04/04/2026: भाषा पर राजनीति | एलपीजी संकट, उल्टा पलायन | पागल राजा | कोर्ट में AI पर रोक | ट्रंप के 48 घंटे | ईरान की 'ना' | पानी-बीयर | जंग का अंत अनिश्चित | चुनाव विभाजनकारी
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
स्टालिन: क्या हिंदी भाषी राज्यों में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली और मराठी अनिवार्य की जाएगी?
प्रधान के गृह राज्य में ओडिया साइनबोर्ड अनिवार्य: अनुपालन न करने पर ₹20,000 तक का जुर्माना
हर चुनाव चक्र भारत को एकजुट करने के बजाय और अधिक विभाजित बना रहा है
एलपीजी संकट से बढ़ा ‘उल्टा पलायन’: यूपी और बिहार में अपने गांव लौट रहे मजदूर और छात्र
एक तरफ पलायन और दूसरी तरफ चुनाव: असम में बिहू और दुर्गा पूजा पर मुफ्त सिलेंडर देने की घोषणा
“पागल राजा और जंगल का कानून”
परमाणु ऊर्जा संचालित पनडुब्बी आईएनएस अरिधमन ने भारतीय नौसेना की शक्ति बढ़ाई
बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी: ‘पति-पत्नी के झगड़े से नहीं बनता आत्महत्या का मामला’
ईरान की जंग का असर: भारत में पानी और बीयर महंगे होने के आसार
गुजरात हाई कोर्ट: जजों और कोर्ट स्टाफ के एआई इस्तेमाल पर रोक
ईरान ने ठुकराई युद्धविराम की पहल
हरकारा डीप डाइव: जेंडर कौन तय करेगा, आप या सरकार?
जंग का 36वां दिन: ट्रंप के बदलते बयान, बढ़ता खर्च और बिगड़ते हालात पर चर्चा
ट्रंप की ईरान को 48 घंटे की मोहलत: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य न खुलने पर ‘नर्क’ बरपाने की धमकी
ईरान में अमेरिकी लड़ाकू विमान गिराया गया, लापता पायलट की तलाश जारी
ईरान युद्ध का 36वां दिन: तेहरान ने दो अमेरिकी युद्धक विमान गिराने की ज़िम्मेदारी ली
विमानों के गिरने से ट्रंप और हेगसेथ के हवाई अजेयता के दावों की पोल खुली
ट्रंप ने ईरान युद्ध जल्दी ख़त्म करने का वादा किया, पर अंत का रास्ता साफ़ नहीं
एलपीजी संकट से बढ़ा ‘उल्टा पलायन’: यूपी और बिहार में अपने गांव लौट रहे मजदूर और छात्र
‘द टेलीग्राफ’ में पीयूष श्रीवास्तव की रिपोर्ट बताती है कि एलपीजी (रसोई गैस) के संकट के कारण हर दिन सैकड़ों प्रवासी मजदूर और बड़ी संख्या में बाहरी छात्र राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) छोड़कर उत्तरप्रदेश और बिहार स्थित अपने घरों की ओर लौट रहे हैं.
नोएडा के सेक्टर 49 स्थित ‘लेबर चौक’ पर ऐसे दृश्य देखने को मिले जो कोविड लॉकडाउन की याद दिलाते थे, हालांकि इस पलायन का पैमाना और चुनौतियाँ उतनी बड़ी नहीं थीं. पूर्वी उत्तरप्रदेश और बिहार के सैकड़ों दिहाड़ी मजदूर वहां जमा हुए और फिर बड़े समूहों में निकटतम रेलवे स्टेशनों की ओर निकल पड़े.
नोएडा की एक रियल एस्टेट कंपनी में मजदूर के तौर पर काम करने वाले मिर्जापुर के निवासी राम अवध मौर्य ने बताया, “अकेले बलिया, सोनभद्र, मिर्जापुर और वाराणसी के 200 से अधिक प्रवासी मजदूर यहाँ काम करते हैं. आज, हम सबने मिलकर घर लौटने का फैसला किया है क्योंकि हम एलपीजी का खर्च नहीं उठा सकते, जो यहाँ खाना पकाने का एकमात्र ईंधन है. कुछ विक्रेता इसे ₹300 प्रति किलोग्राम की दर से बेच रहे हैं, और यह दो दिन में ही खत्म हो जाता है.” उन्होंने सवाल किया: “बताइए, जो व्यक्ति दिन में ₹600 कमाता है, वह यहाँ कैसे गुजारा कर सकता है? इसलिए हमने तय किया कि जब तक यह संकट बना रहेगा, हम यहाँ से दूर ही रहेंगे.”
बिहार के गया के निवासी और नोएडा में एक बिजली के सामान बनाने वाली कंपनी में काम करने वाले अमर कुमार यादव ने कहा: “हमारे गाँव में, हम लकड़ी और उपलों (गोबर के कंडे) का उपयोग कर सकते हैं.”
कई प्रवासी, विशेष रूप से दिहाड़ी मजदूर, अपना पता बदलते रहते हैं और इसलिए उनके पास आधिकारिक एलपीजी कनेक्शन नहीं हैं. राजधानी में 14.2 किलोग्राम के घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमत ₹900 से कुछ अधिक है, जो उन कालाबाजारी कीमतों से बहुत कम है जो इन श्रमिकों को मजबूरी में चुकानी पड़ रही हैं.
