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‘छर्रे’, ‘बिजली के झटके’, ‘कील लगे डंडे’: कॉकरोच पार्टी के संसद मार्च में घायलों की आपबीती
20 जुई को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा आयोजित 'संसद चलो' मार्च के तहत मध्य दिल्ली में हज़ारों की संख्या में प्रदर्शनकारी और छात्र एकत्र हुए थे. इस देशव्यापी आंदोलन की मुख्य मांगें थीं: नीट-यूजी 2026 पेपर लीक के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, देश की शिक्षा प्रणाली में व्यापक और ठोस सुधार व हाल ही में हुई छात्र आत्महत्याओं के मामलों में पीड़ितों के लिए न्याय.
याद हो कि उस दिन मूसलाधार बारिश के बावजूद जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में छात्रों, युवाओं, कामकाजी पेशेवरों और परिवारों का हुजूम उमड़ पड़ा था. जहाँ पुलिस का आधिकारिक रुख यह रहा है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए केवल मानक और गैर-घातक (नॉन-लीथल) साधनों का इस्तेमाल किया गया
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राकेश कायस्थ | ये डिक्टेटरशिप का आखिरी दौर है
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के आंगन में फली-फूली फासिस्ट सत्ता अब बिल्कुल नंगी होकर खड़ी है. इस सत्ता का स्वरूप ऐसा है, जैसा किसी तानाशाही हुकूमत के आखिरी दौर में होता है. बात थोड़ी लंबी है, इसलिए शब्द और वक्त बर्बाद किए बिना सिलसिलेवार तरीके से बताता हूं कि ये यात्रा किस तरह शुरू हुई, यहां तक कैसे पहुंची और आगे कहां तक जा सकती है. क्रोनोलॉजी को समझना हम सबके लिए जरूरी है.
यूपीए-1 के दौर में यानी 2004-09 तक देश की आर्थिक विकास दर औसतन 8.9 फीसदी थी. ऐसा 2008 में आए ग्लोबल मेल्टडाउन के बावजूद था. भारतीय जीडीपी के आंकड़े आज की तरह संदेहास्पद नहीं थे और दुनिया उन पर यकीन कर रही थी. मीडिया से राजनीतिक खबरें बिल्कुल गायब थीं और न्यूज़ चैनल सांप-बिच्छू, मंदिर का रहस्य और कौन जीतेगा इंडियन आइडल जैसी हेडलाइन बना रहे थे. या दूसरे शब्दों में कहें तो जाने-अनजाने में जनता की राजनीतिक स्मृतियां मिटा रहे थे.
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जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शनों में पारंपरिक मीडिया क्यों निशाने पर है?
‘साउथ फर्स्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2026 में दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर, जो लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है, एक नए तरह के टकराव का गवाह बना. यहाँ नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के मूल्यांकन में कथित अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की माँग को लेकर युवाओं का आंदोलन जारी है. लेकिन इन मुद्दों के साथ एक और सवाल प्रमुखता से उभरा है कि मुख्यधारा का मीडिया प्रदर्शनकारियों के निशाने पर क्यों है?
कॉकरोच जनता पार्टी और उससे जुड़े छात्र समूहों ने कई मौकों पर पत्रकारों का विरोध किया. कुछ संवाददाताओं को हूटिंग का सामना करना पड़ा तो कुछ कैमरा टीमों को प्रदर्शन स्थल छोड़ना पड़ा. प्रदर्शनकारियों ने उन्हें "गोदी मीडिया" कहकर संबोधित किया. यह केवल नाराजगी का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मीडिया के प्रति गहराते अविश्वास का संकेत है.
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जहानाबाद में पेपर लीक विरोधी प्रदर्शनकारियों पर बिहार पुलिस की फायरिंग
बिहार के जहानाबाद में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर गुरुवार को पुलिस ने फायरिंग की. प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़कने के बाद पुलिस ने हवाई फायरिंग की और कार्रवाई की.
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन द्वारा सामाजिक माध्यमों पर साझा किए गए एक वीडियो में पुलिसकर्मी हवाई फायरिंग करते और प्रदर्शनकारियों पर पत्थर फेंकते हुए दिखाई दे रहे हैं. वीडियो में कई गोलियों की आवाज भी सुनाई दे रही है.
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अरावली समिति द्वारा ऑनलाइन सुझाव मांगे जाने का ग्रामीण हितधारक कैसे पालन करेंगे?
