07/03/2026: ममता बनाम मुर्मू | बलात्कारी गुरमीत हत्या के मामले में बरी | नेपाल चुनाव | ईरान जंग का 8वां दिन | ट्रंप ने मुसीबत मोल ले ली | मोदी की गिरती छवि, भारत की साख | पाकिस्तान दोराहे पर |
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
बंगाल में घमासान: राष्ट्रपति मुर्मू और ममता बनर्जी आमने-सामने, पीएम मोदी ने बताया ‘शर्मनाक’.
बड़ी राहत: पत्रकार हत्या मामले में डेरा प्रमुख राम रहीम बरी, हाईकोर्ट का फैसला.
नेपाल में युवा क्रांति: रैपर बालेन शाह ने पूर्व पीएम ओली को 50 हजार वोटों से हराया.
ईरान युद्ध: तेहरान पर बमबारी जारी, ट्रम्प ने माँगा ‘बिना शर्त सरेंडर’, 1300 से ज्यादा मौतें.
पाकिस्तान फंसा: सऊदी अरब और ईरान की जंग के बीच इस्लामाबाद की कूटनीतिक परीक्षा.
CAA अपडेट: असम में डिटेंशन सेंटर से रिहा महिला को मिली नागरिकता.
ममता का मुर्मू पर आरोप: राष्ट्रपति चुनाव के समय बीजेपी की सलाह पर राजनीति कर रही हैं
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों की आहट के बीच शनिवार को एक अभूतपूर्व सियासी ड्रामा देखने को मिला. ‘9वें अंतर्राष्ट्रीय संताल सम्मेलन’ में हिस्सा लेने पहुंचीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच प्रोटोकॉल और राजनीति को लेकर तीखी जुबानी जंग छिड़ गई. मामला तब और गरमा गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसमें हस्तक्षेप करते हुए राज्य सरकार के रवैये को “शर्मनाक” करार दिया.
“ममता दीदी शायद मुझसे नाराज़ हैं”
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति मुर्मू उत्तर बंगाल के फांसीदेवा स्थित गोसाईपुर में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुईं. अपने संबोधन में उन्होंने राज्य सरकार की अनुपस्थिति पर हैरानी जताई. राष्ट्रपति ने कहा, “मैं भी बंगाल की बेटी हूँ, लेकिन पता नहीं मुझे यहाँ आने क्यों नहीं दिया जाता. ममता दीदी मेरी छोटी बहन जैसी हैं. शायद वो मुझसे नाराज़ हैं.”
विवाद की मुख्य वजह कार्यक्रम स्थल का बदला जाना था. आयोजक इसे सिलीगुड़ी के पास बिधाननगर में करना चाहते थे, जहाँ संताल आबादी अधिक है, लेकिन प्रशासन ने कथित तौर पर इसकी अनुमति नहीं दी और कार्यक्रम गोसाईपुर शिफ्ट कर दिया गया. राष्ट्रपति ने मंच से सवाल उठाया, “क्या यह एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन जैसा लग रहा है? मुझे लगा कि कई संताल भाई-बहनों को बाहर ही रोक दिया गया. कोई नहीं चाहता कि संताल समाज एकजुट हो.” बाद में, राष्ट्रपति प्रोटोकॉल तोड़ते हुए बिधाननगर गईं और बिना मंच के लोगों को संबोधित किया.
ममता का पलटवार: “मैडम, आप बीजेपी के जाल में फंसी हैं”
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, कोलकाता में मतदाता सूची के मुद्दे पर धरने पर बैठीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति के बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति चुनाव के समय बीजेपी की सलाह पर राजनीति कर रही हैं.
ममता ने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है. हम राष्ट्रपति का सम्मान करते हैं. लेकिन मुझे कहना पड़ रहा है कि राष्ट्रपति को बीजेपी का एजेंडा बेचने के लिए (बंगाल) भेजा गया है. आई एम सॉरी मैडम, लेकिन आप बीजेपी के जाल में फंस गई हैं.”
ममता ने सवाल किया कि राष्ट्रपति अन्य राज्यों में आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों पर चुप क्यों रहती हैं. उन्होंने पूछा, “जब मणिपुर हिंसा के दौरान आदिवासियों पर हमला हुआ और उन्हें अपमानित किया गया, तब आपकी आवाज़ क्यों नहीं सुनाई दी? मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की घटनाओं पर आप क्यों नहीं बोलतीं?”
ममता ने सफाई दी कि यह एक निजी संस्था (’इंटरनेशनल संताल काउंसिल’) का कार्यक्रम था और राज्य सरकार आयोजक नहीं थी. उन्होंने कहा, “अगर आप साल में एक बार आती हैं तो हम स्वागत करेंगे, लेकिन अगर आप चुनाव के दौरान बार-बार आती हैं, तो हम क्या कर सकते हैं? आप बीजेपी की प्राथमिकता हैं, मेरी प्राथमिकता जनता है.” ममता ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रोटोकॉल के तहत सिलीगुड़ी के मेयर, डीएम और पुलिस कमिश्नर ने राष्ट्रपति को रिसीव किया था.
“ममता सरकार ने सारी हदें पार कीं”
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस विवाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने लिखा, “पश्चिम बंगाल की टीएमसी सरकार ने सचमुच सारी हदें पार कर दी हैं. राष्ट्रपति जी, जो खुद आदिवासी समाज से आती हैं, उनके अपमान ने देशवासियों को दुखी किया है.”
पीएम ने आगे लिखा कि राष्ट्रपति का पद राजनीति से ऊपर है और संताल संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विषय के साथ बंगाल सरकार का ऐसा व्यवहार दुर्भाग्यपूर्ण है. ममता बनर्जी ने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी के नेता डेरेक ओ’ब्रायन और सुदीप बंदोपाध्याय राष्ट्रपति भवन जाकर बंगाल में आदिवासियों के लिए किए गए विकास कार्यों की रिपोर्ट सौंपेंगे. टीएमसी ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि राष्ट्रपति को गलत जानकारी दी गई है कि बंगाल में आदिवासियों के लिए काम नहीं हुआ.
