06/04/2026: ट्रंप की धमकी, ईरान की ‘ना’| पहली क्वीयर सांसद | अडानी डील पर एससी | दागी उम्मीदवार| कूटनीति में पाकिस्तान | बाघों की मौत |भाषा विवाद
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आज की सुर्खियां
सतपुड़ा और कान्हा रिजर्व में दो बाघों की मौत; संघर्ष की आशंका, क्योंकि मेटिंग सीज़न समाप्ति की ओर
सुप्रीम कोर्ट ने अडानी की योजना पर रोक लगाने से किया इनकार; ट्रिब्यूनल को वेदांता की याचिका सुनने को कहा
पश्चिम एशिया युद्ध का असर: सोजत मेहंदी और बीकानेरी भुजिया का निर्यात प्रभावित
आपराधिक आरोप कोई बाधा नहीं: चुनाव वाले 3 राज्यों में 38% तक उम्मीदवार दागी
ईश्वर उनके पक्ष में, बिल हमारे नाम: भारत के लिए पश्चिम एशिया युद्ध की असली कीमत का हिसाब
सुशांत सिंह: पाकिस्तान की शांतिदूत बनने की कोशिश भारत के लिए एक झटका
मेनका गुरुस्वामी बनीं देश की पहली LGBTQ+ सांसद
एक्स अकाउंट बैन पर दिल्ली हाईकोर्ट : ‘डॉ. निमो यादव’ और ‘नेहर हू’ अकाउंट तुरंत बहाल के निर्देश
कांग्रेस का हिमंता बिस्वा शर्मा की पत्नी के पास तीन पासपोर्ट का आरोप
ट्रंप के बदलते बयान, मिज़ाज और जंग जी बढ़ती हुई क़ीमत
29° गर्मी में जबरन मोदी कार्यक्रम में बुलाए जाने की शिकायत, छात्रा का इंस्टाग्राम वीडियो भारत में ब्लॉक
दलित ईसाई और मुसलमानों को भी मिले एससी का दर्जा
एलपीजी संकट के बीच दिल्ली से पलायन, हज़ारों प्रवासी मज़दूर गांव लौटने को मजबूर
हिंदी थोपने का आरोप: नई शिक्षा नीति पर तमिलनाडु और केंद्र आमने-सामने
ईरान ने ट्रंप की समयसीमा से पहले शांति योजना पर अपना ‘मक्सिमलिस्ट’ जवाब भेजा
रणनीतिक विश्लेषण: ईरान और अमेरिका के बीच गहराता कूटनीतिक गतिरोध
ईरान की बाब अल-मंडेब बंद करने की धमकी: वैश्विक व्यापार पर संकट के बादल
ईरान ने अस्थायी युद्धविराम को ठुकराया, कहा- समझौते की शर्तें पहले ही तय हैं
ट्रंप की दिमागी हालत कैसी है?
ट्रंप की ‘पावर प्लांट डे’ की धमकी और ईरान के बुनियादी ढांचे पर भीषण बमबारी
ईरान का पलटवार: इज़रायल और खाड़ी देशों पर मिसाइल हमले
गाज़ा और वेस्ट बैंक: नरसंहार और बदतर होते हालात
दुनिया की अन्य महत्वपूर्ण ख़बरें: अफ़ग़ानिस्तान में बाढ़ और नाइजीरिया में अपहरण
आकार पटेल: युद्ध की असलियत
ट्रंप ने कहा, ‘ईरान को एक रात में खत्म किया जा सकता है, और यह मंगलवार की रात हो सकती है’
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को ईरान युद्ध पर अपने संबोधन के दौरान कहा कि “पूरे देश को एक रात में कब्जे में लिया जा सकता है, और वह कल रात (मंगलवार) भी हो सकती है.” यह बयान ईरान के ऊर्जा संयंत्रों पर हमला करने की मंगलवार की समयसीमा (डेडलाइन) से ठीक पहले आया है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने पहले ही अपनी धमकी को और कड़ा कर दिया था कि यदि ईरान मंगलवार की समयसीमा तक होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा नहीं खोलता और युद्धविराम के समझौते पर बातचीत नहीं करता, तो वे ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाएंगे. ट्रंप ने तेहरान से परमाणु हथियारों को त्यागने और तेल पारगमन के प्रमुख जलमार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की मांग की है.
ईरान के बुनियादी ढांचे पर भीषण बमबारी
ड्रॉप साइट न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर बेहद तल्ख लहजे में ईरान को मंगलवार तक का समय देते हुए लिखा, “मंगलवार ईरान में पावर प्लांट डे और ब्रिज डे होगा. या तो जलडमरूमध्य खोल दो, वरना नर्क में रहने के लिए तैयार रहो.” इसी बीच, अमेरिका और इज़रायल ने ईरान के कई शहरों पर हवाई हमले तेज़ कर दिए हैं. सोमवार सुबह हुए हमलों में कम से कम 34 लोग मारे गए. हमलों में तेहरान की प्रतिष्ठित ‘शरीफ यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी’ को निशाना बनाया गया, जिसे ईरान का ‘एमआईटी’ कहा जाता है. इसके अलावा, ईरान के सबसे बड़े पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स ‘महशहर’ और दक्षिण पार्स के पेट्रोकेमिकल प्लांट्स पर भी बमबारी की गई है, जिससे देश के 85 प्रतिशत पेट्रोकेमिकल उत्पादन पर असर पड़ा है. इज़रायली रक्षा मंत्री इज़रायल काट्ज़ ने इसे ईरान के लिए “अरबों डॉलर का आर्थिक झटका” बताया है. बुशहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पास भी हमला हुआ है, जिसमें एक सुरक्षा गार्ड की मौत हो गई.
इज़रायल ने तेहरान में एक हवाई हमले के दौरान रिवोल्यूशनरी गार्ड (आईआरजीसी) के खुफिया प्रमुख मेजर जनरल माजिद खादेमी की हत्या कर दी है. इसके साथ ही कुद्स फोर्स के अधिकारी असगर बाकेरी के भी मारे जाने का दावा किया गया है. दूसरी ओर, अमेरिका ने ईरान के भीतर गिरे अपने F-15E क्रू के दो सदस्यों को बचाने के लिए 36 घंटे का लंबा ऑपरेशन चलाया. अमेरिकी दावों के अनुसार दोनों को बचा लिया गया है, लेकिन इस मिशन के दौरान अमेरिका को अपने कई विमानों से हाथ धोना पड़ा. ईरानी सूत्रों का दावा है कि उन्होंने दो C-130 परिवहन विमान, दो ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर और दो ड्रोन नष्ट कर दिए हैं. उधर, फ्रांस 24 द्वारा सत्यापित वीडियो से पता चला है कि कुवैत की धरती से ईरान पर मिसाइलें दागी गई हैं, जबकि कुवैत ने अपनी ज़मीन के इस्तेमाल से इनकार किया था.
ईरान का पलटवार: इज़रायल और खाड़ी देशों पर मिसाइल हमले
जवाबी कार्रवाई में ईरान ने इज़रायल के हाइफ़ा शहर में एक आवासीय इमारत पर मिसाइल दागी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई. ड्रॉप साइट न्यूज़ के अनुसार, ईरान ने इज़रायल के सैन्य और औद्योगिक क्षेत्रों को निशाना बनाते हुए कई हमले किए हैं. खाड़ी देशों में भी तनाव बढ़ गया है. कुवैत सिटी के सरकारी मंत्रालयों और ऊर्जा केंद्रों पर ड्रोन हमले हुए हैं, जिससे बिजली और पानी के प्लांट ठप हो गए हैं. बहरीन की ‘बापको’ रिफाइनरी और दुबई की ‘ओरेकल’ बिल्डिंग पर भी मलबे और हमलों से नुकसान की खबरें हैं. अबू धाबी के पेट्रोकेमिकल प्लांट में भी आग लगने के बाद कामकाज बंद करना पड़ा है. ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि उसके बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुँचाया गया, तो वह पूरे क्षेत्र में अमेरिकी हितों और ऊर्जा केंद्रों को तबाह कर देगा.
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 2 मार्च से अब तक इज़रायली हमलों में 1,497 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें 129 बच्चे शामिल हैं. पिछले 24 घंटों में 36 लोग मारे गए हैं. ड्रॉप साइट न्यूज़ की रिपोर्ट बताती है कि इज़रायली सेना दक्षिणी लेबनान के सीमावर्ती कस्बों, जैसे नाकुरा और तैबेह में नियंत्रित विस्फोटों के ज़रिए जानबूझकर घरों को नष्ट कर रही है. लेबनान के सबसे बड़े सार्वजनिक अस्पताल, रफ़ीक हरीरी यूनिवर्सिटी अस्पताल के पास भी हमले हुए हैं. इज़रायल ने अब लेबनान-सीरिया सीमा के ‘मस्ना’ क्रॉसिंग को भी बम से उड़ाने की धमकी दी है, जो मानवीय सहायता का प्रमुख मार्ग है. हिज़्बुल्लाह ने दावा किया है कि उसने लेबनान के तट से दूर एक इज़रायली युद्धपोत को एंटी-शिप मिसाइल से निशाना बनाया है.
