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रिबॉर्न मनीष | सत्ता के भीतर के विरोधाभास और जनता का दबाव, दोनों साथ बढ़ रहे हैं.
'हरकारा डीप डाइव' के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं रिबॉर्न मनीष के साथ स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण, ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक नैरेटिव और सत्ता समर्थित भीड़ की भूमिका पर चर्चा हुई. बातचीत का केंद्रीय सवाल यह रहा कि क्या किसी व्यक्ति की हिंसक गतिविधि को एक बड़े राजनीतिक-सामाजिक पैटर्न के संदर्भ में देखा जाना चाहिए और क्या सत्ता के करीब होने का भरोसा कानून के प्रति डर को खत्म कर रहा है.
रिबॉर्न मनीष ने फासीवाद की संरचना को समझाते हुए कहा कि इसमें सत्ता केवल सरकारी संस्थाओं के जरिए काम नहीं करती, बल्कि ऐसे गैर-राज्य तत्वों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो विरोधियों को डराने और दबाने का काम करते हैं. उनके मुताबिक, संवैधानिक संस्थाओं की अपनी सीमाएं होती हैं, इसलिए सत्ता के समानांतर ऐसी ताकतों का इस्तेमाल राजनीतिक नियंत्रण के लिए किया जा सकता है.
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नदियां सीमा पार कर जाती हैं, मुर्दे नहीं: पाकिस्तान में बह गए लद्दाखियों के शवों का इंतजार
'आर्टिकल-14' में इरशाद हुसैन और मुबाशिर नाइक ने लिखा है कि लद्दाख के कारगिल क्षेत्र में सुरू और शिंगो नदियों में बहकर पाकिस्तान प्रशासित गिलगित-बाल्टिस्तान पहुंच जाने वाले शवों को वापस लाना परिवारों के लिए बेहद मुश्किल हो गया है. भारत-पाकिस्तान के बीच ऐसे मानवीय मामलों के लिए कोई आधिकारिक एक्सचेंज प्वाइंट नहीं होने के कारण कई परिवार हफ्तों, महीनों और कभी-कभी हमेशा के लिए अपने प्रियजनों के शव का इंतजार करते रह जाते हैं.
20 मार्च 2026 को कारगिल के हुंदरमन गांव में नौ वर्षीय जुलकरनैन अली और उसके छह वर्षीय चचेरे भाई अली अकबर सुरू नदी के किनारे खेलने गए थे. दोनों तेज बहाव में बह गए. अकबर का शव अगले दिन मिल गया, लेकिन जुलकरनैन का पता नहीं चला. दो दिन बाद सीमा पार रहने वाले रिश्तेदारों ने व्हाट्सऐप के जरिए परिवार को बताया कि उसका शव पाकिस्तान प्रशासित इलाके में मिल गया है.
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मोदी सरकार ने 2,000 रुपये से ऊपर के यूपीआई लेनदेन पर शुल्क की अनुमति दी, "ट्रंप के आगे झुकने" का तंज
'साउथ फर्स्ट' की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त मंत्रालय की नई अधिसूचना के बाद यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाए जाने की आशंका बढ़ गई है. 14 सितंबर को जारी अधिसूचना में कहा गया कि बैंक या भुगतान प्रणाली प्रदाता 2,000 रुपये तक के रुपे डेबिट कार्ड और यूपीआई भुगतान पर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं लगा सकते. मौजूदा समय में यूपीआई लेनदेन पूरी तरह शुल्क मुक्त हैं. खास बात यह है कि कुल यूपीआई लेनदेन की मात्रा का करीब 96 प्रतिशत 2,000 रुपये से कम के भुगतान का है.
इस अधिसूचना में 2,000 रुपये तक के भुगतान पर शुल्क लगाने पर रोक स्पष्ट है, लेकिन इससे ऊपर के लेनदेन के लिए ऐसी स्पष्ट सुरक्षा नहीं दी गई है. इसी वजह से यह आशंका पैदा हुई है कि भविष्य में बड़े भुगतान पर शुल्क लगाया जा सकता है.
