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1997 में, धर्मेंद्र प्रधान ने एक छात्र नेता के रूप में पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था और उन्हें पीटा गया था
1997 में, धर्मेंद्र प्रधान लगभग 1,500 छात्रों के साथ ओडिशा सरकार के सचिवालय के बाहर खड़े होकर पेपर लीक का विरोध कर रहे थे. पुलिस ने भीड़ पर लाठीचार्ज कर दिया. प्रधान को पीटा गया और उन्हें फ्रैक्चर आए. वे अब भारत के केंद्रीय शिक्षा मंत्री हैं. नीट-यूजी परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर उनका इस्तीफा मांगने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र एकत्र हुए हैं, जहां सोमवार को दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ बर्बर कार्रवाई की थी.
ये दो घटनाएँ लगभग तीन दशकों के अंतराल पर हुई हैं, जिनमें अलग-अलग राज्य, अलग-अलग परिस्थितियाँ और एक ही मुद्दे के दो अलग-अलग पहलू शामिल हैं. इस समानता ने इस बात पर फिर से ध्यान आकर्षित किया है कि प्रधान उस पद तक कैसे पहुँचे जिस पर वे आज हैं.
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कमाल मौला मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुक्रवार को, मुस्लिम पक्ष ने कहा- दो जुमे की नमाज छूट चुकी
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई करेगा. मुस्लिम पक्ष ने अदालत को बताया कि वैकल्पिक नमाज स्थल विवादित परिसर से काफी दूर होने के कारण दो जुमे की नमाज छूट चुकी है.
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर उपलब्ध कराया गया वैकल्पिक स्थल करीब दो किलोमीटर दूर है, जिससे वहां पहुंचकर नमाज अदा करना व्यावहारिक नहीं है. वहीं, मध्य प्रदेश सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह दूरी लगभग 900 मीटर है.
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प्रदर्शन स्थल से जबरन हटाए जाने के बाद पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका और अखिलेश को हिरासत में लिया
दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन स्थल से कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और सपा प्रमुख अखिलेश यादव को जबरन हटाकर हिरासत में ले लिया.
राहुल गांधी ने कर्नाटक और केरल के मुख्यमंत्रियों सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ मिलकर एक दिन पहले प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के खिलाफ दोपहर करीब 3:30 बजे धरना शुरू किया था. जैसे ही पुलिस प्रदर्शन स्थल पर पहुंची, लोकसभा में विपक्ष के नेता को जमीन पर लेटे हुए और सुरक्षाकर्मियों द्वारा उठाए जाने का विरोध करते देखा जा सकता था. 'पीटीआई' की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया में वे घायल हो गए. एक सहयोगी ने बताया कि उनकी आंख के नीचे चोट आई है.
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राकेश कायस्थ | छात्रों पर पड़ी लाठियों ने देश की राजनीतिक स्मृतियों को वापस लौटा दिया है
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने लेखक और वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ के साथ छात्र आंदोलन, लोकतंत्र, राजनीतिक स्मृति और सरकार की प्रतिक्रिया पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्रीय सवाल यह है कि क्या छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई ने देश के युवाओं को राजनीतिक रूप से अधिक सजग बना दिया है.
राकेश कायस्थ का कहना है कि भारतीय समाज की राजनीतिक स्मृतियों को लंबे समय तक व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया. उन्होंने छात्रों पर हुए लाठीचार्ज को एक रूपक के तौर पर देखते हुए कहा कि जिस तरह फिल्मों में सिर पर चोट लगने से याददाश्त लौट आती है, उसी तरह छात्रों पर पड़ी लाठियों ने लोगों को यह याद दिला दिया कि लोकतंत्र में सरकारों की जवाबदेही कैसे तय होती रही है.
‘ऑल्ट न्यूज़’ में शिंजिनी मजूमदार की रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा की राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रेखा शर्मा ने इस पोस्ट को आगे बढ़ाते हुए लिखा, "ये छात्र नहीं हैं, ये सीजेपी और उसकी सहयोगी राजनीतिक पार्टियों के वेश में राष्ट्रविरोधी ताकतों के भाड़े के गुंडे हैं."
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“हेलो नेता, मंत्री!! अपने आपको भगवान समझ लिया है क्या? आपको शर्म नहीं आती, बदलाव ही शाश्वत नियम है”
गायक अरिजीत सिंह ने मंगलवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों का समर्थन किया और सोमवार को संसद की ओर निकाले गए ‘चलो संसद मार्च’ के दौरान पुलिस की बर्बर कार्रवाई की आलोचना की.
