03/02/2026: ट्रंप से टैरिफ डील नरेंदर का सरेंडर है या मास्टर स्ट्रोक | व्हाट्स एप को देशनिकाले की धमकी | ट्रंप के दावों से अलग है मास्को की समझ | दीपक चोपड़ा के रंगीले ख़त | लाल किले पर कब्जा मांगा
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियाँ
राहुल गांधी का अब तक का सबसे बड़ा हमला. प्रधानमंत्री मोदी पर नरवणे किताब. एपस्टीन फाइल्स और ट्रेड डील के जरिए समझौता करने का आरोप.
संसद में भारी हंगामा. राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोके जाने के बाद कांग्रेस के 8 सांसद पूरे सत्र के लिए निलंबित.
अमेरिका के साथ ट्रेड डील का सच. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट. 50 प्रतिशत टैरिफ का खतरा टला मगर रूस से तेल खरीद और किसानों के हितों पर सवाल.
सुप्रीम कोर्ट की मेटा और वॉट्सऐप को दो टूक. कहा अगर प्राइवेसी से खिलवाड़ बंद नहीं किया तो भारत छोड़कर जाना होगा.
कर्नाटक में बीजेपी राज के दौरान यूएपीए का दुरुपयोग. आर्टिकल 14 की रिपोर्ट में दावा. 10 में से 8 आरोपी मुस्लिम बनाए गए.
सोशल सेक्टर के बजट में भारी कटौती. इंडियास्पेंड का विश्लेषण. जीडीपी का हिस्सा एक दशक के निचले स्तर पर.
राहुल गांधी ने नरवणे, एपस्टीन और ट्रेड डील के जरिए छेड़ा अब तक का सबसे बड़ा हमला
संसद के बजट सत्र के दौरान विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरने के लिए एक बेहद आक्रामक और नई रणनीति अपनाई है. इस रणनीति का केंद्र बिंदु एक तीखा सवाल है— ‘क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरेंडर कर दिया है?’ मंगलवार को संसद के भीतर और बाहर जो कुछ घटा, वह महज हंगामा नहीं था, बल्कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री की छवि पर सीधा प्रहार करने की एक सोची-समझी कोशिश थी.
राहुल गांधी ने मंगलवार को लगातार दूसरे दिन तीन अलग-अलग लेकिन संवेदनशील मुद्दों—पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के ‘अप्रकाशित संस्मरण’, जेफ़री एपस्टीन फाइलों और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को एक धागे में पिरोते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि प्रधानमंत्री मोदी “Compromised” हैं (दबाव में हैं या समझौता कर चुके हैं).
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल गांधी की यह आक्रामकता अचानक नहीं आई है. बजट सत्र से पहले कांग्रेस ने विदेश नीति और मतदाता सूची जैसे मुद्दों को चुना था, लेकिन पिछले दो दिनों में राहुल ने अपनी पिच को और तीखा कर दिया है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह एक नई रणनीति है जिसका मक़सद राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बीजेपी का मुकाबला करने के बजाय, सीधे प्रधानमंत्री को ‘लायबिलिटी’ (बोझ) करार देना है.
रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी संसद में अपने संबोधन में जनरल नरवणे के 2020 के चीन गतिरोध वाले खुलासों, जेफ़री एपस्टीन फाइलों में मोदी के नाम के कथित संदर्भ और भारत-अमेरिका ट्रेड डील को एक साथ जोड़ना चाहते थे. उनका तर्क यह था कि पीएम मोदी अमेरिकी हितों के लिए भारतीय किसानों और देश की रणनीतिक स्वायत्तता (जैसे रूसी तेल की खरीद रोकना) का सौदा कर रहे हैं, क्योंकि वे “दबाव” में हैं.
संसद के बाहर संवाददाताओं से बात करते हुए राहुल ने बेहद गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा, “मोदी डरे हुए हैं. जो ट्रेड डील चार महीने से रुकी हुई थी, वह अचानक कल शाम को पूरी हो गई... मोदी और मैं इसका कारण जानते हैं. मोदी की छवि का गुब्बारा, जिसे हज़ारों करोड़ खर्च करके बनाया गया था, अब फटने वाला है.”
जब उनसे ‘दबाव’ के बारे में पूछा गया, तो राहुल ने कहा, “अमेरिका में अडानी के ख़िलाफ़ मामला है, जो सीधे मोदी के वित्तीय ढांचे को निशाना बनाता है. दूसरा है एपस्टीन फाइल्स. एपस्टीन फाइल्स में अभी और माल है... वह अभी रिलीज़ नहीं हुआ है. देश को समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री compromised हैं.”
इस सियासी लड़ाई का दूसरा बड़ा मोर्चा भारत-अमेरिका व्यापार समझौता है. द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने “पूरी तरह सरेंडर” कर दिया है.
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने राष्ट्रपति ट्रंप के सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला दिया, जिसमें ट्रंप ने दावा किया था कि पीएम मोदी के अनुरोध पर यह ट्रेड डील तुरंत प्रभाव से लागू हो रही है. जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर लिखा, “ट्रंप का यह दावा साफ़ करता है कि पीएम मोदी ने ‘पूरी तरह सरेंडर’ कर दिया है. यह अनुरोध निस्संदेह हेडलाइंस बदलने के लिए किया गया था क्योंकि राहुल गांधी ने उनकी कायरता उजागर कर दी थी.”
वहीं, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस डील के आंकड़ों पर सवाल उठाए. द टेलीग्राफ के अनुसार, थरूर ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप भारत द्वारा 500 अरब डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने की बात कर रहे हैं, जबकि हमारा कुल आयात बिल ही 700 अरब डॉलर है. हम अमेरिका पर 500 अरब डॉलर कैसे खर्च कर सकते हैं?” विपक्ष का आरोप है कि अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए बाज़ार खोलकर सरकार ने भारतीय किसानों के हितों का सौदा किया है.
संसद के भीतर गतिरोध तब और बढ़ गया जब राहुल गांधी को बोलने से रोक दिया गया. द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी ने मंगलवार (3 फ़रवरी, 2026) को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को एक कड़ा पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया.
राहुल गांधी ने अपने पत्र में लिखा कि उन्होंने संसदीय परंपराओं का पालन करते हुए उस लेख को ‘प्रमाणित’ किया था जिसमें जनरल नरवणे के संस्मरण का ज़िक्र था. इसके बावजूद उन्हें बोलने न देना “लोकतंत्र पर धब्बा” है. उन्होंने लिखा, “संसदीय इतिहास में पहली बार सरकार के इशारे पर नेता प्रतिपक्ष को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोका गया है. यह मेरे अधिकारों का हनन है.”
रिपोर्ट के मुताबिक, जब स्पीकर ने राहुल के बजाय टीडीपी सांसद हरीश बालयोगी को बोलने का मौका दिया, तो विपक्षी सांसदों ने इसका कड़ा विरोध किया और सदन की कार्यवाही बाधित हुई.
इंडियन एक्सप्रेस और पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने संसद भवन परिसर में विपक्ष की मंशा पर सवाल उठाए.
अनुराग ठाकुर ने कहा, “सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस और विपक्ष भारत के हित के साथ हैं या उसके ख़िलाफ़?” उन्होंने आरोप लगाया कि जब अमेरिका ने भारत पर टैरिफ लगाया था, तब विपक्ष जश्न मना रहा था और अब जब ट्रेड डील हो रही है, तब भी वे विरोध कर रहे हैं. ठाकुर ने कहा, “यह भारत विरोधी मानसिकता राहुल गांधी और कांग्रेस में साफ़ दिखाई देती है. वे संसद को चलने भी नहीं दे रहे हैं.”
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी राहुल गांधी पर ‘नकारात्मक मानसिकता’ रखने का आरोप लगाया और कहा कि सरकार संसद में चर्चा के लिए तैयार थी, लेकिन विपक्ष ने हंगामा करके ऐसा नहीं होने दिया.
अडानी, एपस्टीन फाइल्स: राहुल गांधी ने क्यों कहा, ‘मोदी पर भयंकर दबाव और अमेरिकी डील के जरिए किसानों का सौदा कर दिया’
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मंगलवार को आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिकी दबाव के आगे झुक गए हैं और उन्होंने इस समझौते के माध्यम से भारतीय किसानों की कड़ी मेहनत का “सौदा” कर लिया है.
‘टेलीग्राफ वेब डेस्क और पीटीआई’ के अनुसार, संसद भवन परिसर में पत्रकारों से चर्चा करते हुए—जहां उन्हें पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण के एक लेख का हवाला देने पर लोकसभा में बोलने की अनुमति नहीं दी गई थी—राहुल ने कहा कि इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि विपक्ष के नेता को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने की अनुमति नहीं दी गई.
