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श्रवण गर्ग के साथ: संघ के 100 साल और सबसे बड़ा संकट
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने 100वें वर्ष में है, लेकिन शताब्दी का जश्न कहीं दिखाई नहीं दे रहा. वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के मुताबिक इसकी वजह यह है कि संघ अपने इतिहास में पहली बार एक साथ इतने सारे संकटों से घिरा हुआ है. हरकारा डीपडाइव पर निधीश त्यागी के साथ बातचीत में उन्होंने इन संकटों की परतें खोलीं.
पहला सवाल पारदर्शिता का है. देश का आम नागरिक अपनी नागरिकता साबित करने के लिए पासपोर्ट, आधार और वोटर आईडी समेत दर्जन भर कागज़ दिखाने को मजबूर है, और एक भी कागज़ कम पड़ने पर उसके अधिकार छिन सकते हैं. लेकिन 100 साल पुराने संघ से न कभी रजिस्ट्रेशन पूछा गया, न चंदे का हिसाब, न बैलेंस शीट. कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खड़गे ने जब ये सवाल उठाए, तो जवाब देने के बजाय उनके दलित होने तक पर सवाल खड़े किए गए. गर्ग ने यह भी रेखांकित किया कि कर्नाटक में सिद्धारमैया की सरकार ने ढाई साल निकाल दिए और यह सवाल तब उठा जब डी.के. शिवकुमार आए.
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पराकाला प्रभाकर : एसआईआर से बनेगा 'कुछ लोगों का, कुछ लोगों के लिए' लोकतंत्र
एसआईआर को प्रस्तावित परिसीमन से जोड़ते हुए प्रभाकर ने आरोप लगाया कि अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर धकेले जाने का ख़तरा है. उन्होंने कहा, "नतीजा होगा — कुछ लोगों का, कुछ लोगों के लिए लोकतंत्र." सूचना के अधिकार के तहत मिले जवाबों का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि एसआईआर की योजना और अमल अपारदर्शी ढंग से हुआ है और इस पूरी कवायद को जायज़ ठहराने लायक़ पर्याप्त सामग्री सार्वजनिक दायरे में नहीं रखी गई.
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एनआर मोहंती : आरएसएस भी विदेशी पैसा लेता है; सरकार इस पर सवाल क्यों नहीं उठाती?
1948 और आज के राजनीतिक परिदृश्य में एक बहुत बड़ा व्यावहारिक अंतर आ चुका है. 1948 में संघ के पास कोई मजबूत राजनीतिक रसूख या सत्ता नहीं थी. जब सरदार पटेल ने इस पर प्रतिबंध लगाया, तो देश की जनता और अधिकांश राजनीतिक दलों ने इस फैसले का पुरजोर स्वागत किया था; किसी ने इसका विरोध नहीं किया. आज परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है. आरएसएस अब देश की सत्ता को नियंत्रित करने वाला मुख्य केंद्र बन चुका है. वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (जो कभी संघ के कार्यकर्ता या कारिंदे थे) से लेकर सत्ताधारी व्यवस्था के सभी शीर्ष नेता और मंत्री खुलेआम संघ परिवार के प्रति अपनी अटूट निष्ठा व्यक्त करते हैं.
इस भारी राजनीतिक रसूख के कारण, वर्तमान समय में आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना एक व्यावहारिक विचार नहीं है. इसके बजाय, कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे की तरह इस अपारदर्शी और रहस्यमयी संगठन की वास्तविक गतिविधियों, इसके धुंधले अतीत और वर्तमान वित्तीय गड़बड़ियों पर खुली चर्चा शुरू करना और इसे जनता के सामने उजागर करना अधिक आवश्यक है.