पत्रकार की हत्या मामले में बलात्कारी गुरमीत बरी
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़ पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने आज डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्या मामले में बरी कर दिया. यह फैसला मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति विक्रम अग्रवाल की पीठ ने सुनाया. अदालत ने राम रहीम के ख़िलाफ़ सज़ा को तो रद्द कर दिया, लेकिन इस मामले के अन्य तीन दोषियों कुलदीप, निर्मल और कृष्ण लाल की सज़ा और आजीवन कारावास को बरक़रार रखा है.
इससे पहले 2019 में सीबीआई की विशेष अदालत ने गुरमीत राम रहीम सिंह और तीन अन्य आरोपियों को 2002 में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या का दोषी ठहराया था और सभी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी.
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को अक्टूबर 2002 में उनके घर के बाहर गोली मार दी गई थी. उनकी हत्या उस समय हुई जब उनके अखबार ‘पूरा सच’ में एक गुमनाम पत्र प्रकाशित हुआ था. उस पत्र में आरोप लगाया गया था कि सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय में महिलाओं का यौन शोषण किया जा रहा है और इसके लिए गुरमीत राम रहीम सिंह ज़िम्मेदार हैं.
नेपाल चुनाव:
घोषित 87 में से 70 नतीजे आरएसपी के पक्ष में, बालेंद्र ने बुजुर्ग ओली को 50 हजार वोटों से हराया
नेपाल में पीढ़ीगत बदलाव और भ्रष्टाचार मुक्त शासन की मांग करने वाले पिछले साल के हिंसक ‘जेन-जी’ विरोध प्रदर्शनों के बाद हुए पहले आम चुनाव में, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के बालेंद्र शाह ने शनिवार को चार बार के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को भारी अंतर से हराकर पारंपरिक राजनीतिक दलों का सफाया कर दिया है. वे अब नेपाल में अगली सरकार बनाने के लिए तैयार हैं.
रैपर से राजनेता बने ‘बालेन’ के नाम से मशहूर बालेंद्र शाह ने झापा-5 निर्वाचन क्षेत्र में नेपाल के पुराने दल, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के अध्यक्ष ओली को लगभग 50,000 मतों के भारी अंतर से हराया. चुनाव आयोग के अनुसार, 35 वर्षीय बालेन को 68,348 वोट मिले, जबकि 74 वर्षीय ओली को मात्र 18,734 वोट प्राप्त हुए.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, आरएसपी की लहर है. रवि लामिछाने द्वारा 2022 में गठित आरएसपी ने घोषित 87 सीटों में से 70 पर जीत दर्ज की है. काठमांडू जिले की सभी 10 सीटों पर पार्टी ने ‘क्लीन स्वीप’ किया है.
पुराने दलों में नेपाली कांग्रेस (एनसी) ने 10 सीटें जीतीं, जबकि सीपीएन-यूएमएल को केवल 3 सीटों पर जीत मिली. भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ जनता के गुस्से के कारण पुराने दल मतदाताओं को रिझाने में पीछे रह गए.
भारत इस राजनीतिक रूप से अस्थिर हिमालयी राष्ट्र में एक स्थिर सरकार की उम्मीद कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के सफल संचालन पर नेपाल की जनता को बधाई दी.
35 वर्षीय इंजीनियर और रैपर बालेन शाह का अगला प्रधानमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है. उन्होंने खुद को “मधेस का बेटा” बताते हुए ‘अब की बार बालेंद्र सरकार’ के नारे के साथ प्रचार किया था. मधेस प्रांत की 32 सीटों में से आरएसपी ने 8 जीत ली हैं और 22 पर बढ़त बनाए हुए है. ओली ने भी अपनी हार स्वीकार करते हुए बालेन को बधाई दी और उनके 5 साल के कार्यकाल के सफल होने की कामना की. उन्होंने बालेन के साथ अपनी एक पुरानी फोटो भी साझा की जिसमें वे उन्हें ‘तबला’ भेंट कर रहे थे.
नेपाल ने पिछले 18 वर्षों में 14 सरकारें देखी हैं. इस बार का चुनाव ‘जेन-जी’ युवाओं के 8 और 9 सितंबर के उन विरोध प्रदर्शनों का परिणाम था, जिन्होंने ओली सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था. युवाओं की मुख्य मांगें भ्रष्टाचार विरोधी शासन, सुशासन और नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव थीं.
ईरान युद्ध: आठवाँ दिन
तबाही जारी, 1332 से ज्यादा जानें गईं..
अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर 28 फरवरी को शुरू किए गए भीषण हमलों को एक हफ़्ता बीत चुका है, लेकिन शांति के बजाय युद्ध की आग पूरे मिडिल ईस्ट में फैलती जा रही है. ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के आठवें दिन तक मरने वालों का आंकड़ा 1,332 के पार जा चुका है. शनिवार की सुबह राजधानी तेहरान पर बमबारी का एक नया और तेज़ दौर देखा गया, जिसने शहर को हिला कर रख दिया.
अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड का दावा है कि उसने अब तक ईरान में 3,000 से ज़्यादा ठिकानों पर हमला किया है और 43 ईरानी युद्धपोतों को नष्ट कर दिया है. इस भारी तबाही के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान से “बिना शर्त समर्पण” की मांग की है. उनका कहना है कि इसके बिना युद्ध नहीं रुकेगा.
