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इसरो का निजीकरण: वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता पर हमला और नव-उपनिवेशवाद की ओर कदम?
‘कॉउंटरकरंट्स’ में डॉ. अरुण मित्रा लिखते हैं कि भारत की स्वतंत्रता का अर्थ केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं था. स्वतंत्रता आंदोलन का सपना ऐसा भारत बनाना था जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो, अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताएं विकसित कर सके, विश्व राजनीति में स्वतंत्र निर्णय ले सके, सभी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे और साम्राज्यवाद तथा युद्ध के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करे.
गदर आंदोलन, क्रांतिकारी आंदोलनों, कम्युनिस्ट धारा तथा गांधी और नेहरू की राजनीतिक सोच जैसी स्वतंत्रता आंदोलन की विभिन्न धाराओं ने अपने-अपने तरीके से भारतीय स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के विचार को विकसित किया. आजादी के बाद इसी दृष्टि ने देश की आर्थिक, औद्योगिक और वैज्ञानिक नीतियों को दिशा दी.
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श्रवण गर्ग | राहुल गांधी छात्रों की बात सुन रहे हैं, मोदी को संवाद की भाषा बदलनी होगी
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं श्रवण गर्ग के साथ बातचीत में देश की राजनीति में उभरते एक महत्वपूर्ण बदलाव पर चर्चा हुई. सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी छात्रों और युवाओं के बीच अपनी नई राजनीतिक जगह बना रहे हैं और क्या नरेंद्र मोदी की राजनीति का पारंपरिक सामाजिक आधार अब उनसे सवाल पूछने लगा है.
दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में राहुल गांधी के कार्यक्रम और नरेंद्र मोदी के भाषणों की तुलना करते हुए श्रवण गर्ग ने कहा कि दोनों नेताओं की राजनीतिक भाषा में बड़ा अंतर दिखाई देता है. राहुल गांधी छात्रों के बीच जाकर उनकी बातें सुनने, उनके सवालों को समझने और उनके साथ संवाद करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में छात्रों और युवाओं को लेकर आक्रामकता तथा राजनीतिक आरोप अधिक दिखाई देते हैं. श्रीराम कॉलेज के मंच से मोदी द्वारा “दिमागी नक्सल” जैसे शब्दों का इस्तेमाल इसी बदलाव का संकेत माना गया.
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दिल्ली एसआईआर: 70 में से 68 विधानसभा सीटों पर निष्कासित मतदाताओं की संख्या 2025 के जीत के अंतर से अधिक
एक रिपोर्ट के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद मतदाता सूची के मसौदे में निष्कासित (बाहर किए गए) मतदाताओं की संख्या 2025 के चुनावों में दिल्ली की 70 में से 68 विधानसभा सीटों पर जीत के अंतर से अधिक हो गई है.
'वोटर अधिकार मंच' द्वारा भारत निर्वाचन आयोग और दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा प्रकाशित रिकॉर्ड के आधार पर किए गए अध्ययन में कहा गया है कि जब दिल्ली विधानसभा चुनाव आयोजित हुए थे, तब 31 जनवरी 2025 को शहर की मतदाता सूची में 1,56,14,000 मतदाता थे. 30 जून 2026 तक, जब एसआईआर शुरू हुआ, मतदाता सूची में 1,45,10,299 मतदाता रह गए थे.
सब्र इंस्टीट्यूट और वोटर अधिकार मंच के ऑडिट के अनुसार, एसआईआर के दौरान, निर्वाचन आयोग ने 47,27,762 अतिरिक्त मतदाताओं को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट (एएसडीडी) के रूप में चिह्नित किया, जो कि एसआईआर आधार का 32.8 प्रतिशत या लगभग हर तीन में से एक मतदाता है.
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पिछले दिनों 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को कांग्रेस से 7 गुणा अधिक चंदा मिला, 1,473 करोड़ रुपये
भारत निर्वाचन आयोग को सौंपे गए दस्तावेजों के अनुसार, पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों के पिछले दौर के दौरान भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय पार्टी मुख्यालय ने 1,472.8 करोड़ रुपये की शुद्ध प्राप्तियां दर्ज कीं. इसके विपरीत, सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने 15 मार्च से 6 मई की अवधि के दौरान पांच राज्यों के लिए अपनी समेकित व्यय रिपोर्ट में 207.17 करोड़ रुपये की शुद्ध प्राप्ति और 248.55 करोड़ रुपये व्यय की सूचना दी — जो भगवा दल की तुलना में सात गुणा कम है.