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रूस -यूक्रेन युद्ध में हताहतों की संख्या 20 लाख के पार
सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक ऐंड इंटरनेशनल स्टडीज़ (सीएसआईएस) के इस शोध के अनुसार रूस को 14 लाख हताहतों का नुक़सान हुआ है — जिनमें मारे गए, घायल और लापता सैनिक शामिल हैं. यह चौंकाने वाली संख्या रूस की आबादी के क़रीब एक फ़ीसदी के बराबर है. नुक़सान पूरे रूस में बराबर नहीं बंटा है — ग़रीब इलाक़ों और जातीय अल्पसंख्यकों में हताहतों की दर कहीं ज़्यादा है. रूसी विपक्षी मीडिया में दूरदराज़ के छोटे गांवों की पूरी पुरुष आबादी के लगभग मिट जाने की कहानियां आम होती जा रही हैं. अध्ययन के मुताबिक़ रूस फ़िलहाल जिस रफ़्तार से सैनिक खो रहा है, उस रफ़्तार से नई भर्ती नहीं कर पा रहा. उधर यूक्रेन के हताहतों की संख्या 5.25 लाख से 6.25 लाख के बीच आंकी गई है, जिनमें 1.25 से 1.5 लाख मौतें शामिल हैं. न रूस और न यूक्रेन आधिकारिक आंकड़े जारी करते हैं, लेकिन सीएसआईएस के ये ताज़ा आंकड़े पश्चिमी अनुमानों से मोटे तौर पर मेल खाते हैं.
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सुशांत सिंह : कितना महंगा पड़ेगा तेल अवीव की तरफ मोदी सरकार का झुकाव, ईरान अमेरिका जंग की छाया में ?
अमेरिका-ईरान युद्ध की समाप्ति के बाद ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की पहली विदेश यात्रा 23 जून को इस्लामाबाद की थी — पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर को एमओयू पर दस्तख़त कराने में मध्यस्थता के लिए शुक्रिया कहने. अमेरिका ने भी शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को सराहा — उपराष्ट्रपति जे.डी. वैंस ने स्विट्ज़रलैंड में ऐलान किया, "मुझे पाकिस्तान से मोहब्बत है." कैरवैन पत्रिका में प्रकाशित रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सिंह के इस तीखे विश्लेषण का तर्क है कि इसी परिदृश्य में भारत की पश्चिम एशिया नीति की नाकामी पूरी तरह उघड़ गई है.
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राम मंदिर ट्रस्ट का चढ़ावा विवाद: आस्था की चोट, सत्ता का सवाल
चर्चा का केंद्रीय सवाल यह था कि क्या इस विवाद का असर 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात और मणिपुर के विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा. श्रवण गर्ग के अनुसार, जनमानस पर असर तो पहले ही हो चुका है, लेकिन इसे राजनीतिक हार-जीत में बदलना विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा और राष्ट्रीय लोक दल सहित तमाम दलों के बीच एकजुटता का अभाव इस मुद्दे को कमजोर कर सकता है.
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सिर्फ चंपत नहीं हैं मंदिर के ट्रस्ट में, और कौन लोग हैं ?
‘द वायर’ के मुताबिक, 14 सदस्यों में से नौ के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ करीबी संबंध हैं और वे राम मंदिर आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं. ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, जो वर्तमान में विवादों/आरोपों के घेरे में हैं, लेकिन अभी तक उन पर कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है और न ही उनका इस्तीफा स्वीकार किया गया है, उन्हें पीएम मोदी का विशेष रूप से करीबी माना जाता है. वह आरएसएस के विंग 'विश्व हिंदू परिषद' (वीएचपी) से हैं और कभी गुजरात के दिनों से मोदी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे प्रवीण तोगड़िया के करीबी थे. तोगड़िया ने चंपत राय के साथ अपने "30 साल पुराने जुड़ाव" की गवाही दी थी, जब पांच महीने पहले तोगड़िया पहली बार राम मंदिर देखने गए थे. चंपत राय ने उन्हें खुद मंदिर का दौरा कराया था.
