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8 साल में 84 हजार से ज्यादा स्कूल कम हुए, सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी घटी
‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ के मुताबिक, देश में पिछले आठ वर्षों के दौरान स्कूलों की संख्या में 84 हजार से अधिक की कमी दर्ज की गई है. यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2018-19 में देश में 15.5 लाख स्कूल थे, जो 2025-26 में घटकर 14.6 लाख रह गए. इस दौरान छात्र नामांकन में गिरावट आई है और सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी भी कम हुई है, जबकि निजी स्कूलों की संख्या और हिस्सेदारी बढ़ी है.
'कॉकरोच जनता पार्टी' के 'स्कूल ठीक करो' अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की जर्जर होती स्थिति की ओर ध्यान खींचा है. अभियान में स्कूलों के बुनियादी ढांचे की कमी, शिक्षकों की कमी, घटते नामांकन, डिजिटल सुविधाओं के अभाव और निजी संस्थानों पर बढ़ती निर्भरता जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए गए हैं.
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राजेंद्र यादव | मोदी का शासन: प्रशासनिक प्रदर्शन से ज्यादा राजनीतिक छवि पर जोर
'वंदे मातरम्' विवाद भाजपा सरकार के लिए सुर्खियां बटोरने और राजनीतिक विमर्श को दूसरी दिशा में मोड़ने से ज्यादा कुछ नहीं है. पहले राष्ट्रीय ध्वज के रंगों को लेकर विवाद खड़ा हुआ और अब 'वंदे मातरम्' के गायन को लेकर बहस शुरू हो गई है. यह भाजपा की ओर से चल रहे नागरिक प्रदर्शनों और सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति के सामने आने से ध्यान हटाने की एक स्पष्ट कोशिश है.
हाल के विरोध प्रदर्शनों की सबसे खास बात यह है कि प्राथमिक स्तर से लेकर आगे की कक्षाओं तक की युवा छात्राएं इसमें आगे आ रही हैं. इसके बावजूद भाजपा सरकार ने इन मुद्दों पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया, यहां तक कि माफी तक नहीं मांगी.
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श्रवण गर्ग | राहुल गांधी ने अमित शाह को जनता की नजर में खलनायक बना दिया
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधिश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ इस सवाल पर विस्तार से चर्चा की कि आखिर राहुल गांधी लगातार गृह मंत्री अमित शाह को अपने निशाने पर क्यों ले रहे हैं. जंतर-मंतर से शुरू हुई "छात्रों की गूंज" और जेन जी से जुड़े आंदोलन को क्या सिर्फ छात्रों के मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए, या इसके पीछे भारतीय राजनीति की कहीं बड़ी लड़ाई चल रही है?
श्रवण गर्ग का तर्क है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल छात्रों के साथ हुए कथित अन्याय या किसी एक घटना तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता. उनके मुताबिक, यह लड़ाई भारत के राजनीतिक भविष्य और सत्ता के मौजूदा समीकरणों से जुड़ चुकी है. खास तौर पर अमित शाह की बढ़ती बेचैनी को वे इसी बड़े राजनीतिक संदर्भ में देखते हैं.
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‘पहले से तय नाकामी’: क्या मोदी सरकार अपनी ही जाति जनगणना को कमजोर कर रही है?
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, अप्रैल 2025 में मोदी सरकार ने बड़ा यू-टर्न लेते हुए घोषणा की कि भारत की अगली जनगणना में जातियों की गणना भी की जाएगी. उस समय सरकार ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि अधिकांश राजनीतिक दल जाति जनगणना चाहते थे, लेकिन तत्कालीन सरकार ने जनगणना की जगह सामाजिक-आर्थिक एवं जाति सर्वेक्षण कराया. अब एक साल बाद मोदी सरकार ने जाति गणना के लिए उसी तरह की प्रक्रिया अपनाने का फैसला किया है, जिसने 2011 में भारी अव्यवस्था पैदा की थी. इसी वजह से सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार की अपनी जाति जनगणना को ही “फेल होने के लिए डिजाइन” किया जा रहा है.
जनसंख्या गणना का चरण जल्द शुरू होगा और 1931 के बाद पहली बार जाति को आधिकारिक जनगणना का हिस्सा बनाया जाएगा. गणनाकर्मी पहले यह पूछेंगे कि व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से है या नहीं.
