03/04/2026:शिंदे फर्जी बाबा कनेक्शन | बंगाल वोटर लिस्ट विवाद | आप-राघव टकराव | इफ्तार गिरफ्तारी मामला | सवर्ण वर्चस्व | ट्रांस बिल कोर्ट यू-टर्न | ईरान युद्ध | जेट गिरा |नाटो में दरार
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
फर्जी बाबा अशोक खरात मामले में डिप्टी सीएम शिंदे, भाजपा मंत्री पाटिल समेत प्रमुख नेताओं के नाम सामने आए
बंगाल मतदाता सूची: ऑल्ट न्यूज की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट
चुनाव आयोग की डिजिटल दीवार और ऑल्ट न्यूज़ का बड़ा खुलासा
पंचकूला भूमि आवंटन मामला: सीबीआई कोर्ट ने पूर्व सीएम हुड्डा, मोतीलाल वोरा और एजेएल को दोषमुक्त किया
ऊर्जा संकट: पाकिस्तान ने भी दाम बढ़ाए, लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट फ्री किया
चौराहे पर बदरुद्दीन अजमल: असम के मुस्लिमों का मोहभंग, एआईयूडीएफ के लिए अग्निपरीक्षा
आप-राघव चड्ढा विवाद में आर-पार की लड़ाई: किस वजह से आई रिश्तों में इतनी कड़वाहट?
श्रावस्ती इफ्तार पार्टी: भाजपा युवा मोर्चा अध्यक्ष ने मुस्लिम पुरुषों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस पर दबाव बनाया
राहुल गांधी ने पीएम मोदी को लिखा पत्र, दलित-आदिवासी युवाओं पर दर्ज मामले वापस लेने की मांग
आरटीआई में खुलासा: आईआईएम अहमदाबाद में 99 सवर्ण फैकल्टी, दलित-आदिवासी शून्य
राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर बिल पर अपने ही फैसले में किया संशोधन
पीसीआई ने सोशल मीडिया टेकडाउन को कहा ‘मनमाना’, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर जताई चिंता
पश्चिम एशिया युद्ध का असर: मार्च में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार चार साल के निचले स्तर पर
हरकारा डीप डाइव: क्या सटायर से डरती है सत्ता? इंटरनेट, ह्यूमर और अभिव्यक्ति पर बढ़ता दबाव
अच्छा शासन क्या है? सुप्रीम कोर्ट से एचडीएफसी तक संस्थाओं की भूमिका पर उठते सवाल
टॉकिंग न्यूज़: ईरान पर हमले तेज, अमेरिकी सेना में हलचल और नागरिक ठिकानों पर हमलों पर सवाल
ईरान के ऊपर अमेरिकी लड़ाकू विमान गिराया गया: राष्ट्रपति ट्रंप को दी गई जानकारी
ईरान में बुनियादी ढांचे पर भीषण हमले: महत्वपूर्ण पुल और स्वास्थ्य संस्थान तबाह
इज़रायली ड्रोन फैक्ट्री पर हमला और ईरान का F-35 मार गिराने का दावा
युद्ध के 35वें दिन ईरान में मानवीय संकट: हज़ारों नागरिक हताहत
अमेरिकी रक्षा सचिव ने आर्मी चीफ को किया बर्खास्त: सैन्य नेतृत्व में बड़ी फेरबदल
ट्रंप की नीतियों से नाटो गठबंधन में दरार: यूरोपीय देशों में चिंता
ममता की भवानीपुर सीट में हर चौथा मुस्लिम वोटर संदिग्ध
चुनाव आयोग की डिजिटल दीवार और ऑल्ट न्यूज़ का बड़ा खुलासा
भारत निर्वाचन आयोग द्वारा साल 2025-26 में पश्चिम बंगाल की मतदाता सूचियों का किया गया ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) विवादों के केंद्र में है. ‘ऑल्ट न्यूज़’ की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने इस डेटा को पारदर्शी बनाने के बजाय इसे एक ऐसी ‘दीवार’ में बदल दिया, जिसे भेदना आम जनता के लिए लगभग असंभव था. आयोग ने अंतिम मतदाता सूचियों को मशीन द्वारा पढ़े जा सकने वाले डिजिटल फ़ॉर्मेट (जैसे एक्सेल या सीएसवी) के बजाय स्कैन की गई पीडीएफ़ इमेज के रूप में अपलोड किया. ये असल में कागज़ों की तस्वीरें थीं, जिनमें किसी नाम को सर्च करना या डेटा का विश्लेषण करना मुमकिन नहीं था. ऑल्ट न्यूज़ के रिपोर्टर अंकित जैन ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि यह कोई तकनीकी मजबूरी नहीं, बल्कि डेटा को जानबूझकर उपयोग के लायक न छोड़ने का एक सोचा-समझा फ़ैसला था.
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे विवादित हिस्सा ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (तार्किक विसंगति) नाम की एक नई श्रेणी का जुड़ना था. भारतीय चुनावी इतिहास में पहली बार इस्तेमाल किए गए इस नियम के तहत हर मतदाता को 2002 की सूची से अपना संबंध (लिंकेज) साबित करना था. लेकिन सॉफ्टवेयर की कमियों के कारण नाम की स्पेलिंग में मामूली अंतर— जैसे ‘Mohammed’ और ‘Muhammad’ या ‘Mondal’ और ‘Mandal’— होने पर भी मतदाताओं को संदिग्ध मान लिया गया. पूरे बंगाल में लगभग 1.36 करोड़ मतदाताओं को इस श्रेणी में डाल दिया गया. उन्हें सूची से हटाया नहीं गया, लेकिन उनका स्टेटस ‘अंडर एडज्यूडिकेशन’ (विचाराधीन) कर दिया गया. इसका अर्थ यह है कि जब तक उनकी जांच पूरी नहीं होती, वे मतदान नहीं कर सकते. चुनाव की घोषणा हो गई, लेकिन इन करोड़ों लोगों के भविष्य पर कोई समय सीमा तय नहीं की गई.