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ऐन ऐपलबॉम | लूट का साम्राज्य
अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक के अक्टूबर 2026 अंक में छपे एक लंबे लेख में वरिष्ठ पत्रकार और इतिहासकार ऐन ऐपलबॉम ने यह दलील रखी है कि अमेरिका अब अपने सहयोगियों के लिए वह देश नहीं रहा जिसे वे जानते थे. "एम्पायर ऑफ़ ग्रिफ़्ट" यानी "लूट का साम्राज्य" शीर्षक से छपे इस लेख में ऐपलबॉम लिखती हैं कि अमेरिकी ताक़त अब सिर्फ़ प्रशिक्षित राजनयिकों और सरकारी तंत्र के ज़रिए नहीं चलती. अनौपचारिक दूत, निजी कंपनियाँ, ऑनलाइन ठग और कट्टर विचारधारा वाले लोग — सरकार के भीतर भी और बाहर भी — अब ज़्यादा मायने रखते हैं. ये लोग लोकतंत्र फैलाने की भाषा नहीं बोलते, लंबे रिश्ते नहीं बनाना चाहते, और अमेरिका की साख की परवाह नहीं करते. वे अमेरिकी कूटनीति और सरकार के औज़ारों को अपने कारोबारी या वैचारिक मक़सद के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि अचानक वे ऐसा कर सकते हैं.
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समान नागरिक संहिता पर एनडीए में मतभेद: टीडीपी और शिवसेना समर्थन में, जेडीयू का बिहार में विरोध
'द इंडियन एक्सप्रेस' में लिज मैथ्यू और जतिन आनंद ने बताया है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू करने के ऐलान के बाद गठबंधन के भीतर अलग-अलग रुख सामने आए हैं. टीडीपी, शिवसेना और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) ने इसका समर्थन किया है, जबकि जेडीयू ने स्पष्ट किया है कि वह बिहार में यूसीसी लागू नहीं होने देगी. कुछ अन्य सहयोगी दलों ने भी अभी अपना रुख तय करने से पहले विचार-विमर्श की बात कही है.
भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की संसद में बहुमत की स्थिति टीडीपी के समर्थन पर भी निर्भर है. आंध्र प्रदेश में टीडीपी का एक महत्वपूर्ण मुस्लिम वोट आधार है. लोकसभा में टीडीपी नेता लावु कृष्ण देवऱायलु ने कहा कि पार्टी यूसीसी का समर्थन करेगी, लेकिन कानून अपनाने से पहले विभिन्न हितधारकों को विश्वास में लिया जाना चाहिए.
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इमरान खान के बेटों ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख पर जेल में बंद पिता के खिलाफ व्यक्तिगत दुश्मनी का आरोप लगाया
इमरान खान के बेटों ने पाकिस्तान के शक्तिशाली सेना प्रमुख आसिम मुनीर पर जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ "व्यक्तिगत दुश्मनी" रखने का आरोप लगाया है और आशंका जताई है कि उनके पिता को जेल में "धीरे-धीरे मारा" जा रहा है. यह बयान ऐसे समय में आया है जब उनकी जेल की स्थितियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है.
इस महीने के अंत में, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) – अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के चार साल बाद 1996 में खान द्वारा स्थापित राजनीतिक दल – उनकी रिहाई की मांग को लेकर देशव्यापी मार्च की योजना बना रहा है.
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आकार पटेल | अधिकारों पर मुक़दमा
सुनवाई में उपस्थित होना अनिवार्य है. कृपया इसे अति आवश्यक समझें और बिना किसी चूक के उपस्थित होने के लिए आवश्यक व्यवस्था करें."
मैंने व्हाट्सएप पर आए एसआईआर (SIR) नोटिस को नज़रअंदाज़ करने का मन बना लिया था और वहाँ न जाने का फ़ैसला किया था. लेकिन फिर मेरी पत्नी मुझसे एक दिन पहले वहाँ गईं.
उन्होंने बताया कि नोटिस जारी करने वाला अधिकारी इस बात से नाराज़ लग रहा था कि मैंने उसके व्हाट्सएप संदेश का जवाब तक नहीं दिया था.
बड़प्पन का तकाज़ा था, इसलिए मैं अपने काग़ज़ात की उस फटी-पुरानी फ़ाइल के साथ उसके सामने पेश हुआ, जो यह साबित करने के लिए मेरे पास है कि मेरा वजूद है और मैं उन लोगों को चुनने के योग्य हूँ जिन्हें हम अच्छे शब्दों में जनसेवक कहते हैं.
