30/01/2026: हिमंता के बयानों ने तूल पकड़ा | इंकम टैक्स छापे के दौरान खुद को गोली मारी | अमेरिका में आरएसएस लॉबिंग | बाघों की गिनती | धर्मांतरण केस साबित नहीं | तिरुपति के लड्डू
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
असम: सीएम हिमंता के ‘मिया’ बयानों पर पुलिस शिकायत, पूर्व जज ने भी जताई चिंता.
बिजनेस: बैंक फ्रॉड मामले में रिलायंस कम्युनिकेशंस के पूर्व डायरेक्टर गिरफ्तार, अनिल अंबानी से होगी पूछताछ.
कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट का फैसला - माहवारी स्वच्छता लड़कियों का मौलिक अधिकार.
आरएसएस: अमेरिका में लॉबिंग का खुलासा, 3.3 लाख डॉलर खर्च करने की रिपोर्ट.
तिरुपति: सीबीआई का दावा - लड्डू में चर्बी नहीं, ‘सिंथेटिक घी’ का हुआ था इस्तेमाल.
धर्म: उत्तराखंड में धर्मांतरण के 62 में से 5 केस कोर्ट पहुंचे, सभी आरोपी बरी.
आत्महत्या: आईटी रेड के दौरान रियल एस्टेट टाइकून सीजे रॉय ने खुद को गोली मारी.
समाज: बिहार में दलित महिला का शव श्मशान ले जाने से रोका, सड़क पर हुआ अंतिम संस्कार.
अपराध: दिल्ली कार ब्लास्ट की साजिश में डॉक्टर गिरफ्तार, ग्लोबल कॉफी चेन थी निशाना.
मुस्लिमों को निशाना बनाते हिमंता के बयानों का बाद विरोध, कानूनी कार्रवाई की मांग
पूर्व जज ने कहा- ‘गणतंत्र की नींव कमजोर कर रहे सरमा’
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा “मियां मुसलमानों” (बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द) पर की गई विवादास्पद टिप्पणियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है. इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस गोविंद माथुर ने भी सामने आकर कहा है कि “डर, बहिष्कार या नफरत फैलाकर” सरमा “भारतीय गणतंत्र की नींव को कमजोर करने के दोषी” हो सकते हैं.
शांति और न्याय के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता और लेखक हर्ष मंदर ने कहा कि उन्होंने सरमा के खिलाफ मंगलवार (27 जनवरी) को दिए गए सार्वजनिक बयानों को लेकर पुलिस शिकायत दर्ज कराई है. मंदर का कहना है कि ये बयान “असम में बंगाली भाषी मुसलमानों के खिलाफ नफरत, उत्पीड़न और भेदभाव को बढ़ावा देते हैं”. मंदर द्वारा जारी एक प्रेस नोट के अनुसार, उन्होंने दिल्ली के हौज खास पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है, हालांकि इस पर आगे क्या कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी अभी नहीं है.
मंदर ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत तत्काल कार्रवाई और एफआईआर दर्ज करने की मांग की है. इसमें धारा 196 (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 197 (राष्ट्रीय एकता के प्रतिकूल दावे करना), 299 (धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले दुर्भावनापूर्ण कृत्य), 302 (धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के इरादे से शब्द बोलना) और 353 (सार्वजनिक शरारत के लिए बयान) शामिल हैं.
हर्ष मंदर ने बताया कि तिनसुकिया जिले के दिगबोई में एक आधिकारिक कार्यक्रम में सरमा ने बंगाली भाषी मुसलमानों को “मियां” कहा और उनके उत्पीड़न को प्रोत्साहित करने वाले बयान दिए. सरमा ने कहा था, “मेरा काम मियां लोगों को कष्ट देना है.” उन्होंने लोगों को उकसाते हुए कहा कि अगर रिक्शे का किराया 5 रुपये है, तो उन्हें 4 रुपये दें. सीएम ने कहा, “जब वे मुसीबत का सामना करेंगे, तभी वे असम छोड़ेंगे.” इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सरमा ने यह भी कहा कि “हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि वे असम में वोट न डाल सकें.”
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने गुरुवार को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की ‘मियां’ समुदाय पर की गई विवादास्पद टिप्पणी को लेकर प्रधानमंत्री और न्यायपालिका की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “एक प्रधानमंत्री हिमंता के शब्दों पर चुप कैसे रह सकते हैं? क्योंकि वो जानते हैं कि वो खुद भी इसी के दोषी हैं. लेकिन वो अदालतें जो कुत्ते के काटने की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लेती हैं, वे इस पागलपन पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रही हैं?”
इस मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) गोविंद माथुर ने एक बयान में कहा कि सरमा की बातें नागरिकों को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश हैं और यह भारत के संवैधानिक ढांचे के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन है. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, अनुच्छेद 15 धार्मिक आधार पर भेदभाव को रोकता है और अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है. जस्टिस माथुर ने कहा, “सीएम के रूप में, श्री सरमा ने संविधान को बनाए रखने की शपथ ली है... नफरत फैलाने वाले सीएम का इस्तीफा मांगने का यह सही समय है.”
वहीं, सरमा ने अपनी टिप्पणियों का बचाव किया है. उन्होंने कहा कि जो लोग बांग्लादेश से आए हैं, वे खुद को ‘मियां’ कहते हैं और यह शब्द उन्होंने नहीं गढ़ा है. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जब असम में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) होगा, तो 4 से 5 लाख मियां वोट काट दिए जाएंगे.
रिलायंस कम्युनिकेशंस के पूर्व निदेशक पुनीत गर्ग गिरफ्तार, अनिल अंबानी से भी पूछताछ होगी
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) के पूर्व निदेशक पुनीत गर्ग को गिरफ्तार किया है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की शिकायत के आधार पर, सीबीआई ने 2025 में अब बंद हो चुकी आरकॉम, इसके संस्थापक अनिल अंबानी और अन्य के खिलाफ बैंकों से 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी करने का मामला दर्ज किया था.
‘द वायर’ की खबर के मुताबिक, सीबीआई द्वारा दर्ज प्राथमिकी का संज्ञान लेते हुए, ईडी ने गर्ग के खिलाफ धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की है. गर्ग, जो आरकॉम में एक वरिष्ठ कार्यकारी थे, कंपनी के अध्यक्ष के रूप में भी काम कर चुके हैं और इसके वैश्विक उद्यम व्यवसाय को संभालते थे. केंद्रीय एजेंसी ने उन्हें आज पूछताछ के लिए बुलाया था और दिन भर की पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. एजेंसी ने उन पर “उक्त बैंक धोखाधड़ी से उत्पन्न अपराध की कमाई के अधिग्रहण, कब्जे, छिपाने और हेरफेर” में शामिल होने का आरोप लगाया है.
