05/01/2026: अजीब फैसला उमर, शरजील को जमानत नहीं | बलात्कारी रामरहीम को फिर पेरोल | ट्रंप, मोदी और खुशी | विजयवर्गीय का बजता घंटा | चीन का डंका | भारत की फेल होती क्रिकेट डिप्लोमेसी
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दिल्ली दंगा मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज; कोर्ट ने कहा- साजिश में थी अहम भूमिका, वहीं 5 अन्य आरोपियों को मिली राहत.
राम रहीम फिर जेल से बाहर: रेप और हत्या के दोषी डेरा प्रमुख को 15वीं बार मिली पैरोल; 8 साल में 405 दिन जेल से बाहर रह चुका है राम रहीम.
ट्रम्प की धमकी: अमेरिकी राष्ट्रपति का दावा- भारत ने मुझे ‘खुश’ करने के लिए रूसी तेल का आयात घटाया; चेताया- नहीं माने तो बढ़ा देंगे टैक्स.
बांग्लादेश में संकट: हिंदू फैक्ट्री मालिक की गोली मारकर हत्या, विधवा से गैंगरेप; सरकार ने आईपीएल (IPL) के प्रसारण पर लगाया प्रतिबंध.
अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल: अमेरिकी कमांडो ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को किया ‘अगवा’, नार्को-टेररिज्म के आरोप में न्यूयॉर्क कोर्ट में होगी पेशी.
अजीबोगरीब मामला: उज्जैन के एसडीएम सस्पेंड; सरकारी आदेश में मंत्री के ‘घंटा’ वाले बयान को बताया था ‘तानाशाही’.
चीन की बादशाहत: 2026 में दुनिया पर राज करेगा चीन; विश्लेषक आकार पटेल का दावा- अमेरिका पिछड़ रहा है, चीन हर क्षेत्र में आगे.
मणिपुर हिंसा: बिष्णुपुर में आईईडी (IED) ब्लास्ट में दो घायल; मैतेई संगठनों ने बुलाया 24 घंटे का बंद.
अजीब फैसला: 5 को मिली जमानत, पर उमर खालिद और शरजील इमाम की खारिज
5 जनवरी, 2026 को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों की ‘बड़ी साजिश’ मामले में एक अहम फैसला सुनाया, जिसने कानूनी और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने ‘दोषीपन के पदानुक्रम’ का सिद्धांत अपनाते हुए मुख्य आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया. दोनों पिछले पांच साल से अधिक समय से यूएपीए के तहत बिना मुकदमे के जेल में हैं.
अदालत ने जहां खालिद और इमाम को “साजिश में केंद्रीय भूमिका” निभाने वाला बताते हुए राहत देने से इनकार किया, वहीं इसी मामले में पांच अन्य आरोपियों—गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद—को जमानत दे दी. पीठ ने स्पष्ट किया कि सभी आरोपी एक समान स्थिति में नहीं हैं और उनकी भूमिकाओं के आधार पर ही फैसला लिया गया है. इस फैसले ने विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने का मौका दे दिया है, जिसने इसकी तुलना डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को बार-बार मिल रही पैरोल से की है.
क्यों नकारी गई खालिद और शरजील की जमानत: कोर्ट के तर्क
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में उमर खालिद और शरजील इमाम को “प्रमुख आरोपी” करार दिया. पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष की सामग्री प्रथम दृष्टया यह दर्शाती है कि इन दोनों की “कथित आतंकवादी कार्य की परिकल्पना, योजना और समन्वय में केंद्रीय और निर्देशात्मक भूमिका” थी.
अदालत ने जमानत खारिज करने के लिए 10 मुख्य कारण और आधार बताए:
सभी आरोपी दोषीपन के संबंध में समान स्थिति में नहीं हैं.
खालिद और इमाम की भूमिका ‘केंद्रीय और रचनात्मक’ प्रतीत होती है.
कथित साजिश में योजना, लामबंदी और रणनीतिक दिशा देने में इनकी भागीदारी दिखती है.
ये कृत्य समुदाय के जीवन के लिए आवश्यक आपूर्ति को बाधित करने और राष्ट्र की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालने वाले थे.
संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता) महत्वपूर्ण है, लेकिन यह अलगाव में नहीं देखा जा सकता.
सभी को एक समान मानने से मुकदमे से पहले की हिरासत व्यक्तिगत परिस्थितियों से अलग होकर केवल एक दंडात्मक तंत्र बन जाएगी.
अभियोजन की जटिलता और साक्ष्य की प्रकृति इस चरण में जमानत को उचित नहीं ठहराती.
कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस तर्क को भी संज्ञान में लिया, जिसमें कहा गया था कि खालिद और इमाम ने व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पर्चे बांटकर चक्का जाम का आह्वान किया था.
हालांकि, कोर्ट ने एक खिड़की खुली रखी है. आदेश के अनुसार, यदि संरक्षित गवाहों की जांच पूरी नहीं होती है, तो खालिद और इमाम इस आदेश की तारीख से एक वर्ष की अवधि समाप्त होने पर फिर से जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं.
‘दोष का पदानुक्रम’: बाकियों को राहत कैसे?
जस्टिस कुमार और जस्टिस अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि जिन पांच लोगों (गुलफिशा, मीरान, शिफा, सलीम और शादाब) को जमानत मिली है, उनकी भूमिकाएं “सीमित और सहायक” थीं. अदालत ने माना कि खालिद और इमाम की तुलना में ये आरोपी “गुणात्मक रूप से भिन्न स्थिति” में हैं.
गुलफिशा फातिमा के वकील सरीम नवेद ने स्पष्ट किया, “कोर्ट ने कहा है कि जिन पांच लोगों को जमानत दी गई है, उनकी भूमिका निचले स्तर की है. वहीं, उमर और शरजील के लिए निर्देश है कि एक साल के भीतर सभी सुरक्षित गवाहों के बयान दर्ज किए जाएं.”
विपक्ष का हमला: ‘राम रहीम को पैरोल, खालिद को जेल?’
फैसले के तुरंत बाद राजनीतिक विवाद गहरा गया. विपक्षी नेताओं ने इसी दिन बलात्कार और हत्या के दोषी गुरमीत राम रहीम सिंह को मिली 15वीं पैरोल का हवाला देते हुए न्यायिक प्रणाली में दोहरे मापदंड का आरोप लगाया.
सीपीआई (एम) सांसद जॉन ब्रिट्टास ने ‘एक्स’ पर तीखी प्रतिक्रिया दी: “उमर खालिद को कोई जमानत नहीं—पांच साल से अधिक समय से हिरासत में, मुकदमा शुरू भी नहीं हुआ. वहीं, एक दोषी बलात्कारी और हत्यारा (राम रहीम) मांग पर बार-बार ‘जेल की छुट्टियों’ का आनंद लेता है. ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद’ का सिद्धांत चयनात्मक रूप से लागू हो रहा है.”
आरजेडी सांसद मनोज झा ने कहा कि यह परेशान करने वाला सवाल है कि “संवैधानिक सुरक्षा सक्रिय होने से पहले किसी को कितनी कैद सहन करनी होगी? प्रचलित न्यायिक दृष्टिकोण यह प्रतीत होता है कि जेल में बिताया गया समय अभी भी काफी लंबा नहीं है.”