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रिपोर्ट में खुलासा: ग्लेशियर पिघलने से हिमालय ‘टिपिंग पॉइंट’ के करीब, लाखों लोगों की आजीविका दांव पर
इस महीने जारी एक अध्ययन के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियर एक दशक पहले की तुलना में अधिक तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे यह क्षेत्र 'टिपिंग पॉइंट' (अत्यंत संवेदनशील मोड़) की ओर बढ़ रहा है. सदी के मध्य तक इस क्षेत्र में "पीक वाटर" (मीठे पानी की उपलब्धता उच्चतम स्तर पर) की स्थिति पहुंचने से जल सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है.
‘रॉयटर्स’ के मुताबिक, यह निष्कर्ष अगस्त के अंत में नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक हिमालयी ग्लेशियर के टूटने के बाद आए हैं. इस घटना के कारण निचली घाटियों में एक के बाद एक भूस्खलन और अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) की स्थितियां पैदा हो गईं. नेपाल और चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में कम से कम 1,300 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 5,300 से अधिक लोग लापता हैं.
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मोदी-शी वार्ता : लद्दाख में अप्रैल 2020 की यथास्थिति बहाली पर भारत की चुप्पी से पूर्व सैनिक दुखी
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय वार्ता संपन्न हुई. हालांकि, इस उच्चस्तरीय बैठक के बाद जारी आधिकारिक बयानों में पूर्वी लद्दाख में अप्रैल 2020 की यथास्थिति बहाल करने या चीन के कब्जे वाले क्षेत्रों को वापस लेने का कोई जिक्र नहीं था. आधिकारिक बयानों में इस मुद्दे पर बरती गई चुप्पी ने भारत के पूर्व सैन्य अधिकारियों और कूटनीतिक विशेषज्ञों के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है.
इमरान अहमद सिद्दीकी की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व जनरलों ने रविवार को पूर्वी लद्दाख में अप्रैल 2020 की यथास्थिति की बहाली पर भारत की निरंतर चुप्पी पर खेद व्यक्त किया है. उन्होंने रेखांकित किया कि मोदी और शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक के बाद जारी द्विपक्षीय बयानों में क्षेत्र की वापसी का कोई उल्लेख नहीं था.
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पर्यावरण डेटा को रियल-टाइम करने की प्राथमिकता का अभाव, वर्ना पैसा मांगते वक्त भारत का पक्ष मजबूत होता
भारत दुनिया का सबसे विशाल भूजल निगरानी नेटवर्क संचालित करता है. केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) 1969 से 23,000 कुओं के ज़रिए जलस्तर को ट्रैक कर रहा है. इसके बावजूद, राष्ट्रीय जलविज्ञान परियोजना के तहत लगभग 25,000 में से केवल 5,260 स्टेशनों को ही टेलीमेट्री युक्त 'डिजिटल वाटर लेवल रिकॉर्डर' दिए जा रहे हैं. अंकित मिश्रा के अनुसार, अधिकांश आंकड़े आज भी हाथों से मापे जाते हैं. डिजिटल भुगतान और कर संग्रह में वैश्विक मिसाल पेश करने वाले भारत के पास क्षमता होते हुए भी पर्यावरण डेटा को रियल-टाइम करने की प्राथमिकता का अभाव है.
यह उदासीनता अन्य पर्यावरणीय क्षेत्रों में भी साफ़ झलकती है:
आर्द्रभूमि में देरी: भारत का आर्द्रभूमि मानचित्र वर्षों तक पुराने उपग्रह चित्रों पर निर्भर रहा. 2024 में 2018-19 के चित्रों के आधार पर क्षेत्रफल 16.89 मिलियन हेक्टेयर बताया गया. किसी नियमित वैधानिक सर्वेक्षण चक्र के बिना वर्षों का यह अंतर जल संसाधनों के प्रबंधन में बड़ी बाधा है.
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अगस्त में अनिश्चितकाल के लिए स्थगित, लेकिन एक माह बाद भी सत्रावसान नहीं; जानिए देरी के मायने और विपक्ष के सवाल
13 अगस्त को संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था, लेकिन इसके एक महीने बाद भी दोनों सदनों का सत्रावसान नहीं हुआ है. सत्रावसान वह आधिकारिक प्रक्रिया है जो किसी संसदीय सत्र का औपचारिक अंत करती है. संवैधानिक रूप से सत्रावसान का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, लेकिन इस असामान्य विलंब ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा और विवाद को जन्म दे दिया है.
