02/02/2026: नरवणे की न छपी किताब पर संसद में हंगामा | हिमंता और मोदी एक ही हैं? | एपस्टीन, अनिल अंबानी और मोदी | बजट पर जयति घोष | शेयर बाज़ार क्यों बैठा रहा? | कानून और गुंडा राज पर आकार पटेल
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
चीन संकट: जनरल नरवणे का खुलासा - 2020 में युद्ध के बेहद करीब था भारत, पीएम ने फैसला सेना पर छोड़ा.
संसद संग्राम: राहुल गांधी द्वारा नरवणे की किताब कोट करने पर बीजेपी भड़की, राजनाथ सिंह ने किया विरोध.
एपस्टीन-अंबानी लिंक: यूएस जस्टिस डिपार्टमेंट की फाइल्स में खुलासा - अनिल अंबानी ने यौन अपराधी एपस्टीन से मीटिंग की थी.
बंगाल वोटर विवाद: ममता बनर्जी चुनाव आयोग की बैठक से गुस्से में निकलीं, कहा - 58 लाख नाम काटे गए, मुझे अपमानित किया गया.
सोनम वांगचुक: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा - वांगचुक लद्दाख को दूसरा बांग्लादेश बनाना चाहते हैं.
बैंक घोटाला: 25,000 करोड़ के घोटाले में डिप्टी सीएम की पत्नी सुनेत्रा पवार अब भी ईडी की जांच के घेरे में.
तेल डील: ट्रम्प का दावा - भारत अब ईरान नहीं, वेनेजुएला से तेल खरीदेगा.
आदिवासी जीत: महाराष्ट्र में हजारों आदिवासी किसानों के मार्च के बाद सरकार झुकी, जमीन हक देने का वादा.
पूर्व आर्मी चीफ नरवणे का अप्रकाशित संस्मरण
मोदी सरकार ने चीन सीमा संकट पर कैसे पल्ला झाड़ा और 2020 में हम युद्ध के कितने करीब थे
31 अगस्त 2020 की रात, घड़ी में 8:15 बज रहे थे. उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी ने आर्मी चीफ जनरल एम.एम. नरवणे को एक बेहद गंभीर फोन किया. खबर खतरे की घंटी थी—पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला की खड़ी चढ़ाई पर चार चीनी टैंक और पैदल सैनिक तेजी से ऊपर बढ़ रहे थे. यह कैलाश रेंज की वही रणनीतिक चोटियाँ थीं, जिन पर भारतीय सेना ने कुछ ही घंटे पहले कब्जा जमाया था. स्थिति इतनी नाजुक थी कि चीनी टैंक भारतीय चौकियों से महज कुछ सौ मीटर दूर थे. दोनों देश युद्ध के मुहाने पर खड़े थे.
द कैरवन में सुशांत सिंह की एक विस्तृत रिपोर्ट में पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के हवाले से बताया गया है कि उस रात वास्तव में क्या हुआ था. यह रिपोर्ट मोदी सरकार द्वारा बनाए गए उस नैरेटिव की धज्जियां उड़ाती है जिसमें “मजबूत और निर्णायक नेतृत्व” का दावा किया जाता है.
‘जो उचित समझो, वह करो’: पीएम मोदी का वह फैसला
जैसे ही चीनी टैंक ऊपर चढ़ने लगे, जनरल नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और एनएसए अजीत डोभाल को फोन किया. समय बीतता जा रहा था और हर मिनट चीनी टैंक ऊपर पहुँच रहे थे. रात 10:30 बजे राजनाथ सिंह ने वापस फोन किया. उन्होंने बताया कि पीएम मोदी से बात हो गई है. नरवणे लिखते हैं कि पीएम का निर्देश सिर्फ एक वाक्य का था: “जो उचित समझो, वह करो”.
नरवणे के लिए यह एक बड़ा झटका था. उन्हें लगा कि सरकार ने फैसला लेने की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है और एक “गर्म आलू” उनके हाथ में थमा दिया गया है. करगिल युद्ध (वाजपेयी) या 1971 (इंदिरा गांधी) के विपरीत, जहाँ राजनीतिक नेतृत्व ने स्पष्ट निर्देश दिए थे, यहाँ सेना प्रमुख को बिना किसी लिखित आदेश या राजनीतिक सुरक्षा कवच के युद्ध शुरू करने या टालने का फैसला लेना था. नरवणे लिखते हैं, “मैं पूरी तरह अकेला पड़ गया था.”
ब्लफ का खेल और टला हुआ युद्ध
ऑपरेशन्स रूम में सन्नाटा था, बस दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी. नरवणे ने खुद से सवाल किया, “क्या मैं वाकई युद्ध शुरू करना चाहता हूँ?” देश कोविड और गिरती अर्थव्यवस्था से जूझ रहा था. उन्होंने फैसला किया कि भारत पहली गोली नहीं चलाएगा, ताकि चीन को युद्ध थोपने का कोई बहाना न मिले. इसके बजाय, उन्होंने एक जोखिम भरा ‘ब्लफ’ खेला. उन्होंने जनरल जोशी को आदेश दिया कि भारतीय टैंकों को पास की ढलानों पर एकदम आगे तैनात किया जाए और उनकी तोपों का मुंह सीधे चीनी टैंकों की ओर कर दिया जाए. संदेश साफ था—अगर तुम एक इंच भी आगे बढ़े, तो हम उड़ा देंगे. यह दांव काम कर गया. नरवणे लिखते हैं, “चीनी सेना पहले पलक झपका गई.” चीनी टैंक रुक गए और एक विनाशकारी युद्ध टल गया.
गलवान: खुफिया विफलता और सैनिकों की पिटाई
किताब में गलवान घाटी (जून 2020) की घटना पर भी बेबाक राय है. नरवणे स्वीकार करते हैं कि यह घटना अचानक नहीं हुई थी, बल्कि मई 2020 से चीनी आक्रामकता बढ़ रही थी जिसे स्थानीय कमांडरों ने गंभीरता से नहीं लिया. वे लिखते हैं कि भारतीय कमांडर “तैयार नहीं थे”.
सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि गलवान झड़प के बाद चीन द्वारा बंधक बनाए गए भारतीय सैनिकों को न केवल खुले में रखा गया, बल्कि उन्हें बुरी तरह पीटा गया. नरवणे लिखते हैं, “हमारे जवानों को पीटा गया... यह उनकी बर्बरता थी.” बावजूद इसके, मोदी सरकार ने न तो इस दुर्व्यवहार को कभी स्वीकार किया और न ही चीन को कोई आधिकारिक विरोध पत्र जारी किया. सरकार संसद और जनता से यह छिपाती रही.
बफर जोन और जमीन का नुकसान
संस्मरण इस कड़वे सच को भी उजागर करता है कि ‘डिसएंगेजमेंट’ (सेनाओं के पीछे हटने) की प्रक्रिया में भारत ने अपनी जमीन पर नियंत्रण खो दिया है. नरवणे बताते हैं कि कैसे ‘बफर जोन’ बनाने की सहमति देकर भारत ने उन इलाकों में गश्त का अधिकार खो दिया जहाँ हमारे सैनिक दशकों से जा रहे थे. कैलाश रेंज की चोटियों से पीछे हटना, जो भारत के पास एक बड़ा ‘ट्रम्प कार्ड’ था, एक राजनीतिक फैसला था, न कि सैन्य. इससे भविष्य के सीमा समझौतों में भारत की स्थिति कमजोर हो गई है.
सेंसरशिप और सरकार का डर
नरवणे की यह किताब अप्रैल 2024 में पेंगुइन द्वारा छपनी थी, लेकिन रक्षा मंत्रालय ने इसे रोक रखा है. यह साफ है कि एक पूर्व आर्मी चीफ का ऐसा स्पष्टवादी विवरण सरकार के लिए असुविधाजनक है जो यह दावा करती रही है कि “ना कोई घुसा है, ना कोई घुसा हुआ है.” ‘द कारवां’ की रिपोर्ट बताती है कि यह संस्मरण उस ‘नैरेटिव कंट्रोल’ के लिए खतरा है जिसमें मोदी सरकार ने भारी निवेश किया है.
राहुल गांधी ने जैसे ही नरवणे का जिक्र किया, पूरी बीजेपी विरोध में उतरी; राहुल ने पूछा, ‘इसमें ऐसा क्या है, जो इन्हें इतना डरा रहा है’
इस बीच सोमवार को लोकसभा में जैसे ही विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित “संस्मरण” का हवाला देने की कोशिश की, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह समेत पूरी भाजपा ने इसका कड़ा विरोध किया और उल्टे कांग्रेस नेता पर सदन को “गुमराह” करने का आरोप लगाया.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, जब राहुल गांधी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए खड़े हुए, तो उन्होंने कहा कि वह सबसे पहले पिछले वक्ता, भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या द्वारा राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कांग्रेस के खिलाफ लगाए गए आरोपों का जवाब देना चाहेंगे. इसके बाद उन्होंने जनरल नरवणे के उस लेख को उद्धृत करना शुरू किया, जिसे उन्होंने उनका “संस्मरण” बताया था.
लेकिन, राजनाथ सिंह ने इसका कड़ा विरोध किया और राहुल गांधी से यह स्पष्ट करने को कहा कि वह पुस्तक प्रकाशित हुई है या नहीं. सदन में लगभग 50 मिनट तक इसी मुद्दे पर हंगामा चलता रहा. अध्यक्ष ओम बिरला बार-बार यह कहते रहे कि सदन की कार्यवाही से असंबंधित किसी भी पुस्तक या समाचार पत्र की कतरन का हवाला नहीं दिया जा सकता, जबकि राहुल गांधी इस बात पर अड़े रहे कि दस्तावेज़ प्रमाणित है और वह इसे उद्धृत कर सकते हैं.
