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एस. जानकी: हर भावना को स्वर देने वाली आवाज़ खामोश
दक्षिण भारतीय सिनेमा पर दशकों तक अपनी असाधारण आवाज से राज करने वाली और पीढ़ियों तक गूंजने वाले गीतों को आवाज देने वाली दिग्गज पार्श्व गायिका एस. जानकी का शनिवार (11 जुलाई, 2026) को मैसूरु में निधन हो गया. वह 88 वर्ष की थीं.
बी. कोलप्पन के मुताबिक, शास्त्रीय रचनाओं, रोमांटिक धुनों, लोक गीतों, हास्य गीतों और भावनाओं से भरे युगल गीतों को समान सहजता से गाने वाली जानकी ने एक ऐसी बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन किया, जिसकी बराबरी बहुत कम लोग कर सकते हैं. संगीत जगत और अपने प्रशंसकों के बीच 'जानकीअम्मा' के नाम से जानी जाने वाली इस गायिका ने हिंदी समेत 18 भाषाओं में करीब 48 हजार गाने गाए और वे बिना किसी प्रयास के एक बच्चे की आवाज में भी गा सकती थीं. उन्होंने कर्नाटक संगीत में प्रशिक्षण लिया था और त्यागराज कृतियों का एक एल्बम भी जारी किया था.
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करन थापर | एक भयानक गलती, फिर शीर्ष स्तर पर बयां करती चुप्पी: पासपोर्ट विवाद और एक गलत देश निकाला
वरिष्ठ पत्रकार करन थापर ने “द टेलीग्राफ” में लिखा है कि जब सरकारें कोई गलती करती हैं, तो उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए? क्या उन्हें स्वीकार करना चाहिए कि उनसे चूक हुई है? क्या उन्हें इससे आगे बढ़कर खेद व्यक्त करना चाहिए? वास्तव में, क्या उन्हें इस हद तक जाना चाहिए कि वे माफी मांगें? किसी भी आत्म-सम्मान वाले लोकतंत्र में इसका उत्तर स्पष्ट होगा. यह एक स्पष्ट 'हाँ' होगा और उस देश के लोग इसकी उम्मीद करेंगे. दुख की बात है कि हमारे देश में चीजें काफी अलग हैं.
पिछले हफ्ते मुझे दिए गए एक इंटरव्यू में, सुप्रीम कोर्ट के हमारे सबसे सम्मानित पूर्व न्यायाधीशों में से एक, जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि सरकार ने यह दावा करके "एक गंभीर गलती" की है कि पासपोर्ट "केवल एक यात्रा दस्तावेज" है, नागरिकता का प्रमाण नहीं. उन्होंने सबसे पहले पासपोर्ट अधिनियम, 1967 का हवाला दिया, जिसकी प्रस्तावना में कहा गया है कि यह "पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज जारी करने का प्रावधान करने वाला अधिनियम" है. यहाँ 'और' शब्द का जानबूझकर किया गया उपयोग स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज एक ही चीज नहीं हैं. वे अलग-अलग संस्थाएं हैं.
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राम मंदिर चढ़ावा घोटाले पर मचे बवाल से घबराई भाजपा, चुनावी राज्य यूपी में सांप्रदायिक बयानों की ओर मुड़ी
‘द वायर’ के लिए उमर राशिद की रिपोर्ट का सारांश कहता है कि राम मंदिर में चंदे के पैसे की शर्मनाक हेराफेरी के कारण बैकफुट पर आई सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश के लिए अपनी पसंदीदा पुरानी रणनीति फिर से निकाल ली है: सांप्रदायिक बयानों को तेज करना और अपने प्रतिद्वंद्वियों को मुस्लिम-परस्त दिखाना.
अयोध्या मंदिर में चंदे के धन का दुरुपयोग घोर वित्तीय भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है. इन सबसे ऊपर, यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उससे जुड़े संगठनों की राजनीतिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाता है, जिन्होंने व्यावहारिक रूप से मंदिर और उसके निर्माण के आंदोलन का प्रबंधन उस स्थान पर किया था जहाँ 6 दिसंबर, 1992 तक मुगल काल की बाबरी मस्जिद खड़ी थी.
