02/03/2026: जंग की फैलती आग, आफत की जड़ ट्रंप | खोमैनी का पोता खामेनई की जगह | किलो भर चावल में 3000 लि. पानी | हत्यारा तय, पर मृतका का मरा होना तय नहीं | दरवेश की यहूदी प्रेमिका | अरिजीत का नया नग़मा
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां:
ट्रम्प का महायुद्ध: अमेरिका ने ईरान सहित 7 देशों पर हमले किए. 2025 में बाइडेन के पूरे कार्यकाल से ज्यादा एयरस्ट्राइक.
ईरान नेतृत्व खत्म: अमेरिकी हमलों में सर्वोच्च नेता अली खमेनेई की मौत की खबर. उत्तराधिकारी पर सस्पेंस.
होर्मुज ब्लॉक: मध्य पूर्व में तनाव के चलते तेल का रास्ता बंद. भारत फिर खरीदेगा रूसी तेल.
चावल या पानी?: एक किलो चावल के लिए 3000 लीटर पानी का खर्च. भारत के भूजल स्तर पर गहराया संकट.
खतरनाक चावल: मोदी सरकार द्वारा गरीबों को दिए जा रहे फोर्टिफाइड चावल पर वैज्ञानिकों ने जताई चिंता.
अश्विनी बिद्रे केस: हत्या साबित हुई. मुजरिम छूटे. लेकिन सरकारी फाइलों में महिला पुलिसकर्मी अब भी ‘जिंदा’.
अरिजीत की वापसी: प्लेबैक सिंगिंग छोड़ने के बाद अरिजीत सिंह का पहला इंडिपेंडेंट गाना ‘रैना’ रिलीज. पिता ने कहा- मुंबई में दिल नहीं लगा.
एक अधूरी मोहब्बत: महमूद दरवेश की कविताओं वाली ‘रीता’ (तामार बेन-अमी) का निधन.
सारी आफ़त की एक जड़ : ट्रम्प का घातक राष्ट्रपतित्व और इतिहास का सबसे आक्रामक दौर
आधुनिक युग में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने इतने अलग-अलग देशों पर सैन्य हमलों का आदेश नहीं दिया है, जितना डोनाल्ड ट्रम्प ने दिया है. एक्सियोस के रिपोर्टर ज़कारी बासु अपनी विस्तृत रिपोर्ट में लिखते हैं कि ट्रम्प ने सात देशों पर हमले किए हैं, जिनमें से तीन—ईरान, नाइजीरिया और वेनेजुएला—पर पहले कभी अमेरिकी सैन्य हमले नहीं हुए थे. वर्ष 2025 में उन्होंने राष्ट्रपति जो बाइडेन के पूरे चार साल के कार्यकाल की तुलना में अधिक व्यक्तिगत हवाई हमलों (एयर स्ट्राइक्स) को मंजूरी दी.
यह मामला इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रम्प ने चुनाव में खुद को स्पष्ट रूप से ‘युद्ध-विरोधी’ उम्मीदवार के रूप में पेश किया था. व्हाइट हाउस का तर्क है कि वह अब भी वही हैं—वे सैन्य कार्रवाई करने से पहले कूटनीति के सभी रास्ते अपनाते हैं और उनका मानना है कि ‘अत्यधिक बल’ (ओवरव्हेल्मिंग फोर्स) का प्रदर्शन ही स्थायी शांति का रास्ता है. हालांकि, ईरान पर ट्रम्प के हमलों के पहले 24 घंटों में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत ने इस तर्क को सबसे क्रूर परीक्षा में डाल दिया है.
ट्रम्प ने रविवार को एक वीडियो बयान में कहा, “दुख की बात है कि यह खत्म होने से पहले और भी जानें जा सकती हैं. यही सच्चाई है. लेकिन हम यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे कि ऐसा न हो.” उन्होंने सैनिकों की मौत का बदला लेने की भी कसम खाई.
बड़ी तस्वीर: ट्रम्प के हमले न केवल संख्या में बल्कि अपनी प्रकृति में भी ऐतिहासिक रूप से अलग हैं. राष्ट्रपति बुश के 9/11 के बाद के अभियान और ओबामा के ड्रोन युद्ध बड़े पैमाने पर थे, लेकिन वे विरासत में मिले युद्धक्षेत्रों या कांग्रेस द्वारा अधिकृत क्षेत्रों में केंद्रित थे. इसके विपरीत, ट्रम्प ने पारंपरिक आतंकवाद-रोधी प्रयासों के साथ-साथ नए मोर्चे खोले हैं—नाइजीरिया में क्रिसमस डे पर हमला, कैरिबियन में ड्रग नौकाओं को डुबोना और निकोलस मादुरो को कराकस से उठाना. उनका पसंदीदा मॉडल स्पष्ट है: जमीन पर कोई अमेरिकी सैनिक नहीं (नो बूट्स ऑन द ग्राउंड), कोई लंबा जुड़ाव नहीं, बस तेजी से अत्यधिक बल का प्रयोग जिसे अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए आवश्यक बताया जाता है.
ईरान पर फोकस: ईरान के खिलाफ चल रहा अमेरिकी सैन्य अभियान अब अपनी ही एक अलग श्रेणी में है—यह ट्रम्प की प्रेसीडेंसी का सबसे आक्रामक और उच्च जोखिम वाला विदेश नीति कार्य है. ट्रम्प ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ लॉन्च किया—जो एक संयुक्त यूएस-इज़राइली अभियान है जिसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से ईरान की सरकार को गिराना है. यह कांग्रेस की मंजूरी या निरंतर सार्वजनिक बहस के बिना शुरू किया गया. पहले 24 घंटों में ही इज़राइली हमलों में ईरानी सर्वोच्च नेता अली खमेनेई और दर्जनों वरिष्ठ अधिकारी मारे गए. अमेरिका और इज़राइल के हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं, जबकि ईरान की जवाबी मिसाइलें और ड्रोन खाड़ी सहयोगियों पर बरस रहे हैं.
अमेरिका में राजनीतिक प्रतिक्रिया: देश के भीतर, ट्रम्प के कुछ सबसे वफादार समर्थक भी इस युद्ध को उस उम्मीदवार के साथ जोड़ने में संघर्ष कर रहे हैं जिसे उन्होंने चुना था. प्रमुख ‘मागा’ अलगाववादी टकर कार्लसन, जो पिछले हफ्ते ही व्हाइट हाउस गए थे, ने ईरान पर हमला करने के फैसले को “बिल्कुल घिनौना और बुरा” कहा. कई समर्थकों ने दिवंगत एक्टिविस्ट चार्ली kirk की उस चेतावनी को याद किया जिसमें उन्होंने ईरान में सत्ता परिवर्तन को “पागलपन” और “खूनी गृहयुद्ध” का कारण बताया था.
विडंबना यह है कि उप-राष्ट्रपति वेंस ने 2023 में वॉल स्ट्रीट जर्नल के एक लेख में लिखा था, “ट्रम्प की सबसे अच्छी विदेश नीति? कोई युद्ध शुरू न करना.” और इंटेलिजेंस निदेशक तुलसी गबार्ड, जो 2020 में “ईरान के साथ कोई युद्ध नहीं” वाली टी-शर्ट बेचती थीं, आज इस प्रशासन का हिस्सा हैं. ट्रम्प ने खुद उन “ग्लोबलिस्ट्स” के खिलाफ प्रचार किया था जो अमेरिका को अंतहीन युद्धों में घसीटते हैं. व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने एक्सियोस को बताया कि राष्ट्रपति का पहला प्रयास हमेशा कूटनीति था, लेकिन ईरान ने यथार्थवादी रूप से जुड़ने से इनकार कर दिया, जिसके बाद ट्रम्प ने “साहसी कदम” उठाया. अब सवाल यह है कि क्या ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए अमेरिकी जीवन का बलिदान देना उचित था? यह बहस ट्रम्प के शेष कार्यकाल में हावी रहेगी.
