06/01/2026: चुनाव आयोग का गड़बड़ सॉफ्टवेयर | ममता ने कहा भाजपा के एप्स का इस्तेमाल | कविता की पार्टी अलग | अजीत पवार और सावरकर | मुस्तफिजुर चला पाकिस्तान | ट्रंप का खेल और चीन के दांव वेनेजुएला में
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आज की सुर्खियां
चुनाव आयोग की गलती: बिना जांचे सॉफ्टवेयर ने बंगाल और एमपी में 3.66 करोड़ वोटर्स को ‘संदिग्ध’ बताया.
ममता बनाम चुनाव आयोग: ममता बनर्जी का आरोप- आयोग मतदाता हटाने के लिए भाजपा के ऐप का इस्तेमाल कर रहा है.
यूपी मतदाता कटौती: यूपी में 2.89 करोड़ (18.7%) मतदाताओं के नाम सूची से हटे, कारण- मृत्यु और पलायन.
के. कविता का कदम: पूर्व बीआरएस नेता ने तेलंगाना में नई पार्टी लॉन्च की, केसीआर की विरासत को चुनौती.
टीएमसी को झटका: मौसम नूर की कांग्रेस में वापसी; मालदा और मुर्शिदाबाद में अल्पसंख्यक वोट बैंक पर असर संभव.
हिमाचल हाईकोर्ट का फैसला: पाकिस्तान से शांति की चाहत रखना या युद्ध की आलोचना करना राजद्रोह नहीं है.
वेनेजुएला संकट: ट्रंप की आक्रामक नीति से चीन का 100 अरब डॉलर का निवेश खतरे में; खनिजों पर नज़र.
क्रिकेट कूटनीति: भारत-बांग्लादेश तनाव के बीच मुस्तफिजुर रहमान आईपीएल से बाहर, पीएसएल में शामिल.
इंदौर जल त्रासदी: भारत के ‘सबसे स्वच्छ शहर’ में दूषित पानी से मौतों पर हाईकोर्ट ने एमपी सरकार को फटकारा.
चुनाव आयोग के गड़बड़ सॉफ्टवेयर ने 3.66 करोड़ मतदाताओं को संदिग्ध बताया
‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ की खोजी रिपोर्ट के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग द्वारा बिना किसी लिखित प्रोटोकॉल या मैनुअल के तैनात किए गए एक अपरीक्षित सॉफ्टवेयर ने पश्चिम बंगाल में 1.31 करोड़ (कुल का 17.11%) और मध्य प्रदेश में 2.35 करोड़ (कुल का 41.22%) मतदाताओं को ‘संदिग्ध’ करार दिया है. आयुषी कार और नितिन सेठी की रिपोर्ट पुष्टि करती है कि विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) वाले 10 अन्य राज्यों में भी करोड़ों मतदाता प्रभावित हुए हैं, जिन्हें आयोग ने “तार्किक विसंगतियां” नाम दिया. यह डेटा पहली बार सार्वजनिक हुआ है, जिसे आयोग ने अब तक छिपा रखा था.
आयुषी कार और नितिन सेठी के मुताबिक यह सॉफ्टवेयर 20 साल से पुरानी मतदाता सूचियों के जल्दबाजी में किए गए डिजिटलीकरण पर निर्भर था, जिसकी गुणवत्ता की विस्तृत जांच नहीं की गई थी. एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि इससे सॉफ्टवेयर ने गलत तरीके से मतदाताओं को संदिग्ध बताया. आयोग के नियमों के मुताबिक संदेह होने पर जमीनी सत्यापन और सुनवाई जरूरी है, लेकिन इस बार कंप्यूटर जनित संदेहों को दूर करने के लिए सबूतों का कोई मानक नहीं बताया गया. संदिग्ध मामलों की भारी तादाद से परेशान होकर राज्यों ने जांच छोड़ दी और मामला बीएलओ के ‘विवेक’ पर छोड़ दिया गया. आयोग ने प्रक्रिया के दौरान सॉफ्टवेयर में बार-बार बदलाव भी किए.
पश्चिम बंगाल में संदिग्धों की संख्या दिसंबर में 1.31 करोड़ थी जो जनवरी तक घटकर 95 लाख हो गई, लेकिन बीच के 34 लाख मामले कैसे सुलझे, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है. यह पहली बार है जब अपारदर्शी एल्गोरिदम ने बिना सुरक्षा प्रोटोकॉल के करोड़ों मतदाताओं के अधिकारों पर सवाल उठाए. ‘मैपिंग’ प्रक्रिया में मतदाताओं को 2003 की सूची से संबंध साबित करना था. सॉफ्टवेयर ने उन मामलों को रेड-फ्लैग किया जहां एक पूर्वज से 6 से ज्यादा लोग जुड़े थे, माता-पिता और बच्चे की उम्र में 15-45 साल से कम/ज्यादा का अंतर था, या नाम/लिंग में बेमेल था.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दावा किया था कि ‘डिजिटल प्री-मैपिंग’ बोझ कम करेगी, लेकिन जमीनी हकीकत अलग रही. पुरानी सूचियों के डिजिटलीकरण की सटीकता (60% से 95%) अज्ञात थी, जिससे गलत चेतावनियां बनीं. श्रीनिवास कोडाली के अनुसार, बिना एल्गोरिदम के खुलासे के सटीकता नहीं जांची जा सकती. विडंबना यह है कि आयोग ने पहले बिहार मामले में सुप्रीम कोर्ट में ऐसे ही एल्गोरिदम को ‘अविश्वसनीय’ और ‘गलत फ्लैग्स’ वाला बताकर खारिज किया था, लेकिन अब खुद उसी नीति को लागू कर दिया.
आयोग ने अधिकारियों को किसी भी मतदाता की जांच करने का ‘स्वप्रेरणा’ अधिकार दे दिया. पश्चिम बंगाल में फ्लैग किए गए 95 लाख में से केवल 24 लाख को समन भेजे जाएंगे, लेकिन इसके मानदंड गुप्त हैं. सबसे बड़ी समस्या यह है कि जमीनी अधिकारियों को कोई लिखित निर्देश (SOP) नहीं दिया गया कि “तार्किक विसंगतियों” को कैसे हल करें या कौन सा सबूत मान्य होगा. जिला अधिकारियों द्वारा लिखित मार्गदर्शन मांगने के बावजूद रिपोर्ट प्रकाशित होने तक आयोग ने कोई निर्देश जारी नहीं किया है.
