06/02/2026: बजट सत्र पर संशय | नरवणे अकेले नहीं | हिमंता पर सुओ मोटो कार्रवाई की मांग | पाक में शिया मस्जिद में ब्लास्ट, 31 मौतें | लाड़लियों को धमकी | ट्रंप ने ओबामा को बंदर बताया | वैभव सूर्यवंशी
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
संसद: राहुल गांधी को बोलने न देने पर विपक्ष का हंगामा, बजट सत्र पर संकट.
सुरक्षा: महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में 6 नक्सली ढेर, एक जवान शहीद.
आतंक: पाकिस्तान की शिया मस्जिद में धमाका, 31 की मौत.
क्रिकेट: 14 साल के वैभव सूर्यवंशी ने जड़े 175 रन, वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ा.
राजनीति: असम सीएम के ‘हेट स्पीच’ पर 40 नागरिकों की कोर्ट से अपील.
विदेश: अमेरिका की ‘अपराधी लिस्ट’ में 89 भारतीय शामिल.
अनोखी ख़बर: 20 साल पुरानी मछली का हुआ पूरे सम्मान से अंतिम संस्कार.
लोकसभा में बजट सत्र के बचे हुए दिनों पर सस्पेंस: विपक्ष का विरोध और निलंबन से घिरी कार्यवाही
संसद के बजट सत्र का पहला चरण हंगामे और शोरगुल के बीच अपने अंतिम पड़ाव पर है, लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जनरल एम.एम. नरवणे की किताब और अन्य मुद्दों पर बोलने का मौका न दिए जाने के कारण गतिरोध गहरा गया है. ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में प्रीता नायर बताती हैं कि 13 फरवरी को समाप्त होने वाले इस चरण के बाकी दिनों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं.
विपक्षी नेताओं ने साफ कर दिया है कि सरकार की तरफ से सुलह की कोई पहल न होने के कारण वे अपना विरोध तेज करेंगे. विपक्ष का मुख्य मुद्दा राहुल गांधी को जनरल नरवणे की किताब पर बोलने से रोकना और आठ सांसदों का निलंबन है. चेतावनी दी गई है कि यह गतिरोध केंद्रीय बजट 2026-27 पर होने वाली बहस को भी पटरी से उतार सकता है.
शुक्रवार को लगातार व्यवधान के बाद लोकसभा को दिन भर के लिए स्थगित कर दिया गया. स्पीकर ओम बिरला ने नारेबाजी और तख्तियां दिखाने के लिए सांसदों को फटकार लगाई और बताया कि बजट सत्र के दौरान अब तक कुल 19 घंटे और 13 मिनट का समय बर्बाद हो चुका है. तय कार्यक्रम के अनुसार, 9, 10 और 11 फरवरी को केंद्रीय बजट पर चर्चा होनी है और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को 11 फरवरी को जवाब देना है. लेकिन, मौजूदा हालात को देखते हुए सुचारू चर्चा की उम्मीद कम है.
सूत्रों के मुताबिक, गुरुवार को विपक्षी दलों के फ्लोर लीडर्स की बैठक में “किताब विवाद” और नेता प्रतिपक्ष को बोलने न देने के मुद्दे पर विरोध तेज करने का सर्वसम्मत निर्णय लिया गया. विपक्षी दलों का मानना है कि जब तक आठ सांसदों (सात कांग्रेस और एक सीपीएम) का निलंबन वापस नहीं लिया जाता, तब तक बजट पर कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए. इन सांसदों को कथित अभद्र व्यवहार के लिए दंडित किया गया था.
कांग्रेस और उसके सहयोगियों का मानना है कि सरकार दबाव में है. उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के जवाब के दौरान लोकसभा से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति की ओर इशारा किया. उनका कहना है कि यह बजट और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर सरकार की असहजता को दर्शाता है. राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पर भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में भारत के हितों से समझौता करने के आरोपों ने भी सरकार को बैकफुट पर धकेला है. समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, वाम दल और डीएमके जैसी पार्टियां इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ एकजुट हैं, जिसका नजारा राज्यसभा में भी देखने को मिला जब विपक्ष ने प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान वॉकआउट किया.
हालात तब और तनावपूर्ण हो गए जब स्पीकर ओम बिरला ने दावा किया कि उनके पास “पुख्ता जानकारी” है कि कुछ कांग्रेसी सांसद प्रधानमंत्री के खिलाफ “अभूतपूर्व कार्रवाई” की योजना बना रहे थे—इस आरोप पर विपक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई है.
‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए कांग्रेस के मुख्य सचेतक कोडिकुनिल सुरेश ने कहा कि सरकार ने विपक्ष के साथ जुड़ने या उनकी चिंताओं को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया है. उन्होंने कहा, “विपक्ष इस बात का विरोध कर रहा है कि राहुल गांधी को 2020 के चीन गतिरोध पर पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे के संस्मरण को उद्धृत करने से रोका जा रहा है. सरकार का फर्ज है कि वह विपक्ष को बुलाकर सहमति बनाए, लेकिन बुधवार को जब हम स्पीकर से मिले, तो हमें कोई ठोस जवाब नहीं मिला.”
संसद का यह सत्र 13 फरवरी को स्थगित होगा और अवकाश के बाद 9 मार्च से 2 अप्रैल तक दूसरे चरण के लिए फिर से शुरू होगा.
नक्सल विरोधी ऑपरेशन में शीर्ष नेता प्रभाकर और 6 अन्य मारे गये
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में पिछले तीन दिनों से चल रहे नक्सल विरोधी अभियान में सुरक्षाबलों को बड़ी कामयाबी मिली है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने शुक्रवार (6 फरवरी, 2026) को पुष्टि की है कि गढ़चिरौली के अबूझमाड़ क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में शीर्ष माओवादी नेता प्रभाकर समेत छह अन्य माओवादी मारे गए हैं. मारे गए नक्सलियों में तीन महिला कैडर भी शामिल हैं.
मारे गए नक्सली नेता प्रभाकर उर्फ लोकेटी चंदर राव पर 25 लाख रुपये का नकद इनाम था. वह माओवादियों की गढ़चिरौली डिवीजन कमेटी, वेस्ट सब-जोनल ब्यूरो और ‘कंपनी नंबर 10’ का प्रभारी था. इस भीषण मुठभेड़ में एक पुलिस जवान शहीद हो गया, जबकि एक अन्य घायल है. पुलिस ने घटनास्थल से अब तक तीन एके-47 राइफलें, एक एसएलआर और एक .303 राइफल बरामद की है. अन्य मारे गए नक्सलियों की पहचान अभी नहीं हो पाई है.
गढ़चिरौली पुलिस द्वारा जारी एक नोट के मुताबिक, “3 फरवरी को ‘कंपनी नंबर 10’ की गतिविधियों के बारे में विश्वसनीय खुफिया जानकारी मिली थी. इसके आधार पर उसी रात एसडीपीओ भामरागढ़ के नेतृत्व में सी-60 कमांडो की 14 टुकड़ियों के साथ ऑपरेशन शुरू किया गया. यह ऑपरेशन नारायणपुर-गढ़चिरौली सीमा पर फोडेवाड़ा गांव से कुछ किलोमीटर ऊपर चलाया गया.” शुक्रवार को दिन भर रुक-रुक कर गोलीबारी होती रही. पुलिस ने नक्सलियों के दो कैंप ध्वस्त कर दिए और भारी मात्रा में उनका सामान जब्त किया. हालांकि, बीहड़ इलाका और घने जंगल होने के कारण कुछ नक्सली भागने में सफल रहे. घेराबंदी को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त बल और क्यूएटी सीआरपीएफ की एक यूनिट को भेजा गया है.
इस ऑपरेशन में सी-60 यूनिट के 38 वर्षीय जवान दीपक चिन्ना मडावी शहीद हो गए. अहेरी तहसील के मंदा गांव के रहने वाले मडावी ने शहादत से पहले अदम्य साहस का परिचय दिया. पुलिस के अनुसार, गुरुवार शाम हुई भारी गोलीबारी में गोली लगने के बावजूद उन्होंने दो नक्सलियों को मार गिराया. उन्हें एयरलिफ्ट करके भामरागढ़ अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया. शनिवार को उनके पैतृक गांव में पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.
मुठभेड़ में एक अन्य जवान जोगा मडावी भी घायल हुए हैं. उन्हें एयरलिफ्ट करके गढ़चिरौली लाया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है और उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है.