कांग्रेस नेता ने कहा, “हमें यह समझने की जरूरत है कि लगभग चार महीने से अटका हुआ व्यापार समझौता कल शाम अचानक कैसे तय हो गया.” उन्होंने आगे कहा कि “प्रधानमंत्री मोदी पर भारी दबाव था.” जब उनसे पूछा गया कि वह किस तरह के दबाव की बात कर रहे हैं, तो राहुल ने आरोप लगाया कि अमेरिका में उद्योगपति गौतम अडानी के खिलाफ एक मामला है और ‘एपस्टीन फाइल्स’ में अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी है.
उन्होंने कहा कि भारतीय किसानों को यह समझना चाहिए कि इस भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के जरिए उनकी कड़ी मेहनत के साथ-साथ उनके “खून-पसीने” का भी सौदा कर दिया गया है. उन्होंने यह दावा भी किया कि पूरे देश को “बेच दिया गया है.” राहुल गांधी ने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी डरे हुए हैं. उन्होंने दबाव में आकर इस समझौते पर सहमति जताई है.”
राहुल ने कहा कि नरेंद्र मोदी पर भयंकर दबाव है. उनका जो इमेज का गुब्बारा है, जो हजारों-करोड़ों रुपये से बनाया गया था, वो फूट सकता है. नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि पूर्व आर्मी चीफ एमएम नरवणे का बयान मुद्दा नहीं है. ये साइड शो है, इस बात को मैं भी जानता हूं और वह भी जानते हैं. मुख्य बात यह है कि हमारे प्रधानमंत्री को कॉम्प्रोमाइज्ड कर दिया गया है. किसने किया है, कैसे किया है यह हिंदुस्तान की जनता को सोचना है.
मंगलवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान, राहुल गांधी द्वारा लेख का हवाला देने के प्रयास पर हुए हंगामे के बीच लोकसभा की कार्यवाही दोपहर 3 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई.
राहुल गांधी ने सोमवार के अध्यक्ष (स्पीकर) के फैसले का हवाला दिया और बोलने की अनुमति मिलते ही लेख की एक प्रति को प्रमाणित किया. उन्होंने संसदीय नियमों के तहत हस्ताक्षरित प्रति जमा करते हुए कहा, “मैंने इसे प्रमाणित कर दिया है.”
किसी दस्तावेज़ को प्रमाणित करने के लिए, सदस्य को एक हस्ताक्षरित प्रति जमा करनी होती है, जिसमें यह पुष्टि की गई हो कि उनकी जानकारी के अनुसार यह सही है. सदन की अध्यक्षता कर रहे कृष्ण प्रसाद टेन्नेटी ने गांधी को दस्तावेज़ पटल पर रखने के लिए कहा और कहा, “हम इसकी जांच करेंगे और फिर जवाब देंगे.”
भाजपा सांसदों द्वारा राहुल गांधी के इस मुद्दे को उठाने पर आपत्ति जताने के बाद, टेन्नेटी ने सदन की कार्यवाही 3 बजे तक के लिए स्थगित कर दी.
लोकसभा में बोलते हुए राहुल गांधी ने कहा, “राष्ट्रपति के भाषण में एक बहुत महत्वपूर्ण विषय राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित है—पाकिस्तानियों, चीनियों और हमारे बीच का संबंध. इस लेख में, जिसे मैंने प्रमाणित किया है, एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु है. यह प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया के बारे में बताता है. हमारे राष्ट्रपति का अभिभाषण उस मार्ग के बारे में था जो भारत को अपनाना है. आज विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मामलों का मुख्य मुद्दा चीन और अमेरिका के बीच का संघर्ष है. यह हमारे राष्ट्रपति के अभिभाषण का केंद्र है. मैं केवल इतना कह रहा हूँ कि मुझे चीन और भारत के बीच जो हुआ और हमारे प्रधानमंत्री ने उस पर कैसी प्रतिक्रिया दी, उस पर बयान देने दिया जाए. मुझे रोका क्यों जा रहा है?”
कांग्रेस के 8 सदस्य बजट सत्र तक के लिए निलंबित
मंगलवार को लोकसभा के आठ कांग्रेस सदस्यों को उनके “अमर्यादित व्यवहार” के लिए निलंबित कर दिया गया. सरकार के अनुसार, इन सदस्यों ने सदन में बार-बार व्यवधान के दौरान कागज फाड़े और उन्हें अध्यक्ष की आसंदी की ओर फेंका. यह कार्रवाई उस समय हुई जब कई बार स्थगन के बाद दोपहर 3 बजे लोकसभा की कार्यवाही फिर से शुरू हुई और आसन पर मौजूद दिलीप सैकिया ने दुर्व्यवहार के लिए कांग्रेस के आठ सांसदों के नाम लिए. संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बजट सत्र की शेष अवधि (जो 2 अप्रैल को समाप्त होने वाला है) के लिए उनके निलंबन का प्रस्ताव पेश किया, जिसे सदन ने ध्वनि मत से पारित कर दिया. निलंबित सदस्यों में हिबी ईडन, अमरिंदर सिंह राजा वारिंग, मणिकम टैगोर, गुरजीत सिंह औजला, किरण कुमार रेड्डी, प्रशांत पादोले, एस. वेंकटरामन और डीन कुरियाकोस शामिल हैं.
‘द टेलीग्राफ’ के अनुसार, इस टकराव ने 2024 के शीतकालीन सत्र की यादें ताजा कर दीं, जो हाल के संसदीय इतिहास के सबसे अशांत सत्रों में से एक था. उस दौरान संसद परिसर में सुरक्षा चूक के बाद 146 विपक्षी सांसदों को निलंबित किया गया था और एथिक्स कमेटी द्वारा टीएमसी की महुआ मोइत्रा को निष्कासित किया गया था. संसद के बाहर, विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सदस्यों ने निलंबन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह सदन में मतभेदों को सुलझाने के बजाय चर्चा को दबाने के लिए अपने बहुमत का इस्तेमाल कर रही है.
हरकारा डीप डाइव | नरवणे की किताब
क्या मोदी ने चीनी आक्रामकता के सामने अपनी जिम्मेदारी से मुँह फेर लिया था?
पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की पुस्तक के अंशों को लेकर संसद में हुए हंगामे पर हरकारा डीप डाइव में एक विस्तृत चर्चा हुई. इस बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार राजेश चतुर्वेदी और निधीश त्यागी ने पूरे घटनाक्रम, उसके राजनीतिक संदर्भ और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों पर विस्तार से बात की.
बातचीत की शुरुआत संसद में हुए घटनाक्रम से हुई. कैरवन मैगज़ीन में प्रकाशित नरवणे की पुस्तक के अंशों का हवाला देते हुए राहुल गांधी लोकसभा में बोलना चाहते थे. उन्होंने स्पष्ट किया था कि वे पुस्तक नहीं, बल्कि मैगज़ीन में प्रकाशित आर्टिकल का संदर्भ दे रहे हैं. इसके बावजूद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने नियम 349 का हवाला देते हुए आपत्ति की और कहा कि पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए उसका उल्लेख नहीं किया जा सकता.रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह कई बार खड़े हुए. स्पीकर ओम बिरला की ओर से भी रोक लगाई गई. अंततः राहुल गांधी को पढ़ने की अनुमति नहीं मिली और सदन कई बार स्थगित हुआ.
हरकारा डीप डाइव में राजेश चतुर्वेदी ने कहा कि पुस्तक मुद्रित हो चुकी है, उसकी मार्केटिंग भी चल रही है, लेकिन रक्षा मंत्रालय की स्वीकृति के कारण औपचारिक प्रकाशन रोका गया है. मंत्रालय पंक्ति-पंक्ति की जांच कर रहा है. उनका तर्क था कि जब सामग्री सार्वजनिक डोमेन में आ चुकी है और मीडिया में छप चुकी है, तो संसद में उस पर चर्चा रोकना परंपरा के अनुरूप नहीं दिखता.
चर्चा के दौरान पुस्तक के उन अंशों पर भी बात हुई जिनमें चीन सीमा की स्थिति का उल्लेख है. नरवणे ने लिखा है कि चीनी टैंक लगभग 500 मीटर तक आ गए थे. उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और रक्षा मंत्री से निर्देश मांगे. लगभग दो से ढाई घंटे तक स्पष्ट आदेश नहीं मिला. अंततः उन्हें कहा गया कि “जो उचित लगे, आप करें. ” अपने संस्मरण में उन्होंने लिखा कि मानो “गरम आलू” उनके हाथ में थमा दिया गया हो. उन्होंने यह भी लिखा कि उस समय उन्होंने स्वयं से पूछा कि क्या वे युद्ध शुरू करना चाहते हैं और उन्हें अकेलापन महसूस हुआ.
गलवान झड़प का ज़िक्र करते हुए पुस्तक में लिखा गया कि भारतीय सैनिकों को खुले में रखा गया और उनके साथ बर्बरता हुई. चर्चा में यह भी सामने आया कि अग्निवीर योजना को लेकर नरवणे ने 75 प्रतिशत जवानों को लंबे समय तक रखने का सुझाव दिया था, जबकि सरकार ने 25 प्रतिशत को स्थायी रखने का निर्णय लिया. ये बातें पहले पीटीआई के हवाले से भी सामने आ चुकी थीं.
