09/01/2026: अमेरिका से डील न होने का ठीकरा मोदी पर | ट्रंप - मोदी में फर्क पर श्रवण गर्ग | ममता, टीएमसी ईडी के खिलाफ़ सड़क पर | मणिपुर पर इकोनॉमिस्ट | ‘एआई’ वॉइस-क्लोनिंग फ्रॉड | ईरान में आंदोलन
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
अमेरिका ने कहा भारत के साथ व्यापार समझौता न होने के लिए पीएम मोदी का सही समय पर फोन न करना जिम्मेदार.
पश्चिम बंगाल में ईडी और टीएमसी के बीच आर पार की लड़ाई ममता बनर्जी ने खुद रेड में हस्तक्षेप किया.
ट्रंप की वापसी और भारत के लिए 2026 की कूटनीतिक चुनौतियां प्रवीण साहनी का विश्लेषण.
मणिपुर में तीन साल बाद भी हालात तनावपूर्ण द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट में सरकार की विफलताओं का जिक्र.
इंदौर में एआई का इस्तेमाल कर ठगी का पहला मामला पुलिस अधिकारी की आवाज क्लोन कर उड़ाए पैसे.
ईरान में महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हिंसक हुए तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग.
अमेरिका ने भारत के साथ ‘डील’ न होने का ठीकरा मोदी पर फोड़ा, फ़ोन समय रहते करते तो हो जाती
अमेरिका के नवनिर्वाचित प्रशासन और भारत के बीच कूटनीतिक संबंधों को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है. द टेलीग्राफ और द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक ने दावा किया है कि भारत और अमेरिका के बीच एक बड़ा व्यापार समझौता लगभग तय हो चुका था, लेकिन यह अंतिम रूप नहीं ले सका क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सही समय पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को फोन नहीं किया.
‘ऑल-इन’ नामक पॉडकास्ट पर बात करते हुए लटनिक ने कहा कि मैं आपको भारत के बारे में एक कहानी सुनाता हूँ. उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे नई दिल्ली ने तब फैसला नहीं लिया जब “लोहा गर्म था” . लटनिक ने समझाया कि ट्रम्प प्रशासन में सौदे “सीढ़ियों” की तरह होते हैं—जो पहली सीढ़ी पर आता है, उसे सबसे बेहतरीन डील मिलती है. लटनिक ने कहा, “हमने यूके के साथ पहली डील की और उन्हें बताया कि ट्रेन स्टेशन से छूटने वाली है. अगर कोई और पहले आ गया, तो वे पहले होंगे.”
लटनिक के अनुसार, ट्रम्प सार्वजनिक रूप से बार-बार भारत का नाम ले रहे थे. अमेरिकी प्रशासन ने भारत से स्पष्ट कहा था, “आपके पास तीन शुक्रवार हैं . इसे पूरा करना होगा.” लटनिक ने दावा किया कि सौदा पूरी तरह से तैयार था और उन्हें बस इतना चाहिए था कि पीएम मोदी राष्ट्रपति ट्रम्प को फोन करें. लेकिन, लटनिक के शब्दों में, “वे (भारत) ऐसा करने में असहज थे, इसलिए मोदी ने फोन नहीं किया.”
परिणामस्वरूप, वह समय सीमा निकल गई और अमेरिका ने इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम के साथ व्यापार समझौतों की घोषणा कर दी. लटनिक ने “सीसॉ” (बच्चों का झूला) का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत “सीसॉ की गलत साइड” पर रह गया. जब भारत ने तीन हफ्ते बाद संपर्क किया और कहा कि वे तैयार हैं, तो लटनिक ने जवाब दिया, “किस लिए तैयार हैं? वह ट्रेन तो तीन हफ्ते पहले ही स्टेशन से निकल चुकी है.”
हालाँकि, भारत सरकार ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है. विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिकी अधिकारी का यह बयान और वार्ताओं का चित्रण “सटीक नहीं” है. उन्होंने स्पष्ट किया कि पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच 2025 में ही 8 बार फोन पर बात हो चुकी है और भारत अभी भी एक पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौते के लिए इच्छुक है.
इस मुद्दे पर राजनीति भी तेज हो गई है. कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने बॉलीवुड गीतों का सहारा लेते हुए पीएम मोदी पर तंज कसा. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “हग हग न रहा, पोस्ट पोस्ट न रहा” और “क्या से क्या हो गया बेवफा तेरी दोस्ती में.” यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब ट्रम्प ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर “बहुत तेजी से” टैरिफ बढ़ाने की धमकी दी है और वरिष्ठ अमेरिकी सलाहकार पीटर नवारो ने रूस-यूक्रेन युद्ध को “मोदी का युद्ध” तक कह दिया है.
