04/02/2026: मोदी को 'कम्प्रोमाइज्ड पीएम' कहा राहुल ने | ममता गईं सुप्रीम कोर्ट पैरवी करने | किसानों में ट्रंप डील को लेकर चिंता | स्कूल बंद करने में यूपी, एमपी टॉप पर | भूमिहारों के अरमान | क्रिकेट
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियाँ
संसद में संग्राम: राहुल गांधी ने नरवणे की ‘किताब’ लहराई, 2020 चीन विवाद पर पीएम को घेरा.
ममता की दलील: बंगाल सीएम ने सुप्रीम कोर्ट में खुद की बहस, चुनाव आयोग को बताया ‘व्हाट्सएप कमीशन’.
डोभाल का मिशन: रिपोर्ट का दावा- अजीत डोभाल ने गुप्त अमेरिकी यात्रा कर भारत के साथ रिश्ते सुधारे.
किसान चेतावनी: संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा- अमेरिकी उत्पाद आए तो 2020 जैसा आंदोलन फिर होगा.
मणिपुर सरकार: एक साल बाद बनी सरकार, लेकिन कुकी समुदाय ने किया बहिष्कार.
रूसी धोखा: अच्छी नौकरी के नाम पर अफ्रीकी युवाओं को यूक्रेन युद्ध में झोंक रहा है रूस.
मदरसा बोर्ड भंग: उत्तराखंड सरकार ने मदरसों की जगह आधुनिक शिक्षा प्राधिकरण बनाया.
स्कूल बंदी: देश में पिछले 10 साल में 93 हजार सरकारी स्कूल बंद, यूपी सबसे आगे.
राहुल गांधी के समर्थन में कांग्रेस का हंगामा: ‘जो उचित समझो वो करो’ के बैनर लहराए, पीएम मोदी का भाषण टला
बुधवार की शाम लोकसभा में नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला, जिसके चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रपति के अभिभाषण पर होने वाला जवाब टालना पड़ा. सदन में उस वक्त हंगामा मच गया जब कांग्रेस सांसद हाथों में एक बड़ा बैनर लेकर ट्रेजरी बेंच (सत्ता पक्ष) की ओर बढ़ गए. इस बैनर पर पीएम मोदी की तस्वीर के साथ एक नारा लिखा था— “जो उचित समझो वो करो”.
इंडियन एक्सप्रेस में दीप्तिमान तिवारी और जतिन आनंद की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विरोध भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा नेहरू-गांधी परिवार पर किए गए तीखे हमलों के कुछ घंटों बाद शुरू हुआ. दुबे के भाषण के बाद सदन में भारी शोर-शराबा हुआ और कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी थी. जब शाम 5 बजे सदन दोबारा जुड़ा, तो पीठासीन अधिकारी संध्या रे ने भाजपा सांसद पी.पी. चौधरी को बोलने के लिए कहा. इसी दौरान वर्षा गायकवाड़ के नेतृत्व में कांग्रेस सांसद वेल में आ गए. उनके साथ समाजवादी पार्टी के सांसद भी थे, जो वाराणसी में अहिल्याबाई होल्कर मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान हुई कथित क्षति की तस्वीरें लहरा रहे थे.
कांग्रेस का “जो उचित समझो वो करो” वाला बैनर पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की एक अप्रकाशित किताब (मेमॉयर) के उस कथित अंश का संदर्भ था, जिसका जिक्र हाल ही में राहुल गांधी ने किया था. आरोप है कि 2020 में गलवान संघर्ष के दौरान पीएम ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए यही वाक्य कहा था. कांग्रेसी सांसद बैनर लेकर सत्ता पक्ष की चार कतारें पार कर आगे बढ़ गए, जिन्हें अश्विनी वैष्णव और अर्जुन राम मेघवाल जैसे वरिष्ठ मंत्रियों ने रोका.
हंगामे के बीच सदन को गुरुवार सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया. इससे पहले, सदन के बाहर प्रियंका गांधी वाड्रा ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “अगर नेता प्रतिपक्ष (राहुल गांधी) को बोलने नहीं दिया जाएगा, तो हम उन्हें भी बोलने नहीं देंगे.” उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार व्यवधान पैदा करने के लिए जानबूझकर निशिकांत दुबे जैसे सांसदों का इस्तेमाल करती है. प्रियंका ने कहा, “सरकार किसी सदस्य को किताब का हवाला नहीं देने देती, लेकिन दुबे छह किताबें लेकर आते हैं. यह सरकार दिखाना चाहती है कि संसद में सिर्फ उनकी मनमर्जी चलेगी.”
गौरतलब है कि इससे पहले विपक्ष के 8 सांसदों के निलंबन और राहुल गांधी को बोलने से रोके जाने के विरोध में कांग्रेस ने संसद के मकर द्वार पर प्रदर्शन भी किया था.
राहुल गांधी ने संसद परिसर में लहराया नरवणे का ‘अप्रकाशित संस्मरण’, कहा- पीएम मोदी ने 2020 में जिम्मेदारी से झाड़ा था पल्ला
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को एक बड़ा राजनीतिक धमाका करते हुए पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित “संस्मरण” के अंशों को सार्वजनिक किया. संसद भवन परिसर में पत्रकारों को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने अपने हाथ में वह दस्तावेज (जिसे वे नरवणे की किताब बता रहे थे) लहराया और दावा किया कि सरकार इस किताब के अस्तित्व को नकार रही है क्योंकि इसमें 2020 के भारत-चीन संघर्ष की असहज करने वाली सच्चाई है.
राहुल गांधी ने दावा किया कि 2020 में जब लद्दाख सीमा पर तनाव चरम पर था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. नरवणे के कथित संस्मरण का हवाला देते हुए राहुल ने कहा कि उस समय सेना प्रमुख ने खुद को पूरी तरह अकेला और सिस्टम द्वारा “त्यागा हुआ” महसूस किया था.
राहुल ने घटनाक्रम का ब्योरा देते हुए कहा, “मुख्य बात यह है कि पीएम ने कहा था- ‘जो उचित समझो वो करो’. जब चीनी टैंक भारतीय सीमा में घुस आए थे, तो जनरल नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को फोन किया और पूछा कि हमें क्या करना चाहिए? राजनाथ सिंह ने पहले कोई जवाब नहीं दिया. नरवणे ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर और एनएसए अजीत डोभाल से भी संपर्क किया, लेकिन कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिला.”
राहुल ने आगे बताया, “नरवणे ने दोबारा राजनाथ सिंह को फोन किया, जिन्होंने कहा कि ‘मैं ऊपर से पूछकर बताऊंगा’. ऊपर से स्टैंडिंग ऑर्डर था कि अगर चीनी सेना आती है तो बिना अनुमति गोली नहीं चलानी है. जबकि नरवणे जी और हमारी सेना उन टैंकों पर फायर करने के लिए तैयार थी क्योंकि वे हमारी सीमा में घुस चुके थे.”
राहुल ने आरोप लगाया, “नरेंद्र मोदी ने संदेश दिया- ‘जो उचित समझो वो करो’. इसका सीधा मतलब है कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. उन्होंने सेना प्रमुख से कह दिया कि जो करना है आप करें, यह मेरे बस की बात नहीं है.”
