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हार्वर्ड के मित्तल संस्थान ने नौ दिवसीय हिंदू कथा की बुकिंग में मदद की, फिर उसके अपने फ़ैकल्टी ने विरोध कर दिया
अगस्त के महीने में नौ दिनों तक प्रतिदिन लगभग 1,000 श्रद्धालुओं की भीड़ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के ऐतिहासिक 'सैंडर्स थिएटर' में एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु द्वारा भगवान राम के जीवन चरित्र का पाठ सुनने के लिए उमड़ी. यह एक भक्तिमय मैराथन थी, जिसे भारतीय मीडिया आउटलेट्स ने हार्वर्ड के लिए एक ऐतिहासिक क्षण के रूप में कवर किया.
लेकिन पर्दे के पीछे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी हफ्तों से इस आयोजन से अपना नाम पूरी तरह अलग करने की जद्दोजहद में लगी हुई थी, जैसा कि ‘द क्रिमसन’ में अमन्न एस. महाजन की रिपोर्ट में बताया गया है.
15 से 23 अगस्त तक आयोजित यह "राम कथा" भारतीय आध्यात्मिक गुरु मोरारी बापू के मार्गदर्शन में हुई. इसका वित्तपोषण 'हाउस ऑफ लॉर्ड्स' के कंजर्वेटिव सदस्य लॉर्ड डोलर पोपट के बेटे पावन पोपट द्वारा संचालित एक ब्रिटिश चैरिटी संस्था ने किया था.
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‘ब्रिक्स पे’ क्या है, और क्या यह पश्चिम की स्विफ्ट भुगतान प्रणाली का मुकाबला कर सकता है?
‘अल जज़ीरा’ में प्रियंका शंकर की रिपोर्ट कहती है कि ब्रिक्स देशों के समूह का मुख्य उद्देश्य पश्चिमी देशों के वैश्विक आर्थिक और वित्तीय वर्चस्व को चुनौती देना है. यह विचार हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के केंद्र में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया. शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स नेताओं ने ब्रिक्स बिजनेस काउंसिल की एक प्रमुख पहल—'ब्रिक्स पे'—में निवेश करके स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार (क्रॉस-बॉर्डर) भुगतान प्रणालियों के विस्तार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई.
सम्मेलन के समापन पर जारी संयुक्त घोषणापत्र में नेताओं ने स्वीकार किया कि भुगतान प्रणालियों में "सभी के लिए एक ही नियम लागू नहीं हो सकता". उन्होंने सीमा पार भुगतान तंत्र पर केंद्रित केंद्रीय बैंकों के सहयोगात्मक मंच 'ब्रिक्स पेमेंट्स टास्क फोर्स' (बीपीटीएफ) को ऐसे व्यावहारिक समाधान तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया, जो अधिक तेज, सस्ते, सुलभ, पारदर्शी और सुरक्षित हों.
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भाजपा सरकार में भारत की अकादमिक स्वतंत्रता ‘गंभीर रूप से प्रतिबंधित’: रिपोर्ट
‘द हिंदू’ के मुताबिक, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क स्कॉलर्स एट रिस्क की वार्षिक ‘फ्री टू थिंक 2026’ रिपोर्ट ने भारत में अकादमिक स्वतंत्रता को ‘गंभीर रूप से प्रतिबंधित’ श्रेणी में रखा है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत का अकादमिक स्वतंत्रता सूचकांक यानी एएफआई स्कोर 2015 में 0.41 से घटकर 2024 में 0.16 और 2026 में 0.14 हो गया. यह सूचकांक 0 से 1 के पैमाने पर अकादमिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शोध और शिक्षण की स्वतंत्रता, अकादमिक आदान-प्रदान, परिसर की स्वतंत्रता और संस्थागत स्वायत्तता जैसे मानकों को मापता है.
