03/01/2026: वेनेजुएला अब अमेरिका चलाएगा, ट्रंप ने मादुरो को गिरफ्तार करने के बाद कहा | बांग्लादेश में एक और हिंदू की हत्या | गिग वर्कर्स हड़ताल के बाद बढ़ता विवाद | केकेआर ने बांग्लादेशी प्लेयर छोड़ा
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
वेनेजुएला में तख्तापलट: डोनाल्ड ट्रंप ने मादुरो को गिरफ्तार किया, अमेरिका ने अस्थायी शासन का ऐलान किया.
इंदौर जल संकट: दूषित पानी से 16 लोगों की मौत का दावा, शहर में पानी के लिए मची त्राहिमाम.
बांग्लादेश में हत्या: हिंदू कारोबारी पर कुल्हाड़ी से वार कर जिंदा जलाया, अल्पसंख्यक समुदाय में दहशत.
KKR विवाद: BCCI का आदेश- बांग्लादेशी खिलाड़ी को टीम से निकालें शाहरुख, भाजपा नेताओं ने साधा निशाना.
गिग वर्कर्स हड़ताल: जोमैटो और ब्लिंकिट के खिलाफ मोर्चा, यूनियन ने कहा- ‘पिक्चर अभी बाकी है’.
यूपी पुलिस का कारनामा: एसएचओ ने मजदूर पर मशीन लगाकर बताया बांग्लादेशी, वीडियो वायरल होने पर कार्रवाई.
नक्सल ऑपरेशन: सुकमा और बीजापुर में 14 माओवादी ढेर, मार्च 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य.
महाराष्ट्र सियासत: अजित पवार ने अपनी ही सरकार पर उठाए सवाल, भाजपा से तनातनी बढ़ी.
नेहा सिंह राठौर हिरासत में: ‘चौकीदारवा कायर बा’ गाने को लेकर यूपी पुलिस की कार्रवाई.
हरकारा डीप डाइव: प्रोफेसर अपूर्वानंद ने 2026 में ‘हिंदू राष्ट्र’ की राजनीति पर जताई चिंता.
अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को पकड़ा, ट्रंप ने कहा सरकार वे चलाएंगे
ट्रंप ने शनिवार तड़के सोशल मीडिया पर घोषणा की, कैराकस में बमबारी के बाद मादुरो और उनकी पत्नी को देश से बाहर ले जाया गया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार तड़के एक चौंकाने वाली घोषणा करते हुए कहा कि अमेरिका ने वेनेजुएला पर बड़े पैमाने पर हमला कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को पकड़ लिया है और उन्हें देश से बाहर ले जाया गया है.
ट्रंप ने सुबह 4:21 बजे (ईस्टर्न टाइम) ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए लिखा, “संयुक्त राज्य अमेरिका ने वेनेजुएला और इसके नेता राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर हमला सफलतापूर्वक अंजाम दिया है, जिन्हें उनकी पत्नी के साथ पकड़ लिया गया है और देश से बाहर ले जाया गया है.” उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मिलकर किया गया. एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने मार-ए-लागो में सुबह 11 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस की घोषणा की.
वेनेजुएला पर अब अमेरिका का ‘अस्थायी शासन’
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार (3 जनवरी, 2026) को ऐलान किया कि मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अब अमेरिका अस्थायी रूप से वेनेजुएला का शासन चलाएगा जब तक कि वहां सत्ता का सुरक्षित और उचित हस्तांतरण नहीं हो जाता. ‘पोलिटिको’ में बेन जोहानसन और ‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिकी सेना वहां लंबे समय तक रह सकती है. उन्होंने कहा, “हम ‘बूट्स ऑन द ग्राउंड’ (जमीनी सैन्य कार्रवाई) से नहीं डरते. अगर जरूरत पड़ी तो हम दोबारा जाने के लिए तैयार हैं. हम देश को सही तरीके से चलाने जा रहे हैं.”
ट्रंप ने इस हमले को “द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अब तक का ऐसा हमला बताया जो लोगों ने नहीं देखा था.” अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ल्व’ के तहत 20 ठिकानों से 150 से अधिक अमेरिकी विमानों ने वेनेजुएला की ओर उड़ान भरी. इस दौरान वेनेजुएला की राजधानी काराकस की बिजली काट दी गई थी. इस नाटकीय घटनाक्रम में मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स को उनके बेडरूम से हिरासत में लिया गया. अब उन्हें अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत यूएसएस इवो जिमा के जरिए न्यूयॉर्क लाया जा रहा है, जहां उन पर नार्को-टेररिज्म (मादक पदार्थों से जुड़ा आतंकवाद) और अमेरिका के खिलाफ कोकीन आयात की साजिश रचने का मुकदमा चलेगा. अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी ने पुष्टि की है कि मादुरो पर मशीनगन रखने और विध्वंसक उपकरणों के इस्तेमाल के भी आरोप हैं.
न्यूयॉर्क टाइम्स और सीएनएन की रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप ने ऑपरेशन की गोपनीयता बनाए रखने के लिए अमेरिकी कांग्रेस को भी इसकी जानकारी नहीं दी थी, जिस पर डेमोक्रेट्स ने सवाल उठाए हैं. हालांकि, फ्लोरिडा के रिपब्लिकन नेताओं और स्टीव बैलन ने इस कदम को “साहसी और शानदार” बताया है. ट्रंप ने फॉक्स न्यूज को बताया कि मादुरो अंत में बातचीत करना चाहते थे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. ट्रंप ने कहा, “वह (मादुरो) अंत में समझौता करना चाहते थे और मैं नहीं करना चाहता था... हमें कुछ ऐसा करना था जो बहुत अधिक सर्जिकल और शक्तिशाली हो.” ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला जाएंगी और वहां के टूटे हुए बुनियादी ढांचे को ठीक करेंगी, जिसमें अरबों डॉलर खर्च होंगे. उन्होंने इसे 1823 के “मोनरो सिद्धांत” का विस्तार बताते हुए इसे “डॉन-रो सिद्धांत” करार दिया और कहा कि पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभुत्व पर अब कभी सवाल नहीं उठाया जाएगा.
हमले का विवरण और मादुरो की गिरफ़्तारी
पोलिटिको के जोन्स हेडन की रिपोर्ट के मुताबिक़, यह हमला 30 मिनट से भी कम समय तक चला और इसमें कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों ने राजधानी कैराकस को निशाना बनाया. शनिवार तड़के कम से कम सात विस्फोट हुए. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सीनेटर माइक ली को फ़ोन पर बताया कि ये हमले “गिरफ़्तारी वारंट को अंजाम देने वालों की रक्षा के लिए” किए गए.
न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ संक्षिप्त फ़ोन साक्षात्कार में ट्रंप ने मिशन की सफलता का जश्न मनाते हुए कहा, “बहुत अच्छी योजना और बहुत बढ़िया, बढ़िया सैनिक और बढ़िया लोग... यह वास्तव में एक शानदार ऑपरेशन था.”
अमेरिकी अटॉर्नी जनरल पैम बोंडी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए बताया कि मादुरो और उनकी पत्नी पर मैनहट्टन में आरोप तय किए गए हैं. मादुरो पर नार्को-टेररिज़्म की साज़िश समेत कई गंभीर आरोप हैं. बोंडी ने कहा, “वे जल्द ही अमेरिकी धरती पर अमेरिकी अदालतों में अमेरिकी न्याय का पूरा प्रकोप झेलेंगे.”
वेनेजुएला की प्रतिक्रिया और अंतर्राष्ट्रीय निंदा
वेनेजुएला की उप-राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज़ ने राजकीय टीवी पर कहा, “हमें राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और प्रथम महिला सिलिया फ्लोरेस के ठिकाने की जानकारी नहीं है... हम जीवित होने का सबूत मांगते हैं.” वेनेजुएला सरकार ने बयान जारी कर अमेरिका के “अत्यंत गंभीर सैन्य आक्रमण” की निंदा की.
अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेत्रो ने कहा, “पूरी दुनिया को सचेत करता हूं कि उन्होंने वेनेजुएला पर हमला किया है.” उन्होंने वेनेजुएला की संप्रभुता के ख़िलाफ़ इस आक्रमण को ख़ारिज किया और वेनेजुएला सीमा पर सैन्य बल तैनात करने की घोषणा की.
ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने इसे “एक अस्वीकार्य रेखा पार करना” बताया. उन्होंने एक्स पर लिखा, “अंतर्राष्ट्रीय कानून के स्पष्ट उल्लंघन में देशों पर हमला करना हिंसा, अराजकता और अस्थिरता की दुनिया की ओर पहला क़दम है.”
क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज़-कैनेल ने इसे “आपराधिक हमला” और “राज्य आतंकवाद” करार दिया. मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप की निंदा की. चिली, स्पेन, रूस और ईरान ने भी इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की.
यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास ने कहा, “यूरोपीय संघ ने बार-बार कहा है कि मादुरो के पास वैधता नहीं है... सभी परिस्थितियों में अंतर्राष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का सम्मान किया जाना चाहिए.”
इस बीच, द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने वेनेजुएला के घटनाक्रम पर राजनीतिक टिप्पणी करने से परहेज किया है लेकिन अपने नागरिकों के लिए एक ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने भारतीयों को वेनेजुएला की गैर-जरूरी यात्रा से बचने और वहां मौजूद लोगों को अत्यधिक सावधानी बरतने की सलाह दी है.
सीएनएन के निक पैटन वॉल्श के विश्लेषण के अनुसार, यह कार्रवाई ट्रंप की निर्बाध वैश्विक शक्ति का प्रदर्शन है. मादुरो पर 50 मिलियन डॉलर का इनाम था और उन पर 2020 से ही अमेरिका में आरोप लंबित हैं. ट्रंप प्रशासन ने महीनों तक मादुरो पर दबाव बनाया, वेनेजुएला के तेल टैंकरों को ज़ब्त किया और क्षेत्र में भारी सैन्य तैनाती की.
बांग्लादेश में हिंदू कारोबारी पर कुल्हाड़ी से वार, फिर पेट्रोल डालकर जिंदा जलाया; मौत
हिंदू की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार (3 जनवरी, 2026) को एक 50 वर्षीय हिंदू व्यवसायी खोकन चंद्र दास की मौत हो गई. खोकन दास पर तीन दिन पहले भीड़ ने उस वक्त जानलेवा हमला किया था जब वे अपनी दुकान बंद करके घर लौट रहे थे. यह घटना शरीयतपुर जिले के दमुदया में केउरभंगा बाजार के पास हुई. हमलावरों ने न केवल उन्हें धारदार हथियारों से काटा बल्कि उन पर पेट्रोल छिड़क कर आग भी लगा दी.
रिपोर्ट के मुताबिक, खोकन दास दवा की दुकान और मोबाइल बैंकिंग का व्यवसाय करते थे. बुधवार (31 दिसंबर, 2025) की रात जब वे ऑटोरिक्शा में जा रहे थे, तभी हमलावरों ने उन्हें रोका. उन्हें बुरी तरह पीटा गया और धारदार हथियारों से हमला किया गया. इसके बाद उनके सिर पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई. जान बचाने के लिए खोकन दास पास के एक तालाब में कूद गए. स्थानीय लोगों ने उन्हें बचाया और अस्पताल पहुंचाया, लेकिन उनके चेहरे, सिर, हाथ और पेट में गंभीर चोटें आई थीं. तीन दिनों तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद शनिवार सुबह उन्होंने दम तोड़ दिया.
बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के प्रवक्ता काजोल देबनाथ ने हिंदू को बताया कि दिसंबर महीने से लेकर अब तक हिंदू समुदाय के किसी व्यक्ति की यह पांचवीं हत्या है. उन्होंने कहा कि कट्टरपंथी समूह जानबूझकर अल्पसंख्यकों को डराने की कोशिश कर रहे हैं. देबनाथ ने चिंता जताते हुए कहा, “किसी को जलाने के लिए पेट्रोल या बारूद का इस्तेमाल करना एक अशुभ संकेत है... शायद हम एक कट्टरपंथी संस्कृति का उदय देख रहे हैं.”
आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक महीने में समुदाय पर सात हमले दर्ज किए गए हैं. इससे पहले 18 दिसंबर को मैमंसिंग शहर में 25 वर्षीय दीपू चंद्र दास की ईशनिंदा के आरोप में भीड़ ने हत्या कर दी थी. 24 दिसंबर को राजबाड़ी में अमृत मंडल की लिंचिंग की गई थी. इतना ही नहीं, सूफी संतों की दरगाहों को भी निशाना बनाया जा रहा है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बांग्लादेश के बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में भीड़ की हिंसा और गुप्त हमले एक बड़े संकट के रूप में उभरे हैं.
कार्टून | राजेंद्र धोड़पकर

यूपी का दरोगा बिहारी मुस्लिम की कमर पर मशीन बांधकर बोला- “ मशीन बता रही, बांग्लादेशी हो”
“पीटीआई” के मुताबिक, गाजियाबाद के कौशाम्बी थाने के एसएचओ को उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने उस वक्त फटकार लगाई, जब सोशल मीडिया पर उनके कुछ वीडियो सामने आए. इन वीडियो में वह कथित तौर पर मोहम्मद सादिक़ नामक एक व्यक्ति की कमर पर एक डिवाइस (यंत्र) बांधते हुए और यह दावा करते हुए दिख रहे थे कि इस मशीन ने उसे ‘बांग्लादेशी नागरिक’ के रूप में पहचान लिया है. इंदिरापुरम के सहायक पुलिस आयुक्त अभिषेक श्रीवास्तव ने कहा कि एसएचओ को चेतावनी दी गई है और भविष्य में इस तरह के तरीके न अपनाने के लिए आगाह किया गया है.
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि एसएचओ अजय शर्मा “सच सामने लाने के लिए उस व्यक्ति और उसकी बेटी पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे.” एसीपी श्रीवास्तव ने आगे कहा, “गलत हथकंडे अपनाने के लिए शर्मा को फटकार लगाई गई है.”
पुलिस सूत्रों के अनुसार, 23 दिसंबर को कौशाम्बी एसएचओ इलाके की झुग्गियों में तलाशी अभियान चला रहे थे, तभी उन्होंने एक व्यक्ति और उसकी बेटी से उनके मूल निवास स्थान के बारे में पूछा. लड़की ने पुलिस को बताया कि वे बिहार के अररिया जिले के रहने वाले हैं और अपने मोबाइल फोन पर दस्तावेज भी दिखाए. उसने यह भी बताया कि उसका परिवार 1986 से इन झुग्गियों में रह रहा है.
सूत्रों ने बताया कि इसके बावजूद, एसएचओ ने कथित तौर पर उन पर झूठ बोलने का आरोप लगाया और दावा किया कि वे बांग्लादेश से हैं. उन्होंने लड़की के पिता की कमर पर एक उपकरण बांध दिया और दावा किया कि मशीन ने उनकी पहचान बांग्लादेशी नागरिक के रूप में की है.
इस बीच, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तंज़ कसते हुए कहा, “यही उपकरण उस पुलिसकर्मी के सिर पर रखा जाना चाहिए ताकि देखा जा सके कि उसके ‘फर्स्ट फ्लोर’ (दिमाग) में सेरेब्रम (बुद्धि) है या नहीं.” ओवैसी ने इसे “नफरत और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह का स्पष्ट उदाहरण” बताया, क्योंकि पीड़ित का नाम मोहम्मद सादिक है. वायरल वीडियो में एक पुलिस अधिकारी को यह कहते सुना जा सकता है, “क्या तुम बांग्लादेशी हो? मशीन दिखा रही है कि तुम हो, है ना?” जिसके जवाब में वह व्यक्ति कह रहा है कि वह बिहार के अररिया जिले से है.
त्रिपुरा: मुस्लिम रिक्शा चालक पर हमला, जिंदा जलाने की कोशिश; आरोपियों ने बांग्लादेश की घटनाओं का हवाला दिया
ग़ज़ाला अहमद की रिपोर्ट है कि त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में गुरुवार को एक मुस्लिम रिक्शा चालक की हत्या के क्रूर प्रयास में, अज्ञात हमलावरों के एक समूह ने कथित तौर पर उसके साथ मारपीट की, उसे आधा रेत में दबा दिया और आग लगाने की कोशिश की.
