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जंतर-मंतर और बांकीपुर के बाद भाजपा के लिए परिसीमन अब कम आकर्षक हो सकता है
जंतर-मंतर और बांकीपुर को मिलाकर देखा जाए, तो ये भारतीय जनता पार्टी के लिए जल्द परिसीमन कराने की संभावना को उतना आकर्षक नहीं रहने देते, जितना यह एक समय लगता था. पिछले एक दशक के अधिकांश समय में, भाजपा के पास यह विश्वास करने के पर्याप्त कारण थे कि उसने एक टिकाऊ सामाजिक बहुमत तैयार कर लिया है, जिसमें उत्तर और पश्चिम भारत के बड़े हिस्सों में हिंदू एक वोट बैंक के रूप में काम कर रहे हैं. यदि सामाजिक समूह लंबे समय तक स्थिर मतदान प्राथमिकताएँ दिखाते हैं, तो निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण मौजूदा लाभों को और बढ़ा सकता है.
‘द हिंदू’ में वर्गीज के. जॉर्ज ने लिखा है कि किसी विशेष राजनीतिक परिणाम को साधने के लिए निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं में हेरफेर करना, जिसे आमतौर पर 'जेरीमैंडरिंग' कहा जाता है, ठीक इसी धारणा पर टिका है: कि सामाजिक समूहों की चुनावी वफादारियां पूर्व-अनुमानित होती हैं.
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महिला आरक्षण की 33 प्रतिशत हिस्सेदारी तुरंत लागू करने की मांग को लेकर ‘एनसीडब्ल्यूआर’ का जंतर-मंतर पर प्रदर्शन
नेशनल कोएलिशन फॉर वीमेंस रिजर्वेशन की ओर से जंतर-मंतर पर संयुक्त रैली आयोजित कर संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण तत्काल लागू करने की मांग की गई. गठबंधन ने मांग की कि महिला आरक्षण को परिसीमन और जनगणना से अलग रखा जाए और इसके लागू होने के लिए इन दोनों प्रक्रियाओं को शर्त न बनाया जाए.
‘काउंटरकरंट्स’ के मुताबिक, मूसलाधार बारिश के बावजूद दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और आसपास के राज्यों से सैकड़ों महिलाएं रैली में शामिल हुईं.
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मोदी सरकार ने 5 वर्षों में प्रिंट विज्ञापनों पर ₹910 करोड़ खर्च किए; टीवी को भी जोड़ लें तो रोज़ाना 1.5 करोड़
लोकसभा में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, नरेंद्र मोदी सरकार ने 2020-21 और 2024-25 के बीच प्रिंट मीडिया विज्ञापनों पर 910.4 करोड़ रुपये खर्च किए. यह आंकड़े कांग्रेस सांसद राधाकृष्ण के एक प्रश्न के लिखित उत्तर में प्रस्तुत किए गए.
‘न्यूज़ लॉन्ड्री’ के अनुसार, समाचार पत्रों में, 'टाइम्स ऑफ इंडिया' को पांच साल की अवधि के दौरान सरकारी प्रिंट विज्ञापनों में सबसे अधिक 78.22 करोड़ रुपये मिले, इसके बाद 'दैनिक जागरण' को 59.14 करोड़ रुपये और 'हिंदुस्तान टाइम्स' को 47.80 करोड़ रुपये प्राप्त हुए.
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श्रवण गर्ग | टाइगर हो या नहीं हो परिसीमन बिल जिंदा है
संसद का मानसून सत्र तीन हफ्ते बीतने के बाद भी उस कामकाज तक नहीं पहुंच पाया, जिसकी उम्मीद की जा रही थी. विपक्ष लगातार गृह मंत्री अमित शाह के सदन में आकर 20 जुलाई को बिहार में छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर जवाब देने की मांग कर रहा है. इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सदन में गैरमौजूदगी ने सोमवार से शुरू होने वाले आखिरी तीन दिनों को लेकर सियासी अटकलें तेज कर दी हैं.
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी से बात करते हुए श्रवण गर्ग ने मौजूदा स्थिति को एक फिल्म के क्लाइमेक्स से जोड़ते हुए कहा कि पिछले तीन हफ्ते इंटरवल की तरह रहे, लेकिन अब कहानी निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकती है.
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यूपी में योगी आदित्यनाथ ने मोदी को पीछे छोड़ा, 8 साल में ‘खुद का चेहरा’ चमकाने खर्चे ₹7,000 करोड़
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को दावा किया कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने "कॉस्मेटिक फेशियल" पर ₹7,000 करोड़ खर्च करके एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाया है. बसंत कुमार की रिपोर्ट है कि विज्ञापन पर खर्च के मामले में योगी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पीछे छोड़ दिया है. यूपी सरकार ने 8 सालों में 6,812 करोड़ रुपये खर्च दिए हैं. जहां केंद्र की मोदी सरकार 11 साल में करीब 6 हजार करोड़ खर्च करती है तो वहीं यूपी की योगी सरकार मात्र 8 साल में 7 हजार करोड़ के करीब विज्ञापन पर खर्च कर चुकी है.