ऑल्ट न्यूज़ ने इस बाधा को तोड़ने के लिए कोलकाता की दो हाई-प्रोफ़ाइल सीटों— भवानीपुर (ममता बनर्जी की सीट) और बालीगंज— की 558 पीडीएफ़ फ़ाइलों का डिजिटलीकरण किया. इस प्रक्रिया में कई रुकावटें थीं. चुनाव आयोग की वेबसाइट पर एक बार में सिर्फ 10 फ़ाइलें डाउनलोड की जा सकती थीं और हर बार एक कठिन कैप्चा भरना पड़ता था. इसके बावजूद, ऑल्ट न्यूज़ ने एआई और डेटा टूल्स की मदद से 3,52,287 मतदाताओं का रिकॉर्ड निकाला. जांच में सामने आया कि इन दो क्षेत्रों के कुल 39,604 मतदाता ‘विचाराधीन’ श्रेणी में हैं, जो कुल मतदाताओं का 11.2% है.
डेटा का विश्लेषण करने पर धार्मिक आधार पर एक गहरा असंतुलन दिखाई दिया. इन दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता आबादी का 39.5% हैं, लेकिन ‘विचाराधीन’ रखे गए मतदाताओं में उनकी हिस्सेदारी 66.5% है. भवानीपुर में, जहाँ मुस्लिम मतदाता 21.9% हैं, वहां विचाराधीन रखे गए लोगों में वे 51.8% हैं. यानी हर चार में से एक मुस्लिम मतदाता के नाम पर सवाल उठाया गया, जबकि हिंदुओं के मामले में यह आंकड़ा 17 में से एक का था. कुल मिलाकर, एक मुस्लिम मतदाता के नाम पर ‘विचाराधीन’ होने का खतरा हिंदू मतदाता की तुलना में 3.1 गुना अधिक पाया गया.
इस डेटा की विश्वसनीयता के लिए ऑल्ट न्यूज़ ने अपना पूरा डेटाबेस सार्वजनिक कर दिया है, जिसे कोई भी जांच सकता है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस पूरे डेटा को पारदर्शी बनाने और विश्लेषण करने में मात्र 141 डॉलर (लगभग 11,800 रुपये) का खर्च आया. यह चुनाव आयोग के उन दावों पर सवाल उठाता है कि डेटा को सुरक्षित रखने के लिए उसे ‘तस्वीरों’ के रूप में देना ज़रूरी है. रिपोर्टर अंकित जैन के अनुसार, जब डेटा तकनीकी रूप से सार्वजनिक हो लेकिन व्यावहारिक रूप से सुलभ न हो, तो वह पारदर्शिता नहीं बल्कि राजनीतिक बाधा है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप किया था और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का नोटिस भी पेश किया जा चुका है. फिलहाल, लाखों मतदाताओं का लोकतांत्रिक अधिकार अधर में लटका है.
फर्जी बाबा अशोक खरात मामले में डिप्टी सीएम शिंदे, भाजपा मंत्री पाटिल समेत प्रमुख नेताओं के नाम सामने आए
स्वयंभू बाबा और फर्जी ज्योतिषी अशोक खरात के कई फोन से प्राप्त कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) से यह खुलासा हुआ है कि वह उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, भाजपा मंत्री चंद्रकांत पाटिल, राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रूपाली चाकणकर और कई अन्य राजनेताओं के संपर्क में था.
अशोक खरात 150 से अधिक महिला अनुयायियों के यौन शोषण के आरोप में पुलिस हिरासत में है. राज्य सरकार द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अशोक खरात के लैपटॉप और मोबाइल से 200 वीडियो बरामद किए हैं.
मुंबई से सुधीर सूर्यवंशी की रिपोर्ट है कि सीडीआर डेटा से यह भी पता चला है कि रूपाली चाकणकर ने पिछले साल खरात को 177 बार फोन किया था. विवरण दिखाते हैं कि अशोक खरात की बेटी तृप्तिबाला खरात के बाद रूपाली चाकणकर ने ही सबसे ज्यादा कॉल किए हैं.
सामाजिक कार्यकर्ता दमानिया ने दावा किया कि अशोक खरात और रूपाली चाकणकर ने कुल 33,727 सेकंड तक बात की. दमानिया का दावा है, “अगर हम इसे मिनटों में देखें, तो रूपाली चाकणकर और अशोक खरात ने पिछले साल एक-दूसरे से कुल 9 घंटे 36 मिनट तक संवाद किया. रूपाली चाकणकर की बहन ने भी अशोक खरात को कुल 236 बार फोन किया है.”
दमानिया ने आगे दावा किया, “पिछले एक साल में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने फर्जी बाबा अशोक खरात को 17 फोन कॉल किए थे. इनमें से 10 कॉल इनकमिंग थे और सात आउटगोइंग. खरात और शिंदे के बीच सबसे लंबी बातचीत 21 मिनट की थी.”
सीडीआर से यह भी पता चला है कि पूर्व शिवसेना मंत्री दीपक केसरकर, एनसीपी प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे और भाजपा मंत्री आशीष शेलार ने भी अशोक खरात से संपर्क किया था.
उन्होंने आगे कहा कि भाजपा मंत्री चंद्रकांत पाटिल और एनसीपी प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे, दोनों ने आरोपी अशोक खरात से आठ-आठ बार संपर्क किया.
दमानिया ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए ये जानकारियां साझा की हैं. जिन मंत्रियों और नेताओं के नाम सामने आए हैं, उन्होंने अभी तक इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है. हालांकि, इन नेताओं की फर्जी बाबा के साथ तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गई हैं.
पंचकूला भूमि आवंटन मामला: सीबीआई कोर्ट ने पूर्व सीएम हुड्डा, मोतीलाल वोरा और एजेएल को दोषमुक्त किया
2014 के पहले भाजपा या उसके नेतृत्व ने यूपीए के कार्यकाल के जिन कथित घोटालों को मुद्दा बनाकर सत्ता हासिल की, अब हाल ये है कि एक-एक कर सारे आरोपी बरी हो रहे हैं. आज हरप्रीत बाजवा की रिपोर्ट है कि पंचकूला की एक विशेष सीबीआई अदालत ने हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कांग्रेस नेता दिवंगत मोतीलाल वोरा और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) को मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) के एक मामले में औपचारिक रूप से दोषमुक्त कर दिया है.
यह मामला पुरानी दरों पर एक संस्थागत प्लॉट के पुन: आवंटन से संबंधित है. हरियाणा में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत विशेष न्यायाधीश राजीव गोयल ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शिकायत को बंद कर दिया. अदालत का यह आदेश पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के 25 फरवरी के उस फैसले के बाद आया है, जिसमें 2021 के उस आदेश को रद्द कर दिया गया था जिसने मूल रूप से याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आरोप तय किए थे.