इसके जवाब में, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने एक टीवी संबोधन में अमेरिका को दो टूक जवाब दिया. उन्होंने कहा, “बिना शर्त सरेंडर का विचार हमारे दुश्मन अपनी कब्र में लेकर जाएंगे.” हालाँकि, पेज़ेशकियन ने खाड़ी देशों पर हुए ईरानी मिसाइल हमलों के लिए माफ़ी मांगी, लेकिन साथ ही चेतावनी भी दी कि जिन देशों की ज़मीन का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए होगा, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा.
जंग का दायरा अब ईरान से बाहर निकलकर पड़ोसी अरब मुल्कों तक पहुँच चुका है.
सऊदी अरब: रियाद के पास कई ड्रोन इंटरसेप्ट किए गए.
कतर और कुवैत: इन देशों ने भी अपनी सीमाओं में मिसाइल हमलों की पुष्टि की है. कतर ने 10 में से 9 ईरानी ड्रोन मार गिराए.
लेबनान: हिज़्बुल्लाह और इज़राइली सेना के बीच संघर्ष तेज़ हो गया है, जहाँ इज़राइली हमलों में 200 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं. जवाब में हिज़्बुल्लाह ने उत्तरी इज़राइल पर रॉकेट बरसाए हैं.
इस युद्ध में अब रूस की भूमिका भी संदिग्ध होती जा रही है. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, रूस कथित तौर पर ईरान को अमेरिकी सैन्य ठिकानों की खुफिया जानकारी दे रहा है. क्रेमलिन ने स्वीकार किया है कि युद्ध के कारण रूसी तेल और ऊर्जा उत्पादों की मांग बढ़ गई है. दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की विशेष छूट दी है, ताकि वैश्विक तेल बाज़ार को स्थिर रखा जा सके. तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं; अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 14% तक बढ़ गई हैं और कच्चा तेल 91 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुँच गया है.
टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक़ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान ने अपने पड़ोसी मध्य पूर्वी देशों के सामने जो नरमी दिखाई है, वह इसलिए है क्योंकि उसे अमेरिका और इज़राइल के हमलों में “बुरी तरह पीट चूका है”. ट्रंप ने यह बयान अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सोशल पर किया है.
ट्रंप ने कहा कि ईरान ने अपने पड़ोसी देशों से माफी मांगी है और वादा किया है कि अब वह उन पर हमला नहीं करेगा. उनके अनुसार यह फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि अमेरिका और इज़राइल की ओर से लगातार सैन्य हमले किए जा रहे हैं. ट्रंप ने लिखा कि ईरान मध्य पूर्व पर क़ब्ज़ा करना और वहां शासन करना चाहता था, लेकिन अब उसे आसपास के देशों के सामने हार का सामना करना पड़ा है.
अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट: ट्रम्प का ‘ईरानी सत्ता परिवर्तन’ का सपना पूरा होना मुश्किल
ट्रम्प प्रशासन सार्वजनिक रूप से चाहे जितने दावे करे कि वह ईरान के शासन को उखाड़ फेंकेंगा, लेकिन अमेरिका की अपनी खुफिया एजेंसियां इससे इत्तेफाक नहीं रखतीं. वाशिंगटन पोस्ट में वॉरेन पी. स्ट्रोबेल की बेहद संवेदनशील और क्लासिफाइड रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका द्वारा बड़े पैमाने पर हमला करने के बावजूद, ईरान के मौजूदा शासन और वहां के मज़बूत सैन्य-धार्मिक ढांचे को गिराना लगभग असंभव है.
इस रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत (जो इस युद्ध के दौरान हो चुकी है) के बाद भी ईरान का सिस्टम बिखरेगा नहीं. ईरान की ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ और शक्तिशाली ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ (आईआरजीसी) ने सत्ता के हस्तांतरण की पूरी तैयारी कर रखी है. सूत्रों के अनुसार, खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को अगला सुप्रीम लीडर बनाने की प्रक्रिया चल रही है.
हालाँकि, राष्ट्रपति ट्रम्प ने पत्रकारों से बातचीत में मोजतबा को “अक्षम” और “हल्का” बताया है. ट्रम्प ने यह भी संकेत दिया कि वे ईरान का अगला नेता चुनने में भूमिका निभाना चाहते हैं. लेकिन ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की सुज़ैन मैलोनी जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान का सिस्टम अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के बजाय और सख्त हो जाएगा.
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अन्ना केली ने दावा किया कि ईरानी शासन को “पूरी तरह कुचला जा रहा है,” लेकिन इंटेलिजेंस रिपोर्ट बताती है कि ट्रम्प प्रशासन ने एक गलत अनुमान लगाया था. उन्हें उम्मीद थी कि भारी बमबारी से ईरान में जनता विद्रोह कर देगी, लेकिन ज़मीन पर ऐसा कुछ नहीं दिख रहा. लोग डरे हुए हैं और अपनी जान बचाने के लिए घरों में छिपे हैं. रिपोर्ट यह भी सवाल उठाती है कि क्या अमेरिका के पास युद्ध के बाद का कोई प्लान है, या यह सिर्फ एक और लंबा चलने वाला संघर्ष बनकर रह जाएगा.
ईरान पर हमला कर फंस गये हैं ट्रंप
रॉयटर्स और एक्सियोस ने विश्लेषण किये हैं कि कैसे डोनल्ड ट्रंप ईरान युद्ध छेड़ कर फंस गये हैं.
