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लद्दाख में पूर्ण राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची और न्याय की मांग तेज़
‘काउंटरकरंट्स’ में संदीप पांडे और गुंजन सिंह ने लिखा है कि लद्दाख में पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किए जाने, लोकसभा की दो सीटों और अलग लोक सेवा आयोग की मांग को लेकर आंदोलन फिर तेज हो रहा है. 24 सितंबर 2025 की पुलिस गोलीबारी में मारे गए चार युवाओं के लिए न्याय और उस घटना से जुड़े मामलों को वापस लेने की मांग भी अब आंदोलन का हिस्सा है.
लेख के मुताबिक, सोनम वांगचुक लेह में पांचवीं बार अनशन पर थे, तभी 24 सितंबर 2025 को युवाओं का एक समूह अधिक आक्रामक हो गया. अनशन कर रहे कुछ लोगों को अस्पताल में भर्ती कराए जाने और सरकार की प्रतिक्रिया में देरी से युवाओं में निराशा बढ़ी थी. पुलिस गोलीबारी में चार युवाओं की मौत हुई और 44 लोग घायल हुए. कई लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए.
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उज्जैन की शाही मस्जिद का हिस्सा खुद हटाने को मजबूर हुए मुस्लिम, बोले—प्रशासन ने धोखा दिया
‘मकतूब’ में ग़ज़ाला अहमद की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश के उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाने को लेकर तनाव बना हुआ है. मस्जिद के पास तीन रातों तक पहरा देने के बाद सोमवार को स्थानीय स्वयंसेवकों ने करीब तीन फीट का हिस्सा खुद हटाना शुरू किया. स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन के साथ तय सहमति का पालन नहीं किया गया और बुलडोजर कार्रवाई के डर से उन्हें यह कदम उठाना पड़ा.
एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 27 सितंबर की रात मस्जिद की नुमाइंदा कमेटी और प्रशासन के बीच सहमति बनी थी कि मस्जिद की लटकती छज्जेनुमा पटिया का तीन फीट हिस्सा हटाया जाएगा. यह हिस्सा दुकानों के ऊपर है और यहां नमाज अदा नहीं की जाती. कमेटी ने यह हिस्सा स्वयं हटाने पर सहमति जताई थी, जबकि प्रशासन की ओर से आठ फीट हिस्सा हटाने की मांग की जा रही थी.
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मतदाता सत्यापन घर तक, लेकिन बेघर लोगों के पास वोट का अधिकार साबित करने के दस्तावेज़ नहीं
‘आर्टिकल 14’ में बेतवा शर्मा ने दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान बेघर लोगों की मुश्किलों पर रिपोर्ट किया है. चुनाव आयोग ने नोटिस पाने वाले मतदाताओं के घर जाकर सत्यापन करने की व्यवस्था की है, लेकिन 2002 की मतदाता सूची से अपना या परिवार का संबंध साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज़ न होने की समस्या अब भी बनी हुई है. पुरानी सूची से नाम कट चुके लोगों के लिए लगाए गए पुनः पंजीकरण शिविर भी इस बाधा को दूर नहीं कर पा रहे हैं.
पुरानी दिल्ली के एक आश्रय गृह में रहने वाली मुस्लिम महिलाओं ने डर जताया कि मतदाता सूची से नाम हटने पर उन्हें जेल भेजा जा सकता है या बांग्लादेशी कहकर देश से बाहर कर दिया जाएगा. वे कभी मज़ाक में इन आशंकाओं पर हंसती हैं, लेकिन उनकी बातचीत में नागरिकता और सुरक्षा खोने का भय साफ दिखाई देता है.
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श्रवण गर्ग | एक अखबारी रिपोर्ट पर इतना बड़ा भूकंप? यक़ीन नहीं होता!
