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विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026: भारत छह स्थान फिसला, पाकिस्तान पांच पायदान ऊपर चढ़ा
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‘एनएचआरसी’ मुसलमानों पर हो रहे हमलों की अनदेखी कर रहा है और उन मामलों में दखल दे रहा है जो उससे संबंधित नहीं हैं: इलाहाबाद हाई कोर्ट
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ट्रंप ने ईरान का प्रस्ताव ठुकराया, कहा- परमाणु समझौता होने तक जारी रहेगी नौसैनिक नाकेबंदी
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योगेंद्र यादव: पश्चिम बंगाल चुनाव में अल्पसंख्यकों को बाहर करने की साज़िश
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‘हम बनाम वे’ की मानसिकता से पैदा होती है हेट स्पीच; कानूनों का खराब प्रवर्तन ‘हेट क्राइम्स’ की वजह: सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कार्ति चिदंबरम के मामले की सुनवाई से खुद को किया अलग, शराब कंपनी से कथित रिश्वत का आरोप
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दाभोलकर हत्याकांड: बॉम्बे हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी शरद कलस्कर को दी जमानत, रोक लगाने की याचिका खारिज
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हरकारा डीप डाइव | पत्रकार सुमित झा| क्या गरीबी का संबंध जाति से है? तेलंगाना सर्वे ने दिया जवाब!
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भारत में हर 8 मिनट में एक परिवार हार्ट फेलियर के इलाज के लिए बेच रहा है अपनी संपत्ति
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‘मेड इन इंडिया’ संकट: बंगाल चुनाव में ‘एसआईआर’ ने महानगरों में बढ़ाई घरेलू सहायकों की किल्लत
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भारत की ‘गोल्डीलॉक्स’ अर्थव्यवस्था का मिथक; जीडीपी के मामले में भारत से आगे निकले जापान और ब्रिटेन
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“वोट देने के लिए भरोसा नहीं, लेकिन चुनाव कराने के लिए उन पर पूरा भरोसा है” : बंगाल के चुनाव अधिकारी जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए
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औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर मार्च में 5 महीने के निचले स्तर 4.1% पर पहुँची; पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद पहला महीना
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ईरान संघर्ष: नए शीत युद्ध की आहट, होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अमेरिकी नाकाबंदी जारी
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डिजिटल अरेस्ट घोटाला: व्हाट्सएप ने 9,400 खाते बंद किए, सुप्रीम कोर्ट को बताया — पूरे नेटवर्क को किया ध्वस्त
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वैश्विक तेल उत्पादक समूह को बड़ा झटका: यूएई ने ओपेक और ओपेक+ छोड़ा
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‘जिसका खाता है, उसे लेकर आओ’: ओडिशा में बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचा शख्स
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अमेरिका-भारत रिश्तों में तनाव: ट्रंप की टिप्पणी, भारत की चुप्पी और उठते बड़े सवाल
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“धार्मिक पहचान के कारण बनाया निशाना”, एमपी में हिरासत में लिए गए 155 मुस्लिम छात्रों के अभिभावकों का आरोप
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बंगाल चुनाव में आलू का भी दर्द; भाजपा को क्यों दिख रही है उम्मीद
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ट्रंप के इतने करीब कैसे पहुँचा बंदूकधारी?
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किसका पलड़ा भारी है दो माह से जारी जंग के बाद..
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डीप डाइव विद श्रवण गर्ग | ममता की हार का मतलब देश के लिए क्या होगा?
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बिरयानी के बाद तरबूज खाया और फिर 4 मौतें: मुंबई में एक त्रासदी जो 12 घंटों के भीतर घटित हुई
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आकार पटेल: भाजपा मुस्लिमों का पूर्ण बहिष्कार चाहती है
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बंगाल: मछली और झींगा भी मुद्दा; डेल्टा क्षेत्र के बड़े दांव वाले चुनाव में जीविका और वफादारी का असर
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“लॉरेंस ही कर्म है”: मोदी के भारत का गैंगस्टर जो आइकन बन गया
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‘मर्ज़ लाइलाज है, पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है’
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राघव चड्ढा और बड़ी समस्या: नेता-केंद्रित दलों की संरचनात्मक कमजोरी
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ओडिशा में खनन विरोध पर सख्ती: दलित-आदिवासी प्रदर्शनकारियों को ज़मानत के बदले पुलिस थाने साफ करने की शर्त
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द ग्रेट भाजपा वाशिंग मशीन
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पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड मतदान: 92% वोटिंग के पीछे क्या है असली कहानी?
