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श्रवण गर्ग | राहुल गांधी ने मोदी को भी जनता के बीच जाने पर मजबूर किया
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ मौजूदा विपक्षी राजनीति के एक महत्वपूर्ण सवाल पर चर्चा हुई. सवाल यह है कि राहुल गांधी लगातार जनता और युवाओं के बीच सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी उसी अनुपात में इसका राजनीतिक लाभ क्यों नहीं उठा पा रही है. क्या कांग्रेस का कमजोर संगठन राहुल गांधी की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है, या राहुल गांधी ने संगठन से अलग अपनी एक नई राजनीतिक रणनीति तैयार कर ली है.
श्रवण गर्ग ने चर्चा की शुरुआत राहुल गांधी की लोकप्रियता को लेकर बनाए जा रहे राजनीतिक नैरेटिव से की. उनका कहना था कि वैकल्पिक मीडिया और यूट्यूब चैनलों पर लगातार राहुल गांधी की लोकप्रियता और नरेंद्र मोदी के कमजोर होने की चर्चा होती है. लेकिन इस तरह की लगातार कवरेज से राहुल गांधी को वास्तविक राजनीतिक फायदा कितना मिल रहा है, यह अलग सवाल है. उनके मुताबिक, इसका एक परिणाम यह भी हो सकता है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा का आक्रामक रुख और अधिक बढ़ जाए.
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2026 के विधानसभा चुनाव में 191 आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों की जानकारी नहीं दी गई
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद प्रमुख राजनीतिक दलों ने 2026 के विधानसभा चुनावों में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे 191 उम्मीदवारों को मैदान में उतारने के कारणों का खुलासा नहीं किया. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक स्टडी के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समेत कई प्रमुख दलों ने ऐसे उम्मीदवारों के चयन को लेकर जरूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की.
ये उम्मीदवार असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों में मैदान में थे. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत राजनीतिक दलों को फॉर्म सी-7 के माध्यम से यह बताना होता है कि उन्होंने आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों को ऐसे उम्मीदवारों के मुकाबले क्यों चुना, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है.
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डोनाल्ड ट्रंप ने आव्रजन नीति पर दोहरा झटका देकर भारतीय आईटी क्षेत्र पर कसा शिकंजा
डोनाल्ड ट्रंप की सख्त आव्रजन (इमिग्रेशन) नीति के दोहरे झटके ने भारतीय आईटी कर्मचारियों और आईटी दिग्गज कंपनियों को निशाने पर ले लिया है.
महज कुछ ही दिनों के भीतर, वाशिंगटन ने 60-दिन की उस राहत अवधि (ग्रेस पीरियड) को खत्म करने का प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत नौकरी गंवाने वाले H-1B वीजा धारक को अमेरिका छोड़ने से पहले नया नियोक्ता (एंप्लॉयर) ढूंढने का समय मिलता था. वहीं दूसरी तरफ, अमेरिकी श्रम विभाग ने संभावित वीजा धोखाधड़ी की जांच के तहत कॉग्निजेंट कंपनी पर 'पर्म' (पीईआरएम) कार्यक्रम के तहत नए आवेदन जमा करने पर अस्थायी रोक लगा दी है. 'पर्म' एक प्रमुख प्रक्रिया है, जिसके जरिए कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को ग्रीन कार्ड दिलाती हैं.
'ईआईआईआर ट्रेंड' के सीईओ पारिख जैन का कहना है कि भारतीय आईटी उद्योग के पास अब अपने संचालन मॉडल में बदलाव को तेज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है.
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परकला प्रभाकर | एसआईआर भारतीय नागरिकता की बुनियाद को कैसे कमजोर कर रहा है
'फ्रंटलाइन' में परकला प्रभाकर ने लिखा है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने भारत में नागरिकता और लोकतांत्रिक भागीदारी के स्वरूप को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटने से देश में धीरे-धीरे दो वर्ग बन रहे हैं - एक, जिनके पास मतदान का अधिकार है और दूसरा, जो इस अधिकार से बाहर हो गए हैं.