राहुल ने कहा कि वह इस खास मुद्दे पर कभी बोलना नहीं चाहते थे, लेकिन भाजपा के सूर्या द्वारा कांग्रेस पार्टी की देशभक्ति पर सवाल उठाए जाने के बाद उन्होंने ऐसा करने का फैसला किया. उधर, सिंह अपनी इस बात को जब दोहराते रहे कि पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई ह, तो राहुल ने कहा कि वह अपने विचार रखने के लिए एक मैगजीन (कैरेवन) में प्रकाशित लेख का हवाला दे रहे हैं. मगर, अध्यक्ष ने इसकी अनुमति नहीं दी और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अध्यक्ष के आदेश का पालन करने की बात कही.
रिजिजू ने कहा कि यदि विपक्ष के नेता बार-बार अध्यक्ष के आदेश की अनदेखी करते हैं और नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं, तो सदन को इस पर चर्चा करनी होगी कि ऐसे सदस्य के खिलाफ क्या कार्रवाई की जानी चाहिए. राहुल के टस से मस न होने पर, अध्यक्ष ने उन्हें पुस्तक को उद्धृत करने के खिलाफ बार-बार चेतावनी दी.
इसके बाद राजनाथ सिंह खड़े हुए और पूछा कि यदि पुस्तक को प्रकाशित करने की अनुमति नहीं दी गई जैसा कि आरोप लगाया गया है, तो नरवणे इसके खिलाफ अदालत क्यों नहीं गए? रक्षा मंत्री ने राहुल पर “सदन को गुमराह करने” का भी आरोप लगाया.
राजनाथ सिंह ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष (राहुल गांधी) उस पुस्तक को सदन के सामने पेश करें, जिसका वह हवाला दे रहे हैं, क्योंकि जिस पुस्तक का वह जिक्र कर रहे हैं वह प्रकाशित नहीं हुई है. “
विपक्ष के नेता को समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का समर्थन मिला, जिन्होंने कहा, “चीन से जुड़ा मामला बहुत संवेदनशील है. लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष को बोलने की अनुमति दी जानी चाहिए.” राहुल गांधी द्वारा बार-बार “चीनी टैंक” वाक्यांश का उपयोग किए जाने का सदन में लगभग हर भाजपा नेता ने विरोध किया. गृह मंत्री अमित शाह ने सवाल किया, “जब किताब अभी तक प्रकाशित ही नहीं हुई है, तो वह उससे उद्धरण कैसे दे सकते हैं?”
बार-बार हो रहे हस्तक्षेप के कारण राहुल गांधी ने पूछा, “इसमें ऐसा क्या है, जो इन्हें इतना डरा रहा है? अगर वे डरे हुए नहीं हैं, तो मुझे आगे पढ़ने की अनुमति दी जानी चाहिए.”
राहुल ने कहा, “सरकार पूर्व सेना प्रमुख की किताब की उस एक पंक्ति से डर गई है जिसे मैं उद्धृत करना चाहता हूँ. मैं उस पंक्ति को लोकसभा में ज़रूर कहूँगा.” कांग्रेस नेता ने ज़ोर देकर कहा कि वह जिस लेख और पुस्तक का हवाला दे रहे हैं, वे “100% प्रामाणिक” हैं.
हंगामे के कारण सदन की बैठक स्थगित हुई तो संसद परिसर में मीडिया से चर्चा करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि मैं सिर्फ वही कहना चाहता हूँ, जो आर्मी चीफ नरवणे ने लिखा है. मैं यही बताना चाहता हूँ कि आर्मी चीफ ने क्या बोला, मोदी जी और राजनाथ जी ने उनसे क्या कहा. क्या ऑर्डर दिया. बस, इतना ही संसद में बोलना चाहता हूँ.
सदन में भारत-चीन संबंधों पर बात नहीं हो सकती, तो क्या हम वहां बैठकर सिर्फ ‘जय प्रधानमंत्री करें’ : महुआ मोइत्रा
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने “सदन में हंगामे” के दावों को खारिज कर दिया और सत्ता पक्ष पर विपक्ष को बार-बार “देशद्रोही” कहकर निशाना साधने का आरोप लगाया. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी कटाक्ष करते हुए सदन में विपक्षी भाषणों पर लगाई गई पाबंदियों पर सवाल उठाए.
‘टीओआई’ न्यूज़ डेस्क के मुताबिक, संसद के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए मोइत्रा ने कहा, “संसद में कोई हंगामा नहीं था. यह अविश्वसनीय है कि सत्ता पक्ष और ट्रेजरी बेंच, जिसमें प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और संसदीय कार्य मंत्री शामिल हैं, विपक्ष के बारे में कुछ भी कह सकते हैं.”
उन्होंने सवाल किया, “क्या आप मुझे यह बता रहे हैं कि सदन में भारत-चीन संबंधों का जिक्र नहीं किया जा सकता? क्या सदन में भारत-पाकिस्तान संबंधों पर चर्चा नहीं की जा सकती?”
उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में आगे कहा, “तो फिर हमें किस बारे में बात करनी चाहिए? क्या हम बस बैठे रहें और ‘जय प्रधानमंत्री’ करें? क्या सदन में हमें सिर्फ यही करना चाहिए?”
उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेताओं पर अक्सर देशभक्ति की कमी का ठप्पा लगा दिया जाता है. उन्होंने कहा, “वे हमें देशद्रोही कहते हैं. वे हम पर लांछन लगाते हैं और यह सब ठीक माना जाता है. इसे रोकने के लिए कभी कोई नियम आड़े नहीं आता. वे कुछ भी कह सकते हैं.”
तृणमूल कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष के सदस्यों को पूरी छूट दी जाती है, जबकि विपक्ष की आवाज दबा दी जाती है. उन्होंने कहा, “तेजस्वी सूर्या जैसा कोई व्यक्ति खड़ा होकर कुछ भी कह सकता है और उसकी सराहना की जाती है. लेकिन जब हम विपक्ष के नाते कुछ कहने के लिए खड़े होते हैं, तो हमारे अधिकार छीन लिए जाते हैं और हमसे कह दिया जाता है कि इस पर कोई रूलिंग (व्यवस्था) है.”
नियम 349 का हवाला देते हुए मोइत्रा ने तर्क दिया कि चर्चाएं पूरी तरह से संसदीय कार्य के दायरे में थीं. उन्होंने आगे कहा, “आज सदन की कार्यसूची में राष्ट्रपति का अभिभाषण है, और राष्ट्रपति हर विषय पर बात करते हैं.”
श्रवण गर्ग: ‘विकसित भारत’ के शोर में नफरत की गूंज: क्या असम में संविधान के खिलाफ युद्ध?
एक तरफ संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ‘विकसित भारत 2047’ का खाका खींच रही थीं, सुनहरे भविष्य के वादे कर रही थीं, वहीं दूसरी तरफ देश के एक हिस्से में संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर एक समुदाय विशेष को नागरिकता और अधिकारों से वंचित करने की खुली मुनादी की जा रही थी. ‘हरकारा डीप डाइव’ की विशेष चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के हालिया बयानों और देश के शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी पर तीखे सवाल उठाए हैं.
हरकारा के साथ बातचीत में श्रवण गर्ग ने रेखांकित किया कि जब वित्त मंत्री संसद में बजट पेश करते हुए प्रधानमंत्री की पीठ थपथपा रही थीं, तब शायद उनकी आँखों के सामने असम के मुख्यमंत्री का वह चेहरा नहीं था जो खुले मंच से अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दे रहे थे. हिमंता बिस्वा शर्मा का यह बयान कि “असम के 4 से 5 लाख ‘मिया’ (मुस्लिम) वोटर्स के नाम मतदाता सूची से काट दिए जाएंगे” और “पार्टी कार्यकर्ता रात के 2 बजे जाकर उन्हें परेशान करें,” केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक देश के लिए खतरे की घंटी है.
गर्ग ने सवाल उठाया, “हमें उस परिदृश्य की कल्पना करनी चाहिए कि अगर हिमंता, योगी आदित्यनाथ या पुष्कर सिंह धामी भविष्य में देश के प्रधानमंत्री बन जाएं, तो क्या वे देश की एक-तिहाई आबादी को बाहर निकाल फेंकेंगे?” चर्चा के दौरान सबसे गंभीर प्रश्न देश की संस्थाओं की भूमिका पर उठाया गया. श्रवण गर्ग ने कहा, “महुआ मोइत्रा ने सही पूछा था कि देश की सर्वोच्च अदालत आवारा कुत्तों के मामले में तो स्वतः संज्ञान ले लेती है, लेकिन जब एक मुख्यमंत्री खुलेआम हेट स्पीच देता है और संविधान की धज्जियां उड़ाता है, तो अदालत चुप क्यों है?”
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर भी कटाक्ष करते हुए कहा कि लोग अब सोचने लगे हैं कि प्रधानमंत्री के आखिर कितने चेहरे हैं. एक तरफ वे वैश्विक मंचों पर ‘सबका साथ’ की बात करते हैं, और दूसरी तरफ उनके ही मुख्यमंत्री एक समुदाय को आर्थिक रूप से चोट पहुँचाने (मजदूरी कम देने) और उन्हें राज्य से बेदखल करने की बात करते हैं. गर्ग का मानना है कि प्रधानमंत्री की यह चुप्पी या तो डर की वजह से है या फिर मौन सहमति है.