ममता बनर्जी का विस्फोट- मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए चुनाव आयोग कर रहा भाजपा के ‘एप्स’ का अवैध इस्तेमाल
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार (6 जनवरी, 2026) को चुनाव आयोग (ECI) पर बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए हैं. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सागर द्वीप के अपने दो दिवसीय दौरे के समापन पर ममता ने कहा कि राज्य में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (एसआईआर) में चुनाव आयोग भाजपा की आईटी सेल द्वारा विकसित मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग कर रहा है, जो पूरी तरह अवैध, अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है.
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग जानबूझकर शरारतपूर्ण कदम उठा रहा है. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया के जरिए योग्य और जीवित मतदाताओं को भी मतदाता सूची में ‘मृत’ घोषित किया जा रहा है. इतना ही नहीं, बुजुर्गों और बीमार लोगों को सुनवाई के लिए केंद्रों पर बुलाकर परेशान किया जा रहा है. तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ने कड़े शब्दों में कहा, “यह मनमाना रवैया बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. भाजपा की आईटी सेल के एप का इस्तेमाल चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है.”
यह आरोप ऐसे समय में आया है जब तृणमूल कांग्रेस और चुनाव आयोग के बीच तल्खी अपने चरम पर है. ममता के आरोपों को बल देते हुए टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर दावा किया है कि चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए “मनमाने और प्रक्रियात्मक रूप से अनियमित” तरीकों का सहारा ले रहा है. ममता बनर्जी ने जनता से अपील की है कि वे इस प्रक्रिया के दौरान सतर्क रहें और एक-दूसरे की मदद करें. उन्होंने कहा, “आपको मेरा समर्थन करने की जरूरत नहीं है, लेकिन उन लोगों के साथ खड़े रहें जो इस कवायद की वजह से मुसीबत में हैं.” मुख्यमंत्री ने सोमवार को ही स्पष्ट कर दिया था कि वे इस प्रशासनिक मनमानी, जिससे कथित तौर पर लोगों की मौतें और अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आई है, के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगी.
एसआईआर में यूपी से 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए
उत्तरप्रदेश में मतदाता सूची के विवादास्पद ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के बाद मंगलवार को प्रकाशित प्रारंभिक मतदाता सूची से 2.89 करोड़ मतदाताओं को हटा दिया गया है, जो राज्य के कुल मतदाताओं का 18.70 प्रतिशत हैं.
विशेष गहन पुनरीक्षण के प्रारंभिक चरण के बाद, उत्तरप्रदेश देश में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की सूची में शीर्ष पर रहा है. पहले कुल 15.44 करोड़ मतदाता सूचीबद्ध थे, जिनमें से अब 12.55 करोड़ मतदाताओं ने प्रारंभिक सूची में अपनी जगह बनाई है.
“द न्यू इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार, राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) ने दावा किया कि मृत्यु, स्थायी प्रवास या एक से अधिक पंजीकरण के कारण इन 2.89 करोड़ मतदाताओं को प्रारंभिक सूची में शामिल नहीं किया जा सका. सीईओ के अनुसार, 46.23 लाख मतदाता (2.99 प्रतिशत) मृत पाए गए, जबकि 2.57 करोड़ मतदाता (14.06 प्रतिशत) या तो स्थायी रूप से पलायन कर चुके थे या सत्यापन प्रक्रिया के दौरान उपलब्ध नहीं थे. अन्य 25.47 लाख मतदाता (1.65 प्रतिशत) एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत पाए गए.
के. कविता ने बनाई नई पार्टी, केसीआर की विरासत और हरीश राव को देंगी सीधी चुनौती
तेलंगाना की राजनीति में एक बड़े और निर्णायक उलटफेर के तहत, पूर्व सांसद और पूर्व एमएलसी के. कविता ने सोमवार (5 जनवरी) को औपचारिक रूप से अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा कर दी है. ‘द वायर’ और ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) से अलग होने के बाद कविता का यह कदम उनके पिता के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) की विरासत के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है. कविता ने अपनी रणनीतिक मंशा जाहिर करते हुए संकेत दिया है कि वे सिड्डीपेट विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ सकती हैं. सिड्डीपेट का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह न केवल उनके पिता केसीआर का राजनीतिक लॉन्चपैड रहा है, बल्कि वर्तमान में यह उनके चचेरे भाई और बीआरएस के कद्दावर नेता टी. हरीश राव का अभेद्य किला माना जाता है.
विचारधारा की लड़ाई, सत्ता का संघर्ष नहीं
सोमवार को विधान परिषद के बाहर मीडिया से बात करते हुए कविता ने अपने इस्तीफे को ‘सियासी’ नहीं बल्कि ‘वैचारिक आवश्यकता’ बताया. उन्होंने एक नई बहस छेड़ते हुए कहा कि “भौगोलिक तेलंगाना” तो राज्य बनने के साथ मिल गया, लेकिन “सामाजिक तेलंगाना” का सपना अब भी अधूरा है. बीआरएस पर तीखा हमला बोलते हुए उन्होंने कहा, “हम राज्य में एक नई राजनीतिक व्यवस्था खड़ी करेंगे. बीआरएस, जिसे हम तेलंगाना की जनता की पार्टी मानते थे, उसने कई मुद्दों पर हमारे साथ विश्वासघात किया है और हमारी आकांक्षाओं को कुचला है.”
विधान परिषद में अपने विदाई भाषण के दौरान कविता काफी भावुक नजर आईं. उन्होंने बतुकम्मा उत्सव के बाद पार्टी द्वारा उन पर लगाए गए प्रतिबंधों का जिक्र किया और कहा, “मैं यह सदन छोड़ रही हूं, लेकिन मैं एक ताकत बनकर लौटूंगी.” उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कांग्रेस उनके इस्तीफे को ‘संपत्ति विवाद’ बता रही है, जबकि यह लड़ाई ‘आत्म-सम्मान’ की है. 2 जनवरी को अपने इस्तीफे का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने दो टूक कहा था, “भले ही केसीआर मुझे बुलाएं, मैं उस पार्टी में नहीं लौटूंगी.” उन्होंने खुद को जमीनी नेता बताते हुए केटीआर और हरीश राव पर केवल ‘केसीआर के निर्देशों पर काम करने’ का आरोप लगाया.