ईरान युद्ध के एक हफ़्ते बाद, वाशिंगटन में यह सवाल गूंजने लगा है: “इस युद्ध का अंत क्या है?” राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. हालाँकि अमेरिकी सेना ने ईरान के सुप्रीम लीडर को मारने और उनकी नौसेना को तबाह करने में कामयाबी पाई है, लेकिन ट्रम्प के पास जीत का कोई स्पष्ट नक्शा नहीं है. विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प ने यह सोचकर गलती की कि ईरान का हाल भी वेनेजुएला जैसा होगा, जहां आसानी से सत्ता पलट दी गई थी. लेकिन ईरान एक मज़बूत और गहरी जड़ें जमाया हुआ देश साबित हो रहा है. युद्ध के आर्थिक परिणाम अब अमेरिका को डराने लगे हैं:
लागत: युद्ध के पहले 100 घंटों में ही 3.7 बिलियन डॉलर (करीब 30 हजार करोड़ रुपये) खर्च हो चुके हैं.
महंगाई: तेल की कीमतें 25% बढ़ गई हैं, जिससे अमेरिका में महंगाई लौटने का खतरा है. ट्रम्प ने चुनाव में महंगाई कम करने का वादा किया था, जो अब टूटता दिख रहा है.
हताहत: अब तक 6 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो चुकी है.
राजनीतिक मोर्चे पर भी ट्रम्प घिर रहे हैं. उनके अपने समर्थक (MAGA base) तो उनके साथ हैं, लेकिन निर्दलीय वोटर्स (independent voters) इस युद्ध से खुश नहीं हैं. पोलिंग डेटा बताता है कि केवल 38% अमेरिकी इस युद्ध का समर्थन कर रहे हैं.
यूएई के अरबपति व्यवसायी और ट्रम्प के मित्र खलाफ़ अल हबतूर ने एक खुले पत्र में पूछा, “आपको हमारे क्षेत्र को युद्ध का मैदान बनाने का अधिकार किसने दिया?” आलोचकों का कहना है कि बिना किसी ठोस योजना के शुरू किया गया यह युद्ध ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल को दलदल में फंसा सकता है और आने वाले मध्यावधि चुनावों (midterms) में रिपब्लिकन पार्टी को भारी नुकसान पहुँचा सकता है.
जंग में घसीटे जाने की मजबूरी यूरोपीय देशों की
न्यूयॉर्क टाइम्स में मार्क लैंडलर लिखते हैं कि यूरोप के नेता एक अजीबोगरीब कूटनीतिक चक्रव्यूह में फंस गए हैं. लंदन, पेरिस और रोम में बैठे नेता अपनी जनता को यकीन दिला रहे हैं कि “हम युद्ध में शामिल नहीं हैं,” लेकिन हकीकत यह है कि वे अपनी सेना और जहाज़ इस जंग में भेज रहे हैं.
फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इंस्टाग्राम पर एक चिंतित नागरिक को जवाब देते हुए कहा, “मैं स्पष्ट कर दूँ, हम युद्ध में नहीं जा रहे.” लेकिन दूसरी तरफ, उन्होंने फ़्रांसीसी एयरक्राफ्ट कैरियर ‘चार्ल्स डी गॉल’ को पूर्वी भूमध्यसागर में तैनात कर दिया है. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की स्थिति और भी नाजुक है. शुरुआत में उन्होंने अपने सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार किया था, जिस पर ट्रम्प ने तंज कसते हुए कहा था कि स्टार्मर “विंस्टन चर्चिल नहीं हैं.” इसके बाद ब्रिटेन ने चुपचाप अपने टाइफून जेट्स और जहाज मदद के लिए भेज दिए.
यूरोपीय नेताओं का सबसे बड़ा डर यह है कि अगर अमेरिकी हमलों से ईरान पूरी तरह बिखर गया या वहां गृहयुद्ध छिड़ गया, तो शरणार्थियों की एक और भारी बाढ़ यूरोप का रुख करेगी. इसका सीधा असर यूरोप की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने व्हाइट हाउस में ट्रम्प के साथ बैठक के बाद अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा, “हमें नहीं पता कि यह प्लान काम करेगा या नहीं, लेकिन अगर यह फेल हुआ, तो इसके नतीजे हमें भी भुगतने होंगे.” यह स्पष्ट है कि यूरोपीय देश इस युद्ध का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे, लेकिन ट्रम्प की नीतियों ने उन्हें इसमें खींच लिया है.
ट्रम्प की हत्या की साज़िश रचने वाला पाकिस्तानी दोषी करार
वाशिंगटन से आ रही एक बड़ी खबर के मुताबिक, एक पाकिस्तानी नागरिक आसिफ मर्चेंट को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और अन्य शीर्ष अमेरिकी नेताओं की हत्या की साज़िश रचने का दोषी पाया गया है. अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, यह साज़िश दो साल पहले रची गई थी और इसका मकसद 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए ईरानी कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत का बदला लेना था.
अदालत में यह बात सामने आई कि मर्चेंट ने 2024 में अमेरिका के भीतर ‘हिटमैन’ (सुपारी किलर) को काम पर रखने की कोशिश की थी. उसका निशाना सिर्फ ट्रम्प नहीं थे, बल्कि तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन और निक्की हेली भी हिट लिस्ट में शामिल थे. मर्चेंट ने अदालत में स्वीकार किया कि वह ईरानी ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ के इशारे पर काम कर रहा था. हालाँकि, उसने अपने बचाव में कहा कि उसने यह सब तेहरान में अपने परिवार की सुरक्षा के लिए मज़बूरी में किया.
इज़राइल ने कहा: मोदी की यात्रा के बाद लिया गया था ईरान पर हमले का फैसला
इज़राइल के विदेश मंत्री गिडिऑन सार ने को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी हाल की इज़राइल दौरे के दौरान ईरान पर हमले की योजना के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी, क्योंकि सैन्य कार्रवाई का फैसला उनके दौरे के बाद लिया गया था. गिडिऑन सार ने यह बात रायसीना डायलॉग में वर्चुअल रूप से शामिल होते हुए कही.