अब तक देश की मौजूदा मतदाता सूची से करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने का अनुमान है और प्रक्रिया पूरी होने तक यह संख्या एक करोड़ और बढ़ सकती है. पहले से ही अनुमानित 15 करोड़ विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों के करीब 98 प्रतिशत लोग मतदाता सूची में नहीं हैं. ऐसे में एसआईआर से बाहर होने वाली बड़ी आबादी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता पैदा करती है. हालांकि हटाए गए सभी नाम गलत तरीके से हटाए गए हों, ऐसा जरूरी नहीं है. इनमें मृत, डुप्लीकेट, दूसरे स्थान पर चले गए या अन्य श्रेणी के लोग भी हो सकते हैं. लेकिन देश के भीतर एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले व्यक्ति को देश की कुल मतदाता संख्या से बाहर नहीं होना चाहिए.
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आरक्षण विरोधी विचारधारा को क्रीमी लेयर से इतना लगाव क्यों है?
‘स्क्रोल’ में शोएब दानियाल की रिपोर्ट है कि जाति आधारित आरक्षण भारत में सामाजिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है. राजनीतिक वैज्ञानिक क्रिस्टोफ जाफ्रेलो इसे भारत की "मूक क्रांति" का हिस्सा मानते हैं, जिसके जरिए हजारों वर्षों से सामाजिक रूप से हाशिए पर रखे गए पिछड़े और वंचित समुदायों को लोकतांत्रिक व्यवस्था में जगह मिली. इसी वजह से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण हमेशा राजनीतिक और सामाजिक विवाद का विषय रहा है.
आरक्षण के खिलाफ हाल के आंदोलनों में "आरक्षण हटाओ आंदोलन" भी प्रमुख रूप से सामने आया है. अगस्त में इसके समर्थकों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया. आंदोलन का तर्क है कि आरक्षण के कारण सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध नौकरियों का हिस्सा कम हो रहा है. संगठन निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण का विरोध करता है और जाति के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करता है.
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593 मौतें, 261 गायब: सफाईकर्मियों की मौत पर दलितों का प्रतिरोध
'काउंटरकरंट्स' में रेव. ई. इमैनुएल नेहेमायाह ने सफाईकर्मियों की मौत, सरकारी आंकड़ों और दलितों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. लेख की शुरुआत इस आरोप से होती है कि केंद्र की भाजपा सरकार और स्थानीय कांग्रेस सरकार सफाईकर्मियों की मौतों को आंकड़ों से मिटाने की राजनीति कर रही हैं. जमीनी आंकड़ों में जनवरी 2021 से जून 2026 के बीच सीवर और सेप्टिक टैंक में 593 मौतें दर्ज हैं, जबकि संसद में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री रामदास आठवले ने 332 मौतों का आंकड़ा बताया. दोनों के बीच 261 मौतों का अंतर है.
21 जुलाई 2026 को संसद में रामदास आठवले ने बताया कि जनवरी 2021 से जून 2026 के बीच सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 332 लोगों की मौत हुई. इसके छह दिन बाद, 27 जुलाई को सफाई कर्मचारी आंदोलन के संयोजक और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता बेजवाड़ा विल्सन ने दिल्ली में 593 मौतों का आंकड़ा जारी किया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने 261 मौतों को छिपाया है. 2026 में ही अब तक 113 लोगों की मौत होने और अकेले जुलाई में 15 मौतें होने की बात कही गई. उन्होंने #stopkillingus (हमें मारना बंद करो) के जरिए सरकार से सफाईकर्मियों की मौत रोकने की अपील की.
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धीरेंद्र शास्त्री की परवाह नहीं ; दुर्गा पूजा से पहले बांग्लादेश से हिल्सा मछली पर प्रतिबंध हटाने का आग्रह
कथा वाचक धीरेंद्र शास्त्री भले ही दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार करने वालों को पाखंडी कहें या मांसाहारी भोजन न परोसने की सलाह दें, लेकिन दुर्गा पूजा से ठीक पहले भारतीय मत्स्य आयातकों ने शुक्रवार को बांग्लादेश से मछलियों की रानी मानी जाने वाली 'इलिश' (हिल्सा) के निर्यात पर लगे प्रतिबंध को हटाने का आग्रह किया है. इस संबंध में कोलकाता स्थित एक आयातक संघ ने बांग्लादेश के वाणिज्य मंत्री को पत्र लिखकर इलिश का निर्यात फिर से शुरू करने का अनुरोध किया है. 'फिश इंपोर्टर्स एसोसिएशन' के अनुरोध पर बांग्लादेश सकारात्मक रूप से विचार कर रहा है.