राजनीतिक प्रभाव और बीआरएस का पलटवार
बीआरएस ने भी इस हमले का जवाब देने में देर नहीं की. पूर्व विधायक गोंगीडी सुनीता और अन्य महिला नेताओं ने कविता पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने का आरोप लगाया. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कविता यदाद्री लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी की कसम खाकर कह सकती हैं कि उनका दिल्ली शराब नीति मामले में कोई हाथ नहीं है? विश्लेषकों का मानना है कि कविता का अपना वोट बैंक भले ही कम हो, लेकिन उनकी “नुइसेंस वैल्यू” (nuisance value) बहुत ज्यादा है. के. नागेश्वर जैसे विश्लेषकों का कहना है कि कविता का अलग होना और भ्रष्टाचार के आरोप लगाना परोक्ष रूप से कांग्रेस के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को फायदा पहुंचा सकता है, खासकर उन सीटों पर जहां हार-जीत का अंतर बहुत कम होता है.
मौसम नूर ने टीएमसी छोड़ी, कांग्रेस में वापसी से मालदा और मुर्शिदाबाद में बदलेंगे समीकरण
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को एक बड़ा रणनीतिक झटका लगा है. ‘द वायर’ की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, राज्यसभा सांसद और मालदा के प्रभावशाली गनी खान चौधरी परिवार की वारिस मौसम बेनजीर नूर ने टीएमसी छोड़कर वापस अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस का दामन थाम लिया है. मौसम नूर ने सोमवार को राज्यसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया. पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि “बंगाल को एक राजनीतिक बदलाव की सख्त जरूरत है और वे इसकी शुरुआत खुद से कर रही हैं.” उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा ही उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी रहेगी, लेकिन टीएमसी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि वहां काम करना मुश्किल हो गया था.
मौसम नूर का जाना टीएमसी के लिए केवल एक नेता का जाना नहीं है, बल्कि यह मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में पार्टी की पकड़ कमजोर होने का संकेत है. 2024 के लोकसभा चुनावों में टीएमसी मालदा की दोनों सीटें (मालदा उत्तर और मालदा दक्षिण) हार गई थी, जबकि कांग्रेस ने वहां अपनी पकड़ बनाए रखी. राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने ‘द वायर’ को बताया कि यह घटना एक ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हो सकती है. टीएमसी के ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ (जैसे मंदिर निर्माण पर जोर देना) और हाल ही में ओबीसी आरक्षण सूची से कई मुस्लिम जातियों के बाहर होने और वक्फ बोर्ड के मुद्दों पर राज्य सरकार के रवैये से अल्पसंख्यक समुदाय में नाराजगी बढ़ रही है. जहां टीएमसी के स्थानीय नेता कृष्णेंदु नारायण चौधरी ने नूर के प्रभाव को खारिज करते हुए कहा कि “उन्होंने पिछले कुछ सालों में कोई संगठनात्मक काम नहीं किया और उन्हें अपने दम पर राजनीति करनी चाहिए,” वहीं कांग्रेस खेमे में उत्साह है. मालदा कांग्रेस के नेता मुश्ताक आलम ने कहा कि “टीएमसी 2018 से ही पुलिस के दम पर चुनाव लूट रही है, अब लोगों का मोहभंग हो रहा है.” नूर की वापसी को नई दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में जयराम रमेश और गुलाम अहमद मीर जैसे वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में अंजाम दिया गया, जो यह दर्शाता है कि कांग्रेस बंगाल में अपने खोए हुए जनाधार, विशेषकर अल्पसंख्यक वोटों को वापस पाने के लिए कितनी गंभीर है.
हिमाचल हाईकोर्ट का अहम फैसला: ‘पाकिस्तान के साथ शांति की चाहत रखना, युद्ध की आलोचना राजद्रोह नहीं है’
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खबर के मुताबिक, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद की बहस के बीच हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है. जस्टिस राकेश कैंथला की अदालत ने राजद्रोह के एक मामले में आरोपी अभिषेक सिंह भारद्वाज को जमानत देते हुए स्पष्ट किया कि पाकिस्तान के साथ शत्रुता खत्म करने और शांति की इच्छा रखना राजद्रोह (Sedition) की श्रेणी में नहीं आता.
मामला यह था कि याचिकाकर्ता पर फेसबुक पर प्रतिबंधित हथियारों और पाकिस्तान के झंडे की तस्वीरें पोस्ट करने और एक अन्य व्यक्ति नियाज खान के साथ चैट में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को गलत बताने का आरोप था. उसने चैट में कथित तौर पर खालिस्तान का समर्थन भी किया था.
अदालत ने आरोपी की दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि दो व्यक्तियों के बीच की निजी बातचीत, जिसमें वे युद्ध की आलोचना कर रहे हैं और यह कह रहे हैं कि “सभी धर्मों के लोगों को मिलजुलकर रहना चाहिए,” राजद्रोह नहीं हो सकता. जस्टिस कैंथला ने टिप्पणी की, “यह समझना मुश्किल है कि शत्रुता को समाप्त करने और शांति की वापसी की इच्छा रखना राजद्रोह कैसे हो सकता है.” कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी के पास से कोई भी प्रतिबंधित हथियार बरामद नहीं हुआ और न ही उसने सरकार के खिलाफ नफरत भड़काने वाला कोई सार्वजनिक भाषण दिया. जहां तक “खालिस्तान जिंदाबाद” के नारे का सवाल है, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल नारे लगाना जब तक कि हिंसा न भड़के, राजद्रोह नहीं है. आरोपी को कुछ शर्तों के साथ जमानत दे दी गई है.
