03/03/2026: ईरान पर हमले बढ़े, अमेरिका के दो दूतावास बंद | नेपाल बदलेगा या पहले जैसा ही | राजस्थान में गौरक्षा के नाम पर मुस्लिम की हत्या | निज्जर हत्याकांड को लेकर भारत अब भी निशाने पर | बंगाल एसआईआर
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
ईरान में लड़कियों के स्कूल को मुमकिन तौर पर ‘जानबूझकर’ बनाया गया निशाना
ईरान युद्ध: इजराइल-अमेरिका के हमले तेज़, 787 लोगों की मौत, होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल संकट गहराया.
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की हत्या की, ग्लोबल साउथ ने की निंदा.
कश्मीर अलर्ट: खामेनेई की मौत के विरोध में प्रदर्शन, श्रीनगर में इंटरनेट बंद और पाबंदियां जारी.
सियासी घमासान: सोनिया और राहुल गांधी ने पीएम मोदी की चुप्पी को बताया ज़िम्मेदारी से पीछे हटना.
कनाडा विवाद: कनाडाई रिपोर्ट में निज्जर हत्याकांड के लिए भारतीय राजनयिकों और बिश्नोई गैंग पर आरोप.
राजस्थान: भिवाड़ी में कथित गौ-रक्षकों और तस्करों की झड़प में एक मुस्लिम युवक की मौत.
यूपी राजनीति: यूजीसी नियमों और ओबीसी फोकस को लेकर बीजेपी के ब्राह्मण नेताओं में नाराजगी.
बंगाल चुनाव: नई वोटर लिस्ट से 61 लाख नाम हटाए गए, माइनॉरिटी सीटों पर पड़ा सबसे ज्यादा असर.
आप सबको होली मुबारक. हमारा अगला संस्करण अब गुरुवार 5 फरवरी 2026 को आएगा.
अल जजीरा की तफ्तीश:
ईरान में लड़कियों के स्कूल को मुमकिन तौर पर ‘जानबूझकर’ बनाया गया निशाना
शनिवार, 28 फरवरी 2026 की सुबह, जब इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर शुरुआती हमले शुरू किए, तब दक्षिणी ईरान के मीनाब शहर में “शजरे तैयबा” (एक पवित्र वृक्ष) स्कूल में दर्जनों लड़कियां जमा थीं. जैसे ही छात्राओं ने अपनी पढ़ाई शुरू की, मिसाइलों ने स्कूल पर हमला कर दिया, जिससे इमारत तबाह हो गई और छत बच्चों और उनके शिक्षकों पर गिर गई. ईरानी अधिकारियों ने मरने वालों की अंतिम संख्या 165 बताई है, जिनमें से ज्यादातर 7 से 12 साल की लड़कियां थीं. इस हमले में कम से कम 95 अन्य लोग घायल हुए हैं. अल जजीरा ने इस पर गहरी खोजबीन की है.
जैसे ही इस कत्लेआम की तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैलीं, इजराइली और अमेरिकी अधिकारियों ने खुद को इस हमले से दूर करने की कोशिश की. अमेरिकी रक्षा विभाग और इजराइली सेना के प्रवक्ताओं ने ‘टाइम’ पत्रिका और ‘एसोसिएटेड प्रेस’ को बताया कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि किसी स्कूल पर हमला हुआ है. इजराइल से जुड़े कुछ सोशल मीडिया अकाउंट्स ने दावा किया कि यह जगह “इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के बेस का हिस्सा” थी. हालांकि, ‘अल जजीरा’ की डिजिटल जांच इकाई द्वारा एक दशक से अधिक के उपग्रह चित्रों (सैटेलाइट इमेजरी), हालिया वीडियो क्लिप और आधिकारिक ईरानी बयानों के विश्लेषण से एक अलग ही कहानी सामने आती है.
जांच से पता चलता है कि यह स्कूल कम से कम 10 साल से पास के सैन्य स्थल से पूरी तरह अलग था. हमले का पैटर्न उन खुफिया जानकारियों की सटीकता पर गंभीर सवाल उठाता है, जिनके आधार पर बमबारी की गई थी. यह इस ओर भी इशारा करता है कि क्या स्कूल को जानबूझकर निशाना बनाया गया था. मीनाब शहर रणनीतिक रूप से बेहद अहम है क्योंकि यह होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित है, जो आईआरजीसी की नौसेना (एनईडीएसए) के लिए एक प्रमुख केंद्र है.
रिकॉर्ड के मुताबिक, शजरे तैयबा स्कूल आईआरजीसी नौसेना से प्रशासनिक रूप से जुड़ा है और मुख्य रूप से नौसेना कर्मियों के बच्चों के लिए है. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत, यह जुड़ाव स्कूल की नागरिक स्थिति को नहीं बदलता. यूरो-मेड ह्यूमन राइट्स मॉनिटर ने इसे “भयानक अपराध” करार देते हुए कहा है कि पास में सैन्य ठिकाने होने से अमेरिकी और इजराइली सेनाएं अपने कानूनी दायित्व से मुक्त नहीं हो जातीं कि वे हमले से पहले लक्ष्य की सावधानीपूर्वक पुष्टि करें.
अल जजीरा की जांच में दो वीडियो क्लिप का विश्लेषण किया गया. पहला क्लिप सैन्य परिसर से धुआं उठते हुए दिखाता है, जबकि दूसरा क्लिप स्कूल की इमारत से अलग काला धुआं उठते हुए दिखाता है. सैटेलाइट इमेजरी के कालानुक्रमिक (क्रोनोलॉजिकल) विश्लेषण से पता चलता है कि 2013 तक यह हिस्सा सैन्य परिसर का हिस्सा था, लेकिन 2016 में इसमें बड़े बदलाव किए गए. स्कूल को सैन्य ब्लॉक से अलग करने के लिए नई दीवारें बनाई गईं, सुरक्षा टावरों को हटाया गया और आम जनता के लिए तीन नए गेट खोले गए. 2018 की तस्वीरों में वहां बच्चों का खेल का मैदान और रंगीन पेंटिंग भी साफ देखी जा सकती हैं.
एक और चौंकाने वाला सबूत “शहीद अबसालान क्लिनिक” है, जो इसी परिसर के दूसरे कोने पर स्थित है और जनवरी 2025 में खुला था. हमले के दौरान मिसाइलों ने सैन्य बेस और स्कूल को तो निशाना बनाया, लेकिन बीच में स्थित इस क्लिनिक को पूरी तरह छोड़ दिया. यह दर्शाता है कि हमलावरों के पास सटीक नक्शे थे जो क्लिनिक जैसी नई नागरिक सुविधाओं को पहचान रहे थे. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर वे एक साल पुराने क्लिनिक को बचा सकते थे, तो वे 10 साल पुराने स्कूल को पहचानने में कैसे नाकाम रहे?
हमले के बाद सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैलाई गई कि स्कूल ईरानी एयर डिफेंस मिसाइल के गिरने से तबाह हुआ, लेकिन अल जजीरा ने पाया कि उन दावों में इस्तेमाल की गई तस्वीरें मीनाब से 1,300 किलोमीटर दूर जंजान शहर की थीं. इतिहास गवाह है कि बहर अल-बकर स्कूल (1970), अमीरिया शेल्टर (1991), काना (1996) और कुंदुज अस्पताल (2015) जैसे मामलों में भी नागरिक ठिकानों पर हमलों के बाद पहले इनकार किया गया और बाद में वे दावे झूठे निकले. मीनाब में एम्बुलेंस और मुर्दाघरों में जगह कम पड़ गई, जिसके चलते बच्चियों के शवों को रखने के लिए रेफ्रिजेरेटेड ट्रकों का इस्तेमाल करना पड़ा.
ईरान युद्ध ‘धुएं और खून’ के बीच चौथे दिन में दाखिल, वैश्विक बाज़ार धड़ाम
मध्य पूर्व में चल रहा संघर्ष अब एक पूर्ण युद्ध का रूप ले चुका है. ‘अल जजीरा’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इजराइल और अमेरिकी सेना ने ईरान पर अपने हमले तेज कर दिए हैं. इन हमलों में ईरानी सरकारी प्रसारक के मुख्यालय को भी निशाना बनाया गया है. ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, इस संघर्ष में मरने वालों की संख्या बढ़कर 787 हो गई है. इजराइली सेना केवल ईरान तक ही सीमित नहीं है; उसने लेबनान पर हवाई हमले तेज कर दिए हैं और देश के दक्षिणी हिस्से में एक नई जमीनी घुसपैठ शुरू कर दी है.
इस बीच, सऊदी अरब के अधिकारियों ने जानकारी दी है कि रियाद स्थित अमेरिकी दूतावास पर दो ड्रोन से हमला किया गया, जिससे वहां आग लग गई और मामूली नुकसान हुआ.
ट्रम्प की चेतावनी और कतर का बड़ा फैसला
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने साफ किया है कि ईरान के खिलाफ यह सैन्य अभियान लगभग चार सप्ताह तक चल सकता है. उनका कहना है कि वाशिंगटन तेहरान की मिसाइल और परमाणु क्षमताओं को नष्ट करने के लिए जो भी जरूरी होगा, वो करेगा. दूसरी ओर, ईरान ने खाड़ी (गल्फ) में ऊर्जा के बुनियादी ढांचे पर हमले किए हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कतर की सरकारी पेट्रोलियम कंपनी ने अपनी दो सुविधाओं पर हमले के बाद एलएनजी का उत्पादन पूरी तरह से निलंबित कर दिया है.