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अरिजीत ने ‘एक्स’ पर लिखा, "यार अब तो स्टूडेंट्स को मार रहे हैं यहाँ आप लोग. क्या आपको शर्म नहीं आती!!??"
इसके बाद उन्होंने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए एक और पोस्ट किया, "हेलो नेता, मंत्री !! क्या चल रहा है भाई!! अपने आप को भगवान समझ लिया है क्या ?"
‘द टेलीग्राफ’ एंटरटेनमेंट वेब डेस्क के अनुसार, गायक ने चेतावनी देते हुए यह भी लिखा, "हर चीज़ याद रखा जाएगा! हर हर महादेव! याद रखना. बदलाव ही एकमात्र शाश्वत नियम है".
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बड़े असर के लिए रहें तैयार: युद्ध की आशंकाओं से ऊर्जा बाज़ार में उथल-पुथल, भारत का तेल आयात बिल उछला
‘द टेलीग्राफ’ में परन बालकृष्णन की रिपोर्ट है कि मध्य पूर्व में भड़के भीषण सैन्य संघर्ष और वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल ने विश्व ऊर्जा बाज़ार को संकट में डाल दिया है. इसका सबसे गहरा आर्थिक असर भारत जैसे ऊर्जा-आयात पर निर्भर देशों पर देखने को मिल रहा है. अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते टकराव, यमन के हूती विद्रोहियों की आक्रामक गतिविधियों और समुद्री व्यापार मार्गों में बाधाओं ने कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है, जिससे भारत का आयात बिल अत्यधिक बढ़ गया है.
पेट्रोलियम मंत्रालय के तिमाही आंकड़ों के अनुसार, जून तक की तीन महीनों की अवधि में भारत का कच्चा तेल आयात बिल पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत तक उछल गया है. यद्यपि आयात की कुल मात्रा में मामूली गिरावट आई थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ऊंची कीमतों ने इस कमी के प्रभाव को निष्प्रभावी कर दिया.
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विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 : क्या उच्च शिक्षा का केंद्रीकरण संघवाद के लिए खतरा है?
पी. वी. कोंडल राव ने ‘साउथ फर्स्ट’ के लेख में विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (वीबीएसए) विधेयक, 2025 को भारत के संघीय ढांचे और उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता के लिए एक गंभीर चुनौती बताया है.
लेखक के अनुसार, दिसंबर 2025 में लोकसभा में पेश किया गया यह विधेयक उच्च शिक्षा में सुधार के नाम पर केंद्र सरकार के हाथों में अत्यधिक शक्तियां केंद्रित करता है. इस विधेयक के तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) को मिलाकर एक शीर्ष आयोग बनाने का प्रस्ताव है, जो देश में उच्च शिक्षा से जुड़े अधिकांश मामलों को नियंत्रित करेगा.
सरकार इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानती है, लेकिन लेखक का तर्क है कि इससे राज्यों की संवैधानिक भूमिका कमजोर होगी. भारत में शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है,
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चंद्रभूषण | यह आंदोलन अपने राजनीतिक परिणामों से ज्यादा नागरिक चेतना में बदलाव के लिए याद किया जाएगा
जा सकता. हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार, कवि और सामाजिक सरोकारों से जुड़े चंद्रभूषण ने उस दिन की अपनी आंखों देखी साझा की. वे न केवल आंदोलन स्थल पर मौजूद थे, बल्कि पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए लोगों में भी शामिल थे.
चंद्रभूषण के अनुसार, यह आंदोलन अपने स्वरूप में असाधारण था. पिछले कई दिनों से वे सोनम वांगचुक और अन्य अनशनकारियों के आंदोलन से जुड़े हुए थे और लगातार जंतर-मंतर आ-जा रहे थे. 19 जुलाई की रात उन्हें इस बात की आशंका थी कि आंदोलन को बलपूर्वक हटाने की कोशिश हो सकती है, इसलिए वे देर रात तक आंदोलन स्थल के आसपास मौजूद रहे.
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राकेश कायस्थ | सब याद रखा जाएगा
सिर पर चोट लगने से यादाश्त का वापस लौटना अब तक सिर्फ फिल्मों में होता था लेकिन दिल्ली में सचमुच हो गया. कॉरपोरेट मीडिया ने बरसों तक भारतीय समाज की राजनीतिक स्मृतियां खुरच-खुरचकर मिटाई थीं लेकिन दिल्ली पुलिस की लाठियों ने उन्हें पुनर्जीवित कर दिया.