क्रिकेट डिप्लोमेसी: ‘ऊपर’ से आया था फैसला, मुस्तफिजुर रहमान को हटाने से बढ़ा कूटनीतिक विवाद
बीसीसीआई के एक शीर्ष अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मुस्तफिजुर को हटाने का फैसला सामान्य क्रिकेटिंग निर्णय नहीं था, बल्कि यह “ऊपरी स्तर” से आया था और इसमें आईपीएल गवर्निंग काउंसिल तक को विश्वास में नहीं लिया गया था. गौरतलब है कि केकेआर द्वारा मुस्तफिजुर को 9.20 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड कीमत में खरीदे जाने के बाद भारत में दक्षिणपंथी समूहों और संतों ने केकेआर के मालिक शाहरुख खान को ‘राष्ट्रविरोधी’ कहते हुए निशाना बनाया था. क्रिकेट अब महज खेल नहीं रह गया है, बल्कि यह बहुसंख्यकवादी राजनीति का हथियार बन चुका है. जिस तरह 2008 के बाद पाकिस्तानी खिलाड़ियों को आईपीएल से बाहर किया गया था, अब वही पैटर्न बांग्लादेश के साथ दोहराया जा रहा है. बांग्लादेश सरकार के सलाहकारों ने इसे अपने नागरिकों और देश का अपमान बताया है. गुस्से में प्रतिक्रिया देते हुए बांग्लादेश ने 2026 टी20 वर्ल्ड कप के लिए अपनी टीम को भारत न भेजने और आईसीसी से अपने मैच किसी तटस्थ स्थान पर कराने की मांग की है.
अब पाकिस्तान सुपर लीग में खेलेगा मुस्तफिजुर
श्रीहरि मेनन की रिपोर्ट है कि मुस्तफिजुर रहमान ने कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) के साथ अपना अनुबंध रद्द होने के बाद खुद को पीएसएल (पाकिस्तान सुपर लीग) 2026 के लिए उपलब्ध कराया है. भारत और बांग्लादेश के बीच बढ़ते तनाव के बीच, आईपीएल 2026 से पहले फ्रैंचाइजी द्वारा रहमान को रिलीज कर दिया गया था. यह बाएं हाथ का तेज गेंदबाज अब पाकिस्तान जा रहा है. मुस्तफिजुर ने आखिरी बार 2017/18 सीजन के दौरान पीएसएल खेला था.
भारतीय वर्क परमिट पर प्रतिबंध लगाने के लिए बांग्लादेश में रैली
मारे गए छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की पार्टी ने मंगलवार को ढाका में उनकी हत्या के लिए न्याय की मांग करते हुए और अन्य उपायों के साथ-साथ बांग्लादेश में रहने वाले सभी भारतीयों के वर्क परमिट रद्द करने की मांग को लेकर दिन भर की रैली निकाली. अपनी चार सूत्री मांगों के हिस्से के रूप में, ‘इंकलाब मंच’ ने उन कथित हत्यारों के प्रत्यर्पण की भी मांग की, जिनके बारे में उसका दावा है कि उन्होंने भारत में शरण ली है. ‘पीटीआई’ के अनुसार, संगठन ने चेतावनी दी कि यदि नई दिल्ली उन्हें सौंपने से इनकार करती है, तो ढाका को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) का रुख करना चाहिए. हालांकि, भारतीय अधिकारियों ने हादी के हत्यारों के भारत में प्रवेश करने के दावों को खारिज कर दिया था और कहा था कि अवैध सीमा आवाजाही का कोई सबूत नहीं है.
वेनेजुएला में चीन का बहुत कुछ दांव पर लगा है, $100 बिलियन का कर्ज, चरमराती अर्थव्यवस्था
अमेरिका द्वारा अपना सैन्य अभियान शुरू करने और निकोलस मादुरो को “पकड़ने” से कुछ घंटे पहले, वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति लैटिन अमेरिकी मामलों पर चीन के विशेष प्रतिनिधि, किउ जिओकी के साथ बैठक कर रहे थे. केशव पद्मनाभन ने लिखा है कि बीजिंग के लिए वेनेजुएला में बहुत कुछ दांव पर लगा है, जिसमें लगभग 105.6 बिलियन डॉलर के ऋण और अन्य वित्तीय सहायता शामिल है.
बीजिंग ने अमेरिका के इस अभियान की निंदा करते हुए दावा किया कि ऐसे “आधिपत्यवादी कृत्य अंतरराष्ट्रीय कानून और वेनेजुएला की संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन करते हैं.” चीन के बयान में आगे कहा गया, “हम अमेरिका से अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों का पालन करने और अन्य देशों की संप्रभुता एवं सुरक्षा का उल्लंघन बंद करने का आव्हान करते हैं.”
दरअसल, डोनाल्ड ट्रम्प के राजनीतिक परिदृश्य पर आने से बहुत पहले, कराकास (वेनेजुएला की राजधानी) ने चीन के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे, जिससे बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण में अरबों डॉलर आए, क्योंकि पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के पेट्रो-समाजवाद के तहत वेनेजुएला समृद्ध हुआ था. लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में नए बाजारों के साथ मिलकर इन ऋणों ने वेनेजुएला को उस क्षेत्र में चीन की पहुंच का एक प्रमुख भागीदार बना दिया, जिसे लंबे समय से अमेरिका का “प्रभाव क्षेत्र” माना जाता रहा है.
क्षेत्र के देशों ने चीन से अरबों डॉलर की सहायता प्राप्त की है, क्योंकि बीजिंग ने लैटिन अमेरिका में अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रयासों को तेज कर दिया है. ऊर्जा परियोजनाओं से लेकर बुनियादी ढांचे और अंतरिक्ष जैसे उच्च-तकनीकी क्षेत्रों तक, बीजिंग ब्राजील, चिली और वेनेजुएला जैसे देशों के लिए एक प्रमुख भागीदार रहा है.
पिछले साल मई में, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस क्षेत्र में अमेरिका की लंबी पहुंच का मुकाबला करने के प्रयासों के तहत लैटिन अमेरिकी और कैरिबियन राज्यों के समुदाय (सीईएलएसी) के लिए 9.2 बिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन का वादा किया था. सीईएलएसी एक संगठन है, जिसमें इस क्षेत्र के 33 सदस्य देश शामिल हैं.
लैटिन अमेरिका और कैरिबियन (एलएसी) क्षेत्र के लगभग 30 देशों के प्रतिनिधियों ने चीन- सीईएलएसी फोरम की चौथी मंत्रिस्तरीय बैठक में भाग लिया. अपने विजन के हिस्से के रूप में, चीन ने हवाई अड्डों, बंदरगाहों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के निर्माण में मदद करने के लिए दक्षिण अमेरिका में अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) को आगे बढ़ाया है. राष्ट्रपति शी द्वारा बीआरआई को “सदी की परियोजना” के रूप में प्रचारित किया गया है और अपनी शुरुआत के एक दशक में इसने दुनिया भर में 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का ऋण दिया है.