छप्पन इंच की बहादुर सरकार अचानक से इतनी डरी-डरी क्यों दिख रही है? सिर्फ़ तीन दिन में उसका हुलिया बदला गया! वह भूकंप आ गया जो पिछले बारह सालों में नहीं आया! यकीन से परे है कि सिर्फ़ एक अखबारी रिपोर्ट पर इतनी शक्तिशाली हुकूमत के पाये इस तरह हिलते नज़र आने लगें! ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ!
पंद्रह-बीस करोड़ सदस्यों वाली दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी सिर्फ़ बहत्तर घंटों में अपनी इस घोषणा को कैसे भूल-सी गई कि वह प्रधानमंत्री का छहत्तरवाँ जन्मोत्सव एक महीने तक देश भर में मनाएगी? ऐसा क्या हो गया कि ज्ञानेश गुप्ता के नेतृत्व में छुट्टी के दिन शनिवार को हुई मीटिंग में आयोग ने अपने ही पिछले फ़ैसलों को उलटने या नये सिरे से लागू करने का तय कर लिया? क्या इस आरोप को मंज़ूर कर लिया कि पुराने फ़ैसले एक ही व्यक्ति द्वारा मनमानीपूर्ण तरीक़े से लिए गए थे? अगर ऐसा है तो ऐसा किसके इशारे पर हो रहा था? इस्तीफ़ा किसका माँगा जाना चाहिए?
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श्रवण गर्ग | सरकार पारदर्शी और जवाबदेह नहीं है
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ चुनाव आयोग, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और हालिया घटनाक्रम पर चर्चा की. बातचीत में गर्ग ने कहा कि घटनाक्रम को समझने के लिए राहुल गांधी के लंबे अभियान और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट को अलग-अलग देखना जरूरी है. उनके मुताबिक, रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने तेजी से प्रतिक्रिया दी, जबकि राहुल गांधी 2023 से मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठा रहे थे.
गर्ग ने रिपोर्टर रतिका चोपड़ा की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए सवाल किया कि अखबार ने इतनी संवेदनशील रिपोर्ट प्रकाशित करने का जोखिम क्यों उठाया. उन्होंने इस घटनाक्रम की तुलना वाटरगेट प्रकरण से करने पर आपत्ति जताई, लेकिन कहा कि रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया ने कई पुराने सवाल फिर सामने ला दिए हैं.
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12 आंकड़ों में ‘मेक इन इंडिया’ के 12 साल — विकास, रोजगार और वैश्विक हिस्सेदारी पर धीमा और सीमित प्रभाव
25 सितंबर 2014 को शुरू किए गए ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के 12 साल बाद, विकास, निवेश, रोजगार और निर्यात से जुड़े 12 आंकड़ों पर नजर डालने से पता चलता है कि तब से लेकर अब तक भारत के आर्थिक विकास, रोजगार और वैश्विक निर्यात में विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र की हिस्सेदारी काफी हद तक पहले जैसी ही बनी हुई है. हालांकि सरकार की हालिया प्रोत्साहन योजनाओं को कुछ सफलता मिली है, लेकिन वे लाभ केवल कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित हैं.
‘द हिंदू’ में टी.सी.ए. शरद राघवन की रिपोर्ट कहती है कि ‘मेक इन इंडिया’ अभियान की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि "उद्योगपति किसी आकर्षक प्रोत्साहन योजना के कारण नहीं आते", बल्कि उन्हें एक "विकास और वृद्धि-उन्मुख वातावरण" की आवश्यकता होती है. लेकिन, पिछले 12 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि जहां सरकार की प्रोत्साहन योजनाओं को कुछ हद तक सफलता मिली है, वहीं "विकास और वृद्धि-उन्मुख वातावरण" को दर्शाने वाले अन्य मानक कमजोर प्रदर्शन कर रहे हैं.
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‘पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का देश के सबसे बड़े निजी बैंक का प्रमुख बनना बहस का विषय होना चाहिए’
जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा है कि चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर जारी विवाद केवल किसी एक मीडिया रिपोर्ट का नतीजा नहीं है. यह कहते हुए कि चुनावी संस्था के कामकाज पर लगभग एक दशक से सवाल उठ रहे हैं, प्रशांत किशोर ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर देशव्यापी चर्चा और चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता की मांग की.