विपक्ष का आरोप है कि सरकार विवादास्पद ‘लोकसभा विस्तार-आधारित परिसीमन विधेयक’ को दोबारा पेश करने की फिराक में है. महिला आरक्षण को लागू करने के लिए लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 850 करने से जुड़े इस संविधान संशोधन विधेयक को अप्रैल 2026 के विशेष सत्र में संयुक्त विपक्ष ने खारिज कर दिया था. यह पहला मौका था जब मोदी सरकार कोई संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने में विफल रही थी.
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कांति बाजपेयी | भारत और चीन ‘नैश संतुलन’ की स्थिति में हैं; क्या यह कायम रहेगा?
क्या 25 अगस्त को सीमा पर जारी आठ सूत्रीय परिणामों और सहमति पत्र और अभी-अभी संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक के बाद हम भारत-चीन संबंधों के रुख को लेकर थोड़े से अधिक समझदार हुए हैं?
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में कांति बाजपेयी ने लिखा है कि अगस्त के बयान और शिखर सम्मेलन के बाद भारत और चीन द्वारा जारी दो बयान जो संकेत देते हैं, वह यह है कि सीमा के संबंध में दोनों पक्ष ‘नैश संतुलन’ में हैं. अर्थशास्त्र की मूलभूत समझ से दूर मुझ जैसे लोगों के लिए, ब्रिटानिका ऑनलाइन के अनुसार, नैश संतुलन किसी गैर-सहयोगपूर्ण खेल का वह परिणाम है जिसमें "कोई भी खिलाड़ी अपनी रणनीति बदलकर अपने अपेक्षित परिणाम में सुधार नहीं कर सकता."
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वैश्विक अनिश्चितता के बीच सितंबर में अब तक एफपीआई ने शेयर बाजार से ₹13,138 करोड़ निकाले
वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है, जबकि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और मजबूत होते डॉलर ने जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया है. इसके चलते विदेशी निवेशकों (एफपीआई) ने सितंबर के पहले पखवाड़े (15 दिनों) में भारतीय शेयर बाजार से ₹13,138 करोड़ निकाल लिए हैं.
सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड (सीडीएसएल) के आंकड़ों के अनुसार, यह ताजा निकासी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा जुलाई और अगस्त में क्रमशः ₹20,200 करोड़ और ₹29,630 करोड़ का शुद्ध निवेश (खरीदारी) करने के बाद आई है.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'द हिंदू' रिपोर्ट: एनपीसीआई (NPCI) ने 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के P2M यूपीआई भुगतानों पर 0.4% एमडीआर (MDR) शुल्क का ऐलान किया; छोटे व्यापारियों और P2P लेनदेन को मिली छूट.
'हरकारा डीप डाइव' पॉडकास्ट: निधीश त्यागी और रिबॉर्न मनीष के साथ स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण, 'अर्बन/दिमागी नक्सल' नैरेटिव और सत्ता समर्थित भीड़ पर चर्चा.
'आर्टिकल-14' रिपोर्ट: कारगिल में सुरू और शिंगो नदियों में बहकर नियंत्रण रेखा (LoC) पार जाने वाले शवों को वापस लाने में परिवारों की मानवीय त्रासदी और औपचारिक व्यवस्था की मांग.
'साउथ फर्स्ट' रिपोर्ट: वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के बाद 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई (UPI) लेनदेन पर शुल्क लगने की आशंका, एमडीआर (MDR) विवाद और अमेरिकी दबाव के आरोप.
'द इंडियन एक्सप्रेस' रिपोर्ट: 2029 तक 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के अमित शाह के ऐलान के बाद एनडीए (JDU, TDP, LJP) में सियासत तेज.
'द अटलांटिक' रिपोर्ट: ऐन ऐपलबॉम का खुलासा; अमेरिकी विदेश नीति, अनौपचारिक दूतों, व्यापारिक सौदों और यूरोप-कनाडा पर राजनीतिक दबाव की पूरी पड़ताल.
आकार पटेल का लेख: 'अधिकारों पर मुक़दमा' — एसआईआर (SIR) नोटिस, फटे-पुराने दस्तावेज़, नागरिकता शुद्धता परीक्षण और वोट देने के अधिकार पर तीखा प्रहार.
