11/02/2026: मोदी पर भारत माता बेचने का आरोप | राहुल की रणनीति | हरदीप एपस्टीन कई बार मिले | मुस्लिम छात्रों का सेक्शन अलग | किसान और सेब उत्पादक नाराज़ | भारत बंद आज | टैरिफ डील पर जयति घोष
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
भारत-अमेरिका डील पर घमासान: राहुल गांधी का आरोप, “मोदी सरकार ने भारत माता और ऊर्जा सुरक्षा को अमेरिका के पास गिरवी रख दिया.”
एपस्टीन फाइलों पर मंत्री की सफाई: हरदीप सिंह पुरी ने स्वीकारा, “जेफ्री एपस्टीन से 3-4 बार मिला था, लेकिन सिर्फ प्रोफेशनल काम के लिए.”
किसानों पर दोहरी मार: अमेरिकी कृषि उत्पादों पर टैक्स कम होने से मक्का और सोयाबीन के दाम गिरे, 12 फरवरी को भारत बंद का ऐलान.
इंदौर में ‘धार्मिक’ क्लासरूम: स्कूल पर आरोप- मुस्लिम छात्रों के लिए बनाया अलग ‘M’ सेक्शन, एनुअल फंक्शन भी अलग किया.
बंगाल में भूख से मौत: चाय बागान मजदूर की मौत ने खोली पोल, 4 महीने से नहीं मिला था वेतन, कुपोषण का शिकार हैं 38% मजदूर.
ट्रम्प का परमाणु दावा: डोनाल्ड ट्रम्प बोले- “मैंने टैरिफ की धमकी देकर भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध रोका.”
भारत-अमेरिका समझौता
‘आपने भारत माता को बेच दिया है, क्या आपको शर्म नहीं आती?’
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को दावा किया कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते ने भारतीयों के भविष्य को वाशिंगटन के सामने गिरवी रख दिया है.
संघीय बजट पर लोकसभा में अपने भाषण के दौरान राहुल ने कहा, “व्यापार समझौते के तहत हमारी ऊर्जा सुरक्षा अमेरिका को सौंप दी गई है. यह पूरी तरह से आत्मसमर्पण है.” उन्होंने आगे कहा, “आपने (सरकार) मशीनीकृत अमेरिकी फार्मों के लिए दरवाजे खोल दिए हैं, आपने हमारे गरीब किसानों को कुचलने का रास्ता साफ कर दिया है. यह शर्मनाक है.”
“द टेलीग्राफ ब्यूरो” के अनुसार, राहुल ने कहा कि कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री, यहां तक कि नरेंद्र मोदी भी, इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए सहमत नहीं होते, “जब तक कि उनका गला न घोंटा गया हो (या वे भारी दबाव में न हों).”
राहुल ने आरोप लगाया, “मोदी ने 140 करोड़ भारतीयों के भविष्य का समर्पण कर दिया, क्योंकि वे भाजपा के वित्तीय ढांचे की रक्षा करना चाहते थे.” कांग्रेस नेता ने इस व्यापार समझौते को अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी की गई ‘जेफ्री एपस्टीन फाइलों’ के खुलासों से जोड़ने की कोशिश की, जिसका सत्ता पक्ष के सांसदों ने कड़ा विरोध किया. जब राहुल गांधी बोल रहे थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा में मौजूद नहीं थे.
राहुल ने कहा, “आपने भारत को बेच दिया है. क्या आपको भारत को बेचने में शर्म नहीं आती? आपने हमारी माता, भारत माता को बेच दिया है.”
राहुल ने डेटा (आंकड़ों) के बिंदु को आगे बढ़ाया. उन्होंने कहा: “यदि हम (इण्डिया गठबंधन) राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ बातचीत कर रहे होते, तो हम कहते कि भारतीय डेटा सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति है और डॉलर की रक्षा के लिए प्रमुख कुंजी है. यदि अमेरिका इस डेटा तक पहुंच चाहता है, तो उसे भारत के साथ एक समान भागीदार के रूप में जुड़ना होगा, न कि एक अधीनस्थ (जूनियर) के रूप में. हम यह भी स्पष्ट कर देते कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा करेगा और अपने स्वयं के किसानों के हितों को सुरक्षित रखेगा.”
उन्होंने आगे कहा: “बजट यह स्वीकार करता है कि हम एक खतरनाक समय की ओर बढ़ रहे हैं. भू-राजनीतिक संघर्ष तेज हो रहे हैं. बजट यह मानता है कि दुनिया भर में ऊर्जा और वित्त को हथियार बनाया जा रहा है. डॉलर को हथियार बनाया जा रहा है, डॉलर का मूल्य कमजोर हो रहा है, और सोने-चांदी की कीमतें बढ़ रही हैं. लेकिन बजट में ऐसा बिल्कुल कुछ भी नहीं है जो इन मुद्दों पर ध्यान देता हो.”
राहुल ने कहा कि भारत के लिए उसका डेटा सबसे बड़ी ताकत है जो देश के पास है और इसका उपयोग किसी भी बातचीत की मेज पर किया जा सकता है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, विपक्ष के नेता ने कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत ऊर्जा सुरक्षा खत्म हो गई है, और अब अमेरिका यह तय करेगा कि “हम किससे तेल खरीदेंगे.” गांधी ने कहा कि किसानों के हितों के साथ समझौता किया गया है और किसान अब एक “तूफान” का सामना कर रहे हैं, क्योंकि अमेरिका के कृषि उत्पाद भारतीय बाजारों में भर जाएंगे.
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भारतीय कपड़ा उद्योग “खत्म” हो गया है. कांग्रेस नेता ने कहा कि “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनएसए अजीत डोभाल ने कहा था कि युद्ध का युग समाप्त हो चुका है. लेकिन हकीकत यह है कि हम युद्ध के युग की ओर बढ़ रहे हैं.” उन्होंने रेखांकित किया, “एक खतरनाक दुनिया की ओर बढ़ते हुए, हमें अपनी शक्तियों को समझना होगा, और हमारे देश की मुख्य शक्ति हमारे लोग हैं.” उन्होंने देश के लोगों, डेटा, खाद्य आपूर्ति और ऊर्जा प्रणाली की रक्षा करने की आवश्यकता पर जोर दिया.
एपस्टीन फाइलों में नाम आने के बाद भी अनिल अंबानी जेल में क्यों नहीं हैं?
