-
अगस्त में अनिश्चिमनोज कुमार झा | बुद्ध, अंबेडकर और नेहरू का साझा दर्शन आज अधिक प्रासंगिक हैतकाल के लिए स्थगित, लेकिन एक माह बाद भी सत्रावसान नहीं; जानिए देरी के मायने और विपक्ष के सवाल
मनोज कुमार झा ने ‘द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि भारतीय संविधान की कहानी प्रायः संस्थाओं, संसदीय बहसों, मौलिक अधिकारों, संघवाद और न्यायिक समीक्षा जैसे विधिक प्रावधानों के माध्यम से समझी जाती है. किंतु संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि नैतिक कल्पना का भंडार भी होता है. प्रत्येक संवैधानिक पाठ के मूल में मानव, समाज और सत्ता के संबंधों से जुड़ा एक गहरा दर्शन निहित होता है.
झा के मुताबिक, भारत का संविधान विविध बौद्धिक परंपराओं का संगम है. स्वतंत्रता संग्राम, उदारवादी संविधानवाद, समाजवाद और सामाजिक सुधार आंदोलनों के अनुभवों ने इसे आकार दिया. इन तमाम प्रभावों के बीच, सबसे मौलिक किंतु अक्सर उपेक्षित प्रभाव गौतम बुद्ध की दार्शनिक विरासत का रहा है. तर्क, करुणा, समानता और नैतिक उत्तरदायित्व पर बुद्ध के विचारों को आधुनिक भारत में दो प्रमुख व्याख्याकार मिले—डॉ. बी.आर. अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू. दोनों के दृष्टिकोण और उद्देश्य भिन्न थे, परंतु साथ मिलकर उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को एक अद्वितीय नैतिक शब्दावली प्रदान की.
-
ओडिशा में कागजों पर मृत 2,487 मजदूर फिर ‘जिंदा’, आधार से राशन लेते मिले
ओडिशा में निर्माण श्रमिकों के लिए चल रही ‘निर्माण श्रमिक’ कल्याण योजना में बड़े पैमाने पर अनियमितता सामने आई है. ‘द हिंदू’ में सत्यसुंदर बारिक की रिपोर्ट के मुताबिक, 2,487 निर्माण श्रमिकों को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर उनके नामित व्यक्तियों को मृत्यु सहायता दी गई, जबकि ये श्रमिक बाद में भी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून और राज्य खाद्य सुरक्षा योजना के तहत सब्सिडी वाला राशन लेते रहे.
15.10 करोड़ रुपये की मृत्यु सहायता
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब 753 मामलों में इन कथित मृत श्रमिकों ने मृत्यु दर्ज होने के बाद राशन लेने के लिए अपने आधार की बायोमेट्रिक पहचान कराई. ऑडिट के मुताबिक, इन मामलों में नामित व्यक्तियों को कुल 15.10 करोड़ रुपये की मृत्यु सहायता दी गई.
-
आलोक भट्ट: आपत्तिजनक पोस्ट, छिपाया गया एक्स हैंडल और द पैंफलेट से जुड़ाव पर सवाल
‘ऑल्ट न्यूज़’ की शिंजिनी मजूमदार ने बीजेपी की नई सोशल मीडिया टीम में आलोक भट्ट की नियुक्ति और उनके पुराने सोशल मीडिया रिकॉर्ड के साथ-साथ द पैंफलेट और सावित्र एनालिटिक्स मीडिया एंड रिसर्च फाउंडेशन से उनके संभावित संबंधों की पड़ताल की है.
17 अगस्त को भारतीय जनता पार्टी ने अपनी नई सोशल मीडिया टीम की घोषणा की. दीपक म्हास्के को राष्ट्रीय सोशल मीडिया संयोजक और प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी, आलोक भट्ट तथा अरुण यादव को सह-संयोजक बनाया गया. घोषणा के तुरंत बाद प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी और अरुण यादव ने अपने एक्स अकाउंट निजी कर दिए, जबकि आलोक भट्ट का एक्स अकाउंट इंटरनेट पर दिखाई देना ही बंद हो गया.