होर्मुज स्ट्रेट बंद: दुनिया के लिए खतरा
सबसे चिंताजनक खबर ईरान के ‘ रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (आईआरजीसी) की तरफ से आई है. उन्होंने घोषणा की है कि ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ —जिसके रास्ते दुनिया की खपत का पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है—अब “बंद” कर दिया गया है. आईआरजीसी ने चेतावनी दी है कि इस जलमार्ग से गुजरने की कोशिश करने वाले किसी भी जहाज पर हमला किया जाएगा.
ईरान ने इजराइल पर भी पलटवार जारी रखा है. इजराइली सेना ने वेस्ट यरुशलम, तेल अवीव और इलात के ऊपर ईरानी मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने की सूचना दी है. शनिवार से अब तक इजराइल में कम से कम 10 लोग मारे जा चुके हैं.
मंगलवार को तेहरान और बेरुत में ज़बरदस्त धमाकों की गूंज सुनाई दी और अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान के ख़िलाफ़ छेड़े गए हवाई युद्ध से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में लंबी बाधा की आशंका के चलते दुनिया भर के वित्तीय बाज़ार लुढ़क गए. ‘रॉयटर्स’ के अलेक्जेंडर कॉर्नवेल की रिपोर्ट के मुताबिक़, सऊदी अरब स्थित अमेरिकी दूतावास पर ईरानी ड्रोन से हमला हुआ जिससे वहां आग लग गई. इससे पहले कुवैत में भी अमेरिकी मिशन को निशाना बनाया गया था. वाशिंगटन ने जवाब में इन मिशनों को बंद कर दिया है और मध्य पूर्व के कई देशों से अपने गैर-ज़रूरी सरकारी कर्मचारियों को निकलने का आदेश दिया है.
जहाँ एक तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने युद्ध की समय सीमा पर गोलमोल जवाब दिए, वहीं इज़राइल की युद्ध योजना से वाक़िफ़ एक सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि यह अभियान दो सप्ताह के लिए प्लान किया गया था और यह उम्मीद से तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. सूत्र के अनुसार, इसका मक़सद ईरान के धार्मिक शासकों का तख्तापलट करना है और इसके लिए कोई पक्की समय सीमा नहीं है. इज़राइल अपनी ‘निशाने’ को तेज़ी से ख़त्म कर रहा है, जिसमें ईरान के नेताओं को मारना और उनके डिफेंस सिस्टम को तबाह करना शामिल है. इज़राइल को डर है कि कहीं वाशिंगटन ईरान के बचे हुए नेताओं के साथ समझौता न कर ले, इसलिए वे अपने हमले तेज़ कर रहे हैं.
ईरान के भीतर हालात बेहद ख़राब हैं. इज़राइल ने सरकारी ब्रॉडकास्टर आईआरआईबी के मुख्यालय पर हमला किया है. लोग जान बचाने के लिए शहरों से भाग रहे हैं जिससे हाईवे जाम हो गए हैं. तेहरान के एक बैंक कर्मचारी बीजन ने बताया, “हर रात मैं और मेरी पत्नी बेसमेंट में छिपते हैं. पूरा शहर खाली है. हर तरफ बस धुआं और खून है.”
वैश्विक बाज़ारों में भारी गिरावट देखी गई है. कच्चे तेल की कीमतें दो दिनों में 15% बढ़ गई हैं और यूरोप में नेचुरल गैस के दाम 40% तक चढ़ गए हैं. ईरान ने इसे बिना उकसावे वाला हमला बताया है और कहा है कि मरने वालों की संख्या 800 के क़रीब पहुँच रही है. रिपोर्ट में यह भी पुष्टि की गई है कि अमेरिका-इज़राइल अभियान में पहले ही दिन ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए, जो संभवतः इतिहास में पहली बार है जब किसी राष्ट्र प्रमुख की हत्या हवाई हमले से हुई हो.
रूबियो के बयान से ‘मागा ’ और इज़राइल को लेकर रिपब्लिकन पार्टी में दरार
अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट मार्को रूबियो के एक बयान ने रिपब्लिकन पार्टी के ‘अमेरिका फर्स्ट’ खेमे में भूचाल ला दिया है. एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, रूबियो ने प्रभावी रूप से यह स्वीकार कर लिया कि इज़राइल ने ही अमेरिका को ईरान के साथ युद्ध में घसीटा है. रूबियो ने कैपिटल हिल पर संवाददाताओं से कहा, “हमें पता था कि इज़राइल कार्रवाई करने वाला है और इससे अमेरिकी सेना पर हमले शुरू हो जाएंगे. इसलिए हमें पता था कि अगर हमने पहले हमला नहीं किया, तो हमारा ज़्यादा नुक़सान होगा.”
इस बयान का मतलब यह निकाला गया कि अमेरिका अपने छोटे सहयोगी देश इज़राइल को हमला करने से रोक नहीं पाया, इसलिए अमेरिका को भी युद्ध में कूदना पड़ा. हलांकि, बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने सफ़ाई दी कि ट्रम्प ने यह आदेश इसलिए दिया क्योंकि ईरान परमाणु समझौते पर ग़लत नीयत से बात कर रहा था. लेकिन रूबियो के बयान ने ट्रम्प समर्थकों (मागा) को नाराज़ कर दिया है, जो पहले ही युद्ध के ख़िलाफ़ थे. ट्रम्प समर्थक इन्फ्लुएंसर्स का कहना है कि राष्ट्रपति उन ‘युद्ध-प्रेमियों’ के दबाव में आ गए हैं जिनके ख़िलाफ़ उन्होंने चुनाव लड़ा था.
‘द डेली वायर’ के मैट वॉल्श ने लिखा कि रूबियो का यह कहना कि “इज़राइल ने हमें मजबूर किया,” सबसे ख़राब बात है जो वो कह सकते थे. व्हाइट हाउस ने भी डैमेज कंट्रोल की कोशिश की है, लेकिन पार्टी के अंदर मतभेद साफ़ नज़र आ रहे हैं. ट्रम्प के समर्थक जैसे लॉरा लूमर ने ट्रम्प के फ़ैसले की तारीफ़ की है, लेकिन निक फ्यूंटेस जैसे आलोचकों ने इसे “इज़राइल के लिए आक्रामक युद्ध” क़रार दिया है.
मध्य पूर्व संघर्ष में कूदकर ट्रम्प ने अपने राष्ट्रपति पद को दांव पर लगाया
ईरान पर हमले के फ़ैसले के साथ राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने कार्यकाल का सबसे बड़ा जुआ खेला है. न्यूयॉर्क टाइम्स के टाइलर पेजर की रिपोर्ट बताती है कि इस युद्ध में अब तक छह अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं और कई जेट मार गिराए गए हैं. तेल की बढ़ती क़ीमतों और बाज़ार की उथल-पुथल के बीच ट्रम्प, जिन्होंने “शांतिदूत” बनने का वादा किया था, अब 2003 के इराक युद्ध के बाद के सबसे बड़े सैन्य संघर्ष का नेतृत्व कर रहे हैं.
ट्रम्प अपनी रैलियों में अयातुल्ला खामेनेई की हत्या और ईरानी सैन्य ठिकानों की तबाही को एक बड़ी सफ़लता के रूप में पेश कर रहे हैं. लेकिन इतिहास गवाह है कि मध्य पूर्व के युद्ध अमेरिकी राष्ट्रपतियों के लिए मुसीबत साबित हुए हैं. जॉर्ज डब्ल्यू. बुश और जिमी कार्टर की विरासत इसी क्षेत्र के संघर्षों से प्रभावित हुई थी.
चुनावों से ठीक पहले यह युद्ध रिपब्लिकन पार्टी के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर सकता है. एक सीएनएन पोल के मुताबिक़ 59% अमेरिकी इस हमले के ख़िलाफ़ हैं. डेमोक्रेटिक पार्टी ने आरोप लगाया है कि ट्रम्प ने 13 महीनों में 7 देशों में हमले किए हैं और वे घरेलू आर्थिक मुद्दों से ध्यान भटका रहे हैं. ट्रम्प के अपने समर्थक भी बंटे हुए हैं. मार्जोरी टेलर ग्रीन जैसी नेताओं ने इसे “अमेरिका फर्स्ट” के वादे के ख़िलाफ़ बताया है. हालाँकि, ट्रम्प का मानना है कि उनका ‘मागा’ बेस उनके हर फ़ैसले का समर्थन करेगा, लेकिन जानकारों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा और अमेरिकी हताहत बढ़ीं, तो नतीजे ख़तरनाक हो सकते हैं.
कुवैत में बिना किसी चेतावनी के ईरानी हमले में 6 अमेरिकी सैनिक मारे गए
ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे इस युद्ध में पहली बार अमेरिकी सैनिकों की जान गई है. सीएनएन की हेली ब्रिट्स्की की रिपोर्ट के मुताबिक़, कुवैत के शुएबा बंदरगाह पर बने एक अस्थायी ऑपरेशन सेंटर पर ईरान ने सीधा हमला किया, जिसमें 6 अमेरिकी सर्विस मेंबर्स की मौत हो गई. एक सूत्र ने बताया कि यह हमला रविवार की सुबह हुआ और यह एक “डायरेक्ट हिट” था.