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अडानी मामले में अमेरिकी अदालत ने सरकार से मांगा जवाब, धोखाधड़ी के आरोप हटाने का आधार बताने को कहा
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‘खीरे की खेती’ के लिए भाजपा के मंत्री ने अपने ही मंत्रालय से ली 99 लाख रुपये की सब्सिडी
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श्रवण गर्ग | जब पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी और पैन भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हैं, लोग अपनी नागरिकता कैसे साबित करेंगे?
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डॉ. सुरेश खैरनार | तब घोषित आपातकाल, अब अघोषित आपातकाल
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अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट के विवादों के केंद्र में आरएसएस का शख्स
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काली के लिए मटन, दुर्गा के लिए मछली, लेकिन नए बंगाल में बच्चों के लिए अंडा नहीं
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वाराणसी पुलिस ने गंगा में नाव पर चिकन पकाने और बीयर पीने के आरोप में पांच को गिरफ्तार किया, सभी हिंदू
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शशि थरूर | टीएमसी से शिवसेना तक, जनता के जनादेश की सत्ता के लिए सौदेबाज़ी हो रही है.
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प्रियांक खड़गे ने आरएसएस को ला खड़ा किया ‘कागज नहीं दिखाएंगे’ वाले मोड़ पर, और यह शुरुआत भर है
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3,500 करोड़ रुपये नकद दान, लेकिन नहीं बनी एसओपी, 2020 के ऑडिट ने पहले ही जता दी थी राम मंदिर दान विवाद की आशंका
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कैसे ‘हिंदुत्व पॉप’ न्यू इंडिया का साउंडट्रैक बना और बिग टेक ने नफरत को मुख्यधारा तक पहुंचाया
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केंद्र के साथ ‘विश्वसनीय संवाद’ की मांग को लेकर लद्दाख में पूर्ण बंद
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‘नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है; लोग विरोध करें, तो केस थोप दिए जाते हैं’, बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति जामदार ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, "यह क्या है? सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है... वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, वे आंदोलन नहीं कर सकते- यह सब क्या है? अब इतने सारे पेपर लीक हुए हैं. अगर लोग विरोध करेंगे, तो आप केस थोप देंगे... यह क्या है? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है... याचिकाकर्ता ने सिर्फ 'भाजपा सरकार मुर्दाबाद', 'अमित शाह मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए हैं... नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे नारों के लिए तड़ीपार के आदेश क्यों?"
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
एसआईआर को प्रस्तावित परिसीमन से जोड़ते हुए प्रभाकर ने आरोप लगाया कि अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर धकेले जाने का ख़तरा है. उन्होंने कहा, "नतीजा होगा — कुछ लोगों का, कुछ लोगों के लिए लोकतंत्र." सूचना के अधिकार के तहत मिले जवाबों का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि एसआईआर की योजना और अमल अपारदर्शी ढंग से हुआ है और इस पूरी कवायद को जायज़ ठहराने लायक़ पर्याप्त सामग्री सार्वजनिक दायरे में नहीं रखी गई.
न्यायमूर्ति जामदार ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, "यह क्या है? सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है... वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, वे आंदोलन नहीं कर सकते- यह सब क्या है? अब इतने सारे पेपर लीक हुए हैं. अगर लोग विरोध करेंगे, तो आप केस थोप देंगे... यह क्या है? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है... याचिकाकर्ता ने सिर्फ 'भाजपा सरकार मुर्दाबाद', 'अमित शाह मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए हैं... नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे नारों के लिए तड़ीपार के आदेश क्यों?"
‘पीटीआई और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार यह आदेश नीरज शर्मा द्वारा दायर एक आरटीआई आवेदन से संबंधित है, जिन्होंने इस योजना और उससे जुड़े सरकारी आदेशों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं. गृह मंत्रालय से संतोषजनक जवाब न मिलने के बाद उन्होंने आयोग का दरवाजा खटखटाया था. सुनवाई के दौरान, मंत्रालय ने दलील दी कि यह जानकारी "गोपनीय और संवेदनशील प्रकृति की" है और इसे उजागर करने से "संबंधित व्यक्तियों के जीवन को खतरा हो सकता है." इसके तहत आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(g) का हवाला देते हुए इस अनुरोध को खारिज कर दिया गया.