असम के सीएम हिमंता के ‘हेट स्पीच’ वाले बयानों पर अदालत से स्वतः संज्ञान लेने की मांग
शैक्षणिक दिग्गजों, डॉक्टरों, लेखकों और सेवानिवृत्त नौकरशाहों सहित 40 से अधिक प्रमुख नागरिकों ने गौहाटी उच्च न्यायालय से असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा एक विशेष समुदाय के खिलाफ दिए गए हालिया बयानों पर स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह किया है.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, उन्होंने तर्क दिया कि “संवैधानिक उल्लंघनों के खिलाफ चुप्पी या निष्क्रियता” से “स्वयं संविधान के नैतिक अधिकार” का क्षरण हो सकता है. गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार को लिखे एक पत्र में, इन नागरिकों ने मुख्यमंत्री सरमा द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयानों की एक श्रृंखला की ओर उच्च न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया, जो “प्रथम दृष्टया नफ़रती भाषण (हेट स्पीच), डराना-धमकाना और एक विशेष समुदाय का खुला तिरस्कार करने के समान हैं.” यह पत्र ‘मिया’ (बंगाली भाषी मुसलमानों) के खिलाफ मुख्यमंत्री की टिप्पणियों के संदर्भ में था.
उन्होंने कहा कि बंगाली भाषी मुसलमान 100 से अधिक वर्षों के दौरान “वृहद असमिया समाज का हिस्सा” बन गए हैं, और मुख्यमंत्री के बयान “अमानवीयकरण, सामूहिक कलंक और राज्य-प्रायोजित उत्पीड़न की धमकियों के प्रतिबंधित संवैधानिक क्षेत्र में प्रवेश करते हैं.”
‘मिया’ मूल रूप से असम में बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक अपमानजनक शब्द है और गैर-बंगाली भाषी लोग आमतौर पर उन्हें बांग्लादेशी प्रवासियों के रूप में पहचानते हैं. हाल के वर्षों में, इस समुदाय के कार्यकर्ताओं ने इस शब्द को चुनौती या प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में अपनाना शुरू कर दिया है.
नागरिकों ने दावा किया कि सरमा “शारीरिक नुकसान के लिए उकसाने, आर्थिक भेदभाव और सामाजिक अपमान” में लिप्त रहे हैं. उन्होंने विशेष रूप से उनके उस बयान का उल्लेख किया जिसमें उन्होंने लोगों से बंगाली भाषी मुसलमानों द्वारा चलाए जाने वाले रिक्शा के वास्तविक किराए से कम भुगतान करने का आग्रह किया था.
इन 43 हस्ताक्षरकर्ताओं में शिक्षाविद् और बुद्धिजीवी हिरेन गोहेन, पूर्व डीजीपी हरेकृष्ण डेका, गुवाहाटी के पूर्व आर्चबिशप थॉमस मेनामपरम्पिल, राज्यसभा सांसद अजीत भुइयां, पर्यावरण वैज्ञानिक दुलाल चंद्र गोस्वामी, असम मेडिकल कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रिंसिपल टी.आर. बोरबोरा, वकील शांतनु बोरठाकुर, ट्रेड यूनियनों की संयुक्त परिषद के संयुक्त संयोजक गर्ग तालुकदार और साहित्यकार अरूपा पतंगिया कलिता शामिल हैं.
उन्होंने मतदाता सूची के चल रहे विशेष पुनरीक्षण (एसआर) के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं को बंगाली भाषी मुसलमानों को लक्षित करते हुए आपत्तियां दर्ज करने का आदेश देने वाले मुख्यमंत्री के बयानों की ओर भी इशारा किया.
पत्र में कहा गया, “एसआर जैसी संवैधानिक रूप से अनिवार्य और अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया को मुख्यमंत्री के इशारे पर पक्षपातपूर्ण या सांप्रदायिक अभ्यास में नहीं बदला जा सकता.” साथ ही यह भी नोट किया गया कि चुनाव आयोग ने अभी तक इस मामले का संज्ञान नहीं लिया है.
यह बताते हुए कि एक मुख्यमंत्री बिना किसी राग या द्वेष के कर्तव्यों का पालन करने की शपथ लेता है, पत्र में कहा गया: “किसी धार्मिक समुदाय को कष्ट, आर्थिक अभाव, अत्यधिक जांच और बहिष्कार के लिए सार्वजनिक रूप से चिन्हित करना इस शपथ के मौलिक रूप से असंगत है.” इसमें आगे कहा गया, “असम के मुख्यमंत्री का खुल्लम-खुल्ला हेट स्पीच (घृणास्पद भाषण) राष्ट्रीय अखंडता के प्रतिकूल है और धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को सीधे बढ़ावा देता है.”
पाकिस्तान: शिया मस्जिद में आत्मघाती धमाका, 31 की मौत, 169 घायल
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शुक्रवार की नमाज़ के दौरान एक शिया मस्जिद में आत्मघाती हमले में कम से कम 31 लोगों की मौत हो गई और 169 लोग घायल हो गए. इस्लामाबाद के डिप्टी कमिश्नर इरफान मेमन ने रॉयटर्स को बताया कि मरने वालों की संख्या बढ़कर 31 हो गई है और 169 घायलों को अस्पताल लाया गया है. यह धमाका तारलाई इलाके में स्थित इमामबर्गाह खादिजा अल-कुबरा में हुआ. मरने वालों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई गई है.
रिपोर्ट के अनुसार, आत्मघाती हमलावर को मस्जिद के गेट पर रोक लिया गया था, लेकिन उसने वहीं खुद को उड़ा लिया. पुलिस के मुताबिक़ हमले के पीछे आत्मघाती हमलावर होने के संकेत मिले हैं. कुछ पुलिस सूत्रों ने बताया कि हमलावर विदेशी नागरिक था और उसके तार तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से जुड़े बताए जा रहे हैं. हालांकि अब तक किसी संगठन ने हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है.
हमले के तुरंत बाद पुलिस और बचाव दल मौके पर पहुंचे और राहत कार्य शुरू किया गया. राजधानी के अस्पतालों में आपातकाल घोषित कर दिया गया ताकि घायलों का तुरंत इलाज किया जा सके. यह हमला ऐसे समय हुआ है जब उज़्बेकिस्ताब के राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव दो दिन की आधिकारिक यात्रा पर पाकिस्तान में हैं. इससे तीन महीने पहले भी इस्लामाबाद में एक अदालत के बाहर आत्मघाती धमाके में 12 लोगों की मौत हुई थी.
उत्तरप्रदेश में ‘एसआईआर’ को मिला चौथा विस्तार, अंतिम सूची अप्रैल में होगी प्रकाशित
उत्तरप्रदेश की मतदाता सूची के मसौदे के खिलाफ दावे और आपत्तियां दाखिल करने के अंतिम दिन, भारत निर्वाचन आयोग ने शुक्रवार को राज्य की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की अवधि में चौथी बार विस्तार की घोषणा की. अब अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 10 अप्रैल को किया जाएगा.
गुरुवार को उत्तरप्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) को लिखे एक पत्र में, चुनाव आयोग ने कहा कि उसने सीईओ के अनुरोध और “अन्य प्रासंगिक कारकों” पर विचार किया है और समय-सारणी में संशोधन करने का निर्णय लिया है.
निर्वाचन आयोग ने पिछले साल अक्टूबर में उत्तर प्रदेश सहित नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा की थी. अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मतदाता सूचियां 14 फरवरी को प्रकाशित होने वाली हैं.
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ की खबर है कि उत्तरप्रदेश में प्रकाशित मसौदा सूची में 19 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटा दिए गए, जिससे कुल संख्या 15.44 करोड़ से घटकर 12.55 करोड़ रह गई. इसके बाद, अन्य 3.36 करोड़ या 26 प्रतिशत मतदाताओं को नोटिस के लिए चिन्हित किया गया है. यदि ये मतदाता सुनवाई के लिए उपस्थित नहीं होते हैं या पात्रता स्थापित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराते हैं, तो उन्हें भी अंतिम सूची से हटाया जा सकता है.
नरवणे अकेले नहीं: पूर्व आर्मी अफसर की किताब और रॉ के ‘राज’ पर 19 साल पुराना साया
पूर्व आर्मी चीफ जनरल एम.एम. नरवणे की आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के प्रकाशन पर रोक और संसद में राहुल गांधी द्वारा इसे लहराए जाने ने एक पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है. लेकिन जनरल नरवणे अकेले नहीं हैं. रिटायरमेंट के बाद ‘सच बताने वाली’ किताबें लिखने का जोखिम उठाने वाले अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी रहे हैं, जिन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है. द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में इस मुद्दे की गहराई से पड़ताल की गई है.
