07/01/2026: फेक़ न्यूज में भाजपा सबसे आगे | अमर्त्य सेन को भी नहीं छोड़ा | बुलडोज़र कार्रवाई: में 5 सालों में 379% की वृद्धि | जब मोदी ट्रंप के सामने | ज्ञानरंजन नहीं रहे| वेनेजुएला के बाद ग्रीनलैंड?
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
फेक न्यूज़ का लेखा-जोखा: 2025 में भाजपा और अमित मालवीय भ्रामक जानकारी फैलाने में सबसे आगे, राहुल गांधी बने सबसे बड़ा निशाना.
अमर्त्य सेन पर विवाद: चुनाव आयोग ने नोबेल विजेता को भेजा नोटिस, टीएमसी ने बताया बंगाली अस्मिता का अपमान.
हिजाब विवाद: नीतीश कुमार द्वारा हिजाब खींचे जाने की घटना के 23 दिन बाद आयुष डॉक्टर ने ड्यूटी जॉइन की.
भारत के पड़ोसी: पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच जेएफ 17 लड़ाकू विमानों पर बात, सुधर रहे हैं दोनों के रिश्ते.
वीज़ा चेतावनी: अमेरिकी दूतावास ने भारतीय छात्रों को चेताया, कानून तोड़ने पर हो सकते हैं डिपोर्ट.
संभल में बुलडोज़र: यूपी प्रशासन ने मस्जिद और तीन मकान ढहाए, अतिक्रमण का दिया हवाला.
UAPA पर सुप्रीम कोर्ट: उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत नहीं, कोर्ट ने कहा नागरिक जीवन बाधित करना भी आतंकवाद.
बुलडोज़र का कहर: 5 साल में तोड़फोड़ की कार्रवाई 379 प्रतिशत बढ़ी, अल्पसंख्यकों पर सबसे ज़्यादा मार.
अंकिता भंडारी केस: भाजपा नेता दुष्यंत गौतम को राहत, लेकिन ‘वीआईपी’ का सवाल अब भी अनसुलझा.
निकोबार प्रोजेक्ट: 72 हजार करोड़ के प्रोजेक्ट से नई खोजी गई प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा.
फेक़ न्यूज
2025 में राजनीतिक भ्रामक जानकारियों का लेखा-जोखा: किसने सबसे ज़्यादा झूठ फैलाया और कौन बना निशाना? ऑल्ट न्यूज़ का अध्ययन
भाजपा और अमित मालवीय सबसे आगे
एक जागरूक नागरिक लोकतंत्र की नींव होता है, लेकिन 2025 में गलत जानकारियों और दुष्प्रचार ने इस नींव को हिलाने की कोशिश की. ऑल्ट न्यूज़ द्वारा जारी एक विस्तृत विश्लेषण रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि कैसे पिछले साल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और विभिन्न राज्यों के चुनावों के दौरान राजनीतिक प्रोपेगेंडा अपने चरम पर था. रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में ऑल्ट न्यूज़ ने कुल 590 रिपोर्ट्स प्रकाशित कीं, जिनमें से 159 राजनीतिक फैक्ट-चेक थे. आंकड़ों से पता चलता है कि इनमें से 61% (98 मामले) वायरल दावे भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में थे, जबकि केवल 34 दावे गैर-भाजपा दलों के समर्थन में थे. यह स्पष्ट करता है कि भाजपा खेमे ने अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए भ्रामक जानकारियों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया.
भ्रामक जानकारी फैलाने वाले नेता
रिपोर्ट के मुताबिक, राजनीतिक हस्तियों द्वारा साझा की गई गलत जानकारियों में भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय सबसे आगे रहे. जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच 12 बार उनके दावों को गलत पाया गया. उनके बाद भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी और शहजाद पूनावाला का नंबर आता है. दिलचस्प बात यह है कि गलत जानकारी फैलाने वाले नेताओं की सूची में 22 नेता एनडीए से थे, जबकि विपक्ष के केवल 8 नेता शामिल थे. यहां तक कि गृह मंत्री अमित शाह के ऑफिस (@AmitShahOffice) ने भी जनगणना के आंकड़ों को गलत संदर्भ में पेश कर मुस्लिम आबादी की वृद्धि को ‘घुसपैठ’ से जोड़ा, जिसे ऑल्ट न्यूज़ ने भ्रामक पाया.
कौन बना सबसे ज़्यादा निशाना?
दुष्प्रचार का शिकार होने वालों में राहुल गांधी सबसे ऊपर रहे. 46 राजनीतिक फैक्ट-चेक रिपोर्ट्स में से 17 बार (करीब 37%) राहुल गांधी को निशाना बनाया गया. दूसरे नंबर पर लद्दाख के एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक थे, जिन्हें 6 बार टारगेट किया गया, और तीसरे स्थान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (5 बार) रहे. तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा पर संसद में स्मोकिंग का झूठा आरोप लगाया गया, जबकि वे उस दिन संसद में मौजूद ही नहीं थीं. आंकड़ों के अनुसार, निशाना बनाए गए नेताओं में 17 विपक्षी खेमे से थे, जबकि 11 एनडीए से.
सरकारी संस्थाएं और इन्फ्लुएंसर्स भी पीछे नहीं
रिपोर्ट में एक चिंताजनक प्रवृत्ति यह सामने आई कि पीआईबी, पीएमओ, नीति आयोग और एनएसए अजीत डोभाल जैसे सरकारी स्रोतों से भी गलत जानकारियां फैलायी गईं. उदाहरण के लिए, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की ब्रीफिंग के दौरान पीआईबी ने इराक के 2007 के धमाके का वीडियो इस्तेमाल किया. वहीं, एनएसए डोभाल ने अपने एक पुराने बयान को ‘डीपफेक’ बताया, जो वास्तव में सही था.
सोशल मीडिया पर पीएम मोदी द्वारा फॉलो किए जाने वाले इन्फ्लुएंसर्स जैसे जितेंद्र प्रताप सिंह, रोशन सिन्हा और ऋषि बागड़ी ने भाजपा के पक्ष में जमकर भ्रामक दावे शेयर किए. इसके अलावा, राहुल शिवशंकर जैसे वरिष्ठ पत्रकारों ने भी बिना जांच-पड़ताल के यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की का डीपफेक वीडियो शेयर कर गलत नरेटिव सेट करने की कोशिश की.
