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भारत में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास: हिंदी विरोधी आंदोलन से किसान आंदोलन तक
‘अल जज़ीरा’ यशराज शर्मा ने लिखा है कि भारत में चुनावी मतदाता सूची से जुड़े विवादों को लेकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ताओं के पास आंदोलनों की एक लंबी ऐतिहासिक विरासत है. हाल के दिनों में दिल्ली के मध्य हिस्सों में हजारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे युवा प्रदर्शनकारियों को धरना देने के लिए जगह हासिल करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. छात्र संगठनों और विपक्षी दलों के आंदोलन के बीच सोमवार को बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे.
सरकार ने प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रविरोधी हितों से जुड़ा बताने की कोशिश की है. हालांकि, भारत का इतिहास बताता है कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक जन आंदोलनों ने देश की राजनीति और समाज को गहराई से प्रभावित किया है. राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई के अनुसार, सरकारें समय-समय पर आंदोलनों का विरोध करती रही हैं, लेकिन विरोध प्रदर्शन भारत की राजनीतिक यात्रा का अभिन्न हिस्सा रहे हैं.
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राजनीति का अपराधीकरण: भारत के लोकतंत्र के लिए बढ़ता खतरा
‘काउंटरकरंट्स’ में वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव लिखते हैं कि भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों से जुड़े नेताओं में अक्सर जन प्रदर्शनों को लेकर डर और बेचैनी देखी जाती है. विरोध प्रदर्शन उनके लोकप्रिय समर्थन के दावों को चुनौती देते हैं. जब बड़ी संख्या में नागरिक सड़कों पर उतरते हैं, तो नेताओं के सहयोगियों, आर्थिक समर्थकों और राजनीतिक दलों के बीच भी उनकी राजनीतिक उपयोगिता को लेकर सवाल उठने लगते हैं. इससे उनके राजनीतिक नेटवर्क में दरार पड़ सकती है.
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को रद्द करने की मांग पर हो रहे प्रदर्शनों के बावजूद न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनावी प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने के आरोपों के मामले में ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही तय करने में न्यायपालिका की कथित निष्क्रियता ने आम लोगों, खासकर युवाओं को निराश किया है. इससे न्यायपालिका की भूमिका और उसकी स्वतंत्रता को लेकर संदेह बढ़ा है.
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जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल की सूची से बाहर: जब लोकतंत्र को पीछे हटने के लिए कहा जाता है
‘साउथ फर्स्ट’ में पी.वी. कोंडल राव लिखते हैं कि दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का फैसला लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और उसकी व्यावहारिक उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है. किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करना और उसे राजनीतिक रूप से अप्रभावी बना देना दो अलग बातें हैं.
दिल्ली के केंद्र में स्थित जंतर-मंतर लंबे समय से न्याय, जवाबदेही और राजनीतिक बदलाव की मांग करने वाले नागरिकों का प्रमुख स्थल रहा है. मजदूरों, किसानों, छात्रों, महिलाओं और नागरिक समाज के संगठनों ने यहां प्रदर्शन किए हैं. संसद और केंद्र सरकार के संस्थानों के नजदीक होने के कारण यह जगह केवल एक खुला मैदान नहीं, बल्कि अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से उठाने का महत्वपूर्ण माध्यम रही है. ऐसे में इसे निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाना महज प्रशासनिक बदलाव नहीं है. इससे विरोध की पहुंच, दृश्यता और प्रभाव पर असर पड़ सकता है.
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अशोक लवासा | भारत निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता का बढ़ता संकट
क्या भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) मुहावरेदार रूप से और संस्थागत तौर पर असमंजस व उथल-पुथल की स्थिति से गुजर रहा है? क्या 'फॉर्म 6' इसकी साख के पतन का कारण बनेगा, और क्या 'फॉर्म 7' के अनुचित उपयोग ने इसके लिए असहज स्थितियाँ पैदा कर दी हैं? इन फार्मों से जुड़े विवादों ने "हम, भारत के लोग" के संवैधानिक मताधिकार की रक्षा करने की जिम्मेदारी उठाने वाली इस शीर्ष संवैधानिक संस्था की छवि को गहरा आघात पहुँचाया है.
अशोक लवासा के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग को जनता का अटूट विश्वास अर्जित करने में दशकों की अनवरत मेहनत और पारदर्शिता लगी थी. हालाँकि, हाल के दिनों में आयोग को जिस तरह के तीखे जन-आक्रोश, मीडिया जांच और सामाजिक आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है, वैसा इतिहास में कभी नहीं देखा गया. संस्था के शीर्ष पदों पर बैठे कुछ व्यक्तियों के अड़ियल रवैये ने उन सभी नागरिकों की वाजिब चिंताओं को खारिज कर दिया, जो कभी इस संस्था की निष्पक्षता की कसम खाते थे.