हरकारा डीप डाइव
श्रवण गर्ग: ट्रंप का अहंकार, मोदी का अपमान, इसकी क़ीमत कौन चुकाएगा
कभी नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की दोस्ती वैश्विक मंच पर चर्चा का विषय थी. ‘हाउडी मोदी’ और ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ जैसे नारे इस रिश्ते की पहचान थे. लेकिन आज हालात बिल्कुल इसके बरक्स नज़र आ रहे हैं. ट्रम्प और मोदी के दोस्ती भरा यह रिश्ता दिन ब दिन फीका पड़ रहा है. जहाँ ट्रम्प ट्रंप खुले मंचों से मोदी का अपमान कर रहे हैं और वहीं मोदी की विदेश मंत्रालय इस अपमान का घूँट ले रही है.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में श्रवण गर्ग बताते हैं कि यह टकराव केवल व्यक्तिगत नहीं है. रूस से तेल खरीद, ‘ब्रिक्स’ (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) का उभार, डॉलर की घटती पकड़ और वैश्विक दक्षिण की राजनीति इसके मूल में है. ट्रंप ब्रिक्स को अमेरिकी प्रभुत्व के लिए ख़तरे के रूप में देखते हैं और भारत पर दबाव उसी रणनीति का हिस्सा है.
बातचीत में यह भी साफ होता है कि ट्रंप और मोदी दिखने में भले समान लगें, लेकिन सत्ता का इस्तेमाल करने का उनका तरीक़ा अलग है. ट्रंप आवेगी और सार्वजनिक प्रतिक्रिया देते हैं, जबकि मोदी चुप रहकर लंबी चाल चलते हैं. यह चुप्पी झुकने का संकेत नहीं, बल्कि तीन साल तक हालात को झेलने की रणनीति मानी जा रही है.
लेकिन इस रणनीति की क़ीमत देश चुकाएगा. टैरिफ, वीज़ा पाबंदियां और व्यापारिक दबाव का असर किसानों, उद्योगों और आम नागरिकों पर पड़ेगा. सवाल यह नहीं कि ट्रंप और मोदी कौन जीतेंगे, सवाल यह है कि इस टकराव में भारत को कितना नुक़सान उठाना पड़ेगा. यह बातचीत भारत की विदेश नीति को नए सिरे से समझने का अवसर देती है, जहां राष्ट्रवाद, अहंकार और वैश्विक राजनीति आपस में टकरा रहे हैं. पूरा इंटरव्यू हरकारा के यूट्यूब चैनल पर दस्तियाब है.
विश्लेषण
प्रवीण साहनी : 2026 में भारत की सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका से निपटना होगी
साल 2026 में भारत के लिए विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका होगा, जो 2025 की तुलना में कहीं अधिक कठिन साबित होने वाला है. यह स्थिति तब है जब भारत के पास एक ऐसा रणनीतिक विकल्प मौजूद था जिससे अमेरिका खुद उसे लुभाने की कोशिश करता, न कि आज की तरह दयनीय स्थिति होती जहाँ राष्ट्रपति ट्रम्प खुलेआम प्रधानमंत्री मोदी का मजाक उड़ा रहे हैं. ट्रम्प ऐसा लगातार तब से कर रहे हैं जब से भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में युद्धविराम का श्रेय उन्हें देने से इनकार कर दिया था.
भारत के पास वह रणनीतिक विकल्प यह है कि वह चीन के साथ अपने संबंधों को सामान्य करके अमेरिका पर पासा पलट दे. इससे रूस-भारत-चीन का वह प्रारूप मजबूत होगा जो आगे चलकर ब्रिक्स में तब्दील हुआ. ट्रम्प को इसी से डर लगता है क्योंकि इसमें दुनिया की रिजर्व करेंसी के रूप में अमेरिकी डॉलर को विस्थापित (रिप्लेस नहीं) करने की क्षमता है. जरा याद कीजिए 1 सितंबर 2025 को तियानजिन (चीन) में एससीओ (शंघाई सहयोग संगठन) शिखर सम्मेलन के दौरान ली गई वह मशहूर तस्वीर जिसमें तीनों नेता—पुतिन, शी जिनपिंग और मोदी—मुस्कुरा रहे थे. उस तस्वीर ने वॉशिंगटन डीसी में हड़कंप मचा दिया था और कई अमेरिकी सीनेटरों ने ट्रम्प प्रशासन को दोषी ठहराया था कि उन्होंने भारत को चीन के हाथों खो दिया है.