अमेरिकी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस द्वारा प्रकाशित अनुमानों के अनुसार, 2002 और 2021 के बीच, एलएसी देशों के साथ चीन का कुल व्यापार 18 बिलियन डॉलर से बढ़कर लगभग 449 बिलियन डॉलर हो गया. उदाहरण के लिए, लैटिन अमेरिका से होने वाले निर्यात में मुख्य रूप से प्राकृतिक संसाधन (42 प्रतिशत) और सोयाबीन (16 प्रतिशत) शामिल थे, जबकि बीजिंग ने बिजली की मशीनरी और उपकरणों का निर्यात किया.
2009 में चीन ब्राजील के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार के रूप में अमेरिका से आगे निकल गया. क्षेत्र में इसका एक लक्ष्य ताइवान को अलग-थलग करना भी है, क्योंकि स्व-शासित क्षेत्र (ताइवान) को मान्यता देने वाले 12 देशों में से अधिकांश दक्षिण अमेरिका और कैरिबियन से हैं. इसके अलावा, यह क्यूबा और वेनेजुएला की सरकारों को सहारा देने में भी महत्वपूर्ण रहा है.
कर्ज देने की रफ्तार बनी रही
बीजिंग की इस पहुँच की कुंजी वेनेजुएला है. 2006 में, जब राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज वेनेजुएला की सत्ता में थे, तब कराकास ने चीन के साथ कई व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए और घोषणा की कि बीजिंग अमेरिकी आधिपत्य के खिलाफ एक “महान दीवार” है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वेनेजुएला चीन को प्रतिदिन दस लाख बैरल तेल निर्यात करने पर सहमत हुआ, जबकि बीजिंग ने उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक अस्थायी सदस्य सीट के लिए कराकास की दावेदारी का समर्थन करने का वादा किया था.
कराकास ने उस समय बीजिंग को तेल की पेशकश की जब चीन की अर्थव्यवस्था विकसित हो रही थी और वैश्विक विनिर्माण की धुरी बन रही थी. 1990 के दशक की शुरुआत में तेल का शुद्ध निर्यातक होने के बाद, चीन 1993 में तेल का शुद्ध आयातक बन गया और 2008 तक, अपनी तेल आवश्यकताओं के आधे हिस्से के लिए आयात पर निर्भर हो गया.
चीन और शावेज के बीच साझेदारी के कारण बीजिंग ने वेनेजुएला को अरबों डॉलर का कर्ज दिया. अमेरिका के ‘कॉलेज ऑफ विलियम एंड मैरी’ की एक शोध प्रयोगशाला ‘एडडेटा’ के अनुसार, 2006 में चीन ने वेनेजुएला को 2 बिलियन डॉलर का ऋण दिया, जो अगले वर्ष बढ़कर 7 बिलियन डॉलर हो गया.
‘एडडेटा’ के मुताबिक, 2009 में चीन ने 8 बिलियन डॉलर का और ऋण दिया और अगले वर्ष देश को लगभग 27 बिलियन डॉलर उधार दिए. बीजिंग की इस दरियादिली ने वेनेजुएला में निवेश का प्रवाह जारी रखा, जिसके बदले इस दक्षिण अमेरिकी देश का तेल गिरवी रखा गया था.
2007 में, चीन और वेनेजुएला ने 6 बिलियन डॉलर का एक संयुक्त कोष स्थापित किया—जिसमें चीन विकास बैंक (सीडीबी) से 4 बिलियन डॉलर का ऋण और कराकास द्वारा स्थापित ‘एल फोंडो डी डेसरोलो नेशनल एस.ए.’ (फोनडेन) से 2 बिलियन डॉलर शामिल थे. ऋण की अदायगी की सुरक्षा के रूप में वेनेजुएला की सरकारी तेल उत्पादक कंपनी ‘पीडीवीएसए’ द्वारा चीन को तेल की खेप भेजना तय हुआ था, जो ऋण की अवधि तक या ऋण पूरी तरह चुकाए जाने तक जारी रहनी थी.
दो साल बाद, दोनों सरकारें सीडीबी से 4 बिलियन डॉलर के अतिरिक्त ऋण और फोनडेन से पहले के समझौते के बराबर राशि के माध्यम से इस कोष में उपलब्ध धन को दोगुना करके 12 बिलियन डॉलर करने पर सहमत हुईं.
संयुक्त कोष के समझौते के तहत एक ‘पेट्रोलियम बिक्री समझौता’ भी था, जिसमें ‘पीडीवीएसए’ द्वारा चाइनाऑइल को पूर्व-सहमत कीमत पर प्रतिदिन कम से कम 1,00,000 बैरल तेल बेचने का वादा किया गया था. ऐसे समझौते तब आम थे जब चीन ने वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था में निवेश करना शुरू किया था.
अन्य समझौतों में 2014 में कई परियोजनाओं के लिए ‘पीडीवीएसए’ को 1 बिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन और उसी वर्ष कार्यशील पूंजी के उद्देश्यों के लिए राज्य के तेल निर्माताओं को 1.5 बिलियन डॉलर का ऋण शामिल है, जिन्हें ‘एडडेटा’ द्वारा प्रलेखित किया गया है. जैसे ही 2014 में तेल की कीमतें गिरीं, राष्ट्रपति मादुरो के नेतृत्व वाली वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई.
स्थिति को संभालने के लिए, चीन ने सरकार के भुगतान संतुलन को समर्थन सुनिश्चित करने के लिए 10 बिलियन डॉलर का ऋण दिया, जो एक बार फिर ‘पीडीवीएसए’ की तेल बिक्री पर आधारित था. अर्थव्यवस्था की स्थिति को समझते हुए, चीन ने 2015 में कराकास को दिए गए लगभग 50 बिलियन डॉलर के ऋणों के पुनर्भुगतान की शर्तों को और आसान बना दिया.
ये अमेरिकी डॉलर ऋण पहली बार 2007 में दिए गए थे. पुनर्गठन ने प्रतिदिन भेजे जाने वाले तेल के बैरल की संख्या को कम कर दिया जो कराकास को चीन भेजना था (जो 3,30,000 था) और साथ ही स्थानीय मुद्राओं में पुनर्भुगतान की अनुमति भी दी.