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि हमले से पहले न तो कोई चेतावनी मिली और न ही कोई सायरन बजा, जिससे सैनिकों को बंकर में जाने का मौक़ा ही नहीं मिला. धमाका इतना ज़बरदस्त था कि इमारत की दीवारें बाहर की तरफ उड़ गईं और अंदर सब कुछ काला पड़ गया. सेंट्रल कमांड ने पुष्टि की है कि एक प्रोजेक्टाइल (संभवतः ड्रोन) एयर डिफेंस को चकमा देकर भीतर घुस गया.
शुरुआत में तीन सैनिकों के मारे जाने की ख़बर थी, लेकिन मलबे से बाद में और शव बरामद हुए. ये सैनिक केंटकी के फोर्ट नॉक्स स्थित ‘प्रथम थिएटर सस्टेनमेंट कमांड’ का हिस्सा थे. जनरल डैन केन ने मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें राष्ट्र का सर्वोत्तम उदाहरण बताया है. ट्रम्प प्रशासन ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में और भी जानें जा सकती हैं.
ग्लोबल साउथ ने अमेरिका-इज़राइल युद्ध को ‘साम्राज्यवादी’ बताकर निंदा की
ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमले की ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) ने कड़ी निंदा की है और इसे अवैध बताया है. गार्डियन के सईद शाह की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने एक संप्रभु देश के नेता (अयातुल्ला खामेनेई) की हत्या को अस्वीकार्य बताया है. दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने इसे “प्री-एम्पटिव” (पहले से किया गया) हमला मानने से इंकार करते हुए कहा कि आत्मरक्षा केवल सशस्त्र आक्रमण के जवाब में ही जायज़ है.
ब्राज़ील, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों ने भी चिंता जताई है कि बातचीत के रास्ते बंद किए बिना ही हमले शुरू कर दिए गए. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय कानून किसी भी राष्ट्राध्यक्ष को निशाना बनाने की इजाज़त नहीं देता. कई विश्लेषक इस युद्ध को “औपनिवेशिक” नज़रिए से देख रहे हैं.
जोहान्सबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सिफामंडला ज़ोंडी ने कहा, “यह वर्चस्व और अधीनता का युद्ध है, जिसके पीछे साम्राज्यवादी इरादे हैं.” विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका अब सिर्फ़ ज़बरदस्ती और ताक़त के दम पर काम कर रहा है, जिससे दुनिया भर में अमेरिका के ख़िलाफ़ गुस्सा बढ़ रहा है और चीन जैसे देशों का प्रभाव बढ़ सकता है.
खामेनेई की हत्या उल्टा दांव साबित होगी
युद्ध के दौरान दुश्मन के शीर्ष नेता को मारना एक पसंदीदा रणनीति हो सकती है, लेकिन मध्य पूर्व में यह अक्सर तबाही लाती है. अल जज़ीरा के दाऊद कुत्ताब अपने विश्लेषण में लिखते हैं कि ट्रम्प और नेतन्याहू भले ही अयातुल्ला खामेनेई की हत्या को अपनी जीत मान रहे हों, लेकिन 86 वर्षीय बीमार नेता को मारने से ज़मीनी हक़ीक़त नहीं बदलेगी.
इतिहास गवाह है कि “सिर कलम करने” की रणनीति इस क्षेत्र में हमेशा फ़ेल हुई है. सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद इराक में जो शून्य पैदा हुआ, उसने आईएसआईएस को जन्म दिया. इज़राइल ने हमास और हिज़्बुल्लाह के कई नेताओं को मारा, लेकिन इससे उनका प्रतिरोध ख़त्म नहीं हुआ, बल्कि और उग्र नेता पैदा हुए.
ईरान के मामले में भी, खामेनेई की जगह जो भी आएगा, उसके अमेरिका के साथ समझौते करने की संभावना बेहद कम होगी. अगर ईरान में सत्ता बिखरती है, तो इराक और लीबिया जैसा अराजक माहौल बन सकता है जो अमेरिका और यूरोप के लिए बड़ा ख़तरा होगा. लेखक का मानना है कि नेतन्याहू के लिए यह अपनी सत्ता बचाने का ज़रिया हो सकता है, लेकिन ट्रम्प एक ऐसे युद्ध में फंस रहे हैं जिसका कोई अंत नहीं है और जो अंततः अमेरिका की साख को नुक़सान पहुँचाएगा.
खामेनेई की हत्या पर राहुल गांधी ने पीएम मोदी की चुप्पी पर उठाए सवाल, पूछा- क्या हत्या का समर्थन करते हैं?
मंगलवार को कांग्रेस ने अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर सरकार की चुप्पी के लिए उसकी कड़ी आलोचना की. पश्चिम एशिया में जारी संकट का जिक्र करते हुए लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूछा कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खामेनेई की हत्या का समर्थन करते हैं.
‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, उन्होंने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, “पीएम मोदी को बोलना चाहिए. क्या वह विश्व व्यवस्था को परिभाषित करने के एक तरीके के रूप में किसी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या का समर्थन करते हैं? इस समय की चुप्पी दुनिया में भारत के कद को कम करती है.”
स्थिति पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती शत्रुता एक नाजुक क्षेत्र को व्यापक संघर्ष की ओर धकेल रही है. उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों की ओर से किए गए हमलों की निंदा की जानी चाहिए.
उन्होंने कहा, “लगभग एक करोड़ भारतीयों सहित करोड़ों लोग अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं... जबकि सुरक्षा चिंताएं वास्तविक हैं, संप्रभुता का उल्लंघन करने वाले हमले संकट को और खराब करेंगे. ईरान पर एकतरफा हमलों के साथ-साथ अन्य मध्य पूर्वी देशों पर ईरान के हमलों की भी निंदा की जानी चाहिए. हिंसा से हिंसा ही पैदा होती है - संवाद और संयम ही शांति का एकमात्र रास्ता है.”
सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए गांधी ने कहा कि भारत को नैतिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए. उनकी पोस्ट में कहा गया, “हमें अंतरराष्ट्रीय कानून और मानव जीवन की रक्षा में स्पष्ट रूप से बोलने का साहस रखना चाहिए. हमारी विदेश नीति संप्रभुता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में निहित है- और इसे निरंतर (एक समान) बने रहना चाहिए.”
सोनिया गांधी: ईरानी नेता की हत्या पर सरकार की चुप्पी तटस्थता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का त्याग है
कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की लक्षित हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी को लेकर कड़ी आलोचना की है. उन्होंने कहा कि यह चुप्पी तटस्थता नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी से पीछे हटना है. इससे भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं.
इंडियन एक्सप्रेस अखबार में प्रकाशित लेख में सोनिया गांधी ने लिखा कि 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह सैयद अली हुसैनी खामेनेई की एक दिन पहले अमेरिका और इज़राइल द्वारा किए गए लक्षित हमलों में हत्या कर दी गई. उन्होंने कहा कि चल रही बातचीत के बीच किसी देश के मौजूदा प्रमुख की हत्या करना अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर उथल पुथल का संकेत है.
सोनिया गांधी ने इस मामले में नयी दिल्ली की चुप्पी को चौंकाने वाला बताते हुए लिखा कि भारत सरकार ने न तो इस हत्या की निंदा की और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर कोई स्पष्ट बयान जारी किया. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआत में बड़े अमेरिकी- इज़रायली हमले का ज़िक्र किए बिना केवल ईरान की ओर से यूएई पर किए गए जवाबी हमले की आलोचना की. बाद में उन्होंने “गहरी चिंता” और “संवाद और कूटनीति” की बात कही, जबकि बातचीत पहले से चल रही थी और उसी दौरान हमले हुए.
उन्होंने कहा कि जब किसी विदेशी नेता की लक्षित हत्या पर भारत की ओर से संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून का स्पष्ट समर्थन नहीं किया जाता, तो यह हमारी विदेश नीति की दिशा पर गंभीर संदेह पैदा करता है. यह चुप्पी तटस्थ नहीं मानी जा सकती.
सोनिया गांधी ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का हवाला देते हुए कहा कि किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ बल प्रयोग या उसकी धमकी पर रोक है. किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की हत्या इन सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है. अगर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र ऐसे मामलों में आपत्ति नहीं दर्ज करता, तो अंतरराष्ट्रीय मानकों का क्षरण सामान्य बन सकता है.
उन्होंने यह भी कहा कि खामेनेई की हत्या से महज़ 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री मोदी इज़राइल यात्रा से लौटे थे, जहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू सरकार के लिए खुला समर्थन जताया था. उस समय गाज़ा संघर्ष को लेकर वैश्विक स्तर पर नागरिक हताहतों, खासकर महिलाओं और बच्चों की मौतों पर चिंता जताई जा रही थी. सोनिया गांधी ने कहा कि जब ग्लोबल साउथ के कई देश, साथ ही ब्रिक्स के साझेदार रूस और चीन दूरी बनाए हुए हैं, तब भारत का इस तरह खुला राजनीतिक समर्थन बेहद चिंताजनक है.
उन्होंने दावा किया कि भारत का मौजूदा रुख इस त्रासदी के प्रति मौन समर्थन जैसा संकेत देता है. कांग्रेस पार्टी ने ईरान में बमबारी और लक्षित हत्याओं की स्पष्ट रूप से निंदा की है और इसे क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर खतरनाक बढ़ोतरी बताया है. उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति का आधार विवादों का शांतिपूर्ण समाधान है, जैसा कि संप्रभु समानता, गैर-हस्तक्षेप और शांति को बढ़ावा देना भारत की कूटनीतिक पहचान का हिस्सा रहा है.
