01/01/2026 : 28 साल, 4 लाख किसानों की खुदकुशी |विजयवर्गीय का घंटा | नये मनरेगा का फैक्ट चैक | मेयर ममदानी की उमर खालिद को चिट्ठी | विश्वगुरू पर तेलतुम्बडे | लिंक्डइन पर जॉब स्कैम
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
इंदौर में दूषित पानी से 10 मौतें; मंत्री विजयवर्गीय ने रिपोर्टर को दी गाली, बाद में मांगी माफी.
28 साल में 4 लाख किसानों ने की खुदकुशी; अब मजदूरों की जान पर ज्यादा आफत.
मनरेगा पर संकट: नए कानून पर फैक्ट चेक; ‘स्विच ऑफ क्लॉज’ से रोजगार की गारंटी खत्म होने का डर.
मणिपुर मंथन: राष्ट्रपति शासन खत्म होने से पहले अमित शाह की बड़ी बैठक
जोहरान ममदानी बने न्यूयॉर्क के मेयर; उमर खालिद को किया याद.
बंगाल की अदालतों में महिला वकीलों का यौन उत्पीड़न; आईसीसी का पता नहीं.
2025 में 166 बाघों की जान गई; मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा नुकसान.
यूपी के हरदोई में फर्जी जमानत दिलाने वाले गिरोह का भंडाफोड़; 6 गिरफ्तार.
लिंक्डइन पर जॉब स्कैम की बाढ़; मेंटर बनकर युवाओं को ठग रहे जालसाज.
आनंद तेलतुम्बड़े का विश्लेषण; भुखमरी के आंकड़ों के बीच विश्वगुरु बनने का दावा कितना सही?
28 साल, 4 लाख किसानों ने अपनी जान ली
भारत के खेतों में उपजे संकट की एक भयावह तस्वीर पेश करते हुए, डाउन टू अर्थ ने एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) के 28 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण प्रकाशित किया है. रिपोर्ट के अनुसार, 1995 से 2023 के बीच देश में 3.9 लाख से अधिक किसानों और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की है. इसका मतलब है कि हर साल औसतन 13,600 मौतें.
विश्लेषण में पाया गया कि महाराष्ट्र और कर्नाटक पिछले दो दशकों से इस संकट के केंद्र बने हुए हैं, जहां आत्महत्या की दर राष्ट्रीय औसत से लगभग 2.5 गुना अधिक है. सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (सीएसए) के मुताबिक, 2000 के दशक की शुरुआत में बीटी कॉटन का तेजी से प्रसार, बढ़ती लागत, बार-बार फसल खराब होना और विश्वसनीय मूल्य समर्थन की कमी प्रमुख कारणों में शामिल थे.
रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बदलाव को भी रेखांकित किया गया है. 2023 में आत्महत्या करने वालों में जमीन के मालिक किसानों की तुलना में खेतिहर मजदूरों की संख्या अधिक थी. 2023 में दर्ज 10,786 आत्महत्याओं में से 6,096 खेतिहर मजदूर थे. यह ग्रामीण संकट की गहराई को दर्शाता है. रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2010 के बाद मनरेगा जैसी योजनाओं ने आत्महत्याओं को कम करने में मदद की थी, लेकिन 2023 में इसमें फिर से 75% की भारी वृद्धि देखी गई है, जो चिंताजनक है.
फैक्ट चेक
क्या नया कानून ‘रोजगार की गारंटी’ को खत्म कर रहा है?
मोदी सरकार ने मनरेगा की जगह एक नया कानून ‘विकसित भारत – गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी VB-G-RAM-G पास किया है. सरकार का दावा है कि यह एक “रीवैम्प” (सुधार) है, लेकिन ऑल्ट न्यूज़ में शिंजिनी मजूमदार की फैक्ट चेक रिपोर्ट बताती है कि आलोचक इसे रोजगार गारंटी के अधिकार का अंत मान रहे हैं.
रिपोर्ट में इस विधेयक के विवादास्पद प्रावधानों का विश्लेषण किया गया है. सबसे बड़ा मुद्दा ‘स्विच-ऑफ क्लॉज’ है. इसके तहत, केंद्र सरकार के पास यह शक्ति होगी कि वह तय करे कि यह कानून किस राज्य या क्षेत्र में लागू होगा. इसका मतलब है कि रोजगार अब ‘अधिकार’ नहीं, बल्कि सरकार की मर्जी पर निर्भर होगा. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ ने इसे मनरेगा का प्रभावी खात्मा बताया है.
इसके अलावा, फंडिंग के ढांचे को बदल दिया गया है. मनरेगा में केंद्र सरकार मजदूरी का 100% भुगतान करती थी, लेकिन नए कानून में कई राज्यों को 40% हिस्सा देना होगा. आलोचकों का तर्क है कि इससे आर्थिक रूप से कमजोर राज्य काम देने में आनाकानी करेंगे, जिससे यह योजना ‘मांग-आधारित’ नहीं रह जाएगी. रिपोर्ट में तकनीकी बाधाओं का भी जिक्र है—जैसे अनिवार्य बायोमेट्रिक हाजिरी और ऐप-आधारित निगरानी—जो गरीब मजदूरों के लिए काम पाना और मुश्किल बना देगी. ‘महात्मा गांधी’ का नाम हटाना भी विपक्ष के लिए एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है.