स्कॉलर्स एट रिस्क की स्थापना 1999 में हुई थी और इसके नेटवर्क में 40 देशों के 650 से ज्यादा विश्वविद्यालय, अकादमिक संगठन और शैक्षणिक संस्थान शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच 59 देशों और क्षेत्रों में अकादमिक स्वतंत्रता से जुड़े 321 सत्यापित घटनाक्रमों में 382 हमले दर्ज किए गए. इनमें भारत में 42 मामले सामने आए, जो किसी भी देश के लिए सबसे अधिक थे. इनमें हिंसा, गिरफ्तारी और शिक्षकों या छात्रों का पद गंवाना शामिल था.
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बिजनौर में मुस्लिम शिक्षक की गोली मारकर हत्या, आरोपी ने ‘लव जिहाद’ का लगाया आरोप
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में 43 वर्षीय सरकारी प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक नौशाद अहमद की मंगलवार को गोली मारकर हत्या कर दी गई. पुलिस के मुताबिक, वारदात को अंजाम देने वाले 32 वर्षीय किसान गौरव चौधरी ने बाद में नजीबाबाद थाने में आत्मसमर्पण किया और दावा किया कि उसने शिक्षक को इसलिए गोली मारी क्योंकि उसे लगता था कि नौशाद अहमद ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा दे रहे थे. हालांकि, पुलिस इस दावे के साथ दोनों के बीच कुछ दिन पहले हुए कथित व्यक्तिगत विवाद की भी जांच कर रही है.
नौशाद अहमद पुरुषोत्तमपुर गांव के प्राथमिक विद्यालय में तैनात थे. मंगलवार दोपहर स्कूल से घर लौटते समय कथित तौर पर उन पर हमला किया गया. पुलिस के अनुसार, आरोपी पहले से उनका इंतजार कर रहा था. जैसे ही अहमद वहां पहुंचे, उसने कथित तौर पर गोली चला दी और मोटरसाइकिल से मौके से फरार हो गया.
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बच्चे के कैंसर इलाज के लिए हर साल 32 हजार से ज्यादा गरीब परिवार शहरों का रुख करते हैं
‘डाउन टू अर्थ’ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बच्चों के कैंसर का इलाज बड़े शहरों में केंद्रित होने के कारण हर साल 32,000 से ज्यादा कम आय वाले परिवारों को अपने बच्चों के इलाज के लिए गांवों और छोटे शहरों से महानगरों का रुख करना पड़ता है. देश में हर साल करीब 50,000 बच्चे कैंसर से प्रभावित होते हैं, लेकिन विशेषज्ञ उपचार की सुविधाएं मुख्य रूप से बड़े शहरों में उपलब्ध होने के कारण गरीब परिवारों के सामने इलाज के साथ रहने की भी बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है.
सितंबर को बचपन के कैंसर के प्रति जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है. कैंसर मरीजों की देखभाल करने वाली गैर-लाभकारी संस्था सेंट जुड्स इंडिया के मुताबिक, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए अस्पतालों के आसपास सुरक्षित और किफायती आवास मिलना मुश्किल होता है. जिन परिवारों के पास कुछ पैसे होते हैं, वे कम लागत वाली लॉज में रहने की कोशिश करते हैं, लेकिन पैसे खत्म होने के बाद कई परिवार रेलवे स्टेशनों या अस्पतालों के बाहर फुटपाथ पर रहने को मजबूर हो जाते हैं.
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सभी मनुस्मृति ग्रंथों में पक्षपात: शिक्षाविदों ने केंद्र व भाजपा के दावों को गलत बताया, ब्रिटिश काल की मिलावट के दावों को चुनौती
कई शिक्षाविदों (विशेषज्ञों) ने केंद्र सरकार और भाजपा के इस दावे का खंडन किया है कि मनुस्मृति की वे विवादित सामग्रियां, जो गहरी जातिगत और लैंगिक असमानता को बढ़ावा देती हैं, मूल पाठ (टेक्स्ट) का हिस्सा नहीं हो सकती हैं और प्रचलन में मौजूद संस्करणों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.