-
24 साल बाद भी इंसाफ का इंतजार: डेरा प्रमुख पर लिखने वाले पत्रकार की हत्या का मामला
‘स्क्रोल’ में सफवत जरगर की रिपोर्ट के मुताबिक, डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के खिलाफ बलात्कार के आरोपों को प्रकाशित करने वाले पत्रकार रामचंदर छत्रपति की हत्या के 24 साल बाद भी उनके परिवार की कानूनी लड़ाई जारी है. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा 2019 की हत्या की सजा पलटे जाने के खिलाफ छत्रपति के बेटे अंशुल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है, जिस पर नवंबर में सुनवाई होनी है.
सच लिखने की कीमत
रामचंदर छत्रपति ने 2002 में ‘पूरा सच’ नाम से शाम का अखबार शुरू किया था. मई 2002 में एक महिला शिष्या का प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लिखा तीन पन्नों का गुमनाम पत्र सिरसा में चर्चा का विषय बना. पत्र में गुरमीत राम रहीम पर बलात्कार का आरोप लगाया गया था.
-
श्रवण गर्ग | क्या यह मोदीजी की लोकप्रियता पर ‘ओपिनियन पोल’ है?
दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र के सबसे बड़े राजनीतिक दल बीजेपी को अपने प्रधानमंत्री का 76वाँ जन्मदिन इस तरह से क्यों मानना पड़ रहा है ? कोई तो बड़ा कारण होना चाहिए कि 17 सितंबर 2025 को उम्र के पचहत्तर साल पूरे करने पर उनके जन्म की ‘डायमंड जुबली’ उतने धूमधाम से नहीं मनाई गई जिस तरह से सार्वजनिक जीवन में सेवा के पच्चीस साल( सत्ता में पच्चीस साल नहीं कहा जा रहा है?) पूरे करने के नाम पर मोदीजी के 76वें जन्मदिन को मनाया जा रहा हैं !
बीजेपी ने शायद कल्पना नहीं की होगी कि पिछले और इस जन्मदिन के बीच देश-जीवन में इतनी उथल-पुथल मच जाएगी कि सड़कें सड़कें सरकार-विरोधी आंदोलनों से पट जाएँगी और संसद का एक पूरा सत्र ही पीएम और गृहमंत्री की अनुपस्थिति में गुज़र जाएगा.2014 में सत्ता में आने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है.
-
त्रिभुवन | राजस्थान की राजनीति में 2028 का चुनाव एक महत्वपूर्ण पड़ाव होगा
'हरकारा डीप डाइव' में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन के साथ राजस्थान के हालिया नगरीय निकाय चुनावों के नतीजों और उनके जरिए राज्य की आगे की राजनीति के संभावित संकेतों पर चर्चा की. बातचीत में भाजपा और कांग्रेस के वोट शेयर के मामूली अंतर, वार्डों के नतीजों, निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका और दोनों दलों के संगठनात्मक प्रदर्शन को समझने की कोशिश की गई.
त्रिभुवन ने बताया कि राजस्थान में आम तौर पर स्थानीय निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ दल को फायदा मिलता रहा है. इसका एक कारण यह धारणा है कि स्थानीय स्तर पर सड़क, नाली और सफाई जैसे विकास कार्यों के लिए सत्ता पक्ष के साथ रहना जरूरी है. इस बार भी भाजपा को कांग्रेस से अधिक वोट और वार्ड मिले, लेकिन दोनों दलों के बीच वोटों का अंतर बहुत बड़ा नहीं रहा. निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले वोटों ने मुकाबले को और दिलचस्प बनाया.