मौतों पर सवाल से बौखलाए भाजपा मंत्री विजयवर्गीय, पत्रकार से बोले- क्या ‘घंटा’ गए थे…
इंदौर पिछले कुछ वर्षों से भारत का सबसे स्वच्छ शहर बना हुआ है, लेकिन शहर में पीने के दूषित पानी के कारण कम से कम 10 लोगों की मौतों के बाद राज्य सरकार की किरकिरी हो रही है. दो माह पहले राज्य में जहरीले कफ सिरप से 20 से ज्यादा बच्चों की मौत का मामला अभी लोग भूले भी नहीं थे कि इंदौर की मौतें राज्य की भाजपा सरकार के लिए अपयश का कारण बन गई हैं. सरकार के मंत्री दबाव में आपा खो रहे हैं. “द टेलीग्राफ” के अनुसार, बुधवार को एनडीटीवी के रिपोर्टर अनुराग द्वारी और मध्यप्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बीच हुई तीखी बहस का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें विजयवर्गीय को आपा खोते हुए देखा गया. यह वीडियो पत्रकार द्वारा “एक्स’ पर पोस्ट किया गया. इसके बाद पत्रकार के अडिग रुख के लिए उनकी काफी प्रशंसा की गई और इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं.
अनुराग द्वारी ने सवाल किया था कि इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से हुई मौतों की जिम्मेदारी केवल कनिष्ठ (जूनियर) अधिकारियों पर ही क्यों डाली जा रही है और वरिष्ठ नेताओं पर क्यों नहीं. रिपोर्टर ने पूछा: क्या नगरीय प्रशासन मंत्री और क्षेत्र के विधायक होने के नाते इसकी जिम्मेदारी विजयवर्गीय की भी नहीं बनती? क्या इसकी जिम्मेदारी जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट की नहीं है, जो मुख्यमंत्री के बगल में बैठे थे? उन्होंने अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिवारों को चिकित्सा खर्चों की प्रतिपूर्ति न मिलने का मुद्दा भी उठाया. जब इन सवालों पर दबाव बनाया गया, तो विजयवर्गीय ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “...अनावश्यक प्रश्न मत पूछो.” जब रिपोर्टर ने अपनी बात जारी रखी और बताया कि परिवार मेडिकल बिलों से जूझ रहे हैं और उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला है, तो मंत्री अपना आपा खो बैठे. वीडियो में उन्हें यह कहते सुना गया, “छोड़ो यार, तुम फोकट प्रश्न मत पूछो यार.” इस पर रिपोर्टर ने कहा, “फोकट नहीं, मैं वहाँ (मौके पर) होकर आया हूं.” इस पर विजयवर्गीय यह कहते सुने गए कि “क्या घंटा होकर आए हो तुम.” पत्रकार ने इस पर आपत्ति जताई और मंत्री को अपनी भाषा पर ध्यान देने को कहा: “कैलाश जी बात ठीक से कीजिए...शब्दों का चयन ठीक करिए...कैलाश जी आप ढंग से बात नहीं कर रहे हैं...ये क्या शब्द होता है… घंटा-वंटा क्या शब्द होता है...इतने सीनियर मंत्री हैं, बात करने की तमीज़ नहीं है.”
बहरहाल, इसके बाद विजयवर्गीय ने अपनी टिप्पणियों पर खेद व्यक्त किया. उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, “मैं और मेरी टीम पिछले दो दिनों से बिना सोए प्रभावित क्षेत्र की स्थिति सुधारने के लिए लगातार काम कर रहे हैं.” उन्होंने आगे कहा, “मेरे लोग दूषित पानी से पीड़ित हैं और कुछ हमें छोड़कर चले गए हैं; इस गहरे दुख की स्थिति में, मीडिया के एक सवाल के जवाब में मेरे शब्द गलत निकल गए. इसके लिए मैं खेद व्यक्त करता हूँ. लेकिन जब तक मेरे लोग पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ नहीं हो जाते, मैं चुप नहीं बैठूँगा.”
इस बीच मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करते हुए दावा किया कि “इंदौर में जहरीले पानी के कारण होने वाली मौतें आठ से बढ़कर 10 हो गई हैं, “और भाजपा नेताओं पर अहंकार का आरोप लगाया. उन्होंने मांग की कि मुख्यमंत्री मोहन यादव नैतिक आधार पर विजयवर्गीय का इस्तीफा मांगें. मुख्यमंत्री ने भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से फैले डायरिया को “आपातकाल जैसी स्थिति” बताया और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया.