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा चुनाव समाप्त होने के बाद शुरुआत की तुलना में काफी अधिक धन के साथ उभरी. 15 मार्च, 2026 को 6,722.6 करोड़ रुपये की तुलना में 6 मई, 2026 को चुनाव पूरा होने पर इसका अंतिम शेष (क्लोजिंग बैलेंस) 7,627.2 करोड़ रुपये था. असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में पार्टी के केंद्रीय मुख्यालय और संबंधित राज्य व जिला इकाइयों सहित पार्टी का कुल खर्च 160 करोड़ रुपये रहा. इसमें से लगभग 130.4 करोड़ रुपये पार्टी के प्रचार पर खर्च किए गए, जबकि नियमों के तहत आवश्यक अनुसार, 29.6 करोड़ रुपये उम्मीदवारों को एकमुश्त भुगतान के रूप में और उनके आपराधिक इतिहास के प्रचार के लिए दिए गए.
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एसआईआर: नाम की स्पेलिंग में गलती पर भारत रत्न सम्मानित वैज्ञानिक सीएनआर राव को नोटिस
भारत रत्न से सम्मानित वैज्ञानिक सीएनआर राव को कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान पहचान साबित करने के लिए नोटिस भेजे जाने की रिपोर्ट सामने आई है. ‘द हिंदू’ के अनुसार, उनके नाम की स्पेलिंग में अंतर मिलने के बाद यह नोटिस जारी किया गया.
रिपोर्ट के मुताबिक, पुरानी मतदाता सूची में उनका नाम “प्रोफ सीएनआर राव” दर्ज था, जबकि नई सूची में इसे “प्रोफ्फ सीएनआर राव” लिखा गया. पेशेवर उपाधि में अतिरिक्त “एफ” को चुनाव आयोग ने “सेल्फ मिसमैच” की श्रेणी में रखा.
यह वह श्रेणी है जिसमें मतदाता द्वारा भरे गए गणना फॉर्म और 2002 की मतदाता सूची में दर्ज विवरण के बीच अंतर पाया जाता है. इसके अलावा माता-पिता के नाम में अंतर, माता-पिता और बच्चों के बीच कम उम्र का अंतर या माता-पिता के छह से अधिक बच्चों का दर्ज होना भी “तार्किक विसंगति” के तौर पर चिह्नित किया जा सकता है.
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महाराष्ट्र एसआईआर: अधिक मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर 30% मतदाताओं के नाम हटे
‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, के मुताबिक, महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर नई रिपोर्ट सामने आई है. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की 38 विधानसभा सीटों पर लगभग 30% मतदाताओं के नाम प्रारंभिक मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं. इन सीटों पर मुस्लिम आबादी 20% से अधिक है.
इन 38 विधानसभा क्षेत्रों में 37 लाख से अधिक मतदाताओं के गणना प्रपत्र “एकत्र नहीं किए जा सके” की श्रेणी में दर्ज किए गए हैं. यह पिछले मतदाता आधार का 29.7% है. पूरे महाराष्ट्र में प्रारंभिक मतदाता सूची से बाहर किए गए मतदाताओं का औसत 21.1% है, जो दो करोड़ से अधिक लोगों के बराबर है.
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प्रताप भानु मेहता | भागवत से सवाल और उनके बयानों पर बहस खत्म करने का आसान रास्ता
'द इंडियन एक्सप्रेस' में प्रताप भानु मेहता ने लिखा है कि मोहन भागवत की पश्चिमी देशों की यात्रा और न्यूयॉर्क में दिए गए बयानों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. उनके आलोचकों का कहना है कि समावेशी भाषा और यह दावा कि “जो हिंदू मानता है कि मुसलमानों को भारत में नहीं रहना चाहिए, वह हिंदू नहीं रह जाता”, महज दिखावा है. वहीं, भागवत के समर्थकों के बीच भी मतभेद हैं. कुछ लोग इसे आरएसएस की वास्तविक उदारता बताते हैं, तो कुछ को लगता है कि भागवत अपनी ही विचारधारा से दूर जाते हुए उदारवादी भाषा बोल रहे हैं. कुछ अन्य इसे आरएसएस के नफरत से मानवतावाद की ओर बढ़ने का संकेत मान रहे हैं.