बातचीत में यह स्पष्ट किया गया कि असम में जो हो रहा है, वह केवल मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नहीं है. यह भारत के संविधान के खिलाफ एक खुला युद्ध है. जब एक मुख्यमंत्री कहता है कि “मेरा काम लोगों को परेशान करना है ” तो वह अपने पद की शपथ और राजधर्म दोनों का उल्लंघन कर रहा होता है. असम में डीलिमिटेशन के जरिए सीटों का समीकरण बदलना और एनआरसी के अधूरे एजेंडे को इस तरह लागू करना लोकतंत्र की मूल भावना पर प्रहार है.
श्रवण गर्ग ने ‘हरकारा’ के दर्शकों को आगाह करते हुए कहा कि इस समय जो नागरिक चुप हैं, वे भी इस षड्यंत्र का हिस्सा माने जाएंगे. “अगर हम इस पर अपनी असहमति दर्ज नहीं कराते, तो हम भी उस ‘नफरती भारत’ के निर्माण में सहयोग दे रहे हैं.”
एपस्टीन के संदेशों से खुलासा: अनिल अंबानी ने ट्रंप के पास मोदी का एजेंडा पहुंचाने के लिए यौन अपराधी का इस्तेमाल किया
“जेफ्री एपस्टीन के उपकरणों (डिवाइसेज) से प्राप्त अमेरिकी न्याय विभाग के रिकॉर्ड दिखाते हैं कि अनिल अंबानी ने मई 2019 में न्यूयॉर्क की एक बैठक में भाग लिया था, जिसे जेफ्री एपस्टीन ने ‘मोदी के प्रतिनिधि’ की भागीदारी वाली बैठक के रूप में वर्णित किया था. रिकॉर्ड यह भी बताते हैं कि अंबानी 2017 से 2019 तक अमेरिकी राजनीति में पहुंच बनाने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं से जुड़ी चर्चाओं के संबंध में एपस्टीन के संपर्क में रहे थे.”
‘द वायर’ में देवीरूपा मित्रा ने अमेरिकी न्याय विभाग के रिकॉर्ड के हवाले से लिखा है कि कैसे एपस्टीन ने अनिल अंबानी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक एजेंडे का उपयोग करके अमेरिकी राजनीति, विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश की थी.
लीक हुए संदेशों से पता चलता है कि एपस्टीन और अनिल अंबानी के बीच व्यावसायिक और रणनीतिक संबंधों को लेकर चर्चा हुई थी. एपस्टीन खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश कर रहा था, जो अंबानी को अमेरिकी सत्ता के गलियारों (जैसे ट्रंप प्रशासन) में रसूख दिला सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, एपस्टीन ने भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों, विशेषकर पीएम मोदी की नीतियों और ‘मेक इन इंडिया’ जैसे एजेंडे को ट्रंप प्रशासन के सामने भुनाने की कोशिश की. उसने भारतीय व्यापारिक हितों को एक “कवर” या माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया ताकि वह खुद को एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ (ग्लोबल फिक्सर) के रूप में स्थापित कर सके.
मित्रा की रिपोर्ट बताती है कि एपस्टीन ने ट्रंप के करीबी सहयोगियों और सरकारी अधिकारियों तक पहुंचने के लिए इन भारतीय संपर्कों का सहारा लिया. उसने यह दिखाने की कोशिश की कि उसके पास एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और नेतृत्व तक सीधी पहुंच है.रिपोर्ट का सबसे गंभीर पहलू यह है कि एक सजायाफ्ता यौन अपराधी किस तरह से उच्च-स्तरीय कूटनीति और व्यापारिक सौदों के बीच अपनी जगह बना रहा था. यह वैश्विक सुरक्षा और राजनीतिक नैतिकता पर बड़े सवाल खड़े करता है.
यह पूरी रिपोर्ट हाल ही में सार्वजनिक किए गए अदालती दस्तावेजों और ईमेल के विश्लेषण पर आधारित है, जो एपस्टीन के ‘ब्लैक बुक’ और उसके संपर्कों के जाल को उजागर करते हैं. कुलमिलाकर, जेफ्री एपस्टीन ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को फिर से हासिल करने और सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने के लिए अनिल अंबानी जैसे बड़े नामों और भारत-अमेरिका के महत्वपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल करने का प्रयास किया था. अंग्रेजी में पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है.
पश्चिम बंगाल एसआईआर विवाद:
ममता बनर्जी चुनाव आयोग की बैठक से बाहर निकलीं, कहा- ‘अपमानित किया गया’
चुनाव आयोग पर सत्तारूढ़ भाजपा की भाषा बोलने का आरोप लगाते हुए, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सोमवार को चुनाव आयोग (ईसी) के कार्यालय से बाहर निकल गईं. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, बनर्जी ने आरोप लगाया कि बैठक के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार ने उन्हें “अपमानित” किया. ममता बनर्जी, तृणमूल कांग्रेस के सांसदों और पश्चिम बंगाल के 12 मतदाताओं के साथ अपनी आपत्तियां दर्ज कराने आयोग पहुंची थीं. इन 12 मतदाताओं में से पांच वे लोग थे जिन्हें चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मृत घोषित कर मतदाता सूची से उनका नाम हटा दिया गया था. विरोध स्वरूप इस प्रतिनिधिमंडल ने काली शॉल ओढ़ रखी थी.
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल को “जानबूझकर निशाना” बनाया जा रहा है और दावा किया कि 58 लाख मतदाताओं का नाम बिना अपना पक्ष रखने का मौका दिए सूची से हटा दिया गया है. उन्होंने सवाल उठाया कि एसआईआर की प्रक्रिया भाजपा शासित राज्यों में क्यों नहीं हो रही है और यह केवल विपक्षी शासित राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल—तक ही क्यों सीमित है.
ममता बनर्जी ने कहा, “मैंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में इतना अहंकारी और झूठा चुनाव आयुक्त कभी नहीं देखा. उनके पास भाजपा की ताक़त है, हमारे पास जनता की ताक़त है. इसलिए हमने बैठक का बहिष्कार किया.” उन्होंने सीईसी ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जब तक वह कुर्सी पर हैं, यह देश के लिए ख़तरनाक है. उन्होंने यह भी तंज कसा कि आयोग मतदाताओं के माता-पिता का जन्म प्रमाण पत्र मांग रहा है. उन्होंने पूछा, “मैं आडवाणी जी का सम्मान करती हूँ और उनसे पूछती हूँ कि क्या वह अपने माता-पिता का जन्म प्रमाण पत्र दे सकते हैं? मुझे शक है कि प्रधानमंत्री मोदी भी ऐसे दस्तावेज़ दे पाएंगे.”
बाड़मेर में मतदाता नाम हटाने के लिए थोक में मिले ‘फ़ॉर्म 7’, भाजपा एजेंटों ने भरने से किया इनकार
राजस्थान के बाड़मेर जिले के सीमावर्ती गांवों में मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, यहां सैकड़ों की तादाद में ‘फ़ॉर्म 7’ (जो मतदाता का नाम हटाने के लिए भरा जाता है) रहस्यमय तरीके से सामने आए हैं. हैरानी की बात यह है कि जिन भाजपा बूथ-लेवल एजेंटों (बीएलए) के नाम पर ये फ़ॉर्म भरे गए थे, उन्होंने इन पर हस्ताक्षर करने से ही इनकार कर दिया है.
जनपालिया गांव के एक भाजपा कार्यकर्ता सुभान खान तब दंग रह गए जब उनके बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) ने उन्हें बताया कि ‘फ़ॉर्म 7’ के ज़रिए उनका खुद का नाम हटाने के लिए आवेदन आया है. सुभान खान ने रिपोर्टर से कहा, “मैं जब यहां ज़िंदा हूँ और यहीं रह रहा हूँ, तो मैं अपना नाम हटाने के लिए अर्ज़ी क्यों लगाऊंगा?”
बीएलओ रुखमाना राम के पास ऐसे 105 से ज़्यादा फ़ॉर्म पड़े हैं. उन्होंने बताया कि आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई क्योंकि लोगों ने साइन करने से मना कर दिया और ‘शिफ्टेड’ (स्थानांतरित) श्रेणी के तहत जिन लोगों के नाम हटाने की मांग की गई थी, वे पीढ़ियों से गांव में ही रह रहे हैं. बीएलओ फखरुद्दीन के पास भी 87 ऐसे फ़ॉर्म हैं, जो सुभान खान और कृष्णा राम (भाजपा बूथ एजेंटों) के नाम से भरे गए हैं, लेकिन दोनों ने इसे भरने से इनकार किया है.
स्थानीय लोगों में इस “फर्ज़ी” फ़ॉर्म 7 प्रकरण को लेकर भारी आक्रोश है. ग्रामीणों को डर है कि कहीं उनके नाम सच में न कट जाएं. एक किसान काजी ने बताया कि उनकी पत्नी अजीमत, जिन्होंने पिछले हफ्ते ही बच्चे को जन्म दिया है, का नाम हटाने के लिए फ़ॉर्म 7 भरा गया था जिसमें उन्हें “शिफ्टेड” बताया गया, जबकि वह गांव में ही मौजूद हैं. एसडीएम बद्री नारायण विश्नोई ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि ये फ़ॉर्म उनके कार्यालय तक कैसे पहुंचे.
बजट
सोनम वांगचुक पर केंद्र का बड़ा आरोप: जेन ज़ी को उकसाकर नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी स्थिति की ओर धकलने चाहते थे
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत सोनम वांगचुक की हिरासत का बचाव करते हुए, केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस लोकप्रिय जलवायु कार्यकर्ता ने युवा पीढ़ी को उकसाकर लद्दाख को नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी स्थिति की ओर धकेलने का प्रयास किया है.