“द इकनॉमिक टाइम्स” के मुताबिक, राहुल गांधी ने यह सवाल भी उठाया कि उद्योगपति अनिल अंबानी जेल में क्यों नहीं हैं, और आरोप लगाया कि उनका नाम एपस्टीन से जुड़ी फाइलों में आया है. लोकसभा में अपने भाषण के दौरान इस मुद्दे को उठाते हुए राहुल गांधी ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का भी जिक्र किया और दावा किया कि पुरी जानते हैं कि अनिल अंबानी का परिचय एपस्टीन से किसने कराया था. उन्होंने कहा, “एक व्यवसायी अनिल अंबानी हैं, मैं पूछना चाहता हूँ कि वह जेल में क्यों नहीं हैं? कारण यह है कि उनका नाम एपस्टीन फाइलों में है. मैं हरदीप पुरी से भी पूछना चाहूँगा कि उनका परिचय एपस्टीन से किसने कराया. मैं जानता हूँ कि उनका परिचय किसने कराया, और हरदीप पुरी भी जानते हैं कि उनका परिचय किसने कराया.”
अडानी मामले में एसईसी ने समन जारी किए, लेकिन 18 माह में सरकार ने जवाब नहीं दिया
राहुल गांधी ने अमेरिका में अडानी समूह की चल रही जांच का भी उल्लेख किया और सरकार से स्पष्टीकरण मांगा. इस मामले में अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (एसईसी) से जुड़ी कार्यवाही का संदर्भ दिया गया. कांग्रेस ने पहले भी सवाल किया है कि क्या प्रधानमंत्री अडानी समूह के खिलाफ एसईसी की जांच में जवाब देंगे या सहयोग की सुविधा प्रदान करेंगे. राहुल गांधी की इन टिप्पणियों के कारण सदन में तीखी नोकझोंक हुई, क्योंकि सत्ता पक्ष के सदस्यों ने विपक्ष के इन संदर्भों पर आपत्ति जताई. संसद के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए, गांधी ने दावा किया कि अडानी समूह के खिलाफ चल रहे मामले में समन जारी किए गए थे, लेकिन भारत सरकार ने पिछले 18 महीनों से कोई जवाब नहीं दिया है.
राहुल के हमले के पीछे की रणनीति
लोकसभा में बजट पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इंडो-यूएस (भारत-अमेरिका) व्यापार समझौते को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर अब तक का सबसे तीखा और विस्तृत हमला बोला है. इंडियन एक्सप्रेस में मनोज सीजी की रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी ने अपने भाषण में 2008 के परमाणु समझौते की यादें ताज़ा कर दीं, लेकिन इस बार सियासी भूमिकाएं पूरी तरह बदली हुई थीं. उन्होंने वही तर्क और शब्दावली इस्तेमाल की, जो कभी भाजपा (उस समय विपक्ष में) ने कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के खिलाफ इस्तेमाल की थी.
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी बाहरी दबाव में हैं और उन्होंने भारत की संप्रभुता और ‘भारत माता’ का सौदा कर लिया है. उन्होंने कहा कि अगर ‘इंडिया’ गठबंधन की सरकार यह समझौता करती, तो वह अमेरिका से बराबरी के स्तर पर बात करती, न कि ‘नौकर’ की तरह. उनका यह बयान अमेरिका द्वारा भारत को रूस से तेल न खरीदने की शर्त रखने के संदर्भ में था.
‘इतिहास खुद को दोहरा रहा है’ : राहुल गांधी ने सदन को याद दिलाया कि कैसे 2008 में भाजपा ने परमाणु डील को “असमानों के बीच समझौता” बताया था. उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी के पुराने बयानों का हवाला दिया, जिसमें आडवाणी ने कहा था कि वह डील भारत को “अधीनस्थ भागीदार” बनाती है. ठीक उसी तर्ज पर, राहुल ने बुधवार को कहा कि मोदी सरकार ने अमेरिका के सामने घुटने टेक दिए हैं. उन्होंने कहा, “हम वहां (अमेरिका) बराबरी से जाते... हमें पाकिस्तान के बराबर नहीं बनाया जाता.”
डेटा और डिजिटल गुलामी का आरोप : राहुल गांधी ने डील की शर्तों की बारीकियों पर हमला करते हुए कहा कि सरकार ने डेटा और डिजिटल व्यापार के नियमों पर हथियार डाल दिए हैं. उन्होंने कहा, “डेटा 21वीं सदी में हमारी सबसे कीमती संपत्ति है... यह हमें सुपरपावर बना सकता है. लेकिन हमने डिजिटल व्यापार नियमों पर नियंत्रण छोड़ दिया है. डेटा को स्थानीय स्तर पर रखने (डेटा लोकलाइजेशन) की कोई शर्त नहीं है, सोर्स कोड का खुलासा करने की जरूरत नहीं है और अमेरिकी कंपनियों को 20 साल का टैक्स हॉलिडे दे दिया गया है.”
उन्होंने टैरिफ (आयात शुल्क) का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जहां औसत टैरिफ 3% था, वह अब 18% हो गया है. अमेरिकी आयात 46 बिलियन डॉलर से बढ़कर 146 बिलियन डॉलर होने वाला है, जबकि अमेरिका ने अपने टैरिफ 16% से घटाकर शून्य कर दिए हैं. राहुल ने कहा, “हम वहां बेवकूफों की तरह खड़े हैं. हमारे पास कोई प्रतिबद्धता नहीं है.”
‘पीएम की गर्दन पर पकड़’ : अपने भाषण के सबसे विस्फोटक हिस्से में, राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री ऐसा समझौता तभी करेगा जब उस पर कोई भारी दबाव या “चोकहोल्ड” हो. उन्होंने अमेरिका में अडानी के खिलाफ रिश्वतखोरी के मामले और बहुचर्चित ‘एपस्टीन फाइलों’ का जिक्र किया.
राहुल ने कहा, “लॉजिक ही नहीं है . मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय पीएम ऐसा करेगा. यह सरेंडर है. यह पूरी तरह से आत्मसमर्पण है... पीएम कम्प्रोमाइज कर चुके हैं . उन्होंने 1.5 अरब भारतीयों के भविष्य का सरेंडर कर दिया है.”
