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अपूर्वानंद | आज जो लोग जुलूस में आए, उन्होंने भारतीय जनतंत्र का पहला सबक सीखा और भारतीय राज्य का असली चेहरा भी देखा.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ जंतर मंतर पर सोनम वांगचुक के समर्थन में हुए आंदोलन, पुलिस कार्रवाई, सीजेपी की रणनीति और बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर विवाद पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्र सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह सवाल था कि क्या सरकार, आंदोलन और पुलिस तीनों ही लोकतांत्रिक जवाबदेही की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं.
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने बताया कि जब वे शाम को जंतर मंतर पहुंचे तब प्रदर्शन लगभग समाप्त हो चुका था, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर अब भी देश के अलग-अलग हिस्सों से आए युवाओं, छात्रों, महिलाओं और बुजुर्गों के जत्थे मौजूद थे. उनके अनुसार पुलिस ने बेहद छोटे समूहों पर भी बिना किसी स्पष्ट आवश्यकता के आंसू गैस का इस्तेमाल किया और लोगों को बलपूर्वक तितर-बितर किया. उन्होंने ऐसे कई लोगों से मुलाकात की जिन्हें पुलिस ने पीटा था.
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वो सात कारण, क्यों यह विशाल विरोध-प्रदर्शन अलग है और जिसने मोदी सरकार को झकझोर कर रख दिया है
दिल्ली में आयोजित छात्रों का 'संसद मार्च' अब केवल एक परीक्षा घोटाले या पेपर लीक के खिलाफ विरोध तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह केंद्र सरकार की नीतियों, संस्थागत क्षरण और प्रशासनिक कार्यशैली के खिलाफ एक व्यापक पीढ़ीगत बगावत बन चुका है. 'जेन-ज़ी' के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन ने राजनीतिक जवाबदेही को सीधे देश के शीर्ष नेतृत्व के सामने ला खड़ा किया है.
‘द वायर’ ने अपने विश्लेषण में सात कारण बताए हैं कि क्यों यह विशाल छात्र आंदोलन खास और दूसरों से अलग है और क्यों इसने मोदी सरकार को झकझोर कर रख दिया है:
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आकार पटेल | सत्ता को विरोध से डर लगता है
कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन को देखकर कुछ बातें ज़ेहन में आती हैं.
सोनम वांगचुक समेत कार्यकर्ताओं की भूख हड़ताल की एक ही माँग थी, शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दें. क्यों? क्योंकि मंत्री अपने सबसे अहम कामों में से एक में नाकाम रहे नीट (NEET) परीक्षा को बिना भ्रष्टाचार के करा पाना. पाठकों को याद होगा कि 2024 में पेपर लीक हुआ था, फिर भी वही मंत्री पद पर बने रहे, बल्कि पद से चिपके रहे.
इस साल सरकार को मानना पड़ा कि इस मामले में भ्रष्टाचार हुआ है, और उसने परीक्षा रद्द कर दी. इससे 20 लाख छात्र-छात्राएँ मुश्किल में पड़े. उनके परिवारों को भी जोड़ लें, तो सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले क़रीब एक करोड़ भारतीय थे. सब के सब उस भारी तनाव, चिंता और असुरक्षा के शिकार हुए, जो भारतीयों को लगातार सताती रहती है.
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संसद की तरफ मार्च कर रहे सीजेपी प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई, वांगचुक का भूख हड़ताल जारी रखने का संकल्प, सरकार-सीजेपी के बीच बातचीत
सोमवार (20 जुलाई 2026) को संसद मार्ग की ओर से संसद भवन की तरफ बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा बलों ने संसद मार्ग थाने के बाहर रोक दिया. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों ने बर्बर लाठीचार्ज किया, जिसमें कुछ प्रदर्शनकारी घायल हो गए और उन्हें मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया. ‘द हिंदू’ ब्यूरो के मुताबिक, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले भी छोड़े, जिन्हें संसद से मात्र 200 मीटर दूर रायसीना रोड पर रोक दिया गया. संसद मार्च जंतर-मंतर से शुरू हुआ था, जहाँ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) 20 जून से धरना दे रही है. यह प्रदर्शन संसद के मानसून सत्र के पहले दिन के साथ ही आयोजित हुआ.
