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श्रवण गर्ग | मोदी के डर से मुक्त होने का क्या यही सबसे अच्छा अवसर नहीं है ?
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ईडी ने कोई आपत्ति नहीं की, दिल्ली की अदालत ने आई-पैक निदेशक विनेश चंदेल को जमानत दी
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बंगाल के चुनावी रण में केंद्रीय बलों की ज्यादती के आरोप और राजनीतिक तनाव
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ममता का दावा, ‘तृणमूल 226 से ज्यादा सीटें जीतेगी’, टीवी चैनलों को एग्जिट पोल दोपहर 1.08 बजे भाजपा ऑफिस से भेजे गए थे
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असम सीएम की पत्नी पर टिप्पणी मामला: पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
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विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026: भारत छह स्थान फिसला, पाकिस्तान पांच पायदान ऊपर चढ़ा
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छत्तीसगढ़ में पेसा कानून का ग़लत इस्तेमाल: आदिवासियों को सशक्त करने वाला कानून बना ईसाइयों के ख़िलाफ़ हथियार
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पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड 92% मतदान, लेकिन वजह बनी घटती मतदाता संख्या
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अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 95.34 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंचा
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“लग रहा है कि घर में बेघर हो गए हम”: मतदान के लिए व्हीलचेयर तैयार रखी थी, लेकिन सूची से नाम ही हटा दियापूरा पढ़ें/ देखें
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‘एनएचआरसी’ मुसलमानों पर हो रहे हमलों की अनदेखी कर रहा है और उन मामलों में दखल दे रहा है जो उससे संबंधित नहीं हैं: इलाहाबाद हाई कोर्ट
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ट्रंप ने ईरान का प्रस्ताव ठुकराया, कहा- परमाणु समझौता होने तक जारी रहेगी नौसैनिक नाकेबंदी
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योगेंद्र यादव: पश्चिम बंगाल चुनाव में अल्पसंख्यकों को बाहर करने की साज़िश
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‘हम बनाम वे’ की मानसिकता से पैदा होती है हेट स्पीच; कानूनों का खराब प्रवर्तन ‘हेट क्राइम्स’ की वजह: सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कार्ति चिदंबरम के मामले की सुनवाई से खुद को किया अलग, शराब कंपनी से कथित रिश्वत का आरोप
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दाभोलकर हत्याकांड: बॉम्बे हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी शरद कलस्कर को दी जमानत, रोक लगाने की याचिका खारिज
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हरकारा डीप डाइव | पत्रकार सुमित झा| क्या गरीबी का संबंध जाति से है? तेलंगाना सर्वे ने दिया जवाब!
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भारत में हर 8 मिनट में एक परिवार हार्ट फेलियर के इलाज के लिए बेच रहा है अपनी संपत्ति
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‘मेड इन इंडिया’ संकट: बंगाल चुनाव में ‘एसआईआर’ ने महानगरों में बढ़ाई घरेलू सहायकों की किल्लत
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भारत की ‘गोल्डीलॉक्स’ अर्थव्यवस्था का मिथक; जीडीपी के मामले में भारत से आगे निकले जापान और ब्रिटेन
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“वोट देने के लिए भरोसा नहीं, लेकिन चुनाव कराने के लिए उन पर पूरा भरोसा है” : बंगाल के चुनाव अधिकारी जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए
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औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर मार्च में 5 महीने के निचले स्तर 4.1% पर पहुँची; पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद पहला महीना
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ईरान संघर्ष: नए शीत युद्ध की आहट, होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अमेरिकी नाकाबंदी जारी
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डिजिटल अरेस्ट घोटाला: व्हाट्सएप ने 9,400 खाते बंद किए, सुप्रीम कोर्ट को बताया — पूरे नेटवर्क को किया ध्वस्त
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ट्रंप के इतने करीब कैसे पहुँचा बंदूकधारी?
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किसका पलड़ा भारी है दो माह से जारी जंग के बाद..
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डीप डाइव विद श्रवण गर्ग | ममता की हार का मतलब देश के लिए क्या होगा?
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बिरयानी के बाद तरबूज खाया और फिर 4 मौतें: मुंबई में एक त्रासदी जो 12 घंटों के भीतर घटित हुई
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आकार पटेल: भाजपा मुस्लिमों का पूर्ण बहिष्कार चाहती है
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बंगाल: मछली और झींगा भी मुद्दा; डेल्टा क्षेत्र के बड़े दांव वाले चुनाव में जीविका और वफादारी का असर
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“लॉरेंस ही कर्म है”: मोदी के भारत का गैंगस्टर जो आइकन बन गया
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‘मर्ज़ लाइलाज है, पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है’
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राघव चड्ढा और बड़ी समस्या: नेता-केंद्रित दलों की संरचनात्मक कमजोरी
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द ग्रेट भाजपा वाशिंग मशीन
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पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड मतदान: 92% वोटिंग के पीछे क्या है असली कहानी?