हुड्डा के वकील एस.पी.एस. परमार ने कहा, “विजय मदनलाल चौधरी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में, ईडी की शिकायत बरकरार नहीं रह सकती, क्योंकि आरोपियों को ‘प्रेडिकेट ऑफेंस’ (मूल अपराध) में दोषमुक्त कर दिया गया है.”
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया ने टिप्पणी की कि आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं. उन्होंने उल्लेख किया कि अभियोजन पक्ष बेईमान इरादे या गलत तरीके से लाभ प्राप्त करने का प्रथम दृष्टया मामला स्थापित करने में विफल रहा.
विजय मदनलाल चौधरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी, “यदि किसी व्यक्ति को अनुसूचित अपराध से अंततः दोषमुक्त या बरी कर दिया जाता है, या सक्षम क्षेत्राधिकार की अदालत द्वारा उसके खिलाफ आपराधिक मामला रद्द कर दिया जाता है, तो उसके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का कोई अपराध नहीं बन सकता.”
ऊर्जा संकट: पाकिस्तान ने भी दाम बढ़ाए, लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट फ्री किया
इस्लामाबाद से ‘एएफपी’ की खबर है कि पाकिस्तान की राजधानी और सबसे अधिक आबादी वाले प्रांत में सरकारी सार्वजनिक परिवहन अगले एक महीने के लिए मुफ्त रहेगा. यह निर्णय ईरान युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा कीमतों में आए उछाल और उसके बाद सरकार द्वारा ईंधन की कीमतों में की गई भारी वृद्धि के बाद लिया गया है.
गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने ‘एक्स’ पर लिखा, “कल (शनिवार) से अगले 30 दिनों के लिए इस्लामाबाद में सभी सार्वजनिक परिवहन आम जनता के लिए मुफ्त कर दिए जाएंगे.” उन्होंने आगे कहा कि सरकार इस पर 35 करोड़ रुपये (लगभग 12.5 लाख डॉलर) का बोझ उठाएगी.
पाकिस्तान के सबसे अधिक आबादी वाले प्रांत पंजाब की मुख्यमंत्री ने भी सरकारी परिवहन की यात्रा लागत हटा दी और ट्रकों व बसों के लिए “लक्षित सब्सिडी” की घोषणा की. मरियम नवाज शरीफ ने ऑपरेटरों से आग्रह किया कि वे बढ़ी हुई लागत का बोझ यात्रियों और उपभोक्ताओं पर न डालें. उन्होंने कहा, “हम वादा करते हैं कि स्थितियां सुधरते ही जनता को आर्थिक बोझ से राहत देंगे.”
सिंध में, पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची की प्रांतीय सरकार ने मोटर साइकिल चालकों और छोटे किसानों के लिए इसी तरह की सब्सिडी की घोषणा की.
युद्ध और ऊर्जा संकट 28 फरवरी को ईरान पर शुरू हुए अमेरिका-इजरायल युद्ध ने मध्य पूर्व को संघर्ष में झोंक दिया है. ईरानी जवाबी हमलों ने खाड़ी के लक्ष्यों को निशाना बनाया है और होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग को लगभग ठप कर दिया है. इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से सामान्यतः दुनिया की लगभग पांचवां हिस्सा ऊर्जा आपूर्ति गुजरती है, जिसका बड़ा हिस्सा एशिया जाता है.
सरकार ने ईंधन बचाने के लिए कई ‘किफायती उपायों’ का अनावरण किया है, जिसमें कई सरकारी कार्यालयों को सप्ताह में चार दिन कार्य करने, स्कूल की छुट्टियां बढ़ाने और कुछ कक्षाओं को ऑनलाइन स्थानांतरित करना शामिल है.
विरोध प्रदर्शन विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान को निम्न-मध्यम आय वाले देश के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसकी 24 करोड़ की आबादी का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा गरीबी में रहता है. सरकार ने मार्च की शुरुआत में ईंधन की कीमतों में 20 प्रतिशत की वृद्धि की थी, लेकिन हफ्तों तक और बढ़ोतरी का विरोध किया और जोर दिया कि वह बढ़ी हुई कीमतों का बोझ खुद उठाएगी.
इस सप्ताह की शुरुआत में, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने चेतावनी दी थी कि पाकिस्तान जैसी कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को न केवल उच्च ऊर्जा कीमतों बल्कि आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं का भी सामना करना पड़ रहा है. 28 मार्च को आईएमएफ़ ने घोषणा की थी कि उसने पाकिस्तान के साथ $1.2 बिलियन के नए पैकेज को अनलॉक करने के लिए एक प्रारंभिक समझौता किया है.
चौराहे पर बदरुद्दीन अजमल: असम के मुस्लिमों का मोहभंग, एआईयूडीएफ के लिए अग्निपरीक्षा
असम के विवादित राजनीतिक परिदृश्य में, बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ अल्पसंख्यक वोटों पर अपनी पकड़ के कारण एक प्रमुख राजनीतिक खिलाड़ी रही है. हालांकि, आगामी विधानसभा चुनावों में सभी की निगाहें इस बात पर टिकी होंगी कि बंगाली भाषी मुसलमानों से जुड़ी यह पार्टी कैसा प्रदर्शन करती है. यह सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का पतन देखने को मिला था, जिसमें अजमल खुद धुबरी सीट पर कांग्रेस के रकीबुल हसन से 10 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से हार गए थे.
2024 के लोकसभा परिणाम ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के लिए बुरी खबर थी, क्योंकि इसमें स्पष्ट संकेत मिले थे कि उसका मुख्य वोट बैंक अब कांग्रेस को एक विकल्प के रूप में देख रहा है. विकास पाठक अपनी रिपोर्ट में बताते हैं कि यदि विधानसभा चुनावों में भी यही रुझान जारी रहता है, तो कांग्रेस निचले असम और बराक घाटी में सम्मानजनक प्रदर्शन कर सकती है, हालांकि भाजपा को हराने के लिए शायद यह पर्याप्त न हो. वहीं, कांग्रेस के बंगाली भाषी मुसलमानों की पसंदीदा पार्टी बनने का कोई भी संकेत ऊपरी असम में इस तरह से ध्रुवीकरण कर सकता है जिससे भाजपा को वहां बड़ा फायदा मिल जाए.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) की प्रक्रिया के दौरान एआईयूडीएफ अपने मतदाताओं की सुरक्षा करने में विफल रही. अंतिम ड्राफ्ट से बाहर हुए 19 लाख लोगों में से लगभग आधे बंगाली मुस्लिम थे, जिससे समुदाय के बीच पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचा.