यादव ने बताया, “हम छोटे एलपीजी सिलेंडरों का उपयोग करते हैं. स्थानीय विक्रेता उन्हें ₹250 से ₹700 प्रति किलोग्राम के बीच किसी भी कीमत पर रिफिल कर रहे हैं. हमारा मकान मालिक हमें कमरों के अंदर लकड़ी जलाने की अनुमति नहीं देता.”
दिल्ली विश्वविद्यालय के एक स्नातक छात्र, जो गुरुवार को उत्तरप्रदेश के गोंडा स्थित अपने घर लौटे, उन्होंने पत्रकारों को बताया कि कई अन्य छात्रों ने भी शहर छोड़ दिया है क्योंकि वे अब अपने किराए के कमरों में खाना पकाने का खर्च वहन नहीं कर सकते थे.
अपना नाम न छापने की शर्त पर छात्र ने कहा, “कक्षाओं में जाना बहुत कठिन हो गया था क्योंकि हमें पूरा दिन एलपीजी की तलाश में बिताने के लिए मजबूर होना पड़ता था. कुछ छात्र ₹500 प्रति किलोग्राम की दर से सिलेंडर खरीद रहे हैं.”
“एक बार, हमने ₹1,000 में 2 किलो एलपीजी खरीदी और एक दिन बाद पता चला कि विक्रेता ने हमें धोखा दिया है. उस सिलेंडर में मुश्किल से ही गैस थी.” उन्होंने बताया कि कई छात्र कमरे साझा (शेयर) करके रहते हैं, और उन्हें यह पता नहीं होता कि मकान मालिक उन्हें कब तक वहाँ रहने देगा, इसलिए वे कनेक्शन के लिए आवेदन नहीं करते हैं.
बिहार के रोहतास के रहने वाले एक मजदूर रुपेश कुमार ने बताया कि नया कनेक्शन लेने में भी कई दिक्कतें हैं. उन्होंने कहा, “यदि आप नया कनेक्शन लेते हैं, तो एजेंसियां आपको उन्हीं से चूल्हा खरीदने के लिए मजबूर करती हैं. इसके अलावा, हमारी नौकरी अस्थिर है और हम नहीं जानते कि काम की तलाश में हमें कब नोएडा से गुड़गांव या रोहतक जाना पड़ जाए. इसलिए, हम कोई स्थायी कनेक्शन नहीं चाहते. बिहार का एक परिवार जो नोएडा में मेरे घर के पास रहता है, उनके पास एलपीजी कनेक्शन है लेकिन बुकिंग के 15 दिन बाद भी वे इसे रिफिल नहीं करा पाए. आधिकारिक तौर पर, बुकिंग के लगभग 10 दिनों के भीतर सिलेंडर रिफिल हो जाने की उम्मीद की जाती है. शहरी क्षेत्रों में दो लगातार बुकिंग के बीच कम से कम 25 दिनों का अंतर होना अनिवार्य है.
असम में चूंकि चुनाव है; भाजपा सरकार की बिहू और दुर्गा पूजा पर मुफ्त सिलेंडर देने की घोषणा
एक तरफ एनसीआर में एलपीजी संकट के कारण एनसीआर में “उल्टा पलायन” हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ असम में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बिहू और दुर्गा पूजा के दौरान मुफ्त एलपीजी सिलेंडर देने की घोषणा की है. मनोज आनंद के मुताबिक, महमोरा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “हमने निर्णय लिया है कि बिहू और दुर्गा पूजा के दौरान प्रत्येक पात्र परिवार को एक सिलेंडर मुफ्त मिलेगा. लोगों को इन दो सिलेंडरों का खर्च नहीं उठाना पड़ेगा.”
दिलचस्प यह है कि कांग्रेस नेता गौरव गोगोई, असम जातीय परिषद के नेता लुरिनज्योति गोगोई और रायजोर दल के नेता अखिल गोगोई ने सत्तारूढ़ भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाया है और एलपीजी वितरण में अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं. शिकायतों के बाद तेल विपणन कंपनियों ने 2,000 से अधिक निरीक्षण किए और 18 वितरकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है. ग्राहकों की शिकायतों और सोशल मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से इन अनियमितताओं की पहचान की गई थी. आपूर्ति की समस्याओं ने खाद्य सेवा क्षेत्र के कुछ हिस्सों को प्रभावित किया है, जिससे कुछ भोजनालयों को अपना परिचालन कम करना पड़ा है या बिजली, डीजल इकाइयों और लकड़ी जैसे वैकल्पिक ईंधन स्रोतों पर निर्भर होना पड़ा है. जाहिर है, आम लोगों को संकट का सामना करना पड़ रहा है और मौका देखकर असम के दो त्योहारों पर मुफ़्त सिलेंडर की घोषणा कर दी गई है. कुलमिलाकर, व्यवस्था को सुधारने के बजाय चुनाव में लाभ लेने के लिए “मुफ़्त की रेवड़ी” बांटी जा रही है.
