02/04/2026: चार सौ प्रतिशत | रोज़ाना 20 मज़दूर | ट्राई को हटाया | $3.55 ट्रिलियन छिपाए | दलित गायब | गुलाब से बुलडोज़र | बंगाल में 3डी | ट्रम्प बनाम मैक्रों
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
सुनेत्रा पवार ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा; प्रफुल्ल पटेल और तटकरे के अधिकार क्षेत्र पर खड़े किए सवाल
एनसीईआरटी ‘डीम्ड यूनिवर्सिटी’ के रूप में अधिसूचित, अब डिग्री भी देगा
पिछले 5 वर्षों में विदेशों में रोज़ाना 20 से अधिक भारतीय श्रमिकों की मौत, अधिकांश खाड़ी देशों में: सरकारी आंकड़े
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जग्गी हत्याकांड में अमित जोगी को दोषी ठहराया; तीन सप्ताह में आत्मसमर्पण करने का निर्देश
दुनिया के अति-अमीरों ने टैक्स अधिकारियों से $3.55 ट्रिलियन छिपाए: ऑक्सफैम
अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या में 7% की गिरावट: सरकार ने संसद को दी जानकारी
टीवी रेटिंग का कंट्रोल अब सरकार के पास, ट्राई को हटाया गया
भारत में ‘दो भारत’ की कहानी: 6 साल में अमीरी 400% बढ़ी, नीचे 50% वहीं के वहीं
केरल चुनाव से पहले 65 दलित-आदिवासी संगठनों ने किया यूडीएफ का समर्थन, वाम सरकार के विकास मॉडल से नाराज़गी
ईटानगर में रेस्तरां के नामों पर सख्ती, ‘चिकन-बीफ-पोर्क’ हटाने का आदेश
एचपीएससी : गणित सहायक प्रोफेसर भर्ती, 163 पद, सिर्फ 17 चयन, दलित एक भी नहीं
40 पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी पूरी तरह खत्म
हरकारा डीप डाइव: प्रोफेसर अपूर्वानंद
नेहरू के गुलाब से योगी के बुलडोजर तक: भारत किस दिशा में जा रहा है?
ईरान जंग का 34वां दिन: ट्रंप का सख्त रुख, पाकिस्तान बना शांति का दावेदार
मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्य सरकार से जवाब मांगा
एक ही पिता के 11 बच्चों पर शक, वोटर लिस्ट में नाम अटका
पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट का संकट: क्या ‘डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट’ की बड़ी योजना चल रही है?
भारत में 1,000 नए क्लीनिकल ट्रायल साइट्स की तैयारी, लेकिन मरीज़ अब भी अंधेरे में
मैक्रों ने ईरान युद्ध और नाटो पर हमलों के लिए ट्रम्प की कड़ी आलोचना की
ट्रम्प का राष्ट्र के नाम संबोधन: ईरान को ‘पाषाण युग’ में भेजने की धमकी, पर जीत का दावा अधूरा
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान का अमेरिकी जनता को खुला पत्र: ‘अमेरिका फर्स्ट’ पर सवाल
भारत में ‘दो भारत’: देश के 5 सबसे अमीर परिवारों की संपत्ति 400% बढ़ी
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से 2025 के बीच देश के पाँच सबसे अमीर परिवारों की संपत्ति 400 फीसदी बढ़ गई, जबकि नीचे की 50 फीसदी आबादी की हिस्सेदारी 2024 तक सिर्फ 6.4 फीसदी पर ठहरी रही.
बुधवार को जारी वेल्थ ट्रैकर इंडिया 2026 की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया कि देश के 1,688 सबसे अमीर व्यक्तियों पर प्रगतिशील वेल्थ टैक्स लगाकर ₹10 लाख करोड़ से अधिक की राशि कल्याणकारी योजनाओं के लिए जुटाई जा सकती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 तक देश की निचली 50% आबादी की कुल संपत्ति में हिस्सेदारी सिर्फ 6.4% पर स्थिर रही. वहीं, शीर्ष 1% के पास देश की 40% से अधिक संपत्ति है. अध्ययन में कहा गया कि भारत में असमानता का स्तर औपनिवेशिक दौर जैसा हो गया है.
2019 से 2025 के बीच मुकेश अंबानी की संपत्ति 153 प्रतिशत बढ़ी, वहीं गौतम अडानी की संपत्ति में 625 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
भारत सरकार ने पिछले 11 वर्षों में ₹19.6 लाख करोड़ के कर्ज माफ किए हैं. ये निष्कर्ष सरकार के उस दावे को चुनौती देते हैं कि कल्याणकारी योजनाओं के लिए संसाधन उपलब्ध नहीं हैं. जहां सरकार कॉरपोरेट टैक्स घटा रही है, वहीं आम मेहनतकश लोग ज्यादा टैक्स दे रहे हैं.
अभियान के निदेशक अनिर्बान भट्टाचार्य ने कहा कि आज देश में “दो भारत” मौजूद हैं. एक अमीरों का, जिसकी संपत्ति तेजी से बढ़ रही है, और दूसरा गरीबों का, जो कर्ज और अस्थिर रोजगार से जूझ रहा है. उन्होंने कहा कि असमानता जितनी बढ़ेगी, संविधान में वर्णित भारत का सपना उतना ही दूर होता जाएगा.
अति-अमीरों ने टैक्स अधिकारियों से $3.55 ट्रिलियन छिपाए: ऑक्सफैम
ऑक्सफैम के अनुमानों के अनुसार, दुनिया के अति-अमीरों ने टैक्स अधिकारियों की नज़रों से लगभग $3.55 ट्रिलियन (लाख करोड़ डॉलर) छिपाकर रखे हो सकते हैं.
‘द गार्डियन’ में हीदर स्टीवर्ट के मुताबिक, इस चैरिटी संस्था ने ‘ऑफशोर होल्डिंग्स’ (विदेशों में जमा संपत्ति) के पैमाने पर अपना नवीनतम विश्लेषण प्रकाशित करते हुए एक बार फिर ‘वेल्थ टैक्स’ (संपत्ति कर) लगाने की मांग दोहराई है और सरकारों से टैक्स चोरी के रास्तों को बंद करने का आग्रह किया है.
फ्रांसीसी अर्थशास्त्री गेब्रियल ज़ुक्मैन और ‘ईयू टैक्स ऑब्जर्वेटरी’ सहित अन्य शिक्षाविदों के शोध पर आधारित इस रिपोर्ट में ऑक्सफैम ने कहा कि विदेशों में रखी कुल संपत्ति में काफी वृद्धि हुई है. वर्ष 2023 में यह बढ़कर $13.25 ट्रिलियन (£10 ट्रिलियन) तक पहुँच गई है—यह उन अनुमानों का नवीनतम वर्ष है जिसके आंकड़े उपलब्ध थे.