लेकिन भागवत के न्यूयॉर्क वाले बयानों में नया कुछ नहीं है. वह पिछले कई वर्षों से इसी तरह की बातें कहते रहे हैं. 2021 में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के एक कार्यक्रम में भी उन्होंने लगभग यही वाक्य दोहराया था. सवाल यह है कि आलोचक और समर्थक दोनों अब इन बयानों पर हैरान क्यों हैं. यह भी विडंबना है कि आरएसएस प्रमुख की बातों को गंभीरता से लेने के लिए उन्हें न्यूयॉर्क जाना पड़ा. इससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह है कि कई पुराने आलोचक इन बयानों को आरएसएस के साथ समझौता करने का अवसर मान रहे हैं.
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के. नारायणन उन्नी | जनगणना के प्रश्नों को लेकर चिंताएं
‘द हिंदू’ में के. नारायणन उन्नी ने लिखा है कि केंद्र सरकार द्वारा 2027 की जनगणना के जनसंख्या गणना चरण के लिए नए प्रश्नों को अधिसूचित किया गया है. अतीत की परंपरा से अलग हटकर, इस बार नागरिकों से कई ऐसे व्यक्तिगत विवरण मांगे जा रहे हैं, जिनका उपयोग नीति-निर्माण या उपयोगी आंकड़े तैयार करने के लिए सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता.
नए प्रश्नों के तहत उत्तरदाताओं से ये जानकारियां मांगी गई हैं: परिवार के प्रत्येक सदस्य के माता-पिता और पति/पत्नी के नाम व विवरण, घोषित राष्ट्रीयता और स्थायी आवासीय पता, कोविड-19 टीकाकरण का स्थान, बैंक खातों की कुल संख्या और पहचान दस्तावेज़ (यदि उपलब्ध हों) मोबाइल नंबर, आधार नंबर, वोटर आईडी नंबर, ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट नंबर.
संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार, जनगणना का मुख्य उद्देश्य देश के सबसे छोटे भौगोलिक स्तर तक जनसांख्यिकीय, आर्थिक और सामाजिक आंकड़े तैयार करना है, ताकि सरकार और समाज इसका उपयोग योजना निर्माण में कर सकें.
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मणिपुर नागा संगठन ने राजमार्ग नाकाबंदी तेज़ करने की घोषणा की
मणिपुर में नागा समुदायों की शीर्ष संस्था, यूनाइटेड नागा काउंसिल (यूएनसी) ने कहा है कि वह बुधवार (9 सितंबर 2026) को राज्य भर के प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों पर अपनी अंतर-ज़िला आर्थिक नाकाबंदी को और तेज़ करेगी.
‘द हिंदू ब्यूरो’ के मुताबिक, यह निर्णय 2 सितंबर को उखरुल में आयोजित यूएनसी की आपातकालीन प्रेसिडेंशियल काउंसिल की बैठक के बाद आया, जहाँ उसकी मुख्य मांगों पर सरकार के रुख की समीक्षा की गई थी. यूएनसी ने कहा कि आर्थिक नाकाबंदी को तेज़ करना वाजिब है क्योंकि सरकार 13 मई को कांगपोकपी ज़िले के लेइलोन वाइफेई गाँव से अगवा किए गए और मारे गए छह लियांगमई नागा नागरिकों के परिवारों को न्याय दिलाने में विफल रही. संगठन की मांगों में छह नागाओं की हत्या में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई और कुकी सशस्त्र समूहों से सांठगांठ का आरोप झेल रही उप-मुख्यमंत्री नेमचा किपगेन को हटाने की मांग शामिल है.
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प्रभात पटनायक | हाथ की सफाई का खेल
अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के ऐतिहासिक महत्व और हाल ही में इसके स्थान पर लाए गए नए कानून ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी वीबी-जी राम जी के प्रभावों की आलोचनात्मक समीक्षा की है.
उनका कहना है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) स्वतंत्रता के बाद का एक ऐतिहासिक कानून था. इसने भारतीय संविधान की एक बड़ी कमी को दूर किया, जिसने नागरिकों को राजनीतिक अधिकार तो दिए थे लेकिन कोई मौलिक आर्थिक अधिकार नहीं दिया था. मनरेगा ने प्रत्येक ग्रामीण परिवार को प्रति वर्ष 100 दिनों के अकुशल रोजगार की गारंटी दी. यदि मांग के 15 दिनों के भीतर काम नहीं दिया जाता था, तो आवेदक को बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार था. यह योजना सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) थी और किसी विशेष वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं थी. कोरोना महामारी जैसे विपत्ति के दौर में, जब लाखों प्रवासी मजदूर शहरों से गांवों की ओर लौटे, तब मनरेगा उनके लिए आजीविका का सबसे बड़ा सहारा बनी.