“पागल राजा और जंगल का कानून”
पत्रकार एम. के. वेणु ने भी लिखा है कि पश्चिम एशिया के युद्ध के कारण एलपीजी (रसोई गैस) की भारी किल्लत हो गई है. इसके परिणामस्वरूप भारत में ‘रिवर्स माइग्रेशन’ (उल्टा पलायन) हो रहा है, जहाँ मजदूर और छात्र शहरों को छोड़कर गाँवों की ओर लौट रहे हैं क्योंकि वे गैस का खर्च नहीं उठा सकते.
वेणु इसे “फायरवुड इकोनॉमी” (जलाऊ लकड़ी आधारित अर्थव्यवस्था) की ओर वापसी कहते हैं, जहाँ लोग आधुनिक ईंधन छोड़कर फिर से लकड़ी और उपलों पर निर्भर हो रहे हैं. वह अंतरराष्ट्रीय युद्धों (ईरान, गाजा, लेबनान आदि) को भारत की घरेलू समस्याओं से जोड़ते हुए कूटनीतिक तौर पर भारत की “व्यावहारिक चुप्पी” की आलोचना करते हैं और सवाल उठाते हैं कि क्या भारत की विदेश नीति वास्तव में देश के आम नागरिकों के हितों की रक्षा कर पा रही है. उनके अनुसार, जिस ‘जंगल के कानून’ को भारत ने स्वीकार किया था, वही अब भारत को दशकों पीछे धकेलने की धमकी दे रहा है.
उनका यह लेख बताता है कि भू-राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और युद्धों का सीधा असर भारत के गरीब और मध्यम वर्ग की रसोई तक पहुँच रहा है. और, यह दिखाता है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता भारत के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचा रही है. सरकार के इस दावे को चुनौती भी दी गई है कि देश में सब कुछ नियंत्रण में है.
स्टालिन: क्या हिंदी भाषी राज्यों में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली और मराठी अनिवार्य की जाएगी?
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने शनिवार को सीबीएसई द्वारा हाल ही में पेश किए गए पाठ्यक्रम ढांचे को लेकर भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने आरोप लगाया कि “तथाकथित त्रि-भाषा सूत्र” वास्तव में गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी का विस्तार करने का एक “प्रच्छन्न” (गुप्त) तंत्र है.
स्टालिन ने कहा, “इसमें पारस्परिकता (बदले में वैसा ही व्यवहार) कहाँ है? क्या हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों के लिए तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम—या यहाँ तक कि बंगाली और मराठी जैसी भाषाएँ सीखना अनिवार्य किया जाएगा?”
‘पीटीआई’ के मुताबिक स्टालिन ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप सीबीएसई का यह पाठ्यक्रम ढांचा “कोई निर्दोष शैक्षणिक सुधार नहीं” है. स्टालिन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “यह भाषा थोपने का एक सुनियोजित और अत्यंत चिंताजनक प्रयास है, जो हमारी पुरानी आशंकाओं को सच साबित करता है.
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि “भारतीय भाषाओं” को बढ़ावा देने की आड़ में, एनडीए सरकार आक्रामक रूप से एक केंद्रीयकरण के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है, जो भारत की भाषाई विविधता का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन करते हुए हिंदी को विशेषाधिकार देता है. उनके अनुसार, यह ढांचा प्रभावी रूप से दक्षिणी राज्यों के छात्रों के लिए “अनिवार्य हिंदी शिक्षा” में बदल जाता है.
प्रधान का जवाब, स्टालिन एक लचीली नीति को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं
इसके जवाब में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020, वास्तव में भाषाई मुक्ति का एक घोषणापत्र है. यह मातृभाषा को प्राथमिकता देती है ताकि प्रत्येक तमिल बच्चा अपनी शानदार भाषा में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सके. लेकिन स्टालिन एक लचीली नीति को अनिवार्य हिंदी के रूप में गलत तरीके से पेश करके तमिल की रक्षा नहीं कर रहे हैं; बल्कि ऐसी बाधाएं पैदा कर रहे हैं जो हमारे युवाओं को बहुभाषी वैश्विक नेता बनने के अवसर से वंचित करती हैं. उन्होंने भाषा “थोपने” के विमर्श को राजनीतिक विफलताओं को छिपाने की एक “थकी हुई कोशिश” करार दिया.
उधर, प्रधान के गृह राज्य में ओडिया साइनबोर्ड अनिवार्य: अनुपालन न करने पर ₹20,000 तक का जुर्माना
मजेदार यह है कि भाषा को लेकर राजनीति सब कर रहे हैं. ओडिशा, जो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का गृह राज्य है और जहां उनकी पार्टी भाजपा की सरकार है, वहाँ सरकार ने शनिवार को यह सुनिश्चित करने के लिए कड़े प्रवर्तन उपायों की घोषणा की कि सभी दुकानें और वाणिज्यिक प्रतिष्ठान अपने साइनबोर्ड प्रमुखता से ओडिया भाषा में प्रदर्शित करें. नियमों का उल्लंघन करने पर ₹20,000 तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है. अक्षय कुमार साहू के अनुसार, राज्य के श्रम और कर्मचारी राज्य बीमा विभाग द्वारा जारी इस निर्देश में कहा गया है कि ‘ओडिशा दुकान और वाणिज्यिक प्रतिष्ठान अधिनियम’ के प्रावधानों के तहत सभी प्रतिष्ठानों के नाम पट्ट (बोर्ड) स्पष्ट और सही ढंग से ओडिया में लिखे होने चाहिए.
