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भारत-चीन संबंधों में सुधार के बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग का रेड कार्पेट स्वागत
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ब्रिक्स विकासशील देशों के शिखर सम्मेलन के लिए भारत में रेड कार्पेट पर भव्य स्वागत किया गया. यह स्वागत ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी बीजिंग और दिल्ली अपने संबंधों में आए सुधार का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे हैं, हालांकि वे डांवाडोल होती अमेरिकी वैश्विक प्रभुता के दौर में नेतृत्व के लिए चुपचाप प्रतिस्पर्धा भी कर रहे हैं.
‘द गार्डियन’ में ऑलिवर होम्स की रिपोर्ट है कि जैसे ही शी विमान से नीचे उतरे, उन्हें भारतीय सैनिकों के गार्ड ऑफ ऑनर और रंग-बिरंगी पोशाक पहने पारंपरिक नर्तकों के बीच से ले जाया गया. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान का भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पहले ही स्वागत किया जा चुका था.
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‘किताबों ने हौसला बनाए रखा’: नोएडा आंदोलन के आरोपी ने जेल में पास की NET परीक्षा
गौतम बुद्ध नगर जिला जेल में पिछले पांच महीनों से बंद 24 वर्षीय हिमांशु ठाकुर ने अपना अधिकांश समय किताबें पढ़ने में बिताया. किताबों के प्रति उनका यह जुनून तब रंग लाया जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग-राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (यूजीसी-नेट) के परिणाम घोषित हुए: हिमांशु ने इतिहास विषय में 99.3 पर्सेंटाइल हासिल किए. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से इसी विषय में स्नातकोत्तर (एमए) किया है.
ग्रेटर नोएडा जेल में 'द हिंदू' से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, "जेल में मेरा ज्यादातर समय किताबें पढ़ने में बीता. शुरुआत में मैंने नेट परीक्षा की तैयारी पर ध्यान केंद्रित किया. अध्ययन सामग्री जेल के बाहर से दोस्त लाए थे. इसके अलावा मैंने उपन्यास, कविताएं और कहानियां भी पढ़ीं."
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एक समुदाय, सौ नाम: जातीय जनगणना में सही गिनती कैसे होगी?
'द मूकनायक' में दुंद्रा कुमार स्वामी ने प्रस्तावित जातीय जनगणना में जाति पहचान दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि एक ही समुदाय अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. ऐसे में यदि हर नाम को अलग प्रविष्टि के रूप में दर्ज किया गया तो राष्ट्रीय स्तर पर उस समुदाय की वास्तविक संख्या तय करना मुश्किल हो सकता है.
भारत की जाति व्यवस्था सामाजिक, भाषाई और क्षेत्रीय स्तर पर बेहद जटिल है. एक ही समुदाय की पहचान अलग-अलग राज्यों, जिलों और यहां तक कि पड़ोसी गांवों में अलग नामों से हो सकती है. कहीं लोग व्यापक जाति समूह का नाम इस्तेमाल करते हैं तो कहीं उपजाति या स्थानीय पहचान का. नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन सामाजिक समूह एक ही हो सकता है.
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‘बच्चा तो बच्चा ही होता है’: सुप्रीम कोर्ट ने 14 वर्षीय निशू आजाद को मिली धमकियों पर मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 14 वर्षीय निशू आजाद को मिल रही दुष्कर्म की धमकियों और उसके घर पर हुए पथराव के आरोपों पर बेहद गंभीर रुख अपनाया है. निशू ने कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व वाले छात्र विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया था. भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहन की पीठ ने कहा कि कानूनी कार्रवाई की मांग करने पर किसी पीड़िता या उसके परिवार को डराने-धमकाने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
खादीजा इरफान रहीम की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने उत्तर प्रदेश और दिल्ली सरकार से दर्ज प्राथमिकियों (एफआईआर), सुरक्षा इंतजामों और आरोपियों पर हुई कार्रवाई पर स्थिति रिपोर्ट (स्टैटस रिपोर्ट) तलब की है.
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नदीम खान | कानून का चयनात्मक इस्तेमाल कब तक मुसलमानों के खिलाफ होगा?
'हरकारा डीप डाइव' के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं एपीसीआर के नेशनल सेक्रेटरी नदीम खान के साथ सहारनपुर में मस्जिद पर हुई बुलडोजर कार्रवाई और देश के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक स्थलों पर हो रही कार्रवाई के पैटर्न पर विस्तार से चर्चा हुई. बातचीत का केंद्रीय सवाल यह रहा कि क्या ये घटनाएं अलग-अलग स्थानीय विवाद हैं या इनके पीछे एक व्यापक और संगठित राजनीतिक रणनीति काम कर रही है.
