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मलेशियाई इंजीनियर को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जांच के आदेश
मलेशियाई इंजीनियर की आत्महत्या का दो दशक पुराना मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के लिए परेशानी का सबब बन गया है. केरलम सरकार ने इस मामले में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं. राज्य के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने बताया कि उन्हें शिकायत मिली थी कि 2006 में हुई विजिलेंस जांच बाहरी दबाव के कारण प्रभावित हुई थी. उन्होंने कहा कि विजिलेंस पूरे मामले की जांच करेगी और जरूरत पड़ने पर कानूनी कार्रवाई भी करेगी.
शिकायत के मुताबिक, मलेशियाई सिविल इंजीनियर ली सी बीन ने आरोप लगाया था कि सड़क के काम का भुगतान जारी करने के बदले तत्कालीन पीडब्ल्यूडी सचिव ज्ञानेश कुमार ने रिश्वत मांगी थी. चेन्निथला ने बताया कि सुसाइड नोट में ज्ञानेश कुमार के नाम का उल्लेख किया गया है. ऐसे में सरकार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती.
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खराब सड़क; मेघालय में बीमार बच्चे को लेकर 3 घंटे पैदल चली माँ, अस्पताल पहुँचने के पहले बच्चे की मौत
मेघालय के वेस्ट खासी हिल्स जिले के अधिकारियों ने नजदीकी अस्पताल पहुँचने के लिए माता-पिता द्वारा तीन घंटे की पैदल यात्रा के दौरान एक बीमार बच्चे की मौत पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है.
डोमकिरकोह गांव के मुखिया बी. स्यिम के अनुसार, तीन वर्षीय मासूम की मौत उसकी मां की गोद में तब हो गई, जब वह अपने घर से मॉडेट तक पहाड़ी रास्ते पर लगभग 10 किमी की दूरी भी तय नहीं कर पाई थी, जहां से उसे स्वास्थ्य केंद्र ले जाने के लिए वाहन मिल सकता था.
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आकार पटेल | विरोध का इम्तिहान- अधिकार और पाबंदियाँ
गांधी जयंती की यादें अभी हमारे ज़ेहन में ताज़ा हैं. शांतिपूर्ण तरीक़े से इकट्ठा होने का अधिकार भी फिर से चर्चा में है. ऐसे में आइए, इससे जुड़ी कुछ बातों पर नज़र डालते हैं. जब मैं यह लिख रहा हूँ, तब मोदी सरकार प्रदर्शनकारियों को इकट्ठा होने से रोक रही है, क्योंकि वह मुख्य चुनाव आयुक्त को जवाबदेही से बचाना चाहती है. उनके ग़लत रवैये पर कोई बहस नहीं है. तथ्य हमारे सामने हैं. लेकिन सरकार ने वह रवैया अपना लिया है जिसे हम हिंदुस्तानी 'जो करना है कर लो' कहते हैं. क्या यह रवैया टिक पाएगा? इस पर भी आएँगे, लेकिन पहले थोड़ा पीछे चलते हैं.
भारत में गांधी का पहला विरोध प्रदर्शन 1917 में हुआ था, जब वे 47 साल के थे. उन्हें पता चला कि चंपारण के बटाईदार किसानों को 'तिनकठिया' नाम की एक व्यवस्था के तहत क़ानूनन अपनी 15 प्रतिशत ज़मीन पर नील की खेती करनी ही पड़ती थी, चाहे वे चाहें या नहीं.
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मतदाता सूची में नाम शामिल करने के खिलाफ 10 में से 4 अपीलें चुनाव आयोग की तरफ से आईं: बंगाल ट्रिब्यूनल जज
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर उठे विवादों के बीच एक गंभीर और चौंकाने वाला प्रशासनिक मामला सामने आया है. मुर्शिदाबाद जिले के 11 विधानसभा क्षेत्रों—55-फरक्का से लेकर 65-नबाग्राम तक—के मतदाताओं के मामलों की सुनवाई अपीलीय ट्रिब्यूनल संख्या 11 में चल रही है. राज्यभर में इस प्रक्रिया से कुल 6,35,983 अपीलें उत्पन्न हुई हैं. ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता कर रहे कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश इंद्रजीत चटर्जी के अनुसार, इनमें से लगभग 2.54 लाख अपीलें (यानी हर 10 में से 4 अपीलें) खुद बंगाल के अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी (अतिरिक्त सीईओ) द्वारा दायर की गई थीं. ये याचिकाएं नाम बहाल कराने के लिए आम नागरिकों द्वारा नहीं, बल्कि पहले से शामिल किए जा चुके मतदाताओं को सूची से हटाने के लिए चुनाव अधिकारियों द्वारा दर्ज की गई थीं.
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‘हिंदुओं को आरएसएस से कुछ सीखने की जरूरत नहीं’: प्रियंक खड़गे ने धर्म के नाम पर अवैध गतिविधियों का आरोप लगाया
‘साउथ फर्स्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर तीखा हमला करते हुए उस पर धर्म के नाम पर “अवैध गतिविधियां” करने का आरोप लगाया है. उन्होंने आरएसएस को “बिना पंजीकरण वाली मनी लॉन्ड्रिंग इकाई” भी बताया. खड़गे ने यह टिप्पणी कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की प्रस्तावित 1,000 किलोमीटर की पदयात्रा को लेकर पूछे गए सवालों के जवाब में की.
