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हसीना की दिल्ली प्रेस कॉन्फ्रेंस पर बांग्लादेश में आक्रोश, कहा- इससे द्विपक्षीय संबंधों को ठेस पहुँची है
बांग्लादेश ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को नई दिल्ली से मीडिया को संबोधित करने की अनुमति देने के भारत के फैसले की कड़ी निंदा की है. बांग्लादेश ने इस घटना को अपनी संप्रभुता का अपमान बताया है और चेतावनी दी है कि यह द्विपक्षीय संबंधों को फिर से मजबूत करने के प्रयासों को कमजोर कर सकता है.
जयंत जैकब की रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार को जारी एक कड़े बयान में, बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह "आक्रोशित" है कि हसीना — जिन्हें उसने "फरार सजायाफ्ता नरसंहारक" के रूप में वर्णित किया — को भारतीय राजधानी में एक लाइव मीडिया बातचीत में भाग लेने की अनुमति दी गई, जहाँ उन्होंने और उनके सहयोगियों ने कथित तौर पर बांग्लादेश और उसके लोगों के खिलाफ अमित्रतापूर्ण (विरोधी) टिप्पणियां कीं.
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तमिलनाडु: ऊंची जाति के व्यक्ति की जमीन पर घोड़ा चराने के विवाद में दलित युवक की धारदार हथियारों से हत्या
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, मिलनाडु के डिंडीगुल जिले में 26 वर्षीय दलित युवक की कथित तौर पर जातीय हिंसा में हत्या का मामला सामने आया है. तमिलनाडु अस्पृश्यता उन्मूलन मोर्चा (टीएनयूईएफ) ने इसे "निर्मम जातीय हत्या" बताते हुए सभी आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी, पीड़ित परिवार को सुरक्षा और न्याय की मांग की है.
टीएनयूईएफ के अनुसार, मृतक रामर (26) और घायल प्रशांत (20) कोडाइकनाल तालुक के पूम्बरई गांव के रहने वाले थे. दोनों पहाड़ी इलाकों से घोड़ों के जरिए सब्जियां लाकर वाहनों तक पहुंचाने का काम करते थे और इसी से उनका परिवार चलता था.
संगठन का आरोप है कि 30 जुलाई की रात प्रभुत्वशाली जाति से जुड़े रघु नामक व्यक्ति ने रामर के घर पहुंचकर कहा कि उनका घोड़ा उसकी जमीन पर चर गया है.
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अभिजीत दिपके ने कैसे गढ़ी ऐसी राजनीति, जिसने बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया
स्क्रोल’ में प्रकाशित सुमित समोस नीट-यूजी पेपर लीक के विरोध में शुरू हुआ छात्र आंदोलन केवल परीक्षा प्रणाली के खिलाफ विरोध तक सीमित नहीं रहा. इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति में एक नए चेहरे और नई शैली को सामने लाया. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संयोजक अभिजीत दिपके ने ऐसे समय में नेतृत्व संभाला, जब विपक्ष बिखरा हुआ दिख रहा था और युवाओं में व्यवस्था को लेकर गहरी निराशा थी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिपके की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उन्होंने आंदोलन को किसी एक जाति, वर्ग या संगठन तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक स्वर दिया. यही वजह रही कि भारतीय जनता पार्टी को इस आंदोलन के दौरान लगातार रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ा.
दिपके ने खुद को दलित और अंबेडकरवादी विचारधारा से जुड़ा बताया, लेकिन उन्होंने अपनी राजनीति को केवल दलित पहचान तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने शिक्षा, रोजगार, परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य जैसे ऐसे मुद्दे उठाए, जिनसे देशभर के छात्र और युवा खुद को जोड़ सके.
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डर और व्यक्तिगत सुरक्षा मुझे स्वदेश लौटने से नहीं रोकेंगे : शेख हसीना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की
अगस्त 2024 में विरोध प्रदर्शनों के बाद पद से हटाई गईं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बुधवार (5 अगस्त 2026) को वर्चुअली (आभासी रूप से) एक पत्रकार वार्ता को संबोधित किया और कहा कि "डर" और "व्यक्तिगत सुरक्षा की चिंताएं" उन्हें अपने स्वदेश लौटने से नहीं रोकेंगी.
उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी, अवामी लीग के कार्यकर्ताओं पर अत्याचार किए गए हैं और उनकी हत्याएं की गई हैं, और उन्होंने पार्टी पर लगे प्रतिबंध को हटाने की मांग की. उन्होंने भारत को एक ऐसा देश बताया जो "हमेशा से एक मित्र" रहा है और जिसने 1971 तथा 1975 में कठिनाइयों का सामना करने के दौरान बांग्लादेश का समर्थन किया था.