श्रम आयुक्त इंद्रमणि त्रिपाठी ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों पर ओडिया भाषा के उपयोग को बढ़ावा देना और इसके सांस्कृतिक व प्रशासनिक महत्व को मजबूत करना है. कुलमिलाकर, प्रधान भले ही तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन की आलोचना कर रहे हों, लेकिन उनके गृह प्रदेश में उनकी अपनी पार्टी की सरकार भी अपनी भाषा को लेकर वही कर रही है, जो तमिलनाडु में स्टालिन कर रहे हैं.
परमाणु ऊर्जा संचालित पनडुब्बी आईएनएस अरिधमन ने भारतीय नौसेना की शक्ति बढ़ाई
भारत ने अपनी तीसरी स्वदेशी निर्मित परमाणु ऊर्जा संचालित पनडुब्बी, आईएनएस अरिधमन को सेवा में शामिल कर लिया है. इमरान अहमद सिद्दीकी के अनुसार, यह पनडुब्बी परमाणु क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइलें दागने में सक्षम है और इससे समुद्र आधारित परमाणु प्रतिरोध के और मजबूत होने की उम्मीद है.
इससे पहले दिन में, नौसेना ने विशाखापत्तनम में एक अलग समारोह में उन्नत स्टील्थ फ्रिगेट, आईएनएस तारागिरी को भी कमीशन किया. नौसेना के एक अधिकारी ने कहा कि अरिधमन के शामिल होने से भारत “निरंतर समुद्री प्रतिरोध” बनाए रख सकेगा, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति के बीच कम से कम एक परमाणु-सशस्त्र पनडुब्बी हर समय गश्त पर रहे.
जानकारी के अनुसार, अरिधमन को अपने पूर्ववर्ती आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात (जो क्रमशः 2016 और 2024 में कमीशन हुए थे) की तुलना में अधिक लंबी दूरी की परमाणु मिसाइलें ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है.
भारत उन चुनिंदा देशों के समूह (जिसमें अमेरिका, रूस, चीन और फ्रांस शामिल हैं) में से एक है जिनके पास ‘न्यूक्लियर ट्रायड’ (परमाणु त्रय) की क्षमता है. इसका अर्थ है कि भारत हवा, जमीन और समुद्र, तीनों जगहों से परमाणु मिसाइलें दागने में सक्षम है.
बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी: ‘पति-पत्नी के झगड़े से नहीं बनता आत्महत्या का मामला’
‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ की रिपोर्ट के अनुसार, बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के बीच केवल वैवाहिक विवाद होने भर से किसी एक को दूसरे की आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोपी नहीं बनाया जा सकता. यह कहते हुए नागपुर बेंच ने 49 वर्षीय महिला के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द कर दिया, जिस पर अपने पति को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप था.
न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी फाल्के की एकल पीठ ने कहा कि “इस मामले में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर दुर्व्यवहार और प्रताड़ना के आरोप लगाए थे. ऐसे में इसे अधिकतम मानसिक तनाव का कारण माना जा सकता है, लेकिन इसे आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.” अदालत ने कहा कि पुरुष द्वारा छोड़े गए सुसाइड नोट में कहीं भी यह प्रतिबिंबित नहीं होता कि उसने महिला के उकसावे के कारण आत्महत्या की हैं. बल्कि इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उसकी मृत्यु के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाए.
दंपति की शादी दिसंबर 1996 में हुई थी. पुरुष और उसके माता-पिता ने आरोप लगाया कि महिला उन्हें गालियां देती थी और पुरुष के साथ मारपीट भी करती थी. वह आत्महत्या करने और उन्हें झूठे मामलों में फंसाने की धमकी भी देती थी. ससुराल वालों ने यह भी आरोप लगाया कि उसका किसी अन्य पुरुष के साथ अवैध संबंध था और वह बिना बताए कई दिनों तक वैवाहिक घर छोड़कर चली जाती थी. नवंबर 2019 में, दबाव में आकर पुरुष ने आत्महत्या कर ली, जिसके बाद उसके माता-पिता ने महिला के खिलाफ उकसाने का मामला दर्ज कराया.
गुजरात हाई कोर्ट: जजों और कोर्ट स्टाफ के एआई इस्तेमाल पर रोक
‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट है. न्याय व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते दखल के बीच गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला लिया है. कोर्ट ने जजों, कोर्ट स्टाफ और न्यायिक सहायकों द्वारा एआई टूल्स के इस्तेमाल पर सख्त सीमाएं तय कर दी हैं. खासतौर पर फैसले लिखने और न्यायिक प्रक्रिया में. यह नीति गुजरात हाई कोर्ट और जिला न्यायपालिका से जुड़े सभी न्यायिक अधिकारियों, कोर्ट स्टाफ, विधिक सहायकों, इंटर्न और पैरालीगल वॉलंटियर्स पर लागू होती है.
