05/03/2026: जंग की आंच और मोदी | हिंद महासागर में ईरानी जहाज पर अमेरिकी हमला, 87 नौसैनिकों की हत्या | बीबी नेतन्याहू का क्या करें? | नीतीश का पटना छूटा | नेपाल में चुनाव
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
हिंद महासागर में जंग: श्रीलंका के पास अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत डुबोया, 87 नाविकों की मौत.
भारत की चुप्पी टूटी: खामेनेई की हत्या के 6 दिन बाद विदेश सचिव पहुंचे ईरानी दूतावास, जताई संवेदना.
रसोई पर संकट: हॉर्मुज रास्ता बंद होने से भारत में एलपीजी गैस की भारी किल्लत का डर.
बिहार में तख्तापलट: नीतीश कुमार ने भरा राज्यसभा का पर्चा, सीएम कुर्सी छोड़ने पर जदयू दफ्तर में बवाल.
समुद्र में भारतीय मौतें: ओमान की खाड़ी में टैंकर पर हमले में 2 भारतीय नाविकों की जलकर मौत.
संभल मस्जिद विवाद: एएसआई ने कहा- मंदिर तोड़ने का कोई रिकॉर्ड हमारे पास मौजूद नहीं.
खामेनेई की हत्या छह दिन बाद भारत ने संवेदना जताई, विदेश सचिव मिसरी ईरानी दूतावास पहुँचे
‘एक्सप्रेस वेब डेस्क’ के अनुसार, भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने गुरुवार को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर संवेदना व्यक्त की. सरकार की ओर से उन्होंने गुरुवार को नई दिल्ली स्थित ईरान के दूतावास में शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए. शनिवार को अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त हमलों में खामेनेई की मृत्यु के बाद, ईरान ने अपने सर्वोच्च नेता की ‘शहादत’ के उपलक्ष्य में 40 दिनों के सार्वजनिक शोक और सात दिनों के सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की है.
ईरान और खाड़ी क्षेत्र में हो रही मौतों और विनाश पर गहरी चिंता जताते हुए, भारत सरकार ने एक बार फिर संवाद और कूटनीति के अपने आह्वान को दोहराया है.
विदेश मंत्रालय ने अब तक दो प्रमुख बयान जारी किए हैं, एक हमलों के पहले दिन और दूसरा ईरान संघर्ष के चौथे दिन (3 मार्च को). अपना दूसरा बयान जारी करते हुए, विदेश मंत्रालय ने संयम बरतने और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपनी अपील दोहराई, साथ ही यह भी स्वीकार किया कि कुछ भारतीयों की मृत्यु हुई है जबकि अन्य लापता हैं.
अपने पिछले बयान का हवाला देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा, “हमने 28 फरवरी 2026 को ईरान और खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष शुरू होने पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की थी. उस समय भी भारत ने सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव बढ़ाने से बचने और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने का आग्रह किया था.”
बयान में आगे कहा गया, “दुर्भाग्य से, रमजान के पवित्र महीने में, क्षेत्र की स्थिति में काफी और निरंतर गिरावट आई है.”
भारत ने उन रिपोर्टों को खारिज कर दिया है जिनमें दावा किया गया था कि अमेरिकी नौसेना ईरान पर हमला करने के लिए भारतीय बंदरगाहों का उपयोग कर रही है. सरकार ने लोगों को ऐसी “निराधार और मनगढ़ंत” टिप्पणियों के प्रति आगाह किया है. ‘एक्स’ पर अपने फैक्ट-चेक अकाउंट के माध्यम से विदेश मंत्रालय ने कहा, “अमेरिका स्थित चैनल ओएएन पर किए जा रहे ये दावे कि भारतीय बंदरगाहों का उपयोग अमेरिकी नौसेना द्वारा किया जा रहा है, पूरी तरह फर्जी और झूठे हैं. हम आपको ऐसी आधारहीन टिप्पणियों से सावधान रहने की सलाह देते हैं.”
यहाँ दी गई न्यूज़ रिपोर्ट्स का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है. इसमें मूल ख़बरों के सभी महत्वपूर्ण तथ्यों, आंकड़ों और विश्लेषणों को शामिल किया गया है.
श्रीलंका के पास अमेरिकी पनडुब्बी के हमले में ईरानी युद्धपोत डूबा, 87 नाविकों की मौत
श्रीलंका के तट के पास एक बड़ी सैन्य घटना में, एक अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा दागे गए टॉरपीडो हमले में ईरानी युद्धपोत ‘IRIS डेना’ डूब गया. इस हमले में कम से कम 87 लोग मारे गए हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना श्रीलंका के दक्षिणी बंदरगाह शहर गाले से लगभग 19 नॉटिकल मील दूर हुई. बुधवार को हुए इस हमले के बाद श्रीलंकाई बचाव दल ने 32 लोगों को सुरक्षित बचा लिया, जिन्हें गाले के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने पेंटागन में इस हमले की पुष्टि करते हुए एक बेहद तल्ख टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि “ईरानी युद्धपोत को लगा था कि वह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सुरक्षित है, लेकिन उसे टॉरपीडो ने डुबो दिया. यह एक ‘खामोश मौत’ थी.” पेंटागन द्वारा जारी एक वीडियो में जहाज के पिछले हिस्से में भारी विस्फोट और उसे डूबते हुए दिखाया गया है.
श्रीलंका सरकार ने संसद को बताया कि वह अपने तट के पास मौजूद एक ‘दूसरे ईरानी जहाज’ पर मौजूद लोगों की जान बचाने की कोशिश कर रही है. कैबिनेट प्रवक्ता नलिंदा जयतिसा ने कहा कि कोलंबो से शवों को रखने के लिए फ्रीज़र भेजे गए हैं. वहीं, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने कहा कि अमेरिका को इस हमले का “कड़वा पछतावा” होगा. उन्होंने बताया कि यह युद्धपोत भारतीय नौसेना के अभ्यास में भाग लेकर लौट रहा था और इसमें लगभग 130 नाविक सवार थे.
उल्लेखनीय है कि कुवैत के पास भी एक टैंकर में विस्फोट की खबर है. उधर, ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच जारी इस युद्ध ने हिंद महासागर तक अपनी पहुंच बना ली है, जिससे वैश्विक तनाव काफी बढ़ गया है.
ईरान युद्ध: हिंद महासागर में अमेरिकी हमले और भारत की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल
‘टॉकिंग न्यूज़ विथ निधीश’ के ताज़ा एपिसोड में मुख्य केंद्र हिंद महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा एक ईरानी फ्रिगेट (युद्धपोत) को नष्ट करना है, जो भारत के विशाखापत्तनम से लौट रहा था. कल अमेरिका की एक पनडुब्बी ने टारपीडो हमले से ईरान के एक फ्रिगेट को गिरा दिया. यह घटना श्रीलंका के गॉल तट के पास हुई. इस जहाज पर करीब 130 लोग सवार थे, जिनमें से 80 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबर है. 87 शव बरामद किए गए हैं, जबकि 60 लोग अभी भी लापता हैं. श्रीलंका द्वारा भेजे गए बचाव दल ने 32 लोगों को बचाया. महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जहाज किसी युद्धक मिशन पर नहीं था. यह एक ‘सेरेमोनियल’ जहाज था जो 18 से 25 फरवरी के बीच भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित ‘नेवी रिव्यू’ (नौसैनिक निरीक्षण) सम्मेलन में शामिल होकर लौट रहा था. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अपने बयान में कहा कि यह जहाज “भारत का मेहमान” था और उन्होंने अमेरिका को चेतावनी दी है कि उसे इस घटना का पछतावा होगा.
भारत की भूमिका और चुप्पी पर सवाल. इस घटना ने भारत की कूटनीतिक स्थिति पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं:
क्या भारत को जानकारी थी? हिंद महासागर में, भारत के इतना करीब यह हमला हुआ, क्या भारत को इसकी भनक नहीं थी?
देर से प्रतिक्रिया: युद्ध के पांचवें दिन जाकर भारत ने ईरानी सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या और वहां मची तबाही पर शोक संदेश भेजा.
कूटनीतिक झुकाव: निधीश का कहना है कि भारत का रवैया अब साफ दिख रहा है कि उसने ईरान से पल्ला झाड़ लिया है और वह अमेरिका-इजरायल गुट के साथ खड़ा नजर आ रहा है. जब युद्ध की भूमिका बन रही थी, तब पीएम मोदी इजरायल यात्रा पर थे.