यह विवाद तब और गहरा गया जब सरकार ने सदन में इस किताब के अस्तित्व को ही नकार दिया. राहुल ने कहा, “स्पीकर कहते हैं यह किताब नहीं है, रक्षा मंत्री कहते हैं यह नहीं है. लेकिन मैं भारत के हर युवा को दिखाना चाहता हूं कि यह किताब मौजूद है और इसमें सच्चाई लिखी है.” राहुल ने चुनौती दी कि अगर पीएम मोदी में हिम्मत है तो वे सदन में आएं, वे उन्हें यह किताब देंगे.
गौरतलब है कि मंगलवार को लोकसभा में इस मुद्दे पर भारी हंगामा हुआ था. राहुल गांधी को इस “अप्रकाशित संस्मरण” का हवाला देने से रोका गया, जिसके बाद विरोध कर रहे कांग्रेस और माकपा के 8 सांसदों को “अशिष्ट व्यवहार” के आरोप में बजट सत्र के शेष भाग (2 अप्रैल तक) के लिए निलंबित कर दिया गया. राहुल ने स्पीकर को पत्र लिखकर इसे लोकतंत्र पर धब्बा बताया है.
ममता की अदालत में ‘5 मिनट’: टैगोर का हवाला, खुद को बताया ‘बंधुआ मजदूर’, चुनाव आयोग को कहा ‘व्हाट्सएप कमीशन’
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में चल रही मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के खिलाफ तीखा हमला बोला. एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए, वरिष्ठ वकील श्याम दीवान के नेतृत्व में अपनी कानूनी टीम के साथ पहुंचीं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने जजों और बार के सदस्यों का धन्यवाद करते हुए रवींद्रनाथ टैगोर को उद्धृत किया: “हमारे वकील शुरू से न्याय के लिए लड़ते हैं, लेकिन जब हमें न्याय नहीं मिलता, तो न्याय दरवाजों के पीछे रोता है.”
यह सुनवाई बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच बढ़ते टकराव के बीच हुई. राज्य सरकार का आरोप है कि आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया “मनमाने और जल्दबाजी” में की जा रही है, जबकि आयोग इसे निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए एक नियमित अभ्यास बता रहा है. बेंच के सामने भावनात्मक अपील करते हुए ममता बनर्जी ने दावा किया कि एसआईआर का असली मकसद “सिर्फ नाम हटाना है, जोड़ना नहीं.” उन्होंने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को छह पत्र लिखने के बावजूद उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. खुद को “बंधुआ मजदूर” और एक साधारण परिवार की “कम महत्वपूर्ण व्यक्ति” बताते हुए उन्होंने अदालत से लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगाई.
ममता ने अदालत के सामने तस्वीरें और दस्तावेज रखते हुए एक गंभीर मुद्दा उठाया. उन्होंने दावा किया कि शादी के बाद सरनेम बदलने वाली महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं. उन्होंने दलील दी, “मान लीजिए कोई बेटी शादी के बाद अपना टाइटल बदलती है, तो उसे भी ‘मिसमैच’ मानकर हटा दिया जा रहा है.” उन्होंने प्रक्रिया की गति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो काम आम तौर पर दो साल में पूरा होता है, वह बंगाल में तीन महीने में क्यों निपटाया जा रहा है? उन्होंने आरोप लगाया कि इस आपाधापी में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है और कई बीएलओ ने आत्महत्या की है. उन्होंने असम (जहां भाजपा का शासन है) से तुलना करते हुए पूछा कि वहां ऐसा क्यों नहीं हो रहा? क्या सिर्फ बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है?
ममता ने सवाल उठाया, “सिर्फ बंगाल को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है? असम को क्यों नहीं? चुनाव करीब हैं और फसल कटाई का समय है, ऐसे में 20 साल बाद यह प्रक्रिया इतनी जल्दबाजी में क्यों की जा रही है?” उन्होंने दावा किया कि इस आपाधापी में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है.
सीजेआई सूर्य कांत ने ममता को आश्वस्त किया कि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से “भाग नहीं सकता”. उन्होंने कहा, “हर समस्या का समाधान होता है. हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी निर्दोष नागरिक या असली वोटर का नाम लिस्ट से न कटे, चाहे स्थानीय बोली या उच्चारण के कारण कोई गलती क्यों न हुई हो.” कोर्ट ने यह सुझाव भी दिया कि स्थानीय बोली समझने वाले अधिकारियों को मदद के लिए लगाया जा सकता है.
अपने तर्कों को और धार देते हुए ममता ने चुनाव आयोग को “व्हाट्सएप कमीशन” करार दिया. उनका आरोप था कि भाजपा शासित राज्यों से आए माइक्रो-ऑब्जर्वर्स स्थानीय बूथ लेवल अधिकारियों की अनदेखी कर एकतरफा कार्रवाई कर रहे हैं, जिसके चलते लगभग 58 लाख नाम हटा दिए गए हैं और प्रभावित मतदाताओं के पास फॉर्म 6 के तहत कोई प्रभावी उपाय नहीं है. हालांकि, उन्होंने आधार कार्ड और अन्य दस्तावेजों को विचार में लेने की अनुमति देने के लिए कोर्ट का धन्यवाद भी किया. सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ममता की याचिका पर चुनाव आयोग और बंगाल के सीईओ को नोटिस जारी किया. तृणमूल कांग्रेस ने इसे अपनी “बड़ी जीत” बताया है, यह कहते हुए कि ममता ने वकील का कोट पहनकर तथ्यों के साथ बहस की और जवाबदेही तय करवाई.
रिपोर्ट: भारत-अमेरिका संबंधों को बचाने भेजे गए थे डोभाल; गोयल बोले- अमेरिकी डील में डेयरी और खेती पूरी तरह सुरक्षित
टेलीग्राफ और ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बुधवार को लोकसभा में देश को आश्वस्त किया कि अमेरिका के साथ होने वाले व्यापार समझौते में भारत के कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित हैं. व्हाइट हाउस द्वारा यह कहे जाने के कुछ ही घंटों बाद कि दिल्ली अब रूसी तेल नहीं खरीदेगा और अमेरिकी क्षेत्रों में 500 अरब डॉलर का निवेश करेगा, गोयल ने सदन को बताया कि भारतीय सामानों के लिए अमेरिकी टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया जाएगा, जो प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में काफी कम है.
गोयल ने कहा, “दोनों पक्षों के विविध हितों को देखते हुए, यह स्वाभाविक है कि हम अपनी अर्थव्यवस्था के संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा करें. बातचीत के दौरान, भारतीय पक्ष ने कृषि और डेयरी क्षेत्र के हितों की सफलतापूर्वक रक्षा की है.” उन्होंने यह भी जानकारी दी कि फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा के बाद से एक संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभकारी द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए लगातार चर्चाएं चल रही थीं. गोयल के मुताबिक, यह सौदा ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिज़ाइन इन इंडिया’ जैसी पहलों को बढ़ावा देगा, जिससे श्रम-गहन क्षेत्रों को निर्यात में बड़ी मदद मिलेगी और एमएसएमई के लिए नए अवसर खुलेंगे.