जहाँ जून के मामले में पुलिस ने एफआईआर की गंभीर धाराओं को चालान में शामिल न करके आरोपियों के लिए उसी दिन ज़मानत का रास्ता आसान कर दिया, वहीं मार्च के मामले में मुस्लिम समुदाय के युवकों पर लगातार नई और संगीन धाराएं जोड़कर उनकी कानूनी मुश्किलें बढ़ा दी गईं, जिसके कारण उन्हें महीनों जेल में काटने पड़े.
1948 और आज के राजनीतिक परिदृश्य में एक बहुत बड़ा व्यावहारिक अंतर आ चुका है. 1948 में संघ के पास कोई मजबूत राजनीतिक रसूख या सत्ता नहीं थी. जब सरदार पटेल ने इस पर प्रतिबंध लगाया, तो देश की जनता और अधिकांश राजनीतिक दलों ने इस फैसले का पुरजोर स्वागत किया था; किसी ने इसका विरोध नहीं किया. आज परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है. आरएसएस अब देश की सत्ता को नियंत्रित करने वाला मुख्य केंद्र बन चुका है. वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (जो कभी संघ के कार्यकर्ता या कारिंदे थे) से लेकर सत्ताधारी व्यवस्था के सभी शीर्ष नेता और मंत्री खुलेआम संघ परिवार के प्रति अपनी अटूट निष्ठा व्यक्त करते हैं.
इस भारी राजनीतिक रसूख के कारण, वर्तमान समय में आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना एक व्यावहारिक विचार नहीं है. इसके बजाय, कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे की तरह इस अपारदर्शी और रहस्यमयी संगठन की वास्तविक गतिविधियों, इसके धुंधले अतीत और वर्तमान वित्तीय गड़बड़ियों पर खुली चर्चा शुरू करना और इसे जनता के सामने उजागर करना अधिक आवश्यक है.
सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक ऐंड इंटरनेशनल स्टडीज़ (सीएसआईएस) के इस शोध के अनुसार रूस को 14 लाख हताहतों का नुक़सान हुआ है — जिनमें मारे गए, घायल और लापता सैनिक शामिल हैं. यह चौंकाने वाली संख्या रूस की आबादी के क़रीब एक फ़ीसदी के बराबर है. नुक़सान पूरे रूस में बराबर नहीं बंटा है — ग़रीब इलाक़ों और जातीय अल्पसंख्यकों में हताहतों की दर कहीं ज़्यादा है. रूसी विपक्षी मीडिया में दूरदराज़ के छोटे गांवों की पूरी पुरुष आबादी के लगभग मिट जाने की कहानियां आम होती जा रही हैं. अध्ययन के मुताबिक़ रूस फ़िलहाल जिस रफ़्तार से सैनिक खो रहा है, उस रफ़्तार से नई भर्ती नहीं कर पा रहा. उधर यूक्रेन के हताहतों की संख्या 5.25 लाख से 6.25 लाख के बीच आंकी गई है, जिनमें 1.25 से 1.5 लाख मौतें शामिल हैं. न रूस और न यूक्रेन आधिकारिक आंकड़े जारी करते हैं, लेकिन सीएसआईएस के ये ताज़ा आंकड़े पश्चिमी अनुमानों से मोटे तौर पर मेल खाते हैं.
हिंदुत्ववादी संगठन के लिए राम मंदिर में कथित गबन उसके अपने अभियान में एक शर्मिंदा करने वाला 'सेल्फ़ गोल' है — वही अभियान जिसमें हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से "मुक्त" कराने की मांग की जाती रही है. मंदिरों को श्रद्धालुओं को सौंपने की मांग के बाद अब उसे समझाना पड़ रहा है कि सरकारी निगरानी से जुड़े एक ट्रस्ट के तहत चंदा कैसे ग़ायब हो गया. ट्रस्ट में चार पदेन वरिष्ठ सरकारी अधिकारी इसे सीधे केंद्र सरकार — प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय समेत — से जोड़ते हैं, जबकि एक सदस्य उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व करता है.