हालांकि, 2016 के बाद से चीन के ऋण धीरे-धीरे कम हो गए, जबकि बीजिंग और कराकास ने मौजूदा वित्तीय प्रतिबद्धताओं के पुनर्गठन पर ध्यान केंद्रित किया. कुलमिलाकर, चीन के लिए, वेनेजुएला उसके सबसे बड़े ऋणी देशों में से एक बना हुआ है, और कराकास में प्रशासन में किसी भी बदलाव के बीजिंग के लिए बड़े वित्तीय निहितार्थ होंगे.
रूस और चीन की ‘खतरनाक’ चुप्पी
सबसे हैरानी की बात मादुरो के करीबी सहयोगी माने जाने वाले रूस और चीन की प्रतिक्रिया है, जो बेहद नपी-तुली रही है. ‘द अटलांटिक’ में टॉम निकोल्स लिखते हैं कि मादुरो का गिरना चीन और रूस के लिए भले ही झटका हो, लेकिन यह उनके लिए एक रणनीतिक अवसर भी है. विश्लेषकों का मानना है कि व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग, ट्रंप के इस आक्रामक कदम का इस्तेमाल अपने-अपने क्षेत्रों में आक्रामकता को सही ठहराने के लिए कर सकते हैं. तर्क यह है कि अगर अमेरिका अपने ‘बैकयार्ड’ (वेनेजुएला) में सैन्य कार्रवाई कर सकता है, तो रूस यूक्रेन में और चीन ताइवान में ऐसा क्यों नहीं कर सकता? वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने अमेरिका के साथ सहयोग की पेशकश की है, लेकिन ट्रंप प्रशासन का रवैया बेहद सख्त और वर्चस्ववादी है.
वाशिंगटन में सिंदूर और व्यापार वार्ता के लिए भारतीय दूतावास ने अमेरिकी लॉबी फर्म को काम पर रखा
दिपांजन रॉय चौधरी की खबर है कि अमेरिका में एक लॉबी फर्म — एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी, जिसका नेतृत्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पूर्व सलाहकार जेसन मिलर कर रहे हैं — द्वारा की गई एफएआरए (फारा-विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम) फाइलिंग में खुलासा हुआ है कि वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने 2025 तक व्यापार समझौते की वार्ताओं से संबंधित कई कार्यक्रमों के आयोजन के लिए इस फर्म की सहायता ली है.
फाइलिंग में यह भी बताया गया है कि फर्म ने भारतीय राजदूत और अमेरिका में तैनात भारतीय रक्षा अताशे के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान विभिन्न बैठकें आयोजित करने में सहायता प्रदान की थी.
ये फाइलिंग, जो सार्वजनिक डोमेन में हैं, अप्रैल और दिसंबर 2025 के बीच की अवधि से संबंधित हैं. भारतीय दूतावास और अमेरिकी विदेश विभाग तथा राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के विभिन्न अधिकारियों के बीच बैठकें, कॉल और ईमेल की व्यवस्था की गई थी, जिसमें भारत से वाशिंगटन डीसी की उच्च-स्तरीय यात्राएं भी शामिल थीं.
‘फारा’ फाइलिंग वे सार्वजनिक खुलासे हैं जो अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा उन व्यक्तियों या संस्थाओं के लिए आवश्यक हैं जो विदेशी सरकारों, संगठनों या व्यक्तियों की ओर से अमेरिकी नीति या जनमत को प्रभावित करने के लिए लॉबिंग या कार्य करते हैं. फर्म ने भारतीय राजदूत और रक्षा अताशे के लिए बैठकें आयोजित करने में सहायता की.
यह याद किया जा सकता है कि पिछले साल, मिलर ने अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके प्रशासन के कुछ अधिकारियों से भी मुलाकात की थी. रिपोर्टों के अनुसार, एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी को भारतीय दूतावास ने अप्रैल में एक साल की अवधि के लिए 1.8 मिलियन डॉलर में काम पर रखा था.
2027 के ‘अर्धकुंभ’ से पहले हरिद्वार के घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने पर विचार
देहरादून से नरेंद्र सेठी की खबर है कि उत्तराखंड सरकार जनवरी 2027 में होने वाले आगामी ‘अर्धकुंभ’ मेले से पहले, हरिद्वार में गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने के लिए सख्त नियमों पर विचार कर रही है.
सूत्रों का संकेत है कि प्रशासन हरिद्वार के 120 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले लगभग 105 घाटों पर इस प्रतिबंध को लागू करने पर विचार कर रहा है. श्री गंगा सभा से जुड़े पदाधिकारियों द्वारा सरकार को औपचारिक रूप से यह प्रस्ताव सौंपा गया है.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में अपने बयानों में इन चर्चाओं को स्वीकार किया है. धामी ने कहा, “हरिद्वार एक पवित्र शहर है और सरकार इसकी आध्यात्मिक पवित्रता को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है.” उन्होंने पुष्टि की कि उत्तराखंड, जिसे ‘देवभूमि’ के रूप में भी जाना जाता है, की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान की रक्षा के लिए पंडित मदन मोहन मालवीय से जुड़े ऐतिहासिक 1916 के समझौते के प्रावधानों सहित मौजूदा कानूनों की समीक्षा की जा रही है.
पीएम मोदी, गृह मंत्री शाह के खिलाफ नारेबाजी, छात्रों के खिलाफ एफआईआर की मांग की
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रशासन ने सोमवार रात छात्रों के एक समूह द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी किए जाने के बाद एफआईआर दर्ज करने की मांग की है. प्रशासन ने इन नारों को “उकसाने वाला, भड़काऊ और भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय की सीधी अवमानना” बताया है.
जेएनयू के मुख्य सुरक्षा अधिकारी नवीन यादव ने कहा कि “उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं पर न्यायिक फैसले के बाद, कार्यक्रम के दौरान सभा का स्वरूप और स्वर काफी बदल गया. कुछ छात्रों ने अत्यधिक आपत्तिजनक, उत्तेजक और भड़काऊ नारे लगाने शुरू कर दिए. यह भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय की सीधी अवमानना है.”
वसंत कुंज थाने के एसएचओ को लिखे पत्र में यादव ने लिखा, “इस तरह की नारेबाजी लोकतांत्रिक असहमति के पूरी तरह से असंगत है, जेएनयू की आचार संहिता का उल्लंघन करती है, और इसमें सार्वजनिक व्यवस्था, परिसर के सद्भाव और विश्वविद्यालय के सुरक्षा वातावरण को गंभीर रूप से बिगाड़ने की क्षमता है. लगाए गए नारे स्पष्ट रूप से सुनाई दे रहे थे, जानबूझकर लगाए गए थे और बार-बार दोहराए गए थे.”