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ई.ए.एस. शर्मा | चुनाव आयोग एसआईआर रोके, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव रद्द करे
‘काउंटरकरंट्स’ में भारत सरकार के पूर्व सचिव ई.ए.एस. शर्मा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को लिखे पत्र में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने चुनाव आयोग से देशभर में चल रही एसआईआर प्रक्रिया रद्द करने, पश्चिम बंगाल में इसी प्रक्रिया के आधार पर कराए गए विधानसभा चुनावों को अमान्य घोषित करने और चुनावी आंकड़ों के प्रबंधन में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) की भूमिका की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है.
शर्मा ने छह अक्टूबर 2026 को लिखे अपने पिछले पत्र का हवाला देते हुए मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 के इस्तेमाल, सॉफ्टवेयर के जरिए कथित अतार्किक तरीके से नाम हटाने और नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 में अनधिकृत बदलावों पर सवाल उठाए हैं.
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सुरभि गुप्ता | एलन मस्क को मोदी और अंबानी के खिलाफ देखकर अपना हीरो बनाने से पहले सतर्क रहना चाहिए
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने न्यूयॉर्क स्थित न्यू लाइंस मैगजीन की दक्षिण एशिया संपादक सुरभि गुप्ता के साथ एलन मस्क, रिलायंस प्रमुख मुकेश अंबानी और भारत सरकार के बीच उभरे विवाद पर चर्चा की. बातचीत में यह सवाल प्रमुखता से उठा कि मस्क की टिप्पणियां केवल भारत में अपने कारोबार के विस्तार से जुड़ी हैं या इनके पीछे भारत-अमेरिका संबंधों और बदलते राजनीतिक समीकरणों के संकेत भी छिपे हैं.
एलन मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर आरोप लगाया कि कुछ प्रभावशाली कारोबारी उनकी सैटेलाइट इंटरनेट कंपनी स्टारलिंक को भारत में प्रवेश करने से रोक रहे हैं. उन्होंने मुकेश अंबानी का नाम लेते हुए सवाल किया कि क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं. इसके अगले दिन उन्होंने ‘प्राइम मिनिस्टर अंबानी’ लिखकर भी तंज कसा. भारत सरकार ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया. इस घटनाक्रम ने कारोबारी प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक रसूख और सरकारी फैसलों पर बड़े उद्योगपतियों के प्रभाव को लेकर बहस छेड़ दी है.
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जिन मांगों का हवाला देकर चुनाव आयोग ने बदले थे सीसीटीवी फुटेज संबंधी नियम, नहीं दिया उनका रिकॉर्ड
‘द वायर’ में अंकित राज की यह विस्तृत रिपोर्ट भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा चुनावी पारदर्शिता और सीसीटीवी फुटेज तक सार्वजनिक पहुँच को सीमित करने के विवादास्पद फैसलों पर प्रकाश डालती है. अगस्त 2025 में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा मतदाता सूची में अनियमित्ताओं के आरोपों के बाद, ईसीआई ने गोपनीयता का हवाला देकर सीसीटीवी फुटेज को नष्ट करने की नीति का बचाव किया था.
निर्वाचन आयोग का कहना था कि कोई भी परेशान उम्मीदवार 45 दिनों के अंदर अपने चुनाव को चुनौती देने के लिए संबंधित हाईकोर्ट में इलेक्शन पिटीशन फाइल कर सकता है. अगर यह याचिका फाइल की जाती है, तो सीसीटीवी फुटेज रख ली जाती है; नहीं तो, इसका कोई मकसद नहीं है- जब तक कि आपका इरादा कोई वोटर की निजता भंग करने का न हो.
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मुकुल केसवन | ‘दमनकारी अभियान’ का मुख्य जरिया बना चुनाव आयोग, और एसआईआर इसका घातक हथियार
मुकुल केसवन का मानना है कि जंतर मंतर 2.0’ राजनीतिक विश्लेषकों और विचारकों को विद्रोही युवाओं—जिन्हें सत्ता द्वारा ‘कॉकरोच’ का नाम दिया गया—के नेतृत्व में उभर रहे नागरिक समाज आंदोलनों के चुनावी निहितार्थों तथा सीमाओं पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करेगा. क्या अभिजीत दीपके और उनकी टोली नरेंद्र मोदी के विशालकाय 'लेवियाथन' यानी सत्ता के उस बेहद शक्तिशाली राक्षसी तंत्र का मुकाबला कर पाएगी? क्या वे आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों में ज़रा सा भी फर्क डाल पाने में सक्षम होंगे?