कार्यक्रम में रक्षा विशेषज्ञ प्रवीण साहनी के विश्लेषण का हवाला दिया गया. उन्होंने बताया कि भारत और अमेरिका के बीच ऐसे करार हैं जिनके तहत अमेरिकी सैन्य जहाज मेंटेनेंस और सर्विसिंग के लिए भारतीय बंदरगाहों का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह चर्चा है कि अमेरिकी जहाजों को टॉमहॉक मिसाइलों की ‘वर्टिकल लोडिंग’ के लिए सुरक्षित बंदरगाहों की जरूरत होगी, और भारत इसके लिए एक विकल्प बन सकता है. यह युद्ध बराबरी का नहीं है. एक तरफ ईरान 20-30 हजार डॉलर के ड्रोन इस्तेमाल कर रहा है, वहीं अमेरिका को उन्हें रोकने के लिए मिलियन डॉलर की मिसाइलें दागनी पड़ रही हैं.
ईरान में मानवीय स्थिति भयावह है. एक स्कूल पर हुए हमले में 180 से ज्यादा बच्चियों की मौत का जिक्र किया गया. अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस पर अभी तक कोई जिम्मेदारी नहीं ली है, बस जांच की बात कही है. अमेरिका के भीतर भी 60% जनता युद्ध के खिलाफ है, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप इसे आगे बढ़ा रहे हैं. भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रहे हैं (मुगलकालीन वास्तुकला और फारसी भाषा का प्रभाव), और ईरान ने पिछले 300 सालों में किसी देश पर पहले हमला नहीं किया है. लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक समीकरणों में भारत ने अपने ‘मेहमान’ जहाज पर हुए हमले को रोकने या अमेरिका को चेतावनी देने के बजाय चुप्पी साधे रखी.
भारतीय नौसेना के अतिथि पर अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा में हमला: ईरान ने कसम खाई- अमेरिका को पछताना होगा
‘द टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने गुरुवार को कहा कि अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा श्रीलंका के तट के पास ईरानी युद्धपोत (फ्रिगेट) ‘आईरिस देना’ को डुबोए जाने के बाद, अमेरिका को “अपनी इस मिसाल पर कड़ा पछतावा होगा.”
अरागची की टिप्पणी हिंद महासागर में इस युद्धपोत के डूबने की ईरानी सरकार की पहली आधिकारिक स्वीकारोक्ति है. यह बयान ऐसे समय में आया है, जब अमेरिकी नौसेना द्वारा जीवित बचे लोगों को न बचाने को लेकर विवाद छिड़ गया है. अरागची ने लिखा, “अमेरिका ने ईरान के तटों से 2,000 मील दूर समुद्र में एक क्रूरता को अंजाम दिया है.”
उन्होंने आगे कहा, “लगभग 130 नाविकों को ले जा रहा ‘फ्रिगेट देना’, जो भारतीय नौसेना का अतिथि था, उस पर बिना किसी चेतावनी के अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में हमला किया गया. मेरी बात याद रखिएगा: अमेरिका ने जो मिसाल कायम की है, उसके लिए उसे भविष्य में भारी पछतावा होगा.” सोशल मीडिया की दुनिया में भी अमेरिकी नौसेना की इस कार्रवाई की निंदा बढ़ती जा रही है.
ब्रिटेन के पूर्व राजदूत और मानवाधिकार कार्यकर्ता क्रेग जॉन मरे ने ‘एक्स’ पर लिखा: “किसी भी तरह का कोई खतरा न होने के बावजूद, अमेरिकी पनडुब्बी ने बचे हुए लोगों को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया और उन्हें डूबने के लिए छोड़ दिया. यह नाविकों के बीच सबसे पुराने और सबसे पवित्र अलिखित नियम को तोड़ना है.”
कुछ अन्य लोगों ने दूसरे विश्व युद्ध की तस्वीरें साझा कीं, जिनमें कथित तौर पर जर्मन नौसेना को मित्र देशों के उन नाविकों को बचाते हुए दिखाया गया था, जिनके जहाजों को उन्होंने नष्ट किया था, और इसकी तुलना अमेरिकी कार्रवाई से की. वहीं, कुछ अन्य लोगों ने तर्क दिया कि ‘वर्जीनिया क्लास’ की पनडुब्बियों में युद्धबंदियों को ले जाने के लिए बहुत कम जगह होती है.
उल्लेखनीय है कि 17 फरवरी को भारतीय नौसेना की पूर्वी नौसेना कमान ने भारत में ‘आईरिस देना’ का स्वागत किया था.
भारतीय नौसेना ने कहा- ईरानी युद्धपोत ‘आईरिस देना’ के संकटकालीन कॉल का जवाब दिया
अमृता नायक दत्ता की रिपोर्ट है कि भारतीय नौसेना ने ‘आईरिस देना’ के खोज और बचाव कार्यों में सहायता के लिए अपने विमान और जहाज भेजे हैं. विशाखापत्तनम में अभ्यास ‘मिलन’ और ‘इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू’ में भाग लेने के बाद ईरान वापस लौटते समय बुधवार को यह युद्धपोत एक अमेरिकी टॉरपीडो का शिकार हो गया था.
नौसेना के एक बयान के अनुसार, नौसेना ने बुधवार सुबह 10 बजे लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमान P8I के साथ अपना बचाव अभियान शुरू किया, ताकि श्रीलंका के नेतृत्व में चल रहे खोज प्रयासों को और मजबूती दी जा सके. इसके अतिरिक्त, पास के क्षेत्र में ही मौजूद आईएनएस तरंगिणी को बचाव कार्यों में मदद के लिए तैनात किया गया, जो बुधवार शाम 4 बजे तक खोज क्षेत्र में पहुँच गया था, जहाँ श्रीलंकाई नौसेना और अन्य एजेंसियां पहले से ही बचाव कार्य में जुटी थीं.
मोदी की इज़राइल यात्रा के बाद भारत की मध्य पूर्व नीति पर उठे सवाल
इस नए युद्ध में भारत की स्थिति पेचीदा हो गई है. हाल ही में अमेरिका द्वारा श्रीलंका के तट के पास एक ईरानी युद्धपोत को डुबो देने की घटना के बाद, भारत की विदेश नीति और अंतर्राष्ट्रीय क़ानून पर ज़ोर देने की पुरानी प्रणाली अब कमज़ोर पड़ती दिख रही है. हालाँकि, इन सबके बीच एक राहत की बात यह है कि पिछले संकटों के मुक़ाबले भारतीय अर्थव्यवस्था इस बार ज़्यादा मज़बूत दिखाई दे रही है.

विदेश नीति में बदलाव और जोखिम : 2017 में जब पीएम मोदी ने इज़राइल की यात्रा की थी, तो वो वहाँ जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे. क़रीब एक दशक बाद, इस दोस्ती का नतीजा यह निकला है कि भारत अपने पुराने फिलिस्तीन-समर्थक रुख़ और ईरान के साथ दोस्ती से दूर हो गया है. अब तक विशेषज्ञ इसे दो राष्ट्रवादी नेताओं के बीच वैचारिक समानता और आतंकवाद-विरोधी साझा लक्ष्य मानते थे. लेकिन अब यह आकलन शायद सही न बैठे.
मोदी को भले ही ईरान पर हमले के सही समय का पता न हो, लेकिन क्षेत्र में अमेरिकी युद्धपोतों और फाइटर जेट्स की बढ़ती तादाद आने वाले ख़तरे का संकेत दे रही थी. इसके बावजूद उनका इज़राइल जाना यह साफ़ करता है कि उन्होंने अपना पक्ष चुन लिया है.
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर के सीनियर रिसर्च फेलो श्रीनाथ राघवन ने मेनका दोषी से कहा, “यह एक बेहद लापरवाह क़दम है. इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी.” उन्होंने कहा कि भारत की मध्य पूर्व नीति संतुलन बनाने पर आधारित थी, लेकिन अब भारत पूरी तरह से हमलावर के साथ दिख रहा है. इससे न केवल क्षेत्र में भारत की विश्वसनीयता कम होगी, बल्कि यूएई, सऊदी अरब और क़तर जैसे देशों से आने वाले निवेश पर भी असर पड़ सकता है. वहाँ काम करने वाले क़रीब 90 लाख भारतीयों के लिए भी यह चिंता का विषय है.
अर्थव्यवस्था पर असर: ख़तरे और राहत : ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के चेतना कुमार और अंकुर शुक्ला के मुताबिक़, भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूत है लेकिन कुछ गंभीर कमज़ोरियाँ भी हैं. खाड़ी देशों से एनर्जी सप्लाई, ट्रेड कॉरिडोर और रेमिटेंस फ्लो पर असर पड़ने का ख़तरा है. रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है. खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) देशों में भारत का 15% निर्यात होता है और यह क्षेत्र भारतीय सामान के लिए एक बड़ा ट्रांसशिपमेंट हब भी है.