पीयूष गोयल का यह बयान ‘ब्लूमबर्ग’ की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें पर्दे के पीछे की कूटनीति का खुलासा किया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को भारत-अमेरिका संबंधों को बचाने के लिए वाशिंगटन भेजा गया था. उस समय संबंध तब बिगड़ गए थे जब डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत को “मृत अर्थव्यवस्था” कहा था और प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के शी जिनपिंग और रूस के व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थी.
रिपोर्ट में अनाम भारतीय अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि डोभाल ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से स्पष्ट कहा कि दिल्ली वाशिंगटन द्वारा “धमकाया नहीं जाएगा” और भारत ट्रम्प के कार्यकाल के खत्म होने का इंतजार करने को तैयार है, जैसा कि उसने अतीत में अन्य शत्रुतापूर्ण अमेरिकी प्रशासनों के साथ किया है. डोभाल ने यह संदेश भी दिया कि दिल्ली चाहती है कि ट्रम्प की टीम भारत की सार्वजनिक आलोचना बंद करे. इसके कुछ ही समय बाद, ट्रम्प ने मोदी को उनके जन्मदिन पर फोन किया, जिससे संबंधों में जमी बर्फ पिघलनी शुरू हुई. अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर द्वारा भारत और अमेरिका को “असली दोस्त” बताने और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ उनकी बैठक ने इस समझौते को अंतिम रूप देने में निर्णायक भूमिका निभाई.
राष्ट्रपति शासन हटने के बाद खेमचंद सिंह ने मणिपुर के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली
लगभग एक साल के राजनीतिक शून्य के बाद, बुधवार को मणिपुर में नई सरकार का गठन हो गया. वरिष्ठ मैतेई राजनीतिज्ञ और भाजपा नेता युमनाम खेमचंद सिंह ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.
“द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, जातीय संतुलन साधते हुए सरकार में दो उपमुख्यमंत्री बनाए गए हैं. नेमचा किपगेन (भाजपा): कुकी समुदाय से आने वाली किपगेन मणिपुर की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनी हैं. उन्होंने नई दिल्ली स्थित मणिपुर भवन से वर्चुअली शपथ ली. लोसी दिखो (नागा पीपुल्स फ्रंट): नागा समुदाय के इस विधायक ने भी उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. इनके अलावा, दो अन्य मैतेई विधायकों— गोविंददास कोंथौजम (भाजपा) और ख्वैराकम लोकन सिंह (नेशनल पीपुल्स पार्टी)—ने मंत्री पद की शपथ ली.

कुकी विधायकों को सरकार से दूर रहने का फरमान
मणिपुर में सरकार बनाने की कोशिशों में जुटी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को एक बड़ा झटका लगा है. राज्य के प्रभावशाली नागरिक संगठन ‘कुकी-जो काउंसिल’ ने कुकी समुदाय के विधायकों को निर्देश दिया है कि वे इंफाल में बनने वाली नई सरकार का हिस्सा न बनें.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह बयान राजनीतिक रूप से बेहद अहम है क्योंकि भाजपा पिछले कुछ हफ्तों से कुकी विधायकों को मनाने की कोशिश कर रही थी. भाजपा के सूत्रों ने संकेत दिया था कि जातीय विभाजन को पाटने के लिए एक फॉर्मूला तैयार किया जा रहा था, जिसके तहत मैतेई समुदाय के वाई. खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री और कुकी समुदाय की वरिष्ठ नेता नेमचा किपगेन को उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता था.
लेकिन काउंसिल ने 30 दिसंबर, 2025 की गवर्निंग काउंसिल की बैठक और 13 जनवरी, 2026 को गुवाहाटी में हुई “लुंगथु मीटिंग” के फैसलों का हवाला देते हुए इस पर पानी फेर दिया है. काउंसिल ने साफ कहा, “कुकी-जो लोग उस सरकार के गठन में शामिल नहीं हो सकते और न ही होंगे, जिसने उन पर अत्याचार किए और जिनसे हमें हिंसक रूप से अलग कर दिया गया है.”
काउंसिल ने अपनी पुरानी मांग दोहराते हुए कहा कि जब तक केंद्र और राज्य सरकार कुकी-जो लोगों के लिए “अलग प्रशासन” (विधानसभा के साथ केंद्र शासित प्रदेश) की मांग पर लिखित आश्वासन नहीं देती, तब तक सरकार में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता.
काउंसिल ने कुकी विधायकों को चेतावनी भी दी है. उन्होंने कहा कि अगर कोई विधायक इस सामूहिक फैसले के खिलाफ जाकर सरकार में शामिल होता है, तो वह अपनी व्यक्तिगत हैसियत से ऐसा करेगा और उसके परिणामों के लिए काउंसिल जिम्मेदार नहीं होगी. इस फरमान ने कुकी विधायकों को धर्मसंकट में डाल दिया है—एक तरफ सत्ता और विकास कार्यों के लिए सरकार में शामिल होने की जरूरत है, तो दूसरी तरफ अपने समुदाय के बहिष्कार का डर.
भारत-अमेरिका डील में कृषि या डेयरी उत्पादों को शामिल करने पर किसान करेंगे आंदोलन
“अगर अमेरिकी उत्पाद देश में धकेले गए, तो हमारे किसान हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएंगे,” यह बात वरिष्ठ एसकेएम नेता और ऑल इंडियन किसान फेडरेशन के अध्यक्ष प्रेम सिंह भंगू ने कही.
हरप्रीत बाजवा की रिपोर्ट है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर चिंता जताते हुए, विभिन्न किसान संगठनों के शीर्ष निकाय संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने चेतावनी दी है कि यदि समझौते में किसी भी कृषि या डेयरी उत्पाद को शामिल किया गया, तो देश में 2020-21 के किसान आंदोलन जैसी स्थिति फिर से पैदा होगी.
प्रेम सिंह भंगू ने कहा, “अमेरिका में लगभग आठ लाख किसान हैं जिन्हें भारी सब्सिडी मिलती है, जबकि भारत में करोड़ों किसान हैं और हम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए गारंटीकृत कानून की मांग कर रहे हैं. अगर अमेरिकी उत्पादों को भारतीय बाजार में उतारा गया, तो हमारे किसान खत्म हो जाएंगे.”
एसकेएम ने बयान जारी कर कहा, “केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का यह दावा कि भारत के संवेदनशील कृषि और डेयरी क्षेत्रों को बाहर रखा गया है, अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस के दावे के विपरीत है. रोलिंस के अनुसार, इस सौदे के तहत अमेरिका भारत के विशाल बाजार में अधिक अमेरिकी कृषि उत्पाद निर्यात करेगा, जिससे भारत के साथ अमेरिका के 1.3 बिलियन डॉलर के कृषि व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिलेगी.”
मोर्चे ने आगे कहा कि वाणिज्य मंत्री ने रोलिंस के दावे का खंडन नहीं किया है. गोयल का बयान भ्रामक है और इसका उद्देश्य जनता, विशेषकर किसानों को गुमराह करना है.
