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मणिपुर एनआरसी विवाद: प्रदर्शनकारियों ने निकाली रैली, मुख्यमंत्री और गृह मंत्री का फूंका पुतला
एनआरसी को अपडेट करने की मांग को लेकर बुलाया गया 48 घंटे का आम बंद बुधवार को समाप्त होने के साथ ही प्रदर्शनकारियों ने मणिपुर के घाटी वाले जिलों के विभिन्न हिस्सों में राजनेताओं के पुतले फूंके और रैलियां निकालीं.
‘पीटीआई’ के अनुसार, इम्फाल ईस्ट जिले के खुरई लामलोंग में बंद समर्थकों ने मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह और गृह मंत्री गोविंददास कोंथौजम के पुतले जलाए. उन्होंने "नो एनआरसी, नो सेंसस" (एनआरसी नहीं, तो जनगणना नहीं) जैसे नारे लगाए और मांग की कि जब तक आंतरिक रूप से विस्थापित लोग अपने मूल स्थानों पर वापस नहीं लौट जाते,
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शिलांग में बाइक रैली हुई हिंसक; वाहनों में लगाई आग, विवेकानंद और नेताजी की प्रतिमाएं खंडित
खासी स्टूडेंट्स यूनियन (केएसयू) द्वारा शिलांग में आयोजित एक काले झंडे वाली बाइक रैली के दौरान हिंसा भड़क गई. उपद्रवियों ने कम से कम दो सरकारी वाहनों को आग के हवाले कर दिया और कई अन्य वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया. इसके अलावा, 1960 के दशक में पूर्वी पाकिस्तान के विस्थापितों के लिए बसाई गई 'राहत और पुनर्वास कॉलोनी' में स्थापित स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमाओं को भी खंडित कर दिया गया. प्रदर्शनकारियों ने मेघालय सचिवालय के मुख्य द्वार पर विरोध स्वरूप झंडे भी लगा दिए थे, जिन्हें पुलिस ने हटा दिया.
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यूपी के स्कूलों में अव्यवस्थाओं और बच्चों की तकलीफों वाले वीडियो वायरल, यूट्यूबर्स के प्रवेश पर प्रतिबंध
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर, बस्ती, आगरा, आजमगढ़ और बलिया सहित कई जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों (बीएसए) ने परिषदीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में ‘बाहरी लोगों’, यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स के प्रवेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है. जारी निर्देशों के अनुसार, सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना परिसरों के भीतर किसी भी प्रकार की फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी की अनुमति नहीं होगी. बलरामपुर के बीएसए विकास चंद्र श्रीवास्तव और बस्ती के बीएसए अनूप कुमार तिवारी का तर्क है कि यूट्यूबर्स केवल व्यूज़ बढ़ाने और मौद्रिक लाभ कमाने के उद्देश्य से बिना अनुमति कक्षाओं में घुस जाते हैं,
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सावरकर के बारे में परपोते की परेशान करने वाली स्वीकारोक्तियां; राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि की सुनवाई रोकने की मांग
सावरकर शोधकर्ता पंकज फड़नीस ने पुणे की विशेष एमपी/एमएलए अदालत द्वारा याचिका खारिज करने और 20,000 रुपये का जुर्माना लगाने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया है. उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे सावरकर मानहानि मामले की सुनवाई पर रोक लगाने, एक न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त करने और साक्ष्यों के दायरे को सीमित करने की मांग की है.
'लाइव लॉ' के अनुसार, फड़नीस का कहना है कि सावरकर का अनादर करना संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत उनके 'अर्थपूर्ण जीवन के अधिकार' का उल्लंघन है. उनका तर्क है कि अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए -
अमेरिकी फेंटानिल संकट से सूरत का संबंध
अमरीकी अधिकारियों ने घातक दवा के उत्पादन के लिए मैक्सिकन कार्टेल को सामग्री की आपूर्ति करने से जुड़ी गुजरात के रसायन केंद्र (हब) से संबद्ध संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई की है. चीन द्वारा निर्यात पर सख्ती किए जाने के बाद इन कार्टेलों ने भारत का रुख किया है.
यूएस ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डीईए) के अनुसार, केवल 2 मिलीग्राम फेंटानिल — एक ऐसी मात्रा जो पेंसिल की नोक पर आ सकती है — किसी वयस्क की जान लेने के लिए काफी है. दिसंबर 2025 में अमरीका में दर्ज आंकड़ों के अनुसार, वहां 70,000 से अधिक ड्रग ओवरडोज़ से मौतें हुईं.
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एनसीईआरटी ने कक्षा 11 और 12 की राजनीति विज्ञान टीम का पुनर्गठन किया; चार सदस्यों के आरएसएस और बीजेपी से संबंध
एनसीईआरटी ने सांस्कृतिक जड़ों, भारतीय ज्ञान प्रणालियों और समावेशिता को जोड़ने के जनादेश के साथ कक्षा 11 और 12 की राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक विकास टीम का पुनर्गठन किया है, जिसमें कम से कम चार सदस्यों के सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबंध हैं.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, टीम को कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तक नवंबर तक और कक्षा 12 की पुस्तक अगले साल जुलाई तक तैयार करने के लिए कहा गया है. पाठ्यपुस्तक टीम का नेतृत्व शैक्षणिक और राजनीतिक विश्लेषक संदीप शास्त्री करेंगे, जो कर्नाटक स्थित डीम्ड विश्वविद्यालय 'निट्टे' के उपाध्यक्ष हैं.