'द गार्डियन' रिपोर्ट: इमरान खान के बेटों सुलेमान और कासिम का आरोप; पाकिस्तान सेना प्रमुख आसिम मुनीर की 'व्यक्तिगत दुश्मनी' और अदियाला जेल में शारीरिक-मानसिक उत्पीड़न.
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हरकारा डीप डाइव के इस खास एपिसोड में निधीश त्यागी एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, भारत की विदेश नीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक भूमिका पर विस्तार से चर्चा हुई. ब्रिक्स से भारत को क्या हासिल हुआ और क्या कुछ हासिल नहीं हो पाया? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मंच के जरिए ग्लोबल साउथ में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका मजबूत करना चाहते थे? क्या ब्रिक्स में अमेरिका और चीन को लेकर भारत का रुख स्पष्ट दिखाई दिया? बातचीत में क्रिटिकल मिनरल्स, सप्लाई चेन, चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा, अमेरिका के साथ व्यापार और निवेश, रूस से तेल खरीद, डी-डॉलराइजेशन और पश्चिम एशिया में भारत की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई. साथ ही पहलगाम हमले के ब्रिक्स घोषणा-पत्र में उल्लेख, क्रॉस-बॉर्डर टेररिज्म, ईरान-इजराइल संघर्ष और फिलिस्तीन के सवाल पर भारत के रुख को भी परखा गया. श्रवण गर्ग ने यह सवाल भी उठाया कि क्या ब्रिक्स के जरिए भारत वास्तव में ग्लोबल साउथ का नेतृत्व कर पाया या फिर रूस और चीन के प्रभाव वाले इस मंच पर भारत की भूमिका सीमित ही रही. चर्चा का एक अहम सवाल यह भी है कि अगर चीन और अमेरिका दोनों के साथ भारत के अपने-अपने रणनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हैं, तो मौजूदा विदेश नीति में भारत आखिर किस दिशा में आगे बढ़ रहा है? पूरी बातचीत देखिए और समझिए कि ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण रहा और इसके दूरगामी प्रभाव क्या हो सकते हैं. #HarkaraDeepDive #ShravanGarg #NidheeshTyagi #BRICS #NarendraModi #IndiaForeignPolicy #GlobalSouth #China #USA #Russia #Geopolitics #IndianPolitics
हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी एवं अपूर्वानंद के साथ उमर खालिद की जेल में बीत रहे छह वर्षों और उससे जुड़े लोकतांत्रिक, न्यायिक और सामाजिक सवालों पर विस्तार से बातचीत हुई. 13 सितंबर 2026 को उमर खालिद को जेल में छह साल पूरे हो जाएंगे. अभी तक उनके खिलाफ आरोप तय नहीं हुए हैं और मुकदमे की सुनवाई भी शुरू नहीं हुई है. ऐसे में सवाल सिर्फ उमर खालिद की गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, न्याय व्यवस्था और असहमति की जगह का भी है. बातचीत में 2016 के जेएनयू प्रकरण से लेकर 2019 के नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन और 2020 की दिल्ली हिंसा तक उमर खालिद की राजनीतिक यात्रा को समझने की कोशिश की गई. अपूर्वानंद बताते हैं कि किस तरह एक छात्र और शोधार्थी को धीरे-धीरे एक राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया गया. जेएनयू की छात्र राजनीति, उमर खालिद और कन्हैया कुमार के बीच अंतर, मीडिया नैरेटिव, विश्वविद्यालयों के प्रति बदलता रवैया और मुस्लिम पहचान को लेकर पैदा हुए सवालों पर भी चर्चा हुई. दिल्ली हिंसा मामले में उमर खालिद पर लगाए गए आरोपों, अमरावती के भाषण और अदालत में पेश किए गए तर्कों को लेकर भी बातचीत हुई. साथ ही यह सवाल उठाया गया कि हिंसा के लिए खुले तौर पर बयान देने वाले नेताओं और उमर खालिद जैसे आरोपित लोगों के मामलों में पुलिस तथा न्यायपालिका का रवैया अलग क्यों दिखाई देता है. अंत में चर्चा इस सवाल पर पहुंचती है कि जेल में बीते छह साल एक व्यक्ति के जीवन, उसकी शिक्षा, शोध और भविष्य से कितने महत्वपूर्ण वर्ष छीन लेते हैं. अपूर्वानंद के शब्दों में, “उमर खालिद एक ऐसा पैमाना है, जिस पर आप हिंदुस्तान के कद को नाप सकते हैं.” पूरी बातचीत देखिए और इस महत्वपूर्ण बहस को अपने हमख्याल लोगों के साथ साझा कीजिए. अब लोग मुझे मेरे नहीं, उमर के पिता के तौर पर जानते हैं Dr. SQR Ilyas | Umar Khalid https://youtu.be/oGvsW8TPrL8 https://indianexpress.com/article/opinion/columns/umar-khalid-my-son/
हम हरकारा.