एक कथित वीडियो के अनुसार, यह विरोध प्रदर्शन सोमवार देर रात जेएनयू परिसर के साबरमती हॉस्टल में हुआ. यह प्रदर्शन 2020 की दिल्ली हिंसा की साजिश के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने के कुछ घंटों बाद हुआ था. यह कार्यक्रम 2020 की परिसर हिंसा की छठी बरसी पर “गुरिल्ला ढाबा में प्रतिरोध की एक रात” शीर्षक के तहत आयोजित किया गया था.
इस बीच जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) ने कहा कि यह विरोध प्रदर्शन 5 जनवरी, 2020 को परिसर में हुए हिंदुत्ववादी हमले की वार्षिक स्मृति का हिस्सा था. ‘पीटीआई’ के अनुसार जेएनयूएसयू की अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने कहा, “प्रदर्शन के दौरान लगाए गए सभी नारे वैचारिक थे और किसी पर व्यक्तिगत हमला नहीं किया गया था.”
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि ऐसे लोगों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाना चाहिए. कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने अदालती फैसलों के खिलाफ विरोध करने के अधिकार का बचाव किया, लेकिन अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल की आलोचना की. उन्होंने कहा, “आप लोगों की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन इसे व्यक्त करने का एक तरीका और सलीका होता है.”
नई लाइन बिछाने का आदेश 2022 में हो गया था, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाई
भारत के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में सीवेज युक्त जल आपूर्ति के कारण निवासियों की मृत्यु पर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने मंगलवार को टिप्पणी की कि इस घटना ने “देश के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में इंदौर की छवि को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया है और इसे अपने निवासियों को जहरीला पानी आपूर्ति करने के लिए बदनाम कर दिया है.”
“एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस” के मुताबिक, याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई करते हुए, इंदौर में उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी शामिल थे, ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे सुनवाई की अगली तारीख, 15 जनवरी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पूरे मुद्दे पर न्यायालय को संबोधित करें.
मंगलवार को अपने पांच पन्नों के आदेश में हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि, “पानी का मुद्दा केवल इंदौर की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे राज्य की समस्या है, इसलिए राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया जाता है कि वे इस न्यायालय को अवगत कराएंगे कि पूरे राज्य में जल प्रदूषण को रोकने के लिए राज्य स्तर पर क्या कार्रवाई की जा रही है, ताकि अन्य स्थानों पर भी इसी तरह की घटना को रोका जा सके.”
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और इंदौर के अधिकारियों को पीने के पानी की नई पाइपलाइन के लिए टेंडर जारी करने से संबंधित प्रासंगिक फाइलें और 2017-2018 में जांचे गए नमूनों के संबंध में मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट भी पेश करने का निर्देश दिया.
महत्वपूर्ण रूप से, याचिकाओं की सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बगड़िया (जो एक याचिकाकर्ता के वकील हैं) ने हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया कि इंदौर नगर निगम की मेयर-इन-काउंसिल ने भागीरथपुरा क्षेत्र में पीने के पानी की आपूर्ति के लिए नई पाइपलाइन बिछाने का आदेश बहुत पहले 2022 में ही पारित कर दिया था, लेकिन निगम के लापरवाह अधिकारियों द्वारा धन का वितरण न किए जाने के कारण उक्त कार्य नहीं किया जा सका. बगड़िया ने यह भी तर्क दिया कि 2017-2018 में इंदौर शहर के विभिन्न स्थानों से पानी के 60 नमूने लिए गए थे, जिनमें से 59 पीने योग्य नहीं पाए गए थे. उन्होंने प्रस्तुत किया कि मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की उक्त रिपोर्ट के बावजूद, सुधार की रोकथाम के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई.
याचिकाओं की सुनवाई के दौरान, हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि स्वच्छ पेयजल तक पहुँच संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है और इससे “किसी भी परिस्थिति में” समझौता नहीं किया जा सकता. पीठ ने चेतावनी दी कि यदि आवश्यक हुआ, तो दोषी अधिकारियों पर नागरिक और आपराधिक दायित्व तय किए जाएंगे, और यदि पीड़ितों को दिया गया मुआवजा अपर्याप्त पाया गया, तो न्यायालय हस्तक्षेप करेगा. इस बीच पता चला है कि अपने आदेश में नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के “घंटा” शब्द को “अमानवीय और तानाशाही पूर्ण व्यवहार” का प्रतीक बताने वाले देवास के एसडीएम आनंद मालवीय को ‘ऊपर’ से आए दबाव के कारण निलंबित किया गया. मालवीय ने अपने रीडर की गलती को पकड़कर नया आदेश निकाला था, मगर उसको अनदेखा कर दिया गया और कलेक्टर को कथित तौर पर दबाव में कार्रवाई की अनुशंसा करना पड़ी.
सावरकर को लेकर अजीत पवार और भाजपा में घटती नज़दीकियां
सुधीर सूर्यवंशी ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में खबर की है कि भाजपा ने उपमुख्यमंत्री अजित पवार से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के प्रमुख विचारक वी डी सावरकर की विचारधारा को स्वीकार करने के लिए कहा है. वरिष्ठ भाजपा नेता और मंत्री आशीष शेलार ने कहा कि चूंकि अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन का हिस्सा है, इसलिए अगर यह सत्ता में बनी रहना चाहती है तो उसे अपने गठबंधन साझीदारों की विचारधारा और सिद्धांतों को स्वीकार करना होगा. शेलार ने राज्य भाजपा अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा, “हम वी डी सावरकर के अनुयायी हैं और उनके पदचिन्हों पर चलते हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी महायुति का हिस्सा है, और इसलिए उसे भी सावरकर के विचारों को स्वीकार करना होगा. हमारी विचारधारा स्पष्ट है. अगर आप हमारे साथ आना चाहते हैं, तो हम आपको स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, लेकिन शर्त यह है कि हमारी सोच को भी स्वीकार करना होगा. अगर वे इसके लिए तैयार नहीं हैं, तो हम भी उसके लिए तैयार हैं,” शेलार ने कहा.