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गौतम मुखोपाध्याय | मणिपुर में बहिष्करण का एक रास्ता है ‘एसआईआर’
“द हिंदू” में गौतम मुखोपाध्याय ने लिखा है कि मणिपुर में मतदाता सूचियों का 'विशेष गहन पुनरीक्षण' जातीय संघर्ष, विस्थापन और पहचान की चुनौतियों के बीच (लोगों के) ‘बहिष्करण’ को और गहरा करने का जोखिम पैदा करता है. वह लिखते हैं कि भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) का तीसरा चरण चलाया जा रहा है, जिसके अंतर्गत मणिपुर भी शामिल है. पूर्व में बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावों के दौरान इस प्रक्रिया की तीखी आलोचना हो चुकी है. आलोचकों और नागरिक समाज संगठनों का मानना है कि इस प्रक्रिया के तहत बिना उचित जांच और जल्दबाजी में बड़े पैमाने पर लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे कई राजनैतिक रूप से "अवांछित" समुदायों को मताधिकार से वंचित होना पड़ रहा है.
इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, राज्य सरकार का कथित पक्षपात, और आगामी 2029 के चुनावों व नियोजित परिसीमन के साथ इसके अंतर्संबंधों को लेकर गंभीर चिंताएं हैं. मणिपुर के संदर्भ में यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है क्योंकि राज्य वर्तमान में एक अभूतपूर्व सामाजिक और जातीय संकट से गुजर रहा है.
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खाना अब सिर्फ भोजन नहीं, एक ऐप है. क्या शहरी भारत में खत्म हो रही है साथ बैठकर खाने की संस्कृति?
कभी रसोई घर परिवार का सबसे जीवंत हिस्सा हुआ करती थी. यहीं भोजन बनता था, बातचीत होती थी, रिश्ते मजबूत होते थे और यादें बनती थीं. लेकिन अब महानगरों के कई घरों में रसोई का महत्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. उसकी जगह फूड डिलीवरी ऐप्स, माइक्रोवेव और क्लाउड किचन लेते दिखाई दे रहे हैं.
‘स्क्रोल’ में प्रकाशित अंजलि भाटिया की रिपोर्ट बताती है कि पिछले कुछ वर्षों में स्विगी, जोमैटो और ब्लिंकिट जैसे प्लेटफॉर्म ने खाने की आदतों को तेजी से बदला है. अब बाहर जाकर खाना ही नहीं, बल्कि रेस्तरां का खाना घर मंगाकर खाना भी सामान्य जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है. कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन ने इस बदलाव को और तेज कर दिया. बाहर खाना संभव नहीं था, इसलिए "ईटिंग इन-ईटिंग आउट" यानी घर में रहकर बाहर का खाना खाने का चलन तेजी से बढ़ा.
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'स्पर्मागेडन': क्या दुनिया पुरुष प्रजनन संकट का सामना कर रही है?
क्या दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां पुरुषों की प्रजनन क्षमता गंभीर संकट का सामना करेगी? हाल के वर्षों में प्रकाशित कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस सवाल को वैश्विक बहस का विषय बना दिया है. कुछ वैज्ञानिकों का दावा है कि पिछले 50 वर्षों में पुरुषों में औसत टेस्टोस्टेरोन का स्तर लगभग आधा रह गया है और शुक्राणुओं की संख्या में भी लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. हालांकि, इस निष्कर्ष पर वैज्ञानिक समुदाय पूरी तरह एकमत नहीं है.
‘द गार्डियन’ के मुताबिक, येल विश्वविद्यालय से जुड़े प्रोफेसर हगाई लेविन का कहना है कि टेस्टोस्टेरोन में लगभग 50 प्रतिशत की गिरावट बेहद चिंताजनक है. उनकी टीम इससे पहले भी एक अध्ययन प्रकाशित कर चुकी है, जिसे लोकप्रिय रूप से "स्पर्मागेडन" कहा गया. इस अध्ययन में दावा किया गया था कि दुनिया भर में पुरुषों के शुक्राणुओं की संख्या तेजी से घट रही है.