पत्र में कहा गया, "दुर्भाग्य से, जुलाई 2012 में बांग्लादेश सरकार ने इलिश मछली के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था. तब से हम लगातार इस प्रतिबंध को हटाने के लिए बांग्लादेश सरकार को पत्र लिखते रहे हैं, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ."
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अरुणाचल में सीमा पर तनाव और आर्थिक मुद्दे मोदी-शी द्विपक्षीय बैठक में हावी रहने के आसार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (12 सितंबर, 2026) को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे. इस वार्ता का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापारिक और जन-दर-जन (पीपल-टू-पीपल) संबंधों को मजबूत करना है. राष्ट्रपति शी की 2014 के बाद नई दिल्ली की यह पहली यात्रा होगी, हालांकि वे 2016 (गोवा ब्रिक्स) और 2019 (मामल्लापुरम) में भारत आ चुके हैं.
सुहासिनी हैदर, विजयेता सिंह की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 के सीमा विवाद के बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में ठहराव रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसे भारत-चीन संबंधों के पूर्ण "रीसेट" के रूप में देखना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह शिखर वार्ता दोनों देशों के बीच जारी मतभेदों को सुलझाने के लिए एक स्थिर और स्पष्ट मंच प्रदान कर सकती है.
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मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने व्यापक जनहित में मस्जिद के आंशिक विध्वंस को सही ठहराया
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने उज्जैन में स्थानीय नगर निगम द्वारा मस्जिद के एक हिस्से को ढहाए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए कहा है कि यह कार्य व्यापक जनहित में किया गया था. न्यायमूर्ति संजीव एन भट्ट ने माना कि मस्जिद के एक हिस्से को गिराने का यह कदम उज्जैन नगर निगम द्वारा कानून के अनुसार और व्यापक जनहित में उठाया गया था. नगर निकाय ने 2028 के उज्जैन कुंभ को ध्यान में रखते हुए सड़क चौड़ीकरण परियोजना को सुगम बनाने के लिए मस्जिद के एक हिस्से को ध्वस्त किया है.
‘डेक्कन क्रॉनिकल’ के अनुसार, अदालत ने नगर निगम की कार्रवाई को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं को खारिज करते हुए देखा कि मस्जिद के आंशिक विध्वंस का निर्णय लेकर नगर निकाय ने कोई मनमाना रवैया नहीं अपनाया है. यह मस्जिद एक वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत है. याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह ढांचा एक प्राचीन धार्मिक स्थल था जो पीढ़ियों से अस्तित्व में था और इसके आंशिक विध्वंस से संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 के तहत उनके अधिकारों का उल्लंघन होगा.
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कच्चे तेल की कीमतें मई के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंचने से भारत की बढ़ीं मुश्किलें
कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और भारत इसका सबसे बड़ा शिकार बन सकता है. वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए भूचाल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव तथा एक-दूसरे के जहाजों पर हमलों की तेजी के कारण अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड $108 प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर गया है. बीते कारोबारी सत्र में ब्रेंट 6 प्रतिशत से अधिक की दैनिक उछाल के साथ $107.63 प्रति बैरल पर बंद हुआ, जो मई के बाद का उच्चतम स्तर है. विश्लेषकों का मानना है कि तेल का तीन अंकों (100 डॉलर से ऊपर) में पहुंचना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है.
परन बालकृष्णन की रिपोर्ट के अनुसार, कीमतों में हालिया तेजी की मुख्य वजह मध्य पूर्व में जहाजरानी (शिपिंग) मार्गों पर हुए भीषण हमले हैं. ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य के पास कई जहाजों को निशाना बनाए जाने के बाद आपूर्ति बाधित होने का डर बढ़ गया है. गौरतलब है कि युद्ध से पहले वैश्विक तेल व्यापार का 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता था.
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अरुणाचल में सुरक्षा के साथ बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की जरूरत
अरुणाचल प्रदेश के वाचा-दमाई में भारत और चीन के कोर कमांडरों की वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर बैठक के साथ ही इस संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में सड़कों, मजबूत बुनियादी ढांचे और पर्यटन प्रबंधन पर एक शांत लेकिन बेहद जरूरी चर्चा आवश्यक हो गई है.