2016 में विभिन्न देशों के बीच सूचनाओं के स्वत: आदान-प्रदान की नई प्रणाली शुरू होने के बाद से, टैक्स अधिकारियों से छिपाई गई गुप्त संपत्तियों की हिस्सेदारी में तेजी से गिरावट आई है. लेकिन ऑक्सफैम का अनुमान है कि अभी भी शायद $3.55 ट्रिलियन टैक्स से बचाकर रखे गए हैं—जो वैश्विक जीडीपी के 3% से अधिक के बराबर है. पिछले शोध के अनुमान बताते हैं कि इस संपत्ति का 80% हिस्सा, या $2.84 ट्रिलियन से अधिक, संभवतः सबसे अमीर 0.1% परिवारों के पास है.
इसका अर्थ यह होगा कि इस छोटे से समूह के पास उतनी अघोषित संपत्ति है जो दुनिया की आधी गरीब आबादी की कुल संपत्ति के बराबर है. यह शोध पनामा पेपर्स के प्रकाशन के 10 साल पूरे होने के अवसर पर जारी किया गया है. पनामा पेपर्स एक ऐसी जाँच थी जिसने ‘टैक्स हेवन’ (कर चोरी के सुरक्षित ठिकाने) के भीतर की कार्यप्रणाली को उजागर किया था.
ऑक्सफैम के टैक्स विभाग के प्रमुख क्रिश्चियन हलम ने कहा: “यह सिर्फ चालाकी भरी अकाउंटिंग के बारे में नहीं है—यह शक्ति और दंडमुक्ति के बारे में है. जब करोड़पति और अरबपति विदेशों के टैक्स हेवन में खरबों डॉलर जमा करते हैं, तो वे खुद को उन दायित्वों से ऊपर रख लेते हैं जो बाकी समाज को बांधते हैं.”
ऑक्सफैम एक वैश्विक प्रगतिशील वेल्थ टैक्स की मांग को लेकर चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में कर सहयोग के ढांचे पर बातचीत भी शामिल है. ब्रिटेन स्थित यह चैरिटी संस्था लेबर पार्टी की सरकार से ‘वेल्थ टैक्स’ लागू करने का आह्वान कर रही है. चांसलर राचेल रीव्स ने पहले ही संपत्ति पर कर बढ़ा दिया है. उन्होंने संपत्ति बेचने पर लगने वाले ‘कैपिटल गेन्स टैक्स’ की दर बढ़ाई है और £2 मिलियन से अधिक मूल्य की संपत्तियों पर नया ‘काउंसिल टैक्स सरचार्ज’ लगाने की घोषणा की है.
पिछले 5 वर्षों से विदेशों में रोज़ाना 20 से अधिक भारतीय श्रमिकों की मौत, अधिकांश खाड़ी देशों में: सरकारी आंकड़े
विदेशों में भारतीय श्रमिकों की स्थिति से जुड़े परेशान करने वाले आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में हर दिन 20 से अधिक व्यक्तियों की विदेशी धरती पर मृत्यु हुई है, जिनमें से अधिकांश मौतें खाड़ी देशों में हुई हैं.
‘द हिंदू’ में पीटीआई के हवाले से ख़बर है कि पिछले पांच वर्षों (2021-2025) में हर दिन औसतन 20 से अधिक भारतीय श्रमिकों की विदेशी धरती पर मृत्यु हुई है. आंकड़ों के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच विदेशों में कुल 37,740 भारतीय श्रमिकों की जान गई. इन मौतों में से 86% से अधिक मामले खाड़ी देशों से हैं. अकेले खाड़ी क्षेत्र में हर दिन औसतन 18 भारतीय श्रमिकों की मृत्यु हो रही है. वर्षवार आंकड़े: 2021 में 8,234 मौतें (सबसे अधिक), 2022: 6,614 मौतें, 2023: 7,291 मौतें, 2024: 7,747 मौतें और 2025 में 7,854 मौतें दर्ज की गईं.
पांच साल की अवधि के देशवार आंकड़े देखें तो संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में 12,380 मौतें, सऊदी अरब में 11,757 मौतें, कुवैत में 3,890, ओमान में 2,821 मौतें, मलेशिया में 1,915 और कतर में 1,760 भारतीय श्रमिकों की मौतें हुईं.
विदेश मंत्रालय ने इन मौतों के कारणों का विस्तृत विवरण तो नहीं दिया, लेकिन “वीजा जांच में सख्ती” और “कठिन कार्य परिस्थितियों” को इसके संभावित कारकों के रूप में देखा जा रहा है. सरकार ने राज्यसभा में बताया कि वह विदेशों में भारतीय श्रमिकों के हितों और सुरक्षा के मुद्दों को संबंधित देशों के अधिकारियों के साथ नियमित रूप से उठाती रहती है.
अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या में 7% की गिरावट: सरकार ने संसद को दी जानकारी
अमेरिका में इस समय 3.5 लाख से अधिक भारतीय छात्र पढ़ रहे हैं, लेकिन पिछले साल की तुलना में आंकड़ा गिरा है. सरकार ने गुरुवार को संसद को यह जानकारी दी.
‘पीटीआई’ के अनुसार, विदेश मंत्रालय से पूछा गया था कि क्या अमेरिका में भारतीय छात्रों के नामांकन में कमी आई है, और “वीजा स्लॉट की कमी” तथा “वीजा अस्वीकृति का उच्च प्रतिशत” इसमें किस हद तक योगदान दे रहे हैं. प्रश्न के लिखित उत्तर में, विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कुछ आंकड़े राज्यसभा के साथ साझा किए.
इन आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2025 में अमेरिका में 3,78,787 छात्र थे, वहीं इस वर्ष फरवरी 2026 में घटकर 3,52,644 छात्र रह गए. यह आंकड़ा कुल छात्र नामांकन में लगभग 7 प्रतिशत की गिरावट दर्शाता है.
विदेश मंत्रालय से यह भी पूछा गया कि क्या “वीजा जांच (स्क्रूटनी) में वृद्धि” इस गिरावट का कारण है. राज्य मंत्री ने कहा कि नए दिशानिर्देशों के तहत, अमेरिका एफ, एम और जे गैर-प्रवासी श्रेणियों के सभी छात्रों और विनिमय आगंतुक आवेदकों की ऑनलाइन उपस्थिति सहित व्यापक जांच करेगा. सिंह ने कहा कि बढ़ी हुई जांच और अनुपालन आवश्यकताओं सहित इन उपायों का “भारतीय नागरिकों को जारी किए गए अमेरिकी छात्र वीजा की संख्या पर प्रभाव पड़ा है.”
उन्होंने स्पष्ट किया कि हालांकि वीजा जारी करना और संबंधित नीतियां संबंधित देश का संप्रभु अधिकार हैं, लेकिन विदेश मंत्रालय छात्रों और पेशेवरों की कानूनी आवाजाही के रास्तों को सरल बनाने के लिए प्रासंगिक अमेरिकी अधिकारियों के साथ संपर्क बनाए हुए है.