वहीं, भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने फैसले का स्वागत करते हुए लिखा, “सत्यमेव जयते.” उन्होंने इसे कांग्रेस पर “बड़ा तमाचा” बताया और मांग की कि कांग्रेस “टुकड़े-टुकड़े गैंग” का समर्थन करने के लिए माफी मांगे. दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी कहा कि शहर को हिंसा में धकेलने वालों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए.
‘अब जेल ही मेरी ज़िंदगी है’
उमर खालिद की साथी बनोज्योत्स्ना लाहिड़ी ने सोशल मीडिया पर खालिद की प्रतिक्रिया साझा की. उन्होंने बताया कि जब उन्होंने खालिद को बाकी साथियों की जमानत की खबर दी, तो उन्होंने खुशी जताई. बनोज्योत्स्ना ने लिखा, “खालिद ने कहा, ‘मैं उन अन्य लोगों के लिए वास्तव में खुश हूं! बहुत राहत मिली.’ जब मैंने कहा कि मैं कल मुलाकात के लिए आऊंगी, तो उन्होंने जवाब दिया, ‘अच्छा, अच्छा, आ जाना. अब यही ज़िंदगी है.’”
उमर खालिद के पिता एस.क्यू.आर. इलियास ने फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा, “मुझे कुछ नहीं कहना है, फैसला आपके सामने है.” वहीं, शरजील इमाम के चाचा अरशद इमाम ने कहा कि उन्हें पूरी उम्मीद थी कि इस बार जमानत मिल जाएगी क्योंकि बहस बेगुनाही की ओर इशारा कर रही थी, फिर भी वे अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं. दूसरी ओर, जमानत पाने वाले शिफा-उर-रहमान की पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट का आभार व्यक्त किया.
कानूनी बहस: बचाव पक्ष की दलीलें बनाम ‘लॉन्ग इंकार्सरेशन’
सुनवाई के दौरान खालिद के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जोरदार दलीलें दी थीं. उन्होंने कोर्ट को बताया था, “दंगे के वक्त खालिद दिल्ली में नहीं था. उसके पास से कोई हथियार या आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई. 751 एफआईआर दर्ज हैं, लेकिन मुझे (खालिद को) सिर्फ एक में आरोपी बनाया गया है.”
कानूनी विशेषज्ञों ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों (जैसे यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब, 2021) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अगर मुकदमा पूरा होने की संभावना न हो, तो यूएपीए की कठोरता के बावजूद लंबी कैद जमानत का आधार बन सकती है. पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने कहा, “लंबी कैद अपने आप में एक मुद्दा होनी चाहिए. एक बार छीनी गई आजादी की कोई भरपाई नहीं हो सकती.”
यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुए दंगों से जुड़ा है, जिसमें 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक घायल हुए थे. दिल्ली पुलिस ने इसे सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान रची गई एक ‘बड़ी साजिश’ बताया है. हाल ही में अमेरिकी सांसदों के एक समूह ने भी खालिद की लंबी हिरासत पर चिंता जताते हुए भारतीय राजदूत को पत्र लिखा था, जिससे यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में रहा है.
‘पांच साल की जेल काफी नहीं’: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया
पत्रकार सौरव दास ने सुप्रीम कोर्ट के उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत से इनकार करने के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. अपनी एक्स पोस्ट में उन्होंने लिखा, “क्या आप इस बेतुकेपन को समझ सकते हैं? भारत का सुप्रीम कोर्ट कहता है कि ‘निरंतर हिरासत संवैधानिक अस्वीकार्यता को पार नहीं कर पाई है जो उनके खिलाफ वैधानिक प्रतिबंध को खारिज कर सके’ उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में.”
सौरव दास ने आगे समझाया, “दूसरे शब्दों में, जस्टिस अरविंद कुमार का मतलब है कि हालांकि एक संवैधानिक अदालत जमानत दे सकती है यदि कैद की अवधि लंबी, अनुचित या असमान हो, खालिद और अन्य के मामले में, जेल में बिताया गया समय अभी तक काफी लंबा नहीं है, देरी अभी तक चौंकाने वाली या असंवैधानिक नहीं है, और अनुच्छेद 21 के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन अभी तक नहीं हुआ है.”
उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में लिखा, “स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार अभी तक इतना मजबूत नहीं हुआ है कि कठोर यूएपीए जमानत प्रतिबंध को हरा सके. माननीय न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना वराले के लिए मुकदमा शुरू होने की संभावना के बिना पांच साल जेल में रहना काफी अच्छा नहीं है.”
यह पोस्ट सुप्रीम कोर्ट के उस तर्क पर सवाल उठाती है जिसमें कहा गया है कि लंबी अवधि की हिरासत अभी संवैधानिक सीमा को पार नहीं कर पाई है. आलोचकों का कहना है कि यह फैसला यह संकेत देता है कि पांच साल से अधिक की बिना मुकदमे की हिरासत भी अदालत की नजर में पर्याप्त नहीं है जिससे जमानत दी जा सके, जो संविधान के अनुच्छेद 21 की भावना के विपरीत है.
आंखें मूंदकर न्याय: दिल्ली दंगा मामलों में सुप्रीम कोर्ट के जमानत आदेश का विश्लेषण
कानूनी विद्वान गौतम भाटिया ने अपने ब्लॉग ‘इंडियन कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ एंड फिलॉसफी’ में 5 जनवरी, 2026 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तीखा विश्लेषण किया है. भाटिया लिखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज करके और पांच अन्य को जमानत देकर एक अजीब मिसाल पेश की है. उनके अनुसार, अदालतों ने यूएपीए (UAPA) के तहत जमानत के सवाल पर लगातार “आंखें मूंद लेने वाला दृष्टिकोण” (Eyes wide shut approach) अपनाया है. यानी, अदालतें अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई सामग्री की कोई सार्थक जांच करने के बजाय यूएपीए की धारा 43(D)(5) की आड़ लेती हैं और अभियोजन की कमियों को अपनी तरफ से अनुमान लगाकर भर देती हैं.
भाटिया का विश्लेषण कहता है कि कोर्ट ने ‘देरी’ के सवाल पर दो तर्क दिए जो जांच में टिकते नहीं हैं. पहला, कोर्ट ने देरी का ठीकरा बचाव पक्ष (डिफेंस) के सिर फोड़ा है कि उन्होंने आपत्तियां उठाईं. भाटिया तर्क देते हैं कि कानूनी आपत्तियां उठाना आरोपी का अधिकार है और अंततः स्थगन देना या न देना कोर्ट के हाथ में होता है, वकील के नहीं. दूसरा, कोर्ट ने कहा कि देरी को “अपराध की गंभीरता” के साथ संतुलित किया जाना चाहिए. भाटिया इसे असंगत बताते हैं क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को त्वरित सुनवाई का अधिकार देता है, चाहे आरोप कुछ भी हो. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ही पुराने फैसलों (जैसे जावेद इकबाल केस) का हवाला दिया, जो कहते हैं कि अपराध जितना गंभीर हो, सुनवाई उतनी ही तेज होनी चाहिए.