हालाँकि, ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स का मानना है कि कुछ बफ़र्स मौजूद हैं, जैसे रूस से तेल की सप्लाई और सरकारी तेल कंपनियों के मज़बूत मार्जिन. साथ ही, भारत की अर्थव्यवस्था अन्य एशियाई देशों के मुक़ाबले तेल पर थोड़ी कम निर्भर है.
मेनका दोषी अंत में लिखती हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प के बदलते मक़सदों के कारण यह कहना मुश्किल है कि युद्ध कब ख़त्म होगा. लेकिन जब भी यह ख़त्म होगा, पीएम मोदी के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. इस साल भारत ब्रिक्स का अध्यक्ष है. उन्हें ग्लोबल साउथ के उन नेताओं का सामना करना होगा जिन्होंने इस युद्ध की निंदा की है, और उन्हें समझाना होगा कि भारत ने ऐसा क्यों नहीं किया.
ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले तेज: 1,230 लोगों की मौत, तेल आपूर्ति बाधित
अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर अपने हमले तेज कर दिए हैं. शनिवार से अब तक हुई बमबारी में कम से कम 1,230 लोग मारे गए हैं. इज़रायली सेना ने लेबनान में भी ईरान समर्थित हिज़बुल्लाह के 80 ठिकानों पर हमला किया है. संघर्ष के छठे दिन, तेहरान ने अज़रबैजान और कतर में अमेरिकी ठिकानों पर ताज़ा हमले करने का दावा किया है.
इस बीच, अमेरिकी सीनेट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सैन्य अभियान को रोकने के लिए लाए गए एक प्रस्ताव को 53-47 के वोट से खारिज कर दिया, जिससे ट्रम्प को युद्ध जारी रखने की खुली छूट मिल गई है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने इराक सीमा पर “आतंकवादी गतिविधियों” की चेतावनी दी है और आरोप लगाया है कि अमेरिका कुर्द बलों को हथियार देकर ईरान के खिलाफ विद्रोह भड़काने की कोशिश कर रहा है.
वैश्विक स्तर पर इसका असर साफ दिखने लगा है. ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा के बाद मालवाहक जहाजों ने वहां से गुजरना बंद कर दिया है, जिससे दुनिया भर में तेल और गैस की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है.
कूटनीतिक मोर्चे पर, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से बात की है. वहीं, भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहली ने कहा कि तेहरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन इस संघर्ष की अवधि और इसका अंत ईरान ही तय करेगा.
ट्रम्प को ईरान में ‘जल्द जीत’ की उम्मीद, लेकिन युद्ध अमेरिका को भारी पड़ सकता है
राष्ट्रपति ट्रम्प का मानना है कि वे अमेरिकी जान-माल के कम से कम नुकसान के साथ विदेशी धरती पर सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन ईरान में शुरू हुआ युद्ध इस धारणा को चुनौती दे रहा है. युद्ध के शुरुआती दिनों में ही 6 अमेरिकी मारे जा चुके हैं, शेयर बाजार डगमगा गया है और गैस की कीमतें बढ़ रही हैं.
द न्यूयॉर्क टाइम्स के ल्यूक ब्रॉडवाटर की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने स्पष्ट किया है कि हम “रुक नहीं रहे हैं, बल्कि गति बढ़ा रहे हैं.” हालांकि, कोलोराडो से डेमोक्रेटिक प्रतिनिधि और पूर्व आर्मी रेंजर जेसन क्रो ने चेतावनी दी है कि अमेरिका एक और “अंतहीन युद्ध” की ओर बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि ट्रम्प ने युद्धों को खत्म करने का वादा किया था, लेकिन अब हम फिर उसी रास्ते पर हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका ने ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश की, तो यह क्षेत्र में भारी अस्थिरता ला सकता है. कैटो इंस्टीट्यूट के जॉन हॉफमैन के मुताबिक, यह वेनेजुएला जैसा आसान मामला नहीं है. यूरोप में गैस की कीमतें 40% तक बढ़ गई हैं. हालांकि, ट्रम्प प्रशासन के पूर्व अधिकारी इलियट अब्राम्स का मानना है कि ईरानी शासन को खत्म करना अमेरिका के हित में है, भले ही इसकी कीमत चुकानी पड़े.
‘युद्ध को ना’: स्पेन ने अमेरिकी सेना को अपने बेस देने से मना किया, ट्रम्प की व्यापार रोकने की धमकी
स्पेन के प्रधान मंत्री पेड्रो सांचेज़ ने ईरान में अमेरिकी और इज़रायली सैन्य हस्तक्षेप को “अनुचित” और “खतरनाक” बताते हुए युद्ध में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है. सांचेज़ ने एक टीवी संबोधन में कहा, “स्पेन सरकार की स्थिति चार शब्दों में समझी जा सकती है: युद्ध को ना (नो टु द वॉर).”
इस रुख से नाराज़ होकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्पेन के साथ व्यापार खत्म करने की धमकी दी है. ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि स्पेन ने अमेरिकी सेना को अपने रोटा और मोरोन स्थित संयुक्त सैन्य अड्डों का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी, जिससे अमेरिकी सैनिकों की जान खतरे में पड़ी. अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने भी पुष्टि की है कि स्पेन के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. हालांकि, स्पेन यूरोपीय संघ (ईयू) का सदस्य है, और ईयू ने साफ किया है कि वह अपने सदस्य देश के हितों की रक्षा करेगा. स्पेन के लिए अमेरिका छठा सबसे बड़ा निर्यात बाजार है, लेकिन स्पेनिश सरकार अपने सिद्धांतों पर अडिग है. सांचेज़ को यूरोप का अंतिम बड़ा प्रगतिशील नेता माना जाता है, और उन्होंने इसे अपने मूल्यों और हितों के खिलाफ बताया है.
ईरान के पास दोस्त तो हैं, लेकिन जंग में वे कहां हैं?
ईरान ने लंबे समय से रूस, चीन, भारत और तुर्की जैसे देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखे हैं, लेकिन अब जब वह अमेरिका और इज़रायल के हमलों का सामना कर रहा है, तो ये ‘दोस्त’ केवल शब्दों तक सीमित हैं. बेन हबर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के लिए यह एक अकेला युद्ध साबित हो रहा है.
तुर्की, जो नाटो का सदस्य है, ने ईरान से दागी गई एक बैलिस्टिक मिसाइल को मार गिराया है, हालांकि उसने युद्ध की आलोचना भी की है. भारत ने अपने रणनीतिक संतुलन को बनाए रखते हुए दूरी बना ली है; भारत के लिए ईरान एक व्यापारिक भागीदार है, लेकिन इज़रायल उसका सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता है.
चीन, जो ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, ने केवल संयम बरतने की अपील की है. रूस, जो ईरान का सबसे करीबी सैन्य सहयोगी माना जाता है, वह भी खुद यूक्रेन युद्ध में व्यस्त है और इज़रायल के साथ सीधे टकराव से बच रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि “यह उन लोगों के लिए एक कड़वी सच्चाई है जो मानते थे कि एक ‘एंटी-वेस्ट’ (पश्चिम विरोधी) धुरी तैयार हो रही है.” संकट के समय में ईरान के सहयोगी ठोस मदद देने के बजाय केवल बयानबाजी कर रहे हैं.
दुबई ड्रोन हमले की गलत खबर पर खलीज टाइम्स की फटकार
भारतीय टीवी मीडिया के लिए एक और शर्मनाक स्थिति तब सामने आई जब यूएई के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार ‘खलीज टाइम्स’ ने दुबई पर कथित ड्रोन हमले से जुड़ी खबरों को गलत बताया. अखबार और ऑल्ट न्यूज़ के मोहम्मद ज़ुबैर पहले ही स्पष्ट कर चुके थे कि जो वीडियो टीवी चैनलों पर दुबई का बताकर दिखाया जा रहा था, वह दरअसल बहरीन में एक ऊंची इमारत पर ईरानी ड्रोन हमले का वीडियो था.
इसके बावजूद कई प्रमुख भारतीय टीवी चैनलों और एंकरों ने अपने गलत पोस्ट अब तक नहीं हटाए हैं. सीएनएन-न्यूज़ 18 के एडिटोरियल अफेयर्स डायरेक्टर राहुल शिवशंकर ने अपने पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “युद्ध के दो पक्ष होते हैं. सूचना युद्ध में भी दोनों पक्षों को सुना जाना चाहिए. मैं सिर्फ एक माध्यम हूं. ” वहीं आज तक और रिपब्लिक भारत के आधिकारिक यूट्यूब चैनलों पर भी यह गलत वीडियो अब तक मौजूद बताया गया है, जिससे भारतीय टीवी मीडिया की तथ्य-जांच प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं. यह खबर न्यूज़ लॉंड्री में प्रकाशित हुई है.