सीजेपी ने सोमवार को कहा कि उसके प्रवक्ताओं ने स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा से मुलाकात की और उन्हें एक पत्र सौंपा. इस पत्र में सोनम वांगचुक को तत्काल रिहा करने, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और नीट-यूजी पेपर लीक के बाद जान गंवाने वाले सभी अभ्यर्थियों के लिए एक-एक करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की गई है. पार्टी के अनुसार, “नड्डा ने मांगों पर “उपयुक्त स्तर” पर चर्चा करने का आश्वासन दिया है. लेकिन कोई प्रतिबद्धता (ठोस आश्वासन) नहीं जताई गई है.
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अपूर्वानंद | आंदोलन अब सोनम वांगचुक और सीजेपी से भी बड़ा हो चुका है
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का कहना है कि सोनम वांगचुक का अनशन अब एक ऐसे जन आंदोलन में बदल चुका है, जो किसी एक व्यक्ति या संगठन की सीमाओं से बहुत आगे निकल गया है. दिल्ली, मुंबई, शांतिनिकेतन और जयपुर सहित देश के कई शहरों में लोग सड़कों पर इसलिए उतरे क्योंकि उन्होंने एक अहंकारी सत्ता का वह चेहरा देखा, जो शांतिपूर्ण और अहिंसक विरोध को भी बलपूर्वक दबाने के लिए तैयार है.
जंतर-मंतर से पुलिस द्वारा अनशनरत सोनम वांगचुक को जबरन हटाकर अस्पताल ले जाने की घटना ने लोगों को गहराई से झकझोर दिया. इसे केवल वांगचुक के साथ हुआ व्यवहार नहीं, बल्कि हर नागरिक के सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला माना गया. लंबे समय से लोगों के भीतर जमा असंतोष इस घटना के बाद खुलकर सामने आ गया. अब आंदोलन केवल सरकार से बातचीत कराने या किसी प्रतिनिधि के आने का इंतजार नहीं कर रहा, बल्कि लोग स्वयं अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए यह बता रहे हैं कि लोकतंत्र में उनकी भी आवाज और भागीदारी है.
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श्रवण गर्ग | क्या मोदीजी डर गए हैं कि अब बच्चे भी उनसे नहीं डरते?
कॉकरोच जनता पार्टी का असली आंदोलन तो अब शुरू हुआ है. उसकी ताक़त की परीक्षा अब होनी है कि वांगचुक की अनुपस्थिति में कैसे और इतने दिन चल पाता है. पार्टी के पास सोनम वांगचुक के क़द का कोई अन्य चेहरा नहीं है. सिद्ध करना पड़ेगा कि किसी अण्णा हजारे या वांगचुक के बिना भी आंदोलन को ज़िंदा रखा जा सकता है. कॉकरोचों का आंदोलन अगर हक़ीक़त में ग़ैर-राजनीतिक और गांधीवादी है तो अभिजीत दीपके को चाहिए कि वे मेधा पाटकर से मराठी में संपर्क करके उन्हें मनाएँ कि वे अपने ‘नर्मदा बाधाओ आंदोलन’ को छोड़ जंतर-मंतर पर आकर बैठ जाएँ और उसे विश्वसनीयता प्रदान करें. वे आएँगी नहीं.
मेधा पाटकर जानती हैं उन्हें जीवन में क्या करना है. वांगचुक नहीं जानते थे. (हालाँकि एक इंटरव्यू में वांगचुक ने कहा है कि लद्दाख के एलजी ने उन्हें दीपके से संपर्क करने के लिए ‘विवश’ किया था). बताया गया है कि वांगचुक की अनुपस्थिति में उनकी पत्नी गीतांजलि आंदोलन को लीड करने वाली है. वांगचुक इस समय सरकार की मेडिकल कस्टडी में हैं. यह कस्टडी कब तक चलेगी पता नहीं.