अमर्त्य सेन भी संदिग्ध मतदाता
चुनाव आयोग ने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के तहत सुनवाई का नोटिस भेजने पर सफाई दी है. कोलकाता में मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि अमर्त्य सेन के लिए सुनवाई का नोटिस इसलिए जारी हुआ क्योंकि उनके द्वारा भरे गए फॉर्म के अनुसार उनकी और उनकी माँ की उम्र में 15 साल से कम का अंतर दिख रहा था. अधिकारी ने कहा, “चुनाव आयोग की नज़र में सभी मतदाता समान हैं. किसी भी वीआईपी या प्रतिष्ठित व्यक्ति के लिए कोई विशेष उपचार नहीं है.”
हालांकि, चूंकि सेन की उम्र 90 वर्ष से अधिक है, इसलिए आयोग के नियमों के मुताबिक उन्हें सुनवाई केंद्र जाने की ज़रूरत नहीं है. एक अधिकारी ने बताया कि उनके आवास पर ही सुनवाई की जाएगी. बीरभूम जिले के शांतिनिकेतन स्थित उनके आवास ‘प्रतीची’ पर 16 जनवरी को बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) जाकर दस्तावेजों की जाँच करेंगे.
इस मामले पर राजनीतिक घमासान भी शुरू हो गया है. तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने रामपुरहाट में एक रैली के दौरान आरोप लगाया कि चुनाव आयोग और भाजपा की मिलीभगत से बंगाल की प्रमुख हस्तियों को निशाना बनाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि अमर्त्य सेन जैसे व्यक्ति, जिन्होंने देश को नोबेल दिलाया, उन्हें नोटिस भेजना अपमानजनक है. अभिषेक ने दावा किया कि अभिनेता देव और क्रिकेटर मोहम्मद शमी को भी ऐसे नोटिस भेजे गए हैं. अमर्त्य सेन के परिवार ने इसे ‘उत्पीड़न’ करार दिया है, जबकि विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने इसे महज एक तकनीकी त्रुटि या वर्तनी की गलती बताया है
नीतीश ने खींचा था हिजाब: दो बार तारीख बढ़ने के बाद आयुष डॉक्टर ने ड्यूटी जॉइन की
पटना से रमाशंकर की रिपोर्ट है कि सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए, आयुष डॉक्टर डॉ. नुसरत परवीन ने बुधवार को अपनी ड्यूटी जॉइन कर ली. यह वही डॉक्टर हैं, जिनका हिजाब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नीचे खींच दिया था. घटना के 23 दिन बाद उन्होंने काम संभाला है.
डॉ. परवीन ने पटना में सिविल सर्जन के कार्यालय के बजाय सीधे विभाग में रिपोर्ट किया और विस्तारित समय सीमा के अंतिम दिन अपनी जॉइनिंग की औपचारिकताएं पूरी कीं. परवीन को मूल रूप से 20 दिसंबर को ड्यूटी पर रिपोर्ट करने के लिए कहा गया था, लेकिन उनके ड्यूटी पर न आने के कारण राज्य सरकार ने जॉइनिंग की तारीख पहले 31 दिसंबर और फिर 7 जनवरी तक बढ़ा दी थी.
हिजाब विवाद 15 दिसंबर को पटना में मुख्यमंत्री सचिवालय में हुआ था, जहां आयुष डॉक्टर नियुक्ति पत्र लेने के लिए एकत्र हुए थे. जब हिजाब पहनी हुई परवीन आगे आईं, तो नीतीश ने कथित तौर पर पूछा, “यह क्या है?” और उनका हिजाब नीचे खींच दिया. इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था, जिस पर राज्य और बाहर के राजनेताओं और नागरिक समाज के सदस्यों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी.
पाकिस्तान की नज़र बांग्लादेश के साथ रक्षा समझौते और जेएफ-17 थंडर लड़ाकू विमानों की बिक्री पर
पाकिस्तान और बांग्लादेश के वायु सेना प्रमुखों ने ढाका को ‘जेएफ-17 थंडर’ लड़ाकू विमानों की बिक्री से संबंधित एक संभावित समझौते पर बातचीत की है. यह घटनाक्रम तब सामने आया है, जब इस्लामाबाद अपनी हथियारों की आपूर्ति के लक्ष्यों का विस्तार कर रहा है और बांग्लादेश के साथ संबंधों को मजबूत कर रहा है.
पाकिस्तान सेना की प्रेस शाखा ने बताया कि पाकिस्तान के एयर चीफ मार्शल जहीर अहमद बाबर सिद्धू और बांग्लादेशी समकक्ष हसन महमूद खान ने चीन के साथ संयुक्त रूप से विकसित एक बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान ‘जेएफ-17 थंडर’ की खरीद पर विस्तृत चर्चा की. मंगलवार के बयान में आगे कहा गया कि पाकिस्तान ने बांग्लादेश को “सुपर मुश्शाक ट्रेनर विमानों की तेजी से डिलीवरी के साथ-साथ एक संपूर्ण प्रशिक्षण और दीर्घकालिक सहायता पारिस्थितिकी तंत्र” का भी आश्वासन दिया है.
‘रॉयटर्स’ के मुताबिक, ये बातचीत दोनों दक्षिण एशियाई देशों के बीच सुधरते संबंधों का संकेत है. अगस्त 2024 में हुए बड़े विरोध प्रदर्शनों के बाद, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत भागने पर मजबूर कर दिया और ढाका के नई दिल्ली के साथ संबंधों को छिन्न-भिन्न कर दिया, तब से इस्लामाबाद और ढाका करीब आए हैं. सेना ने कहा, “यह यात्रा पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच मजबूत ऐतिहासिक संबंधों को रेखांकित करती है और रक्षा सहयोग को गहरा करने तथा दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी बनाने के साझा संकल्प को दर्शाती है.”
हसीना की विदाई के बाद, इस्लामाबाद और ढाका ने 1971 के युद्ध (जिससे बांग्लादेश को स्वतंत्रता मिली थी) के बाद पहली बार सीधा व्यापार फिर से शुरू किया है, जबकि उनके सैन्य अधिकारियों ने कई बैठकें की हैं. नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाले अंतरिम प्रशासन के तहत, बांग्लादेश में 12 फरवरी को आम चुनाव होने वाले हैं, जो पाकिस्तान से संबंध रखने वाले एक बार प्रतिबंधित बांग्लादेशी इस्लामी दल के लिए सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं.