शिक्षाविदों ने कहा कि मनुस्मृति के सभी संस्करण—जो 'धर्मशास्त्र' नामक प्राचीन ग्रंथों के संग्रह का हिस्सा हैं और सामाजिक, कानूनी व नैतिक मानदंडों पर चर्चा करते हैं—शूद्रों और अति-शूद्रों को शैक्षिक तथा आर्थिक अधिकारों से वंचित करने के मामले में एकमत हैं, जिन्हें ग्रंथ द्वारा निर्धारित जाति व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर रखा गया है.
बसंत कुमार मोहंती की रिपोर्ट के अनुसार, मनुस्मृति पर सरकार का बचाव 30 जुलाई को राज्यसभा में परीक्षा पेपर लीक के लिए सजा बढ़ाने वाले विधेयक पर चर्चा के दौरान सामने आया था, जब विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस पुस्तक की एक प्रति का हवाला देते हुए इसे पढ़ना चाहा था.
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अमेरिका-ईरान युद्ध की लागत $38 बिलियन पहुंची, हर महीने $3 बिलियन बढ़ने का अनुमान
कांग्रेस के गैर-पक्षपातपूर्ण लेखापरीक्षक (सीबीओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच छह महीने से जारी युद्ध पर अब तक 38 बिलियन डॉलर (364 अरब रुपये 1 अगस्त तक) खर्च हो चुके हैं और इसमें प्रति माह 3 बिलियन डॉलर की अतिरिक्त बढ़ोतरी का अनुमान है. सीबीओ के मुताबिक, 2027 की पहली तिमाही में यह युद्ध महंगाई (मुद्रास्फीति) में 0.5% की वृद्धि कर सकता है.
गोला-बारूद की भारी कमी और तैयारियों पर असर
‘रॉयटर्स’ में जैकब बोगेज की रिपोर्ट है कि लागत का एक बड़ा हिस्सा सैन्य सामग्री और मिसाइलों की तेज खपत से जुड़ा है. सीबीओ का मानना है कि अमेरिकी हथियारों के भंडार को फिर से भरने में लगभग 5 साल लग सकते हैं. रॉयटर्स के अनुसार, अमेरिका अपनी लगभग सभी लंबी दूरी की सटीक मिसाइलों का इस्तेमाल कर चुका है.
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रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, अमेरिकी सदन में विधेयक आगे बढ़ा
‘द हिन्दू’ के मुताबिक, अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले भारत समेत अन्य देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को देने वाले विधेयक को आगे बढ़ा दिया है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026 ने 15 सितंबर की शाम प्रतिनिधि सभा में एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक बाधा पार की. इसके पक्ष में 214 और विरोध में 211 वोट पड़े.
दो डेमोक्रेट सांसदों ने अपनी पार्टी से अलग जाकर रिपब्लिकन सांसदों के साथ विधेयक के पक्ष में मतदान किया. अब प्रतिनिधि सभा में इस पर अंतिम मतदान 16 सितंबर को होने की उम्मीद है.
अमेरिका का आरोप है कि रूस के कच्चे तेल से होने वाली कमाई यूक्रेन के खिलाफ युद्ध को वित्तीय मदद देती है. इसी आधार पर विधेयक में रूस के प्रमुख तेल व्यापार साझेदारों पर दबाव बढ़ाने का प्रस्ताव है. भारत और चीन जैसे देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति को दिया जा सकता है.
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भारत का ग्रेट फायरवॉल: पोस्ट हटाना आसान, चुनौती देना मुश्किल
‘आर्टिकल-14’ की वरिष्ठ संपादक कविता अय्यर ने लिखा है कि भारत में ऑनलाइन सेंसरशिप की सरकारी व्यवस्था तेजी से ऐसी दिशा में बढ़ रही है, जहां सोशल मीडिया सामग्री हटाना बेहद आसान और उस कार्रवाई को चुनौती देना मुश्किल होता जा रहा है. प्लेटफॉर्म्स को सरकारी या अदालत के आदेश पर सामग्री हटाने के लिए मिलने वाली समय-सीमा 36 घंटे से घटाकर तीन घंटे कर दी गई है. साथ ही, स्वचालित तकनीकी प्रणालियों के बढ़ते इस्तेमाल ने मानवीय समीक्षा की भूमिका भी कम कर दी है.