राजेश चतुर्वेदी ने बातचीत में कहा कि अगर संसद में चर्चा होने दी जाती तो सरकार अपना पक्ष रख सकती थी और मामला सीमित रह सकता था. रोक लगाने से उल्टा संदेह बढ़ा. चर्चा में ऐतिहासिक संदर्भ भी आए. 1962 के युद्ध के दौरान संसद में बहस हुई थी. कारगिल के बाद जनरल वी.पी. मलिक की पुस्तक आई थी और उस पर चर्चा हुई थी. संसद में अखबारों और प्रकाशित रिपोर्टों का हवाला देना कोई नई बात नहीं है. ऐसे में नियमों का हवाला देकर रोक लगाने को असामान्य बताया गया.
बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सेना के मनोबल से जुड़ा था. यह कहा गया कि सीमा पर तैनात सैनिक स्पष्ट राजनीतिक निर्देश की अपेक्षा करते हैं. यदि सेना प्रमुख अपने संस्मरण में लिखते हैं कि वे निर्णय की घड़ी में अकेले महसूस कर रहे थे, तो यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि नेतृत्व और जवाबदेही का प्रश्न है.
अंत में यह निष्कर्ष सामने आया कि मामला केवल एक पुस्तक या संसद की कार्यवाही का नहीं है. यह राष्ट्रीय सुरक्षा, पारदर्शिता, राजनीतिक छवि और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच संतुलन का सवाल है.
एंडी मुखर्जी : मोदी को अच्छी यूएस ट्रेड डील मिली, लेकिन इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ी?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘टैरिफ जेल’ में पांच महीने से अधिक समय बिताने के बाद, भारत आख़िरकार आज़ाद हो गया है. भारत के मैन्युफैक्चरिंग उद्योगों पर जो 50% का दंडात्मक शुल्क मंडरा रहा था, वह अब घटकर 18% हो जाएगा. यह वियतनाम पर लगने वाले 20% शुल्क से भी थोड़ा बेहतर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह एक बेहतरीन ‘पीआर मोमेंट’ है, जिसे वे इस उदाहरण के तौर पर पेश कर सकते हैं कि सब्र का फल मीठा होता है.
लेकिन इससे पहले कि नई दिल्ली में जश्न शुरू हो, ट्रंप द्वारा सोशल मीडिया पर घोषित और मोदी द्वारा पुष्टि किए गए इस सौदे को हस्ताक्षरों की ज़रूरत है. साथ ही इस स्पष्टता की भी कि दोनों नेताओं ने वास्तव में किन शर्तों पर सहमति जताई है. ब्लूमबर्ग के एंडी मुखर्जी लिखते हैं कि “शैतान विस्तार में छिपा है”.
भारत के लिए अपने सबसे बड़े निर्यात बाज़ार तक पहुँच खोने का डर पूरी तरह बुरा नहीं रहा. इसने नई दिल्ली के मंत्रियों और नौकरशाहों के अलगाववादी अहंकार को तोड़ा है. घरेलू उद्योगों के दबाव के कारण ही ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ अलग व्यापार समझौते हुए हैं. लेकिन असली पेंच ट्रंप के साथ हुई डील की शर्तों में है.
ट्रंप ने अपनी पोस्ट में कहा है कि मोदी “रूसी तेल खरीदना बंद करने और अमेरिका व संभावित रूप से वेनेजुएला से बहुत ज़्यादा तेल खरीदने पर सहमत हुए हैं.” हालांकि, मोदी की तरफ से रूसी तेल का कोई ज़िक्र नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि क्या उन्होंने तत्काल रोक पर सहमति दी है या धीरे-धीरे कमी करने पर? रिलायंस के मुकेश अंबानी की रिफाइनरी वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को तो संभाल सकती है, लेकिन क्या सरकारी रिफाइनरियों को ईरानी तेल की ओर जाने की अनुमति मिलेगी, जबकि ट्रंप ने तेहरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ की धमकी दी है?
ट्रंप ने यह भी दावा किया है कि भारत अमेरिका के ख़िलाफ़ अपने टैरिफ और नॉन-तैरिफ बैरियर्स को “शून्य” कर देगा और 500 बिलियन डॉलर से अधिक के अमेरिकी ऊर्जा, तकनीक, कृषि और कोयला उत्पादों को खरीदेगा. क्या मास्को पर निर्भरता कम करने के लिए हथियार प्रणालियाँ भी इस सौदे का हिस्सा हैं? क्या अमेज़न जैसे अमेरिकी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म को अपनी इन्वेंट्री रखने की अनुमति मिलेगी?
कृषि का मुद्दा सबसे संवेदनशील है. क्या मोदी जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) खाद्य फसलों पर प्रतिबंध में ढील देंगे, जबकि उन्हें घर में उगाने की अनुमति नहीं है? भारत पेट्रोल में इथेनॉल मिलाता है, जो अमेरिकी मक्का की खपत कर सकता है, लेकिन भारतीय किसानों को यह समझाना मुश्किल होगा. 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद सरकार ने स्थानीय आबादी के लिए गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी थी. विपक्षी दल कृषि पर मोदी द्वारा दी गई किसी भी छूट की बारीकी से जांच करेंगे.
वीज़ा के मोर्चे पर, भारतीय राजनेताओं और मध्यम वर्ग के लिए अमेरिका का आकर्षण कम नहीं हुआ है. चूंकि एच-1बी वर्क वीज़ा में भारतीयों की हिस्सेदारी 70% है, इसलिए ट्रंप की तरफ से किसी भी रियायत का मोदी को घर में बड़ा सियासी फ़ायदा मिलेगा.
भारत-अमेरिका की 18% टैरिफ डील और वह कड़वा सच जिसे जानना ज़रूरी है
लंबे इंतज़ार के बाद भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते पर सहमति बन गई है. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में सुनीता नट्टी की रिपोर्ट और विश्लेषण के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पीएम मोदी द्वारा घोषित इस डील में एक बड़ी राहत यह है कि अमेरिका द्वारा लगाया जाने वाला जवाबी टैरिफ दंडात्मक 50% से घटकर 18% हो गया है. हालांकि, इस डील के पीछे एक कड़वा सच छिपा है.
टैरिफ का बोझ कौन उठाता है?
विश्लेषण बताता है कि टैरिफ वास्तव में एक ‘ओन गोल’ (आत्मघाती गोल) की तरह हैं. यह एक मिथक है कि निर्यातक ये शुल्क चुकाते हैं. कील इंस्टीट्यूट फॉर द वर्ल्ड इकॉनमी के अध्ययन के अनुसार, अमेरिकी आयातक और उपभोक्ता ही हालिया टैरिफ लागत का 96% हिस्सा चुका रहे हैं. इसका मतलब है कि टैरिफ से होने वाली रिकॉर्ड कमाई वास्तव में अमेरिकी परिवारों की जेब से ही निकल रही है. 2026 में, प्रत्येक अमेरिकी परिवार पर इसका अनुमानित बोझ $1,300 बढ़ने वाला है. हालांकि, भारत अपने क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बेहतर स्थिति में है. वियतनाम और बांग्लादेश पर 20% और चीन पर 34% अमेरिकी टैरिफ है, जबकि भारत के लिए यह 18% है. इसका मतलब है कि भारतीय कपड़ा, रत्न, आभूषण और ऑटो कंपोनेंट निर्यात अन्य देशों की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी होंगे.
ट्रंप ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच व्यापार 500 अरब डॉलर को पार कर जाएगा. विश्लेषकों का मानना है कि यदि तेल और गैस निर्यात को भी शामिल कर लिया जाए, तो अगले पांच वर्षों में यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. शेयर बाज़ार ने भी इस अनिश्चितता के ख़त्म होने पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है और निफ्टी व सेंसेक्स में उछाल देखा गया.
नई दिल्ली के साथ ट्रंप के व्यापार समझौते के बावजूद, रूसी तेल आयात बंद करने पर भारत की ओर से कोई बयान नहीं: क्रेमलिन
क्रेमलिन ने मंगलवार को कहा कि उसने रूसी तेल की खरीद बंद करने के बारे में भारत की ओर से कोई बयान नहीं सुना है. यह स्पष्टीकरण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि नई दिल्ली वाशिंगटन के साथ एक व्यापार समझौते के हिस्से के रूप में ऐसी खरीद को रोकने के लिए सहमत हो गई है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को भारत के साथ एक व्यापारिक सौदे की घोषणा की, जो भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ (आयात शुल्क) को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करता है. इसके बदले में भारत रूसी तेल की खरीद बंद करने और व्यापारिक बाधाओं को कम करने पर सहमत हुआ है.
‘रॉयटर्स’ के मुताबिक, क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा कि रूस भारत के साथ संबंधों पर ट्रंप की टिप्पणियों का बारीकी से विश्लेषण कर रहा है. जब उनसे सीधे तौर पर पूछा गया कि क्या भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद करने का फैसला किया है, तो पेसकोव ने कहा: “फिलहाल, हमने इस मुद्दे पर दिल्ली की ओर से कोई बयान नहीं सुना है.”
