06/03/2026: एप्सटीन फाइल्स में ट्रंप | रूसी तेल खरीदने की परमिशन? | नेपाल रैपर पीएम बनने को | ईरानी बच्चियों का ख़ून अमेरिकी हाथों पर | जंग का 7वां दिन | ब्रांड दुबई को धक्का | कल्याण का झूठ | कोहरा-2
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
ट्रंप फाइल्स: एफबीआई ने जारी किए नए दस्तावेज़, ट्रंप पर नाबालिग से यौन शोषण और मारपीट का आरोप.
नेपाल चुनाव: रैपर बालेन शाह की पार्टी ऐतिहासिक जीत की ओर, के.पी. ओली अपने ही गढ़ में पिछड़े.
ईरान युद्ध: अमेरिकी हमले में 175 स्कूली बच्चे मारे गए, खामेनेई की मौत के बाद उत्तराधिकार का संकट गहराया.
भारत में एलपीजी संकट: सरकार ने लागू की आपातकालीन शक्तियां, रिफाइनरियों को सिर्फ़ रसोई गैस बनाने का आदेश.
बाबरी विध्वंस: पूर्व अटॉर्नी जनरल का खुलासा- कल्याण सिंह ने कोर्ट से बोला था ‘साफ़ झूठ’.
बिहार मॉब लिंचिंग: मधुबनी में मुस्लिम महिला को जबरन पेशाब पिलाया, पिटाई से मौत.
…इसके बाद ट्रंप ने चिल्लाकर अपने लोगों से कहा, "इस लिटिल बिच को यहाँ से बाहर निकालो!"
न्यूयोर्क टाइम्स के मुताबिक़ अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ख़िलाफ़ अमेरिका के न्याय विभाग ने एफबीआई को कुछ और दस्तावेज़ जारी किए हैं, इसमें उस महिला का इंटरव्यू भी शामिल है जिसने ट्रंप पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. यह दस्तावेज़ इसलिए अहम है क्यों की यह पहले जारी किए गए रिकॉर्ड में शामिल नहीं था. दरअसल अधिकारियों ने गलती से इसे पहले से मौजूद दस्तावेज़ों की डुप्लीकेट कॉपी समझ लिया था. बाद में समीक्षा में पता चला कि यह आकलन गलत था, जिसके बाद अब इन्हें सार्वजनिक किया गया.
दस्तावेज़ों में 2019 में एफबीआई द्वारा महिला से किए गए कई इंटरव्यू का सार दर्ज है. महिला ने उस समय सामने आकर कहा था कि उसे एपस्टीन और ट्रंप दोनों ने जिस्मानी तौर पर प्रताड़ित किया था. उन्होंने यह आरोप 1980 के दशक की घटना से जुड़ा बताया, जब वह नाबालिग़ थी.
‘पॉलिटिको’ में एरिका ऑरडेन की रिपोर्ट है कि महिला का मुख्य आरोप यह है कि जब ट्रंप ने उसे ओरल सेक्स के लिए मजबूर करने की कोशिश की और उसने उनके लिंग पर काट लिया, तो इसके जवाब में ट्रंप ने उसे मारा था. महिला (जिसका नाम गोपनीय रखा गया है) ने आरोप लगाया है कि जब वह 13 से 15 वर्ष के बीच की थी, तब एपस्टीन उसे न्यूयॉर्क या न्यू जर्सी ले गया था, जहाँ “विशाल कमरों वाली एक बहुत ऊंची इमारत” में उसने उसका परिचय ट्रंप से कराया था. महिला के अनुसार, ट्रंप को यह पसंद नहीं आया कि वह एक “बॉय-गर्ल” (जिसका साक्षात्कार नोट में अर्थ ‘टॉमबॉय’ निकाला गया है) की तरह दिखती थी.
महिला ने बताया कि वहां अन्य लोग भी मौजूद थे, लेकिन उसे याद नहीं कि वे कौन थे. साक्षात्कार के नोट्स के अनुसार, ट्रंप ने उन्हें कमरे से बाहर जाने को कहा और फिर कुछ ऐसा कहा जिसका अर्थ था, “चलो मैं तुम्हें सिखाता हूं कि छोटी लड़कियों को कैसा होना चाहिए.” महिला ने साक्षात्कार में याद करते हुए बताया कि इसके बाद ट्रंप ने अपनी पैंट की चेन खोली और उसका सिर “अपने लिंग की ओर” झुका दिया. उसने कहा कि उसने उस पर “पूरी ताकत से काट लिया.” इसके जवाब में, महिला ने आरोप लगाया कि ट्रंप ने उसके बाल खींचे और उसके सिर के किनारे पर मुक्का मारा.
महिला ने याद करते हुए बताया कि उसने (ट्रंप ने) कहा, “इस छोटी कुतिया को यहाँ से दफा करो.” उसने बताया कि उस समय लोग कमरे में वापस आ गए थे. एफबीआई के इन साक्षात्कारों में इस बारे में जानकारी नहीं है कि वह घटना कैसे समाप्त हुई या महिला वहां से बाहर कैसे निकली. हालांकि इन आरोपों की तस्दीक़ नहीं हुई है और ट्रंप ने हमेशा ऐसे किसी भी आरोप से इनकार किया है.
एफबीआई ने महिला से कुल चार बार इंटरव्यू किया था, लेकिन पहले सार्वजनिक किए गए रिकॉर्ड में सिर्फ एक इंटरव्यू का सार शामिल था, जिसमें उसने एपस्टीन द्वारा किए गए कथित हमले के बारे में बताया था. बाकी तीन इंटरव्यू के दस्तावेज़ गायब होने से सवाल उठे थे. शुरुआत में अधिकारियों ने कहा था कि ये डुप्लीकेट थे, लेकिन बाद में जांच में पता चला कि ऐसा नहीं था. नए जारी दस्तावेज़ों में यह भी बताया गया है कि बाद के इंटरव्यू में जब एजेंटों ने उससे ट्रंप के साथ हुई घटनाओं के बारे में और जानकारी मांगी, तो उसने आगे सवालों का जवाब देने से मना कर दिया और जांचकर्ताओं से संपर्क तोड़ लिया.
नेपाल
रैपर से मेयर से पीएम बनने की तरफ बालेन शाह
‘एचटी’ की रिपोर्ट के अनुसार, बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) नेपाल में 110 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि नेपाली कांग्रेस केवल 10 सीटों तक सिमट कर रह गई है. झापा-5 में मतगणना जारी रहने के साथ ही, इस रैपर-राजनेता की पार्टी ने सीपीएन-यूएमएल नेता के.पी. शर्मा ओली पर अपनी बढ़त और मजबूत कर ली है. नवीनतम मतगणना के अनुसार, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के बालेंद्र शाह अब एक ऐतिहासिक जीत की ओर अग्रसर हैं और नेपाल के 110 निर्वाचन क्षेत्रों में आगे चल रहे हैं. उनकी पार्टी ने ओली के घरेलू मैदान, झापा-5 से पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के खिलाफ अपनी बढ़त को और बढ़ा दिया है.