ईडी ने एक बयान में कहा कि अपराध की कमाई को अमेरिका के न्यूयॉर्क (मैनहट्टन) में एक लग्जरी कॉन्डोमिनियम अपार्टमेंट खरीदने के लिए डायवर्ट किया गया था. इस संपत्ति को आरकॉम की ‘कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया’ (सीआईआरपी) के दौरान पुनीत गर्ग द्वारा धोखाधड़ी से बेचा गया था. बिक्री से प्राप्त 83 लाख अमेरिकी डॉलर को रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की जानकारी या सहमति के बिना, एक पाकिस्तान से जुड़े व्यक्ति द्वारा नियंत्रित दुबई स्थित इकाई के साथ एक फर्जी निवेश व्यवस्था के बहाने अमेरिका से भेजा गया था.”
गिरफ्तारी के बाद गर्ग को राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत में पेश किया गया, जहां से केंद्रीय एजेंसी ने मामले में आगे की पूछताछ के लिए उन्हें नौ दिन की हिरासत में ले लिया है. सूत्रों ने आगे बताया कि पुनीत गर्ग के बयान के आधार पर, अनिल अंबानी से भी पूछताछ की जानी है. जांच में यह भी पता चला है कि ऋण की राशि को अनिल अंबानी और उनके परिवार के निजी खर्चों के लिए डायवर्ट किया गया था.
अजित पवार के निधन के बाद सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री बनाने की तैयारी
बुधवार को एक विमान दुर्घटना में उपमुख्यमंत्री अजित पवार के आकस्मिक निधन के बाद, उनके नेतृत्व वाली राकांपा (एनसीपी) के वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि उनकी पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार जल्द से जल्द उनकी जगह उपमुख्यमंत्री और विधायक दल के नेता के रूप में कार्यभार संभालें.
मानसी फड़के ने लिखा है कि अजित पवार गुट के वरिष्ठ मंत्री छगन भुजबल ने शुक्रवार को मुंबई में पत्रकारों को बताया कि यदि सब कुछ ठीक रहा, तो पार्टी नेता शनिवार को ही सरकार में उपमुख्यमंत्री के रूप में सुनेत्रा पवार का शपथ ग्रहण कराने के पक्ष में हैं. भुजबल ने कहा, “पार्टी के वरिष्ठ नेताओं—प्रफुल्ल भाई (प्रफुल्ल पटेल), तटकरे जी (सुनील तटकरे), मैं, धनंजय मुंडे—ने अस्थायी रूप से विधायक दल की बैठक करने और विधायक दल के नेता के रूप में सुनेत्रा ताई के नाम को अंतिम रूप देने का निर्णय लिया था.”
हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि विधायक दल की बैठक के लिए अभी पत्र जारी नहीं किया गया है क्योंकि कुछ “तकनीकी कारण” हैं. भुजबल ने कहा, “निधन के बाद, परिवार के बाहर निकलने पर कुछ पाबंदियां होती हैं, चाहे वह तीन दिन की हों या दस दिन की, मुझे नहीं पता. प्रफुल्ल भाई और तटकरे जी इस मामले को देख रहे हैं.”
इससे पहले दिन में, भुजबल, तटकरे, पटेल और मुंडे ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से उनके आधिकारिक आवास ‘वर्षा’ पर मुलाकात की. बैठक में उन पदों पर चर्चा हुई जो अजित पवार के पास थे, जिनमें उपमुख्यमंत्री पद और वित्त मंत्रालय शामिल हैं. साथ ही एक अन्य कैबिनेट पद पर भी चर्चा हुई जो पिछले साल दिसंबर तक राकांपा मंत्री माणिकराव कोकाटे के पास था.
सुप्रीम कोर्ट: माहवारी स्वच्छता का अधिकार जीवन और गरिमा के अधिकार का हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि लड़कियों को मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान साफ-सफाई और ज़रूरी सुविधाएं मिलना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीवन और गरिमा के अधिकार का हिस्सा है. जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि अगर स्कूलों में माहवारी से जुड़ी सुविधाएं नहीं होंगी तो इससे लड़कियों को अपमान, भेदभाव और पढ़ाई छोड़ने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
अदालत ने कहा कि साफ और सुरक्षित माहवारी के इंतेज़ाम और तैयारी न होने से लड़कियां या तो स्कूल नहीं जातीं या असुरक्षित तरीकों का सहारा लेती हैं, जो उनके स्वास्थ्य और आत्मसम्मान के ख़िलाफ़ है. यह स्थिति उनकी शिक्षा और भविष्य दोनों को नुक़सान पहुंचाती है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माहवारी से जुड़ी सुविधाएं सिर्फ स्वच्छता का मुद्दा नहीं, बल्कि शरीर पर अधिकार और सम्मान से जीने का सवाल हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि हर सरकारी और निजी स्कूल में अलग-अलग शौचालय हों, सैनिटरी नैपकिन आसानी से उपलब्ध हों और ‘मासिक धर्म प्रबंधन कक्ष’ बनाए जाएं. इसमें पानी, निस्तारण की सुविधा, अतिरिक्त कपड़े और ज़रूरी सामान होना चाहिए. अदालत ने कहा कि नियमों का पालन न करने वाले स्कूलों पर कार्रवाई होगी. साथ ही लड़कों और पुरुष शिक्षकों को भी माहवारी के बारे में जागरूक करने पर ज़ोर दिया गया, ताकि लड़कियों के साथ किसी तरह का भेदभाव या अपमान न हो.
अमेरिका में आरएसएस की लॉबिंग बंद, खुलासे के बाद कॉन्ट्रैक्ट खत्म
प्रिज़्म में छपी बिपलोब कुमार और मेघनाद बोस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक़ म भारत के सबसे बड़े हिंदू दक्षिणपंथी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अमेरिका में की जा रही अपनी लॉबिंग गतिविधियां बंद कर दी हैं. यह कदम तब उठाया गया, जब एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि आरएसएस अमेरिकी सांसदों को प्रभावित करने के लिए लॉबिंग फर्म स्क्वायर पैटन बोग्स की सेवाएं ले रहा था. रिपोर्ट सामने आने के कुछ ही हफ्तों बाद इस फर्म ने आरएसएस के साथ अपना क़रार खत्म कर दिया.
रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2025 से आरएसएस की ओर से अमेरिकी संसद के सदस्यों से संपर्क किया जा रहा था और इसके लिए करीब 3.3 लाख डॉलर खर्च किए गए. प्रिज़्म द्वारा देखे गए अमेरिकी संसद के दस्तावेज़ों से पता चला कि आरएसएस को विदेशी संगठन के रूप में दर्ज ही नहीं किया गया था, जबकि वह भारत में स्थित संगठन है. विदेशों में प्रभाव डालने से जुड़े मामलों के जानकारों ने भी चिंता जताई कि लॉबिंग फर्म स्क्वायर पैटन बोग्स ने आरएसएस के लिए की गई लॉबिंग को विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम (एफएआरए) के तहत दर्ज नहीं किया. यह कानून 1938 से लागू है और विदेशी हितों की ओर से काम करने वालों के लिए पारदर्शिता अनिवार्य करता है.
बाद में दस्तावेज़ों में बदलाव कर आरएसएस की जगह एक अमेरिकी नागरिक विवेक शर्मा को क्लाइंट बताया गया, जो एक दवा कंपनी के प्रमुख हैं.