पेसकोव ने पत्रकारों से कहा, “हम अमेरिका-भारत द्विपक्षीय संबंधों का सम्मान करते हैं. लेकिन हम रूस और भारत के बीच उन्नत रणनीतिक साझेदारी के विकास को भी उतना ही महत्व देते हैं.” उन्होंने कहा, “यह हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है, और हम दिल्ली के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को और विकसित करने का इरादा रखते हैं.”
2022 में यूक्रेन में मास्को के युद्ध शुरू होने के बाद भारत रियायती रूसी समुद्री कच्चे तेल का शीर्ष खरीदार बन गया था. इससे पश्चिमी देशों में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी, जिन्होंने रूस के ऊर्जा क्षेत्र को उन प्रतिबंधों के साथ निशाना बनाया है जिनका उद्देश्य मास्को के राजस्व को कम करना है ताकि युद्ध के लिए धन जुटाना कठिन हो जाए.
एक भारतीय सरकारी अधिकारी ने कहा कि भारत इस समझौते के तहत अमेरिका से पेट्रोलियम, रक्षा सामान और विमान खरीदने के लिए सहमत हो गया है, जबकि अपने संरक्षित कृषि क्षेत्र को आंशिक रूप से खोल दिया है. अधिकारी के अनुसार, नई दिल्ली ने वाशिंगटन की तत्काल मांगों को पूरा करने के लिए आयातित कारों पर टैरिफ भी कम कर दिए हैं.
ट्रंप ने कहा कि भारत ऊर्जा, कोयला, प्रौद्योगिकी, कृषि और अन्य उत्पादों सहित $500 बिलियन से अधिक की अमेरिकी वस्तुओं की खरीद करेगा. उन्होंने इसके लिए किसी समय-सीमा का उल्लेख नहीं किया.
ट्रंप की घोषणा और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘एक्स’ पर पोस्ट के बावजूद, सौदे का विवरण अभी भी बहुत कम है. ‘रॉयटर्स’ ने बताया कि रूसी तेल आयात रोकने से पहले भारतीय रिफाइनरियों को रूस के साथ जारी सौदों को पूरा करने के लिए एक ‘वाइंड-डाउन’ (समापन) अवधि की आवश्यकता होगी, और उन्हें अब तक सरकार द्वारा इस तरह के आयात को रोकने का आदेश नहीं दिया गया है.
भारत के सोशल सेक्टर बजट में लगातार गिरावट: जीडीपी का हिस्सा एक दशक के निचले स्तर पर
रिपोर्टर: अवनी कपूर, इंडियास्पेंड
भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सामाजिक क्षेत्र के बजट का हिस्सा अब एक दशक के निचले स्तर पर है—यह 2014-15 से भी कम है, जब नरेंद्र मोदी सरकार ने अपना पहला बजट पेश किया था. इंडियास्पेंड में अवनि कपूर के विश्लेषण के अनुसार, सरकार द्वारा राजकोषीय घाटे को कम करने के प्रयासों ने सामाजिक क्षेत्र में निवेश करने की क्षमता को सीमित कर दिया है.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2026-27 के बजट में कुल व्यय का 18% सामाजिक क्षेत्र के लिए आवंटित किया है. जीडीपी के हिस्से के रूप में देखें तो यह महज़ 2.5% है. यहां तक कि स्वास्थ्य के लिए भी खर्च कम बना हुआ है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2017) ने 2025 तक कुल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण 2025 के अनुसार यह अभी भी 1.7% पर है.
बजट भाषणों में लगातार बुनियादी ढांचे के नेतृत्व वाले विकास पर ज़ोर दिया गया है. लेकिन इंडियास्पेंड का विश्लेषण बताता है कि कई बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं का फंड पूरा खर्च ही नहीं हो पा रहा है. 2024-25 में, आठ प्रमुख मंत्रालयों ने अपने बजट का 0.3% से लेकर 78% तक हिस्सा बिना खर्च किए छोड़ दिया.
‘जल जीवन मिशन’ और ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ (ग्रामीण और शहरी) जैसी इंफ्रा-हेवी योजनाओं में भी भारी ‘अंडर-यूशियलाइज़ेशन’ (कम उपयोग) देखा गया है. 2024-25 में, ग्रामीण सड़कों के कार्यक्रम को छोड़कर, इन योजनाओं ने अपने बजट का दो-तिहाई से भी कम उपयोग किया. उदाहरण के लिए, ग्रामीण आवास के लिए हाल के वर्षों में कम उपयोग के कारण राज्यों के पास भारी ‘ओपनिंग बैलेंस’ जमा हो गया है.
कल्याणकारी मंत्रालयों की स्थिति और भी चिंताजनक है. अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, जो ‘प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम’ जैसी योजनाएं चलाता है, ने बजट और वास्तविक खर्च के बीच 78% की गिरावट देखी. श्रम और रोज़गार मंत्रालय ने अपने बजट का आधे से कुछ ही ज़्यादा हिस्सा खर्च किया. यहां तक कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के खर्च में भी कटौती देखी गई.
अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर दीपा सिन्हा कहती हैं, “कर राजस्व घटने के समय राजकोषीय समेकन का पूरा बोझ सामाजिक क्षेत्र उठा रहा है.” वहीं, बान्यन एकेडमी के नचिकेत मोर का मानना है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में कम खर्च फंडिंग की कमी से ज़्यादा ‘स्ट्रक्चरल’ (संरचनात्मक) सीमाओं की ओर इशारा करता है—पैसा है, लेकिन सिस्टम इसे सही से इस्तेमाल करने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया है.
बजट 2026-27 में दिव्यांगजन, महिलाओं और अल्पसंख्यकों जैसे ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहने वाले समूहों के लिए आवंटन कम बना हुआ है. 2019-20 और 2024-25 के बीच, इन समूहों के लिए फंडिंग कुल सामाजिक क्षेत्र के व्यय का 5% से भी कम रही.
कर्नाटक में बीजेपी शासन के दौरान मुसलमानों के ख़िलाफ़ ‘हथियार’ बना यूएपीए
गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए), 1967 के 58 साल के इतिहास में, इसका इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक विरोध और अल्पसंख्यक समुदायों के ख़िलाफ़ हथियार के रूप में किया जाता रहा है. ‘आर्टिकल-14’ द्वारा प्रकाशित और लंदन यूनिवर्सिटी के एसओएएस में तीन साल तक चले एक नए शोध से पता चलता है कि कर्नाटक में यूएपीए का इस्तेमाल विशेष रूप से मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए किया गया है.
जनवरी 2005 से फरवरी 2025 तक के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि कर्नाटक में UAPA के तहत आरोपी बनाए गए 10 में से लगभग 8 लोग उस 10.5 साल की अवधि के दौरान बुक किए गए जब बीजेपी सत्ता में थी. यानी, पिछले 20 वर्षों में कर्नाटक में कांग्रेस की तुलना में बीजेपी ने इस कानून का इस्तेमाल 5.2 गुना अधिक किया.
अध्ययन के मुताबिक, कुल 925 आरोपियों में से 783 (84.6%) मुसलमान थे. विडंबना यह है कि जिन मामलों में ट्रायल आगे बढ़ा, उनमें सजा की तुलना में बरी होने वालों की संख्या 5 गुना अधिक थी. यानी सरकार कड़े आरोप तो लगाती है, लेकिन कोर्ट में उन्हें साबित नहीं कर पाती. इसके बावजूद, यूएपीए की धारा 43डी(5) के कारण ज़मानत मिलना लगभग असंभव हो जाता है, जिससे आरोपी सालों तक जेल में सड़ते रहते हैं.
शोध में एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया कि कर्नाटक में 80% सजाएं ‘दोषी मानने’ के आधार पर हुईं, न कि मुकदमे के बाद. यह राष्ट्रीय औसत (40%) से बहुत ज़्यादा है. एक आरोपी ने बताया, “अगर मैं दोषी मान लेता, तो एक साल में बाहर आ जाता. अगर मैं मुकदमा लड़ता, तो बरी होने की उम्मीद में सालों इंतज़ार करना पड़ता.”
रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे “साज़िश” की थ्योरी को बिना किसी ठोस सबूत के बुना जाता है. एक मामले में, एक आरोपी के भाई द्वारा घर की बैठक में बनाए गए एक “डूडल” को एनआईए ने हत्या की साज़िश का “मास्टर प्लान” बता दिया. एक अन्य मामले में, बेलगावी की एक पूरी मुस्लिम फुटबॉल टीम को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि एक सदस्य अफ़ग़ानिस्तान युद्ध के वीडियो देख रहा था.
शोध में ‘एफआईआर’ के बजाय ‘घटना’ के आधार पर विश्लेषण किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि कैसे एक ही घटना को कई मामलों में बदलकर साज़िश का जाल बुना जाता है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद यूपी में जारी हैं ‘दंडात्मक विध्वंस’: हाई कोर्ट ने उठाये सवाल
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद उत्तर प्रदेश में जारी “दंडात्मक विध्वंस” पर गंभीर चिंता जताई है. हमीरपुर स्थित एक परिवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस सिद्धार्थ नंदन और जस्टिस अतुल श्रीधरन की बेंच ने कहा कि यह अदालत ऐसे कई मामलों की गवाह है जहाँ अपराध के तुरंत बाद आरोपी के घर पर डिमोलिशन (विध्वंस) का नोटिस चिपका दिया जाता है.