एसकेएम ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने 9 दिसंबर, 2021 को एमएसपी (सी2+50%), पूर्ण कर्ज माफी और बिजली क्षेत्र के निजीकरण को रोकने जैसे जो लिखित आश्वासन दिए थे, उन्हें अभी तक लागू नहीं किया गया है.
बीकेयू (लखोवाल गुट) के अध्यक्ष हरिंदर सिंह लखोवाल ने कहा, “जब तक हम इस सौदे की बारीकियों को नहीं पढ़ लेते, कुछ नहीं कहा जा सकता. लेकिन अगर यह सौदा किसानों, डेयरी और मत्स्य पालन क्षेत्रों को प्रभावित करता है, तो हमारे पास 2020-21 जैसा आंदोलन शुरू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा. “
सरवन सिंह पंढेर ने कहा कि पीएम मोदी ने पहले कहा था कि कृषि क्षेत्र को नहीं खोला जाएगा, लेकिन अब लगता है कि केंद्र ने अमेरिका को अनुमति दे दी है. किसान मजदूर मोर्चा गुरुवार को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और अन्य मंत्रियों के आवासों के सामने विरोध प्रदर्शन करेगा और मांग करेगा कि राज्य विधानसभा में इस समझौते के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया जाए.
उत्तराखंड ने मदरसा बोर्ड को समाप्त किया; पारंपरिक मदरसों की जगह लेंगे आधुनिक स्कूल
अपनी शिक्षा नीति में एक ऐतिहासिक बदलाव करते हुए, उत्तराखंड सरकार ने आधिकारिक तौर पर मदरसा बोर्ड को भंग कर दिया है और इसके स्थान पर नवगठित ‘राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ को स्थापित किया है. यह परिवर्तन पिछले विधानसभा सत्र के दौरान बोर्ड को भंग करने वाले विधेयक के पारित होने के बाद आया है. नए नियम 1 जुलाई से प्रभावी होंगे, जिसके तहत सभी अल्पसंख्यक संस्थान ‘राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ के दायरे में आ जाएंगे.
नरेंद्र सेठी की रिपोर्ट है कि इन संस्थानों की मान्यता की प्रक्रिया अब सीधे उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड द्वारा संभाली जाएगी. इस परिवर्तन की देखरेख के लिए 11 सदस्यीय निकाय का गठन किया गया है, जिसका अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी को नियुक्त किया गया है.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि इस कदम का उद्देश्य शैक्षिक समानता सुनिश्चित करना है. नए शासनादेश के तहत, इन संस्थानों के छात्र अब केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं रहेंगे. पाठ्यक्रम में अब विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान जैसे आधुनिक विषयों को प्राथमिकता दी जाएगी.
हालांकि, इस फैसले पर समुदाय के प्रतिनिधियों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. ‘उत्तराखंड मुस्लिम सेवा संगठन’ के अध्यक्ष नईम अहमद कुरैशी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि यह कदम संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है.
कुरैशी ने कहा, “राज्य सरकार द्वारा गठित अल्पसंख्यक शिक्षा बोर्ड संविधान के उन प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है, जो अल्पसंख्यकों को अपने स्वयं के शैक्षणिक संस्थानों को संचालित करने का अधिकार देते हैं.”
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा, स्वास्थ्य के आधार पर सोनम वांगचुक की हिरासत पर पुनर्विचार करें
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से पूछा कि क्या जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उनकी हिरासत पर फिर से विचार करने की कोई संभावना है.
‘द टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने पाया कि वांगचुक की स्वास्थ्य रिपोर्ट ठीक नहीं थी. पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) के.एम. नटराज को इस मामले में निर्देश प्राप्त करने को कहा.
अदालत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, “दलीलों, जवाबी दलीलों और कानूनी बिंदुओं से हटकर, अदालत के एक अधिकारी के रूप में इस पर विचार करें. हिरासत का आदेश 26 सितंबर, 2025 को पारित किया गया था, जिसे लगभग पांच महीने हो चुके हैं. हिरासत में लिए गए व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए... हमने जो रिपोर्ट पहले देखी थी, वह बताती है कि उनका स्वास्थ्य इतना अच्छा नहीं है. कुछ उम्र संबंधी या अन्य कारण हो सकते हैं. क्या सरकार के लिए इस पर पुनर्विचार करने या दोबारा देखने की संभावना है?”
सुनवाई के दौरान, एएसजी नटराज ने तर्क दिया कि वांगचुक पिछले साल लेह में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार थे, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी और 161 लोग घायल हुए थे. नटराज ने कहा, “अंततः यह उनका भड़काऊ भाषण और उकसावा था. व्यक्ति को सक्रिय रूप से भाग लेने की आवश्यकता नहीं है, व्यक्तियों के समूह को प्रभावित करने की प्रवृत्ति ही पर्याप्त है.”
कानून अधिकारी ने तर्क दिया कि वांगचुक की हिरासत के आदेश को 3 अक्टूबर, 2025 को मंजूरी दी गई थी और इस मंजूरी के आदेश को कोई चुनौती नहीं दी गई है. नटराज ने कहा कि वह अदालत के सुझाव को संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखेंगे. मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी.
भारत में पिछले 10 वर्षों में 93,000 से अधिक स्कूल बंद, यूपी और एमपी सबसे आगे
करियर्स360 की शीना सचदेवा की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने सोमवार को लोकसभा में बताया कि पिछले 10 वर्षों में पूरे भारत में 93,000 से अधिक स्कूल बंद हो गए हैं. माकपा सांसद अमरा राम के एक सवाल के लिखित जवाब में मंत्री ने बताया कि इनमें से अधिकांश स्कूल दशक के पहले छह वर्षों में बंद हुए.
आंकड़ों के मुताबिक, 2014-15 और 2019-20 के बीच स्थिति सबसे गंभीर थी, जब 70,000 से अधिक स्कूल बंद हुए. इसके बाद 2020-21 से 2024-25 के बीच अतिरिक्त 18,727 स्कूल बंद किए गए. इस दौरान उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 24,590 स्कूल बंद हुए, जो एक रिकॉर्ड है. इसके बाद मध्य प्रदेश का नंबर आता है, जहां 22,438 स्कूल बंद हुए.
विश्लेषण किए गए 10 साल के आंकड़ों से पता चलता है कि मध्य प्रदेश और ओडिशा में दोनों समय-सीमाओं (2014-20 और 2020-25) के दौरान स्कूलों के बंद होने की दर उच्च रही है. 2014-15 से 2019-20 के बीच झारखंड में 5,000 से अधिक, राजस्थान में 2,500 से अधिक और महाराष्ट्र में लगभग 2,000 स्कूल बंद हुए. हालिया रुझानों (2020-21 से 2024-25) में, जम्मू और कश्मीर में 4,000 से अधिक स्कूल बंद हुए, जबकि पश्चिम बंगाल में 1,200 से अधिक स्कूलों पर ताला लगा. कार्यकर्ताओं ने इन बंदी को “शिक्षा विरोधी” करार दिया है, हालांकि संबंधित राज्य सरकारों ने अक्सर बंद होने की सीमा से इनकार किया है.