सहारनपुर की घटना का जिक्र करते हुए नदीम खान ने कहा कि यहां मामला सिर्फ संपत्ति के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि "ड्यू प्रोसेस" का सवाल सबसे महत्वपूर्ण है. उनके अनुसार, अदालत के आदेश में कार्रवाई का उल्लेख था, लेकिन सीधे ध्वस्तीकरण का आदेश नहीं था. इसके बावजूद अपील का पर्याप्त अवसर दिए बिना सुबह बुलडोजर की कार्रवाई की गई. उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी संपत्ति को लेकर कानूनी विवाद चल रहा हो तो संबंधित पक्ष को ऊपरी अदालत में जाने का अवसर क्यों नहीं दिया गया.
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उमर खालिद की गिरफ्तारी के छह साल: इतिहासकार और कार्यकर्ता की विरासत
'काउंटरकरंट्स' में डेबोर्शी चक्रवर्ती ने उमर खालिद की गिरफ्तारी के छह वर्ष पूरे होने के मौके पर उनके राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष को याद किया है. अक्टूबर 2020 में जब लेखक इतिहास में पीएचडी शुरू करने के लिए भारत से बाहर गए, उससे कुछ दिन पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से इतिहास में पीएचडी पूरी कर चुके उमर खालिद को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. छह साल बाद भी केंद्र सरकार ने उनका मुकदमा शुरू नहीं किया है और वह लगातार जेल में हैं.
उमर खालिद की आदिवासी प्रतिरोध पर लिखी पीएचडी थीसिस हाल ही में एक किताब के रूप में प्रकाशित हुई है. पूर्वी भारत में आदिवासी प्रतिरोध के अपेक्षाकृत कम अध्ययन किए गए इतिहास पर उनका शोध आने वाले समय में विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जा सकता है और छात्रों को इतिहास के शोध की ओर प्रेरित कर सकता है. लेकिन यहां ध्यान इतिहासकार उमर से ज्यादा उस कार्यकर्ता उमर पर है, जिसने पिछले एक दशक के भारतीय छात्र और लोकतांत्रिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
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प्रज्वल रेवन्ना की जेल सेल से मिले फोन में 173 वीडियो फाइलें, जांच में खुलासा
'साउथ फर्स्ट' की रिपोर्ट के मुताबिक, बलात्कार के मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व हासन सांसद प्रज्वल रेवन्ना की बेंगलुरु स्थित केंद्रीय जेल की सेल से बरामद मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच में करीब 173 फाइलें मिली हैं. इनमें कन्नड़, हिंदी, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं की फिल्में, वेब सीरीज और अन्य वीडियो शामिल हैं. कुछ फाइलें पासवर्ड से सुरक्षित थीं, जिन्हें फॉरेंसिक जांच के दौरान खोला गया. जांच में यह भी पाया गया कि मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सक्रिय रूप से इस्तेमाल किए जा रहे थे.
जेल की सेल से मिले एक पेन ड्राइव में भी आपत्तिजनक वीडियो पाए गए, हालांकि इनका रेवन्ना से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामलों से कोई संबंध नहीं बताया गया है.
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कोलकाता में मुस्लिम कॉलेज की उप-प्राचार्य के इस्तीफे के बाद एबीवीपी ने कमरे में गंगाजल छिड़का
'मकतूब मीडिया' की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता के सुरेंद्रनाथ लॉ कॉलेज की उप-प्राचार्य डॉ. मोहम्मदी तरन्नुम के 23 घंटे लंबे छात्र आंदोलन के बाद इस्तीफा देने के अगले दिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े छात्रों ने उनके कमरे में गंगाजल छिड़का और अगरबत्ती जलाई. छात्रों ने इसे पिछले तृणमूल कांग्रेस सरकार के प्रभाव को खत्म करने की कोशिश बताया.
एबीवीपी से जुड़े छात्रों ने तरन्नुम के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान उनके साथ तीखी बहस भी की. तरन्नुम ने आरोप लगाया कि घेराव के दौरान उन्हें उनके कमरे में ही रहने के लिए मजबूर किया गया और कमरे की लाइट तथा पंखा बंद कर दिया गया. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें पानी और खाना जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दी गईं.