संसद के बजट सत्र (2026) के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब के अंश पढ़ने की कोशिश की, जिस पर सरकार ने यह कहकर रोक लगा दी कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है. हालांकि, सरकार ने यह नहीं बताया कि रक्षा मंत्रालय ने खुद इस किताब को एक साल से अधिक समय से “समीक्षा के अधीन” रखा है और इसके प्रकाशन को रोका हुआ है.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला मेजर जनरल वी.के. सिंह (सेवानिवृत्त) के 19 साल पुराने मामले की याद दिलाता है. 2007 में उनकी किताब ‘इंडियाज एक्सटर्नल इंटेलिजेंस - सीक्रेट्स ऑफ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ प्रकाशित होने के ठीक बाद सीबीआई ने उन पर ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट’ (ओएसए) के तहत केस दर्ज किया था. उनके घर पर छापा मारा गया, कंप्यूटर और पासपोर्ट जब्त कर लिए गए. आज 81 वर्ष के हो चुके मेजर जनरल सिंह जमानत पर हैं, लेकिन 19 साल बाद भी उनके खिलाफ मुकदमा ठीक से शुरू नहीं हो पाया है.
मेजर जनरल सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “मुझे यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि प्रकाशक ने जनरल नरवणे की पांडुलिपि मंजूरी के लिए रक्षा मंत्रालय को भेजी. यह प्रकाशक का काम नहीं है. वैसे भी, 1954 के आर्मी रूल्स केवल सेवारत अधिकारियों पर लागू होते हैं, रिटायर्ड अफसरों पर नहीं.” उन्होंने कहा कि 2021 के संशोधित नियम केवल संवेदनशील संगठनों के नागरिक अधिकारियों पर लागू होते हैं.
वी.के. सिंह का कहना है कि उन्होंने अपनी किताब में रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के भीतर संभावित भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए एक ‘व्हिसलब्लोअर’ के रूप में काम किया था, लेकिन उन पर गोपनीयता भंग करने का आरोप लगाया गया. उनका मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है, जहां उन्होंने तर्क दिया है कि जनहित में प्रकाशित किताब के लिए 18 साल से चल रहा उत्पीड़न न्याय की अवधारणा के खिलाफ है.
इस बीच, जनरल नरवणे ने अपनी आत्मकथा के प्रकाशन की उम्मीद छोड़ दी है और मिलिट्री फिक्शन की ओर रुख कर लिया है. उनकी फिक्शन किताब ‘द कैंटोनमेंट कॉन्सपिरेसी’ पिछले साल प्रकाशित हुई थी, जिस पर उन्होंने कहा था: “मैं अब आगे बढ़ चुका हूं.”
अमेरिका ने ‘सबसे खतरनाक’ अपराधी प्रवासियों की सूची में 89 भारतीयों को शामिल किया
‘डेक्कन क्रॉनिकल’ की खबर है कि अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने अपनी एक नई वेबसाइट पर “आपराधिक गैर कानूनी प्रवासी” नाम से एक सूची सार्वजनिक की है, जिसका शीर्षक “वर्स्ट ऑफ द वर्स्ट” (सबसे बुरे) रखा गया है. इस सूची में उन प्रवासियों को शामिल किया गया है जिन्हें गिरफ्तार कर दोषी ठहराया जा चुका है, जिनमें 89 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं. वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस सूची में दोषी व्यक्तियों के नाम, फोटो, अपराध और उनकी राष्ट्रीयता का विवरण दिया गया है.
सूची के अनुसार, वेबसाइट पर मौजूद भारतीय नागरिकों को विभिन्न अपराधों के लिए गिरफ्तार और दोषी ठहराया गया है, जिनमें यौन अपराध, बलात्कार, मादक पदार्थों की तस्करी, चोरी, शराब पीकर गाड़ी चलाना, हिट एंड रन, तस्करी, धोखाधड़ी, डकैती, हमला, अपहरण, मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स रखना, घरेलू हिंसा और हत्या के मामले शामिल हैं.
मणिपुर
कुकी विरोध प्रदर्शनों से केंद्र क्यों नहीं है चिंतित?
मणिपुर में नई सरकार के गठन के साथ ही कुकी संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, लेकिन केंद्र सरकार इसे लेकर बहुत अधिक चिंतित नहीं है. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि यह हिंसा और विरोध “अपेक्षित” थे और यह एक रणनीतिक कदम का हिस्सा हो सकते हैं.
एक एमएचए अधिकारी ने बताया, “कुकी समूहों ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि जब तक केंद्र से ‘अलग प्रशासन’ का लिखित आश्वासन नहीं मिलता, उनके विधायक सरकार में शामिल नहीं होंगे. लेकिन कोई लिखित आश्वासन नहीं दिया गया, फिर भी विधायक सरकार में शामिल हो गए. ऐसे में, अपनी जनता के सामने साख बचाने के लिए उन्हें विरोध का दिखावा करना पड़ रहा है.”
सूत्रों के मुताबिक, सरकार में शामिल होने वाले कुकी विधायकों को ‘कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन’ और ‘यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट’ से हरी झंडी मिली थी. ये दोनों उग्रवादी संगठन केंद्र के साथ ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन’ समझौते का हिस्सा हैं. डिप्टी सीएम बनीं नेमचा किपगेन, यूपीएफ के एक प्रमुख नेता की पत्नी हैं. यह सब सितंबर 2025 में ही तय हो गया था.
दिलचस्प बात यह है कि कुकी विधायकों की आलोचना करने वाले बयान ‘कुकी-जो काउंसिल’ और छात्र संगठनों की ओर से आ रहे हैं, न कि हथियारबंद समूहों की ओर से. कांगपोकपी से विधायक को डिप्टी सीएम बनाना भी एक सोची-समझी रणनीति है ताकि इम्फाल घाटी को भारत से जोड़ने वाले प्रमुख राजमार्ग पर यातायात सुचारू रखा जा सके.
रिपोर्ट में बताया गया है कि केंद्र ने कुकी समूहों को आश्वासन दिया है कि उनकी चिंताओं का समाधान किया जाएगा, लेकिन राज्य की क्षेत्रीय अखंडता से समझौता नहीं होगा. केंद्र को उम्मीद है कि जैसे ही नई सरकार काम करना शुरू करेगी, लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक शून्य के भरने से स्थिति कुछ दिनों में शांत हो जाएगी.
मणिपुर में BJP की नई सरकार पर विवाद: उपमुख्यमंत्री की ऑनलाइन शपथ पर सवाल, कूकी-ज़ो समुदाय में विरोध
मणिपुर में नए मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति के तुरंत बाद चुराचांदपुर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. बीजेपी ने करीब एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद युमनाम खेमचंद सिंह (मैतेई समुदाय) को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया है. पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने फरवरी 2025 में इस्तीफा दिया था, जब उन पर बढ़ते जातीय संघर्ष को संभाल न पाने के आरोप लगे. बीजेपी ने अपनी पुरानी “सामाजिक प्रतिनिधित्व” वाली रणनीति अपनाते हुए कूकी-ज़ो समुदाय से नेमचा किपगेन और नगा समुदाय से लोसी दीखो को उपमुख्यमंत्री बनाया है. किपगेन को राज्य की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बताकर इसे शांति की दिशा में क़दम बताया गया.
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक़ लेकिन यह फैसला उलटा पड़ता दिख रहा है. कूकी-ज़ो काउंसिल, जो पहाड़ी इलाकों को स्वायत्तता देने की मांग कर रही है, ने किपगेन के नेतृत्व को सर्वसम्मति से ख़ारिज कर दिया और उनका इस्तीफ़ा मांगा है. काउंसिल के प्रवक्ता गिंज़ा वुअलजोंग ने कहा कि यह फैसला समुदाय की भावनाओं के साथ “विश्वासघात” है. बताया गया कि 10 कूकी-ज़ो विधायकों में से केवल तीन ने सरकार का समर्थन किया, बाकी काउंसिल के साथ हैं.
विरोध इतना ज़्यादा था कि किपगेन शपथ समारोह में मणिपुर नहीं जा सकीं और उन्हें दिल्ली के मणिपुर भवन से वीडियो लिंक के ज़रिये शपथ लेनी पड़ी. इसी तरह विश्वास मत के दौरान भी तीनों समर्थक कूकी-ज़ो विधायक ऑनलाइन ही शामिल हुए. 5 फरवरी को डेढ़ साल बाद विधानसभा की बैठक हुई, लेकिन कोई भी कूकी-ज़ो विधायक इम्फाल नहीं पहुँच सके, क्योंकि मई 2023 से जारी हिंसा के बाद वे घाटी क्षेत्र में नहीं जा पा रहे हैं.