‘टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक, रविवार रात मीडिया से बात करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका होनी चाहिए.
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‘ब्रांड एंबेसडर’: ज्ञानेश कुमार ने केरल के पूर्व मुख्य सचिव को भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने का सुझाव दिया था
जब आप किसी ब्रांड से गहराई से प्रभावित होते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से उसके ‘ब्रांड एंबेसडर’ या वक्ता बन जाते हैं और बिना किसी औपचारिक शुल्क के उसकी मार्केटिंग करने लगते हैं. इसे मार्केटिंग की भाषा में 'वर्ड-ऑफ-माउथ मार्केटिंग' या ऑर्गेनिक एडवोकेसी कहा जाता है. केरल के पूर्व मुख्य सचिव जीजी थॉमसन ने खुलासा किया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में पथनमथिट्टा सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने का सुझाव दिया था.
थॉमसन ने ‘द हिंदू’ को बताया, "यह कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं बल्कि एक मित्रवत सुझाव था. जब मैं केरल के मुख्य सचिव के रूप में कार्यरत था और अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर था, तब दिल्ली की एक उड़ान के दौरान ज्ञानेश कुमार ने मेरी सेवानिवृत्ति के बाद की योजनाओं के बारे में पूछा था. मैंने कहा था कि मेरी ऐसी कोई योजना नहीं है. इसी दौरान उन्होंने सुझाव दिया कि मैं भाजपा के लिए पथनमथिट्टा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ सकता हूँ."
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एक व्यक्ति (ज्ञानेश कुमार) का विचार बाकी दो लोगों (आयुक्तों) पर कैसे हावी हुआ: पूर्व चुनाव आयुक्त
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने ‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ से बातचीत में कहा कि भारत निर्वाचन आयोग को अपने कामकाज, विशेष रूप से मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर उठाए गए सवालों पर स्पष्टीकरण देना चाहिए.
लवासा ने कहा, "उन्हें पूरे तथ्यों के साथ खुले तौर पर सामने आना चाहिए. एसआईआर के तीसरे चरण को रद्द कर देना चाहिए क्योंकि इसमें कई कमियां हैं और यह अनावश्यक है. तीसरा चरण अभी पूरा नहीं हुआ है. आयोग को एसआईआर से पहले वाली मतदाता सूचियों पर वापस लौट जाना चाहिए."
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सुप्रीम कोर्ट ने यूपीआई एमडीआर पर सरकार से पूछा: यदि यह न टैक्स है न शुल्क, तो फिर यह ‘जब्ती’ क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (28 सितंबर, 2026) को ₹2,000 से अधिक के निर्दिष्ट यूपीआई व्यक्ति-से-व्यापारी (पर्सन-टु-मर्चन्ट) लेनदेन पर व्यापारियों से 0.4% शुल्क वसूलने के सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने की याचिका खारिज कर दी.
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने भारत सरकार, भारतीय रिज़र्व बैंक और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) को उस याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि यूपीआई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शुल्क से लोग फिर से नकद लेनदेन की ओर लौटेंगे, जो कि काले धन का कारण बनेगा.
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मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटाने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नया महाभियोग नोटिस लाने की तैयारी
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है. कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, कानूनी विशेषज्ञों की मदद से प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है और जल्द ही संयुक्त विपक्ष की ओर से नोटिस सौंपा जाएगा.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, यह घटनाक्रम उसकी इस रिपोर्ट के खुलासे के बाद सामने आया है, जिसमें कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों में चुनाव आयोग के कई फैसलों पर आंतरिक रूप से लिखित आपत्तियां जताई थीं. त्रि-सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त 'बराबर वालों में प्रथम' होते हैं और नियमतः फैसले सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए.