विश्लेषण
जयंती घोष : भारत-अमेरिका डील इकतरफा और विनाशकारी है
‘संयुक्त राज्य अमेरिका-भारत संयुक्त बयान’ पढ़ने पर जो पहला सवाल मन में उठता है, वह है: क्यों? भारत को अभी अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की घोषणा करने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी? यह हड़बड़ी तब दिखाई गई जब अमेरिका के अधिकांश अन्य व्यापारिक साझेदार ट्रम्प के शुल्कों की वैधता पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं.
प्रख्यात अर्थशास्त्री और यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स की प्रोफेसर जयंती घोष ने ‘द वायर’ के लिए अपने लेख में इस समझौते पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि भारत सरकार ने इतनी बड़ी रियायतें क्यों दीं? सरकार ने ऐसे वादे क्यों किए जो या तो पूरे नहीं किए जा सकते या फिर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए तबाही का कारण बनेंगे?
क्या महज थोड़े कम टैरिफ का इनाम (माल निर्यात पर जो भारत की जीडीपी का 2% से भी कम है) इतना बड़ा है कि उसके लिए आत्मसम्मान से समझौता किया जाए? विशेष रूप से तब जब अमेरिका की टैरिफ दरें अभी भी अप्रैल 2025 से पहले की तुलना में कई गुना अधिक हैं. और सबसे अपमानजनक यह है कि भारत इस बात के लिए सहमत हो गया है कि अमेरिका इसकी ‘निगरानी’ करेगा कि भारत रूस से तेल खरीद रहा है या नहीं.
खोखले दावे और कड़वी हकीकत
आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि “भारत ने 30 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी बाजार तक पहुंच बनाई है.” घोष लिखती हैं कि यह पूरी तरह भ्रामक है. वास्तव में, तरजीही पहुंच केवल 10 बिलियन डॉलर के भारतीय निर्यात के लिए है. इसके अलावा, कपड़ा, चमड़ा, और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में भारत को अभी भी 18% टैरिफ का सामना करना पड़ेगा, जिससे वियतनाम और मलेशिया (19-20% टैरिफ वाले) के मुकाबले भारत की प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाएगी. फार्मास्यूटिकल्स और रत्न जैसे प्रमुख क्षेत्रों को अभी कोई लाभ नहीं मिलेगा, उन्हें “अंतरिम समझौते” का इंतजार करना होगा.
किसानों पर दोहरी मार
जयंती घोष के अनुसार, भारत ने कृषि क्षेत्र में जो रियायतें दी हैं, वे भयावह हैं. सरकार ने अमेरिकी “ऊर्जा उत्पादों, विमानों और कोकिंग कोल” की खरीद के लिए अगले 5 वर्षों में 500 बिलियन डॉलर खर्च करने का इरादा जताया है, जो भारत के मौजूदा कुल आयात से भी दोगुना है और इसे पूरा करना असंभव है.
इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों जैसे ज्वार, सोयाबीन तेल और फलों पर टैरिफ कम या खत्म कर दिया है.
ज्वार : इस पर मौजूदा टैरिफ 57.75% है. अब अमेरिकी सब्सिडी वाला ज्वार भारत में आएगा, जिससे राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों के किसान बर्बाद हो जाएंगे.
सोयाबीन तेल: एक तरफ सरकार ‘खाद्य तेल मिशन’ और ‘आत्मनिर्भरता’ की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ शुल्क मुक्त सोयाबीन तेल का आयात मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के किसानों की कमर तोड़ देगा.
बागवानी: कश्मीर के सेब उत्पादकों से लेकर देशभर के फल उत्पादकों पर इसका गंभीर असर होगा.
घोष अंत में पूछती हैं कि जब अप्रैल-दिसंबर 2025 में भारतीय निर्यात में 2.2% की वृद्धि हुई थी, तो इस एकतरफा समझौते की क्या मजबूरी थी? क्या यह किसी उद्योगपति को बचाने के लिए है या सरकार अपनी विफलताओं से ध्यान भटाने की कोशिश कर रही है? कारण जो भी हो, यह समझौता भारत के लिए आर्थिक रूप से विनाशकारी साबित हो सकता है.
हरदीप सिंह पुरी ने माना कि एपस्टीन से वह 3-4 बार मिले थे
राहुल गांधी के भाषण में अपना नाम आने के बाद मोदी सरकार में मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और यह माना कि वह यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से तीन या चार बार मिले थे. उन्होंने कहा, यह बातचीत पूरी तरह से प्रोफेशनल थी, जो इंडिपेंडेंट कमीशन ऑन मल्टीलेटरलिज्म और दूसरे अंतर्राष्ट्रीय कामों से जुड़ी थी. उन्होंने एपस्टीन के आपराधिक मामलों से अपना कोई संबंध होने के आरोपों को बेबुनियाद बताया. पुरी ने कहा, जब मैंने मई 2009 से न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत के रूप में कार्यभार संभाला था, तब से लेकर 2017 में मंत्री बनने तक की अवधि के 30 लाख ईमेल जारी किए गए हैं. इस दौरान, केवल तीन या चार बैठकों का ही जिक्र मिलता है और मेरी बातचीत पूरी तरह से पेशेवर थी.
किसानों और सेब उत्पादकों में हाहाकार: ‘हम मुकाबला नहीं कर सकते’
भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते के बाद देश के कृषि क्षेत्र में भारी आर्थिक उथल-पुथल मच गई है. रॉयटर्स और द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली द्वारा अमेरिकी सोया तेल और मक्का आधारित जानवरों के चारे (डीडीजीएस) के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति देने के बाद बुधवार को भारतीय बाजारों में मक्का और सोयाबीन की कीमतों में तत्काल गिरावट दर्ज की गई. सोयाबीन की कीमतों में 10% और मक्का की कीमतों में 4% की गिरावट आई है, जिससे किसानों में डर और गुस्सा है. मक्का की कीमतें सरकार के समर्थन मूल्य (2,400 रुपये) से काफी नीचे लुढ़क कर 1,820 रुपये प्रति 100 किलोग्राम पर आ गई हैं. यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब भारत में मक्का का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर है.
किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार ने यह समझौता करने से पहले किसानों से कोई चर्चा नहीं की. उन्होंने कहा, “हमें अंधेरे में रखा गया... यह कृषि क्षेत्र पर एक बड़ा प्रहार है, जो भारत की रीढ़ है.” टिकैत ने चेतावनी दी है कि 12 फरवरी को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन होगा और इसके बाद आंदोलन को और तेज किया जाएगा.