नई नीति में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस “कभी भी किसी भी प्रकार के निर्णय लेने, न्यायिक तर्क, आदेश लिखने, फैसले तैयार करने, जमानत/सजा पर विचार या किसी भी मूल न्यायिक निर्णय प्रक्रिया में उपयोग नहीं किया जाएगा. यह नीति संविधान के अनुच्छेद 225 और 227 के तहत बनाई गई है और अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर आधारित है. नीति के किसी भी प्रावधान के उल्लंघन को कदाचार माना जाएगा और इसके तहत विभागीय या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है.
सीमित क्षेत्रों में एआई उपयोग की अनुमति
एआई को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है. कानूनी शोध, फैसलों की खोज या विश्लेषण निकालने, मिसाल पहचानने, विधिक व्याख्या आदि के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह पूरी तरह मानवीय विवेक के अधीन होगा और उपयोगकर्ता द्वारा सत्यापित किया जाना आवश्यक है. ऐसे शोध को मान्य स्रोतों से मिलान कर पुष्टि करना जरूरी होगा. साथ ही प्रशासनिक कार्य जैसे आईटी विभाग के कार्यों का ऑटोमेशन, प्रशिक्षण के लिए टेम्पलेट बनाना, सर्कुलर/नोटिस का ड्राफ्ट तैयार करना, ड्राफ्टिंग में भाषा, संरचना और स्पष्टता सुधारने के लिए एआई का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन कानूनी विश्लेषण और तर्क पूरी तरह जज का ही रहेगा.
ईरान ने ठुकराई युद्धविराम की पहल; अपने अधिकारियों को इस्लामाबाद भेजने से किया इनकार
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध के बीच शांति की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है. ईरान ने पाकिस्तान की ओर से अमेरिका और इज़राइल के साथ युद्धविराम करने की पहल को ठुकरा दिया है और बातचीत के लिए इस्लामाबाद अपने अधिकारियों को भेजने से इनकार कर दिया है. ईरान ने कहा है कि उसे अमेरिका की कोई भी शर्तें स्वीकार्य नहीं है. इसलिए अब यह बातचीत आगे नहीं बढ़ सकती है.
इस बीच तुर्की और मिस्र जैसे मध्यस्थ देश शांति वार्ता के लिए नए स्थान तलाश कर रहे हैं, जिनमे क़तर और इस्तांबुल एक ख़ास विकल्प के रूप में सामने आए हैं. एक्सिऑस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, प्रस्तावित शांति योजना में यह बात शामिल थी कि ईरान को होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण ढीला करना होगा, तब युद्धविराम हो सकता है. ट्रंप ने भी सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान से इस मुद्दे पर बातचीत की है.
हालाँकि पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के राजनयिकों के साथ बैठक की, लेकिन ईरान इसमें शामिल नहीं हुआ. ईरान का कहना है कि वह फिलहाल सिर्फ अमेरिका- इज़राइल के हमलों की ख़िलाफ़ अपनी रक्षा पर ध्यान दे रहा है. वहीं ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया है कि ईरान युद्धविराम चाहता है, लेकिन यह तभी मुमकिन है जब ईरान स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को पूरी तरह खोल दे, जिसे ईरान के विदेश मंत्रायल ने झूठा और निराधार बताया.
जंग का 36वां दिन: ट्रंप के बदलते बयान, बढ़ता खर्च और बिगड़ते हालात
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के 36वें दिन के हालात पर विस्तार से चर्चा की. जिस युद्ध की जल्दी खत्म होने की उम्मीद थी, वह अब लंबा खिंचता जा रहा है और हालात लगातार जटिल होते जा रहे हैं.
कार्यक्रम में बताया गया कि हाल के दिनों में ईरान ने अमेरिकी हमलों का जवाब देते हुए दो अमेरिकी जेट गिराने का दावा किया, जिसमें कुछ क्रू मेंबर्स को बचा लिया गया जबकि एक लापता बताया जा रहा है. वहीं, ईरान में अब तक 2000 से अधिक लोगों की मौत और हजारों के घायल होने की खबर है. इसके अलावा खाड़ी देशों, कुवैत, बहरीन और अबू धाबी तक इस युद्ध का असर फैलता दिख रहा है, जहां ड्रोन हमलों और ऊर्जा ढांचे पर खतरे की बात सामने आई.
शो में खास तौर पर डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और उनके रुख पर चर्चा की गई. उन्होंने बताया कि ट्रंप लगातार अपने बयान बदलते रहे हैं, कभी ईरान को “पाषाण युग” में पहुंचाने की बात, तो कभी युद्ध खत्म करने का संकेत देते हैं. साथ ही, युद्ध के बीच अपने ही सैन्य अधिकारियों को हटाने और नए बड़े रक्षा बजट (लगभग 1.5 ट्रिलियन डॉलर) की मांग जैसे फैसलों का भी जिक्र किया गया.