जेएफ-17 विमान पाकिस्तानी सेना के हथियार विकास कार्यक्रम का आधार बन गए हैं, जो अज़रबैजान के साथ एक सौदे और लीबिया की नेशनल आर्मी के साथ 4 अरब डॉलर के हथियार समझौते में शामिल हैं. मंगलवार को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि उनके हथियार उद्योग की सफलता देश के आर्थिक दृष्टिकोण को बदल सकती है. उन्होंने कहा, “हमारे विमानों का परीक्षण हो चुका है, और हमें इतने सारे ऑर्डर मिल रहे हैं कि पाकिस्तान को छह महीने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की आवश्यकता नहीं पड़ सकती है.”
ज्ञानरंजन नहीं रहे
पहल के संपादक व विख्यात कथाकार ज्ञानरंजन का आज 7 जनवरी को रात 10.30 बजे जबलपुर में निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। आज सुबह ही उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया था।
अमेरिकी दूतावास ने भारतीय छात्रों को चेताया, यदि नियम तोड़े तो डिपोर्ट कर दिए जाओगे
भारत में अमेरिकी दूतावास ने बुधवार को कहा कि अमेरिकी वीजा “एक विशेषाधिकार है, अधिकार नहीं” और भारतीय छात्रों को चेतावनी दी कि यदि वे कानून तोड़ते हैं तो उनका वीजा रद्द किया जा सकता है.
‘एजेंसी’ के अनुसार, दूतावास ने ‘एक्स’ पर लिखा, “अमेरिकी कानूनों को तोड़ने के आपके छात्र वीजा के लिए गंभीर परिणाम हो सकते हैं.” दूतावास ने आगे कहा, “यदि आप गिरफ्तार किए जाते हैं या किसी कानून का उल्लंघन करते हैं, तो आपका वीजा रद्द किया जा सकता है, आपको निर्वासित किया जा सकता है, और आप भविष्य के अमेरिकी वीजा के लिए अयोग्य हो सकते हैं.” यह संदेश ऐसे समय में आया है जब हजारों भारतीय छात्र बढ़ते वीजा शुल्क, सख्त सोशल मीडिया निगरानी, नए अनुपालन नियमों और छात्र प्रवास पर प्रस्तावित समय सीमा के बीच 2026 के शैक्षणिक सत्र के लिए तैयारी कर रहे हैं.
यूपी सरकार ने संभल में एक मस्जिद और मकानों पर बुलडोज़र चलाया
उत्तरप्रदेश सरकार ने मंगलवार को संभल के रायबुजुर्ग गांव में एक मस्जिद और उससे सटे तीन घरों को बुलडोजर से ढहा दिया, जो कथित तौर पर सरकारी जमीन पर बने थे.
तहसीलदार धीरेंद्र कुमार ने पीयूष श्रीवास्तव को बताया कि इमारतों के मालिकों को संपत्तियों पर अपना स्वामित्व साबित करने के लिए समय दिया गया था, लेकिन वे ऐसा करने में विफल रहे. उन्होंने कहा, “अतिक्रमणकारियों ने वहां एक मस्जिद, दो घर और एक मैरिज हॉल बना लिया था. हमने जिलाधिकारी (राजेंद्र पैंसिया) को रिपोर्ट सौंपी थी और उनके निर्देश पर कार्रवाई शुरू की गई.”
सर्कल ऑफिसर कुलदीप कुमार ने कहा कि ढांचों का निर्माण अवैध रूप से सरकारी जमीन पर किया गया था. प्रशासन ने मालिकों को नोटिस दिया था और उन्होंने पिछले हफ्ते तीन दिन का और समय मांगा था. उन्होंने कहा था कि वे खुद इन ढांचों को ढहा देंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. अंततः हमने मंगलवार को उन्हें ध्वस्त कर दिया.
इससे पहले 4 जनवरी को, संभल प्रशासन ने दो सप्ताह पहले प्रबंधन समिति को नोटिस देने के बाद सलेमपुर सालार गांव में मदीना मस्जिद को बुलडोजर से ढहा दिया था. इसके एक दिन बाद संभल कस्बे में शंकर चौक के पास मल्लाक शाह बाबा के कब्रिस्तान को समतल कर दिया गया था.
प्रशासन ने यह तोड़फोड़ अभियान 24 नवंबर, 2024 को शाही जामा मस्जिद के अदालत द्वारा नियुक्त सर्वेक्षण के दौरान संभल में हुई हिंसा के मद्देनजर शुरू किया था, जिसमें चार लोग मारे गए थे. कुछ हिंदुत्ववादी समूहों ने दावा किया है कि मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा गिराए गए एक शिव मंदिर के अवशेषों पर किया गया था. पीयूष के अनुसार, तब से संभल में कम से कम 20 ढांचों को ढहाया जा चुका है, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम समुदाय के हैं. पैंसिया ने कहा है कि जिला अधिकारियों ने जिले में दर्जनों अवैध इमारतों की पहचान की है जिन्हें ध्वस्त किया जाना है.
सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत क्यों नहीं दी: यूएपीए का बदलता स्वरूप
सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों के पीछे कथित “बड़ी साज़िश” के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिका खारिज कर दी है. हालांकि, कोर्ट ने इसी मामले में पांच अन्य आरोपियों को ज़मानत दे दी. जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ द्वारा दिए गए इस फैसले ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और ‘आतंकवाद’ की परिभाषा पर एक नई बहस छेड़ दी है.
अदालत ने आरोपियों के बीच एक “पदानुक्रम” (हाईरेर्की) तय किया. कोर्ट का कहना था कि जिन पांच लोगों को ज़मानत मिली, वे केवल “स्थानीय स्तर के मददगार” या ‘फुट-सोल्जर्स’ थे, जिनकी भूमिका सीमित थी. लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को “मास्टरमाइंड” माना गया, जो कथित साज़िश की योजना बनाने और दिशा देने में शामिल थे.