याचिकाकर्ता फामुद्दीन और उनके माता-पिता ने आशंका जताई थी कि जिला प्रशासन उनके घर, लॉज और आरा मशीन कारखाना (सॉ मिल) को गिरा सकता है. उनके परिवार के एक रिश्तेदार पर जनवरी में रेप, पॉक्सो एक्ट और धर्मांतरण कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था. परिवार का आरोप है कि एफआईआर में उनका नाम न होने के बावजूद प्रशासन ने नोटिस जारी कर दिया और संपत्तियों को सील कर दिया.
हाई कोर्ट ने तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा, “ढांचों को गिराना शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन है, क्योंकि सजा देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है, न कि कार्यपालिका के पास.”
अदालत ने विध्वंस से संबंधित “पांच सवाल” तैयार किए और राज्य सरकार से जवाब माँगा. इनमें शामिल हैं:
क्या यह सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का उल्लंघन नहीं है जिसमें दंडात्मक विध्वंस पर रोक लगाई गई है?
क्या बिना किसी सार्वजनिक उद्देश्य के किसी के घर को गिराना राज्य का अधिकार है?
क्या अपराध होने के तुरंत बाद विध्वंस की कार्रवाई करना कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं है?
अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने “मौखिक रूप से” आश्वासन दिया कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बिना कोई विध्वंस नहीं होगा. कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ताओं के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा करे. अगली सुनवाई 9 फरवरी को होगी.
‘पुलिस अगर गोली न मारे तो क्या खुद गोली खाए?’: यूपी में एनकाउंटर पर हाईकोर्ट की फटकार के बाद बोले योगी
कथित मुठभेड़ों के दौरान पुलिस द्वारा आरोपियों के पैरों में गोली मारने के बढ़ते चलन पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीखी फटकार के कुछ दिनों बाद, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को कहा कि पुलिस को अपराधियों को “उसी भाषा में समझाने के लिए प्रशिक्षित किया गया है जो वे समझते हैं.”
संजय पांडे की रिपोर्ट के अनुसार, एक ‘फार्मा कॉन्क्लेव’ का उद्घाटन करने के बाद आदित्यनाथ ने कहा, “पुलिस अगर गोली न मारे तो क्या गोली खाए... दोनों काम एक साथ नहीं चल सकते.” उन्होंने आगे कहा, “अगर अपराधियों को गोली चलाने की आजादी है, तो पुलिस को भी वही आजादी है... पुलिस को पिस्टल और ट्रेनिंग इसलिए दी गई है ताकि वे अपराधियों से उसी तरह निपटें जैसा वे समझते हैं.”
मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाने के कुछ दिनों बाद आई है. अदालत ने तब कहा था कि उत्तरप्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी न्यायाधीशों, विशेष रूप से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों (सीजेएम) पर “विशिष्ट आदेश” सुनाने के लिए “दबाव” डाल रहे थे.
व्हाट्सएप और मेटा को भारत से निकाल बाहर करने की धमकी दी सुप्रीम कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को व्हाट्सएप और मेटा को उनकी डेटा शेयरिंग पॉलिसी को लेकर कड़ी फटकार लगाई. कोर्ट ने कहा कि ये कंपनियां देश की संवैधानिकता का मज़ाक उड़ा रही हैं और उन्हें नागरिकों के निजी डेटा का शोषण करने की अनुमति नहीं दी जाएगी. इंडियन एक्सप्रेस की लीगल न्यूज़ रिपोर्ट के अनुसार, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर वे डेटा शेयरिंग और शोषण से जुड़ी चिंताओं का समाधान नहीं कर सकतीं, तो उन्हें भारत छोड़ देना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट मेटा और व्हाट्सएप द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने 2021 की गोपनीयता नीति को लेकर भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) द्वारा लगाए गए 213 करोड़ रुपये के जुर्माने को बरकरार रखने वाले एनसीएलएटी के फैसले को चुनौती दी थी.
‘शेर और मेमने के बीच समझौते जैसा’
चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्य कांत ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “ग्राहक के पास क्या विकल्प है? बाज़ार में आपका एकाधिकार है और आप कहते हैं कि आप विकल्प दे रहे हैं. यह विकल्प तो ‘शेर और मेमने’ के बीच समझौते जैसा है—या तो व्हाट्सएप छोड़ दो या अपना डेटा दो. हम इसकी अनुमति क्यों दें?”
सीजेआई ने कहा कि जब तक मामला पूरी तरह से तय नहीं हो जाता, तब तक डेटा साझा नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, “विकल्प बहुत सरल है. या तो आप अंडरटेकिंग (वचनबद्धता) दें, वरना हम निर्देश जारी करेंगे... या हम अभी इसे खारिज कर देते हैं. आपने इस देश की संवैधानिकता का मज़ाक बना दिया है.”
जब मेटा और व्हाट्सएप की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील अखिल सिब्बल ने कहा कि एनसीएलएटी ने यूज़र की सहमति से डेटा शेयरिंग की अनुमति दी है, तो सीजेआई ने दो टूक कहा, “हम आपको अपने डेटा का एक शब्द भी साझा करने की अनुमति नहीं देंगे. यह बहुत स्पष्ट होना चाहिए. आप लोगों के निजता के अधिकार के साथ इस तरह खिलवाड़ कैसे कर सकते हैं?”
‘मोनोपोली’ (एकाधिकार) के कारण निर्भरता
सीजेआई कांत ने कहा कि लोग व्हाट्सएप पर निर्भर होने के लिए मजबूर हैं क्योंकि कंपनी ने एकाधिकार बना लिया है. उन्होंने ‘ऑप्ट आउट’ के विकल्प पर सवाल उठाते हुए कहा, “ऑप्ट आउट का मतलब क्या है? ऑप्ट आउट का मतलब है कि आप देश से ऑप्ट आउट करें (बाहर जाएं). आप अपनी सुविधाएं यहाँ से हटा लें.”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, “हमारा पर्सनल डेटा न केवल बेचा जाता है, बल्कि उसका व्यावसायिक शोषण भी किया जाता है. हमें लगता है कि हम उपभोक्ता हैं, लेकिन असल में हम प्रोडक्ट हैं.”
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि एक गरीब रेहड़ी-पटरी वाला या सामान्य उपभोक्ता उन जटिल नियमों और शर्तों को कैसे समझेगा जो बहुत चालाकी से तैयार की गई भाषा में होती हैं. सीजेआई ने इसे एक तरह से “निजी जानकारी की चोरी” करार दिया. बेंच ने कंपनियों को अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए हलफनामा दायर करने की अनुमति दी और सीसीआई से आवश्यक शर्तों का सुझाव देने को कहा. मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को होगी.
युमनाम खेमचंद सिंह भाजपा विधायक दल के नेता चुने गए, मणिपुर के अगले मुख्यमंत्री होंगे
मंगलवार को दिल्ली में आयोजित मणिपुर विधायक दल की बैठक में भाजपा द्वारा युमनाम खेमचंद सिंह को विधायक दल का नेता चुना गया है. ‘पीटीआई’ के मुताबिक खेमचंद सिंह राज्य के अगले मुख्यमंत्री होंगे. महिला कुकी नेता और पूर्व मंत्री नेमचा किपगेन के उपमुख्यमंत्री बनने की संभावना है. वर्तमान में मणिपुर में भाजपा के 37 विधायक हैं. मैतेई और कुकी समुदायों के बीच महीनों तक चली जातीय हिंसा के बाद, 13 फरवरी 2025 से मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू है. 9 फरवरी 2025 को बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के इस्तीफे के बाद वहां केंद्रीय शासन (राष्ट्रपति शासन) लगाया गया था.
विश्लेषण
योगेंद्र यादव: यूजीसी नियमों के विवाद के पीछे छिपा है गहरा सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख में स्वराज इंडिया के सदस्य और भारत जोड़ो अभियान के संयोजक योगेंद्र यादव लिखते हैं कि यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए नियमों को लेकर चल रहा विवाद सिर्फ एक कानूनी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक गहरा सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष है.
यादव लिखते हैं कि शीर्ष संस्थानों में दलित छात्रों के साथ जिस तरह की अपमानजनक शब्दावली का इस्तेमाल किया जाता है—जैसे “कोटा चिल्ड्रेन”, “सरकारी दामाद”, या जातिसूचक गालियां—वह शर्मनाक है. सुकुमार द्वारा 10 विश्वविद्यालयों में 600 एससी (अजा) छात्रों के साक्षात्कार पर आधारित एक अध्ययन में पाया गया कि दो-तिहाई छात्र इंटरव्यू के दौरान भेदभाव का सामना करते हैं.