पीड़ित दीदार हुसैन, जो पेशे से रिक्शा चालक है और अगरतला के अभयनगर का निवासी है, पर 1 जनवरी की शाम लगभग 6:30 बजे गंगाईल निवेदिता क्लब इलाके के पास चार से पांच अज्ञात हमलावरों ने हमला किया. हमले में जीवित बचने के बाद, हुसैन ने दुर्गा चौमुहानी आउटपोस्ट में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई. हुसैन ने बताया कि इस हमले में वह केवल इसलिए बच पाया, क्योंकि उसकी चीख-पुकार सुनकर हमलावर वहां से भाग निकले. शिकायत में कहा गया है कि वर्तमान में उसका इलाज चल रहा है.
एक स्थानीय निवासी, हबीब उर रहमान ने ‘मकतूब’ को बताया कि हुसैन का नाम पूछने के बाद उसे निशाना बनाया गया, जिसके बाद हमलावरों ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा पर सवाल उठाए. रहमान ने आगे कहा, “कथित तौर पर हुसैन ने हमलावरों से पूछा कि उनका अपराध क्या है, जिस पर उन्होंने सीमा पार ‘अल्पसंख्यकों’ पर हुए हमलों का हवाला दिया.”
पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, जिसमें धारा 109 (हत्या का प्रयास), धारा 115(2) (गंभीर चोट पहुंचाना), और धारा 326 (आगजनी या आग से मौत का कारण बनने की कोशिश) शामिल हैं. इस घटना के बाद अगरतला में व्यापक आक्रोश फैल गया है. आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई की मांग को लेकर कई लोगों ने विरोध मार्च निकाला.
मधुबनी: “बांग्लादेशी” बताकर मुस्लिम मजदूर की बेरहमी से पिटाई; हत्या के प्रयास का केस दर्ज
बिहार के मधुबनी जिले में कथित तौर पर एक मुस्लिम मजदूर को हमलावरों के एक समूह द्वारा “बांग्लादेशी” बताकर बेरहमी से पीटा गया. इस हमले में पीड़ित नूरशेद आलम को गंभीर चोटें आई हैं.
“मकतूब मीडिया” की खबर है कि आरोपियों ने कथित तौर पर यह दावा किया कि आलम के मोबाइल फोन में पाकिस्तान और बांग्लादेश के फोन नंबर सुरक्षित थे. हमले के एक वीडियो में एक हमलावर पीड़ित का फोन पकड़े हुए दिख रहा है और यह दावा कर रहा है कि इसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश के नंबर “सबूत” के तौर पर मौजूद हैं कि वह एक विदेशी नागरिक है. हालांकि, पुलिस ने बाद में स्पष्ट किया कि डिवाइस में कोई भी आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली है.
नारे लगाने के लिए बनाया दबाव
पीड़ित नूरशेद आलम, जिनके सिर पर पट्टी बंधी थी और शरीर पर चोट व सूजन के निशान थे, ने बताया कि हमला तब शुरू हुआ जब वह कुछ खास नारे पूरी तरह से नहीं लगा पाया. उसने कहा कि उससे “जय श्री राम” के नारे लगाने को कहा गया था, और उसकी झिझक के कारण उस पर संदेह किया गया और हिंसा की गई. नूरशेद का मानना है कि यह हमला उनकी मुस्लिम पहचान के कारण योजनाबद्ध तरीके से किया गया था. उसने बताया कि जब उन्हें पीटा जा रहा था, तब बार-बार उनकी राष्ट्रीयता को लेकर सवाल पूछे जा रहे थे.
एक आधिकारिक बयान में, पुलिस ने पुष्टि की है कि पीड़ित बिहार के सुपौल जिले का निवासी है, और उन दावों को खारिज कर दिया कि वह एक विदेशी नागरिक है. इस मामले में ‘हत्या के प्रयास’ की धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है.
मधुबनी के एसपी योगेंद्र कुमार ने विवरण देते हुए कहा कि अब तक दो नामजद आरोपियों की पहचान हो चुकी है और अन्य संलिप्त व्यक्तियों को पकड़ने के लिए एक विशेष टीम का गठन किया गया है, जिन्हें जल्द ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा.”
याद रहे कि कुछ हफ्ते पहले, छत्तीसगढ़ के एक दलित प्रवासी मजदूर की चोर बताकर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी. कथित तौर पर हमलावरों ने उससे सवाल किया था, “क्या तुम बांग्लादेशी हो?”
गिग वर्कर्स पर सलाउद्दीन: “यह तो सिर्फ एक ‘टीज़र’ था, असली फिल्म अभी बाकी है”
तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन के संस्थापक अध्यक्ष शेख सलाउद्दीन ने शनिवार को आरोप लगाया कि “ज़ोमैटो के सीईओ दीपिंदर गोयल खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं और संगठनात्मक स्तर पर वह दबाव में आ गए हैं.”
सलाउद्दीन ने कहा, “सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी पोस्ट के जरिए संकट पर दी गई गोयल की प्रतिक्रिया ने आम जनता को यह समझने में मदद की कि अंदरूनी तौर पर क्या चल रहा था. हालांकि, हमारे कई सवाल अब भी अननुत्तरित हैं.”
“द ट्रिब्यून” के अनुसार, उन्होंने कहा कि फूड डिलीवरी ऐप्स के सीईओ और गिग वर्कर्स एक साथ बैठकर चर्चा कर सकते हैं कि क्या सही है और क्या गलत हुआ, ताकि मामले को सुलझाया जा सके.
उन्होंने आगे कहा, “सीईओ की बार-बार धमकियों के बावजूद, गिग वर्कर्स ने शांतिपूर्ण हड़ताल जारी रखी, जिसके परिणामस्वरूप 60% ऑर्डर्स में देरी हुई. अगर समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो मैं आपको बता दूँ कि यह तो सिर्फ एक ‘टीज़र’ था, असली फिल्म अभी बाकी है.” उन्होंने कहा, “10-मिनट की डिलीवरी सभी डिलीवरी बॉयज़ के लिए मानसिक और शारीरिक तनाव है. इसे तत्काल हटाया जाना चाहिए.”
गौरतलब है कि हाल ही में गिग वर्कर्स द्वारा कम वेतन, लंबे कामकाजी घंटों और ‘अल्ट्रा-फास्ट’ डिलीवरी मॉडल के दबाव के विरोध में की गई हड़ताल के बाद, प्लेटफॉर्म-आधारित कार्यबल की स्थिति को लेकर इंटरनेट पर एक तीखी बहस छिड़ गई है.
यह बहस तब और तेज हो गई, जब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने एक वीडियो पोस्ट करते हुए ‘एक्स’ पर लिखा: ‘यह कोई शिकायत नहीं है. यह उन लोगों के साथ बातचीत है, जिनका जीवन हमारी रोजमर्रा की सुख-सुविधाओं को शक्ति देता है. यह दुखद है कि लाखों डिलीवरी राइडर्स को अपनी बात सुनाने के लिए विरोध करने पर मजबूर होना पड़ रहा है. ये प्लेटफॉर्म केवल एल्गोरिदम के कारण सफल नहीं हुए हैं, बल्कि मानवीय पसीने और श्रम की बदौलत सफल हुए हैं. गिग इकोनॉमी को शोषण की ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं बनने दिया जा सकता, जहां कोई पछतावा ही न हो.’ इस बीच ‘गिग-मॉडल’ के चर्चा में आने पर ज़ोमैटो के दीपिंदर गोयल ने अपना रुख दोहराया है. गोयल द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, ज़ोमैटो में डिलीवरी पार्टनर्स की औसत प्रति घंटा कमाई 2025 में साल-दर-साल लगभग 10.9 प्रतिशत बढ़कर 102 रुपये हो गई, जो 2024 में 92 रुपये थी. ये आंकड़े, जिनमें टिप्स (बख्शिश) शामिल नहीं हैं, गिग वर्कफोर्स की कमाई में लंबी अवधि में निरंतर वृद्धि को दर्शाते हैं.
गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर गिग मॉडल की वित्तीय संरचना साझा की. उन्होंने बताया कि यदि कोई पार्टनर महीने में 26 दिन और दिन में 10 घंटे काम करता है, तो उसकी कुल कमाई लगभग 26,500 रुपये होती है. ईंधन और रखरखाव के खर्च (लगभग 20 प्रतिशत) को घटाने के बाद, शुद्ध आय लगभग 21,000 रुपये प्रति माह रहती है. ये गणना लॉग-इन के कुल घंटों पर आधारित है, जिसमें वेटिंग टाइम (प्रतीक्षा समय) भी शामिल है.
गोयल ने काम के लचीले स्वरूप पर जोर देते हुए बताया कि ज़ोमैटो पर औसत डिलीवरी पार्टनर ने 2025 में 38 दिन काम किया और प्रति कार्य दिवस औसतन सात घंटे काम किया. पूरे वर्ष में केवल 2.3 प्रतिशत पार्टनर्स ने ही 250 से अधिक दिन काम किया.
गोयल ने कहा, “गिग भूमिकाओं के लिए पीएफ या गारंटीड वेतन जैसे पूर्णकालिक कर्मचारी लाभों की मांग करना उस उद्देश्य के अनुकूल नहीं है, जिसके लिए यह मॉडल बनाया गया है.” उन्होंने आगे कहा कि यह सिस्टम लंबे समय के लिए लॉक-इन के बजाय एक “लचीला, तात्कालिक कमाई का विकल्प” प्रदान करता है.
‘गिग वर्कर्स’ की चिंताओं को सुनने और उनके उचित समाधान की जरूरत
“द इंडियन एक्सप्रेस” ने लिखा है कि, पिछले एक दशक में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के व्यापक विस्तार के कारण देश भर में ‘गिग वर्कर्स’ (अस्थाई तौर पर काम करने वाले कर्मचारी) की संख्या में भारी उछाल आया है. नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2020-21 में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स की संख्या 77 लाख थी, जिसके 2029-30 तक बढ़कर 2.35 करोड़ होने का अनुमान है. कुछ उदाहरण इस पैमाने को स्पष्ट करते हैं: 2025-26 की दूसरी तिमाही में ज़ोमैटो के पास औसतन 5.5 लाख मासिक डिलीवरी पार्टनर्स थे, ब्लिंकिट के पास लगभग 3.39 लाख, जबकि 2023 में उबर के प्लेटफॉर्म का उपयोग करने वाले ड्राइवरों की संख्या 10 लाख को पार कर गई थी. इसके अलावा लॉजिस्टिक्स और अन्य डिलीवरी प्लेटफॉर्म भी हैं

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हालांकि, गैर-कृषि क्षेत्र में श्रम के इतने बड़े समूह के शामिल होने के साथ-साथ, श्रमिकों के कल्याण और उनकी नौकरी व आय की सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बढ़ी हैं. अस्थिर और अनिश्चित मजदूरी, वेतन संरचना में पारदर्शिता की कमी, लंबे कामकाजी घंटे और असुरक्षित कार्य स्थितियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं. पिछले कुछ दिनों में स्विगी, ज़ोमैटो और ज़ेप्टो जैसी कंपनियों के श्रमिकों द्वारा 10-मिनट की डिलीवरी सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर की गई हड़तालों ने इस मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया है. इसके भविष्य की राह पर सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है.
अपनी ओर से, केंद्र सरकार ने गिग वर्कर्स के कल्याण में सुधार की दिशा में कदम उठाए हैं. नए श्रम कोड के तहत, गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को औपचारिक रूप से परिभाषित और मान्यता दी गई है. ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता’ के तहत, एग्रीगेटर्स (कंपनियों) को अपने टर्नओवर का 1-2 प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान देना आवश्यक है, जो इन श्रमिकों के लिए कल्याणकारी योजनाओं का वित्तपोषण करेगा. ये श्रमिक अब सरकार द्वारा अधिसूचित दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य और मातृत्व लाभ के लिए भी पात्र हैं. इन कोडों में गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों से संबंधित मामलों पर सलाह देने के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड के तहत एक विशेषज्ञ समिति की परिकल्पना की गई है.
हालांकि, इसके अलावा सरकार के लिए किसी विशिष्ट समस्या—उदाहरण के लिए, डिलीवरी समय सीमा—को हल करने के लिए हस्तक्षेप करना शायद समझदारी भरा न हो. भारत जैसी श्रम-बहुल अर्थव्यवस्था में, जहां गैर-कृषि रोजगार के अवसर अभी भी पर्याप्त नहीं हैं, वहां मजदूरी वृद्धि पर दबाव बना रहने की संभावना है.
यह आवश्यक है कि कंपनियां स्वीकार करें कि गिग वर्कर्स उनके संचालन की रीढ़ हैं. भले ही वे अपने शेयरधारकों के लिए मुनाफा अधिकतम करना चाहते हों, लेकिन उन्हें श्रमिकों की चिंताओं को सुनना और उनका समाधान करना चाहिए. उदाहरण के लिए, भुगतान संरचनाओं को अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है.
किसी उपभोक्ता को थोड़ी “देरी” से मिलने वाली डिलीवरी से उसकी संतुष्टि में होने वाली मामूली कमी कंपनी के मुनाफे के लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं हो सकती, जितनी कि यह जल्दबाजी श्रमिकों के लिए गंभीर खतरे पैदा करती है. दोनों पक्षों (कंपनियों और श्रमिकों) द्वारा बातचीत के जरिए एक न्यायसंगत और उचित समाधान निकालने की आवश्यकता है.
पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन की मध्यस्थता की तसदीक की, बताया ‘शांति के लिए कूटनीति’
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन की भूमिका पर पाकिस्तान ने कहा कि बीजिंग का नेतृत्व दोनों देशों के संपर्क में था, भारत ने इसका खंडन किया था
पाकिस्तान ने चीन के इस दावे का समर्थन किया है कि बीजिंग ने मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के साथ तनाव कम करने में भूमिका निभाई थी. पाकिस्तान ने इसे “शांति के लिए कूटनीति” और व्यापक अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों का हिस्सा बताया है.
टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि चीनी नेतृत्व पाकिस्तान के नेतृत्व के लगातार संपर्क में था और “6 से 10 मई के उन तीन-चार दिनों में और शायद उससे पहले और बाद में भारतीय नेतृत्व के साथ भी कुछ संपर्क किए थे.” उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि उन संपर्कों ने, जो बहुत सकारात्मक कूटनीतिक आदान-प्रदान से चिह्नित थे, तापमान कम करने और क्षेत्र में शांति और सुरक्षा लाने में योगदान दिया. इसलिए मुझे यकीन है कि मध्यस्थता का चीनी विवरण सही है.”
यह बयान गुरुवार को चीनी विदेश मंत्री वांग यी के उस दावे के जवाब में आया जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत-पाकिस्तान तनाव उन हॉटस्पॉट मुद्दों में से था जिनमें 2025 में चीन ने “मध्यस्थता” की.
हालांकि भारत ने लगातार यह स्थिति बनाए रखी है कि मई में पाकिस्तान के साथ संघर्ष दोनों देशों की सेनाओं के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) के बीच सीधी बातचीत के माध्यम से सुलझाया गया था. नई दिल्ली ने लगातार कहा है कि भारत और पाकिस्तान से संबंधित मामलों में किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप के लिए कोई जगह नहीं है.
अंद्राबी ने चीन के मध्यस्थता के दावे को “शांति के लिए कूटनीति” बताया. उन्होंने आगे कहा, “यह समृद्धि के लिए, सुरक्षा के लिए कूटनीति थी, और यह कई अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की पहचान रही है जो उन तीन से चार दुर्भाग्यपूर्ण दिनों में उस संघर्ष को हल करने में लगे थे.”
मंगलवार को बीजिंग में एक संगोष्ठी में बोलते हुए वांग ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव उन गर्म मुद्दों की सूची में थे जिनमें 2025 में चीन ने मध्यस्थता की.
ऑपरेशन सिंदूर, जो 7 मई को भारत द्वारा शुरू किया गया था, ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया था. यह पहलगाम हमले का जवाब था जिसमें 26 नागरिक मारे गए थे. हमलों ने दोनों देशों के बीच चार दिनों तक गहन झड़पों को शुरू किया और 10 मई को सैन्य कार्रवाई रोकने की समझ के साथ समाप्त हुआ. संघर्ष के दौरान पाकिस्तान ने चीनी हार्डवेयर का इस्तेमाल किया, जो बीजिंग की रक्षा प्रौद्योगिकी पर उसकी निर्भरता को उजागर करता है.