इसमें यह भी बताया गया कि इस युद्ध की कीमत लगातार बढ़ रही है. अनुमान के अनुसार, अमेरिका इस युद्ध पर रोज़ाना भारी खर्च कर रहा है, जो अरबों डॉलर तक पहुंच चुका है. इसके बावजूद न तो कोई निर्णायक जीत मिल रही है और न ही युद्ध खत्म होने के संकेत दिख रहे हैं. तेल की कीमतों, वैश्विक बाजार और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर इसका असर साफ दिखने लगा है.
चर्चा में यह निष्कर्ष सामने आया कि यह युद्ध सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इससे वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय साख पर भी असर पड़ रहा है.
ट्रंप की ईरान को 48 घंटे की मोहलत: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य न खुलने पर ‘नर्क’ बरपाने की धमकी
अक्सिओस के रिपोर्टर बराक राविद की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने शनिवार को चेतावनी दी है कि अगर ईरान 48 घंटों के भीतर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने पर सहमत नहीं होता है, तो वहां “नर्क बरपेगा”. ट्रंप की 10 दिनों की समय सीमा सोमवार को समाप्त हो रही है. उन्होंने पहले ही धमकी दी थी कि समझौता न होने पर वह ईरान के ऊर्जा, पानी और तेल के बुनियादी ढांचे पर बमबारी करेंगे. तेहरान ने ट्रंप पर युद्ध अपराध की योजना बनाने का आरोप लगाया है. पिछले 10 दिनों से अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की के माध्यम से अप्रत्यक्ष बातचीत चल रही है, लेकिन अब तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है. ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “याद रखें जब मैंने ईरान को समझौता करने या हॉर्मुज़ खोलने के लिए 10 दिन दिए थे. समय समाप्त हो रहा है - 48 घंटे पहले कि उन पर क़यामत टूटे.” सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी ट्रंप से बात करने के बाद कहा कि वे भारी सैन्य बल के इस्तेमाल के लिए पूरी तरह तैयार हैं. पर्दे के पीछे, उपराष्ट्रपति वेंस और ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर ग़ालिबाफ़ पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की मध्यस्थता में संपर्क में हैं. ईरान ने अब तक अस्थायी युद्धविराम के किसी भी प्रस्ताव को खारिज कर दिया है और युद्ध के स्थायी अंत की गारंटी मांगी है.
अमेरिकी सेना को अब तक नहीं मिला लड़ाकू विमान का लापता पायलट; तलाश जारी
सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेना उस पायलट को खोजने के लिए संघर्ष कर रही है जो ईरान के ऊपर मार गिराए गए एक लड़ाकू विमान से बाहर निकला था. व्हाइट हाउस ने एफ-15ई लड़ाकू विमान के गिरने पर चुप्पी साधी हुई है. अधिकारियों के अनुसार, चालक दल के एक सदस्य को बचा लिया गया है, लेकिन दूसरे का अब तक पता नहीं चला है. ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पायलट के बारे में सीधे कुछ नहीं कहा, बल्कि अपनी 48 घंटे की समय सीमा को दोहराया. इज़राइली सेना भी इस तलाश में खुफिया जानकारी साझा कर रही है और उस इलाके में हमले रोक दिए गए हैं जहां पायलट के होने की संभावना है. यह घटना दिखाती है कि हफ्तों के हमलों के बावजूद ईरान के पास पलटवार करने की क्षमता बची है. इसी बीच, एक अमेरिकी ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर पर भी ज़मीनी गोलीबारी हुई और एक दूसरा अमेरिकी विमान ए-10 हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया, हालांकि उसके पायलट को बचा लिया गया है.
तेहरान ने दो अमेरिकी युद्धक विमान गिराने की ज़िम्मेदारी ली, अमेरिका पर ‘पाखंड’ का आरोप
अल जज़ीरा रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने दो अमेरिकी युद्धक विमानों को गिराने की ज़िम्मेदारी ली है. तेहरान में लोगों ने इस सैन्य सफलता का जश्न मनाया. ईरानी अधिकारियों का कहना है कि यह घटना दिखाती है कि उनके पास अभी भी अमेरिकी और इज़राइली ताक़तों का मुक़ाबला करने की क्षमता है. ईरान के अनुसार, एक “नई उन्नत रक्षा प्रणाली” ने इन विमानों को निशाना बनाया है. युद्ध शुरू होने से अब तक ईरान में कम से कम 2076 लोग मारे गए हैं और 26500 घायल हुए हैं. ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने अमेरिका पर पाखंड का आरोप लगाया है और दुनिया से हस्तक्षेप की अपील की है. खाड़ी देशों में भी ईरानी हमलों से नुक़सान हुआ है, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात में एक नागरिक की मौत हुई है. ऑस्ट्रेलिया में पेट्रोल की भारी कमी हो गई है और दुनिया भर में खाद्य सामग्री के दाम बढ़ गए हैं. इज़राइल में भी युद्ध की आर्थिक लागत 112 अरब डॉलर तक पहुंच गई है.