पूर्व लोकसभा महासचिव पी.डी.टी. आचार्य ने इस वर्चुअल शपथ पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसकी कानूनी वैधता की जांच होनी चाहिए और पूछा कि अगर मंत्री दिल्ली में बैठेंगी तो राज्य का काम कैसे संभालेंगी. इस बीच राज्य में हालात अब भी सामान्य नहीं हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ जातीय हिंसा में 270 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं और करीब 60,000 लोग अब भी राहत शिविरों में हैं. गृह मंत्री अमित शाह ने मार्च 2025 में राज्य में “मुक्त आवाजाही” सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था, लेकिन आज भी मैतेई और कूकी-ज़ो समुदाय एक-दूसरे के इलाकों में नहीं जा पा रहे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 सितंबर 2025 को, हिंसा शुरू होने के दो साल बाद, राज्य का दौरा किया था.
नई सरकार के गठन और कूकी-ज़ो काउंसिल में कथित तौर पर तोड़फोड़ की कोशिशों से अविश्वास और बढ़ सकता है. काउंसिल ने आंदोलन तेज़ करने और किपगेन के तुरंत इस्तीफे की मांग की है. इससे साफ है कि बीजेपी की सत्ता-साझेदारी की रणनीति फिलहाल मणिपुर में गहरे जातीय घाव भरने में नाकाम साबित हो रही है.
रेप और हत्या का दोषी गुरमीत राम रहीम 15वीं बार पैरोल पर बाहर: सीएनएन रिपोर्ट
भारतीय जेल के दरवाजे एक बार फिर एक हाई-प्रोफाइल धर्मगुरु के लिए खुले हैं. बलात्कार और हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह 15वीं बार पैरोल पर बाहर आया है. सीएनएन की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में जेल जाने के बाद से वह अब तक 400 से अधिक दिन जेल से बाहर बिता चुका है.
हरियाणा के सिरसा स्थित डेरा का यह प्रमुख न केवल एक धर्मगुरु है, बल्कि एक रॉक-स्टार जैसी छवि रखता है. “मैसेंजर ऑफ गॉड” जैसी फिल्मों में खुद को सुपरहीरो के रूप में पेश करने वाला और “लव चार्जर” जैसे गाने गाने वाला राम रहीम राजनीतिक रूप से भी रसूखदार है. उसकी रिहाई अक्सर चुनावों के समय होती है, जिससे यह अटकलें लगती हैं कि उसके लाखों अनुयायियों के वोट बैंक के बदले उसे यह रियायत मिलती है. हालांकि, उसके वकील ने किसी भी राजनीतिक मकसद से इनकार किया है.
पत्रकार राम चंद्र छत्रपति, जिनकी 2002 में हत्या के लिए राम रहीम को दोषी ठहराया गया था, के बेटे अंशुल छत्रपति ने सीएनएन से कहा, “हर बार जब वह बाहर आता है, तो ऐसा लगता है जैसे हमारा जख्म फिर से हरा हो गया है. हमने 2002 से न्याय के लिए लड़ाई लड़ी, लेकिन यह सिस्टम बार-बार उसे बाहर भेज देता है.”
डेरा सच्चा सौदा ने बयान दिया है कि पैरोल राम रहीम का अधिकार है और यह कोई “विशेष एहसान” नहीं है. जेल से बाहर आते ही राम रहीम ने सोशल मीडिया पर नए गाने रिलीज किए हैं, जिनमें नशा मुक्ति का संदेश दिया गया है, जबकि वह खुद गंभीर अपराधों का दोषी है. रिपोर्ट में भारत के ‘गॉडमैन’ कल्चर और राजनीति के साथ उनके गठजोड़ पर भी सवाल उठाए गए हैं.
फ्रांसीसी आपूर्तिकर्ता के अधिग्रहण के बाद सुर्खियों में राफेल, अमेरिका के नियमों के दायरे में आ सकता है यह लड़ाकू विमान
114 अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों के प्रस्तावित अधिग्रहण पर अगले सप्ताह रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) की बैठक में चर्चा होने की संभावना है. उम्मीद है कि इस महीने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा से पहले इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाएगी.
इस बीच, यूरोप में हुए हालिया अधिग्रहणों ने इस कार्यक्रम में एक नया विनियामक आयाम जोड़ दिया है. अमेरिकी कंपनी ‘लोअर ग्रुप’ द्वारा प्रमुख फ्रांसीसी एयरोस्पेस आपूर्तिकर्ता ‘एलएमबी एयरोस्पेस’ के अधिग्रहण के बाद, डसॉल्ट एविएशन का राफेल संभावित रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के ‘इंटरनेशनल ट्रैफिक इन आर्म्स रेगुलेशन’ (आईटीएआर) के दायरे में आ सकता है.
जवारिया राणा की रिपोर्ट है कि इस घटनाक्रम ने फ्रांस में एक बड़ी राजनीतिक बहस छेड़ दी है और मौजूदा व भविष्य के राफेल संचालकों के लिए इसके संभावित परिणामों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
चिंता का मुख्य कारण यह है कि राफेल के निर्यात में फ्रांस का एक प्रमुख तर्क यह रहा है कि यह विमान अमेरिकी निर्यात नियंत्रणों से तुलनात्मक रूप से मुक्त है, जिससे खरीदारों को अधिक परिचालन लचीलापन मिलता है. आईटीएआर नियम संयुक्त राज्य अमेरिका से उत्पन्न रक्षा-संबंधित प्रौद्योगिकियों के निर्यात, हस्तांतरण और उपयोग को नियंत्रित करते हैं.
यदि विशिष्ट उप-प्रणालियां आईटीएआर के अधिकार क्षेत्र में आती हैं, तो उन घटकों से जुड़े भविष्य के निर्यात, अपग्रेड या तीसरे पक्ष को हस्तांतरण के लिए संभावित रूप से अमेरिकी नियामक मंजूरी की आवश्यकता हो सकती है.
रक्षा और सुरक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों का कहना है कि एक अमेरिकी फर्म द्वारा ‘एलएमबी’ का अधिग्रहण किए जाने से राफेल की निर्यात स्वतंत्रता स्वतः ही खत्म नहीं हो जाती, लेकिन वे इन चिंताओं को पूरी तरह से खारिज न करने की चेतावनी भी देते हैं.
एक सूत्र ने विस्तार से बताया, “आईटीएआर के लागू होने की सीमा इस बात पर निर्भर करेगी कि अधिग्रहण के बाद आपूर्ति श्रृंखला में अमेरिकी मूल की तकनीक या विनियामक नियंत्रण शामिल किए जाते हैं या नहीं. केवल स्वामित्व में बदलाव से निर्यात की स्थिति नहीं बदलती, लेकिन आईटीएआर की व्याख्या करने में अमेरिका का लचीला ट्रैक रिकॉर्ड, आपूर्ति श्रृंखला के प्रभाव का रणनीतिक मूल्य और निर्यात नियंत्रणों में निहित कानूनी अस्पष्टता यह दर्शाती है कि इस मुद्दे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. “
न्यूयॉर्क स्थित ‘लोअर ग्रुप’ ने पिछले साल दिसंबर में 43.3 करोड़ डॉलर (433 मिलियन डॉलर) में ‘एलएमबी फैन्स एंड मोटर्स’ का अधिग्रहण पूरा किया था.
फ्रांसीसी नेशनल असेंबली में कड़े विरोध के बावजूद पिछले सप्ताह फ्रांस सरकार ने इस सौदे को मंजूरी दे दी. असेंबली में सभी दलों के सांसदों ने एक रणनीतिक रूप से संवेदनशील एयरोस्पेस आपूर्तिकर्ता को अमेरिकी इकाई को सौंपे जाने पर चिंता जताई थी.
यह पूर्व फ्रांसीसी कंपनी एयरोस्पेस और रक्षा प्लेटफार्मों में उपयोग होने वाले उच्च-क्षमता वाले पंखों और ब्रशलेस मोटर्स के डिजाइन और निर्माण में विशेषज्ञता रखती है. इसके पुर्जे राफेल और फ्रांस की परमाणु पनडुब्बियों सहित कई प्रणालियों में लगे होते हैं.
हालांकि, इस अधिग्रहण से मौजूदा प्लेटफार्मों की विनियामक स्थिति तुरंत नहीं बदलती है, लेकिन यह इस संभावना को जन्म देता है कि भविष्य के तकनीकी वर्गीकरण और आपूर्ति-श्रृंखला के निर्णयों के आधार पर, समय के साथ कुछ घटक अमेरिकी निर्यात नियंत्रण निगरानी के दायरे में आ सकते हैं.
भारतीय वायु सेना लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित प्रस्ताव के तहत 114 जेट विमानों के बड़े अधिग्रहण की योजना को आगे बढ़ा रही है.