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बरी बृजभूषण: यह विकृत जीत है; नारी शक्ति के सम्मान में भाजपा के नारे झूठे साबित होते हैं
दिल्ली की एक विशेष अदालत ने भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह और उनके सहयोगी विनोद तोमर को छह महिला पहलवानों द्वारा दर्ज कराए गए यौन उत्पीड़न के मामले में बरी कर दिया है. महिला पहलवानों ने कहा है कि वे इस फैसले के खिलाफ अपील दायर करेंगी. मामले की सुनवाई कर रहे अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने टिप्पणी की कि बिना किसी स्पष्ट कारण के हुई देरी — कथित उत्पीड़न 2016 और 2019 के बीच हुआ था और पहलवानों ने 2023 में मामला दर्ज कराया — बयानों में विसंगतियां, मुख्य मुद्दों पर विरोधाभास, और सभी शिकायतकर्ताओं का घटना के बाद का आचरण — यानी यह तथ्य कि वे सिंह के अधीन काम करती रहीं — ने उनके आरोपों को अविश्वसनीय बना दिया.
विशेष रूप से, सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में यह माना गया है कि केवल देरी से ही कानूनी रूप से यौन उत्पीड़न की शिकायत अमान्य नहीं हो जाती. शीर्ष अदालत ने स्वीकार किया कि पीड़ित डर, कलंक, पेशेवर निर्भरता या आरोपी के प्रभाव/अधिकार के कारण चुप रह सकते हैं.
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एफसीआरए संशोधन पर अमेरिकी सांसद की चेतावनी, बोले- 'चर्चों पर नियंत्रण की कोशिश भारत-अमेरिका संबंधों को प्रभावित कर सकती है'
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधन को लेकर अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने भारत सरकार की आलोचना की है. उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय संसद चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण का रास्ता खोलने की कोशिश कर रही है. मूर ने चेतावनी दी कि यदि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है तो इसका असर भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है.
सोशल मीडिया पर जारी बयान में वेस्ट वर्जीनिया से सांसद राइली मूर ने कहा, "ईसाई धर्म भारत में सेंट थॉमस के मालाबार तट पर आने के समय से मौजूद है. इसके बावजूद भारतीय संसद ऐसे नियमों में बदलाव पर विचार कर रही है, जो सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर नियंत्रण की अनुमति देंगे. यह ईसाइयों के खिलाफ स्पष्ट हमला है."
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महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर एनडीए ने क्यों लगाया विराम?
महिला आरक्षण और परिसीमन (डिलिमिटेशन) से जुड़े विधेयकों को संसद के मौजूदा मानसून सत्र के एजेंडे से बाहर रखने के केंद्र सरकार के फैसले ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. इसे लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शनों के दबाव में पीछे हटी है, या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक कारण है. ‘साउथ फर्स्ट’ के मुताबिक, राजनीतिक संकेत बताते हैं कि इसकी वजह सड़क का दबाव नहीं, बल्कि संसद का गणित और राज्यों की चिंताएं हैं.
दरअसल, 17 अप्रैल 2026 को आयोजित विशेष सत्र में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, परिसीमन विधेयक, 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका था.
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‘हमें परेशान करना बंद करें’: प्रधानमंत्री को ‘अपशब्द’ कहने वाली 15 वर्षीय छात्रा की मां बोलीं- घर छोड़ने पर मजबूर हुए
दो दिन पहले, एक महिला अपना सारा सामान समेटकर अपनी 15 साल की बेटी के साथ नोएडा स्थित किराए के मकान से निकल गई. उन्होंने कहा कि उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था: जब उनकी बेटी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित टिप्पणी को लेकर विवाद में फंस गई, तो पुलिस और अनजान लोग लगातार उनके दरवाजे पर पहुंचने लगे.
मां ने कहा कि उनकी बेटी ने माफी मांग ली है और प्रधानमंत्री ने उसे माफ भी कर दिया है, लेकिन फिर भी परिवार को लगातार उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है.
उन्होंने 'द इंडियन एक्सप्रेस' से बात करते हुए अधिकारियों और जनता से उनके परिवार को परेशान न करने की अपील की और कहा, “मैं अपनी बेटी का पालन-पोषण अकेले कर रही हूं.
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राकेश कायस्थ | बांकीपुर का नतीजा बताता है कि प्रशांत किशोर ने विपक्ष से ज्यादा भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाई है
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार एवं व्यंग्यकार राकेश कायस्थ बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की बदलती भूमिका और बांकीपुर उपचुनाव में उनकी जीत के राजनीतिक मायनों पर विस्तार से चर्चा करते हैं. बातचीत इस सवाल से शुरू होती है कि जिन प्रशांत किशोर ने पिछले डेढ़ दशक में नरेंद्र मोदी, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, एम. के. स्टालिन और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं की चुनावी जीत की रणनीति तैयार की, वही जब खुद राजनीति में उतरे तो पहले विधानसभा चुनाव में बुरी तरह असफल रहे. अब बांकीपुर से मिली जीत ने उन्हें एक बार फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है.