सुदीप्त भट्टाचार्जी के अनुसार, हर साल सितंबर में ज़ीरो घाटी अपनी शांत अपतानी संस्कृति और 'ज़ीरो फेस्टिवल ऑफ म्यूजिक' के कारण जीवंत हो उठती है. सितंबर 2025 में इस चार दिवसीय आयोजन ने देशभर और विदेशों से 12,000 से अधिक पर्यटकों और कलाकारों को आकर्षित किया. प्लास्टिक प्रतिबंध, बांस के बने मंच, कंपोस्टिंग और 300 से अधिक स्थानीय लोगों को मिलने वाले रोजगार के कारण इसे राष्ट्रीय स्तर पर 'सस्टेनेबिलिटी पुरस्कार' भी मिला.
हालांकि, ज़ीरो की यह अभूतपूर्व सफलता ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. इसका सुदूर होना जहाँ एक ओर आकर्षण है, वहीं दूसरी ओर कमजोर बुनियादी ढांचा सबसे बड़ी बाधा. क्षेत्र में सड़कों की खस्ताहाल स्थिति, अनिश्चित मौसम, सार्वजनिक परिवहन की कमी और सीमित आपातकालीन व्यवस्थाएं यात्रा को जोखिम भरा बनाती हैं.
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जीडीपी आंकड़ों की समीक्षा करने वाले पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग कौन हैं?
इस सप्ताह के शुरू में (31 अगस्त) भारत की पहली तिमाही (क्वार्टर-1) के जीडीपी वृद्धि आंकड़े जारी होने के बाद, पूर्व वरिष्ठ सरकारी अधिकारी सुभाष चंद्र गर्ग खुद को इन आंकड़ों को लेकर छिड़ी एक जोरदार बहस के केंद्र में पा रहे हैं.
यह क्यों महत्वपूर्ण है
एक टीवी चैनल (एनडीटीवी) को दिए गए एक साक्षात्कार में, जो काफी वायरल हुआ है, वित्त मंत्रालय के इस पूर्व शीर्ष नौकरशाह ने भारत की 7.8% आर्थिक वृद्धि दर पर सवाल उठाए हैं, जिसने उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया था.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'हरकारा डीप डाइव' में निधीश त्यागी और श्रवण गर्ग का विश्लेषण: राहुल गांधी की जन-सक्रियता, कांग्रेस की संगठनात्मक चुनौतियां और चुनावी राजनीति का असर.
ADR की नई रिपोर्ट: 2026 के विधानसभा चुनावों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद राजनीतिक दलों द्वारा आपराधिक छवि वाले 191 उम्मीदवारों का चयन कारण (फॉर्म C-7) न बताने पर विस्तृत विश्लेषण.
'स्क्रोल' में शोएब दानियाल की रिपोर्ट: "आरक्षण हटाओ आंदोलन" और क्रीमी लेयर विवाद के बहाने वंचित जातियों के उभरते सामाजिक नेतृत्व को सीमित करने के प्रयासों का विश्लेषण.
'फ्रंटलाइन' में परकला प्रभाकर का लेख: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटने पर विश्लेषणात्मक रिपोर्ट और लोकतांत्रिक नागरिकता पर खतरा.
'काउंटरकरंट्स' में रेव. ई. इमैनुएल नेहेमायाह का लेख: सीवर-सेप्टिक टैंक मौतों के आंकड़ों में हेरफेर, मैनुअल स्कैवेंजिंग और दलित सफाईकर्मियों के अधिकारों पर विस्तृत विश्लेषण.
'द टेलीग्राफ' रिपोर्ट: ट्रंप प्रशासन का H-1B वीजा धारकों पर बड़ा प्रहार; 60-दिन का ग्रेस पीरियड खत्म करने का प्रस्ताव और कॉग्निजेंट पर 'पर्म' (PERM) बैन.
दुर्गा पूजा 2026 से ठीक पहले 'फिश इंपोर्टर्स एसोसिएशन' ने बांग्लादेश सरकार को पत्र लिखकर पद्मा नदी की 'इलिश' (हिल्सा) मछली के निर्यात पर लगा प्रतिबंध हटाने की मांग की.
'द हिंदू' / सुहासिनी हैदर और विजयेता सिंह की रिपोर्ट: नई दिल्ली में मोदी-शी जिनपिंग द्विपक्षीय वार्ता; सीमा विवाद, एलएसी डिसइंगेजमेंट और व्यापार घाटे पर बड़ा विश्लेषण.