हाल ही में हुए निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के कारण मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या कम हो गई है. पहले जहाँ ऐसी सीटों की संख्या 30 थी, अब वह घटकर लगभग 22 रह गई है. इससे एआईयूडीएफ की चुनावी ताकत और कम हो गई है. 2021 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और एआईयूडीएफ का गठबंधन था, लेकिन इससे ऊपरी असम में हिंदुओं का ध्रुवीकरण हुआ जिससे भाजपा को फायदा हुआ. अब कांग्रेस ने एआईयूडीएफ से दूरी बना ली है, ताकि वह असमिया बहुल मतदाताओं को अपने साथ जोड़ सके.
भाजपा “ध्रुवीकरण” का लाभ उठाती है. यदि कांग्रेस बंगाली भाषी मुसलमानों की पहली पसंद बनती है, तो भाजपा इसका इस्तेमाल हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने के लिए कर सकती है. बहरहाल, आगामी विधानसभा चुनाव बदरुद्दीन अजमल के लिए “करो या मरो” की स्थिति है. यदि वे अपने आधार को वापस पाने में विफल रहते हैं, तो असम की राजनीति में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उनकी पार्टी का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है.
आप-राघव चड्ढा विवाद में आर-पार की लड़ाई: किस वजह से आई रिश्तों में इतनी कड़वाहट?
एक दिन की लुका-छिपी (प्रतीकात्मक लड़ाई) के बाद, अब आम आदमी पार्टी (आप) और उसके राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के बीच सीधी जंग शुरू हो गई है. चड्ढा को गुरुवार को उच्च सदन (राज्यसभा) में पार्टी के उप-नेता पद से हटा दिया गया था.
आप के एक अंदरूनी सूत्र ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि चड्ढा, जो कभी पार्टी और पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल के बेहद चहेते (ब्लू-आईड बॉय) थे, अब पार्टी से काफी दूर हो गए हैं. उन्होंने खुद को राज्यसभा में पार्टी का नेता मनोनीत करवाने की कोशिश की थी. यह वाकया तब का है जब अक्टूबर 2023 में दिल्ली आबकारी नीति मामले में गिरफ्तारी के बाद संजय सिंह जेल में थे. पार्टी नेतृत्व को यह बात पसंद नहीं आई. इस घटना और पिछले एक साल के दौरान उनके अन्य कार्यों ने पार्टी के इस फैसले (उन्हें पद से हटाने) को प्रभावित किया है.
पार्टी का एक बड़ा आरोप यह है कि जब अरविंद केजरीवाल और अन्य बड़े नेता जेल में थे, तब राघव चड्ढा लंबे समय तक परिदृश्य से गायब रहे. उन्होंने अपनी अनुपस्थिति के पीछे दिल्ली जल बोर्ड से जुड़े एक कथित घोटाले में गिरफ्तारी के डर का हवाला दिया था, लेकिन पार्टी का मानना है कि उन्होंने संकट के समय साथ छोड़ दिया.
‘आप’ नेताओं ने आरोप लगाया कि राघव चड्ढा राज्यसभा में आवंटित समय का उपयोग अपनी व्यक्तिगत छवि चमकाने के लिए कर रहे थे, न कि पार्टी के मुद्दों को उठाने के लिए. हाल ही में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के विपक्षी नोटिस पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे।
इस बीच चड्ढा ने एक वीडियो संदेश जारी कर अपनी चुप्पी तोड़ी और कहा कि पार्टी उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने सवाल किया कि उन्हें संसद में बोलने से क्यों रोका जा रहा है. उन्होंने अपनी चुप्पी को हार न मानने का संकेत देते हुए कहा, “मेरी खामोशी को हार मत समझना, मैं वो दरिया हूँ जो वक्त आने पर सैलाब बन जाता है.”
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में जतिन आनंद की रिपोर्ट यह भी बताती है कि जब राघव चड्ढा की दिल्ली में दाल नहीं गली, तो उन्होंने पंजाब सरकार के मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था, जिससे स्थानीय नेतृत्व और पार्टी के बीच दूरियां और बढ़ गईं.
पार्टी के कुछ नेताओं को अंदेशा है कि चड्ढा अंततः भाजपा में शामिल हो सकते हैं, हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी ऐसी कोई पुष्टि नहीं हुई है. फिलहाल पार्टी उन्हें निलंबित नहीं कर रही है, ताकि उन्हें ‘शहीद’ बनने का मौका न मिले, लेकिन उनकी भूमिका को काफी सीमित कर दिया गया है.
श्रावस्ती इफ्तार पार्टी: भाजपा युवा मोर्चा अध्यक्ष ने मुस्लिम पुरुषों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस पर दबाव बनाया
‘द वायर’ में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में आकांक्षा कुमार ने बताया है कि कैसे एक सामान्य इफ्तार भोजन की घटना को राजनीतिक रंग देकर और बिना स्पष्ट कानूनी आधार के ‘साजिश’ या ‘जासूसी’ जैसे गंभीर आरोपों में बदल दिया गया.
यह मामला उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले का है, जहाँ एक हिंदू आश्रम (सोनपथरी आश्रम) से लगभग तीन किलोमीटर दूर जंगल में इफ्तार पार्टी (मांसाहारी भोजन) करने के आरोप में आठ मुस्लिम पुरुषों को गिरफ्तार किया गया. शुरुआत में चार पुरुषों को गिरफ्तार किया गया था जिन्हें जल्द ही जमानत मिल गई थी. लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद, उन्हें और चार अन्य लोगों को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया.
भाजपा युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष हरिओम तिवारी ने पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर इस घटना को एक “सुनियोजित साजिश” बताया. उन्होंने आशंका जताई कि यह संवेदनशील सीमा क्षेत्र की सुरक्षा की जासूसी करने या सुरक्षा व्यवस्था को परखने की कोशिश हो सकती है.