लेकिन सियासी साया संभालना और मुश्किल है. ब्लूमबर्ग का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से क़रीबी तौर पर जुड़े एक हिंदू मंदिर में कथित वित्तीय अनियमितताएं उनकी पार्टी की एक प्रमुख परियोजना की छवि पर दाग़ लगाने का ख़तरा बन गई हैं.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में दीप्तिमान तिवारी की रिपोर्ट के अनुसार, मंदिर के तीर्थयात्री सुविधा केंद्र के 45 दिनों के फुटेज की गहन जांच से पता चला है कि गिनती करने वाले पांच कर्मी नोटों के बंडल हटाकर उन्हें अपने कपड़ों या मोजों में छुपा रहे थे.
इस बीच, जिस एजेंसी के माध्यम से इन कर्मियों को काम पर रखा गया था, उसने दावा किया है कि उसने इन लोगों की तलाश खुद नहीं की थी, बल्कि इन नामों की सिफारिश भारतीय स्टेट बैंक द्वारा की गई थी, जहां दान का पैसा जमा किया जाता था. पुलिस ने दान का पैसा हटाते हुए दिखे आरोपियों से जुड़े परिसरों की तलाशी ले ली है और नकदी बरामद की है. पुलिस अब तक करीब 80 लाख रुपये बरामद कर चुकी है. ट्रस्ट ने मंदिर की विभिन्न हुंडियों (दानपात्रों) में डाले गए नोटों और सिक्कों की गिनती के लिए लगभग 50 लोगों को लगाया था.
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श्रवण गर्ग के अनुसार, जनमानस पर असर तो पहले ही हो चुका है, लेकिन इसे राजनीतिक हार-जीत में बदलना विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा और राष्ट्रीय लोक दल सहित तमाम दलों के बीच एकजुटता का अभाव इस मुद्दे को कमजोर कर सकता है. श्रवण गर्ग ने इस पूरे प्रकरण को आरएसएस की छवि के लिए भी बड़ा झटका बताया, यह कहते हुए कि चंपत राय जैसे संघ प्रचारक रहे व्यक्ति पर लगे आरोप संघ और बीजेपी के बीच पहले से मौजूद खींचतान को और उजागर करते हैं.
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में चढ़ावे और चंदे को लेकर उठा विवाद अब सिर्फ प्रशासनिक मसला नहीं रह गया है, बल्कि बीजेपी और आरएसएस के राजनीतिक भविष्य से सीधे जुड़ गया है. वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने हरकारा डीपड्राइव में नितीश त्यागी से बातचीत में कहा कि इस पूरे प्रकरण ने करोड़ों उन श्रद्धालुओं को गहरी चोट पहुंचाई है, जिन्होंने दशकों तक आस्था के नाम पर अपना सब कुछ दांव पर लगाया था.
ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा ने कथित तौर पर इस्तीफा दे दिया है, लेकिन इस्तीफे की न तो कोई लिखित प्रति सार्वजनिक हुई है, न ही इसकी घोषणा करने वाले कोषाध्यक्ष का इससे कोई सीधा वास्ता सामने आया है. इन इस्तीफों पर 11 जुलाई को विचार होना है, जिसे श्रवण गर्ग "अदालती तारीख की तरह टलती जाने वाली प्रक्रिया" बताते हैं.
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित एसआईटी की जांच में अब तक नौ लोगों पर एफआईआर और आठ गिरफ्तारियां हुई हैं, जबकि छापों में बरामद राशि महज 80 लाख रुपए के आसपास बताई जा रही है, जो कथित 2000 करोड़ रुपए के घोटाले के दावों के सामने बेहद छोटी है. श्रवण गर्ग का कहना है कि जांच की गति और दायरा दोनों ही यह संकेत देते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें इस मामले को "डाइल्यूट" करने में पूरी ताकत झोंक रही हैं.