-
एयर इंडिया का समेकित घाटा दोगुना होकर 22,238 करोड़ रुपये हुआ
मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष में एयर इंडिया का समेकित घाटा बढ़कर 22,238.23 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले वर्ष 10,858.83 करोड़ रुपये था. कुल आय भी 78,635.61 करोड़ रुपये से घटकर 71,869.94 करोड़ रुपये रह गई. इन आंकड़ों में एयर इंडिया एक्सप्रेस भी शामिल है.
कंपनी घाटे के पीछे जून 2025 में हुए घातक AI171 हादसे (260 मौते), भू-राजनीतिक तनाव, एयरस्पेस बंदी और ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव को मुख्य वजह मान रही है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, समेकित व्यय बढ़कर 93,733.31 करोड़ रुपये और विदेशी मुद्रा घाटा 7,388.23 करोड़ रुपये रहा. हालांकि ईंधन खर्च घटकर 26,871.80 करोड़ रुपये हुआ. AI171 हादसे के कारण असाधारण मदों में 429.05 करोड़ रुपये दर्ज हुए. कंपनी के अनुसार, विमान नुकसान और देनदारियां बीमा पॉलिसियों से कवर हैं, जिससे रिजर्व पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा.
-
चेतावनी की बत्तियां जल रही हैं: भारत की विकास गाथा को महंगाई के बेरहम झटके का सामना करना पड़ रहा है
यदि आपको लग रहा है कि आपकी दिनचर्या से जुड़े सामान और सेवाएं अचानक महंगी हो गई हैं, तो आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 102 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचने के साथ ही आम जनता की जेब पर बोझ और बढ़ने वाला है. अगस्त में भारत की खुदरा मुद्रास्फीति (महंगाई दर) बढ़कर 4.82 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो जुलाई में 4.45 प्रतिशत थी. यह लगातार तीसरा महीना है जब महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर रही है.
परन बालकृष्णन के मुताबिक, भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है. यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली कोई भी बढ़ोतरी सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है.
-
हिंदुत्व इन्फ्लुएंसर स्वतंत्र भारद्वाज का ‘वीडियो फिर सामने आया’, हेकड़ी अब भी बरकरार है
सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है जिसमें स्वतंत्र भारद्वाज जैसा दिखने वाला एक व्यक्ति — वह हिंदुत्व कार्यकर्ता जिसे दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व वाले आंदोलन में एक प्रदर्शनकारी का सिर फोड़ने की शेखी बघारने के बाद गिरफ्तार किया गया था और बाद में जमानत दे दी गई थी — खुद को और अपने साथियों को परेशान करने वालों को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दे रहा है.
वीडियो में, वह व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से बात करते हुए एक पुलिस स्टेशन के बाहर कुछ लोगों द्वारा एक वाहन पर हमला करने के प्रयास का हवाला देता है और कहता है कि इसमें शामिल लोग "हमारे भाई" थे. वह इस हमले के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ बदला लेने की धमकी देता भी दिखाई देता है. वीडियो में वह व्यक्ति कहता है, “जो भी इनकी गाड़ी को घेरे ना, तुम लोग को हम कुछ नहीं करने वाले... तुम न मेरे लायक हो न मेरे लेवल पे हो.”
-
दिल्ली एसआईआर में 47.7 लाख मतदाता बाहर, कमजोर मतदाताओं की सुरक्षा के अपने ही नियमों की अनदेखी करता चुनाव आयोग
‘आर्टिकल-14’ में पत्रकार अरित्रि दास की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद जारी मसौदा मतदाता सूची से 47.7 लाख मतदाताओं को बाहर कर दिया गया. यह राजधानी के लगभग हर तीन मतदाताओं में से एक के नाम के बाहर होने के बराबर है. रिपोर्ट में ऐसे घरेलू कामगारों, कबाड़ संग्रहकर्ताओं और झुग्गी में रहने वाले लोगों के मामले सामने आए हैं, जिनके पास मतदाता पहचान पत्र है और जो पहले चुनावों में मतदान कर चुके हैं, लेकिन इस बार उन्हें फॉर्म और सत्यापन प्रक्रिया में पर्याप्त सहायता नहीं मिली.