शिकायतकर्ता (आश्रम के एक महंत) का आरोप था कि ये लोग आश्रम के पास मांस पका रहे थे और अवशेषों को उस पानी में फेंक रहे थे जिसका उपयोग मंदिर की मूर्तियों को धोने और पीने के लिए किया जाता है. जबकि, घटना के वायरल वीडियो में न तो खाना पकाने और न ही अवशेष फेंकने का साफ सबूत दिखता है. आरोपियों का कहना है कि वे पहले से पका खाना लेकर आए थे और इफ्तार की जगह मंदिर से करीब 3 किलोमीटर दूर थी. इसके बावजूद कार्रवाई हुई और सभी आरोपी अब डर के कारण अपने घर छोड़ चुके हैं. दूसरी एफआईआर में संरक्षित वन क्षेत्र में आग जलाने और वनस्पति को नुकसान पहुँचाने का भी उल्लेख किया गया.
रिपोर्ट के अनुसार, यह गिरफ्तारी बिना किसी ठोस सबूत के और केवल राजनीतिक दबाव के कारण की गई. पुलिस ने यह कार्रवाई भाजपा नेता के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक से मिलने के कुछ ही घंटों बाद की.
आरटीआई में खुलासा: आईआईएम अहमदाबाद में 99 सवर्ण फैकल्टी, दलित-आदिवासी शून्य
‘गीता सुनील पिल्लई’ की रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद (आईआईएम-ए) के एक हालिया सूचना का अधिकार (आरटीआई) जवाब ने संस्थान के फैकल्टी पदों का श्रेणी-वार वितरण सामने लाया है. जवाब चौकाने वाले हैं- सभी फैकल्टी जनरल वर्ग से हैं, इनमे एक भी बहुजन समुदाय का नहीं है.
ऑल इंडिया ओबीसी स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईओबीसीएसए) के राष्ट्रीय अध्यक्ष गौड़ किरण कुमार के आरटीआई के मुताबिक संस्थान में कुल 120 फैकल्टी पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 100 भरे हुए हैं. इनमें 99 जनरल श्रेणी के हैं और केवल 1 ओबीसी, वह भी असिस्टेंट प्रोफेसर स्तर पर. एससी, एसटी, ईडब्ल्यूएस या पीडब्ल्यूडी से एक भी फैकल्टी नहीं है.
आईआईएम इंदौर, कलकत्ता और तिरुचिरापल्ली के आंकड़े भी इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं, जहां ओबीसी, एससी और एसटी के पद या तो बेहद कम हैं या खाली है.इन प्रमुख संस्थानों में 80 प्रतिशत से अधिक फैकल्टी सदस्य जनरल श्रेणी के हैं, जबकि कई संस्थानों में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत से भी ऊपर है.
यही हाल आईआईटी में भी देखने को मिलता है. देश के कई प्रमुख आईआईटी में सामान्य श्रेणी का दबदबा साफ दिखता है, जबकि ओबीसी, एससी और एसटी का प्रतिनिधित्व बेहद सीमित है. आईआईटी दिल्ली, आईआईटी कानपूर, आईआईटी खड़गपुर जैसे संस्थानों में 85 से 90 प्रतिशत तक फैकल्टी सामान्य वर्ग से हैं. कई जगह प्रोफेसर स्तर पर आरक्षित श्रेणियों का प्रतिनिधित्व लगभग शून्य है. बड़ी संख्या में पद खाली होने के बावजूद श्रेणी-वार भर्ती नहीं होना सवाल खड़े करता है.
राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर बिल पर अपने ही फैसले में किया संशोधन, कहा-गलती से शामिल हुईं
स्क्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पर की गई अपनी पिछली टिप्पणी के कुछ हिस्सों को हटा दिया है. कोर्ट ने कहा कि “उपसंहार (एपिलॉग) को दोबारा पढ़ने पर पता चला कि उसमें गलती से कुछ ऐसे अनुच्छेद (पैरा 3, 4 और 5) शामिल हो गए थे, जो न तो इरादतन थे और न ही जरूरी थे.”
हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए 30 मार्च को अपने आदेश में ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पर आलोचनात्मक टिप्पणी किया था. जस्टिस अरुण मोंगा ने अपने आदेश में कहा था कि “यह कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सेल्फ आईडेंटिफिकेशन के अधिकार को सीमित कर सकता है.” हालांकि अब कोर्ट ने उन टिप्पणियों को हटाकर नया स्पष्टीकरण जारी किया है.
यह संशोधन विधेयक 25 मार्च को संसद से पारित हुआ था. ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के कानून में बदलाव करते हुए ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा को सीमित करता है और स्व-पहचान के अधिकार को खत्म करता है. अब कानूनी लैंगिक पहचान के लिए मेडिकल जांच और प्रमाणन अनिवार्य होगा.
मामला एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की याचिका से जुड़ा था, जिसमें 2023 की राजस्थान सरकार की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ओबीसी में शामिल किया गया, लेकिन अलग आरक्षण नहीं दिया गया. कोर्ट ने राज्य सरकार को ट्रांसजेंडर समुदाय की स्थिति का आकलन करने के लिए एक समिति बनाने का निर्देश दिया. साथ ही, सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में चयन के दौरान 3 प्रतिशत अतिरिक्त वेटेज देने को भी कहा.
पीसीआई ने सोशल मीडिया टेकडाउन को कहा ‘मनमाना’, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर जताई चिंता
सरकार का सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ता नियंत्रण अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधे सवाल खड़े कर रहा है. प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया (पीसीआई) ने हालिया सोशल मीडिया पोस्ट के टेकडाउन आदेशों को “मनमाना” बताते हुए चेताया है कि यह सीधे-सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है. सरकार लगातार पत्रकारों, विपक्षी नेताओं और स्वतंत्र क्रिएटर्स जो सरकार की आलोचना करते हैं उनके पोस्ट डिलीट करवा रही है.
‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, पीसीआई ने अपने बयान कहा “ये कार्यकारी फैसले संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मिले बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित करते हैं. उन्होंने श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही अस्पष्ट कानूनों के जरिए ऑनलाइन सेंसरशिप पर “चिलिंग इफेक्ट” की चेतावनी दे चुका है.
पीसीआई ने इसे “आलोचनात्मक आवाजों के खिलाफ जारी कार्रवाई का पैटर्न” बताते हुए कहा कि यह “स्पष्ट कार्यकारी अतिक्रमण” है. संगठन ने सरकार से नागरिकों और पत्रकारों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करने की अपील की है. बयान में कहा गया कि टेकडाउन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है, जहां कारण तक नहीं बताए जाते, जो इसे मनमाना और असंवैधानिक बनाती है.