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि अजित पवार ने कभी सावरकर की विचारधारा का विरोध नहीं किया है. उन्होंने कहा कि भाजपा उन लोगों या पार्टियों को स्वीकार नहीं करती जो सावरकर का विरोध करते हैं. “मेरी जानकारी के अनुसार, अजित पवार ने कभी सावरकर की सोच का विरोध नहीं किया है, न ही उनके पास ऐसा करने का कोई कारण है. हम अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध हैं और इस पर समझौता नहीं करेंगे,” मुख्यमंत्री ने कहा.
इस बीच, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नेता अमोल मितकारी ने कहा कि पार्टी शाहू-फुले-अंबेडकर विचारधारा का दृढ़ता से पालन करती है, जिसे उन्होंने महाराष्ट्र की मूल विचारधारा बताया, और इसे जारी रखेगी. उन्होंने आरोप लगाया कि आशीष शेलार दूसरों पर भाजपा की विचारधारा थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जो उन्होंने कहा कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को स्वीकार्य नहीं होगी. “हम एक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध हैं. वास्तव में, हम आपकी विचारधारा को स्वीकार नहीं करते हैं. हालांकि, यह एक तथ्य है कि आप राजनीतिक रूप से डॉ. बी आर अंबेडकर की विचारधारा का पालन करने के लिए मजबूर हैं,” मितकारी ने कहा.
इससे पहले, अजित पवार ने भाजपा पर हमला करते हुए इसे सबसे भ्रष्ट पार्टी बताया था और आरोप लगाया था कि सत्ता की उसकी भूख अनंत है. जवाब में, भाजपा ने चेतावनी दी कि अगर पवार अपने हमले जारी रखते हैं, तो पार्टी भी उसी तरह जवाबी कार्रवाई करेगी.
एक्सप्लेनर
खनिज, तेल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए जंग
राष्ट्रपति ट्रंप ने वेनेजुएला, ग्रीनलैंड और अन्य गोलार्ध के खिलाड़ियों में अपनी तीव्र, आक्रामक महत्वाकांक्षाओं के लिए विभिन्न कारण दिए हैं. लेकिन एक्सियोस के मुताबिक उन सभी को एक धागा बांधता है: उनके पास कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रक्षा प्रौद्योगिकी के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिज हैं — और इसलिए भविष्य का वैश्विक प्रभुत्व.
वेनेजुएला के नेता को पकड़ने के दो दिनों के भीतर, ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों और वित्तीय विश्लेषकों ने उस देश की खनिज संपदा की विशाल श्रृंखला पर चर्चा करना शुरू कर दिया. अधिकारियों का कहना है कि वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार का दोहन करने के साथ-साथ, देश के दुर्लभ-पृथ्वी खनिजों की कटाई से इसके वित्त को स्थिर करने में मदद मिल सकती है और अमेरिका को उन कीमती संसाधनों पर चीन की वैश्विक जकड़बंदी को कमजोर करने में मदद मिल सकती है जिनकी चिप उद्योग को आवश्यकता है.
वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने रविवार देर रात राष्ट्रपति ट्रंप के साथ एयर फोर्स वन पर संवाददाताओं से कहा, “आपके पास स्टील है, आपके पास खनिज हैं, सभी महत्वपूर्ण खनिज हैं. उनका एक महान खनन इतिहास है जो जंग खा गया है.” लुटनिक ने कहा कि ट्रंप “इसे ठीक करने जा रहे हैं और इसे वापस लाने जा रहे हैं — वेनेजुएला के लोगों के लिए.”
ट्रंप की शक्ति की चाल अमेरिकी कंपनियों को भी लाभान्वित करेगी, जिन्होंने वेनेजुएला में व्यावसायिक अवसरों के बारे में प्रशासन से संपर्क करना शुरू कर दिया है. सोमवार को वित्तीय विश्लेषक वहां संभावित खनन निवेश की प्रशंसा कर रहे थे.
ग्रीनलैंड के लिए, ट्रंप ने डेनमार्क क्षेत्र पर नियंत्रण लेने के बारे में सोचा है. उनके अधिकांश सलाहकारों का मानना नहीं है कि वह एक सहयोगी से जमीन जब्त करने के चरम विचार पर अमल करेंगे, जो नाटो में संकट पैदा करेगा. लेकिन ट्रंप इस मुद्दे को उठाना जारी रखते हैं.
वेनेजुएला और ग्रीनलैंड दोनों में उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी के लिए आवश्यक कुछ महत्वपूर्ण खनिज हैं. उनके पास गैलियम, जर्मेनियम, इंडियम, टैंटलम और सिलिकॉन के भंडार हैं जो उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता चिप्स में उपयोग होते हैं. ग्रीनलैंड में एक और प्रतिष्ठित खनिज है जो वेनेजुएला में नहीं है — पैलेडियम.
ग्रीनलैंड की तुलना में, वेनेजुएला में कोल्टान की अधिक महत्वपूर्ण मात्रा है, एक धातु जो स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक वाहनों में उपयोग होती है. वेनेजुएला और ग्रीनलैंड में थोरियम भी है, एक धातु जिसे विखंडनीय यूरेनियम-233 में परिवर्तित किया जा सकता है और परमाणु ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है. और दोनों लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे स्वच्छ ऊर्जा खनिजों से समृद्ध हैं जो विशाल कृत्रिम बुद्धिमत्ता डेटा केंद्रों को शक्ति प्रदान कर सकते हैं.
वेनेजुएला और अन्य जगहों पर महत्वपूर्ण खनिजों को सुरक्षित करने में अमेरिका की रुचि कृत्रिम बुद्धिमत्ता में प्रभुत्व के बारे में उतनी ही है जितनी हथियारों में, जो अमेरिकी आर्थिक विकास और शेयर बाजार में तेजी से बड़ा योगदानकर्ता है.
अमेरिका अपने अधिकांश दुर्लभ पृथ्वी खनिजों तक पहुंच के लिए चीन पर निर्भर है क्योंकि बीजिंग के पास दुनिया की आपूर्ति का लगभग 90% तक पहुंच है. बीजिंग ने चल रहे व्यापार युद्ध में इस तथ्य का अपने फायदे के लिए उपयोग किया है, दुर्लभ पृथ्वी पर निर्यात नियंत्रण बढ़ाया है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.