यूएपीए कानून का विस्तार और सख्ती
इंडियन एक्सप्रेस में दीप्तिमान तिवारी का विश्लेषण बताता है कि यह कानून 1967 में बना था, लेकिन तब इसमें ‘आतंकवाद’ का ज़िक्र नहीं था. इसका वर्तमान स्वरूप कांग्रेस (यूपीए) और भाजपा (एनडीए) दोनों सरकारों के कार्यकाल में हुए संशोधनों का नतीजा है:
2004: पहली बार ‘आतंकवादी गतिविधियों’ के लिए एक अलग अध्याय जोड़ा गया.
2008 (26/11 के बाद): सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब धारा 15 में “किसी अन्य तरीके से” वाक्यांश जोड़ा गया. इसने आतंकवाद की परिभाषा को इतना व्यापक बना दिया कि कोई भी व्यवधानकारी कृत्य इसमें फिट हो सकता है. पुलिस हिरासत की अवधि 15 से बढ़ाकर 30 दिन कर दी गई और बिना चार्जशीट के 180 दिन तक जेल में रखने की शक्ति मिल गई.
2019: सरकार को अब किसी ‘संगठन’ के अलावा ‘व्यक्ति’ को भी आतंकवादी घोषित करने का अधिकार मिल गया.
अदालत का तर्क और नागरिक अधिकारों पर असर
फ्रंटलाइन में सौरव दास विश्लेषण करते हुए लिखते हैं कि यह फैसला “न्याय का मज़ाक” है. अदालत ने ‘नागरिक जीवन को अस्थिर करने’ को भी आतंकवाद की श्रेणी में माना है. इसका मतलब है कि भविष्य में कोई भी बड़ा विरोध प्रदर्शन, जिससे आम जनजीवन प्रभावित हो, उसे ‘आतंकवादी कृत्य’ कहा जा सकता है.
बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि विरोध प्रदर्शन और सविनय अवज्ञा को आतंकवाद नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कोई बम या हथियार बरामद नहीं हुए थे. लेकिन कोर्ट ने यूएपीए की धारा 15 की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि केवल हथियारों का इस्तेमाल ही आतंकवाद नहीं है, बल्कि इरादा और प्रभाव भी मायने रखता है.
इसके अलावा, कोर्ट ने ‘वटाली फैसले’ का सहारा लिया, जिसके तहत ज़मानत के चरण में कोर्ट को पुलिस/अभियोजन पक्ष की कहानी को ‘प्रथम दृष्टया सत्य’ मानना पड़ता है. यद्यपि आरोपी साढ़े पांच साल से जेल में हैं और संविधान का अनुच्छेद 21 त्वरित सुनवाई का अधिकार देता है, लेकिन कोर्ट ने कहा कि “आरोपों की गंभीरता” इस संवैधानिक अधिकार पर भारी पड़ती है. कोर्ट ने यह भी शर्त रखी कि आरोपी एक साल बाद दोबारा ज़मानत की अर्जी लगा सकते हैं, जो व्यावहारिक रूप से उनकी कैद को और लंबा करने जैसा है.
बुलडोज़र कार्रवाई
5 सालों में 379% की वृद्धि, न्याय प्रक्रिया को छोड़ ‘सामूहिक सजा’ देने का नया हथियार
भारत में बुलडोज़र का इस्तेमाल अब केवल अवैध निर्माण हटाने तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह एक “दंडात्मक” और बहुसंख्यकवादी राजनीति का प्रतीक बन गया है. हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क (एचएलआरएन) के आंकड़ों के हवाले से यह रिपोर्ट बताती है कि 2019 से 2023 के बीच भारत में बेदखली और तोड़फोड़ की घटनाओं में 379% की भारी वृद्धि हुई है. जहां 2019 में 1 लाख लोगों को बेघर किया गया था, वहीं 2023 में यह आंकड़ा 5 लाख के पार चला गया. सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि 2022 और 2023 में जिनके घर तोड़े गए, उनमें से 89% मुस्लिम, अनुसूचित जाति/जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग से थे.
आर्टीकल 14 में अपने विश्लेषणात्मक लेख में हर्षमंदर लिखते हैं कि यह कार्रवाई ‘स्मार्ट सिटी’ या ‘सौंदर्यीकरण’ के नाम पर शुरू होती है, लेकिन इसका असली मकसद अक्सर कुछ और होता है. जी-20 सम्मेलन के दौरान दिल्ली में गरीबों के आश्रय स्थलों को यह कहते हुए तोड़ दिया गया कि प्रधानमंत्री ने “कमजोर वर्गों” की मदद की बात की है. पीड़ितों की कहानियाँ दिल दहला देने वाली हैं. महरौली की 57 वर्षीय चाय की दुकान चलाने वाली फैमान इसरा ने 35 साल की मेहनत से घर बनाया था, जिसे मिनटों में मलबे में बदल दिया गया. बारिश के मौसम में भी लोगों को सामान निकालने का मौका नहीं दिया गया. दिल्ली में एक जगह तो अधिकारियों ने 5-6 फीट गहरे गड्ढे खोद दिए ताकि लोग दोबारा वहां न बस सकें. हर्ष मंदर और कानूनी विशेषज्ञ इसे “बुलडोज़र राज” कहते हैं. भारत के किसी भी कानून में यह प्रावधान नहीं है कि अपराध के आरोपी का घर गिरा दिया जाए. अपराध साबित करने के लिए पुलिस, अदालत और गवाहों की एक पूरी प्रक्रिया होती है. लेकिन अब प्रशासन खुद ही जज और जल्लाद बन गया है. रिपोर्ट में मध्य प्रदेश के उज्जैन का उदाहरण दिया गया है, जहां तीन मुस्लिम किशोरों पर एक जुलूस पर थूकने का आरोप लगा (जो बाद में गलत साबित हुआ). पुलिस ने डीजे और ढोल-नगाड़ों के साथ उनके घर पर बुलडोज़र चला दिया. यह एक तरह का सार्वजनिक तमाशा बन गया है, जहां भीड़ जश्न मनाती है. यह ‘सामूहिक सजा’ का एक रूप है, जिसका उद्देश्य एक समुदाय विशेष को डराना और उनकी आर्थिक कमर तोड़ना है. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इसे क्रूर और मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया है.