8 सितंबर 2026 को इंस्टाग्राम ने ‘आर्टिकल-14’ की एक पोस्ट भारत में ब्लॉक कर दी. पोस्ट लद्दाख में सितंबर 2025 के राज्य का दर्जा मांगने वाले प्रदर्शन के दौरान पुलिस गोलीबारी में चार नागरिकों की मौत से जुड़ी रिपोर्ट पर आधारित थी. मृतकों के परिवार एक साल बाद भी यह जानने का इंतजार कर रहे हैं कि गैर-घातक तरीकों के इस्तेमाल से पहले घातक बल क्यों प्रयोग किया गया. न्यायिक जांच भी अभी अपने निष्कर्ष तक नहीं पहुंची है.
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जम्मू-कश्मीर में भूमि अभियान के तहत सरकारी संपत्तियों के कब्जाधारियों को बेदखली के नोटिस
जम्मू और कश्मीर सरकार ने श्रीनगर के पॉश इलाकों में स्थित सरकारी संपत्तियों के उन कब्जाधारियों को बेदखली के नोटिस जारी किए हैं, जिनकी लीज (पट्टे) की अवधि समाप्त हो चुकी है. इसे 2019 के बाद सरकारी जमीन वापस लेने के व्यापक अभियान के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है.
यह पहल उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के प्रशासन द्वारा लागू किए गए 'जम्मू और कश्मीर लैंड ग्रांट रूल्स, 2022' के तहत शुरू किए गए अभियान का हिस्सा लगती है. इन नियमों के तहत प्रशासन को आवासीय उद्देश्यों के लिए मौजूदा/समाप्त पट्टों को छोड़कर, उन सभी पट्टेदारों से जमीन का कब्जा वापस लेने का अधिकार मिला है जिनकी लीज खत्म हो चुकी है. ऐसा न करने पर उन्हें बेदखल कर दिया जाएगा. मुजफ्फर रैना की रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर में कई लोगों का मानना है कि इस तरह की पहल का मकसद स्थानीय कब्जाधारियों को संपत्तियों से हटाकर बाहरी लोगों के लिए बोली लगाने का रास्ता साफ करना है.
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पर्यावरण डेटा को रियल-टाइम करने की प्राथमिकता का अभाव, वर्ना पैसा मांगते वक्त भारत का पक्ष मजबूत होता
भारत दुनिया का सबसे विशाल भूजल निगरानी नेटवर्क संचालित करता है. केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) 1969 से 23,000 कुओं के ज़रिए जलस्तर को ट्रैक कर रहा है. इसके बावजूद, राष्ट्रीय जलविज्ञान परियोजना के तहत लगभग 25,000 में से केवल 5,260 स्टेशनों को ही टेलीमेट्री युक्त 'डिजिटल वाटर लेवल रिकॉर्डर' दिए जा रहे हैं. अंकित मिश्रा के अनुसार, अधिकांश आंकड़े आज भी हाथों से मापे जाते हैं. डिजिटल भुगतान और कर संग्रह में वैश्विक मिसाल पेश करने वाले भारत के पास क्षमता होते हुए भी पर्यावरण डेटा को रियल-टाइम करने की प्राथमिकता का अभाव है.
यह उदासीनता अन्य पर्यावरणीय क्षेत्रों में भी साफ़ झलकती है:
आर्द्रभूमि में देरी: भारत का आर्द्रभूमि मानचित्र वर्षों तक पुराने उपग्रह चित्रों पर निर्भर रहा. 2024 में 2018-19 के चित्रों के आधार पर क्षेत्रफल 16.89 मिलियन हेक्टेयर बताया गया. किसी नियमित वैधानिक सर्वेक्षण चक्र के बिना वर्षों का यह अंतर जल संसाधनों के प्रबंधन में बड़ी बाधा है.