ट्रम्प का युद्ध ‘लापरवाह’ है लेकिन यह उनका राजनीतिक फैसला है, जबकि मोदी ने चीन का मामला सेना पर डाल दिया था
द वायर की सीमा चिश्ती अपने विश्लेषण में लिखती हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का ईरान पर युद्ध छेड़ने का फैसला भले ही विनाशकारी और अवैध हो, लेकिन यह पूरी तरह से उनका और उनकी कैबिनेट का राजनीतिक फैसला है, जिसकी वे जिम्मेदारी ले रहे हैं. इसके विपरीत, 2020 में जब भारतीय सैनिक चीन का सामना कर रहे थे, तब प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने महत्वपूर्ण निर्णय लेने की जिम्मेदारी सेना प्रमुख पर छोड़ दी थी.
पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के संस्मरणों का हवाला देते हुए लेख में कहा गया है कि संकट के समय राजनीतिक नेतृत्व ने उनसे कहा था—”जो उचित समझो वो करो.” एक लोकतंत्र में युद्ध या संघर्ष का फैसला चुनी हुई सरकार का होता है, सेना का नहीं. लेख में तर्क दिया गया है कि ट्रम्प और उनके मंत्री सवालों के जवाब दे रहे हैं, लेकिन भारत सरकार ने संसद में राष्ट्रीय सुरक्षा के सवालों पर चुप्पी साधे रखी. संसद के आगामी सत्र में मोदी सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि महत्वपूर्ण फैसले कैसे लिए गए.
सायरन के बीच इज़रायल में वही पुराना सवाल: बीबी (नेतन्याहू) चाहिए या नहीं?
हारेत्ज़ की रवित हेचट अपनी रिपोर्ट में बताती हैं कि ईरान के साथ युद्ध में चाहे जीत हो या नुकसान, इज़रायली समाज का प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (बीबी) को लेकर बंटवारा जस का तस है. नेतन्याहू के करीबी सूत्रों का मानना है कि ईरानी शासन के पतन से नेतन्याहू को राजनीतिक लाभ मिलेगा और वे जून में समय से पहले चुनाव करा सकते हैं. नेतन्याहू इस युद्ध को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहे हैं, खासकर ईरानी सर्वोच्च नेता खामेनेई की हत्या के बाद. लेकिन विपक्ष और जनता का एक बड़ा हिस्सा, जो ‘एनीवन-बट-नेतन्याहू’ (नेतन्याहू के अलावा कोई भी) कैंप में है, अभी भी उनके खिलाफ है. इज़रायल में विश्व युद्ध या ईरान के साथ संघर्ष से भी बड़ा मुद्दा यह है कि आप नेतन्याहू के समर्थक हैं या विरोधी. यह युद्ध शायद उन्हें दक्षिणपंथी वोट वापस दिला दे, लेकिन उनके विरोधियों का मन बदलने वाला नहीं है.
नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य दांव पर
विशेषज्ञों का कहना है कि इज़राइल में चुनाव नजदीक आने के साथ ही, ईरान के साथ युद्ध ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को अपनी उस छवि को सुधारने का अवसर दिया है, जिसे 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले ने गहरा जख्म दिया था.
हालाँकि, उनका यह भी कहना है कि किसी भी राजनीतिक लाभ का मिलना इस बात पर निर्भर करेगा कि यह संघर्ष आगे कैसा मोड़ लेता है और कितने समय तक चलता है.
अमेरिकी-इज़राइली हमलों की लहर में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के मारे जाने के एक दिन बाद, नेतन्याहू ने कहा कि वाशिंगटन के साथ उनके करीबी संबंधों ने इज़राइल को वह करने में सक्षम बनाया है, “जिसकी मैं 40 वर्षों से आकांक्षा कर रहा था: आतंकवादी शासन पर निर्णायक प्रहार करना.”
7 अक्टूबर 2023 को इज़राइल पर हमास के अभूतपूर्व हमले से शुरू हुए गाजा युद्ध ने नेतन्याहू की लोकप्रियता को कम कर दिया था. आलोचकों ने उन पर इज़राइल के इतिहास के सबसे घातक दिन को रोकने में अधिकारियों की विफलता की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करने का आरोप लगाया है.
76 वर्ष की आयु में, दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के नेता नेतन्याहू इज़राइल के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने कई कार्यकालों में कुल मिलाकर 18 से अधिक वर्ष पद पर बिताए हैं.
अपनी राजनीतिक जिजीविषा (लचीलेपन) के लिए मशहूर नेतन्याहू, अपने अति-रूढ़िवादी धार्मिक सहयोगियों के साथ चल रहे संकट के बीच, गर्मियों से ही संसदीय बहुमत के बिना काम कर रहे हैं. वे लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार के एक मामले में मुकदमे का भी सामना कर रहे हैं और उन्होंने राष्ट्रपति से क्षमादान की मांग की है, जिसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग पर दबाव डाला है.
इज़राइल में चुनाव हर हाल में 27 अक्टूबर तक होने चाहिए. तेल अवीव विश्वविद्यालय के राजनीतिक विश्लेषक इमैनुएल नावोन का कहना है कि नेतन्याहू जल्द चुनाव बुलाएंगे. नावोन ने कहा, “यह स्पष्ट है. 7 अक्टूबर की बरसी के मद्देनजर वह अक्टूबर तक इंतजार नहीं करेंगे.”
उन्होंने आगे कहा, “हमास के हमले के बाद अगर नेतन्याहू बिल्कुल निचले स्तर पर थे, तो उसके बाद से उन्होंने धीरे-धीरे पासा पलट दिया है.” उन्होंने गाजा युद्ध की शुरुआत के बाद से हमास, हिजबुल्लाह और ईरान को इज़राइली सेना द्वारा दिए गए करारे झटकों का हवाला दिया.
जनमत सर्वेक्षण बताते हैं कि यदि आज चुनाव होते हैं, तो नेतन्याहू के नेतृत्व वाली लिकुड पार्टी सबसे आगे निकलकर उभरेगी. ऐसी स्थिति में उन्हें अगली सरकार बनाने का काम सौंपा जा सकता है, हालांकि उनके पास अपने वर्तमान सहयोगियों के साथ अभी भी बहुमत की कमी होगी.
विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान पर जीत इस गणित को बदल सकती है. स्वतंत्र भू-राजनीतिक विश्लेषक माइकल होरोविट्ज़ ने ‘एएफपी’ को बताया, “यह आक्रामक हमला निर्विवाद रूप से उस छवि को मजबूत करता है, जिसे नेतन्याहू बनाना चाहते हैं—वह छवि जो उनके ‘पूर्ण विजय’ के नारे से जुड़ी है.” उन्होंने आगे कहा, “नेतन्याहू यह दिखाना चाहते हैं कि यह केवल चुनाव प्रचार का नारा नहीं बल्कि हकीकत है. यही उनका राष्ट्रीय एजेंडा और उनकी चुनावी रणनीति है.”
हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकर पर हमले में 2 भारतीय नाविकों की मौत
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच, ओमान की खाड़ी में तेल टैंकर ‘स्काईलाइट’ पर हुए हमले में दो भारतीय नागरिकों की मौत हो गई है. ‘एनडीटीवी’ की रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों व्यक्तियों की पहचान बिहार के कैप्टन आशीष कुमार और राजस्थान के चालक दल के सदस्य दलीप सिंह के रूप में हुई है.
खबरों के मुताबिक, कुमार और सिंह की केवल हड्डियाँ बरामद की जा सकीं; हमले में उनके शरीर पूरी तरह जल गए थे. सरकार द्वारा दी गई जानकारी का हवाला देते हुए एनडीटीवी ने बताया कि आशीष की हड्डियाँ कैप्टन के केबिन से मिलीं. पलाऊ के ध्वज वाले इस तेल टैंकर पर 15 भारतीय और पाँच ईरानी नाविक सवार थे. इस पर ओमान के मुसंडम प्रायद्वीप के पास हमला किया गया, जो देश के दुक्म बंदरगाह पर हुए ड्रोन हमलों के ठीक बाद हुआ.