इंदौर के घनी आबादी वाले इलाके भागीरथपुरा में परिवारों का दावा है कि पानी पीने से कम से कम आठ लोगों की मौत हुई है, जबकि आधिकारिक मृत्यु संख्या अलग-अलग रही है. स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों में चार मौतों का उल्लेख किया गया है, जिसमें 212 मरीज अस्पताल में भर्ती हैं और 50 को इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई है.
बाद में विजयवर्गीय ने कहा, “1400–1500 लोग प्रभावित हुए थे. 198 अस्पताल में भर्ती थे और आज दो और लोगों को भर्ती किया गया है. कुछ को इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई है. सभी जिम्मेदार अधिकारी काम पर लगे हैं और हम स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं और प्रभावितों की निगरानी कर रहे हैं. समर्पित डॉक्टरों की एक टीम ड्यूटी पर है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार चार लोगों की मौत हुई है, लेकिन यहां आने पर मुझे पता चला कि यह संख्या बढ़कर 8–9 हो गई है.”
‘प्रशासन ने उन्हें मार डाला’: इंदौर में दूषित पानी से 6 महीने के बच्चे समेत 8 की मौत; ‘सबसे स्वच्छ शहर’ में स्वास्थ्य संकट
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस त्रासदी का सबसे छोटा शिकार छह महीने का एक बच्चा था, जिसके माता-पिता ने एक बेटे के लिए पूरे एक दशक तक इंतजार किया था. बच्चे के पिता सुनील की आवाज़ में दर्द साफ झलक रहा था. उन्होंने बताया, “उसे दस्त और बुखार था. हम उसे डॉक्टर के पास ले गए... वह दो दिन तक ठीक था. लेकिन अचानक रात में उसे बहुत तेज़ बुखार आया. उसने उल्टी की और घर पर ही उसकी मौत हो गई.”
रिपोर्ट के मुताबिक, मरने वालों में से अधिकांश लोग बीमार पड़ने से पहले पूरी तरह स्वस्थ थे. 31 वर्षीय उमा कोरी की मौत की कहानी भी उतनी ही दर्दनाक है. उनके पति बिहारी कोरी ने बताया कि उमा ने रविवार की रात सामान्य खाना खाया था, लेकिन सोमवार तड़के 3 बजे उन्हें उल्टियां शुरू हो गईं. शुरुआत में इसे फूड पॉइज़निंग समझा गया, लेकिन उनकी हालत तेजी से बिगड़ी. शरीर में पानी की कमी (डिहायड्रेशन) और लगातार उल्टियों के कारण सुबह 11 बजे तक वह बेहोश हो गईं. उनके पति उन्हें बाइक पर अस्पताल ले जा रहे थे, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई.
इसी तरह, 74 वर्षीय मंजुला वाधे और 50 वर्षीय सीमा प्रजापत ने भी दूषित पानी पीने के कुछ घंटों के भीतर दम तोड़ दिया. मंजुला के पति दिगंबर ने प्रशासन पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा, “हमारे इलाके का पानी पिछले कुछ दिनों से खराब आ रहा था. प्रशासन मेरी पत्नी की मौत के लिए जिम्मेदार है.” स्थानीय लोगों की शिकायत है कि पिछले एक सप्ताह से नल के पानी में ड्रेनेज जैसी बदबू आ रही थी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.
शुरुआत में, कुछ मामलों में अस्पताल प्रशासन ने मौत का कारण ‘कार्डियक अरेस्ट’ बताया था, लेकिन बाद में अधिकारियों ने पुष्टि की कि दूषित पानी ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई है. 75 वर्षीय नंदलाल के बेटे सिद्धार्थ ने कहा, “हमने सोचा था कि उन्होंने कुछ गलत खा लिया होगा; हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जो पानी हम रोज पीते हैं, वह उन्हें मार डालेगा.”
विजयवर्गीय का वीडियो हटाने पर भड़के अभिषेक बनर्जी; न्यूज़ चैनल को लताड़ते हुए कहा- ‘यह क्रोनी कैपिटलिज्म है’
तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भारतीय मीडिया के एक हिस्से पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने एक प्रमुख समाचार चैनल पर प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करने के बजाय सत्ता के सामने झुकने का आरोप लगाया है. टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, विवाद तब खड़ा हुआ जब चैनल ने मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का एक वीडियो अपने सोशल मीडिया हैंडल से डिलीट कर दिया. इस वीडियो में मंत्री एक पत्रकार को गाली देते हुए दिखाई दे रहे थे, जिसने उनसे इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों पर सवाल पूछा था.
अभिषेक बनर्जी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां एक समाचार चैनल अपने ही पत्रकार पर सत्ताधारी पार्टी के नेता द्वारा किए गए मौखिक हमले को दिखाने वाले ट्वीट को हटा देता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने सवाल पूछे थे. अपने रिपोर्टर के साथ खड़े होने के बजाय, चैनल ने चुप्पी चुनी, प्रेस की स्वतंत्रता के बजाय सत्ता की रक्षा की.”