अमेरिका और इज़राइल ने एक हफ्ते की देरी की थी
वरिष्ठ अमेरिकी और इज़राइली अधिकारियों के अनुसार, अमेरिका और इज़राइल ने मूल रूप से ईरान पर एक सप्ताह पहले हमला करने की योजना बनाई थी, लेकिन परिचालन और खुफिया कारणों से शुरुआती हमले में देरी हुई. एक्सियोस की रिपोर्ट बताती है कि इस देरी ने राष्ट्रपति ट्रम्प को दो समानांतर रास्तों—कूटनीति और युद्ध—के बीच चयन करने के लिए एक और सप्ताह का समय दिया.
पर्दे के पीछे की कहानी: 17 फरवरी को दूसरे दौर की यूएस-ईरान वार्ता बिना किसी महत्वपूर्ण प्रगति के समाप्त हुई. इसके बाद अमेरिकी और इज़राइली सैन्य योजनाकार 21 फरवरी, शनिवार को हमले शुरू करने के लिए तैयार थे. लेकिन अंतिम आदेश नहीं आया. अधिकारियों ने इसका एक मुख्य कारण क्षेत्र में खराब मौसम बताया. एक इज़राइली अधिकारी ने कहा कि यह देरी मुख्य रूप से अमेरिकी पक्ष द्वारा की गई थी और इसका संबंध इज़राइल डिफेंस फोर्सेज (आईडीएफ) के साथ बेहतर समन्वय की आवश्यकता से था.
हमले का लक्ष्य और खमेनेई: शुरुआती हमले का डिज़ाइन ईरानी सर्वोच्च नेता अली खमेनेई और उनके बेटों, साथ ही वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों की कई बैठकों को निशाना बनाने के लिए किया गया था. इज़राइली राजदूत येशिएल लेइटर ने दावा किया कि दो अलग-अलग बैठकें निशाने पर थीं. मूल और नई तारीख के बीच के सप्ताह में, इज़राइली और अमेरिकी खुफिया अधिकारी इस बात से चिंतित थे कि खमेनेई अपने आवास से किसी भूमिगत बंकर में चले जाएंगे. इसलिए, अमेरिका और इज़राइल यह संकेत देना चाहते थे कि “कोई आसन्न हमला नहीं है,” ताकि खमेनेई और अन्य अधिकारी सुरक्षित महसूस करें. ट्रम्प प्रशासन के एक अधिकारी ने कहा, “भले ही वह जमीन के नीचे होते, हम उन्हें मार गिराते.”
जिनेवा वार्ता का सच: देरी ने जिनेवा में गुरुवार के लिए निर्धारित वार्ता के एक और दौर के लिए जगह बनाई. कुछ का कहना है कि यह केवल समय बिताने की चाल थी, लेकिन दो अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि ट्रम्प के दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ केवल दिखावा नहीं कर रहे थे. उन्होंने गुरुवार को एक अंतिम अमेरिकी प्रस्ताव रखा. इसमें ईरानी यूरेनियम संवर्धन पर 10 साल की रोक और उसके बाद केवल प्रतीकात्मक क्षमता की मांग शामिल थी. अमेरिका ने नागरिक जरूरतों के लिए मुफ्त परमाणु ईंधन देने की पेशकश भी की. लेकिन ट्रम्प की टीम ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि ईरान ने सौदा नहीं किया तो सैन्य बल का प्रयोग होगा.
अंततः, ईरानियों ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया. कुशनर और विटकॉफ ने ट्रम्प को रिपोर्ट दी, और राष्ट्रपति ने युद्ध का पहिया घुमा दिया. एक अधिकारी ने कहा, “ईरान अच्छी नीयत से बातचीत करके इसे रोक सकता था. उन्होंने ऐसा नहीं किया.”
चीन और रूस ईरान के पक्ष में
28 फरवरी 2026 को ईरान पर हुए हालिया अमेरिकी और इजरायली हमलों ने ईरानी नेतृत्व, परमाणु केंद्रों और सैन्य बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया, जिसमें सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु हो गई. इस घटना से मध्य पूर्व में तनाव काफी बढ़ गया है. इन कार्रवाइयों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं आई हैं, जिनमें चीन और रूस प्रमुख आलोचक के रूप में उभरे हैं, हालांकि उनकी भूमिका सैन्य के बजाय मुख्य रूप से कूटनीतिक और शाब्दिक रही है.
चीन की प्रतिक्रिया: एक संप्रभु नेता की खुलेआम हत्या” और सत्ता परिवर्तन के लिए उकसाने वाला कदम
चीन ने इन हमलों की कड़ी निंदा करते हुए इन्हें “अस्वीकार्य” और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है. चीन ने इसे विशेष रूप से “एक संप्रभु नेता की खुलेआम हत्या” और सत्ता परिवर्तन के लिए उकसाने वाला कदम कहा है. विदेश मंत्री वांग यी ने रूसी समकक्ष सर्गेई लावरोव के साथ फोन पर बातचीत में तत्काल युद्धविराम और संवाद की वापसी का आग्रह किया ताकि तनाव और न बढ़े. चीन ने ईरान की संप्रभुता, सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने पर जोर दिया है. कूटनीतिक स्तर पर, चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक का समर्थन किया और एससीओ जैसे मंचों के माध्यम से न्याय की वकालत करने की तत्परता व्यक्त की.
हालाँकि, चीन की प्रतिक्रिया नपी-तुली और सतर्क रही है. विश्लेषकों का कहना है कि बीजिंग आर्थिक स्थिरता और ईरान से निर्बाध तेल आपूर्ति को प्राथमिकता दे रहा है. चीनी सरकारी मीडिया ने हमलों को “अत्यधिक खतरनाक” और “आधिपत्यवादी दादागिरी” करार दिया है, लेकिन किसी भी प्रकार की भौतिक सहायता का वादा नहीं किया गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि चीन एक व्यापक संघर्ष में फंसने से बचना चाहता है और “रुको और देखो” की नीति अपना रहा है.
रूस की प्रतिक्रिया: “पूर्व नियोजित और बिना उकसावे वाली सशस्त्र आक्रामकता”
रूस ने भी इन हमलों को एक संप्रभु राष्ट्र के खिलाफ “पूर्व नियोजित और बिना उकसावे वाली सशस्त्र आक्रामकता” करार दिया है. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खामेनेई की हत्या को मानवीय नैतिकता का “घृणित” उल्लंघन बताया और ईरान के प्रति संवेदना व्यक्त की. विदेश मंत्री लावरोव ने ईरानी और चीनी अधिकारियों के साथ बातचीत में हमलों की निंदा की और राजनीतिक समाधान की आवश्यकता पर बल दिया.
लेकिन, चीन की तरह, रूस की कार्रवाइयां भी सैन्य हस्तक्षेप तक नहीं पहुंचीं. विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध के कारण रूस की क्षमताएं सीमित हैं. इसके बजाय, रूस गुप्त रूप से हथियारों की आपूर्ति तेज कर सकता है या अन्य क्षेत्रों (जैसे यूक्रेन) में अमेरिकी ध्यान भटकने का लाभ उठाने की रणनीति अपना सकता है. पूर्व अधिकारी दिमित्री मेदवेदेव ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए अमेरिका पर “आग से खेलने” का आरोप लगाया.
चीन और रूस ने आपसी समन्वय दिखाया है, जैसा कि वांग-लावरोव की बातचीत से स्पष्ट है. दोनों देशों ने हमलों को “स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य” बताया है, लेकिन ईरान के साथ उनके गठबंधन की “कठोर सीमाएँ” हैं; वे अमेरिका या इज़राइल के साथ सीधे टकराव की इच्छा नहीं रखते हैं. विश्लेषण से संकेत मिलता है कि हालांकि वे ईरान को आर्थिक और तकनीकी सहायता प्रदान करते हैं, लेकिन पूर्ण पैमाने पर सैन्य सहायता देने में उन्हें तनाव बढ़ने का जोखिम दिखता है. यह स्थिति एक “बिखरती क्षेत्रीय व्यवस्था” को उजागर करती है, जहाँ रूस और चीन ईरान को असीमित समर्थन देने के बजाय अपने स्वयं के हितों को प्राथमिकता देते हैं.