लेखक का मानना है कि यह लड़ाई किसी नियम के शब्दों के बारे में नहीं है, बल्कि उस इच्छाशक्ति की कमी के बारे में है जो इन नियमों को लागू करने के लिए चाहिए. 2012 के यूजीसी नियम कागज़ पर ही रह गए थे, और 2026 के नियमों का हश्र भी अलग नहीं होने वाला था. यह विवाद एक राजनीतिक लड़ाई है.
योगेंद्र यादव विश्लेषण करते हैं कि बीजेपी ने “सवर्ण” हिंदुओं के अपने कोर वोट बैंक और हिंदू समाज के अन्य वर्गों के बीच एक गठबंधन बनाया है. अब तक, बीजेपी के कोर वोट बैंक ने “निचले” वर्गों को दी जाने वाली रियायतों को सत्ता बनाए रखने की कीमत के रूप में स्वीकार किया था. लेकिन बीजेपी के चुनावी वर्चस्व ने उसके “सवर्ण” समर्थकों को यह विश्वास दिला दिया है कि अब ऐसी रियायतों की आवश्यकता नहीं है. ओबीसी का मुद्दा वह लकीर है जहाँ वे रेखा खींचते हैं.
लेखक चेतावनी देते हैं कि यह सामाजिक न्याय के संवैधानिक विचार पर एक हमला है. यूजीसी के इक्विटी नियम तो बस एक बहाना हैं; असली निशाना आरक्षण की पूरी व्यवस्था और ओबीसी का उदय है. यह पिरामिड के शीर्ष का दावा है, और अब यह पिरामिड के निचले हिस्से पर निर्भर है कि वह इसका जवाब कैसे देता है.
मनरेगा ने कैसे बदली जाति, लिंग की सामाजिक संरचना, अब मज़दूरों को सता रहा इसे खोने का डर
मनरेगा के 20 साल पूरे होने पर, कर्नाटक भर से 10,000 से अधिक ग्रामीण मज़दूरों ने सोमवार को फ्रीडम पार्क में एक विशाल विरोध प्रदर्शन किया. द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, ये मज़दूर प्रस्तावित ‘विकसित भारत-रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण)’ (वीबी-जी-राम जी) ढांचे का विरोध कर रहे हैं, जो उनके मुताबिक मनरेगा को कमज़ोर और ख़त्म करने की कोशिश है.
बेलगावी के एक खेतिहर मज़दूर महंतप्पा के. ने कहा, “हमारे लिए साल के ज़्यादातर समय काम नहीं होता. जो चीज़ हमें जिंदा रखती थी, वह थी ‘गारंटी’. अब वे कह रहे हैं कि काम तभी मिलेगा जब कोई प्रोजेक्ट अप्रूव होगा और फंड होगा. यानी अब कोई गारंटी नहीं है.”
दलितों और महिलाओं के लिए बदलाव
बागलकोट के दलित मज़दूर विनायक पी. ने याद किया कि मनरेगा से पहले काम तक पहुँच अपमान और जातिगत नियंत्रण से तय होती थी. मनरेगा ने उन्हें संगठित होने और सम्मानजनक मज़दूरी की मांग करने की ताकत दी. वहीं, महिला मज़दूरों ने बताया कि इस कानून ने न केवल उन्हें आर्थिक रूप से मज़बूत किया, बल्कि सामाजिक रूप से भी आत्मविश्वास दिया. विधवाओं और एकल महिलाओं ने कहा कि इस योजना ने उन्हें पलायन या शोषणकारी मज़दूरी पर निर्भर हुए बिना अपने गाँव में सम्मान से जीने का मौका दिया.
डिमांड से कमांड की ओर
मनरेगा संघर्ष मोर्चा के राजेंद्रन नारायणन ने तर्क दिया कि प्रस्तावित कानून मौलिक रूप से अनुचित है क्योंकि यह केंद्र सरकार के पास सत्ता केंद्रित करता है. उन्होंने कहा कि मनरेगा के तहत काम मांगने का अधिकार पंचायत स्तर पर था, लेकिन नए ढांचे में यह ‘डिमांड-ड्रिवन’ (मांग आधारित) से ‘कमांड-ड्रिवन’ (आदेश आधारित) बन जाएगा. मज़दूरों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि नए कानून में बुवाई और कटाई के पीक सीज़न के दौरान 60 दिनों तक काम पर रोक लगाने का प्रावधान है, जो उनकी आजीविका पर सीधा हमला है.
उत्तराखंड में कश्मीरियों पर बढ़े हमले: धार्मिक पहचान पूछकर पीटा
उत्तराखंड में 18 वर्षीय कश्मीरी मुस्लिम तबिश अहमद गनी के साथ उसकी मुस्लिम और कश्मीरी पहचान को लेकर मारपीट की गयी. आर्टिकल 14 की रिपोर्ट के मुताबिक़ तबिश अहमद 10वीं कक्षा का छात्र है, इस हमले में उसके सिर पर 12 टांके आये हैं और उसकी एक बांह टूटी है. ज़ख़्मी हालत में उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर गश्त कर रही है. 28 जनवरी 2026 को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 40 किमी दूर विकासनगर में उसे और उसके भाई दानिश अहमद गनी (10वीं का ड्रॉपआउट) को बुरी तरह पीटा गया.
तबिश अपने पिता के साथ सर्दियों की छुट्टियों में कमाई के लिए उत्तराखंड गया था. फोन पर हिमाचल प्रदेश से बात करते हुए उसने बताया कि एक दुकानदार ने उससे पूछा, “तू कश्मीरी मुसलमान है?”. हमलावर की पहचान संजय यादव के रूप में हुई है. तबिश के अनुसार, वह और उसका भाई नाश्ता खरीदने दुकान पर गए थे. दुकानदार फोन पर व्यस्त था. जब वे कश्मीरी में बात करते हुए दूसरी दुकान पर जाने लगे, तो दुकानदार भड़क गया. उसने लोहे की रॉड से हमला किया. बाद में एक पुरुष और एक महिला भी हमले में शामिल हो गए. तबिश के मुताबिक़ दुकानदार चिल्लाया, “ये कश्मीर नहीं है, उत्तराखंड है.”
हमले में तबिश का सिर फट गया, हाथ टूट गया और उसे चलने में दिक्कत हो रही है. परिवार का आरोप है कि हमलावरों ने 22,000 रुपये नकद और लगभग 70,000 रुपये के शॉल भी लूट लिए.
पुलिस का रुख
उत्तराखंड के आईजी सुनील कुमार मीणा ने इस घटना को “छोटा झगड़ा” बताया और कहा कि किसी को विशेष रूप से निशाना नहीं बनाया गया. उन्होंने कहा कि आरोपी संजय यादव को गिरफ्तार किया गया है और उस पर गंभीर चोट पहुंचाने और शांति भंग करने के आरोप लगाए गए हैं.
हालांकि जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय संयोजक नासिर खुएहामी का कहना है कि कश्मीरी छात्रों, मज़दूरों और शॉल विक्रेताओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है. उनके अनुसार 2025 में हिमाचल प्रदेश में कम से कम 17 ऐसे मामले सामने आए. कई मामलों में पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती या कमज़ोर धाराएं लगाती है, जिससे आरोपी जल्दी ज़मानत पर छूट जाते हैं.
17 जनवरी 2026 को हिमाचल प्रदेश से भी एक ऐसा मामला सामने आया था. सुरजीत राजपूत गुलेरिया नाम के एक पूर्व सैनिक ने एक कश्मीरी फेरीवाले को अपमानित कर फेसबुक पर लाइव वीडियो डाला. उसने सांप्रदायिक और आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं. पुलिस ने उसे थाना तो बुलाया, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं की. 31 जनवरी को उसी व्यक्ति ने एक और कश्मीरी फेरीवाले मोहम्मद रमज़ान को धमकाया और लाइव वीडियो बनाया. रमजान का कहना है कि पुलिस ने पूछताछ तो की, लेकिन मामला दर्ज नहीं किया.
25 दिसंबर 2025 को उत्तराखंड के काशीपुर में बिलाल अहमद नामक शॉल विक्रेता को “भारत माता की जय” बोलने से इनकार करने पर पीटा गया. 31 दिसंबर को हरियाणा और हिमाचल में भी कश्मीरी शॉल विक्रेताओं पर हमले दर्ज हुए.
रोज़गार की मजबूरी
कश्मीर में सर्दियों के दौरान काम न मिलने के कारण हज़ारों लोग दूसरे राज्यों में जाकर शॉल, सूखे मेवे बेचते हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2025 में जम्मू-कश्मीर में बेरोज़गारी की दर 6.1% थी, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है. 2019 में विशेष दर्जा हटने के बाद रोज़गार बढ़ने के दावे किए गए थे, लेकिन कई युवा अब भी बेरोज़गार हैं.
तबिश के पिता यासीन गनी ने कहा कि वे पिछले 12 साल से हिमाचल और उत्तराखंड आकर काम कर रहे हैं और पहले कभी ऐसा व्यवहार नहीं झेला. “मुझे अपने परिवार को पालना है, यही हमारी रोज़ी-रोटी है,” उन्होंने कहा.