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अगस्त में अनिश्चितकाल के लिए स्थगित, लेकिन एक माह बाद भी सत्रावसान नहीं; जानिए देरी के मायने और विपक्ष के सवाल
13 अगस्त को संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था, लेकिन इसके एक महीने बाद भी दोनों सदनों का सत्रावसान नहीं हुआ है. सत्रावसान वह आधिकारिक प्रक्रिया है जो किसी संसदीय सत्र का औपचारिक अंत करती है. संवैधानिक रूप से सत्रावसान का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, लेकिन इस असामान्य विलंब ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा और विवाद को जन्म दे दिया है.
विपक्ष का आरोप है कि सरकार विवादास्पद ‘लोकसभा विस्तार-आधारित परिसीमन विधेयक’ को दोबारा पेश करने की फिराक में है. महिला आरक्षण को लागू करने के लिए लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 850 करने से जुड़े इस संविधान संशोधन विधेयक को अप्रैल 2026 के विशेष सत्र में संयुक्त विपक्ष ने खारिज कर दिया था. यह पहला मौका था जब मोदी सरकार कोई संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने में विफल रही थी.
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कांति बाजपेयी | भारत और चीन ‘नैश संतुलन’ की स्थिति में हैं; क्या यह कायम रहेगा?
क्या 25 अगस्त को सीमा पर जारी आठ सूत्रीय परिणामों और सहमति पत्र और अभी-अभी संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक के बाद हम भारत-चीन संबंधों के रुख को लेकर थोड़े से अधिक समझदार हुए हैं?
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में कांति बाजपेयी ने लिखा है कि अगस्त के बयान और शिखर सम्मेलन के बाद भारत और चीन द्वारा जारी दो बयान जो संकेत देते हैं, वह यह है कि सीमा के संबंध में दोनों पक्ष ‘नैश संतुलन’ में हैं. अर्थशास्त्र की मूलभूत समझ से दूर मुझ जैसे लोगों के लिए, ब्रिटानिका ऑनलाइन के अनुसार, नैश संतुलन किसी गैर-सहयोगपूर्ण खेल का वह परिणाम है जिसमें "कोई भी खिलाड़ी अपनी रणनीति बदलकर अपने अपेक्षित परिणाम में सुधार नहीं कर सकता."
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'द क्रिमसन' रिपोर्ट: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में मोरारी बापू की 'राम कथा' पर विवाद; संस्थागत तटस्थता नीति और फैकल्टी विरोध के बाद विश्वविद्यालय ने नाम वापस लिया.
'अल जज़ीरा' रिपोर्ट: प्रियंका शंकर का विश्लेषण; 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 'ब्रिक्स पे' (BRICS Pay) की घोषणा, डॉलर निर्भरता कम करने और SWIFT के समानांतर भुगतान विकल्प की तैयारी.
'द हिंदू' की विशेष रिपोर्ट: न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की 'फ्री टू थिंक 2026' रिपोर्ट में भारत की अकादमिक स्वतंत्रता 'गंभीर रूप से प्रतिबंधित' श्रेणी में, यूजीसी नियमों व कैंपस पाबंदियों पर सवाल.
'मकतूब मीडिया' की ग्राउंड रिपोर्ट: बीजनौर में प्राथमिक शिक्षक की गोली मारकर हत्या, आरोपी का 'लव जिहाद' का दावा और पुलिस द्वारा आपसी रंजिश के कोण की जांच.
'डाउन टू अर्थ' रिपोर्ट: भारत में बच्चों के कैंसर का इलाज बड़े शहरों में केंद्रित, 32,000 गरीब परिवारों की विस्थापन समस्या और सेंट जुड्स इंडिया का मददगार मॉडल.
बसंत कुमार मोहंती की रिपोर्ट: संसद और सार्वजनिक मंचों पर मनुस्मृति को लेकर राजनीतिक बहस; भाजपा-आरएसएस के दावों, आंबेडकरवादी विचारों और शिक्षाविदों के तर्कों का विस्तृत विश्लेषण.