चर्चा का केंद्रीय सवाल यह था कि क्या इस विवाद का असर 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात और मणिपुर के विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा. श्रवण गर्ग के अनुसार, जनमानस पर असर तो पहले ही हो चुका है, लेकिन इसे राजनीतिक हार-जीत में बदलना विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा और राष्ट्रीय लोक दल सहित तमाम दलों के बीच एकजुटता का अभाव इस मुद्दे को कमजोर कर सकता है. वहीं कांग्रेस नेता अजय राय और सपा नेता धर्मेंद्र यादव सहित कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिए जाने की घटनाएं भी सामने आई हैं.
श्रवण गर्ग ने इस पूरे प्रकरण को आरएसएस की छवि के लिए भी बड़ा झटका बताया, यह कहते हुए कि चंपत राय जैसे संघ प्रचारक रहे व्यक्ति पर लगे आरोप संघ और बीजेपी के बीच पहले से मौजूद खींचतान को और उजागर करते हैं. उन्होंने इसे 1975 के आपातकाल से तुलना करते हुए "धार्मिक आपातकाल" की संज्ञा दी, जिसमें आम श्रद्धालुओं की आस्था और बचत, दोनों पर आघात हुआ है.
बातचीत के अंत में श्रवण गर्ग ने आगाह किया कि अगर विपक्ष इस अवसर को भुनाने में नाकाम रहता है, तो यह मुद्दा भी समय के साथ शांत पड़ जाएगा और आरोपित लोग बिना किसी नतीजे के पुनर्वासित हो सकते हैं. उनके शब्दों में, "यह सिर्फ सूचना का मामला नहीं, बल्कि जनचेतना का मामला है."
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने डिजिटल क्रिएटर और राजनीतिक टिप्पणीकार रीबोर्न मनीष के साथ राम मंदिर में चढ़ावे में कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत केवल एक वित्तीय विवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि इस सवाल तक पहुंची कि क्या तीन दशकों से आस्था और राजनीति के नाम पर तैयार की गई सामाजिक चेतना अब अपने सबसे कठिन मोड़ पर खड़ी है. रिबॉर्न मनीष का कहना है कि 1990 के दशक के बाद एक पूरी पीढ़ी ने हिंदुत्व की राजनीति को केवल एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया. उनके अनुसार सोशल मीडिया, व्हाट्सएप और लगातार चलने वाले वैचारिक प्रचार ने इस सोच को और मजबूत किया. उन्होंने कहा कि समय के साथ बहुत से लोगों ने इतिहास और समाज को समझने की स्वतंत्र कोशिश छोड़ दी और उन्हें जो जानकारी मिलती रही, उसी को अंतिम सत्य मानते गए. यही कारण है कि आज जब राम मंदिर से जुड़े कथित वित्तीय विवाद सामने आए हैं, तब सबसे अधिक मानसिक संकट उन्हीं लोगों के सामने खड़ा हुआ है जिन्होंने इस आंदोलन को अपने जीवन का भावनात्मक निवेश माना था. रिबॉर्न मनीष ने कहा कि यह केवल किसी आर्थिक गड़बड़ी का मामला नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के विश्वास के टूटने का क्षण है. उनके अनुसार अर्थव्यवस्था, विदेश नीति या दूसरे सरकारी फैसलों पर सवाल उठने पर समर्थक अक्सर दूसरे मुद्दों का सहारा लेकर बहस को मोड़ देते थे, लेकिन मंदिर से जुड़े आरोपों में ऐसा करना आसान नहीं है. उनका कहना था कि यहां न विपक्ष को दोष दिया जा सकता है, न पाकिस्तान या किसी दूसरे देश को, क्योंकि सवाल उसी व्यवस्था के भीतर से उठ रहे हैं जिसने स्वयं इस पूरे आंदोलन का नेतृत्व किया था. चर्चा के दौरान रिबॉर्न मनीष