केंद्र की ओर से पेश हुए वरिष्ठ विधि अधिकारी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ के समक्ष दलील दी, “जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक चाहते थे कि केंद्र शासित प्रदेश (लद्दाख) में वैसा ही आंदोलन और हिंसा हो जैसा नेपाल और बांग्लादेश में हुआ था.”
सुचित्रा कल्याण मोहंती के अनुसार, जेल में बंद कार्यकर्ता की पत्नी गीतांजलि जे. आंग्मो की याचिका का विरोध करते हुए मेहता ने कहा कि वांगचुक लद्दाख को “नेपाल या बांग्लादेश” बनाना चाहते थे. उन्होंने कहा, “हम सभी जानते हैं कि बांग्लादेश में क्या हुआ. वह संवेदनशील युवाओं को निशाना बना रहे हैं. जिस क्षण आप इस देश में ‘हमारा’ और ‘उनका’ कहते हैं, आप देश के खिलाफ कुछ कर रहे होते हैं.”
विस्तार से बताते हुए मेहता ने तर्क दिया कि वांगचुक ने कथित तौर पर भड़काऊ भाषण दिए हैं और महात्मा गांधी के नाम का इस्तेमाल केवल अपने भाषणों की शुरुआत और अंत में एक ‘मुखौटे’ के तौर पर किया है. मेहता ने कहा, “उनके भाषण की शुरुआत और अंत में हमेशा गांधीजी होते हैं. लेकिन बीच में आप जो कुछ भी कहते हैं, उसके लिए गांधीजी को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल करते हैं. यह आमतौर पर तब किया जाता है, जब भड़काऊ भाषण दिए जाते हैं.” उन्होंने आगे जोड़ा कि वांगचुक युवा पीढ़ी को नेपाल में हुई घटनाओं का अनुसरण करने के लिए गुमराह कर रहे थे.
केंद्र ने जिलाधिकारी के आदेश को सही बताते हुए इसका बचाव किया और कहा कि यह निर्णय विभिन्न कारकों की जांच करने के बाद पारित किया गया था. सोमवार को सॉलिसिटर जनरल की दलीलें अधूरी रहीं और मंगलवार को दोपहर के भोजन के बाद इनके जारी रहने की संभावना है. केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के लिए पूर्ण राज्य के दर्जे और छठी अनुसूची की मांगों को लेकर सितंबर 2025 में लेह में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद, वांगचुक को राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल में एनएसए के तहत हिरासत में रखा गया है.
एक सुनवाई के दौरान, वांगचुक ने उन आरोपों से इनकार किया कि उन्होंने ‘अरब स्प्रिंग’ की तरह सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए बयान दिए थे. उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार की आलोचना और विरोध करना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है. उन्होंने शीर्ष अदालत को बताया कि इस तरह की भावनाएं राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं हैं कि उनकी हिरासत को उचित ठहराया जा सके. ये दलीलें वांगचुक की पत्नी, आंग्मो की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दीं. वरिष्ठ वकील ने आगे कहा कि उनके खिलाफ हिंसा का कोई मामला नहीं है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कहा, “उन्होंने जो कुछ भी किया है वह पूरी तरह से शांतिपूर्ण तरीके से किया है. कोई हिंसा नहीं, केवल शांतिपूर्ण माध्यमों से.”
25 हजार करोड़ रुपये के बैंक घोटाले में सुनेत्रा अब भी जांच के घेरे में
महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार 25,000 करोड़ रुपये के महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक (एमएससीबी) घोटाले में कानूनी जांच का सामना कर रही हैं. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अपनी चार्जशीट में अजित पवार के साथ उनका नाम भी शामिल किया था. मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) ने दंपत्ति को क्लीन चिट दे दी थी, लेकिन ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले को बंद करने पर आपत्ति जताई और मामला फिलहाल अदालत में लंबित है.
मुम्बई से विजय वी. सिंह की खबर के अनुसार, सुनेत्रा और अजीत की आयकर विभाग द्वारा बेनामी संपत्ति कानून के तहत भी जांच की गई थी, जहां एजेंसी ने 1,000 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क की थी. हालांकि, दंपत्ति को निर्णायक प्राधिकरण और फिर अपीलीय न्यायाधिकरण से राहत मिली, जिसने फैसला सुनाया कि इस सबूत के अभाव में कि संपत्ति के लिए भुगतान उनके द्वारा किया गया था, उन्हें ‘लाभार्थी स्वामी’ नहीं माना जा सकता.
एमएससीबी मामला राज्य के सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में से एक बना हुआ है, क्योंकि इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के कई राजनेता शामिल थे. यह घोटाला एमएससीबी के अंतर्गत आने वाले 31 जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों से संबंधित है, जो ज्यादातर जिलों के नाम पर हैं और वरिष्ठ राजनेताओं के नेतृत्व में हैं. इन बैंकों ने नियमों का उल्लंघन करते हुए सहकारी चीनी मिलों को ऋण दिया था. आरोप है कि इससे एमएससीबी को 25,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, क्योंकि इन चीनी मिलों ने 2002 और 2017 के बीच भुगतान में चूक की थी. एमएससीबी ने बाद में चीनी मिलों को उनकी ज़मीन के साथ कौड़ियों के दाम पर नीलाम कर दिया, जो अधिकतर बैंक चलाने वालों के रिश्तेदारों को दिए गए.
बंबई उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी और इसके निर्देश पर 2019 में जांच शुरू करने के लिए एक एफआईआर दर्ज की गई थी. इसी के आधार पर ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया. बाद में, तत्कालीन विपक्ष के नेता अजित पवार अपने एनसीपी गुट के साथ भाजपा और शिंदे सेना की महायुति सरकार में शामिल हो गए.
जरंदेश्वर चीनी सहकारी मिल की खरीद के संबंध में सुनेत्रा का नाम ईडी की जांच के दायरे में आया, जबकि अजित एमएससीबी से जुड़े थे. ईडी ने कहा कि मिल को एमएससीबी द्वारा 2010 की नीलामी में मुंबई के एक बिल्डर से जुड़ी कंपनी गुरु कमोडिटी प्राइवेट लिमिटेड को 65.7 करोड़ रुपये में बेचा गया था. तुरंत बाद, गुरु कमोडिटी ने मिल को एक नई बनी निजी कंपनी, जरंदेश्वर शुगर को केवल 12 लाख रुपये के वार्षिक शुल्क पर लीज पर दे दिया. ईडी ने कहा, “जरंदेश्वर शुगर मिल्स लिमिटेड के निदेशक, राजेंद्र घाडगे, अजित के मामा हैं, जो उस समय बैंक के निदेशक थे. नीलामी में मिल की खरीद के लिए उपयोग किए गए धन का मुख्य स्रोत जरंदेश्वर शुगर था, जिसे बदले में जय एग्रोटेक प्राइवेट लिमिटेड से 20 करोड़ रुपये मिले थे, जिसमें सुनेत्रा एक निदेशक थीं.”
आयकर विभाग के निष्कर्षों को चुनौती देने वाली कार्यकर्ता अंजलि दमानिया ने कहा, “पिछले साल, मैंने आयकर विभाग को पवारों के खिलाफ मामला फिर से खोलने के लिए पत्र लिखा था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने गणपति डील-कॉम मामले में अपने उस आदेश को वापस ले लिया था, जिसमें कहा गया था कि बेनामी लेनदेन (निषेध) संशोधन अधिनियम, 2016 को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू किया जा सकता है, जिससे उन्हें राहत मिली थी. मैंने आयकर अधिकारियों से पवार और भुजबल की संपत्तियों को फिर से कुर्क करने का अनुरोध किया है जो उसी आदेश के आधार पर पहले मुक्त की गई थीं, क्योंकि अब इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा वापस ले लिया गया है.”
‘भारत अब वेनेज़ुएला से तेल खरीदेगा’: ट्रम्प ने कहा ‘डील का कॉन्सेप्ट’ तैयार है
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि भारत अब ईरान के बजाय वेनेज़ुएला से कच्चा तेल खरीदेगा और नई दिल्ली द्वारा कराकस (वेनेज़ुएला) का तेल आयात करने के लिए “डील” या “डील का कॉन्सेप्ट” (समझौता) तैयार है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, हालांकि ट्रम्प की टिप्पणियों पर भारत की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि तेल खरीदने का फैसला बाज़ार के हालात (मार्केट डायनामिक्स) पर आधारित है. फ़रवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से ही भारत सरकार का यही रुख रहा है. भारतीय रिफाइनिंग सेक्टर के सूत्रों ने संकेत दिया है कि कुछ भारतीय रिफाइनर वेनेज़ुएला से तेल आयात फिर से शुरू करने के इच्छुक होंगे.
शनिवार को फ्लोरिडा के पाम बीच के लिए उड़ान भरते समय ‘एयर फोर्स वन’ पर पत्रकारों से बात करते हुए ट्रम्प ने ये टिप्पणियाँ कीं. वे इस सवाल का जवाब दे रहे थे कि क्या चीन वेनेज़ुएला को तेल आपूर्ति के बदले दिए गए अपने कर्ज़ की वसूली कर पाएगा. ग़ौरतलब है कि जनवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिकी सेना द्वारा वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के बाद, ट्रम्प ने कहा था कि वाशिंगटन कराकस के तेल क्षेत्र पर नियंत्रण कर लेगा और अमेरिकी कंपनियां वहां के संघर्षरत तेल उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश करेंगी.