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आप में फूट: राघव चड्ढा ने बगावत की, 6 सांसदों के साथ भाजपा में शामिल, मित्तल को 10 दिन पहले ईडी ने घेरा था
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‘इन तर्कों को ट्रिब्यूनल के समक्ष रखें’: सुप्रीम कोर्ट का उन लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार, जिनके नाम बंगाल ‘एसआईआर’ के बाद हटाए
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क्या गरीबी सच में ‘जातिहीन’ है? तेलंगाना सर्वे ने ‘समान हालात’ की सदियों पुरानी दलील तोड़ी
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और तो और ये साहब भी यथावत हैं, बल्कि जज साहब का तबादला हो गया!
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लोकतंत्र की अप्रत्याशित घर वापसी
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मोदी के भाषण और आचार संहिता पर विवाद, 700 नागरिकों की चिट्ठी से बढ़ी बहस, “टॉकिंग न्यूज़” में विस्तृत चर्चा
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“अब नहीं आऊंगा दोस्त…”: सूरत से पलायन की पीड़ा के बीच नोएडा से तमिलनाडु तक मज़दूर असंतोष
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आकार पटेल: ईरान को छोड़कर किसी भी अन्य देश की तुलना में भारतीयों ने सबसे अधिक कष्ट झेला है और झेल रहे हैं
वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के इस विस्तृत राजनीतिक विश्लेषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द बने प्रभावशाली तंत्र, उनकी छवि के ‘कल्ट’ में बदलने और उसके सामाजिक-राजनीतिक असर की गहराई से पड़ताल की गई है. लेख में यह सवाल उठाया गया है कि क्या देश की राजनीति एक व्यक्ति केंद्रित विमर्श में सिमटती जा रही है और इसका लोकतंत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है. साथ ही, विपक्ष की रणनीति, जनता के मनोविज्ञान, डर की राजनीति और सत्ता के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा की गई है. लेख पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह समय डर से मुक्त होकर लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनः स्थापित करने का सबसे उपयुक्त अवसर है.
दिल्ली की एक अदालत ने गुरुवार (30 अप्रैल, 2026) को राजनीतिक परामर्शदाता संस्था 'इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी' (आई-पैक) के निदेशक विनेश चंदेल को नियमित जमानत दे दी. यह फैसला तब आया जब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उनकी जमानत याचिका का विरोध नहीं किया. चंदेल को केंद्रीय एजेंसी ने 13 अप्रैल को गिरफ्तार किया था, जो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से कुछ दिन पहले की बात है. राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक के निदेशक और सह-संस्थापक चंदेल, चुनावी राज्य में एक कथित कोयला घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी हैं.
खबरों के मुताबिक, केंद्रीय बल लोगों को पीट रहे थे और महिलाओं व बच्चों तक को नहीं छोड़ रहे थे. ममता बनर्जी ने कहा कि लाठीचार्ज की कई घटनाएं हुईं और अदालत के आदेशों का उल्लंघन करते हुए तृणमूल कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया. उन्होंने आरोप लगाया कि बूथों पर प्रभावी रूप से केंद्रीय बलों ने "कब्जा" कर लिया था और सवाल उठाया कि क्या ऐसा करना उनकी ड्यूटी है.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को आरोप लगाया कि एग्जिट पोल के अनुमान टीएमसी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराने के लिए "भाजपा के निर्देश" पर प्रसारित किए जा रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि उनकी पार्टी विधानसभा की 294 सीटों में से 226 से अधिक सीटें जीतेगी. 4 मई को होने वाली मतगणना से पहले 'एक्स' पर पोस्ट किए गए एक वीडियो संदेश में, बनर्जी ने दावा किया कि टेलीविजन चैनल उन चुनावी अनुमानों को चला रहे हैं जो "भाजपा कार्यालय से प्रसारित" किए गए थे.
बस्तर के कांकेर जिले के डोमपदर गांव के सरपंच देवलाल वट्टी का मामला इस बढ़ते तनाव को दिखाता है. वट्टी ने एक बार अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए धर्म की स्वतंत्रता की बात लिखी थी. इसके कुछ ही समय बाद उन्हें गांव की बैठक में बुलाकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया. वट्टी, जो खुद आदिवासी पारंपरिक धर्म कोया पुनेम के अनुयायी हैं, का कहना है कि बस्तर में कई धर्म आए हैं और सभी ने स्थानीय संस्कृति को प्रभावित किया है, लेकिन निशाना केवल ईसाइयों को बनाया जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की उस याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने असम पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के संबंध में अग्रिम जमानत की मांग की है.यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत से जुड़ा है. न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल चांदुरकर की पीठ ने पवन खेड़ा की उस याचिका पर सुनवाई की, जो गौहाटी उच्च न्यायालय द्वारा उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद दायर की गई थी.