शाह की पार्टी को अक्सर ‘जेन ज़ी’ समर्थित पार्टी के रूप में वर्णित किया जाता है, क्योंकि उनका राजनीतिक उत्कर्ष युवाओं की उस हताशा की लहर से गहराई से जुड़ा है जिसने पिछले साल के युवा विरोध प्रदर्शनों को हवा दी थी.
सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़ रखने वाले पूर्व रैपर, शाह ने डिजिटल पहुंच, सत्ता-विरोधी संदेशों और पारंपरिक राजनीतिक दिग्गजों की आलोचना के माध्यम से युवा और शहरी मतदाताओं के बीच अपनी लोकप्रियता बनाई. हिमालयी राष्ट्र नेपाल एक नई संसद चुनने के लिए तैयार है, जो ‘जेन ज़ी’ के नेतृत्व वाले उन विरोध प्रदर्शनों के लगभग छह महीने बाद हो रहा है, जिसमें 77 लोग मारे गए थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा था.
ईरान युद्ध
अमेरिका ने मारा था मिनाब के प्राइमरी स्कूल में 175 से ज्यादा बच्चियों को
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी को दक्षिणी ईरान के मिनाब शहर के एक एलिमेंट्री स्कूल पर हुए हमले में दर्जनों बच्चों सहित भारी जान-माल का नुकसान हुआ है. यह अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद से नागरिक हताहतों की सबसे बड़ी घटना है. हालाँकि किसी भी पक्ष ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा जुटाए गए सबूत—जिनमें सैटेलाइट तस्वीरें और वीडियो शामिल हैं—यह संकेत देते हैं कि स्कूल एक ‘प्रिसिजन स्ट्राइक’ (सटीक हमले) की चपेट में आया.
टाइम्स की जाँच बताती है कि यह हमला उसी समय हुआ जब पास ही स्थित ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स’ (आईआरजीसी) के नौसैनिक अड्डे पर हमले हो रहे थे. अमेरिकी अधिकारियों के बयान भी यह सुझाव देते हैं कि अमेरिकी बल उस समय होर्मुज जलडमरूमध्य के पास नौसैनिक लक्ष्यों पर हमला कर रहे थे, जहाँ यह बेस स्थित है. ईरानी स्वास्थ्य अधिकारियों और सरकारी मीडिया के अनुसार, ‘शजराह तय्येबेह’ एलिमेंट्री स्कूल पर हुए इस हमले में कम से कम 175 लोग मारे गए हैं.
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा, “हमारी जानकारी में ऐसा नहीं है,” और बताया कि युद्ध विभाग इसकी जाँच कर रहा है. वहीं, इज़रायली सेना के प्रवक्ता नदाव शोशानी ने कहा कि उन्हें उस समय उस क्षेत्र में किसी भी इज़रायली ऑपरेशन की जानकारी नहीं है.
अखबार द्वारा विश्लेषण किए गए प्लैनेट लैब्स की सैटेलाइट तस्वीरें दिखाती हैं कि स्कूल की इमारत और पास के नौसैनिक अड्डे की कम से कम छह इमारतों पर सटीक हमले हुए हैं. पेंटागन के पूर्व सलाहकार और सुरक्षा विश्लेषक वेस जे. ब्रायंट ने तस्वीरों को देखकर निष्कर्ष निकाला कि स्कूल सहित सभी इमारतों पर “पिक्चर परफेक्ट” सटीक हमले किए गए थे. उनका मानना है कि यह संभवतः “टार्गेट मिसआइडेंटिफिकेशन” (गलत लक्ष्य की पहचान) का मामला हो सकता है, जहाँ हमलावरों को यह नहीं पता था कि इमारत में नागरिक मौजूद हैं.
ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने पुष्टि की कि अमेरिकी सेना दक्षिणी ईरान में हमले कर रही थी, जबकि इज़रायली सेना मुख्य रूप से उत्तर में सक्रिय थी. जनरल केन ने कहा कि “दक्षिणी धुरी पर यूएसएस अब्राहम लिंकन स्ट्राइक ग्रुप दबाव बना रहा है.” ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की युद्ध कानूनों की विशेषज्ञ जेनिना डिल ने कहा कि हमलावरों की यह जिम्मेदारी होती है कि वे लक्ष्य की स्थिति की पुष्टि करें ताकि नागरिकों को नुकसान न पहुँचे.
ईरान युद्ध का 7वां दिन
खामेनेई की मौत के बाद उत्तराधिकार का संकट और खाड़ी देशों पर हमले
अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध अपने सातवें दिन में प्रवेश कर चुका है. अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ के तहत अमेरिकी और इज़रायली हमले जारी हैं.
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) का अनुमान है कि इस ऑपरेशन के पहले 100 घंटों की लागत 3.7 बिलियन डॉलर (लगभग 891 मिलियन डॉलर प्रतिदिन) आंकी गई है. हमलों की शुरुआत के बाद से ईरान में 1,230 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.
शनिवार को तेहरान पर हुए अमेरिकी-इज़रायली हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद उत्तराधिकार को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. रिपोर्टों के अनुसार उनके बेटे मोजतबा खामेनेई कमान संभाल सकते हैं, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि वे ईरान के अगले नेता के चयन में प्रत्यक्ष भूमिका निभाएंगे और मोजतबा को “अस्वीकार्य” बताया है.
ईरान की जवाबी कार्रवाई भी तेज हो गई है. कुवैत, बहरीन, यूएई और कतर ने ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों की सूचना दी है. कुवैत में अमेरिकी दूतावास का कामकाज निलंबित कर दिया गया है. बहरीन में एक तेल रिफाइनरी पर मिसाइल गिरी, जबकि दोहा में भी धमाकों की आवाज़ें सुनी गईं. हालाँकि, अमेरिका का दावा है कि ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं में 90% की गिरावट आई है और उसकी वायु रक्षा प्रणाली का 80% हिस्सा नष्ट हो चुका है.
इज़रायली सेना लेबनान पर भारी बमबारी कर रही है और बेरूत के दक्षिणी उपनगरों को खाली करने की चेतावनी दी है. आर्थिक मोर्चे पर, युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ने से अमेरिकी शेयर बाजार लुढ़क गए हैं और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने चेतावनी दी है कि उनका देश आर्थिक आपातकाल के करीब है.
खाड़ी देशों में कुछ ही हफ्तों में बंद हो सकता है ऊर्जा उत्पादन
इसी बीच, कतर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ को बताया कि यह युद्ध कुछ ही हफ्तों में खाड़ी देशों के ऊर्जा उत्पादन को बंद कर सकता है, जिससे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं और यह “दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को धराशायी” कर सकता है. दुनिया के दूसरे सबसे बड़े एलएनजी उत्पादक कतर ने, अपने सबसे बड़े तरलीकृत प्राकृतिक गैस संयंत्र ‘रास लफ़ान’ पर ईरानी ड्रोन हमले के बाद इस सप्ताह उत्पादन रोक दिया है.