ट्रम्प ने कहा, “चीन का स्वागत है और वे बहुत सारा तेल ले सकते हैं. हम चीन का स्वागत करते हैं. हमने पहले ही एक सौदा कर लिया है. भारत भी इसमें आ रहा है, और वे ईरान से खरीदने के बजाय वेनेज़ुएला का तेल खरीदने जा रहे हैं. तो हमने वह सौदा, यानी उस सौदे का कॉन्सेप्ट पहले ही बना लिया है.”
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत ने पिछले लगभग सात वर्षों से ईरान से कोई कच्चा तेल आयात नहीं किया है, क्योंकि ट्रम्प के पहले कार्यकाल के दौरान तेहरान पर अमेरिकी प्रतिबंध लगा दिए गए थे. वहीं, भारत ने इस साल के बजट में ईरान के चाबहार बंदरगाह के लिए कोई फंड आवंटित नहीं किया है, क्योंकि अमेरिका की ओर से इस प्रोजेक्ट को लेकर चुनौतियां सामने आ रही हैं.
वेनेज़ुएला से भारत के तेल आयात की कहानी ईरान से अलग है. 2019 में अमेरिकी प्रतिबंध लगने से पहले रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) जैसी निजी कंपनियां वहां से नियमित तेल खरीदती थीं. अक्टूबर 2023 में जब अमेरिका ने प्रतिबंधों में ढील दी थी, तो आरआईएल ने आयात फिर शुरू किया था, लेकिन 2025 की गर्मियों में ट्रम्प प्रशासन द्वारा टैरिफ (शुल्क) बढ़ाने की धमकी के बाद इसे रोक दिया गया था. अब, जिंस बाज़ार विश्लेषण फर्म ‘केप्लर’ के अनुसार, एचपीसीएल (एचपीसीएल) और अन्य रिफाइनरियों में अपग्रेड के बाद भारत की वेनेज़ुएला के भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता बढ़ सकती है.
इसी बीच, 30 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वेनेज़ुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज से बात की और दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने पर सहमति जताई. मादुरो को अमेरिका द्वारा पकड़े जाने के बाद यह रोड्रिग्ज और मोदी के बीच पहली फोन कॉल थी, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा भी चर्चा का एक विषय था.
छत्तीसगढ़: दूधकैया गांव में सांप्रदायिक झड़प, छह पुलिसकर्मी घायल और कई घर फूंके गए
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के दूधकैया गांव में रविवार देर शाम भड़की सांप्रदायिक हिंसा में कम से कम छह पुलिसकर्मी घायल हो गए और भीड़ ने करीब एक दर्जन घरों और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया. ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में एजाज़ कैसर की रिपोर्ट के अनुसार, हिंसा को और भड़कने से रोकने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है.
गरियाबंद के पुलिस अधीक्षक वेदव्रत सिरमौर ने बताया कि तीन मुख्य आरोपियों को राजिम पुलिस स्टेशन में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया है. यह बवाल तब शुरू हुआ जब आरिफ और उसके दो साथियों ने कथित तौर पर लोहे की रॉड से स्थानीय चार-छह युवकों के एक समूह पर हमला कर दिया. पुलिस के मुताबिक, ये आरोपी उसी गांव में एक शिव मंदिर की मूर्ति के कथित विखंडन से जुड़े एक साल पुराने मामले में हाल ही में ज़मानत पर रिहा हुए थे.
आरोप है कि ज़मानत पर छूटने के बाद इन तीनों ने गांव वालों को धमकाना और मंदिर मामले से जुड़े गवाहों व शिकायतकर्ताओं को परेशान करना शुरू कर दिया था. पुलिस अधिकारी ने बताया कि इससे ग्रामीणों में गुस्सा बढ़ गया और तनाव फैल गया. इसके बाद स्थानीय निवासियों ने आरोपियों के घरों को निशाना बनाया और आग लगा दी. भीड़ ने आरोपियों और उनके साथियों या पड़ोसियों के लगभग 12 रिहायशी मकानों और कई गाड़ियों को फूंक दिया.
विश्लेषण
आकार पटेल: क़ानून तोड़ कर सत्ता का इस्तेमाल करने वाले देशों का हश्र क्या होता है?
देखिए, एक लोकतांत्रिक समाज होने के नाते, यह उम्मीद की जाती है कि भारत की अथॉरिटीज ‘रूल ऑफ लॉ’ यानी क़ानून के राज का पालन करें. इसमें यह मानकर चला जाता है कि गवर्नेंस मनमाना नहीं होगा, ख़ासकर जब बात क्रिमिनल लॉ की हो. यह बात इसलिए ज़रूरी है क्योंकि क्रिमिनल लॉ में जिंदगियां तबाह करने की ताक़त होती है, जैसा कि हाल ही में एक जज ने कॉलेज के उन छात्रों को याद दिलाया जिन्होंने एक प्रोटेस्ट मीट में हिस्सा लिया था.
विरोध प्रदर्शन में जाने वाले लोगों पर अपराध का चार्ज क्यों लगना चाहिए, यह तो एक अलग मुद्दा है, लेकिन यहाँ चीज़ें ऐसी ही हैं. स्टेट द्वारा क्रिमिनल लॉ का ऐसे ही कैजुअल इस्तेमाल करना और फिर आम आदमी का लंबे समय तक संघर्ष करना—हम भारतीयों ने मान लिया है कि ‘भाई, यहाँ तो ऐसा ही होता है’. यह हमारे यहाँ की ख़ास बात है: यह कोई नेचुरल बात नहीं हो सकती कि ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ में नागरिक पुलिस से, कोर्ट से और सरकार से डरते हों. इसमें कुछ नया नहीं है और ‘पुलिस का चक्कर’—यह शब्द तो सिनेमा ने न जाने कब से इस्तेमाल किया है.
पर मैं आज कुछ अलग बात करना चाहता था, जो अब भारत की डेमोक्रेसी में जड़ पकड़ चुका है. इस हफ़्ते की दो हेडलाइंस से आपको समझ आ जाएगा कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ.
पहली हेडलाइन है: ‘इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अक्यूज़्ड (आरोपियों) के पैरों में गोली मारने की प्रैक्टिस के लिए यूपी पुलिस की आलोचना की’. इसकी सबहेड कहती है: ‘ऐसा बर्ताव पूरी तरह अस्वीकार्य है, क्योंकि सज़ा देने की ताक़त सिर्फ़ कोर्ट्स के पास है,’ बेंच ने कहा.
दूसरी हेडलाइन है: ‘उत्तराखंड के कन्वर्जन लॉ के तहत दर्ज केस कोर्ट में गिर गए: 7 साल, 5 पूरे ट्रायल, और पाँचों में बरी’.
पहले मामले की बात करें, तो यूपी सरकार ने पिछले साल जुलाई में खुद आँकड़े जारी किए थे. उन्होंने बताया कि 2017 से अब तक उन्होंने 9,467 लोगों के पैरों में गोली मारी है. इसका मतलब है कि पिछले नौ सालों में यूपी में पुलिस ने हर रोज़ लगभग तीन लोगों को गोली मारी है.
कोर्ट ने कुछ ख़ास बातें नोट कीं: कि लोगों को या तो अपने बड़े अफ़सरों को खुश करने के लिए गोली मारी जा रही थी या फिर बिना किसी प्रोसेस के सज़ा देने के लिए. कोर्ट ने कहा कि यह ज्यूडिशियल डोमेन में दखलअंदाजी है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. बयान रिकॉर्ड करने और इन्वेस्टिगेशन के मामले में, कोर्ट ने नोट किया कि पुलिस सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन्स को फॉलो नहीं कर रही थी. कोर्ट इस बात को लेकर भी चिंतित थी कि पुलिस अफ़सर जजों पर, ख़ासकर चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट्स पर, दबाव डाल रहे थे कि वो स्पेसिफिक ऑर्डर्स पास करें.
जज साहब ने कहा कि कोर्ट उत्तर प्रदेश को ‘पुलिस स्टेट’ नहीं बनने दे सकती.
एक ऐसा स्टेट जो कस्टडी में लोगों को मार देता है, उन्हें अपाहिज बना देता है, जो बिना ड्यू प्रोसेस के प्राइवेट प्रॉपर्टी तोड़ देता है और जस्टिस सिस्टम (यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट) को भी नहीं मानता—क्या वो पहले से ही एक ‘पुलिस स्टेट’ नहीं है?
दूसरी रिपोर्ट की हेडलाइन थी: ‘उत्तराखंड के कन्वर्जन लॉ के केस कोर्ट में गिर गए: 7 साल, 5 पूरे ट्रायल, सभी 5 बरी’. यहाँ बात हो रही है उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2018 की. यह उन कई क़ानूनों में से पहला था जो बीजेपी द्वारा तब लाए गए जब ‘लव जिहाद’ की कॉन्सपिरेसी थ्योरी फैलाई जाने लगी थी.
यह क़ानून मुस्लिमों और हिंदुओं के बीच शादी को अपराध मानता है अगर कोई एक पार्टनर धर्म बदलता है. लेकिन, यह कहता है कि ‘अगर कोई व्यक्ति अपने पैतृक धर्म में वापस आता है’ तो उसे कन्वर्जन नहीं माना जाएगा, बिना यह बताए कि ‘पैतृक धर्म’ का मतलब क्या है. साफ़ मतलब है कि हिंदू धर्म में कन्वर्ट होने को कन्वर्जन नहीं गिना जाएगा.