'एक्स' पर एक पोस्ट में अखिलेश यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री ने "झूठी छवि को असली के रूप में पेश करने के लिए जनता के टैक्स के पैसे से" ₹7,000 करोड़ से अधिक खर्च कर दिए हैं.
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मई से जुलाई 2026 के बीच भारत में 25 मुसलमानों की हत्या, 15 राज्य एजेंसियों के हाथों, इंडिया परसिक्यूशन ट्रैकर का दावा
‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट है कि दक्षिण एशिया जस्टिस कैंपेन के इंडिया परसिक्यूशन ट्रैकर के अनुसार, मई से जुलाई 2026 के बीच भारत में 25 मुसलमानों की हत्या हुई. इनमें 15 की मौत पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में तथा 10 की हत्या हिंदू चरमपंथी गैर-राज्य तत्वों द्वारा धार्मिक घृणा से प्रेरित हिंसा में किए जाने की बात कही गई है. इसके साथ 2026 के पहले सात महीनों में मुसलमानों की मौत का आंकड़ा 44 पहुंच गया है. इनमें 19 मौतों के लिए राज्य एजेंसियों और 25 के लिए हिंदुत्ववादी हमलावरों को जिम्मेदार बताया गया है. ट्रैकर के अनुसार, 2022 से आंकड़े दर्ज किए जाने के बाद 2026 मुसलमानों के खिलाफ घृणा अपराधों का सबसे घातक वर्ष बन सकता है.
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कनाडा में 40 से अधिक संगठनों और दो सांसदों ने मोहन भागवत का प्रवेश रोकने की मांग की
कनाडा के 40 से अधिक नागरिक समाज, मानवाधिकार, श्रम और धार्मिक संगठनों ने सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री गैरी अनंदसांगरी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत को कनाडा में प्रवेश की अनुमति नहीं देने की मांग की है. इसके साथ ही कनाडा की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसद हीदर मैकफर्सन और जेनी क्वान ने भी सरकार से आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने और भागवत के प्रवेश पर रोक लगाने की अपील की है. भागवत के 31 अगस्त से 1 सितंबर तक कनाडा जाने की संभावना है.
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अयोध्या के राम मंदिर के बाद मुंबई के सिद्धिविनायक में हर साल 18 करोड़ की चोरी: फडणवीस ने दिए जांच के आदेश
अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी के बाद मुंबई के प्रसिद्ध सिद्धिविनायक मंदिर में भी कथित चढ़ावा चोरी का मुद्दा सुर्खियां बटोर रहा है. उत्तरप्रदेश की तरह महाराष्ट्र में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, लिहाजा पार्टी को विपक्ष के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है.
दरअसल, पिछले दिनों महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने सिद्धिविनायक मंदिर में दान (चढ़ावा) की चोरी का आरोप लगाते हुए उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को भेजे गए एक पत्र का हवाला दिया था. ठाकरे का कहना था, "शिंदे को लिखे गए एक पत्र में दावा किया गया है कि मंदिर से हर साल 18 करोड़ रुपये चुराए जा रहे हैं."
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पुष्पेंद्र सिंह | गृह मंत्री अमित शाह को इस्तीफा क्यों देना चाहिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद के मौजूदा सत्र में अब तक हिस्सा नहीं लिया है और 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर भी कोई बयान नहीं दिया है. विपक्ष की ओर से जवाबदेही की मांग के बावजूद दोनों नेताओं की चुप्पी बनी हुई है.
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पुलिस कार्रवाई के लिए सीधे अमित शाह को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि बल प्रयोग की अनुमति केवल गृह मंत्री या प्रधानमंत्री दे सकते हैं. बाद में उन्होंने शाह से जिम्मेदारी स्वीकार करने और इस्तीफा देने की मांग की.
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बिहार के झटके के बाद, अगड़ी जातियों का असंतोष उत्तर प्रदेश में भाजपा को नुकसान पहुँचाएगा?
बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद पार्टी के भीतर उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर चिंताएँ गहरी हो गई हैं. भाजपा के पारंपरिक और सबसे मजबूत वोट बैंक—उच्च जातियों (विशेष रूप से ब्राह्मण और ठाकुर)—के बीच पनप रहे असंतोष को इस हार का मुख्य कारण माना जा रहा है. पार्टी के शीर्ष रणनीतिकारों को डर है कि यदि इस असंतोष को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो 2027 के उत्तर प्रदेश चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को बड़ा राजनीतिक नुकसान झेलना पड़ सकता है.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लालमणि वर्मा और विकास पाठक की रिपोर्ट है कि उच्च जातियों के गुस्से की मुख्य वजह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा जारी किए गए नए समानता (इक्विटी) नियम हैं, जिन्हें इस साल की शुरुआत में अधिसूचित किया गया था.