इस खुलासे के बाद भारत और अमेरिका दोनों जगह सवाल उठे. आरएसएस ने पहले कहा कि उसने कोई लॉबिंग नहीं करवाई, लेकिन बाद में उसके मुखपत्र ऑर्गनाइज़र ने माना कि गतिविधियां लॉबिंग कानून के तहत थीं. रिपोर्ट के बाद राजनीतिक विवाद बढ़ा और विपक्ष ने आरएसएस की पारदर्शिता पर सवाल उठाए. विशेषज्ञों ने इसे “गुपचुप तरीके से प्रभाव डालने की कोशिश” बताया.
दिसंबर के आख़िर में लॉबिंग औपचारिक रूप से बंद कर दी गई. विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम दबाव और जांच से बचने के लिए उठाया गया. अब भी सवाल बना हुआ है कि आरएसएस ने अमेरिका में लॉबिंग के लिए पैसा कहां से और कैसे दिया, जबकि संगठन खुद को भारत में भी औपचारिक रूप से पंजीकृत नहीं मानता.
उत्तराखंड के धर्मांतरण विरोधी कानून का विश्लेषण: 7 साल, 5 ट्रायल, सभी बरी
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड पुलिस द्वारा धर्मांतरण विरोधी कानून (यूएफआरए) के तहत दर्ज मामलों के अदालती रिकॉर्ड एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ द्वारा राज्य के 13 जिलों के केस रिकॉर्ड्स के विश्लेषण से पता चला है कि सितंबर 2025 तक, इस कानून के तहत 62 मामले दर्ज किए गए थे, लेकिन उनमें से केवल पांच ही पूरे ट्रायल तक पहुंच पाए. महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी पांचों मामले अदालत में टिक नहीं सके और आरोपी बरी हो गए.
अदालती दस्तावेजों से खुलासा होता है कि जांच में खामियां, बालिग जोड़ों की आपसी सहमति और जबरदस्ती का कोई सबूत न होना इन फैसलों का मुख्य आधार बना. कम से कम सात मामले तो बीच में ही खारिज हो गए क्योंकि शिकायतकर्ता अपने बयान से पलट गए या अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका. शेष 39 मामलों में से अधिकतर में आरोपियों को जमानत मिल चुकी है. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने कई मामलों में यह नोट करते हुए जमानत दी कि संबंध आपसी सहमति से थे.
इस स्थिति का एक उदाहरण अमन सिद्दीकी उर्फ अमन चौधरी का मामला है. दो परिवारों ने रजामंदी से शादी तय की थी और लड़की ने हलफनामा दिया था कि वह धर्म नहीं बदलेगी. इसके बावजूद, लड़की के भाई की शिकायत पर अमन को जेल जाना पड़ा. मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे यह कहते हुए जमानत दी कि जब बालिग जोड़े और उनके माता-पिता सहमत हैं, तो राज्य को क्या आपत्ति हो सकती है.
उत्तराखंड में यह कानून 2018 में भाजपा सरकार द्वारा लाया गया था और 2022 व 2025 में इसे और सख्त किया गया, जिसमें सजा को 10 साल तक बढ़ाया गया है. हालांकि, पुलिस का डेटा बताता है कि कड़े प्रावधानों के बावजूद अदालत में पुलिस के दावे कमजोर साबित हो रहे हैं. बरी होने वाले अन्य मामलों में पादरी नरेंद्र सिंह बिष्ट का केस भी शामिल है, जिन पर धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभन देने का आरोप था, लेकिन पुलिस यह साबित ही नहीं कर पाई कि उन्होंने किसे और कब लालच दिया. इसी तरह टिहरी गढ़वाल में विनोद कुमार को बरी कर दिया गया, जिन पर फेसबुक वीडियो के जरिए हिंदू धर्म की आलोचना करने का आरोप था, लेकिन जांच अधिकारी कोर्ट में कोई सबूत पेश नहीं कर सके.
ट्रेड यूनियनों ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर जताई कड़ी आपत्ति, कहा- यह ‘न्यायिक तर्क’ में वर्गीय चरित्र को दर्शाता है
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) ने सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी को सिरे से खारिज कर दिया है. संगठन ने कहा कि यह टिप्पणी “न्यायिक तर्क” में “वर्गीय चरित्र” (class character) को उजागर करती है, जो संविधान में निहित समाजवादी लोकतंत्र के आदर्शों के लिए हानिकारक है. एटक की राष्ट्रीय परिषद ने एक बयान में मांग की कि “माननीय सर्वोच्च न्यायालय इन टिप्पणियों को वापस ले.”
दरअसल, 29 जनवरी को भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमलिया बागची की पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की थी. पीठ ने कहा था कि काम के प्रति प्रतिरोध की संस्कृति और “झंडा उठाने वाली” ट्रेड यूनियनों के आक्रामक नेतृत्व के कारण देश भर में कई औद्योगिक प्रतिष्ठान बंद हो गए हैं. यह टिप्पणी घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई थी.
एटक ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां और घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन की याचिका पर विचार करने से इनकार करना गहरा चिंताजनक और परेशान करने वाला है. यह सामाजिक न्याय, समानता और श्रम की गरिमा के संवैधानिक जनादेश के खिलाफ है.” संगठन ने कहा कि ट्रेड यूनियन गतिविधियों को औद्योगिक ठहराव का कारण बताना आर्थिक वास्तविकताओं को गलत तरीके से पढ़ना है और उन कॉर्पोरेट समर्थक नीतियों के विनाशकारी परिणामों को नजरअंदाज करना है जिनके कारण कॉर्पोरेट एकाधिकार बढ़ा है.
ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (एक्टू) ने भी सीजेआईई की मौखिक टिप्पणियों को चौंकाने वाला और तथ्यों के विपरीत बताया. उन्होंने कहा, “यह सर्वविदित है कि औद्योगिक इकाइयों का बंद होना ट्रेड यूनियनों और श्रमिकों के आंदोलनों से संबंधित नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से कुप्रबंधन और धन के जानबूझकर दुरुपयोग का परिणाम है.”
भारतीय मजदूर संघ के पूर्व महासचिव विर्जेश उपाध्याय ने भी कहा कि ट्रेड यूनियनें विकास की विरोधी नहीं हैं. उन्होंने कहा, “वे सामूहिक एकजुटता और आपसी सहयोग की स्थायी भारतीय परंपरा में निहित संस्थाएं हैं, जो प्राचीन श्रमिक संघों और गिल्ड की प्रथाओं से चली आ रही हैं.”
तिरुपति लड्डू विवाद: ‘पशु की चर्बी’ नहीं, बल्कि ‘सिंथेटिक घी’ का हुआ था इस्तेमाल- सीबीआई
तिरुपति लड्डू में मिलावट के मामले में सीबीआई की जांच ने एक नया खुलासा किया है. सीबीआई की चार्जशीट के अनुसार, लड्डू बनाने में इस्तेमाल किए गए घी में बीफ टैलो (गाय की चर्बी) या लार्ड (सुअर की चर्बी) का इस्तेमाल नहीं हुआ था, जैसा कि पहले आरोप लगाया गया था. इसके बजाय, घी की कमी को पूरा करने और मुनाफा कमाने के लिए वनस्पति तेलों और रसायनों का उपयोग कर ‘सिंथेटिक घी’ तैयार किया गया था.