88 सिंगल-सीटर और 26 ट्विन-सीटर वेरिएंट के इस प्रस्ताव में 18 विमानों के ‘फ्लाई-अवे’ (तैयार स्थिति) में मिलने की संभावना है, जबकि शेष विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा, जिसमें 60 प्रतिशत तक स्वदेशी सामग्री शामिल होगी.
अनुबंध में भारतीय राफेल विमानों को भविष्य के एफ5 मानक (उपलब्ध होने पर) में अपग्रेड करने का प्रावधान शामिल होने की उम्मीद है, जबकि वर्तमान विमानों को एफ4 कॉन्फ़िगरेशन में अपग्रेड किया जाएगा. अलग से, भारत ने पिछले साल भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन लड़ाकू विमानों के अधिग्रहण के लिए 63,000 करोड़ रुपये के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इनकी डिलीवरी 2028 में शुरू होने की उम्मीद है, और इन विमानों को स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर तैनात किया जाएगा.
वन नेशन वन राशन कार्ड: वादा बड़ा, लेकिन प्रवासी मज़दूरों तक पहुंच अब भी सीमित
अगस्त 2019 में शुरू की गई ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ योजना का मक़सद था कि देश के प्रवासी मज़दूर कहीं भी रहकर सस्ता राशन ले सकें. पहले पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के तहत लोगों को सिर्फ अपने गृह जिले की एक तय दुकान से ही राशन मिलता था. इससे करीब 14 करोड़ मौसमी प्रवासी मज़दूर काम के लिए दूसरे राज्यों में जाने पर अपने राशन के हक से वंचित हो जाते थे. नई योजना के तहत बायोमेट्रिक पहचान के ज़रिए देश की किसी भी राशन दुकान से अनाज लेने की सुविधा दी गई.
लेकिन द स्क्रॉल में प्रकाशित हुए वीणा नरेगल की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह योजना लागू होने के पांच साल बाद भी राज्यों के बीच राशन की पोर्टेबिलिटी (एक राज्य से दूसरे राज्य में राशन लेने की सुविधा) बराबर नहीं है. दिल्ली में हर साल लगभग 37 लाख इंटर-स्टेट लेनदेन होते हैं, जो राष्ट्रीय कुल का लगभग 70% है. फिर भी दिल्ली में रहने वाले 80-90 लाख प्रवासियों में से हर महीने सिर्फ करीब 3.1 लाख लोग राशन ले पाते हैं. यानी कुल आबादी का 4% हिस्सा इसका लाभ उठा पा रहा है. इससे साफ है कि आंकड़ों में गतिविधि ज़्यादा दिखती है, लेकिन वास्तविक लाभ सीमित है.
इस समस्या की जड़ योजना की संरचना में है. 2013 के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत लाभार्थियों की संख्या 2011 की जनगणना के आधार पर तय कर दी गई थी और उसे बाद में नहीं बढ़ाया गया. जबकि देश की आबादी 15 करोड़ से अधिक बढ़ चुकी है. यानी अधिकार आधारित योजना को एक तय कोटे में सीमित कर दिया गया. जब कोई व्यक्ति दूसरे राज्य में राशन लेता है तो अनाज उसके गृह राज्य के तय कोटे से ही घटता है. वितरण का खर्च उस राज्य को उठाना पड़ता है जहां राशन लिया जा रहा है, लेकिन उसे कोई अतिरिक्त मदद नहीं मिलती.
कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों ने अपने खर्च पर ज़्यादा लोगों को राशन देना जारी रखा है. लेकिन नई अनिवार्य पोर्टेबिलिटी और केंद्रीकृत निगरानी प्रणाली के कारण इन राज्यों पर वित्तीय दबाव बढ़ा है. केरल में लगभग 55 लाख प्रवासी मज़दूर हैं, लेकिन इंटर-स्टेट पोर्टेबिलिटी बहुत कम है. वजह यह है कि ज्यादा लेनदेन से राज्य की अतिरिक्त वितरण व्यवस्था केंद्रीय निगरानी में उजागर हो सकती है और वित्तीय दबाव बढ़ सकता है.
कुल मिलाकर, वन नेशन वन राशन कार्ड ने तकनीकी रूप से राशन लेने की सुविधा तो दी है, लेकिन लाभार्थियों की संख्या नहीं बढ़ाई. योजना में पोर्टेबिलिटी तो है, पर विस्तार नहीं; निगरानी है, पर अधिकारों का पुनर्मूल्यांकन नहीं. प्रवासी मज़दूर को शामिल करने का दावा किया गया, लेकिन जहां इससे राज्यों पर अतिरिक्त खर्च आता है, वहां यह सुविधा सीमित ही दिखाई देती है.
दिल्ली पुलिस ने ‘लापता लड़कियों में अचानक बढ़ोतरी’ के दावे को बताया भ्रामक
द ऑब्ज़र्वर पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली पुलिस ने राजधानी में लड़कियों के अचानक बड़ी संख्या में लापता होने के दावों को ख़ारिज करते हुए इन्हें भ्रामक और पेड सोशल मीडिया प्रचार बताया है. पुलिस ने कहा कि कुछ वायरल पोस्ट में 1 जनवरी से 15 जनवरी 2026 के बीच 807 लोगों के लापता होने का दावा किया गया था, जिनमें 509 महिलाएं और लड़कियां, 298 पुरुष और 191 नाबालिग शामिल बताए गए. इन पोस्ट में रोज़ाना औसतन 54 लोगों के लापता होने की बात कही गई थी.
पुलिस के अनुसार, जांच में पता चला कि “लापता लड़कियों में उछाल” की कहानी पेड प्रमोशन के ज़रिए फैलाई जा रही थी ताकि लोगों में डर पैदा किया जा सके. संयुक्त पुलिस आयुक्त संजय त्यागी ने कहा कि जनवरी 2026 में मामलों में कोई असामान्य बढ़ोतरी नहीं हुई, बल्कि आंकड़ों में कमी आई है. पुलिस ने बताया कि जनवरी में कुल 1,777 गुमशुदगी के मामले दर्ज हुए, जो 2025 के मासिक औसत (लगभग 2,042 प्रति माह, कुल 24,508 मामले) से कम हैं.
दिल्ली पुलिस ने यह भी कहा कि गुमशुदगी के मामले समय के साथ सुलझते हैं और कई लोगों को हफ्तों या महीनों बाद ढूंढ लिया जाता है. 2016 से 2025 के बीच करीब 1,80,805 लापता लोगों को उनके परिवारों से मिलाया गया, जो लगभग 77% रिकवरी दर दर्शाता है. पुलिस ने ‘ऑपरेशन मिलाप’ और एआई आधारित तकनीकों के उपयोग का भी ज़िक्र किया.
इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाज़ी भी हुई. आम आदमी पार्टी ने दिल्ली सरकार पर निशाना साधते हुए शहर को “लापतागंज” कहा. पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी स्थिति को चिंताजनक बताया. हालांकि पुलिस ने स्पष्ट किया कि वायरल दावे संभवतः लापता बच्चों पर बनी किसी फिल्म के प्रमोशन से जुड़े थे और बिना जांच के उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया. पुलिस ने अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है.
अडानी समूह ‘कानूनी दबाव’ बनाकर पत्रकारों को चुप कराना चाहता है: आरएसएफ
अंतरराष्ट्रीय मीडिया निगरानी संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने अपनी नई रिपोर्ट में अडानी समूह पर आरोप लगाया है कि वह पत्रकारों के ख़िलाफ़ “कानूनी युद्ध” छेड़ रहा है. आरएसएफ के मुताबिक, गौतम अडानी के नेतृत्व वाला यह कॉरपोरेट समूह पिछले कई वर्षों से खोजी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर दीवानी और आपराधिक मानहानि के मुक़दमे कर रहा है, जिससे भारत में प्रेस की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है.
रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से अब तक अडानी समूह ने कम से कम 15 पत्रकारों के काम में रुकावट डालने की कोशिश की है. अब तक किसी भी मामले में किसी पत्रकार या मीडिया संस्थान को दोषी नहीं ठहराया गया है. फिर भी कम से कम चार मामलों में अदालतों ने अंतरिम रोक (गैग ऑर्डर) लगाई, जिससे पत्रकारों को अस्थायी रूप से चुप रहना पड़ा. आरएसएफ का कहना है कि ऐसे मुक़दमों का मकसद पत्रकारों को मानसिक और आर्थिक रूप से थकाना है, ताकि कानूनी प्रक्रिया ही सज़ा बन जाए. फिलहाल नौ पत्रकार अलग-अलग मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, जिनमें परंजॉय गुहा ठाकुरता (सात मामले), अबीर दासगुप्ता (चार मामले) और रवि नायर (दो मामले) शामिल हैं.