‘फर्क समझो सर जी’: राहुल गांधी ने ट्रंप की मिमिक्री के बहाने मोदी सरकार पर कसा तंज
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी बातचीत की नकल उतारने और टैरिफ (आयात शुल्क) को लेकर की गई टिप्पणी ने भारतीय राजनीति में हलचल मचा दी है. ट्रंप ने दावा किया कि पीएम मोदी ने उनसे मिलकर रूसी तेल खरीद पर अमेरिकी टैरिफ को लेकर शिकायत की थी. ट्रंप ने मोदी के अंदाज की नकल करते हुए कहा, “सर, मे आई सी यू प्लीज?” (श्रीमान, क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ?).
इस वीडियो के वायरल होते ही राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर “फर्क समझो, सर जी!” लिखते हुए अपना एक पुराना वीडियो साझा किया. इसमें उन्होंने 1971 के युद्ध के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अमेरिकी दबाव के आगे न झुकने की तुलना वर्तमान सरकार के कथित ‘समर्पण’ से की. राहुल गांधी का तर्क है कि इंदिरा गांधी ने अमेरिकी सातवें बेड़े की धमकी के बावजूद पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे, जबकि वर्तमान सरकार ट्रंप के दबाव में है.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी तंज कसते हुए कहा, “नमस्ते ट्रंप से लेकर हाउडी मोदी तक का सफर अब इस अपमान तक आ गया है.” ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत ने अब 68 अपाचे हेलिकॉप्टर ऑर्डर किए हैं, जिसे विपक्ष दबाव में की गई डील बता रहा है.
प्रोफेसर महमूदाबाद के खिलाफ मामला बंद करने पर विचार करें; हरियाणा सरकार से सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर सोशल मीडिया पोस्ट के लिए अशोक विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को “एकमुश्त उदारता” के रूप में बंद करने पर विचार करने के लिए छह सप्ताह का समय दिया है.
“द टेलीग्राफ” ब्यूरो के अनुसार, मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने हालांकि आशा व्यक्त की कि महमूदाबाद भी अपनी हरकतों को न दोहराकर “जिम्मेदारी” के साथ इसका प्रत्युत्तर देंगे. पीठ ने मौखिक रूप से अतिरिक्त सॉलिसिटर-जनरल एस.वी. राजू (राज्य के वकील) से पूछा, “एकमुश्त उदारता के तौर पर, क्या इस मामले को बंद नहीं किया जा सकता?” राजू ने इस मुद्दे पर सरकार से निर्देश लेने की अनुमति मांगी थी. पीठ ने मामले को छह सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया. सुनवाई के दौरान, राजू ने प्रस्तुत किया कि एसआईटी ने अगस्त 2025 में आरोप पत्र दायर कर दिया था, लेकिन महमूदाबाद के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सक्षम प्राधिकारी से मंजूरी मिलना अभी बाकी है.
पीठ ने पूछा, “ठीक है, तो क्या एकमुश्त उदारता के तौर पर मामला बंद नहीं किया जा सकता?” अदालत ने आगे कहा, “बेशक, फिर उन्हें (महमूदाबाद) भी भविष्य में अधिक जिम्मेदारी से व्यवहार करना होगा.” प्रोफेसर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं बनता है.
न्यायममूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “हम यह भी नहीं चाहते कि जैसे ही वे मुकदमा चलाने की मंजूरी न देने का निर्णय लें, आप (महमूदाबाद) जाकर कुछ भी अनाप-शनाप लिख दें! यदि राज्य कुछ उदारता दिखाता है, तो आपको भी जिम्मेदार बनना होगा.” हालांकि, अदालत ने अंततः “एकमुश्त उदारता” देने का मामला “सक्षम प्राधिकारी” के विवेक पर छोड़ दिया.
पिछले साल 25 अगस्त को, शीर्ष अदालत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर महमूदाबाद की सोशल मीडिया पोस्ट से संबंधित दो प्राथमिकियों में से एक को रद्द कर दिया था. उन पोस्ट्स में उन्होंने कर्नल सोफिया कुरैशी की सराहना करने वाले लेकिन “मॉब लिंचिंग,” “मनमाने ढंग से बुलडोजर चलाने” और “नफरत फैलाने” की घटनाओं की आलोचना न करने वाले “दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों” की आलोचना की थी.
शीर्ष अदालत ने निचली अदालत के मजिस्ट्रेट को एसोसिएट प्रोफेसर के खिलाफ दूसरी प्राथमिकी पर संज्ञान लेने से भी रोक दिया था. 16 जुलाई को, शीर्ष अदालत ने महमूदाबाद के खिलाफ दर्ज दो प्राथमिकियों की जांच को “गुमराह” करने के लिए एसआईटी को फटकार लगाई थी.
जले हुए नोटों की गड्डियां: जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में लोकसभा स्पीकर की जांच समिति को चुनौती दी
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा, जिनके दिल्ली आवास पर जलते हुए नोटों की गड्डियां मिली थीं, ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लोकसभा अध्यक्ष द्वारा अपने विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए एक जांच समिति के गठन का विरोध किया है. उन्होंने तर्क दिया कि यह कदम न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 और संविधान के अनुच्छेद 124(5) का उल्लंघन है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ को बताया कि जब लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही दिन महाभियोग प्रस्ताव शुरू किए जाते हैं, तो कानून एक संयुक्त प्रक्रिया का आदेश देता है. उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी परिस्थितियों में, जाँच समिति का गठन संसद के दोनों सदनों द्वारा संयुक्त रूप से ही किया जा सकता है, न कि किसी एक सदन द्वारा एकतरफा रूप से. न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए, रोहतगी ने प्रस्तुत किया कि न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव 21 जुलाई, 2025 को दोनों सदनों में पेश किए गए थे.
रोहतगी ने तर्क दिया कि जब दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्ताव के नोटिस दिए जाते हैं, तो कोई भी समिति तब तक गठित नहीं की जाएगी जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार न कर लिया जाए. ऐसी स्थिति में, अधिनियम लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा एक संयुक्त समिति के गठन की परिकल्पना करता है.