फॉर्म और सत्यापन की मुश्किल
दक्षिण-पूर्वी दिल्ली की बंगाली कॉलोनी में रहने वाली 42 वर्षीय घरेलू कामगार मीनू चौधरी का नाम भी मसौदा सूची से बाहर है. उनका कहना है कि तुगलकाबाद के बीएलओ ने उनसे उनके पति के मतदाता पहचान पत्र की जानकारी मांगी, लेकिन पिछले 18 वर्षों से उनका पति से कोई संपर्क नहीं है. उनका नाम एएसडीडी सूची में ‘अनुपस्थित’ श्रेणी में दर्ज किया गया.
-
जम्मू-कश्मीर में भूमि अभियान के तहत सरकारी संपत्तियों के कब्जाधारियों को बेदखली के नोटिस
जम्मू और कश्मीर सरकार ने श्रीनगर के पॉश इलाकों में स्थित सरकारी संपत्तियों के उन कब्जाधारियों को बेदखली के नोटिस जारी किए हैं, जिनकी लीज (पट्टे) की अवधि समाप्त हो चुकी है. इसे 2019 के बाद सरकारी जमीन वापस लेने के व्यापक अभियान के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है.
यह पहल उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के प्रशासन द्वारा लागू किए गए 'जम्मू और कश्मीर लैंड ग्रांट रूल्स, 2022' के तहत शुरू किए गए अभियान का हिस्सा लगती है. इन नियमों के तहत प्रशासन को आवासीय उद्देश्यों के लिए मौजूदा/समाप्त पट्टों को छोड़कर, उन सभी पट्टेदारों से जमीन का कब्जा वापस लेने का अधिकार मिला है जिनकी लीज खत्म हो चुकी है. ऐसा न करने पर उन्हें बेदखल कर दिया जाएगा. मुजफ्फर रैना की रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर में कई लोगों का मानना है कि इस तरह की पहल का मकसद स्थानीय कब्जाधारियों को संपत्तियों से हटाकर बाहरी लोगों के लिए बोली लगाने का रास्ता साफ करना है.
-
पर्यावरण डेटा को रियल-टाइम करने की प्राथमिकता का अभाव, वर्ना पैसा मांगते वक्त भारत का पक्ष मजबूत होता
भारत दुनिया का सबसे विशाल भूजल निगरानी नेटवर्क संचालित करता है. केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) 1969 से 23,000 कुओं के ज़रिए जलस्तर को ट्रैक कर रहा है. इसके बावजूद, राष्ट्रीय जलविज्ञान परियोजना के तहत लगभग 25,000 में से केवल 5,260 स्टेशनों को ही टेलीमेट्री युक्त 'डिजिटल वाटर लेवल रिकॉर्डर' दिए जा रहे हैं. अंकित मिश्रा के अनुसार, अधिकांश आंकड़े आज भी हाथों से मापे जाते हैं. डिजिटल भुगतान और कर संग्रह में वैश्विक मिसाल पेश करने वाले भारत के पास क्षमता होते हुए भी पर्यावरण डेटा को रियल-टाइम करने की प्राथमिकता का अभाव है.
यह उदासीनता अन्य पर्यावरणीय क्षेत्रों में भी साफ़ झलकती है:
आर्द्रभूमि में देरी: भारत का आर्द्रभूमि मानचित्र वर्षों तक पुराने उपग्रह चित्रों पर निर्भर रहा. 2024 में 2018-19 के चित्रों के आधार पर क्षेत्रफल 16.89 मिलियन हेक्टेयर बताया गया. किसी नियमित वैधानिक सर्वेक्षण चक्र के बिना वर्षों का यह अंतर जल संसाधनों के प्रबंधन में बड़ी बाधा है.