टीवी रेटिंग का कंट्रोल अब सरकार के पास, ट्राई को हटाया गया
केंद्र सरकार ने टीवी रेटिंग से जुड़े पूरे सिस्टम का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है, जिससे अब अरबों डॉलर के विज्ञापन खर्च को प्रभावित करने वाली इस व्यवस्था पर उसका सीधा नियंत्रण होगा.
‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण को इस निगरानी ढांचे से बाहर कर दिया है.अब यह जिम्मेदारी पूरी तरह से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सौंप दी गई है. पहले ट्राई और एमआईबी दोनों मिलकर इस पर निगरानी रखते थे, जिससे एक दोहरा सिस्टम बना हुआ था. हालांकि, प्रसारण और केबल टीवी के अन्य पहलुओं जैसे चैनल प्राइसिंग, विज्ञापन सीमा, इंटरकनेक्शन और वितरण नियम, सेवा गुणवत्ता और अनुपालन मानकों पर ट्राई का अधिकार बना रहेगा.
टीवी रेटिंग्स दर्शकों की देखने की आदतों को ट्रैक करती हैं और यह तय करती हैं कि विज्ञापन का पैसा कहां खर्च होगा. मार्च में जारी ईवाई-एफआईसीसीआई रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारतीय कंपनियों ने टीवी विज्ञापन पर ₹36,200 करोड़ खर्च किए हैं.
ट्राई के पूर्व प्रमुख सलाहकार सत्य एन. गुप्ता ने कहा कि “भले ही सरकार के पास अधिकार हों, लेकिन नीति और नियमन को एक साथ मिलाना और एक स्वतंत्र नियामक को हटाना एक पीछे की ओर कदम है.”
एनसीईआरटी ‘डीम्ड यूनिवर्सिटी’ के रूप में अधिसूचित, अब डिग्री भी देगा
शिक्षा मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) को ‘डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी’ (मानद विश्वविद्यालय) संस्थान घोषित किया है. इससे अब यह संस्थान स्वयं के पाठ्यक्रम/प्रोग्राम चलाने और डिग्री प्रदान करने में सक्षम होगा.
‘द हिंदू ब्यूरो’ के अनुसार, 30 मार्च की इस अधिसूचना में मंत्रालय ने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने इसी साल जनवरी में एनसीईआरटी (जो स्कूली शिक्षा की एक नोडल संस्था है) को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा देने के लिए विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को मंजूरी दे दी थी, जिसके बाद मंत्रालय ने इसे आधिकारिक रूप से घोषित कर दिया.
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जग्गी हत्याकांड में अमित जोगी को दोषी ठहराया; तीन सप्ताह में आत्मसमर्पण करने का निर्देश
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने गुरुवार (2 अप्रैल, 2026) को पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को 2003 के एक हत्या के मामले में दोषी करार दिया और उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है.
‘द हिंदू’ में शुभोमॉय सिकदर के अनुसार, यह मामला रायपुर में व्यवसायी-राजनीतिज्ञ रामावतार जग्गी की हत्या से संबंधित है. घटना उस समय की है जब अजीत जोगी राज्य के मुख्यमंत्री थे. 2007 में, सीबीआई की एक विशेष अदालत ने इस मामले में 28 लोगों को दोषी ठहराया था, लेकिन अमित जोगी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था.
2011 में, सीबीआई ने बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था, लेकिन तब देरी के आधार पर अपील खारिज कर दी गई थी. इसके बाद जांच एजेंसी सुप्रीम कोर्ट गई, जिसने पिछले साल नवंबर में मामला वापस उच्च न्यायालय को भेज दिया था.
फैसले के बाद, अमित जोगी ने कहा कि उनके साथ घोर अन्याय हुआ है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा: “आज, माननीय उच्च न्यायालय ने मुझे सुनने का अवसर दिए बिना ही मात्र 40 मिनट में मेरे खिलाफ सीबीआई की अपील स्वीकार कर ली. मुझे खेद है कि जिस व्यक्ति को अदालत ने पहले बरी कर दिया था, उसे अब सुनवाई का एक भी मौका दिए बिना दोषी ठहरा दिया गया है. यह अभूतपूर्व है. अदालत ने मुझे आत्मसमर्पण करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है. मुझे लगता है कि मेरे साथ घोर अन्याय हुआ है. मुझे पूरा विश्वास है कि मुझे सुप्रीम कोर्ट से न्याय अवश्य मिलेगा.”
जग्गी परिवार का बयान
रामावतार जग्गी के पुत्र सतीश जग्गी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे सत्य की जीत बताया. उन्होंने कहा कि उनके परिवार का बीस साल का संघर्ष आखिरकार रंग लाया है.
बता दें, 4 जून, 2003 को हुई रामावतार जग्गी की हत्या उस वर्ष के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले एक सनसनीखेज घटना थी. जग्गी उस समय राज्य में दिवंगत विद्या चरण शुक्ल के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के कोषाध्यक्ष थे. उनके परिवार ने आरोप लगाया था कि राजनीतिक मैदान में एनसीपी के उभरने से तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी.
ईटानगर में रेस्तरां के नामों पर सख्ती, ‘चिकन-बीफ-पोर्क-मटन’ नहीं लिख सकेंगे; हटाने का आदेश
अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में खाने-पीने के कारोबार पर नया नियम लागू हुआ है. अब रेस्तरां अपने नाम में ‘चिकन’, ‘बीफ’, ‘पोर्क’ या ‘मटन’ जैसे शब्द इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे.
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, इटानगर नगर निगम ने मंगलवार को जारी आदेश में कहा कि ऐसे नाम “सार्वजनिक शालीनता” और “पशु कल्याण” से जुड़े मौजूदा मानकों के खिलाफ हैं.
निगम के मुताबिक, कई दुकानों ने अपने ट्रेड लाइसेंस ऐसे नामों के साथ लिए हैं, जिनमें सीधे किसी खास मांस का जिक्र है. अब 2019 के अरुणाचल प्रदेश म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन एक्ट के तहत इन्हें बदलकर “सामान्य और उपयुक्त” नाम रखना होगा.
रेस्तरां मालिकों को 10 दिन के भीतर अपने साइनबोर्ड, मेन्यू और प्रमोशनल सामग्री अपडेट करने के निर्देश दिए गए हैं. ऐसा न करने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है.
साथ ही नए नियम के अनुसार, भविष्य में भी ऐसे किसी नाम पर नया लाइसेंस जारी नहीं किया जाएगा. नगर निगम यह फैसला स्थानीय कारोबारियों के लिए चुनौती बन सकता है, क्योंकि कई रेस्तरां अपनी खास डिश या मांस आधारित पहचान के नाम से ही ग्राहकों को आकर्षित करते हैं.