सोशल मीडिया (जैसे ‘एक्स’) पर जनता की राय मिली-जुली है. कुछ लोगों ने इस बात पर कटाक्ष किया कि हमलों में इस्तेमाल किए गए अमेरिकी ड्रोन कथित तौर पर ईरानी डिजाइनों से प्रेरित थे. वहीं कुछ लोगों का मानना है कि रूस और चीन का विरोध ही इस बात का प्रमाण है कि हमला सफल रहा. आर्थिक दृष्टिकोण से कुछ पोस्ट में कहा गया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इस कदम ने अमेरिका के मुख्य प्रतिद्वंद्वी, चीन को बड़ा आर्थिक झटका दिया है.
ट्रम्प ने 20वीं सदी को दफन कर दिया
रॉकेटों की गड़गड़ाहट, अंतरराष्ट्रीय चीख-पुकार और ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत के साथ, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विरासत पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो गई है. पोलिटिको के एलेक्जेंडर बर्न्स अपने विश्लेषण में लिखते हैं कि ट्रम्प 20वीं सदी को दफन कर रहे हैं—इसके खलनायकों, इसके गठबंधनों, इसके राजनीतिक मानदंडों और युद्धविरामों को. और वे अनिश्चितता और व्यवधान के एक ऐसे भविष्य को खोल रहे हैं जहां कोई नया संतुलन दिखाई नहीं देता.
अपने दोनों कार्यकालों में, ट्रम्प की मुख्य उपलब्धियां ‘विध्वंस’ की रही हैं. उन्होंने ‘रो वी. वेड’ (गर्भपात अधिकार) को खत्म किया, जिसने 1970 के दशक से अमेरिका को शासित किया था. लैटिन अमेरिका में उनके सैन्य हस्तक्षेप ने शीत युद्ध के अवशेष क्यूबा सरकार को पतन की कगार पर ला दिया है. उनके टैरिफ और व्यापारिक खतरों ने रीगन-क्लिंटन नीति की आम सहमति को उड़ा दिया है. नाटो के प्रति उनकी अवमानना ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन को पुराने अवशेष की स्थिति में धकेल दिया है. और अब, युद्ध के पहले कुछ घंटों में, उन्होंने 1979 की ईरानी क्रांति के नेता अली खमेनेई को मार गिराया, जो एक क्रूर तानाशाह थे.
हर मामले में, ट्रम्प पुरानी संरचनाओं और प्रणालियों को तोड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें बदलने के लिए उनके पास कोई स्पष्ट दृष्टि नहीं है. 79 साल की उम्र में, ट्रम्प खुद उस युग की उपज हैं जिसे वे अब खत्म कर रहे हैं. उनके पास एक नई दुनिया बनाने के लिए ज्यादा समय नहीं है—केवल 35 महीने बचे हैं. यह संभावना नहीं है कि उनके कार्यालय छोड़ने से पहले हम कोई स्थिर वैश्विक व्यापार व्यवस्था या हवाना और तेहरान में नई सरकारें देखेंगे.
बाइडेन ने दावा किया था कि वे अतीत को पुनर्जीवित करेंगे, लेकिन वे असफल रहे. अब अमेरिका के लिए ओबामा के दौर की ईरान और क्यूबा के साथ ‘देतांत’ (détente - तनाव में कमी) की नीति हमेशा के लिए बंद हो चुकी है. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने सही कहा है, “हम जानते हैं कि पुरानी व्यवस्था वापस नहीं आने वाली है.” यदि 20वीं सदी अंततः मर चुकी है, तो 21वीं सदी में इस देश की दिशा एक बड़ा प्रश्नचिह्न है. ट्रम्प ने अपने उत्तराधिकारी के लिए यही चुनौती छोड़ी है.
खमेनेई की मौत के बाद खोमैनी के पोते पर नज़रें
इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के संस्थापक अयातुल्ला रूहोल्लाह खोमैनी के पोते, हसन खोमैनी, अब चर्चा के केंद्र में हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, 86 वर्षीय अयातुल्ला अली खमेनेई की अमेरिकी-इज़राइली हमले में मौत के बाद उत्तराधिकारी के चयन में हसन खोमैनी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है.
हसन खोमैनी (53) को दिवंगत अयातुल्ला के 15 पोते-पोतियों में सबसे प्रमुख और ईरान के मौलवी प्रतिष्ठान के भीतर एक ‘उदारवादी’ (मॉडरेट) के रूप में देखा जाता है. उनके पूर्व राष्ट्रपतियों मोहम्मद खातमी और हसन रूहानी जैसे सुधारवादियों के साथ घनिष्ठ संबंध हैं. वह अपने दादा के मकबरे के संरक्षक हैं, जो एक प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका है. कुछ राजनेता उन्हें खमेनेई के बेटे मोजतबा जैसे कट्टरपंथियों के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं.
जनवरी में ईरान में हुए अशांति और विरोध प्रदर्शनों के बाद, कुछ ईरानी राजनेताओं के बीच खमेनेई के उदारवादी उत्तराधिकारी को स्थापित करने की मांग ने जोर पकड़ा था. हसन खोमैनी का रिकॉर्ड सुधारों की वकालत करने का रहा है. 2021 में, उन्होंने गार्जियन काउंसिल की आलोचना की थी जब उसने सुधारवादियों को चुनाव लड़ने से रोक दिया था. उन्होंने 2022 में महसा अमिनी की मौत के बाद जवाबदेही की मांग की थी.
वह पश्चिमी दर्शन में रुचि रखते हैं, सोशल मीडिया के रुझानों का पालन करते हैं और 21 साल की उम्र तक एक उत्साही फुटबॉल खिलाड़ी थे. खमेनेई की मौत के बाद, उत्तराधिकार का सवाल गहरा गया है. यद्यपि वह व्यवस्था के प्रति वफादार हैं और इज़राइल को “कैंसर ट्यूमर” कहते हैं, फिर भी पश्चिम के साथ जुड़ाव की उनकी पिछली वकालत उन्हें इस संकट की घड़ी में एक धुरी बना सकती है.
48 घंटे बाद ईरान - सामरिक सफलता, रणनीतिक अनिश्चितता
पूर्व वरिष्ठ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी और सीएनएन के वैश्विक मामलों के विश्लेषक ब्रेट मैकगर्क ने मौजूदा संकट का आकलन करते हुए 10 प्रमुख मुद्दों को रेखांकित किया है जो व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में चर्चा का विषय हो सकते हैं:
हवाई प्रभुत्व : अमेरिका और इज़राइल ने ईरान की बची-खुची वायु रक्षा प्रणालियों को नष्ट कर दिया है. अब वे अपनी मर्जी से उड़ान भर सकते हैं.
ईरानी नेतृत्व में बिखराव: ट्रम्प ने बताया है कि 48 शीर्ष ईरानी नेता मारे गए हैं, जिनमें सर्वोच्च नेता अली खमेनेई शामिल हैं. यह वैसा ही है जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति और पूरी कैबिनेट एक साथ मारी जाए. ईरानी विदेश मंत्री ने स्वीकार किया है कि सैन्य इकाइयां अब स्वतंत्र रूप से कार्य कर रही हैं, जो भारी भ्रम का संकेत है.
उत्तराधिकार की अनिश्चितता: खमेनेई का कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं है. राष्ट्रपति रईसी की दो साल पहले ही मौत हो चुकी है. खमेनेई के बेटे मोजतबा के सामने कई बाधाएं हैं. नेतृत्व की कमी से इस्लामी गणराज्य की नींव कमजोर हो सकती है.