आरएसएफ ने अडानी समूह से इन मुक़दमों को वापस लेने की अपील की है और भारतीय संसद से “स्ट्रैटेजिक लॉसूट्स अगेंस्ट पब्लिक पार्टिसिपेशन” (एसएलएपीपी) के खिलाफ़ स्पष्ट कानून बनाने की मांग की है. संस्था की साउथ एशिया डेस्क प्रमुख सेलिया मर्सिए ने कहा कि बार-बार मुक़दमे दायर कर कॉरपोरेट समूहों की जांच को रोकना गंभीर चिंता का विषय है. रिपोर्ट में द वायर, ईपीडब्ल्यू, न्यूज़क्लिक, न्यूज़लॉन्ड्री, द इकोनॉमिक टाइम्स और पत्रकार रवि नायर, अभिसार शर्मा, रवीश कुमार जैसे नामों का भी उल्लेख है. आरएसएफ के अनुसार, अडानी समूह ने इस मामले पर उनके सवालों का कोई जवाब नहीं दिया है.
चाबहार पोर्ट
अमेरिकी दबाव के बीच भारत ने 120 मिलियन डॉलर चुकाए, लेकिन भविष्य अनिश्चित
शुक्रवार, 6 फरवरी 2026 को सरकार ने संसद को बताया कि उसने चाबहार बंदरगाह के लिए अपनी 120 मिलियन डॉलर (करीब 1000 करोड़ रुपये) की प्रतिबद्धता को पूरी तरह से चुका दिया है. यह कदम अप्रैल 2026 में अमेरिकी प्रतिबंधों से मिली छूट की समयसीमा समाप्त होने से ठीक पहले उठाया गया है. द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, 2026-27 के केंद्रीय बजट में चाबहार के लिए कोई नया आवंटन नहीं किया गया है, जिससे विपक्ष ने सवाल उठाए हैं.
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह अमेरिकी दबाव में चाबहार परियोजना से “समय से पहले पीछे हट रही” है. उन्होंने कहा कि यह पोर्ट अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए भारत का प्रमुख जरिया था. हालांकि, विदेश मंत्रालय (MEA) ने जवाब दिया कि भारत ने उपकरणों की खरीद के लिए अपनी वित्तीय प्रतिबद्धता पूरी कर ली है और वह अमेरिका व ईरान दोनों के संपर्क में है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर कड़े प्रतिबंधों और भारत पर 25% टैरिफ लगाने की धमकी दी है, जिससे स्थिति जटिल हो गई है. भारत ने ट्रंप की पिछली धमकियों के बाद से ही ईरान से तेल आयात बंद कर दिया था.
भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फताली ने पत्रकारों से कहा कि भारत सरकार ने अभी तक पोर्ट के भविष्य को लेकर अपनी योजनाओं के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं दी है. उन्होंने कहा, “हमें विश्वास है कि भारत इस मुद्दे को सुलझाना चाहता है, लेकिन अभी तक भारतीय पक्ष से कोई टिप्पणी नहीं मिली है.” उन्होंने यह भी कहा कि इस साल के अंत में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की संभावित भारत यात्रा से संबंधों को मजबूती मिल सकती है.
ईरान के राजदूत मोहम्मद फताली ने शुक्रवार को कहा कि तेहरान का मानना है कि भारत सरकार चाबहार बंदरगाह के निरंतर उपयोग को लेकर बनी “स्थिति को संभालने” के लिए उत्सुक है. यह बयान ऐसे समय में आया है, जब व्हाइट हाउस में ट्रंप की वापसी के बाद, ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए बंदरगाह के लिए दी गई प्रतिबंधों की छूट हटा ली गई है, जिसके बाद भारत वहां अपना परिचालन समेट रहा है.
केशव पद्मनाभन के मुताबिक, फताली की यह टिप्पणी भारत सरकार द्वारा पिछले कुछ महीनों में ईरान को 120 मिलियन डॉलर (लगभग 12 करोड़ डॉलर) हस्तांतरित करने के बाद आई है. यह राशि चाबहार के ‘शाहिद बेहश्ती टर्मिनल’ में अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए दी गई थी. ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित इस बंदरगाह को अमेरिका से दीर्घकालिक प्रतिबंध छूट मिली हुई थी, जिसे पिछले साल आगे नहीं बढ़ाया गया. हालांकि, अमेरिका ने भारत को छह महीने की एक अस्थायी छूट जरूर दी है, जो 26 अप्रैल 2026 तक वैध है.
राजधानी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान फताली ने कहा, “चाबहार तो चाबहार ही है. इसकी लोकेशन (स्थान) नहीं बदलेगी. कुछ देश मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए इस स्थान का उपयोग करते हैं. इस मुद्दे पर भारत के साथ हमारे अच्छे संबंध हैं. मेरा मानना है कि भारत सरकार स्थिति को संभालना चाहती है.”
ईरानी राजदूत ने आगे कहा: “चाबहार पूरी तरह से हमारी अपनी क्षमता से बना है. यदि कोई देश इस क्षमता का उपयोग करना चाहता है, तो आपको उन देशों से पूछना चाहिए. हमने इस पर भारत की ओर से कोई (विपरीत) टिप्पणी नहीं सुनी है.”
मध्य प्रदेश में बीजेपी मंत्री करण सिंह वर्मा का धमकी भरा बयान: बैठक में न आने वाली ‘लाड़ली बहनों’ के नाम हटाने की चेतावनी
मध्यप्रदेश के राजस्व मंत्री और बीजेपी नेता करण सिंह वर्मा ने 5 फरवरी को सीहोर जिले के धामंदा गांव में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान विवादित बयान दिया. द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि जो “लाड़ली बहनें” बैठक में नहीं आएंगी, उनके नाम योजना की सूची से हटा दिए जाएंगे.
उन्होंने मंच से कहा कि वह सीईओ को बुलाकर सभी लाभार्थियों को एक दिन बुलाने के लिए कहेंगे और जो नहीं आएंगी, उनके नाम काट दिए जाएंगे. यह कार्यक्रम इछावर विधानसभा क्षेत्र में एक उप-स्वास्थ्य केंद्र के उद्घाटन का था. इस दौरान उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल से हर घर में दिल्ली से गेहूं भेजा जा रहा है और लाड़ली बहना योजना के तहत हर महीने 1,500 रुपये दिए जा रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने महिलाओं को एक पैसा भी नहीं दिया. गांव में 894 लाड़ली बहनें हैं, लेकिन कार्यक्रम में कम लोगों की उपस्थिति पर उन्होंने नाराज़गी जताई. घटना का एक कथित वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुआ.
कांग्रेस नेता भूपेंद्र गुप्ता अगम ने इस बयान की आलोचना करते हुए कहा कि यह टैक्सदाताओं का पैसा है, किसी की निजी संपत्ति नहीं. उन्होंने कहा कि योजना के नाम पर वोट लेकर अब महिलाओं को धमकाना गलत है.
इससे पहले दिसंबर में राज्य के एक अन्य मंत्री विजय शाह भी विवाद में आए थे. उन्होंने कहा था कि लाड़ली बहना योजना की लाभार्थियों को मुख्यमंत्री का “सम्मान” करना चाहिए, क्योंकि योजना के तहत करोड़ों रुपये दिए जा रहे हैं. उन्होंने चेतावनी दी थी कि जो ऐसा नहीं करेंगे, उनके आवेदन रोके जा सकते हैं और आधार लिंकिंग की समस्या से भुगतान भी बंद हो सकता है. यह बयान रतलाम में जिला विकास सलाहकार समिति की बैठक में दिया गया था.
बॉलीवुड ने अपनाई ताज महल की ‘साजिश’: नई फिल्म ने छेड़ी बहस
दुनिया की सबसे प्रसिद्ध इमारतों में से एक ताज महल को लेकर इंटरनेट पर चल रही साजिश की थ्योरीज अब बॉलीवुड तक पहुंच गई हैं. 6 फरवरी 2026 को प्रकाशित न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट (स्टीवन ली मायर्स द्वारा) के अनुसार, नई फिल्म “द ताज स्टोरी” ने उन दावों को हवा दी है कि ताज महल असल में एक हिंदू मंदिर या महल था.