फिलहाल ये सवाल किसी विचार-लेखन के अनुमान का खेल मात्र हैं, क्योंकि इसका कोई निश्चित उत्तर किसी के पास नहीं है. ठीक वैसे ही, जैसे 'जंतर मंतर 1.0' के दौर में हम इसके इतिहास, पृष्ठभूमि और भविष्य की संभावनाओं के बारे में कुछ नहीं जानते थे. इसलिए, किसी दूरगामी नतीजे पर पहुँचने की जल्दबाज़ी करने से बेहतर है कि हम इस दौर के उस अनोखे और अजीब जादू का प्रत्यक्ष अनुभव करें.
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दोनों चुनाव आयुक्तों की चिंताओं के बीच चुनाव आयोग में नए उप चुनाव आयुक्त नियुक्त, संजय कुमार को समय से पहले मूल काडर में भेजा
‘द हिंदू’ में श्रीपर्णा चक्रवर्ती की रिपोर्ट है कि 2010 बैच के आईएएस अधिकारी प्रकाश राजपुरोहित को भारत निर्वाचन आयोग में उप चुनाव आयुक्त (डीईसी) नियुक्त किया गया है. वह संजय कुमार के समय से पहले अपने मूल काडर में वापस लौटने से खाली हुए पद को भरेंगे, जो मतदाता सूची और आईटी प्रभाग के प्रभारी थे.
इस नई नियुक्ति के बाद चुनाव आयोग में कार्यों का आवंटन कैसा होगा, यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि संजय कुमार अगस्त 2024 से इस साल अगस्त तक उप चुनाव आयुक्त रहे थे और चुनाव आयोग के मतदाता सूची व आईटी प्रभागों के लिए जिम्मेदार थे. उन्होंने देश में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) शुरू करने वाले चुनाव आयोग के 24 जून 2025 के आदेश पर हस्ताक्षर भी किए थे.
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मणिपुर हिंसा: नगा संगठन ने मारे गए व्यक्ति का सिर वापस पाने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया
भारत में स्टारलिंक के लॉन्च में हो रही देरी से निराश एलन मस्क ने अरबपति मुकेश अंबानी पर अपना हमला तेज कर दिया है.
‘एक्स’ पर रिलायंस प्रमुख के खिलाफ अपने हालिया तीखे हमले में, मस्क ने तंज कसते हुए उन्हें “प्रधानमंत्री अंबानी” कहा और उन पर अपने खुद के टेलीकॉम साम्राज्य की रक्षा के लिए उनकी स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सेवा को भारत से बाहर रखने का आरोप लगाया.
मस्क ने यह कहते हुए भी मज़ाक उड़ाया कि वे यह पहचानने में विफल रहे कि भारत में असल हुकूमत किसकी चलती है: “प्रिय प्रधानमंत्री अंबानी, कृपया यह न समझ पाने के लिए मेरी विनम्र माफी स्वीकार करें कि आप भारत के असली बॉस हैं.”
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मणिपुर हिंसा: कुकी-नागा के बीच ताजा झड़पों में 5 लोगों की मौत, गोलीबारी हुई, 10 घर जलाए गए
‘पीटीआई’ के मुताबिक, मणिपुर के कामजोंग और उखरूल जिलों में सशस्त्र समूहों के बीच हुई ताजा झड़पों में पांच लोगों की मौत हो गई.
अधिकारियों ने शनिवार को बताया कि नागा-बहुसंख्यक कामजोंग जिले के कुकी-प्रधान चासाद गांव में 22 वर्षीय एक युवक और 42 वर्षीय एक महिला की हत्या कर दी गई. अधिकारियों ने बताया कि पांच बच्चों की मां उस महिला को शुक्रवार रात गर्दन के पास गोली मारी गई थी और कुछ ही मिनटों में उसकी मौत हो गई.
उन्होंने आगे बताया कि उसकी हत्या के कारण कुकी और नागा सशस्त्र समूहों के बीच गोलीबारी शुरू हो गई, जो शनिवार सुबह तक जारी रही. इसके बाद हुई झड़पों में उस युवक की मौत हो गई, और इस दौरान 10 घरों को भी आग के हवाले कर दिया गया.