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अजित साही | मोदी जी की रवानगी अब तय है
'हरकारा डीप डाइव' में निधीश त्यागी ने वाशिंगटन डीसी से वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अजित साही के साथ चुनाव आयोग में कथित असहमति, राहुल गांधी के आरोपों, जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन और केंद्र सरकार की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर चर्चा की.
बातचीत में साही ने इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट को महत्वपूर्ण बताया, जिसमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराने की बात कही गई थी. साही के मुताबिक, चुनाव आयोग के भीतर सामने आई असहमति और मतदाता सूची से जुड़े सवाल केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं.
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चुनाव आयोग में अभूतपूर्व दरार: 10 महीनों में 14 बार दो चुनाव आयुक्तों ने ईसी के कदमों पर दर्ज कराई आपत्ति
भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने वाली सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है. हालांकि, हालिया घटनाक्रमों और 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक विशेष जांच ने इस प्रतिष्ठित संस्थान के भीतर पनप रहे अभूतपूर्व असंतोष और प्रशासनिक दरार को उजागर कर दिया है.
रीतिका चोपड़ा की इस विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि जून 2025 में बिहार से शुरू हुआ विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्यक्रम—जो कि मतदाता सूचियों को अद्यतन करने की एक नियमित प्रक्रिया है—अब एक बड़े राष्ट्रीय विवाद का केंद्र बन चुका है. 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चलाए गए इस अभियान के तहत ड्राफ्ट मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटा दिए गए हैं. बड़े पैमाने पर की गई इस कटौती ने पूरे देश में इस बात पर बहस छेड़ दी है कि लोकतंत्र में नागरिक के मताधिकार का निर्धारण आखिर किस प्रक्रिया के तहत हो रहा है.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'द वायर' रिपोर्ट: उमर राशिद का खुलासा; यूपी 2027 चुनाव से पहले सीएम योगी आदित्यनाथ के 1 लाख सरकारी नौकरियों के वादे और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के 'टैक्सी चलाओ' बयान पर छिड़ा सियासी घमासान.
'द टेलीग्राफ' में मुकुल केसवन का तीखा विश्लेषणात्मक आलेख: एसआईआर (SIR) के माध्यम से मतदाता छांटने की रणनीति, 'हंगर गेम्स' जैसा संकट और 'कॉकरोच जन क्रांति' पर रिपोर्ट.
'काउंटरकरंट्स' रिपोर्ट: संदीप पांडे व गुंजन सिंह का विश्लेषण; लद्दाख में छठी अनुसूची, पूर्ण राज्य की मांग और 24 सितंबर 2025 की हिंसा की बरसी पर सोनम वांगचुक का अमित शाह पर आरोप.
'मकतूब' रिपोर्ट: ग़ज़ाला अहमद का खुलासा; उज्जैन में 2028 सिंहस्थ कुंभ सड़क चौड़ीकरण के तहत 100 वर्ष पुरानी शाही मस्जिद के हिस्से को हटाने पर पुलिस और स्थानीय लोगों में तनाव.
'आर्टिकल 14' रिपोर्ट: बेतवा शर्मा का खुलासा; दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान बेघर और गरीब मुस्लिम महिलाओं पर नागरिकता खोने का खतरा और दस्तावेजी मुश्किलें.
'हरकारा' में श्रवण गर्ग का तीखा विश्लेषणात्मक आलेख: चुनाव आयोग के फैसलों में यू-टर्न, भाजपा के अंदरूनी आक्रोश और राष्ट्रीय राजनीति में मचे उथल-पुथल का गहरा विश्लेषण.
'हरकारा डीप डाइव' टॉक शो: निधीश त्यागी और श्रवण गर्ग की चर्चा; 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एसआईआर (SIR) रिपोर्ट, रतिका चोपड़ा का खुलासा और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल.
'द हिंदू' रिपोर्ट: टी.सी.ए. शरद राघवन का विशेष विश्लेषण; 'मेक इन इंडिया' के 12 साल बाद विनिर्माण, रोजगार, निर्यात और पीएलआई (PLI) योजनाओं के आंकड़ों का विस्तृत ब्योरा.