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भारत ने तस्करों को रोकने के लिए एक बाड़ बनाई थी; 2024 से, पाकिस्तान 1,200 से अधिक बार इसके ऊपर से निकल गया है
31 जनवरी की सुबह 11:18 बजे, पंजाब के तरनतारन जिले के सीमावर्ती गांव गिलपण के राजस्व अधिकारी पिशौरा सिंह अपनी पगड़ी बांध रहे थे, तभी उन्हें आसमान से एक जानी-पहचानी भनभनाहट सुनाई दी. बाहर निकलकर देखा तो पाकिस्तान की ओर से आया एक ड्रोन उनके घर की रसोई के बगीचे में आ गिरा. बाड़ से महज 700 मीटर दूर गिरे इस ड्रोन पर उर्दू में नीली मुहर लगी थी और उसमें दो पैकेटों में बंद एक किलोग्राम नशीला पदार्थ बंधा था. पिशौरा सिंह ग्राम रक्षा समिति के सदस्य हैं. उन्होंने पुलिस को सूचना देनी चाही, लेकिन स्थानीय अधिकारियों से संपर्क नहीं हो सका. आखिरकार तरनतारन के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के हस्तक्षेप के बाद ही पुलिस और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की टीम मौके पर पहुंची.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में मन अमन सिंह छिना और कमलदीप सिंह बरार की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना पंजाब की 550 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रोजाना खेले जा रहे चूहे-बिल्ली के खेल की एक बानगी भर है.
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सुरजीत एस भल्ला | ‘ब्रिक्स’ को भूल जाइए; यूरोप और अमेरिका के वैश्विक भागीदार के रूप में है भारत का भविष्य
मोदी सरकार में आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रहे सुरजीत एस भल्ला का मानना है कि ब्रिक्स में भारत की उपस्थिति केवल एक दिखावा बनकर रह गई है. भारत को अपने आर्थिक और तकनीकी विकास के लिए ब्रिक्स पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अमेरिका और यूरोप जैसे पश्चिमी देशों के साथ वैश्विक साझेदारी और व्यापार समझौतों को प्राथमिकता देनी चाहिए.
भल्ला के अनुसार, भारत 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स (बीआरआईसीएस) शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, और इस वर्ष समूह की अध्यक्षता भी कर रहा है. यह सवाल पूछने का एक अच्छा समय है: 17 वर्षों के शिखर सम्मेलनों में, इस सदस्यता ने भारत को क्या दिया है?
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कैसे चीन के ‘क्लीन इंटरनेट’ अभियान का नया शिकार बनी नेपाल-तिब्बत आपदा
दक्षिण भारत में निर्वासित जीवन जी रहे 46 वर्षीय तिब्बती छेरिंग फुनत्सोक के रिश्तेदार सीमा के दोनों ओर लापता हैं. नेपाल की ओर से तो सरकारी सूचियों में उनके परिजनों के नाम दर्ज हैं, लेकिन तिब्बत की तरफ से कोई जानकारी न मिलने पर वे अब सिर्फ उनके लिए प्रार्थना ही कर पा रहे हैं. यह सन्नाटा किसी तकनीकी खामी का नहीं, बल्कि चीनी सरकार की डिजिटल सेंसरशिप का नतीजा है.
‘द गार्डियन’ में डेनी विंसेंट की रिपोर्ट के अनुसार, हालिया नेपाल-तिब्बत बाढ़ आपदा चीनी अधिकारियों द्वारा चलाए जा रहे "क्लीन इंटरनेट 2026" अभियान का ताज़ा शिकार बनी है. सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय का यह अभियान फर्जी सूचनाओं को रोकने के नाम पर किसी भी गैर-सरकारी विवरण, अनौपचारिक आंकड़ों और बाढ़ से जुड़ी जमीनी सच्चाई को ‘आपराधिक श्रेणी’ में डाल देता है.
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भारत चीन से कम आयात करना चाहता है, पर उसकी जरूरतें बढ़ती जा रही हैं
भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंध एक जटिल विरोधाभास में उलझे हुए हैं. भारत वर्षों से अपने विशाल पड़ोसी पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को चीनी मशीनों, इलेक्ट्रॉनिक घटकों और कच्चे माल की सख्त जरूरत है. देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर (इलेक्ट्रिक वाहनों के दुर्लभ-पृथ्वी चुंबक) से लेकर फार्मास्यूटिकल उद्योग (दवा सामग्री/एपीआई) तक, चीनी आपूर्ति के बिना कारखानों का पहिया थमने लगता है.