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मणिपुर के गुटों ने भारत में राज्य के 1949 के विलय के खिलाफ बंद का आह्वान किया
मणिपुर के सात प्रतिबंधित सशस्त्र समूहों ने 1949 में भारतीय संघ के साथ राज्य के विलय के विरोध में "राष्ट्रीय काला दिवस" (नेशनल ब्लैक डे) मनाने के लिए 15 अक्टूबर को 12 घंटे के बंद का आह्वान किया है.
‘द हिंदू’ ब्यूरो के मुताबिक, मुख्य रूप से इम्फाल घाटी के मैतेई समुदाय के इन समूहों ने कहा कि चिकित्सा आपात स्थिति, मीडिया संचालन और धार्मिक गतिविधियों सहित आवश्यक सेवाओं को इस बंद से छूट दी जाएगी.
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एम.ए. बेबी | बैरिकेड्स लोकतंत्र की आवाज़ को खामोश नहीं कर सकते
पिछले कुछ महीनों में जंतर-मंतर के बैरिकेड्स पर भारी हलचल देखी गई है. भारत के निर्वाचन आयोग (ईसीआई) में घटी घटनाओं पर हालिया मीडिया खुलासे से विरोध प्रदर्शनों की एक नई लहर पैदा हुई, इस बार निशाना मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार थे. कुमार के इस्तीफे की मांग अब स्वयं चुनावी शुचिता की मांग बन चुकी है. सीईसी के खिलाफ जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन से पहले, 2 अक्टूबर 2026 को पूरे नई दिल्ली जिले में धारा 163 (बीएनएसएस) के तहत निषेधाज्ञा लागू कर दी गई थी. कई मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए और यातायात पर भारी प्रतिबंधों की घोषणा की गई.
इन उपायों ने प्रदर्शनकारियों के हौसले पस्त नहीं किए, लेकिन दिल्ली पुलिस द्वारा किए गए सामूहिक कस्टडी/हिरासत और प्रतिबंध कई ऐसे कठिन सवाल खड़े करते हैं जिनका जवाब मिलना बाकी है: यह राजधानी किसकी है? ये सड़कें किसकी हैं? जुलाई 2026 में, राजधानी के तय विरोध स्थल 'जंतर-मंतर' ने वर्ष के सबसे बड़े युवा विरोध प्रदर्शनों में से एक देखा, जो अंततः प्रदर्शनकारियों के लिए एक बड़ी जीत में तब्दील हुआ.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'स्वदेशी जागरण मंच' की केंद्र सरकार से मांग: एलन मस्क की 'स्टारलिंक' सेवा को भारत में बैन करने का आग्रह; लैटरल लेजर लिंक्स, सुरक्षा और इंटरनेट पाबंदी पर चिंताएं.
'द हिंदू' सुहासिनी हैदर-अनंत कृष्णन रिपोर्ट: लद्दाख में 28 स्थानों के नामकरण पर भारत-चीन विवाद, 2 साल बाद नक्शों पर पहली बड़ी तनातनी.
'अल जज़ीरा' यशराज शर्मा की विशेष रिपोर्ट: 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन से लेकर किसान आंदोलन और 'कॉकरोच आंदोलन' तक, भारत के जन-आंदोलनों का ऐतिहासिक इतिहास.
'काउंटरकरंट्स' में अरुण श्रीवास्तव का तीखा लेख: जन प्रदर्शनों से नेताओं की घबराहट, चुनाव आयोग पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट का रुख और 10-11 अक्टूबर के दिल्ली दमन का विस्तृत विश्लेषण.
'साउथ फर्स्ट' पी.वी. कोंडल राव का विश्लेषण: दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध, लोकतांत्रिक अधिकारों की सीमाएं और वैकल्पिक स्थलों की चुनौतियां.
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का बड़ा विश्लेषण: 'फॉर्म 6' और 'फॉर्म 7' का दुरुपयोग, 'ईसीआईनेट' डेटा केंद्रीकरण और चुनाव आयोग के विश्वसनीयता का संकट.
'द वायर' अंकित राज की पड़ताल: चुनाव आयोग द्वारा सीसीटीवी फुटेज और वीडियो रिकॉर्डिंग छिपाने पर उठे सवाल; निजता का तर्क और आरटीआई में डेटा न होने का खुलासा.
'हरकारा डीप डाइव' सुरभि गुप्ता का विश्लेषण: एलन मस्क का मुकेश अंबानी पर 'प्राइम मिनिस्टर अंबानी' तंज, स्टारलिंक एंट्री और भारत-अमेरिका संबंधों के संकेत.
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