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आप में फूट: राघव चड्ढा ने बगावत की, 6 सांसदों के साथ भाजपा में शामिल, मित्तल को 10 दिन पहले ईडी ने घेरा था
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‘इन तर्कों को ट्रिब्यूनल के समक्ष रखें’: सुप्रीम कोर्ट का उन लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार, जिनके नाम बंगाल ‘एसआईआर’ के बाद हटाए
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भाजपा की योजनाओं पर हिटलर की छाप: बेबी ने ‘एसआईआर’ को हिंदुत्व की बड़ी योजना का हिस्सा बताया
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एनसीएल के खदान विस्तार में शहरी-ग्रामीण इलाक़े प्रभावित, कम मुआवज़े पर लोगों की ज़मीन ली जा रही
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एक अलग आवाज़: बंगाल बोल रहा है, भारत को सुनना चाहिए
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होर्मुज़ में बारूदी सुरंगें बिछाने वालों को देखते ही गोली मारने का ट्रम्प का आदेश
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शमशेरगंज एक सैंपल: मतदान से पहले ही ‘एसआईआर’ ने बदला चुनावी समीकरण, भाजपा को वोटिंग से पूर्व लाभ
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परिसीमन की राजनीति:उत्तर-दक्षिण असंतुलन और कंपनसेशन पॉलिटिक्स
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क्या गरीबी सच में ‘जातिहीन’ है? तेलंगाना सर्वे ने ‘समान हालात’ की सदियों पुरानी दलील तोड़ी
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और तो और ये साहब भी यथावत हैं, बल्कि जज साहब का तबादला हो गया!
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जब मतदाता ही गुम हो जाए: बंगाल चुनाव में लोकतंत्र का अनकहा संकट
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2006 मालेगांव ब्लास्ट केस: बॉम्बे हाई कोर्ट ने चार आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप रद्द किए
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लोकतंत्र की अप्रत्याशित घर वापसी
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मोदी के भाषण और आचार संहिता पर विवाद, 700 नागरिकों की चिट्ठी से बढ़ी बहस, “टॉकिंग न्यूज़” में विस्तृत चर्चा
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“अब नहीं आऊंगा दोस्त…”: सूरत से पलायन की पीड़ा के बीच नोएडा से तमिलनाडु तक मज़दूर असंतोष
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मोदी बनाम ममता: पूरा दिल्ली दरबार उतर आया है एक राज्य के चुनाव को जीतने?
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आकार पटेल: ईरान को छोड़कर किसी भी अन्य देश की तुलना में भारतीयों ने सबसे अधिक कष्ट झेला है और झेल रहे हैं
भारतीय समयानुसार गुरुवार तड़के ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (आरएसएफ) द्वारा प्रकाशित विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत 180 देशों में से 157वें स्थान पर खिसक गया है. पिछले साल वैश्विक मीडिया स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 151वें स्थान पर था. भारत का परमाणु-संपन्न पड़ोसी देश पाकिस्तान 153वें स्थान पर है, जो पिछले साल के 158वें स्थान से बेहतर हुआ है.
इंडियन एक्सप्रेस के ओपिनियन कॉलम में स्वराज इंडिया के सदस्य और भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव लिखते हैं कि पिछले 10 महीनों में पश्चिम बंगाल में ‘स्पेशल इम्पेडिमेंट रिमूवल’ (एसआईआर) के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाना एक सामान्य बात बन गई है. बंगाल का यह मामला मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का एक असाधारण उदाहरण है.
अमेरिकी न्यूज़ वेबसाइट एक्सियोस के रिपोर्टर बराक राविड की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के उस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है जिसमें पहले होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने और नाकेबंदी हटाने, और फिर परमाणु वार्ता को बाद के चरण तक टालने की बात कही गई थी. ट्रंप ने एक्सियोस को बताया कि जब तक ईरानी शासन अमेरिका की चिंताओं को दूर करने वाले परमाणु समझौते पर सहमत नहीं हो जाता, तब तक वह ईरान पर नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखेंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (29 अप्रैल, 2026) को कहा कि नफरत भरे भाषण (हेट स्पीच) और अफवाह फैलाना “हम बनाम वे” की मानसिकता से उपजा है और यह एक विविध समाज में भाईचारे की भावना को दूषित करने का काम करता है. हालांकि, अदालत ने नफरत भरे भाषणों और अपराधों के खिलाफ विशिष्ट कानून बनाने का निर्देश देने से इनकार कर दिया, इसके बजाय इस अपराध को कवर करने वाले मौजूदा कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने का आव्हान किया.
महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को पुणे में सुबह की सैर के दौरान मोटरसाइकिल सवार दो हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. इस मामले की जांच पहले स्थानीय पुलिस ने की थी और बाद में उनकी बेटी मुक्ता दाभोलकर की याचिका पर 2014 में इसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया था.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने तीखी टिप्पणी करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) पर आरोप लगाया कि वह मुसलमानों के खिलाफ हिंसा के गंभीर मामलों की अनदेखी कर रहा है, जबकि उन मामलों में लगा हुआ है “जो प्रथम दृष्टया उसके कार्यक्षेत्र से संबंधित नहीं हैं.”
दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने मंगलवार को कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम की उस याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिसमें उन्होंने सीबीआई द्वारा दर्ज कथित भ्रष्टाचार मामले को रद्द करने की मांग की थी. यह मामला कथित ‘डियाजियो स्कॉटलैंड रिश्वत प्रकरण’ से जुड़ा है. सीबीआई का आरोप है कि वर्ष 2005 में, जब पी. चिदंबरम केंद्रीय वित्त मंत्री थे, तब कार्ति चिदंबरम ने शराब कंपनी डियाजियो स्कॉटलैंड को उसकी व्हिस्की की ड्यूटी-फ्री बिक्री पर लगे प्रतिबंध से राहत दिलाने में भूमिका निभाई थी.
तेलंगाना का ताज़ा जाति सर्वे इस सोच को खारिज करता है कि अगर समाज से जाति खत्म करनी है तो जाति जनगणना की जरूरत नहीं है. आंकड़े साफ दिखाते हैं कि जाति आज भी हर जगह मौजूद है, चाहे गांव में पानी पीने की व्यवस्था हो या शहर में रहने की स्थिति. अनुसूचित जाति के परिवार सामान्य वर्ग की तुलना में लगभग चार गुना ज़्यादा मेडिकल लोन लेते हैं. इसका कारण यह है कि इन समुदायों के लोग अधिकतर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहां नौकरी की सुरक्षा या स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं नहीं होतीं. बीमारी की स्थिति में इन्हें पहले झोला-छाप डॉक्टरों के पास जाना पड़ता है, और जब हालत बिगड़ती है तो महंगे निजी अस्पतालों में क़र्ज़ लेकर इलाज कराना पड़ता है. यह क़र्ज़ भी अक्सर बैंक से नहीं बल्कि निजी मनीलेंडर्स से लिया जाता है, जिसे चुकाने के लिए कई बार मज़दूरी तक करनी पड़ती है.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
हरकारा डीप डाइव के एक ऑडियो संस्करण में वरिष्ठ विश्लेषक श्रवण गर्ग के साथ भारत-अमेरिका संबंधों पर विस्तृत बातचीत की गई. इस चर्चा में मुख्य रूप से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा भारत को लेकर की गई अपमानजनक टिप्पणी और भारत सरकार की प्रतिक्रिया या कहें, चुप्पी, पर सवाल उठाए गए. ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर माइकल सैवेज की एक टिप्पणी साझा की, जिसमें भारत को “नर्क” कहा गया और भारतीयों को “गैंगस्टर्स विद लैपटॉप्स” जैसे शब्दों से संबोधित किया गया.
पश्चिम बंगाल का 2026 का विधानसभा चुनाव अब सिर्फ एक राज्य की सत्ता का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे देश की राजनीति और लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला एक निर्णायक ‘कुरुक्षेत्र’ बन चुका है. ‘हरकारा डीप डाइव’ पर ऑडियो पॉडकास्ट में, वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने इस चुनाव के उन अनछुए पहलुओं पर रोशनी डाली, जो इसे आज़ाद भारत के सबसे जटिल और अभूतपूर्व चुनावों में से एक बनाते हैं. वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग इस चुनाव की तुलना ‘प्लासी के युद्ध’ से करते हैं. उनका मानना है कि बंगाल में जिस तरह से ‘मीर जाफरों’ और ‘जगत सेठों’ की तलाश की गई है, वह अभूतपूर्व है. ममता बनर्जी के खिलाफ इस बार भयंकर सत्ता विरोधी लहर है. 2021 के मुकाबले इस बार भाजपा ने हिंदू वोटों की नाराज़गी को और गहरा किया है, वहीं 30% वाले मुस्लिम वोट बैंक में भी दरार डालने की कोशिश की है.
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.


हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में हमने पत्रकार सुमित झा से गहन बातचीत की, जिन्होंने तेलंगाना के जातिगत सर्वे से उजागर हुई असमानताओं पर साउथ फर्स्ट में विस्तृत लेखों की श्रृंखला लिखी है. तेलंगाना का 2024 का जाति सर्वे, एक ऐसा सर्वे जो सिर्फ आंकड़े नहीं देता, बल्कि समाज की छुपी परतों को उधेड़ कर सामने रखता है. बातचीत में यह समझने की कोशिश की गई कि क्या सच में हम जाति से आगे बढ़ चुके हैं, या जाति आज भी हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी को चुपचाप नियंत्रित कर रही है.
सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य के स्तर पर अब भी पीछे हैं. इलाज के लिए क़र्ज़ लेना, असंगठित काम में फंसा रहना, और बुनियादी सुविधाओं की कमी, ये सब सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि जीवन की कठोर सच्चाइयां हैं. वहीं दूसरी तरफ, सरकारी योजनाओं का बड़ा हिस्सा उन वर्गों तक पहुंच रहा है जो पहले से ही अपेक्षाकृत मज़बूत हैं.