राकेश कायस्थ का मानना है कि प्रशांत किशोर को केवल भाजपा की "बी टीम" कहकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं है. उनके अनुसार, अधिक महत्वपूर्ण यह समझना है कि वे बिहार की राजनीति में किस खाली स्थान को भरने की कोशिश कर रहे हैं.
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विवेक काटजू | विदेश मंत्रालय को स्थापित करना होगा कि मोदी का ध्यान देश के हितों को बढ़ाने पर है, न कि ‘पुरस्कारों’ पर
भारतीय विदेश सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी विवेक काटजू ने लिखा है कि किसी विदेशी देश द्वारा किसी देश के शासनाध्यक्ष (हेड ऑफ गवर्नमेंट) को दिए जाने वाले राष्ट्रीय सम्मानों का उस प्राप्तकर्ता देश के विदेशी और रणनीतिक हितों के लिए क्या अर्थ होता है? भारत की विदेश नीति और कूटनीति के लिए यह एक गंभीर सवाल है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 में पदभार संभालने के बाद से अब तक 33 देशों द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जा चुके हैं.पद पर रहते हुए किसी अन्य सेवारत शासनाध्यक्ष या राष्ट्रध्यक्ष — कार्यकारी या अन्य — को अपने 12 वर्षों के कार्यकाल में इतने विदेशी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होते नहीं दिखे हैं जितने मोदी को मिले हैं.
मोदी को दिया गया पहला पुरस्कार 2016 में सऊदी अरब की उनकी यात्रा के दौरान मिला था. 5 अप्रैल 2016 को अपने मीडिया ब्रीफिंग में, विदेश मंत्रालय में तत्कालीन सचिव (आर्थिक संबंध) अमर सिन्हा ने कहा था, "...सऊदी पक्ष ने प्रधानमंत्री को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान — 'किंग अब्दुलअजीज स्पेशल सैश' से सम्मानित करके एक बहुत बड़ा आश्चर्य दिया.
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'मैं अब तक 80 फैसले हटा चुका हूं': 'राइट टू बी फॉरगॉटन' आदेश को इंडियन कानून ने क्यों दी चुनौती
‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, दिल्ली हाई कोर्ट के 'राइट टू बी फॉरगॉटन' (भूल जाने के अधिकार) से जुड़े एक फैसले के खिलाफ ऑनलाइन कानूनी डेटाबेस इंडियन कानून ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है. वेबसाइट का कहना है कि वह देश का इकलौता कानूनी पोर्टल है, जिसे नाम के आधार पर फैसलों की खोज (नेम-बेस्ड सर्च) सीमित करने का निर्देश दिया गया है. वेबसाइट के अनुसार, इस आदेश के बाद उसे अब तक 80 न्यायिक फैसले अपने पोर्टल से हटाने पड़े हैं.
बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने इंडियन कानून की अपील पर सुनवाई करते हुए मामले की अगली सुनवाई 13 अगस्त के लिए तय की. यह अपील 29 मई के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें अदालत ने ऐसे लोगों से जुड़े फैसलों को सर्च इंजन से डी-इंडेक्स करने का निर्देश दिया था, जो अपने पुराने मामलों को ऑनलाइन खोज परिणामों से हटाना चाहते थे.
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पेपर लीक से परे: क्यों नीट को लेकर लड़ाई सिर्फ धोखाधड़ी से आगे की बात बन चुकी है
‘द टेलीग्राफ’ में परन बालाकृष्णन ने लिखा है कि भारत में चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश पाने के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) एक अनिवार्य बाधा बन चुकी है. अब केवल स्कूली प्रदर्शन या स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर प्रवेश संभव नहीं है. लगभग 22 लाख छात्र इस अति-प्रतिस्पर्धी परीक्षा में भाग लेते हैं, जहाँ महज़ कुछ अंकों का अंतर एक सस्ते सरकारी कॉलेज और अत्यंत महंगे निजी कॉलेज के बीच का अंतर तय करता है.
सरकार ने न केवल एलोपैथिक एमबीबीएस, बल्कि बीडीएस (दंत चिकित्सा), पशु चिकित्सा, आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी अन्य सभी प्रणालियों को भी इसी एकल परीक्षा के तहत ला दिया है. इसके अलावा, परीक्षा देने की अधिकतम आयु सीमा (25 वर्ष) और प्रयासों की सीमित संख्या के प्रतिबंध को हटा दिया गया है, जिससे हर साल पुराने और नए उम्मीदवारों की भीड़ एक साथ सीमित सीटों के लिए होड़ लगाती है.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
जयंत जैकब की रिपोर्ट: शेख हसीना के दिल्ली मीडिया संबोधन पर बांग्लादेश की कड़ी आपत्ति; भारत पर संप्रभुता के अपमान का आरोप और संबंधों में दरार की चेतावनी.