ओमान के समुद्री सुरक्षा केंद्र ने एक पोस्ट में कहा, “समुद्री सुरक्षा केंद्र घोषणा करता है कि पलाऊ गणराज्य के ध्वज वाले तेल टैंकर को मुसंडम गवर्नरेट में खसब बंदरगाह से 5 समुद्री मील उत्तर में निशाना बनाया गया था. टैंकर के सभी 20 चालक दल के सदस्यों—जिनमें 15 भारतीय और 5 ईरानी नागरिक शामिल थे—को निकाल लिया गया है.” हालांकि, इस पोस्ट में यह नहीं बताया गया कि टैंकर पर किस चीज़ से हमला किया गया था. इससे पहले दिसंबर 2025 में, ‘स्काईलाइट’ को अमेरिकी सरकार की प्रतिबंध सूची में शामिल किया गया था.
मिसाइल हमले में मुंबई के नाविक की मौत
क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर बढ़ते हमलों के बीच, 1 मार्च को हॉर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पाद टैंकर पर कथित मिसाइल हमले के बाद मुंबई के एक 33 वर्षीय नाविक की जान चली गई. मृतक की पहचान दीक्षित अमृतलाल सोलंकी के रूप में हुई है, जो जहाज पर ‘ऑयलर’ के रूप में काम कर रहे थे.
नेपाल में मतदान: ‘जेन-जी’ के हिंसक विरोध प्रदर्शनों के छह महीने बाद बदलाव की उम्मीद
नेपाल के लोगों ने नई संसद चुनने के लिए मतदान किया है. यह चुनाव उन हिंसक विरोध प्रदर्शनों के लगभग छह महीने बाद हो रहे हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया था.
‘अल जज़ीरा’ की रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार शाम 5 बजे मतदान समाप्त होने के बाद अधिकांश केंद्रों पर गिनती शुरू होनी थी और शुक्रवार तक शुरुआती रुझान आने की संभावना है. हालाँकि, पूर्ण परिणाम आने में एक सप्ताह का समय लग सकता है. कार्यवाहक मुख्य निर्वाचन आयुक्त राम प्रसाद भंडारी ने एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि प्रतिनिधि सभा के 275 सदस्यों को चुनने के लिए हुआ मतदान लगभग 60 प्रतिशत रहा. उन्होंने कहा, “अवरोध की कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़कर, चुनाव की निगरानी के लिए तैनात राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की प्रारंभिक रिपोर्ट भी संकेत देती है कि चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ है.” 2022 में हुए पिछले चुनावों में मतदान 61 प्रतिशत रहा था.
यह मतदान उन महीनों के बाद हो रहा है जब युवाओं के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों ने इस दक्षिण एशियाई देश को झकझोर कर रख दिया था. हजारों युवा नेपाली जवाबदेही, रोजगार और भ्रष्टाचार के अंत की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए थे. ‘जेन-जी’ के नेतृत्व वाले इन प्रदर्शनों में कम से कम 77 लोगों के मारे जाने की खबर थी.
मतदाता प्रतिनिधि सभा (संसद के निचले सदन) के 165 सदस्यों को सीधे चुन रहे हैं. 275 सदस्यीय सदन की शेष 110 सीटें समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से आवंटित की जाएंगी, जिसके तहत राजनीतिक दल प्राप्त वोटों के हिस्से के आधार पर सांसदों को नामित करते हैं.
पहली बार वोट देने वाली लुनिवा ने समाचार एजेंसी ‘द एसोसिएटेड प्रेस’ को बताया, “मैं मुख्य रूप से विरोध प्रदर्शनों के कारण वोट देने आई हूँ. बदलाव की उम्मीद में और एक बेहतर नेपाल देखने की आशा में इतने सारे लोगों ने अपनी जान दी है. मैं चाहती हूँ कि किए गए सभी बलिदानों के बदले मेरा देश बेहतर बने.”
रोजगार सृजन, भ्रष्टाचार पर लगाम और शासन में सुधार के वादे—जो सितंबर के विरोध प्रदर्शनों के दौरान उठाई गई मांगें थीं—चुनावी अभियान पर छाए रहे. राजनीतिक विश्लेषक पुरंजन आचार्य ने ‘रॉयटर्स’ को बताया, “जेन-जी विरोध प्रदर्शनों के दौरान व्यक्त की गई युवाओं की आकांक्षाओं को संबोधित करने के लिए यह चुनाव महत्वपूर्ण है. यदि नवनिर्वाचित नेता ऐसा करने में अक्षम दिखे, तो आगे और परेशानी का खतरा है.”
त्रिकोणीय मुकाबला
चार साल से भी कम समय पहले बनी मध्यमार्गी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को इस चुनाव में सबसे आगे और दो लंबे समय से हावी दलों—नेपाली कांग्रेस और पूर्व प्रधानमंत्री ओली की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल)—के लिए एक मजबूत चुनौती माना जा रहा है.
आरएसपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रैपर से नेता बने और काठमांडू के पूर्व मेयर बालेंद्र शाह हैं, जो 2025 के विद्रोह में एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे थे. ओली एक बार फिर मैदान में हैं, साथ ही 65 दलों के 3,400 से अधिक अन्य उम्मीदवार भी शामिल हैं. हालांकि, 35 वर्षीय शाह ने अभियान के दौरान भारी भीड़ जुटाई और बदलाव की मांग करने वाले युवा मतदाताओं की बड़ी तादाद से जुड़ाव बनाया.
नीतीश कुमार की बिहार की राजनीति से विदाई
अमित शाह के साथ ‘बिना हत्थे की कुर्सी’ पर बैठे; जदयू समर्थकों ने पार्टी कार्यालय में की तोड़फोड़
नीतीश कुमार गुरुवार को पटना में राज्यसभा के लिए अपना नामांकन दाखिल करने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ बिना हत्थे वाली (बिना आर्मरेस्ट की) कुर्सी पर बैठे.
तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए, बिहार के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री ने नामांकन दाखिल कर बिहार की राजनीति से अपनी विदाई का संकेत दे दिया. नीतीश के नामांकन दाखिल करने के लिए विधानसभा पहुँचने से पहले ही, जदयू समर्थकों ने पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ की, फर्नीचर और बर्तन तोड़ दिए. उनकी एकमात्र मांग थी: नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में बने रहते देखना. पिछले साल ही नीतीश ने 10वीं बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी.
‘पीटीआई’ के अनुसार, जदयू नेता राजीव रंजन पटेल ने कहा, “हम केवल नीतीश कुमार को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. हम उनके राज्यसभा जाने के खिलाफ हैं. इसके बजाय उनके बेटे निशांत कुमार राज्यसभा जा सकते हैं.”
नीतीश की विदाई के साथ, 243 सदस्यीय राज्य विधानसभा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन गई है, और संभावना है कि वह अपना मुख्यमंत्री बनाएगी. भाजपा के इस कदम का जदयू समर्थकों द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा है.
राजद (आरजेडी) नेता तेजस्वी यादव ने कहा, “2025 के विधानसभा चुनाव के समय से ही हम कह रहे थे कि भाजपा नीतीश कुमार को सीएम नहीं रहने देगी. यह आज सच साबित हो गया है. सत्ता का यह परिवर्तन जनादेश के खिलाफ है. जब नीतीश कुमार ने हमारे गठबंधन (महागठबंधन) को छोड़ा था, तब हमने कहा था कि भाजपा जदयू को निगल जाएगी. भाजपा ने जदयू को पूरी तरह खत्म कर दिया है.”
गुस्साए समर्थकों ने नीतीश से मिलने आए जदयू विधायकों को खदेड़ दिया और भाजपा के खिलाफ नारेबाजी की. समर्थकों ने “भाजपा होश में आओ” के नारे लगाए और अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों का भी विरोध किया.
तेजस्वी ने आगे कहा, “हमारी सहानुभूति नीतीश कुमार के साथ है. हमने चुनाव प्रचार के दौरान उन पर कोई व्यक्तिगत हमला नहीं किया था. हमने बस इतना कहा था कि दूल्हे का चेहरा नीतीश कुमार का है, लेकिन शादी किसी और के साथ होगी. भाजपा किसी भी एससी, एसटी या ओबीसी नेता को शीर्ष पद पर नहीं रहने देगी. वे पिछड़ी जातियों से किसी ऐसे नेता को चुनेंगे जो उनके ‘प्रॉक्सी’ (प्रतिनिधि) के रूप में काम करे.”
वहीं, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि नीतीश कुमार की यह “पदोन्नति” भाजपा के शीर्ष दो नेताओं द्वारा रची गई एक साजिश है. रमेश ने कहा, “इस साजिश के जरिए ‘जी-2’ ने राज्य की सत्ता पर कब्जा कर लिया है. यह जनता के जनादेश के साथ विश्वासघात है.”