काबी ने ‘एफटी’ को बताया कि यदि संघर्ष तुरंत समाप्त भी हो जाता है, तब भी कतर को अपनी सामान्य डिलीवरी अनुसूची (शेड्यूल) बहाल करने में “हफ्तों से महीनों” का समय लगेगा.
रूस से 30 दिन तेल लेने के लिए अमेरिका ने भारत को ‘छूट’ दी… मोदी सरकार की व्यापक आलोचना
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच, संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत को 30 दिनों की अस्थायी छूट प्रदान की है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को उस रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखने की अनुमति मिली है, जो वर्तमान में समुद्र में फँसा हुआ है. यह घोषणा अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेन्ट द्वारा की गई, जिन्होंने कहा कि इस निर्णय का उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा बाजारों में व्यवधान को रोकना है, क्योंकि यह क्षेत्र बढ़ते संघर्ष और आपूर्ति की अनिश्चितताओं से जूझ रहा है.
यह घटनाक्रम उस जटिल संतुलन को रेखांकित करता है, जिसका सामना भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने और वाशिंगटन तथा मॉस्को दोनों के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखने के दौरान कर रहा है.
बेसेन्ट ने स्पष्ट किया कि यह उपाय जानबूझकर अल्पकालिक और सीमित दायरे वाला रखा गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इससे मॉस्को को कोई बड़ा वित्तीय लाभ न हो.
उज्वल जलाली की रिपोर्ट है कि बेसेन्ट ने कहा, “इससे रूसी सरकार को कोई सार्थक वित्तीय लाभ नहीं होगा, क्योंकि यह केवल उस तेल से जुड़े लेनदेन को अधिकृत करता है जो पहले से ही समुद्र में फंसा हुआ है.”
यह छूट ऐसे समय में आई है जब पश्चिम एशिया में गहराते संकट के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार दबाव में है, जिससे आपूर्ति में व्यवधान और कीमतों में भारी अस्थिरता की आशंका बढ़ गई है.
वाशिंगटन ने भारत को एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार बताया और संकेत दिया कि इस अस्थायी राहत का उद्देश्य नई दिल्ली को अपने ऊर्जा स्रोतों को फिर से व्यवस्थित करने के लिए समय देना भी है.
बेसेन्ट ने आगे कहा, “भारत संयुक्त राज्य अमेरिका का एक अनिवार्य भागीदार है, और हम पूरी उम्मीद करते हैं कि नई दिल्ली अमेरिकी तेल की खरीद बढ़ाएगा.”
भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत और अपनी प्राकृतिक गैस की जरूरतों का लगभग आधा हिस्सा आयात करता है. आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आता है, जो भारतीय रिफाइनरियों तक पहुंचने से पहले रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ मार्ग से होकर गुजरता है. पश्चिम एशिया में हालिया संघर्ष के बाद, ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की दिशा में कदम उठाए, जिससे भारत सहित प्रमुख आयातकों को होने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर चिंता बढ़ गई है.
‘भारत को अनुमति देने वाला अमेरिका कौन होता है?’ राहुल गांधी रूसी तेल को लेकर मोदी पर बरसे
30 दिन की अमेरिकी छूट पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज़ करते हुए कहा कि भारत की विदेश नीति अब “एक मजबूर व्यक्ति के शोषण का परिणाम” है. मोदी के खिलाफ उनके इस आरोप को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और ‘आप’ प्रमुख एवं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी दोहराया.
‘द टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, राहुल ने ‘एक्स’ पर लिखा, “भारत की विदेश नीति हमारे लोगों की सामूहिक इच्छा से निकलती है. इसे हमारे इतिहास, हमारे भूगोल और सत्य तथा अहिंसा पर आधारित हमारे आध्यात्मिक लोकाचार में निहित होना चाहिए.” उन्होंने आगे कहा, “आज हम जो देख रहे हैं वह नीति नहीं है. यह एक समझौतावादी (मजबूर) व्यक्ति के शोषण का परिणाम है.” उन्होंने अपने एक पुराने पोस्ट को साझा किया, जिसमें लोकसभा में उनके भाषण का एक वीडियो था. उस वीडियो में वह भारत की ऊर्जा सुरक्षा से समझौता किए जाने के बारे में बोल रहे थे. उन्होंने कहा था, “अमेरिका हमें बताएगा कि हम किससे तेल खरीद सकते हैं या नहीं – चाहे वह रूस हो या ईरान, फैसला अमेरिका करेगा. लेकिन हमारे प्रधानमंत्री फैसला नहीं करेंगे.”
उधर, राहुल गांधी ने शुक्रवार को केरल के इडुक्की स्थित मारियन कॉलेज में छात्रों के साथ प्राचीन युद्ध कला कलरीपायट्टु में हाथ आजमाया. बाद में उन्होंने छात्रों के साथ बातचीत की और फिल्मों, राजनीति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उच्च शिक्षा पर चर्चा की.
बातचीत के दौरान, एक छात्र ने कांग्रेस नेता से फिल्मों के प्रोपेगेंडा (दुष्प्रचार) के रूप में इस्तेमाल होने पर सवाल पूछा. ‘केरल स्टोरी-2 गोज बियॉन्ड’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह “अच्छी खबर” है कि फिल्म दर्शकों को नहीं खींच पा रही है. उन्होंने कहा कि फिल्मों, टेलीविजन और मीडिया को तेजी से “हथियार” बनाया गया है. उनके अनुसार, ऐसे प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल अक्सर “लोगों को बदनाम करने” और समाज में विभाजन पैदा करने के लिए किया जाता है.
राहुल ने पश्चिम एशिया के संघर्षों और उनके व्यापक प्रभावों पर भी बात की. उन्होंने कहा, “सतह पर यह अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच का युद्ध दिखता है,” लेकिन यह संघर्ष अमेरिका, चीन और रूस से जुड़ी बड़ी भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा है. उन्होंने चेतावनी दी कि मध्य पूर्व से ऊर्जा आपूर्ति पर अपनी निर्भरता के कारण भारत को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि यदि संघर्ष बढ़ता है तो ईंधन की कीमतें बढ़ सकती हैं और आर्थिक विकास धीमा हो सकता है. उन्होंने आगे कहा कि भारत को इस “हिंसक और खतरनाक समय” के दौरान अपने नीतिगत निर्णयों में सावधान रहना चाहिए.
तकनीक के बारे में बात करते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दौड़ में भारत अमेरिका और चीन से पीछे है. उन्होंने अमेरिका और चीन को इस क्षेत्र का मुख्य खिलाड़ी बताते हुए कहा, “वास्तव में भारत एआई में सफल नहीं है.”