सुनेत्रा पवार का चुनाव आयोग को पत्र; प्रफुल्ल पटेल और तटकरे के अधिकार क्षेत्र पर खड़े किए सवाल
महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री और राकांपा (एनसीपी) की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनेत्रा पवार ने भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) को पत्र लिखकर कहा है कि 28 जनवरी से लेकर उनके अध्यक्ष बनने की तारीख तक राकांपा नेताओं द्वारा किए गए किसी भी पत्राचार को पार्टी का आधिकारिक पत्राचार न माना जाए. यह पत्र 28 फरवरी को लिखा गया था, उनके पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के ठीक दो दिन बाद.
मुंबई से सुधीर सूर्यवंशी की रिपोर्ट है कि सुनेत्रा का यह पत्र 16 फरवरी, 2026 को कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे द्वारा चुनाव आयोग को भेजे गए उस संदेश को ‘अमान्य’ बना देता है, जिसमें दावा किया गया था कि अजीत पवार की अनुपस्थिति में, पार्टी के निर्णय लेने का अधिकार प्रफुल्ल पटेल को सौंपा गया है.
दिलचस्प बात यह है कि उनके पत्र में पटेल या तटकरे का कोई उल्लेख नहीं है, जिससे यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये दोनों वरिष्ठ नेता अभी भी दिवंगत अजीत पवार द्वारा दिए गए पदों पर बने हुए हैं या कोई बदलाव हुआ है.
घटनाक्रम से परिचित एक व्यक्ति ने कहा कि चुनाव आयोग को लिखे पत्र में इन दोनों नेताओं का जिक्र न होना इस बात का संकेत है कि सुनेत्रा पवार ने पार्टी की मौजूदा कार्यकारिणी को भंग कर दिया है. अपनी नई टीम बनाने की प्रक्रिया में दोनों नेताओं के पद खोने की संभावना है.
एनसीपी के एक वरिष्ठ व्यक्ति ने कहा, “संदेश स्पष्ट है कि सुनेत्रा पवार को उनके पति के निधन के बाद जिस तरह से पटेल और तटकरे ने पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश की, वह पसंद नहीं आया. अब, वह धीरे-धीरे इन दोनों नेताओं को अप्रत्यक्ष रूप से बाहर का रास्ता दिखाकर पार्टी में अपना अधिकार जताने और उसे पुनः प्राप्त करने की कोशिश कर रही हैं.”
इसके अलावा, उन्होंने ‘डिजाइन बॉक्स’ नामक राजनीतिक अभियान और पीआर फर्म के साथ अनुबंध भी समाप्त कर दिया है, जिसे पटेल और तटकरे ने भारी लागत पर नियुक्त किया था. यदि सुनेत्रा पवार इस संकट की घड़ी में ‘महारानी ताराबाई’ बनकर उभरती हैं, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
सुनेत्रा पवार ने अपने विधायकों के साथ एक बैठक भी की, जिन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे पार्टी को फिर से सार्वजनिक वर्चस्व में लाने के लिए मुखर और सक्रिय हों. एक विश्लेषक ने कहा, “हम जानते हैं कि सुनेत्रा पवार, अजीत पवार की जगह नहीं ले सकतीं, लेकिन वह निश्चित रूप से पार्टी में हो रहे बिखराव को रोक सकती हैं. दो मंत्रियों और राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर के इस्तीफे, और मंत्री नरहरि जिरवाल के कथित वीडियो के बाद जब पार्टी जर्जर स्थिति में है, तब वह एक सकारात्मक धारणा बना सकती हैं. इसलिए, उन्हें बाहर निकलकर नेतृत्व दिखाने की जरूरत है.
केरल चुनाव: 65 दलित-आदिवासी संगठनों ने किया यूडीएफ का समर्थन, वाम सरकार के विकास मॉडल से नाराज़गी
मकतूब मीडिया के अनुसार, केरल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 65 से अधिक दलित-आदिवासी संगठनों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को समर्थन देने की घोषणा की है. साथ ही लेफ्ट (वाम) सरकार के विकास मॉडल की आलोचना भी की है.
अंबेडकराइट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने आरोप लगाया है कि वामपंथी सरकार की विकास नीतियों ने आदिवासी, दलित और अन्य हाशिए पर मौजूद समुदायों को नजरअंदाज किया है. एडीएफ ने अपने बयान में कहा कि आम टैक्सपेयर्स, जिनमें दलित, आदिवासी, मछुआरे और कम इनकम वाले ग्रुप शामिल हैं, विझिंजम पोर्ट, नेशनल हाईवे और टनल रोड जैसे प्रोजेक्ट्स के बेनिफिशियरी नहीं हैं, क्योंकि वे एक अलग डेवलपमेंट मॉडल दिखाते हैं.
एडीएफ के कार्यकारी अध्यक्ष के. अंबुजाक्षन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि “प्लान फंड का सिर्फ़ 10% (जो खुद कुल बजट का सिर्फ़ सातवां हिस्सा है) एससी/एसटी डेवलपमेंट के लिए दिया जाता है, और इसका एक बड़ा हिस्सा कथित तौर पर कम इस्तेमाल किया जाता है. आरोप है कि पिछले नौ सालों में एससी/एसटी फंड से 7,411 करोड़ रुपये बर्बाद हो गए हैं. इससे एजुकेशन सेक्टर पर बुरा असर पड़ा है. ई-ग्रांट देने में देरी के कारण, लगभग 150 एससी/एसटी स्टूडेंट्स ने कथित तौर पर अपनी पढ़ाई छोड़ दी है.”
एडीएफ करीब 65 एससी/एसटी संगठनों का एक मिला-जुला संगठन है. उनके मुताबिक, इन समुदायों में यह चिंता बढ़ रही है कि अगर वाम सरकार दोबारा सत्ता में आती है तो उनके अस्तित्व और कल्याण पर खतरा हो सकता है.
हरियाणा: गणित सहायक प्रोफेसर भर्ती, 163 पद, सिर्फ 17 चुने, दलित एक भी नहीं
‘द मूकनायक’ के रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा लोक सेवा आयोग ने कॉलेज कैडर में असिस्टेंट प्रोफेसर (गणित) भर्ती का ताज़ा परिणाम घोषित कर दिया है. लेकिन घोषित नतीजों में 163 पदों के लिए आयोजित सब्जेक्ट नॉलेज टेस्ट (एसकेटी) में सिर्फ 17 उम्मीदवार ही न्यूनतम 35% अंक हासिल कर सके. यानी 146 पद खाली रह गए. अधिकारी परीक्षा में सफलता की कम दर का कारण प्रश्न पत्र के कठिन स्तर और सख़्त मूल्यांकन को मानते हैं.
एचपीएससी के एक अधिकारी ने कहा, “एसकेटी पेपर सब्जेक्टिव होते हैं. ऐसा लगता है कि उम्मीदवार परीक्षा लिखने में उतने अच्छे नहीं हैं.