भूमिहारों को सेंसस में ब्राह्मणों का दर्जा चाहिए
जातीय जनगणना ने भूमिहारों के बीच छेड़ी ‘पहचान’ की जंग: बिहार में समुदाय मांग रहा ‘औपनिवेशिक’ ब्राह्मण दर्जा
‘द प्रिंट’ के लिए कृष्ण मुरारी की बेगूसराय और पटना से रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में भूमिहार समुदाय अपनी पहचान को लेकर एक नई लड़ाई लड़ रहा है. बेगूसराय, जिसे कभी ‘बिहार का लेनिनग्राद’ कहा जाता था और जो अब भाजपा का गढ़ है, इस आंदोलन का केंद्र बन गया है. समुदाय की मांग है कि 2015 की एक ‘लिपिकीय त्रुटि’ को सुधारा जाए और उन्हें आधिकारिक रिकॉर्ड में सिर्फ ‘भूमिहार’ के बजाय ‘भूमिहार ब्राह्मण’ का दर्जा वापस दिया जाए, जैसा कि 1931 की ब्रिटिशकालीन जनगणना में था.
आगामी राष्ट्रीय जनगणना और बिहार सरकार के हालिया जाति सर्वेक्षण ने समुदाय में चिंता पैदा कर दी है. उनका मानना है कि अगर अभी सुधार नहीं हुआ, तो उनकी उच्च-जाति की पहचान हमेशा के लिए मिट सकती है. बेगूसराय के बीहट गांव में युवाओं का नारा है—”ब्राह्मण जाति बहाल करो”. पटना स्थित टीवी पत्रकार धीरेंद्र कुमार ने इस मुद्दे को लेकर पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसके बाद अब मामला राज्य के सवर्ण आयोग के पास है. आयोग के कार्यालय में ब्रिटिश काल के दस्तावेजों और जमीन के रिकॉर्ड्स का अंबार लग गया है, जिसे लोग सबूत के तौर पर भेज रहे हैं कि वे ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मण हैं.
हालांकि, समुदाय के भीतर एक विरोधाभास भी है. एक तरफ जहां कई लोग परशुराम के वंशज होने और ‘भूमिहार ब्राह्मण’ टैग के लिए लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ‘भूमिहार ओबीसी संघर्ष मोर्चा’ जैसे संगठन भी सक्रिय हैं. आलोक कुमार सिंह के नेतृत्व वाला यह गुट मांग कर रहा है कि भूमिहारों को ओबीसी श्रेणी में शामिल किया जाए. उनका तर्क है कि जाति सर्वेक्षण के अनुसार 27.58% भूमिहार गरीब हैं और ‘जमींदारी’ अब पुरानी बात हो चुकी है, इसलिए समुदाय को आरक्षण और आर्थिक सुरक्षा की जरूरत है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि यह पहचान का संकट गहरा है. समुदाय अपनी ‘दबंग’ छवि और अतीत के गौरव (जैसे स्वामी सहजानंद सरस्वती और श्री कृष्ण सिंह का दौर) और वर्तमान की आर्थिक वास्तविकताओं के बीच फंसा हुआ है. जहां एक वर्ग ‘रंगदारी’ और ‘रॉयल्टी’ का प्रदर्शन सोशल मीडिया पर कर रहा है, वहीं दूसरा वर्ग सरकारी सुविधाओं के लिए सामाजिक पदानुक्रम में नीचे आने को तैयार है.
काला घोड़ा फेस्टिवल से हटाई गई आनंद तेलतुंबड़े की पुस्तक चर्चा: पुलिस के अनुरोध पर फैसला, आयोजकों ने बताया ‘दुर्भाग्यपूर्ण’
इंडियन एक्सप्रेस की एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई के प्रतिष्ठित काला घोड़ा आर्ट्स फेस्टिवल (केजीएएफ) में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. ऑनलाइन विरोध और कथित पुलिस दबाव के बाद, दलित विद्वान और लेखक आनंद तेलतुंबड़े की पुस्तक पर होने वाली चर्चा को अंतिम समय में रद्द कर दिया गया है. फेस्टिवल के आयोजकों ने वक्ताओं को भेजे गए ईमेल में पुलिस के अनुरोध का हवाला दिया है, जबकि मुंबई पुलिस के अधिकारियों ने विरोधाभासी बयान देते हुए कहा है कि वे आमतौर पर साहित्यिक कार्यक्रमों को रद्द करने का निर्देश नहीं देते.
“इनकार्सरेटेड टेल्स फ्रॉम बिहाइंड बार्स” शीर्षक वाला यह सत्र गुरुवार (6 फरवरी) रात 8 बजे निर्धारित था. इसमें एल्गार परिषद मामले के आरोपी और विद्वान आनंद तेलतुंबड़े के साथ वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका नीता कोल्हत्कर को शामिल होना था. सत्र का संचालन स्क्रोल के संपादक नरेश फर्नांडीस करने वाले थे. फेस्टिवल की वेबसाइट पर इस सत्र का विवरण दिया गया था: “किसी विचार के लिए अपनी स्वतंत्रता खोने का क्या अर्थ है? राजनीतिक कैदियों के आख्यानों के जरिए यह सत्र चर्चा करेगा कि कैसे कारावास सजा और गहन चिंतन दोनों का स्थान बन जाता है.”
यह चर्चा सबसे पहले नवंबर 2025 में प्रस्तावित की गई थी और दिसंबर में इसे अंतिम रूप दिया गया. मूल रूप से यह 8 फरवरी को होनी थी, लेकिन तेलतुंबड़े की एक पारिवारिक शादी (भोपाल में) की व्यस्तता के कारण इसे 6 फरवरी को पुनर्निर्धारित किया गया. जैसे ही संशोधित तारीख की जानकारी ऑनलाइन प्रसारित हुई, सोशल मीडिया पर ट्रोल्स ने इसे निशाना बनाना शुरू कर दिया. मंगलवार 3 फरवरी की रात, आयोजकों ने वक्ताओं को ईमेल भेजकर सूचित किया कि पुलिस के अनुरोध के कारण चर्चा रद्द कर दी गई है. इसके बाद एक फॉलो-अप ईमेल में प्रतिभागियों से सोशल मीडिया पर कार्यक्रम से संबंधित पोस्ट हटाने का भी अनुरोध किया गया. फेस्टिवल के निदेशक ने इस फैसले को “अप्रत्याशित और दुर्भाग्यपूर्ण” करार दिया है.
आनंद तेलतुंबड़े ने इस स्थिति को “पूरी तरह से हास्यास्पद” बताया. उन्होंने कहा, “मुझे वास्तव में नहीं पता कि क्या हुआ. जब आयोजकों ने नई तारीख के बारे में पोस्ट करना शुरू किया, तो मुंबई पुलिस ने कार्यक्रम रद्द करने को कहा. मुझे यही बताया गया है.” उन्होंने आश्चर्य जताया कि उनकी जिस किताब (’द सेल एंड द सोल: ए प्रिजन मेमॉयर’) पर चर्चा होनी थी, वह पहले ही प्रकाशित हो चुकी है और प्रेस क्लब सहित कई सार्वजनिक मंचों पर उस पर बिना किसी समस्या के चर्चा की जा चुकी है.