रायबरेली के सांसद ने यह भी कहा कि एआई भारत के सेवा (सर्विस) और सॉफ्टवेयर क्षेत्रों में नौकरियों को बाधित कर सकता है. राहुल ने विश्वविद्यालयों में वैचारिक प्रभाव पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा, “हमारी उच्च शिक्षा प्रणाली एक वैचारिक हमले के अधीन है.”
क्या ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली हमलों को लेकर बंटा हुआ है ब्रिक्स ?
अल जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए जा रहे हमलों के एक हफ्ते बाद भी ब्रिक्स समूह (जिसमें ईरान भी शामिल है) ने एक गुट के रूप में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. विश्लेषकों का मानना है कि भारत की अध्यक्षता में यह चुप्पी असामान्य है, क्योंकि पिछले साल जब ब्राजील अध्यक्ष था, तो उसने हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया था.
आलोचकों का कहना है कि नई दिल्ली के अपने हित गठबंधन के उद्देश्यों पर भारी पड़ रहे हैं. 2026 में भारत के नेतृत्व में संगठन ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है. हालाँकि, व्यक्तिगत रूप से सदस्य देश बंटे हुए नज़र आ रहे हैं. दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन ने इन हमलों की निंदा की है. चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने स्पष्ट कहा कि चीन अमेरिका और इज़रायल द्वारा किसी भी सैन्य हमले का विरोध करता है.
इसके विपरीत, भारत ने हमलों की सीधे तौर पर निंदा नहीं की है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने केवल “संघर्ष के जल्द अंत” और “बातचीत और कूटनीति” का आह्वान किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खाड़ी देशों से बात की लेकिन ईरान का जिक्र नहीं किया. गौरतलब है कि पीएम मोदी ने युद्ध शुरू होने से ठीक पहले 25-26 फरवरी 2026 को इज़रायल का दौरा किया था और ‘कनेसेट’ (संसद) को संबोधित करते हुए कहा था कि “भारत इज़रायल के साथ खड़ा है.”
अल जज़ीरा की रिपोर्ट बताती है कि भारत अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है, खासकर तब जब राष्ट्रपति ट्रम्प ने हाल ही में भारत पर लगाए गए शुल्कों को कम करने की घोषणा की है. पेकिंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डोंग वांग का कहना है कि भारत “डी-एस्केलेशन” (तनाव कम करने) पर जोर देते हुए एक सतर्क और संतुलित मुद्रा अपना रहा है.
जंग से ब्रांड दुबई की छवि को खासा धक्का
सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान द्वारा दुबई पर किए गए हालिया मिसाइल हमलों ने अमीरात की “सुरक्षित पनाहगाह” वाली प्रतिष्ठा को गहरा धक्का दिया है. दुबई, जो लगभग 50,000 सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स का घर है, अब एक जनसंपर्क (पीआर) युद्ध का सामना कर रहा है. हमले में ‘फेयरमोंट द पाम’ और ‘बुर्ज अल अरब’ होटल जैसे प्रसिद्ध लैंडमार्क क्षतिग्रस्त हुए हैं.
यूरोपीय काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की विशेषज्ञ सिंजिया बियानको ने इसे “दुबई का सबसे बुरा सपना” बताया है. जो इन्फ्लुएंसर्स अपनी ग्लैमरस लाइफस्टाइल के लिए जाने जाते थे, वे अब डर और दहशत के बीच “बहादुरी” दिखाने वाले वीडियो पोस्ट कर रहे हैं. मॉडल पेट्रा एक्लेस्टन ने शनिवार की रात को “अपनी जिंदगी की सबसे डरावनी रातों में से एक” बताया.
कंटेंट क्रिएटर निकोल मीरा ने बताया कि उन्हें शुरू में पता ही नहीं चला कि उन पर हमला हो रहा है, जब तक कि उनके बॉयफ्रेंड ने बमों की आवाज़ के बारे में नहीं पूछा. बाद में उन्होंने अपने सिर के ऊपर मिसाइलों को इंटरसेप्ट होते देखा. कुछ इन्फ्लुएंसर्स ने जलती हुई इमारतों के वीडियो भी साझा किए, हालांकि यूएई के अधिकारियों द्वारा “राष्ट्रीय एकता” या देश की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाले पोस्ट पर जेल की चेतावनी के बाद कई वीडियो हटा लिए गए हैं.
अमेरिका और यूके ने अपने नागरिकों को यूएई छोड़ने की सलाह दी है, लेकिन कई विदेशी निवासी अभी भी वहां टिके हुए हैं. लॉरेन ओ’कोनेल जैसी यूट्यूबर का कहना है कि वे दुबई के नेतृत्व पर भरोसा करती हैं और अभी देश छोड़ने पर विचार नहीं कर रही हैं.
हरकारा डीप डाइव
जंग, राजनीति और शक्ति संतुलन: ईरान संकट को कैसे देख रही दुनिया?
‘हरकारा’ डीप डाइव के हालिया एपिसोड में पत्रकार शोभन सक्सेना ने ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच चल रही जंग पर विस्तार से बातचीत की. चर्चा में पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति, खामेनेई की हत्या के बाद बढ़ते तनाव, अमेरिका और इज़राइल की रणनीति, और भारत की विदेश नीति जैसे कई अहम मुद्दों पर बात हुई.
शोभन सक्सेना ने कहा कि ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या के बाद टकराव और गहरा हो गया है. उनके मुताबिक यह घटना उस समय हुई जब ईरान और पश्चिमी देशों के बीच परमाणु समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी. उन्होंने बताया कि ओमान और जिनेवा में बातचीत के कई दौर हो चुके थे और ईरान का प्रतिनिधिमंडल समझौते के करीब पहुंचने की बात कर रहा था. लेकिन इसी दौरान खामेनेई पर हमला हुआ, जिसके बाद हालात सीधे युद्ध की तरफ बढ़ गए.
सक्सेना के मुताबिक अब ईरान की तरफ से भी यह साफ संकेत है कि वह इसे आर-पार की लड़ाई मान रहा है और बातचीत की गुंजाइश काफी कम हो गई है. ईरान पर हमला करने के लिए जिस तरह “परमाणु खतरे” का तर्क दिया जा रहा है, वह कुछ हद तक इराक युद्ध के समय दिए गए तर्कों जैसा लगता है. ईरान ने 2015 में परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की निगरानी भी मौजूद थी. इसलिए यह सवाल उठता है कि क्या यह युद्ध सचमुच परमाणु हथियारों को रोकने के लिए है या इसके पीछे क्षेत्रीय वर्चस्व की राजनीति भी है.
शोभन सक्सेना ने यह भी कहा कि इज़राइल की आंतरिक राजनीति को भी इस युद्ध से अलग करके नहीं देखा जा सकता. उनके मुताबिक प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने राजनीतिक दबाव और चुनावी चुनौतियाँ हैं. ऐसे हालात में बाहरी खतरे और युद्ध का माहौल कई बार घरेलू राजनीति को प्रभावित करता है और नेतृत्व को समर्थन भी दिलाता है.