राजनीतिक प्रतिक्रिया
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि अगर कश्मीर भारत का हिस्सा है, तो कश्मीरियों को देश के दूसरे हिस्सों में डर के माहौल में नहीं जीना चाहिए. उन्होंने रोजगार के लिए राज्य के अंदर मजबूत व्यवस्था बनाने की बात कही.
राजस्थान में ‘ ओरण बचाओ’ पदयात्रा: सौर परियोजनाओं के लिए जमीन आवंटन के ख़िलाफ़ 700 किमी का मार्च
राजस्थान में भारत-पाकिस्तान सीमा से लगभग 30 किमी दूर जैसलमेर के तनोट में लोगों ने रामगढ़ तहसील में 745 हेक्टेयर ज़मीन सोलर कंपनियों को दिए जाने के ख़िलाफ़ पदयात्रा निकाली. स्क्रॉल की रिपोर्ट के मुताबिक़ 21 जनवरी की सुबह लोगों ने ओरण बचाओ गोचर बचाओ के नारे के साथ रेगिस्तान की सड़कों पर लंबी पदयात्रा शुरू की.
उसी दिन राजस्थान सरकार ने जैसलमेर के रामगढ़ तहसील में 745 हेक्टेयर ज़मीन सोलर कंपनियों को दे दी. स्थानीय लोगों को अभी यह सही जानकारी मुहैय्या नहीं है कि सरकार ने कौन सी ज़मीन कमापनियों को आवंटन की है, लेकिन उन्हें डर है कि इन ज़मीनों को रिकॉर्ड में “बंजर भूमि” क, तौर पर दर्ज किया गया है, जबकि असल में वह ओरण या गांवों की चराई भूमि है. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में हज़ारो एकड़ ज़मीन नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को दी गई है, जिनमें तालाब और जलस्रोत भी शामिल हैं.
राजस्थान देश में सौर ऊर्जा उत्पादन में सबसे आगे है, जहाँ 22,000 मेगावॉट से अधिक ऊर्जा उत्पाद की जाती है. राज्य में करीब 41,000 हेक्टेयर ज़मीन पर सात और परियोजनाएं बन रही हैं. पहले भी ऐसे विवाद हुए हैं. 2018 में नेदान गांव ने अडानी समूह की 600 मेगावॉट हाइब्रिड परियोजना के ख़िलाफ़ केस किया था, जिसे 2021 में राजस्थान हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया.
अब ग्रामीण 700 किमी की पदयात्रा कर जैसलमेर और जोधपुर से होते हुए जयपुर जा रहे हैं. उनकी मांग है कि राज्य के सभी ओरण ज़मीनो को राजस्व रिकॉर्ड में आधिकारिक रूप से दर्ज किया जाए. ओरण ऐसे जंगल के हिस्से होते हैं जिन्हें गाँव के लोग किसी देवी या देवता के नाम पर सुरक्षित रखते हैं. हर गाँव अपनी आस्था और ज़रूरत के अनुसार एक जगह को पवित्र मानकर उसकी रक्षा करता है. इन जगहों पर पेड़ काटना या शिकार करना मना होता है. इसलिए ओरण को आसान शब्दों में पवित्र जंगल भी कहा जाता है.
सिर्फ जैसलमेर में करीब 5.8 लाख हेक्टेयर ओरण को दर्ज करने की ज़रुरत है. कई जगह इन्हें “बंजर” लिखा गया है, जबकि यह ज़मीन पर जंगल और वन्यजीव के लिए हैं और जिसका इस्तेमाल लोग चराई के लिए भी करते हैं.
1 फरवरी तक यात्री 200 किमी चलकर पोखरण पहुंच चुके थे. 28 जनवरी को जैसलमेर के कलेक्टर ने फतेहगढ़ और रामगढ़ में 2,000 हेक्टेयर से अधिक ओरण ज़मीन को रिकॉर्ड में ओरण घोषित किया. पदयात्रा फरवरी के अंत तक जयपुर पहुंचने की उम्मीद है. ग्रामीणों ने चेतावनी दी है – “नो ओरण, नो वोट”.
सुप्रीम कोर्ट ने 2005 और 2018 में ओरण को “डीम्ड फॉरेस्ट” घोषित करने का निर्देश दिया था, ताकि उन्हें कानूनी सुरक्षा मिले. 2024 में भी कोर्ट ने विस्तृत मैपिंग और रिकॉर्डिंग का आदेश दिया, लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई ओरण अभी भी दर्ज नहीं हैं. यदि इन्हें डीम्ड फॉरेस्ट बनाया जाए तो इनके उपयोग के लिए राज्य और केंद्र स्तर पर मंज़ूरी ज़रूरी होगी, जिससे सुरक्षा बढ़ेगी.
ओरण पर्यावरण के लिए अहम हैं. जैसलमेर में गंभीर रूप से संकटग्रस्त ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ का निवास इन्हीं इलाकों में है. देश में इसके केवल करीब 150 पक्षी बचे हैं. सोलर और विंड परियोजनाओं की बिजली लाइनों से टकराकर कई पक्षी मारे गए है. 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने नई परियोजनाओं में ओवरहेड लाइनों पर रोक और पुरानी लाइनों पर बर्ड डाइवर्टर लगाने का आदेश दिया था. यहां दुर्लभ जंगली बिल्ली ‘काराकल’ भी पाई जाती है.
विशेषज्ञों को चिंता है कि डीम्ड फॉरेस्ट का दर्जा मिलने पर वन विभाग का नियंत्रण बढ़ सकता है और समुदायों की भूमिका कम हो सकती है. ग्रामीणों का कहना है कि ओरन सदियों से समुदाय द्वारा धार्मिक मान्यताओं के साथ संरक्षित किए जाते हैं, यहां शिकार और पेड़ काटना प्रतिबंधित है. उनका आग्रह है कि यदि सरकार इन्हें दर्ज करे तो प्रबंधन समुदाय के हाथ में ही रहे.
मैनपुरी में 14 साल के दलित छात्र की पिटाई, जातिसूचक गालियां और जान से मारने की धमकी
उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में एक निजी स्कूल में 14 साल के दलित छात्र के साथ मारपीट और जातिसूचक गालियां देने का मामला सामने आया है. मकतूब मीडिया के मुताबिक़ घटना कुरावली थाना क्षेत्र के पास स्थित लल्लू सिंह इंटर कॉलेज की है.परिवार के अनुसार, 29 जनवरी को कक्षा 8 का छात्र स्कूल में पानी पी रहा था, तभी पानी की पाइप टूट गई. परिजनों का कहना है कि पाइप किसी अन्य छात्र ने तोड़ी थी, लेकिन झूठा आरोप इस बच्चे पर लगा दिया गया.
आरोप है कि विजय सिंह के बेटे सुवीर सिंह और महावीर सिंह के बेटे राजीव वर्मा उर्फ राजू लोधी ने छात्र को जातिसूचक गालियां दीं, बुरी तरह पीटा और धमकी दी कि “अगर दोबारा स्कूल आए तो जान से मार देंगे.” परिवार का कहना है कि पिटाई के बाद बच्चे को चलने में दिक्कत हो रही है. पीड़ित के बड़े भाई, जो कुरावली के घनराजपुर निवासी हैं, ने 30 जनवरी को शिकायत दी. उसी दिन शाम में एफआईआर दर्ज की गई.
मामला अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज किया गया है. साथ ही भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 115(2) जानबूझकर चोट पहुंचाना, 352 शांति भंग करने के इरादे से अपमान और 351(3) आपराधिक धमकी के तहत मामला दर्ज किया गया है.
मुज़फ्फरनगर में सब-स्टेशन ऑपरेटर ने खुद को मारी गोली, फ़र्ज़ी एससी सर्टिफिकेट शिकायत के बाद उठाया क़दम
द मूकनायक की रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में रविवार सुबह 28 वर्षीय सब-स्टेशन ऑपरेटर शुभम कुमार ने तितावी स्थित बिजली विभाग के सब-स्टेशन के कंट्रोल रूम में खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली. पुलिस को मौके से एक सुसाइड नोट और एक देसी तमंचा बरामद हुआ. पुलिस के अनुसार, सुसाइड नोट में शुभम ने कथित तौर पर स्वीकार किया है कि उसने फ़र्ज़ी अनुसूचित जाति (एससी) प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल की थी.
घटना कैसे हुई?
प्रारंभिक जांच के मुताबिक़, घटना के समय सब-स्टेशन पर कुछ लाइनमैन भी मौजूद थे. उनके फील्ड वर्क पर जाने के बाद शुभम ने कंट्रोल रूम को अंदर से बंद कर लिया और चाबी बाहर फेंक दी. इसके बाद उसने खुद को गोली मार ली.