वीडियो
क्या चुनाव आयोग के भीतर दर्ज असहमतियां और मतदाता सूची से जुड़े सवाल लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसे की नई बहस खड़ी कर रहे हैं? राहुल गांधी के आरोप, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, जंतर-मंतर पर युवाओं का विरोध और केंद्र सरकार की राजनीतिक चुनौतियां—इन मुद्दों पर हरकारा डीप डाइव के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अजित साही से विस्तार से बातचीत की. चर्चा में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद, एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े विवाद, सरकार की निर्णय प्रक्रिया, युवाओं की राजनीतिक भागीदारी और भाजपा, आरएसएस तथा हिंदुत्व की राजनीति के भविष्य को लेकर साही के विश्लेषण और आकलन शामिल हैं. पूरी बातचीत देखें और अपनी राय कमेंट में साझा करें. वीडियो पसंद आए तो लाइक, शेयर और हरकारा को सब्सक्राइब करें. #HarkaraDeepDive #AjitSahi #NidheeshTyagi #ElectionCommission #RahulGandhi #IndianPolitics #Democracy
चुनाव आयोग को लेकर सामने आई इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और उसके बाद राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और आयोग के भीतर कथित असहमति को लेकर बहस तेज कर दी है. इस Harkara Deep Dive में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ इसी पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से बातचीत की. चर्चा में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी के बीच कथित असहमति, 10 महीनों में दर्ज किए गए डिसेंट नोट्स, मतदाता सूची से जुड़े सवाल और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टिंग के आधार पर सामने आए मुद्दों पर बात हुई. साथ ही राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाए गए वोट चोरी और मतदाता सूची में बदलाव से जुड़े आरोपों पर भी चर्चा हुई. क्या राहुल गांधी के आरोप और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट एक ही मुद्दे की ओर इशारा करते हैं या दोनों को अलग-अलग समझने की जरूरत है? रिपोर्ट को लेकर उठे पत्रकारिता और स्रोतों से जुड़े सवाल क्या हैं? और क्या चुनाव आयोग के भीतर चल रही कथित असहमति का आने वाले दिनों में कोई बड़ा राजनीतिक या संस्थागत असर दिखाई देगा? श्रवण गर्ग ने खोजी पत्रकारिता की प्रक्रिया, डिसेंट नोट्स के सामने आने और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े कई सवालों पर अपनी बात रखी. देखिए हरकारा डीप डाइव में निधीश त्यागी और श्रवण गर्ग की पूरी बातचीत. #Harkara #HarkaraDeepDive #ShravanGarg #NidheeshTyagi #ElectionCommission #GyaneshKumar #RahulGandhi #IndianExpress #SIR #IndianPolitics
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट छपी. रिपोर्ट के मुताबिक़ चुनाव आयोग के तीन में से दो आयुक्त महीनों से असहमति दर्ज करा रहे थे. इसके तीन दिन के भीतर आयोग की बैठक हुई, सफ़ाई आई और नौ फ़ैसले लिए गए. इनमें बैठकों के एजेंडा और मिनट्स अनिवार्य करना, ईसीनेट तक ज़मीनी अफ़सरों की पहुँच और गोवा के 97 मतदाताओं की बहाली शामिल हैं. वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग कहते हैं कि ये बदलाव ख़ुद एक स्वीकारोक्ति हैं. उनका सवाल है कि बंगाल के 16 लाख मतदाताओं के ख़िलाफ़ अपील, फ़ॉर्म 6 में बदलाव और केंद्रीकृत ईसीनेट पर आयोग अब भी चुप क्यों है. बातचीत का दूसरा हिस्सा परिदृश्य-निर्माण है. इसमें कई सवाल ऐसे हैं जिन्हें गर्ग ख़ुद अटकल और कल्पना कहते हैं. फिर भी ये सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि सरकार और संस्थाएँ पारदर्शी नहीं हैं. harkaraonline.com harkara.substack.com शोर कम, रोशनी ज़्यादा.