लेकिन यह परिणाम सिर्फ कम सफलता दर की कहानी नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व के संकट को भी सामने लाता है. श्रेणीवार आंकड़े बताते हैं कि 17 चयनित उम्मीदवारों में अनारक्षित श्रेणी के 81 में 12, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस ) के 14 पदों के सामने 1 और पिछड़ा वर्ग-बी के 10 पदों के सामने 4 लिए हैं. वहीं पिछड़ा वर्ग-ए (बीसी -ए ) के 21 पदों, अन्य अनुसूचित जाति (ओएससी) के 18 पदों और वंचित अनुसूचित जाति (डीएससी) के 19 पदों पर एक भी उम्मीदवार चयनित नहीं हुआ है.
सोशल मीडिया पर लोग इस पर तीख़ी प्रतिक्रिया देते हुए सवाल भी पूछ रहे हैं.जर्नलिस्ट मंदीप पुनिया ने एक्स पोस्ट में सवाल उठाया, “इन 17 में एक भी दलित उम्मीदवार को चयनित नहीं किया गया. समझ नहीं आ रहा- हरियाणा में सिलेक्शन बोर्ड चल रहा है या रिजेक्शन बोर्ड!”
यह पहला मामला नहीं है. आयोग द्वारा हाल ही में की गई कई भर्तियों में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिला है. कंप्यूटर साइंस में पोस्ट ग्रेजुएट टीचर,अर्थशास्त्र, अंग्रेजी, रक्षा अध्ययन, वनस्पति विज्ञान और रसायन विज्ञान समेत अन्य विषयों में भी यही कमी देखने को मिली है.
40 पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी खत्म
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध को देखते हुए करीब 40 पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी पूरी तरह खत्म कर दी है, यह छूट 30 जून 2026 तक लागू रहेगी. पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलीस्टायरीन, पॉलीऑल्स, पॉलीब्यूटाडाइन, स्टायरीन ब्यूटाडाइन और एनहाइड्रस अमोनिया जैसे उत्पाद शामिल हैं.
सिंथेटिक टेक्सटाइल के लिए जरूरी कच्चे माल पीटीए और मोनो एथिलीन ग्लाइकॉल की कीमत पिछले एक महीने में 43% बढ़ गई है. इसकी कीमत ₹83 प्रति किलो से बढ़कर ₹118 प्रति किलो हो गई. युद्ध के कारण जहाज़ों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे सप्लाई कम हो गई और उद्योगों पर असर पड़ा है.
हरकारा डीप डाइव: प्रोफेसर अपूर्वानंद
नेहरू के गुलाब से योगी के बुलडोजर तक:भारत किस दिशा में जा रहा है?
हरकारा डीप डाइव के इस बातचीत में प्रोफेसर अपूर्वानंद ने उस घटना पर सवाल उठाए, जिसमें एक छोटी बच्ची द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बुलडोजर का खिलौना तोहफ़े के तौर पर दिया गया. इस घटना को केवल एक सामान्य या मासूम दृश्य नहीं, बल्कि समाज और राजनीति में हो रहे गहरे बदलाव के संकेत के रूप में देखा गया.
चर्चा में यह सामने आया कि पिछले कुछ वर्षों में बुलडोजर एक साधारण मशीन से बढ़कर एक राजनीतिक प्रतीक बन गया है. कई उदाहरणों के ज़रिए बताया गया कि किस तरह बुलडोजर कार्रवाई को न्याय के रूप में पेश किया गया, जबकि कई मामलों में इससे लोगों के घर उजड़े और समुदाय विशेष को निशाना बनाए जाने के आरोप भी लगे. आंकड़ों के अनुसार, 2024 में 16 राज्यों में 747 मकान गिराए गए, जो इस प्रवृत्ति की गंभीरता को दर्शाता है.
सबसे बड़ी चिंता बच्चों पर इसके असर को लेकर जताई गई. चर्चा में कहा गया कि जब छोटे बच्चों के सामने बुलडोजर को न्याय या शक्ति के प्रतीक के रूप में पेश किया जाता है, तो उनके मन में हिंसा और प्रभुत्व की भावना सामान्य हो सकती है. उदाहरण के तौर पर यह भी बताया गया कि किस तरह कई जगहों पर बच्चे नारे लगाते, तलवार लेकर जुलूस में शामिल होते या धार्मिक स्थलों के सामने शक्ति प्रदर्शन करते नज़र आते हैं. यह बदलाव इस बात का संकेत है कि समाज में एक आक्रामक मानसिकता धीरे-धीरे सामान्य बनती जा रही है.
चर्चा का निष्कर्ष यही रहा कि समाज और संस्थाओं को इस दिशा में गंभीरता से सोचने की ज़रुरत है. राजनीति में प्रतीकों के इस्तेमाल की ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए और बच्चों को किसी भी तरह के राजनीतिक या हिंसक संदेश से दूर रखा जाना चाहिए. अभिभावकों, शिक्षकों और नागरिकों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि आने वाली पीढ़ी नफरत नहीं, बल्कि समझ, संवेदनशीलता और इंसानियत के साथ आगे बढ़े.
बंगाल चुनाव:
मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्य सरकार से जवाब मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के दौरान 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की घटना पर गंभीर चिंता जताई है.यह खबर द टेलीग्राफ से ली गई है. कोर्ट ने इसे कानून-व्यवस्था की विफलता और न्यायपालिका की गरिमा पर सीधा हमला बताया. कोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी समेत कई अधिकारियों को नोटिस जारी कर पूछा कि समय पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह घटना सोची-समझी और जानबूझकर की गई कोशिश लगती है, जिसका मकसद न्यायिक अधिकारियों को डराना और चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करना था. कोर्ट ने चुनाव आयोग को ज़रुरत पड़ने पर सीबीआई या एनआईए जांच कराने और न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बल तैनात करने की अनुमति दी.
यह घटना बुधवार को मालदा के कालियाचक इलाके में हुई, जहां प्रदर्शनकारियों ने वोटर लिस्ट से नाम हटाने के आरोप में ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिस में अधिकारियों को कई घंटों तक घेर लिया. प्रदर्शनकारियों ने नेशनल हाईवे-12 को भी जाम कर दिया. देर रात सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन चलाकर अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला. इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियों को रोकने और नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया. कोर्ट ने निर्देश दिया कि न्यायिक प्रक्रिया में किसी तरह की रुकावट न हो और अधिकारियों व उनके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.
एक ही पिता के 11 बच्चों पर शक, वोटर लिस्ट में नाम अटका
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार कोलकाता के टॉपसिया इलाके में रहने वाले एक परिवार के 12 भाई-बहनों में से 11 लोगों के नाम वोटर लिस्ट में ‘अंडर एडजुडिकेशन’ में डाल दिए गए हैं. चुनाव आयोग को इस बात पर “संदेह” है कि इतने सारे भाई-बहन एक ही पिता से कैसे हो सकते हैं.
