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दाराब फ़ारूक़ी : ओवैसी की एआईएमआईएम कोई सियासी पार्टी नहीं, ख़ानदानी जायदाद है
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करुणानिधि के पीछे खड़े युवा विजय की पुरानी फोटो: ‘कलैग्नार ने सपने में भी नहीं सोचा होगा’
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संसद द्वारा कानून बनाने तक ही सीईसी-ईसी नियुक्तियों में सीजेआई की भूमिका तय थी: सुप्रीम कोर्ट
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डेटा से पता चलता है कि ‘एसआईआर’ ने बंगाल जीतने में भाजपा की मदद की
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यूपी की ‘एक जिला, एक व्यंजन’ सूची में 208 व्यंजनों की पहचान, एक भी मांसाहार नहीं; ‘गलौटी कबाब’ और ‘मुरादाबादी बिरयानी’ नदारद
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बंगाल में भाजपा की जीत के बाद बांग्लादेशी विदेश मंत्री ने बंगाली भाषी मुसलमानों के ‘पुश-इन’ के खिलाफ चेताया
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कोलकाता में बुलडोजर कार्रवाई से तनाव बढ़ा; उपद्रवियों के हाथ में भाजपा का झंडा और ‘जय श्री राम’ के नारे
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श्रीलंका के मीडिया में छा गई तमिलनाडु में सी. जोसेफ विजय की बड़ी जीत
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तमिलनाडु चुनाव की गिनती के बीच मोदी और विजय की फोटो फिर आई सामने, सोशल मीडिया पर चर्चा
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आकार पटेल | ध्रुवीकरण की राजनीति
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सावरकर ने 5 बार ब्रिटिश सरकार से मांगी माफ़ी, गाय को भगवान नहीं मानते थे: सावरकर के प्रपौत्र का कोर्ट में बयान
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एससीएओआरए बनाम एसआईआर: कहानी एक ही, फैसले अलग-अलग; सुप्रीम कोर्ट से बंगाल को ऐसा विशेष उपचार नहीं मिला
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लिपुलेख के जरिए मानसरोवर यात्रा पर नेपाल ने जताई आपत्ति; कहा- लिपुलेख हमारा क्षेत्र; भारत बोला- दावा अनुचित
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बिहार में एक और पुल गिरा; भागलपुर में विक्रमशिला सेतु का हिस्सा गिरने से यातायात रुका, बड़ा हादसा टला
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यूपी में मुस्लिम धर्मगुरु को मारपीट के बाद ट्रेन से बाहर फेंका गया; पोस्टमार्टम में सभी पसलियों में फ्रैक्चर की पुष्टि
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मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन और उसके चार शावकों की मौत, कुत्तों से फैलने वाले वायरस पर संदेह
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“लग रहा है कि घर में बेघर हो गए हम”: मतदान के लिए व्हीलचेयर तैयार रखी थी, लेकिन सूची से नाम ही हटा दियापूरा पढ़ें/ देखें
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ट्रंप ने ईरान का प्रस्ताव ठुकराया, कहा- परमाणु समझौता होने तक जारी रहेगी नौसैनिक नाकेबंदी
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योगेंद्र यादव: पश्चिम बंगाल चुनाव में अल्पसंख्यकों को बाहर करने की साज़िश
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हरकारा डीप डाइव | पत्रकार सुमित झा| क्या गरीबी का संबंध जाति से है? तेलंगाना सर्वे ने दिया जवाब!
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आईआईटी स्नातक और पीएचडी छात्र शरजील इमाम छह साल से अधिक समय से बिना मुकदमे के जेल में हैं. दिल्ली पुलिस ने उन्हें 2020 के दिल्ली दंगों की "बड़ी साजिश" का मुख्य चेहरा बताया है, जबकि उनकी गिरफ्तारी दंगों से पहले उनके द्वारा दिए गए भाषणों के आधार पर हुई थी.
इन विधानसभा चुनावों के बाद ही लोग यह सोचने लगे हैं कि चुनाव और अदालतें कोई उपाय नहीं हैं. भारत का विचार ख़तरे में है. यह सब चुनावी अंकगणित और हिसाब-किताब बनकर रह गया है. मैं काफ़ी समय से यह तर्क देता रहा हूँ कि समस्त विपक्ष को चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए और सभी विधायिकाओं — लोकसभा और राज्य विधानसभाओं — से अपनी सीटें छोड़ देनी चाहिए.
असदुद्दीन ओवैसी का दाँव सीधा-सादा है. मुझे वोट दो. मैं मुसलमान हूँ. बस यही पूरी दलील है. इसके पीछे कोई कार्यक्रम नहीं है. कोई संस्था नहीं. कोई योजना नहीं. बस एक पहचान, जो एक प्रमाण-पत्र की तरह पेश की जाती है. वे मुसलमानों की स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व बनना चाहते हैं. एक पल के लिए इसे गंभीरता से लेते हैं और देखते हैं कि वे असल में पेश क्या कर रहे हैं.