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हिंदुत्व और बुलडोजर ‘नए भारत’ में एक-दूसरे को आकार दे रहे हैं, बढ़ावा दे रहे हैं और एक-दूसरे के साथ फल-फूल रहे हैं
‘द प्रिंट’ में ब्रह्म प्रकाश ने लिखा है कि हिंदुत्व मात्र एक विचार या दर्शन नहीं है, बल्कि यह एक ठोस रूप और आकृति धारण कर चुका है. यह सवाल उठाता है कि इस विचारधारा की शारीरिक या प्रतीकात्मक छवि क्या हो सकती है—क्या यह कोई मनुष्य है, कोई ज़ोंबी है, या फिर कोई विनाशकारी मशीन है? हिंदुत्व के इस शक्तिशाली पुनरुत्थान के दौर में इसके परतदार अर्थों, इसकी अनियंत्रित और विनाशकारी शक्ति, तथा इसकी पुरुषवादी ताक़त को दर्शाने वाली एक ऐसी छवि की आवश्यकता महसूस होती है, जो समाज में बिना किसी विरोध के बहुसंख्यकवादी रास्ते को साफ कर सके.
यह एक ऐसी कलाकृति या प्रतीक की तलाश है, जो सौंदर्यशास्त्र और संवेदनहीनता (एनेस्थीसिया) को एक साथ लाकर जनता में डर और नफरत पैदा करती है.
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संजय बारू | खुद के भीतर झांकें
‘द टेलीग्राफ’ में संजय बारू ने लिखा है कि जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'अच्छे दिन', 'अमृत काल', '5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था' आदि का वादा किया है, उन्होंने चालाकी से ध्यान भविष्य पर केंद्रित रखा है और हुई प्रगति पर रिपोर्ट देने की परवाह नहीं की है. बारू के अनुसार, इस बार उनके स्वतंत्रता दिवस भाषण का सकारात्मक पहलू यह स्वीकारोक्ति है कि सरकार का असली काम विदेशों में झप्पियां पाने या पुरस्कार बटोरने के बजाय अपने देश के भीतर काम करना है. वैश्विक वातावरण प्रतिकूल हो चुका है और भारत तभी मजबूत हो सकता है जब वह अपनी आंतरिक जड़ों को सींचे. राष्ट्रीय शक्ति की असल नींव घरेलू स्थिरता, सामाजिक एकता, और देश की आंतरिक क्षमताओं में निवेश करने से ही मजबूत होती है.
वह लिखते हैं कि वर्ष 2026 के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण की सबसे अनूठी विशेषता मुख्यधारा के प्रिंट मीडिया में उसकी कम उपस्थिति रही. अधिकांश प्रमुख समाचार पत्रों के पहले पन्ने के ऊपरी हिस्से से यह भाषण लगभग नदारद था.
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भारत के न्यूज़ चैनलों पर ‘सच्चाई से बहुत दूर’ खबरें दिखाई जाती हैं, रात जितनी ढलती है, शो उतने ही बेकाबू होते जाते हैं: सर्जियो गोर
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा है कि "रात जितनी ढलती है, भारत के न्यूज़ चैनलों के शो उतने ही अजीब और बेकाबू होते जाते हैं." भारतीय चैनलों पर दिखाई जाने वाली कुछ खबरें अमेरिका की 'फेक न्यूज़' की समस्या को भी पीछे छोड़ देती हैं, उन्होंने कहा.
‘टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक, गोर नई दिल्ली में एक वित्तीय समाचार पत्र द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे. उन्होंने कहा, "मुझे घर लौटकर भारतीय टीवी न्यूज़ शो देखना बहुत पसंद है. रात जितनी ढलती है, शो उतने ही बेकाबू होते जाते हैं. शाम 6 बजे शो में आठ लोग बहस कर रहे होते हैं. रात 10 बजे, 12 लोग होते हैं जो एक ही समय में बोल रहे होते हैं और आप वास्तव में किसी एक को भी ठीक से नहीं सुन पाते हैं."
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छिंदवाड़ा के बाद अब महाराष्ट्र के सरकारी अस्पताल में आग लगने से तीन नवजात शिशुओं की मौत
महाराष्ट्र के अमरावती स्थित जिला महिला अस्पताल की विशेष नवजात देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में सोमवार (24 अगस्त 2026) की तड़के 3:30 बजे अचानक आग लग गई. तीसरी मंज़िल पर एक वेंटिलेटर में विस्फोट होने के कारण यह हादसा हुआ, जिसमें गंभीर रूप से झुलसने और धुएँ में दम घुटने से 3 नवजात शिशुओं की दुखद मौत हो गई.