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हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


'हरकारा डीप डाइव' के इस एपिसोड में निधीश त्यागी एवं रीबॉर्न मनीष के साथ स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण, ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक नैरेटिव, सत्ता के संरक्षण और बदलते सामाजिक माहौल पर विस्तार से बातचीत हुई. क्या स्वतंत्र भारद्वाज सिर्फ एक व्यक्ति हैं या पिछले वर्षों में विकसित हुई एक बड़ी राजनीतिक-सामाजिक प्रवृत्ति का हिस्सा? क्या सत्ता के करीब होने का भरोसा कुछ लोगों के भीतर कानून का डर खत्म कर रहा है? और क्या संवैधानिक व्यवस्था के समानांतर ऐसी ताकतें मजबूत हो रही हैं, जिनके लिए नियमों की सीमाएं अलग हैं? रीबॉर्न मनीष ने बातचीत में फासीवाद की संरचना, ‘फोर्स’ और ‘कंसेंट’ की राजनीति तथा गैर-राज्य तत्वों की भूमिका को समझाने की कोशिश की. चर्चा में ‘अर्बन नक्सल’, ‘खान मार्केट गैंग’ और ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक नैरेटिव के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सिविल डिफेंस’ और ‘दिमागी नक्सल’ संबंधी बयानों से लेकर अग्निवीर योजना तक, बातचीत में यह सवाल उठाया गया कि आने वाले समय में प्रशिक्षित लेकिन बेरोजगार युवाओं की भूमिका क्या होगी. उमर खालिद और सिद्दीकी कप्पन जैसे मामलों के जरिए कानून के कथित असमान इस्तेमाल, लंबे समय तक जेल में रहने और नागरिक स्वतंत्रताओं पर भी चर्चा हुई. जंतर-मंतर की घटना के संदर्भ में नई पीढ़ी के बदलते राजनीतिक नजरिए पर भी बात हुई. क्या आज का युवा हिंदू-मुसलमान और मंदिर-मस्जिद की राजनीति से आगे रोजगार, शिक्षा और शांति को प्राथमिकता दे रहा है? क्या पुराने राजनीतिक नैरेटिव अब पहले की तरह प्रभावी नहीं रहे? रीबॉर्न मनीष के मुताबिक, “यह नशा अब फट चुका है, लोग वापस जाग रहे हैं.” वहीं उनका मानना है कि लंबे समय से दबा असंतोष आने वाले समय में नए सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व को जन्म दे सकता है. पूरी बातचीत देखिए और समझिए कि स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण के पीछे दिखाई देने वाली राजनीति और सामाजिक प्रवृत्ति को किस बड़े संदर्भ में देखा जाना चाहिए. रीबॉर्न मनीष के फेसबुक लेख https://www.facebook.com/share/p/1EWZWnsNWN/ #HarkaraDeepDive #RebornManish #NidheeshTyagi #SwatantraBhardwaj #DimaagiNaxal #CivilDefence #Agniveer #IndianPolitics #Fascism #Democracy #CivilLiberties #harkaramapnakarenge #Harkara #JantarMantar #CivilDefence #IndiaPolitics #Fascism #Agniveer #UmarKhalid #Constitution #RSS #HindiPodcast #NidheeshTyagi #DeepDive #Democracy #IndianYouth #FreeSpeech स. मिलाजुला सेट — यूट्यूब के लिए यही सुझाव है #हरकारा #जंतरमंतर #दिमागीनक्सल #सिविलडिफेंस #अग्निवीर #उमरखालिद #फासीवाद #संविधान #भारतीयराजनीति #हिंदीपॉडकास्ट #Harkara #JantarMantar #IndiaPolitics #Agniveer #HindiPodcast