टीएमसी नेता ने इसे “क्रोनी कैपिटलिज्म” (याराना पूंजीवाद) का परिणाम बताया. उन्होंने कहा, “यह वही है जो क्रोनी कैपिटलिज्म ने भारतीय मीडिया के साथ किया है, जहां सच्चाई से ज्यादा मालिकान मायने रखते हैं और पत्रकारिता के साहस की जगह सत्ता की निकटता ले लेती है. यह तथाकथित नया भारत है... सब चंगा सी!”
इससे पहले, अभिषेक बनर्जी ने उस पत्रकार, अनुराग द्वारी की तारीफ की थी जिसने मंत्री से सवाल पूछने की हिम्मत दिखाई. विवाद की जड़ इंदौर की घटना थी, जहां पत्रकार ने मंत्री विजयवर्गीय से सवाल किया था कि क्या प्रशासन उन परिवारों को मुआवजा देगा जिनके प्रियजनों की मौत दूषित पानी से हुई है. इस पर मंत्री अपना आपा खो बैठे और पत्रकार को अपशब्द कहे, हालांकि बाद में उन्होंने इसके लिए माफी मांग ली थी.
मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय अक्सर भड़काऊ बयानों के कारण विवादों में रहने का एक लंबा इतिहास रखते हैं. इस घंटा कुवाच के अलावा पहले उनका मुँह जब भी खुला है, उनकी पार्टी, सरकार, राजनीति को शर्मसार ही होना पड़ा है.
अक्टूबर 2025 (ऑस्ट्रेलियाई महिला क्रिकेटरों की घटना): इंदौर में दो ऑस्ट्रेलियाई महिला क्रिकेटरों के साथ कथित छेड़छाड़ की घटना पर टिप्पणी करते हुए उन पर ‘विक्टिम-ब्लेमिंग’ (पीड़िता को ही दोषी ठहराने) के आरोप लगे. उन्होंने सुझाव दिया कि खिलाड़ियों को होटल से निकलने से पहले अधिकारियों को सूचित करना चाहिए था और इसे अधिकारियों के लिए एक “सबक” के रूप में पेश किया.
अगस्त 2025 (स्वतंत्रता दिवस पर टिप्पणी): भारत के 78वें स्वतंत्रता दिवस पर, उन्होंने 1947 के विभाजन को “कटी-फटी” आजादी करार दिया और “अखंड भारत” के तहत पाकिस्तान में भारतीय ध्वज फहराने की परिकल्पना की. इस पर कांग्रेस ने उन पर स्वतंत्रता संग्राम का अपमान करने का आरोप लगाया.
जून 2025 (महिलाओं के कपड़ों पर): उन्होंने “छोटे कपड़ों” (skimpy clothes) को अभारतीय और विदेशी प्रभाव वाला बताते हुए महिलाओं की आलोचना की. उन्होंने महिलाओं से नैतिक अखंडता के लिए “देवी का रूप” धारण करने का आग्रह किया, जिससे जेंडर और परंपरा पर बहस फिर से शुरू हो गई.
अप्रैल 2023 (शूर्पणखा वाला बयान): एक धार्मिक कार्यक्रम में, उन्होंने “गंदे या छोटे कपड़े” पहनने वाली लड़कियों की तुलना रामायण की राक्षसी शूर्पणखा से की, जिससे महिलाओं के पहनावे पर उनके विचारों को लेकर काफी गुस्सा भड़का.
हरदोई में हत्यारों और बलात्कारियों को जमानत दिलाने वाले गिरोह का भंडाफोड़; 6 गिरफ्तार
उत्तरप्रदेश के हरदोई जिले में पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ किया है, जो कथित तौर पर फर्जी भू-राजस्व रिकॉर्ड, फर्जी आधार कार्ड और मनगढ़ंत पहचान दस्तावेजों का उपयोग करके हत्या, बलात्कार और लूट जैसे जघन्य अपराधों के आरोपियों को जमानत दिलाने के लिए “पेशेवर जमानतदार” के रूप में काम कर रहा था.
“टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क” के अनुसार, जमानत पर छूटे एक हत्या के दोषी सहित छह आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है. यह गिरोह कथित तौर पर प्रति केस लगभग ₹20,000 वसूलता था. सिटी सर्कल ऑफिसर अंकित मिश्रा ने बताया कि अब तक की जांच में सामने आया है कि इस गिरोह ने धोखाधड़ी से कम से कम 23 मामलों में जमानत हासिल की थी.
एडिशनल एसपी सुबोध गौतम के अनुसार, एसओजी, सर्विलांस यूनिट और सिटी कोतवाली की टीमों ने तकनीकी और दस्तावेजी सत्यापन के बाद ये गिरफ्तारियां कीं. मुख्य आरोपी राम किशोर ने कथित तौर पर 13 मामलों में फर्जी भू-राजस्व दस्तावेज तैयार किए. विश्वनाथ पांडे और प्रवीण दीक्षित, दो-दो मामलों में जमानतदार बने. धर्मेंद्र ने दो मामलों में और पिंकू ने एक मामले में जमानत ली. जबकि, अमित तीन मामलों में जमानतदार के रूप में शामिल था.