-
कांति बाजपेयी | भारत और चीन ‘नैश संतुलन’ की स्थिति में हैं; क्या यह कायम रहेगा?
क्या 25 अगस्त को सीमा पर जारी आठ सूत्रीय परिणामों और सहमति पत्र और अभी-अभी संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक के बाद हम भारत-चीन संबंधों के रुख को लेकर थोड़े से अधिक समझदार हुए हैं?
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में कांति बाजपेयी ने लिखा है कि अगस्त के बयान और शिखर सम्मेलन के बाद भारत और चीन द्वारा जारी दो बयान जो संकेत देते हैं, वह यह है कि सीमा के संबंध में दोनों पक्ष ‘नैश संतुलन’ में हैं. अर्थशास्त्र की मूलभूत समझ से दूर मुझ जैसे लोगों के लिए, ब्रिटानिका ऑनलाइन के अनुसार, नैश संतुलन किसी गैर-सहयोगपूर्ण खेल का वह परिणाम है जिसमें "कोई भी खिलाड़ी अपनी रणनीति बदलकर अपने अपेक्षित परिणाम में सुधार नहीं कर सकता."
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
'द हिंदू ब्यूरो' रिपोर्ट: मणिपुर राहत शिविरों में 25 अस्वाभाविक मौतों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती; मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राज्य के मुख्य सचिव से विस्तृत रिपोर्ट और पोस्टमार्टम ब्योरा मांगा.
'पीटीआई' रिपोर्ट: मेघालय की राजधानी शिलांग में सरकारी परिसरों और पुलिस बूथों पर पेट्रोल बम से सिलसिलेवार 4 हमले; पुलिस अलर्ट, जांच जारी.
'द टेलीग्राफ' में मनोज कुमार झा का लेख: भारतीय संविधान की नैतिक कल्पना में गौतम बुद्ध, डॉ. बी.आर. अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू के दार्शनिक योगदान की विस्तृत व्याख्या.
सत्यसुंदर बारिक की रिपोर्ट: ओडिशा में निर्माण श्रमिक कल्याण योजना में CAG ऑडिट का बड़ा खुलासा; 2,487 'जीवित' श्रमिकों को कागजों पर मृत दिखाकर ₹15.10 करोड़ का घोटाला.
'ऑल्ट न्यूज़' की विशेष पड़ताल: ऑल्ट न्यूज़ द्वारा बीजेपी की नई सोशल मीडिया टीम में आलोक भट्ट की नियुक्ति, उनके पुराने विवादित पोस्ट और 'सावित्र एनालिटिक्स' व 'द पैंफलेट' से वित्तीय/संस्थागत जुड़ाव की विस्तृत रिपोर्ट.
'स्क्रोल' रिपोर्ट: पत्रकार रामचंदर छत्रपति हत्या मामले के 24 साल; हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ बेटे अंशुल की सुप्रीम कोर्ट में अपील और न्याय की लंबी जंग.
श्रवण गर्ग और निधीश त्यागी की रिपोर्ट: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन के भव्य आयोजनों, राजनीतिक संकटों और संघ प्रमुख मोहन भागवत के जन्मदिन पर सन्नाटे का बड़ा विश्लेषण.
'हरकारा डीप डाइव' पॉडकास्ट: वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन के साथ राजस्थान नगरीय निकाय चुनाव 2026 के नतीजों, भाजपा-कांग्रेस वोट शेयर और निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका का विश्लेषण.