विमानों के गिरने से अमेरिका के दावों की पोल खुली, कहा था- ईरान का हवाई क्षेत्र हमारे नियंत्रण में
अमेरिकी जेट का गिराया जाना ट्रंप प्रशासन के उन दावों के लिए एक बड़ा झटका है, जिसमें उन्होंने ईरानी आसमान पर पूर्ण नियंत्रण की बात कही थी. रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने लगभग एक महीने पहले कहा था कि ईरान का हवाई क्षेत्र अब पूरी तरह उनके नियंत्रण में है और ईरान कुछ नहीं कर पाएगा. ट्रंप ने भी पिछले हफ्तों में कई बार कहा था कि ईरान के रडार और मिसाइल सिस्टम 100% नष्ट हो चुके हैं. लेकिन इन विमानों के गिरने से यह स्पष्ट हो गया है कि प्रशासन ने अपनी सैन्य सफलता को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था. यह स्थिति ट्रंप के लिए राजनीतिक मुश्किलें खड़ी कर सकती है, क्योंकि अमेरिकी जनता पहले से ही इस युद्ध और बढ़ती तेल की कीमतों से परेशान है.
ट्रंप ने ईरान युद्ध जल्दी ख़त्म करने का वादा किया, पर अंत का रास्ता साफ़ नहीं
न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर ग्रेग जाफ़े की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के पांचवें हफ़्ते में भी यह साफ़ नहीं है कि यह संघर्ष कैसे समाप्त होगा. ट्रंप और हेगसेथ ने दावा किया था कि यह युद्ध पुराना ढर्रा नहीं अपनाएगा और अमेरिकी योद्धाओं को पूरी छूट दी जाएगी. ट्रंप की रणनीति में लक्ष्यों को अस्पष्ट रखा गया है ताकि वे कभी भी अपनी सुविधा के अनुसार जीत का दावा कर सकें. हालांकि, हक़ीक़त यह है कि 12000 ठिकानों पर हमलों के बावजूद ईरानी शासन झुकने को तैयार नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी शासन को अस्तित्व की लड़ाई के लिए मजबूर करने से वह और भी आक्रामक हो जाता है. ट्रंप अब ईरान के बिजली संयंत्रों को तबाह कर उन्हें “पाषाण युग” में भेजने की धमकी दे रहे हैं. ‘पॉवेल डॉक्ट्रिन’ की विफलता के बाद अब यह युद्ध एक अनिश्चित मोड़ पर है जहां बातचीत के रास्ते कम और हमले के रास्ते ज़्यादा नज़र आ रहे हैं.
ईरान जंग का असर: भारत में पानी और बीयर महंगे होने के आसार
‘बीबीसी हिंदी’ की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब भारत की रोज़मर्रा की चीज़ों की कीमतों पर असर डालने लगा है. खासतौर पर बोतलबंद पानी और बीयर पर. भारत में बढ़ते गर्मी के कारण कई हिस्सों में तापमान 45°C तक पहुंचने की आशंका है. ऐसे समय में पानी की मांग बढ़ती है, लेकिन इसी बीच कच्चे माल की कीमतों में उछाल ने बोतलबंद पानी उद्योग पर दबाव बढ़ा दिया है. इसकी सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है.
दुनिया की लगभग 20% तेल और गैस सप्लाई होरमुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है. अमेरिका, इज़राइल और ईरान के संघर्ष के कारण यहां शिपिंग प्रभावित हुई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं. भारत, जो अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इस असर को सीधे महसूस कर रहा है.कच्चे तेल से बनने वाला पीईटी प्लास्टिक बोतलों का मुख्य कच्चा माल है. इसकी कीमत 115 रुपये प्रति किलो से बढ़कर करीब 180 रुपये प्रति किलो हो गई है. इससे बोतल बनाने की लागत बढ़ गई है.
इसका असर भी बाजार में दिखने लगा है. बिसलेरी ने हाल ही में अपने दाम बढ़ाए हैं, जबकि बेली और क्लियर प्रीमियम वाटर जैसे ब्रांड्स ने भी कीमतें बढ़ानी शुरू कर दी हैं. हालांकि कई कंपनियां अभी अतिरिक्त लागत खुद वहन कर रही हैं, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना मुश्किल है. महाराष्ट्र में करीब 20% बोतल निर्माण इकाइयों ने उत्पादन अस्थायी रूप से बंद कर दिया है, जिससे सप्लाई पर भी असर पड़ा है.
बीयर इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है. ब्रूअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, ग्लास बोतलों की कीमतें करीब 20% तक बढ़ गई हैं. हेनेकेन और कार्ल्सबर्ग जैसी कंपनियां अब राज्यों से 12–15% तक कीमत बढ़ाने की मांग कर रही हैं.
हरकारा डीप डाइव
जेंडर कौन तय करेगा, आप या सरकार?
हरकारा डीप डाइव में फिल्ममेकर और परफॉर्मेंस आर्टिस्ट अवतारी देवी ने हालिया पारित हुए बिल ट्रांसजेंडर बिल 2026 पर विस्तार से बातचीत की. इस चर्चा में बिल के प्रावधानों और इसके सामाजिक प्रभावों को समझने की कोशिश की गई.