वीडियो
हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ चर्चा हुई कि राहुल गांधी की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और लोकप्रियता का कांग्रेस को चुनावी फायदा क्यों नहीं मिल पा रहा है. क्या कांग्रेस का कमजोर संगठन राहुल गांधी की राह में सबसे बड़ी चुनौती है? क्या राहुल गांधी ने कांग्रेस संगठन पर निर्भर रहने के बजाय सीधे जनता और युवाओं से जुड़ने की रणनीति अपनाई है? और क्या मौजूदा राजनीति अब संगठनों से ज्यादा नेताओं और जनता के बीच सीधे संवाद की लड़ाई बन गई है? बातचीत में कांग्रेस की उत्तर भारत में कमजोर स्थिति, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात में संगठनात्मक चुनौतियों, राहुल गांधी की रणनीति और भाजपा की राजनीतिक तैयारी पर विस्तार से चर्चा हुई. श्रवण गर्ग ने युवाओं और छात्र आंदोलनों के संदर्भ में नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, अरब स्प्रिंग, 1968 के फ्रांस के छात्र आंदोलन और 1974 के जेपी आंदोलन का भी उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि कैसे पारंपरिक राजनीतिक संगठनों से अलग जनता और युवाओं की सक्रियता सत्ता के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती है. चर्चा में यह सवाल भी अहम रहा कि राहुल गांधी की लोकप्रियता को क्या कांग्रेस वास्तविक चुनावी ताकत में बदल पाएगी. 2024 के बाद इंडिया ब्लॉक की स्थिति, विपक्षी दलों के बदलते समीकरण और 2027-2029 के चुनावी परिदृश्य पर भी बातचीत हुई. देखिए पूरा हरकारा डीप डाइव और जानिए श्रवण गर्ग का विश्लेषण. #HarkaraDeepDive #ShravanGarg #RahulGandhi #Congress #NarendraModi #IndianPolitics #PoliticalAnalysis #Harkara #YouthPolitics #BJP#HarkaraDeepDive,#ShravanGarg,#RahulGandhi,#Congress,#NarendraModi,#IndianPolitics,#PoliticalAnalysis,#Harkara,#YouthPolitics,#BJP,#IndiaPolitics,#RahulGandhiNews,#CongressPolitics,#OppositionPolitics,#IndiaAlliance,#PoliticalStrategy,#IndianDemocracy,#YouthMovement,#StudentPolitics,#Election2027,#Election2029,#PoliticalLeadership,#GrassrootsPolitics,#CongressOrganization,#BJPPolitics,#IndianElections,#PoliticalDebate,#DemocracyInIndia,#HarkaraNews
हरकारा डीप डाइव के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग चर्चा कर रहे हैं. राहुल गांधी के छात्र संवाद और मोदी के ‘सच की गूंज’ वाले पलटवार के बीच सियासी बहस किस दिशा में जा रही है? छात्रों के मुद्दे, रोजगार और विपक्ष की रणनीति पर. आज रात 9 बजे
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ एपीसीआर के नेशनल सेक्रेटरी नदीम खान से बातचीत हुई. चर्चा का केंद्र सहारनपुर में मस्जिद पर हुई बुलडोजर कार्रवाई और देश के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक स्थलों के खिलाफ हो रही कार्रवाइयां हैं. सहारनपुर में अदालत के आदेश के बाद इतनी जल्दबाजी में बुलडोजर कार्रवाई क्यों की गई? क्या प्रभावित पक्ष को अपील का पर्याप्त अवसर मिला? नदीम खान इस मामले में "ड्यू प्रोसेस" और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हैं. बातचीत में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, राजस्थान और अन्य राज्यों में मस्जिदों, दरगाहों और मदरसों से जुड़े मामलों का भी जिक्र हुआ. क्या इन घटनाओं के पीछे कोई समान पैटर्न दिखाई देता है? क्या धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों में 1991 के पूजा स्थल अधिनियम की अनदेखी हो रही है? और इन मामलों में निचली अदालतों, प्रशासन और पुलिस की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है? नदीम खान ने यह भी बताया कि बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाने वाले स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई का क्या असर पड़ता है और प्रभावित लोगों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ना कितना मुश्किल हो जाता है. बातचीत के अंत में सहारनपुर के सामाजिक माहौल, समुदाय के भीतर मौजूद गुस्से और इस आशंका पर चर्चा हुई कि कहीं हिंसा के जरिए राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश तो नहीं की जा रही.