अक्सर सिस्टम अपने तरीके से काम करता है, चाहे फिर मसला कोई हो. अरावली से जुड़े मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति (हाई पावर कमेटी) के एक हालिया कदम पर कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविदों और आदिवासी समूहों ने चिंता जताई है. कारण यह है कि उच्चस्तरीय समिति ने इन मुद्दों पर विशिष्ट हितधारकों के साथ-साथ आम जनता से भी सुझाव आमंत्रित किए हैं, लेकिन शर्त यह रखी है कि इन्हें ईमेल या गूगल फॉर्म के माध्यम से भेजा जाए.
इसमें समस्या यह है कि अरावली पर्वत शृंखला से जुड़े फैसलों से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले ग्रामीण समुदायों द्वारा ऑनलाइन माध्यम से प्रभावी ढंग से अपनी बात या अभ्यावेदन रख पाने की संभावना बहुत कम है.
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अजित साही | यह नाराज़गी पिछले दस दिनों में पैदा नहीं हुई है. यह वर्षों से लोगों के भीतर जमा असंतोष का विस्फोट है.
जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन को लेकर देशभर में बहस जारी है. क्या यह केवल परीक्षा प्रणाली और पेपर लीक के खिलाफ गुस्सा है या भारतीय राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत? ‘हरकारा डीप डाइव’ में वरिष्ठ पत्रकार अजित साही ने दावा किया कि नरेंद्र मोदी की राजनीति अपने "पॉइंट ऑफ नो रिटर्न" पर पहुंच चुकी है और इतिहास में तानाशाही व्यवस्थाओं के पतन के जो पैटर्न दिखाई देते हैं, भारत में भी वैसी ही परिस्थितियां बनती दिख रही हैं.
अजित साही का कहना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक परिवर्तन से पहले जनता के भीतर लंबे समय से जमा असंतोष अचानक दिखाई देने लगता है. उनके मुताबिक, जंतर-मंतर का आंदोलन अचानक पैदा नहीं हुआ है, बल्कि यह वर्षों से जमा हो रहे असंतोष का विस्फोट है. उन्होंने मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और अन्य वैश्विक उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि राजनीतिक सत्ता का पतन अक्सर बेहद तेज़ी से होता है.
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राकेश कायस्थ | अमृतकाल के अ-राजनीतिक चोट्टे
अ-राजनीतिक कुछ भी नहीं होता है. दुनिया की हर चीज़ राजनीतिक होती है. देश को ज्यादा बड़ा खतरा स्वयंभू अ-राजनीतिक या अर्ध-शिक्षित राजनीतिक लोगों से हैं. वैज्ञानिक, शिक्षाविद, स्थानीय अधिकारों के योद्धा सोनम वांगचुक पर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसी धारा लगाकर उन्हें जेल में डाला.
अचानक सारे चार्ज वापस ले लिये गये और सोनम जेल से रिहा हो गये. क्या इस देश का कानून सिर्फ सत्ता के हाथों का खिलौना है कि जिस पर चाहे देशद्रोह की धारा लगा दें और जब चाहे हटा लें?
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फिर वही सजा : आतंकवादियों द्वारा पुलिसकर्मी की हत्या के बाद कश्मीर में दो संदिग्धों के मकान गिराए
अनंतनाग में अमरनाथ यात्रा की ड्यूटी पर तैनात एक पुलिसकर्मी की आतंकवादियों द्वारा गोली मारकर हत्या किए जाने के कुछ ही घंटों बाद, कश्मीर में सुरक्षाकर्मियों ने रातभर में संदिग्ध आतंकी बताए जा रहे दो लोगों के घरों को विस्फोट से उड़ा दिया.
सुरक्षाबलों का आरोप है कि आदिल ठोकर और हारून रशीद गनाई लश्कर-ए-तय्यबा के आतंकवादी थे; वहीं जुनैद डार से बात करने वाले पड़ोसियों ने बताया कि दोनों पिछले कई सालों से लापता हैं. केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन ने पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद भी ऐसी ही सामूहिक सजा दी थी,
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जंतर-मंतर पर विरोध का प्रतीक बना एक स्टेंसिल: सार्वजनिक स्थान होता है स्ट्रीट आर्टिस्ट ‘टाइलर’ का कैनवास
यदि आप भारत में दुनिया से बिल्कुल बेखबर होकर नहीं जी रहे हैं, तो इसकी पूरी संभावना है कि आपने नीट परीक्षा के पेपर लीक के खिलाफ अपना विरोध जताने वाले जेन-ज़ी (युवा पीढ़ी) के प्रदर्शनकारियों द्वारा बनाए गए मीम्स, पोस्टरों और कलाकृतियों की बाढ़ देखी होगी. भले ही इसका नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा किया जा रहा हो, लेकिन देश भर के प्रदर्शनकारी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपना असंतोष व्यक्त करने के लिए कला को एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.