'रॉयटर्स' रिपोर्ट: अमेरिका-ईरान युद्ध के 6 महीने में $38 बिलियन खर्च; गोला-बारूद की भारी कमी से रक्षा तैयारियों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बढ़ा आर्थिक दबाव.
'द हिंदू' की विशेष रिपोर्ट: अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्स में रूस से तेल खरीदने वाले देशों (भारत, चीन) पर 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति डोनाल्ड ट्रंप को देने वाला विधेयक पारित.
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'हरकारा डीप डाइव' के इस एपिसोड में निधीश त्यागी एवं रीबॉर्न मनीष के साथ स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण, ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक नैरेटिव, सत्ता के संरक्षण और बदलते सामाजिक माहौल पर विस्तार से बातचीत हुई. क्या स्वतंत्र भारद्वाज सिर्फ एक व्यक्ति हैं या पिछले वर्षों में विकसित हुई एक बड़ी राजनीतिक-सामाजिक प्रवृत्ति का हिस्सा? क्या सत्ता के करीब होने का भरोसा कुछ लोगों के भीतर कानून का डर खत्म कर रहा है? और क्या संवैधानिक व्यवस्था के समानांतर ऐसी ताकतें मजबूत हो रही हैं, जिनके लिए नियमों की सीमाएं अलग हैं? रीबॉर्न मनीष ने बातचीत में फासीवाद की संरचना, ‘फोर्स’ और ‘कंसेंट’ की राजनीति तथा गैर-राज्य तत्वों की भूमिका को समझाने की कोशिश की. चर्चा में ‘अर्बन नक्सल’, ‘खान मार्केट गैंग’ और ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक नैरेटिव के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सिविल डिफेंस’ और ‘दिमागी नक्सल’ संबंधी बयानों से लेकर अग्निवीर योजना तक, बातचीत में यह सवाल उठाया गया कि आने वाले समय में प्रशिक्षित लेकिन बेरोजगार युवाओं की भूमिका क्या होगी. उमर खालिद और सिद्दीकी कप्पन जैसे मामलों के जरिए कानून के कथित असमान इस्तेमाल, लंबे समय तक जेल में रहने और नागरिक स्वतंत्रताओं पर भी चर्चा हुई. जंतर-मंतर की घटना के संदर्भ में नई पीढ़ी के बदलते राजनीतिक नजरिए पर भी बात हुई. क्या आज का युवा हिंदू-मुसलमान और मंदिर-मस्जिद की राजनीति से आगे रोजगार, शिक्षा और शांति को प्राथमिकता दे रहा है? क्या पुराने राजनीतिक नैरेटिव अब पहले की तरह प्रभावी नहीं रहे? रीबॉर्न मनीष के मुताबिक, “यह नशा अब फट चुका है, लोग वापस जाग रहे हैं.” वहीं उनका मानना है कि लंबे समय से दबा असंतोष आने वाले समय में नए सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व को जन्म दे सकता है. पूरी बातचीत देखिए और समझिए कि स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण के पीछे दिखाई देने वाली राजनीति और सामाजिक प्रवृत्ति को किस बड़े संदर्भ में देखा जाना चाहिए. रीबॉर्न मनीष के फेसबुक लेख https://www.facebook.com/share/p/1EWZWnsNWN/ #HarkaraDeepDive #RebornManish #NidheeshTyagi #SwatantraBhardwaj #DimaagiNaxal #CivilDefence #Agniveer #IndianPolitics #Fascism #Democracy #CivilLiberties #harkaramapnakarenge #Harkara #JantarMantar #CivilDefence #IndiaPolitics #Fascism #Agniveer #UmarKhalid #Constitution #RSS #HindiPodcast #NidheeshTyagi #DeepDive #Democracy #IndianYouth #FreeSpeech स. मिलाजुला सेट — यूट्यूब के लिए यही सुझाव है #हरकारा #जंतरमंतर #दिमागीनक्सल #सिविलडिफेंस #अग्निवीर #उमरखालिद #फासीवाद #संविधान #भारतीयराजनीति #हिंदीपॉडकास्ट #Harkara #JantarMantar #IndiaPolitics #Agniveer #HindiPodcast