लगभग 16 महीने पहले, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और पवन कल्याण ने आरोप लगाया था कि प्रसादम में ‘पशु की चर्बी’ मिलाई गई थी, जिससे बड़ा विवाद खड़ा हो गया था. लेकिन सीबीआई जांच बताती है कि मुख्य आपूर्तिकर्ता, उत्तराखंड स्थित ‘भोले बाबा ऑर्गेनिक डेयरी’ ने एक “वर्चुअल” यूनिट चलाई, जहां 2019 से 2024 के बीच दूध या मक्खन की कोई खरीद नहीं हुई. इसके बावजूद, इस डेयरी ने तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) को लगभग 250 करोड़ रुपये का 68 किलोग्राम घी सप्लाई किया.
रिपोर्ट के मुताबिक, पाम ऑयल, पाम कर्नेल ऑयल और एसिटिक एसिड एस्टर का उपयोग करके लैब टेस्ट को धोखा दिया गया. इन रसायनों ने घी की शुद्धता मापने वाले ‘आरएम वैल्यू’ को कृत्रिम रूप से बढ़ा दिया. साथ ही, गाय के घी जैसा पीला रंग देने के लिए ‘बीटा कैरोटीन’ और खुशबू के लिए आर्टिफिशियल फ्लेवर मिलाया गया.
सीबीआई ने इस साजिश में 36 लोगों को आरोपी बनाया है, जिसमें टीटीडी के पूर्व महाप्रबंधक (खरीद) आरएसएसवीआर सुब्रमण्यम और भोले बाबा डेयरी के निदेशक शामिल हैं. इस खुलासे के बाद वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने चंद्रबाबू नायडू और पवन कल्याण से माफी की मांग की है. उनका कहना है कि नायडू ने ‘पशु चर्बी’ का झूठा दावा करके भगवान वेंकटेश्वर के भक्तों की भावनाओं को आहत किया और मंदिर को राजनीति का अखाड़ा बनाया.
आईटी रेड के दौरान कॉन्फिडेंट ग्रुप के चेयरमैन सीजे रॉय ने खुद को गोली मारी
इंडियन एक्सप्रेस के शाजू फिलिप की रिपोर्ट के मुताबिक प्रख्यात रियल एस्टेट कंपनी ‘कॉन्फिडेंट ग्रुप’ के चेयरमैन रॉय चिरियांकंदथ जोसेफ, जिन्हें सीजे रॉय के नाम से जाना जाता था, ने शुक्रवार दोपहर बेंगलुरु स्थित अपने कार्यालय में कथित तौर पर खुद को गोली मार ली. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, जिस वक्त यह घटना हुई, उस समय आयकर विभाग के अधिकारी उनके कार्यालय में मौजूद थे.
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि रॉय ने अपने पास मौजूद पिस्तौल का इस्तेमाल किया. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. कॉन्फिडेंट ग्रुप केरल और दक्षिण भारत की अग्रणी रियल एस्टेट फर्मों में से एक है, जिसका कारोबार दुबई और अमेरिका तक फैला हुआ है. रॉय अक्सर अपनी कंपनी को “जीरो-डेट” (कर्ज मुक्त) बिजनेस बताते थे.
उनकी वेबसाइट के अनुसार, उन्होंने 159 से अधिक प्रोजेक्ट पूरे किए थे. रियल एस्टेट के अलावा, रॉय फिल्म निर्माण में भी सक्रिय थे. उन्होंने मोहनलाल की ‘कासा नोवा’ और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘मरक्कर: लायन ऑफ द अरेबियन सी’ का सह-निर्माण किया था. वे अपनी लग्जरी कारों और सामाजिक कार्यों के लिए भी जाने जाते थे. पुलिस मामले की जांच कर रही है कि आखिर आईटी अधिकारियों की मौजूदगी में यह कदम क्यों उठाया गया.
हेट क्राइम
दलित बुज़ुर्ग महिला का सड़क पर अंतिम संस्कार, श्मशान जाने से रोके जाने का आरोप
बिहार के वैशाली जिले से एक शर्मनाक घटना सामने आई है. ऑब्ज़र्वर पोस्ट के मुताबिक़ गोड़ौल थाना क्षेत्र के सोंठो अंधारी गांव में 95 वर्षीय दलित महिला झपकी देवी का अंतिम संस्कार सड़क पर करना पड़ा. परिवार का आरोप है कि कुछ लोगों ने गांव के श्मशान घाट तक जाने का रास्ता रोक दिया, जिसके कारण उन्हें सड़क पर ही चिता जलानी पड़ी.
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह समस्या लंबे समय से चली आ रही है. हर बार शव ले जाने पर रास्ता रोका जाता है, लेकिन प्रशासन ने कभी स्थायी समाधान नहीं निकाला. गुरुवार को जब परिवार शव लेकर श्मशान की ओर गया तो रास्ता बंद होने के कारण उन्हें अंधारी गाछी चौक पर, शिव मंदिर के पास, सड़क पर ही अंतिम संस्कार करना पड़ा.
घटना के बाद इलाके में तनाव फैल गया. ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि श्मशान जाने वाला रास्ता कुछ लोगों ने क़ब्ज़ा कर लिया है. सूचना मिलने पर पुलिस और प्रशासन मौके पर पहुंचे. फायर ब्रिगेड बुलाकर चिता की आग बुझाई गई और सड़क साफ कराई गई. प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों को भी मौके से लौटा दिया.
वैशाली के एसपी विक्रम सिहाग ने कहा कि पहले श्मशान तक रास्ता था, लेकिन वहां मंदिर बन जाने से रास्ता बंद हो गया. उन्होंने कहा कि मामले की जांच की जा रही है और रास्ता बहाल करने की व्यवस्था की जाएगी. प्रशासन ने कहा है कि ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे.
ओडिशा के गांव में आदिवासी ईसाइयों पर हमला, 18 साल पुराने चर्च को हटाने की धमकी
ओडिशा के नबरंगपुर जिले के कापेना गांव में आदिवासी ईसाई समुदाय के लोगों के साथ मारपीट और धमकी का मामला सामने आया है. मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ आरोप है कि गांव के कुछ लोगों ने चर्च हटाने की मांग को लेकर ईसाइयों को परेशान किया और उन्हें प्रार्थना करने से रोका. भीड़ ने लाउडस्पीकर से धमकी दी कि अगर प्रार्थना जारी रही तो चर्च तोड़ दिया जाएगा और करीब 30 ईसाई परिवारों को गांव से निकाल दिया जाएगा.