एक बार ‘लव जिहाद’ शादी की शिकायत दर्ज हो गई, तो डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पुलिस के ज़रिए जाँच करेगा कि धर्म बदलने का ‘असली इरादा, मक़सद और वजह’ क्या है. जो लोग बिना सरकार को ‘प्रेस्क्राइबड प्रोफार्मा’ में अप्लाई किए और बिना पुलिस इंक्वायरी के बाद सरकार की मंज़ूरी लिए अपना धर्म बदलते हैं, उन्हें एक साल की जेल हो सकती है.
यह क़ानून सात साल से लागू है. इस दौरान, पाँच केसों का ट्रायल पूरा हुआ, और सभी में आरोपी बरी हो गए. सात और केस ट्रायल के दौरान ही ख़ारिज हो गए.
रिपोर्ट में कहा गया कि ‘कोर्ट रिकॉर्ड्स से साफ़ है कि सबूतों के स्टैंडर्ड्स अक्सर पूरे नहीं किए गए, आपसी सहमति वाले रिश्तों को क्रिमिनलाइज़ किया गया, और इन्वेस्टिगेशन और प्रॉसिक्यूशन में प्रोसीजरल ग़लतियाँ थीं.’
जिस अख़बार ने यह रिपोर्ट छापी, उसने अपनी एडिटोरियल हेडलाइन में बड़े शब्दों में लिखा: ‘उत्तराखंड में ज्यूडिशियरी ने नागरिकों को एग्जीक्यूटिव की ज़्यादती से बचाया’. यह बात बेमतलब है, क्योंकि उन लोगों ने जो सज़ा भुगती वो तो असली थी. जैसा कि आजकल के यंगस्टर्स कहते हैं, यहाँ ‘बचाया’ शब्द पर कुछ ज़्यादा ही बोझ डाला जा रहा है.
तो हम अपने आस-पास जो देख रहे हैं, उससे क्या नतीजा निकालें? दो बातें.
पहली यह कि पूरे इंडिया में सत्ता जानबूझकर क़ानून तोड़ रही हैं ताकि वो वही करें जो बीजेपी सरकारें चाहती हैं. वो ऐसा पूरे कॉन्फिडेंस के साथ कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी कोई अकाउंटेबिलिटी नहीं होगी, और हो सकता है उन्हें इसके लिए इनाम भी मिले, जैसा कि यूपी कोर्ट ने नोट किया.
दूसरी बात वही है जहाँ से हमने शुरू किया था—क्या होता है जब किसी लोकतांत्रिक समाज की ताकतें जानबूझकर रूल ऑफ लॉ, ख़ासकर क्रिमिनल लॉ को तोड़ती हैं? इसके शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म अंजाम होते हैं, और दोनों ही होने तय हैं.
शॉर्ट टर्म अंजाम वो हैं जो हम पढ़ते हैं: सरकार के एक्शन से लोगों की ज़िंदगी बर्बाद होना. लॉन्ग टर्म अंजाम वो हैं जो पूरे देश और समाज पर असर डालते हैं. एक ऐसा देश जो खुद से झूठ बोलता है कि वो एक ‘रूल ऑफ लॉ’ वाली डेमोक्रेसी है, वो अंत में वहाँ नहीं पहुँचेगा जहाँ रूल ऑफ लॉ समाजों को ले जाना चाहता है.
आकार पटेल वरिष्ठ पत्रकार और भारत में मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंडिया के प्रमुख हैं.
बजट प्रतिक्रिया
जयति घोष: हिस्सेदारी में कटौती, अधिकारों का हनन और दिखावे की राजनीति
केंद्र सरकार की वित्तीय नीति में राज्यों के प्रति कंजूसी और खुला राजनीतिक पक्षपात साफ़ तौर पर दिखाई दे रहा है. द टेलीग्राफ के लिए लिखे गए एक आर्टिकल जेएनयू में इकोनॉमिक्स पढ़ा चुकी जयति घोष लिखती हैं कि संविधान के अनुसार, केंद्र को टैक्स से होने वाली आमदनी का एक तय हिस्सा राज्यों के साथ बाँटना होता है. यह अनुपात और तरीका समय-समय पर बनने वाले वित्त आयोग तय करते हैं. 14वें वित्त आयोग, जिसकी अध्यक्षता वाई. वी. रेड्डी ने की थी, ने सिफ़ारिश की थी कि राज्यों का हिस्सा 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत किया जाए, जिसे 2015 से 2020 के बीच लागू किया जाना था.
लेकिन केंद्र सरकार ने इस सिफ़ारिश को कमज़ोर कर दिया. इसके लिए टैक्स में सेस और सरचार्ज का हिस्सा तेज़ी से बढ़ाया गया. इन करों से मिलने वाली रकम राज्यों के साथ बाँटना ज़रूरी नहीं होता. इसका नतीजा यह हुआ कि काग़ज़ पर राज्यों का हिस्सा 42 प्रतिशत दिखा, लेकिन हक़ीक़त में पिछले कुछ वर्षों में राज्यों को मिलने वाला टैक्स घटकर लगभग 34 प्रतिशत रह गया. मौजूदा वित्त वर्ष के संशोधित बजट अनुमान भी इसी बात की पुष्टि करते हैं.
इसी दौरान केंद्र ने टैक्स से जुड़े बड़े फैसले राज्यों से बिना सलाह लिए किए. 2019 में कॉरपोरेट टैक्स की दरों में भारी कटौती इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. इस फैसले से अगले ही साल टैक्स आमदनी में जीडीपी के 2 प्रतिशत से ज़्यादा का नुकसान हुआ, और आगे भी नुकसान जारी रहने की संभावना है. इस फैसले से राज्यों की आय भी घटी, लेकिन उन्हें इसकी भरपाई के लिए कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया.
इस साल के बजट से यह भी सामने आया है कि जब केंद्र को उम्मीद के मुताबिक टैक्स नहीं मिलता, तो वह सबसे पहले राज्यों को दिए जाने वाले पैसे में कटौती करता है. संशोधित अनुमान बताते हैं कि केंद्र को मिलने वाला शुद्ध टैक्स बजट अनुमान से लगभग 1.62 लाख करोड़ रुपये कम रहने वाला है. इसके जवाब में केंद्र ने राज्यों को मिलने वाले अनुदान (ग्रांट्स-इन-एड) में करीब 1.19 लाख करोड़ रुपये की कटौती कर दी और केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर खर्च भी लगभग 1.21 लाख करोड़ रुपये कम कर दिया है. इन कटौतियों के बावजूद केंद्र ने अपने वित्त को मज़बूत करने के लिए लगभग 78,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त सरप्लस बना लिया.
इन फैसलों का बोझ सीधे राज्यों पर पड़ता है. जबकि जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों ने अपने ज़्यादातर टैक्स लगाने के अधिकार पहले ही छोड़ दिए हैं और वे कड़े कानूनी और वित्तीय नियमों में बँधे हुए हैं. इसके बावजूद उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे केंद्र की कटौती की भरपाई खुद करें.
केंद्र सरकार का यह राजनीतिक पक्षपात पहले भी देखा गया है. पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मनरेगा के पैसे सालों तक रोक दिए गए. कई विपक्ष-शासित राज्यों को प्राकृतिक आपदाओं के समय भी केंद्र से पर्याप्त मदद नहीं मिली. वहीं दूसरी ओर, यह संदेश खुले तौर पर दिया जाता है कि अगर लोग ‘डबल इंजन सरकार’ चुनेंगे, तो राज्यों को ज़्यादा फंड मिलेगा. इसे संघीय व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ माना जा रहा है.
यह केंद्रीकरण अब ग्रामीण रोज़गार योजना में सबसे ज़्यादा साफ़ दिखता है. नए क़ानून के तहत ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना का स्वरूप बदल दिया गया है. अब यह अधिकार-आधारित और माँग पर मिलने वाली योजना नहीं रही. केंद्र यह तय करेगा कि कहाँ, कब और कितना काम मिलेगा, और इसमें ठेकेदारों व पूँजी-प्रधान कामों की भी अनुमति होगी. इसके साथ ही राज्यों पर कुल खर्च का 40 प्रतिशत बोझ डाल दिया गया है, जबकि पहले यह हिस्सा 10 प्रतिशत या उससे भी कम था. ज़्यादातर राज्यों के लिए इतनी बड़ी राशि जुटाना लगभग असंभव है.
बजट में इस नई योजना के लिए 95,692 करोड़ रुपये रखे गए हैं, लेकिन केंद्र चाहता है कि राज्य 40 प्रतिशत अतिरिक्त रकम जोड़ें, जिससे कुल खर्च 1.51 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचे. अधिकतर राज्यों के लिए यह संभव नहीं है. ऐसे में रोज़गार के मौके कम होंगे, 125 दिन काम देने का वादा पूरा नहीं होगा, और इसकी ज़िम्मेदारी राज्यों पर डाल दी जाएगी.
विवेक कौल: शेयर बाजार के लिए “फटा पोस्टर, निकला जीरो”
आर्थिक टिप्पणीकार और लेखक विवेक कौल के अनुसार, केंद्रीय बजट के बाद शेयर बाजार (सेंसेक्स) में आई 2% की गिरावट का मुख्य कारण केवल ‘प्रतिभूति लेनदेन कर’ (एसटीटी) में वृद्धि नहीं है, बल्कि बाजार की अवास्तविक उम्मीदों का टूटना है. शेयर बाजार के विशेषज्ञ (ओपीएम- दूसरों का पैसा मैनेज करने वाले) यह नरेटिव बना रहे हैं कि टैक्स बढ़ने से बाजार गिरा, जबकि सच्चाई अधिक गहरी और जटिल है. बजट से पहले ‘ओपीएम लॉबी’ ने टैक्स कटौती और पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) को खत्म करने की भारी उम्मीदें पाल ली थीं. हालांकि, सरकारी आंकड़े बताते हैं कि व्यक्तिगत आयकर और कुल कर राजस्व में वृद्धि की दर अनुमान से काफी धीमी रही है. ऐसे में सरकार के लिए करों में कटौती करना संभव नहीं था.