इस चर्चा में ब्रिक्स देशों का भी ज़िक्र हुआ. रूस और चीन जैसे देशों ने ईरान के समर्थन में अपेक्षाकृत स्पष्ट रुख दिखाया है.
इसके मुकाबले भारत का रुख अपेक्षाकृत सतर्क दिखाई देता है. भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध रहे हैं, खासकर ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय दबाव और बदलते समीकरणों के कारण इन संबंधों में बदलाव आया है.
श्रीलंका ने बचाए गए 208 ईरानी नौसैनिकों को नेवल कैंप भेजा
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीलंकाई अधिकारियों ने शुक्रवार को जानकारी दी है कि वे एक दूसरे ईरानी नौसैनिक जहाज को सुरक्षित बंदरगाह तक ले जा रहे हैं और उसके 208 चालक दल के सदस्यों (क्रू) को एक कैंप में भेजा जा रहा है. यह घटनाक्रम उसी क्षेत्र में एक अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा ईरानी युद्धपोत को डुबोने के दो दिन बाद सामने आया है.
श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने कहा कि अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के साथ चल रहे युद्ध के बीच, उनके द्वीपीय राष्ट्र की यह “मानवीय जिम्मेदारी” है कि वे संकट में फंसे क्रू को शरण दें. यह युद्ध वैश्विक बाजारों में तबाही मचा रहा है और व्यापार को बाधित कर रहा है.
रॉयटर्स ने श्रीलंकाई नौसेना के हवाले से बताया कि दूसरे ईरानी जहाज की पहचान नेवल ऑग्ज़लरी वेसल (सहायक पोत) ‘IRIS बुशहर’ के रूप में की गई है. प्रेसिडेंशियल मीडिया डिविजन द्वारा साझा की गई तस्वीरों में ईरानी नाविकों को सूटकेस और बैग ले जाते हुए श्रीलंका में उतरते देखा गया. श्रीलंकाई सरकार के एक सूत्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जहाज में इंजन की समस्या थी और नेविगेशन में मदद के लिए लगभग 15 क्रू मेंबर अभी भी जहाज पर ही हैं.
अधिकारियों के अनुसार, चालक दल को श्रीलंका की वाणिज्यिक राजधानी कोलंबो के बंदरगाह पर लाया गया, जहाँ उनकी मेडिकल जाँच की गई. इसके बाद उन्हें समूहों में वेलिसरा स्थित नेवल कैंप में ले जाया गया. रक्षा मंत्रालय ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
उल्लेखनीय है कि यह घटना ईरानी युद्धपोत ‘IRIS डेना’ के डूबने के एक दिन बाद हुई. ‘डेना’ भारत से एक नौसैनिक अभ्यास के बाद लौट रहा था, तभी श्रीलंका के तट से लगभग 19 समुद्री मील दूर हिंद महासागर में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने उसे टॉरपीडो से उड़ा दिया. इस हमले में 87 लोग मारे गए थे, जिससे ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली युद्ध का दायरा और बढ़ गया है. ईरान के विदेश मंत्री ने बचे लोगों को बचाने के लिए श्रीलंका का धन्यवाद किया है. ईरानी उप विदेश मंत्री सईद खतीबजादेह ने नई दिल्ली में पत्रकारों को बताया कि “वह जहाज (बुशहर) समारोहिक था, खाली था और निहत्था था.”
रॉयटर्स की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वाशिंगटन और तेहरान दोनों ही श्रीलंका के प्रमुख व्यापारिक भागीदार हैं. अमेरिका श्रीलंका के परिधान निर्यात का लगभग 40% हिस्सा खरीदता है, जबकि ईरान उसके चाय के मुख्य खरीदारों में से एक है.
सुशांत सिंह: खामेनेई की हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी भारतीय हितों की रक्षा नहीं करती
कैरेवन पत्रिका में सुशांत सिंह का यह लेख हाल ही में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की हत्या और ईरानी युद्धपोत आई.आर.आई.एस. देना पर हुए अमेरिकी हमले के बाद मोदी सरकार की चुप्पी का कड़ा विश्लेषण करता है. लेखक का तर्क है कि यह चुप्पी केवल कूटनीतिक संयम नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की हार है. मोटे तौर पर वे कहते हैं.
रणनीतिक अपमान: श्रीलंका के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी युद्धपोत को डुबोना, जो हाल ही में एक भारतीय कार्यक्रम में अतिथि था, भारत के प्रभाव क्षेत्र में एक बड़ी चुनौती है. भारत की चुप्पी ने संदेश दिया है कि वह अपने समुद्री पड़ोस में तीसरे पक्ष की सैन्य कार्रवाई को सहन करने को तैयार है.
दावे और हकीकत: सरकार का तर्क है कि खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा के लिए चुप रहना जरूरी है. लेखक इसे गलत मानते हैं, क्योंकि खाड़ी देशों (सऊदी, यूएई आदि) का आर्थिक ढांचा दक्षिण एशियाई श्रम पर टिका है और वे खुद क्षेत्रीय युद्ध से डरते हैं. वे केवल एक बयान के कारण भारतीयों को खतरे में नहीं डालेंगे.
अमेरिका-इजरायल खेमे की ओर झुकाव: लेख के अनुसार, मोदी सरकार ने भारत को स्पष्ट रूप से अमेरिका-इजरायल खेमे में धकेल दिया है. खामेनेई की हत्या पर चुप्पी भारत के उन पुराने सिद्धांतों के खिलाफ है जहां वह संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का पक्षधर रहा है. यह झुकाव रूस से सस्ता तेल खरीदने के मामले में भी दिखता है, जहाँ भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से अपने विकल्पों को सीमित कर लिया है.
ग्लोबल साउथ के नेतृत्व पर असर: भारत खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ का नेता मानता है और सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट चाहता है. लेकिन गाजा और ईरान जैसे संकटों पर मौन रहने से अन्य विकासशील देशों के बीच भारत की साख कम हो रही है, खासकर तब जब चीन और अन्य ब्रिक्स देश कड़ा स्टैंड ले रहे हैं.
घरेलू प्रभाव: भारत में बड़ी शिया आबादी और खामेनेई के प्रति सम्मान को देखते हुए, सरकार की उदासीनता मुस्लिम समुदाय में अलगाव की भावना पैदा कर सकती है, जो एक आंतरिक राजनीतिक जोखिम है.
लेखक का मानना है कि मोदी सरकार की चुप्पी ‘मुफ्त’ नहीं है; इसकी दीर्घकालिक रणनीतिक कीमत भारत को चुकानी होगी. अगर भारत चाहता है कि चीन जैसे देश उसकी सीमाओं का सम्मान करें, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संप्रभुता के सिद्धांतों के लिए मजबूती से बोलना होगा.