सोनिया गांधी ने 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तेहरान यात्रा का ज़िक्र करते हुए कहा कि उन्होंने भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंधों की पुष्टि की थी. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि आज भारत किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा में स्पष्ट रुख नहीं अपनाता, तो भविष्य में ग्लोबल साउथ के देश भारत पर कैसे भरोसा करेंगे.
उन्होंने मांग की कि जब संसद का बजट सत्र दोबारा शुरू हो, तो इस चुप्पी पर खुली और स्पष्ट बहस होनी चाहिए. लेख के अंत में सोनिया गांधी ने कहा कि भारत लंबे समय से “वसुधैव कुटुंबकम” का आदर्श पेश करता रहा है. यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि न्याय, संयम और संवाद के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है. ऐसे समय में जब नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था दबाव में है, चुप रहना जिम्मेदारी से पीछे हटना है.
श्रवण गर्ग : भारत के लिए आर्थिक और कूटनीतिक संकट की आशंका
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खमेनी की मौत और अमेरिका-इज़राइल द्वारा किए गए हमले के बाद मध्य पूर्व में युद्ध के बादल गहरा गए हैं. वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक श्रवण गर्ग ने आगाह किया है कि इस संघर्ष में भारत की चुप्पी और इज़राइल के प्रति झुकाव देश की अर्थव्यवस्था और खाड़ी में रहने वाले लाखों भारतीयों के लिए भारी पड़ सकता है. ‘हरकारा डीप डाइव’ पर निधीश त्यागी के साथ बातचीत में श्रवण गर्ग ने इसे “वॉर फॉग” (युद्ध का कोहरा) करार देते हुए कहा कि डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के इस कदम ने ईरान में कट्टरपंथ को और मजबूत कर दिया है.
गर्ग ने कहा कि भारत वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ता दिख रहा है. जहां ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के प्रमुख देशों—रूस, चीन और ब्राजील—ने ईरान पर हमले की निंदा की है, वहीं भारत ने इस पर चुप्पी साध रखी है. उन्होंने कहा, “पीएम मोदी की इज़राइल यात्रा और वहां हुए 17 समझौतों के बाद भारत के पास अब पीछे हटने का रास्ता नहीं बचा है. ऐसा लगता है कि पीएम मोदी ने बिना संसद या विपक्ष को विश्वास में लिए देश को एक विशेष दिशा में मोड़ दिया है.”
महंगाई और प्रवासियों पर खतरा
विश्लेषण के अनुसार, भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता खाड़ी देश हैं. यूएई में 36 लाख और पूरे क्षेत्र में लगभग 1 करोड़ भारतीय रहते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं. पीएम मोदी की इज़राइल यात्रा के बाद सऊदी अरब द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए प्रतिबंधों का हवाला देते हुए गर्ग ने कहा कि भारतीयों की नौकरियों पर तलवार लटक रही है.
इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में 10% की बढ़ोतरी हो चुकी है. खाड़ी के समुद्री रास्ते बंद होने और तेल की कीमतें बढ़ने से भारत में पेट्रोल-डीजल और अन्य सामानों की कीमतें आसमान छू सकती हैं.
ट्रंप का गलत आकलन
चर्चा में यह बात भी सामने आई कि अमेरिका ने ईरान की सैन्य क्षमता और रणनीतिक गहराई को कम करके आंका. ईरान की जनता अब अपने नेतृत्व के साथ और मजबूती से खड़ी हो गई है, जिससे वहां किसी भी तरह के सत्ता परिवर्तन की संभावना खत्म हो गई है. श्रवण गर्ग ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रंप इस युद्ध से जल्दी निकलना चाहते थे, लेकिन अब वे और इज़राइल एक लंबी लड़ाई में फंस चुके हैं, जिसका खामियाजा भारत जैसे तेल आयातक देशों को भुगतना पड़ेगा.
खामेनेई की हत्या के विरोध में श्रीनगर में दूसरे दिन भी इंटरनेट बंद और पाबंदियां जारी
निकिता जैन की रिपोर्ट है कि अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले के विरोध में जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में लगातार दूसरे दिन इंटरनेट ठप रहा और पाबंदियां जारी रहीं. ईरान के धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर आक्रोश व्यक्त करने के लिए श्रीनगर, बडगाम और घाटी के अन्य हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए.
इस बीच, अधिकारियों ने बताया कि प्रदर्शनों के दौरान छह सुरक्षाकर्मियों सहित कम से कम 14 लोग घायल हुए हैं. पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोलों का सहारा लिया, वहीं कुछ वीडियो में महिलाओं को पुलिस द्वारा पीटे जाते हुए भी देखा गया है.
ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे पत्रकारों ने ‘मकतूब’ को बताया कि स्थिति बहुत गंभीर है और कई शिया-बहुल इलाकों में सख्त कर्फ्यू लागू है. नाम न छापने की शर्त पर एक स्वतंत्र पत्रकार ने कहा, “इंटरनेट बंद है और मुख्य रूप से शिया-बहुल क्षेत्रों में आवाजाही पर रोक है. बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए हैं.”
श्रीनगर के निवासी उमर ने बताया कि अनुच्छेद 370 के हटने के बाद “यह पहली बार है जब कश्मीर में इतने तीव्र विरोध प्रदर्शन देखे गए हैं.” उन्होंने आगे कहा, “हम इस बात से गुस्से में हैं कि उन्होंने हमारे रहबर (नेता) को कैसे मार दिया. इन क्रूर साम्राज्यवादी ताकतों को बाहर निकलना होगा.”
श्रीनगर और घाटी के अन्य हिस्सों में जम्मू-कश्मीर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की भारी टुकड़ी तैनात की गई है और नागरिक आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. श्रीनगर के ऐतिहासिक लाल चौक को टिन की चादरों और कटीले तारों से सील कर दिया गया, जबकि शहर की ओर जाने वाली सड़कों को ब्लॉक कर दिया गया.
अमेरिका में एक ही रात में गैस (पेट्रोल) की औसत कीमत 11 सेंट बढ़कर लगभग $3.11 हुई
मोटर क्लब एएए (अमेरिकन ऑटोमोबाइल एसोसिएशन) के अनुसार, अमेरिका में एक गैलन गैसोलीन (पेट्रोल) की औसत कीमत रातों-रात 11 सेंट बढ़कर लगभग $3.11 हो गई है.
‘एपी’ के अनुसार, ईरान पर अमेरिका द्वारा हमले शुरू किए जाने से पहले ही गैस की कीमतें बढ़ रही थीं, क्योंकि रिफाइनरियां ईंधन के ‘समर ब्लेंड’ (गर्मी के मिश्रण) की ओर स्विच कर रही हैं. हालांकि, युद्ध के कारण इस सप्ताह कच्चे तेल के वायदा भाव में भारी उछाल आया है.
मंगलवार को, तेल वायदा उन स्तरों पर पहुंच गया जो एक साल से अधिक समय में नहीं देखे गए थे, क्योंकि ईरान ने जवाबी हमलों की एक श्रृंखला शुरू की, जिसमें सऊदी अरब में अमेरिकी दूतावास पर ड्रोन हमला भी शामिल था.
अमेरिकी कच्चे तेल का बेंचमार्क 8.6% उछलकर $77.36 प्रति बैरलपर पहुंच गया. अंतरराष्ट्रीय मानक, ब्रेंट क्रूड, 6.7% बढ़कर $81.29 प्रति बैरलहो गया. सप्ताह की शुरुआत में वैश्विक तेल कीमतों में इस चिंता के कारण उछाल आया कि युद्ध कच्चे तेल के वैश्विक प्रवाह को बाधित कर सकता है.
नेपाल के जेन-जी ने पुरानी पार्टियों को उखाड़ फेंका था, क्या अब अहम चुनाव में वे उन्हें वोट देंगे?
काठमांडू, नेपाल. अल जजीरा के लिए समिक खरेल की रिपोर्ट के अनुसार, जैसे-जैसे नेपाल 5 मार्च को होने वाले महत्वपूर्ण संसदीय चुनाव की ओर बढ़ रहा है, हिमालयी देश की स्थापित राजनीतिक पार्टियां न केवल वोटों के लिए, बल्कि अपनी वैधता के लिए भी लड़ रही हैं. इस वैधता को पिछले साल सितंबर में तब चुनौती दी गई थी जब हजारों नेपाली युवा सड़कों पर उतर आए थे और दो दशकों से नेपाल की राजनीति पर हावी बूढ़े नेतृत्व से पद छोड़ने की मांग की थी.
एक सोशल मीडिया प्रतिबंध से शुरू हुआ जेन-जी के नेतृत्व वाला यह विरोध प्रदर्शन जल्द ही एक व्यापक विद्रोह में बदल गया. स्थिर अर्थव्यवस्था और सत्ताधारी कुलीन वर्ग के बीच भ्रष्टाचार से नाराज जनता ने 74 वर्षीय प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देने और एक अंतरिम सरकार बनाने के लिए मजबूर कर दिया. इन विरोध प्रदर्शनों में कम से कम 77 लोग मारे गए थे. यह घटना स्थापित राजनीतिक दलों के प्रति जनता के मोहभंग को दर्शाती है, जिनमें ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनिफाइड मार्क्सवादी लेनिनवादी, पूर्व माओवादी विद्रोहियों वाली नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी और मध्यमार्गी नेपाली कांग्रेस पार्टी शामिल हैं.