अवतारी देवी ने इस कानून के सबसे विवादित पहलू सेल्फ आईडेन्टिफिकेशन के अधिकार पर रौशनी डाली. उनके अनुसार, नए कानून में अब किसी व्यक्ति की जेंडर पहचान को खुद तय करने के बजाय मेडिकल प्रक्रिया और सरकारी प्रमाण से जोड़ा गया है. उन्होंने कहा कि जेंडर एक व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक पहचान है, जिसे कोई बाहरी संस्था तय नहीं कर सकती. चर्चा में यह भी सामने आया कि नए प्रावधानों के तहत ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड, सर्जरी और जिला प्रशासन की मंजूरी जैसी प्रक्रियाएं जरूरी हो सकती हैं. इसके बाद ही व्यक्ति को आधिकारिक सर्टिफिकेट मिलेगा, जिससे वह अपने अधिकारों का दावा कर सकेगा. इस प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठाए गए.
उन्होंने यह भी कहा कि यह मुद्दा सिर्फ ट्रांसजेंडर समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर व्यक्ति की पहचान और स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल है. उन्होंने जेंडर को एक “स्पेक्ट्रम” बताया, जिसमें केवल पुरुष और महिला ही नहीं, बल्कि कई अन्य पहचानें भी शामिल होती हैं.
इस कानून को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन और बहस जारी है. कई सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि बिना पर्याप्त चर्चा और समुदाय से संवाद के यह कानून लाया गया है, जिससे अधिकारों पर असर पड़ सकता है.
हर चुनाव चक्र भारत को एकजुट करने के बजाय और अधिक विभाजित बना रहा है
‘द वायर’ में पामेला फिलिपोज़ का यह लेख भारत में चुनावी राजनीति के कारण बढ़ते सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर गहरी चिंता व्यक्त करता है. उनका मानना है कि भारत में विधानसभा चुनावों का प्रत्येक चक्र देश को एकजुट करने के बजाय और अधिक विभाजित कर रहा है. उदाहरण के तौर पर, चार राज्यों (पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम) और एक केंद्र शासित प्रदेश (पुडुचेरी) के चुनावों का जिक्र किया गया है, जहाँ चुनावी अभियान के दौरान समाज में कटुता बढ़ती देखी गई.
पामेला लिखती हैं कि हम एक ऐसी प्रक्रिया की दहलीज पर खड़े हैं, जिसमें मई की शुरुआत तक 17.4 करोड़ लोगों द्वारा चुने गए 824 विधायक सत्ता में आएंगे. वास्तव में, यह हमारी राज्य चुनाव प्रणाली का सबसे बड़ा विधानसभा चुनाव चक्र है, जिसमें चार राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं. यदि आप भारतीय राज्यों के संघ को एक विशाल ‘जिग्सॉ पहेली’ के रूप में देखते हैं, तो यह क्षेत्र—प्रायद्वीपीय भारत का पूर्वी हिस्सा—अपने आप में देश की अनिवार्य एकता को परिभाषित करने वाला माना जा सकता है. फिर भी, इन राज्यों में होने वाला प्रत्येक चुनाव देश को और अधिक खंडित और कटु बना रहा है.
केरल, जिसने शायद किसी भी अन्य राज्य की तुलना में अपने तीन मुख्य धर्मों—हिंदू, मुस्लिम और ईसाई (जो 2011 की जनगणना के अनुसार क्रमशः 54.73%, 26.56% और 18.38% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं)—के अनुयायियों के बीच सदियों से सद्भाव के साथ रहने की क्षमता प्रदर्शित की है, वहाँ अब गुरुवायूर विधानसभा क्षेत्र का एक उम्मीदवार सार्वजनिक रूप से यह तर्क दे रहा है कि “हिंदुओं की मिट्टी को वापस हासिल किया जाना चाहिए”.
पामेला विशेष रूप से केरल का जिक्र करती हैं, जो अपनी बहु-धार्मिक संस्कृति और सद्भाव के लिए जाना जाता रहा है. लेकिन, उनकी चिंता है कि अब वहाँ भी चुनावी लाभ के लिए सांप्रदायिक बयानों का सहारा लिया जा रहा है, जो सदियों पुराने सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचा रहा है.
वह इस बात की आलोचना भी करती हैं कि कि मुख्यधारा का मीडिया इन विभाजनों को कम करने के बजाय उन्हें और हवा देता है. चुनावी बहसों में अक्सर गंभीर मुद्दों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य) के बजाय पहचान की राजनीति को प्राथमिकता दी जाती है.
उनका तर्क है कि चुनाव अब केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं रह गए हैं, बल्कि वे समुदायों के बीच नफरत और अविश्वास पैदा करने का जरिया बन गए हैं. चुनावी रैलियों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और रणनीतियाँ देश की “विविधता में एकता” वाली पहचान को कमजोर कर रही हैं.
संक्षेप में पामेला का यह लेख बताता है कि अगर चुनावी जीत के लिए समाज को बाँटने का यह सिलसिला जारी रहा, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया स्वयं देश की एकता के लिए खतरा बन सकती है. नीति-निर्माताओं को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम एक अधिक ध्रुवीकृत भारत की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ चुनावी सफलता सामाजिक सद्भाव से ऊपर हो गई है. अंग्रेजी में पूरा लेख यहां पढ़ा जा सकता है.
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