रोहतगी ने कहा, “इस मामले में, एक प्रस्ताव खारिज कर दिया गया था. इसलिए, उसके बाद गठित की गई समिति कानून की दृष्टि में शून्य है.” उन्होंने बताया कि राज्यसभा में जो प्रस्ताव पहले सभापति द्वारा स्वीकार कर लिया गया था, उसे बाद में 11 अगस्त को उपसभापति ने खारिज कर दिया. इसके बावजूद, लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त को एक जाँच समिति का गठन किया. रोहतगी ने इस समिति को कानूनन “अस्तित्वहीन” बताया और राज्यसभा के उपसभापति द्वारा उस प्रस्ताव को खारिज करने के निर्णय पर भी हमला किया जिसे पहले ही स्वीकार किया जा चुका था.
वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि एक बार जब दो प्रस्ताव एक ही दिन उचित रूप से पेश किए जाते हैं, तो कानून के अनुसार एक संयुक्त प्रक्रिया आवश्यक होती है. उन्होंने प्रस्तुत किया कि यदि दोनों प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए जाते हैं, तो पूरी कवायद विफल हो जानी चाहिए. उन्होंने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम की धारा 3(2) के तहत लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति के गठन पर भी सवाल उठाया और तर्क दिया कि यह अनिवार्य संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन है.
पीठ ने हालांकि यह सवाल उठाया कि क्या एक सदन में प्रस्ताव का खारिज होना दूसरे सदन में शुरू की गई कार्यवाही को स्वतः ही अमान्य कर देगा. लोकसभा द्वारा दायर हलफनामे का हवाला देते हुए, रोहतगी ने कहा कि राज्यसभा के उपसभापति ने 11 अगस्त को प्रस्ताव खारिज कर दिया था, जबकि लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त को समिति का गठन किया.
अदालत ने टिप्पणी की कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम स्पष्ट रूप से यह नहीं कहता कि यदि एक सदन प्रस्ताव खारिज कर देता है, तो दूसरा सदन कार्यवाही करने से रुक जाता है. न्यायमूर्ति दत्ता ने पूछा, “यदि राज्यसभा प्रस्ताव को खारिज कर देती है, तो लोकसभा द्वारा समिति नियुक्त करने के लिए प्रावधान के तहत रोक कहाँ है?”
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए, रोहतगी ने दोहराया कि एक बार जब दोनों सदनों में एक साथ प्रस्ताव पेश किए जाते हैं, तो कानून एक संयुक्त प्रक्रिया का आदेश देता है, और एक सदन द्वारा एकतरफा कार्रवाई अस्वीकार्य है.
मामले में सुनवाई जारी है. उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति वर्मा को 14 मार्च को नई दिल्ली में उनके सरकारी आवास पर जलते हुए नोटों की गड्डियां मिलने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय से वापस इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेज दिया गया था.
महाराष्ट्र निकाय चुनाव: विचारधारा को छोड़, भाजपा-कांग्रेस, ओवैसी की पार्टी में गठबंधन
महाराष्ट्र के आगामी निकाय चुनावों में राजनीतिक सिद्धांतों की धज्जियां उड़ती दिख रही हैं. सत्ता पाने की होड़ में विचारधाराएं गौण हो गई हैं और “फ्री-फॉर-ऑल” की स्थिति बन गई है. अंबरनाथ और अकोट नगर परिषदों में भाजपा ने अपनी धुर विरोधी पार्टियों—कांग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम —के साथ गठबंधन कर लिया है. लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर अपने विश्लेषण में इसे “राजनीतिक व्यभिचार” कहते हैं. उनका कहना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में अब एलाइंस याद रखना मुश्किल है—मुंबई में जो दोस्त हैं, वे जिलों में दुश्मन हैं. पार्टियां जीतने की क्षमता के नाम पर गुंडों और दलबदलुओं का स्वागत कर रही हैं, और शहरी विकास के असली मुद्दे गायब हैं.
अंबरनाथ में एकनाथ शिंदे की शिवसेना को सत्ता से बाहर रखने के लिए भाजपा ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया, जबकि अकोट में भाजपा ने एआईएमआईएम के साथ ‘विकास मंच’ बनाया है. इस खबर के बाहर आते ही उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस को शर्मिंदगी उठानी पड़ी और उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “कांग्रेस और एआईएमआईएम के साथ गठबंधन स्वीकार्य नहीं है. इसे तुरंत तोड़ा जाए.”
हिंदुत्ववादी विरोध के बाद वैष्णो देवी मेडिकल इंस्टीट्यूट की एमबीबीएस परमिशन रद्द
नेशनल मेडिकल कमीशन ने जम्मू-कश्मीर के श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस को एमबीबीएस कोर्स शुरू करने के लिए दी गई अनुमति वापस ले ली है. यह फैसला ‘एसएमवीडी संघर्ष समिति’ नामक संगठन के विरोध प्रदर्शन के कुछ ही घंटों बाद आया. भाजपा समर्थित इस संगठन ने संस्थान में मुस्लिम और गैर-हिंदू छात्रों के प्रवेश का विरोध किया था.
रिपोर्ट के मुताबिक, नीट रैंकिंग के आधार पर चयनित 50 छात्रों के पहले बैच में 47 मुस्लिम और एक सिख छात्र थे, जबकि केवल दो हिंदू थे. प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि चूंकि संस्थान हिंदू तीर्थयात्रियों के दान से चलता है, इसलिए सीटें केवल हिंदुओं के लिए आरक्षित होनी चाहिए. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार ने इसे खारिज करते हुए कहा था कि यूनिवर्सिटी एक्ट के तहत ऐसा कोई भेदभाव संभव नहीं है. एनएमसी ने अनुमति रद्द करने का आधिकारिक कारण “न्यूनतम मानकों का पालन न करना” बताया है. अब इन 50 छात्रों को अन्य कॉलेजों में शिफ्ट किया जाएगा.
अंकिता भंडारी केस:
बीजेपी के पूर्व विधायक राठौर की गिरफ्तारी पर रोक, गौतम के खिलाफ लिंक हटाने के लिए भी कहा
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने मंगलवार को भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर को अंतरिम राहत प्रदान की, जो अभिनेत्री उर्मिला सनावर द्वारा जारी विवादास्पद वीडियो के बाद कई आरोपों का सामना कर रहे हैं. राठौर के खिलाफ हरिद्वार के बहादराबाद और झबरेड़ा थानों तथा देहरादून के नेहरू कॉलोनी और डालनवाला थानों में मामले दर्ज किए गए थे.