गुरुवार को होने वाले मतदान से पहले, इन पार्टियों ने दावा किया है कि उन्होंने पिछले साल के विद्रोह से सबक सीखा है और भ्रष्टाचार से निपटने का वादा किया है. लेकिन युवा कार्यकर्ता पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं. राजधानी काठमांडू के 27 वर्षीय बिजनेस छात्र राजेश चंद के लिए यह चुनाव अब पार्टी के लेबल के बारे में नहीं है. उन्होंने अल जजीरा से कहा, “मैं पुरानी या नई पार्टियों में दिलचस्पी नहीं रखता. मुझे दिलचस्पी इस बात में है कि हम इस देश को सही दिशा में कैसे आगे ले जा सकते हैं. देश डूब रहा है. हमें भ्रष्टाचार रोकना होगा.”
आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक, 26 वर्षीय रक्षा बाम का कहना है कि बहस को केवल ‘पुराने बनाम नए’ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर कोई पुरानी पार्टी भी सुधार के एजेंडे का समर्थन करती है, तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन उनकी नज़र उन पर बनी रहेगी. नेपाली कांग्रेस (एनसी) के वरिष्ठ नेता मिनेंद्र रिजाल ने स्वीकार किया कि विद्रोह के दौरान ओली के अहंकार ने उनकी पार्टी की छवि को भी नुकसान पहुंचाया. हालांकि, पार्टी ने अब गगन कुमार थापा (49) को अपना नया चेहरा बनाया है और गलतियों के लिए माफी मांगी है.
दूसरी ओर, ओली की सीपीएन- यूएमएल के लिए 5 मार्च का चुनाव अस्तित्व और नवीनीकरण दोनों की लड़ाई है. ओली सरकार में पूर्व मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग इसे लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई बताते हैं. उनका तर्क है कि उनकी पार्टी ने जेन-जी के कई नेताओं को शामिल किया है. हालांकि, विरोधाभास यह है कि जिन ओली के सोशल मीडिया बैन से विरोध शुरू हुआ था, वही फिर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. गुरुंग का कहना है कि सोशल मीडिया को विनियमित करना जरूरी था, बस समय गलत था.
राजनीतिक वैज्ञानिक सुचेता प्याकुरेल का मानना है कि मुख्यधारा की पार्टियों की लापरवाही ने जनता के गुस्से को इस स्तर तक पहुंचाया. नेपाल की मिश्रित चुनावी प्रणाली अक्सर गठबंधन सरकारों और अस्थिरता को जन्म देती है, जिससे जेन-जी चिंतित है. 5 मार्च को लगभग 1.9 करोड़ नेपाली मतदाता 275 सदस्यीय संसद का चुनाव करेंगे, जिनमें 8 लाख पहली बार वोट देने वाले मतदाता हैं.
युवाओं को लुभाने के लिए पार्टियों ने अपने घोषणापत्रों को “वचन पत्र” के रूप में रीब्रांड किया है. ओली के जिस सोशल मीडिया बैन से विरोध शुरू हुआ था, उसकी जगह अब युवाओं के लिए 10 जीबी डेटा और युवा उद्यमियों के लिए फंड के वादे ने ले ली है. प्याकुरेल इसे “राजनीतिक उपभोक्तावाद” कहती हैं, जहां पार्टियां खुद को रीपैकेज करके बेच रही हैं.
इस बीच, रैपर और काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह (35) प्रधानमंत्री पद के लिए एक प्रमुख दावेदार बनकर उभरे हैं. वह ओली के खिलाफ झापा-5 सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. बालेन शाह जेन-जी के बीच बेहद लोकप्रिय हैं और अपने काम पर जोर देते हैं (”मुझे बात करना नहीं आता, मुझे काम करना आता है”). हालांकि, पारंपरिक पार्टियां उन्हें बिना किसी विचारधारा वाला नेता बताकर खारिज कर रही हैं. लेकिन विश्लेषकों का सवाल है कि क्या पुरानी पार्टियों ने खुद उन विचारधाराओं का पालन किया है जिनका वे दावा करती हैं? बिना इन सवालों के जवाब के मतदान की प्रक्रिया अधूरी है.
निज्जर हत्याकांड: कनाडाई रिपोर्ट में भारतीय राजनयिकों पर साज़िश का आरोप, भारत ने दावों को किया खारिज
कनाडा में एक बार फिर खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का मामला गरमा गया है. ‘अल जजीरा’ ने ‘द ग्लोब एंड मेल’ की एक रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि वैंकूवर में तैनात भारतीय वाणिज्य दूतावास के अधिकारी 2023 में हुई इस हत्या से जुड़े हो सकते हैं. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद कनाडा में सिख समुदाय के अधिवक्ताओं ने गहरी चिंता व्यक्त की है.
‘वर्ल्ड सिख ऑर्गनाइजेशन ऑफ कनाडा’ ने कहा कि वे इस खबर से “बेहद परेशान” हैं. अखबार ने कानून प्रवर्तन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दो अज्ञात सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि वैंकूवर में भारतीय वाणिज्य दूतावास के एक वीज़ा अधिकारी—जिसके बारे में माना जाता है कि वह भारत की खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ का अधिकारी था—ने निज्जर के बारे में जानकारी जुटाने के लिए अपने पद का इस्तेमाल किया.
रिपोर्ट के अनुसार, यह जानकारी नई दिल्ली में एक अन्य रॉ अधिकारी को दी गई, जिसने लॉरेंस बिश्नोई गैंग से संपर्क किया. सूत्रों का कहना है कि गैंग के एक कनाडा स्थित सदस्य ने निज्जर की हत्या की व्यवस्था करने में मदद की. निज्जर की जून 2023 में ब्रिटिश कोलंबिया के सरे में एक गुरुद्वारे के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.
भारत का कड़ा जवाब
भारत के विदेश मंत्रालय के सचिव पेरियासामी कुमारन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है. उन्होंने पत्रकारों से कहा कि भारत “अंतरराष्ट्रीय हिंसा या संगठित अपराध में संलिप्तता के आरोपों को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करता है.” उन्होंने कहा कि बार-बार अनुरोध करने के बावजूद बिना किसी ठोस सबूत के लगाए गए ये दावे राजनीति से प्रेरित और बेबुनियाद हैं.
मार्क कार्नी की यात्रा और विवाद
यह विवाद ऐसे समय में फिर से उभरा है जब कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी सोमवार को अपनी भारत यात्रा समाप्त कर रहे थे. 2 मार्च, 2026 को नई दिल्ली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगाए गए टैरिफ और धमकियों के बीच कनाडा अपने व्यापारिक साझेदारों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है. हालांकि, सिख कार्यकर्ताओं ने कार्नी की आलोचना करते हुए आरोप लगाया है कि उन्होंने व्यापार के लिए मानवाधिकारों को किनारे कर दिया है. डबल्यूएसओ ने कार्नी से मांग की है कि जांच का दायरा केवल शूटरों तक सीमित न रहे, बल्कि हत्या का निर्देश देने वाले भारतीय अधिकारियों तक भी जाए.
कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद ने नई दिल्ली में कहा कि कनाडा राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून प्रवर्तन पर भारत के साथ सहयोग जारी रखेगा. उन्होंने बिश्नोई गैंग को प्रतिबंधित करने का जिक्र किया, लेकिन निज्जर मामले में सीधे टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि मामला अभी जांच के अधीन है.
मेटा ने भारत में ‘कश्मीर लाइफ’ के फेसबुक और इंस्टाग्राम पेज ब्लॉक किए
कश्मीर स्थित एक स्वतंत्र समाचार पोर्टल, ‘कश्मीर लाइफ’ के फेसबुक और इंस्टाग्राम पेज सोमवार दोपहर को भारत में एक्सेस के लिए बंद हो गए. मेटा ने कानून प्रवर्तन अधिकारियों के अनुरोध पर इन पेजों तक पहुंच को प्रतिबंधित कर दिया है. मीडिया संस्थान ने कहा कि एक्सेस ब्लॉक किए जाने से पहले कोई पूर्व सार्वजनिक नोटिस या संचार नहीं दिया गया था.
इसके बाद, मेटा ने पेज पर एक ऑटो-रिस्पॉन्स (स्वचालित प्रतिक्रिया) लगाया, जिसमें कहा गया कि उसने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(b) के तहत ‘भारत सरकार और कानून प्रवर्तन’ से प्राप्त एक नोटिस के अनुसरण में भारत में इस कंटेंट तक पहुंच को प्रतिबंधित कर दिया है.
राजस्थान के भिवाड़ी में कथित गौ-तस्करों और गौ-रक्षकों के बीच झड़प के दौरान मुस्लिम युवक की मौत
सोमवार तड़के राजस्थान के भिवाड़ी में कथित गौ-तस्करों और गौ-रक्षकों के बीच हुई झड़प में आमिर नामक एक युवक की मौत हो गई. इस घटना के बाद मृतक के परिजनों ने विरोध प्रदर्शन किया, जिनका आरोप है कि आमिर को गौ तस्कर मानकर गोली मार दी गई. हालांकि, पुलिस का कहना है कि मौत के सटीक कारणों की पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही हो पाएगी.
भिवाड़ी डीएसपी कैलाश चौधरी के अनुसार, चौपानकी थाने को सुबह करीब 5 बजे सूचना मिली कि मवेशियों से लदा एक पिकअप ट्रक टपूकड़ा से तावडू की ओर जा रहा है और कुछ लोग उसका पीछा कर रहे हैं. जल्द ही सारे कलां गांव के पास दोनों पक्षों का आमना-सामना हो गया.