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आकार पटेल | 9/11 के पार 11 सितंबर के हमलों की 25वीं बरसी जल्द ही हमारे सामने होगी
अमेरिकी शोक मनाएँगे, और किसी दूसरे युद्ध के चलते उन पर थोपी गईं पेट्रोल की ऊँची क़ीमतों के बारे में शिकायत करने के लिए भी समय निकालेंगे. अमेरिकी मीडिया की पड़ताल करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि विदेशों में उसकी सैन्य शक्ति पर संयम का प्रमुख कारक उसकी मतदान करने वाली आबादी की नैतिकता नहीं है. निश्चित रूप से, यह उन लोगों की नैतिकता भी नहीं है जो इस पर शासन करते हैं. सबसे महत्वपूर्ण विचार—और शायद एकमात्र विचार—जब अमेरिकी विमानवाहक पोत दूर-दराज़ के देशों में बमबारी करने और दूसरों को मारने के लिए जाते हैं, तो यह होता है कि अमेरिकियों पर इसका कोई नकारात्मक असर न पड़े.
वेनेज़ुएला के तेल पर क़ब्ज़ा करना, जहाँ आक्रमण के साथ-साथ लूटपाट भी होती है, एक आदर्श स्थिति है; ईरान के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाइयों से पैदा होने वाली महँगाई की परेशानी नहीं.
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जीडीपी आंकड़ों की समीक्षा करने वाले पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग कौन हैं?
इस सप्ताह के शुरू में (31 अगस्त) भारत की पहली तिमाही (क्वार्टर-1) के जीडीपी वृद्धि आंकड़े जारी होने के बाद, पूर्व वरिष्ठ सरकारी अधिकारी सुभाष चंद्र गर्ग खुद को इन आंकड़ों को लेकर छिड़ी एक जोरदार बहस के केंद्र में पा रहे हैं.
यह क्यों महत्वपूर्ण है
एक टीवी चैनल (एनडीटीवी) को दिए गए एक साक्षात्कार में, जो काफी वायरल हुआ है, वित्त मंत्रालय के इस पूर्व शीर्ष नौकरशाह ने भारत की 7.8% आर्थिक वृद्धि दर पर सवाल उठाए हैं, जिसने उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया था.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'काउन्टरकरंट्स' में डॉ. अरुण मित्रा का लेख: इसरो में निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका, वैज्ञानिक संप्रभुता और देश की रणनीतिक स्वायत्तता पर उठते बड़े सवाल.
'हरकारा डीप डाइव': निधीश त्यागी और श्रवण गर्ग की बातचीत; राहुल गांधी की युवा राजनीति, पीएम मोदी के भाषणों और भाजपा के सामाजिक आधार में बदलाव का विश्लेषण.
'वोटर अधिकार मंच' की रिपोर्ट: दिल्ली एसआईआर में 47 लाख से अधिक मतदाता चिह्नित; योगेंद्र यादव और अंजलि भारद्वाज ने उठाए सवाल.
'द टाइम्स ऑफ इंडिया' व 'पीटीआई' रिपोर्ट: पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के पास 1,472.8 करोड़ की शुद्ध प्राप्ति, कांग्रेस की तुलना में 7 गुना अधिक धन.
'द इंडियन एक्सप्रेस' रिपोर्ट: महाराष्ट्र में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से 38 मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों पर 30% मतदाताओं के नाम हटे; विपक्षी दलों की बढ़ी चिंताएं.
'द हिन्दू' रिपोर्ट: भारत रत्न सीएनआर राव को मतदाता सूची में नाम में गड़बड़ी पर नोटिस भेजा गया; कर्नाटक SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल.
'द इंडियन एक्सप्रेस' में प्रताप भानु मेहता का विश्लेषणात्मक लेख: मोहन भागवत के समावेशी बयानों की वास्तविकता, आरएसएस की चुनौतियां और मोदी सरकार के आचरण पर तीखे सवाल.
'द हिन्दू' में सांख्यिकीविद के. नारायणन उन्नी का लेख: 2027 की जनगणना की नई प्रश्नावली पर सवाल, नागरिकता व पहचान संबंधी प्रश्नों से डेटा सुरक्षा पर संकट.