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राकेश कायस्थ | अगर चोर दरवाजे से परिसीमन हुआ तो मैं क्या करूँगा?
आप इसे समाज और सरकार के नाम एक आम नागरिक का एलान मान सकते हैं. फरमान हमेशा सरकार जारी करती आई है, लेकिन अब इस देश के नागरिक भी फरमान जारी करेंगे, क्योंकि इस देश के असली मालिक आम नागरिक हैं. वही नागरिक, जिनसे उनकी नागरिकता का सबूत माँगा जा रहा है. आज अगस्त क्रांति दिवस है. आज ही के दिन 1942 को महात्मा गाँधी ने “करो या मरो” का नारा दिया था. गाँधीजी ने कहा था, “स्वराज कायरों के लिए नहीं है.”
इस देश की सरकार कायर है, उसे लोकतंत्र और विधिसम्मत संवैधानिक प्रक्रियाओं से डर लगता है, इसलिए वो हमेशा अपने लिए चोर दरवाजे ढूँढती है. लेकिन देश की जनता कायर नहीं है. सरकार वहीं पैंतरा अपनाने जा रही है, जिसकी कोशिश में वो अप्रैल में नाकाम हो चुकी है—यानी महिला आरक्षण की
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"आपने अपने शरीर के बजाय अपना करियर क्यों चुना?" बृजभूषण सिंह के बरी होने से यह दिखता है कि कटघरे में वह नहीं थे
'आर्टिकल 14' के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत से बरी किए जाने के बाद फैसले पर सवाल उठ रहे हैं. प्रकाशन का कहना है कि अदालत ने उन्हें कानूनी रूप से दोषमुक्त कर दिया, लेकिन मुकदमे की पूरी प्रक्रिया ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या वास्तव में आरोपी कटघरे में था या फिर शिकायत करने वाली महिला पहलवानों को ही अपनी विश्वसनीयता साबित करनी पड़ रही थी.
महिला पहलवानों ने 2016 से 2022 के बीच यौन उत्पीड़न की सात घटनाओं का आरोप लगाया था. एक शिकायत के अनुसार, 2016 ओलंपिक क्वालिफायर के दौरान बृजभूषण सिंह ने एक पहलवान को अपने पास बुलाकर उसकी अनुमति के बिना उसके सीने और पेट को कई बार छुआ और "सांस जांचने" के बहाने अनुचित हरकत की.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
राकेश कायस्थ का विश्लेषण: महिला आरक्षण और परिसीमन के जरिए लोकसभा सीटें बढ़ाने के प्रयास पर तीखा हमला, सविनय अवज्ञा की चेतावनी.
'द इंडियन एक्सप्रेस' की लालमणि वर्मा और विकास पाठक की रिपोर्ट: बांकीपुर में हार के बाद यूपी बीजेपी में घबराहट; UGC नियमों पर उच्च जातियों के गुस्से ने बढ़ाई चिंता.
'द हिंदू' में वर्गीज के. जॉर्ज की रिपोर्ट: बांकीपुर उपचुनाव और जेन ज़ी के उभार ने परिसीमन के गणित को बदला; भाजपा के सामाजिक बहुमत के समीकरणों पर गहराया संकट.
'काउंटरकरंट्स' की रिपोर्ट: नेशनल कोएलिशन फॉर वीमेंस रिजर्वेशन ने जंतर-मंतर पर भारी बारिश के बीच रैली निकाल 33% महिला आरक्षण तुरंत लागू करने की मांग की.
'हरकारा डीप डाइव' रिपोर्ट: संसद सत्र के आखिरी 3 दिनों पर सस्पेंस; परिसीमन बिल, गृह मंत्री अमित शाह और पीएम मोदी की गैरमौजूदगी पर श्रवण गर्ग का विश्लेषण.
'न्यूज़ लॉन्ड्री' रिपोर्ट: मोदी सरकार ने 2020-25 के दौरान प्रिंट विज्ञापनों पर ₹910.4 करोड़ खर्च किए, जिसमें 'टाइम्स ऑफ इंडिया' को सबसे ज्यादा ₹78.22 करोड़ मिले.
बसंत कुमार की रिपोर्ट: अखिलेश यादव का सीएम योगी पर बड़ा हमला; 8 साल में ₹6,812 करोड़ के विज्ञापन खर्च को "कॉस्मेटिक फेशियल" बताकर बोला हमला.