आरोप था कि राठौर और एक अन्य आरोपी व्यक्ति ने अंकिता भंडारी मामले में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत कुमार गौतम की छवि खराब करने के इरादे से सोशल मीडिया पर जानबूझकर झूठी और भ्रामक सामग्री फैलाई.
नरेंद्र सेठी के मुताबिक, राठौर ने सभी आरोपों से इनकार किया और दावा किया कि उन्हें राजनीतिक प्रतिशोध के तहत फंसाया जा रहा है। नेता ने यह भी दावा किया कि सह-आरोपी उर्मिला उनकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं है और वायरल सामग्री उनकी भागीदारी के बिना ‘एआई’ का उपयोग करके बनाई गई थी. याद रहे कि उर्मिला सनावर के वीडियो प्रसारित होने के बाद, भाजपा नेता दुष्यंत कुमार गौतम का नाम भी इस हत्याकांड से जोड़ा जा रहा है. इसे चुनौती देते हुए गौतम ने दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया. बुधवार को अदालत ने उनके पक्ष में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी कर कहा कि गौतम को अंकिता भंडारी मामले से जोड़ने वाली सोशल मीडिया पर प्रसारित सभी सामग्री को 24 घंटे के भीतर हटाया जाना चाहिए. दिल्ली हाईकोर्ट ने कांग्रेस और आप को भाजपा नेता को अंकिता भंडारी मामले से जोड़ने वाली पोस्ट हटाने का आदेश दिया.
इन कानूनी लड़ाइयों के बीच, विपक्ष ने अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच के तौर-तरीकों को लेकर राज्य सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं. मीडिया को संबोधित करते हुए उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने प्रशासन की तीखी आलोचना की. गोदियाल ने कहा, “पहले अंकिता हत्याकांड के सबूत मिटाए गए और अब सरकार सबूत मांग रही है. “ उन्होंने अंकिता के माता-पिता द्वारा लगातार की जा रही सीबीआई जांच की मांग पर जोर देते हुए कहा कि राज्य सरकार पिछले तीन वर्षों में इस महत्वपूर्ण कदम पर निर्णय लेने में विफल रही है. गोदियाल ने दावा किया, “यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक अंकिता भंडारी को न्याय नहीं मिल जाता.”
उर्मिला ने धामी को झुठलाया, कहा- मैं अंकिता को न्याय दिलाने पूरे साक्ष्य पेश करूंगी
पृथ्वीराज सिंह के अनुसार, भले ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को मीडिया से कहा कि अंकिता भंडारी हत्याकांड के संबंध में भाजपा नेताओं के नाम वाले ऑडियो और वीडियो क्लिप जारी करने वाली उर्मिला सनावर लापता हैं, लेकिन सनावर ने उसी शाम देहरादून में अपनी मौजूदगी की घोषणा कर दी. एक सोशल मीडिया पोस्ट में, सनावर ने कहा कि वह विशेष जांच दल की जांच का सामना करने के लिए तैयार हैं और 2023 में ऋषिकेश के एक रिसॉर्ट में मारी गई 19 वर्षीय अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के लिए पूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करेंगी.
हरकारा डीप डाइव
भाजपाई का रिजॉर्ट, वीआईपी को स्पेशल सर्विस देने की मांग, अंकिता की हत्या
उत्तराखंड की 19 वर्षीय अंकिता भंडारी की हत्या को तीन साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन यह मामला आज भी राज्य की राजनीति, प्रशासन और समाज के लिए एक खुला सवाल बना हुआ है. ऋषिकेश के पास वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम कर रहीं अंकिता की सितंबर 2022 में हत्या कर दी गई थी. छह दिन बाद उनका शव एक नहर से बरामद हुआ. तीन साल के बाद यह मामला एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं जब एक ऑडियो क्लिप सामने आई, जिसमें कथित तौर पर एक उत्तराखंड के एक प्रभावशाली व्यक्ति का ज़िक्र किया गया है. हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में पत्रकार गौरव नौडियाल ने इस पर चर्चा की.
इस एपिसोड में पत्रकार गौरव नौडियाल के साथ बातचीत में इस पूरे मामले को सिर्फ एक आपराधिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पर्यटन मॉडल, बेरोज़गारी, सत्ता संरक्षण और पहाड़ों से आने वाली युवा महिलाओं की असुरक्षा के संदर्भ में देखा गया. बातचीत में यह भी सामने आया कि राज्य में डर का माहौल है और सत्ता के ख़िलाफ़ बोलने वालों पर दबाव और कार्रवाई की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं.
राज्य भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों और “वीआईपी कौन है” जैसे नारों ने इस केस को एक व्यापक सार्वजनिक सवाल में बदल दिया है. अंकिता भंडारी का मामला अब केवल न्याय की मांग नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता की कसौटी बन चुका है.
इस मामले की शुरुआती जांच और अदालत में पेश साक्ष्यों से यह सामने आया कि अंकिता पर तथाकथित “स्पेशल सर्विस” देने का दबाव बनाया जा रहा था. व्हाट्सऐप चैट्स में उसने साफ लिखा था कि वह आरोपियों के व्यवहार से परेशान है और नौकरी छोड़ना चाहती है. एक संदेश में उसने लिखा था कि वह गरीब है, लेकिन क्या कुछ पैसों के लिए खुद को बेच दे. इस मामले में रिसॉर्ट मैनेजर पुलकित आर्य, जो पूर्व भाजपा नेता विनोद आर्य के बेटे हैं, और उसके दो सहयोगियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। इसके बावजूद शुरू से यह भावना बनी रही कि जांच की सीमा यहीं तय कर दी गई और जिन लोगों के नाम “वीआईपी ” के तौर पर सामने आए, वे जांच के दायरे से बाहर रहे.
2025–26 में मामला एक बार फिर चर्चा में आया, जब एक ऑडियो क्लिप सामने आई, जिसमें कथित तौर पर एक प्रभावशाली व्यक्ति का ज़िक्र किया गया. इस क्लिप को लेकर सियासी बयानबाज़ी तेज़ हुई, पुलिस ने आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया, लेकिन अब तक किसी भी वीआईपी को आरोपी नहीं बनाया गया है. मुख्यमंत्री ने पीड़ित परिवार से बात करने की बात कही, लेकिन सीबीआई जांच की मांग पर कोई स्पष्ट रुख सामने नहीं आया.