फैक्ट-चेकर मोहम्मद ज़ुबैर, मीडिया प्लेटफॉर्म नेशनल दस्तक और 4पीएम जैसे नाम हाल के दिनों में कार्रवाई की जद में आए हैं. व्यंग्यकार राजीव निगम और मॉलिटिक्स जैसे पेज भी ब्लॉक किए गए हैं. सरकार इन आदेशों के लिए आईटी एक्ट की धारा 69ए का सहारा लेती है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर कंटेंट हटाने की इजाज़त देती है.
पश्चिम एशिया युद्ध का असर: मार्च में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार चार साल के निचले स्तर पर
‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 में भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की गतिविधि लगभग चार साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. इसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध है, जिससे लागत, मांग और नए ऑर्डर प्रभावित हुए.
एचएसबीसी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग का पीएमआई यानी परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स, जो नए ऑर्डर, उत्पादन, रोज़गार, सप्लाई और स्टॉक जैसी चीज़ों को मापता है, फरवरी के 56.9 से गिरकर मार्च में 53.9 पर आ गया है. जून 2022 के बाद यह पहली बार इतने काम स्तर पर पहुंचा है. 50 से ऊपर का आंकड़ा वृद्धि दिखाता है, जबकि 50 से नीचे गिरावट को दर्शाता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती लागत, कड़ी प्रतिस्पर्धा, बाज़ार में अनिश्चितता और पश्चिम एशिया युद्ध के कारण नए ऑर्डर और उत्पादन की रफ्तार धीमी हुई है. इनपुट लागत भी तेज़ी से बढ़ी, जो अगस्त 2022 के बाद सबसे ज़्यादा है. एल्युमिनियम, केमिकल, ईंधन, जूट, लेदर, कपड़ा, तेल, रबर और स्टील जैसी चीज़ों के दाम बढ़े हैं.
हालाँकि एक सकारात्मक पक्ष यह है कि मार्च में भारत के निर्यात में बढ़ोतरी हुई, खासकर ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, चीन, यूरोप, जापान, पश्चिम एशिया, तुर्की और वियतनाम जैसे देशों से मांग बढ़ी है.
हरकारा डीप डाइव
क्या सटायर से डरती है सत्ता? इंटरनेट, ह्यूमर और अभिव्यक्ति पर बढ़ता दबाव
हरकारा डीप डाइव में हमने इस बार उस बदलते माहौल पर बात की, जहां ह्यूमर, सटायर और कॉमेडी अब सिर्फ मनोरंजन नहीं रह गए हैं, बल्कि सत्ता के लिए असहज सवाल बनते जा रहे हैं. इस बातचीत में कार्टूनिस्ट मंजुल और डिजिटल सटायरिस्ट रोफल गांधी के साथ हुई बातचीत में यह साफ तौर पर सामने आया कि देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी का दायरा धीरे-धीरे सिमटता दिख रहा है. हाल के समय में कॉमेडियन्स पर एफआईआर, सोशल मीडिया अकाउंट्स का ब्लॉक होना और नए नियमों के ज़रिये कंटेंट को तुरंत हटाने का दबाव, यह सब घटनाएं किसी एक व्यक्ति या मामले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक बड़े ट्रेंड की ओर इशारा करती हैं.
बातचीत में यह भी उभरा कि पारंपरिक मीडिया की भूमिका कमज़ोर पड़ने के बाद अब सटायरिस्ट, कार्टूनिस्ट और डिजिटल क्रिएटर्स सच को नए तरीके से सामने ला रहे हैं. जहां एक समय पत्रकारिता को सच का माध्यम माना जाता था, वहीं अब इंटरनेट पर मौजूद छोटे-छोटे प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र आवाजें समाज और राजनीति की परतें खोल रही हैं. यही वजह है कि इन आवाजों को नियंत्रित करने की कोशिशें तेज़ होती दिख रही हैं. तीन घंटे में कंटेंट हटाने जैसे नियम और क्रिएटर्स पर बढ़ती निगरानी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या सरकार असहमति को मैनेज करने के बजाय उसे दबाने की दिशा में बढ़ रही है.
इस पूरी चर्चा में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि इंटरनेट को पूरी तरह नियंत्रित करना आसान नहीं है. जहां टीवी मीडिया पर प्रभाव स्थापित करना संभव रहा, वहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हर आवाज़ को दबा पाना लगभग असंभव है. यही कारण है कि जब भी किसी कंटेंट को हटाने की कोशिश होती है, वह और ज़्यादा फैलता है. यह एक नए तरह का लोकतांत्रिक स्पेस बन चुका है, जहां आम लोग अपनी बात कह रहे हैं और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है.
आखिर में सवाल सिर्फ ह्यूमर या कॉमेडी का नहीं है, बल्कि उस स्पेस का है जहां समाज आज़ादी के साथ अपने सवाल पूछ सकता है. अगर सटायर, तंज़ और आलोचना की जगह लगातार कम होती है, तो यह सिर्फ कलाकारों या क्रिएटर्स का संकट नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का संकट बन जाता है.
अच्छा शासन क्या है? सुप्रीम कोर्ट से एचडीएफसी तक संस्थाओं की भूमिका पर उठते सवाल
भारत की संस्थाओं में ‘अच्छा शासन’ क्या होता है, इस पर स्क्रोल में अरुण मायरा ने एक लेख लिखा है. लेख में कहा गया है कि हाल के कुछ मामलों, जैसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन शिक्षाविदों पर कार्रवाई और एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन का इस्तीफा, ने यह बहस तेज़ कर दी है कि संस्थाएं किसके हित में काम कर रही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने तीन शिक्षाविदों को उनके काम से प्रभावी रूप से वंचित कर दिया, क्योंकि उन्होंने स्कूल की किताब में एक अध्याय लिखा था, जिसमें न्यायपालिका पर कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियां थीं. कानून के छात्र ऋषि कुमार ने पूरा अध्याय पढ़कर अपने सबस्टैक पर एक लेख लिखा और बताया कि जिन पंक्तियों पर आपत्ति जताई गई, उन्हें संदर्भ से हटाकर पेश किया गया, जबकि पूरा अध्याय न्यायपालिका के योगदान की सराहना करता है. इसके बाद उनकी यूनिवर्सिटी ने उन्हें पोस्ट हटाने का नोटिस भेजा, जिसे बाद में “एडवाइजरी” बताया गया.