पुलिस ने बताया कि प्रवीण दीक्षित एक सजायाफ्ता हत्यारा है, जो उम्रकैद की सजा काट रहा है, लेकिन वर्तमान में हाईकोर्ट से मिली जमानत पर बाहर है. वहीं, पिंकू उर्फ प्रेम शंकर कथित तौर पर कोर्ट परिसर में आवेदन ड्राफ्ट करने का काम करता था और पेशेवर अपराधियों के लिए जमानतदार और फर्जी दस्तावेज उपलब्ध कराने में उसकी मुख्य भूमिका थी.
भारत में इस वर्ष 166 बाघों की मौत, पिछले साल से 40 ज्यादा, मध्यप्रदेश सबसे आगे
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, दुनिया की सबसे बड़ी बाघ आबादी वाले देश भारत ने वर्ष 2025 में 166 बाघों को खो दिया है. यह संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 40 अधिक है. 2024 में 126 बाघों की मौत हुई थी. इसकी बड़ी वजह यह है कि स्वस्थ जंगल सीमित हो गए हैं.
‘पीटीआई’ के अनुसार, आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि देश का ‘टाइगर स्टेट’ (बाघ राज्य) कहे जाने वाले मध्यप्रदेश में सबसे अधिक 55 मौतें दर्ज की गई हैं. अन्य राज्यों में, बीते वर्ष के दौरान महाराष्ट्र, केरल और असम में क्रमशः 38, 13 और 12 बाघों की मौत हुई. इन मृत 166 बाघों में से 31 शावक थे. विशेषज्ञों का मानना है कि जगह की कमी के कारण आपसी वर्चस्व की लड़ाई इनकी मौत का मुख्य कारण थी. बीते वर्ष बाघ की मृत्यु का पहला मामला 2 जनवरी को महाराष्ट्र के ब्रह्मपुरी वन प्रभाग से सामने आया था, जहां एक वयस्क नर बाघ की मौत हुई थी. इसके तीन दिन बाद, मध्यप्रदेश के पेंच टाइगर रिजर्व में एक मादा बाघ की मृत्यु हुई. एनटीसीए के आंकड़ों के अनुसार, एक वयस्क नर बाघ की सबसे हालिया मौत 28 दिसंबर को मध्यप्रदेश के उत्तरी सागर में दर्ज की गई.
बाघों पर विस्तृत लेखन करने वाले वन्यजीव विशेषज्ञ जयराम शुक्ला ने कहा कि बाघों की आबादी एक संतृप्ति बिंदु पर पहुँच गई है. उन्हें अपने इलाके स्थापित करने के लिए जगह की कमी का सामना करना पड़ रहा है.
मध्यप्रदेश का जिक्र करते हुए शुक्ला ने कहा कि राज्य में 2014 के बाद से बाघों की आबादी में लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है. यह वृद्धि अभूतपूर्व है. सवाल यह है कि उनके लिए इलाका कहाँ है? मध्य प्रदेश में जहाँ उनकी आबादी तेजी से बढ़ी है, वे जगह के लिए लड़ रहे हैं और मर रहे हैं.”
2023 में अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर जारी किए गए बाघों के आकलन के अंतिम आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या 2018 में 2,967 से बढ़कर 2022 में 3,682 हो गई, जो लगभग छह प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्शाता है. अधिकारियों ने कहा कि एक अनुमान के अनुसार दुनिया की लगभग 75 प्रतिशत बाघ आबादी भारत में रहती है. प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) शुभ रंजन सेन ने कहा कि मध्यप्रदेश में दुनिया की सबसे अधिक बाघ आबादी है, इसलिए यहाँ मौतों की अधिक संख्या दर्ज होने की संभावना रहती है. सेन ने बताया कि मध्य प्रदेश में 2014 में 308 बाघ थे, जिनकी संख्या 2018 में बढ़कर 526 और 2022 में 785 हो गई. उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय बाघ गणना, जो हर चार साल में आयोजित की जाती है, इस वर्ष शुरू हो गई है और मध्यप्रदेश में बाघों की आबादी और बढ़ने की उम्मीद है.
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मध्यप्रदेश में बाघों की कुल मृत्यु 2023 में 44, 2024 में 47 और 2025 में अब तक 55 रही. इनमें से 38 से अधिक मौतें प्राकृतिक कारणों से हुई थीं. बाघ के शरीर के अंगों की जब्ती से जुड़े पांच मामले भी दर्ज किए गए. 10 मौतें अवैध शिकार के कारण हुईं. इनमें से कम से कम सात को “गैर-लक्षित हत्या” के रूप में वर्णित किया गया, जहां इरादा बाघ को मारना नहीं था, बल्कि अधिकतर जंगली सूअर को मारना था. सात मामले बिजली का करंट लगने से हुई मौतों से जुड़े थे.
