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“लॉरेंस ही कर्म है”: मोदी के भारत का गैंगस्टर जो आइकन बन गया
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‘मर्ज़ लाइलाज है, पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है’
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राघव चड्ढा और बड़ी समस्या: नेता-केंद्रित दलों की संरचनात्मक कमजोरी
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ओडिशा में खनन विरोध पर सख्ती: दलित-आदिवासी प्रदर्शनकारियों को ज़मानत के बदले पुलिस थाने साफ करने की शर्त
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द ग्रेट भाजपा वाशिंग मशीन
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पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड मतदान: 92% वोटिंग के पीछे क्या है असली कहानी?
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आप में फूट: राघव चड्ढा ने बगावत की, 6 सांसदों के साथ भाजपा में शामिल, मित्तल को 10 दिन पहले ईडी ने घेरा था
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‘इन तर्कों को ट्रिब्यूनल के समक्ष रखें’: सुप्रीम कोर्ट का उन लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार, जिनके नाम बंगाल ‘एसआईआर’ के बाद हटाए
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भाजपा की योजनाओं पर हिटलर की छाप: बेबी ने ‘एसआईआर’ को हिंदुत्व की बड़ी योजना का हिस्सा बताया
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एनसीएल के खदान विस्तार में शहरी-ग्रामीण इलाक़े प्रभावित, कम मुआवज़े पर लोगों की ज़मीन ली जा रही
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एक अलग आवाज़: बंगाल बोल रहा है, भारत को सुनना चाहिए
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होर्मुज़ में बारूदी सुरंगें बिछाने वालों को देखते ही गोली मारने का ट्रम्प का आदेश
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शमशेरगंज एक सैंपल: मतदान से पहले ही ‘एसआईआर’ ने बदला चुनावी समीकरण, भाजपा को वोटिंग से पूर्व लाभ
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‘तृणमूल के गुंडों’ पर सीआरपीएफ की कार्रवाई? बांग्लादेश का पुराना वीडियो गलत दावे के साथ वायरल
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बंगाल चुनाव: भाजपा ने राहुल गांधी के वीडियो क्लिप का इस्तेमाल कर उन्हें धन्यवाद दिया!
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परिसीमन की राजनीति:उत्तर-दक्षिण असंतुलन और कंपनसेशन पॉलिटिक्स
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लाखों मतदाताओं का छूटना हमारे लोकतंत्र पर कलंक है’: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत
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ऑनलाइन गेमिंग पर सरकार का ‘कंट्रोल मोड’: नए नियम लागू, पैसे वाले गेम्स पर सख्ती
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क्या गरीबी सच में ‘जातिहीन’ है? तेलंगाना सर्वे ने ‘समान हालात’ की सदियों पुरानी दलील तोड़ी
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ममता का गढ़ बनाम भाजपा का बड़ा दांव: क्या ‘एसआईआर’ पलटेगा संतुलन?
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और तो और ये साहब भी यथावत हैं, बल्कि जज साहब का तबादला हो गया!
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भारतीय मेडिकल छात्र ने एआई से बनाई ‘मागा गर्ल’, अमेरिकी मर्दों को ठगकर कमाए हज़ारों डॉलर
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जब मतदाता ही गुम हो जाए: बंगाल चुनाव में लोकतंत्र का अनकहा संकट
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2006 मालेगांव ब्लास्ट केस: बॉम्बे हाई कोर्ट ने चार आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप रद्द किए
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लोकतंत्र की अप्रत्याशित घर वापसी
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मोदी के भाषण और आचार संहिता पर विवाद, 700 नागरिकों की चिट्ठी से बढ़ी बहस, “टॉकिंग न्यूज़” में विस्तृत चर्चा
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“अब नहीं आऊंगा दोस्त…”: सूरत से पलायन की पीड़ा के बीच नोएडा से तमिलनाडु तक मज़दूर असंतोष
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अरुण कुमार: ऐन चुनाव के वक़्त बंगाल में आरएसएस का हरकत में आना
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मोदी बनाम ममता: पूरा दिल्ली दरबार उतर आया है एक राज्य के चुनाव को जीतने?
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आकार पटेल: ईरान को छोड़कर किसी भी अन्य देश की तुलना में भारतीयों ने सबसे अधिक कष्ट झेला है और झेल रहे हैं
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नेपाल में जेन जी का इन्क़लाब: 'ट्रॉमा' से 'उम्मीद' तक का सफ़र
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महंगी होती पढ़ाई: स्कूल फीस, कोचिंग और बढ़ता ख़र्च परिवारों पर भारी
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“लेकिन तुम हमारे बिना क्या हो?” कुछ भी नहीं!