फिल्म में परेश रावल जैसे मंझे हुए अभिनेता हैं और यह एक कोर्टरूम ड्रामा के रूप में पेश की गई है. फिल्म के निर्देशक तुषार अमरीश गोयल का कहना है कि उन्होंने “तर्कों को अदालत में रखा है”, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह फिल्म उन दावों को मुख्यधारा में ला रही है जिन्हें इतिहासकारों ने बार-बार खारिज किया है. यह थ्योरी पी.एन. ओक नामक एक ‘स्यूडो-हिस्टोरियन’ (छद्म इतिहासकार) ने दशकों पहले दी थी, जिसमें दावा किया गया था कि ताज महल के तहखाने में 22 गुप्त कमरे हैं जहां हिंदू मूर्तियां छिपी हैं.
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और सुप्रीम कोर्ट ने अतीत में ऐसे दावों को कई बार खारिज किया है. इतिहासकार रुचिका शर्मा ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि 20 करोड़ मुसलमानों वाले देश में ऐसी फिल्में “सांप्रदायिक जहर” का काम करती हैं. हालांकि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बहुत बड़ी हिट नहीं रही, लेकिन सोशल मीडिया पर इसने बहस को तेज कर दिया है. ताज महल के एक गाइड शम्सुद्दीन खान ने फिल्म को “बकवास” बताते हुए कहा कि निर्माता तथ्यों को तोड़-मरोड़ रहे हैं.
वैभव सूर्यवंशी ने मात्र 80 गेंदों में जड़े 175 रन, 15 छक्के और 15 चौके, डेढ़ सौ रन सिर्फ 30 गेंदों पर
भारतीय बल्लेबाजी के युवा सनसनी वैभव सूर्यवंशी ने शुक्रवार को पावर-हिटिंग का लुभावना प्रदर्शन किया. उन्होंने अंडर-19 विश्व कप के इतिहास का दूसरा सबसे तेज़ शतक जड़ा और रिकॉर्ड बुक को नए सिरे से लिख दिया.
‘पीटीआई’ के अनुसार, 14 वर्षीय इस सलामी बल्लेबाज ने जिम्बाब्वे के हरारे में इंग्लैंड के खिलाफ अंडर-19 विश्व कप के फाइनल में केवल 55 गेंदों में अपना शतक पूरा किया. इसके बाद उन्होंने मात्र 80 गेंदों में 175 रनों की तूफानी पारी खेली, एक ऐसी पारी जिसकी चर्चा इस संस्करण के समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक होती रहेगी.
उनकी पारी, जिसमें 15 आश्चर्यजनक छक्के शामिल थे, ने भारत को शुक्रवार को फाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ रिकॉर्ड 411/9 के स्कोर तक पहुँचा दिया. वह मात्र 55 गेंदों में अपना शतक पूरा कर इन टूर्नामेंटों में दूसरे सबसे तेज़ शतकवीर बन गए. यह अंडर-19 विश्व कप फाइनल में सर्वश्रेष्ठ व्यक्तिगत स्कोर का रिकॉर्ड है और टूर्नामेंट के खिताबी मुकाबले में किसी टीम द्वारा बनाया गया अब तक का सबसे बड़ा स्कोर भी है.
इस सलामी बल्लेबाज ने सबसे महत्वपूर्ण मौके पर अपना रौद्र रूप दिखाया, महज 32 गेंदों में अपना अर्धशतक पूरा किया और अपने विविध स्ट्रोक्स के साथ अंग्रेजी गेंदबाजों को परेशान करना जारी रखा.
उनका दूसरा पचासा (50 से 100 रन) सिर्फ 23 गेंदों में आया. उनकी 175 रनों की पारी में से कुल 150 रन केवल चौकों और छक्कों (15 छक्के और 15 चौके) से आए. अपनी इस पारी के दौरान उन्होंने विपक्षी आक्रमण के साथ खिलवाड़ किया और हरारे स्पोर्ट्स क्लब को मानो अपना खेल का मैदान बना लिया.
अब उनके नाम यूथ वनडे की एक पारी में सर्वाधिक छक्के लगाने का रिकॉर्ड दर्ज हो गया है, उन्होंने दिसंबर में दुबई के आईसीसीए में यूएई के खिलाफ लगाए गए अपने ही 14 छक्कों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है. सूर्यवंशी के नाम अब अंडर-19 क्रिकेट में सबसे तेज़ 150 रन (71 गेंदों पर) बनाने का रिकॉर्ड भी है. उन्होंने इंग्लैंड के बेन मेयस द्वारा इसी प्रतियोगिता में पहले स्कॉटलैंड के खिलाफ बनाए गए 98 गेंदों के रिकॉर्ड को बेहतर किया.
पीएम मोदी के ख़िलाफ़ पोस्ट पर दर्ज FIR सही: मुंबई पुलिस ने हाईकोर्ट में कहा
मकतूब मीडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मुंबई पुलिस ने बॉम्बे हाईकोर्ट में कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ कथित आपत्तिजनक और भड़काऊ पोस्ट करना सिर्फ अभिव्यक्ति की बात नहीं, बल्कि “संवैधानिक पद की छवि खराब करने की संगठित कोशिश” हो सकती है. यह मामला यूके में रहने वाले डॉक्टर और यूट्यूबर डॉ. संग्राम पाटिल से जुड़ा है, जिनके ख़िलाफ़ दिसंबर 2025 में एफआईआर दर्ज की गई थी.
पुलिस के हलफ़नामों में कहा गया है कि डॉ. पाटिल टूरिस्ट वीज़ा पर भारत आए थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ कथित रूप से मानहानिकारक और भड़काऊ सामग्री पोस्ट की. पुलिस का कहना है कि यह जांच का विषय है कि क्या उनकी पोस्ट किसी बड़े और संगठित प्रयास का हिस्सा थीं. बोरीवली (एमएचबी कॉलोनी) में हुई एक हिंसक घटना को उन्होंने सोशल मीडिया पर “योजनाबद्ध क्षेत्रीय संघर्ष” बताकर पेश किया, जिससे सामाजिक तनाव भड़क सकता था.
यह एफआईआर बीजेपी मीडिया सेल के पदाधिकारी निखिल भामरे की शिकायत पर दर्ज हुई. आरोप है कि “शहर विकास अघाड़ी” नाम के फेसबुक पेज के जरिए समुदायों के बीच नफरत फैलाने वाली सामग्री साझा की गई. पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या डॉ. पाटिल ने अपने टूरिस्ट वीज़ा की शर्तों का उल्लंघन किया और क्या भारत में उनके सहयोगी थे. पुलिस ने कहा है कि जांच के लिए उनका भारत में रहना ज़रूरी है, क्योंकि यूके लौटने के बाद उनसे पूछताछ मुश्किल हो सकती है.
डॉ. पाटिल, जो भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक हैं, ने हाईकोर्ट में एफआईआर और लुक आउट सर्कुलर को रद्द करने की मांग की है. उनका कहना है कि उन्हें राजनीतिक कारणों से निशाना बनाया जा रहा है और आपराधिक कानून का दुरुपयोग कर असहमति को दबाया जा रहा है. वहीं पुलिस का कहना है कि उन्होंने जांच में पूरा सहयोग नहीं किया और अपने उपकरण व अकाउंट की जानकारी फॉरेंसिक जांच के लिए उपलब्ध नहीं कराई. मामला फिलहाल बॉम्बे हाईकोर्ट में लंबित है.
बालाघाट के घोटी गांव में मुस्लिम परिवारों का बहिष्कार खत्म, लेकिन कार्रवाई पर सवाल कायम
द ऑब्ज़र्वर पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़ मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के घोटी गांव में मुस्लिम परिवारों के ख़िलाफ़ लगाया गया सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार पुलिस और जिला प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद आधिकारिक रूप से खत्म कर दिया गया है. हालांकि, इस पूरे मामले में ज़िम्मेदारी तय करने और कार्रवाई को लेकर अब भी सवाल उठ रहे हैं.
27 जनवरी को गांव में आयोजित एक हिंदू सम्मेलन में इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ़ कथित रूप से भड़काऊ और आपत्तिजनक भाषण दिए गए. जब स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया, तो गांव में बैठक कर घोटी के 10 मुस्लिम परिवारों के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की बात कही गई. ग्रामीणों के अनुसार, घोषणा की गई कि कोई भी हिंदू परिवार मुसलमानों से संपर्क नहीं रखेगा. उनसे बात करने, काम देने, उनकी दुकानों से सामान खरीदने या उनके कार्यक्रमों में जाने पर 5,000 रुपये जुर्माना और सामाजिक बहिष्कार की चेतावनी दी गई. करीब एक हफ्ते तक मुस्लिम परिवारों को काम, व्यापार और सामाजिक संबंधों से वंचित रखा गया.