मिसाइल गणित: ईरान अभी भी इज़राइल और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दाग रहा है. अमेरिका और इज़राइल की सर्वोच्च प्राथमिकता अब ईरान के मिसाइल लॉन्चरों को नष्ट करना है, जो छिपाए गए हैं.
खाड़ी देश : सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि ईरान ने सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन और कुवैत में नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया है. इससे ये देश संघर्ष में खिंच आए हैं और अब वे ईरान के खिलाफ एक व्यापक गठबंधन बना रहे हैं.
रूस और चीन: दोनों ने अभी तक केवल जुबानी निंदा की है. रूस अपनी रक्षा प्रणालियां खो चुका है और चीन ईरानी तेल पर निर्भर है, लेकिन वे हस्तक्षेप करते नहीं दिख रहे. ईरान अकेला खड़ा है.
ऊर्जा झटका: तेल की कीमतें 10% बढ़ गई हैं. ओपेक ने उत्पादन बढ़ाने पर सहमति जताई है.
कोई प्राकृतिक अंत नहीं: वाशिंगटन की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस अभियान का कोई स्पष्ट ‘एंडपॉइंट’ (अंत) नहीं है. यदि शासन के अवशेष घातक बल के साथ विरोध प्रदर्शनों को दबाते हैं, तो क्या अमेरिका हस्तक्षेप करेगा?
मैकगर्क निष्कर्ष निकालते हैं कि सैन्य लाभ भारी है, लेकिन यह सब कहां जाकर रुकेगा, इसे लेकर गहरी अनिश्चितता बनी हुई है. ट्रम्प को मिल रहे ‘नेट असेसमेंट’ में यही बात प्रमुख होगी.
टिमोथी स्नाईडर: ईरान पर हमला क्यों? सत्ता और भ्रष्टाचार का कोण
इतिहासकार टिमोथी स्नाइडर अपने लेख में सवाल उठाते हैं कि हमें सरकारी प्रचार से दूर हटकर पूछना चाहिए कि यह युद्ध वास्तव में क्यों हो रहा है. तथ्यों के आधार पर, वह दो मुख्य व्याख्याएं प्रस्तुत करते हैं:
घरेलू राजनीति : विदेशी युद्ध अक्सर घर में लोकतंत्र को कमजोर करने का औजार होते हैं. ट्रम्प प्रशासन और उनके सहयोगी अतीत में भी ऐसा व्यवहार करते रहे हैं. युद्ध के समय सवाल पूछने वालों को अक्सर ‘गद्दार’ करार दिया जाता है और सत्ताधारी पार्टी अपने पक्ष में चुनावी माहौल बनाती है.
व्यक्तिगत भ्रष्टाचार : स्नाइडर एक गंभीर कोण सामने रखते हैं—ट्रम्प का व्यक्तिगत लाभ. खाड़ी के अरब देशों (जैसे यूएई और सऊदी अरब) ने ट्रम्प की पारिवारिक कंपनियों और व्यवसायों में भारी निवेश किया है. कतर ने ट्रम्प को जेट उपहार में दिया था. अब अमेरिकी सेना का उपयोग उन देशों का पक्ष लेने के लिए किया जा रहा है जिन्होंने ट्रम्प और उनके परिवार को आर्थिक रूप से समृद्ध किया है. यह युद्ध उन देशों के पक्ष में लड़ा जा रहा है जो ईरान के प्रतिद्वंद्वी हैं.
स्नाइडर तर्क देते हैं कि “ईरान परमाणु हथियार बनाने वाला था” या “सत्ता परिवर्तन जरूरी था” जैसे दावे विश्वसनीय नहीं हैं, क्योंकि यह प्रशासन पहले ही दावा कर चुका था कि उसने ईरानी परमाणु कार्यक्रम को नष्ट कर दिया है. साथ ही, ‘मागा’ का मुख्य सिद्धांत सत्ता परिवर्तन युद्धों का विरोध करना था. युद्ध के समय हमें बेतुकी बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए, बल्कि और अधिक तीखे सवाल पूछने चाहिए.
तानाशाही को हटाने से अपने आप उदारवादी लोकतंत्र नहीं आता, बल्कि अराजकता, उग्रवाद और संस्थागत पतन होता है
प्रोफेसर मुकतेदर खान का न्यू लाइन्स इंस्टीट्यूट विश्लेषण है कि अमेरिका और इज़राइल के लिए सामरिक जीत तो बहुत आसान है—परमाणु सुविधाएं नष्ट करना, मिसाइल भंडार कम करना और नेतृत्व को खत्म करना. खमेनेई की हत्या यह स्पष्ट संदेश देती है कि सैन्य लाभ अमेरिका के पास है. लेकिन खमेनेई की मौत ईरानियों को सरकार के खिलाफ भड़काने के बजाय राष्ट्रीय संप्रभुता के नाम पर एकजुट कर सकती है. बाहरी हमले के समय समाज अक्सर अपनी सरकार के साथ खड़ा हो जाता है.
ट्रम्प प्रशासन “सत्ता परिवर्तन” की बात कर रहा है, लेकिन इसका ब्लू प्रिंट क्या है? इराक और अफगानिस्तान का इतिहास बताता है कि तानाशाही को हटाने से अपने आप उदारवादी लोकतंत्र नहीं आता, बल्कि अराजकता, उग्रवाद और संस्थागत पतन होता है. 9 करोड़ की आबादी वाले देश में यदि सत्ता का ढांचा बिखरता है, तो कौन शासन करेगा? कोई रक्षक बल या राजनीतिक उत्तराधिकारी तैयार नहीं है.
इज़राइल का लक्ष्य सीमित है (खतरे को नष्ट करना), लेकिन अमेरिका ‘राजनीतिक बदलाव’ की बात करके बाद के परिणामों (शरणार्थी संकट, अस्थिरता) की जिम्मेदारी अपने सिर ले रहा है. यदि वाशिंगटन का लक्ष्य ईरान को कमजोर करना है, तो यह हासिल हो रहा है. लेकिन अगर लक्ष्य एक नई सरकार बनाना है, तो स्पष्ट योजना के अभाव में यह ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ का जोखिम पैदा करता है. बमबारी करके किसी देश को अनिश्चितता में धकेलना कोई महान रणनीति नहीं है.
ईरान की संरचना अयातुल्ला की हत्या को सहने के लिए ही बनी है; एक व्यक्ति पर नहीं टिका है ईरान का सिस्टम
ईरान पर नवीनतम इजरायली और अमेरिकी युद्ध की शुरुआत सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के घर और कार्यालयों पर हवाई हमलों के साथ हुई. इसके पीछे यह धारणा प्रतीत होती थी कि खामेनेई का अचानक खात्मा वर्तमान शासन व्यवस्था के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर देगा. इसका लक्ष्य वही हासिल करना था, जो मुअम्मर अल-गद्दाफी के बाद लीबिया में या बशर अल-असद के बाद सीरिया में हुआ था, जहाँ शासक के सत्ता में न रहते ही शासन व्यवस्थाएं ढह गईं. उन व्यवस्थाओं में, राज्य का भविष्य एक ही व्यक्ति से जुड़ा हुआ था.
लेकिन ईरान का इतिहास और अस्तित्व बचाए रखने का दृष्टिकोण अलग है. समकालीन बहुत कम सरकारें एक ही कार्यालय में इतनी अधिक प्रत्यक्ष शक्ति केंद्रित करती हैं, जितनी ईरान ‘सर्वोच्च नेता’ के कार्यालय में करता है. धार्मिक वैधता, सशस्त्र बलों की कमान और अंतिम राजनीतिक मध्यस्थता, सब कुछ वहीं पर आकर मिलते हैं.
“एफपी” में अली हाशिम का यह लेख इस विचार का विश्लेषण करता है कि क्या ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मृत्यु या हत्या से ईरानी शासन पूरी तरह ढह जाएगा. उनका तर्क है कि लीबिया या सीरिया जैसी अन्य व्यवस्थाओं के विपरीत, ईरान का सिस्टम केवल एक व्यक्ति पर टिका हुआ नहीं है.