गांव में करीब 18 साल से एक प्रार्थना स्थल और पवित्र उपवन साथ-साथ मौजूद थे और पहले कभी विवाद नहीं हुआ था. लेकिन पिछले दो हफ्तों से तनाव बना हुआ है. रविवार रात दो युवक के साथ मारपीट भी की गयी. जिनकी पहचान 20 वर्षीय जॉन सांता और 17 वर्षीय जोलंदर सांता के तौर पर हुई है. इसके बाद उन्होंने 26 जनवरी को उमरकोट थाने में शिकायत दर्ज कराई. पुलिस ने मौके पर पहुंचकर चर्च का ताला खुलवाया और सुरक्षा तैनात की.
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि दोनों पक्षों की बैठक कराई गई है और शांति बनाए रखने पर सहमति बनी है. ईसाई समुदाय ने 15 दिन में चर्च को लेकर फैसला लेने की बात कही है. एहतियात के तौर पर इलाके में पुलिस बल तैनात किया गया है, खासकर फरवरी में होने वाले यज्ञ को देखते हुए.
यह घटना ऐसे समय में हुई है जब ओडिशा में ईसाइयों पर हमलों की घटनाएं बढ़ रही हैं. हाल ही में ढेंकानाल जिले में एक पादरी से मारपीट कर उसे जूतों की माला पहनाई गई थी. राज्य में ईसाई आबादी करीब 2.7 प्रतिशत है. मानवाधिकार संगठनों ने इन घटनाओं पर चिंता जताते हुए धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की है.
कोटद्वार में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम पर दुकान का नाम बदलने का दबाव बनाया
सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित एक वीडियो के अनुसार, उत्तराखंड के कोटद्वार शहर में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के एक समूह ने एक मुस्लिम दुकानदार पर अपनी दुकान का नाम बदलने के लिए दबाव डाला. उन्हें दुकान के नाम “बाबा शॉप” पर आपत्ति थी.
ग़ज़ाला अहमद के अनुसार, फेसबुक और अन्य प्लेटफार्मों पर साझा किए गए वीडियो में हिंदू दक्षिणपंथी समूह के सदस्यों को मुस्लिम दुकानदार का सामना करते और “बाबा शॉप” नाम पर आपत्ति जताते हुए देखा जा सकता है. उनका आरोप था कि यह नाम भ्रामक है और इसे बदला जाना चाहिए, जबकि दुकान के बोर्ड पर दुकानदार का नाम स्पष्ट रूप से लिखा हुआ था. यह घटना कोटद्वार के पटेल मार्ग इलाके की है, जो जामा मस्जिद के पीछे स्थित है. यहां हिंदुओं और मुस्लिमों दोनों की दुकानें हैं.
“मोहम्मद दीपक” के जवाब से पीछे हटे कार्यकर्ता
बहस के दौरान, दीपक कुमार के रूप में पहचाने जाने वाले एक स्थानीय हिंदू व्यक्ति ने हस्तक्षेप किया और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को दृढ़ता से चुनौती दी. वीडियो में वह उनके अधिकार पर सवाल उठाते हुए और उन्हें वहां से जाने के लिए कहते हुए दिखाई दे रहे हैं.
जब समूह ने उनकी पहचान जाननी चाही, तो उन्होंने जवाब दिया— “मोहम्मद दीपक”. इस टिप्पणी से समूह के लोग असहज हो गए और इसके बाद बजरंग दल के कार्यकर्ता वहां से चले गए.
‘इस घटना ने मुझे डरा दिया है’
दुकान के मालिक शोएब सलमानी ने ‘मकतूब’ से बात करते हुए कहा कि इस घटना ने उन्हें डरा दिया है. सलमानी ने कहा, “वे आए और मुझ पर दुकान का नाम हटाने के लिए दबाव बनाने लगे. उन्होंने कहा कि यह स्वीकार्य नहीं है. चूंकि यह हमारा 30 साल पुराना ब्रांड नेम है, इसलिए मैंने समझाने की कोशिश की, लेकिन वे परेशान करते रहे.”
उन्होंने आगे बताया, “वे चार महीने पहले भी आए थे. उनके कहने पर हमने बोर्ड पर मालिक का नाम लिख दिया था, हालांकि इसकी आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि हम ‘बाबा शॉप’ के नाम से जाने जाते हैं और यह एक सामान्य नाम है.” सलमानी ने पुष्टि की कि उन्होंने शुरू में स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन दीपक द्वारा हस्तक्षेप किए जाने के बाद मामला शांत हो गया है.
अधिकार कार्यकर्ताओं की चिंता: मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि यह घटना मुस्लिम व्यापारियों के खिलाफ ‘मॉरल पुलिसिंग’ और आर्थिक डराने-धमकाने के बढ़ते पैटर्न को दर्शाती है, जहां अनधिकृत समूह बिना किसी कानूनी अधिकार के नाम और धार्मिक पहचान को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं.
दीपक कुमार की प्रशंसा: दीपक कुमार के हस्तक्षेप की ऑनलाइन काफी सराहना हो रही है. सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने इसे एकजुटता और भीड़ की धमकी के खिलाफ प्रतिरोध के रूप में देखा है.
सलमानी ने अंत में कहा, “दीपक ने जो किया वह सराहनीय है, और अधिक लोगों को उनके जैसा साहस दिखाना चाहिए. उन्होंने वास्तव में दिखाया कि मानवता अभी भी जीवित है, और यदि साहस और मानवता के साथ सामना किया जाए तो हर खतरा और धमकी छोटी है.”
यूजीसी की इक्विटी गाइडलाइन्स पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: विवाद और पक्ष
सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) के ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले विनियम, 2026’ पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने इन नियमों को “अस्पष्ट और दुरुपयोग के योग्य” बताया और कहा कि ये देश को विभाजित कर सकते हैं. हालांकि, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं का तर्क है कि ये नियम सबसे अधिक हाशिए पर पड़े छात्रों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी थे. स्क्रोल में जोहाना दीक्षा ने इसका विश्लेषण किया हैै.
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में मुख्य आपत्ति यह थी कि ये नियम केवल एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों को भेदभाव से बचाने की बात करते हैं, और सामान्य वर्ग के छात्रों को इसमें शामिल नहीं किया गया, जो कि उनके साथ भेदभाव है. इसके जवाब में, दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एन. सुकुमार कहते हैं कि सामान्य वर्ग की यह मांग अर्थहीन है क्योंकि हाशिए के समुदायों के पास सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक कारण हैं, जबकि सामान्य वर्ग के पास शिकायत निवारण के अन्य तंत्र मौजूद हैं.
इन नियमों की पृष्ठभूमि में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की आत्महत्याएं हैं, जिनके बाद परिसरों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए सख्त तंत्र की मांग उठी थी. कार्यकर्ताओं का कहना है कि 2019 के बाद से परिसरों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118% की वृद्धि हुई है. ओबीसी छात्र संघ के अध्यक्ष किरण गौड़ ने कहा कि “बंटेंगे तो कटेंगे” जैसे नारों के साथ हो रहे विरोध प्रदर्शन यह दिखाते हैं कि कुछ लोग परिसरों में जातिवाद को बनाए रखना चाहते हैं. फिलहाल कोर्ट ने 2012 के पुराने नियमों को बहाल करते हुए अगली सुनवाई मार्च में तय की है.