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भवानी शंकर नायक | भारत में दो भूख हड़तालों की कहानी
भूख हड़ताल राजनीति में एक नैतिक रणनीति है, जिसका उद्देश्य सत्ता में बैठे लोगों की मानवीय चेतना को जगाना होता है. इतिहास में इसका उपयोग शासक वर्ग को अधिक मानवीय बनाने और समाज को लोकतांत्रिक दिशा में आगे बढ़ाने के लिए किया गया है. महात्मा गांधी ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनसमर्थन जुटाने के लिए भूख हड़ताल का सहारा लिया. उन्होंने विभाजन के दौरान हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए भी "आमरण अनशन" की रणनीति अपनाई. गांधी के इस अहिंसक हस्तक्षेप का असर हुआ और नोआखाली के दंगे थम गए. भारत, अफ्रीका और आयरलैंड के स्वतंत्रता आंदोलनों में भी भूख हड़ताल एक महत्वपूर्ण राजनीतिक हथियार रही है. जेलों में बंद कैदियों ने भी अपनी मांगों के समर्थन में इसका इस्तेमाल किया है. इस तरह भूख हड़ताल आज भी अहिंसक प्रतिरोध की साझा राजनीतिक भाषा बनी हुई है.
गांधी से लेकर सोनम वांगचुक तक, स्वतंत्र भारत में अनेक भूख हड़तालें अहिंसक प्रतिरोध और आत्मबलिदान की भावना के साथ की गई हैं. गांधी इसे आत्मानुशासन और आत्मशुद्धि का माध्यम मानते थे, जो शासक और जनता दोनों की नैतिक चेतना को संबोधित करता है तथा उन्हें शांति और अहिंसा के रास्ते पर ले जाता है. ऐसे आंदोलनों ने भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है, लोकतंत्र को मजबूत किया है और नागरिक अधिकारों के विस्तार में योगदान दिया है. भूख हड़ताल का यह तरीका लगभग सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और व्यक्तियों ने अपने-अपने उद्देश्यों के लिए अपनाया है.
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श्रवण गर्ग | मानसून सत्र सिर्फ कानून बनाने का सत्र नहीं, लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला सत्र भी हो सकता है.
हरकारा डीप डाइव के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने संसद के मानसून सत्र, जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन, कॉकरोच जनता पार्टी की पहल, सोनम वांगचुक के समर्थन में उभरते जन प्रतिरोध और सरकार के सामने खड़ी राजनीतिक चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्रीय प्रश्न यह था कि क्या यह मानसून सत्र केवल विधायी कामकाज का सत्र होगा या भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है.
चर्चा की शुरुआत जंतर-मंतर पर प्रस्तावित छात्र मार्च और उसके पहले पुलिस की कार्रवाई से होती है. श्रवण गर्ग का कहना है कि संसद शुरू होने से पहले जिस तरह आंदोलनों पर रोक, गिरफ्तारियों और प्रशासनिक सख्ती की खबरें सामने आई हैं, उससे टकराव का माहौल बनता दिखाई देता है. उनका मानना है कि यह स्थिति स्वतः भी पैदा हो सकती है और योजनाबद्ध भी हो सकती है. उन्होंने आशंका जताई कि यदि आंदोलन का नेतृत्व धीरे-धीरे राजनीतिक दलों और विभिन्न समूहों के हाथ में चला जाता है, तो इसकी दिशा और प्रभाव दोनों बदल सकते हैं.
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'मुस्कान या नफ़रत?': मेटा के एआई स्मार्ट ग्लास ने कैसे बदल दी एक ट्रांस व्यक्ति की ज़िंदगी
दिल्ली की 38 वर्षीय ग्राफिक इलस्ट्रेटर और कलाकार शुभनम की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के ऑनलाइन उत्पीड़न की नहीं, बल्कि एआई आधारित पहनने योग्य तकनीक, सोशल मीडिया एल्गोरिदम और निजता के अधिकार से जुड़े गंभीर सवालों की कहानी है. ट्रांस अधिकारों से जुड़े एक प्रदर्शन के दौरान शुभनम का वीडियो उनकी अनुमति के बिना मेटा के एआई-संचालित रे-बैन स्मार्ट ग्लास से रिकॉर्ड किया गया. कुछ ही घंटों में यह वीडियो इंस्टाग्राम पर वायरल हो गया और बाद में एक्स, यूट्यूब तथा अन्य प्लेटफॉर्म पर भी फैल गया.
‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, वीडियो के वायरल होते ही शुभनम ट्रांसफोबिक टिप्पणियों, मीम और एआई से तैयार की गई अपमानजनक तस्वीरों का निशाना बन गए. उनकी तस्वीरों को बदलकर उनका मजाक उड़ाया गया और उन्हें अपमानजनक कार्टून पात्रों से जोड़ा गया. शुभनम कहते हैं कि अब लोग उन्हें एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि इंटरनेट पर वायरल हुए मीम के रूप में पहचानते हैं. उनके मुताबिक, जहां भी जाते हैं, लोगों की नजरों में या तो व्यंग्य होता है या असहिष्णुता. इस घटना ने उनकी निजी जिंदगी और सार्वजनिक जीवन दोनों को प्रभावित किया है.
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“वे अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेज रहे हैं, लेकिन हमारा क्या?”; सुबह होते ही लोगों के समुद्र में तब्दील हो गई मध्य दिल्ली
कुछ ही दूरी पर दिल्ली के एक छात्र संदीप के सिर से खून बह रहा था, लेकिन वह इसी हालत में फुटपाथ पर बैठे थे. उन्होंने आरोप लगाया कि संसद मार्ग के पास लाठीचार्ज के दौरान उन पर वार किया गया था. उन्होंने दावा किया, "उन्होंने मेरे सिर पर मारा और उसके बाद मुझे घसीटकर यहाँ ले आए. अगर हम डर गए तो हमें कायर कहा जाएगा. वे अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेज रहे हैं, लेकिन हमारा क्या?”
‘पीटीआई’ के अनुसार, घरों से छुपकर निकले बच्चों, विभिन्न राज्यों से यात्रा कर पहुंचे बुजुर्गों और हाथों में तख्तियां (प्लैकार्ड) थामे छात्रों समेत हजारों लोग सोमवार को कॉकरोच जनता पार्टी के 'चलो संसद' विरोध-प्रदर्शन के लिए दिल्ली में एकत्र हुए.
सुबह होते ही मध्य दिल्ली लोगों के समुद्र में तब्दील हो गई. भारी भीड़ का एक ड्रोन वीडियो वायरल हो गया, जिसे ‘द हिंदू’ ने भी अपने ‘एक्स’ अकाउंट पर पोस्ट किया था, लेकिन बाद में इसे हटा दिया गया. दिल्ली पुलिस ने कहा कि उसने वायरल ड्रोन वीडियो का संज्ञान लिया है और इस अनधिकृत ड्रोन संचालन की जांच शुरू कर दी है.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
‘हरकारा डीप डाइव’ का विशेष एपिसोड. निधीश त्यागी और प्रोफेसर अपूर्वानंद के बीच जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई, सीजेपी (CJP) की रणनीति और बिहार के भरत तिवारी एनकाउंटर विवाद पर विस्तृत चर्चा.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट और सोशल मीडिया पर वायरल घटना. दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी के आंदोलन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में नागपुर के भारत बनाइत पर बर्बरता का "मारो, सर" वीडियो वायरल; ध्रुव राठी की टिप्पणी.
‘हरकारा डीप डाइव’ का विशेष एपिसोड. निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के बीच संसद के मानसून सत्र के पहले दिन हुए हंगामे, जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन और सरकार की प्रतिक्रिया पर विस्तृत विश्लेषण.
एमनेस्टी इंडिया के पूर्व प्रमुख आकार पटेल का राजनीतिक विश्लेषण. जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक के आंदोलन, नीट परीक्षा विवाद, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और नागरिक अधिकारों पर विशेष टिप्पणी.
‘द वायर’ का विशेष राजनीतिक विश्लेषण. दिल्ली में छात्रों का 'संसद मार्च' क्यों बना मोदी सरकार के लिए बड़ा संकट; जेन-ज़ी (Gen-Z) के नेतृत्व, खौफ टूटने और जवाबदेही के 7 बड़े कारणों पर विस्तृत रिपोर्ट.
‘पीटीआई’ की रिपोर्ट. दिल्ली में सीजेपी के 'चलो संसद' मार्च के दौरान पुलिस लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले छोड़े जाने और अनधिकृत ड्रोन वीडियो वायरल होने पर दिल्ली पुलिस की जांच और गतिरोध का विवरण.