गाज़ा और वेस्ट बैंक: नरसंहार और बदतर होते हालात
गाज़ा में अक्टूबर 2023 से अब तक मरने वालों की संख्या 72,302 हो गई है. पिछले 24 घंटों में इज़रायली हमलों में सात और फ़िलिस्तीनी मारे गए. ड्रॉप साइट न्यूज़ की रिपोर्ट एक डरावनी हकीकत पेश करती है कि गाज़ा के शिविरों में स्वच्छता की कमी के कारण बच्चों को चूहों द्वारा काटे जाने की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं. सोमवार को इज़रायली सेना ने खान यूनिस में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के एक वाहन पर गोलीबारी की, जिसमें उसके ड्राइवर की मौत हो गई. इसके बाद डबल्यूएचओ ने रफ़ा क्रॉसिंग के ज़रिए मरीज़ों को निकालने का काम अस्थायी रूप से रोक दिया है. वेस्ट बैंक के कलंदिया शरणार्थी शिविर से एक वीडियो सामने आया है जिसमें इज़रायली सैनिक एक निहत्थे फ़िलिस्तीनी को बेरहमी से पीटते दिख रहे हैं.
ईरान ने ट्रंप की समयसीमा से पहले अपनी ढेर सारी मांगें रख दीं, 10 सूत्री जवाब भेजा
एक्सियोस के ग्लोबल अफेयर्स कॉरेस्पोंडेंट बराक़ राविद की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने युद्ध समाप्त करने के लिए अमेरिका के साथ चल रही चर्चाओं पर अपना 10-सूत्रीय जवाब भेज दिया है. अमेरिकी अधिकारियों और ईरानी सरकारी समाचार एजेंसी इरना ने इसकी पुष्टि की है. यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दी गई मंगलवार रात 8 बजे (ईटी) की समयसीमा समाप्त होने वाली है. ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि इस समय तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो वे ईरानी नागरिक बुनियादी ढांचे पर बड़े पैमाने पर हमलों का आदेश देंगे. एक अमेरिकी अधिकारी ने ईरानी प्रतिक्रिया को ‘मक्सिमलिस्ट’ (अधिकतम मांग वाला) करार दिया है. ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि ईरान का जवाब “महत्वपूर्ण” तो है लेकिन “काफी नहीं” है. उन्होंने कहा कि इसकी संभावना बहुत कम है कि वे अपनी समयसीमा को आगे बढ़ाएंगे. ट्रंप के शब्दों में, “मैंने उन्हें एक मौका दिया था, और उन्होंने इसे नहीं लिया.”
इस बीच, इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप को किसी भी युद्धविराम समझौते के खिलाफ चेतावनी दी है. रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका, ईरान और क्षेत्रीय मध्यस्थ दो चरणों वाले समझौते पर चर्चा कर रहे हैं. इसमें पहले 45 दिनों का युद्धविराम होगा, जिसका उपयोग बातचीत के लिए किया जाएगा और फिर युद्ध समाप्त करने के लिए एक पूर्ण समझौता होगा. ईरान की मांग है कि युद्ध का अंत केवल अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी होना चाहिए. इरना के अनुसार, ईरान चाहता है कि लेबनान जैसे अन्य क्षेत्रों में भी शत्रुता समाप्त हो. उनकी अन्य मांगों में होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से सुरक्षित मार्ग के लिए एक प्रोटोकॉल, पुनर्निर्माण के लिए भुगतान, और अमेरिका व अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को हटाना शामिल है. ट्रंप ने दोहराया है कि यदि सौदा नहीं हुआ, तो ईरान के पास न पुल बचेंगे और न ही पावर प्लांट. उन्होंने नेतन्याहू से बातचीत में यह भी स्पष्ट किया कि वे ईरान द्वारा समृद्ध यूरेनियम सौंपने की अपनी मांग से पीछे नहीं हटेंगे.
विश्लेषण: ईरान और अमेरिका के बीच गहराता कूटनीतिक गतिरोध
इज़रायली रणनीतिक विशेषज्ञ डैनी सिट्रिनोविच, जो आईएनएसएस के सीनियर फेलो हैं, ने बराक़ राविद की रिपोर्ट पर एक विस्तृत विश्लेषण साझा किया है. सिट्रिनोविच के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच रणनीतिक मतभेद इतने गहरे हैं कि समयसीमा समाप्त होने से पहले किसी समझौते पर पहुँचना बेहद मुश्किल है. उनका मानना है कि तनाव कम करने का एकमात्र वास्तविक तरीका ऐसा युद्धविराम है जो ईरान को विश्वसनीय गारंटी दे कि बातचीत की स्थिति चाहे जो भी हो, सैन्य हमले फिर से शुरू नहीं होंगे. इसके अलावा, ईरान चाहता है कि प्रमुख समुद्री रास्तों पर उसके नियंत्रण को चुनौती न दी जाए.
सिट्रिनोविच का विश्लेषण कहता है कि तेहरान वर्तमान में खुद को मज़बूत स्थिति में देख रहा है और वह उन शर्तों को स्वीकार करने को तैयार नहीं है जिन्हें उसने युद्ध से पहले ठुकरा दिया था. उनके अनुसार, ईरान के नज़रिए से कूटनीतिक प्रगति तभी संभव है जब अमेरिका ईरान की शर्तों के करीब आए, जिनमें भविष्य के हमलों के खिलाफ गारंटी और आर्थिक मुआवज़ा शामिल है. बदले में, ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य को अपने नियंत्रण में रखते हुए खुला रखने की पेशकश कर सकता है. अगले 48 घंटे इस बात का फैसला करेंगे कि यह संघर्ष अनियंत्रित होकर बड़े युद्ध में बदलता है या फिर किसी ऐसे युद्धविराम की ओर बढ़ता है जो प्रभावी रूप से लड़ाई को समाप्त कर दे.
ईरान की बाब अल-मंडेब बंद करने की धमकी: वैश्विक व्यापार पर संकट के बादल
अल ज़जीरा के लिए प्रियंका शंकर और चारु सूडान कस्तूरी की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के सर्वोच्च नेता मोज्तबा खमेनेई के एक शीर्ष सलाहकार अली अकबर वेलायती ने धमकी दी है कि ईरान के सहयोगी बाब अल-मंडेब शिपिंग मार्ग को बंद कर सकते हैं. यह मार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और वैश्विक तेल व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. वेलायती ने सोशल मीडिया पर चेतावनी दी कि “प्रतिरोध मोर्चे की एकीकृत कमान बाब अल-मंडेब को होर्मुज़ की तरह ही देखती है.” यदि होर्मुज़ और बाब अल-मंडेब दोनों बंद हो जाते हैं, तो दुनिया की 25 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति (तेल और गैस) ठप हो जाएगी.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक “दुःस्वप्न” साबित हो सकती है. बाब अल-मंडेब से होकर ही चीन और भारत जैसे एशियाई देशों से यूरोप जाने वाले कंटेनर जहाज़ गुज़रते हैं. सऊदी अरब ने हाल के दिनों में होर्मुज़ के बंद होने के बाद अपने तेल निर्यात के लिए लाल सागर के बंदरगाहों का उपयोग बढ़ा दिया है, लेकिन बाब अल-मंडेब के बंद होने से यह विकल्प भी खत्म हो जाएगा. यमन के हूती विद्रोहियों ने पहले भी इस मार्ग पर हमले करके इसे बाधित किया है. पूर्व अमेरिकी राजनयिक नबील खूरी के अनुसार, हूतियों द्वारा जहाजों पर किया गया एक भी हमला लाल सागर के पूरे वाणिज्यिक यातायात को रोक सकता है, जो अमेरिका और इज़रायल के लिए एक ‘रेड लाइन’ होगी और इसके परिणामस्वरूप यमन पर भीषण हमले हो सकते हैं.
ईरान ने अस्थायी युद्धविराम को ठुकराया, कहा- समझौते की शर्तें पहले ही तय हैं
ड्रॉप साइट न्यूज़ की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने बताया है कि तेहरान ने अमेरिका और इज़रायल के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए किसी भी ‘अस्थायी युद्धविराम’ के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है. जेरेमी स्कहिल, मुर्तज़ा हुसैन और जावा अहमद की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान केवल उसी समझौते को स्वीकार करेगा जो युद्ध का स्थायी अंत करे. अधिकारी ने पाकिस्तान द्वारा मध्यस्थता किए गए नए प्रस्ताव को “जमीनी हकीकत से कटा हुआ” बताया. पाकिस्तान के आर्मी चीफ असीम मुनीर और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के बीच हुई बातचीत के बाद ‘इस्लामाबाद समझौते’ का ढांचा तैयार किया गया था, जिसमें 15-20 दिनों के अस्थायी युद्धविराम के बदले होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने की बात कही गई थी. ईरानी अधिकारी ने कहा कि ट्रंप प्रशासन केवल वित्तीय बाज़ारों और कानूनी बाधाओं के कारण युद्ध में एक छोटा ब्रेक चाहता है, जबकि ईरान को स्थायी सुरक्षा और प्रतिबंधों से मुक्ति चाहिए. ईरान ने स्पष्ट किया कि फरवरी में जिनेवा में दिया गया उसका प्रस्ताव, जिसमें परमाणु कार्यक्रम पर रियायतें और ‘अनाक्रमण समझौता’ शामिल था, आज भी स्थायी शांति का आधार बन सकता है.
दुनिया की अन्य महत्वपूर्ण ख़बरें: अफ़ग़ानिस्तान में बाढ़ और नाइजीरिया में अपहरण
अफ़ग़ानिस्तान: पिछले 10 दिनों में भारी बारिश, बाढ़ और आकाशीय बिजली गिरने से 77 लोगों की मौत हो गई है और 800 से ज़्यादा घर तबाह हो गए हैं.
सीरिया: न्यूयॉर्क टाइम्स की एक जांच में पाया गया है कि सीरिया में अलावी अल्पसंख्यक महिलाओं और लड़कियों का अपहरण और यौन उत्पीड़न बड़े पैमाने पर हो रहा है, जिसे प्रशासन छिपा रहा है.