सेन ने कहा, “इसके बावजूद, इन सभी को बाघ के अवैध शिकार के मामले के रूप में माना जाता है और अदालतों में उन पर मुकदमा चलाया जा रहा है.” उन्होंने कहा कि बाघ प्राकृतिक मृत्यु के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील तब होते हैं, जब वे शावक होते हैं या जब वे अपने जन्म के क्षेत्रों से अलग होते हैं. बाघ के शावक कम से कम 20 महीनों तक अपनी मां के साथ रहते हैं, जिसके बाद वे, विशेष रूप से नर, नए क्षेत्रों की तलाश में निकल जाते हैं.
सेन ने बताया, “ज्यादातर जंगलों में, इन अलग होने वाले बाघों को वहां पहले से रह रहे बाघों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है. यह स्वाभाविक है कि उनमें से कई अन्य बाघों द्वारा मार दिए जाते हैं.” सेन ने कहा कि इस साल राज्य में प्राकृतिक कारणों से मृत पाए गए 38 बाघों में से 19 की उम्र एक से दो साल के बीच थी. उन्होंने आगे कहा कि प्राकृतिक मौतों में शावकों और युवा बाघों की संख्या सबसे अधिक है.
सेन के अनुसार, तथ्य यह भी है कि मारे गए बाघों में से एक बड़ी संख्या 2-3 साल से कम उम्र के बाघों की है, जो यह दर्शाता है कि वहां अपनी ही प्रजाति के बीच प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि स्वस्थ जंगल सीमित हैं और मानव-बहुल क्षेत्र उन गलियारों को बंद कर देते हैं, जो बाघों को एक आवास से दूसरे आवास में स्वतंत्र रूप से जाने में मदद करते हैं.
मणिपुर में राष्ट्रपति शासन खत्म होने से पहले अमित शाह करेंगे उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक
मणिपुर में जारी राष्ट्रपति शासन 13 फरवरी, 2026 को समाप्त होने वाला है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नए साल की शुरुआत (2 जनवरी) हिंसा प्रभावित मणिपुर की स्थिति की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय बैठक के साथ करेंगे.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार राज्य में राजनीतिक प्रक्रिया को फिर से शुरू करने और एक लोकतांत्रिक सरकार के गठन की संभावनाओं को तलाश रही है. इसके लिए एक स्थिर और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा. बैठक में मणिपुर के राज्यपाल अजय कुमार भल्ला, राज्य सरकार के सुरक्षा सलाहकार कुलदीप सिंह, मुख्य सचिव पीके गोयल और पुलिस महानिदेशक राजीव सिंह सहित केंद्रीय गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे.
मणिपुर पिछले ढाई वर्षों से जिस हिंसा और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, वह अब महज एक कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि एक गहरे मानवीय संकट और अघोषित ‘गृह युद्ध’ में तब्दील हो चुका है. पूर्वोत्तर का यह राज्य मई 2023 से ही जातीय संघर्ष की आग में जल रहा है, जिसकी शुरुआत मेइतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच अनुसूचित जनजाति (एसटी) के दर्जे और भूमि अधिकारों को लेकर हुए विवाद से हुई थी. 3 मई 2023 को तोरबुंग में एक आदिवासी मार्च के दौरान भड़की चिंगारी ने देखते ही देखते पूरे राज्य को अपनी चपेट में ले लिया.
शुरुआती दौर बेहद भयावह रहा, जिसमें सैकड़ों घर, चर्च और मंदिर जला दिए गए. कर्फ्यू और इंटरनेट बंदी के बावजूद हिंसा नहीं रुकी. स्थिति तब और भी गंभीर हो गई जब पुलिस शस्त्रागारों से हजारों हथियार लूट लिए गए और जुलाई 2023 में महिलाओं के साथ यौन हिंसा का वीडियो सामने आया, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवैधानिक विफलता करार दिया. इस दौरान, म्यांमार सीमा से अवैध घुसपैठ और ड्रग तस्करी (नार्को-टेररिज्म) के मुद्दों ने आग में घी का काम किया, जिससे दोनों समुदायों के बीच अविश्वास की खाई और गहरी हो गई.
राजनीतिक रूप से, यह संकट राज्य सरकार के लिए भी भारी पड़ा. हिंसा को नियंत्रित करने में विफलता के आरोपों के बीच, फरवरी 2025 में मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को इस्तीफा देना पड़ा, जिसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया और लगभग 40,000 केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की गई.