लेख के अनुसार, ईरान में शक्तियाँ ‘सर्वोच्च नेता’ के कार्यालय में केंद्रित तो हैं, लेकिन यह संस्था एक व्यक्ति से बड़ी है. इसमें धार्मिक वैधता, सेना की कमान और राजनीतिक फैसले लेने की एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया शामिल है.
ईरान का इतिहास और उसकी संरचना उसे ऐसी चुनौतियों से निपटने के योग्य बनाती है. शासन के पास इस्लामी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) जैसी शक्तिशाली संस्थाएँ हैं, जिनका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा तंत्र पर बहुत गहरा है. ये संस्थाएँ केवल एक व्यक्ति के आदेश पर नहीं, बल्कि एक वैचारिक और संस्थागत ढांचे पर चलती हैं.
अली का कहना है कि ईरान में उत्तराधिकार के लिए ‘विशेषज्ञों की सभा’ जैसी संवैधानिक व्यवस्था पहले से मौजूद है. भले ही खामेनेई का जाना एक बड़ा झटका हो, लेकिन सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह ‘नेतृत्व विहीन’ होने पर भी काम करता रहे.
कुलमिलाकर, वह कहते हैं कि विदेशी ताकतों को लगता है कि “सिर काटने” की रणनीति से शासन बदल जाएगा, लेकिन ईरान का सुरक्षा तंत्र और उसकी संस्थागत जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे नेता की कमी को पूरा कर सकती हैं और शायद और भी अधिक कठोर रुख अपना सकती हैं.
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट: भारत रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाने पर कर रहा विचार
सुकल्प शर्मा की रिपोर्ट है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण ‘हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य’ से तेल की आपूर्ति में आए व्यवधान के बीच, भारत सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरियां तेल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाने पर विचार कर रही हैं. भारत ने हाल के महीनों में अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता के चलते रूस से अपने तेल आयात में काफी कटौती की थी. लेकिन हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से शिपमेंट प्रभावी रूप से निलंबित होने के कारण, प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रूसी तेल भारत की सहायता के लिए आ सकता है.
भारत के कच्चे तेल के कुल आयात का लगभग आधा हिस्सा (तकरीबन 25-27 लाख बैरल प्रति दिन) हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जो मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आता है. भारत कच्चे तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जिसकी आयात पर निर्भरता 88% से अधिक है. देश की अधिकांश गैस खपत भी आयात के माध्यम से पूरी होती है, और पश्चिम एशिया से तेल और गैस की आपूर्ति भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.
ईरान और ओमान के बीच स्थित यह संकरा जलमार्ग वैश्विक तेल पारगमन का सबसे महत्वपूर्ण ‘चोकपॉइंट’ माना जाता है, जहाँ से दुनिया के कुल तरल पेट्रोलियम उपभोग और वैश्विक एलएनजी व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है. शनिवार देर रात, ईरान के ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स’ ने जहाजों को संदेश भेजा कि जलडमरूमध्य को बंद कर दिया गया है. इसके बाद बड़ी संख्या में ट्रेडिंग हाउसों, बीमाकर्ताओं और जहाजों ने क्षेत्रीय संघर्ष के जोखिम से बचने के लिए इस समुद्री मार्ग से शिपमेंट निलंबित कर दिया है.
व्यापारिक स्रोतों के अनुसार, रूस से तेल प्राप्त करने के विकल्प के अलावा, हिंद महासागर और अरब सागर क्षेत्र में रूसी कच्चे तेल के कार्गो की निरंतर उपलब्धता बनी हुई है, जिसमें ‘फ्लोटिंग स्टोरेज’ (समुद्र में जहाजों पर भंडारित तेल) भी शामिल है. तेल का यह भंडार आंशिक रूप से इसलिए बना, क्योंकि भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद काफी कम कर दी थी. उद्योग के अनुमानों के अनुसार, एशियाई जलक्षेत्र में लगभग 1 करोड़ बैरल रूसी कच्चा तेल उपलब्ध है. कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म ‘केपलर’ के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी में भारत ने 11 लाख बैरल प्रति दिन रूसी तेल का आयात किया, जो 2025 के 20 लाख बैरल प्रति दिन के उच्चतम स्तर से लगभग आधा है.
भारतीय रिफाइनरियों के पास पहले से ही 10 दिनों से अधिक का कच्चे तेल का भंडार और लगभग एक सप्ताह का ईंधन स्टॉक उपलब्ध है. इसके अलावा, देश के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (एसपीआर) में भी लगभग एक सप्ताह का तेल उपलब्ध है. आयात में किसी भी संभावित कमी को पूरा करने के लिए भारत अपने रणनीतिक भंडार का उपयोग कर सकता है, गैर-हॉर्मुज़ क्षेत्रों से ‘स्पॉट’ खरीद तेज कर सकता है और अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका जैसे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं के साथ अनुबंधों को गहरा कर सकता है. हालांकि, तात्कालिक रूप से क्षेत्र में आसानी से उपलब्ध रूसी तेल भारत के काम आ सकता है.
केपलर के लीड रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने कहा, “ऐसी स्थिति में जहाँ मध्य पूर्व से आयात बाधित होता है, भारतीय रिफाइनरियां नीतिगत समर्थन के साथ रूसी कार्गो की ओर तेजी से रुख कर सकती हैं. राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से, यह लचीलापन भारत को भू-राजनीतिक झटकों के खिलाफ एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच प्रदान करता है. कुल मिलाकर, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान से तत्काल अस्थिरता तो आएगी, लेकिन भारत की विविध सोर्सिंग रणनीति और नजदीकी जलक्षेत्र में वैकल्पिक तेल की मौजूदगी से लंबे समय तक चलने वाले आपूर्ति संकट का जोखिम कम हो जाता है.”
भारत के चावल उत्पादन और निर्यात पर पुनर्विचार की आवश्यकता; गंभीर चुनौतियां
“द इंडियन एक्सप्रेस” में प्रकाशित विश्लेषण में हरीश दामोदरन ने लिखा है कि भारत वर्ष 2011-12 से दुनिया के चावल निर्यात बाजार में शीर्ष स्थान पर काबिज है. वर्ष 2024-25 के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि भारत ने 21.69 मिलियन टन चावल का निर्यात किया, जो इसके निकटतम प्रतिद्वंद्वियों थाईलैंड और वियतनाम के कुल निर्यात से भी कहीं अधिक है. इसी अवधि में भारत, चीन को पीछे छोड़कर 150 मिलियन टन उत्पादन के साथ दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश भी बन गया है. हालाँकि, यह सफलता अपने साथ गंभीर पर्यावरणीय और वित्तीय चुनौतियाँ भी लेकर आई है.
इस विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू धान की खेती में पानी की अत्यधिक खपत है. पारंपरिक ‘ट्रांसप्लांटिंग’ विधि में खेत को निरंतर पानी से भरकर रखना पड़ता है. गणना के अनुसार, एक किलो चावल तैयार करने में लगभग 3,000 लीटर पानी खर्च होता है. इसका अर्थ यह है कि जब भारत लाखों टन चावल का निर्यात करता है, तो वह वास्तव में अरबों लीटर पानी का ‘अदृश्य निर्यात’ कर रहा होता है. यह पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों के लिए चिंताजनक है, जहाँ भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है.
वित्तीय दृष्टिकोण से, बासमती चावल गैर-बासमती की तुलना में कहीं अधिक लाभदायक है. 2023-25 के आंकड़ों के अनुसार, बासमती का निर्यात मात्रा में गैर-बासमती से आधा था, लेकिन उससे होने वाली कुल विदेशी मुद्रा की कमाई लगभग बराबर थी. बासमती की औसत कीमत 82-92 रुपये प्रति किलो रही, जबकि गैर-बासमती की मात्र 34-39 रुपये. अतः, बासमती कम अनाज निर्यात करके अधिक ‘डॉलर’ भारत लाता है.