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दिल्ली के दक्षिण परिसर के पास सत्यनिकेतन में इमारत गिरने से हुई छात्रों की मौत ने देश की शिक्षा व्यवस्था, भवन सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. हादसे के बाद राहत और बचाव कार्य में देरी से लेकर छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती आवास की कमी तक, इस घटना ने कई व्यवस्थागत खामियों को उजागर किया है. हरकारा डीप डाइव में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ इसी मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत में यह सवाल उठाया गया कि दिल्ली विश्वविद्यालय और देश के अन्य विश्वविद्यालयों में लगातार छात्रों की संख्या और कोर्स बढ़ रहे हैं, लेकिन उनके रहने, पढ़ने और सुरक्षित वातावरण की व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही है. प्रोफेसर अपूर्वानंद ने सत्यनिकेतन हादसे को केवल एक इमारत गिरने की घटना नहीं, बल्कि छात्रों की लगातार उपेक्षा का प्रतीक बताया. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों के आसपास अनियोजित निर्माण, महंगे किराए, असुरक्षित कमरे और कमजोर निगरानी छात्रों को जोखिम में डाल रहे हैं. चर्चा में दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया में हॉस्टल की कमी, छात्रों के लिए हाउसिंग पॉलिसी, निजी मकान मालिकों की मनमानी, फायर सेफ्टी मानकों और भवनों के नियमित निरीक्षण जैसे मुद्दे भी शामिल रहे. क्या विश्वविद्यालयों को सीटें और कोर्स बढ़ाने से पहले छात्रों के आवास और सुरक्षा की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए? क्या हादसे के बाद अधिकारियों को केवल डांटना पर्याप्त है? और क्या सरकार, नगर निगम, विश्वविद्यालय प्रशासन तथा मकान मालिकों की जवाबदेही तय होगी? देखिए हरकारा डीप डाइव का यह महत्वपूर्ण एपिसोड. #Harkara #HarkaraDeepDive #निधीशत्यागी #अपूर्वानंद #SatyamNiketan #DelhiUniversity #StudentSafety #EducationSystem #HostelCrisis #StudentHousing #DelhiNews #PoliticalAnalysis
‘कड़वी कॉफी’ की इस कड़ी में प्रो. अपूर्वानंद और शुद्धव्रत सेनगुप्ता के साथ वंदे मातरम को लेकर जारी विवाद पर विस्तार से बातचीत. क्या वंदे मातरम के पूरे छंद गाना अनिवार्य होना चाहिए? इस गीत का मूल साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ क्या है? आनंदमठ में इसका अर्थ कैसे बदलता है? और क्या किसी नागरिक को देशभक्ति की एक तय अभिव्यक्ति के लिए बाध्य किया जा सकता है? बातचीत में शुद्धव्रत सेनगुप्ता वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों और बाद के छंदों के बीच के अंतर, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे धार्मिक प्रतीकों, तथा ब्रह्म समाज और आर्य समाज जैसी परंपराओं की आपत्तियों पर चर्चा करते हैं. साथ ही आनंदमठ के मुसलमान विरोधी संदर्भ, संन्यासी-फकीर विद्रोह के इतिहास और 1937 में कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति के निर्णय को भी समझने की कोशिश की जाती है. रविंद्रनाथ टैगोर की रचनाओं, राष्ट्रवाद और हिंदू जातीयतावाद पर उनकी आलोचनात्मक दृष्टि के साथ बातचीत नागरिक स्वतंत्रता के सवाल तक पहुंचती है. बीजू इमैनुएल मामले का उदाहरण देते हुए यह सवाल उठाया जाता है कि यदि कोई नागरिक शांतिपूर्वक रहे और किसी राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान में बाधा न डाले, तो क्या उसे गाने के लिए बाध्य किया जा सकता है? “आप मुझे किसी से प्रेम करने के लिए बाध्य कैसे कर सकते हैं?” क्या देशभक्ति की अभिव्यक्ति का तरीका भी राज्य तय करेगा? वंदे मातरम पर जारी बहस के बहाने इतिहास, धर्म, राष्ट्रवाद और नागरिक स्वतंत्रता के इन सवालों को समझने के लिए पूरी बातचीत सुनिए. #कड़वीकॉफी #वंदेमातरम #राष्ट्रवाद #नागरिकस्वतंत्रता #आनंदमठ #इतिहास #अपूर्वानंद #शुद्धव्रतसेनगुप्ता #Harkara
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
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हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


हरकारा डीप डाइव के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग चर्चा कर रहे हैं. राहुल गांधी के छात्र संवाद और मोदी के ‘सच की गूंज’ वाले पलटवार के बीच सियासी बहस किस दिशा में जा रही है? छात्रों के मुद्दे, रोजगार और विपक्ष की रणनीति पर. आज रात 9 बजे