आतंकवाद की परिभाषा पर, भाटिया लिखते हैं कि कोर्ट ने “नागरिक जीवन को अस्थिर करने” जैसी अस्पष्ट परिभाषा दी है. यह खतरनाक है क्योंकि इससे हर चक्का जाम या विरोध प्रदर्शन को ‘आतंकवाद’ करार दिया जा सकता है. तथ्यों पर बात करते हुए भाटिया बताते हैं कि अभियोजन पक्ष के पास उमर खालिद के खिलाफ हिंसा का कोई सबूत नहीं है, कोई रिकवरी नहीं हुई है, और वह दंगों के वक्त दिल्ली में भी नहीं थे. इस कमी को छुपाने के लिए कोर्ट और पुलिस “साजिश” शब्द का इस्तेमाल करते हैं. कोर्ट ने अपने आदेश में माना कि साजिश “एपिसोडिक नहीं, आर्किटेक्चरल” है, लेकिन यह नहीं बताया कि बैठकों और हिंसा के बीच सीधा संबंध क्या है. भाटिया के अनुसार, कोर्ट ने सबूतों के अभाव को “तार्किक निरंतरता” मान लिया है.
अंत में, भाटिया जमानत की शर्तों की आलोचना करते हैं, जो आरोपियों को ट्रायल खत्म होने तक बोलने, रैलियों में जाने या पोस्ट करने से रोकती हैं. वे पूछते हैं कि बिना दोषसिद्धि के किसी के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की आजादी) को पूरी तरह खत्म कैसे किया जा सकता है? उमर और शरजील के लिए कोर्ट ने कहा है कि वे एक साल बाद या गवाहों की जांच के बाद फिर अर्जी दे सकते हैं. भाटिया निष्कर्ष निकालते हैं कि कोर्ट ने सबूतों के बीच के खाली स्थानों को जांचने के बजाय उन्हें अपनी कल्पना से भर दिया है, जिसका परिणाम अनिश्चितकालीन कैद है.
इस बीच हत्यारे बलात्कारी राम रहीम को 15वीं बार मिली पैरोल, 8 वर्षों में 405 दिन जेल से बाहर
हत्या के मामले में उम्रकैद और बलात्कार के मामले में 20 साल की जेल की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को 2017 में अपनी पहली सजा के बाद से 15वीं बार पैरोल मिली है. सत सिंह की रिपोर्ट के अनुसार, वह 40 दिनों के लिए रोहतक की सुनारिया जेल से बाहर आ सकता है, जिससे पिछले आठ वर्षों में उसके जेल से बाहर बिताए गए कुल दिनों की संख्या 405 हो जाएगी.
रोहतक के संभागायुक्त (डिवीजनल कमिश्नर) ने शनिवार को राम रहीम की पैरोल मंजूर की. यह पैरोल डेरा के दूसरे प्रमुख शाह सतनाम सिंह की 25 जनवरी को आने वाली जयंती में शामिल होने की उनकी याचिका के आधार पर दी गई है. उम्मीद है कि वह अपनी पैरोल की अवधि सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय में बिताएगा.
वर्ष 2025 में राम रहीम को तीन बार पैरोल मिली थी — दिल्ली चुनावों से पहले जनवरी में 30 दिनों के लिए, अप्रैल में 21 दिनों के लिए, और अगस्त में उनके जन्मदिन के अवसर पर 40 दिनों के लिए. हालांकि पैरोल के नियम बलात्कार और हत्या के दोषी को सार्वजनिक सभाओं का हिस्सा बनने से रोकते हैं, लेकिन उसे हर बार वर्चुअल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपने अनुयायियों के साथ बातचीत करने की अनुमति दी गई.
पैरोल की अवधि (दिनों की संख्या)
आंकड़ों के अनुसार राम रहीम को कब-कब पैरोल मिली: अक्टूबर 24, 2020: 1 दिन, फरवरी 7, 2022: 21 दिन, जून 2022: 30 दिन, अक्टूबर 2022: 40 दिन, जनवरी 2023: 40 दिन, जुलाई 2023: 30 दिन, नवंबर 2023: 21 दिन, जनवरी 2024: 50 दिन, अगस्त 2024: 21 दिन, अक्टूबर 2024: 20 दिन, जनवरी 2025: 30 दिन, अप्रैल 2025: 21 दिन, अगस्त 2025: 40 दिन, जनवरी 2026: 40 दिन.
ट्रम्प को लगता है मोदी मुझे खुश करना चाहते हैं, इसीलिए भारत ने रूसी तेल के आयात में कटौती की
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रविवार (4 जनवरी, 2026) को दावा किया कि भारत ने पिछले कुछ महीनों में रूस से अपने तेल आयात में कटौती की है. ट्रम्प के अनुसार, भारत ने ऐसा उन्हें “खुश करने” और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को सुरक्षित करने के प्रयास में किया है. हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी कि यदि भारत अपनी खरीदारी जारी रखता है, तो और अधिक टैरिफ (शुल्क) “जल्द ही लगाए जा सकते हैं.”
ट्रम्प के इस दावे का समर्थन करते हुए, अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा कि अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने दिसंबर 2025 में एक बैठक के दौरान रूस से भारत के घटते तेल आयात का मुद्दा उठाया था. ग्राहम के अनुसार, राजदूत ने उनसे अनुरोध किया था कि वे ट्रम्प से अमेरिका द्वारा लगाए गए 25% के टैरिफ को “हटाने” के लिए कहें, जो कि 25% पारस्परिक टैरिफ के अतिरिक्त लगाया गया है.
सुहासिनी हैदर की रिपोर्ट है कि विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी नेताओं के इन दावों पर टिप्पणी के अनुरोधों का कोई जवाब नहीं दिया. इन नेताओं के साथ राष्ट्रपति ट्रम्प के विमान में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक भी शामिल थे. अतीत में, विदेश मंत्रालय अमेरिका द्वारा एकतरफा प्रतिबंध लगाने को “दोहरा मापदंड” बता चुका है, क्योंकि अमेरिका स्वयं रूसी तेल, यूरेनियम और महत्वपूर्ण खनिजों की खरीद करता है. ट्रम्प ने अक्टूबर 2025 में भी कई अवसरों पर यह दावा किया था कि भारत ने रूसी तेल आयात को “पूरी तरह” से बंद करने का वादा किया है.
जैसा कि “द हिंदू” ने सोमवार (5 जनवरी, 2026) को रिपोर्ट किया, भारतीय तेल आयातकों ने गत वर्ष जून से अक्टूबर तक रूसी तेल आयात में कटौती की थी, लेकिन नवंबर में रूसी तेल और अमेरिकी तेल दोनों के आयात में भारी वृद्धि हुई और यह सात महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया. “द हिंदू” की रिपोर्ट में उद्धृत वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों ने कहा था कि कटौती के बावजूद, अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता आगे नहीं बढ़ी है, जो दिल्ली में इस प्रक्रिया को लेकर कुछ “हताशा” का संकेत देती है.