चुनाव से पहले हुए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के कारण मतदाता सूची में बड़ी कटौती हुई. इस प्रक्रिया में राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 11% घटकर 7.66 करोड़ से 6.26 करोड़ रह गई. यह प्रक्रिया काफी विवादित रही है. इसी तरह 2021 के विधानसभा चुनाव में जहां 7.34 करोड़ मतदाता थे, वहीं हालिया चुनाव में यह संख्या घटकर 6.82 करोड़ रह गई, यानी करीब 7% की कमी आई है.हालांकि मतदाताओं की संख्या कम हुई, लेकिन वोट डालने वालों की संख्या में केवल 3.6% की ही बढ़ोतरी हुई, जो पिछले दस विधानसभा चुनावों में सबसे कम वृद्धि मानी जा रही है.
परवेज़ ने आँखों में आँसू भरकर कहा, “लग रहा है कि घर में बेघर हो गए हम. मतदान का दिन एक उत्सव होता है—लोकतंत्र का उत्सव. हम एक परिवार के रूप में इसमें भाग लेते थे. इस बार हम सिर्फ गवाह हैं. और कुछ नहीं कर सकते हम. यह दर्द देता है.”
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
हरकारा डीप डाइव के एक ऑडियो संस्करण में वरिष्ठ विश्लेषक श्रवण गर्ग के साथ भारत-अमेरिका संबंधों पर विस्तृत बातचीत की गई. इस चर्चा में मुख्य रूप से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा भारत को लेकर की गई अपमानजनक टिप्पणी और भारत सरकार की प्रतिक्रिया या कहें, चुप्पी, पर सवाल उठाए गए. ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर माइकल सैवेज की एक टिप्पणी साझा की, जिसमें भारत को “नर्क” कहा गया और भारतीयों को “गैंगस्टर्स विद लैपटॉप्स” जैसे शब्दों से संबोधित किया गया.
पश्चिम बंगाल का 2026 का विधानसभा चुनाव अब सिर्फ एक राज्य की सत्ता का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे देश की राजनीति और लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला एक निर्णायक ‘कुरुक्षेत्र’ बन चुका है. ‘हरकारा डीप डाइव’ पर ऑडियो पॉडकास्ट में, वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने इस चुनाव के उन अनछुए पहलुओं पर रोशनी डाली, जो इसे आज़ाद भारत के सबसे जटिल और अभूतपूर्व चुनावों में से एक बनाते हैं. वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग इस चुनाव की तुलना ‘प्लासी के युद्ध’ से करते हैं. उनका मानना है कि बंगाल में जिस तरह से ‘मीर जाफरों’ और ‘जगत सेठों’ की तलाश की गई है, वह अभूतपूर्व है. ममता बनर्जी के खिलाफ इस बार भयंकर सत्ता विरोधी लहर है. 2021 के मुकाबले इस बार भाजपा ने हिंदू वोटों की नाराज़गी को और गहरा किया है, वहीं 30% वाले मुस्लिम वोट बैंक में भी दरार डालने की कोशिश की है.
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.


हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में हमने पत्रकार सुमित झा से गहन बातचीत की, जिन्होंने तेलंगाना के जातिगत सर्वे से उजागर हुई असमानताओं पर साउथ फर्स्ट में विस्तृत लेखों की श्रृंखला लिखी है. तेलंगाना का 2024 का जाति सर्वे, एक ऐसा सर्वे जो सिर्फ आंकड़े नहीं देता, बल्कि समाज की छुपी परतों को उधेड़ कर सामने रखता है. बातचीत में यह समझने की कोशिश की गई कि क्या सच में हम जाति से आगे बढ़ चुके हैं, या जाति आज भी हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी को चुपचाप नियंत्रित कर रही है.
सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य के स्तर पर अब भी पीछे हैं. इलाज के लिए क़र्ज़ लेना, असंगठित काम में फंसा रहना, और बुनियादी सुविधाओं की कमी, ये सब सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि जीवन की कठोर सच्चाइयां हैं. वहीं दूसरी तरफ, सरकारी योजनाओं का बड़ा हिस्सा उन वर्गों तक पहुंच रहा है जो पहले से ही अपेक्षाकृत मज़बूत हैं.