लेखिका नीता कोल्हत्कर ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह शर्मनाक है कि आयोजक कुछ दक्षिणपंथी ट्रोल्स और पुलिस के दबाव में आ गए. यह ‘कैंसल कल्चर’ हमारे लोकतंत्र के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है. नागरिकों को ये कहानियाँ जानने का अधिकार था, जिससे उन्हें वंचित कर दिया गया.” पुलिस का बयान आयोजकों के दावे से मेल नहीं खाता. एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि इस कार्यक्रम के लिए कोई अनुमति नहीं मांगी गई थी, इसलिए कोई अनुमति नहीं दी गई. वहीं, एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मुंबई पुलिस आमतौर पर कार्यक्रमों को रद्द करने का निर्देश नहीं देती है और ऐसा निर्देश जारी किए जाने की संभावना कम है.
गौरतलब है कि पूर्व आईआईटी प्रोफेसर तेलतुंबड़े को अप्रैल 2020 में एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किया गया था और नवंबर 2022 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दी थी. अदालत ने उस समय टिप्पणी की थी कि प्रथम दृष्टया उनके खिलाफ आतंकवादी कृत्य का कोई सबूत नहीं है.
बलूचिस्तान को वापस लेने के लिए पाक सुरक्षा बलों ने इस्तेमाल किए ड्रोन और हेलिकॉप्टर, 3 दिन की खूनी जंग में 58 मौतें
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के सुरक्षा बलों ने ड्रोन और लड़ाकू हेलीकॉप्टरों का भारी इस्तेमाल करते हुए देश के दक्षिण-पश्चिमी शहर नुश्की को तीन दिन की भीषण लड़ाई के बाद अलगाववादी विद्रोहियों से वापस छीन लिया है. पुलिस ने बुधवार को पुष्टि की कि इस हिंसा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 58 हो गई है, जिसमें नागरिक और सुरक्षाकर्मी शामिल हैं.
शनिवार को बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) द्वारा किए गए समन्वित हमलों की लहर ने पाकिस्तान के सबसे बड़े और संसाधन संपन्न प्रांत को लगभग ठप कर दिया था. विद्रोहियों ने स्कूलों, बैंकों, बाजारों और पुलिस स्टेशनों पर कब्जा कर लिया था और सुरक्षा बलों के साथ गोलीबारी की थी. सुरक्षा अधिकारियों का दावा है कि उन्होंने जवाबी कार्रवाई में 197 आतंकवादियों को मार गिराया है. दूसरी ओर, बीएलए, जो क्षेत्र का सबसे मजबूत विद्रोही समूह है, ने अपने ‘ऑपरेशन हेरोफ’ (ब्लैक स्टॉर्म) में 280 सैनिकों को मारने का दावा किया है, हालांकि उन्होंने इसका कोई सबूत पेश नहीं किया.
नुश्की शहर में स्थिति बेहद तनावपूर्ण थी, जहां विद्रोहियों ने पुलिस स्टेशन और अन्य सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर कब्जा कर लिया था, जिससे तीन दिन तक गतिरोध बना रहा. असिस्टेंट कमिश्नर मारिया शमून ने बताया, “विद्रोही हमारे घरों में घुस आए और डिप्टी कमिश्नर मोहम्मद हुसैन व उनके परिवार को बंधक बना लिया. वे हमें लोगों की सेवा करने से रोकना चाहते थे.” क्वेटा में एक गृहिणी रोबिना अली ने दहशत बयां करते हुए कहा, “मुझे लगा कि मेरे घर की छत और दीवारें उड़ जाएंगी.”
पाकिस्तान ने इन हमलों के लिए हमेशा की तरह भारत को जिम्मेदार ठहराया है, लेकिन कोई सबूत नहीं दिया. भारत के विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि इस्लामाबाद को अपनी विफलताओं को छुपाने के बजाय बलूचिस्तान के लोगों की लंबी समय से चली आ रही मांगों पर ध्यान देना चाहिए. सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल आमिर रियाज का कहना है कि पिछले एक दशक में विद्रोह काफी विकसित हुआ है और यह संघर्ष आगे भी जारी रह सकता है, क्योंकि सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ राजनीतिक समाधान की भी जरूरत है.
एपस्टीन से संबंधों पर बिल को जवाब देना होगा, मैं उस ‘दलदल’ से दूर खुश हूँ: मेलिंडा फ्रेंच गेट्स
सीएनएन के लिए जॉन लियू की रिपोर्ट के मुताबिक, मेलिंडा फ्रेंच गेट्स ने अपने पूर्व पति और माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स के दिवंगत यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन के साथ संबंधों को लेकर अपनी चुप्पी तोड़ी है. पिछले हफ्ते जारी किए गए नए दस्तावेजों, जिनमें गेट्स और एपस्टीन के संबंधों का विवरण था, पर प्रतिक्रिया देते हुए मेलिंडा ने कहा कि वह “अविश्वसनीय दुख” से भर गई थीं. 2021 में गेट्स से तलाक लेने वाली मेलिंडा ने एनपीआर के एक पॉडकास्ट में कहा, “मैं उस सारी गंदगी से दूर होकर खुश हूँ. जो भी सवाल बचे हैं, उनके जवाब उन लोगों और मेरे पूर्व पति को देने होंगे, मुझे नहीं.”
हाल ही में अमेरिकी न्याय विभाग ने एपस्टीन जांच से जुड़ी 30 लाख से अधिक पेजों की फाइलें जारी की हैं. इनमें एपस्टीन के ईमेल अकाउंट में 2013 का एक ड्राफ्ट (जो कभी भेजा नहीं गया) मिला है. इसमें एपस्टीन ने “विश्वासघात” की भावनाओं को व्यक्त किया है और गेट्स व उनकी तत्कालीन पत्नी मेलिंडा के बीच वैवाहिक कलह का जिक्र किया है. इसमें व्यापारिक सौदों और गेट्स द्वारा यौन संचारित रोग (एसटीडी) को लेकर चिंता जैसी बातें भी शामिल हैं.
बिल गेट्स के एक प्रवक्ता ने इन दावों को “बिल्कुल बेतुका और पूरी तरह झूठा” बताया है. उनका कहना है कि ये दस्तावेज केवल एपस्टीन की हताशा को दिखाते हैं कि वह गेट्स के साथ संबंध नहीं बना पाया. गेट्स ने बाद में एक साक्षात्कार में दोहराया कि एपस्टीन के साथ समय बिताना एक बड़ी “गलती” थी, लेकिन उन्होंने किसी भी गलत काम से इनकार किया और कहा कि वह कभी एपस्टीन के द्वीप पर नहीं गए. मेलिंडा ने कहा कि नए विवरणों को पढ़ना उनकी शादी के “बहुत दर्दनाक समय” की याद दिलाता है. उन्होंने उन लड़कियों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की जो एपस्टीन का शिकार हुईं, यह कहते हुए कि उनके साथ जो हुआ वह “अकल्पनीय” है.