पाकिस्तान दोराहे पर: ईरान और सऊदी अरब के बीच फंसा
अल जज़ीरा मे आबिद हुसैन की रिपोर्ट है कि ईरान युद्ध की लपटें अब पाकिस्तान की दहलीज तक पहुँच गई हैं, जिससे इस्लामाबाद एक गंभीर कूटनीतिक संकट में फंस गया है. एक तरफ उसका 900 किलोमीटर लंबा पड़ोसी ईरान है, और दूसरी तरफ उसका पुराना रणनीतिक साझेदार सऊदी अरब. अमेरिकी और इज़राइली हमलों में ईरानी सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद पाकिस्तान में शिया समुदाय द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जिसमें अब तक 23 लोग मारे गए हैं और गिलगित-बाल्टिस्तान में कर्फ्यू लगाना पड़ा है.
पाकिस्तान की सबसे बड़ी दुविधा 2025 में सऊदी अरब के साथ हुआ ‘म्यूचुअल डिफेंस पैक्ट’ (रक्षा समझौता) है. इस समझौते के तहत, अगर सऊदी अरब पर कोई हमला होता है, तो पाकिस्तान को उसकी रक्षा करनी होगी. जैसे ही ईरान ने सऊदी अरब पर जवाबी मिसाइल हमले किए, रियाद ने पाकिस्तान की तरफ देखना शुरू कर दिया है.
कूटनीतिक दौड़-भाग: पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने रियाद और तेहरान के बीच “शटल डिप्लोमेसी” की. उन्होंने ईरान को याद दिलाया कि पाकिस्तान सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.
सैनिक समीकरण: 6 मार्च को सऊदी अरब ने तीन ईरानी मिसाइलें इंटरसेप्ट कीं. इसके तुरंत बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर रियाद पहुँच गए.
घरेलू खतरा: जानकारों का कहना है कि अगर पाकिस्तान सऊदी अरब के पक्ष में युद्ध में कूदता है, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. पाकिस्तान के भीतर सक्रिय ‘ज़ैनबियून ब्रिगेड’ (ईरान समर्थित लड़ाके) देश में गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा कर सकते हैं. बलूचिस्तान पहले से ही अशांत है.
विश्लेषकों का मानना है कि इस्लामाबाद के लिए अब “तटस्थ” रहना मुश्किल होता जा रहा है. किंग फैसल सेंटर के उमर करीम चेतावनी देते हैं कि “शायद यह आखिरी बार है जब सऊदी अरब पाकिस्तान को परख रहा है. अगर इस बार पाकिस्तान ने साथ नहीं दिया, तो रिश्ते हमेशा के लिए टूट जाएंगे.” फिलहाल, पाकिस्तान अपनी वायु रक्षा प्रणाली के ज़रिए सऊदी अरब की मदद करने पर विचार कर सकता है, लेकिन सीधे तौर पर ईरान पर हमला करना उसके लिए आत्मघाती होगा.
ट्रंप और उनके सलाहकार ‘जीत की बीमारी’ से ग्रस्त, रणनीति के मामले में नाकाबिल
टॉम निकोल्स ने ‘द अटलांटिक’ में लिखा है कि ईरान युद्ध ने दो बातें साफ कर दी हैं. पहली यह कि अमेरिका के पास दुनिया की सबसे प्रोफेशनल और ताकतवर सेना है, जो किसी भी मिशन को अंजाम देने में सक्षम है. दूसरी सच्चाई यह है कि जब रणनीति की बात आती है, तो ट्रम्प प्रशासन पूरी तरह नाकाबिल है.
रणनीति का मतलब होता है देश की ताकत, खासकर मिलिट्री फोर्स का इस्तेमाल करके राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करना. लेकिन ट्रम्प और उनकी टीम ने इस युद्ध का कोई एक साफ मकसद नहीं बताया है. वे रोज नए-नए लक्ष्य बता रहे हैं. इसका नतीजा यह है कि बेहतरीन मिलिट्री ऑपरेशन्स तो हो रहे हैं, लेकिन उनका कोई रणनीतिक आधार नहीं है.
इससे भी बुरा यह है कि ट्रम्प मिलिट्री की सफलता को ही रणनीति मान बैठे हैं. वे बमबारी और हमलों से इतने खुश हैं कि अब उनका मकसद ‘ईरानी शासन को पूरी तरह खत्म करना’ और ‘मेक ईरान ग्रेट अगेन’ हो गया है. इसे इतिहास में ‘विक्ट्री डिजीज’ कहा गया है—जब शुरुआती जीत नेताओं को अंधी दौड़ में डाल देती है और अंत में वे बड़ी मुसीबत में फंस जाते हैं. ऐसा नेपोलियन, हिटलर और वियतनाम युद्ध में अमेरिका के साथ हो चुका है.
1991 के गल्फ वॉर में जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश ने इस बीमारी से खुद को बचाया था, लेकिन उनके बेटे जॉर्ज डब्ल्यू. बुश इराक और अफगानिस्तान में फंस गए. अब ट्रम्प को भी यही बीमारी लग गई है. वे वेनेजुएला और सीरिया के छोटे ऑपरेशन्स की सफलता को देखकर मान बैठे हैं कि ईरान में भी आसानी से जीत जाएंगे. उन्होंने अब ‘बिना शर्त सरेंडर’ की मांग कर दी है, लेकिन जीत का मतलब क्या है, यह किसी को नहीं पता.
अमेरिकी और इजराइली सेना ने ईरान के आसमान और समुद्र पर लगभग पूरा कब्जा कर लिया है. हालांकि, कुवैत में एक हमले में 6 अमेरिकी सैनिक मारे गए और एक अमेरिकी हमले में गलती से ईरानी स्कूल के बच्चे भी मारे गए. फिर भी, ऑपरेशनल लेवल पर अमेरिकी सेना का काम शानदार रहा है. लेकिन सवाल वही है—इस युद्ध का मकसद क्या है और यह कब खत्म होगा?