पिछले 16 महीनों से बाजार में कोई खास बढ़त नहीं दिखी है और वैल्यूएशन (मूल्यांकन) बहुत ऊंचे स्तर पर हैं. कौल के अनुसार, ऊंचे वैल्यूएशन के कारण प्रमोटर्स और विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल रहे हैं, जबकि मध्यम वर्ग का पैसा बाजार में फंस रहा है. यह मध्यम वर्ग से अमीरों की ओर संपत्ति के हस्तांतरण जैसा है.
आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, घरेलू बचत का एक बड़ा हिस्सा (23%) पहले ही शेयर बाजार में जा चुका है. इसलिए सरकार को निवेशकों को आकर्षित करने के लिए और अधिक टैक्स छूट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई.
कौल इस बजट को ‘बाजार-विरोधी’ के बजाय ‘भ्रम-विरोधी’ कहते हैं. सरकार ने बाजार को खुश करने के बजाय ‘राजस्व यथार्थवाद’ को प्राथमिकता दी है. बाजार की गिरावट दरअसल एसटीटी बढ़ने के कारण नहीं, बल्कि उन ‘आसमानी उम्मीदों’ के धराशायी होने के कारण हुई जो विशेषज्ञों ने खुद ही गढ़ी थीं. संक्षेप में, यह बजट शेयर बाजार के लिए “फटा पोस्टर, निकला जीरो” साबित हुआ क्योंकि प्रचार और उम्मीदें हकीकत से कोसों दूर थीं.
आदिवासी किसानों की जीत: नासिक से निकली पदयात्रा के बाद सरकार ने माना ज़मीन का हक़
महाराष्ट्र के अहमदनगर (अब अहिल्यानगर) जिले के खड़की बुद्रुक गांव के महादेव कोली आदिवासी किसान नामदेव भांगरे ने 25 जनवरी को गुस्से और अनिश्चितता के साथ विरोध मार्च शुरू किया था. परी की रिपोर्ट के मुताबिक़ तीन दिन बाद, 28 जनवरी को नामदेव एक नयी उम्मीद के साथ घर लौटे हैं. उनके साथ नासिक और अहिल्यानगर से आए हज़ारों आदिवासी किसान भी हमक़दम थे. भांगरे का परिवार पीढ़ियों से अकोले तालुका में छह एकड़ वन भूमि पर खेती करता आ रहा है, लेकिन कभी उस ज़मीन का मालिक नहीं बन पाया. उनका कहना है कि वे चावल और रागी उगाते हैं, लेकिन डर है कि उन्हें कभी भी इस ज़मीन से बेदख़ल किया जा सकता है.
इस असुरक्षा को खत्म करने के लिए 2006 में वन अधिकार अधिनियम बना, जो आदिवासियों और पारंपरिक वनवासियों को ज़मीन और संसाधनों पर अधिकार देता है. लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका सही से लागू नहीं हो पाया. भांगरे ने भी वन अधिकार अधिनियम के तहत दावा किया था, जिसे ग्राम सभा ने सही माना, लेकिन सालों की प्रक्रिया के बाद चार साल में उसे ख़ारिज कर दिया गया. हाल ही में पास के गांव में एक परिवार को वन अधिकारियों ने ज़मीन से बेदखल कर दिया, जिससे डर और बढ़ गया था.
इसी वजह से ऑल इंडिया किसान सभा (एआईकेएस) के नेतृत्व में आदिवासी किसान एक बार फिर 25 जनवरी 2026 को नासिक से मुंबई की ओर पदयात्रा पर निकले. इससे पहले 2018 में भी वे 180 किलोमीटर पैदल चलकर मुंबई पहुंचे थे, तब भी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वादे किए थे. इस बार किसान “ठोस फैसले” चाहते थे. लगभग 80 किलोमीटर चलकर खारदी पहुंचने के बाद, 28 जनवरी को सरकार से बातचीत हुई और मार्च रोक दिया गय. सरकार ने खारिज किए गए FRA दावों को फिर से खोलने, वन भूमि पर फसल निरीक्षण कराने और वन भूमि पर खेती करने वालों को सरकारी योजनाओं का लाभ देने पर सहमति ज़ाहिर की है.
ऑल इंडिया किसान सभा के अनुसार, मुख्यमंत्री ने इन मांगों के लागू होने की व्यक्तिगत गारंटी दी है. हर जिले में उप-विभागीय अधिकारी (एसडीओ) की अध्यक्षता में समितियां बनेंगी और तीन महीने में सभी मामलों की जांच होगी. इससे हज़ारों आदिवासी किसानों को दोबारा ज़मीन के मालिक बनने की उम्मीद जगी है. नामदेव भांगरे कहते हैं कि वे चाहते हैं कि उनके बेटे-बेटी को वह सुरक्षा मिले, जो उन्हें कभी नहीं मिली.
कोटद्वार में मुस्लिम दुकानदार के समर्थन पर बवाल: बजरंग दल के प्रदर्शन के बाद तीन एफआईआर दर्ज
उत्तराखंड के कोटद्वार में एक मुस्लिम दुकानदार के समर्थन में खड़े होने पर जिम मालिक दीपक कुमार को निशाना बनाए जाने का मामला सामने आया है. ऑब्ज़र्वर पोस्ट के मुताबिक़ बजरंग दल के सदस्यों के प्रदर्शन के बाद पुलिस ने इस पूरे घटनाक्रम में तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की हैं.
मामला 26 जनवरी से शुरू हुआ, जब “बाबा स्कूल ड्रेस” नाम की दुकान चलाने वाले वकील अहमद को कुछ लोगों ने दुकान के नाम से “बाबा” शब्द हटाने को कहा. आरोप है कि उन्होंने कहा कि “बाबा” शब्द सिर्फ हिंदू धार्मिक व्यक्तियों के लिए इस्तेमाल होना चाहिए. इसी दौरान पास में जिम चलाने वाले दीपक कुमार ने हस्तक्षेप किया और दुकानदार का बचाव किया. घटना के एक वीडियो में दीपक खुद को “मोहम्मद दीपक” बताते हुए कहते हैं कि वे भारतीय हैं और कानून के सामने सभी बराबर हैं.
इसके बाद 31 जनवरी को करीब 40 लोगों की भीड़ दीपक कुमार के जिम के पास जमा हुई. भीड़ ने नारेबाजी की, राष्ट्रीय राजमार्ग पर ट्रैफिक रोका और पुलिस के साथ धक्का-मुक्की की. इसके बाद प्रदर्शनकारी वकील अहमद की दुकान की ओर बढ़े और अपशब्द का इस्तेमाल करते हुए माहौल बिगाड़ने की कोशिश की. हालात बिगड़ते देख पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा.
पुलिस ने इस मामले में तीन एफआईआर दर्ज की हैं. पहली एफआईआर 30–40 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ है, जिन पर सड़क जाम करने, सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और पुलिस से बदसलूकी के आरोप हैं. दूसरी एफआईआर वकील अहमद की शिकायत पर दर्ज हुई है, जिसमें दुकान के नाम को लेकर डराने-धमकाने का आरोप है. तीसरी एफआईआर एक स्थानीय निवासी कमल प्रसाद की शिकायत पर दर्ज की गई है, जिसमें दीपक कुमार और उनके साथियों पर कथित तौर पर अपशब्द कहने और धमकी देने का आरोप लगाया गया है.
इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है और शांति बनाए रखने की अपील की गई है. सुरक्षा के लिए 1 फरवरी को फ्लैग मार्च भी किया गया.
दीपक कुमार को सोशल मीडिया पर काफी समर्थन मिल रहा है. उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो में कहा, “मैं सबसे पहले एक इंसान हूं. हमारे देश को नफरत नहीं, प्यार की ज़रुरत है.” धमकियों और ट्रोलिंग के बावजूद दीपक ने कहा है कि वे पीछे नहीं हटेंगे.
आज अजीत अंजुम ने कोटद्वार जाकर पुलिस की भी थोड़ी खबर ली.
कर्नाटक में बीजेपी शासन के दौरान मुसलमानों के ख़िलाफ़ हथियार बना यूएपीए
आर्टिकल-14 की यूएपीए क़ानून पर हुई इस राज्य-स्तरीय रिसर्च से साफ़ होता है कि यह क़ानून ज़्यादातर मुसलमानों के ख़िलाफ़ और खास तौर पर भाजपा के शासनकाल में अधिक इस्तेमाल हुआ. साथ ही यह भी सामने आया कि देशभर में यूएपीए से जुड़े मामलों का भरोसेमंद डेटा जुटाना बेहद मुश्किल है. कम से कम 134 ज़िलों में अदालतों और ई-कोर्ट्स पोर्टल पर यूएपीए के केस या तो अधूरे थे या मौजूद ही नहीं थे. जम्मू-कश्मीर इसका बड़ा उदाहरण है, 20 में से 16 ज़िलों में यूएपीए क़ानून ड्रॉप-डाउन मेनू में तक नहीं था, जिससे आम लोग यह जान ही नहीं सकते कि कितने मामले चल रहे हैं.