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पर्यावरण बचाने के दावे, लेकिन रैंकिंग में सबसे नीचे. भारत 176वें स्थान पर क्यों पहुंचा?
‘वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर के देशों के पर्यावरणीय प्रदर्शन को मापने वाले पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (ईपीआई) 2026 में भारत एक बार फिर सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है. इस बार 177 देशों की सूची में भारत 176वें स्थान पर है. केवल लाओस का प्रदर्शन भारत से खराब रहा. भारत का कुल स्कोर 22.46 रहा, जबकि पहले स्थान पर रहे एस्टोनिया का स्कोर 74.79 है. दक्षिण एशिया के आठ देशों में भी भारत सबसे नीचे रहा.
ईपीआई को येल और कोलंबिया विश्वविद्यालय समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के वैज्ञानिक हर दो साल में जारी करते हैं. यह सूचकांक किसी देश के पर्यावरणीय प्रदर्शन का आकलन तीन प्रमुख आधारों पर करता है. पहला, पर्यावरणीय स्वास्थ्य. दूसरा, पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण. और तीसरा, जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयास. इस बार 47 संकेतकों और 12 श्रेणियों के आधार पर देशों का मूल्यांकन किया गया. पहली बार घास के मैदानों के क्षरण को भी आकलन में शामिल किया गया.
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"मुझे गोली क्यों मारी गई?" पेलेट गन से अंधी हुई छात्रा की कहानी, जो फिल्म ‘चौहान’ से गायब कश्मीरियों की सच्चाई सामने लाती है
साल 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. इन्हीं प्रदर्शनों के दौरान 14 वर्षीय छात्रा इंशा मुश्ताक की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. वह न तो प्रदर्शन में शामिल थी और न ही किसी हिंसा का हिस्सा. अपने घर की रसोई की खिड़की से बाहर का शोर सुनकर उसने केवल एक बार झांकने की कोशिश की. उसी क्षण सुरक्षा बलों की ओर से दागी गई पेलेट गन के सैकड़ों धातु के छर्रों ने उसके चेहरे, गले, सीने और दोनों आंखों को छलनी कर दिया.
‘आर्टिकल 14’ में हरिंदर बावेजा की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सर्जरी के बावजूद इंशा की दोनों आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई. आज, लगभग एक दशक बाद भी वह दुनिया को नहीं देख सकती, लेकिन उसकी कहानी कश्मीर में पेलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े सबसे बड़े मानवीय सवालों में से एक बन चुकी है.
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अपूर्वानंद | राम मंदिर से जुड़े मौजूदा विवाद को केवल चढ़ावे की कथित अनियमितता तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद से राम मंदिर ट्रस्ट में सामने आई कथित वित्तीय अनियमितताओं और उसके व्यापक राजनीतिक संदर्भ पर बातचीत की. चर्चा की शुरुआत इस सवाल से होती है कि क्या इसे केवल चढ़ावे की चोरी का मामला मानकर देखा जा सकता है, या फिर इसके पीछे उस पूरी प्रक्रिया की समीक्षा भी जरूरी है जिसके जरिए राम मंदिर आंदोलन खड़ा हुआ.
प्रोफेसर अपूर्वानंद का तर्क है कि किसी भी कथित भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच तभी संभव है जब जांच एजेंसियों पर जनता का भरोसा बना रहे. उनका कहना है कि आज सबसे बड़ी चिंता यही है कि सरकारी जांच की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. वे यह भी कहते हैं कि यदि कानून की सामान्य प्रक्रिया हर संस्था पर लागू होती है, तो राम मंदिर ट्रस्ट पर भी वही मानक लागू होने चाहिए.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
‘द वायर’ में उमर राशिद की रिपोर्ट. राम मंदिर ट्रस्ट में चंदे की कथित हेराफेरी के आरोपों के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा की चुनावी रणनीति, ध्रुवीकरण के मुद्दों और राजनीतिक विमर्श पर एक विस्तृत विश्लेषण.
‘द हिंदू’ में बी. कोलप्पन की रिपोर्ट. संगीत जगत में 'जानकीअम्मा' के नाम से मशहूर दिग्गज पार्श्व गायिका एस. जानकी का मैसूरु में 88 वर्ष की आयु में निधन, 18 भाषाओं में गाए 48 हजार गाने.