नेपाल: ईरान युद्ध के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट से निपटने के लिए नेपाल सरकार ने दफ़्तरों और स्कूलों में कार्य सप्ताह 6 दिन से घटाकर 5 दिन कर दिया है.
नाइजीरिया: ज़मफ़ारा राज्य में सशस्त्र डकैतों ने 150 से ज़्यादा लोगों, जिनमें ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं, का अपहरण कर लिया है.
यूक्रेन: यूक्रेन ने रूस के बाल्टिक सागर तेल टर्मिनल और रिफाइनरी पर ड्रोन हमले तेज़ कर दिए हैं, जिसमें कई लोग हताहत हुए हैं.
भूमध्य सागर: लीबिया से आ रही प्रवासियों की नाव डूबने से 70 से ज़्यादा लोगों के मारे जाने की आशंका है.
ट्रंप बेहद घातक अहंकारी, झूठ बोलने और दूसरों को परेशान देख खुश होने वाले
टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश के लाइव शो में डोनाल्ड ट्रंप की दिमागी सेहत पर चर्चा की गई. दरअसल, अप्रैल 2026 में ईरान के साथ चल रहे युद्ध के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बर्ताव ने उनकी मानसिक सेहत और स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. उनके गाली-गलौज वाले अल्टीमेटम और युद्ध को लेकर लगातार बदलते फैसलों ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. मनोवैज्ञानिक जॉन गार्टनर उन्हें एक “मैलिग्नेंट नार्सिसिस्ट” यानी बेहद घातक अहंकारी मानते हैं. उनके अनुसार ट्रंप में अहंकार, बिना किसी पछतावे के झूठ बोलना, हर किसी पर शक करना और दूसरों को परेशान देखकर खुश होने जैसे लक्षण हैं. दूसरे कार्यकाल में उनके पास अब ऐसे समझदार सलाहकारों की कमी है जो उन्हें गलत फैसले लेने से रोक सकें.
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप “हाइपोमेनिया” के शिकार हैं, जिस वजह से वे बहुत ज़्यादा ऊर्जावान रहते हैं, कम सोते हैं और बिना सोचे-समझे बड़े फैसले ले लेते हैं. ईरान संकट के दौरान उनके सोशल मीडिया पोस्ट, जैसे “पुलों और पावर प्लांट को तबाह करने का दिन”, इसी दिमागी अस्थिरता का संकेत हैं. कुछ न्यूरोसाइंटिस्ट्स का मानना है कि उनमें “फ्रंटो-टेंपोरल डिमेंशिया” यानी दिमाग के सिकुड़ने के लक्षण भी दिख रहे हैं. वे अक्सर अपनी बातों को पूरा नहीं कर पाते, शब्दों में उलझ जाते हैं और अपनी ही पुरानी शिकायतों को बार-बार दोहराते हैं. 1980 के दशक के उनके भाषणों के मुकाबले आज उनके सोचने और बोलने के तरीके में भारी गिरावट देखी गई है.
आम जनता के बीच भी उनकी मानसिक क्षमता को लेकर भरोसा कम हुआ है. 2026 के एक सर्वे के अनुसार 61 प्रतिशत अमेरिकी मानते हैं कि उम्र के साथ ट्रंप का व्यवहार अनिश्चित हो गया है. यहाँ तक कि उनकी अपनी पार्टी के 30 प्रतिशत लोग भी अब उनकी दिमागी मजबूती पर शक करने लगे हैं. पत्रकार सुज़ैन ग्लेसर कहती हैं कि ट्रंप के दिमाग का “इंटरनल फ़िल्टर” अब पूरी तरह खत्म हो चुका है. वे अब केवल “बदला” लेने की भावना से काम कर रहे हैं और तथ्यों से परे अपनी एक अलग ही काल्पनिक दुनिया बना चुके हैं जहाँ वे 2020 की हार को स्वीकार नहीं करते.
ईरान युद्ध के दौरान उनकी बयानबाज़ी बहुत विरोधाभासी रही है. एक ही दिन में उन्होंने युद्ध की योजना पर कई अलग-अलग बातें कहीं, जिससे मित्र देशों में भी डर का माहौल है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके हाथ में परमाणु कोड हों और जो अपनी भावनाओं पर काबू न रख सके, वह दुनिया के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है. हालांकि ट्रंप के समर्थक इसे उनकी पारदर्शिता और ताकत मानते हैं, लेकिन दिमागी डॉक्टर इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट देख रहे हैं.
ईश्वर उनके पक्ष में, बिल हमारे नाम: भारत के लिए पश्चिम एशिया युद्ध की असली कीमत का हिसाब
राजनीतिक वैज्ञानिक और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के जानकार जॉन मियरशाइमर के अनुसार, “राष्ट्र तभी युद्ध छेड़ते हैं जब उन्हें त्वरित सफलता की उम्मीद होती है.” हालाँकि, बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किया गया यह युद्ध अब एक महीने से अधिक खींच चुका है, जिसने पूरी दुनिया, विशेषकर भारत को एक गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया है. आर्थिक मामलों के जानकार विवेक कौल ने “न्यूज़ लॉन्ड्री” में ईरान युद्ध के बाद देश के मौजूदा आर्थिक हालात की समग्र तस्वीर पेश की है. इसके लिए उन्होंने कई समाचार माध्यमों की मदद ली है.
उनका कहना है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है (89% कच्चा तेल और 50% से अधिक गैस). पश्चिम एशिया में तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य का मार्ग लगभग बंद हो गया है, जहाँ से दुनिया का 20% तेल गुजरता है. इसके परिणामस्वरूप, कच्चे तेल की भारतीय बास्केट $69 से बढ़कर $120.84 प्रति बैरल तक पहुँच गई है. प्राकृतिक गैस की कीमतों में 73% से अधिक की उछाल आई है.
ईंधन की बढ़ती कीमतों ने चौतरफा मार की है: मसलन, औद्योगिक डीजल की कीमतों में 25% की वृद्धि हुई है, जो अंततः माल के उत्पादन की लागत बढ़ाकर महंगाई (मुद्रास्फीति) को बढ़ाएगी. कमर्शियल सिलेंडर महंगे होने से बाहर का खाना महंगा हुआ है. घरेलू सिलेंडरों की किल्लत और कालाबाजारी के कारण प्रवासी श्रमिकों का पलायन शुरू हो गया है. एटीएफ की बढ़ती कीमतों ने हवाई यात्रा को महंगा बना दिया है.
युद्ध का प्रभाव केवल ईंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन उत्पादों तक फैला है जिनकी हम कल्पना भी नहीं करते: जैसे- दवाएं. पैरासिटामोल और एंटीबायोटिक्स जैसे आवश्यक साल्ट पेट्रोकेमिकल्स से बनते हैं. आपूर्ति बाधित होने से दवाओं की भारी किल्लत और कीमतों में वृद्धि तय है.
खेती और उर्वरक: भारत यूरिया का दुनिया का सबसे बड़ा आयातक है. प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतों और सप्लाई चेन टूटने से उर्वरक की लागत बढ़ी है. हालांकि सरकार सब्सिडी दे रही है, लेकिन इससे राजकोषीय खजाना खाली हो रहा है.
स्वास्थ्य और तकनीक: हीलियम गैस, जो एमआरआई मशीनों और सेमीकंडक्टर के लिए अनिवार्य है, उसकी आपूर्ति कतर से बाधित होने के कारण स्वास्थ्य सेवाएं संकट में हैं.
रोजमर्रा की वस्तुएं: प्लास्टिक, पैकेजिंग और यहाँ तक कि कंडोम (अमोनिया की कमी के कारण) के उत्पादन पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं.
राजकोषीय घाटा: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ‘मैक्रो’ स्तर पर स्थिति और भी गंभीर है. सरकार ने जनता को बचाने के लिए पेट्रोल-डीजल पर टैक्स घटाया है, लेकिन इस बढ़े हुए खर्च को पूरा करने के लिए सरकार को भारी कर्ज लेना पड़ेगा, जिससे ब्याज दरें बढ़ेंगी और विकास धीमा होगा.
रुपये की गिरावट: बढ़ते आयात बिल के कारण डॉलर की मांग बढ़ी है. विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से लगभग 1.38 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं, जिससे रुपया ऐतिहासिक गिरावट की ओर है.
विदेशी मुद्रा भंडार: आरबीआई ने रुपये को बचाने के लिए केवल चार हफ्तों में 40 अरब डॉलर खर्च कर दिए हैं, जो चिंताजनक है.
अप्रैल में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों के कारण सरकार के लिए कीमतें बढ़ाना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा है. इसके अलावा, इस संकट ने भारत की ‘ऊर्जा सुरक्षा’ की पोल खोल दी है. भारत आज भी रूसी तेल खरीदने या अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विदेशी शक्तियों और उनके द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों की अनुमति पर निर्भर है.
कौल के अनुसार, अंततः, पश्चिम एशियाई युद्ध का विनाश बॉब डायलन के गीत “विथ गॉड ऑन अवर साइड” की सनकी सच्चाई को दर्शाता है. नेता अक्सर इस नैतिक “निश्चितता” के साथ संघर्ष में उतरते हैं कि जीत त्वरित और गारंटीशुदा होगी. लेकिन जैसे-जैसे होर्मुज का रास्ता बंद हो रहा है और तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, वह अहंकार पूरी दुनिया के लिए एक लंबा और महंगा सच बन गया है.
