फ़िलिस्तीन के समर्थन में उठा सुर: ‘दोनना’ बना दमन के खिलाफ वैश्विक प्रतिरोध का गीत
बर्लिन की कलाकार सिबा अलखियामी द्वारा लिखा और गाया गया गीत दोनना साल 2026 में सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा है, जबकि यह गीत मूल रूप से 2024 में बनाया गया था. आर्टिस्ट मंकी मैन के साथ तैयार किया गया यह ट्रैक अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर रहा है.
मोदी बनाम ममता: पूरा दिल्ली दरबार उतर आया है एक राज्य के चुनाव को जीतने?
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार और केंद्र के बीच लगभग बहुत सारे मुद्दों और मोर्चों पर टकराव चल रहा है. इनमें प्रमुख रूप से चुनावी रणनीतिकार संस्था I-PAC के दफ्तरों पर ईडी (ED) के छापे और उसके सह-संस्थापक विनेश चंदेल की गिरफ्तारी शामिल है. ममता बनर्जी का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियां उनके 800 से ज्यादा बूथ एजेंटों को गिरफ्तार करने की योजना बना रही हैं.
महंगी होती पढ़ाई: स्कूल फीस, कोचिंग और बढ़ता ख़र्च परिवारों पर भारी
भारत में बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च लगातार बढ़ रहा है. परिवार अब स्कूल के साथ-साथ निजी कोचिंग पर भी ज़्यादा पैसा ख़र्च कर रहे हैं. 2025 के शिक्षा सर्वे के अनुसार, सेकेंडरी स्कूल के लगभग 38% छात्र कोचिंग लेते हैं, जबकि प्राइमरी स्तर पर यह संख्या 25% से भी कम है.
नेपाल में जेन ज़ी का इन्क़लाब: 'ट्रॉमा' से 'उम्मीद' तक का सफ़र
बालेन शाह की सरकार ने 12 लाख नौकरियाँ पैदा करने और डिजिटल गवर्नेंस का वादा किया है. क्या एक रैपर प्रधानमंत्री और ये युवा सांसद नेपाल की तक़दीर बदल पाएंगे? पूरी दुनिया की नज़रें अब इस हिमालयी देश पर हैं, जो जेन जी की आकांक्षाओं का ग्लोबल टेस्ट केस बन गया है.
चौराहे पर बदरुद्दीन अजमल: असम के मुस्लिमों का मोहभंग, एआईयूडीएफ के लिए अग्निपरीक्षा
असम के विवादित राजनीतिक परिदृश्य में, बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ अल्पसंख्यक वोटों पर अपनी पकड़ के कारण एक प्रमुख राजनीतिक खिलाड़ी रही है. हालांकि, आगामी विधानसभा चुनावों में सभी की निगाहें इस बात पर टिकी होंगी कि बंगाली भाषी मुसलमानों से जुड़ी यह पार्टी कैसा प्रदर्शन करती है. यह सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का पतन देखने को मिला था, जिसमें अजमल खुद धुबरी सीट पर कांग्रेस के रकीबुल हसन से 10 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से हार गए थे.
आकार पटेल: ईरान को छोड़कर किसी भी अन्य देश की तुलना में भारतीयों ने सबसे अधिक कष्ट झेला है और झेल रहे हैं
हमारी अक्षमता को हम कैसे समझते हैं? या, यदि हम थोड़ी उदारी बरतें तो हमारी झिझक को, जो हमारे आस-पास की दुनिया को प्रभावित करने में आड़े आती है. दुनिया के बाक़ी हिस्सों की तरह, भारत भी ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली युद्ध से नकारात्मक रूप से प्रभावित है. वास्तव में, ईरान को छोड़कर किसी भी अन्य देश की तुलना में भारतीयों ने सबसे अधिक कष्ट झेला है और झेल रहे हैं. इसका कारण, निश्चित रूप से, यह है कि खाड़ी में लगभग एक करोड़ भारतीय हैं, जो छह जीसीसी (GCC) देशों में से पाँच की संयुक्त नागरिक आबादी से भी बड़ी जनसंख्या है.
आकार पटेल: एक कमज़ोर राष्ट्र के रूप में हमने दब्बू बने रहना चुना है
जहाँ सच्चे राष्ट्रीय हितों का सवाल उठता है, जहाँ विरोध करना मुश्किल और बात मानना आसान होता है, वहाँ हम अक्सर और शायद हमेशा घुटने टेक देते हैं. रूसी तेल मत खरीदो. जी सर. रूसी तेल खरीदो. ठीक है सर. कोई ईरानी तेल नहीं. जी सर. अब अमेरिका को हमें यह बताने की भी ज़रूरत नहीं है कि हमें क्या कहना है या क्या नहीं कहना है. हम अपने दिल में जानते हैं कि ईरान के इस बेवकूफ़ी भरे युद्ध पर सच बोलने से ट्रम्प नाराज़ हो जाएँगे और इसलिए हम दूसरी तरफ़ देखने लगते हैं, क्योंकि अगर हम उस दबंग की आँखों में आँखें डालेंगे, तो वह हमें सीधा कर देगा.