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तरुण तेजपाल, बृजभूषण और यौन हिंसा के मामलों में अदालतों के सामने सवाल: संदेह पैदा किस वजह से होता है?
‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित आदित्य कृष्ण के रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने देश की प्रमुख महिला पहलवानों द्वारा पूर्व भाजपा सांसद और कुश्ती प्रशासक बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को खारिज कर दिया. अगस्त 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने पत्रकार तरुण तेजपाल को बलात्कार मामले में बरी करने वाले निचली अदालत के फैसले को पलट दिया. दोनों मामलों के तथ्य और कानूनी सवाल अलग हैं, लेकिन दोनों एक व्यापक सवाल उठाते हैं: यौन हिंसा के मामलों में अदालत को मिलने वाला संदेह वास्तव में सबूत से पैदा होता है या महिलाओं के व्यवहार को लेकर बनी सामाजिक धारणाओं से?
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रोजगार गारंटी योजना अधर में फंसी, ग्रामीण श्रमिकों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही
‘द हिन्दू’ में ज्यां द्रेज एवं मोहम्मद जमीर के रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार द्वारा भारत की रोजगार गारंटी व्यवस्था में किए गए बदलावों का खामियाजा ग्रामीण श्रमिकों को भुगतना पड़ रहा है. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा की जगह लाई गई विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण यानी वीबी-जी राम जी योजना के तहत रोजगार सृजन में अभूतपूर्व गिरावट के संकेत मिल रहे हैं.
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फरहान सिद्दीकी | आधुनिक भारत में दलित महिलाओं के जीवन में जाति, वर्ग और पितृसत्ता
‘काउंटरकरंट्स’ में प्रकाशित फरहान सिद्दीकी के लेख के मुताबिक, भारत में लैंगिक न्याय की चर्चा केवल एक अमूर्त ‘महिला’ की अवधारणा के आधार पर नहीं की जा सकती. महिलाओं का वास्तविक जीवन श्रम, संपत्ति, जाति, वर्ग और लैंगिक संबंधों से प्रभावित होता है. दलित महिलाओं के मामले में इन सभी स्तरों को अलग-अलग करके देखना संभव नहीं है, क्योंकि उनका शोषण एक साथ जाति, वर्ग और पितृसत्ता से जुड़ा है. यही वजह है कि दलित नारीवाद मुख्यधारा के उस नजरिए को चुनौती देता है, जिसमें जाति को महिलाओं के सवाल से अलग या गौण मुद्दा माना जाता है.
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राकेश कायस्थ | दिमागी नक्सल’ के पीछे की राजनीति क्या है?
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर चर्चा की. बातचीत में इस शब्द की राजनीतिक पृष्ठभूमि, शिक्षा और सवाल पूछने की प्रवृत्ति पर बढ़ते दबाव तथा सरकार की बदलती राजनीतिक स्थिति को समझने की कोशिश की गई.
राकेश कायस्थ के मुताबिक, ‘दिमागी नक्सल’ को महज भाषण का एक जुमला मानकर छोड़ देना ठीक नहीं होगा.
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अयोध्या में जमीन के सौदों से नेताओं के रिश्तेदारों और करीबियों को बड़ा मुनाफा
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जमीन खरीदने के दौरान नेताओं और राजनीतिक संगठनों से जुड़े लोगों के रिश्तेदारों तथा करीबियों को जमीन के सौदों से बड़ा मुनाफा मिलने का सिलसिला सामने आया है. ‘स्क्रोल’ की पड़ताल के मुताबिक, मंदिर ट्रस्ट को जमीन बेचने वालों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक नेता, समाजवादी पार्टी के एक वार्ड प्रत्याशी की पत्नी, सपा नेता के भतीजे की पत्नी और अयोध्या के पूर्व भाजपा महापौर के रिश्तेदारों से जुड़े लोग शामिल हैं.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'मनोज आनंद' और 'पीटीआई' रिपोर्ट: मणिपुर में एनआरसी की मांग को लेकर 48 घंटे के बंद के बाद घाटी के जिलों में राजनेताओं के फूंके पुतले, प्रदर्शन तेज.
'पीटीआई' रिपोर्ट: शिलांग में केएसयू की बाइक रैली के दौरान भड़की हिंसा, दो सरकारी गाड़ियां फूंकीं, राहत कॉलोनी में स्वामी विवेकानंद और सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त.
उमर रशीद की रिपोर्ट: यूपी में स्कूली बच्चों के जमीनी विरोध प्रदर्शनों के बीच बेसिक शिक्षा अधिकारियों ने स्कूलों में यूट्यूबर्स और वीडियोग्राफी पर लगाई रोक.