भारत के लिए, इस तथाकथित “न्यायपूर्ण” युद्ध की कीमत केवल डॉलर और रुपये में नहीं, बल्कि दवा, भोजन और कमजोर होते रुपये के रूप में चुकाई जाएगी. हम उस संघर्ष का बिल भरने के लिए छोड़ दिए गए हैं जो इस खतरनाक भ्रम से पैदा हुआ है कि सत्ता हमेशा सही होती है.
या जैसा कि महान अमरीश पुरी ने कहा होता, यदि उन्होंने कभी पर्दे पर डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका निभाई होती: “ट्रंप खुश हुआ!”
सुशांत सिंह: पाकिस्तान की शांतिदूत बनने की कोशिश भारत के लिए एक झटका
सुशांत सिंह ने “एफपी” (फॉरेन पॉलिसी) के लिए इस लेख में लिखा है कि ‘इस्लामाबाद जहां ईरान युद्ध में खुद को एक मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर रहा है, वहीं नई दिल्ली हाशिए पर होती जा रही है. उनका यह लेख भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे कूटनीतिक शक्ति-संतुलन में आए एक बड़े बदलाव को रेखांकित करता है. लेख का मुख्य तर्क यह है कि जहाँ भारत ने पिछले एक दशक से पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की रणनीति अपनाई थी, वहीं वर्तमान में पाकिस्तान न केवल उस घेराबंदी को तोड़ने में सफल रहा है, बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण ‘मध्यस्थ’ के रूप में उभरकर अपनी प्रासंगिकता सिद्ध कर दी है.
सुशांत के अनुसार, जब भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभाने के लिए पाकिस्तान को “दलाल” (फिक्सर) कहा, तो इस अपमानजनक शब्द के पीछे दरकिनार किए जाने का एक गहरा अहसास छिपा था. एक तरह से, यह वास्तविकता की एक अनैच्छिक स्वीकृति भी थी: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नजर में, “दलाल” होना शर्म की बात नहीं, बल्कि उपयोगिता का प्रतीक है.
ट्रंप इतिहास के सबसे बेहतरीन सौदे करने की अपनी क्षमता का बखान करते हैं, और उन्हें पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर के रूप में बिल्कुल वैसा ही वार्ताकार मिला है जैसा वे पसंद करते हैं—एक सैन्य शक्ति का संचालक जिसकी व्हाइट हाउस तक सीधी पहुँच है और जो खुद को उपयोगी साबित करने की इच्छा रखता है. इसने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक असहज स्थिति में डाल दिया है, जिन्हें मध्य पूर्व के संकट पर ट्रंप की ओर से केवल एक औपचारिक फोन कॉल (जिसमें एलन मस्क भी लाइन पर सुन रहे थे) से संतोष करना पड़ा.
लेख के अनुसार, इस्लामाबाद ने खुद को वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित किया है. 29 मार्च को पाकिस्तान ने मिस्र, तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिलकर युद्ध पर चर्चा की मेजबानी की. इसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर एक ‘पांच-सूत्रीय शांति योजना’ जारी की.
यह सक्रियता 1971 की याद दिलाती है जब पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन के बीच ऐतिहासिक मुलाकात करवाई थी. आज पाकिस्तान फिर से अपनी भौगोलिक स्थिति और सैन्य संबंधों का लाभ उठा रहा है. पाकिस्तान ने न केवल ईरान के साथ बलूच विद्रोहियों पर सहयोग की सहमति बनाई है, बल्कि सऊदी अरब और चीन के साथ भी अपने संबंधों को नया आयाम दिया है. जबकि, मोदी सरकार की विदेश नीति ने ‘जमीनी हकीकत’ के बजाय ‘घरेलू विमर्श’ को अधिक महत्व दिया. भारत ने हमेशा खुद को एक ऐसी वैश्विक शक्ति के रूप में पेश किया जिससे दुनिया को सलाह लेनी चाहिए, लेकिन ईरान-अमेरिका संकट में भारत की भूमिका नगण्य रही.
ईरान युद्ध की शुरुआत में भारत ने खुलकर इजरायल का साथ दिया, जिससे उसने एक तटस्थ मध्यस्थ बनने का मौका खो दिया. आज स्थिति यह है कि भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा (रसोई गैस) के लिए तेहरान से व्यक्तिगत अनुरोध करने पड़ रहे हैं, जबकि पाकिस्तान पूरे क्षेत्र के लिए नीतिगत ढांचे तैयार कर रहा है.
लेख यह भी उजागर करता है कि भारत और अमेरिका के संबंध साझा मूल्यों के बजाय ‘चीन को लेकर साझा चिंताओं’ पर अधिक आधारित हैं. ट्रंप प्रशासन ने जिस तरह भारतीय सामानों पर शुल्क लगाए और रूसी तेल पर प्रतिबंध की बात की, उसने दोनों देशों के बीच के ‘विशेष संबंधों’ के दावे की पोल खोल दी. अमेरिकी अधिकारियों ने यहाँ तक संकेत दिए हैं कि वे चीन जैसी गलती दोबारा नहीं करेंगे और भारत के उदय को आँख बंद करके समर्थन नहीं देंगे. 1971 की तरह ही, अमेरिका के लिए पाकिस्तान की सामरिक उपयोगिता फिर से भारत के कूटनीतिक कद पर भारी पड़ती दिख रही है.
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय पाकिस्तान, मिस्र, तुर्की और सऊदी अरब का एक साथ आना है. यह गुट न केवल सैन्य रूप से शक्तिशाली है, बल्कि इसमें परमाणु शक्ति और वित्तीय ताकत का भी संगम है. यह समूह पारंपरिक सत्ता केंद्रों को दरकिनार कर क्षेत्रीय व्यवस्था को अपने अनुसार ढालने की क्षमता रखता है, जो भारत के द्विपक्षीय हितों के लिए एक गंभीर चुनौती है.
बहरहाल, सुशांत के इस लेख का निचोड़ यह है कि पाकिस्तान ने अपनी तमाम आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरताओं के बावजूद अपनी ‘प्रासंगिकता’ को फिर से निर्मित कर लिया है. भारत के लिए यह अपमानजनक है कि जिन राजधानियों में मोदी परामर्श की उम्मीद करते थे, वहाँ असीम मुनीर का स्वागत हो रहा है.
सुशांत सिंह अंत में सुझाव देते हैं कि भारत को पाकिस्तान के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग करने के बजाय अपनी विदेश नीति के बुनियादी सिद्धांतों पर गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए. यह ‘विश्वगुरु’ के घरेलू नारों से बाहर निकलकर वास्तविक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के झटके को समझने और उसे स्वीकार करने का समय है. अंग्रेजी में पूरा लेख यहां पढ़ा जा सकता है.
(सुशांत सिंह येल विश्वविद्यालय में व्याख्याता और भारत की ‘कारवां’ पत्रिका के कंसल्टिंग एडिटर हैं)
युद्ध का असर: सोजत मेहंदी और बीकानेरी भुजिया का निर्यात प्रभावित; ईरानी ऊन का आयात भी रुका
पश्चिम एशिया युद्ध के कारण पैदा हुए शिपिंग और ईंधन संकट के क्रमिक प्रभाव ने अब निर्यात को बाधित करना, लागत बढ़ाना और उत्पादन को रोकना शुरू कर दिया है. इसका सीधा असर बीकानेर के प्रसिद्ध नमकीन उद्योग और सोजत के मेहंदी व्यापार जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर पड़ा है.
जयपुर से राजेश असनानी की रिपोर्ट है कि राजस्थान के लोकप्रिय स्नैक, बीकानेरी भुजिया की वैश्विक स्तर पर मजबूत पकड़ है और भारत इसके निर्यात में अग्रणी है. वर्तमान में, पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण बढ़ी हुई माल ढुलाई लागत (फ्रेट कॉस्ट) और शिपिंग में देरी की वजह से इस उद्योग को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
आमतौर पर बीकानेर से हर महीने भुजिया, पापड़ और नमकीन के लगभग 15-20 कंटेनर निर्यात किए जाते हैं, लेकिन अब इस निर्यात में भारी कमी आई है. निर्यातकों के अनुसार, जो खेप पहले खाड़ी और यूरोपीय बाजारों में 30 दिनों के भीतर पहुँच जाती थी, उसे अब पहुँचने में 60 दिन तक लग रहे हैं. इस देरी का कारण क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच जहाजों द्वारा लंबे और सुरक्षित रास्तों का चयन करना बताया जा रहा है, जिससे पारगमन समय और रसद (लॉजिस्टिक्स) लागत बढ़ गई है. कंटेनरों की कमी और कार्गो की धीमी आवाजाही ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है.
उद्योग से जुड़े लोगों ने माल ढुलाई शुल्क में लगातार हो रही वृद्धि पर चिंता जताई है. साथ ही, कच्चे माल की लागत भी बढ़ गई है. पिछले एक महीने में खाद्य तेलों, विशेष रूप से पाम और सोयाबीन तेल की कीमतों में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसने सीधे तौर पर निर्माताओं के लिए उत्पादन लागत बढ़ा दी है.
इस संकट ने पाली जिले में स्थित सोजत के प्रसिद्ध ‘मेहंदी’ उद्योग को भी बुरी तरह प्रभावित किया है. खबरों के अनुसार, 150 से अधिक फैक्ट्रियों में कामकाज बंद हो गया है, जिससे 2,200 से अधिक श्रमिक बेरोजगार हो गए हैं. लगभग 250 करोड़ रुपये का माल बंदरगाहों और गोदामों में अटका हुआ है, जिससे निर्यातक संकट में हैं.
