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अवतारी देवी ने इस कानून के सबसे विवादित पहलू सेल्फ आईडेन्टिफिकेशन के अधिकार पर रौशनी डाली. उनके अनुसार, नए कानून में अब किसी व्यक्ति की जेंडर पहचान को खुद तय करने के बजाय मेडिकल प्रक्रिया और सरकारी प्रमाण से जोड़ा गया है. उन्होंने कहा कि जेंडर एक व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक पहचान है, जिसे कोई बाहरी संस्था तय नहीं कर सकती. चर्चा में यह भी सामने आया कि नए प्रावधानों के तहत ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड, सर्जरी और जिला प्रशासन की मंजूरी जैसी प्रक्रियाएं जरूरी हो सकती हैं. इसके बाद ही व्यक्ति को आधिकारिक सर्टिफिकेट मिलेगा, जिससे वह अपने अधिकारों का दावा कर सकेगा. इस प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठाए गए.