इसी दौरान, एचडीएफसी बैंक के गैर-कार्यकारी चेयरमैन अतानु चक्रवर्ती ने इस्तीफा देते हुए कहा कि बैंक के अंदर कुछ चीजें उनके “नैतिक मूल्यों” के अनुरूप नहीं थीं. इस बयान के बाद बैंक के शेयर एक ही दिन में 8-9% गिर गए और करीब 16 अरब डॉलर का बाजार मूल्य कम हो गया. सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने कहा कि इस तरह के “अस्पष्ट बयान” निवेशकों के भरोसे को नुकसान पहुंचाते हैं. एक पूर्व वित्त सचिव ने भी लिखा कि किसी कंपनी के निदेशक को “निजी नैतिकता” नहीं, बल्कि “कॉरपोरेट गवर्नेंस” को प्राथमिकता देनी चाहिए.
यह सोच बताती है कि बाजार और नियामक संस्थाएं ‘गवर्नेंस’ को केवल निवेशकों के फायदे और कानून के पालन तक सीमित मानती हैं. लेकिन असल में सार्वजनिक महत्व की संस्थाएं, जैसे अदालत, विश्वविद्यालय, मीडिया, बिजली-पानी जैसी सेवाएं, बैंक और बीमा, को समाज के सभी लोगों के हित में काम करना चाहिए. निजीकरण के कारण इन सेवाओं में असमानता बढ़ रही है, जहां कंपनियां मुनाफे को प्राथमिकता देती हैं, न कि लोगों की ज़रूरतों को.
इस लेख में 1973 के मशहूर केस केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य का ज़िक्र किया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद संविधान की “मूल संरचना” को नहीं बदल सकती. इस केस में निजी संपत्ति और सार्वजनिक हित के बीच टकराव था, और अदालत ने सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दी. अधिकार और आज़ादी की समझ समय के साथ बदलती रही है. जैसे अमेरिका में शुरू में महिलाओं और रंगभेद से प्रभावित लोगों को बराबरी का अधिकार नहीं था, जो बाद में मिला. इसी तरह, समाज में नए अधिकार संघर्ष और बहस के जरिए विकसित होते हैं.
टॉकिंग न्यूज़: ईरान पर हमले तेज, अमेरिकी सेना में हलचल और नागरिक ठिकानों पर हमलों पर सवाल
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में 35वें दिन चल रही अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच जंग की स्थिति पर विस्तार से चर्चा हुई. एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद युद्ध खत्म होने के कोई संकेत नहीं हैं. अमेरिका ने ईरान के ऊर्जा ठिकानों, जैसे तेल कुएं, स्टोरेज और परिवहन पर हमले तेज करने की बात कही है, जिसे जिनेवा कन्वेंशन के तहत युद्ध अपराध माना जा सकता है, हालांकि अमेरिका इसे औपचारिक रूप से युद्ध नहीं मान रहा. है.
पिछले 24 घंटों की बड़ी घटनाओं में अमेरिकी सेना के एक टॉप जनरल से इस्तीफा लिया जाना शामिल है, जिसे युद्ध के बीच असामान्य माना जा रहा है. रिपोर्ट में बताया गया कि कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को हटाया गया और उनकी जगह रक्षा सचिव पीट हेगसेट के करीबी लोगों को लाया जा रहा है. इसके साथ ही कुवैत की एक बड़ी ऑयल रिफाइनरी पर ड्रोन हमला हुआ, ईरान के पुल और अन्य ढांचों को निशाना बनाया गया, जबकि ईरान की तरफ से भी लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले जारी हैं.
ईरान के नागरिक और सांस्कृतिक ठिकानों पर हमलों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई. एक स्कूल, विश्वविद्यालय, शोध संस्थान जैसे पाश्चर इंस्टीट्यूट, संगीत स्कूल और ऐतिहासिक धरोहरों पर हमले हुए हैं. मिनाब में 8-12 साल की बच्चियों के स्कूल पर हमले और तेहरान के पास पुल पर बमबारी जैसी घटनाओं का जिक्र हुआ. विशेषज्ञों ने कहा कि इस तरह के हमले सिर्फ सैन्य नहीं बल्कि मानवीय और सांस्कृतिक नुकसान भी हैं. सीएनएन की जेसी युंग और अल जज़ीरा की रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक संस्थान अब युद्ध के नए मोर्चे बन गए हैं. तेहरान के प्रसिद्ध ‘होनियाक म्यूज़िक एकेडमी’ पर हुए हवाई हमले में सब कुछ राख हो गया है. इस स्कूल के संचालक हामिदरेज़ा अफ़रीदेह ने बताया कि उनकी 15 साल की मेहनत एक रात में बर्बाद हो गई. इसके अलावा, ईरान के विज्ञान मंत्रालय ने पुष्टि की है कि युद्ध शुरू होने के बाद से कम से कम 21 विश्वविद्यालयों को नुकसान पहुँचाया गया है. इज़रायली सेना का तर्क है कि इन संस्थानों का उपयोग सैन्य उद्देश्यों या हथियार विकास के लिए किया जा रहा था. हमलों के डर से लेबनान, कतर और कुवैत में भी अमेरिकी संबद्ध विश्वविद्यालयों ने अपनी कक्षाएं ऑनलाइन कर दी हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि शैक्षणिक संस्थानों को निशाना बनाना युद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकता है, क्योंकि ये नागरिक बुनियादी ढांचे का हिस्सा हैं.
इसके साथ ही शो में अमेरिका के भीतर बढ़ती असहमति और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति पर सवालों की भी चर्चा हुई. बताया गया कि युद्ध लंबा खिंचने से ट्रंप पर दबाव बढ़ रहा है, जबकि पाकिस्तान शांति वार्ता की कोशिश कर रहा है लेकिन उसे मुश्किलें आ रही हैं. यह युद्ध सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और मानवता पर गहरा असर डाल रहा है, और इसके समाधान का रास्ता अभी स्पष्ट नहीं दिख रहा.
ईरान के ऊपर अमेरिकी लड़ाकू विमान गिराया गया: राष्ट्रपति ट्रंप को दी गई जानकारी
सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के ऊपर मार गिराए गए एक अमेरिकी लड़ाकू विमान से एक सेवा सदस्य को सुरक्षित बचा लिया गया है. सूत्रों ने पुष्टि की है कि गिराया गया विमान एक F-15 फाइटर जेट था. विमान के दूसरे चालक दल के सदस्य की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है और अमेरिकी खोज एवं बचाव अभियान जारी है. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव ने सीएनएन को बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इस घटना के बारे में पूरी जानकारी (ब्रिफिंग) दे दी गई है. हालांकि, अमेरिकी सेना और व्हाइट हाउस ने इस स्थिति पर अभी कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की है. अपने हालिया सार्वजनिक बयानों में, ट्रंप ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बारे में बात करते हुए सुझाव दिया था कि अमेरिका थोड़ा और समय लेकर इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को “आसानी से” फिर से खोल सकता है.