“अभूतपूर्व गिरावट”: हिमंता बिस्वा सरमा की ‘मिया’ टिप्पणी पर असम में राजनीतिक बवाल
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा बंगाली मूल के मुसलमानों (जिन्हें अक्सर ‘मिया’ कहा जाता है) के खिलाफ की गई ताजा टिप्पणियों ने राज्य में बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. असम कांग्रेस और एआईयूडीएफ ने मुख्यमंत्री पर “नफरत की राजनीति” करने और संविधान को कमजोर करने का आरोप लगाया है. वहीं, सरमा ने 2005 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अपने बयानों का बचाव किया है.
हाल ही में सीएम सरमा ने कहा, “हम मिया लोगों के कुछ वोट चुराना चाहते हैं. मिया को वास्तव में यहाँ वोट देने में सक्षम नहीं होना चाहिए; उन्हें बांग्लादेश में वोट देना चाहिए.” ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक कांग्रेस के ‘वोट चोरी’ के आरोपों के जवाब में सरमा ने कहा कि उन्होंने खुद बीजेपी कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे मिया लोगों के खिलाफ मतदाता सूची में शिकायतें दर्ज कराएं ताकि “उन्हें थोड़ा इधर-उधर भागना पड़े, वे परेशान हों और समझें कि असमिया लोग अभी भी जीवित हैं.”
सरमा ने आर्थिक बहिष्कार का आह्वान करते हुए कहा, “जो कोई भी उन्हें (मिया को) किसी भी तरह से परेशान कर सकता है, उसे करना चाहिए... रिक्शे में अगर किराया 5 रुपये है, तो उन्हें 4 रुपये दें. जब वे परेशानी झेलेंगे, तभी वे असम छोड़ेंगे.” पिछले कुछ महीनों में सरमा ने बार-बार इस समुदाय को “ओसिनाकी मानूह” (अपरिचित लोग) कहा है और लोगों से उन्हें जमीन न बेचने या नौकरी न देने की अपील की है.
विपक्ष का कहना है कि बीजेपी चुनाव में ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है. एआईयूडीएफ विधायक अमीनुल इस्लाम ने कहा, “यह आख्यान (नैरेटिव) एक अभूतपूर्व निचले स्तर पर पहुंच गया है.” वहीं, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सरमा को “भूमि-विक्रेता” कहते हुए उन पर असम की ज़मीन अपने मित्रों को बेचने का आरोप लगाया.
अपने बचाव में सरमा ने गुरुवार को सोशल मीडिया पर लिखा कि यह उनकी भाषा नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी है, जिसने 2005 में “जनसांख्यिकीय आक्रमण” शब्द का इस्तेमाल किया था. उन्होंने कहा कि उनका प्रयास असम की पहचान और सुरक्षा को बचाने के लिए है.
दिल्ली कार ब्लास्ट: आतंकी मॉड्यूल का निशाना थी ग्लोबल कॉफी चेन
10 नवंबर, 2025 को लाल किले के पास हुए कार बम धमाके के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए डॉक्टरों का समूह कथित तौर पर एक ग्लोबल कॉफी चेन ( जिसका नाम रिपोर्ट में सीधे नहीं लिखा गया पर संस्थापक के यहूदी होने का जिक्र है) के आउटलेट्स को निशाना बनाना चाहता था. सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह “व्हाइट कॉलर आतंकी मॉड्यूल” पिछले चार साल से सक्रिय था और गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई के खिलाफ संदेश देना चाहता था. ‘द हिंदू’ की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक गिरफ्तार किए गए तीन डॉक्टरों—जम्मू-कश्मीर के मुजामिल अहमद गनी और आदिल अहमद राथर, तथा उत्तर प्रदेश के शाहीन सईद—ने बताया कि समूह के भीतर लक्ष्यों को लेकर मतभेद था. कार हमलावर उमर-उन-नबी (जो धमाके में मारा गया) और अन्य आरोपी कॉफी चेन पर हमला करना चाहते थे, जबकि कुछ सदस्य केवल सुरक्षा बलों को निशाना बनाना चाहते थे.
यह समूह ‘अंसार गजवत-उल-हिंद’ को पुनर्जीवित करना चाहता था, जो अल-कायदा की भारतीय शाखा है. लाल किले के पास हुए विस्फोट में एक दर्जन से अधिक लोग मारे गए थे. इस साजिश का खुलासा तब हुआ जब जम्मू-कश्मीर पुलिस ने जैश-ए-मोहम्मद के एक पैम्फलेट की जांच शुरू की, जिससे वे शोपियां के एक मौलवी तक पहुंचे. इसके बाद फरीदाबाद में छापेमारी के दौरान 2,900 किलोग्राम विस्फोटक और हथियार बरामद किए गए.
अधिकारियों ने बताया कि आरोपी ऑनलाइन वीडियो देखकर बम बनाना सीख रहे थे और उन्होंने यूरिया का इस्तेमाल किया ताकि शक पैदा न हो. उमर-उन-नबी के फोन से एक वीडियो मिला जिसमें वह भारी अंग्रेजी लहजे में “शहादत और आत्मघाती हमले” की बात कर रहा था. फिलहाल एनआईए इस मामले की जांच कर रही है और अब तक तीन डॉक्टरों समेत नौ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.
निचली अदालत द्वारा पुलिस के खिलाफ एफआईआर के आदेश के बाद, हाईकोर्ट से संभल के युवक को अग्रिम जमानत
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मंगलवार को नवंबर 2024 में संभल जिले में हुई हिंसा के आरोपी एक युवक को अंतरिम अग्रिम जमानत दे दी है. यह राहत तब मिली है जब एक निचली अदालत ने पहले ही उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने का आदेश दिया है, जिन पर उस युवक पर गोली चलाने का आरोप है.
न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा ने आरोपी मोहम्मद आलम को 25 फरवरी, 2026 तक गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की और उत्तरप्रदेश सरकार को उसकी जमानत याचिका पर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया.
“मकतूब मीडिया” के मुताबिक, यह आदेश संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) विभांशु सुधीर के उस निर्देश के हफ़्तों बाद आया है, जिसमें उन्होंने अकारण गोलीबारी के आरोप में क्षेत्राधिकारी अनुज चौधरी और कोतवाली प्रभारी अनुज कुमार तोमर सहित वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था.
मजिस्ट्रेट के आदेश के बावजूद, आलम खुद भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर का सामना कर रहा है, जिसमें घातक हथियार के साथ दंगा करना, हत्या का प्रयास और सरकारी कर्मचारी पर हमला जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं.