ट्रम्प इन सवालों को टालते हुए कहते हैं, “मिलिट्री का प्रदर्शन देखो, 10 में से 15 नंबर.” लेकिन सिर्फ तबाही मचाना रणनीति नहीं होती. ‘बिना शर्त सरेंडर’ का मतलब है ईरान पर कब्जा करना, जिसके लिए ट्रम्प प्रशासन तैयार नहीं दिखता. व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने बाद में ट्रम्प के बयान को हल्का करने की कोशिश भी की.
ट्रम्प की टीम ने युद्ध के लिए अब तक 10 अलग-अलग वजहें बताई हैं—कभी ‘खतरा’, कभी ‘न्यूक्लियर हथियार’, तो कभी ‘ईश्वर की मर्जी’. यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि उनके पास कोई एक ठोस वजह नहीं है और जनता इस युद्ध के खिलाफ है. अगर संसाधन कम होते तो शायद ट्रम्प को सोच-समझकर फैसला लेना पड़ता, लेकिन अमेरिकी सेना की ताकत उन्हें लापरवाह बना रही है.
‘विक्ट्री डिजीज’ का सबसे बड़ा खतरा यह है कि ट्रम्प अब खुद को महान रणनीतिकार समझने लगे हैं और क्यूबा सरकार को गिराने की बातें भी कर रहे हैं. जबकि घर में आतंकी हमलों का खतरा बढ़ रहा है. फिलहाल अमेरिकी जनता सिर्फ अपनी सेना की बहादुरी की तारीफ कर सकती है और उम्मीद कर सकती है कि कभी न कभी ‘जीत’ मिलेगी—भले ही वह जीत क्या है, किसी को नहीं पता.
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता नए सिरे से शुरू; अब 3-4 महीनों में समझौते की उम्मीद
‘बिजनेस लाइन’ में पूर्णिमा जोशी की रिपोर्ट है कि प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के लिए मार्च की समय-सीमा को टाल दिया जाएगा. अब स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करने और समझौते को अंतिम रूप देने में तीन से चार महीने और लग सकते हैं. यह कदम अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (आईईईपीए) के तहत लगाए गए शुल्कों (टैरिफ) को रद्द करने के बाद उठाया गया है.
अधिकारी ने बताया कि अदालत के इस फैसले ने बातचीत में एक ठहराव (पॉज़) पैदा कर दिया है, लेकिन भारत इस बात पर कड़ी नजर रखेगा कि अतिरिक्त शुल्क लगाने के लिए अमेरिकी प्रशासन अब किन माध्यमों या उपकरणों का उपयोग करता है. सूत्र ने कहा, “हमें देखना होगा कि वे किन प्रावधानों का इस्तेमाल करते हैं. यदि वे किसी अन्य प्रावधान का उपयोग करते हैं, तो हम आकलन करेंगे कि क्या यह समझौता अभी भी सार्थक है. इसमें तीन से चार महीने लगेंगे.”
अधिकारी के मुताबिक, अदालत के इस फैसले ने पिछले दौर की वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में शामिल ‘समीक्षा खंड’ (रिव्यू क्लॉज़) को प्रभावी रूप से सक्रिय कर दिया है. इससे दोनों पक्षों को परिस्थितियाँ बदलने पर शर्तों पर दोबारा विचार करने की अनुमति मिल गई है. भारत-अमेरिका संयुक्त बयान का खंड 8 वही समीक्षा खंड है, जो स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि परिस्थितियाँ बदलती हैं, तो यह सुनिश्चित करने के लिए समझौते पर दोबारा काम किया जाएगा कि दोनों पक्षों के बीच संतुलन बना रहे.
सूत्र ने आगे कहा, “व्यापार समझौते तरजीही व्यवहार के बारे में होते हैं. एक बार जब टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया गया, तो हमारे पास समझौते में बदलाव करने का अवसर आ गया.”
डिटेंशन सेंटर भेजी गई बांग्लादेशी महिला को सीएएए के तहत मिली भारतीय नागरिकता
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ असम के कछार जिले में 59 वर्षीय दीपाली दास को नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएएए) के तहत भारतीय नागरिकता मिल गई है. वह असम की पहली ऐसी महिला हैं जिन्हें पहले विदेशी घोषित किया गया था, डिटेंशन सेंटर में रखा गया था और बाद में ज़मानत पर रिहा होने के बाद सीएएए के तहत नागरिकता दी गई.
दीपाली दास धोलाई विधानसभा क्षेत्र के हवाइथांग इलाके की रहने वाली हैं. फरवरी 2019 में विदेशी न्यायाधिकरण ने उन्हें अवैध प्रवासी घोषित किया था. इसके बाद दो साल तक सिलचर डिटेंशन सेंटर में क़ैद रहीं. बाद में 17 मई 2021 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें ज़मानत पर रिहा किया गया.
दीपाली दास मूल रूप से बांग्लादेश के सिलहट जिले के धिराई थाना क्षेत्र के डिप्पुर गांव की निवासी थीं. इसके बाद वह अपने पति के साथ 1988 में भारत आ गई और असम के कछार जिले में रहने लगी.2013 में पुलिस ने उनकी नागरिकता की जांच शुरू की और 2 जुलाई 2013 को चार्जशीट दाखिल की, जिसमें कहा गया कि दीपाली दास बांग्लादेश की निवासी हैं और मार्च 1971 के बाद अवैध रूप से भारत आई थीं. बाद में यही चार्जशीट उनके सीएएए आवेदन में महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गई, क्योंकि इस कानून के तहत आवेदन करने के लिए यह दिखाना ज़रूरी होता है कि व्यक्ति बांग्लादेश, पाकिस्तान या अफगानिस्तान से आया है.