तस्वीर में एम. करुणानिधि किसी फिल्मी समारोह में नजर आ रहे हैं. वे फ्रेम के अगले हिस्से में हैं, जैसा कि वे आमतौर पर रहते थे. उनके ठीक पीछे, कहीं भीड़ में एक युवा विजय खड़े हैं जिन पर मुश्किल से नजर जाती है. राम गोपाल वर्मा (आरजीवी) ने कैप्शन में लिखा: "कलैग्नार ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके पीछे खड़ा यह बच्चा एक दिन उनकी पार्टी को तबाह कर देगा."
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (6 मई, 2026) को यह व्याख्या दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की भागीदारी केवल तब तक के लिए थी जब तक कि संसद इस पर कोई कानून नहीं बना लेती.
पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 150 सीटों पर, एसआईआर के दौरान कुल हटाए गए नाम जीत के अंतर से अधिक थे, और भाजपा ने इनमें से 99 सीटें जीतीं. 2021 में, उसने इनमें से केवल 19 सीटें जीती थीं.कड़े मुकाबले वाले क्षेत्रों में चुनावी नतीजे अक्सर बहुत मामूली अंतर से तय होते हैं, जहाँ हर एक वोट कीमती होता है.
जे. जयललिता के निधन के बाद से अपने सबसे गंभीर आंतरिक विखंडन की ओर बढ़ती दिख रही है. पार्टी के भीतर इस बात को लेकर गहरे मतभेद उभर आए हैं कि क्या विजय की 'तमिलगा वेट्री कझगम' (टीवीके) को गठबंधन सरकार बनाने में समर्थन दिया जाए या नहीं.
हाल के वर्षों में भारत में 'जिहाद' शब्द का प्रयोग किसी भी सामाजिक या व्यक्तिगत मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने के लिए एक हथियार की तरह किया जाने लगा है. महाराष्ट्र के नासिक में स्थित भारत की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) की एक शाखा में हुई घटना इसका सबसे ताज़ा और चिंताजनक उदाहरण है.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
हरकारा डीप डाइव के एक ऑडियो संस्करण में वरिष्ठ विश्लेषक श्रवण गर्ग के साथ भारत-अमेरिका संबंधों पर विस्तृत बातचीत की गई. इस चर्चा में मुख्य रूप से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा भारत को लेकर की गई अपमानजनक टिप्पणी और भारत सरकार की प्रतिक्रिया या कहें, चुप्पी, पर सवाल उठाए गए. ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर माइकल सैवेज की एक टिप्पणी साझा की, जिसमें भारत को “नर्क” कहा गया और भारतीयों को “गैंगस्टर्स विद लैपटॉप्स” जैसे शब्दों से संबोधित किया गया.
पश्चिम बंगाल का 2026 का विधानसभा चुनाव अब सिर्फ एक राज्य की सत्ता का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे देश की राजनीति और लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला एक निर्णायक ‘कुरुक्षेत्र’ बन चुका है. ‘हरकारा डीप डाइव’ पर ऑडियो पॉडकास्ट में, वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने इस चुनाव के उन अनछुए पहलुओं पर रोशनी डाली, जो इसे आज़ाद भारत के सबसे जटिल और अभूतपूर्व चुनावों में से एक बनाते हैं. वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग इस चुनाव की तुलना ‘प्लासी के युद्ध’ से करते हैं. उनका मानना है कि बंगाल में जिस तरह से ‘मीर जाफरों’ और ‘जगत सेठों’ की तलाश की गई है, वह अभूतपूर्व है. ममता बनर्जी के खिलाफ इस बार भयंकर सत्ता विरोधी लहर है. 2021 के मुकाबले इस बार भाजपा ने हिंदू वोटों की नाराज़गी को और गहरा किया है, वहीं 30% वाले मुस्लिम वोट बैंक में भी दरार डालने की कोशिश की है.
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.


हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में हमने पत्रकार सुमित झा से गहन बातचीत की, जिन्होंने तेलंगाना के जातिगत सर्वे से उजागर हुई असमानताओं पर साउथ फर्स्ट में विस्तृत लेखों की श्रृंखला लिखी है. तेलंगाना का 2024 का जाति सर्वे, एक ऐसा सर्वे जो सिर्फ आंकड़े नहीं देता, बल्कि समाज की छुपी परतों को उधेड़ कर सामने रखता है. बातचीत में यह समझने की कोशिश की गई कि क्या सच में हम जाति से आगे बढ़ चुके हैं, या जाति आज भी हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी को चुपचाप नियंत्रित कर रही है.
सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य के स्तर पर अब भी पीछे हैं. इलाज के लिए क़र्ज़ लेना, असंगठित काम में फंसा रहना, और बुनियादी सुविधाओं की कमी, ये सब सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि जीवन की कठोर सच्चाइयां हैं. वहीं दूसरी तरफ, सरकारी योजनाओं का बड़ा हिस्सा उन वर्गों तक पहुंच रहा है जो पहले से ही अपेक्षाकृत मज़बूत हैं.