जब कर्मचारी वापस लौटे तो दरवाजा अंदर से बंद मिला. चाबी ढूंढकर दरवाज़ा खोला गया, तो अंदर शुभम का शव खून से लथपथ पड़ा था. ग्रामीण क्षेत्र के अधिशासी अभियंता बाल किशन ने बताया कि हाल ही में शिकायत मिली थी कि शुभम ने फ़र्ज़ी एससी प्रमाण पत्र के आधार पर 2017 में नौकरी पाई थी. इस मामले में जांच होनी थी. हालांकि शिकायतकर्ता का नाम नहीं बताया गया. शुभम के पिता अनिल कुमार ने फ़र्ज़ी दस्तावेज़ के आरोपों को गलत बताया. उनका कहना है कि उनके बेटे को पिछले चार साल से तीन लोग ब्लैकमेल कर रहे थे और हाल की शिकायत से वह मानसिक तनाव में था. परिवार दोषियों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराने की तैयारी कर रहा है.
अपर पुलिस अधीक्षक आदित्य बंसल ने कहा कि अब तक हत्या या साज़िश का कोई सबूत नहीं मिला है. उत्पीड़न की भी कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं है. चूंकि घटना में देसी कट्टा इस्तेमाल हुआ, इसलिए आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है. शुभम अपने पीछे पत्नी और डेढ़ साल के बेटे को छोड़ गए हैं.
महुआ मोइत्रा और हरदीप सिंह पुरी के बीच सोशल मीडिया पर विवाद: एपस्टीन फाइल्स से जुड़े आरोप
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा और केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के बीच सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई है. यह विवाद हाल ही में जारी जेफरी एपस्टीन की फाइलों से जुड़ा है, जिसमें पुरी का नाम सामने आया है. मोइत्रा ने पुरी पर एपस्टीन के साथ संबंधों को लेकर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि पुरी ने उन्हें फोन कर ट्वीट हटाने की धमकी दी.
मोइत्रा ने अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर पोस्ट किया कि 2014 में एपस्टीन की फाइलों में पुरी के ईमेल उल्लेखित हैं, जहां वे एपस्टीन को “फन” करने की सलाह देते हैं और उनके “एक्जॉटिक आइलैंड” का जिक्र करते हैं. मोइत्रा ने सवाल किया, “कैसा फन?” और दावा किया कि पुरी, जो उस समय भारतीय राजनयिक थे, ने एपस्टीन जैसे दोषी यौन अपराधी के साथ भारत के हितों को बढ़ावा देने का प्रयास किया.
इसके बाद, मोइत्रा ने एक और ट्वीट में आरोप लगाया कि पुरी ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से फोन किया और ट्वीट हटाने की मांग की. उन्होंने कहा कि पुरी ने चेतावनी दी कि अगर “लोग” उनके पीछे पड़ गए तो वे मदद नहीं कर पाएंगे. मोइत्रा ने इसे “धमकी” बताते हुए कहा, “आपकी गुंडा सेनाएं मुझे डराती नहीं हैं.” यह ट्वीट वायरल हो गया और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई.
पुरी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया यूजर्स ने इस मुद्दे पर विभाजित राय व्यक्त की है. कुछ ने मोइत्रा के आरोपों को गंभीर बताते हुए जांच की मांग की, जबकि अन्य ने इसे राजनीतिक हमला करार दिया. एपस्टीन फाइल्स में पुरी का नाम आने से मोदी सरकार पर भी सवाल उठ रहे हैं, जहां अन्य नाम जैसे अनिल अंबानी का भी उल्लेख है, यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब एपस्टीन की फाइलों ने वैश्विक स्तर पर कई प्रमुख हस्तियों के नाम उजागर किए हैं. जांच की मांग बढ़ रही है कि क्या ये संबंध राजनयिक थे या इससे आगे कुछ.
दीपक चोपड़ा और जेफरी एपस्टीन के बीच ईमेल: युवा महिलाओं से ‘उत्तेजना’ की चर्चा, सोशल मीडिया पर हंगामा
आध्यात्मिक गुरु और लेखक दीपक चोपड़ा का नाम हाल ही में जारी जेफरी एपस्टीन की फाइलों में उभरा है, जहां उनके बीच 2016 के एक ईमेल में चोपड़ा ने अपनी ‘जैविक जरूरतों’ और ‘युवा बौद्धिक रूप से तेज महिलाओं’ के साथ जुड़ने की बात की है. यह ईमेल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर वायरल हो गया है, जहां यूजर्स ने चोपड़ा को ‘ओपरा द्वारा प्रमाणित आध्यात्मिक गुरु’ बताते हुए आलोचना की है.
ईमेल में चोपड़ा ने एपस्टीन को लिखा, “मेरी जैविक जरूरतें कभी-कभी पूरी होती हैं,” और आगे कहा, “मैं युवा बौद्धिक रूप से तेज और आत्म-जागरूक महिलाओं की कंपनी का आनंद लेता हूं और उन्हें प्रेरित और उत्तेजित करने के लिए उनसे जुड़ना पसंद करता हूं.” यह ईमेल 6 अगस्त 2016 का है, जिसमें चोपड़ा ने परित्यक्त जगहों पर बाघ आने और हार्वर्ड चोपड़ा माइंड/ब्रेन इंस्टीट्यूट जैसी बातों का जिक्र किया है. यह खुलासा एपस्टीन की फाइलों के नए बैच से हुआ है, जिसमें चोपड़ा और एपस्टीन के बीच लगातार संपर्क दिखाया गया है, यहां तक कि एपस्टीन की 2008 की दोषसिद्धि के बाद भी.
सोशल मीडिया पर @ParaN_rmal नामक यूजर ने इस ईमेल की स्क्रीनशॉट साझा की, जिसे हजारों लाइक्स और रीपोस्ट मिले. यूजर्स ने इसे ‘घिनौना’ बताते हुए चोपड़ा की आलोचना की, कुछ ने ओपरा विन्फ्रे के साथ उनके संबंधों पर सवाल उठाए. एक यूजर ने लिखा, “युवा महिलाएं 79 साल के आदमी से उत्तेजित होना पसंद करती हैं?” जबकि दूसरे ने चोपड़ा को ‘धोखेबाज’ करार दिया. चोपड़ा ने अपने एक्स अकाउंट पर कमेंट्स बंद कर दिए हैं.
एपस्टीन फाइलों में चोपड़ा के अन्य ईमेल भी शामिल हैं, जैसे 2016 में मारला मैपल्स (डोनाल्ड ट्रंप की पूर्व पत्नी) के बारे में पूछना, जहां एपस्टीन ने दावा किया कि उन्होंने ट्रंप से 10,000 डॉलर की शर्त हारी और बेबी फूड का ट्रक भेजा. चोपड़ा ने एपस्टीन से वित्तीय सलाह भी मांगी और बैठकें तय कीं. विश्लेषकों का कहना है कि यह खुलासा चोपड़ा की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है, जो कई बेस्टसेलिंग किताबों के लेखक हैं.
चोपड़ा ने इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन पहले एपस्टीन से संबंधों पर कहा था कि वे जांच में सहयोग करेंगे. यह मामला एपस्टीन की फाइलों से निकलने वाले कई खुलासों का हिस्सा है, जिसमें कई प्रमुख हस्तियां शामिल हैं. सोशल मीडिया पर बहस जारी है, जहां कुछ ने इसे ‘कब्जे में’ गुरुओं की आलोचना के रूप में देखा है.
सुलताना बेग़म को लाल किले पर कब्जा चाहिए
आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की पड़पोती बहू सुल्ताना बेगम, जो मिर्जा बेदार बख्त की विधवा हैं, वर्तमान में हावड़ा की एक साधारण झोपड़ी में रह रही हैं. वह अपनी पैतृक संपत्ति रेड फोर्ट पर दावा करने के लिए अकेले ही व्यवस्था से लड़ रही हैं.
सौम्या सेनगुप्ता द्वारा निर्देशित आगामी डॉक्यूमेंट्री “लॉस्ट क्वीन ” में उनकी इस संघर्षपूर्ण कहानी को दर्शाया गया है, जिसमें एक बुजुर्ग महिला की दृढ़ता और अपनी विरासत को सम्मान देने की लड़ाई को भावुक तरीके से दिखाया गया है. वीडियो क्लिप में सुल्ताना बेगम कहती हैं कि उनके ससुराल वाले शहीदों के परिवार से हैं, और वे केवल अपना घर चाहती हैं, न कि रेड फोर्ट या कोई अन्य किला. वह कहती हैं, “बहादुर शाह जफर भिखारी नहीं थे, वे अधिकारी थे, उनका घर कहां गया?”
सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को लाखों व्यूज मिले हैं, जहां प्रतिक्रियाएं मिश्रित हैं. कुछ यूजर्स ने उनकी स्थिति पर सहानुभूति जताई, जबकि अन्य ने इसे कर्म का फल बताया या सरकार से पेंशन की मांग की. एक यूजर ने कहा कि अगर उनके पूर्वज ब्रिटिशों के साथ होते तो वह सांसद या मंत्री होतीं. डॉक्यूमेंट्री गरीबी में जी रही मुगल वंशज की याचिका और समाचार क्लिपिंग्स को भी दिखाती है.
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