हरकारा डीप डाइव के इस खास एपिसोड में निधीश त्यागी एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, भारत की विदेश नीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक भूमिका पर विस्तार से चर्चा हुई. ब्रिक्स से भारत को क्या हासिल हुआ और क्या कुछ हासिल नहीं हो पाया? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मंच के जरिए ग्लोबल साउथ में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका मजबूत करना चाहते थे? क्या ब्रिक्स में अमेरिका और चीन को लेकर भारत का रुख स्पष्ट दिखाई दिया? बातचीत में क्रिटिकल मिनरल्स, सप्लाई चेन, चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा, अमेरिका के साथ व्यापार और निवेश, रूस से तेल खरीद, डी-डॉलराइजेशन और पश्चिम एशिया में भारत की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई. साथ ही पहलगाम हमले के ब्रिक्स घोषणा-पत्र में उल्लेख, क्रॉस-बॉर्डर टेररिज्म, ईरान-इजराइल संघर्ष और फिलिस्तीन के सवाल पर भारत के रुख को भी परखा गया. श्रवण गर्ग ने यह सवाल भी उठाया कि क्या ब्रिक्स के जरिए भारत वास्तव में ग्लोबल साउथ का नेतृत्व कर पाया या फिर रूस और चीन के प्रभाव वाले इस मंच पर भारत की भूमिका सीमित ही रही. चर्चा का एक अहम सवाल यह भी है कि अगर चीन और अमेरिका दोनों के साथ भारत के अपने-अपने रणनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हैं, तो मौजूदा विदेश नीति में भारत आखिर किस दिशा में आगे बढ़ रहा है? पूरी बातचीत देखिए और समझिए कि ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण रहा और इसके दूरगामी प्रभाव क्या हो सकते हैं. #HarkaraDeepDive #ShravanGarg #NidheeshTyagi #BRICS #NarendraModi #IndiaForeignPolicy #GlobalSouth #China #USA #Russia #Geopolitics #IndianPolitics
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हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


स्वतंत्र भारद्वाज को मिली अंतरिम जमानत ने जमानत, जेल व्यवस्था और न्यायपालिका को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है. लेकिन क्या इस बहस को सिर्फ एक व्यक्ति की जमानत तक सीमित रखना चाहिए? हरकारा डीप डाइव में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने स्वतंत्र भारद्वाज की जमानत से आगे भारतीय जेल व्यवस्था, विचाराधीन कैदियों, न्याय तक समान पहुंच और मीडिया के अलग-अलग मामलों में अलग रवैये पर विस्तार से बात की. बातचीत में उमर खालिद, शरजील इमाम, गुरमीत राम रहीम और बिलकिस बानो मामले जैसे संदर्भों के जरिए यह सवाल उठाया गया कि जेल, जमानत और रिहाई को लेकर समाज और मीडिया की प्रतिक्रिया अलग-अलग क्यों दिखाई देती है. साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट की 'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' वाली टिप्पणी, संस्थागत भरोसे और लोकतंत्र में जनता की भूमिका पर भी चर्चा हुई. क्या स्वतंत्र भारद्वाज की जमानत को सिर्फ कानूनी घटना के रूप में देखना चाहिए? या इसके जरिए न्याय व्यवस्था, मीडिया और समाज के रवैये को भी परखना चाहिए? श्रवण गर्ग इस पूरे सवाल को एक अलग नजरिए से देखते हैं. पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं. स्वतंत्र भारद्वाज सिर्फ एक चेहरा या बड़ी सियासी प्रवृत्ति? | रीबॉर्न मनीष https://youtu.be/D0hg9AC_zD4 #HarkaraDeepDive #ShravanGarg #SwatantraBhardwaj #IndianJudiciary #Democracy #CivilLiberties