संभल की शाही जामा मस्जिद को किसी पूर्व संरचना को गिराकर बनाने का दावा फेल; एएसआई के पास कोई रिकॉर्ड नहीं
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने केंद्रीय सूचना आयोग को बताया है कि उसके पास ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जो यह दर्शाता हो कि संभल की शाही जामा मस्जिद का निर्माण किसी पूर्व संरचना को गिराकर किया गया था या खाली जमीन पर. इसके साथ ही, एएसआई के पास निर्माण के समय भूमि के मालिक की पहचान करने वाले दस्तावेज़ भी उपलब्ध नहीं हैं.
“द टेलीग्राफ” की रिपोर्ट है कि नवंबर 2024 में अदालती आदेश पर किए गए एएसआई के एक सर्वेक्षण के कारण स्थानीय लोगों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें गोली लगने से चार लोगों की मौत हो गई थी. अदालत हिंदुओं की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें दावा किया गया था कि मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल के दौरान एक शिव मंदिर को गिराकर इस मस्जिद का निर्माण किया गया था. ऐसी भी शिकायतें थीं कि सर्वेक्षण टीम के साथ आए कुछ लोग “जय श्री राम” के नारे लगा रहे थे, जिससे क्षेत्र की अल्पसंख्यक आबादी आक्रोशित हो गई. इस हिंसा के सिलसिले में कई लोग अब भी जेल में हैं.
संभल जिला अदालत द्वारा नियुक्त एक आयोग ने कथित तौर पर 2024 की एक रिपोर्ट में कहा था कि संभल की शाही जामा मस्जिद में हिंदू धर्म से जुड़े प्रतीक पाए गए हैं, जो 1920 से एएसआई द्वारा संरक्षित है.
एक आरटीआई आवेदन में, संभल निवासी सत्य प्रकाश यादव ने यह जानना चाहा था कि क्या मुगल काल की इस मस्जिद का निर्माण किसी खंडहर को गिराकर किया गया था या खाली जमीन पर. साथ ही, उन्होंने उस समय के भूमि मालिक का नाम और स्वामित्व अधिकार प्रदान करने वाले दस्तावेजों की मांग की थी.
एएसआई ने अपने जवाब में कहा कि “इस कार्यालय में ऐसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.” मस्जिद के एएसआई के संरक्षण में आने के समय वहां निर्माण की प्रकृति, उसके बाद हुए किसी भी निर्माण और दरगाह से जुड़े पिछले विवादों से संबंधित सवालों पर एएसआई ने कहा कि उसके रिकॉर्ड में ऐसी जानकारी उपलब्ध नहीं है.
आवेदक ने मस्जिद के निर्माण काल के बारे में भी पूछा था. एएसआई ने जवाब दिया कि उसके रिकॉर्ड के अनुसार, “जामा मस्जिद संभल का निर्माण वर्ष 1526 में किया गया था” और इससे संबंधित सहायक सामग्री का हवाला दिया. क्या इस संरचना को पहले किसी अन्य नाम से जाना जाता था, इस पर विभाग ने कहा कि मस्जिद एएसआई द्वारा इसी नाम से संरक्षित की गई है.
संरचना की वर्तमान प्रकृति पर एक प्रश्न के उत्तर में, एएसआई ने कहा: “वर्तमान में, यह एक मस्जिद के रूप में अस्तित्व में है.” इसने आगे कहा कि एक गजट अधिसूचना का हवाला देते हुए जामा मस्जिद को 1920 में एएसआई के संरक्षण में लिया गया था.
केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष सुनवाई के दौरान, अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उपलब्धता न होने के आधार पर महत्वपूर्ण जानकारी को गलत तरीके से रोका गया है. एएसआई ने अपना रुख कायम रखा कि उसने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सभी जानकारी प्रदान कर दी है और उसे ऐसी जानकारी बनाने या एकत्र करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जो उसके द्वारा संधारित नहीं की गई है.
आपकी रसोई में युद्ध: ईरान पर अमेरिका-इज़राइल के हमले से भारत में रसोई ईंधन की कमी का डर
मध्य पूर्व में फैलता युद्ध जल्द ही भारतीय रसोइयों तक पहुँच सकता है. विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से टैंकरों की आवाजाही प्रभावी रूप से बाधित रहती है, तो घरेलू स्तर पर रसोई गैस (एलपीजी) की आपूर्ति में भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है. यह संकरा समुद्री मार्ग वह ‘चोकपॉइंट’ (अवरोध बिंदु) है, जहाँ से भारत के ऊर्जा आयात का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है.
परन बालाकृष्णन की रिपोर्ट के अनुसार, तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी), यानी सिलेंडरों में घरों तक पहुँचने वाला ईंधन, भारत की आपूर्ति श्रृंखला के सबसे संवेदनशील हिस्से के रूप में उभर रहा है. कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की तुलना में, एलपीजी की आपूर्ति अधिक सीमित है और इसके वैकल्पिक स्रोत भी कम हैं.
केपलर के प्रमुख शोध विश्लेषक सुमित रितोलिया ने कहा, “भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का लगभग 80% से 85% आयात करता है, जिसमें से अधिकांश खाड़ी देशों से आता है और लगभग पूरी तरह से हॉर्मुज मार्ग से होकर गुजरता है.” उन्होंने आगे कहा, “कच्चे तेल के विपरीत, भारत के पास उस पैमाने के ‘रणनीतिक एलपीजी भंडार’ नहीं हैं, जो एलपीजी के प्रवाह को रसद के नजरिए से अधिक असुरक्षित बनाता है.”
उन्होंने कहा कि एलपीजी की वैकल्पिक आपूर्ति खोजने के मामले में भारत के पास बहुत कम विकल्प हैं. हालांकि अमेरिका, रूस या अर्जेंटीना से कुछ अतिरिक्त खेप सुरक्षित की जा सकती हैं, लेकिन वे मात्रा में बहुत कम होंगी और पूरी तरह से माल ढुलाई लागत और स्पॉट मार्केट की उपलब्धता पर निर्भर करेंगी.
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि एलपीजी का वर्तमान स्टॉक लगभग 30 दिनों तक चल सकता है. लेकिन अगर मार्च के लिए निर्धारित खेप में देरी होती है और यदि लोग डर के मारे समय से पहले रिफिल बुकिंग शुरू कर देते हैं, तो यह राहत भरा समय तेजी से कम हो सकता है.
शहरी केंद्रों के वितरकों का कहना है कि उपभोक्ता अतिरिक्त सिलेंडर सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं. अधिकारियों ने लोगों से जमाखोरी न करने का आग्रह किया है और चेतावनी दी है कि घबराहट में की गई खरीदारी स्टॉक खत्म होने से पहले ही उपलब्धता पर दबाव डाल सकती है.
केपलर के आंकड़ों के अनुसार, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है और अपनी 90 प्रतिशत से अधिक खरीद के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है. विश्लेषकों का कहना है कि जब तक हॉर्मुज जलडमरूमध्य के पास फंसे हुए और मार्च में अनलोड होने वाले एलपीजी जहाज कुछ ही दिनों में अपनी यात्रा फिर से शुरू नहीं करते, तब तक वितरण की समस्या तेजी से उभर सकती है.
यद्यपि भारत ने अपने कच्चे तेल के आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाई है, फिर भी खाड़ी देशों से आने वाले तेल को ‘लॉजिस्टिकल’ (परिवहन संबंधी) लाभ प्राप्त है. खाड़ी से एक टैंकर को भारतीय बंदरगाहों तक पहुँचने में आमतौर पर पाँच से सात दिन लगते हैं, जबकि अटलांटिक क्षेत्र से आने वाली खेप में 25 से 45 दिन लग सकते हैं, जिससे माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है और जहाज भी लंबे समय तक व्यस्त रहते हैं.
फिलहाल, एलपीजी की तुलना में कच्चे तेल की आपूर्ति अधिक सुरक्षित स्थिति में है. भारत के पास कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का लगभग आठ सप्ताह का संयुक्त वाणिज्यिक और रणनीतिक भंडार है, जो शुरुआती व्यवधान से निपटने में मदद कर सकता है.
केपलर की ट्रैकिंग यह भी दिखाती है कि रूसी तेल की खेप हिंद महासागर और अरब सागर में उपलब्ध है, जिसमें ‘फ्लोटिंग स्टोरेज’ (समुद्र में जहाजों पर भंडारित तेल) भी शामिल है. यदि खाड़ी से होने वाली आवक में भारी कमी आती है, तो रिफाइनरियां अपेक्षाकृत तेज़ी से वापस रूसी कच्चे तेल के ग्रेड की ओर रुख कर सकती हैं.