आलम की ओर से अधिवक्ता प्रभाव श्रीवास्तव ने हाईकोर्ट को बताया कि उनका मुवक्किल निर्दोष है और शुरुआती एफआईआर में उसका नाम नहीं था. उन्होंने यह भी कहा कि आलम को घटना के दौरान गोली लगी थी और उसका इलाज चल रहा है. राज्य सरकार ने इस याचिका का विरोध किया. अपर शासकीय अधिवक्ता रूपक चौबे ने तर्क दिया कि आलम को पुलिस की गोलीबारी से कोई चोट नहीं लगी है.
संभल के सीजेएम ने आलम के पिता यामीन द्वारा दायर आवेदन पर 11 पन्नों का फैसला सुनाया था. शिकायत के अनुसार, 24 नवंबर, 2024 को आलम जामा मस्जिद के पास रेहड़ी पर बिस्कुट बेच रहा था, तभी पुलिस ने जान से मारने की नीयत से भीड़ पर फायरिंग कर दी. मजिस्ट्रेट ने पुलिस के इस दावे को खारिज कर दिया था कि फायरिंग “आधिकारिक कर्तव्य” के पालन में की गई थी. कोर्ट ने कहा था कि किसी व्यक्ति पर गोली चलाना आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता.
कोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट को “संदिग्ध” बताते हुए कहा था कि यह मेडिकल रिकॉर्ड के विपरीत है, जिसमें स्पष्ट रूप से “गोली का घाव” और “दंगे में पुलिस फायरिंग” को चोट का कारण बताया गया था.
बहरहाल, आदेश के सात दिन बाद, सीजेएम सुधीर का संभल से तबादला कर दिया गया. यह 13 न्यायिक अधिकारियों के प्रशासनिक फेरबदल का हिस्सा था, जिसने कानूनी जानकारों के बीच चिंता पैदा की है.
दिल्ली दंगे: खालिद सैफी को मिली अंतरिम जमानत
दिल्ली की एक अदालत ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की ‘बड़ी साजिश’ मामले के आरोपी खालिद सैफी को कई शर्तों के साथ 13 दिन की अंतरिम जमानत दे दी है. इन शर्तों में सोशल मीडिया से दूर रहना भी शामिल है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी, ‘यूनाइटेड अगेंस्ट हेट’ के संस्थापक सैफी द्वारा दायर अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे. सैफी ने अपने भतीजों की शादी में शामिल होने और अपने परिवार के साथ रमजान मनाने के लिए यह आवेदन दिया था.
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि सैफी अपनी रिहाई के बाद किसी भी गवाह के संपर्क में नहीं आएगा. इसके अलावा, आवेदक अपनी अंतरिम जमानत की अवधि के दौरान दिल्ली-एनसीआर की सीमा नहीं छोड़ेगा. साथ ही, आवेदक मीडिया से संपर्क नहीं करेगा और किसी भी कीमत पर सोशल मीडिया पर कोई गतिविधि नहीं करेगा या कोई सामग्री पोस्ट नहीं करेगा.
कनाडा: जबरन वसूली से जुड़ी गोलीबारी के मामले में दो भारतीय गिरफ्तार
कनाडा में जबरन वसूली से जुड़ी गोलीबारी के मामले में पंजाबी मूल के दो भारतीय नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है.
पुलिस ने 26 जनवरी को 129 स्ट्रीट और 84 एवेन्यू के पास एक वाहन में सवार हर्षदीप सिंह (20) और हंसप्रीत सिंह (21) को रोका. पुलिस को संदेह था कि वे ब्रिटिश कोलंबिया के लोअर मेनलैंड क्षेत्र के सरे शहर में हुई कथित गोलीबारी में शामिल थे.
हरप्रीत बाजवा के अनुसार, वाहन से एक भरी हुई हैंडगन जब्त की गई है. दोनों पर आग्नेयास्त्र से संबंधित कई अपराधों के आरोप लगाए गए हैं, जिनमें प्रतिबंधित हथियार के साथ वाहन में सवार होना और खतरनाक ड्राइविंग शामिल है. वे फिलहाल हिरासत में हैं. पुलिस ने बताया कि चूंकि दोनों विदेशी नागरिक हैं, इसलिए सरे पुलिस सेवा ने इस मामले में ‘कनाडा सीमा सेवा एजेंसी’ को भी शामिल किया है.
सिर्फ़ बड़े दावे: मोदी युग में खराब शासन अब अपवाद नहीं, पहचान बन गया है
हाल तक भारतीयों को बताया जा रहा था कि भारत विश्व मामलों की धुरी है और प्रधानमंत्री मोदी व एस. जयशंकर के बिना कोई वैश्विक निर्णय नहीं लिया जाता. जयशंकर ने दावा किया था कि “मोदी की केमिस्ट्री” ने भारत को एक “लीडिंग पावर” बना दिया है. लेकिन ट्रम्प 2.0 (डोनाल्ड ट्रम्प की वापसी) के रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बयां करते हैं.
टेलीग्राफ में लेखक सुशांत सिंह विश्लेषण करते हुए लिखते हैं कि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से मोदी सरकार ने चुपचाप चाबहार बंदरगाह परियोजना से अपने कदम पीछे खींच लिए हैं, जिसे कभी भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का प्रतीक माना जाता था. यह मोदी के 2024 के उस दावे के विपरीत है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत किसी तीसरे पक्ष के दबाव में निर्णय नहीं लेता.
विदेश नीति में “मजबूती” के दावों के बावजूद, अमेरिका भारतीय सामानों पर भारी शुल्क लगा रहा है और भारतीय नागरिकों को बेड़ियों में जकड़ कर वापस भेज रहा है. व्लादिमीर पुतिन के युद्ध में सैकड़ों भारतीय नागरिक फंस गए हैं, जिन्हें रूसी सेना में भर्ती कर लिया गया, लेकिन मोदी सरकार उनकी वापसी सुनिश्चित करने में विफल रही है. चीन के साथ व्यापार घाटा 2014 के 37.8 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 116.1 अरब डॉलर हो गया है, जबकि सीमा पर चीन का दबाव जारी है.
घरेलू मोर्चे पर भी स्थिति अलग नहीं है. विमुद्रीकरण (नोटबंदी) ने अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई, कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा और कोविड के कुप्रबंधन की तस्वीरें आज भी ताज़ा हैं. मणिपुर महीनों से जल रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री ने वहां नेतृत्व दिखाने के बजाय चुप्पी साधे रखी. लेखक का तर्क है कि खराब शासन अब मोदी युग की पहचान बन गया है, जो केवल प्रचार, केंद्रीयकरण और “चौंकाने” की नीति पर चलता है. संसद और स्वतंत्र संस्थाओं को कमजोर कर दिया गया है.
लेख में निष्कर्ष निकाला गया है कि “रणनीतिक रूप से संप्रभु” भारत के आख्यान (नैरेटिव) और वास्तविकता के बीच की खाई चौड़ी हो गई है. जो नेतृत्व दावा करता था कि उसके बिना पत्ता नहीं हिलता, वह अब यह तय करने में भी असमर्थ है कि साफ़ हवा, सुरक्षित पानी और संवैधानिक व्यवस्था कैसे सुनिश्चित की जाए. संकट अब भविष्य में नहीं, बल्कि वर्तमान में है.