‘द हिंदू’ ब्यूरो की रिपोर्ट. संसद के मानसून सत्र के पहले दिन जंतर-मंतर से निकले ‘संसद चलो’ मार्च पर पुलिस का बर्बर लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले; सोनम वांगचुक का अस्पताल से अनशन जारी रखने का संकल्प.
‘हरकारा डीप डाइव’ का विशेष एपिसोड. निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के बीच संसद के मानसून सत्र, जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन और सरकार के सामने खड़ी राजनीतिक-आर्थिक चुनौतियों पर गहन चर्चा.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार मिल रहे विदेशी सम्मान क्या भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रतीक हैं, या इनके पीछे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की कोई अलग कहानी छिपी है? हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और निधीश त्यागी चर्चा करते हैं कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं, विदेशी पुरस्कारों, इंडियन डायस्पोरा की राजनीति और भारत के भीतर मौजूद चुनौतियों को किस नज़र से देखा जाना चाहिए. इस बातचीत में चर्चा के प्रमुख मुद्दे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिल रहे विदेशी सम्मान. विदेशी पुरस्कारों पर उठे सवाल और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट. इंडियन डायस्पोरा की भूमिका और विदेश यात्राओं की राजनीति. भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और घरेलू चुनौतियां. विदेश नीति, कूटनीति और रणनीतिक हित. क्या विदेशी सम्मान घरेलू राजनीति को प्रभावित करते हैं? अगर आपको यह विश्लेषण महत्वपूर्ण लगा हो तो वीडियो को लाइक करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें. हरकारा. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने पत्रकार शोभन सक्सेना से फ़ीफ़ा विश्व कप, ब्राज़ील की फुटबॉल संस्कृति, अर्जेंटीना से जुड़े विवाद, वीएआर, फ़ीफ़ा के बढ़ते व्यावसायीकरण और भारत में फुटबॉल की स्थिति पर विस्तार से बातचीत की. इस एपिसोड में जानिए. ब्राज़ील में फुटबॉल धर्म की तरह क्यों माना जाता है? आधुनिक फुटबॉल को दक्षिण अमेरिका ने कैसे बदला? अर्जेंटीना और वीएआर विवाद पर क्या हैं सवाल? क्या फ़ीफ़ामें राजनीति और कारोबार का असर बढ़ गया है? भारत और चीन फुटबॉल में पीछे क्यों रह गए? क्या फुटबॉल आज भी दुनिया को जोड़ने वाला सबसे बड़ा खेल है? अगर आपको यह विश्लेषण पसंद आए तो वीडियो को लाइक करें, अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और हरकारा को सब्सक्राइब करना न भूलें. #FIFAWorldCup #Football #Brazil #Argentina #Messi #VAR #FIFA #SportsPolitics #WorldCup #Harkara #HindiPodcast #NidheeshTyagi #ShobhanSaxena
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राम मंदिर ट्रस्ट में सामने आए कथित चढ़ावा अनियमितता के आरोपों ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह सिर्फ वित्तीय गड़बड़ी का मामला है, या इससे राम मंदिर आंदोलन, न्यायिक प्रक्रिया, राजनीतिक परियोजना और संस्थागत जवाबदेही पर भी बहस जुड़ती है? हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद से इन्हीं सवालों पर विस्तार से बातचीत की. चर्चा में राम जन्मभूमि आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले, राम मंदिर ट्रस्ट की जवाबदेही, जांच एजेंसियों पर भरोसा, आरएसएस की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर प्रो. अपूर्वानंद ने अपने विचार रखे. यह बातचीत समकालीन राजनीति, इतिहास और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाती है. अगर वीडियो पसंद आए तो लाइक करें, शेयर करें और हरकारा को सब्सक्राइब करना न भूलें. हरकारा. शोर कम, रोशनी ज़्यादा. #RamMandir #Ayodhya #Harkara #DeepDive #Apoorvanand #NidheeshTyagi #Politics #SupremeCourt #RSS #BJP #IndianPolitics #HindiNews #CurrentAffairs