ब्रेंट क्रूड की कीमतें $85 प्रति बैरल के ऊपर पहुँच गई हैं, जो स्तर आखिरी बार 2024 के मध्य में देखा गया था. कई ब्रोकरेज फर्मों का मानना है कि यदि तनाव बना रहता है तो कीमतें $80 से $90 के दायरे में रहेंगी, जबकि जेपी मॉर्गन चेस ने चेतावनी दी है कि यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से तेल के प्रवाह में निरंतर व्यवधान आता है, तो कच्चा तेल $120 प्रति बैरल तक पहुँच सकता है.
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है और इससे व्यापार घाटा बढ़ सकता है. इसके कारण पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है, जब तक कि सरकार सब्सिडी के माध्यम से इस बोझ को खुद न उठाए.
एलएनजी भी दबाव में है. भारत अपनी एलएनजी का लगभग 40 प्रतिशत कतर से प्राप्त करता है, जिसने उत्पादन पूरी तरह से बंद कर दिया है. एशियाई बाजारों में ‘स्पॉट एलएनजी’ की कीमतें बढ़ गई हैं, जहाँ हालिया कीमतें लगभग $25 प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट के आसपास हैं, जो कि कई दीर्घकालिक अनुबंध दरों से लगभग दोगुनी हैं.
देश की सबसे बड़ी एलएनजी आयातक कंपनी, पेट्रोनेट एलएनजी ने उत्पादन में व्यवधान और सुरक्षा जोखिमों के बीच कतर से आने वाली खेपों पर ‘फोर्स मेज्योर’ नोटिस जारी किया है. कतर एनर्जी ने भी अपने ग्राहकों को ‘फोर्स मेज्योर’ नोटिस जारी किए हैं.
ईरानी ड्रोन हमले के बाद कतर ने सोमवार को अपने रास लफान संयंत्र में एलएनजी उत्पादन बंद कर दिया, जो दुनिया की सबसे बड़ी निर्यात सुविधा है. ‘फोर्स मेज्योर’ एक अनुबंधात्मक प्रावधान है जो कंपनियों को तब अपनी डिलीवरी (आपूर्ति) निलंबित करने की अनुमति देता है जब युद्ध जैसी असाधारण घटनाएं अनुबंध को पूरा करना असंभव बना देती हैं.
पेट्रोनेट ने कहा, “मौजूदा सुरक्षा स्थिति और समुद्री नौवहन के लिए उत्पन्न भौतिक जोखिमों को देखते हुए, कंपनी ने अपने एलएनजी टैंकरों के संबंध में कतर एनर्जी को ‘फोर्स मेज्योर’ नोटिस जारी किया है.” गेल, इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम सहित भारतीय गैस कंपनियों ने औद्योगिक ग्राहकों को एलएनजी आवंटन में कटौती की चेतावनी दी है. बताया जा रहा है कि कुछ क्षेत्रों में 10 से 30 प्रतिशत तक की कटौती देखी गई है, जबकि घरों के लिए पाइप्ड गैस और सीएनजी के वितरण को प्राथमिकता दी जा रही है.
अधिकारियों का मानना है कि यदि हॉर्मुज में यह व्यवधान एक सप्ताह या उससे अधिक समय तक रहता है, तो स्टॉक का उपयोग करके और आपूर्ति को फिर से आवंटित करके उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले प्रभाव को संभाला जा सकता है. लेकिन यदि संकट लंबा खिंचता है, तो भारत को दूर स्थित आपूर्तिकर्ताओं पर अधिक निर्भर होना पड़ेगा, जिससे माल ढुलाई की लागत और डिलीवरी का समय बढ़ जाएगा. एक ऊर्जा विश्लेषक का कहना है, “हॉर्मुज ऊर्जा सुरक्षा नेटवर्क की एक मुख्य धमनी बना हुआ है. यदि वह धमनी बंद रहती है, तो आपूर्ति का दबाव बढ़ना तय है.”
पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति की चिंताओं के बीच, रूसी कच्चे तेल से लदे कुछ टैंकर भारत की ओर मुड़े
सुकल्प शर्मा की रिपोर्ट है कि पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही में आए भारी व्यवधान के बीच, ऐसे शुरुआती संकेत मिल रहे हैं कि भारत रूसी कच्चे तेल के अपने आयात को बढ़ा सकता है. जहाज ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, रूसी तेल से लदे दो कच्चे तेल के टैंकर, जो पहले अपने गंतव्य के रूप में पूर्वी एशिया को दिखा रहे थे, गुरुवार को भारतीय बंदरगाहों पर पहुँचे. एक अन्य टैंकर, जो अभी भी अपने गंतव्य के रूप में सिंगापुर को दिखा रहा है, प्रतीत होता है कि वह इसके बजाय भारत के पश्चिमी तट की ओर बढ़ रहा है. भारत ने हाल के महीनों में अमेरिका के साथ व्यापारिक वार्ताओं के बीच रूस से अपने तेल आयात में काफी कटौती की थी.
वेसल ट्रैकिंग डेटा से पता चला कि सिएरा लियोन के ध्वज वाले दो तेल टैंकर—’मतारी’ और ‘ओडून’—गुरुवार सुबह क्रमशः गुजरात के वाडिनार बंदरगाह और ओडिशा के पारादीप बंदरगाह पर पहुँचे. अनुमान है कि ये दोनों टैंकर मिलकर 14 लाख बैरल से अधिक रूसी कच्चा तेल ले जा रहे हैं. आंकड़ों के अनुसार, सिएरा लियोन ध्वज वाला एक और टैंकर—’इंद्री’ —स्पष्ट रूप से उत्तर की ओर भारत की तरफ मुड़ गया है, हालांकि यह अभी भी अपने गंतव्य के रूप में सिंगापुर का संकेत दे रहा है. अनुमान है कि ‘इंद्री’ लगभग 7 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल ले जा रहा है. ‘इंद्री’ और ‘ओडून’ रूस के प्रिमोरस्क बंदरगाह से रवाना हुए थे, जबकि ‘मतारी’ ने उस्त-लुगा बंदरगाह से अपनी यात्रा शुरू की थी.
विशेष रूप से, बुधवार को रूस के उप-प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने कहा कि यदि आवश्यकता पड़ती है, तो मास्को भारत और चीन से तेल की अतिरिक्त मांग को पूरा करने के लिए तैयार है. रूसी समाचार एजेंसी इंटरफैक्स की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व में संघर्ष बढ़ने के बीच क्या रूस भारत और चीन को तेल की आपूर्ति बढ़ाने की योजना बना रहा है, इस सवाल के जवाब में नोवाक ने कहा, “हमेशा तैयार हैं.” रिपोर्ट में नोवाक के हवाले से कहा गया, “हमारे तेल की मांग है. अगर वे खरीदेंगे, तो हम बेचेंगे.”
नजफ से कुम तक: अयातुल्ला खामेनेई, ईरान और भारत में शिया राजनीति
रविवार को जैसे ही अयातुल्ला अली होसैनी खामेनेई की हत्या की खबर सामने आई, कश्मीर घाटी और लद्दाख से लेकर उत्तरप्रदेश और कर्नाटक तक— देश के उन सभी शहरों और कस्बों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए जहाँ शिया मुस्लिम आबादी है.
भारत सहित दुनिया भर के शियाओं के लिए, खामेनेई केवल ईरान के “सर्वोच्च नेता” के रूप में एक राजनीतिक नेता ही नहीं थे, बल्कि एक धार्मिक नेता भी थे. शिया धर्मगुरुओं ने कहा कि समुदाय के लिए खामेनेई का महत्व वैसा ही था, जैसा ईसाइयों के लिए ‘पोप’ का होता है.
“द इंडियन एक्सप्रेस” में असद रहमान ने अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद भारत में शिया समुदाय की प्रतिक्रिया और ईरान के साथ उनके गहरे धार्मिक व राजनीतिक संबंधों का विश्लेषण किया है.
रहमान लिखते हैं कि दक्षिण एशिया के शिया मुस्लिम ऐतिहासिक रूप से दो बड़े केंद्रों से जुड़े रहे हैं. एक, इराक में नज़फ (जहाँ आयतुल्ला अली अल-सिस्तानी प्रमुख हैं) और दूसरा, ईरान में कुम (जहाँ खामेनेई का प्रभाव रहा है). 1979 की ईरानी क्रांति से पहले, शिया नेतृत्व का केंद्र नजफ था और राजनीति में उनका दखल कम था. लेकिन अयातुल्ला खुमैनी के आने और ‘विलायत-ए-फकीह’ (इस्लामी न्यायविद का शासन) के सिद्धांत के बाद, कुम एक प्रमुख राजनीतिक और धार्मिक शक्ति बन गया.