खड़गे ने दिग्विजय सिंह को “कट्टर सनातनी” बताते हुए हिंदू धर्म और हिंदुत्व के बीच अंतर की बात कही. उन्होंने कहा कि आरएसएस करीब 100 साल पुराना संगठन है, जबकि हिंदू धर्म हजारों वर्षों से मौजूद है. आरएसएस की स्थापना 27 सितंबर 1925 को हुई थी.
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मोदी सरकार का चुनाव कानून अब भी लागू, सुप्रीम कोर्ट में दो साल से फैसला लंबित
‘आर्टिकल 14’ में सार्थक गुप्ता और प्रन्नव धवन लिखते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में ढाई साल से फैसला लंबित है. 23 सितंबर 2026 को दो जजों की पीठ ने इस मामले पर विभाजित फैसला दिया. जस्टिस दीपांकर दत्ता ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की जरूरत नहीं मानी, जबकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने संविधान पीठ के सामने सुनवाई को जरूरी माना. अब मामला मुख्य न्यायाधीश के पास है, लेकिन अगली सुनवाई की तारीख तय नहीं हुई है.
2023 के कानून ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया. अब समिति में प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं. इस कानून को 2 जनवरी 2024 को लागू किया गया और उसी दिन इसे चुनौती सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी. जनवरी 2024 में अदालत ने कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था.
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भुइयां के बाद, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज रोहिंटन नरीमन ने भी उठाई आवाज़ : ‘हमारे पास ऐसा चुनाव आयोग नहीं हो सकता जो इस तरह से खराब काम करे’
उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के पूर्व न्यायाधीश रोहिंटन फली नरीमन ने शीर्ष अदालत से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जल्द फैसला करने का आग्रह किया है. उन्होंने मतदाताओं को सूची से हटाने (वोटर एक्सक्लूजन) और चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं. उनकी यह चिंता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां के उस बयान से मेल खाती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जिस प्रक्रिया से लाखों भारतीय नागरिकों के वोट देने के अधिकार छीन लिए जाते हैं, वह संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन करती है.
नरीमन राजकोट के राजकुमार कॉलेज में ‘द कॉन्स्टिट्यूशन एंड द कॉमन मैन’ (संविधान और आम आदमी) विषय पर बोल रहे थे. उनकी आलोचना मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर केंद्रित थी.
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चुनाव आयोग और केंद्र को नोटिस, एक सप्ताह में जवाब दें
इस बीच ‘द हिंदू’ की ही खबर है कि उच्चतम न्यायालय ने निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है. यह नोटिस उस याचिका पर जारी किया गया है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग द्वारा दो चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना कथित रूप से निर्णय लेने के तरीके को चुनौती दी गई है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची तथा वी. मोहना की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह की दलीलों पर संज्ञान लेते हुए यह नोटिस जारी किया.
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भारत में इलेक्ट्रिक वाहन हर सड़क के लिए उपयुक्त नहीं, बहु-ईंधन परिवहन रणनीति की आवश्यकता
द एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (टीईआरआई) और पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस रेगुलेटरी बोर्ड (पीएनजीआरबी) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सड़क परिवहन को कार्बन-मुक्त बनाने के लिए एक समान नहीं, बल्कि बहु-ईंधन (मल्टी फ्यूल) रणनीति अपनानी होगी.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, छह प्रमुख वाहन श्रेणियों और 10 शहरों के विश्लेषण के बाद रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी एकल ईंधन तकनीकी, आर्थिक और पर्यावरणीय मापदंडों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता. इसलिए वाहनों के उपयोग और क्षेत्र के हिसाब से चरणबद्ध बदलाव जरूरी है: दोपहिया व तीन-पहिया: कम परिचालन लागत के कारण लंबी अवधि में विद्युतीकरण (ईवी) सबसे उपयुक्त है. यात्री कारें व हल्के वाणिज्यिक वाहन: वर्तमान में सीएनजी किफायत और उपयोगिता का सबसे व्यावहारिक विकल्प है. इंफ्रास्ट्रक्चर सुधरने पर ईवी की भूमिका बढ़ेगी.
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एशिया में भारतीय मुद्रा का सबसे खराब प्रदर्शन, निचले स्तर पर बना हुआ है भारतीय रुपया
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और दुनिया भर में बॉन्ड यील्ड (प्रतिफल) में उछाल के कारण स्थानीय संपत्तियों पर दबाव बढ़ा है, जिससे भारतीय रुपया इस तिमाही और पिछले 30 दिनों में एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रहा.
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा लगातार किए गए हस्तक्षेपों के कारण मुद्रा बड़े नुकसान से बचने में काफी हद तक सफल रही, फिर भी इस महीने इसमें 0.7% और जुलाई-सितंबर तिमाही में 1.2% की गिरावट दर्ज की गई. बुधवार को यह डॉलर के मुकाबले 95.83 पर बंद हुआ, जो पिछले सत्र के 95.98 के स्तर से थोड़ा सुधार दर्शाता है. दक्षिण एशियाई मुद्रा ने एक उथल-पुथल भरी तिमाही का सामना किया, जिसमें अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते-घटते तनाव के कारण बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $70 प्रति बैरल से लगभग $110 के बीच झूलती रहीं.