भारत में रसोई गैस के लिए आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल, उत्पादन बढ़ाने का आदेश
एक सरकारी आदेश से पता चला है कि मध्य पूर्व संकट के कारण आपूर्ति में आई बाधाओं के बाद, भारत ने आपातकालीन शक्तियों का उपयोग किया है और खाना पकाने के ईंधन की कमी को रोकने के लिए रिफाइनरियों को तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का अधिकतम उत्पादन करने का निर्देश दिया है.
‘रॉयटर्स’ में निधि वर्मा की रिपोर्ट है कि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े एलपीजी आयातक ने पिछले साल 33.15 मिलियन मीट्रिक टन रसोई गैस की खपत की, जो प्रोपेन और ब्यूटेन का मिश्रण है. एलपीजी की कुल खपत में आयात की हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई है, जिसमें से लगभग 85-90% आपूर्ति मध्य पूर्व से होती है. गुरुवार देर रात जारी किए गए आदेश में कहा गया है कि सभी तेल रिफाइनरियों को “अधिकतम उत्पादन करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि उनके पास उपलब्ध प्रोपेन और ब्यूटेन का उपयोग एलपीजी के उत्पादन के लिए किया जाए.”
सरकार ने उत्पादकों से कहा है कि वे घरों में वितरण के लिए सरकारी रिफाइनरियों - इंडियन ऑयल कॉर्प, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्प और भारत पेट्रोलियम कॉर्प को एलपीजी, प्रोपेन और ब्यूटेन उपलब्ध कराएं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में लगभग 332 मिलियन (33.2 करोड़) सक्रिय एलपीजी उपभोक्ता हैं.
एलपीजी उत्पादन के लिए प्रोपेन और ब्यूटेन के अनिवार्य डायवर्जन के कारण रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा गैसोलीन ब्लेंडिंग घटक (पेट्रोल में मिलाए जाने वाले तत्व), ‘अल्काइलेट्स’ के उत्पादन में कमी आएगी.
एलएसईजी डेटा के अनुसार, रिलायंस ने पिछले साल हर महीने अल्काइलेट्स के लगभग चार कार्गो (माल) का निर्यात किया था. सरकार ने रिफाइनरियों को यह भी आदेश दिया है कि वे पेट्रोकेमिकल उत्पादन के लिए प्रोपेन और ब्यूटेन का उपयोग (डायवर्ट) न करें.
एक व्यापारिक सूत्र ने कहा कि एलपीजी उत्पादन के लिए प्रोपेन और ब्यूटेन का रुख मोड़ने से उन पेट्रोकेमिकल कंपनियों के मुनाफे (मार्जिन) को नुकसान पहुंचेगा जो पॉलीप्रोपाइलीन और अल्काइलेट्स जैसे उत्पाद बनाती हैं, क्योंकि बाजार में उन्हें एलपीजी की तुलना में बेहतर कीमत मिलती है.
किताब
कल्याण सिंह ने ‘साफ झूठ’ कहा था- ‘बाबरी मस्जिद को गिरने नहीं देंगे’: के.के. वेणुगोपाल
पूर्व अटॉर्नी जनरल और वरिष्ठ वकील के.के. वेणुगोपाल ने द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि बाबरी मस्जिद गिराने से पहले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने उनसे “साफ झूठ” कहा था कि मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचने दिया जाएगा. वेणुगोपाल ने बताया कि कल्याण सिंह ने अदालत में यह भरोसा दिलाया था कि कारसेवकों को रोका जाएगा और मस्जिद को गिरने नहीं दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बाद में उन्हें लगा कि कल्याण सिंह ने अदालत और उन्हें दोनों को गुमराह किया.
वेणुगोपाल ने यह बातें अपनी नई आत्मकथा “द एक्सीडेंटल लॉयर” के बारे में बातचीत के दौरान कहीं. बाबरी मस्जिद गिरने के समय वेणुगोपाल कल्याण सिंह के वकील थे. उन्होंने बताया कि कल्याण सिंह ने अदालत में एक हलफनामा दिया था, जिसे उन्होंने ही सुप्रीम कोर्ट को सौंपा था. उस समय अटॉर्नी जनरल मिलन बनर्जी ने एक खुफिया रिपोर्ट भी दी थी, जिसमें कहा गया था कि कारसेवकों को लंबे समय से मस्जिद विध्वंस के लिए तैयार किया जा रहा है. इसके बावजूद अदालत ने कल्याण सिंह के भरोसे पर विश्वास किया. मस्जिद गिरने के बाद वेणुगोपाल ने अदालत में कहा था कि “मेरा सिर शर्म से झुक गया है” और सुझाव दिया था कि उसी रात ईंटें वापस लगाकर मस्जिद को पहले जैसा बना दिया जाए, ताकि विवाद और न बढ़े. लेकिन उनका यह सुझाव स्वीकार नहीं किया गया.
उन्होंने अपनी किताब में 1984 के सिख विरोधी दंगों का भी ज़िक्र किया है. वेणुगोपाल के अनुसार उस समय जो हिंसा हुई, वह “राजनीतिक आकाओं के आदेश” के कारण हुई थी. उन्होंने कहा कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में सरकार की ज़िम्मेदारी है कि किसी भी धर्म या जाति के साथ भेदभाव या उत्पीड़न न हो. अगर ऐसा नहीं होता तो देश सिर ऊंचा करके खड़ा नहीं रह सकता.
मतदाता सूची में ‘अंडर एडजुडिकेशन’ का डर: बंगाल में तीन आत्महत्याएँ
पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न के बाद हालिया दिनों में मतदाता सूची जारी की गई थी, जिसमे तक़रीबन 63 लाख वोटर्स को हटाया गया है. इस दरमियान मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार,मतदाता सूची में “अंडर एडजुडिकेशन” या हटाए गए ज़ुमरे में अपना नाम देखने के बाद तीन लोगों ने आत्महत्या कर ली, जबकि एक व्यक्ति की सदमे से मौत हो गई.मालदा जिले की रहने वाली हाजेरा बीबी ने रविवार को कथित तौर पर कीटनाशक पी लिया, जब उन्हें पता चला कि दस्तावेज़ जमा करने के बावजूद उनका नाम “अंडर एडजुडिकेशन” में है. इसी तरह रफ़ीक़ अली ग़ाज़ी ने फांसी लगाकर जान दे दी. परिवार का कहना है कि ग़ाज़ी ने चुनाव आयोग के नोटिस के बाद सभी काग़ज़ जमा किए थे, लेकिन अंतिम मतदाता सूची में उनके नाम के सामने “अंडर स्क्रूटिनी” लिखा था, जिसके बाद वह लगातार चिंता में रहने लगे थे.
जलपाईगुड़ी के गौरांगो डे ने भी आत्महत्या कर ली. परिवार के अनुसार 2002 की मतदाता सूची में उनका नाम नहीं था, लेकिन सुनवाई में दस्तावेज़ देने के बावजूद 2026 की सूची में उन्हें “अंडर एडजुडिकेशन” में डाल दिया गया. वहीं देबरा के कृष्ण पाल की तबीयत उस समय बिगड़ गई जब उन्हें पता चला कि उनका और उनके बेटे दीपांजन का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है.