रीथ लेक्चर्स 2 : कैसे शुरू करें एक नैतिक क्रांति
इतिहास उन लोगों द्वारा नहीं बदला जाता है जिनका अपना कोई दांव नहीं लगा है, निंदकों द्वारा नहीं जो समझाते हैं कि चीज़ें कभी काम क्यों नहीं करेंगी, या चतुर आवाज़ों द्वारा जो हर ख़ामी को इंगित करते हैं, कुछ ऐसा जो मैंने विशेष रूप से अक्सर पत्रकारों के बीच देखा है. परिवर्तन उन लोगों से आता है जो शर्मिंदगी का जोख़िम उठाते हैं, जो ग़लतियाँ करते हैं, जो गिर जाते हैं और फिर से खड़े हो जाते हैं. वो वे हैं जो अपने आराम से बड़े किसी उद्देश्य के लिए ख़ुद को समर्पित करने का साहस करते हैं. कभी वो जीतते हैं. अक्सर वो असफल हो जाते हैं.
रटगर ब्रैगमैन का तीसरा भाषण : सरकार सिर्फ चेक नहीं काटती. वह सबसे बड़े, सबसे साहसी जोखिम उठा सकती है.
रटगर ब्रैगमैन ने बीबीसी रीथ लेक्चर्स का तीसरा हिस्सा स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरा यूनिवर्सिटी में पढ़ा. यह राजधानी शहर ब्रैगमेन के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि किसी ज़माने में यह ‘स्कॉटिश एनलाइटनमेंट’ (स्कॉटिश ज्ञानोदय) का पालना हुआ करता था. एडिनबरा यूनिवर्सिटी में 18वीं और 19वीं सदी के दौरान, सदाचार या ‘वर्च्यू’ के विचारों ने उस दौर के सबसे महान विचारकों को घेरे रखा था. अब, 21वीं सदी में, वही सदाचार का विचार रटगर ब्रैगमैन की ‘नैतिक क्रांति’ सीरीज़ के केंद्र में है. वह पूछ रहे हैं कि हम अच्छाई को फिर से फैशनेबल कैसे बना सकते हैं? अब यह सवाल सुनने में तो बहुत सरल लगता है, लेकिन क्या इसका जवाब भी उतना ही सीधा है? अपनी बात बेबाकी से रखने के लिए मशहूर, रटगर ब्रैगमैन हमारे सोचने और जीने के तरीके में पूरी तरह से बदलाव की वकालत कर रहे हैं. उनका मानना है कि आम लोगों के छोटे-छोटे समूह अगर साथ मिलकर काम करें, तो वे पूरी दुनिया को बदल सकते हैं. इस तीसरे लेक्चर का शीर्षक है, ‘अ कॉन्सपिरेसी ऑफ डीसेंसी’ यानी ‘शराफ़त की साज़िश’.
रटगर ब्रेगमन का 2025 का चौथा और अंतिम रीथ लेक्चर
यह रटगर ब्रेगमन का 2025 का चौथा और अंतिम रीथ लेक्चर है, जो स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी, सिलिकॉन वैली के केंद्र में दिया गया था. इस व्याख्यान में ब्रेगमन अपनी किशोरावस्था के दार्शनिक संकट से लेकर बर्ट्रेंड रसेल से प्रेरणा, मानव विकास की कहानी, और आज के डिजिटल युग में मानवता के सामने आने वाली चुनौतियों तक का सफ़र तय करते हैं. वे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के खतरों पर चर्चा करते हुए यह सवाल उठाते हैं कि इस तकनीकी क्रांति के दौर में हमें क्या पवित्र मानना चाहिए और मानवता की रक्षा कैसे करनी चाहिए. यह व्याख्यान धर्म के पाँच मूलभूत सवालों - हम कौन हैं, हम कहाँ से आए हैं, हम कहाँ जा रहे हैं, हमें कैसे जीना चाहिए, और क्या पवित्र है - के इर्द-गिर्द घूमता है. मोरल रेवोल्यूशन नाम की अपनी व्याख्यान श्रृंखला में, उन्होंने पहले ही हमारे राजनीतिक अभिजात वर्ग को उनके पतन और गैर-गंभीरता के लिए फटकार लगाई है. उन्होंने कहा कि इतिहास हमें बहुत कुछ सिखाता है कि कैसे छोटे समूह संगठित होकर दुनिया को बदल सकते हैं और कैसे व्यक्ति पूरी तरह से हमारे जीवन जीने के तरीके को फिर से ढाल सकते हैं, कभी-कभी बहुत ही क्रांतिकारी तरीकों से. अब, यह भाषण बिग टेक के बारे में केंद्रित है. क्या यह नियंत्रण से बाहर है? क्या यह मानव होने का सार ही खतरे में डाल रहा है? उन्होंने इस व्याख्यान को मशीन के युग में मानवता के लिए संघर्ष नाम दिया है. पहले तीन लैक्चर हिंदी में आप यहां, यहां और यहां पढ़ सकते हैं.