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आसिम अली | न्यूक्लियर बटन
‘द टेलीग्राफ’ में आसिम अली ने लिखा है कि देश “अभूतपूर्व स्थिति” में प्रवेश कर चुका है, जहाँ “वोट, कानून और संविधान को जोड़ने वाली मुख्य कड़ी टूट चुकी है.” मुख्य चुनाव आयुक्त की देखरेख में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े विवादित कदमों पर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की मीडिया रिपोर्ट आने के बाद, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यह तीखी प्रतिक्रिया दी थी.
भारतीय राजनीति के लोकतांत्रिक दायरों से भटककर एक हाइब्रिड 'चुनावी-सत्तावादी' दौर में चले जाने की चिंता पूरे 'इंडिया' विपक्षी गठबंधन में व्याप्त है. उदाहरण के लिए, जून में गठबंधन के 23 नेताओं ने उच्चतम न्यायालय को एक संयुक्त पत्र लिखकर मुख्य चुनाव आयुक्त के “पक्षपातपूर्ण आचरण” और बिहार व पश्चिम बंगाल में एसआईआर के क्रियान्वयन में हुई कथित गड़बड़ियों की ओर ध्यान आकर्षित किया. पत्र में आगाह किया गया था कि यदि न्यायपालिका ने इस पर हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह “गणराज्य के पूरी तरह से चरमराने” का संकेत होगा.
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जापान की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी बुलेट ट्रेन की समय-सीमा
जापान के विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर परियोजना की प्रगति की गति जापान की शुरुआती उम्मीदों के "अनुरूप नहीं रही है". भारत की इस पहली बुलेट ट्रेन परियोजना को जापान द्वारा वित्तीय और तकनीकी रूप से सहायता प्रदान की जा रही है.
‘द हिंदू’ से विशेष बातचीत करते हुए अधिकारी ने कहा कि जापान यह घोषणा करने की स्थिति में नहीं है कि यह परियोजना कब पूरी होगी, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि देरी के बावजूद अब यह परियोजना निरंतर प्रगति कर रही है.
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135 साल पुरानी लाइब्रेरी, 8.5 लाख किताबें और नई सेंट्रल विस्टा योजना में कोई जगह तक नहीं
जब 1911 में किंग जॉर्ज पंचम ने ब्रिटिश भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने के फैसले की घोषणा की, तो सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी (सीएसएल), जिसे तब इम्पीरियल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी के नाम से जाना जाता था, इसके साथ ही स्थानांतरित हो गई और इसे सिविल लाइंस क्षेत्र की ओल्ड सेक्रेटेरियट बिल्डिंग (पुराना सचिवालय) में पहला ठिकाना मिला. अंग्रेजों द्वारा रायसीना हिल के आसपास सत्ता की नई सीट बनाने के बाद, लाइब्रेरी को फिर से नॉर्थ ब्लॉक और फिर शास्त्री भवन में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ यह 1969 से मौजूद है.
अब इसे फिर से स्थानांतरित करने का समय आ गया है - लेकिन किसी को यकीन नहीं है कि कहाँ?
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मलेशियाई इंजीनियर को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में जांच के आदेश की खबर और कानूनी स्थिति का विश्लेषण.
'द हिंदू' रिपोर्ट: मेघालय के वेस्ट खासी हिल्स में सड़क न होने से अस्पताल ले जाते समय 3 साल के मासूम की मौत, दूरदराज इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल.
'आकार पटेल' विशेष: चंपारण सत्याग्रह (1917) से 2026 के विरोध प्रदर्शनों की तुलना, सत्याग्रह की ताकत और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर विश्लेषण.
'द हिंदू' अपडेट: सुप्रीम COURT द्वारा चुनाव आयोग और केंद्र को नोटिस जारी; दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना एकतरफा फैसलों को दी गई चुनौती.
'साउथ फर्स्ट' रिपोर्ट: प्रियंक खड़गे का आरएसएस पर सीधा हमला; हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म, 'बिना पंजीकरण मनी लॉन्ड्रिंग इकाई' का आरोप और मोहन भागवत का पक्ष.
'आर्टिकल 14' विशेष: सार्थक गुप्ता और प्रन्नव धवन का विश्लेषण; मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून (2023) की संवैधानिक चुनौती, सुप्रीम कोर्ट में बेंच आवंटन और न्यायिक विलंब.
'लाइवलॉ' विशेष रिपोर्ट: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रोहिंटन नरीमन का बड़ा बयान; एसआईआर (SIR) से 90 लाख मतदाताओं को हटाने, कोर्ट की चुप्पी और चुनाव आयोग पर सवाल.
'द हिंदू' अपडेट: सुप्रीम COURT द्वारा चुनाव आयोग और केंद्र को नोटिस जारी; दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना एकतरफा फैसलों को दी गई चुनौती.
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