चुनाव आयोग की ओर से भेजे गए नोटिस में कहा गया कि एक ही व्यक्ति को कई लोगों ने पिता बताया है, जो शक के घेरे में आता है. परिवार का कहना है कि उन्होंने पिता से संबंध साबित करने वाले सभी दस्तावेज़ जमा किए हैं, फिर भी उनके नाम रोके गए हैं, जबकि एक भाई का नाम सूची में है. परिवार में 9 भाई और 3 बहनें हैं.
परिवार ने बताया कि उन्होंने आधार, पैन, वोटर कार्ड, पिता का डेथ सर्टिफिकेट, पासपोर्ट और स्कूल सर्टिफिकेट जैसे सभी दस्तावेज दोबारा जमा किए हैं. उनके पिता आमिर अहमद का निधन 2009 में हो चुका है. इसके बावजूद अभी तक उनके नाम सप्लीमेंट्री लिस्ट में नहीं आए हैं और उन्हें यह भी नहीं बताया जा रहा कि सूची कब जारी होगी.
पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट: क्या ‘डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट’ की बड़ी योजना चल रही है?
पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट अपडेट करने की प्रक्रिया में इतनी गड़बड़ियां और अव्यवस्था सामने आई हैं कि लाखों लोग अपने वोट देने के अधिकार से वंचित हो सकते हैं, ख़ासकर बंगाली मुस्लिमों के लिए यह ज़्यादा मुश्किल वक़्त हो सकता है. आर्टिकल 14 में समर हलरनकर अपनी एक रिपोर्ट में लिखते हैं कि कई लोगों की नाम की वर्तनी या जन्मतिथि की छोटी गलतियों के कारण लोगों को “संदिग्ध” माना जा रहा है, जिससे उनका नाम वोटर लिस्ट से हट सकता है और यहां तक कि उन्हें डिटेंशन सेंटर भेजने या देश से बाहर करने का खतरा भी हो सकता है.
रिपोर्ट में एक घटना का जिक्र है, जहां 19 मार्च 2026 को चुनाव आयोग का एक आधिकारिक पत्र सामने आया है, जिस पर सत्ताधारी पार्टी की मुहर थी, चुनाव आयोग ने इसे “क्लेरिकल एरर” कहा, लेकिन इसके बाद सोशल मीडिया पर इसे साझा करने वालों को पुलिस की ओर से धमकी भरे नोटिस भेजे गए. उन पर “साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने” जैसे आरोप लगाए गए, हालांकि यह साफ नहीं था कि उनका अपराध क्या था.
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान करीब 1.2 करोड़ मतदाताओं को जांच के दायरे में रखा गया, जिनमें बड़ी संख्या मुस्लिम बहुल जिलों की है. इनमें से करीब आधे लोगों को “अंडर एडजुडिकेशन” में रखा गया. रिपोर्ट के अनुसार, जिन 10 जिलों में सबसे ज़्यादा लोग जांच में हैं, उनमें 9 जिलों में मुस्लिम आबादी 50% या उससे अधिक है. महिलाओं के नाम पुरुषों के मुकाबले 7.1% ज़्यादा हटाए गए हैं.
इसके बाद जारी “सप्लीमेंट्री लिस्ट” में 32 लाख नामों में से लगभग 12.8 लाख नाम हटा दिए गए हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किन लोगों के नाम हटे हैं. कई परिवारों ने शिकायत की कि एक ही परिवार में कुछ लोगों के नाम हैं और कुछ के हटा दिए गए, जैसे माता-पिता के नाम हटे लेकिन बच्चों के नहीं, या भाइयों के नाम हटे लेकिन बहनों के नहीं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह पूरी प्रक्रिया एक बड़े राजनीतिक प्रोजेक्ट से जुड़ी हो सकती है. गृह मंत्री अमित शाह पहले ही ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ की बात कर चुके हैं. संसद में उन्होंने इस प्रक्रिया का बचाव भी किया था. देशभर में अब तक करीब 7 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं. लेख में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग धीरे-धीरे चुनाव प्रक्रिया को इस तरह बदल रहा है जिससे सत्तारूढ़ दल भाजपा को फायदा हो, 2023 में सरकार ने चुनाव आयुक्तों को कानूनी कार्रवाई से छूट दी, जिससे उनकी जवाबदेही और कम हो गई.
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कहा है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि चुनाव घोषित हो जाए और 10% मतदाताओं की स्थिति ही तय न हो. वहीं पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई क़ुरैशी ने कहा कि संविधान के तहत वोटर की जांच की जा सकती है, लेकिन वोट का अधिकार छीनना सही नहीं है. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी हमेशा हर वोटर को शामिल करने की रही है, लेकिन अब यह सिद्धांत कमज़ोर हो रहा है.
हाल के वर्षों में बंगाली मुस्लिमों को कई राज्यों, जैसे गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और असम, में “घुसपैठिया” बताकर हिरासत में लिया गया है. इससे यह डर और बढ़ गया है कि वोटर लिस्ट की यह प्रक्रिया सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकता और निर्वासन से भी जुड़ी हो सकती है.
भारत में 1,000 नए क्लीनिकल ट्रायल साइट्स की तैयारी, लेकिन मरीज़ अब भी अंधेरे में
इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में क्लीनिकल ट्रायल्स को बढ़ावा देने के लिए सरकार 1,000 नए ट्रायल साइट्स बनाने की योजना पर काम कर रही है और इसके लिए 10,000 करोड़ रुपये का बजट भी तय किया गया है. लेकिन इसके बावजूद मरीज़ों की जागरूकता, सुरक्षा और अधिकारों को लेकर गंभीर खामियां अब भी सामने आ रही हैं.
रिपोर्ट में 35 वर्षीय ऋतु भल्ला का मामला सामने आता है, जिन्हें बचपन में दो बार ब्लड कैंसर हुआ और बाद में इलाज के साइड इफेक्ट के कारण हेपेटाइटिस बी हो गया. तीन साल पहले दिल्ली के एक अस्पताल में एक महिला ने उनसे बिना पूरी जानकारी दिए क्लीनिकल ट्रायल में शामिल होने के लिए खून का सैंपल और सहमति पत्र पर साइन करने को कहा. जब उन्होंने जानकारी मांगी तो उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिला और उन्होंने ट्रायल में शामिल होने से इनकार कर दिया. विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई अकेली और पहली घटना नहीं है.