बैरी रॉजर्स और संजना गणेश के अनुसार, इनमें सबसे लोकप्रिय स्टेंसिल (चित्र) वह है जिसमें पीएम मोदी के दोनों ओर उद्योगपति गौतम अडानी और मुकेश अंबानी खड़े हैं, और वे दोनों पीएम को चूमते हुए दिखाई दे रहे हैं. इस पोस्टर के पीछे 'टाइलर स्ट्रीट आर्ट' हैं, जिन्हें अक्सर 'मुंबई का बैंक्सी' कहा जाता है. वह भित्तिचित्रों (ग्रेफिटी) को माध्यम बनाकर ऐसी कला रचते हैं जो आज आम जनता के लिए मायने रखती है.
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डॉक्टरों ने कहा है, पेलेट गन का शिकार हुए पीड़ित की आँख की रोशनी वापस आने की केवल 1% संभावना है
‘द हिंदू’ में आशना बुटानी की रिपोर्ट के अनुसार, 19 वर्षीय साहिल लोचब के परिवार का कहना है कि डॉक्टरों ने उन्हें सूचित किया है कि उसकी दाहिनी आँख की रोशनी वापस आने की संभावना केवल 1% है. साहिल की आँख सोमवार (20 जुलाई 2026) को संसद की ओर निकाले जा रहे मार्च पर सुरक्षा बलों द्वारा की गई कार्रवाई के दौरान कथित तौर पर पेलेट गन की फायरिंग से घायल हो गई थी. दरअसल आँख की पुतली को खासा नुकसान हुआ है. 21 जुलाई को एम्स के जयप्रकाश नारायण अपेक्स ट्रॉमा सेंटर में उसके शरीर से छर्रों को निकालने के लिए सर्जरी की गई थी.
‘ऑल्ट न्यूज़’ से बात करते हुए साहिल की माँ ज्योति ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने साहिल को एम्स दिल्ली में भर्ती कराया, तो वहाँ के डॉक्टरों ने "लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (एलएचएमसी) से रेफर किए जाने का कारण स्वीकार नहीं किया और मुझसे ऐसे कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए जिनमें एलएचएमसी से रेफर किए जाने का कारण ही दर्ज नहीं था." ‘ऑल्ट न्यूज़’ ने सोमवार को हुई पेलेट गन फायरिंग के फुटेज की जियोलोकेशन (स्थान) की भी पुष्टि की है.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
महेश्वर पेरी का 'X' पर विश्लेषण. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देर रात आए वीडियो संदेश, fast-track कोर्ट कानून और 10 करोड़ के जुर्माने पर जंतर-मंतर के छात्रों और शिक्षा विशेषज्ञों ने उठाए सवाल.
संतोष सिंह की रिपोर्ट. नीट-यूजी 2024 पेपर लीक मामले में सीबीआई जांच के दौरान मुख्य संदिग्ध संजीव मुखिया के खिलाफ सबूत न मिलने पर चार्जशीट दायर नहीं की गई; पूरे मामले का विवरण.
इशिता मिश्रा की रिपोर्ट. Fast-Track Courts की घोषणा के अगले ही दिन कानून मंत्रालय के आंकड़े आए सामने; देश की विशेष अदालतों में 2.45 लाख से अधिक मामले लंबित.
‘द टेलीग्राफ’ में देबायन दत्ता की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट. 20 जुलाई के संसद चलो मार्च में पेलेट गन, कील लगे डंडे और टीजर गन के इस्तेमाल के गंभीर आरोप; राहुल गांधी ने पीड़ित साहिल लोचब को मीडिया के सामने लाते हुए सरकार पर बोला हमला.
‘स्क्रोल’ और ‘एबीपी न्यूज़’ की रिपोर्ट. बिहार के जहानाबाद में छात्र प्रदर्शन के दौरान हिंसक झड़प; पुलिस ने की फायरिंग, 100 से अधिक लोग गिरफ्तार और जिलाधिकारी आवास पर पथराव.
कश्मीर के अनंतनाग में पुलिसकर्मी आशिक हुसैन की हत्या के बाद सुरक्षा बलों की बड़ी कार्रवाई; संदिग्ध आतंकियों के दो घर धमाके से उड़ाए गए, 2000 ओवरग्राउंड वर्कर्स हिरासत में.