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक मामले मुर्शिदाबाद (11,01,145), मालदा (8,28,127), दक्षिण 24 परगना (5,22,042), उत्तर 24 परगना (5,91,252), हावड़ा (2,89,714) और उत्तर दिनाजपुर (4,80,341) जिलों में हैं, जहां मुस्लिम आबादी काफी है.
भारत के साथ चीन जैसी आर्थिक नीति नहीं अपनाएगा अमेरिका
हालिया दिनों में अमेरिका ने भारत के साथ आर्थिक रिश्तों में दोहरी नीति अपनाई हुई दिखाई देती है, पहले टैरिफ की मार, फिर उनसे पीछे हटने की बात, उसके बाद रूस से तेल न खरीदने का दबाव, और अब अमेरिका के उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडाउ का यह कहना कि अमेरिका भारत के साथ वही आर्थिक गलती नहीं दोहराएगा जो उसने 20 साल पहले चीन के साथ की थी. द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्होंने यह बात 5 मार्च को नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग में कही.
लैंडाउ ने कहा कि अमेरिका ने पहले चीन को अपने बाज़ारों तक व्यापक पहुंच दी और बाद में चीन कई व्यापारिक क्षेत्रों में अमेरिका का बड़ा प्रतिस्पर्धी बन गया. उन्होंने कहा कि भारत के साथ आर्थिक संबंध “न्यायसंगत और अमेरिकी लोगों के हित में” होने चाहिए. यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत सख्त व्यापार और आव्रजन नीतियां लागू कर रही है.
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद अमेरिका ने अपने कई बड़े व्यापारिक साझेदारों पर आयात शुल्क बढ़ाए थे. भारत-अमेरिका संबंधों में भी तनाव देखने को मिला, क्योंकि अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने पर 25% पेनल्टी और भारतीय सामानों पर 25% पारस्परिक टैरिफ लगाया था. हालांकि दोनों देशों ने बाद में एक अंतरिम समझौता किया, जिसके तहत शुल्क घटाकर करीब 19% किया गया है, लेकिन इस समझौते का पूरा विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है. लैंडाउ ने कहा कि अमेरिका भारत के साथ संबंध मज़बूत करना चाहता है, लेकिन सहयोग पारस्परिकता और अमेरिकी राष्ट्रीय हितों के आधार पर होगा.
भारत तेज़ी से बूढ़ा हो रहा है, लेकिन बुजुर्गों की देखभाल की व्यवस्था अभी अधूरी
भारत में बुज़ुर्गों की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है. 2011 में 60 वर्ष से ऊपर के लोगों की संख्या लगभग 10 करोड़ थी, जो 2036 तक बढ़कर 23 करोड़ होने का अनुमान है. 2024 तक बुज़ुर्ग देश की आबादी का करीब 11% हो चुके थे. जीवन प्रत्याशा बढ़ने और जन्म दर घटने के कारण अनुमान है कि 2050 तक भारत में बुज़ुर्गों की संख्या बच्चों से ज़्यादा हो जाएगी. विशेषज्ञों का कहना है कि देश अभी इतनी तेज़ी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए तैयार नहीं है. यह रिपोर्ट इंडियास्पेंड में प्रकाशित हुई है.
2024 की नीति आयोग रिपोर्ट के अनुसार बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए व्यापक और एकीकृत नीति की कमी है. बुज़ुर्गों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए ज़रूरी ढांचा, क्षमता, जेरियाट्रिक बीमारियों के प्रबंधन के लिए जानकारी, निगरानी तंत्र और आपातकालीन सेवाओं में भी कमी है. बुज़ुर्गों के कल्याण की ज़िम्मेदारी सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के पास है, जो अटल पेंशन योजना, राष्ट्रीय वयोश्री योजना और आजीविका से जुड़ी योजनाएं चलाता है. इस साल बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि आने वाले वर्ष में 1.5 लाख मल्टी-स्किल्ड केयरगिवर तैयार किए जाएंगे. हालांकि केरल जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर देश में बुज़ुर्गों की ज़रूरतें अभी भी पूरी नहीं हो पा रही हैं, क्योंकि आवास और कल्याण राज्य सरकारों का विषय है.
देश में बुज़ुर्गों के लिए ढांचे की भी कमी है. सरकार के सहयोग से 696 वृद्धाश्रम चल रहे हैं और 2025-26 के लिए 84 और केंद्र चुने गए हैं. लेकिन निजी वृद्धाश्रमों का कोई आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है. टाटा ट्रस्ट्स, समर्थ और यूएनएफपीए के एक अध्ययन के अनुसार देश में लगभग 1,150 वृद्धाश्रम हैं, जिनमें करीब 97,000 बुज़ुर्गों के रहने की क्षमता है. बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ने के साथ “सिल्वर इकोनॉमी” भी बढ़ रही है. सरकार के अनुसार 2024 में बुज़ुर्गों से जुड़ी सेवाओं और उत्पादों का बाजार लगभग 73,000 करोड़ रुपये का है. लेकिन इन सेवाओं तक पहुंच सीमित है, क्योंकि लगभग 70% बुज़ुर्गों ग्रामीण इलाकों में रहते हैं.
राष्ट्रीय नीति में बुज़ुर्गों के लिए घर आधारित पैलिएटिव केयर पर जोर दिया गया है. नेशनल प्रोग्राम फॉर पैलिएटिव केयर (एनपीपीसी) के तहत स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर मरीज़ों की देखभाल करते हैं. लेकिन संसद में दिसंबर 2025 में दिए गए आंकड़ों के अनुसार इन सेवाओं की पहुंच अभी सीमित है. केरल में आठ महीनों में लगभग 6.5 लाख होम विजिट, महाराष्ट्र में 1.67 लाख, जबकि उत्तर प्रदेश में केवल 42,500 विजिट दर्ज हुईं और बिहार में सेवाएं सिर्फ छह जिलों तक सीमित रहीं. एक राष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार 60 वर्ष से ऊपर के 12.2% लोगों को पैलिएटिव देखभाल की ज़रुरत होती है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में यह अनुपात लगभग 16% है.
कर्नाटक में 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य का 2026 का बजट पेश करते हुए घोषणा की कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई जाएगी. यह फैसला बच्चों में बढ़ती डिजिटल लत और मोबाइल के ज़्यादा इस्तेमाल से होने वाले नकारात्मक प्रभाव को रोकने के लिए लिया गया है. मुख्यमंत्री ने कहा, “मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल के कारण बच्चों पर पड़ रहे बुरे असर को रोकने के लिए 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया जाएगा.” कर्नाटक ऐसा क़दम उठाने वाला भारत का पहला राज्य होगा.