मकतूब मीडिया और स्क्रॉल की रिपोर्ट: कनाडा के 40 संगठनों और सांसदों ने RSS प्रमुख मोहन भागवत के प्रवेश पर रोक और संगठन पर प्रतिबंध की मांग की.
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RSS को जेन ज़ी की ज़रूरत क्यों पड़ गई? भागवत का बड़ा दांव या बढ़ती बेचैनी? पेपर लीक, छात्र आंदोलन और देशभर में उभरते युवा आक्रोश के बीच RSS ने पहली बार जेन ज़ी (Gen Z) और जेन अल्फा (Gen Alpha) के प्रतिनिधियों के साथ विशेष संवाद का आयोजन किया है. सवाल यह है कि आखिर संघ को अचानक नई पीढ़ी से सीधे बात करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह सिर्फ वैचारिक संवाद है या युवाओं के बदलते राजनीतिक रुझान को समझने और प्रभावित करने की कोशिश? क्या राहुल गांधी के युवा-केंद्रित अभियान और छात्र आंदोलनों ने संघ और भाजपा की रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है?
जिस आदमी ने पंद्रह साल तक दूसरों के लिए छह मुख्यमंत्री जिताए — मोदी, नीतीश, ममता, जगन, स्टालिन, केजरीवाल — उसकी अपनी पार्टी 2025 में 238 सीटों पर लड़कर एक भी नहीं जीत पाई, कई जगह नोटा से भी पीछे रही. और अब वही प्रशांत किशोर बीजेपी के 30 साल पुराने गढ़ बांकीपुर से, पहली बार लड़कर जीत गए हैं. पर हरकारा डीपडाइव की यह बातचीत "बी टीम" की बहस से आगे जाती है. निधीश त्यागी और लेखक-व्यंग्यकार राकेश कायस्थ की बातचीत में: ▪️ बी टीम की थ्योरी को एक तरफ़ रखकर — प्रशांत किशोर आख़िर करना क्या चाहते हैं ▪️ आँकड़ों की कहानी: 34% का न्यूनतम मतदान, बीजेपी से 28% और आरजेडी से 18% वोट का खिसकना ▪️ वोटर की बेचैनी — केजरीवाल, तमिलनाडु में विजय, पंजाब में भगवंत मान, और CJP की लहर से जोड़कर ▪️ अपने ही वोटर से सवाल करने की शैली — नेहरू, अंबेडकर और कांशीराम की परंपरा से तुलना ▪️ "सर्जिकल स्ट्राइक": मोदी-शाह और संघ पर चुप्पी, पर सम्राट चौधरी पर सीधा हमला ▪️ माइग्रेशन, शिक्षा और बिहार की तरक़्क़ी के मुद्दे — जो कांग्रेस-आरजेडी को उठाने चाहिए थे ▪️ तेजस्वी यादव का गिरता ग्राफ़ और आरजेडी का संकट ▪️ आगे का सवाल: PK एनडीए के साथ जाएँगे या इंडिया गठबंधन के, या नवीन पटनायक की तरह उदासीन? विस्तृत विश्लेषण और फ़ैक्टशीट: harkaraonline.com
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
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हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


मोहन भागवत का Gen Z से संवाद: https://www.youtube.com/watch?v=So_LMdZmNvg मुंबई में IIMUN के मंच से RSS प्रमुख मोहन भागवत ने Gen Z को अपनी पीढ़ी से अधिक ईमानदार और देशभक्त बताया. उन्होंने कहा कि अगर युवाओं से समय रहते संवाद हुआ होता, तो जंतर-मंतर जैसा आंदोलन नहीं होता. साथ ही उन्होंने आंदोलन को लोकतंत्र में संवाद का माध्यम बताया और प्रदर्शन करने वाले युवाओं को एंटी-नेशनल कहने का विरोध किया. भागवत ने शिक्षा, रोजगार, आरक्षण, सोशल मीडिया, AI, चीन-पाकिस्तान से संबंध, LGBTQ, महिलाओं की भागीदारी और पर्यावरण जैसे कई अहम मुद्दों पर भी अपनी राय रखी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह मोहन भागवत का वैचारिक बदलाव है, या फिर युवाओं के बीच बढ़ती नाराज़गी और बदलते राजनीतिक माहौल को देखते हुए RSS की नई रणनीति? हरकारा Deep Dive LIVE में निधीश त्यागी और श्रवण गर्ग इसी सवाल पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं. आइए समझते हैं कि भागवत के इन बयानों के राजनीतिक, वैचारिक और चुनावी मायने क्या हैं, और क्या ये संघ की सोच में बदलाव का संकेत हैं या केवल बदलते समय के अनुरूप नई रणनीति.