लेकिन भारत को ऐसा करने के लिए सिर्फ साहस और बुद्धिमत्ता से ज्यादा कुछ और चाहिए, जो अपने आप में एक चुनौती है. इसके लिए ‘बौद्धिक ईमानदारी’ की जरूरत है—यह स्वीकार करने की कि आज की बहुध्रुवीय दुनिया में चीन एक बड़ी ताकत है. बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में दिखाई देने वाला उसका भू-आर्थिक और तकनीकी उदय न तो रोका जा सकता है और न ही उसकी बराबरी की जा सकती है. इसे देखते हुए, दक्षिण एशिया में (जहाँ भूटान को छोड़कर सभी देश बीआरआई में शामिल हो चुके हैं) चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय, भारत के लिए उसके साथ मिलकर काम करना ज्यादा फायदेमंद होगा. बेशक, ऐसा नहीं होगा क्योंकि अपनी ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ के चलते भारत किसी भी कीमत पर अमेरिकी नेतृत्व के साथ फोटो खिंचवाना पसंद करेगा.
और इसकी कीमत बहुत बड़ी रही है. यह जानते हुए कि अमेरिका वैश्विक सैन्य प्रभुत्व को बनाए नहीं रख सकता, ट्रम्प ने खुद को ‘शांति का राष्ट्रपति’ बताते हुए अपने पहले साल में ही पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में चीन के साथ सुरक्षा प्रतिस्पर्धा को कम करने और क्वाड का दर्जा घटाने का फैसला किया. इससे हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के खिलाफ अमेरिका की ‘सैन्य ढाल’ के रूप में भारत की रणनीतिक भूमिका छिन गई. दिलचस्प बात यह है कि यह भूमिका औपचारिक रूप से भारत को पहले ट्रम्प प्रशासन ने ही मई 2018 में दी थी, जब उन्होंने भारत को केंद्र में रखने के लिए यूएस पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड कर दिया था.
अब, ट्रम्प, जो एक मनमौजी राष्ट्रपति हैं, बहुत ज्यादा बोलते हैं और अपनी बातें किसी से भी साझा कर देते हैं जो सुनने को तैयार हो. 20 जनवरी 2025 को अपने उद्घाटन के बाद से ही ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को लेने, कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने जैसी बातें शुरू कर दी थीं. समझदारी इसी में थी कि मोदी सरकार थोड़ा इंतजार करती और उनकी विदेश नीति की प्राथमिकताओं को समझती. लेकिन ट्रम्प को खुश करने वालों में सबसे आगे रहने की होड़ में, मोदी ने व्हाइट हाउस की अपनी पहली यात्रा पर 13 फरवरी 2025 को एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसने अमेरिका को उसकी उम्मीद से कहीं ज्यादा दे दिया.
भारत ने मौजूदा द्विपक्षीय व्यापार को 132 अरब डॉलर (2024-25) से बढ़ाकर 2030 तक 500 अरब डॉलर करने का वादा किया. इसके साथ ही भारत ने ऊर्जा (परमाणु सहित), सैन्य उपकरण, ग्रीन और बड़ी टेक्नोलॉजी (एआई इंफ्रास्ट्रक्चर) खरीदने और अंतरिक्ष सहयोग पर सहमति जताई. इतना ही नहीं, भारत ने 31 अक्टूबर 2025 को अमेरिका के साथ 10-वर्षीय रक्षा ढांचे को 2035 तक के लिए नवीनीकृत किया. यह सब ट्रम्प की विदेश नीति ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) के प्रति भारत की पूर्ण प्रतिबद्धता दिखाने के लिए किया गया. जबकि यह एक भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है कि अमेरिका फिर से महाशक्ति बन सकता है.
अब जब भारत के पास खेलने के लिए कोई पत्ता नहीं बचा है, तो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के साथ मोदी सरकार की अमेरिका से जुड़ी समस्याएं शुरू हो गईं. ट्रम्प इस बात से बेहद नाराज थे कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में उन्हें शांतिदूत की भूमिका का श्रेय नहीं दिया. दिलचस्प बात यह है कि ट्रम्प के दावे के समर्थन में पर्याप्त सबूत मौजूद हैं. उदाहरण के लिए, उन्होंने 10 मई 2025 को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा था कि भारत और पाकिस्तान ‘पूर्ण और तत्काल युद्धविराम’ पर सहमत हो गए हैं. उसी शाम भारत ने इसकी पुष्टि भी की थी. फिर, ‘द हिंदू’ अखबार ने 7 जनवरी 2026 को रिपोर्ट दी कि भारतीय दूतावास ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर मीडिया कवरेज पर चर्चा करने के लिए 10 मई को शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों के साथ बैठकें तय करने हेतु एक अमेरिकी लॉबी फर्म को हायर किया था.