खून से नहाया यह नौजवान जंतर-मंतर का एक प्रतिनिधि चेहरा बन गया. ऐसे ना जाने कितने चेहरे हैं. सिर से खून बह रहा है लेकिन आँखों में वो इरादे हैं जो किसी भी अनैतिक सत्ता की नींद उड़ा दें.
आपने 20 जुलाई को कई ऐसे दृश्य देखे होंगे जब बेरहमी से पिट रहे किसी नौजवान ने डरने से इनकार कर दिया. वो पुलिस वाले की आंखों में आंखें डालकर देखता रहा लेकिन प्रतिरोध में हाथ नहीं उठाया. ऐसा पहले कब हुआ था?
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दिल्ली में युवा प्रदर्शनकारियों का गुस्सा प्रधानमंत्री मोदी की ओर क्यों मुड़ा?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ आंदोलन अब केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं रह गया है. सोनम वांगचुक को भूख हड़ताल के 21वें दिन पुलिस द्वारा जबरन हटाए जाने के बाद बड़ी संख्या में युवाओं ने इस आंदोलन का रुख किया है और उनका गुस्सा सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की ओर दिखाई दे रहा है.
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, 23 वर्षीय श्री, जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली में डिजाइन विषय में परास्नातक की छात्रा हैं, सोमवार को जंतर-मंतर पर एक सफेद चादर के पीछे खड़ी थीं. इस चादर पर उन्होंने 1990 के दशक के लोकप्रिय बॉलीवुड गीत "चोली के पीछे क्या है?" की पंक्ति लिखी थी. यह चादर प्रतीकात्मक रूप से उसी सफेद कपड़े की याद दिला रही थी, जिसका इस्तेमाल दिल्ली पुलिस ने शनिवार को सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटाते समय कैमरों और मोबाइल फोन से दृश्य छिपाने के लिए किया था.
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भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विरोध में किसानों का दिल्ली कूच, शंभू बॉर्डर सील
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विरोध में आयोजित किसान महापंचायत में शामिल होने के लिए दिल्ली जा रहे किसानों को मंगलवार को शंभू बॉर्डर पर रोक दिया गया. हरियाणा सरकार ने पंजाब और हरियाणा को जोड़ने वाले इस महत्वपूर्ण अंतरराज्यीय मार्ग को सील कर दिया, जिसके बाद किसान संगठनों ने सरकार पर लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करने और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को दबाने का आरोप लगाया है.
‘मकतूब मीडिया’ के मुताबिक, दिल्ली के किसान घाट पर 'देश बचाओ मोर्चा' के बैनर तले आयोजित इस महापंचायत में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश समेत कई राज्यों के किसानों के शामिल होने की योजना थी. मंगलवार सुबह पंजाब से हजारों किसान बसों में सवार होकर दिल्ली के लिए रवाना हुए. इससे पहले किसानों ने रात श्री फतेहगढ़ साहिब गुरुद्वारे में बिताई थी. किसानों का काफिला सिरहिंद के पास माधोपुर होते हुए शंभू बॉर्डर पहुंचा, जहां भारी पुलिस बल और कई स्तर की बैरिकेडिंग पहले से मौजूद थी.
टीका - टिप्पणियां | विश्लेषण | लेख
‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ की रिपोर्ट. 1997 में ओडिशा में एबीवीपी छात्र नेता के रूप में पेपर लीक के खिलाफ लाठीचार्ज सहने वाले धर्मेंद्र प्रधान आज केंद्रीय शिक्षा मंत्री के तौर पर छात्रों के तीखे विरोध के केंद्र में हैं.
वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ का तीखा व्यंग्य 'बंद करो राजनीति'. नीट पेपर लीक, छात्र आंदोलन और सरकार के रवैये पर कड़ा प्रहार.
‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट. धार भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई; मुस्लिम पक्ष ने रखी नमाज़ स्थल की दूरी और 2003 की व्यवस्था बहाल करने की दलील.
‘हरकारा डीप डाइव’ में निधीश त्यागी की राकेश कायस्थ के साथ विशेष चर्चा. जानिए कैसे छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई ने देश के युवाओं की राजनीतिक स्मृति को पुनर्जीवित किया है.
‘काउंटरकरेंट्स’ में प्रकाशित भबानी शंकर नायक के लेख का हिंदी अनुवाद. दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और लोकतांत्रिक अधिकारों पर विशेष टिप्पणी.
‘द वायर’ के लिए करन थापर के साथ विशेष साक्षात्कार में दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने नीट घोटाले, जंतर-मंतर पर छात्रों पर लाठीचार्ज और सरकार के रवैये पर तीखी प्रतिक्रिया दी.