कथित तौर पर इस झड़प के दौरान दोनों समूहों के बीच पथराव हुआ. इस बीच, हरियाणा के उटावड़ गांव के निवासी आमिर के रूप में पहचाने गए एक युवक को गंभीर चोटें आईं. उसे भिवाड़ी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.
राजेश असनानी की रिपोर्ट के अनुसार, मृतक के परिवार ने आमिर की गौ-तस्करी में किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया है. उनका दावा है कि जब हिंसा भड़की, तब वह केवल सड़क किनारे खड़ा था.
आमिर के मामा याह्या खान ने बताया कि आमिर ड्राइवर का काम करता था. वह शादीशुदा था और परिवार में उसकी पत्नी और दो साल की बेटी है. परिवार के अनुसार, वह नूंह मेवात के उटावड़ से सारे कलां गांव एक वाहन लेने आया था और अपने दोस्त के साथ सड़क किनारे इंतजार कर रहा था, तभी मवेशियों से लदा एक पिकअप ट्रक वहां से गुजरा.
याह्या खान ने आरोप लगाया, “पिकअप ट्रक तो वहां से निकल गया, लेकिन कुछ लोगों ने गलती से आमिर और उसके दोस्त को गौ-तस्कर समझ लिया. उन्होंने अपने वाहन से उन्हें टक्कर मारी और उन पर हमला कर दिया. पाँच से छह राउंड गोलियां चलाई गईं. एक गोली आमिर की आँख के पास लगी और वह जमीन पर गिर पड़ा.”
उन्होंने आगे दावा किया कि तीन वाहनों में 15 से 20 लोग आए और हमले के बाद भिवाड़ी की ओर भाग गए. चौपानकी पुलिस को तुरंत सूचित किया गया और आमिर को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया.
पुलिस का पक्ष रखते हुए डीएसपी कैलाश चौधरी ने कहा कि सारे कलां गांव के पास कथित पशु तस्करों की मदद के लिए एक पिकअप ट्रक में पांच से छह लोग पहुंचे थे. उन्होंने बताया कि आमिर उसी पिकअप वाहन में था, जिसमें कथित तौर पर पत्थर भरे हुए थे, और वह झड़प के दौरान पत्थरबाजी करने वालों में शामिल था.
डीएसपी ने आगे कहा कि पत्थरबाजी के दौरान आमिर घायल हो गया और बाद में उसकी मौत हो गई. गोलीबारी के आरोप के संबंध में उन्होंने कहा कि विस्तृत जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि मौत गोली लगने से हुई या पत्थरबाजी के दौरान आई चोटों के कारण.
घटना के बाद मृतक के परिजनों और ग्रामीणों की भारी भीड़ चौपानकी थाने पर जमा हो गई और विरोध प्रदर्शन किया. परिवार ने आरोप लगाया कि गोलीबारी में बजरंग दल के सदस्य शामिल थे और उन्होंने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की.
याद रहे कि राजस्थान में पिछले एक दशक में गौ-तस्करी के आरोपों से जुड़ी हिंसा की कई घटनाएं देखी गई हैं. इनमें सबसे चर्चित मामला 2017 में अलवर में पहलू खान की हत्या का था, जिसने देश भर में आक्रोश पैदा किया था. 2018 में, अलवर जिले में ही एक ऐसी ही घटना में रकबर खान की कथित तौर पर लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) कर दी गई थी. इन मामलों ने राज्य में गौ-सतर्कता और कानून प्रवर्तन पर बहस को तेज कर दिया है, जिससे अदालतों और प्रशासन की ओर से सख्त निर्देश जारी किए गए हैं.
यूनिवर्सिटी कैंपस में खामोशी का अब नया नियम, चिंता और घबराहट के केंद्र
विश्वविद्यालय अब चिंता और घबराहट के केंद्र बनते जा रहे हैं, जहाँ विवादों से बचने के लिए चुपचाप ‘आत्म नियंत्रण’ (सेल्फ-सेंसरशिप) का सहारा लिया जा रहा है. यह एक ऐसा ‘फॉस्टियन सौदा’ (क्षणभंगुर लाभ के लिए आत्मा का सौदा) है, जिसमें बौद्धिक जिज्ञासा दम तोड़ देती है. असगर अली इंजीनियर की यह चेतावनी कि शैक्षणिक संस्थान वैकल्पिक विचारों के अभयारण्य के रूप में अपनी भूमिका छोड़ रहे हैं, आज और भी सच प्रतीत होती है.
क्राइस्ट, बेंगलुरु के पूर्व प्रोफेसर जॉन जे कैनेडी ने ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखा है कि भारत के विश्वविद्यालय परिसर, जो कभी बौद्धिक जोखिम और वैचारिक मतभेदों के लिए जाने जाते थे, आज सहमे हुए से लगते हैं. हवा में एक नई तरह की सावधानी घुली हुई है, जो बातचीत और खामोशी दोनों को नया आकार दे रही है. यह भयावह बदलाव किसी बड़े दमन के जरिए नहीं, बल्कि छोटे-छोटे क्रमिक निर्णयों के माध्यम से आया है, जिसने सामूहिक रूप से कई उच्च शिक्षण संस्थानों की शैक्षणिक भावना को बदल दिया है.
किसी व्याख्यान का चुपचाप रद्द होना, ‘विवादास्पद’ वक्ताओं को आमंत्रित करके मना कर देना, या पाठ्यक्रम से किसी असहज विषय को हटा देना—ये सब अब आम बात होती जा रही है. ये निर्णय व्यक्तिगत रूप से मामूली और व्यावहारिक लग सकते हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन इन्हें ध्रुवीकरण के दौर में ‘आवश्यक सावधानी’ बताता है. लेकिन कुलमिलाकर, ये निर्णय एक समय के जीवंत और बहुलवादी भारतीय विश्वविद्यालय को जिज्ञासा के बजाय चिंता द्वारा परिभाषित स्थान में बदलने का संकेत देते हैं.
दशकों तक, भारत के परिसर (कैम्पस) वैचारिक संघर्ष के अखाड़े थे. लेक्चर हॉल न्याय, विकास और पहचान जैसे विविध विषयों पर बहस से गूंजते थे. प्रोफेसर अक्सर सार्वजनिक रूप से असहमत होते थे और इस असहमति को एक विद्वत्तापूर्ण गुण के रूप में पेश करते थे. छात्रों ने अपने शिक्षकों से सीखा कि ज्ञान आम सहमति से नहीं, बल्कि विचारों के घर्षण से बढ़ता है. दुर्भाग्य से, वह लोकाचार अब ओझल हो रहा है. अधिक चिंता की बात यह है कि अब बौद्धिक चुनौती के बजाय ‘सुरक्षा की तलाश’ इसकी जगह लेती जा रही है. यह तब स्पष्ट होता है जब विश्वविद्यालय प्रबंधन विवादास्पद निर्णयों को ‘जोखिम प्रबंधन’ की भाषा में पेश करता है—जैसे प्रतिष्ठा की चिंता, नियामक दबाव या सुरक्षा का खतरा. ये चिंताएँ वास्तविक हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रशासक आज न केवल राजनीतिक ताकतों, बल्कि ऑनलाइन अभियानों और संगठित दबाव समूहों की निरंतर निगरानी में काम करते हैं. ऐसे माहौल में, सावधानी बरतना जिम्मेदार, अपरिहार्य और कभी-कभी अनिवार्य लगने लगता है.
हालाँकि, हम इस दृष्टिकोण के दूरगामी परिणामों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. यह आंतरिक सेंसरशिप एक ‘फॉस्टियन सौदा’ है. जैसा कि असगर अली इंजीनियर ने तर्क दिया था, जो संस्थान जोखिम से घबराते हैं, वे वैकल्पिक विचारों के अभयारण्य और बहुसंख्यक विमर्श के प्रतिसंतुलनके रूप में अपनी ऐतिहासिक भूमिका का त्याग कर रहे हैं. ऐसे संस्थान धीरे-धीरे ज्ञान केंद्रों से जोखिम-प्रबंधन इकाइयों में बदल रहे हैं, जहाँ बौद्धिक साहस के बजाय संस्थान के अस्तित्व को प्राथमिकता दी जा रही है.
विद्वानों ने इस परिवर्तन को ‘नागरिक समाज का निरंकुशताकरण’ कहा है, जिसमें शासन हर स्वतंत्र संस्थान को नष्ट करके नहीं, बल्कि एक व्यापक डर पैदा करके सफल होता है, जो अनिवार्य रूप से स्व-सेंसरशिप की ओर ले जाता है. परिणामस्वरूप, विश्वविद्यालय किसी भी संभावित विरोध की आशंका में पहले से ही खुद पर पहरा बिठाने लगते हैं. समय के साथ, मौन एक आदत बन जाता है, और इससे भी बदतर यह कि बौद्धिक तटस्थता को ‘संस्थागत बुद्धिमत्ता’ समझने की भूल कर दी जाती है.