अब, जनवरी 2026 में, हालांकि बड़े पैमाने पर हिंसा में कुछ कमी आई है, लेकिन छिटपुट हत्याओं और झड़पों का सिलसिला पूरी तरह थमा नहीं है. अब तक 260 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और हजारों लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं. राष्ट्रपति शासन की मियाद खत्म होने वाली है और केंद्र सरकार राजनीतिक प्रक्रिया को बहाल करने की कोशिश कर रही है, लेकिन जमीन पर डर और तनाव अब भी बरकरार है. मणिपुर का यह घटनाक्रम बताता है कि सैन्य तैनाती से फौरी शांति तो मिल सकती है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए दोनों समुदायों के बीच एक विश्वसनीय संवाद और विश्वास बहाली ही एकमात्र रास्ता है.
जोहरान ममदानी बने न्यूयॉर्क के पहले मुस्लिम मेयर; उमर खालिद को लिखा भावुक पत्र
अमेरिका के सबसे प्रमुख शहर न्यूयॉर्क में एक ऐतिहासिक बदलाव हुआ है. युगांडा से आए 34 वर्षीय आप्रवासी और डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट जोहरान ममदानी ने गुरुवार तड़के न्यूयॉर्क शहर के 112वें मेयर के रूप में शपथ ली. सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, प्रसिद्ध फिल्म निर्माता मीरा नायर और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर महमूद ममदानी के बेटे जोहरान ने कई रिकॉर्ड तोड़े हैं. वे शहर के पहले मुस्लिम मेयर, पहले दक्षिण एशियाई मेयर और एक सदी से भी अधिक समय में इस पद को संभालने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति बन गए हैं.
शपथ ग्रहण समारोह भी प्रतीकात्मक था. ममदानी ने सिटी हॉल के नीचे स्थित पुराने सबवे स्टेशन पर शपथ ली, जो सार्वजनिक परिवहन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है. उन्होंने शहर की बसों को “तेज़ और मुफ़्त” बनाने और 20 लाख किराएदारों के लिए किराए को स्थिर (freeze) करने का वादा किया है. शपथ के लिए उन्होंने न्यूयॉर्क पब्लिक लाइब्रेरी से ली गई एक ऐतिहासिक कुरान और अपने दादा की कुरान का इस्तेमाल किया.
मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अपने कार्यकाल के पहले ही दिन ममदानी ने भारत में जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ता उमर खालिद को याद किया. उन्होंने खालिद को एक पत्र लिखा, जिसे उनके शपथ ग्रहण के दिन साझा किया गया. दिल्ली हिंसा की साजिश के मामले में यूएपीए के तहत छह साल से जेल में बंद खालिद के नाम अपने पत्र में ममदानी ने लिखा, “प्रिय उमर, मैं अक्सर कड़वाहट पर तुम्हारे शब्दों और खुद को इससे न मिटने देने के महत्व के बारे में सोचता हूं... हम सब तुम्हारे बारे में सोच रहे हैं.” इससे पहले 2023 में भी ममदानी ने न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम के दौरान उमर खालिद के संघर्षों को दुनिया के सामने रखा था.
जेंडर
‘तौलिये में लिपटे सीनियर ने कहा- गले लगाओ’: बंगाल की महिला वकीलों का दर्दनाक सच
पश्चिम बंगाल की अदालतों के गलियारों में न्याय की वकालत करने वाली महिला वकीलों को खुद अन्याय और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है. आर्टिकल-14 की एक विस्तृत रिपोर्ट में वकील सेंजुति चक्रवर्ती ने महिला वकीलों के भयानक अनुभवों को साझा किया है.
रिपोर्ट में ‘ए’ (बदला हुआ नाम) नाम की एक युवा वकील की कहानी बताई गई है, जिसने 2019 में एक सीनियर वकील के साथ काम करना शुरू किया था. एक दिन सीनियर ने उसे अपने घर के चेंबर में ऊपर के कमरे में बुलाया. जब वह वहां पहुंची, तो उसने देखा कि 50 वर्षीय सीनियर वकील सिर्फ तौलिये में लिपटे हुए थे और बाल सुखा रहे थे. उन्होंने कथित तौर पर कहा, “इन दिनों तुम लोग इतने संवेदनशील हो गए हो... मैंने किसी जूनियर को अपने कमरे में नहीं आने दिया, लेकिन तुममे ईमानदारी देखी.” इसके बाद उन्होंने कहा, “अब मुझे गले लगाओ और काम पर लग जाओ.” घबराई हुई ‘ए’ वहां से भाग निकली और कभी उस चेंबर में वापस नहीं लौटी.
लेखिका ने पाया कि कलकत्ता उच्च न्यायालय में आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) 2010 में ही बन गई थी, लेकिन 15 साल तक इसका कोई अता-पता नहीं था. 2025 में जाकर इसे वेबसाइट पर सार्वजनिक किया गया. आरटीआई से पता चला कि जिला अदालतों में स्थिति और भी खराब है. कई महिला वकीलों को पता ही नहीं है कि शिकायत कहां करनी है. पुरुष-प्रधान ‘बार’ में अक्सर महिलाओं को ही गलत ठहराया जाता है या उन्हें “मेयेछेले लॉयर” (अपमानजनक शब्द) कहकर बुलाया जाता है. अगर कोई महिला आवाज़ उठाती है, तो उसे काम मिलने में दिक्कतें आती हैं और उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है.