पाकिस्तान की तरह भारत-बांग्लादेश क्रिकेट संबंध टूट सकते हैं, बीसीसीआई ने केकेआर को मुस्तफिजुर रहमान को टीम से निकालने को कहा
सीमा पार हालिया घटनाक्रम के बाद बीसीसीआई ने इस साल बांग्लादेश के निर्धारित दौरे को रोक दिया है और अंतिम निर्णय लेने से पहले सरकार की मंजूरी लेगी
बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) ने शुक्रवार को एक मीडिया विज्ञप्ति जारी की थी जिसमें कहा गया था कि वे सितंबर के पहले सप्ताह में तीन वनडे के बाद तीन टी20आई के लिए भारत की मेज़बानी करेंगे. हालांकि सीमा पार हालिया घटनाक्रम के बाद भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) ने श्रृंखला को रोकने का फैसला किया है और अंतिम निर्णय लेने से पहले भारत सरकार की मंजूरी लेगी.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बीसीसीआई उचित समय पर बीसीबी को भारत सरकार के फैसलों के बारे में बताएगी. हालांकि चल रहे राजनीतिक संकट से फरवरी में भारत और श्रीलंका में आगामी टी20 विश्व कप में बांग्लादेश की भागीदारी पर असर पड़ने की संभावना नहीं है.
एक शीर्ष बीसीसीआई अधिकारी ने कहा, “हम पिछले साल भी बांग्लादेश नहीं गए थे, बीसीबी ने अपना अंतर्राष्ट्रीय कैलेंडर जारी किया था, लेकिन यह संदिग्ध लग रहा है क्योंकि हमें किसी भी अन्य देश में खेलने के लिए भारत सरकार की मंजूरी की ज़रूरत है. जहां तक टी20आई विश्व कप का सवाल है, बांग्लादेश भारत में निर्धारित खेलों के अनुसार खेलेगा.”
शृंखला को रोकने का निर्णय उसी दिन आया जिस दिन इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) फ्रेंचाइजी कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) को बीसीसीआई द्वारा 2026 सीज़न से पहले बांग्लादेश के तेज़ गेंदबाज़ मुस्तफिजुर रहमान को अपने दस्ते से रिलीज़ करने के लिए सूचित किया गया.
केकेआर ने दिसंबर में इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के 2026 सीज़न से पहले नीलामी में 30 वर्षीय बांग्लादेशी तेज़ गेंदबाज़ को 9.5 करोड़ रुपये में ख़रीदा था.
बॉलीवुड सुपरस्टार और केकेआर के सह-मालिक शाहरुख़ खान भी तूफ़ान की आंख में आ गए, विभिन्न राजनीतिक नेताओं ने तीन बार की आईपीएल चैंपियन टीम से रहमान को हटाने की मांग की. हिंदू आध्यात्मिक नेता जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने 60 वर्षीय अभिनेता को “राष्ट्र-विरोधी” करार दिया और कहा कि उनका कोई चरित्र नहीं है.
शिवसेना नेता आनंद दुबे ने भी अभिनेता को निशाना बनाया और कहा कि वे “किसी भी कीमत पर” रहमान को खेलने की अनुमति नहीं देंगे. “अगर शाहरुख़ खान उसे खिलाते हैं और पैसा कमाते हैं, तो वह पैसा वहां आतंकवादियों का पोषण करने और हमारे देश के ख़िलाफ़ साज़िश रचने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. हम इसे किसी भी कीमत पर होने नहीं देंगे,” उन्होंने कहा.
“कोलकाता नाइट राइडर्स पुष्टि करता है कि बीसीसीआई/आईपीएल ने, आईपीएल के नियामक के रूप में, इसे आगामी इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) सीज़न से पहले मुस्तफिजुर रहमान को दस्ते से रिलीज़ करने का निर्देश दिया है,” केकेआर ने एक बयान में कहा जो बीसीसीआई सचिव देवजित सैकिया द्वारा तीन बार की आईपीएल चैंपियन के साथ निर्देश की घोषणा के तुरंत बाद आया.
बयान में कहा गया, “भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड के निर्देश पर उचित प्रक्रिया और परामर्श के बाद रिलीज़ किया गया है. बीसीसीआई कोलकाता नाइट राइडर्स को आईपीएल नियमों के अनुसार एक प्रतिस्थापन खिलाड़ी की अनुमति देगी, और आगे के विवरण उचित समय पर बताए जाएंगे.”
बीसीसीआई सचिव देवजित सैकिया ने पहले कहा था कि बीसीसीआई ने “हाल के घटनाक्रम” के कारण केकेआर को मुस्तफिजुर को रिलीज़ करने के लिए कहा था.
सुकमा, बीजापुर में 14 नक्सली मारे गए
रायपुर. छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले और पड़ोसी बीजापुर ज़िले में शनिवार सुबह डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड (डीआरजी) द्वारा दो अलग मुठभेड़ों में चौदह माओवादी मारे गए.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चौदह माओवादियों में से 12 दक्षिणी सुकमा में मारे गए, जबकि दो बीजापुर में मारे गए जहां मुठभेड़ सुबह 5 बजे शुरू हुई. सुकमा में मारे गए लोगों में कोंटा क्षेत्र समिति के सचिव मांगदू भी थे. सुकमा के पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण ने कहा कि कोंटा क्षेत्र समिति में सभी सशस्त्र माओवादी मारे गए.
मुठभेड़ ऐसे समय में आती है जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा माओवाद को समाप्त करने के लिए निर्धारित मार्च 2026 की समय सीमा नज़दीक आ रही है.
यह उस दिन भी आता है जब कई माओवादियों, जिनमें पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी बटालियन 1 के शीर्ष कमांडर बरसा देवा उर्फ बरसा सुक्का शामिल हैं, तेलंगाना के पुलिस प्रमुख बी. शिवधर रेड्डी के सामने आत्मसमर्पण करने वाले हैं. 2024 से राज्य में 500 से अधिक माओवादी मारे गए हैं.
कोंटा क्षेत्र समिति और सुकमा में किस्तराम क्षेत्र समिति महत्वपूर्ण थे क्योंकि ये क्षेत्र दशकों से प्रतिबंधित संगठन के सशस्त्र विंग पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की बटालियन 1 के प्रभुत्व में थे. “यह रमण्णा, हिडमा और बरसे देवा जैसे शीर्ष नक्सलियों के लिए प्रजनन स्थल था जिन्होंने आत्मसमर्पण किया है. यह क्षेत्र आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए एक महत्वपूर्ण पारगमन बिंदु भी था,” एक अधिकारी ने कहा.
मृतक वेट्टी मांगदू उर्फ मुक्का, एक डिवीजनल कमेटी मेंबर (डीवीसीएम), को पिछले साल जून में कोंटा में आईईडी विस्फोट में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक आकाश राव गिरिपुंजे की हत्या का मास्टरमाइंड कहा जाता है. “अतीत में कई बार मुक्का कई मुठभेड़ों में भागने में कामयाब रहा. वह एक कट्टर माओवादी था जो कई हिंसक अपराधों में शामिल था,” अधिकारी ने कहा.
रायपुर मॉल तोड़फोड़ मामले में छह बजरंग दल सदस्यों को जमानत मिली — और ‘हीरो का स्वागत’
क्रिसमस की पूर्व संध्या पर लकड़ी की लाठियों से लैस भीड़ ने मैग्नेटो मॉल में घुसकर क्रिसमस की सजावट के साथ तोड़फोड़ की थी
रायपुर. गुरुवार को रायपुर शहर में जेल से बाहर निकलते ही बजरंग दल के सदस्यों ने माला और “रघुपति राघव राजा राम” के नारों के साथ उनका स्वागत किया. उनकी जमानत का “जश्न मनाने” के लिए बजरंग दल के सदस्यों ने एक जुलूस निकाला जिसमें छह आरोपियों को कंधों पर उठाया गया.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जब बजरंग दल के राज्य संयोजक ऋषि मिश्रा से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि जुलूस निकालने में कुछ भी गलत नहीं है. “उनके ख़िलाफ़ नारे लगाने में क्या ग़लत है? पूरा मुद्दा छत्तीसगढ़ में उनके द्वारा धर्मांतरण से संबंधित है. सभी (दक्षिणपंथी) समूहों ने बंद का आह्वान करने का फैसला किया था लेकिन एक साज़िश की गई और हमारे सदस्यों को जेल में डाल दिया गया. तो इस विषय पर नारे लगाए जाएंगे,” उन्होंने कहा.