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यह घोषणा करते हुए कि उन्हें उम्मीद है कि ‘रूस प्रतिबंध अधिनियम’ जल्द ही पारित हो जाएगा, ट्रम्प ने ग्राहम से संवाददाताओं को इस “शानदार कानून” के बारे में समझाने के लिए कहा. उन्होंने आगे कहा कि उन्हें उम्मीद है कि भारत उन देशों में शामिल होगा जो इससे प्रभावित होंगे.
ग्राहम ने दावा किया, “लगभग एक महीने पहले मैं भारतीय राजदूत के घर पर था और वह केवल इसी बारे में बात करना चाहते थे कि वे कैसे रूसी तेल कम खरीद रहे हैं. क्या आप राष्ट्रपति से टैरिफ कम करने के लिए कहेंगे? यह तरीका काम करता है.”
बीच में हस्तक्षेप करते हुए ट्रम्प ने कहा, “वे (भारत) मुझे खुश करना चाहते थे.” उन्होंने आगे कहा, “खास तौर पर मूल रूप से वे चाहते थे- (प्रधानमंत्री) मोदी एक बहुत अच्छे इंसान हैं. वह एक अच्छे व्यक्ति हैं. उन्हें पता था कि मैं नाखुश था और मुझे खुश करना महत्वपूर्ण था. वे व्यापार करते हैं और हम उन पर बहुत तेज़ी से टैरिफ बढ़ा सकते हैं और यह उनके लिए बुरा होगा.”
ग्राहम ने इससे पहले दावा किया था कि उनका विधेयक भारत, चीन और ब्राजील सहित रूसी तेल के साथ व्यापार करने वाले देशों की “अर्थव्यवस्थाओं को कुचलने” में मदद करेगा. 2 दिसंबर को क्वात्रा ने ग्राहम सहित 5 सीनेटरों के लिए आयोजित रात्रिभोज की तस्वीरें साझा की थीं. क्वात्रा ने कहा, “ऊर्जा और रक्षा सहयोग से लेकर व्यापार और महत्वपूर्ण वैश्विक घटनाक्रमों तक की साझेदारी पर सार्थक बातचीत हुई. एक मजबूत भारत-अमेरिका संबंधों के लिए उनके समर्थन के लिए आभारी हूं.”
रूस प्रतिबंध अधिनियम के अनुसार, जिसे अमेरिकी सीनेट में (100 में से) 85 और प्रतिनिधि सभा में 150 से अधिक सह-प्रायोजकों का समर्थन प्राप्त है, “अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों से आयातित सभी वस्तुओं और सेवाओं पर शुल्क की दर को बढ़ाकर कम से कम 500% करना होगा जो जानबूझकर रूसी मूल के यूरेनियम और पेट्रोलियम उत्पादों के लेन-देन में शामिल हैं.”
बजना बंद नहीं हो रहा विजयवर्गीय का ‘घंटा’
टिप्पणी को ‘तानाशाही व्यवहार’ बताने वाले उज्जैन के एसडीएम निलंबित
मध्यप्रदेश में उज्जैन के एक अनुविभागीय दंडाधिकारी (एसडीएम) को इसलिए निलंबित कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद राज्य के नगरीय प्रशासन एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की विवादित “घंटा” वाली टिप्पणी का हवाला देते हुए उसे “तानाशाही व्यवहार का प्रतीक” बताया था. एसडीएम आनंद मालवीय ने इंदौर जल प्रदूषण मामले में कांग्रेस के विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए जिले में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के संबंध में एक आदेश जारी किया था. इस आदेश में कुछ अजीबोगरीब दावे किए गए थे.
आदेश में कहा गया कि इंदौर में “भाजपा शासित नगर निगम द्वारा आपूर्ति किए गए दूषित और गंदे पानी” के सेवन से लोगों की मौत हुई है. आदेश में लिखा था, “इंदौर में भाजपा शासित नगर निगम द्वारा सप्लाई किए गए दूषित और गंदे पानी के सेवन से 14 लोगों की मृत्यु हो गई है और 2,800 व्यक्तियों का उपचार चल रहा है.” इस मुद्दे पर विजयवर्गीय की टिप्पणी का जिक्र करते हुए, आदेश में इसे “अमानवीय और तानाशाही व्यवहार का प्रतीक” बताया गया. इसमें आगे कहा गया कि इतने संवेदनशील मामले पर ‘घंटा’ शब्द का प्रयोग “अत्यधिक आपत्तिजनक” है.
एसडीएम द्वारा जारी नोटिस में कहा गया: “इस संवेदनशील मुद्दे पर राज्य सरकार के एक मंत्री द्वारा की गई आपत्तिजनक टिप्पणी और ‘घंटा’ शब्द का उपयोग अमानवीय और तानाशाही व्यवहार का संकेत है. (कांग्रेस) प्रदेश अध्यक्ष... जीतू पटवारी जी ने निर्णय लिया है कि इस घटना के विरोध में भाजपा सांसदों और विधायकों का घेराव किया जाएगा.”
बहरहाल, इसके बाद उज्जैन संभाग के कमिश्नर ने एक अत्यधिक संवेदनशील मामले में आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में गंभीर लापरवाही और अनियमितता बरतने के आरोप में मालवीय को निलंबित कर दिया.
जब ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने आनंद मालवीय से संपर्क किया, तो उन्होंने बताया कि आदेश के कुछ हिस्से कांग्रेस के एक व्हाट्सएप ग्रुप से लिए गए प्रतीत होते हैं. उन्होंने कहा: “आदेश में कुछ हिस्से कांग्रेस पार्टी के एक व्हाट्सएप ग्रुप से उठाए गए थे, जिसमें विरोध प्रदर्शन का आव्हान किया गया था; रीडर (अधिकारी के सहायक) ने वे हिस्से वैसे ही ले लिए थे. इसमें जो स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े दिए गए थे, वे भी आधिकारिक स्रोतों से थे, लेकिन जब गलतियों पर ध्यान गया, तो मैंने वह आदेश रद्द कर दिया और नया आदेश जारी किया. लेकिन किसी ने पुराना आदेश वायरल कर दिया.”
इंदौर में मृतक संख्या 17 हुई; गांधीनगर और बेंगलुरू में भी सीवेज मिले पानी से टायफायड और पेट के रोगी मिले
इंदौर में पीने के पानी में सीवेज (गंदे पानी) के मिलने से हुई मौतों की संख्या बढ़कर 17 हो गई है. जबकि 20 नए प्रकरण भी सामने आए हैं. उधर इंदौर के बाद, अब गांधीनगर और बेंगलुरु भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के इसी तरह के खतरे से जूझ रहे हैं. जहाँ गांधीनगर के कई इलाकों में टाइफाइड के मामलों में अचानक उछाल आया है, वहीं बेंगलुरु के लिंगराजपुरम क्षेत्र के केएसएफसी लेआउट के निवासी पिछले कुछ महीनों से पेट दर्द, उल्टी और दस्त जैसे लक्षणों की शिकायत कर रहे हैं, जिनमें से कुछ को अस्पताल में भर्ती होने की भी नौबत आई है. इन दोनों शहरों में भी पीने के पानी की पाइपलाइनों में सीवेज के रिसाव ने इस संकट को जन्म दिया है.