वीडियो
स्वतंत्र भारद्वाज को मिली अंतरिम जमानत ने जमानत, जेल व्यवस्था और न्यायपालिका को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है. लेकिन क्या इस बहस को सिर्फ एक व्यक्ति की जमानत तक सीमित रखना चाहिए? हरकारा डीप डाइव में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने स्वतंत्र भारद्वाज की जमानत से आगे भारतीय जेल व्यवस्था, विचाराधीन कैदियों, न्याय तक समान पहुंच और मीडिया के अलग-अलग मामलों में अलग रवैये पर विस्तार से बात की. बातचीत में उमर खालिद, शरजील इमाम, गुरमीत राम रहीम और बिलकिस बानो मामले जैसे संदर्भों के जरिए यह सवाल उठाया गया कि जेल, जमानत और रिहाई को लेकर समाज और मीडिया की प्रतिक्रिया अलग-अलग क्यों दिखाई देती है. साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट की 'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' वाली टिप्पणी, संस्थागत भरोसे और लोकतंत्र में जनता की भूमिका पर भी चर्चा हुई. क्या स्वतंत्र भारद्वाज की जमानत को सिर्फ कानूनी घटना के रूप में देखना चाहिए? या इसके जरिए न्याय व्यवस्था, मीडिया और समाज के रवैये को भी परखना चाहिए? श्रवण गर्ग इस पूरे सवाल को एक अलग नजरिए से देखते हैं. पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं. स्वतंत्र भारद्वाज सिर्फ एक चेहरा या बड़ी सियासी प्रवृत्ति? | रीबॉर्न मनीष https://youtu.be/D0hg9AC_zD4 #HarkaraDeepDive #ShravanGarg #SwatantraBhardwaj #IndianJudiciary #Democracy #CivilLiberties
'हरकारा डीप डाइव' के इस एपिसोड में निधीश त्यागी एवं रीबॉर्न मनीष के साथ स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण, ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक नैरेटिव, सत्ता के संरक्षण और बदलते सामाजिक माहौल पर विस्तार से बातचीत हुई. क्या स्वतंत्र भारद्वाज सिर्फ एक व्यक्ति हैं या पिछले वर्षों में विकसित हुई एक बड़ी राजनीतिक-सामाजिक प्रवृत्ति का हिस्सा? क्या सत्ता के करीब होने का भरोसा कुछ लोगों के भीतर कानून का डर खत्म कर रहा है? और क्या संवैधानिक व्यवस्था के समानांतर ऐसी ताकतें मजबूत हो रही हैं, जिनके लिए नियमों की सीमाएं अलग हैं? रीबॉर्न मनीष ने बातचीत में फासीवाद की संरचना, ‘फोर्स’ और ‘कंसेंट’ की राजनीति तथा गैर-राज्य तत्वों की भूमिका को समझाने की कोशिश की. चर्चा में ‘अर्बन नक्सल’, ‘खान मार्केट गैंग’ और ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक नैरेटिव के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सिविल डिफेंस’ और ‘दिमागी नक्सल’ संबंधी बयानों से लेकर अग्निवीर योजना तक, बातचीत में यह सवाल उठाया गया कि आने वाले समय में प्रशिक्षित लेकिन बेरोजगार युवाओं की भूमिका क्या होगी. उमर खालिद और सिद्दीकी कप्पन जैसे मामलों के जरिए कानून के कथित असमान इस्तेमाल, लंबे समय तक जेल में रहने और नागरिक स्वतंत्रताओं पर भी चर्चा हुई. जंतर-मंतर की घटना के संदर्भ में नई पीढ़ी के बदलते राजनीतिक नजरिए पर भी बात हुई. क्या आज का युवा हिंदू-मुसलमान और मंदिर-मस्जिद की राजनीति से आगे रोजगार, शिक्षा और शांति को प्राथमिकता दे रहा है? क्या पुराने राजनीतिक नैरेटिव अब पहले की तरह प्रभावी नहीं रहे? रीबॉर्न मनीष के मुताबिक, “यह नशा अब फट चुका है, लोग वापस जाग रहे हैं.” वहीं उनका मानना है कि लंबे समय से दबा असंतोष आने वाले समय में नए सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व को जन्म दे सकता है. पूरी बातचीत देखिए और समझिए कि स्वतंत्र भारद्वाज प्रकरण के पीछे दिखाई देने वाली राजनीति और सामाजिक प्रवृत्ति को किस बड़े संदर्भ में देखा जाना चाहिए. रीबॉर्न मनीष के फेसबुक लेख https://www.facebook.com/share/p/1EWZWnsNWN/ #HarkaraDeepDive #RebornManish #NidheeshTyagi #SwatantraBhardwaj #DimaagiNaxal #CivilDefence #Agniveer #IndianPolitics #Fascism #Democracy #CivilLiberties #harkaramapnakarenge #Harkara #JantarMantar #CivilDefence #IndiaPolitics #Fascism #Agniveer #UmarKhalid #Constitution #RSS #HindiPodcast #NidheeshTyagi #DeepDive #Democracy #IndianYouth #FreeSpeech स. मिलाजुला सेट — यूट्यूब के लिए यही सुझाव है #हरकारा #जंतरमंतर #दिमागीनक्सल #सिविलडिफेंस #अग्निवीर #उमरखालिद #फासीवाद #संविधान #भारतीयराजनीति #हिंदीपॉडकास्ट #Harkara #JantarMantar #IndiaPolitics #Agniveer #HindiPodcast
हम हरकारा.