इन्हीं दिक़्क़तों के चलते शोध को पूरे देश की बजाय कर्नाटक तक सीमित किया गया, जहाँ 2010 के बाद अपेक्षाकृत ज़्यादा डेटा उपलब्ध था. जनवरी 2005 से फ़रवरी 2025 के बीच कर्नाटक में 95 घटनाओं का अध्ययन किया गया, जिनसे जुड़े 1,125 केस दर्ज हुए और 925 लोगों को आरोपी बनाया गया। इनमें से लगभग 85% आरोपी मुसलमान थे.
यूएपीए के 58 साल के इतिहास में यह क़ानून हमेशा विवादों में रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इसके इस्तेमाल को लेकर चिंताएँ और गहरी हुई हैं. राज्यवार रिसर्च और आँकड़े दिखाते हैं कि यह क़ानून असमान रूप से मुसलमानों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हुआ है, खासकर उन राज्यों में जहाँ लंबे समय तक बीजेपी की सरकार रही.
इसी अध्ययन में यह भी सामने आया कि कर्नाटक में यूएपीए के लगभग 10 में से 8 आरोपी बीजेपी के शासनकाल (करीब साढ़े दस साल) में गिरफ़्तार किए गए. तुलना करें तो कांग्रेस सरकार के समय इस क़ानून का इस्तेमाल पाँच गुना कम हुआ. यह पैटर्न साफ़ संकेत देता है कि यूएपीए सिर्फ़ सुरक्षा का क़ानून नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार की तरह भी इस्तेमाल किया गया.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि 2014 से 2023 के बीच पूरे देश में यूएपीए के तहत 9,469 मामलों में 17,723 लोग गिरफ़्तार हुए, लेकिन सज़ा सिर्फ़ 474 लोगों को मिली, जो कुल मामलों का लगभग 2.6 प्रतिशत है. कर्नाटक के अध्ययन में तो स्थिति और गंभीर दिखी: 1,125 मामलों में से 37 प्रतिशत में ट्रायल शुरू होने से पहले ही आरोप हटा दिए गए, और जो मामले अदालत तक पहुँचे उनमें बरी होने की संख्या सज़ा से पाँच गुना ज़्यादा थी. इसके बावजूद, लोगों को सालों जेल में रहना पड़ा.
शोध यह भी बताता है कि कई मामलों में “साज़िश” जैसी धाराएँ बिना ठोस सबूत के लगाई गईं. लंबी जेल, ज़मानत न मिलने और डर के माहौल में कई आरोपियों ने मजबूरी में गुनाह कबूल किया, कर्नाटक में यह दर 80 प्रतिशत तक पहुँची, जबकि देश का औसत करीब 40 प्रतिशत है.
मैनिट में रैगिंग की तीसरी शिकायत, जूनियर छात्र से मारपीट का आरोप
द मूकनायक की रिपोर्ट के मुताबिक़ भोपाल स्थित मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) में रैगिंग की घटनाएं रुक नहीं रही हैं. इस महीने की तीसरी रैगिंग की शिकायत यूजीसी एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन पर दर्ज की गई है. ताज़ा मामले में प्रथम वर्ष के एक छात्र ने आरोप लगाया है कि छह से सात सीनियर छात्रों ने उसके साथ मारपीट की. पीड़ित ने सभी आरोपित छात्रों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की है.
यूजीसी हेल्पलाइन ने इस शिकायत को “गंभीर श्रेणी” में रखते हुए मैनिट प्रशासन को तुरंत कार्रवाई और रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं. इसके बाद संस्थान ने प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है. सुरक्षा अधिकारी और एंटी-रैगिंग कमेटी सीसीटीवी फुटेज की जांच कर रहे हैं. सोमवार को पीड़ित छात्र, आरोपित सीनियर छात्रों और आसपास मौजूद अन्य विद्यार्थियों से पूछताछ की जाएगी.
जनवरी में भी मैनिट में रैगिंग के दो मामले सामने आए थे, जिनकी जांच अभी जारी है. प्रशासन का कहना है कि दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई होगी.गौरतलब है कि फरवरी 2025 में भी रैगिंग को लेकर कैंपस में तनाव फैला था, जब जूनियर और सीनियर छात्रों के बीच विवाद, सोशल मीडिया पर धमकियां और कक्षाओं के बहिष्कार जैसी घटनाएं हुई थीं. लगातार शिकायतों से मैनिट की सुरक्षा और एंटी-रैगिंग व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं.
ट्रंप और चीन के बीच फंसा भारत, अब सुदूर देशों से दोस्ती की तलाश में
“द न्यूयॉर्क टाइम्स” में आलेक्स ट्रेवली ने अपने ताज़ा विश्लेषण में लिखा है कि मुक्त व्यापार समझौतों के प्रति अपनी हिचकिचाहट को छोड़कर भारत अब कनाडा और अन्य ‘मध्यम शक्तियों’ के करीब जा रहा है.
जब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने स्विट्जरलैंड के दावोस में ‘विश्व आर्थिक मंच’ (डब्ल्यूईएफ) में यह घोषणा करके भीड़ में जोश भर दिया कि “विश्व व्यवस्था में एक दरार आ गई है” और जीवित रहने के लिए “मध्यम शक्तियों को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए”, तो वह एक तरह से नाम लेकर भारत का ही आव्हान कर रहे थे.
एक सप्ताह के भीतर, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नई दिल्ली में यूरोपीय संघ (ईयू) की कार्यकारी शाखा की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के साथ खड़े थे. उन्होंने “सभी समझौतों की जननी” की घोषणा की—एक ऐसा व्यापारिक समझौता, जिसमें रक्षा प्रावधान भी शामिल हैं और जिसे पूरा करने के लिए दोनों पक्ष पिछले लगभग 20 वर्षों से संघर्ष कर रहे थे.
यह व्यापारिक समझौता 2 अरब लोगों के बाजार का वादा करता है और अगले छह वर्षों में व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखता है. यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक ऐसे नए नेटवर्क का भी प्रतिनिधित्व करता है, जिसे अमेरिकी प्रभुत्व के बाद वाली अव्यवस्था से जो कुछ भी बचाया जा सकता है, उसे सहेजने के लिए बनाया गया है.
भारत कोई छोटा देश नहीं है, लेकिन दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं की किसी भी नई व्यवस्था में इसे एक विशेष रूप से प्रासंगिक ‘मध्यम शक्ति’ माना जाता है. 1.4 अरब की आबादी के साथ यह दुनिया का सबसे बड़ा देश है, और इसकी अर्थव्यवस्था जापान और जर्मनी के साथ शीर्ष पांच में शामिल हो गई है, भले ही इसकी प्रति व्यक्ति आय उनके मुकाबले बहुत कम हो.
भारत और अन्य मध्यम शक्तियों के बीच गतिविधियों की यह तेज रफ्तार पिछले साल ब्रिटेन के साथ हुए एक मुक्त व्यापार समझौते से शुरू हुई थी, जो वर्षों से अटका हुआ था. इसके बाद दिसंबर में ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भी समझौते हुए.
ये द्विपक्षीय समझौते भारत की दिशा में एक बदलाव की ओर इशारा करते हैं, जहां प्रधानमंत्री मोदी का ‘आत्मनिर्भरता’ का जोर अब थोड़ा पीछे नजर आ रहा है. यह विचार कि भारत अन्य देशों के साथ आर्थिक उलझनों से बचकर ही अपनी सबसे अच्छी रक्षा कर सकता है, एक लंबा इतिहास रहा है. लेकिन अब यूरोपीय संघ, कनाडा और अन्य देश यह तर्क दे रहे हैं कि असली ताकत आपसी संबंधों को गहरा करने में है.
विश्लेषण में उन्होंने लिखा है कि कैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापारिक नीतियों (विशेषकर टैरिफ) और चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है. ट्रंप के टैरिफ और भारत पर दबाव के बारे में वह लिखते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत सहित कई देशों पर कड़े टैरिफ (आयात शुल्क) लगाए हैं. भारत के बजट 2026 में इन टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए विशेष उपाय किए गए हैं, जैसे कि सीफूड और चमड़ा उद्योगों के लिए आयात शुल्क में छूट देना, ताकि वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रह सकें.
चीन के साथ व्यापारिक संतुलन के बारे में उनका कहना है कि भारत एक तरफ चीन से अपनी निर्भरता कम करना चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीतियों के कारण पैदा हुए व्यापारिक दबाव ने भारत को चीन के साथ अपने व्यापारिक संबंधों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है. उन्होंने संकेत दिया है कि भारत और चीन व्यापार के क्षेत्र में कुछ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि अमेरिकी दबाव का सामना किया जा सके.
इसी बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह है कि ट्रंप ने दावा किया है कि भारत अब ईरान के बजाय वेनेजुएला से तेल खरीदेगा. यह समझौता अमेरिकी दबाव और भारत की ऊर्जा जरूरतों के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश है. भारत अब केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अन्य देशों (जैसे यूरोपीय संघ) के साथ भी अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है. हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार और सुरक्षा को लेकर हुई चर्चाएं इसी का हिस्सा हैं.
भारत सरकार ने अपने बजट में अमेरिकी कंपनियों के लिए कुछ क्षेत्रों (जैसे एयरोस्पेस, क्लीन एनर्जी और मेडिकल डिवाइस) में बाजार पहुंच आसान बनाई है, ताकि ट्रंप प्रशासन की शिकायतों को दूर किया जा सके और व्यापार युद्ध जैसी स्थिति से बचा जा सके.
कुलमिलाकर, भारत इस समय एक कठिन भू-राजनीतिक स्थिति में है, जहां उसे एक तरफ ट्रंप की अनिश्चित व्यापारिक नीतियों को संभालना है और दूसरी तरफ चीन के आर्थिक प्रभाव और सीमा विवाद के बीच अपनी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखना है.
अपील :
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