बलूचिस्तान में पाक सेना की कार्रवाई में 41 लड़ाके मारे गए, भारत पर लगाए आरोप
पाकिस्तान की सेना ने शुक्रवार को दावा किया कि उसने दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान में दो अलग-अलग अभियानों में कम से कम 41 सशस्त्र लड़ाकों को मार गिराया है. पाकिस्तानी सेना ने अपनी पुरानी आदत के मुताबिक, बिना कोई सबूत पेश किए इन लड़ाकों का संबंध भारत से जोड़ा है. अल जजीरा की रिपोर्ट है कि पाकिस्तानी सेना के अनुसार, पहली कार्रवाई हरनाई जिले में हुई जहां प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से जुड़े 30 लड़ाके मारे गए. दूसरी कार्रवाई पंजगुर जिले में हुई जहां 11 लड़ाके मारे गए. सेना ने दावा किया कि पंजगुर में मारे गए लड़ाके “फितना-अल-हिंदुस्तान” समूह के थे और भारत द्वारा प्रायोजित थे. हालांकि, भारत ने इन आरोपों पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
यह कार्रवाई बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा और अलगाववादी गतिविधियों के बीच हुई है. बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और टीटीपी जैसे समूह वहां लगातार सक्रिय हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सेना की कार्रवाई का समर्थन किया है. गौरतलब है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक सुरक्षा विफलताओं के लिए अक्सर बाहरी ताकतों पर दोष मढ़ता रहा है.
रूस ने कहा, ट्रंप के अनुरोध पर 1 फरवरी तक यूक्रेन पर हमला रोकने के लिए वह सहमत
क्रेमलिन ने शुक्रवार को कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को उनके अमेरिकी समकक्ष डोनाल्ड ट्रंप की ओर से एक व्यक्तिगत अनुरोध प्राप्त हुआ है, जिसमें शांति वार्ता के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने हेतु 1 फरवरी तक कीव पर हमले रोकने का आग्रह किया गया है.
ट्रंप ने गुरुवार को कहा था कि पुतिन कड़ाके की ठंड के कारण एक सप्ताह तक कीव और अन्य यूक्रेनी शहरों पर गोलाबारी न करने के लिए सहमत हो गए हैं, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि यह अवधि कब समाप्त होगी.
“रॉयटर्स” के मुताबिक, क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने शुक्रवार को संवाददाताओं के सवालों का जवाब देते हुए मौसम को एक कारक (वजह) के रूप में नहीं बताया. उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप ने वास्तव में राष्ट्रपति पुतिन से व्यक्तिगत अनुरोध किया था कि बातचीत के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाने के उद्देश्य से 1 फरवरी तक एक सप्ताह के लिए कीव पर हमले न किए जाएं.”
यह पुष्टि करने के लिए पूछे जाने पर कि क्या पुतिन मान गए हैं, उन्होंने कहा, “हाँ बिल्कुल, राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से एक व्यक्तिगत अनुरोध था.”
यह स्पष्ट नहीं था कि पेसकोव “कीव” शब्द का इस्तेमाल केवल राजधानी शहर के लिए कर रहे थे, जहां यूक्रेन युद्ध के दौरान रूसी हमलों के बाद सैकड़ों अपार्टमेंट बिना गर्मी (हीट) और बिजली के रह गए हैं, या इसका तात्पर्य पूरे देश से था.
उधर, यूक्रेन ने कहा है कि यदि रूस कड़ाके की ठंड के बीच देश के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमले नहीं करता है, तो वह भी इसका सकारात्मक जवाब देगा (अर्थात जवाबी हमले नहीं करेगा).
रूस, यूक्रेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच त्रिपक्षीय शांति वार्ता का अगला दौर रविवार को अबू धाबी में होने वाला था, लेकिन यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने शुक्रवार को कहा कि इसकी तारीख या स्थान बदला जा सकता है.
अमेरिका के हमले पर ईरान की प्रतिक्रिया इस बार अलग क्यों हो सकती है?
ईरानी जलक्षेत्र के पास अमेरिकी युद्धपोत अब्राहम लिंकन की तैनाती और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की धमकियों ने क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है. बीबीसी पर्शियन के अमीर अज़ीमी के विश्लेषण के मुताबिक, इस बार हालात पिछले संघर्षों से अलग हैं. ईरान वर्तमान में अपने इतिहास के सबसे बड़े और हिंसक घरेलू विरोध प्रदर्शनों का सामना कर रहा है, जिसे कुचलने के लिए उसने भारी बल प्रयोग किया है.
विश्लेषण में कहा गया है कि पहले ईरान अमेरिका के साथ सीधे टकराव से बचता था और ‘कैलिब्रेटेड’ (नपे-तुले) हमले करता था, जैसे सुलेमानी की हत्या के बाद किया गया हमला. लेकिन अब ईरान का शासन कमजोर और दबाव में है. एक सीमित अमेरिकी हमला भी ईरानी सरकार को घरेलू दमन बढ़ाने का बहाना दे सकता है, या फिर यह शासन के पतन और अराजकता का कारण बन सकता है.
ईरानी नेता इस बार त्वरित और आक्रामक प्रतिक्रिया दे सकते हैं ताकि अपनी ताकत दिखाई जा सके, क्योंकि वे आंतरिक रूप से कमजोर महसूस कर रहे हैं. वहीं, ट्रम्प भी जानते हैं कि पूर्ण युद्ध का जोखिम बहुत बड़ा है. दोनों पक्षों के बीच यह ‘ब्रिंकमैनशिप’ (कगार की कूटनीति) खतरनाक स्तर पर है, जहां एक छोटी सी गलती पूरे क्षेत्र को युद्ध में झोंक सकती है.
भारत में बाघों की गिनती कैसे होती है?
‘ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन फील्ड गाइड 2021’ के अनुसार, भारत में बाघों की गणना एक वैज्ञानिक और तकनीकी प्रक्रिया है जो दो चरणों में पूरी होती है.
इंडिया स्पेंड के मुताबिक पहले चरण में, वन विभाग की टीमें संभावित बाघ आवासों में व्यापक जमीनी सर्वेक्षण (ग्राउंड सर्वे) करती हैं. इसमें बाघों के पंजों के निशान, शिकार की उपलब्धता, आवास की गुणवत्ता और मानवीय दखल के सबूत इकट्ठा किए जाते हैं. डेटा को मानकीकृत करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाता है. दूसरे चरण में, चयनित क्षेत्रों में ‘कैमरा ट्रैप’ लगाए जाते हैं. जब बाघ इन कैमरों के सामने से गुजरते हैं, तो उनकी तस्वीरें कैद हो जाती हैं. इन तस्वीरों का विश्लेषण विशेष सॉफ्टवेयर और सांख्यिकीय मॉडल के जरिए किया जाता है. दिलचस्प तथ्य यह है कि हर बाघ की धारियां इंसान के फिंगरप्रिंट की तरह अलग होती हैं, जिससे उनकी व्यक्तिगत पहचान सुनिश्चित की जाती है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.