कश्मीर और हिमाचल की सेब अर्थव्यवस्था पर संकट
इस डील का असर सिर्फ अनाज तक सीमित नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर और हिमाचल प्रदेश की 10,000 करोड़ रुपये की सेब अर्थव्यवस्था पर भी अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है. सोपोर फ्रूट मंडी के अध्यक्ष फैयाज अहमद मलिक ने कहा, “यह डील हमारे लिए तबाही लाएगी. हम अमेरिकी उत्पादकों का मुकाबला नहीं कर सकते. वहां की सरकार खेती के हर चरण में मदद करती है, उन्हें भारी सब्सिडी मिलती है, जबकि हमें यहां फसल बीमा तक नहीं मिलता.”
हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादकों ने 12 फरवरी को बंद का आह्वान किया है और कश्मीर के उत्पादक भी इसी राह पर चलने पर विचार कर रहे हैं. किसानों का कहना है कि पहले ही ईरानी सेबों की डंपिंग ने बाजार गिरा दिया था और अब अमेरिकी सेबों और कृषि उत्पादों के लिए दरवाजा खोलना उनकी आजीविका खत्म कर देगा. राहुल गांधी ने भी अपने भाषण में इसी मुद्दे को उठाया था कि मशीनीकृत अमेरिकी फार्म हमारे गरीब किसानों को कुचल देंगे.
सोनम वांगचुक हिंसा भड़का रहे थे या चेतावनी दे रहे थे?
बुधवार (11 फरवरी, 2026) को सुप्रीम कोर्ट में लद्दाख के जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत को लेकर अहम सुनवाई हुई. द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत से साफ कहा कि वांगचुक “पूरी तरह स्वस्थ” हैं और उन्हें स्वास्थ्य आधार पर रिहा नहीं किया जा सकता.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ को बताया कि हिरासत के दौरान वांगचुक की 24 बार मेडिकल जांच की गई है. उन्हें पाचन संबंधी कुछ समस्याएं थीं, जिनका इलाज किया जा रहा है, लेकिन कोई चिंताजनक बात नहीं है. मेहता ने कहा, “हम इस तरह के अपवाद नहीं बना सकते... जिन आधारों पर हिरासत का आदेश दिया गया था, वे आज भी कायम हैं.” सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प बहस तब हुई जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने वांगचुक को हिंसक विरोध प्रदर्शनों का “मुख्य उकसाने वाला” करार दिया. उन्होंने दलील दी कि वांगचुक ने युवाओं को उकसाने के लिए ‘नेपाल’ और ‘अरब स्प्रिंग’ जैसे हिंसक आंदोलनों का उदाहरण दिया था.
इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र की दलील पर सवाल उठाया. जजों ने टिप्पणी की, “वह (वांगचुक) कहां ऐसा कह रहे हैं? वह तो कह रहे हैं कि युवा ऐसा कह रहे हैं... अगर कोई यह चिंता जताता है कि हिंसक तरीका सही नहीं है, तो आप इसका बहुत ज्यादा अर्थ निकाल रहे हैं.” वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने ‘हैबियस कॉर्पस’ याचिका दायर कर उनकी एनएसए के तहत हिरासत को चुनौती दी है. उनका कहना है कि वांगचुक ने हमेशा हिंसा की निंदा की है और लद्दाख की “तपस्या” को शांतिपूर्ण रखने की वकालत की है.
अडानी मानहानि मामले में पत्रकार रवि नायर दोषी करार, एक साल की जेल
गुजरात के गांधीनगर की एक अदालत ने पत्रकार रवि नायर को अडानी ग्रुप के खिलाफ किए गए ट्वीट्स के लिए आपराधिक मानहानि का दोषी ठहराया है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मानसा स्थित मजिस्ट्रेट अदालत ने नायर को एक साल की कैद और जुर्माने की सजा सुनाई है.
यह मामला अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड द्वारा दायर किया गया था. कंपनी ने आरोप लगाया था कि रवि नायर ने कई ऐसे ट्वीट प्रकाशित और प्रसारित किए जिनमें झूठे और अपमानजनक बयान थे. कंपनी का तर्क था कि इन ट्वीट्स का उद्देश्य जनता और निवेशकों की नजरों में कंपनी और अडानी समूह की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना था. बचाव पक्ष की ओर से यह दलील दी जा सकती थी कि यह “उचित टिप्पणी” या पत्रकारिता के तहत वैध आलोचना थी, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया. पूरे ट्रायल के बाद, कोर्ट ने माना कि अडानी एंटरप्राइजेज ने अपना मामला सफलतापूर्वक साबित कर दिया है और नायर के ट्वीट जानबूझकर कंपनी की विश्वसनीयता कम करने के लिए डिजाइन किए गए थे. फैसले के तुरंत बाद रवि नायर की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है.
ओडिशा: दलित रसोइये की नियुक्ति पर बहिष्कार, 3 महीने से खाली पड़ा आंगनवाड़ी केंद्र
ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले में जातिगत भेदभाव का एक बेहद गंभीर और शर्मनाक मामला सामने आया है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एक आंगनवाड़ी केंद्र में दलित महिला को रसोइया-सह-सहायिका नियुक्त किए जाने के विरोध में ग्रामीणों ने अपने बच्चों को भेजना बंद कर दिया है. पिछले तीन महीनों से यहां उपस्थिति लगभग शून्य है.
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता लिजारानी पांडव ने बताया कि गांव के लोग इस नियुक्ति से नाराज हैं. केंद्र में 6 महीने से 3 साल तक के 22 बच्चे और 3 से 6 साल के 20 बच्चे पंजीकृत हैं. यहां बच्चों को सत्तू और अंडे जैसा पौष्टिक आहार मिलता है, लेकिन माता-पिता न तो बच्चों को भेज रहे हैं और न ही राशन ले रहे हैं. यहां तक कि एक स्तनपान कराने वाली मां ने भी राशन लेने से मना कर दिया है.
अधिकारियों द्वारा कई बार बैठकें करने और समझाने के बाद भी गतिरोध बना हुआ है. सीडीपीओ दीपाली मिश्रा ने बताया कि बुधवार को जिला प्रशासन के अधिकारियों ने गांव का दौरा किया. कुछ माता-पिता बच्चों को भेजने पर सहमत हुए हैं, जबकि कुछ ने फैसला लेने के लिए तीन दिन का समय मांगा है. केंद्रपाड़ा के कलेक्टर ने कहा है कि सब-कलेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी.