मामला बाहर आने के बाद प्रशासन हरकत में आया. पहले अधिकारियों ने जानकारी से इनकार किया, लेकिन आलोचना बढ़ने पर शांति समिति की बैठक बुलाई गई. लांजी एसडीओपी ओमप्रकाश ने बताया कि एसडीएम कमल सिंह सिंगसार, तहसीलदार संजय भास्कर और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में दोनों समुदायों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठक हुई, जिसमें शांति और भाईचारा बनाए रखने पर सहमति बनी.
हालांकि मुस्लिम परिवारों का कहना है कि समझौते से राहत तो मिली, लेकिन न्याय नहीं मिला. उनका सवाल है कि नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने और बहिष्कार लागू करने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई. उनका कहना है कि “हमें काम नहीं मिला, हमारी दुकानों से कोई सामान नहीं खरीदता था. हमारे मर्द घर पर बैठे रहे.” गांव के अधिकतर मुस्लिम परिवार मज़दूरी, छोटी दुकानों, ड्राइविंग और खेती पर निर्भर हैं, इसलिए बहिष्कार से उनकी आजीविका और सम्मान दोनों प्रभावित हुए.
कुछ ग्रामीणों ने बहिष्कार से इनकार किया. नेतराम तिडके ने इसे अफवाह बताया, जबकि तुलाराम ने कहा कि बात-चीत से मामला सुलझ जाएगा. पूर्व विधायक किशोर समरिते ने प्रशासन की आलोचना करते हुए गृह मंत्रालय से जांच की मांग की और कहा कि पुलिस को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए थी.
भागीरथपुरा में दूषित पानी से एक ही परिवार में दूसरी मौत, ड्रेनेज लाइन से मिला गंदगी का सुराग
मध्यप्रदेश के इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से हो रही मौतों का सिलसिला जारी है. द मूकनायक की रिपोर्ट के मुताबिक़ गुरुवार को हलकूप्रसाद यादव की इलाज के दौरान मौत हो गई. वे कई दिनों से अस्पताल में वेंटिलेटर पर थे. इससे पहले इसी बीमारी से उनकी पत्नी की भी मौत हो चुकी है. लोगों का कहना है कि उल्टी-दस्त के मामले तेज़ी से बढ़े हैं और खासकर बुजुर्गों की हालत ज़्यादा बिगड़ रही है. मरीज़ों में शुरुआत में सामान्य लक्षण दिखते हैं, लेकिन बाद में शरीर के दूसरे अंग भी प्रभावित हो रहे हैं. लोगों को डर है कि यदि जल्द पूरी व्यवस्था ठीक नहीं हुई तो हालात और खराब हो सकते हैं.
जांच में सामने आया कि वार्ड 80 में कुछ मकानों ने अवैध रूप से अपनी निजी ड्रेनेज लाइन नर्मदा जल के वाल्व चैंबर से जोड़ दी थी. जब पानी का वाल्व खोला जाता था तो नाले का गंदा पानी पीने के पानी में मिलकर घरों तक पहुंच रहा था. शिकायत के बाद नगर निगम ने खुदाई कर ड्रेनेज लाइन अलग कराई. पार्षद प्रशांत बड़वे के अनुसार, 12 ज्योतिर्लिंग मंदिर के पास जांच में बदबूदार पानी मिला और चार मकानों की अवैध कनेक्शन की पुष्टि हुई. रहवासी संघ ने आरोप लगाया कि ये मकान मूल ले-आउट में नहीं हैं और शिकायत करने वालों को धमकाया गया. निगम ने लाइन अलग कर शुद्ध जल आपूर्ति शुरू करने का दावा किया है और अब इन मकानों की वैधता की भी जांच होगी. वहीं रंगवासा सिंदौड़ा स्थित ताप्ती परिसर में भी गंदगी और अधूरे निर्माण कार्यों को लेकर लोगों ने नाराज़गी ज़ाहिर की है, जहां निगमायुक्त ने निरीक्षण कर काम जल्द पूरा करने के निर्देश दिए.
ट्रंप ने ओबामा को ‘बंदर’ दिखाने वाला वीडियो शेयर किया, व्हाइट हाउस ने कहा ‘फेक आउटरेज’
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक नस्लभेदी वीडियो शेयर किया है जिसमें पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा को ‘बंदर’ के रूप में दिखाया गया है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, 62 सेकंड के इस वीडियो में “द लायन स्लीप्स टुनाइट” गाना बज रहा है और ट्रंप को ‘जंगल का राजा’ (शेर) तथा डेमोक्रेट्स को जानवरों के रूप में चित्रित किया गया है.
सीनेटर टिम स्कॉट, जो सीनेट में एकमात्र अश्वेत रिपब्लिकन हैं, ने इसे “व्हाइट हाउस से आई अब तक की सबसे नस्लभेदी चीज” कहा और इसे हटाने की मांग की. ऐतिहासिक रूप से, अश्वेत लोगों को जानवरों के रूप में चित्रित करना एक पुराना नस्लवादी हथकंडा रहा है जिसका इस्तेमाल अमानवीयकरण के लिए किया जाता था.
हालांकि, व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने इस आलोचना को खारिज करते हुए इसे “फेक आउटरेज” (फर्जी गुस्सा) करार दिया. उन्होंने कहा, “यह सिर्फ एक इंटरनेट मीम है जिसमें ट्रंप को शेर और डेमोक्रेट्स को ‘लायन किंग’ के किरदारों के रूप में दिखाया गया है. मीडिया को असली मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए.” कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने इसे “घिनौना व्यवहार” बताया है.
20 साल पुरानी पालतू मछली की मौत से पूरा परिवार सदमे में, दी अनोखी विदाई
ओडिशा के बालासोर शहर के एक शांत पड़ोस में, शोक ने एक असामान्य लेकिन गहरा मानवीय रूप ले लिया है. एक परिवार किसी व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि अपनी पालतू मछली के लिए शोक मना रहा है—एक ऐसी मछली जो उनके साथ 20 से अधिक वर्षों तक रही और जिसे घर के सदस्य की तरह प्यार दिया गया.
भुवनेश्वर से अक्षय कुमार साहू की रिपोर्ट है कि “जायंट गौरामी” प्रजाति की इस मछली का संजय दास के परिवार के साथ दो दशकों का असाधारण बंधन था. 20साल पहले जमशेदपुर से एक नन्ही, दो इंच की मछली के रूप में घर लाई गई यह मछली, परिवार की देखरेख में लगभग तीन फीट लंबी और करीब चार किलोग्राम वजन वाले एक विशाल जीव में विकसित हो गई थी.
बीते वर्षों में, यह गौरामी उनके दैनिक जीवन की लय में रच-बस गई थी. परिवार के सदस्यों का कहना है कि पुकारने पर वह प्रतिक्रिया देती थी और सीधे उनके हाथों से खाना खाती थी—ऐसा व्यवहार जो अक्सर मछलियों के बजाय स्तनधारी जीवों में देखा जाता है. परिवार के एक सदस्य ने कहा, “यह सिर्फ एक पालतू जीव नहीं था, बल्कि हम में से ही एक महसूस होता था.” लगभग 20 साल और चार महीने तक जीवित रहने के बाद, हाल ही में मछली की मृत्यु हो गई, जिससे पूरा परिवार गहरे सदमे में है. यह क्षति परिवार के एक छोटे बच्चे के लिए विशेष रूप से कठिन थी, जो मछली के साथ ही बड़ा हुआ था और उसे अपना साथी मानता था.
इस मृत्यु को सामान्य रूप से न लेते हुए, परिवार ने उसे गरिमा और भावनाओं के साथ विदा करने का फैसला किया. शव को फेंकने के बजाय, उन्होंने उसका अंतिम संस्कार किया. मछली को उनके घर की छत पर एक ट्रे में रखी मिट्टी में दफनाया गया और उसके ऊपर गुलाब का एक पौधा लगाया गया—जो उनके बीच के बंधन का एक जीवंत स्मारक है. परिवार उस पौधे की देखभाल जारी रखे हुए है, उनका कहना है कि इससे यादों को जीवित रखने में मदद मिलती है.
स्थानीय पत्रकार सुदाम पात्रा ने कहा, “इस घटना ने घर की सीमाओं से परे लोगों के दिलों को छुआ है और उन भावनात्मक संबंधों की ओर ध्यान आकर्षित किया है जो इंसान जानवरों के साथ बना सकते हैं, यहां तक कि उनके साथ भी जिनके शरीर पर बाल या पंख नहीं होते. ऐसी दुनिया में जहां पालतू जानवरों को परिवार के रूप में देखा जा रहा है, दास परिवार की यह विदाई एक मार्मिक याद दिलाती है कि प्यार और नुकसान की परिभाषा प्रजातियों से तय नहीं होती.”
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