योहान वर्गीस के अनुसार, हादसे के समय वार्ड में कुल 39 नवजात शिशु भर्ती थे. घटना के तुरंत बाद अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ ने त्वरित बचाव अभियान चलाते हुए चिकित्सा उपकरणों को हटाकर 6 शिशुओं को सुरक्षित बाहर निकाला तथा 10-15 मिनट में आग पर काबू पा लिया.
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अपूर्वानंद | दिमागी गुंडागर्दी
राजस्थान के रामपुरा-कंवरपुरा गांव में गुंडों ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के कार्यकर्ताओं पर हमला कर दिया. उन्होंने उन पर पथराव किया, मारपीट की और उनकी गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए.
राजस्थान के शिक्षा मंत्री ने इस हिंसा का बचाव करते हुए कहा कि गुंडे सीजेपी कार्यकर्ताओं से इसलिए नाराज थे, क्योंकि स्कूल का निरीक्षण करने के नाम पर वे बच्चों की पढ़ाई में बाधा डाल रहे थे. वे यहीं नहीं रुके, उन्होंने गुंडों को बधाई तक दे डाली. स्थानीय विधायक ने इस बात से इनकार किया कि गुंडों का बीजेपी से कोई संबंध था. लेकिन जब वे यह कह रहे थे, तब एक गुंडा उनके ठीक पीछे खड़ा था.
पश्चिम बंगाल में, पिछले सप्ताह लगातार तीन दिनों तक गुंडों ने जादवपुर विश्वविद्यालय पर हमला किया. एक आरोप यह है कि वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े थे.
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8.7 करोड़ भारतीय युवा न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न नौकरी और न ही प्रशिक्षण ले रहे हैं: नीति आयोग
नीति आयोग की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 8.7 करोड़ भारतीय युवा न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न नौकरी और न ही किसी प्रशिक्षण में शामिल हैं. यानी फोकट हैं. रिपोर्ट में रियायती प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देने, स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने और इन्हें स्थानीय मांग व उभरते क्षेत्रों के अनुकूल बनाने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया गया है.
'Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में आयोग ने बताया कि यह अनुमान 2021 में आयोजित राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) के 78वें दौर के आंकड़ों पर आधारित है.
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आकार पटेल : धर्मांतरण की उलझन
इस हफ़्ते की हेडलाइन: "पुणे पुलिस ने 2 मामलों से धर्मांतरण क़ानून के प्रावधान वापस लिए, अधिकारियों को पता चला कि अधिनियम अभी लागू नहीं हुआ है." हमारे हमेशा सतर्क रहने वाले क़ानून लागू करने वालों ने न केवल पिछले क़ानूनों की समस्याओं को सुलझा लिया है बल्कि भविष्य के क़ानूनों की भी. जिस नए क़ानून का ज़िक्र किया गया है वह अब लागू हो चुका है और यह उन तोहफ़ों में से एक है जो बीजेपी ने 2018 से भारत को दिए हैं, जब ऐसा पहला क़ानून उत्तराखंड में लागू हुआ था. धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता भारत में एक मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25) होने के साथ-साथ एक आपराधिक कृत्य भी है. इससे कुछ लोग उलझन में पड़ सकते हैं कि हम असल में
क्या करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन लोकतंत्र की माँ समझदार है और जानती है कि अपने बच्चों को नियंत्रण में कैसे रखना है. मैं पहले भी इन क़ानूनों की विशिष्ट समस्याओं के बारे में यहाँ लिख चुका हूँ, और मैं उन्हें दोहराऊँगा नहीं. लेकिन हमें इस बात पर नज़र डालनी चाहिए कि असल में वह कौन सी समस्या है जिसे ये क़ानून हल करने की कोशिश कर रहे हैं. भारत में धर्मांतरण कितना बड़ा मुद्दा है?
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'बिज़नेस स्टैंडर्ड' की विस्तृत रिपोर्ट: देश में 84 हजार स्कूल बंद, यूडीआईएसई के आंकड़ों और 'कॉकरोच जनता पार्टी' के अभियानों के बीच निजी स्कूलों पर बढ़ती निर्भरता का विश्लेषण.
'राजेंद्र यादव' का विस्तृत विश्लेषण: उत्तर प्रदेश में बंद होते सरकारी स्कूल, जेवर एयरपोर्ट-गंगा एक्सप्रेसवे विवाद और मोदी सरकार की विदेश नीति पर बड़ा सवाल.