यहाँ जर्मन दार्शनिक जुर्गन हेबरमास को याद करना भी सार्थक होगा, जिन्होंने विश्वविद्यालयों को ‘पब्लिक स्फीयर’ (सार्वजनिक क्षेत्र) के केंद्रीय स्थान के रूप में वर्णित किया था, जहाँ नागरिक सत्ता पर बहस करते हैं और वैकल्पिक भविष्य की कल्पना करते हैं. उनके अनुसार, जब परिसर विवादों से पीछे हटते हैं, तो सार्वजनिक क्षेत्र संकुचित हो जाता है. आज हमारे परिसरों में ठीक यही हो रहा है. अक्सर राजनीतिक ध्रुवीकरण ही इस संकट को शुरू और गहरा करता है. जब असहमति को तेजी से ‘अराजकता या निष्ठाहीनता’ के रूप में देखा जाने लगता है, तो विश्वविद्यालय नेतृत्व स्वाभाविक रूप से बौद्धिक जीवंतता के बजाय संस्थागत संरक्षण को प्राथमिकता देता है.
पेशेवर परिणामों से डरे हुए संकाय सदस्य अपने शोध एजेंडे और सार्वजनिक जुड़ाव कोसीमित कर लेते हैं. जब प्रशासनिक और शैक्षणिक नेतृत्व अपने कर्तव्य में विफल हो जाता है, तो छात्रों से क्या उम्मीद की जा सकती है? वे विश्वविद्यालय को एक ‘सिविक स्पेस’ (नागरिक स्थान) के बजाय केवल डिग्री देने वाली फैक्ट्री के रूप में देखने लगते हैं.
ये सभी रुझान एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं. जब प्रशासक सावधानी पर जोर देते हैं, तो शिक्षक और पीछे हट जाते हैं और छात्र इस संयम को सामान्य शैक्षणिक व्यवहार के रूप में अपना लेते हैं. परिणामस्वरूप, जांच और शोध के स्थान से हटकर कैंपस चुपचाप अनुपालन की जगह में बदल जाता है. हम इसकी भारी कीमत चुकाते हैं. छात्र केवल व्याख्यान से नहीं, बल्कि संस्थागत आचरण से सीखते हैं. एक रद्द किया गया सेमिनार उन्हें बताता है कि कुछ विचार परीक्षण के लिए बहुत खतरनाक हैं. एक आमंत्रित वक्ता को मना किया जाना उन्हें सिखाता है कि बौद्धिक चुनौती के परिणाम भुगतने पड़ते हैं. धीरे-धीरे, जिज्ञासा की जगह समझदारी और सावधानी ले लेती है.
इस प्रवृत्ति की राष्ट्रीय कीमत और भी बड़ी है. विश्वविद्यालय वे स्थान हैं जहाँ युवा नागरिक लोकतांत्रिक विमर्श का अभ्यास करते हैं, विरोधी विचारों को सुनते हैं, अपने तर्कों को परिष्कृत करते हैं और अपना मन बदलना सीखते हैं. जब परिसर (कैम्पस) इस भूमिका को छोड़ देते हैं, तो लोकतंत्र स्पष्ट रूप से कमजोर होता है. जो समाज बहस को हतोत्साहित करता है, वह आत्म-सुधार की क्षमता खो देता है. क्या इस दिशा को बदलना संभव है? इसका उत्तर जानने के लिए पूरा लेख यहां पढ़ सकते हैं.
उत्तरप्रदेश में ब्राह्मणों और ओबीसी के बीच फंसी भाजपा के सामने कई संकट; सपा के पीडीए ने बढ़ाया दबाव
जहाँ अखिलेश यादव की ‘पीडीए’ राजनीति ने पार्टी के लिए पिछड़ी जातियों के बीच अपनी स्थिति मजबूत करना अनिवार्य बना दिया है, वहीं भाजपा के ब्राह्मण नेता ओबीसी पर बढ़ते फोकस से नाखुश हैं. यह बेचैनी हाल ही में यूजीसी नियमों से जुड़े विवाद के दौरान खुलकर सामने आई.
“द इंडियन एक्सप्रेस” में लिज़ मैथ्यू की रिपोर्ट है कि अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले उत्तरप्रदेश में पारंपरिक जातीय समीकरण बदलाव के दौर में हैं. ऐसे में भाजपा एक जटिल संकट का सामना कर रही है, क्योंकि उसके सामने कई चुनौतियाँ हैं: अपने मुख्य आधार ‘उच्च जाति’ के बीच बढ़ता असंतोष, ओबीसी समर्थन में कमी का डर, आंतरिक गुटबाजी, और हालिया यूजीसी नियमों पर उपजी नाराजगी, जिसके कारण उच्च जातियों ने उन पर संस्थागत भेदभाव का आरोप लगाया है.
उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से लाए गए यूजीसी के समानता नियमों की उच्च जाति समूहों द्वारा व्यापक आलोचना की गई है. भाजपा के कुछ राज्य नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया है और आरोप लगाया है कि इन नियमों का दुरुपयोग उच्च जातियों के खिलाफ भेदभाव करने के लिए किया जा सकता है. इन नियमों— जो सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फिलहाल रोक दिए गए हैं— ने न केवल पार्टी के भीतर भाजपा के ओबीसी कार्ड को लेकर ब्राह्मणों की बेचैनी को उजागर किया है, बल्कि ब्राह्मण-ठाकुर समीकरणों को भी जटिल बना दिया है, जो पिछले लोकसभा चुनाव से पहले ही बिगड़ने लगे थे. संक्षेप में, यह पार्टी की व्यापक ‘हिंदू एकीकरण’ की रणनीति के लिए खतरा पैदा करता है.
भाजपा के लिए स्थिति की गंभीरता तब और बढ़ गई जब विपक्षी नेता अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपने यादव आधार से आगे बढ़कर ओबीसी समुदायों के बीच पैठ बनाने की कोशिशें तेज कर दीं. सपा ने ‘मुस्लिम-यादव’ पार्टी की छवि से हटकर पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) गठबंधन तैयार किया. इस रणनीति का फल 2024 के संसदीय चुनावों में मिला, जहाँ सपा ने 37 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 33 पर सिमट गई. अखिलेश यादव अब पश्चिमी, मध्य और पूर्वी यूपी के जिलों में गुर्जर, कुर्मी, सैनी और कुशवाहा समुदायों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं. सपा प्रमुख ने भाजपा सरकार पर ओबीसी के 27% आरक्षण को छीनने का आरोप लगाया है. भाजपा के कुछ नेताओं को डर है कि यूजीसी विवाद से सपा को अपने इन आरोपों को सच साबित करने का मौका मिल सकता है.
ब्राह्मणों की बेचैनी
ऐसे समय में जब सपा अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रही थी, यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) नियम, 2026 को पिछड़ी जातियों पर भाजपा की पकड़ मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखा गया. लेकिन, इसके साथ ही पार्टी के पारंपरिक उच्च जाति आधार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई.
अगड़ी जातियों के लगभग हर पार्टी सांसद ने कहा कि इसने भाजपा सरकार में उनके “समुदाय के विश्वास” को “चोट” पहुँचाई है. कई जिलों में पार्टी पदाधिकारियों ने इन नियमों को “काला कानून” बताते हुए अपने पदों से इस्तीफा दे दिया. भाजपा के ब्राह्मण नेता नेतृत्व से पहले ही नाराज थे, क्योंकि उन्हें केवल ब्राह्मण विधायकों की बैठक करने पर फटकार लगाई गई थी. इन नेताओं का तर्क था कि ठाकुर और ओबीसी विधायकों की ऐसी कई बैठकें हुई हैं, लेकिन उन्हें कभी नहीं टोका गया. यूजीसी नियमों पर गुस्सा इतना गहरा था कि एक ब्राह्मण नेता ने इसकी तुलना कांग्रेस के “शाह बानो क्षण” से कर दी.
भाजपा के एक ब्राह्मण नेता ने कहा, “भाजपा द्वारा ओबीसी कार्ड खेलने को लेकर उच्च जातियों में पहले से ही बहुत नाराजगी है. उन्हें लगता है कि पिछड़ा समुदाय नौकरियां ले जा रहा है और उत्तरप्रदेश व बिहार में सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी का आनंद ले रहा है. पहले एससी और एसटी की सुरक्षा के लिए ऐसे नियम थे, जिनका दुरुपयोग उच्च जातियों के खिलाफ किया जाता था, और अब इसमें ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया है. उनकी चिंताएं जायज हैं.”
आंकड़े और चुनावी चुनौतियां
हालांकि ब्राह्मण चुनावी रूप से एक निर्णायक ताकत नहीं हैं, लेकिन उन्हें राजनीति, नौकरशाही और शिक्षा जगत में एक प्रभावशाली वर्ग के रूप में देखा जाता है. एक नेता ने कहा, “समुदाय के पास कोई विकल्प नहीं है. कांग्रेस अब निजी नौकरियों में भी कोटे की बात करती है. जब तक सपा उन तक पहुँचने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाती, समुदाय को भाजपा के साथ ही रहना होगा. लेकिन वे विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं और मतदान के दिन वोट देने से बच सकते हैं.”
यह मोहभंग ऐसे समय में हो रहा है, जब राष्ट्रीय राजनीति में सुरक्षित होने के बावजूद भाजपा की यूपी में सीटों की संख्या घटी है. जहाँ लोकसभा में भाजपा की सीटें 2014 में 71 से घटकर 2019 में 62 और 2024 में 33 रह गईं, वहीं विधानसभा में भी 2017 की 312 सीटों के मुकाबले 2022 में 255 सीटें मिलीं. आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि गैर-यादव, गैर-कुर्मी ओबीसी और गैर-जाटव दलितों के बीच भाजपा का समर्थन 2019 और 2024 के बीच गिरा है.