रायपुर में एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 29 दिसंबर को उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था. क्रिसमस की पूर्व संध्या पर दक्षिणपंथी समूहों ने कथित धार्मिक रूपांतरणों के विरोध में छत्तीसगढ़ में दिन भर के बंद का आह्वान किया था जो उनके दावे के अनुसार राज्य में हो रहे थे.
उसी दिन लकड़ी की लाठियों से लैस एक भीड़ मैग्नेटो मॉल में घुस गई और क्रिसमस की सजावट और प्रतिष्ठानों को तोड़फोड़ दिया. मॉल में सांता क्लॉज़, बारहसिंगा, स्लेज और स्नोमैन की आकृतियां थीं. मॉल के सुरक्षा गार्डों ने भीड़ को रोकने की कोशिश की लेकिन उन्हें दबा दिया गया.
उसी रात तेलीबंधा पुलिस स्टेशन में 30-40 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ बीएनएस धारा 331(3), 324(2), 115(2), 191(2) और 190 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी, जो अनधिकृत प्रवेश, जानबूझकर संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या उसके मूल्य/उपयोगिता को कम करने, चोट पहुंचाने, दंगा करने और ग़ैरक़ानूनी सभा से संबंधित हैं.
27 दिसंबर को तेलीबंधा पुलिस ने छह पुरुषों को गिरफ्तार किया और एक नाबालिग को हिरासत में लिया; छह पुरुषों ने पांच दिन जेल में बिताए. गिरफ्तारी से नाराज़ लगभग 300 बजरंग दल कार्यकर्ता तेलीबंधा पुलिस स्टेशन के बाहर एक मुख्य सड़क पर बैठ गए और लगभग नौ घंटे तक यातायात को अवरुद्ध किया. इस घटना में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है.
सर्व हिंदू समाज द्वारा 24 दिसंबर को बुलाया गया ‘छत्तीसगढ़ बंद’ कथित तौर पर बस्तर क्षेत्र के कांकेर ज़िले में एक परिवर्तित परिवार के व्यक्ति के दफन को लेकर दो समुदायों के बीच हालिया झड़प से शुरू हुआ था.
अजित पवार : 70 हजार करोड़ के घोटाले का आरोप लगाने वाले आज मेरे साथ सत्ता में हैं
महाराष्ट्र में उस समय राजनीतिक पारा गरमा गया, जब उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने पुणे और पिंपरी चिंचवाड़ नगर निगमों में कथित भ्रष्टाचार को लेकर भारतीय जनता पार्टी पर ताजा हमला बोला. इसके बाद भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के बीच तीखी बहस शुरू हो गई है.
सुधीर सूर्यवंशी की रिपोर्ट है कि पुणे और पिंपरी चिंचवाड़ प्रमुख राजनीतिक युद्ध के मैदान बनकर उभरे हैं, जहां भाजपा इन नगरीय निकायों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रही है, वहीं अजित पवार एनसीपी के इन पारंपरिक गढ़ों को वापस पाने के लिए ठोस प्रयास कर रहे हैं.
इससे पहले, अजित पवार ने आरोप लगाया था कि पिंपरी चिंचवाड़ में भाजपा के कार्यकाल के दौरान ‘वर्क ऑर्डर’ की कीमतों को बढ़ाकर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया गया था. उन्होंने अपने ऊपर लगे सिंचाई घोटाले के पुराने आरोपों पर भी भाजपा को पलटकर जवाब दिया और कहा, “जिन लोगों ने मुझ पर 70 हजार करोड़ के सिंचाई घोटाले का आरोप लगाया था, वे आज राज्य में मेरे साथ सत्ता साझा कर रहे हैं.”
भाजपा के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने अजित पवार को ऐसे आरोप लगाने के खिलाफ चेतावनी देते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी. चव्हाण ने पवार के भ्रष्टाचार के आरोपों पर नाराजगी जताते हुए कहा, “वह हमें मुंह खोलने पर मजबूर न करें, वरना बहुत सी बातें सार्वजनिक हो जाएंगी.” उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को अजित पवार को महायुति गठबंधन में शामिल करने के बारे में आगाह किया था. उन्होंने कहा, “आज यह एक गलत कदम साबित हुआ है. अब वह भाजपा पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं.”
इन टिप्पणियों का जवाब देते हुए एनसीपी के प्रदेश प्रवक्ता सूरज चव्हाण ने कहा कि भाजपा नेताओं को पहले निकाय चुनाव लड़ रहे अपने उम्मीदवारों के चुनावी हलफनामों की जांच करनी चाहिए. उन्होंने कहा, “वे हलफनामे बताएंगे कि भाजपा ने कितने गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को नामांकित किया है और क्यों.”
वरिष्ठ भाजपा मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा कि वह अजित पवार के आक्रामक रुख से हैरान हैं, क्योंकि दोनों दल राज्य और केंद्र में सत्तासीन गठबंधन का हिस्सा हैं. उन्होंने याद दिलाया कि महायुति के नेताओं ने सहमति जताई थी कि निकाय चुनाव अभियान के दौरान एक-दूसरे पर आरोप नहीं लगाएंगे. बावनकुले ने कहा, “हम अजित पवार के मुद्दे पर चर्चा के लिए महायुति नेताओं की एक और बैठक करेंगे.” वहीं, शिवसेना मंत्री उदय सामंत ने इस विवाद को कम महत्व देते हुए कहा कि पार्टी अजित पवार द्वारा किए गए कार्यों के लिए भाजपा की आलोचना नहीं करेगी.
एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि आने वाले दिनों में भाजपा और एनसीपी के बीच यह जुबानी जंग और तेज होने की संभावना है, क्योंकि दोनों दल पुणे और पिंपरी चिंचवाड़ पर नियंत्रण पाने के इच्छुक हैं. विश्लेषक ने बताया, “इन शहरों को लंबे समय तक एनसीपी का गढ़ माना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में भाजपा ने यहां सत्ता छीनी और बरकरार रखी. अब आगामी नगर निगम चुनावों में एनसीपी को अपनी जमीन वापस पाने का अवसर दिख रहा है.”
महाराष्ट्र में मतदान से पहले ही महायुति के 68 उम्मीदवार जीते, सर्वाधिक 44 भाजपा के
15 जनवरी को होने वाले महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों में भाजपा और उसके महायुति सहयोगियों ने 68 सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की है. इनमें से 44 उम्मीदवार अकेले भाजपा के हैं. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के 22 और अजित पवार की एनसीपी के 2 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं. “पीटीआई” के मुताबिक, सबसे अधिक निर्विरोध जीत ठाणे जिले के कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में हुई है, इसके बाद पुणे, पिंपरी चिंचवाड़, पनवेल, भिवंडी, धुले, जलगांव और अहिल्यानगर का नंबर आता है. इस बीच, विपक्षी दलों ने सत्ताधारी गठबंधन पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उम्मीदवारों को मैदान से हटने के लिए मजबूर करने हेतु धमकियों और पैसों का इस्तेमाल किया.
इंदौर: अब नल का पानी पीने से डर रहे लोग, गरीबों को खरीदना पड़ रहा पानी, मृतक संख्या 16 हुई
कोई घटना-दुर्घटना हो, आखिर में पिसता गरीब ही है. पिछले लगभग एक दशक से देश के सबसे स्वच्छ शहर का खिताब जीतने वाले मध्यप्रदेश के इंदौर में दूषित पानी की त्रासदी ने लोगों को नगर निगम की नल सप्लाई के प्रति आशंकित कर दिया है. लोग अब बोतलबंद पानी खरीदने को मजबूर हैं, जिससे सीमित आय वाले परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है.