हरकारा डीप डाइव का यह इंटरव्यू इसी सवाल के इर्द-गिर्द केंद्रित है कि क्या उत्तराखंड में सच तक पहुंचने की राह जानबूझकर रोकी जा रही है, और क्या यह मामला कभी सत्ता के असली केंद्रों तक पहुंच पाएगा.
ग्रेट निकोबार परियोजना से नई खोजी गई दुर्लभ प्रजातियों के विलुप्त होने का ख़तरा
ग्रेट निकोबार द्वीप समूह में केंद्र सरकार की 72,000 करोड़ रुपये की विशाल बुनियादी ढांचा परियोजना वहां की जैव विविधता के लिए अस्तित्व का संकट बन गई है. स्क्रोल में वैष्णवी राठौर की रपट है कि हाल ही में शोधकर्ताओं ने वहां ‘निकोबार क्रेक’ (एक प्रकार का पक्षी) और ‘इरविन्स वोल्फ स्नेक’ (सांप) जैसी नई प्रजातियां खोजी हैं. लेकिन जिस तेजी से जंगल काटे जाने की योजना है, वैज्ञानिकों को डर है कि ये प्रजातियां विज्ञान द्वारा पूरी तरह से पहचाने जाने (formal description) से पहले ही विलुप्त हो सकती हैं.
पिया सेठी और नीतू सेठी ने इस साल मई में वहां एक पक्षी देखा, जो विज्ञान के लिए नया था. इसी तरह जीवविज्ञानी जीशान मिर्जा ने एक नई सांप की प्रजाति की पहचान की. समस्या यह है कि ये दुर्लभ जीव ठीक उन्हीं इलाकों (गैलाथिया बे, गांधी नगर) में पाए गए हैं, जहां सरकार एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, हवाई अड्डा और पावर प्लांट बनाने जा रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि द्वीपों के अलग-थलग होने के कारण यहां ‘स्थानिक’ (endemic) प्रजातियां पाई जाती हैं, जो दुनिया में और कहीं नहीं मिलतीं. किसी नई प्रजाति को वैज्ञानिक रूप से ‘डिस्क्राइब’ करने में सालों लग जाते हैं. लेकिन परियोजना के लिए लगभग 10 लाख पेड़ों की कटाई इन जीवों के आवास को हमेशा के लिए खत्म कर देगी. जीशान मिर्जा चेतावनी देते हैं, “जब जंगल में कुछ रिकॉर्ड ही नहीं होगा, तो उसे साफ करना आसान होता है. हम अभी सतह भी नहीं खुरच पाए हैं कि वहां क्या-क्या छिपा है.”
अमेरिका ने वेनेजुएला से जुड़े दो प्रतिबंधित तेल टैंकरों को जब्त किया, एक पर रूसी झंडा था
अमेरिका ने बुधवार को वेनेजुएला के तट से पीछा करने के बाद उत्तरी अटलांटिक में रूसी ध्वज वाले एक तेल टैंकर को जब्त कर लिया. रूस ने अमेरिका की इस कार्रवाई की निंदा की है. बहरहाल, इस अभियान से मॉस्को के साथ तनाव और अधिक बढ़ने की आशंका है.
‘एएफपी’ के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह टैंकर उस तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ का हिस्सा है जो अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए वेनेजुएला, रूस और ईरान जैसे देशों के लिए तेल ले जाता है. इस जहाज ने पिछले महीने वेनेजुएला के पास इसे रोकने की एक कोशिश को विफल कर दिया था. इस ऑपरेशन के बाद, पेंटागन प्रमुख पीट हेगसेथ ने पोस्ट किया कि वेनेजुएला के तेल पर अमेरिकी नाकाबंदी “दुनिया में कहीं भी” पूरी तरह से प्रभावी है.
उत्तरी अटलांटिक में सफल जब्ती की पुष्टि करने के तुरंत बाद, अमेरिकी सेना ने घोषणा की कि कैरिबियन सागर में एक दूसरे प्रतिबंधित टैंकर जहाज को भी जब्त कर लिया गया है. उत्तरी अटलांटिक का यह ऑपरेशन रूस द्वारा खाली टैंकर की सुरक्षा के लिए एक पनडुब्बी भेजने के बावजूद किया गया.
रूस का तर्क था कि जहाज रूसी ध्वज के नीचे चल रहा था और अमेरिकी तट से बहुत दूर था. रूस के परिवहन मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “1982 के समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के अनुसार, खुले समुद्र के जल क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता लागू होती है, और किसी भी देश को दूसरे देशों के अधिकार क्षेत्र के तहत विधिवत पंजीकृत जहाजों के खिलाफ बल प्रयोग करने का अधिकार नहीं है.” मंत्रालय ने बताया कि जहाज, जिसने अपना नाम बेला-1 से बदलकर मारिनेरा कर लिया था, उसे 24 दिसंबर को रूसी ध्वज के तहत चलने की “अस्थायी अनुमति” मिली थी. मंत्रालय ने आगे कहा कि “किसी भी देश के क्षेत्रीय जल क्षेत्र से परे, खुले समुद्र में” अमेरिकी नौसेना बलों के जहाज पर सवार होने के बाद “जहाज से संपर्क टूट गया.”
कार्टून | राजेन्द्र धोडपकर
ट्रंप की ग्रीनलैंड खरीदने की धमकियों से नाटो गठबंधन में तनाव
एक्सियोस के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ‘ग्रीनलैंड’ को खरीदने की नई धमकियों ने नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) गठबंधन के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं. पेरिस में यूक्रेन की सुरक्षा पर चर्चा के लिए जुटे यूरोपीय नेताओं के बीच ट्रंप की इस मांग ने चिंता बढ़ा दी है. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव ने स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड हासिल करना अमेरिका की ‘राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता’ है और इसके लिए सैन्य विकल्प भी खुला रखा गया है. डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने चेतावनी दी है कि एक सहयोगी देश पर ऐसा कदम नाटो गठबंधन का अंत हो सकता है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.