बासमती न केवल महंगा बिकता है, बल्कि यह अधिक ‘पर्यावरण-अनुकूल’ भी है. गैर-बासमती की रोपाई जून की भीषण गर्मी में होती है, जिससे पानी का वाष्पीकरण अधिक होता है. इसके विपरीत, बासमती जुलाई में मानसून के साथ लगाया जाता है. अक्टूबर की ठंडक बासमती में ‘2-एसिटाइल-1-पायरोलिन’ नामक सुगंधित यौगिक को संरक्षित रखने में मदद करती है. वैज्ञानिकों का सुझाव है कि हमें सामान्य चावल के बजाय बासमती और अन्य जीआई प्राप्त सुगंधित किस्मों जैसे कालानामक, कतरनी और गोबिंदोभोग को बढ़ावा देना चाहिए.
नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के पूर्व निदेशक अशोक कुमार सिंह के अनुसार, पंजाब और हरियाणा के पूरे 6.2 मिलियन हेक्टेयर जीआई क्षेत्र को बासमती के अंतर्गत लाया जाना चाहिए. इससे पानी की बचत होगी और किसानों की आय बढ़ेगी. वहीं, गैर-बासमती चावल की खेती को उन राज्यों (बिहार, पश्चिम बंगाल, असम) में स्थानांतरित किया जाना चाहिए जहाँ जल संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं. बासमती किसानों को सुरक्षा देने के लिए सरकार को एक ‘न्यूनतम फ्लोर प्राइस’ (आधार मूल्य) भी तय करना चाहिए.
आईएआरआई के वैज्ञानिकों ने पूसा बासमती-1509 जैसी क्रांतिकारी किस्में विकसित की हैं, जो कम समय (115-120 दिन) में तैयार होती हैं और अधिक पैदावार देती हैं. हाल ही में, वैज्ञानिकों ने ‘मार्कर-असिस्टेड सिलेक्शन’ तकनीक का उपयोग करके पूसा बासमती-1847, 1885 और 1886 जैसी नई किस्में जारी की हैं. ये किस्में ‘बैक्टीरियल ब्लाइट’ और ‘राइस ब्लास्ट’ जैसी बीमारियों के प्रति आंतरिक रूप से प्रतिरोधी हैं. इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसानों को महंगे और हानिकारक रसायनों (एंटीबायोटिक्स और फफूंदनाशकों) के छिड़काव की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे भारतीय चावल की गुणवत्ता और वैश्विक साख बनी रहती है.
विश्लेषण में भविष्य की ‘स्मार्ट’ खेती की चर्चा की गई है. अब वैज्ञानिक ‘प्रेडिक्टिव ब्रीडिंग’ (पूर्वानुमानित प्रजनन) की ओर बढ़ रहे हैं, जो ‘जीनोमिक सिलेक्शन’ (आनुवंशिक चयन) और ‘मशीन लर्निंग’ का मिश्रण है. इसमें कंप्यूटर मॉडल डीएनए डेटा के आधार पर यह पहले ही बता देते हैं कि कौन सा पौधा भविष्य में सबसे अच्छी फसल देगा. इससे नई किस्मों को विकसित करने में लगने वाला समय और मेहनत काफी कम हो जाएगी.
कुलमिलाकर, विश्लेषण कहता है कि भारत को अपनी वैश्विक स्थिति बनाए रखने के लिए अब ‘मात्रा’ के बजाय ‘गुणवत्ता और मूल्य’ पर ध्यान देने की आवश्यकता है. कम पानी में उगने वाली और अधिक मूल्य देने वाली बासमती तथा सुगंधित किस्मों को बढ़ावा देकर ही भारत अपनी कृषि अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन बना सकता है.
मोदी सरकार ने स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ी चेतावनियों को नज़रअंदाज़ कर गरीबों को फोर्टिफाइड चावल परोसा
‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने मई 2023 की अपनी एक जांच पड़ताल में बताया था कि आंतरिक चेतावनियों और अनिश्चित विज्ञान के बावजूद, मोदी सरकार भारत के गरीबों को फोर्टिफाइड चावल परोस रही है.
श्रीगिरीश जलिहल की यह रिपोर्ट बताती है कि किस प्रकार भारत सरकार ने पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाणों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनियों को दरकिनार करते हुए, देश की 80 करोड़ जनता को ‘फोर्टिफाइड’ (कृत्रिम आयरन और विटामिन युक्त ) चावल देने का फैसला किया.
दस्तावेजों से पता चलता है कि नीति आयोग और वित्त मंत्रालय ने इस योजना को “अपरिपक्व” बताया था. उन्होंने चेतावनी दी थी कि चावल के पोषण संबंधी प्रभाव को जांचने के लिए शुरू किए गए पायलट प्रोजेक्ट्स (प्रायोगिक परियोजनाएं) अभी पूरे भी नहीं हुए थे, फिर भी सरकार ने इसे पूरे देश में लागू करने की घोषणा कर दी.
भारत के शीर्ष चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर) के विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई थी. विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी आनुवंशिक बीमारियों से पीड़ित हैं. ऐसे मरीजों के शरीर में पहले से ही आयरन की अधिकता होती है, और आयरन युक्त चावल खाने से उनके अंगों के खराब होने का खतरा बढ़ सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट्स की विफलता को छिपाया. नीति आयोग की एक गोपनीय रिपोर्ट में कहा गया कि ये प्रोजेक्ट्स बुनियादी रूप से दोषपूर्ण थे और चावल के पोषण संबंधी प्रभाव का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं दे सके.
जांच में यह भी खुलासा हुआ कि कुछ अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और डच कंपनियों का इस नीति को बनवाने में प्रभाव था. ये संस्थाएं फोर्टिफाइड चावल के लिए लगने वाले पोषक मिश्रण के कारोबार से जुड़ी थीं. इन्होंने सरकार को “साक्ष्य” प्रदान किए और मानकों को प्रभावित करने में भूमिका निभाई.
प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त 2021 को लाल किले से घोषणा की थी कि सभी सरकारी योजनाओं (जैसे पीडीएस और मिड-डे मील) के तहत केवल फोर्टिफाइड चावल ही दिया जाएगा. रिपोर्ट का तर्क है कि गरीबों के पास कोई विकल्प नहीं बचा है, और उन्हें बिना किसी चेतावनी के यह चावल खाने पर मजबूर किया जा रहा है.
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि सरकार ने एनीमिया (खून की कमी) को दूर करने के नाम पर एक ऐसी नीति लागू की है, जिसके वैज्ञानिक आधार संदिग्ध हैं और जो आबादी के एक बड़े हिस्से के स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरी हो सकती है.
अश्विनी हत्याकांड: हत्या साबित हो गई, दोषी रिहा हो गए, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में महिला एएसआई अभी भी ‘जीवित’
उनकी हत्या ने जन-आक्रोश को जन्म दिया, बड़ी बहस छिड़ी और अंततः एक पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर को सजा भी हुई, लेकिन आधिकारिक रिकॉर्ड में असिस्टेंट इंस्पेक्टर अश्विनी बिद्रे गोरे अभी भी “जीवित” हैं. इस प्रशासनिक विसंगति के कारण गोरे परिवार न्याय के लिए एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर भटक रहा है, लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिल रही है.
उनके थक चुके पति राजू गोरे ने 6 फरवरी को अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग करते हुए एक पत्र में लिखा, “पूरा प्रशासन फिलहाल यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि अश्विनी बिद्रे की हत्या नहीं हुई थी, बल्कि वह जीवित हैं. इसलिए, अब हम पूरी तरह से निराश हैं... अंतिम उपाय के रूप में, हम अब यह अनुरोध कर रहे हैं कि और अधिक अन्याय सहने के बजाय, मुझे और मेरी बेटी को ‘इच्छा मृत्यु’ की अनुमति दी जाए.”