अधिकारियों के अनुसार, भागीरथपुरा में दूषित पेयजल के कारण फैले उल्टी-दस्त (डायरिया) के प्रकोप से अब तक छह लोगों की मौत हो गई है और 200 से अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हैं. इस क्षेत्र में मुख्य रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग की बड़ी आबादी रहती है.
हालांकि, मौतों के आंकड़ों को लेकर विरोधाभास है, जो 10 से 16 के बीच बताए जा रहे हैं. मराठी मोहल्ला की निवासी सुनीता ने शनिवार को बताया, “हाँ, अब हमें नगर निगम के नलों से पानी पीने में डर लगता है. हमें सबूत चाहिए कि पानी साफ है, तभी हम इसे पिएंगे. मेरा परिवार फिलहाल बाजार से पानी के जार खरीद रहा है, जिसके लिए हमें प्रति जार 20 से 30 रुपये देने पड़ रहे हैं.”
उन्होंने दावा किया कि पिछले दो-तीन साल से इलाके के नलों में “गंदा पानी” आ रहा था, लेकिन निवासियों की शिकायतों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. सुनीता ने आगे कहा, “लंबे समय से हम पानी में फिटकरी डाल रहे हैं और पीने से पहले उसे उबाल भी रहे हैं.”
“पीटीआई” के मुताबिक, सफाई के लिए सराहे जाने वाले इस शहर में अविश्वास का स्तर इतना बढ़ गया है कि चाय की दुकान चलाने वाले लोग ग्राहकों को सुरक्षा का भरोसा दिलाने के लिए बोतलबंद पानी से चाय बना रहे हैं. चाय दुकानदार तुषार वर्मा ने बताया कि बोतलबंद पानी का उपयोग करने के बावजूद उन्होंने चाय की कीमत नहीं बढ़ाई है.
प्रशासन ने अब तक छह मौतों की पुष्टि की है, लेकिन इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने शुक्रवार को कहा था कि उनके पास इस प्रकोप से जुड़ी 10 मरीजों की मौत की सूचना है. वहीं, स्थानीय निवासियों का दावा है कि 6 महीने के एक बच्चे सहित कुल 16 लोगों की मौत हुई है.
इंदौर अपनी पानी की जरूरतों के लिए नर्मदा नदी पर निर्भर है, जिसका पानी लगभग 80 किलोमीटर दूर पड़ोसी खरगोन जिले के जलूद से पाइपलाइनों के जरिए लाया जाता है. शहर में हर दूसरे दिन नल के जरिए पानी की आपूर्ति की जाती है.
शुक्रवार को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि उन्होंने नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को “हटाने” (तबादला करने), और अतिरिक्त नगर निगम आयुक्त रोहित सिसोनिया व लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के प्रभारी अधीक्षक अभियंता संजीव श्रीवास्तव को निलंबित करने के आदेश दिए हैं. सरकार ने हाईकोर्ट के समक्ष अपनी स्टेटस रिपोर्ट में कहा है कि दूषित जल आपूर्ति के कारण फैली बीमारी अब प्रभावी नियंत्रण में है और स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए निरंतर निगरानी रखी जा रही है.
पहलगाम के बाद “चौकीदारवा कायर बा...’’ गाने के लिए नेहा सिंह राठौर हिरासत में
लखनऊ पुलिस ने लोक गायिका नेहा सिंह राठौर को हिरासत में ले लिया है. उन पर पहलगाम आतंकी हमले के बाद सोशल मीडिया पर कथित तौर पर आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट करने का आरोप है. इसके बाद पुलिस ने उन्हें नोटिस भेजकर अपना बयान दर्ज कराने के लिए कहा था.
“भास्कर” के मुताबिक, नोटिस के पालन में नेहा राठौर शनिवार को अपना बयान दर्ज कराने हजरतगंज कोतवाली पहुंचीं. बयान दर्ज होने के बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया, जहां वह रात भर रहेंगी.
पुलिस के अनुसार, 12 मई को नेहा सिंह राठौर के एक गाने “चौकीदारवा कायर बा... बेटियां किसानन खातिर बनल जनरल डायर बा...” को लेकर विवाद खड़ा हुआ था. उन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना जनरल डायर से करने का आरोप लगाया गया था.
इस गाने के विरोध में 20 मई को वाराणसी कमिश्नरेट के 3 ज़ोन के 15 थानों में हिंदू संगठनों और भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा नेहा सिंह राठौर के खिलाफ 500 से अधिक शिकायतें दर्ज कराई गईं. अकेले लंका थाने में ही 318 शिकायतें प्राप्त हुईं.
हरकारा डीप डाइव: प्रोफेसर अपूर्वानंद
हिंदू राष्ट्र 2026 से कितना ख़तरा है भारत को?
2025 भारत के लिए केवल एक और साल नहीं था. यह वह साल था जब हिंदू राष्ट्र की राजनीति के साथ हिंसा और नफरत ने एक नई तीव्रता हासिल की. मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं, बल्कि रोज़मर्रा की खबर बन गईं है.
हरकारा डीप डाइव में प्रोफेसर अपूर्वानंद के अनुसार, 2026 को लेकर किसी बड़े बदलाव की उम्मीद करना खुद को भ्रम में रखने जैसा है. उनके शब्दों में, सिर्फ कैलेंडर बदलेगा, दिशा वही रहेगी जो 2014 के बाद तय हो चुकी है.
उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान का भी ज़िक्र किया जिसमे भागवत का यह कहना कि हिंदू राष्ट्र के लिए संविधान की आवश्यकता नहीं है, जो इस दिशा को और स्पष्ट करता है. हिंदू राष्ट्र की यह कल्पना नई नहीं है. सावरकर और गोलवलकर पहले ही यह साफ कर चुके थे कि इस राष्ट्र में गैर-हिंदुओं को न तो बराबर नागरिक अधिकार मिलेंगे और न ही राजनीतिक और सांस्कृतिक समानता. लक्ष्य स्पष्ट है. मुसलमानों और ईसाइयों को अधिकारों से वंचित करना और उन्हें बहुसंख्यक की शर्तों पर जीने के लिए मजबूर करना.
इस प्रक्रिया में कानून का राज सबसे पहले कमज़ोर हुआ. देहरादून में एंजेल चकमा की हत्या हो या अख़लाक़ का मामला, बार-बार यह दिखा कि क़ानून या तो देर से आया या आया ही नहीं. पुलिस पर भरोसा कम होता गया और यह धारणा मज़बूत हुई कि पुलिस, सत्ता और हिंसक भीड़ एक ही तरफ खड़ी हैं. नारे लगते हैं कि पुलिस लाठी चलाए, सत्ता लाठी चलाए, और भीड़ खुद को संरक्षित महसूस करती है.
हिंसा के औचित्य के लिए नए तर्क गढ़े गए. अगर गलत व्यक्ति मारा गया तो उसे ग़लतफ़हमी कहा गया. अगर मुसलमान को मारने की मंशा थी, तो इरादे को सही ठहराया गया. बिना किसी निजी दुश्मनी के की गई हत्या को कम गंभीर बताया गया, जबकि यह स्थिति समाज के लिए कहीं अधिक ख़तरनाक है. पहचान, पहनावा, नाम, टोपी या शक्ल अब हिंसा के बहाने बन चुके हैं.
यह हिंसा केवल सड़क तक सीमित नहीं रही. ट्रेन, कॉलेज और विश्वविद्यालय जैसे सार्वजनिक स्थान भी इसके दायरे में आ गए. शिक्षा संस्थान ज्ञान के केंद्र नहीं रह गए हैं. वहां जाति, जेंडर और असमानता जैसे विषयों पर बात करना रोका जा रहा है और पाठ्यक्रमों के ज़रिये एक तय वैचारिक दृष्टि थोपी जा रही है. इसका नतीजा नई पीढ़ियों में उस मानसिक क्षति के रूप में सामने आ रहा है, जहां वे यथार्थ और कल्पना में फ़र्क़ करने की क्षमता खोती जा रही हैं.