हरकारा एक देशज शब्द है संदेशवाहक के लिए.हमारी यह एक छोटी सी कोशिश है कि वे ज़रूरी ख़बरें आप तक पहुँचाई जाएँ, जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती हैं, छिपा दी जाती हैं, या फिर इस तरह तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं कि वे भ्रम पैदा करें.
हरकारा की छोटी सी टीम हर चौबीस घंटे में आपके लिए ऐसी ख़बरों को संजोकर एक सूची के रूप में प्रस्तुत करती है, उनके मर्म के साथ, ताकि आप मीडिया के शोर-शराबे में दब रही सच्ची ख़बरों तक पहुँच सकें.
हम अनुभवी पत्रकारों की एक छोटी टीम हैं, लेकिन एक बड़े समुदाय का हिस्सा भी, जिसमें आप भी शामिल हैं.
हमारा उद्देश्य उन मुद्दों पर संवाद और विमर्श शुरू करना है, जो अक्सर छूट जाते हैं या जानबूझकर हाशिए पर डाल दिए जाते हैं.
हरकारा तथ्यपरक पत्रकारिता, लोकतंत्र और पाठक-केंद्रित दृष्टिकोण का समर्थक है. हम खबरों और उनके पाठकों/श्रोताओं को फिर से केंद्र में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. ये गाना सुनिये. शायद आपको भी उतना ही पसंद आए, जितना टीम हरकारा को है.


राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के नतीजे आ गए हैं. भाजपा ने 566 वार्ड ज़्यादा जीते, पर वोटों में उसकी बढ़त 1% से भी कम है. भाजपा को 35.19%, कांग्रेस को 34.25% और निर्दलीयों को 27.38% वोट मिले. क्या यह भाजपा की जीत है या कांग्रेस के बिखराव की कहानी? जंतर-मंतर के जन-उभार के बाद पहले बड़े चुनाव में जनता का ग़ुस्सा कहाँ गया? वसुंधरा राजे के झालावाड़ से अर्जुन मेघवाल के बीकानेर तक दिग्गजों के गढ़ में क्या हुआ? और 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए ये नतीजे क्या संकेत देते हैं? निधीश त्यागी की बातचीत जयपुर के वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन से, जो दैनिक भास्कर के कई संस्करणों के संपादक रहे हैं और दशकों से राजस्थान की राजनीति पर लिखते रहे हैं. पढ़ें: harkaraonline.com न्यूज़लेटर: harkara.substack.com स्पॉटिफ़ाई और एपल पॉडकास्ट्स पर भी उपलब्ध बातचीत अच्छी लगी तो अपने हमख़यालों से साझा करें और चैनल सब्सक्राइब करें. हरकारा: शोर कम, रोशनी ज़्यादा.