“टाइम्स ऑफ इंडिया” के अनुसार, गांधीनगर में, स्वास्थ्य अधिकारियों ने सेक्टर 24, 26, 28 और अदिवाड़ा में केंद्रित टाइफाइड के 70 सक्रिय मामलों की पुष्टि की है (भास्कर ने यह संख्या 150 बताई है, जिनमें 104 बच्चे हैं), जिसका मुख्य कारण दूषित पानी को बताया गया है. पाइपलाइन नेटवर्क में कम से कम सात ऐसे लीकेज (रिसाव) की पहचान की गई है, जिससे पीने के पानी की आपूर्ति में सीवेज मिल रहा है.
सिविल अस्पताल ने तेज बुखार और पेट संबंधी लक्षणों के साथ आने वाले बच्चों की बढ़ती संख्या को देखते हुए 30 बिस्तरों वाला एक पीडियाट्रिक (बाल चिकित्सा) वार्ड भी शुरू किया है. डॉक्टरों का कहना है कि नन्हे मरीजों का आना लगातार जारी है. यह संकट ऐसे समय में आया है जब 24x7 जल आपूर्ति परियोजना में 257 करोड़ रुपये का निवेश किया गया था.
इंजीनियरिंग अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि पानी की पाइपलाइनें सीवर लाइनों के बहुत करीब बिछाई गई थीं. सड़क एवं भवन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया, “जब पाइपलाइनों में उच्च दबाव के साथ पानी बहना शुरू हुआ, तो कमजोर पाइपों में रिसाव होने लगा.”
उधर, बेंगलुरु में, कम से कम 30-40 परिवारों को एक सप्ताह से अधिक समय से निजी जल स्रोतों (टैंकर आदि) पर निर्भर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा है. कई निवासी अक्सर बीमार पड़ रहे थे, लेकिन पानी के दूषित होने का असली पैमाना इसी सप्ताह तब स्पष्ट हुआ, जब उन्होंने नलों से दुर्गंधयुक्त और झाग वाला पानी आते देखा. साथ ही, भूमिगत टैंकों की सफाई के दौरान वहां गहरे रंग के सीवेज के गाद की मोटी परतें पाई गईं.
लगातार मिल रही शिकायतों के बाद, ‘बेंगलुरु जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड’ के अधिकारियों ने इलाके का निरीक्षण किया और पुष्टि की कि किसी अज्ञात स्थान पर पेयजल पाइपलाइन में सीवेज मिल गया है. हालांकि, निवासियों ने आरोप लगाया कि अधिकारी अभी तक सटीक रिसाव स्थल का पता नहीं लगा पाए हैं और खराबी ढूँढने के लिए ‘ट्रायल एंड एरर’ (अनुमान के आधार पर कोशिश) पद्धति अपनाते हुए कई जगहों पर खुदाई कर रहे हैं.
मणिपुर में फिर हिंसा, बिष्णुपुर में आईईडी ब्लास्ट में दो जख्मी
सोमवार को मणिपुर में हुए एक विस्फोट में दो लोग घायल हो गए, जिसके बाद कई मैतई नागरिक समाज संगठनों ने सोमवार आधी रात से 24 घंटे के बंद का आव्हान किया है.
प्रशांत मजूमदार की रिपोर्ट है कि बिष्णुपुर और चुराचांदपुर जिलों की सीमा के पास एक खाली पड़े घर में अज्ञात उपद्रवियों द्वारा लगाया गया एक आईईडी सुबह करीब 5:45 बजे फट गया. यह घर 3 मई 2023 से ही खाली पड़ा है, जिस दिन राज्य में घातक जातीय हिंसा भड़की थी. घर का मालिक, जो एक मैतई है, अपने परिवार के साथ एक राहत शिविर में रह रहा है.
विस्फोट के बाद जब उत्सुक स्थानीय लोग घटनास्थल पर पहुंचे, तो पास में ही एक और धमाका हुआ. इस दूसरे विस्फोट में दो मैतई व्यक्ति—सनातोम्बा सिंह (52) और इंदुबाला देवी (37)—के पैरों में छर्रे लगे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. दोनों की स्थिति खतरे से बाहर बताई गई है.
पुलिस ने बताया कि दूसरा विस्फोट सुबह करीब 8:45 बजे, पहले वाले स्थान से लगभग 200 मीटर की दूरी पर हुआ. पुलिस ने घटनास्थल का दौरा कर जांच शुरू कर दी है, जबकि अधिकारियों ने क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ा दी है. इस बीच, मैतई समूह कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी’ (कोकोमी) ने इन धमाकों की निंदा की और समयबद्ध जांच की मांग की है.
कोकोमी ने कहा, “निहत्थे नागरिकों के खिलाफ आतंक का यह जानबूझकर किया गया कृत्य मौलिक मानवाधिकारों, संवैधानिक गारंटियों और कानून के शासन का गंभीर उल्लंघन है. अंधेरे की आड़ में एक नागरिक घर को निशाना बनाना उस खतरनाक और आवर्ती पैटर्न को दर्शाता है, जिसमें इस क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से सक्रिय सशस्त्र नार्को-आतंकवादी अपराधी दंडमुक्ति का आनंद ले रहे हैं.”
इसके अलावा, संगठन ने जांच के निष्कर्षों को सार्वजनिक करने की मांग की है, जिसमें अपराधियों और उन अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए जिनकी लापरवाही के कारण ऐसे हमले हुए. उन्होंने आतंकी हमले करने वाले सशस्त्र समूहों के खिलाफ ठोस कार्रवाई और संवेदनशील व संघर्ष प्रभावित इलाकों के नागरिकों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट आश्वासन की भी मांग की है.
विश्लेषण
आकार पटेल: दुनिया में चीन का डंका बजने का साल है 2026?
2026 में देखने लायक़ सबसे दिलचस्प चीज़ों में से एक है हमारे युग की दो महाशक्तियों के बीच की प्रतिद्वंद्विता. संयुक्त राज्य अमेरिका ने पहले विश्व युद्ध के अंत (1918 में खाई-युद्ध के गतिरोध के अंतिम चरणों में अमेरिकी प्रवेश को शाही जर्मनी के खिलाफ़ निर्णायक माना गया था) से लेकर आज तक वैश्विक प्रभुत्व की एक पूरी सदी का आनंद लिया है. यह प्रभुत्व का दौर ख़त्म हो रहा है अगर पहले से ख़त्म नहीं हो गया है.
2000 में, संयुक्त राज्य अमेरिका वैश्विक व्यापार पर राज करता था. आज चीन है जो 150 से अधिक देशों के लिए सबसे बड़ा साझेदार है. कई लोगों के लिए कोई विकल्प नहीं है. नया भारत बीजिंग के साथ जुड़ने में अनिच्छुक है लेकिन किसी भी अन्य देश की तुलना में चीन से अधिक आयात करने के लिए मजबूर है. विश्व स्तर पर व्यापार युद्ध जीतने से चीन को वह लीवरेज मिला है जो शायद एक चौथाई सदी पहले अपने चरम पर अमेरिका के पास भी नहीं था.