“टैरिफ की बात न करता तो भारत-पाक में परमाणु युद्ध हो सकता था, 10 विमान गिरा दिए गए थे”
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने इस दावे को फिर से दोहराया है कि उन्होंने शुल्कों (टैरिफ) के माध्यम से पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को रोका था, जो उनके अनुसार परमाणु युद्ध में बदल सकता था.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, ट्रम्प ने मंगलवार को ‘फॉक्स बिजनेस’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा, “मैंने आठ युद्ध सुलझाए हैं. उन आठ युद्धों में से कम से कम छह युद्ध टैरिफ की वजह से सुलझे. दूसरे शब्दों में, मैंने कहा, ‘अगर आप इस युद्ध को नहीं सुलझाते हैं, तो मैं आप पर टैरिफ लगाऊँगा, क्योंकि मैं लोगों को मरते हुए नहीं देखना चाहता.”
ट्रम्प ने आगे कहा, “और उन्होंने (संबंधित देशों) कहा, ‘भला, इसका इससे क्या लेना-देना है?’ मैंने कहा, ‘आप पर शुल्क लगाया जाएगा.’ जैसे भारत और पाकिस्तान. मेरी राय में, यह एक परमाणु युद्ध होता. वे सच में युद्ध में उतर चुके थे, 10 विमान गिरा दिए गए थे. वे आपस में लड़ रहे थे.”
उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा था, ‘राष्ट्रपति ट्रम्प ने कम से कम 1 करोड़ लोगों की जान बचाई जब उन्होंने हमें लड़ने से रोका.’ क्योंकि मेरी राय में, वे परमाणु युद्ध की ओर बढ़ रहे थे. टैरिफ के बिना, ऐसा नहीं हो पाता.
बता दें कि ट्रम्प पिछले साल 10 मई से अब तक 80 से अधिक बार भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रोकने का श्रेय ले चुके हैं, जब उन्होंने सोशल मीडिया पर घोषणा की थी कि वाशिंगटन की मध्यस्थता में हुई बातचीत के बाद दोनों पड़ोसी देश “पूर्ण और तत्काल” संघर्षविराम के लिए सहमत हो गए हैं. भारत ने लगातार किसी भी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से इनकार किया है.
‘गोली मारने’ वाले वीडियो पर फजीहत के बाद असम भाजपा ने सोशल मीडिया इंचार्ज को हटाया, सीएम सरमा बोले- जानकारी नहीं थी
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का एक विवादित वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के बाद मचे बवाल पर भाजपा बैकफुट पर है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, असम भाजपा ने उस वीडियो को डिलीट कर दिया है और इसे पोस्ट करने वाले सोशल मीडिया टीम के एक सह-संयोजक को पद से हटा दिया है. पार्टी ने अब दावा किया है कि यह पोस्ट “अनधिकृत” थी और इसे एक “अपरिपक्व” व्यक्ति ने बिना अनुमति के डाल दिया था.
क्या था वीडियो में?
पिछले शनिवार को ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर “पॉइंट ब्लैंक शॉट” कैप्शन के साथ एक वीडियो पोस्ट किया गया था. इसमें सीएम सरमा को दो लोगों (जो टोपी पहने थे) की तस्वीर पर राइफल तानते हुए दिखाया गया था. इनमें से एक व्यक्ति कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई जैसा दिख रहा था. वीडियो के अंत में सरमा को काउबॉय की तरह दिखाया गया, जिसके बैकग्राउंड में “बांग्लादेशियों पर कोई रहम नहीं” और “विदेशी मुक्त असम” जैसे नारे लिखे थे.
पार्टी की सफाई
असम भाजपा के सोशल मीडिया प्रभारी रंजीब सरमा और अन्य नेताओं ने सफाई दी है कि पार्टी का इरादा किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाना नहीं था. उन्होंने कहा, “पार्टी अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ है, लेकिन हम गोलियों से मुसलमानों को निशाना बनाने का समर्थन नहीं करते. यह पोस्ट संबंधित अधिकारियों या सीएम ऑफिस से वेट नहीं कराया गया था.”
सीएम सरमा का बयान
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने दावा किया कि उन्हें इस वीडियो की जानकारी नहीं थी. उन्होंने कहा, “हमने इस पर एफआईआर दर्ज की है. असम में हर कोई जानता है कि हम असमिया मुसलमानों के खिलाफ नहीं हैं. हम बांग्लादेशी मुसलमानों के खिलाफ हैं, जिन्हें हम मिया मुस्लिम कहते हैं. भाजपा या मैं एक इंसान के तौर पर असमिया मुस्लिम समुदाय के खिलाफ किसी भी चीज का समर्थन नहीं करते.”
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब असम भाजपा का हैंडल विवादों में आया है. पिछले साल सितंबर में भी एक एआई-जनरेटेड वीडियो पोस्ट किया गया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया था.
12 फरवरी को भारत बंद
केंद्र सरकार की श्रम नीतियों, चार लेबर कोड और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विरोध में केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों ने 12 फरवरी को ‘भारत बंद’ (राष्ट्रव्यापी हड़ताल) का आह्वान किया है. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, इस हड़ताल का असर देश के 600 जिलों में देखने को मिल सकता है.
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) की महासचिव अमरजीत कौर ने पीटीआई को बताया कि इस बार हड़ताल में 30 करोड़ से अधिक श्रमिकों के शामिल होने की उम्मीद है, जो पिछले साल के 25 करोड़ के आंकड़े से ज्यादा है.
प्रमुख मांगें:
चार लेबर कोड (श्रम संहिताओं) को रद्द करना.
मनरेगा की बहाली और बजट बढ़ाना.
पुरानी पेंशन योजना की बहाली.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को वापस लेना.
संयुक्त किसान मोर्चा ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का भी विरोध किया है, जिससे किसानों को नुकसान होने की आशंका है.
क्या बंद रहेगा और कहां असर होगा?
राज्य: अमरजीत कौर के मुताबिक, ओडिशा और असम में पूर्ण बंद रहने की संभावना है. पश्चिम बंगाल और केरल में भी व्यापक असर दिख सकता है.