'मकतूब मीडिया' की रिपोर्ट: तमिलनाडु के डिंडीगुल में दलित युवक रामर की हत्या पर बवाल; TNUEF ने दोषियों की गिरफ्तारी और पुलिस सुरक्षा की मांग की.
'स्क्रोल' में सुमित समोस का विश्लेषण: नीट-यूजी आंदोलन से उभरे कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दिपके, अंबेडकरवादी दृष्टिकोण और भारतीय राजनीति पर उनका प्रभाव.
बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना ने अगस्त 2026 में वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा: डर या सुरक्षा की चिंताएं उन्हें स्वदेश लौटने से नहीं रोक सकतीं.
'द टेलीग्राफ' संपादकीय: महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न मामले में बृजभूषण शरण सिंह के बरी होने और भारतीय खेल व राजनीतिक तंत्र पर उठे गंभीर सवालों का विश्लेषण.
'स्क्रोल' रिपोर्ट: अमेरिकी सांसद राइली मूर ने भारत के FCRA संशोधन विधेयक की आलोचना की; कहा- चर्चों पर नियंत्रण का प्रयास, भारत-अमेरिका संबंधों पर पड़ेगा असर.
'साउथ फर्स्ट' की रिपोर्ट: महिला आरक्षण व परिसीमन विधेयक टलने की असली वजह जेन ज़ी आंदोलन नहीं, बल्कि संसद का गणित और दक्षिणी राज्यों का विरोध है.
'द इंडियन एक्सप्रेस' रिपोर्ट: पीएम मोदी पर टिप्पणी से जुड़े विवाद के बाद लगातार उत्पीड़न से तंग आकर नोएडा से घर छोड़ने को मजबूर हुई 15 वर्षीय किशोरी और उसकी मां.
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जिस आदमी ने पंद्रह साल तक दूसरों के लिए छह मुख्यमंत्री जिताए — मोदी, नीतीश, ममता, जगन, स्टालिन, केजरीवाल — उसकी अपनी पार्टी 2025 में 238 सीटों पर लड़कर एक भी नहीं जीत पाई, कई जगह नोटा से भी पीछे रही. और अब वही प्रशांत किशोर बीजेपी के 30 साल पुराने गढ़ बांकीपुर से, पहली बार लड़कर जीत गए हैं. पर हरकारा डीपडाइव की यह बातचीत "बी टीम" की बहस से आगे जाती है. निधीश त्यागी और लेखक-व्यंग्यकार राकेश कायस्थ की बातचीत में: ▪️ बी टीम की थ्योरी को एक तरफ़ रखकर — प्रशांत किशोर आख़िर करना क्या चाहते हैं ▪️ आँकड़ों की कहानी: 34% का न्यूनतम मतदान, बीजेपी से 28% और आरजेडी से 18% वोट का खिसकना ▪️ वोटर की बेचैनी — केजरीवाल, तमिलनाडु में विजय, पंजाब में भगवंत मान, और CJP की लहर से जोड़कर ▪️ अपने ही वोटर से सवाल करने की शैली — नेहरू, अंबेडकर और कांशीराम की परंपरा से तुलना ▪️ "सर्जिकल स्ट्राइक": मोदी-शाह और संघ पर चुप्पी, पर सम्राट चौधरी पर सीधा हमला ▪️ माइग्रेशन, शिक्षा और बिहार की तरक़्क़ी के मुद्दे — जो कांग्रेस-आरजेडी को उठाने चाहिए थे ▪️ तेजस्वी यादव का गिरता ग्राफ़ और आरजेडी का संकट ▪️ आगे का सवाल: PK एनडीए के साथ जाएँगे या इंडिया गठबंधन के, या नवीन पटनायक की तरह उदासीन? विस्तृत विश्लेषण और फ़ैक्टशीट: harkaraonline.com
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


RSS को जेन ज़ी की ज़रूरत क्यों पड़ गई? भागवत का बड़ा दांव या बढ़ती बेचैनी? पेपर लीक, छात्र आंदोलन और देशभर में उभरते युवा आक्रोश के बीच RSS ने पहली बार जेन ज़ी (Gen Z) और जेन अल्फा (Gen Alpha) के प्रतिनिधियों के साथ विशेष संवाद का आयोजन किया है. सवाल यह है कि आखिर संघ को अचानक नई पीढ़ी से सीधे बात करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह सिर्फ वैचारिक संवाद है या युवाओं के बदलते राजनीतिक रुझान को समझने और प्रभावित करने की कोशिश? क्या राहुल गांधी के युवा-केंद्रित अभियान और छात्र आंदोलनों ने संघ और भाजपा की रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है?