चीन प्रतिदिन 3 बिलियन डॉलर का व्यापार अधिशेष (सरप्लस) लेता है, जो आश्चर्यजनक है, और 2025 के लिए इसके 1.1 ट्रिलियन डॉलर के अधिशेष का यही मतलब है. यह इस साल गति के कारण बढ़ेगा. चीन ने 2020 में 10 लाख कारों का निर्यात किया और पांच साल बाद यह 70 लाख कारें हो गईं. और ये कारें बेहतर और सस्ती होती जा रही हैं, मतलब दुनिया भर में और भी अधिक अपनाना.
नवीकरणीय ऊर्जा में, सौर और पवन ऊर्जा पैदा करने वाले उपकरण बनाने में, चीन का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है. पूर्व में इसकी 85% वैश्विक बाज़ार हिस्सेदारी है और बाद वाले में लगभग 60%. दुनिया की लगभग 70% इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियां चीन में बनती हैं. यह दुनिया का आधा या अधिक स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट बनाता है. दुनिया के लगभग तीन चौथाई ड्रोन चीनी हैं.
दुनिया के आधे से अधिक जहाज़ अब चीन में बनते हैं, ख़ासकर सबसे जटिल वाले: एलएनजी टैंकर, क्रूज़ जहाज़, बड़े सैन्य जहाज़ और निश्चित रूप से कंटेनर जहाज़ जो दुनिया भर में सभी सामान ले जाते हैं. राष्ट्रपति ट्रंप के तहत, अमेरिका ने टैरिफ़ के साथ दुनिया को धमकाने की कोशिश की. अकेले चीन खड़ा हुआ और सफलतापूर्वक पलटवार किया जबकि नए भारत सहित अधिकांश देशों ने ‘टैरिफ़ खा लिया’ जैसा कि ट्रंप कहते हैं.
लेकिन चीन ने इसका जवाब दिया और जीत गया. ट्रंप अपने बढ़ते तनाव से पीछे हट गए, और आज अमेरिकी रक्षा उद्योग को बीजिंग के पास हाथ में टोपी लेकर जाना पड़ता है और चुंबकों और सामग्रियों की भीख मांगनी पड़ती है जिनके बिना वे अपनी मिसाइलें और जेट नहीं बना सकते. कुछ हफ़्ते पहले ट्रंप ने एनवीडिया से चीन को हाई-एंड चिप्स के निर्यात नियंत्रण में ढील दी लेकिन शी जिनपिंग ने कहा कि चीन उन्हें नहीं ख़रीदेगा और अपना खुद का बनाएगा, भले ही वे अभी के लिए थोड़े कम कुशल हों.
पिछले महीने, एक रिपोर्ट ने दावा किया कि चीन ने एकमात्र शेष हाई-टेक सेक्टर में सफलता हासिल की है जहां इसे पहुंच से वंचित किया गया था: चिप्स के लिए लिथोग्राफ़ी. इससे लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह आम तौर पर समझा जाता है कि अगर कुछ मैन्यूफैक्चरिंग से जुड़ा है, चाहे यह कितना भी जटिल हो, चीन इसे कर लेगा.
यही बात वाणिज्यिक विमानों पर भी लागू होती है, जो छह दशकों से अधिक समय से अमेरिका में बोइंग और यूरोप में एयरबस द्वारा एकाधिकार का आनंद लिया गया है. चीन ने पिछले साल अपना वाणिज्यिक जेट पेश किया और 2026 में हम इसे व्यापक रूप से अपनाते हुए देखेंगे. जो हिस्से अभी आयातित हैं - इंजन टर्बाइन, लैंडिंग गियर, कुछ सॉफ़्टवेयर - स्थानीय बनाए जाएंगे.
चीन ने कुछ महीने पहले अपना पहला स्वदेशी हाई-एंड विमान वाहक चालू किया, और इस साल संभवतः अपना पहला परमाणु-संचालित वाहक लाएगा. ऐसा होने के बाद, वैश्विक विनिर्माण महाशक्ति के लिए इसे दोहराना और यहां तक कि सुधारना भी बहुत आसान होगा. एक अमेरिकी रक्षा रिपोर्ट ने कहा कि 10 साल बाद चीन के पास लगभग उतने ही वाहक होंगे जितने आज अमेरिका के पास हैं (जो कि 11 हैं) और वास्तव में पश्चिमी प्रशांत में अधिक होंगे, जहां एक्शन है.
यही स्थिति हवा में भी पाई जाती है और चीन ने 2025 में लड़ाकू विमान दिखाए जो पुराने अमेरिकी बेड़े से आगे थे. अमेरिकी प्रभुत्व बड़े हिस्से में इस तथ्य से संचालित था कि दुनिया की प्रतिभा अमेरिका में पलायन कर गई. यह खुलापन भारतीयों के लिए कुछ फ़ायदे लेकर आया, ख़ासकर मध्यम वर्ग के लिए, हमारे अनूठे अंग्रेज़ीभाषी लाभ के कारण.
ट्रंप की नीतियों ने इसे ख़त्म कर दिया है जैसा कि हम एच1बी कार्यक्रम की फ़ीस और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में समस्याओं के साथ देख सकते हैं. चीन ने, भारत की तरह, कभी भी अप्रवासियों का स्वागत नहीं किया. लेकिन यह अपनी एकरूपता के साथ सहज है और औद्योगिक प्रौद्योगिकी की ज़ोरदार तैनाती के माध्यम से जनसंख्या स्थिरता के साथ आने वाले कुछ मुद्दों को टाल दिया है.
2018 में, चीन ने पहली बार व्यापार के माध्यम से खुली अमेरिकी दुश्मनी महसूस की. इसने अनुमान लगाया कि क्या आ रहा है और अगले सात साल ख़ुद को तैयार करने में बिताए, ऐसा करने वाला एकमात्र देश. यह एक साल पहले ट्रंप की सत्ता में वापसी तक तैयार था और अब यह अजेय बन गया है.
इसने उस समय यह सुनिश्चित करने में बिताया कि यह निर्भर नहीं होगा बल्कि इसके बजाय ‘आत्मनिर्भर’ बन जाएगा. इसने इसे इतने कम समय में इतनी पूरी तरह से हासिल किया कि अब यह दुनिया है जो इस पर निर्भर हो गई है. इसने अमेरिका के विपरीत मार्ग अपनाकर ऐसा किया है. इसने सरकार की भूमिका बढ़ाई है, इसने कॉर्पोरेट की अति को रोका है, इसने सबसे उन्नत तकनीक को ख़ारिज कर दिया है और अपना खुद का बनाने का विकल्प चुना है.
इसने बैंकों को रियल एस्टेट को उधार देना बंद करने और इसके बजाय उद्योग को फ़ंड करने के लिए मजबूर किया. उस सभी योजना और निष्पादन ने इसे उस जगह पर रखा है जहां यह आज है, वैश्विक प्रभुत्व के लिए एकमात्र गंभीर चुनौतीकर्ता एक ऐसे अमेरिका के लिए जो जनसंख्या में बूढ़ा हो रहा है, ख़ुद को दुनिया के लिए बंद कर रहा है और पीछे गिर रहा है.