ईरान में बुनियादी ढांचे पर भीषण हमले: महत्वपूर्ण पुल और स्वास्थ्य संस्थान तबाह
राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा ईरान को “पत्थर युग” में वापस भेजने की धमकी देने के एक दिन बाद, एक अमेरिकी हवाई हमले में तेहरान और पास के शहर कारज के बीच एक प्रमुख हाईवे पुल आंशिक रूप से ढह गया, जिसमें कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस हमले का वीडियो साझा करते हुए जश्न मनाया और चेतावनी दी कि यदि ईरान “सौदा” नहीं करता है, तो और अधिक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दिया जाएगा. इसके अलावा, तेहरान में ‘पाश्चर इंस्टीट्यूट ऑफ ईरान’ नामक एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी को भी नष्ट कर दिया गया, जो देश में टीकों का उत्पादन और वितरण करती थी. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में वाशिंगटन के साथ बातचीत असंभव है. इस बीच, कुवैत की ‘मीना अल-अहमदी’ रिफाइनरी पर भी ड्रोन हमला हुआ है, जिससे वहां की इकाइयों में आग लग गई. तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है और ब्रेंट क्रूड 109.03 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है.
इज़रायली ड्रोन फैक्ट्री पर हमला और ईरान का F-35 मार गिराने का दावा
हारेट्ज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, इज़रायली ड्रोन निर्माता ‘वेलोरिक्स’ ने शुक्रवार को बताया कि एक ईरानी मिसाइल हमले ने मध्य इज़रायल के पेटाह टिकवा में उसकी निर्माण इकाई को भारी नुकसान पहुँचाया है. यह कंपनी रक्षा और सरकारी ग्राहकों के लिए ड्रोन सिस्टम विकसित करती है. दूसरी ओर, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने दावा किया है कि उसने एक नए और उन्नत रक्षा तंत्र का उपयोग करके ईरानी हवाई क्षेत्र में एक अमेरिकी F-35 फाइटर जेट को मार गिराया है. आईआरजीसी का कहना है कि विमान पूरी तरह से नष्ट हो गया है और पायलट के बचने की संभावना कम है. हालांकि, अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इन रिपोर्टों को खारिज कर दिया है. इससे पहले भी अमेरिका ने ईरान द्वारा विमान गिराए जाने के दावों को नकार दिया था. ज्ञात हो कि F-35 दुनिया के सबसे उन्नत युद्धक विमानों में से एक माना जाता है.
युद्ध के 35वें दिन ईरान में मानवीय संकट: हज़ारों नागरिक हताहत
अल जज़ीरा की एलिज़ाबेथ मेलिमोपोलोस की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इज़रायल के हमलों में अब तक 2,076 लोग मारे गए हैं और 26,500 से अधिक घायल हुए हैं. ईरान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, 28 फरवरी से अब तक 600 से अधिक स्कूलों और शैक्षणिक केंद्रों को निशाना बनाया गया है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने चेतावनी दी है कि घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों और ऊर्जा केंद्रों पर हमलों के कारण नागरिक बिजली, दवा और ईंधन की भारी कमी का सामना कर रहे हैं. इसके अतिरिक्त, ईरान की रेड क्रिसेंट सोसाइटी ने बताया कि लगभग 80,000 से 85,000 नागरिक संरचनाएं क्षतिग्रस्त या नष्ट हो गई हैं. युद्ध की लागत भी आसमान छू रही है, कुछ अनुमानों के अनुसार अमेरिका को इस युद्ध पर प्रतिदिन 1 बिलियन डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं. पाकिस्तान और ओमान जैसे देश युद्ध विराम के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है.
अमेरिकी रक्षा सचिव ने आर्मी चीफ को किया बर्खास्त: सैन्य नेतृत्व में बड़ी फेरबदल
न्यूयॉर्क टाइम्स के के अनुसार, रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने गुरुवार को सेना के प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज को बर्खास्त कर दिया. यह कदम ट्रंप प्रशासन द्वारा शीर्ष सैन्य अधिकारियों की छंटनी के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, हेगसेथ और सेना के नेतृत्व के बीच लंबे समय से तनाव चल रहा था, जो विशेष रूप से पदोन्नति और कर्मियों के फैसलों को लेकर था. जनरल जॉर्ज ने 2024 में सेना के भर्ती संकट को दूर करने और आधुनिक ड्रोन तकनीक को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनकी जगह जनरल क्रिस्टोफर ला नेवे को कार्यवाहक प्रमुख बनाया गया है, जो पहले हेगसेथ के वरिष्ठ सैन्य सहायक रह चुके हैं. इस बर्खास्तगी से सेना के वरिष्ठ अधिकारियों में नाराजगी और निराशा का माहौल है, क्योंकि युद्ध के बीच में नेतृत्व का इस तरह बदलना सैन्य स्थिरता के लिए खतरा माना जा रहा है.
ट्रंप की नीतियों से नाटो गठबंधन में दरार: यूरोपीय देशों में चिंता
एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान युद्ध ने नाटो गठबंधन के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने उन सहयोगियों की आलोचना की है जिन्होंने अमेरिका को सैन्य बेस या हवाई क्षेत्र का उपयोग करने से मना कर दिया है. ट्रंप ने उन्हें “कायर” कहा है और गठबंधन से पूरी तरह हटने की धमकी दी है. इसके विपरीत, यूरोपीय सहयोगियों का कहना है कि ट्रंप ने उनकी सलाह के बिना यह युद्ध शुरू किया और अब वे इसकी कीमत चुका रहे हैं. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ट्रंप की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि यदि अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं पर रोज़ाना संदेह पैदा करेगा, तो गठबंधन खोखला हो जाएगा. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस खींचतान का सीधा फायदा रूस को हो रहा है, क्योंकि पश्चिमी देशों का ध्यान बँट गया है और तेल की बढ़ती कीमतों से रूस का खजाना भर रहा है.
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.