2024 के खराब प्रदर्शन के बाद, पार्टी की समीक्षा में आंतरिक कलह को जिम्मेदार ठहराया गया, जिसमें कहा गया कि ब्राह्मण योगी आदित्यनाथ सरकार से नाखुश थे. साथ ही, ठाकुर समुदाय के बीच भी उम्मीदवारों के चयन को लेकर नाराजगी की खबरें आई थीं, जिससे सीएम खुद ताल्लुक रखते हैं.
मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद से निपटने के लिए बने कानून; इस्तेमाल के तरीकों से उठते सवाल
आर्टिकल-14 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद से निपटने के लिए बनाए गए दो खास कानून, प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), 2002 और अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (यूएपीए), 1967, अब अपने मूल उद्देश्य से आगे बढ़कर ऐसे रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं, जो संविधान की भावना पर सवाल खड़े करते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, समय के साथ इन कानूनों का दायरा इतना बढ़ा दिया गया है कि अब इनमें ज़मानत मिलना मुश्किल हो गया है, निर्दोष मानने की कानूनी धारणा कमज़ोर हुई है और बिना ट्रायल लंबे समय तक जेल में रखना सामान्य बात बनती जा रही है.
5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक्टिविस्ट उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत देने से इनकार कर दिया, जबकि पांच अन्य आरोपियों को राहत दी. इस फैसले की कई राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों, यहां तक कि पूर्व सुप्रीम कोर्ट जजों ने भी आलोचना की. लेकिन रिपोर्ट का कहना है कि यह विवाद किसी एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पीएमएलए और यूएपीए लगातार बढ़ते दायरे से जुड़ी बड़ी संरचनात्मक समस्या की ओर इशारा करता है.
कानूनों का मूल उद्देश्य क्या था?
पीएमएलए का जन्म 1990 के दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ड्रग तस्करी से जुड़े काले धन पर रोक लगाने की मुहिम से हुआ. 1990 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की घोषणा और 1998 की विशेष बैठक के बाद देशों से कहा गया कि वे ऐसे कानून बनाएं जो ड्रग्स से जुड़े पैसों की कमाई को रोक सकें. इसी पृष्ठभूमि में भारत ने पीएमएलए बनाया. इसका मक़सद था-गंभीर, सीमा-पार अपराधों से जुड़े “अपराध की आय” को ज़ब्त करना.
वहीं यूएपीए 1960 के दशक में लाया गया था, जब देश में अलगाववादी आंदोलनों और पूर्वोत्तर में उग्रवाद की चुनौतियां थीं. इसका मूल उद्देश्य था देश की एकता और अखंडता की रक्षा करना और गैरकानूनी संगठनों पर प्रतिबंध लगाना.
कैसे बढ़ा कानूनों का दायरा?
रिपोर्ट के अनुसार, समय के साथ इन दोनों कानूनों में कई संशोधन किए गए. 2018 में पीएमएलए के तहत अनुसूची में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 को जोड़ा गया. इससे पीएमएलए का इस्तेमाल सिर्फ ड्रग मनी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, जालसाज़ी और आपराधिक साजिश जैसे 30 कानूनों के तहत 156 अपराध इसमें शामिल कर दिए गए. अब सामान्य संपत्ति विवाद तक को मनी लॉन्ड्रिंग केस में बदला जा सकता है. इसी तरह 2019 में यूएपीए में संशोधन कर सरकार को यह अधिकार दे दिया गया कि वह किसी संगठन के साथ-साथ किसी व्यक्ति को भी “आतंकवादी” घोषित कर सकती है, बिना किसी ट्रायल या सज़ा के.
आंकड़े क्या बताते हैं?
2019 में यूएपीए के तहत 1,948 गिरफ्तारियां हुई थीं, जो 2023 में बढ़कर 2,914 हो गईं, यानी 49.6% की बढ़ोतरी हुई है. लेकिन 2022 में 2,636 गिरफ्तार लोगों में से सिर्फ 41 को सज़ा हुई, यानी सज़ा दर सिर्फ 1.6% रही.
इसी तरह, प्रवर्तन निदेशालय पीएमएलए के तहत 96% सज़ा दर का दावा करता है, लेकिन यह सिर्फ 25 पूरे हुए ट्रायल पर आधारित है, जबकि कुल 5,906 केस दर्ज हुए. 513 गिरफ्तारियों में से केवल 45 लोगों को सज़ा हुई, यानी वास्तविक सज़ा दर 8.77% है.
बंगाल में एसआईआर: मुस्लिम बहुल, प्रवासी आबादी वाले और कड़े मुकाबले वाली सीटों पर सबसे ज़्यादा असर
पश्चिम बंगाल में इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, बिहार और असम की तरह यहाँ विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद जारी अंतिम मतदाता सूची से पता चलता है कि 1.21 करोड़ मतदाता, यानी राज्य के लगभग हर छह में से एक वोटर, या तो “डिलीट” कर दिए गए हैं या “अंडर एडजुडिकेशन”, यानी जांच के अधीन रखे गए हैं. उनका बड़ा हिस्सा मुस्लिम बहुल, प्रवासी आबादी वाले और राजनीतिक रूप से कड़ी टक्कर वाली सीटों में केंद्रित है. यह रिपोर्ट ‘द वायर’ के लिए अपर्णा भट्टाचार्य ने लिखी है.
एसआईआर शुरू होने से पहले राज्य में कुल मतदाता 7.66 करोड़ थे. 16 दिसंबर 2025 को ड्राफ्ट लिस्ट आने के बाद यह संख्या घटकर 7.08 करोड़ रह गई. 28 फरवरी 2026 को अंतिम सूची जारी होने के बाद कुल मतदाता 7.04 करोड़ पर आ गए. यानी कुल मिलाकर, पहले के मुकाबले 61 लाख से ज़्यादा मतदाता कम हो गए.
अंतिम सूची के अनुसार 61.7 लाख मतदाताओं को “डिलीट” कर दिया गया है. 294 विधानसभा क्षेत्रों में से 140 सीटों पर डिलीट किए गए वोटरों की संख्या 2024 लोकसभा चुनाव के जीत के अंतर से ज़्यादा है. इसका मतलब है कि इन बदलावों का सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है.
इसके अलावा 60 लाख से ज्यादा मतदाता “अंडर एडजुडिकेशन” (जांच प्रक्रिया के अधीन) में हैं. यानी उनका नाम अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है. अगर किसी का नाम इस श्रेणी में है, तो उसका मामला केवल न्यायिक अधिकारी ही तय कर सकते हैं. जब तक फैसला नहीं होता, वे वोट नहीं डाल सकते. अगर फैसला उनके ख़िलाफ़ जाता है, तो वे “डाउटफुल वोटर” माने जा सकते हैं, जैसा पहले असम में हुआ था. ऐसे वोटर नया फॉर्म 6 भरकर दोबारा नाम नहीं जुड़वा सकते, जब तक ट्रिब्यूनल से राहत न मिले.
111 विधानसभा सीटों पर जांच के अधीन वोटरों की संख्या 2024 के जीत के अंतर से ज़्यादा है. यानी इन सीटों पर लंबित मामलों का नतीजा भविष्य के चुनावों को प्रभावित कर सकता है.
अलग-अलग इलाकों में अलग असर
आंकड़ों के अनुसार, जिन 160 सीटों पर अल्पसंख्यक आबादी 20% से कम है, वहां औसतन 8.46% वोटर डिलीट हुए हैं. इन इलाकों में करीब 33.8 लाख वोटर हटाए गए. लेकिन यहां एडजुडिकेशन की संख्या कम है, करीब 4% कम है.
इसके उलट, 41 ऐसी सीटें जहां अल्पसंख्यक आबादी 50% से ज़्यादा है, वहां डिलीट रेट कम 5.61% है, लेकिन औसतन 21.41% वोटर “अंडर एडजुडिकेशन” में हैं. इन सीटों पर 2024 में तृणमूल कांग्रेस TMC ने 29, कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन ने 11 और बीजेपी ने सिर्फ 1 सीट जीती थी. यहां औसतन हर सीट पर करीब 55,503 वोटर एडजुडिकेशन में हैं.
पूरे राज्य में देखें तो टीएमसी जीती सीटों में करीब 35.4 लाख, बीजेपी जीती सीटों में 14.1 लाख और कांग्रेस-लेफ्ट सीटों में 10.4 लाख वोटर जांच से गुजर रहे हैं.
औद्योगिक क्षेत्रों में ज़्यादा डिलीशन
पश्चिम बर्धमान (आसनसोल-दुर्गापुर), उत्तर 24 परगना (बराकपुर), हुगली और हावड़ा के 30 औद्योगिक इलाकों में औसतन 14.40% वोटर डिलीट किए गए हैं, जो राज्य के बाकी हिस्सों से दोगुना है. इन 30 सीटों में 10.5 लाख से ज़्यादा वोटर डिलीट हुए हैं. हालांकि यहां एडजुडिकेशन रेट 5.74% है. इन 30 सीटों में टीएमसी ने 25 और बीजेपी ने 5 सीटें जीती थीं. लेकिन 17 सीटों पर लंबित वोटरों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा है. जैसे आसनसोल उत्तर, दुर्गापुर पूर्व, बराकपुर और बाली जैसी सीटों पर जीत का अंतर काफी कम था, जबकि हजारों वोटर अभी एडजुडिकेशन में हैं.
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