यह देखना दिलचस्प होगा कि इस साल दो आधुनिक दिग्गजों के बीच हमारे समय की इस महान प्रतिद्वंद्विता में क्या नए विकास होंगे.
क्रिसमस की छुट्टी से इनकार भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के गहरे संकट को उजागर करता है
हाल ही में केरल लोक भवन में कर्मचारियों को क्रिसमस की छुट्टी देने से इनकार करना और उन्हें ‘सुशासन दिवस’ के कार्यक्रमों में शामिल होने का निर्देश देना, केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि एक गहरे वैचारिक बदलाव का संकेत है. यह घटना सार्वजनिक जीवन में बढ़ती ‘बहुसंख्यकवादी प्राथमिकता’ और धार्मिक सामंजस्य के निरंतर क्षरण को उजागर करती है.
“द वायर” में लेखक अमल चंद्रा लिखते हैं कि केरल जैसे राज्य, जो अपनी बहुलवादी संस्कृति के लिए जाने जाते हैं, वहां भी अब क्रिसमस समारोहों में व्यवधान देखे जा रहे हैं. ईसाई संगठनों ने ‘संघ परिवार’ से जुड़े समूहों द्वारा कैरल गायन और झांकियों पर आपत्ति जताने को जानबूझकर की गई उकसावे वाली कार्रवाई बताया है. इसी तरह, उत्तर प्रदेश में क्रिसमस पर स्कूलों को खुला रखने का निर्णय ईसाई समुदाय को हाशिए पर धकेलने और भारत के धर्मनिरपेक्ष आदर्शों को कमजोर करने के रूप में देखा जा रहा है.
प्रतीकात्मक बहिष्कार के नीचे हिंसा की एक भयावह वास्तविकता छिपी है. रिपोर्टों के अनुसार, भारत में ईसाइयों के खिलाफ लक्षित हिंसा की घटनाएं 2023 में 601 से बढ़कर 2024 में 830 हो गईं. यह कोई छिटपुट अशांति नहीं, बल्कि एक ढांचागत प्रवृत्ति है, जिसमें शामिल हैं:
प्रार्थना सभाओं में हिंसक व्यवधान और चर्चों में तोड़फोड़ (जैसे छत्तीसगढ़ के धमतरी में हुआ हमला). पादरी और ननों पर शारीरिक हमले (ओडिशा के बालासोर और मध्यप्रदेश के जबलपुर की घटनाएं). सामाजिक बहिष्कार और सार्वजनिक स्थानों पर ईसाई उपस्थिति को ‘अपराध’ की तरह पेश करना.
इस हिंसा का भूगोल स्पष्ट रूप से उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों में केंद्रित है. इन क्षेत्रों में ‘धर्मांतरण विरोधी कानूनों’ का उपयोग पादरियों और आम विश्वासियों को परेशान करने के लिए एक रणनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है. ये कानून अक्सर ‘विजिलेंटिज्म’ (अवैध निगरानी) को वैध बनाते हैं, जिससे भीड़ द्वारा किए गए हस्तक्षेप को कानूनी संरक्षण जैसा आभास मिलता है. कई मामलों में पुलिस की संदिग्ध भूमिका और संस्थागत मिलीभगत ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है.
इस दौर की सबसे खतरनाक बात इन बहिष्कारों और हमलों का ‘सामान्यीकरण’ है. जब अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन नियमित समाचार बन जाए, तो यह एक गंभीर लोकतांत्रिक गिरावट का संकेत है. भारत का संविधान धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन वर्तमान जमीनी हकीकत यह बताती है कि ये अधिकार अब राजनीतिक पहचान पर निर्भर होते जा रहे हैं.
क्रिसमस जैसी छुट्टियों से इनकार करना मामूली लग सकता है, लेकिन यह अल्पसंख्यकों के लिए प्रतीकात्मक और भौतिक स्थान के सिकुड़ने का लक्षण है. भारत के लोकतांत्रिक वादे की परीक्षा इस बात से होगी कि वह नफरत की इस मशीनरी से अपने सबसे असुरक्षित नागरिकों की रक्षा कितनी दृढ़ता से करता है. इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए निष्पक्ष कानून प्रवर्तन, साहसी राजनीतिक नेतृत्व और एक सजग मीडिया तंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है.
बांग्लादेश में एक और हिंदू की गोली मारकर हत्या, विधवा के साथ सामूहिक बलात्कार
‘एनडीटीवी’ की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में सोमवार शाम अज्ञात हमलावरों ने एक हिंदू फैक्ट्री मालिक की गोली मारकर हत्या कर दी, जो एक स्थानीय समाचार पत्र के कार्यकारी संपादक भी थे. अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों के खिलाफ हिंसा की यह नवीनतम घटना है.
मृतक की पहचान 45 वर्षीय राणा प्रताप के रूप में हुई है, जिनकी हत्या जशोर जिले के मनीरामपुर उप-जिले के कोपालिया बाजार इलाके में शाम करीब 6 बजे की गई.
अधिकारियों ने बताया कि मोटरसाइकिल पर आए पुरुषों के एक समूह ने प्रताप को उनकी आइस फैक्ट्री से बाहर बुलाया और पास की एक गली में ले गए, जहाँ उनके सिर में बेहद करीब से गोली मार दी गई.
स्थानीय निवासियों ने ‘एनडीटीवी’ को बताया कि हमलावरों ने गोली चलाने और मौके से फरार होने से पहले प्रताप के साथ थोड़ी बहस भी की थी. प्रताप पिछले दो वर्षों से कोपालिया बाजार में आइस फैक्ट्री चला रहे थे और नरेल जिले से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘बीडी खबर’ के कार्यकारी संपादक भी थे. अखबार के समाचार संपादक अबुल कासिम ने कहा कि प्रताप को पहले कई मुकदमों का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन सभी में वे बरी हो गए थे. उन्होंने कहा, “मैं नहीं कह सकता कि इस हत्या की वजह क्या थी.”
इसी बीच, कालीगंज में एक और भयानक घटना सामने आई, जहाँ एक 40 वर्षीय हिंदू विधवा के साथ कथित तौर पर दो पुरुषों द्वारा सामूहिक बलात्कार किया गया, उसे पेड़ से बांध दिया गया और उसके बाल काट दिए गए. अपनी पुलिस शिकायत में महिला ने कहा कि अपराधी—शाहीन और उसका साथी हसन—जमीन और घर खरीदने के विवाद को लेकर सालों से उसे परेशान कर रहे थे. शनिवार शाम जब दो रिश्तेदार उसके घर आए, तो उन लोगों ने कथित तौर पर उसके साथ मारपीट की, 50,000 टका की मांग की और इस शोषण का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित कर दिया.
स्थानीय निवासियों ने उसे बचाया और झेनाइदाह सदर अस्पताल में भर्ती कराया. पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और जांच जारी है. ये घटनाएं बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के प्रति बढ़ती चिंताओं के बीच आई हैं. दिसंबर से अब तक कम से कम तीन हिंदू पुरुषों की हत्या हो चुकी है, जिसके कारण अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर अंतरिम सरकार की कार्यप्रणाली की आलोचना हो रही है.