ने कहा कि पिछले तीन दशकों में राम मंदिर आंदोलन केवल धार्मिक अभियान नहीं रहा, बल्कि एक बड़े राजनीतिक प्रोजेक्ट के रूप में विकसित हुआ. उनके मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया में आस्था को राजनीतिक पूंजी में बदला गया और अब जब पारदर्शिता तथा जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं, तब समर्थकों के सामने अपनी पुरानी धारणाओं की समीक्षा करने की चुनौती खड़ी हो गई है. उन्होंने कहा कि किसी भी विचारधारा से जुड़ना गलत नहीं होता, लेकिन उसे अपनी स्थायी पहचान बना लेना व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी मुश्किल पैदा करता है. रीबोर्न मनीष ने यह भी कहा कि लोकतंत्र केवल निष्ठा से नहीं चलता, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता से चलता है. उनके अनुसार यदि किसी धार्मिक ट्रस्ट या सार्वजनिक संस्था पर सवाल उठते हैं तो निष्पक्ष जांच और स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए. उनका मानना है कि संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बच सकती है जब कानून का व्यवहार सभी के लिए समान हो और किसी भी मामले में राजनीतिक सुविधा के आधार पर अलग-अलग मापदंड न अपनाए जाएं.
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में है — लेकिन जश्न कहीं दिखाई नहीं दे रहा. हरकारा डीपडाइव की इस कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग से निधीश त्यागी की बातचीत उन सवालों पर, जो इस समय संघ को घेरे हुए हैं. इस बातचीत में: - आम नागरिक से नागरिकता के 11-12 कागज़ मांगे जाते हैं, तो 100 साल पुराने संगठन से रजिस्ट्रेशन और बैलेंस शीट क्यों नहीं? - कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खड़गे के सवाल और उन पर हुआ पलटवार - राम जन्मभूमि ट्रस्ट घोटाले पर एक महीने बाद आया दत्तात्रेय होसबाले का बयान — "एंटी-हिंदू, एंटी-नेशनल कॉन्सपिरेसी" कहने के मायने क्या हैं? - 10 से 12 जुलाई तक बेलगावी में होने वाली संघ की प्रांत प्रचारक बैठक का एजेंडा - बीजेपी के 3 करोड़ से 14-18 करोड़ सदस्य कैसे हो गए, जबकि संघ की सदस्य संख्या 2013 से वहीं की वहीं है? - क्या यह पूरा घटनाक्रम बीजेपी और संघ के बीच सुप्रीमेसी के संघर्ष की अभिव्यक्ति है? श्रवण गर्ग का कहना है — संघ अपने संकट को देश का संकट, हिंदू समाज का संकट बनाना चाहता है. निष्कर्ष हम नहीं देंगे. तथ्य आपके सामने हैं — फ़ैसला आप कीजिए. हरकारा — शोर कम, रोशनी ज़्यादा. 🔔 चैनल सब्सक्राइब करें और बेल आइकन दबाएं 🌐 वेबसाइट: harkaraonline.com 📩 सहयोग और सुझाव के लिए हमसे जुड़ें चैप्टर्स: 00:00 परिचय — संघ, संविधान और खड़गे के सवाल 02:00 संघ के 100 साल और संकटों की फ़ेहरिस्त 05:45 प्रियांक खड़गे: रजिस्ट्रेशन और चंदे का हिसाब 06:53 राम जन्मभूमि घोटाला — एफ़आईआर से होसबाले के बयान तक 11:00 बीजेपी बनाम संघ: सुप्रीमेसी की लड़ाई 12:06 बेलगावी बैठक: 10-12 जुलाई का एजेंडा 16:54 आंकड़ों की पड़ताल: संघ, बीजेपी और कांग्रेस की सदस्यता 21:04 दो आरएसएस — एक सत्ता में, एक बाहर 26:02 "एंटी-हिंदू कॉन्सपिरेसी" कौन करेगा? 33:08 क्या संघ को भंग कर देना चाहिए? 34:09 समापन — ज़िम्मेदारी किसकी?