‘द हिंदू’ और ‘द वायर’ की ग्राउंड रिपोर्ट. जंतर-मंतर पर सीजेपी के संसद मार्च में दिल्ली पुलिस/आरएएफ की कार्रवाई; लेडी हार्डिंग अस्पताल में पेलेट गन से घायल युवक की सर्जरी, शॉक बेटन के इस्तेमाल का आरोप.
‘स्क्रॉल’ में डैन कय्यूम की विशेष विश्लेषणात्मक रिपोर्ट. श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के बाद क्या भारत में भी छात्र-युवा असंतोष सत्ता के लिए चुनौती बन रहा है? जानिए 4 बड़े कारण.
वीडियो
राम मंदिर ट्रस्ट में सामने आए कथित चढ़ावा अनियमितता के आरोपों ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह सिर्फ वित्तीय गड़बड़ी का मामला है, या इससे राम मंदिर आंदोलन, न्यायिक प्रक्रिया, राजनीतिक परियोजना और संस्थागत जवाबदेही पर भी बहस जुड़ती है? हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद से इन्हीं सवालों पर विस्तार से बातचीत की. चर्चा में राम जन्मभूमि आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले, राम मंदिर ट्रस्ट की जवाबदेही, जांच एजेंसियों पर भरोसा, आरएसएस की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर प्रो. अपूर्वानंद ने अपने विचार रखे. यह बातचीत समकालीन राजनीति, इतिहास और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाती है. अगर वीडियो पसंद आए तो लाइक करें, शेयर करें और हरकारा को सब्सक्राइब करना न भूलें. हरकारा. शोर कम, रोशनी ज़्यादा. #RamMandir #Ayodhya #Harkara #DeepDive #Apoorvanand #NidheeshTyagi #Politics #SupremeCourt #RSS #BJP #IndianPolitics #HindiNews #CurrentAffairs
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार मिल रहे विदेशी सम्मान क्या भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रतीक हैं, या इनके पीछे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की कोई अलग कहानी छिपी है? हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और निधीश त्यागी चर्चा करते हैं कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं, विदेशी पुरस्कारों, इंडियन डायस्पोरा की राजनीति और भारत के भीतर मौजूद चुनौतियों को किस नज़र से देखा जाना चाहिए. इस बातचीत में चर्चा के प्रमुख मुद्दे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिल रहे विदेशी सम्मान. विदेशी पुरस्कारों पर उठे सवाल और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट. इंडियन डायस्पोरा की भूमिका और विदेश यात्राओं की राजनीति. भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और घरेलू चुनौतियां. विदेश नीति, कूटनीति और रणनीतिक हित. क्या विदेशी सम्मान घरेलू राजनीति को प्रभावित करते हैं? अगर आपको यह विश्लेषण महत्वपूर्ण लगा हो तो वीडियो को लाइक करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें. हरकारा. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
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20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर पर क्या हुआ था? पुलिस कार्रवाई के दौरान आखिर ऐसा क्या हुआ कि वरिष्ठ पत्रकार और कवि चंद्रभूषण को भी हिरासत में लिया गया? हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण ने जंतर-मंतर की अपनी आंखों देखी साझा की. उन्होंने बताया कि किस तरह हजारों छात्रों और युवाओं की भीड़, पुलिस की बैरिकेडिंग, लाठीचार्ज, हिरासत और आंदोलन के बदलते स्वरूप ने भारतीय लोकतंत्र के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं. क्या यह केवल एक छात्र आंदोलन है या भारतीय राजनीति में एक नए सामाजिक उभार की शुरुआत? क्या सरकार इस नए तरह के स्वतःस्फूर्त जन आंदोलन को समझ पाने में असफल रही है? और आखिर क्यों चंद्रभूषण कहते हैं कि “सर कुछ बदले चाहे न बदले, हम तो बदल गए.” इस बातचीत में जानिए. जंतर-मंतर की पूरी आंखों देखी. पुलिस कार्रवाई और हिरासत का अनुभव. आंदोलन में शामिल युवाओं की मनःस्थिति. सोनम वांगचुक और आंदोलन की रणनीति पर चर्चा. * सरकार के डर और लोकतंत्र के भविष्य पर चंद्रभूषण का विश्लेषण. #HarkaraDeepDive #JantarMantar #Chandrabhushan #NidheeshTyagi #SonamWangchuk #StudentProtest #DelhiPolice #Democracy #Harkara