'द टेलीग्राफ' में अमिय कुमार कुशवाहा की रिपोर्ट. एनटीसीए (NTCA) के अनुसार भारत के 58 बाघ अभयारण्यों में से 22 में रेस्क्यू सेंटर नहीं हैं; बाघों की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की कमी पर विशेष रिपोर्ट.
'द टेलीग्राफ' में प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार करन थापर का लेख. जस्टिस मदन लोकुर के इंटरव्यू के हवाले से पासपोर्ट विवाद, नागरिकता के प्रमाण और बंगाली मुस्लिम नागरिक दानिश शेख के गलत निष्कासन पर बड़ा विमर्श.
‘द हिंदू’ में पूर्व राजदूत गौतम मुखोपाध्याय का लेख. मणिपुर में चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से विस्थापित कुकी-ज़ो समुदाय के मतदाता सूची से बाहर होने और नागरिकता संकट पर बड़ा विश्लेषण.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद से राम मंदिर ट्रस्ट में सामने आई कथित वित्तीय अनियमितताओं, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले और इसके राजनीतिक संदर्भ पर विशेष बातचीत की.
'द गार्डियन' की रिपोर्ट. पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन के स्तर में 50% की कमी और शुक्राणुओं की घटती संख्या पर 'स्पर्मागेडन' बहस; मोटापा, माइक्रोप्लास्टिक और जीवनशैली के प्रभावों का वैज्ञानिक विश्लेषण.
'आर्टिकल 14' में हरिंदर बावेजा की रिपोर्ट. साल 2016 में कश्मीर में पेलेट गन का शिकार हुईं इंशा मुश्ताक के संघर्ष, फिल्म 'चौहान' के विवाद और घाटी में मानवाधिकारों की हकीकत पर एक विशेष विमर्श.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार मिल रहे विदेशी सम्मान क्या भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रतीक हैं, या इनके पीछे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की कोई अलग कहानी छिपी है? हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और निधीश त्यागी चर्चा करते हैं कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं, विदेशी पुरस्कारों, इंडियन डायस्पोरा की राजनीति और भारत के भीतर मौजूद चुनौतियों को किस नज़र से देखा जाना चाहिए. इस बातचीत में चर्चा के प्रमुख मुद्दे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिल रहे विदेशी सम्मान. विदेशी पुरस्कारों पर उठे सवाल और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट. इंडियन डायस्पोरा की भूमिका और विदेश यात्राओं की राजनीति. भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और घरेलू चुनौतियां. विदेश नीति, कूटनीति और रणनीतिक हित. क्या विदेशी सम्मान घरेलू राजनीति को प्रभावित करते हैं? अगर आपको यह विश्लेषण महत्वपूर्ण लगा हो तो वीडियो को लाइक करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें. हरकारा. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने पत्रकार शोभन सक्सेना से फ़ीफ़ा विश्व कप, ब्राज़ील की फुटबॉल संस्कृति, अर्जेंटीना से जुड़े विवाद, वीएआर, फ़ीफ़ा के बढ़ते व्यावसायीकरण और भारत में फुटबॉल की स्थिति पर विस्तार से बातचीत की. इस एपिसोड में जानिए. ब्राज़ील में फुटबॉल धर्म की तरह क्यों माना जाता है? आधुनिक फुटबॉल को दक्षिण अमेरिका ने कैसे बदला? अर्जेंटीना और वीएआर विवाद पर क्या हैं सवाल? क्या फ़ीफ़ामें राजनीति और कारोबार का असर बढ़ गया है? भारत और चीन फुटबॉल में पीछे क्यों रह गए? क्या फुटबॉल आज भी दुनिया को जोड़ने वाला सबसे बड़ा खेल है? अगर आपको यह विश्लेषण पसंद आए तो वीडियो को लाइक करें, अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और हरकारा को सब्सक्राइब करना न भूलें. #FIFAWorldCup #Football #Brazil #Argentina #Messi #VAR #FIFA #SportsPolitics #WorldCup #Harkara #HindiPodcast #NidheeshTyagi #ShobhanSaxena
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