बैंक: ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज एसोसिएशन सहित कई बैंक यूनियनों ने हड़ताल का समर्थन किया है, जिससे सार्वजनिक बैंकिंग सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं.
परिवहन: कई जगहों पर ‘चक्का जाम’ की योजना है. राज्य परिवहन की बसें और ऑटो-रिक्शा सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं. हालांकि, ट्रेन और उड़ानें अपने समय पर चलेंगी, लेकिन यात्रियों को स्टेशन/एयरपोर्ट पहुंचने में दिक्कत हो सकती है.
स्कूल-कॉलेज: कोई आधिकारिक राष्ट्रीय छुट्टी नहीं है, लेकिन केरल, ओडिशा और बंगाल जैसे राज्यों में स्थानीय समर्थन के कारण संस्थान बंद रह सकते हैं.
क्या खुला रहेगा?
अस्पताल, एम्बुलेंस सेवाएं, मेडिकल स्टोर, हवाई अड्डे और अन्य आवश्यक सेवाएं इस हड़ताल से मुक्त रहेंगी और सामान्य रूप से काम करेंगी.
चाय बागान में मज़दूर की मौत ने खोली भूख, कुपोषण और बकाया वेतन की पोल
‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले के गर्गांडा चाय बागान में एक मज़दूर की मौत ने यह उजागर कर दिया है कि वहां के मज़दूर कितनी गंभीर और खस्ता हालत में काम करने को मजबूर हैं. कई मज़दूरों को महीनों से वेतन नहीं मिला है.
29 जून 2025 को 51 वर्षीय चाय मज़दूर गुंजन नायक की मौत हो गई. मृत्यु प्रमाण पत्र में मौत का कारण दर्ज नहीं है, लेकिन उनकी पत्नी बसंती नायक का कहना है कि वे कई महीनों से भूख और बीमारी से जूझ रहे थे. चार महीने से उन्हें वेतन नहीं मिला था. परिवार केवल सरकारी राशन, ‘हर महीने 15 किलो चावल और 20 किलो गेहूं’ पर निर्भर था. सब्ज़ी खरीदने के लिए राशन का हिस्सा बाज़ार में बेचना पड़ता था. बाद में हालात इतने खराब हो गए कि परिवार दिन में सिर्फ एक बार उबला चावल और नमक खाकर गुज़ारा करने लगा. बसंती के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे और वे अस्पताल नहीं जा सके. अब वे बिना आय के पड़ोसियों के सहारे रह रही हैं.
राइट टू फूड एंड वर्क कैंपेन और पश्चिम बंग चा मजदूर समिति (पीबीसीएमएस) ने गुंजन नायक की मौत के बाद एक सर्वे किया.108 मज़दूरों में से लगभग 38% कुपोषित पाए गए. 26 मजदूर (करीब 24%) का बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) 17 से नीचे था, जिन्हें बेहद कमज़ोर श्रेणी में रखा गया. 14% मज़दूर कम वज़न वाले थे. डॉक्टरों ने गर्गांडा को “भुखमरी का स्थल” बताया, जहां महिलाएं और बच्चे सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, लगातार भूख के कारण मजदूरों में गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा हो गया है. कम बीएमआई और तेजी से वजन घटने के बावजूद कई युवा मजदूर उच्च रक्तचाप और स्ट्रोक जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. बागान की चिकित्सा सुविधा वर्षों से बंद है. नज़दीकी सरकारी अस्पताल दूर है और मज़दूरों के पास बस या ट्रेन का किराया तक नहीं है.
मज़दूरों का कहना है कि राशन परिवार के लिए पर्याप्त नहीं है.“हमारे परिवार में 10 सदस्य हैं, लेकिन राशन एक व्यक्ति के हिसाब से मिलता है , 20 किलो गेहूं, 15 किलो चावल. दाल, तेल कुछ नहीं. चीनी 13.5 रुपये किलो मिलती है, लेकिन पैसे कहां से लाएं?”
चुनाव आयोग की “एब्सेंट, शिफ्टेड एंड डेड (एएसडी)” सूची के अनुसार, जहां राज्य में औसतन प्रति मतदान केंद्र 30 मौतें दर्ज हैं, वहीं मदारीहाट ब्लॉक में यह संख्या 50 है. गर्गांडा चाय बागान के चार मतदान केंद्रों में औसत 80 मौत प्रति केंद्र है, जिनमें बड़ी संख्या 50 वर्ष से कम उम्र के लोगों की है.
2025 में काम अनियमित हो गया और वेतन अक्सर वक़्त पर नहीं मिलता है. करीब 1,200 मज़दूरों में से लगभग 30% दूसरे राज्यों में पलायन कर चुके हैं. मज़दूरों का कहना है कि पिछले साल केवल चार महीने का वेतन मिला.
गर्गांडा चाय बागान का प्रबंधन 2018 में मेरिको एग्रो इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड ने संभाला था, जब डंकन्स गोयनका समूह ने 2015 में इसे छोड़ दिया था. आरोप है कि कंपनी मज़दूरों के वेतन से 12% भविष्य निधि (पीएफ) काट रही है, लेकिन 2023 से यह राशि जमा नहीं की गई. मई 2025 में पश्चिम बंग चा मजदूर समिति ने 1,720 शिकायतें दर्ज कराईं, जिनमें वेतन चोरी और भरोसा तोड़ने के आरोप लगाए गए. मज़दूरों का कहना है कि पुलिस, प्रशासन और श्रम विभाग की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
कंपनी ने आर्थिक संकट का हवाला दिया है. लेकिन 31 मार्च 2024 तक के वित्तीय रिकॉर्ड के अनुसार, मेरिको एग्रो इंडस्ट्रीज की कुल आय 112.4 करोड़ रुपये रही, जो पिछले वर्ष से 12% अधिक है.कंपनी लाभ 70% बढ़कर 1.9 करोड़ रुपये हो गया. कंपनी की ट्रेडिंग शाखा सम्मलेन टी एंड बेवरेजेज प्राइवेट लिमिटेड ने भी मुनाफे में 246.63% और EBITDA में 107.43% वृद्धि दर्ज की.
इस बीच, कई परिवारों के बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं. एक 13 वर्षीय लड़की ने वेतन संकट के कारण स्कूल छोड़ दिया है और घरेलू काम के लिए शहर जाने की तैयारी कर रही है, ताकि परिवार की मदद कर सके.