सोजत का मेहंदी उद्योग, जिसका वार्षिक टर्नओवर 4,000-5,000 करोड़ रुपये है, फिलहाल ठप पड़ा है. व्यापारियों का कहना है कि पिछले एक महीने से निर्यात पूरी तरह से रुका हुआ है. इस कस्बे में लगभग 35 बड़ी फैक्ट्रियां हैं जो मुख्य रूप से मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) के बाजार में प्राकृतिक मेहंदी और हेयर डाई उत्पादों की आपूर्ति करती हैं. मांग में भारी गिरावट के कारण उत्पादन अपनी सामान्य क्षमता के मात्र 20 प्रतिशत तक गिर गया है.
निर्यातक नितेश अग्रवाल ने कहा, “यह स्थिति उद्योग के लिए कोविड-19 महामारी के बाद से अब तक का सबसे बुरा दौर है.”
इस बीच, बीकानेर का ऊन उद्योग भी एक नए संकट से जूझ रहा है. अपनी मजबूत घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति के लिए जाने जाने वाले इस क्षेत्र पर निर्यात और कच्चे माल के आयात, दोनों में आए व्यवधानों की मार पड़ी है. भू-राजनीतिक तनाव के कारण निर्यात के ऑर्डर लंबित हैं और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) प्रभावित हुई है.
स्थानीय ऊन व्यापारी राहुल कुमार ने कहा कि इस संघर्ष का बीकानेर के औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है. कच्चे ऊन के प्रमुख आपूर्तिकर्ता ईरान ने खेप (शिपमेंट) रोक दी है, जिससे आपूर्ति बाधित हो गई है. इसके अतिरिक्त, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने परिवहन लागत को बढ़ा दिया है, जिससे उत्पादन की कुल लागत और बढ़ गई है.
बीकानेर में लगभग 100 ऊन प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) इकाइयाँ हैं जो सामूहिक रूप से प्रतिदिन लगभग 1 लाख किलोग्राम ऊनी धागे का उत्पादन करती हैं, जिसका एक बड़ा हिस्सा कालीन निर्माण के लिए भदोही को आपूर्ति किया जाता है. यह धागा आमतौर पर 180-200 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकता है.
उद्योग के अनुमानों के अनुसार, जारी संकट के कारण लगभग 200-300 करोड़ रुपये का व्यवसाय पहले ही प्रभावित हो चुका है. व्यापारियों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति ऐसी ही बनी रही, तो घाटा और बढ़ सकता है, जिससे क्षेत्र के पारंपरिक उद्योगों पर आर्थिक दबाव गहरा जाएगा.
आकार पटेल: युद्ध की असलियत
हम उस जंग के दूसरे महीने में हैं जो अब एक लंबी लड़ाई की शक्ल लेती जा रही है और मैंने सोचा कि मुझे कुछ बातें लिखनी चाहिए. पहली बात तो ये है कि दुनिया भर के देश अपनी जनता को उस चीज़ के लिए तैयार कर रहे हैं जो आने वाले समय में होने वाली है.
ऑस्ट्रेलिया ने तस्मानिया और विक्टोरिया में पब्लिक ट्रांसपोर्ट मुफ़्त कर दिया है ताकि लोग कार का इस्तेमाल न करें. मिस्र में दुकानों और रेस्टोरेंट्स को रात 9 बजे बंद करना पड़ता है. फिलीपींस में अब हफ्ते में 4 दिन काम होता है और पाकिस्तान में भी ऐसा ही है. म्यांमार में कारों को सड़क से दूर रखने के लिए ऑड-ईवन सिस्टम लागू है. स्लोवेनिया में ईंधन खरीदने की 50 लीटर की सीमा है और नेपाल ने एलपीजी सिलेंडरों में गैस कम कर दी है. थाईलैंड की सरकार ने लोगों से जैकेट न पहनने को कहा है ताकि एयर-कंडीशनर ज़्यादा तापमान पर चल सकें. बांग्लादेश ने अपनी यूनिवर्सिटियां बंद कर दी हैं और वहां प्लान्ड ब्लैकआउट (जिसे हम पुराने दिनों में लोड-शेडिंग कहते थे) शुरू हो गया है. दक्षिण सूडान भी बिजली के इस्तेमाल को सीमित कर रहा है. श्रीलंका ने बुधवार को सरकारी छुट्टी घोषित कर दी है. ये लिस्ट काफी लंबी है.
भारत में अभी तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है. इसके दो कारण हैं. पहला ये कि हमारी सरकार को ऐसा लगता है, हालांकि उसने ये साफ़ तौर पर नहीं कहा है, कि कोई असली समस्या नहीं है. उसने हमें बताया है कि लोग जो कमी महसूस कर रहे हैं वो घबराहट का नतीजा है और अगर भारतीयों की ये बेमतलब की घबराहट कम हो जाए, तो चीज़ें सामान्य हो जाएंगी. दूसरा कारण ये है कि हमारी सरकार का अंदाज़ा है कि उसके पास खाड़ी देशों से आने वाली चीज़ों का पर्याप्त स्टॉक है: जैसे ईंधन, गैस, खाद का सामान वगैरह. ‘पर्याप्त स्टॉक’ ज़ाहिर तौर पर एक लचीला शब्द है क्योंकि कोई नहीं जानता कि ये जंग कब तक चलेगी. इनमें से कोई भी बात उन ऑटो-रिक्शा की कतारों और मज़दूरों के पलायन से मेल नहीं खाती जो हम देख रहे हैं. हम देखेंगे कि जैसे-जैसे ईरान टिका रहेगा, चीज़ें कैसे बदलती हैं. तेल के कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि इसी हफ्ते से चीज़ों की भारी कमी होने लगेगी, क्योंकि जंग शुरू होने के वक़्त जो जहाज़ समुद्र में थे वो अब खाली हो चुके हैं और नए जहाज़ नहीं आ रहे हैं.
मेरी एक और बात ये है कि अमेरिका ने कांग्रेस, यानी वहां की संसद द्वारा युद्ध की घोषणा किए बिना ही ईरान पर हमला कर दिया है. ये बात क्यों ज़रूरी है? जब अमेरिकी संविधान पर बहस हो रही थी, तो उसके संस्थापकों को लगा कि किसी एक व्यक्ति द्वारा युद्ध घोषित करने की क्षमता ही एक राजा को चुने हुए नेता से अलग करती है. राष्ट्रपति हिंसा का रास्ता दिखा सकता है और उसे संभाल सकता है, लेकिन युद्ध की औपचारिक घोषणा के बाद ही; जंग का ऐलान करने की ज़िम्मेदारी कांग्रेस की थी. सत्ता का ये अहम बंटवारा ईरान युद्ध में खत्म हो गया है और अगर बात दूसरे देशों पर हमला करने की ताकत की हो, तो अमेरिकी राष्ट्रपति और एक राजा में अब कोई फ़र्क नहीं रह गया है.
दिलचस्प बात ये है कि जो रूढ़िवादी आमतौर पर खुद को संविधानवादी होने पर गर्व करते हैं, वही ऐसी स्थिति चाहते हैं. ये बात इसलिए भी बताने लायक है क्योंकि डोनाल्ड ट्रम्प एक अस्थिर मिज़ाज वाले राष्ट्रपति हैं. वो ये कह सकते हैं और कह चुके हैं कि जंग ‘पूरी तरह खत्म’ है लेकिन जारी रहेगी. वो कहते हैं कि बातचीत अच्छी चल रही है और अगले ही पल कहते हैं कि बात करने के लिए कोई बचा ही नहीं है क्योंकि अमेरिका ने सभी ईरानी नेताओं को मार डाला है. वो एक पोस्ट में मांग करते हैं कि ईरान होर्मुज़ की खाड़ी खोल दे और फिर एक भाषण में कहते हैं कि अमेरिका वहां से चला जाएगा और इसे खोलना दूसरे देशों की ज़िम्मेदारी है. अमेरिका की जनता, वहां का मीडिया और लोकतांत्रिक ढांचा इस सब से ठीक लग रहा है, इसीलिए ट्रम्प अपनी मर्ज़ी चला रहे हैं.
तीसरी बात जो मेरे मन में है वो भारत की भूमिका को लेकर है. हमारे कई बेहतरीन वॉट्सऐप ग्रुप इस बात पर यकीन करते हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यू.एन.एस.सी.) की हमारी सीट गंवा दी. इस यकीन का आधार क्या है ये साफ़ नहीं है, पर शायद ये है कि नेहरू सीट रिज़र्व करने के लिए उस पर अपना रुमाल रखना भूल गए (या उन्होंने रुमाल फेंका और वो चूक गया) या ऐसा ही कुछ. लेकिन मान लेते हैं कि हमारे पास सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट होती. आज फारस की खाड़ी में चल रही जंग को रोकने के लिए हम उसका क्या करते? इस सीट के मालिकों के पास एक मुख्य ताकत होती है: वीटो, यानी सुरक्षा परिषद में वोट के लिए आने वाली चीज़ों को खारिज करने का अधिकार. यूनाइटेड किंगडम के पास वो ताकत है, और उसका कहना है कि वो इस जंग में शामिल नहीं है. उसने अपनी सीट का क्या किया और वो क्या कर सकता है? ऐसा कुछ नहीं जो दिमाग में आए, इसीलिए आज दुनिया सुरक्षा परिषद की तरफ नहीं देख रही है.
इस जंग को खत्म करने या इसके नुकसानदेह असर को कम करने के लिए भारत समेत कोई भी देश जो कर सकता है, वो उन पहलों से ही आएगा जो वो दूसरे देशों को एकजुट करने के लिए ले सकता है. जो लोग किनारे पर खड़े रहना चाहते हैं, उनसे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, चाहे वो अपने कीमती वीटो को पकड़कर बैठे रहें या नहीं. वे बस तमाशबीन हैं.