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में सदफ़ मोदक की रिपोर्ट के मुताबिक, गोरे के पास व्यथित होने के पर्याप्त कारण हैं. पिछले साल 21 अप्रैल को — नवी मुंबई पुलिस में कार्यरत उनकी 37 वर्षीय पत्नी के लापता होने के नौ साल बाद — पनवेल सत्र न्यायालय ने पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर अभय कुरुंदकर (61) और दो अन्य को सात साल की सजा सुनाई थी. चूंकि वे पहले ही विचाराधीन कैदी के रूप में इतना समय बिता चुके थे, इसलिए उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया.
कुरुंदकर, जो अश्विनी के साथ रिश्ते में था, पर यह साबित हुआ कि उसने अश्विनी की हत्या तब की जब उसने शादी के लिए दबाव बनाया. हालांकि उनका शव कभी बरामद नहीं हुआ, लेकिन अदालत ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से यह निश्चित रूप से स्थापित हो गया है कि कुरुंदकर के आवास पर उनकी हत्या की गई, उनके शरीर के टुकड़े किए गए और उन्हें खाड़ी में फेंक दिया गया.
दस महीने बाद भी, परिवार का कहना है कि अधिकारी उनकी मृत्यु दर्ज करने में आनाकानी कर रहे हैं, और ट्रायल कोर्ट के आदेश पर रोक या उसके पलटने की संभावना का हवाला दे रहे हैं. इसका मतलब है कि पुलिस विभाग से मिलने वाले सेवा-संबंधी वित्तीय लाभों तक परिवार की पहुंच बंद है. पिछले साल सजा सुनाए जाने के बाद से, परिवार का कहना है कि उसने राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश और बॉम्बे हाई कोर्ट सहित विभिन्न अधिकारियों को हस्तक्षेप के लिए “28 बार” पत्र लिखे हैं.
एक किसान और पूर्व मनसे (एमएनएस) कार्यकर्ता गोरे ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, “मुझे पहले एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर दौड़ाया गया. फिर मुझे बताया गया कि चूंकि मामला न्यायपालिका के समक्ष लंबित है, इसलिए वे मृत्यु प्रमाणपत्र जारी नहीं कर सकते... मैंने उनसे कहा कि मृत्यु पर ‘स्टे’ (रोक) नहीं लग सकता.”
गोरे का कहना है कि उन्होंने सबसे पहले कोल्हापुर जिले के हातकणंगले तहसील के अधिकारियों से संपर्क किया, जहाँ से परिवार ताल्लुक रखता है. बाद में उन्होंने पनवेल नगर निगम (जहां अश्विनी रहती थीं) और मीरा भयंदर नगर निगम (जहां पुलिस ने आरोप लगाया था कि शव फेंका गया था) से संपर्क किया.
23 जुलाई 2025 को, मीरा भयंदर नगर निगम ने जवाब दिया कि “केवल फैसले के आधार पर मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता.” पत्र में कहा गया,”संभावना है कि सत्र न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील दायर की जाएगी. इसलिए उचित अदालत से निर्देश मांगे जा सकते हैं.”
पनवेल नगर निकाय ने मई 2025 में गोरे को सूचित किया कि कथित मृत्यु स्थान उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है. हातकणंगले पंचायत ने कहा कि किसी अदालत ने उन्हें प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश नहीं दिया है, हालांकि स्वीकार किया कि उनके लापता होने के सात साल बीत चुके हैं.
‘जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969’ के तहत, मृत्यु आमतौर पर मेडिकल सर्टिफिकेट या पुलिस दस्तावेजों के आधार पर दर्ज की जाती है. भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 108 के तहत, यदि कोई व्यक्ति सात साल से लापता है, तो अदालत उसे मृत मान सकती है. हालांकि, इसके लिए सक्षम दीवानी अदालत से घोषणात्मक आदेश की आवश्यकता होती है.
अश्विनी के मामले में, जबकि सत्र न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि उनकी हत्या हुई थी, उसने किसी स्थानीय प्राधिकरण को उनकी मृत्यु दर्ज करने का विशिष्ट निर्देश नहीं दिया. नतीजतन, पोस्टमार्टम रिपोर्ट या शव की अनुपस्थिति ने प्रक्रियात्मक हिचकिचाहट पैदा कर दी है.
कुरुंदकर को दोषी ठहराते समय, पनवेल अदालत ने सिफारिश की थी कि रायगढ़ का जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण अश्विनी की बेटी के लिए मुआवजे का निर्धारण करे. लेकिन, गोरे का कहना है कि इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
अश्विनी को आखिरी बार 11 अप्रैल 2016 को एक रेलवे स्टेशन के बाहर जीवित देखा गया था. सजा सुनाते समय, सत्र न्यायालय ने इस बात पर भी हैरानी जताई थी कि हत्या के मामले में आरोपी होने के बाद कुरुंदकर को राष्ट्रपति पदक के लिए सिफारिश कैसे की गई थी.
‘प्लेबैक रिटायरमेंट’ के बाद अरिजीत का पहला इंडिपेंडेंट ट्रैक रिलीज़
गायक अरिजीत सिंह के प्रशंसकों का दिल उस वक्त टूट गया था जब उन्होंने प्लेबैक सिंगिंग (फिल्मों के लिए गायन) से संन्यास की घोषणा की थी. हालांकि, अब एक ऐसी खुशखबरी आई है, जिसने करोड़ों चेहरों पर मुस्कान वापस ला दी है.
ऐसा लगता है कि गायक अब ‘इंडिपेंडेंट म्यूजिक’ (स्वतंत्र संगीत) पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, और उनकी नवीनतम रिलीज़ दिखाती है कि अरिजीत की संगीतमय यात्रा एक नए चरण में प्रवेश कर रही है.
अरिजीत सिंह ने हाल ही में “रैना” शीर्षक से एक नया गाना रिलीज़ किया है, जिसने श्रोताओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. इस गाने को शेखर रवजियानी ने कंपोज किया है और इसके बोल प्रिया सरैया ने लिखे हैं.
‘लोकमार्ग’ के अनुसार, अरिजीत और शेखर ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट के जरिए इस रिलीज़ की घोषणा की. यह एक रोमांटिक ट्रैक है जो प्यार और भावनाओं के विषयों को टटोलता है. अरिजीत ने इस गाने को अपनी आवाज़ दी है, जबकि शेखर ने संगीत निर्देशन संभाला है.
गाना रिलीज़ होने के तुरंत बाद, प्रशंसकों ने कमेंट सेक्शन में प्यार और उत्साह भरे संदेशों की बाढ़ ला दी. एक प्रशंसक ने लिखा, “यह लीजेंड हमें हैरान करना कभी बंद नहीं करता. पता नहीं आगे वह किन प्रतिष्ठित प्रोजेक्ट्स पर काम करेंगे. बहुत उत्साहित हूँ.” एक अन्य ने लिखा, “आखिरकार, उनकी आवाज़ दोबारा सुनकर खुशी के आँसू आ गए.” तीसरे प्रशंसक ने कहा, “लीजेंड वापस आ गया है.” बता दें कि इस साल की शुरुआत में, अरिजीत सिंह ने घोषणा की थी कि वह प्लेबैक सिंगिंग के नए असाइनमेंट लेना बंद कर देंगे.
मेरा बेटा मुंबई में नहीं रह सका: जियागंज वापसी पर अरिजीत के पिता का खुलासा; ‘गुरुद्वारे में कीर्तन’ से हुई थी शुरुआत
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के एक छोटे से कस्बे जियागंज के लड़के, अरिजीत सिंह ने हमेशा अपनी निजी जिंदगी को चकाचौंध से दूर रखा है. हाल ही में प्लेबैक सिंगिंग से संन्यास की घोषणा करने वाले अरिजीत, स्पॉटिफाई पर 17,46,05,324 फॉलोअर्स के साथ दुनिया के सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले गायक हैं. बॉलीवुड की लाइमलाइट से दूर जाने के अरिजीत के बड़े फैसले के बाद, अभिनेता आमिर खान भी उनके गृहनगर में उनके साथ समय बिताने पहुंचे थे. अब एक हालिया साक्षात्कार में, गायक के पिता सुरिंदर सिंह ने अपने बेटे की बचपन से अब तक की संगीत यात्रा और उनके प्यारे निकनेम ‘शोमू’ के बारे में खुलकर बात की है.