हालांकि 2013 में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद नियमों को मजबूत किया गया था, जिनमें वीडियो के ज़रिए सहमति लेना और मुआवजे का प्रावधान शामिल है, लेकिन ज़मीन पर इनका सही पालन नहीं हो रहा है. कई मामलों में मरीज़ों को यह तक नहीं बताया जाता कि दवाओं के दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं या उनके क्या अधिकार हैं. अध्ययनों के अनुसार, 60% से 75% तक लोग पर्याप्त जानकारी के बिना ही ट्रायल में शामिल हो जाते हैं.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि कई बार गरीब और कम पढ़े-लिखे लोगों को मुफ्त इलाज के नाम पर ट्रायल में शामिल कर लिया जाता है, खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में ऐसे मामले सामने आते हैं. हैदराबाद में 2025 का एक मामला सामने आया, जहां एक ट्रायल प्रतिभागी को सीने में दर्द की शिकायत पर इलाज देने के बजाय सिर्फ 500 रुपये देकर सरकारी अस्पताल भेज दिया गया, जबकि उसे पहले 20,000 रुपये का वादा किया गया था.
इसके अलावा अहमदाबाद के एक सरकारी अस्पताल में 58 क्लीनिकल ट्रायल्स में वित्तीय गड़बड़ियां सामने आईं, जहां 500 से ज़्यादा मरीज़ शामिल थे और करीब 1.87 करोड़ रुपये डॉक्टरों के निजी खातों में भेजे गए. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि निगरानी तंत्र कमज़ोर है और नियामक संस्थाओं के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि क्लीनिकल ट्रायल्स ज़रूरी हैं और इससे इलाज के नए रास्ते खुलते हैं, लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि मरीज़ पूरी तरह जागरूक हों. इसके लिए बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान, पारदर्शिता, मजबूत निगरानी और आसान शिकायत प्रणाली की ज़रुरत है.
ईरान जंग का 34वां दिन:
ट्रंप का सख्त रुख, लेकिन अमेरिका अभी इसे ‘युद्ध’ नहीं कह रहा है; आखिर क्यों?
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में आज ईरान पर अमेरिका-इज़राइल की जंग के 34वें दिन पर विस्तार से चर्चा हुई. शो में बताया गया कि इस जंग को अमेरिका अब भी आधिकारिक तौर पर “युद्ध” नहीं कह रहा है, क्योंकि उसे कांग्रेस की मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन ज़मीन पर हमले लगातार जारी हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के हालिया संबोधन से उम्मीद थी कि युद्धविराम की दिशा में कोई संकेत मिलेगा, लेकिन उन्होंने साफ कहा कि यह जंग अभी 2–3 हफ्ते और चल सकती है और ईरान को “स्टोन एज” तक पहुंचाने की बात भी दोहराई.
ट्रंप के बयान के बाद वैश्विक बाजारों में तुरंत असर देखा गया, ब्रेंट क्रूड के दाम करीब 7% बढ़ गए और दुनिया भर के शेयर बाजार गिर गए. हालांकि ट्रंप का दावा है कि ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता काफी कमजोर हो चुकी है, लेकिन हकीकत में ईरान लगातार इज़राइल और खाड़ी देशों में हमले करता दिख रहा है, जहां अमेरिकी ठिकाने भी मौजूद हैं. संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने कई मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने की बात कही है, जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है.
शो में पाकिस्तान की भूमिका पर खास चर्चा हुई, जो इस समय एक संभावित “पीसमेकर” के रूप में उभर रहा है. पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने की पेशकश की है और इस्लामाबाद में कई देशों, जैसे तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के साथ इस पर चर्चा भी हुई है. चीन ने भी पाकिस्तान के जरिए शांति प्रस्ताव आगे बढ़ाया है. हालांकि यह स्थिति विरोधाभासी भी है, क्योंकि पाकिस्तान खुद अफगानिस्तान के साथ सैन्य तनाव में उलझा हुआ है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की भूमिका और महत्व बढ़ता नजर आ रहा है. अमेरिका के साथ उसके रिश्ते मजबूत हुए हैं और वह दोनों पक्षों के बीच संवाद का माध्यम बनने की कोशिश कर रहा है. लेकिन यह अभी साफ नहीं है कि वह इस जटिल स्थिति में वास्तव में शांति स्थापित कर पाएगा या नहीं. फिलहाल जंग जारी है, हमले जारी हैं और पूरी दुनिया तेल की कीमतों से लेकर महंगाई तक इसका असर झेल रही है.
इस बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने अमेरिकी जनता के नाम एक चिट्ठी जारी कर ट्रंप के दावों पर सवाल उठाए और कहा कि यह जंग अमेरिका के लोगों के हित में नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि ईरान केवल आत्मरक्षा में जवाब दे रहा है और अमेरिका से किसी तरह की बातचीत नहीं चल रही है, जबकि ट्रंप लगातार बातचीत के दावे करते रहे हैं. ईरान के विदेश मंत्री ने भी साफ किया कि किसी भी तरह की राजनीतिक बातचीत या समझौते की प्रक्रिया जारी नहीं है.
मैक्रों ने ईरान युद्ध और नाटो पर हमलों के लिए ट्रम्प की कड़ी आलोचना की
द न्यूयॉर्क टाइम्स के संवाददाताओं की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने गुरुवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तीखी आलोचना की है. मैक्रों ने ट्रम्प पर ईरान युद्ध के लक्ष्यों को बार-बार बदलने और नाटो गठबंधन को नीचा दिखाने का आरोप लगाया है. यह बयान उस समय आया है जब ट्रम्प ने अपने हालिया टीवी संबोधन में युद्ध को समाप्त करने के लिए कोई स्पष्ट रणनीति पेश नहीं की, जिससे यूरोपीय देशों में हताशा बढ़ गई है.
दक्षिण कोरिया की यात्रा के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए मैक्रों ने कहा, “जब हम गंभीर होते हैं, तो हम हर दिन वह बात नहीं कहते जो पिछले दिन कही गई बात के उलट हो. शायद इंसान को हर दिन नहीं बोलना चाहिए.” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि नाटो पर ट्रम्प के बढ़ते हमले इस सैन्य गठबंधन को कमज़ोर कर रहे हैं. ट्रम्प ने हाल ही में नाटो की आलोचना की थी क्योंकि वह ईरान के खिलाफ एक महीने से चल रहे अमेरिका-इजरायल सैन्य अभियान में मदद नहीं कर रहा है. मैक्रों ने अन्य यूरोपीय अधिकारियों की चिंताओं को दोहराते हुए कहा, “यदि आप अपनी प्रतिबद्धता के बारे में हर दिन संदेह पैदा करते हैं, तो आप उसे खोखला कर देते हैं.”
अमेरिकी सहयोगियों, जिनसे युद्ध शुरू करने से पहले सलाह नहीं ली गई थी, अब इस संघर्ष के आर्थिक परिणामों को संभालने की कोशिश कर रहे हैं. इसी कड़ी में, ब्रिटेन ने गुरुवार को दर्जनों देशों के साथ एक वर्चुअल बैठक की, जिसमें अमेरिका शामिल नहीं था. इस बैठक का मुख्य मुद्दा ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य की घेराबंदी था, जो ऊर्जा शिपिंग के लिए एक महत्वपूर्ण रास्ता है. इसके साथ ही, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बहरीन द्वारा तैयार किए गए एक प्रस्ताव पर मतदान होने की उम्मीद है, जो इस जलमार्ग को खोलने के लिए सैन्य बल के उपयोग की अनुमति देता है.