मध्य प्रदेश के स्कूल में मुस्लिम छात्रों के लिए अलग ‘एम सेक्शन’, वार्षिक समारोह भी अलग
मध्यप्रदेश के इंदौर के खजराना क्षेत्र, जो शहर के सबसे घनी मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में से एक है, स्थित इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बॉम्बे पर धार्मिक आधार पर छात्रों को अलग रखने और इस्लामोफोबिया के आरोप लगे हैं. स्कूल ने हाल ही में दो अलग-अलग वार्षिक समारोह आयोजित किए, एक मुस्लिम छात्रों के लिए और दूसरा गैर-मुस्लिम, मुख्य रूप से हिंदू छात्रों के लिए.
‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ अभिभावकों, एक शिक्षिका और स्थानीय लोगों के अनुसार, यह तफ़रीक़ महज़ वार्षिक समारोह तक सीमित नहीं है. आरोप है कि छात्रों को धर्म के आधार पर अलग-अलग सेक्शन में रखा गया है. कुछ अभिभावकों का यह भी दावा है कि पहले के वर्षों में मुस्लिम उपनामों को स्कोरकार्ड से हटा दिया गया था. यह मामला सोशल मीडिया रील्स और स्थानीय स्तर पर चर्चा के ज़रिये सामने आया.
कक्षा 8 की एक मुस्लिम छात्रा की मां निकहत ने बताया कि उनकी बेटी और अन्य मुस्लिम छात्रों को अपने डांस कार्यक्रम खुद तैयार करने के लिए कहा गया. उन्हें देशभक्ति गीतों पर प्रस्तुति देने की अनुमति नहीं दी गई और पंजाबी गानों पर प्रस्तुति देने को कहा गया.उन्होंने कहा कि जहां अन्य छात्रों को शिक्षकों ने खुद प्रोग्राम के लिए तैयार किया, वहीं मुस्लिम छात्रों ने घर पर वीडियो कॉल के ज़रिये अभ्यास किया. उनका वार्षिक समारोह दो घंटे चला और उसमें कोई मुख्य अतिथि नहीं था, जबकि दूसरे समारोह की अवधि तीन से चार घंटे थी.
निकहत और दूसरे मुस्लिम बच्चोँ के अभिभावकों ने वार्षिक समारोह के दिन स्कूल के मुख्य द्वार पर विरोध प्रदर्शन भी किया. उन्होंने ऐतराज़ ज़ाहिर किया कि आख़िर स्कूल दो अलग-अलग वार्षिक समारोह आयोजित कर क्यों रहा है.
स्कूल में प्रवेश के लिए हिंदू दंपति बनकर पहुंचे पत्रकारों ने गणित शिक्षिका पूनम तिवारी से बात की. तिवारी ने बताया कि वह पिछले एक साल से स्कूल में पढ़ा रही हैं और कक्षा 6 और 7 के “एम” सेक्शन संभालती हैं, जो मुस्लिम छात्रों के हैं. उन्होंने कहा कि स्कूल पढ़ाई और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में अच्छा प्रदर्शन करता है और किसी भी प्रकार की सांप्रदायिक घटना नहीं हुई है. उन्होंने “ए1” और “ए2” सेक्शन में प्रवेश लेने की सलाह दी, जहां हिंदू छात्र बहुमत में हैं.
छात्रों के अलगाव के बारे में पूछने पर तिवारी ने कहा कि पहले मुस्लिम छात्रों को दोपहर की पाली में पढ़ाया जाता था, लेकिन एक साल पहले उन्हें सुबह की पाली में मिला दिया गया. सेक्शन तब से बदले नहीं गए हैं.
प्रशासनिक कर्मचारी निधि जोशी ने बताया कि स्कूल के सात निदेशकों में से एक पहले नीता अंबानी के साथ काम कर चुके हैं और मुंबई के धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल से जुड़े रहे हैं. उन्होंने फीस संरचना और पाठ्यक्रम की जानकारी दी और स्कूल परिसर का दौरा कराया, लेकिन कक्षाएं दिखाने की अनुमति नहीं दी. विवाद पर पूछे जाने पर उन्होंने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि स्कूल सभी को समान अवसर देता है.
जोशी ने मध्य प्रदेश के तीन प्रमुख हिंदी अखबारों, दैनिक भास्कर, नईदुनिया और पत्रिका में प्रकाशित स्कूल के विज्ञापन भी दिखाए. सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बावजूद इन अखबारों में खबर प्रकाशित नहीं हुई थी.
इसके अलावा अभिभावकों का यह भी आरोप है कि पिछले दो-तीन साल से स्कूल प्रशासन सांप्रदायिक आधार पर काम कर रहा है. पिछले साल अकादमिक स्कोरबोर्ड पर मुस्लिम छात्रों के केवल पहले नाम लिखे गए, जबकि गैर-मुस्लिम छात्रों के पूरे नाम लिखे गए.
मुस्लिम छात्रों का वार्षिक समारोह 2 फरवरी 2026 को इंदौर के रवींद्र नाट्य गृह में हुआ, जिसमें लगभग 25 प्रतिशत सीटें भरी थीं और केवल मुस्लिम छात्र व अभिभावक उपस्थित थे. कार्यक्रम दो घंटे चला और कोई मुख्य अतिथि नहीं था. इसके विपरीत, गैर-मुस्लिम छात्रों का समारोह 3 फरवरी 2026 को उसी स्थान पर हुआ, जिसमें 50 प्रतिशत से अधिक उपस्थिति थी, कार्यक्रम तीन से चार घंटे चला, मुख्य अतिथि मौजूद थे और अभिभावकों के लिए जलपान की व्यवस्था थी.
कुछ अभिभावकों का आरोप है कि बुर्का, अबाया, कुर्ता-पायजामा या टोपी पहनकर पहुंचे लोगों को प्रवेश नहीं दिया गया. विरोध के बाद जब अभिभावक अगले दिन स्कूल पहुंचे तो गेट बंद मिले.
एक गैर-मुस्लिम अभिभावक ने कहा कि समाज का माहौल पहले से सांप्रदायिक है और स्कूल ने सुरक्षा के लिहाज़ से अलग व्यवस्था की होगी. उनका कहना था कि मुस्लिम पर्व शब-ए-बरात के कारण अलग कार्यक्रम रखा गया.