लिंक्डइन पर ‘जॉब स्कैम’ की वैश्विक महामारी: मेंटर बनकर ठग रहे जालसाज
नौकरी और प्रोफेशनल नेटवर्किंग का सबसे भरोसेमंद प्लेटफॉर्म माना जाने वाला लिंक्डइन अब एक वैश्विक धोखाधड़ी का अड्डा बन गया है. रेस्ट ऑफ वर्ल्ड की एक खोजी रिपोर्ट बताती है कि कैसे स्कैमर्स अलग-अलग देशों की संस्कृति और आर्थिक मजबूरी के हिसाब से अपनी चालें बदल रहे हैं. जुलाई से दिसंबर 2024 के बीच लिंक्डइन ने 8 करोड़ से अधिक फर्जी खातों को हटाया है, जो समस्या की गंभीरता को दर्शाता है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में, जहां टेक जॉब्स का बहुत क्रेज है, स्कैमर्स “मेंटर” बनकर लोगों को फंसाते हैं. वे बड़ी कंपनियों (जैसे फेसबुक, गूगल, अमेज़ॅन) के कर्मचारी होने का नाटक करते हैं, फर्जी ऑफर लेटर देते हैं और फिर ‘मेंटरशिप’ या ‘रेफरल’ के नाम पर पैसे मांगते हैं. केन्या में, भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार आम है, इसलिए वहां स्कैमर्स “फास्ट-ट्रैक” प्रोसेसिंग के लिए रिश्वत मांगते हैं. नाइजीरिया में बेरोजगारी इतनी भयावह है कि लोग काम पाने की उम्मीद में अपने लिंक्डइन अकाउंट का लॉगिन ही स्कैमर्स को दे देते हैं, जिससे उनके अकाउंट हैक हो जाते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर छंटनी के दौर ने नौकरी चाहने वालों को और अधिक हताश बना दिया है, जिसका फायदा ये जालसाज उठा रहे हैं.
विश्वगुरु का दावा और आंकड़ों की ज़मीन: आनंद तेलतुम्बडे की पड़ताल
“भारत को सिर्फ सुपरपावर नहीं, बल्कि विश्वगुरु बनना चाहिए.” आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का हालिया बयान एक बार फिर सुर्खियों में है. लेकिन क्या यह दावा हकीकत की जमीन पर टिकता है, या यह महज अपनी कमजोरियों को छिपाने का एक जरिया है? द वायर में प्रोफेसर आनंद तेलतुम्बड़े ने अपने ताज़ा लेख में इस “विश्वगुरु कॉम्प्लेक्स” की गहरी पड़ताल की है.
तेलतुम्बड़े तर्क देते हैं कि “विश्वगुरु” बनने की यह रट दुनिया के किसी और देश में नहीं देखी जाती. अमेरिका, चीन या रूस अपनी ताकत काम से दिखाते हैं, न कि दुनिया का “टीचर” बनने का दावा करके. उनका कहना है कि यह सोच दरअसल एक खास ‘ब्राह्मणवादी’ मानसिकता से निकलती है, जहां यह मान लिया जाता है कि ज्ञान एक ऊंचे तबके के पास है और बाकी दुनिया को बस उसे ग्रहण करना है. यह आत्मविश्वास किसी उपलब्धि से नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक जातीय अहंकार से आता है.
लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं. ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में भारत 127 देशों में 102वें नंबर पर है. दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे (क्षय दर 19%) भारत में हैं. प्रेस की आज़ादी के मामले में हम 180 देशों में 161वें स्थान पर लुढ़क चुके हैं. शिक्षा का हाल यह है कि एएसईआर की रिपोर्ट के मुताबिक बच्चे अपनी क्लास की किताबें तक नहीं पढ़ पा रहे.
लेख में चेतावनी दी गई है कि जब देश भूख, स्वास्थ्य और रोजगार के मोर्चे पर पिछड़ रहा हो, तब “विश्वगुरु” के नारे लगाना दरअसल अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने जैसा है. यह एक तरह का “रहस्यीकरण” है, जहां जनता का ध्यान “बच्चे भूखे क्यों हैं?” से हटाकर “हमारा अतीत कितना महान था” पर ले जाया जाता है. तेलतुम्बड़े इतिहास का हवाला देते हुए कहते हैं कि चीन के किंग राजवंश और सोवियत संघ ने भी अपने पतन के दिनों में इसी तरह की श्रेष्ठता की बातें की थीं.
निष्कर्ष साफ है: असली राष्ट्रीय गौरव नारों से नहीं, नतीजों से मिलता है. एक ऐसा देश जो अपने बच्चों को पढ़ना नहीं सिखा पा रहा, उसे दुनिया का शिक्षक बनने का दावा करने से पहले अपने घर के हालात सुधारने की ज़रूरत है.
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