हिंदुत्व अब उत्तर भारत तक सीमित परियोजना नहीं है. अरुणाचल, मणिपुर और असम जैसे राज्यों में भी बाहरी और अंदरूनी की राजनीति तेज़ हो गई है. हर समाज अपने ‘बाहरी’ को चिन्हित कर हिंसा को सही ठहराने लगा है. बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद सड़क स्तर पर इस हिंसा के औज़ार बने हुए हैं, जबकि आरएसएस वैचारिक आधार देता है और बीजेपी राजनीतिक गोलबंदी करती है. यह एक संगठित ढांचा है, जिसे प्रोफेसर अपूर्वानंद तकनीकी फासीवाद कहते हैं.
इस पूरी तस्वीर में सबसे बड़ा सवाल भविष्य को लेकर है. प्रोफेसर अपूर्वानंद के अनुसार, भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि समाज, खासकर बहुसंख्यक समाज, इस सच्चाई को कब स्वीकार करता है और प्रतिरोध का रास्ता कब चुनता है. 2026 सिर्फ एक नया साल नहीं होगा. वह इस बात की परीक्षा भी होगी कि भारत अपने भीतर चल रहे इस परिवर्तन को पहचान पाता है या नहीं.
रथिन रॉय : क्या बिहार और यूपी अपने बीमारू स्टेटस से निकल सकते हैं?
हरकारा डीप डाइव में अर्थशास्त्री डॉ.रथिन रॉय के साथ हुई बातचीत ने उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर प्रचलित धारणाओं पर कई अहम सवाल खड़े किए. इस चर्चा का केंद्र बिहार और उत्तर प्रदेश रहे, जिनकी आर्थिक स्थिति को अक्सर ऐतिहासिक मजबूरी मान लिया जाता है। डॉ. रॉय इस धारणा को सिरे से खारिज करते हैं.
उनके अनुसार 1950 के आसपास उत्तर प्रदेश और बिहार की अर्थव्यवस्था तमिलनाडु या आंध्र प्रदेश से कमज़ोर नहीं थी. कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र का संतुलन लगभग समान था. उत्तर भारत कभी सिर्फ कृषि आधारित क्षेत्र नहीं रहा. गाजियाबाद, कानपुर, आगरा, मुरादाबाद, मोदीनगर और गोरखपुर जैसे शहर मज़बूत औद्योगिक केंद्र थे. बिहार में रोहतास, मुंगेर और जमशेदपुर जैसे इलाके औद्योगिक पहचान रखते थे.
1975 के बाद उत्तर भारत में डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन शुरू हुआ, लेकिन इसके कारणों को लेकर गंभीर शोध नहीं हुआ. जातिवाद, कम्युनिज्म या सांप्रदायिक राजनीति जैसे आसान जवाब डॉ. रॉय को अपर्याप्त लगते हैं. उनका तर्क है कि अगर यही कारण होते तो तमिलनाडु, तेलंगाना या पश्चिम भारत में उद्योग क्यों टिके रहते.
1960 की फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी को भी अक्सर दोषी ठहराया जाता है, लेकिन डॉ. रॉय के मुताबिक़ इस नीति से सबसे ज़्यादा लाभ गुजरात और महाराष्ट्र को हुआ. दक्षिण भारत की सफलता का कारण यह नीति नहीं थी. 1991 के बाद आर्थिक सुधारों के बावजूद विकास उत्तर भारत में NCR तक सीमित रह गया, जबकि बिहार लगभग पूरी तरह बाहर रह गया.
एक बड़ा विरोधाभास यह है कि उत्तर भारत के पास सबसे बड़ी श्रम शक्ति और कम मज़दूरी है, फिर भी निवेश यहां नहीं आया. डॉ. रॉय इसके लिए स्थानीय एलिट्स को ज़िम्मेदार मानते हैं, जो अपने शहरों, प्रशासन और जीवन स्तर को बेहतर बनाने की मांग नहीं करते हैं. कमज़ोर अर्थव्यवस्था के साथ प्रशासन भी कमज़ोर होता गया और छोटे स्तर का भ्रष्टाचार हावी हो गया.
इस असंतुलन का असर माइग्रेशन में दिखता है. श्रम और पूंजी दोनों उत्तर से दक्षिण की ओर जा रहे हैं. बैंक डिपॉजिट का पैसा भी उत्तर भारत से बाहर चला जाता है. यह स्थिति दोनों क्षेत्रों के लिए नुकसानदेह है और एक जीरो सम गेम बन चुकी है.
समाधान के रूप में डॉ. रॉय का केंद्रीय सुझाव है, जहां घर, वहीं नौकरी. स्थानीय ज़रूरतों के लिए स्थानीय उत्पादन जैसे कपड़े, जूते, चश्मे, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव है, बिना भारी तकनीक या डिग्रियों के. टेक्सटाइल जैसे सेक्टर में स्केल पर काम करने की ज़रूता है, न कि छोटे पायलट प्रोजेक्ट्स की.
डॉ. रॉय के अनुसार समस्या का समाधान संभव है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, समृद्धि आधारित राजनीति और युवाओं की निर्णायक भूमिका ज़रूरी है. उत्तर भारत का पतन कोई ऐतिहासिक मजबूरी नहीं था, और उसका रास्ता भी अब बदला जा सकता है.
विनोद कुमार शुक्ल, एक उपस्थिति जो शब्दों से आगे जाती है
प्रख्यात हिंदी साहित्यकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल का दिसंबर 2025 में 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उनके जाने से हिंदी साहित्य की दुनिया में ऐसा शून्य पैदा हुआ है, जिसे आने वाले वर्षों में भर पाना लगभग असंभव है.
हरकारा डीप डाइव में कवि और लेखक मधुकर उपाध्याय, विनोद कुमार शुक्ल को केवल एक साहित्यकार के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यक्ति, एक गहरी संवेदना और एक चलती-फिरती जीवित कविता के रूप में याद करते हैं. उनकी यह बातचीत हमें शुक्ल जी के लेखन से आगे जाकर उनके होने, देखने और जीने के तरीक़े से रूबरू कराती है. वह बताते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल का जाना हिंदी साहित्य के लिए सिर्फ एक लेखक का जाना नहीं है. यह उस संवेदनशील दृष्टि का खो जाना है, जो भाषा को आदेश नहीं देती थी, बल्कि उसे खुला छोड़ देती थी. उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए हमेशा यह महसूस होता है कि कुछ ऐसा है जो शब्दों में पूरा नहीं आता, और शायद वही उनकी सबसे बड़ी ताक़त थी. उन्हें केवल कवि, कथाकार या लेखक कहना अधूरा है. उनकी रचनाएँ समय, भूगोल और तय अर्थों की सीमाओं को पार करती हैं. वे पाठक से यह अपेक्षा नहीं रखते थे कि उनकी बात को किसी एक सही ढंग से समझा जाए. वे आलोचना के लिए नहीं, बल्कि उस पाठक के लिए लिखते थे जो साथ चलना चाहता है, रुकना चाहता है, और देखना चाहता है. उनके लेखन में विस्मय और बालसुलभता का भाव लगातार मौजूद रहता है. वह पाठक को उसके भीतर की भूली हुई जगहों तक ले जाता है. मोहल्ले, जंगल, पेड़, मौसम, साधारण वस्तुएँ. सब कुछ ऐसा लगता है जैसे पहली बार देखा जा रहा हो. वे मानते थे कि दुनिया में मूल रूप से एक ही कविता और एक ही कहानी है, जिसे हर लेखक अपने ढंग से कहता है. उनकी रचनाओं में जानबूझकर छोड़ी गई खाली जगहें उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितने शब्द. वे विराम, मौन और अधूरेपन को भी बोलने देते थे. यही कारण है कि उनका लेखन उपदेश या दर्शन नहीं बनता, बल्कि एक साझा अनुभव की तरह सामने आता है. विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ना सुनने जैसा अनुभव है. ज़ोर से पढ़ने पर वह और गहरा हो जाता है. उनकी रचनाएँ पाठक को बेहतर मनुष्य बनने की ओर ले जाती हैं, बिना यह बताए कि बेहतर होना क्या है. आज जब हम उन्हें याद करते हैं, तो लगता है कि वे गए नहीं हैं. उनकी किताबें खोलते ही वे फिर से बोलने लगते हैं. शायद यही उनकी सबसे स्थायी उपस्थिति है.
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