कश्मीर और कारगिल के शिया खामेनेई को अपना ‘वली-ए-फकीह’ (सर्वोच्च नेता) मानते हैं. लखनऊ के ‘रिज़वी सैयद’ और अवध क्षेत्र के शिया खुद को ईरान से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. लखनऊ में शिया समुदाय सामाजिक और राजनीतिक रूप से काफी प्रभावशाली है. भारत में शिया समुदाय (जो मुस्लिम आबादी का लगभग 15% है) पारंपरिक रूप से सत्तारूढ़ दलों, विशेषकर भाजपा के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है.
बाबरी मस्जिद विवाद के दौरान, शिया वक्फ बोर्ड ने सुन्नी वक्फ बोर्ड से अलग रुख अपनाया था और मंदिर के पक्ष में सुलह का प्रस्ताव दिया था. शिया धर्मगुरुओं (जैसे मौलाना यासूब अब्बास) ने खामेनेई की हत्या के लिए अमेरिका और इज़राइल के साथ-साथ कुछ अरब देशों (बहरीन, सऊदी अरब) की भी आलोचना की है. वे इसे केवल ईरान का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे शिया जगत पर हमला मान रहे हैं.
“शिया धर्मगुरुओं के अनुसार, समुदाय के लिए खामेनेई का महत्व वैसा ही था जैसा ईसाइयों के लिए ‘पोप’ का होता है. यद्यपि दक्षिण एशिया के कई शिया नजफ (इराक) के अयातुल्ला सिस्तानी का अनुसरण करते हैं, लेकिन 1979 की क्रांति के बाद से खामेनेई का भी इस उपमहाद्वीप में बड़ा प्रभाव रहा है.”
ओडिशा के सुंदरगढ़ में खनन विस्तार के ख़िलाफ़ आदिवासी, विरोध करने पर पुलिस कार्रवाई, कंपनी ने 28 एकड़ कृषि भूमि पर कब्जा किया
ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के लंजिबेर्ना गांव में आदिवासी ग्रामीण सीमेंट कंपनी डालमिया सीमेंट भारत लिमिटेड (डीसीबीएल) के खनन विस्तार का विरोध कर रहे हैं. यह रिपोर्ट मक़तूब के लिए पत्रकार निकिता जैन ने की है.
ग्रामीणों के अनुसार 25 फरवरी को ओडिशा पुलिस की चार प्लाटून और कथित तौर पर कंपनी से जुड़े लोग जेसीबी मशीनों के साथ गांव पहुंचे और विरोध के बावजूद खेतों की खुदाई शुरू कर दी. इससे पहले 13 दिसंबर 2025 को भी रात के समय भारी पुलिस मौजूदगी में कृषि भूमि को नुकसान पहुंचाया गया था. ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी ने खनन परियोजना के विस्तार के लिए 28 एकड़ कृषि भूमि पर कब्जा कर लिया है.
25 फरवरी की कार्रवाई के दौरान विरोध कर रहे कई लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया. इसके बाद 27 फरवरी को ग्रामीणों ने फिर विरोध किया और पुलिस के साथ झड़प हुई. कुछ वीडियो में पुलिस वाहनों पर पत्थर फेंकने की घटनाएं भी सामने आईं. ग्रामीणों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है.
लंजिबेर्ना में डालमिया समूह की कंपनी ओसीएल इंडिया (अब डालमिया सीमेंट) 1951 से चूना पत्थर और डोलोमाइट खनन कर सीमेंट उत्पादन कर रही है. 2017 में कंपनी ने अपने प्लांट की क्षमता 4.2 मिलियन टन प्रति वर्ष से बढ़ाकर 9.5 मिलियन टन करने और खनन क्षेत्र के विस्तार का प्रस्ताव दिया था. इसके लिए ओडिशा सरकार ने 2020 और 2021 में 990.67 एकड़ निजी कृषि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की, जो सात गांवों और पांच ग्राम पंचायतों में फैली है. यह क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची में आता है और यहां पेसा अधिनियम 1996 लागू होता है. 26 जनवरी 2020 को पांच ग्राम पंचायतों में हुई ग्राम सभाओं में खनन विस्तार का विरोध किया गया था.
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि अदालत में यह दिखाया गया कि लोगों ने परियोजना को मंजूरी दी है. कुछ मामलों में मृत लोगों के हस्ताक्षर और फर्जी सहमति के आरोप भी लगाए गए हैं. ग्रामीणों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 (एलआरआर) की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. 6 सितंबर 2024 को ओडिशा हाईकोर्ट ने खनन विस्तार रोकने की मांग वाली ग्रामीणों की याचिका खारिज कर दी थी. वहीं 2017-2022 की सीएजी रिपोर्ट में अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में कई खामियों की ओर इशारा किया गया था.
आरटीआई से खुलासा: कर्नाटक में चुनाव से पहले मोदी के एक दिन के दौरे पर 33 करोड़ रुपये खर्च हुए
कर्नाटक विधानसभा चुनाव से कुछ हफ्ते पहले, 27 फरवरी 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य के शिवमोगा में बने नए हवाई अड्डे का उद्घाटन किया था. उस समय राज्य में भाजपा की सरकार थी, जो बाद में चुनाव हार गई. इस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने लोगों से भविष्य में भी “डबल इंजन सरकार” को वोट देने की अपील की थी.
अब सूचना के अधिकार (आरटीआई) के ज़रिये तीन साल बाद सामने आए दस्तावेजों से पता चला है कि सिर्फ इस उद्घाटन कार्यक्रम पर ही करीब 18.81 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे. इसके अलावा यात्रा के दूसरे हिस्से पर 14.35 करोड़ रुपये और खर्च हुए. इस तरह एक दिन के इस दौरे पर कुल मिलाकर 33.16 करोड़ रुपये सार्वजनिक धन खर्च हुआ.
डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, इस खर्च में लोगों को कार्यक्रम स्थल तक लाने के लिए 1,800 बसें किराए पर ली गईं, जिन पर 4.11 करोड़ रुपये खर्च हुए. इसके अलावा मुख्य मंच और ग्रीन रूम के लिए वॉटरप्रूफ जर्मन स्ट्रक्चर ट्रस पंडाल, मॉडल प्रदर्शनी स्टॉल और प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री समेत अन्य नेताओं के लिए फूलों की सजावट पर 1.8 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए.
उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री विशेष विमान से बेलगावी गए और वहां से हेलीकॉप्टर से दोपहर में रोड शो के लिए रवाना हुए. हवाई यात्रा का पूरा खर्च उपलब्ध दस्तावेज़ों में शामिल नहीं है, लेकिन आरटीआई से मिले दूसरे दस्तावेज़ों के अनुसार यात्रा के इस हिस्से पर 14.35 करोड़ रुपये खर्च हुए, जिसमें लोगों को कार्यक्रम में लाने के लिए 2.5 करोड़ रुपये बसों पर खर्च किए गए.
यह जानकारी आरटीआई कार्यकर्ता और पारदर्शिता पर किताब लिख चुके मंजूनाथ हिरेचौट्टी को मिली, जो “लंचामुक्त कर्नाटक” संगठन से जुड़े हैं. उन्होंने मार्च 2023 में आरटीआई आवेदन किया था, लेकिन राज्य सूचना आयोग से अनुकूल आदेश मिलने के बाद उन्हें इसका जवाब जनवरी 2026 में मिला.
आरटीआई से यह भी पता चला कि लोक निर्माण विभाग ने कर्नाटक ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक प्रोक्योरमेंट एक्ट की धारा 4(जी) का हवाला देकर टेंडर प्रक्रिया से खुद को छूट दे दी थी.
मंजूनाथ हिरेचौट्टी ने ‘डेक्कन हेराल्ड’ से कहा, “सार्वजनिक धन चुनाव प्रचार का साधन नहीं होना चाहिए. विकास परियोजनाओं को चुनाव से पहले राजनीतिक प्रचार के मंच में नहीं बदला जाना चाहिए. भारत में चुनाव से पहले खर्च पर नियंत्रण का कानूनी तंत्र होना चाहिए, क्योंकि आचार संहिता लागू होने से पहले वित्तीय नियंत्रण नहीं होता. अगर सुधार नहीं हुआ तो करदाताओं पर ऐसे खर्च का बोझ पड़ता रहेगा.”जब इस खर्च के बारे में उस समय के लोक निर्माण मंत्री सी.सी. पाटिल से पूछा गया, जो भाजपा सरकार में मंत्री थे, तो उन्होंने कहा कि उन्हें सही खर्च याद नहीं है.
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