हेट क्राइम
बिहार के मधुबनी में मुस्लिम महिला की पिटाई के बाद मौत, जबरन पेशाब पिलाने का आरोप
बिहार के मधुबनी जिले में मुस्लिम महिला के साथ गाँव के प्रधान द्वारा मारपीट किए जाने और जबरन पेशाब पिलाए जाने के बाद मौत हो गई. सोशल मीडिया पर इस मारपीट की घटना का एक वीडियो भी सामने आया है और द हिंदुस्तान गैज़ेट में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक़ 40 वर्षीय मुस्लिम महिला की पहचान रोशन खातून के तौर की गई है.
रोशन खातून की रविवार रात पटना में इलाज के दौरान मौत हो गई. 25 फरवरी को वह ज़मीन के विवाद को लेकर प्रधान के घर गई थीं, जहां उनके साथ यह घटना हुई. प्रधान के पति और बेटे के नेतृत्व में कई लोगों ने रोशन खातून को पकड़कर लात-घूंसे और डंडों से पीटा. प्रधान के कहने पर उन्हें एक खंभे से बांध दिया गया और मारपीट जारी रखी गई. उस समय रोशन खातून रोज़े की हालत में थीं. जब उन्होंने पानी मांगा तो आरोप है कि उन्हें पेशाब और शराब मिलाकर पिलाया गया.
गांव के लोगों का कहना है कि रोशन खातून के कान और मुंह से खून निकल रहा था. घटना के बाद पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठे हैं. आरोप है कि उन्हें थाने ले जाया गया लेकिन मेडिकल जांच के बिना ही छोड़ दिया गया और उनसे पीआर बॉन्ड पर हस्ताक्षर कराए गए.
कोहरा सीज़न 2
प्रगति सक्सेना: एक प्रतिगामी समाज में रिश्तों की सड़न की दिल छू लेने वाली दास्तां
कोहरा ने हिंदी-पंजाबी वेब सीरीज में अपनी एक अलग और खास मिसाल कायम की है. हाल ही में इसका दूसरा सीज़न रिलीज हुआ.
पहला सीज़न बेशक मर्मस्पर्शी, हकीकत के करीब और फिर भी रचनात्मक रूप से प्रभावशाली था तो दूसरा सीज़न मानवीय रिश्तों की अनकही सूक्ष्मताओं को व्यक्त करते हुए समाज पर एक सशक्त कमेंट करता है.
पहले सीज़न में हिंसा कुछ ज्यादा थी, इस सीज़न में मानसिक हिंसा, प्रताड़ना और यातना की संवेदनशील अभिव्यक्ति है और वह भी बगैर किसी वागाडंबर या भड़कीले संवादों के.
आज के समय में जब अभिव्यक्ति और रचनात्मक आजादी सिर्फ गालियों के इस्तेमाल तक ही सीमित है, यह वेबसीरीज़ संवादों से अधिक चेहरों के क्लोज अप का प्रयोग करती है, जो डायलॉग्स से कहीं अधिक प्रभावशाली साबित होते हैं खासकर जब मोना सिंह और वरुण सोबती जैसे मंझे हुए अभिनेता लीड किरदार हों.
धनवंत कौर एक अधेड़ पुलिस ऑफिसर है जो इस उम्र में बच्चे की चाहत रखती है, जवान जहान बेटे को एक दुर्घटना में खो चुकी है और पति को शराब से रोजाना खींच कर घर तक लाती है. अमरपाल अपनी वैवाहिक जिंदगी को शांति से जीना चाहता है लेकिन अतीत की पेचीदगियां उसके जीवन को बोझिल बना देती है. इस सबके बीच हत्या का एक केस है- एक ऐसी औरत की जो कहने को एक अमीर जमींदार घराने से थी, विदेश में बसे पति से झगड़ कर दो बच्चों को वहीं छोड़ कर मायके में बैठी थी. मगर उसकी अपनी महत्वाकांक्षाएं थीं, अरमान थे.
पीड़िता प्रीत की जिंदगी के बारे में तफ्तीश करते हुए धनवंत और अमरपाल ना सिर्फ अपने अतीत के साए से रूबरू होते हैं, उसका सामना करते हैं, बल्कि प्रीत के परिवार, उसके भाई बलजिंदर की पतित और अय्याश जमींदार वाली क्रूर मानसिकता से भी सकते में आ जाते हैं. एक स्कैंडिनेवियन क्राइम सीरीज की तरह धीरे धीरे इस धुंध की परतें उघड़ती जाती हैं.
और सामने आता है एक ऐसा प्रतिगामी समाज, जहां जमींदार अपनी जमीनें गिरवी रख, या बेच कर विलासिता का जीवन बिता रहे हैं, जहां आज भी बंधुआ मजदूर रखे जाते हैं जिनका जीवन जानवर से भी बदतर है, उन्हें जंजीरों में रखा जाता है ताकि वे भाग ना पाएं और उमर भर बेगारी करते रहें. समाज में जमीन की बेच से आए अचानक धन, बेरोजगारी और नशे में डूबता समाज इतना आत्मकेंद्रित है कि कमजोर का अमानवीय हदों तक शोषण उसे कतई अनुचित नहीं लगता. आखिर में प्रीत की दादी हत्यारे को कोसती है तो धनवंत पलट कर गुर्राती है- कि हत्या का जिम्मेदार दरअसल उनका पूरा परिवार है, जिसने ना सिर्फ अपने रिश्तों की सड़न को ‘ऐसा ही होता है’, मान कर अपना लिया है बल्कि अप्रवासी मजदूरों पर अमानवीय अत्याचार और उनके शोषण को भी स्वीकार कर लिया है क्योंकि यही एक आसान रास्ता है जिससे वे अपनी सुविधापूर्ण जिंदगी को बरकरार रख सकते हैं.
दूसरी तरफ हर पल अपने बेटे की याद में जलती धनवंत है, अपने ही परिवार में संबंध बनाने के अपराध से ग्रसित अमरपाल है- जो अपनी जिंदगी में बदलाव लाने के लिए कोशिश कर रहे हैं. बेटे को सड़क दुर्घटना में खोने के बाद धनवंत लगातार फर्टिलिटी क्लिनिक जाती है, लेकिन उस हृदयविदारक दुर्घटना में हार मान बैठा उसका पति खुद को नशे में डुबा चुका है और धनवंत की तमाम कोशिशों के बावजूद उसके साथ खड़ा नहीं हो पाता.
हर तरह के कोहरे और अस्पष्टता से सराबोर यह कहानी चुपचाप समाज में व्याप्त कठिनाइयों, सामाजिक-राजनीतिक बंधनों, बुराइयों, सड़ी गली प्रथाओं को तो दर्शाती ही है, साथ ही इन सबके बावजूद एक व्यक्ति के निजी स्तर पर संघर्ष की भी संवेदनशील अभिव्यक्ति है- संघर्ष अतीत से, तमाम नई- पुरानी कड़ियों से आजाद होने का; उम्मीद करने का, उसे पोसते रहने का संघर्ष.
मौजूदा वक्त में तमाम तरह के कोहरों से बोझिल हमारे समाज के लिए भी शायद यही एक मंद सी उम्मीद है.
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.
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