ये कुछ बातें हैं जो मैंने गौर की हैं और मुझे शक है कि ये आखिरी बार नहीं है जब ये कॉलम ईरान युद्ध का ज़िक्र करेगा. ऐसी घटनाएं होती हैं जो दुनिया को नया रूप देती हैं और उसके काम करने के तरीके को हमेशा के लिए बदल देती हैं. ये भी वैसा ही एक मौका है और अमेरिका के राष्ट्रपति-राजा ने हम सभी को इस नई हकीकत में धकेल दिया है, चाहे हम इसे पसंद करें या न करें और चाहे हम इसे चाहें या न चाहें.
सुप्रीम कोर्ट ने अडानी की योजना पर रोक लगाने से किया इनकार; ट्रिब्यूनल को वेदांता की याचिका सुनने को कहा
भारत के उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने जयपी एसोसिएट्स लिमिटेड (जेएएल) के लिए अडानी एंटरप्राइजेज की समाधान योजना के कार्यान्वयन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है, जिससे फिलहाल के लिए अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है. ‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ के अनुसार, यह निर्णय वेदांता लिमिटेड द्वारा कार्यवाही को रोकने की मांग वाली चुनौती के बाद आया है. हालांकि अदालत ने अडानी की योजना पर रोक नहीं लगाई, लेकिन उसने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) को प्राथमिकता के आधार पर वेदांता की अपील सुनने का निर्देश दिया है, और इस मामले के लिए विशेष रूप से 10 अप्रैल की तारीख तय की है.
यह कानूनी विवाद लेनदारों की समिति (सीओसी) द्वारा अपनाई गई मूल्यांकन प्रक्रिया पर केंद्रित है. वेदांता का मुख्य तर्क यह है कि उसकी 16,726 करोड़ रुपये की बोली अडानी समूह के लगभग 14,500 करोड़ रुपये के प्रस्ताव से काफी अधिक थी. वेदांता का तर्क है कि कम मूल्य वाले प्रस्ताव को चुनकर, सीओसी दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) के मुख्य अधिदेश का पालन करने में विफल रही है, जो सभी हितधारकों के लिए मूल्य के अधिकतमकरण पर जोर देता है.
इसके जवाब में, समाधान पेशेवर और लेनदारों ने कहा है कि चयन एक संरचित मूल्यांकन मैट्रिक्स के आधार पर किया गया था. उनका तर्क है कि सीओसी की “व्यावसायिक बुद्धिमत्ता” में केवल अंतिम बोली राशि ही नहीं, बल्कि योजना की व्यवहार्यता और प्रस्तावक की विश्वसनीयता जैसे कारक भी शामिल होते हैं. अडानी की स्वीकृत योजना में लगभग 6,005 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान और 180 दिनों के भीतर कार्यशील पूंजी व पूंजीगत व्यय के रूप में 800 करोड़ रुपये प्रदान करने की प्रतिबद्धता शामिल है.
दोनों पक्षों के हितों को संतुलित करने के लिए, उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने विशिष्ट सुरक्षा उपाय पेश किए हैं. अदालत ने आदेश दिया कि जेएएल के संचालन के संबंध में किसी भी बड़े नीतिगत निर्णय के लिए एनसीएलएटी से पूर्व स्वीकृति लेना अनिवार्य होगा. इसके अलावा, अदालत ने स्पष्ट किया कि अडानी की योजना का वर्तमान कार्यान्वयन अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के अंतिम फैसले के अधीन रहेगा. यह सुनिश्चित करता है कि भले ही अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, लेकिन 10 अप्रैल की सुनवाई के परिणाम के आधार पर इसे कानूनी रूप से बदला जा सकता है.
आपराधिक आरोप कोई बाधा नहीं: चुनाव वाले 3 राज्यों में 38% तक उम्मीदवार दागी
उन्नी के चेन्नमकुलथ की रिपोर्ट के मुताबिक, उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के निर्देशों के बावजूद, चुनाव वाले राज्यों में राजनीतिक दल आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों को मैदान में उतारना जारी रखे हुए हैं. केरल, असम और पुडुचेरी में नामांकन पत्रों के साथ जमा किए गए नवीनतम हलफनामों के विश्लेषण से पता चलता है कि 14% से 38% उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं.
‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) और ‘केरल इलेक्शन वॉच’ द्वारा उम्मीदवारों के स्व-शपथ पत्रों के आधार पर जारी आंकड़ों के अनुसार, केरल विधानसभा चुनाव 2026 में राजनीतिक दलों ने एक बार फिर आपराधिक रिकॉर्ड वाले व्यक्तियों को टिकट देने की अपनी पुरानी परिपाटी का पालन किया है. इस बार, लगभग 38% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले लंबित हैं.
केरल विधानसभा चुनाव लड़ रहे सभी प्रमुख दलों ने 42% से 100% ऐसे उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जिन्होंने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं.
असम और पुडुचेरी में आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों का अनुपात क्रमशः लगभग 14% और 23% है.
एडीआर और ‘असम इलेक्शन वॉच’ द्वारा उम्मीदवारों के हलफनामों के विश्लेषण के अनुसार, राज्य में कुल 722 उम्मीदवार हैं, जिनमें से 102 ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं. गंभीर आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों की संख्या लगभग 79 (11%) है.
पुडुचेरी में कुल 294 उम्मीदवारों में से 66 (23%) ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जबकि कम से कम 38 उम्मीदवारों (13%) पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं.
जहाँ तक असम का सवाल है, एडीआर का विश्लेषण पिछले चुनावों की तुलना में मामूली सुधार की ओर संकेत करता है, हालांकि राजनीति में अपराधीकरण अभी भी महत्वपूर्ण बना हुआ है. एडीआर ने कहा कि राज्य में उम्मीदवारों के खिलाफ “गंभीर मामलों” में हत्या के प्रयास और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे अन्य गंभीर अपराध शामिल हैं.
पुडुचेरी में, द्रमुक (डीएमके) के 12 उम्मीदवारों में से 6 (50%) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं. यद्यपि 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि का एडीआर विश्लेषण अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन ऐतिहासिक आंकड़े दोनों राज्यों में निरंतर पैटर्न (पद्धति) का सुझाव देते हैं. पश्चिम बंगाल में आमतौर पर अपराधीकरण का स्तर मध्यम से उच्च (लगभग 15-25%) दर्ज किया गया है, जबकि तमिलनाडु में यह सामान्यतः 10-15% रहा है। 2026 के विधानसभा चुनावों में भी इसी तरह के रुझान जारी रहने की उम्मीद है.
13 फरवरी, 2020 के अपने निर्देशों में, उच्चतम न्यायालय ने विशेष रूप से राजनीतिक दलों को यह समझाने का निर्देश दिया था कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों का चयन क्यों किया गया और बिना ऐसे रिकॉर्ड वाले व्यक्तियों को क्यों नहीं चुना जा सका. इन अनिवार्य दिशा-निर्देशों के अनुसार, कारण उम्मीदवार की योग्यता, उपलब्धियों और मेरिट (गुणवत्ता) से संबंधित होने चाहिए.
2025 में हुए दो राज्य विधानसभा चुनावों के दौरान यह देखा गया कि राजनीतिक दलों ने लोकप्रियता, सामाजिक कार्य, या मामलों के राजनीति से प्रेरित होने जैसे दावे किए—ऐसे आधार जिन्हें एडीआर न तो ठोस मानता है और न ही तर्कसंगत.
एसोसिएशन ने आगे कहा, “यह डेटा स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि राजनीतिक दलों की चुनावी प्रणाली में सुधार करने में कोई रुचि नहीं है, और हमारा लोकतंत्र उन कानून तोड़ने वालों के हाथों पीड़ित होता रहेगा जो कानून बनाने वाले (जनप्रतिनिधि) बन जाते हैं.”
ज्ञानेश कुमार को हटाने के प्रस्ताव पर विपक्ष के नोटिस खारिज किए गए
‘टीएनआईई’ के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग करने वाले विपक्ष के अलग-अलग नोटिसों को खारिज कर दिया.
विपक्ष ने दोनों पीठासीन अधिकारियों को नोटिस सौंपे थे, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त पर “पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण”, “चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझकर बाधा डालने” और “बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने” जैसे अन्य आरोप लगाए गए थे.
अलग-अलग आदेशों में, अध्यक्ष और सभापति ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(5) और अन्य प्रासंगिक संवैधानिक व वैधानिक प्रावधानों के तहत पेश किए गए उन नोटिसों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिनमें ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की गई थी.
राज्यसभा महासचिव की ओर से जारी एक अधिसूचना में कहा गया, “प्रस्ताव के नोटिस पर उचित विचार करने और इसमें शामिल सभी प्रासंगिक पहलुओं व मुद्दों के सावधानीपूर्वक और निष्पक्ष मूल्यांकन के बाद, राज्यसभा के सभापति ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए उक्त प्रस्ताव के नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है.”
मेनका गुरुस्वामी बनीं देश की पहली LGBTQ+ सांसद
संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में 19 नवनिर्वाचित और पुनर्निर्वाचित सदस्यों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली. इस शपथ ग्रहण में सबसे ज्यादा चर्चा रही वकील डॉ. मेनका गुरुस्वामी की, जिन्होंने पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस की सांसद के रूप में सदन में कदम रखा. उनकी मौजूदगी सिर्फ एक और सांसद की एंट्री नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में बदलती सामाजिक स्वीकृति का संकेत मानी जा रही है.