'हरकारा डीप डाइव' में श्रवण गर्ग का विश्लेषण: राहुल गांधी द्वारा अमित शाह को निशाना बनाने के पीछे की बड़ी राजनीतिक रणनीति, 2027 और 2029 के सत्ता समीकरणों का गणित.
'स्क्रोल' की विस्तृत रिपोर्ट: मोदी सरकार द्वारा 2026 में 1931 के बाद पहली बार जाति जनगणना का फैसला, लेकिन पुरानी प्रक्रिया के कारण 'प्लांड फेलियर' की आशंका पर विश्लेषण.
'ब्रह्म प्रकाश' का विस्तृत विश्लेषण: 'द प्रिंट' में प्रकाशित लेख के जरिए जानिए कैसे बुलडोजर आज हिंदुत्ववादी राजनीति, नवउदारवाद और बहुसंख्यकवाद का नया प्रतीक बन चुका है.
'संजय बारू' का विस्तृत विश्लेषण: स्वतंत्रता दिवस 2026 के प्रधानमंत्री मोदी के भाषण, 'दिमागी नक्सल' विवाद और अर्थव्यवस्था की जमीनी सच्चाई.
'टेलीग्राफ वेब डेस्क' की रिपोर्ट: अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भारतीय टीवी न्यूज़ शो के बेकाबू होने और अमेरिका से ज्यादा 'फेक न्यूज़' का दावा कर खड़ा किया नया विवाद.
'योहान वर्गीस' की रिपोर्ट: अमरावती के जिला महिला अस्पताल में वेंटिलेटर विस्फोट के बाद एसएनसीयू में लगी आग, तीन नवजात बच्चों की दर्दनाक मौत.
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हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद हुए कथित ‘शुद्धिकरण’ ने जाति, छुआछूत और हिंदुत्व की राजनीति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. हरकारा डीप डाइव में निधीश त्यागी के साथ सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने इस पूरे मामले की पड़ताल की. भंवर मेघवंशी की प्रमुख किताबें: https://www.amazon.com/s?k=Bhanwar+Meghwanshi&i=digital-text&crid=1IRSVBLX03E2Z&sprefix=bhanwar+meghwanshi%2Cdigital-text%2C279&ref=nb_sb_noss हरकारा - शोर कम, रोशनी ज्यादा.
दिल्ली में राहुल गांधी के धरने से सियासी टकराव एक बार फिर तेज हो गया है. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी संसद मार्ग स्थित डीसीपी ऑफिस के बाहर धरने पर बैठ गए. मामला 20 जुलाई के छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित पैलेट गन से घायल हुए युवक साहिल लोहबच से जुड़ा है. राहुल गांधी की मांग है कि मामले में एफआईआर दर्ज की जाए. उनके साथ पैलेट गन से घायल छात्र साहिल लोहबच, कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा और अन्य नेता भी मौजूद रहे. राहुल गांधी का आरोप है कि अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई है. वहीं दिल्ली पुलिस का कहना है कि शिकायत ले ली गई है, लेकिन राहुल गांधी इस मामले में शिकायतकर्ता नहीं हैं. तो क्या यह सिर्फ एफआईआर का मामला है या सरकार और विपक्ष के बीच एक बड़े राजनीतिक टकराव की शुरुआत? राहुल गांधी के धरने से क्या सरकार पर दबाव बढ़ेगा? और पैलेट गन मामले की राजनीतिक लड़ाई अब किस दिशा में जाएगी? वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग एवं निधीश त्यागी के साथ देखिए हरकारा डीप डाइव लाइव, जहां होगी इस पूरे घटनाक्रम और इसके राजनीतिक मायनों पर विस्तृत चर्चा. #HarkaraDeepDive #RahulGandhi #RahulGandhiDharna #DelhiPolice #Congress #IndianPolitics
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


PM CARES Fund में करीब ₹8,450 करोड़ जमा हैं, लेकिन 2024-25 में सिर्फ करीब ₹88 लाख खर्च किए गए. आखिर आपदा के लिए बनाए गए इस फंड का पैसा खर्च क्यों नहीं हो रहा? हरकारा डीप डाइव में निधीश त्यागी के साथ RTI और Transparency Activist अंजलि भारद्वाज ने PM CARES Fund, पारदर्शिता, जवाबदेही और फंड के इस्तेमाल से जुड़े अहम सवालों पर बात की. हरकारा - शोर कम, रोशनी ज्यादा.