'लाइव लॉ' रिपोर्ट: सावरकर मानहानि केस की सुनवाई पर रोक और साक्ष्यों को सीमित करने की मांग लेकर पंकज फड़नीस पहुंचे बॉम्बे हाईकोर्ट, पुणे कोर्ट के आदेश को दी चुनौती.
'द टाइम्स ऑफ इंडिया' रिपोर्ट: मैक्सिकन ड्रग कार्टेल के लिए गुजरात के सूरत स्थित केमिकल हब से अवैध फेंटानिल सप्लाई के तार जुड़े, अमरीकी जांच के बाद भारतीय एजेंसियों का कड़ा एक्शन.
'एनसीईआरटी' की 11वीं और 12वीं की राजनीति विज्ञान पाठ्यपुस्तक टीम में एबीवीपी और आरएसएस से जुड़े सदस्यों को शामिल किए जाने पर विवाद.
'आर्टिकल 14' में आदित्य कृष्ण की रिपोर्ट: तरुण तेजपाल और बृजभूषण शरण सिंह मामलों के जरिए यौन हिंसा मुकदमों में लैंगिक पूर्वाग्रहों और न्यायिक निष्पक्षता का विश्लेषण.
'स्क्रोल' की विशेष रिपोर्ट: अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट को जमीन बेचकर नेताओं, एबीवीपी नेता और पूर्व महापौर के करीबियों को मिला कई गुना मुनाफा, जांच के बाद भी सौदे जारी.
वीडियो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया.आखिर इस शब्द का मतलब क्या है और इसके पीछे की राजनीतिक सोच क्या है? हरकारा डीप डाइव के इस खास एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ के साथ ‘दिमागी नक्सल’ की राजनीति, शिक्षा, असहमति, सवाल पूछने की संस्कृति और मोदी सरकार की बदलती राजनीतिक भाषा पर विस्तार से बातचीत की. क्या ‘दिमागी नक्सल’ महज एक नया राजनीतिक जुमला है या आने वाले समय में इसका इस्तेमाल असहमति और सवाल पूछने वालों को परिभाषित करने के लिए किया जाएगा? इस पूरी बहस को राकेश कायस्थ अपने व्यंग्यात्मक और विश्लेषणात्मक अंदाज में समझाते हैं.
20 जुलाई 2026 को जंतर मंतर से संसद की तरफ़ बढ़ रहे छात्रों पर लाठी, आँसू गैस और — रिकॉर्ड के मुताबिक़ — पेलेट चले. उसके बाद सरकार पीछे हटती दिखी. शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा हुआ, गिरफ़्तार नाबालिग़ छोड़े गए, राज्यों ने कार्रवाई रोकी. ग़लती सरकार की थी, पर माफ़ मोदी जी ने किया. मोहन भागवत वात्सल्य रस से ओत प्रोत नज़र आये. हालांकि सरकार के मंत्री और आरएसएस के दूसरे पदाधिकारी नौजवान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जहर उगलते रहे. ये बताने से बचने के लिए कि प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन्स, छात्राओं से बदसलूकी, एके -47, बल प्रयोग किसके कहने पर हुए थे, देश के गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद के मानसून सत्र के दौरान सदन मे आने से बचते रहे. फिर सरकार वापस लौट आई. एफ़आईआर बनी रहीं, घरों पर दस्तक हुई, इंस्टाग्राम से पोस्ट ग़ायब होने लगीं, और रामपुर में बुलडोज़र फिर से खड़ा हो गया. 15 अगस्त को लाल किले से 77 मिनट का भाषण हुआ. उसमें युवा शक्ति थी, एआई ट्रेनिंग थी, 2047 था. 20 जुलाई नहीं था. इस एपिसोड में हम पाँच बातें रखते हैं — और आख़िर में उन्हें दोहराते हैं ताकि वे याद रहें.
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


सोनिया गांधी की आगामी आत्मकथा Belonging: A Journey of Love में उनके इटली के बचपन, राजीव गांधी से प्रेम, गांधी परिवार की त्रासदियों और भारतीय राजनीति से जुड़े कई अनछुए पहलुओं के सामने आने की चर्चा है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि सोनिया गांधी ने 2004 में कांग्रेस की जीत के बाद प्रधानमंत्री पद क्यों ठुकराया था? क्या उनकी आत्मकथा इस फैसले के पीछे की असली वजह पर से पर्दा उठाएगी? राजीव गांधी से पहली मुलाकात और प्रेम से लेकर संजय गांधी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को खोने तक की त्रासदियों ने सोनिया गांधी को किस तरह बदला? हरकारा डीप डाइव लाइव में श्रवण गर्ग और निधीश त्यागी इन तमाम सवालों पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं. गेस्ट श्रवण गर्ग बताएंगे कि सोनिया गांधी की आत्मकथा से भारतीय राजनीति में क्या नए सवाल और संभावित भूचाल सामने आ सकते हैं.