बांग्लादेश ने आईपीएल के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाया, मुस्तफिजुर को हटाने के बाद फैसला
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने सोमवार को अपने देश में इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के अगले सीजन के प्रसारण पर अनिश्चितकाल के लिए प्रतिबंध लगा दिया है. इसके पहले कल रविवार को बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए फरवरी में शुरू होने वाले टी-20 विश्व कप में खेलने के लिए अपनी राष्ट्रीय टीम को भारत भेजने से इनकार कर दिया था.
“द टेलीग्राफ” की खबर है कि बांग्लादेश के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के टीवी-2 विंग द्वारा कहा गया कि अंतरिम सरकार को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के उस फैसले की जानकारी मिली है, जिसमें बांग्लादेशी तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) फ्रेंचाइजी से बाहर कर दिया गया है. बीसीसीआई के इस फैसले का कोई तर्कसंगत कारण ज्ञात नहीं है और इस तरह के फैसले ने बांग्लादेश के लोगों को दुखी, व्यथित और आहत किया है. इसको मद्देनजर रखते हुए यह फैसला लिया गया है.
सुशांत सिंह: मुस्तफिजुर, बंगाल के चुनाव और हिंदू भावनाओं का ध्रुवीकरण
3 जनवरी 2026 को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) को एक गुप्त निर्देश जारी कर बांग्लादेशी तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को रिलीज करने का आदेश दिया. इसके पीछे “बिगड़ते राजनयिक संबंधों” जैसे अस्पष्ट कारणों का हवाला दिया गया. रहमान, जो 2026 के आईपीएल सीजन में एकमात्र बांग्लादेशी खिलाड़ी थे, को 9.20 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड कीमत पर खरीदा गया था. उनका इस तरह बाहर किया जाना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक संदेश है.
“Cricket Et Al” में सुशांत सिंह ने अपनी लंबी रिपोर्ट में लिखा है कि इस विवाद का असली केंद्र बांग्लादेश नहीं, बल्कि बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान हैं. रहमान को टीम में शामिल करने पर हिंदू राष्ट्रवादी गुटों ने खान पर समन्वित हमले शुरू किए. भाजपा और शिव सेना के नेताओं ने उन्हें “गद्दार” तक करार दिया. यह हमला भारत की उस ‘बहुसंख्यकवादी’ राजनीति को उजागर करता है, जहां एक भारतीय मुस्लिम सेलिब्रिटी को पड़ोसी देश के आंतरिक मामलों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है. यह रणनीति नई नहीं है; 2021 में शाहरुख के बेटे आर्यन खान की गिरफ्तारी भी इसी तरह के राजनीतिक उत्पीड़न का हिस्सा थी.
सुशांत के मुताबिक, क्रिकेट को राजनीति का हथियार बनाने की शुरुआत 2008 के मुंबई हमलों के बाद हुई, जब पाकिस्तानी क्रिकेटरों पर स्थायी प्रतिबंध लगा दिया गया. मुस्तफिजुर का मामला इस प्रवृत्ति को और भयावह बनाता है. बीसीसीआई, जो एक स्वतंत्र खेल निकाय होना चाहिए, अब सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा बन चुका है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा कूटनीति की तुलना क्रिकेट रणनीति से करना इस बात की पुष्टि करता है कि अब खेल मैदान से ज्यादा वैचारिक अनुरूपता लागू करने का मंच बन गया है.
पश्चिम बंगाल में 2026 के चुनावों को देखते हुए, मुस्तफिजुर को बाहर करना हिंदू भावनाओं के ध्रुवीकरण की एक कोशिश है. इसके परिणाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिखने लगे हैं. बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने सुरक्षा चिंताओं और खिलाड़ियों के साथ होने वाले भेदभाव को देखते हुए आईसीसी से अपने मैच भारत से बाहर शिफ्ट करने की मांग की है. भारत के इनकार के बाद पाकिस्तान पहले से ही अपने विश्व कप मैच श्रीलंका में खेलने को मजबूर है. उस्मान ख्वाजा और शोएब बशीर जैसे खिलाड़ियों को वीजा में होने वाली देरी दर्शाती है कि अब खेल कौशल से ज्यादा खिलाड़ी की मूल पहचान मायने रखने लगी है.
कुलमिलाकर, सुशांत के अनुसार, आज आईसीसी पर बीसीसीआई का पूर्ण नियंत्रण है, जिससे अन्य क्रिकेट बोर्ड विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की वह नींव, जहाँ खेल भू-राजनीति से परे होता था, अब दरक रही है. यदि वैश्विक क्रिकेट समुदाय ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो क्रिकेट एक बहु-राष्ट्रीय खेल के बजाय ‘बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद’ का विस्तार बनकर रह जाएगा. आज निशाना पाकिस्तान और बांग्लादेश हैं, कल कश्मीर या मानवाधिकारों पर बोलने वाले ऑस्ट्रेलिया या इंग्लैंड जैसे देश भी हो सकते हैं. वह लिखते हैं कि बिना किसी रोक-टोक के, क्रिकेट का जुनून अब वैमनस्य और राजनीतिक दबाव के औजार में बदलता जा रहा है.
अपहृत वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो न्यूयॉर्क कोर्ट में होंगे पेश, ट्रम्प ने दी और हमलों की धमकी
शनिवार को अमेरिकी कमांडो द्वारा कराकस (वेनेजुएला) में एक सैन्य अभियान के दौरान अपहृत किए गए वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस सोमवार को न्यूयॉर्क की एक संघीय अदालत में पेश होंगे. उन पर नार्को-टेररिज्म (मादक पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद) के आरोप लगाए गए हैं.
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, मादुरो को भारी सुरक्षा के बीच लोअर मैनहटन कोर्ट ले जाया गया. वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की है कि “वेनेजुएला अब अमेरिका के नियंत्रण में है.” ट्रम्प ने अपने आक्रामक तेवर दिखाते हुए सुझाव दिया कि कोलंबिया, मैक्सिको और यहां तक कि डेनमार्क के क्षेत्र ग्रीनलैंड के खिलाफ भी इसी तरह की सैन्य कार्रवाई की जा सकती है. जब उनसे कोलंबिया के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “मुझे यह सुनने में अच्छा लग रहा है.” कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने इसे “अवैध” बताते हुए चेतावनी दी कि उन्हें हिरासत में लेने का कोई भी प्रयास भारी जन आक्रोश पैदा करेगा.
वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेलसी रोड्रिगेज ने सत्ता के इस संक्रमण काल में वाशिंगटन के साथ “संतुलित और सम्मानजनक” संबंधों का आह्वान किया है. हालांकि, मादुरो के बेटे निकोलस मादुरो गुएरा ने इसे “अपहरण” बताया और दुनिया से एकजुटता की अपील की. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इस मुद्दे पर आपात बैठक बुलाई है, जिसे यूएन प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने “खतरनाक मिसाल” बताया है. अमेरिकी राजदूत माइक वाल्ट्ज ने सफाई दी है कि यह वेनेजुएला के लोगों के खिलाफ युद्ध नहीं है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.