डॉ.मेनका गुरुस्वामी देश की पहली ऐसी सांसद बनी हैं जिन्होंने खुलकर अपनी LGBTQ+ पहचान साझा की है. यानि उन्होंने राज्यसभा की सदस्य के रूप में शपथ लेकर देश की पहली खुले तौर पर क्वीयर सांसद बनने का गौरव हासिल किया है. यह सिर्फ व्यक्तिगत साहस का मामला नहीं, बल्कि उस लंबे संघर्ष का परिणाम भी है जो समान अधिकारों और प्रतिनिधित्व के लिए चला है.
उप-राष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई.डॉ. गुरुस्वामी ने ही सुप्रीम कोर्ट में धारा 377 के खिलाफ लड़ाई लड़कर समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करवाया था.
‘डॉ. निमो यादव’ और ‘नेहर हू’ अकाउंट तुरंत बहाल करने के निर्देश, लेकिन मोदी वाली पोस्ट ब्लॉक ही रहेंगी
स्क्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक एक्स अकाउंट @DrNimoYadav और @Nehr_who को बहाल करने का आदेश दिया है, जिन्हें 18 मार्च को केंद्र सरकार के निर्देश पर ब्लॉक किया गया था.
जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने प्रतीक शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया है. शर्मा ने इस अकाउंट को ब्लॉक किए जाने के फैसले को अदालत में चुनौती दी थी. बेंच ने साफ किया कि अकाउंट्स तो वापस आएंगे, लेकिन जिन पोस्ट्स को सरकार ने आपत्तिजनक बताया है, वे फिलहाल ब्लॉक ही रहेंगी. यानी राहत भी, और नियंत्रण भी. कोर्ट ने दोनों अकाउंट्स चलाने वालों प्रतीक शर्मा और कुमार नयन को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की समीक्षा समिति के सामने पेश होने को कहा है. यहां यह तय होगा कि क्या विवादित पोस्ट्स पर रोक जारी रहनी चाहिए.
यह पूरा मामला सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A से जुड़ा है, जिसके तहत सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता या सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर कंटेंट हटाने का आदेश दे सकती है.
18 मार्च को, केंद्र सरकार ने ‘एक्स’ को 12 अकाउंट्स को ब्लॉक करने का निर्देश दिया था, जिनमें @mrjethwani_ और @Doc_RGM जैसे लोकप्रिय प्रोफाइल शामिल थे. पत्रकार और एक्टिविस्ट संदीप सिंह का अकाउंट भी रोका गया था. सरकार का आरोप है कि इन अकाउंट्स ने प्रधानमंत्री को लेकर “भ्रामक और आपत्तिजनक” सामग्री फैलाई और एआई जनरेटेड कंटेंट का इस्तेमाल कर पीएम मोदी की छवि खराब करने की कोशिश की गई.
कांग्रेस का हिमंता बिस्वा शर्मा की पत्नी के पास तीन पासपोर्ट का आरोप
‘द वायर’ की रिपोर्ट के अनुसार, असम चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी ने दावा किया है कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां के पास तीन देशों के पासपोर्ट हैं और दूसरे देशों में उनके नाम पर संपत्ति दर्ज हैं. साथ ही अमेरिका के टैक्स-हेवन वायोमिंग में उनके नाम पर होटल व्यवसाय शुरू करने के लिए एक कंपनी में 52,000 करोड़ रुपये (डॉलर में) जमा किए गए हैं.
रविवार (5 अप्रैल) को नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता पवन खेड़ा ने मांग की कि सरमा को 9 अप्रैल के चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए और अपनी पत्नी की संपत्ति का खुलासा न करने के लिए उन्हें ‘गिरफ्तार’ किया जाए. ‘शर्मा से यह भी पूछा जाना चाहिए कि परिवार के पास इतनी बड़ी रकम कहां से आई?’
प्रेस कॉन्फ्रेंस में खेड़ा ने शर्मा की पत्नी को कथित तौर पर संयुक्त अरब अमीरात, एजिप्ट और एंटीगुआ एवं बारबुडा द्वारा जारी पासपोर्ट की प्रतियां दिखाईं. खेड़ा द्वारा दिखाए गए इन पासपोर्टों पर क्रमशः 2027, 2029 और 2031 तक की वैधता अवधि दर्ज थी. खेड़ा ने सवाल किया, ‘क्या वह भारतीय नागरिकता भी रखती हैं? क्या गृह मंत्री अमित शाह, जो शर्मा के बेहद करीबी हैं, इस मामले की जांच करवाएंगे?’
हालांकि, मुख्यमंत्री सरमा ने इन आरोपों को “निराधार और दुर्भावनापूर्ण” बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है. उन्होंने कहा कि यह विपक्ष की “घबराहट” का संकेत है और अगले 48 घंटों में खेड़ा के खिलाफ आपराधिक व सिविल मानहानि का केस दर्ज किया जाएगा. उन्होंने पासपोर्ट दस्तावेजों में कथित गड़बड़ियों की ओर इशारा करते हुए इन्हें “फर्जी या छेड़छाड़ किया हुआ” बताया. भाजपा की ओर से भी आरोपों को “मनगढ़ंत कहानी” करार दिया गया है.
इतनी गर्मी में मोदी के कार्यक्रम में जबरन बुलाने पर छात्रा ने वीडियो बनाया, लेकिन भारत में ब्लॉक
ऑल्ट न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ ग्रेटर नोएडा की एक छात्रा ने दावा किया है कि उन्हें और अन्य छात्रों को इतनी गर्मी में जबरन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम में बुलाया गया. इस अनुभव पर बनाया गया उनका इंस्टाग्राम वीडियो 30 मार्च को भारत में ब्लॉक कर दिया गया है.
28 मार्च को जस्ट हैप्पी नाम के अकाउंट पर पोस्ट किए गए इस वीडियो में छात्रा ने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट उद्धाटन कार्यक्रम के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि ग्रेटर नोएडा के स्कूल और कॉलेज के छात्रों को दो दिन की फ्री अटेंडेंस जैसे लालच देकर कार्यक्रम में लाया गया. उनका कहना है कि छात्र अपनी मर्ज़ी से नहीं आए थे, बल्कि उन्हें बुलाया गया था. कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और केंद्रीय मंत्री राम मोहन नायडू मौजूद थे. छात्रा ने कार्यक्रम की वयवस्था पर भी सवाल उठाए. भीड़ को तेज़ गर्मी और ट्रैफिक में खड़ा रखा गया. अब इंटस्टाग्राम ने इस वीडियो को ब्लॉक कर दिया है
ऑल्ट न्यूज़ के मुताबिक, हाल के समय में आईटी एक्ट की धारा 69A का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर कंटेंट ब्लॉक करने के लिए बढ़ा है. आरोप है कि इसका उपयोग सरकार की आलोचना और असहमति को दबाने के लिए किया जा रहा है.
दलित ईसाई और मुसलमानों को भी मिले एससी का दर्जा
मकतूब मीडिया के लिए वैष्णवी पाल लिखती हैं कि क्या अनुसूचित जाति का दर्जा सिर्फ धर्म के आधार पर तय होना चाहिए, या फिर सामाजिक हकीकत को देखकर इसमें बदलाव होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च 2026 को चिंथदा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में कहा कि धर्म बदलने के बाद जाति खत्म हो जाती है, इसलिए जो लोग ईसाई या मुस्लिम बन जाते हैं, उन्हें एससी का दर्जा नहीं मिल सकता. यह फैसला 1950 के राष्ट्रपति आदेश पर आधारित है, जिसमें एससी का दर्जा सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म तक सीमित है.
लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे अलग है. दलित ईसाई और मुसलमान आज भी जाति के आधार पर भेदभाव, गरीबी और सामाजिक अलगाव झेलते हैं. स्कूलों में अलग बैठाना, कब्रिस्तान या समाज में बराबरी न मिलना, ये सब दिखाता है कि धर्म बदलने के बाद भी जाति खत्म नहीं होती. लेख के अनुसार, जाति सिर्फ धर्म से जुड़ी चीज नहीं है, बल्कि यह जन्म, काम और समाज की सोच से जुड़ी होती है. इसलिए धर्म परिवर्तन करने से जाति की पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता. दक्षिण एशिया के अन्य देशों जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी अलग-अलग धर्मों के बावजूद जाति जैसी व्यवस्था मौजूद है.
भारत में भी दलित मुसलमान और ईसाई समुदायों के साथ भेदभाव जारी है. उन्हें कई बार “नीची जाति” मानकर देखा जाता है और उनके साथ अलग व्यवहार किया जाता है. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी मुस्लिम समाज में मौजूद जाति जैसी संरचना का जिक्र किया था. लेख में यह भी कहा गया है कि एससी दर्जा सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कानूनी सुरक्षा भी देता है, जैसे एससी/ एसटी अत्याचार कानून के तहत सुरक्षा. लेकिन जब दलित ईसाई और मुसलमान इस सूची से बाहर होते हैं, तो उनके साथ होने वाली जाति आधारित हिंसा को कानून सही तरीके से पहचान नहीं पाता.
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अगर इन समुदायों को एससी में शामिल किया गया, तो मौजूदा लाभ कम हो जाएंगे. लेकिन न्याय को सीमित संसाधन की तरह नहीं देखना चाहिए. जरूरत हो तो व्यवस्था का दायरा बढ़ाया जा सकता है ताकि सभी वंचित समुदायों को बराबरी मिल सके.