युद्ध के मैदान की बात करें तो अमेरिका और इजरायल ने ईरान की कई मिसाइलों को नष्ट करने का दावा किया है, लेकिन ईरान अभी भी ड्रोन और मिसाइल हमले जारी रखे हुए है. इस बीच, ईरान के भीतर मानवाधिकारों की स्थिति गंभीर है. मशहूर वकील नसरीन सोतौदेह को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया है. युद्ध में अब तक बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए हैं. ‘ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी’ के अनुसार ईरान में 1,606 नागरिक मारे गए हैं, जबकि लेबनान में यह संख्या 1,318 से अधिक है. अमेरिका के भी 13 सैनिक इस युद्ध में अपनी जान गंवा चुके हैं.
ट्रम्प का राष्ट्र के नाम संबोधन: ईरान को ‘पाषाण युग’ में भेजने की धमकी, पर जीत का दावा अधूरा
अल जज़ीरा के लिए रिपोर्टर अली हर्ब की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान युद्ध पर राष्ट्र को संबोधित किया, लेकिन इसमें किसी बड़ी नई घोषणा के बजाय वही पुरानी बातें दोहराई गईं. वाशिंगटन डीसी से दी गई इस रिपोर्ट में विश्लेषण किया गया है कि ट्रम्प ने 20 मिनट के भाषण में दावा किया कि अमेरिका लक्ष्य हासिल करने के “बहुत करीब” है, लेकिन उन्होंने युद्ध खत्म करने का कोई ठोस रास्ता नहीं बताया.
ट्रम्प ने अपने भाषण में चार मुख्य बातें कहीं: युद्ध ज़रूरी है, इसे लगभग जीता जा चुका है, यह जारी रहना चाहिए, और यह जल्द ही खत्म हो जाएगा. उन्होंने धमकी दी कि अगर कोई समझौता नहीं हुआ, तो वे ईरान को “पाषाण युग” में वापस भेज देंगे और उसके बिजली घरों सहित बुनियादी ढांचे को तबाह कर देंगे. हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि इस भाषण में कुछ भी नया नहीं था. क्विंसी इंस्टीट्यूट के ट्रिटा पारसी के अनुसार, यह भाषण केवल पिछले 30 दिनों के उनके ट्वीट्स का सारांश था, जिससे पता चलता है कि उनके पास वास्तव में कोई योजना नहीं है.
अमेरिकी जनता के बीच इस युद्ध की लोकप्रियता गिर रही है. यूगोव के एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 28 प्रतिशत लोग ही इस संघर्ष का समर्थन कर रहे हैं. रिपब्लिकन समर्थकों में भी इसके प्रति धैर्य कम हो रहा है क्योंकि गैस और किराने के सामान की कीमतें बढ़ रही हैं. भाषण के दौरान ट्रम्प ने ईरान पर कई पुराने आरोप लगाए और उसे 2000 में हुए यूएसएस कोल हमले और 7 अक्टूबर के इजरायल हमले से जोड़ने की कोशिश की, जबकि इनके सीधे सबूत नहीं मिले हैं.
ट्रम्प ने दावा किया कि ईरान की नौसेना पूरी तरह नष्ट हो गई है और उसकी मिसाइल दागने की क्षमता खत्म हो चुकी है. लेकिन उनके भाषण के तुरंत बाद ही ईरान ने इजरायल पर एक और मिसाइल हमला कर दिया. इसके अलावा, ट्रम्प ने ईरान में ‘सत्ता परिवर्तन’ का दावा किया क्योंकि वहां के कई पुराने नेता मारे गए हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि शासन अभी भी मज़बूत है. सर्वोच्च नेता खामेनेई की जगह उनके बेटे मोज्तबा ने ले ली है और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स युद्ध जारी रखने की कसमें खा रहे हैं. आर्थिक मोर्चे पर, ट्रम्प ने स्वीकार किया कि अमेरिकियों को पेट्रोल की अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है, लेकिन उन्होंने इसके लिए ईरान को ज़िम्मेदार ठहराया.
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान का अमेरिकी जनता को खुला पत्र: ‘अमेरिका फर्स्ट’ पर सवाल
न्यूज़ रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने अमेरिकी जनता के नाम एक खुला पत्र लिखकर ट्रम्प प्रशासन के युद्ध पर गंभीर सवाल उठाए हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट किए गए इस पत्र में पेज़ेश्कियान ने पूछा है कि क्या ईरान के साथ यह युद्ध वाकई “अमेरिका फर्स्ट” की नीति के हित में है?
पेज़ेश्कियान ने पत्र में लिखा, “अमेरिकी लोगों के कौन से हितों की सेवा इस युद्ध द्वारा की जा रही है? क्या ‘अमेरिका फर्स्ट’ वास्तव में आज की अमेरिकी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है?” उन्होंने दावा किया कि ईरान ने अपने आधुनिक इतिहास में कभी भी आक्रामकता, उपनिवेशवाद या वर्चस्व का रास्ता नहीं चुना है और न ही कभी किसी युद्ध की पहल की है. उनके अनुसार, ईरान को एक खतरे के रूप में पेश करना शक्तिशाली लोगों की राजनीतिक और आर्थिक सनक का नतीजा है.
ईरानी राष्ट्रपति ने अमेरिका और इज़राइल के हमलों के जवाब में दी गई ईरान की प्रतिक्रिया को “वैध आत्मरक्षा” करार दिया. उन्होंने अमेरिकी सरकार और वहां की जनता के बीच अंतर करते हुए कहा कि ईरानी लोगों के मन में अमेरिकी या यूरोपीय लोगों के प्रति कोई दुश्मनी नहीं है. यह पत्र ट्रम्प के उस संबोधन से कुछ घंटे पहले आया जिसमें उन्होंने ईरानी नेतृत्व को “पृथ्वी पर सबसे हिंसक और ठग शासन” कहा था.
पत्र में यह भी संकेत मिलता है कि ईरान के नेतृत्व में कुछ बदलाव आए हैं. सर्वोच्च नेता मोज्तबा खामेनेई युद्ध शुरू होने के बाद से सार्वजनिक रूप से नहीं देखे गए हैं. पेज़ेश्कियान ने चेतावनी दी कि दुनिया एक चौराहे पर खड़ी है और टकराव का रास्ता जारी रखना पहले से कहीं अधिक महंगा और व्यर्थ साबित होगा. उन्होंने दुनिया से अपील की है कि वे शांति और संवाद के महत्व को समझें, क्योंकि युद्ध केवल विनाश लेकर आता है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.