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पहलगाम: एक साल बाद भी, मोदी सरकार ने उन ‘चूक’ पर स्थिति स्पष्ट नहीं की जिनके कारण हमला हुआ
लॉरेंस बिश्नोई पिछले एक दशक से अधिक समय से उच्च सुरक्षा हिरासत में है. इस दौरान उसका नाम भारत में और कनाडा तक कई हाई-प्रोफ़ाइल हत्याओं से जुड़ा रहा है. उसकी ताक़त, जो अब तक कमज़ोर नहीं हुई दिखती, उसे क्या समझाती है? लॉरेंस की ज़िंदगी पर ‘द गार्डियन’ में प्रकाशित अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में अतुल देव ने कहा है कि बिश्नोई आज के उस भारत का प्रतीक बन गया है जहाँ कानून के बजाय ताकत की पूजा हो रही है. वह खुद को 'मुख्यधारा' से बाहर रहकर खुश बताता है, और उसके समर्थक उसे एक ऐसे योद्धा के रूप में देखते हैं, जो वह सब हासिल कर रहा है जो वे केवल सपनों में देख सकते हैं. बिश्नोई केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक बदलती हुई सामाजिक मानसिकता का परिणाम है.
2011 में अन्ना हज़ारे ने जंतर मंतर पर अनशन शुरु किया. देश को लगा भ्रष्टाचार अब जल्द ख़त्म हो जाएगा. हज़ारों की भीड़ जमा हो गई. क्रांति को नाम मिला ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’. नामी गिरामी एक्टिविस्ट, वकील, बाबा, पत्रकार, एक्टर, कॉमेडियन, आर्टिस्ट और न जाने कौन कौन उसमें शामिल हो गए. मेरी एक मुंहबोली बहन भी उनमें थीं. मैं ख़ुद तो वहाँ कभी नहीं गया.
आम आदमी पार्टी से राघव चड्ढा का बाहर निकलना महज एक सामान्य राजनीतिक उथल-पुथल नहीं है; यह उन कई व्यक्तित्व-आधारित पार्टियों की एक साझा संरचनात्मक कमजोरी को उजागर करता है—जो तेजी से, करिश्मा-प्रेरित लामबंदी को टिकाऊ संगठन में बदलने की कठिनाई से जुड़ी है. अरविंद केजरीवाल के इर्द-गिर्द बनी 'आप', एक शक्तिशाली भ्रष्टाचार विरोधी विमर्श और कड़ाई से केंद्रीकृत नेतृत्व के दम पर उभरी. यह मॉडल उत्थान के चरण में गति और स्पष्टता तो देता है, लेकिन एक बार जब पार्टी 'आंदोलन' से 'शासन' में परिवर्तित होती है, तो गहरी संस्थागत व्यवस्थाओं की कमी दिखाई देने लगती है. ऐसे सिस्टम में विशिष्ट नेताओं का बाहर निकलना, गुटीय तनाव और आंतरिक अनिश्चितता कोई विसंगतियां नहीं हैं; वे अनुमानित परिणाम हैं.
ओडिशा के रायगढ़ा जिले के तिजिमाली इलाके में आदिवासी अपनी ज़मीन खनन के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन पर लगातार जब्र बढ़ता जा रहा है. जनवरी 2025 में कुमेश्वर नायक नाम के 26 वर्षीय दलित युवक को भी गिरफ्तार किया गया है. वह कांतामाल गांव का रहने वाला है और एक छोटी किराना दुकान चलाता है. कुमेश्वर को ओडिशा हाईकोर्ट से ज़मानत मिली, लेकिन इसके साथ एक विवादित शर्त भी रखी गई कि उन्हें हर दिन सुबह 6 बजे से 9 बजे तक काशीपुर पुलिस स्टेशन की सफाई करनी होगी. उन्हें करीब दो महीने तक झाड़ू, फिनाइल और सफाई के सामान से पुलिस स्टेशन साफ करना पड़ा. ऐसे कुल 8 ज़मानत आदेश मिले हैं, इन 8 लोगों में 6 दलित और 2 आदिवासी हैं. इनमें से कम से कम 5 मामलों में यह शर्त लागू भी की गई है.