‘द हिंदू’ : एलपीजी 400 से 500 रुपये प्रति किलो मिल रही है, इसीलिए हज़ारों प्रवासी मज़दूर गांव लौटने को मजबूर
द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली में एलपीजी की कमी और महंगे दामों के कारण बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर अपने घर लौट रहे हैं. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सैकड़ों लोग बिहार और उत्तर प्रदेश जाने के लिए जुटे दिख रहे हैं. कुछ लोग उम्मीद कर रहे हैं कि हालात सुधरने पर वापस आएंगे, जबकि कई लोग गांव में सस्ते विकल्पों के कारण वहीं रहने का फैसला कर रहे हैं.
कपासहेड़ा की रहने वाली अंजू कुमारी, जो पटना की रहने वाली हैं, ने बताया कि उनके पति की नौकरी छूटने के बाद वे पिछले 15 दिनों से लकड़ी पर खाना बना रही हैं. उन्होंने कहा कि अगर काम नहीं है तो शहर में रहना मुश्किल है. वहीं, कई प्रवासियों ने बताया कि गांव में लकड़ी या कोयले से खाना बनाना सस्ता पड़ता है, जबकि काले बाजार में एलपीजी 400-500 प्रति किलो तक मिल रही है, जबकि लकड़ी करीब 10 रुपए प्रति किलो मिल जाती है.
आज़मगढ़ लौट रही सुशीला देवी ने बताया कि उनका पूरा परिवार दिल्ली में खिलौना फैक्ट्री में काम करता था, लेकिन गैस महंगी होने के कारण वे एक हफ्ते से बाहर का खाना खा रहे थे, जिससे खर्च बढ़ गया और उन्हें वापस जाना पड़ा. वहीं, रोहिणी में काम करने वाले मनोज कुमार ने बताया कि 10 लोगों के परिवार के लिए एक सिलेंडर काफी नहीं है और गैस एजेंसी के नियमों के कारण दूसरी बुकिंग में देरी होती है, इसलिए उनके माता-पिता गांव लौट गए.
एलपीजी संकट के कारण लोग फिर से तंदूर, लकड़ी और केरोसिन जैसे पुराने तरीकों पर लौट रहे हैं, जबकि इलेक्ट्रिक कुकर जैसे विकल्प महंगे हैं. रेलवे टिकट विक्रेताओं के अनुसार, रोजाना 10,000 से 12,000 टिकट बिक रहे हैं और करीब 5 लाख लोग दिल्ली से यात्रा कर रहे हैं, जिनमें ज्यादातर यूपी और बिहार के हैं, साथ ही हरियाणा, पंजाब, झारखंड, ओडिशा और दक्षिण भारत के लोग भी शामिल हैं.
हरकारा डीप डाइव
तीन भाषा फार्मूला कोई नया विचार नहीं, पर सही तरीके से लागू ही नहीं हुआ
हरकारा डीप डाइव में प्रोफेसर अपूर्वानंद से हिंदी, सीबीएससी और नई शिक्षा नीति को लेकर उठे विवाद पर विस्तार से बातचीत हुई, जिसमें खास तौर पर तमिलनाडु और केंद्र सरकार के बीच बढ़ते टकराव को समझने की कोशिश की गई.
इस चर्चा में बताया गया कि विवाद की जड़ तीन भाषा फार्मूला है, जिसे नई शिक्षा नीति के तहत फिर से ज़ोर दिया जा रहा है. केंद्र सरकार का कहना है कि बच्चों को तीन भाषाएं सीखनी चाहिए, लेकिन तमिलनाडु सरकार इसका विरोध कर रही है और अपने दो भाषा मॉडल यानी तमिल और अंग्रेज़ी पर कायम है.
अपूर्वानंद ने कहा कि तीन भाषा फार्मूला कोई नया विचार नहीं है, बल्कि इसे 1950–60 के दशक में भारत को एकजुट करने के लिए लाया गया था. इसका उद्देश्य था कि लोग अपनी भाषा के साथ-साथ एक दूसरी भारतीय भाषा और अंग्रेज़ी सीखें, ताकि देश में आपसी समझ बढ़े. लेकिन उनका दावा है कि यह फार्मूला व्यवहार में कभी सही तरीके से लागू ही नहीं हुआ.
चर्चा में यह भी सामने आया कि हिंदी राज्यों में यह मॉडल कागज़ों तक सीमित रह गया. वहां तीसरी भाषा के नाम पर ज्यादातर जगहों पर संस्कृत पढ़ाई गई, जबकि दूसरी भारतीय भाषाएं जैसे तमिल, बंगाली या मराठी शायद ही कहीं पढ़ाई गईं. इसकी वजह बताई गई, शिक्षकों की कमी, व्यवस्था की कमी और वास्तविक इच्छा का अभाव. आज “तीन भाषा” के नाम पर दरअसल हिंदी को बढ़ावा देने और थोपने की कोशिश हो रही है, जो एक शैक्षिक नहीं बल्कि राजनीतिक मुद्दा है. उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार राज्यों को मिलने वाले फंड पर शर्तें जोड़ रही है, जिससे राज्यों के अधिकारों पर असर पड़ रहा है. तमिलनाडु के रुख को समझाते हुए उन्होंने कहा कि वहां हिंदी का विरोध भाषा से नफरत नहीं है, बल्कि थोपने के खिलाफ है. तमिलनाडु में हिंदी सीखने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन उसे अनिवार्य बनाने का विरोध है. उनका तर्क है कि अंग्रेज़ी उन्हें दुनिया से जोड़ती है, इसलिए वही ज्यादा उपयोगी है.
चर्चा में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच अंतर पर भी बात हुई. बताया गया कि हिंदी भाषी राज्योंजैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में खुद भाषा शिक्षा की स्थिति कमजोर है, यहां तक कि हिंदी में भी बड़ी संख्या में छात्र फेल होते हैं. वहीं तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्य शिक्षा, अर्थव्यवस्था और प्रशासन में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं.
अपूर्वानंद ने कई उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर लगातार प्रयास हो रहे हैं जैसे हिंदी दिवस, विदेशों में हिंदी सेल, साइनबोर्ड्स में हिंदी को प्राथमिकता और उत्तर-पूर्व में हिंदी शिक्षकों की नियुक्ति. उनके अनुसार, इससे यह धारणा मजबूत होती है कि हिंदी को धीरे-धीरे लागू किया जा रहा है.
बाघों की मौत; संघर्ष की आशंका, क्योंकि मेटिंग सीज़न समाप्ति की ओर
मध्यप्रदेश के सतपुड़ा और कान्हा टाइगर रिजर्व में 12 घंटे के भीतर दो बाघों—एक चार महीने के नर शावक और एक दस वर्षीय मादा बाघ—की मौत हो गई. आशंका जताई जा रही है कि यह मौतें वयस्क बाघों के बीच आपसी संघर्ष के कारण हुई हैं, क्योंकि संभोग (मेटिंग) का मुख्य सीजन अब समाप्ति की ओर है.
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ के मुताबिक, नर्मदापुरम जिले के सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के मटकुली रेंज के घने जंगलों में चार महीने का एक नर बाघ शावक मृत पाया गया. शनिवार शाम को संबंधित जंगल में दहाड़ने की आवाजें सुनी गई थीं. जब गश्ती दल ने स्थान का पता लगाया और वहां पहुँचा, तो उन्हें मौके पर एक नर शावक मृत मिला.
सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा ने सोमवार को ‘टीएनआईई’ को बताया, “शावक के शव परीक्षण (नेक्रोप्सी) से उसके शरीर के विभिन्न हिस्सों पर पंजों और दांतों के कई घावों का पता चला है. संबंधित क्षेत्र में पद चिन्हों (पगमार्क) के आधार पर की गई जांच से संभोग सीजन के बीच वयस्क नर और मादा बाघों की उपस्थिति के पुख्ता संकेत मिले हैं. जांच में इस बात की प्रबल संभावना जताई गई है कि नर शावक पर किसी वयस्क नर बाघ ने जानलेवा हमला किया होगा.”
लगभग 150 किलोमीटर दूर कान्हा टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में, कुछ ही घंटों बाद रविवार सुबह दस वर्षीय बाघिन सुनैना (T-122) समान परिस्थितियों में मृत पाई गई. सुनैना कान्हा रिजर्व के सबसे लोकप्रिय और सबसे ज्यादा देखे जाने वाले बाघों में से एक थी.
कान्हा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर रवींद्र मणि त्रिपाठी ने बताया, “पशु चिकित्सा विशेषज्ञों और डॉग स्क्वायड द्वारा शव और घटनास्थल के निरीक्षण से इलाके में कई वयस्क बाघों (नर और मादा) की आवाजाही का पता चला है. इसके अलावा, गहरे जख्मों की प्रकृति भी इस संभावना की ओर इशारा करती है कि बाघिन की मौत किसी अन्य वयस्क बाघ के साथ क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई के दौरान हुई है. “
इन दो मौतों के साथ, मध्य प्रदेश ने 2026 में अब तक 16 बाघों को खो दिया है, जो इस वर्ष देश में हुई कुल बाघों की मृत्यु का 30% से अधिक है. पिछले साल के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, कान्हा टाइगर रिजर्व लगभग 120 वयस्क बाघों और लगभग 40 शावकों का घर है, जबकि बालाघाट जिले के आस-पास के क्षेत्रीय वन भी बाघों की बढ़ती आबादी से भरे हुए हैं, जो इसे एक आदर्श ‘टाइगर कॉरिडोर’ बनाता है.
ये दोनों मौतें ऐसे समय में हुई हैं जब बाघों का मुख्य संभोग/प्रजनन सीजन (नवंबर-अप्रैल) समाप्त होने वाला है, और इसी समय अखिल भारतीय बाघ अनुमान (एआईटीई-2026) का छठा और अंतिम चक्र भी अपने समापन चरण में है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.