‘स्टील पोर्क्युपाइन’: युद्ध के बाद खुद की रक्षा के लिए यह है यूक्रेन का प्लान बी
पॉलिटिको की एक विशेष रिपोर्ट बताती है कि यूक्रेन को डर है कि किसी भी संभावित शांति समझौते में सहयोगियों की सुरक्षा गारंटी पर भरोसा नहीं किया जा सकता. विशेष रूप से अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की सत्ता में वापसी की संभावनाओं और उनकी रूस के प्रति नरम नीतियों को देखते हुए, यूक्रेन ने “स्टील पोर्क्युपाइन” (फौलादी साही) बनने की रणनीति अपनाई है. यह शब्द यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन ने दिया था, जिसका अर्थ है देश को इतना कंटकपूर्ण और मजबूत बनाना कि कोई भी हमलावर उसे निगल न सके.
यूक्रेन की नाटो में शामिल होने की उम्मीदें कम होती दिख रही हैं क्योंकि ट्रम्प जैसे नेता और रूस इसका विरोध कर रहे हैं. 1994 के बुडापेस्ट ज्ञापन के कड़वे अनुभवों के बाद, जहां सुरक्षा के वादे खोखले साबित हुए थे, कीव अब अपनी रक्षा के लिए पूरी तरह आत्मनिर्भर बनना चाहता है. इस योजना का मतलब है—एक विशाल स्थायी सेना (लगभग 8 लाख सैनिक), ड्रोन और मिसाइल तकनीक में भारी निवेश, और एक मजबूत घरेलू हथियार उद्योग. यूक्रेनी रक्षा उद्योग परिषद के सीईओ इहोर फेडिरको ने कहा कि भविष्य की सुरक्षा बाहरी वादों पर नहीं, बल्कि “उत्पादन लचीलेपन” और लंबी अवधि तक हथियार बनाने की क्षमता पर निर्भर करती है. रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन ने 2025 में 45 लाख एफपीवी ड्रोन का अनुबंध किया है और अपनी खुद की क्रूज व बैलिस्टिक मिसाइलें विकसित कर रहा है जो रूस के रिफाइनरियों और बुनियादी ढांचे पर गहरा प्रहार कर सकें. राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के लिए इसका अर्थ है कि यूक्रेन को अपनी रक्षा क्षमताओं को इतना मजबूत करना होगा कि रूस दोबारा हमला करने की हिम्मत न करे. इसके लिए सेना में भर्ती, प्रशिक्षण और खरीद प्रणाली में सुधार किए जा रहे हैं. नाटो महासचिव मार्क रूटे ने भी स्वीकार किया है कि यूक्रेन को मजबूत सुरक्षा गारंटी की जरूरत है, लेकिन यूक्रेन का ‘प्लान बी’ यही है कि अगर पश्चिम पीछे हटे, तो वह खुद लड़ने के लिए तैयार रहे.
‘या तो भाग जाओ, या मरो’: अफ्रीकी पुरुषों को धोखे से यूक्रेन के ‘मीट ग्राइंडर’ में झोंक रहा रूस
‘सीएनएन’ की एक विस्तृत और चौंकाने वाली इन्वेस्टिगेशन में खुलासा हुआ है कि रूस अफ्रीकी पुरुषों को आकर्षक नौकरियों का झांसा देकर यूक्रेन युद्ध में लड़ने के लिए मजबूर कर रहा है. केन्या की ऐन नदारुआ अपने इकलौते बेटे फ्रांसिस के लिए आंसुओं से भरी हैं. छह महीने पहले, फ्रांसिस इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की नौकरी के वादे पर रूस गया था, लेकिन अब वह लापता है. उसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है जिसमें वह रूसी सेना की वर्दी में, सीने पर लैंडमाइन बांधे हुए नजर आ रहा है. वीडियो में एक रूसी सैनिक उसे नस्लीय अपशब्द कहते हुए धमकी दे रहा है कि उसे यूक्रेनी सेना की स्थिति भेदने के लिए “कैन-ओपनर” की तरह इस्तेमाल किया जाएगा.
सीएनएन ने 12 अफ्रीकी लड़ाकों से बात की और सैकड़ों चैट, वीजा और अनुबंधों की समीक्षा की. जांच में रूस की भर्ती रणनीति का पर्दाफाश हुआ है: एजेंट अफ्रीकी देशों में युवाओं को ड्राइवर या सुरक्षा गार्ड जैसी सिविल नौकरियों का लालच देते हैं. लेकिन रूस पहुंचते ही उन्हें जबरन सेना में भर्ती कर लिया जाता है. उन्हें रूसी भाषा में लिखे अनुबंधों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिन्हें वे पढ़ नहीं सकते, और उनके पासपोर्ट जब्त कर लिए जाते हैं, जिससे भागना असंभव हो जाता है.
कई रंगरूटों ने बताया कि उन्हें 13,000 डॉलर का साइनिंग बोनस, 3,500 डॉलर मासिक वेतन और सेवा के अंत में रूसी नागरिकता का वादा किया गया था. लेकिन वास्तविकता में, उन्हें बहुत कम प्रशिक्षण देकर सीधे फ्रंटलाइन पर भेज दिया जाता है. एक अनाम लड़ाके ने बताया कि उसके खाते से रूसी सैनिकों ने बंदूक की नोक पर पैसे निकाल लिए. उसने कहा, “जब तक आप रूसी सेना में हैं, या तो आप भाग जाएं या मर जाएं. यहां से वापस जाने का कोई रास्ता नहीं है.”
पैट्रिक क्वोबा नामक एक केन्याई, जो घायल होने के बाद किसी तरह भागने में सफल रहा, ने अपने चार महीनों को “नरक” बताया. उसने बताया कि घायल होने पर उसे मदद के बजाय रूसी साथियों ने भगा दिया. यूक्रेन के राजदूत ने अफ्रीकी देशों से आग्रह किया है कि वे रूस को सैनिकों की आपूर्ति करने वाले इस “पाइपलाइन” को रोकें. केन्या, युगांडा और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों ने समस्या को स्वीकार किया है, लेकिन रूस ने इन आरोपों पर चुप्पी साधे रखी है.
महान समाजशास्त्री आंद्रे बेतेई, 91 का निधन
आधुनिक भारत के सबसे प्रतिष्ठित समाजशास्त्रियों में से एक, आंद्रे बेतेई का मंगलवार रात दिल्ली में निधन हो गया. वे 91 वर्ष के थे. उनके निधन से अकादमिक और बौद्धिक जगत में एक गहरा शून्य पैदा हो गया है. बंगाली और फ्रांसीसी माता-पिता की संतान, बेतेई ने भारतीय समाज, जाति और वर्ग की संरचना को समझने में एक नई दृष्टि प्रदान की थी. बेतेई का जन्म और पालन-पोषण बंगाल में हुआ था. कलकत्ता विश्वविद्यालय से एमए पूरा करने के तुरंत बाद वे दिल्ली चले गए, जहाँ उन्होंने अपना पूरा जीवन शोध और अध्यापन को समर्पित कर दिया. उन्होंने दशकों तक प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में समाजशास्त्र पढ़ाया और उसे एक विश्वस्तरीय संस्थान बनाने में योगदान दिया. वे दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर एमेरिटस थे और बाद में अशोक विश्वविद्यालय के पहले चांसलर भी बने. उनके निधन पर देशभर से श्रद्धांजलि आ रही है. प्रमुख इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने सोशल मीडिया पर लिखा, “महान समाजशास्त्री आंद्रे बेतेई के निधन की खबर सुनकर टूट गया हूँ. वह भारतीय विद्वानों में थे जिनकी मैं सबसे अधिक प्रशंसा करता था. मेरे और कई अन्य लोगों के लिए वे एक नैतिक और बौद्धिक एंकर थे.”
अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने उन्हें “बौद्धिक और नैतिक रूप से एक विशाल व्यक्तित्व” बताया, जिनके पास गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर था. कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने कहा, “वे एक अद्भुत लेखक थे और उनसे बात करना हमेशा सुखद होता था. अब उनके जैसे लोग नहीं बनते.” उनके पूर्व छात्र और पत्रकार अर्नव दास शर्मा ने याद किया कि बेतेई के विचारों में अद्भुत स्पष्टता थी. वे जटिल विषयों को गहराई और बारीकियों के साथ समझाते थे, जो आज की दुनिया में दुर्लभ है. बेतेई ने राजनीतिक समाजशास्त्र और धर्म के समाजशास्त्र पर कई कालजयी किताबें लिखीं. इनमें ‘कास्ट, क्लास एंड पावर’, ‘सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया’ और ‘द आइडिया ऑफ नेचुरल इनइक्वालिटी’ प्रमुख हैं. उन्होंने समाचार पत्रों के लिए भी व्यापक लेखन किया. अकादमिक क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें 2005 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था.
क्रिकेट का ‘कयामत का समय’? पाकिस्तान की अराजकता बनाम भारत का अहंकार
पाकिस्तान क्रिकेट उसी अव्यवस्था और अराजकता का शिकार है जो पाकिस्तानी सरकार की हकीकत है. यह बमुश्किल काम करने वाले संस्थानों, राजनीतिक अवसरवादियों और नाजुक अहंकार की दुनिया है. येल यूनिवर्सिटी में लेक्चरर सुशांत सिंह अपने लेख ‘आर्मागेडन टाइम?’ में लिखते हैं कि पाकिस्तान सरकार का यह फैसला कि उनकी टीम 2026 टी20 विश्व कप तो खेलेगी, लेकिन 15 फरवरी को भारत के खिलाफ मैदान में नहीं उतरेगी, इसी ‘पागलपन भरे डिसफंक्शन’ का ताज़ा उदाहरण है.
तकनीकी रूप से, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) सरकार के आदेश का पालन कर रहा है. पीसीबी प्रमुख मोहसिन नकवी देश के गृह मंत्री भी हैं. यह एक ऐसे आश्रित का रवैया है जो खुद को विद्रोही दिखाना चाहता है. ‘मेंबर पार्टिसिपेशन एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर करने के बावजूद मैच न खेलने पर आईसीसी कड़े प्रतिबंध लगा सकता है, जिसमें द्विपक्षीय क्रिकेट से निलंबन और पीएसएल के लिए विदेशी खिलाड़ियों को एनओसी न देना शामिल हो सकता है. यह कदम इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि दिसंबर 2024 में ही दोनों देशों के बीच ‘हाइब्रिड मॉडल’ पर सहमति बनी थी, जिसके तहत 2027 तक मैच न्यूट्रल वेन्यू (जैसे श्रीलंका) पर होने थे.
सुशांत सिंह का तर्क है कि अगर पाकिस्तान की समस्या अराजकता है, तो भारत की समस्या अधिक भयावह, व्यवस्थित और खेल के लिए विनाशकारी है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) अब केवल एक खेल संस्था नहीं रह गया है. नरेंद्र मोदी सरकार के राजनीतिक मिजाज के साथ तालमेल बिठाते हुए, बीसीसीआई अब ‘हिंदुत्ववादी सत्ता’ के एक हथियार के रूप में काम कर रहा है. पाकिस्तान की अराजकता उसके अपने प्रशंसकों के लिए त्रासदी है, लेकिन बीसीसीआई द्वारा खेल का यह ‘वेपनाइज़ेशन’ वैश्विक क्रिकेट के लिए एक खतरा है. जय शाह के नेतृत्व में आईसीसी को अब अक्सर ‘बीसीसीआई का दुबई ऑफिस’ कहा जाता है.
तनाव की एक बड़ी वजह हालिया आईपीएल घटनाक्रम भी है. जब आईपीएल नीलामी में कोलकाता नाइट राइडर्स ने बांग्लादेश के मुस्तफिजुर रहमान को खरीदा, तो असम और पश्चिम बंगाल में चुनावों और बांग्लादेश में सांप्रदायिक तनाव के बीच, कथित तौर पर भाजपा के राजनीतिक दबाव में फ्रेंचाइजी (जिसके मालिक शाहरुख खान हैं) को मुस्तफिजुर को रिलीज़ करने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह घटना दिखाती है कि सत्ता का प्रभाव कितना गहरा है.
क्रिकेट का पूरा आर्थिक मॉडल भारत-पाकिस्तान मैच पर टिका है. आईसीसी के प्रसारण अधिकारों का अनुबंध इसी मुकाबले के भारी मूल्य पर निर्भर करता है, जो प्रति मैच 2.2 करोड़ डॉलर से अधिक है. रिपोर्टों के अनुसार, अगर पाकिस्तान मैच का बहिष्कार करता है, तो ब्रॉडकास्टर पीसीबी और आईसीसी को कोर्ट में घसीट सकते हैं और लगभग 3.8 करोड़ डॉलर के हर्जाने की मांग कर सकते हैं. पाकिस्तान ने उस मॉडल को बाधित कर दिया है जो भले ही भारत के पक्ष में झुका था, लेकिन काम कर रहा था. अब पूरा सिस्टम खतरे में है.
लेखक का कहना है कि यह गतिरोध भारत की बदलती हुई आत्म-छवि को दर्शाता है. पिछले एक दशक में भारतीय क्रिकेट ‘आत्मविश्वासी बहुलवाद’ से हटकर ‘कठोर हिंदू राष्ट्रवाद’ की ओर बढ़ गया है. अब क्रिकेट की जीत को सैन्य विजय और हार को देशद्रोह की तरह देखा जाता है. भले ही पाकिस्तान का फैसला खेल के आधार पर गलत है, लेकिन भारत के अहंकार ने ही ऐसे हालात पैदा किए हैं जहाँ पड़ोसी अब विरोधी बन गए हैं.
अंत में, सुशांत सिंह चेतावनी देते हैं कि वह रूमानी विचार अब ख़त्म हो चुका है कि क्रिकेट राजनीति से ऊपर है. खेल का राजनीतिकरण अब उन वाणिज्यिक और कानूनी तंत्रों को ट्रिगर कर रहा है जो इसे बर्बाद कर देंगे. क्रिकेट आर्थिक, नैतिक और सांस्कृतिक रूप से दिवालियापन की ओर बढ़ रहा है. सवाल बस यह है कि क्या कोई इस जहर को पहचानने का साहस रखता है.
अपील :
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