‘द वायर’ की रिपोर्ट. सर्वोच्च न्यायालय की हाई पावर कमेटी ने अरावली मुद्दों पर केवल ऑनलाइन माध्यम (ईमेल और गूगल फॉर्म) से मांगे सुझाव; ग्रामीण समुदायों, पर्यावरणविदों और आदिवासियों ने जताई भारी चिंता.
लेखक राकेश कायस्थ का तीखा राजनीतिक विश्लेषण. सोनम वांगचुक के अनशन, शिक्षा व्यवस्था के निजीकरण, डिजिटल युग में विपक्ष की भूमिका और जंतर-मंतर छात्र आंदोलन पर विस्तार से चर्चा.
वीडियो
राम मंदिर ट्रस्ट में सामने आए कथित चढ़ावा अनियमितता के आरोपों ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह सिर्फ वित्तीय गड़बड़ी का मामला है, या इससे राम मंदिर आंदोलन, न्यायिक प्रक्रिया, राजनीतिक परियोजना और संस्थागत जवाबदेही पर भी बहस जुड़ती है? हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद से इन्हीं सवालों पर विस्तार से बातचीत की. चर्चा में राम जन्मभूमि आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले, राम मंदिर ट्रस्ट की जवाबदेही, जांच एजेंसियों पर भरोसा, आरएसएस की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर प्रो. अपूर्वानंद ने अपने विचार रखे. यह बातचीत समकालीन राजनीति, इतिहास और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाती है. अगर वीडियो पसंद आए तो लाइक करें, शेयर करें और हरकारा को सब्सक्राइब करना न भूलें. हरकारा. शोर कम, रोशनी ज़्यादा. #RamMandir #Ayodhya #Harkara #DeepDive #Apoorvanand #NidheeshTyagi #Politics #SupremeCourt #RSS #BJP #IndianPolitics #HindiNews #CurrentAffairs
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार मिल रहे विदेशी सम्मान क्या भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रतीक हैं, या इनके पीछे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की कोई अलग कहानी छिपी है? हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और निधीश त्यागी चर्चा करते हैं कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं, विदेशी पुरस्कारों, इंडियन डायस्पोरा की राजनीति और भारत के भीतर मौजूद चुनौतियों को किस नज़र से देखा जाना चाहिए. इस बातचीत में चर्चा के प्रमुख मुद्दे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिल रहे विदेशी सम्मान. विदेशी पुरस्कारों पर उठे सवाल और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट. इंडियन डायस्पोरा की भूमिका और विदेश यात्राओं की राजनीति. भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और घरेलू चुनौतियां. विदेश नीति, कूटनीति और रणनीतिक हित. क्या विदेशी सम्मान घरेलू राजनीति को प्रभावित करते हैं? अगर आपको यह विश्लेषण महत्वपूर्ण लगा हो तो वीडियो को लाइक करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें. हरकारा. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
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20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर पर क्या हुआ था? पुलिस कार्रवाई के दौरान आखिर ऐसा क्या हुआ कि वरिष्ठ पत्रकार और कवि चंद्रभूषण को भी हिरासत में लिया गया? हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण ने जंतर-मंतर की अपनी आंखों देखी साझा की. उन्होंने बताया कि किस तरह हजारों छात्रों और युवाओं की भीड़, पुलिस की बैरिकेडिंग, लाठीचार्ज, हिरासत और आंदोलन के बदलते स्वरूप ने भारतीय लोकतंत्र के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं. क्या यह केवल एक छात्र आंदोलन है या भारतीय राजनीति में एक नए सामाजिक उभार की शुरुआत? क्या सरकार इस नए तरह के स्वतःस्फूर्त जन आंदोलन को समझ पाने में असफल रही है? और आखिर क्यों चंद्रभूषण कहते हैं कि “सर कुछ बदले चाहे न बदले, हम तो बदल गए.” इस बातचीत में जानिए. जंतर-मंतर की पूरी आंखों देखी. पुलिस कार्रवाई और हिरासत का अनुभव. आंदोलन में शामिल युवाओं की मनःस्थिति. सोनम वांगचुक और आंदोलन की रणनीति पर चर्चा. * सरकार के डर और लोकतंत्र के भविष्य पर चंद्रभूषण का विश्लेषण. #HarkaraDeepDive #JantarMantar #Chandrabhushan #NidheeshTyagi #SonamWangchuk #StudentProtest #DelhiPolice #Democracy #Harkara