“द इंडियन एक्सप्रेस” के मुताबिक, अरिजीत के पिता ने संगीत उद्योग में सफलता मिलने से बहुत पहले के अपने पारिवारिक सफर को याद किया. उन्होंने साझा किया, “हमारा पुश्तैनी घर लाहौर के पास था. बंटवारे के बाद, मेरे पिता और उनके तीन भाई लालगोला आ गए.” बंटवारे के बाद सिंह परिवार को सब कुछ पीछे छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा और अंततः वे जियागंज आ गए. अरिजीत की संगीत यात्रा यहीं से शुरू हुई, जब वे अपनी दिवंगत माँ अदिति सिंह के साथ विशेष अवसरों पर स्थानीय गुरुद्वारे में जाकर कीर्तन गाते थे. उनके पिता ने गर्व महसूस करते हुए कहा, “मजा लागे (अच्छा लगता है). मुझे हंसी आती है जब लोग मुझसे पूछते हैं कि ‘आपका बेटा क्या कर रहा है’ या उसका अगला प्रोजेक्ट क्या है.”
अरिजीत के बचपन के एक दोस्त ने बताया कि जियागंज कस्बा उन्हें हमेशा अपनी ओर खींचता है, चाहे उनकी पेशेवर प्रतिबद्धताएँ कितनी भी बड़ी क्यों न हों. दोस्त ने साझा किया, “शोमू के मुंबई में अपार्टमेंट और ऑफिस हैं, लेकिन वह यहीं रहना पसंद करता है. उसके बेटे — जुल और अली — यहीं के एक स्थानीय सीबीएसई स्कूल में पढ़ते हैं. शोमू अब अपने ‘तत्वमसि’ फाउंडेशन के प्रोजेक्ट्स को अधिक समय देना चाहता है.” सुरिंदर सिंह ने कस्बे से जुड़ाव पर जोर देते हुए कहा, “यह बहुत ही शांतिपूर्ण जगह है. यहाँ तक कि मेरा बेटा भी मुंबई में नहीं रह सका और उसे वापस आना पड़ा. ‘एई माटीर एमोनी तान’ (इस मिट्टी की खींच ही ऐसी है).”
फिलीस्तीन के महबूब कवि महमूद दरवेश की यहूदी प्रेमिका का निधन
“रीता और मेरी आंखों के बीच, एक राइफल है. और जो कोई भी रीता को जानता है, वह घुटने टेकता है और प्रार्थना करता है...”
हारेत्ज़ और येदिओथ अह्रोनोथ के हवाले से ख़बर है कि फलीस्तीन के महबूब और राष्ट्रीय शायर महमूद दरवेश की कविताओं में अक्सर जिस ‘रीता’ का जिक्र आता है, वह किरदार असल जिंदगी में इजरायली डांसर और कोरियोग्राफर तामार बेन-अमी थीं. पिछले हफ्ते 79 वर्ष की उम्र में कैंसर से उनका निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार बुधवार को यारकोनिम कब्रिस्तान में किया गया.
अपने पीछे पति, बहन और छात्रों का एक भरा-पूरा परिवार छोड़ जाने वाली तामार की कहानी, इजरायल और फलीस्तीन के जटिल रिश्तों के बीच एक अधूरी लेकिन अमर प्रेम कहानी है.
“रीता और मेरी आंखों के बीच एक राइफल है...” तामार और महमूद दरवेश का रिश्ता दरवेश की कई बेहतरीन प्रेम कविताओं की प्रेरणा बना, जिनमें सबसे मशहूर कविता “रीता” है. दरवेश ने लिखा था: “रीता और मेरी आंखों के बीच, एक राइफल है. और जो कोई भी रीता को जानता है, वह घुटने टेकता है और प्रार्थना करता है...”
2014 में इजरायली अखबार हारेत्ज़ को दिए एक इंटरव्यू में, बेन-अमी ने एक कलाकार के रूप में खुद पर दरवेश के प्रभाव के बारे में बात की थी. उन्होंने कहा था, “दरवेश के साथ मेरा रिश्ता मेरी जिंदगी की सिर्फ एक और प्रेम कहानी नहीं है. एक इंसान और एक रचनाकार के तौर पर मेरे विकास में महमूद की बड़ी भूमिका थी. उनके जरिए ही मैंने अनुभवों को रूपकों में ढालना सीखा. महमूद मुझे ‘तामारी’ बुलाते थे... मुझे उनके मुंह से यह शब्द सुनना और उनके पत्रों में इसे पढ़ना बहुत पसंद था.”
एक ‘असंभव’ प्रेम कहानी
बेन-अमी का जन्म 1947 में हाइफा में हुआ था. 16 साल की उम्र में कम्युनिस्ट यूथ पार्टी के एक कार्यक्रम में उनकी मुलाकात दरवेश से हुई थी. वह एक शायर थे और तामार एक डांसर. येदिओथ अह्रोनोथ को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, “हम यहूदियों और अरबों का एक छोटा, मिला-जुला समूह था. जब हमारा रिश्ता मजबूत होने लगा, तो मेरे माता-पिता को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया.”
तीन साल बाद, तामार ने यह रिश्ता खत्म कर दिया. उन्होंने 2014 में कहा था, “मैं इजरायलियों के साथ अधिक रहना चाहती थी. मुझे लगा कि मैं दूसरी तरफ (अरब पक्ष की ओर) बहुत ज्यादा बह रही हूँ. मेरी अपनी पहचान को कहीं न कहीं चोट पहुँच रही थी.”
प्रेम पत्र और ‘डीएनए’ में दरवेश
2014 में इब्तिसाम माराना-मेनूहिन की फिल्म “राइट डाउन, आई एम एन अरब” में इस रिश्ते की गहराइयों और दरवेश द्वारा तामार को लिखे गए प्रेम पत्रों का खुलासा हुआ. एक पत्र में दरवेश ने लिखा था: “तामारी, मैं लिख नहीं रहा, बल्कि तुम्हारे कान में फुसफुसा रहा हूँ... तुम मेरे बिस्तर में, मेरे दिल में और मेरे खून में हो.”
अपने आखिरी समय तक तामार ने इस प्रेम को सम्मान दिया. रेडियो शो ‘गाम केन टारबुत’ पर उन्होंने कहा था, “महमूद दरवेश मेरे डीएनए में हैं, मेरे शरीर और मेरी आत्मा में हैं.” जब उनसे पूछा गया कि 7 अक्टूबर के हमलों के बाद दरवेश क्या कहते, तो उन्होंने कहा: “मुझसे यह बहुत पूछा जाता है. मैं उनके लिए बहुत खुश हूँ कि वह (यह सब देखने के लिए) यहाँ नहीं हैं.” तामार बेन-अमी का करियर शानदार रहा. उन्होंने न्यूयॉर्क और जर्मनी में काम किया और इजरायल की बात्शेवा डांस कंपनी के लिए कोरियोग्राफी की. अपने आखिरी इंटरव्यू में उन्होंने एक दिलचस्प बात कही थी: “मैंने अपनी जिंदगी की शुरुआत एक अरब (दरवेश) के साथ की थी. अब मैं इसका अंत एक जर्मन (अपने पति) के साथ कर रही हूँ. वे दोनों ही फरिश्ते हैं.” फिल्म निर्माता माराना-मेनूहिन ने फेसबुक पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा: “तामार और दरवेश उस प्यार का प्रतीक बने रहेंगे जो हमारी खूनी हकीकत में कभी-कभी नदारद रहता है.”
अपील :
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