आंकड़ों में गहराता व्यापार असंतुलन
‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में एलिस ट्रैवेली की रिपोर्ट है कि पिछले पांच वर्षों में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार लगभग दोगुना होकर 151 अरब डॉलर प्रति वर्ष पहुंच गया है. हालांकि, यह व्यापार अभूतपूर्व रूप से असंतुलित हो चुका है—भारत अब चीन से सात गुना अधिक सामान खरीदता है जितना वह वहां बेचता है. 2020 की गलवान घाटी झड़प के बाद राजनीतिक और कूटनीतिक संबंध बेहद ठंडे दौर में चले गए थे, लेकिन व्यापार पर इसका कोई असर नहीं पड़ा.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'द गार्डियन' / ऑलिवर होम्स की रिपोर्ट: भारत में 18वें ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान शी जिनपिंग का स्वागत, भारत-चीन संबंधों में सुधार और वैश्विक संतुलन का विश्लेषण.
'द हिंदू' की विशेष रिपोर्ट: नोएडा आंदोलन में गिरफ्तार हिमांशू ठाकुर ने ग्रेटर नोएडा जेल में रहते हुए इतिहास विषय में UGC-NET परीक्षा 99.3 पर्सेंटाइल के साथ पास की.
'द मूकनायक' में दुंद्रा कुमार स्वामी का लेख: प्रस्तावित जातीय जनगणना में जातिगत नामों के वर्गीकरण, उपजातियों और सांख्यिकीय चुनौतियों का विश्लेषण.
सुप्रीम कोर्ट की सीजेआई सूर्य कांत पीठ का बड़ा फैसला: 14 वर्षीय निशू आजाद को दुष्कर्म की धमकियों पर सख्त रुख, यूपी और दिल्ली पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट तलब.
'मकतूब मीडिया' रिपोर्ट: कोलकाता के सुरेंद्रनाथ लॉ कॉलेज की उप-प्राचार्य का 23 घंटे के आंदोलन के बाद इस्तीफा और ABVP छात्रों पर कमरे के 'शुद्धिकरण' का आरोप.
'साउथ फर्स्ट' की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट: परप्पना अग्रहारा जेल में बंद प्रज्वल रेवन्ना की सेल से बरामद फोन की फॉरेंसिक जांच में 173 फाइलें बरामद; जेल में मोबाइल नेटवर्क पर बड़ा खुलासा.
'हरकारा डीप डाइव' में निधीश त्यागी और नदीम खान का विश्लेषण: सहारनपुर मस्जिद बुलडोजर कार्रवाई, कानूनी प्रक्रिया और धार्मिक स्थलों के ध्वस्तीकरण का पैटर्न.
'काउंटरकरंट्स' में डेबोर्शी चक्रवर्ती का लेख: उमर खालिद की 6 साल की कैद, UAPA, छात्र आंदोलनों का इतिहास और लोकतांत्रिक प्रतिरोध पर विस्तृत विश्लेषण.
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हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ एपीसीआर के नेशनल सेक्रेटरी नदीम खान से बातचीत हुई. चर्चा का केंद्र सहारनपुर में मस्जिद पर हुई बुलडोजर कार्रवाई और देश के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक स्थलों के खिलाफ हो रही कार्रवाइयां हैं. सहारनपुर में अदालत के आदेश के बाद इतनी जल्दबाजी में बुलडोजर कार्रवाई क्यों की गई? क्या प्रभावित पक्ष को अपील का पर्याप्त अवसर मिला? नदीम खान इस मामले में "ड्यू प्रोसेस" और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हैं. बातचीत में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, राजस्थान और अन्य राज्यों में मस्जिदों, दरगाहों और मदरसों से जुड़े मामलों का भी जिक्र हुआ. क्या इन घटनाओं के पीछे कोई समान पैटर्न दिखाई देता है? क्या धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों में 1991 के पूजा स्थल अधिनियम की अनदेखी हो रही है? और इन मामलों में निचली अदालतों, प्रशासन और पुलिस की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है? नदीम खान ने यह भी बताया कि बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाने वाले स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई का क्या असर पड़ता है और प्रभावित लोगों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ना कितना मुश्किल हो जाता है. बातचीत के अंत में सहारनपुर के सामाजिक माहौल, समुदाय के भीतर मौजूद गुस्से और इस आशंका पर चर्चा हुई कि कहीं हिंसा के जरिए राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश तो नहीं की जा रही.
हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ चर्चा हुई कि राहुल गांधी की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और लोकप्रियता का कांग्रेस को चुनावी फायदा क्यों नहीं मिल पा रहा है. क्या कांग्रेस का कमजोर संगठन राहुल गांधी की राह में सबसे बड़ी चुनौती है? क्या राहुल गांधी ने कांग्रेस संगठन पर निर्भर रहने के बजाय सीधे जनता और युवाओं से जुड़ने की रणनीति अपनाई है? और क्या मौजूदा राजनीति अब संगठनों से ज्यादा नेताओं और जनता के बीच सीधे संवाद की लड़ाई बन गई है? बातचीत में कांग्रेस की उत्तर भारत में कमजोर स्थिति, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात में संगठनात्मक चुनौतियों, राहुल गांधी की रणनीति और भाजपा की राजनीतिक तैयारी पर विस्तार से चर्चा हुई. श्रवण गर्ग ने युवाओं और छात्र आंदोलनों के संदर्भ में नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, अरब स्प्रिंग, 1968 के फ्रांस के छात्र आंदोलन और 1974 के जेपी आंदोलन का भी उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि कैसे पारंपरिक राजनीतिक संगठनों से अलग जनता और युवाओं की सक्रियता सत्ता के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती है. चर्चा में यह सवाल भी अहम रहा कि राहुल गांधी की लोकप्रियता को क्या कांग्रेस वास्तविक चुनावी ताकत में बदल पाएगी. 2024 के बाद इंडिया ब्लॉक की स्थिति, विपक्षी दलों के बदलते समीकरण और 2027-2029 के चुनावी परिदृश्य पर भी बातचीत हुई. देखिए पूरा हरकारा डीप डाइव और जानिए श्रवण गर्ग का विश्लेषण. #HarkaraDeepDive #ShravanGarg #RahulGandhi #Congress #NarendraModi #IndianPolitics #PoliticalAnalysis #Harkara #YouthPolitics #BJP#HarkaraDeepDive,#ShravanGarg,#RahulGandhi,#Congress,#NarendraModi,#IndianPolitics,#PoliticalAnalysis,#Harkara,#YouthPolitics,#BJP,#IndiaPolitics,#RahulGandhiNews,#CongressPolitics,#OppositionPolitics,#IndiaAlliance,#PoliticalStrategy,#IndianDemocracy,#YouthMovement,#StudentPolitics,#Election2027,#Election2029,#PoliticalLeadership,#GrassrootsPolitics,#CongressOrganization,#BJPPolitics,#IndianElections,#PoliticalDebate,#DemocracyInIndia,#HarkaraNews
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी एवं अपूर्वानंद के साथ उमर खालिद की जेल में बीत रहे छह वर्षों और उससे जुड़े लोकतांत्रिक, न्यायिक और सामाजिक सवालों पर विस्तार से बातचीत हुई. 13 सितंबर 2026 को उमर खालिद को जेल में छह साल पूरे हो जाएंगे. अभी तक उनके खिलाफ आरोप तय नहीं हुए हैं और मुकदमे की सुनवाई भी शुरू नहीं हुई है. ऐसे में सवाल सिर्फ उमर खालिद की गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, न्याय व्यवस्था और असहमति की जगह का भी है. बातचीत में 2016 के जेएनयू प्रकरण से लेकर 2019 के नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन और 2020 की दिल्ली हिंसा तक उमर खालिद की राजनीतिक यात्रा को समझने की कोशिश की गई. अपूर्वानंद बताते हैं कि किस तरह एक छात्र और शोधार्थी को धीरे-धीरे एक राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया गया. जेएनयू की छात्र राजनीति, उमर खालिद और कन्हैया कुमार के बीच अंतर, मीडिया नैरेटिव, विश्वविद्यालयों के प्रति बदलता रवैया और मुस्लिम पहचान को लेकर पैदा हुए सवालों पर भी चर्चा हुई. दिल्ली हिंसा मामले में उमर खालिद पर लगाए गए आरोपों, अमरावती के भाषण और अदालत में पेश किए गए तर्कों को लेकर भी बातचीत हुई. साथ ही यह सवाल उठाया गया कि हिंसा के लिए खुले तौर पर बयान देने वाले नेताओं और उमर खालिद जैसे आरोपित लोगों के मामलों में पुलिस तथा न्यायपालिका का रवैया अलग क्यों दिखाई देता है. अंत में चर्चा इस सवाल पर पहुंचती है कि जेल में बीते छह साल एक व्यक्ति के जीवन, उसकी शिक्षा, शोध और भविष्य से कितने महत्वपूर्ण वर्ष छीन लेते हैं. अपूर्वानंद के शब्दों में, “उमर खालिद एक ऐसा पैमाना है, जिस पर आप हिंदुस्तान के कद को नाप सकते हैं.” पूरी बातचीत देखिए और इस महत्वपूर्ण बहस को अपने हमख्याल लोगों के साथ साझा कीजिए. अब लोग मुझे मेरे नहीं, उमर के पिता के तौर पर जानते हैं Dr. SQR Ilyas | Umar Khalid https://youtu.be/oGvsW8TPrL8 https://indianexpress.com/article/opinion/columns/umar-khalid-my-son/