अभिभावकों का कहना है कि स्कूल की वेबसाइट पर होली, दिवाली, नवरात्रि, क्रिसमस और शिक्षक दिवस की तस्वीरें हैं, लेकिन ईद का उल्लेख नहीं है. छुट्टियों की सूची में केवल ईद मिलाद-उन-नबी का ज़िक्र है, जबकि ईद-उल-फितर और ईद-उल- अज़हा का उल्लेख नहीं है.
ओबीसी और शहरी वोट की ओर बढ़ती जेएमएम की राजनीति, सरना मुद्दे पर हेमंत सोरेन की चुप्पी
पिछले दो वर्षों में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की राजनीति में बदलाव देखा जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों और आदिवासी बुद्धिजीवियों का मानना है कि अब जेएमएम केवल आदिवासी वोट तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि ओबीसी और शहरी वोट बैंक को भी साधने की कोशिश कर रही है. ‘आउटलुक’ में इस विषय पर विस्तार से एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है.
24 जनवरी को रांची में एक कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि “सरना कोई धर्म नहीं, बल्कि वह आराधना करने का एक दूसरा तरीक़ा है और आदिवासी भी हिन्दू ही हैं.” इस बयान पर हेमंत सोरेन और उनकी पार्टी की चुप्पी ने सवाल खड़े किए हैं. पहले जब भी भाजपा या आरएसएस नेताओं ने आदिवासियों को हिंदू बताया है, जेएमएम ने उसका कड़ा विरोध किया है. सोरेन खुद कहते रहे हैं कि आदिवासी कभी हिंदू नहीं थे और न कभी होसकते हैं. 12 नवंबर 2020 को झारखंड विधानसभा ने सरना धर्म कोड के समर्थन में प्रस्ताव पास कर केंद्र को भेजा था, लेकिन अब तक इस पर फैसला नहीं हुआ है. हालांकि कांग्रेस की मंत्री नेहा शिल्पी तिर्की ने भागवत के बयान पर आपत्ति जताई.
सरना धर्म प्रकृति को ही अपना भगवन मानती है और उसकी ही पूजा करने में यक़ीन रखती है. झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में सरना धर्म के मानने वाले लोग रहते हैं. 2011 की जनगणना में करीब 79 लाख लोगों ने “अन्य धर्म” कॉलम भरा था, जिनमें 49.57 लाख ने खुद को सरना बताया, जिनमें 42 लाख झारखंड के आदिवासी थे. लंबे समय से अलग सरना धर्म कोड की मांग उठती रही है
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि 31 जनवरी 2024 को ज़मीन घोटाले मामले में गिरफ्तारी और जून 2024 में रिहाई के बाद सोरेन का रुख नरम हुआ है. उनकी पत्नी कल्पना सोरेन के सक्रिय राजनीति में आने और दोनों के लगातार मंदिर दौरे ने भी चर्चा बढ़ाई है. वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार के अनुसार, सोरेन परिवार पहले धर्मनिरपेक्ष छवि से जुड़ा था, लेकिन अब उनका झुकाव “सॉफ्ट हिंदुत्व” की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है.
हाल के दिनों में दो प्रमुख ओबीसी नेता, कोडरमा की शालिनी गुप्ता और धनबाद के पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल जेएमएम में शामिल हुए हैं. इससे पार्टी का ओबीसी आधार मज़बूत होने की संभावना है. माना जा रहा है कि सरना बनाम हिंदू मुद्दे पर तीखा रुख अपनाने से ओबीसी वोट प्रभावित हो सकता था, इसलिए चुप्पी को चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.
झारखंड की 81 विधानसभा सीटों में से 25–30 सीटें शहरी मानी जाती हैं, जहां जेएमएम अब तक कांग्रेस पर निर्भर रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जेएमएम अब भाजपा के शहरी और ओबीसी वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है.
हालांकि जेएमएम या हेमंत सोरेन की ओर से भागवत के बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. पूर्व आदिवासी सलाहकार परिषद सदस्य रतन तिर्की ने सोरेन की चुप्पी को राजनीतिक समझदारी बताया और कहा कि अगर आदिवासी हिंदू हैं, तो आरएसएस को अगला प्रमुख आदिवासी या दलित बनाना चाहिए.
ट्रेन में मुस्लिम युवक से मारपीट का आरोप, धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाने का दावा
‘द ऑब्ज़र्वर पोस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ मनमाड–काकीनाडा शिर्डी एक्सप्रेस में सफर कर रहे एक मुस्लिम युवक ने आरोप लगाया है कि उसकी धार्मिक पहचान की वजह से ट्रेन में करीब 20 लोगों के समूह ने उसके साथ मारपीट की.
मोहम्मद इमरान लातूर जा रहे थे, तभी हाफिज़पेट रेलवे स्टेशन के पास यह घटना हुई. इमरान का कहना है कि रेलवे स्टाफ और कुछ अन्य लोगों ने उनकी टोपी और दाढ़ी देखकर उन्हें निशाना बनाया. उनके साथ मौजूद दोस्त ने जब बचाने की कोशिश की, तो उसके साथ भी मारपीट की गई.
इमरान ने बताया कि विवाद तब शुरू हुआ जब रेलवे स्टाफ एसी कोच में बिना टिकट यात्रा कर रहे एक व्यक्ति को पीट रहा था. “जब रेलवे स्टाफ उसे मार रहे थे, तो मैंने और कुछ अन्य लोगों ने रोकने की कोशिश की. इसके बाद उन्होंने मुझे निशाना बनाना शुरू कर दिया.”
इमरान का आरोप है कि हमलावरों ने उनकी दाढ़ी खींची, सिर से टोपी उतारकर फेंक दी और बुरी तरह पीटा. उन्होंने कहा, “उन्होंने मुझे इतना मारा कि मेरे मुंह से खून आने लगा. मेरे दोस्त को भी मारा गया और उसका मोबाइल छीन लिया गया.”
इमरान ने दावा किया कि यह हमला उनकी धार्मिक पहचान से जुड़ा था. इमरान के अनुसार, उन्होंने कई बार टीटीई और रेलवे पुलिस से मदद मांगी, लेकिन किसी ने सहायता नहीं की.उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब वे बीदर स्टेशन पर उतरकर मदद लेना चाहते थे, तो उन्हें उतरने नहीं दिया गया.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.