हाल ही में आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा समेत कई नेताओं के भाजपा में शामिल होने की चर्चाओं ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है. सवाल वही पुराना है क्या भाजपा सचमुच एक ऐसी ‘वाशिंग मशीन’ बन चुकी है, जहां राजनीतिक दाग सत्ता की चमक में धुल जाते हैं? या यह सिर्फ विपक्ष का गढ़ा हुआ एक प्रभावशाली नैरेटिव है? इस ‘हरकारा एक्सप्लेनर’ में हम उन नेताओं, मामलों और राजनीतिक पैटर्न को समझेंगे, जिनकी वजह से यह जुमला भारतीय लोकतंत्र की सबसे चर्चित राजनीतिक उपमाओं में बदल गया.
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में पत्रकार राजेश चतुर्वेदी से पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड तोड़ मतदान पर बातचीत की गई. पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के पहले चरण में करीब 91.7% से 92.6% तक मतदान दर्ज किया गया है, जो पिछले चुनाव (2021) के लगभग 82% मतदान से काफी ज्यादा है. इस बढ़ोतरी को लेकर चर्चा तेज है, लेकिन इसके पीछे कई अहम कारण भी सामने आ रहे हैं. चर्चा में यह बात सामने आई कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं. केवल पहले चरण की 152 सीटों पर ही करीब 50 से 52 लाख नाम हटाए गए, जबकि पूरे राज्य में यह संख्या लगभग 11-12% मतदाताओं तक पहुंचती है. ऐसे में कुल मतदाताओं की संख्या कम होने से मतदान प्रतिशत अपने आप बढ़ा हुआ दिखाई देता है.
आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक के साथ भाजपा में शामिल हो गए हैं. अपने सहयोगियों संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए चड्ढा ने कहा, “हमने यह निर्णय लिया है कि राज्यसभा में 'आप' से संबंधित दो-तिहाई सदस्य होने के नाते, हम भारत के संविधान के प्रावधानों का उपयोग करते हुए भाजपा में अपना विलय करते हैं.”
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल के कई व्यक्तियों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिनमें मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) के बाद उनके नाम हटाए जाने को चुनौती दी गई थी. इन याचिकाकर्ताओं में चुनाव ड्यूटी पर तैनात 65 लोग भी शामिल हैं. अदालत ने उन्हें संबंधित अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष राहत पाने का निर्देश दिया.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में अर्थशास्त्री रथिन रॉय से ख़ास बातचीत हुई. इस चर्चा का केंद्र है भारत का एक बेहद संवेदनशील और जटिल मुद्दा: परिसीम, उत्तर बनाम दक्षिण का संतुलन, और बदलती राजनीति का चरित्र. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से होती है कि आखिर भारत में “वन पर्सन, वन वोट” का सिद्धांत व्यवहार में क्यों लागू नहीं है. 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का जो फिक्सेशन हुआ, उसने आज एक ऐसी स्थिति बना दी है जहां जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच असंतुलन स्पष्ट दिखता है.
बातचीत आगे बढ़ती है तो राजनीति के बदलते स्वरूप पर तीखी टिप्पणी सामने आती है. डॉ. रॉय इसे “कंपनसेशन पॉलिटिक्स ” कहते हैं, जहां सरकारें विकास के कठिन रास्ते पर चलने के बजाय मुफ्त योजनाओं, नकद हस्तांतरण और लाभार्थी राजनीति के जरिए वोट हासिल करने की कोशिश करती हैं. उनका तर्क है कि असली विकास वह है जिसमें लोगों को रोजगार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसर मिलें न कि केवल असफलताओं की भरपाई के रूप में सहायता.
आज टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर गंभीर मुद्दों पर चर्चा की गई. शो में वरिष्ठ पत्रकार राजेश चतुर्वेदी भी शामिल हुए. बातचीत में सामने आया कि इस बार चुनाव में सबसे बड़ा सवाल खुद मतदाता को लेकर खड़ा हो गया है. बताया गया कि करीब 90–91 लाख यानी लगभग हर दसवां मतदाता वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग मतदान से बाहर हो सकते हैं.
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.


टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के इस लाइव शो में हम चर्चा करेंगे पश्चिम बंगाल चुनाव में दर्ज हुए 92% मतदान पर, आख़िर यह आंकड़ा क्या संकेत देता है? क्या यह बढ़ती राजनीतिक भागीदारी और जागरूकता का प्रमाण है, या इसके पीछे कोई और सामाजिक और राजनीतिक परतें छिपी हैं? इस बातचीत में हम समझने की कोशिश करेंगे कि इतने उच्च मतदान का लोकतंत्र, चुनावी रणनीतियों और ज़मीनी राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ता है. क्या यह ट्रेंड भविष्य की राजनीति की दिशा तय कर सकता है?