पश्चिम बंगाल में एसआईआर पर काम करने वाली का परिवार भी ‘अंडर एडजुडिकेशन’
कोलकाता के बेनियापुकुर इलाके की एक बूथ लेवल अधिकारी, जिन्होंने मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में काम किया था, अब खुद अपने परिवार के साथ ‘अंडर एडजुडिकेशन’ श्रेणी में आ गई हैं. द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक़ 28 फरवरी को जारी नई मतदाता सूची में समीना हसन और उनके परिवार के चारों सदस्यों के नाम भी इसी श्रेणी में डाल दिए गए हैं. समीना हसन बालीगंज विधानसभा क्षेत्र के एक हिस्से की बीएलओ हैं.
परिवार में राशिद हसन (67), सरवत हसन (57), उनकी बेटी समीना हसन (40) और बेटा राशद हसन (38) शामिल हैं. परिवार के अनुसार उनके माता-पिता राशिद और सरवत हसन के नाम 2002 की मतदाता सूची में मौजूद थे. इस साल फॉर्म भरते समय बच्चों ने पिता के नाम के आधार पर मैपिंग की थी. सुनवाई के लिए नोटिस मिलने पर परिवार ने ज़रूरी दस्तावेज़ भी जमा किए. राशद और उनके पिता ने पासपोर्ट, जबकि उनकी मां और बहन ने बोर्ड परीक्षा के एडमिट कार्ड जमा किए. साथ ही 2002 की मतदाता सूची का रिकॉर्ड भी दिया गया जिसमें माता-पिता के नाम दर्ज थे.
जब स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन शुरू हुआ था तब समीना के हिस्से में करीब 1,200 मतदाता थे और वह कई दिनों तक आधी रात तक काम करती थीं. इसके बावजूद अब पूरा परिवार ही “अंडर एडजुडिकेशन” में डाल दिया गया है.
विश्लेषण
अरुण श्रीवास्तव: मोदी की कमज़ोर होती छवि, भारत की गिरती हुई साख़
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘विश्वगुरु’ वाली छवि अब हकीकत में कमजोर होती दिख रही है. काउंटर करंट्स में अरुण श्रीवास्तव द्वारा लिखे गए आर्टिकल में कहा गया है कि भारत की संप्रभुता को अमेरिका के सामने चुनौती मिल रही है और कई भारतीय इस बात से शर्मिंदा हैं कि मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं कर सके. जब ट्रम्प ने ईरान पर हमला किया, जिससे पूरा मिडिल ईस्ट हिल गया, तो मोदी ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई, जबकि छोटे अरब देशों ने भी सवाल उठाए थे.
पहली बार अमेरिका ने भारत को शर्तों के साथ रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन की छूट दी. लेखक इसे एक तरह की ‘दया’ बताते हैं. ट्रम्प ने ऐसा भारत के लिए नहीं, बल्कि ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतें स्थिर रखने के लिए किया था. मोदी ने इसे चुपचाप स्वीकार कर लिया.
इस चुप्पी की वजह वैचारिक समानता बताई गई है. आर्टिकल के मुताबिक, मोदी की हिंदुत्व की राजनीति और अमेरिका की राइट-विंग राजनीति में काफी मेल है. आलोचक मानते हैं कि इस झुकाव ने भारत को रणनीतिक रूप से अमेरिका पर निर्भर बना दिया है. 25-26 फरवरी को मोदी के इजराइल दौरे के दौरान ही नेतन्याहू ने उन्हें स्थिति की जानकारी दे दी थी, और इसके तुरंत बाद अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर हमला कर दिया.
लेखक का आरोप है कि मोदी सरकार ने ईरान के साथ भारत के हजारों साल पुराने रिश्तों को छोड़ दिया है और पूरी तरह से इजराइल और अमेरिका के खेमे में चली गई है. भारत अब इजराइल के हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है. स्थिति यहां तक पहुंच गई कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई की मौत पर मोदी ने सार्वजनिक रूप से शोक भी नहीं जताया. काफी आलोचना के बाद 5 मार्च को विदेश सचिव ने औपचारिकता पूरी की.
एक और गंभीर घटना यह हुई कि ईरानी जहाज ‘आईआरईएस देना’, जो एक भारतीय नौसेना कार्यक्रम में शामिल हुआ था, उसे श्रीलंका के पास अमेरिकी टारपीडो ने डुबो दिया. खुद को हिंद महासागर का ‘गार्डियन’ कहने वाला भारत इस पर भी खामोश रहा. सोनिया गांधी ने इस पर कहा है कि “इस मामले में चुप्पी का मतलब है कि हम निष्पक्ष नहीं हैं.” देश के अंदर सरकार ने सुरक्षा बढ़ा दी है और इजराइल-अमेरिका के दूतावासों के पास सख्ती कर दी है. आर्टिकल के अंत में एपस्टीन फाइलों में मोदी के संदर्भ और मंत्री हरदीप पुरी की मुलाकातों का भी जिक्र है, जिसने विवाद को और हवा दी है. लेखक का निष्कर्ष है कि भारत ने अपनी पारंपरिक संतुलित कूटनीति खो दी है.
महिला दिवस 2026
खेती में बड़ी भूमिका के बावजूद महिलाओं को किसान का दर्जा, ज़मीन के अधिकार अब भी नहीं
8 मार्च 2026 को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाएगा. इतने साल बाद भी औरतें और लड़कियां समान अधिकार और न्याय की मांग उठा रही हैं. इस साल का विषय खास है क्योंकि 2026 को “अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष” के रूप में भी मनाया जा रहा है. भारत के पस मंज़र में देखें तो कृषि क्षेत्र में भारतीय महिलाओं की स्थिति में अब भी बहुत ज़्यादा सुधार नहीं हुआ है. यह रिपोर्ट द हिन्दू में प्रकाशित हुई है.
ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर खेती की ज़मीन और संपत्ति पुरुषों के नाम पर दर्ज होती है. सामाजिक परंपराएं, पितृसत्तात्मक निज़ाम, कानूनी जानकारी की कमी और प्रशासनिक समस्याओं के कारण महिलाओं का नाम ज़मीन के रिकॉर्ड में अक्सर नहीं जुड़ पाता. कई बार वही महिलाएं खेती का पूरा काम संभालती हैं, जैसे बीज बोना, खाद तैयार करना और मज़दूरों का काम देखना. लेकिन इसके बावजूद उनके पास ज़मीन का कानूनी मालिकाना हक नहीं होता.
किसान के रूप में औपचारिक पहचान न होने के कारण महिलाओं को बैंक ऋण, फसल बीमा, सिंचाई योजनाएं, कृषि प्रशिक्षण, नई तकनीक और कई सरकारी योजनाओं तक पहुंचने में कठिनाई होती है. क्योंकि अधिकतर योजनाओं में पात्रता ज़मीन के मालिक होने से जुड़ी होती है, इसलिए महिलाएं इनसे बाहर रह जाती हैं.
महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए चार प्रमुख कदम ज़रूरी हैं. पहला, महिलाओं को कानून, डेटा और नीतियों में स्पष्ट रूप से किसान के रूप में मान्यता दी जाए. इसके लिए कृषि से जुड़े आंकड़ों में महिलाओं की भागीदारी का अलग रिकॉर्ड होना चाहिए. राष्ट्रीय किसान नीति के अनुसार किसान की पहचान केवल ज़मीन के मालिक से नहीं बल्कि खेती से जुड़े काम से होनी चाहिए, ताकि बटाईदार, खेत मजदूर, आदिवासी और वन उत्पाद इकट्ठा करने वाली महिलाएं भी किसान मानी जाएं. दूसरा, महिलाओं को पानी, ऋण और खेती के उपकरणों तक बराबर अधिकार दिया जाए. इसके लिए संपत्ति में बराबर विरासत के कानून लागू करना, पति-पत्नी के संयुक्त नाम से ज़मीन पंजीकरण को बढ़ावा देना और ज़मीन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को महिलाओं के लिए आसान बनाना जरूरी है.
तीसरा, खाद्य प्रणाली और सरकारी योजनाओं को पोषण के लक्ष्य से जोड़ा जाए. सरकारी खरीद और कृषि समर्थन नीतियों में दाल, मोटे अनाज, फल और सब्जियों की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और इन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आंगनवाड़ी और स्कूल मिड-डे मील में शामिल किया जाना चाहिए. चौथा, महिलाओं को नई कृषि तकनीक, प्रशिक्षण और विस्तार सेवाओं तक समान पहुंच मिलनी चाहिए. जब महिलाओं को ज्ञान, अधिकार और संस्थागत समर्थन मिलता है, तो वे जलवायु-अनुकूल, जैव विविधता वाली और पोषण-केंद्रित खेती को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
‘जीटीआरआई’ की रिपोर्ट: पश्चिम एशिया संघर्ष से भारत के $11.8 बिलियन के कृषि निर्यात को खतरा
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (जीटीआरआई) की शनिवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में भारत का लगभग 11.8 बिलियन डॉलर का कृषि और खाद्य निर्यात प्रभावित हो सकता है. क्षेत्र में जारी संघर्ष के कारण समुद्री रास्ते बाधित हो रहे हैं और बीमा लागत में वृद्धि हो रही है.
‘पीटीआई और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक, 2025 में, भारत ने पश्चिम एशिया को लगभग 11.8 बिलियन डॉलर मूल्य के अनाज, फल, सब्जियां, डेयरी उत्पाद और मसाले निर्यात किए. भारत के कुल कृषि और खाद्य निर्यात में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 21.8 प्रतिशत रही.
थिंक टैंक ‘जीटीआरआई’ ने कहा, “खाड़ी क्षेत्र की भौगोलिक निकटता और वहां रहने वाली बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासियों ने ऐतिहासिक रूप से इसे भारत के खाद्य निर्यात के लिए एक स्वाभाविक बाजार बनाया है. हालांकि, क्षेत्र में संघर्ष शिपिंग मार्गों को बाधित कर रहा है, बीमा लागत बढ़ा रहा है और लॉजिस्टिक्स (माल ढुलाई) में अनिश्चितता पैदा कर रहा है.”
आंकड़े भारतीय निर्यातकों के लिए इस क्षेत्र के महत्व को दर्शाते हैं. भारत ने 2025 में पश्चिम एशिया को 7.48 बिलियन डॉलर मूल्य के अनाज, फल, सब्जियां और मसाले भेजे. इस श्रेणी में भारत के वैश्विक निर्यात का 29.2 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है.
निर्यात किए जाने वाले प्रमुख उत्पादों में चावल, केले, प्याज, सब्जियां, दलहन (दालें), मेवे, कॉफी, चाय और मसालों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है.
‘जीटीआरआई’ के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा, “चावल पर सबसे बड़ा संभावित प्रभाव पड़ सकता है. भारत ने पश्चिम एशिया को 4.43 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के चावल का निर्यात किया, जो इसके कुल वैश्विक चावल निर्यात का 36.7 प्रतिशत है. यह खाड़ी के बाजारों को पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के उत्पादकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है.”
श्रीवास्तव ने कहा, “लेकिन पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष, शिपिंग मार्गों में व्यवधान और बढ़ती बीमा लागत के साथ, अब निर्यातकों के लिए अनिश्चितता पैदा कर रहा है और यह कई भारतीय राज्यों के किसानों और खाद्य प्रसंस्करणकर्ताओं को सीधे प्रभावित कर सकता है.”
अपील :
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