ट्रम्प को शांत करने के बजाय, भारत की हरकतों ने उन्हें और भड़का दिया, जिससे उन्होंने सार्वजनिक रूप से 60 से अधिक बार कहा कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध को खत्म करवाया. मोदी पर ट्रम्प का हमला लगातार जारी है. उन्होंने हाल ही में कहा कि भारत ने रूस से तेल की खरीद कम कर दी है क्योंकि मोदी जानते हैं कि उन्हें (ट्रंप को) खुश रखना जरूरी है.
एक तरफ, मोदी को नीचा दिखाने वाले ट्रम्प के ऐसे बयान भारत को अस्वीकार्य होने चाहिए. दूसरी तरफ, मोदी के लिए ट्रम्प से व्यक्तिगत रूप से मिलना मुश्किल होगा क्योंकि वे उनके मुंह पर भी उनकी बेइज्जती कर सकते हैं. इस राजनीतिक कड़वाहट को देखते हुए, दोनों देशों के बीच पहले की तरह सामान्य कामकाज जारी रखना मुश्किल होगा.
भारत की चिंता बढ़ाने के लिए, ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रम्प ने पाकिस्तान को मध्य पूर्व में एक रणनीतिक भूमिका दे दी है ताकि वह ईरान (जिसे अमेरिका अपना मुख्य दुश्मन मानता है) पर अपने आकलन साझा कर सके.
बहुध्रुवीय दुनिया भारत को जो विकल्प प्रदान करती है, उसके बावजूद मोदी सरकार अपनी पुरानी विदेश नीति की कैदी बनी हुई है और ट्रम्प के अहंकार को झेलने के लिए अभिशप्त है.
टीएमसी बनाम ईडी: दिल्ली में सांसदों का प्रदर्शन और कोलकाता में ममता की ‘रेड’ में एंट्री से हड़कंप
पश्चिम बंगाल चुनाव से ठीक पहले केंद्रीय जाँच एजेंसियों और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच टकराव अब आर-पार की लड़ाई में बदल गया है. शुक्रवार को दिल्ली और कोलकाता दोनों जगह भारी हंगामा देखने को मिला. टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में टीएमसी सांसदों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया. इस दौरान पुलिस ने डेरेक ओ’ब्रायन, महुआ मोइत्रा, कीर्ति आजाद और अन्य सांसदों को हिरासत में ले लिया.
टीएमसी सांसदों का आरोप है कि भाजपा नीत केंद्र सरकार चुनाव जीतने के लिए ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) का दुरुपयोग कर रही है. महुआ मोइत्रा ने तीखा हमला बोलते हुए कहा, “कल पूरे भारत ने देखा कि कैसे गृह मंत्रालय द्वारा ईडी का दुरुपयोग किया गया. ईडी को हमारी पार्टी की राजनीतिक और रणनीतिक जानकारी चोरी करने के लिए भेजा गया था. ममता बनर्जी शेरनी हैं, उन्होंने पार्टी की संपत्ति की रक्षा की.”
यह प्रदर्शन कोलकाता में हुई उस नाटकीय घटना के बाद हुआ, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद राजनीतिक परामर्शदाता फर्म आई-पैक के साल्ट लेक ऑफिस और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के घर पहुँच गईं, जहाँ ईडी छापेमारी कर रही थी. ममता ने करीब चार घंटे तक वहां मौजूद रहकर अधिकारियों का सामना किया. उन्होंने आरोप लगाया कि एजेंसी चुनाव से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज जब्त करना चाहती थी. ममता वहां से एक हरे रंग का प्लास्टिक फोल्डर लेकर बाहर निकलीं और अमित शाह को “सबसे गंदा गृह मंत्री” करार दिया. उन्होंने कहा, “शरारती गृह मंत्री देश की रक्षा नहीं कर सकते, वे मेरे पार्टी के दस्तावेज छीन रहे हैं.”
“इंडियन” एक्सप्रेस के अनुसार, मामला अब कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गया है. ईडी ने याचिका दायर कर ममता बनर्जी, पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की है. एजेंसी का आरोप है कि सीएम और उनकी पार्टी के लोगों ने जांच में बाधा डाली, अधिकारियों को बंधक बनाया और सबूत (दस्तावेज और डिजिटल डिवाइस) छीन लिए. ईडी ने कोर्ट से मांग की है कि छीन गए दस्तावेजों को वापस दिलाया जाए और सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित की जाए. वहीं, टीएमसी और आई-पैक ने भी काउंटर याचिका दायर कर ईडी की कार्रवाई को “उत्पीड़न” और “अवैध” घोषित करने की मांग की है. ईडी का कहना है कि यह छापेमारी पुराने कोयला घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी थी, जबकि टीएमसी इसे चुनावी साजिश बता रही है. टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने ‘एक्स’ पर लिखा, “लोकतंत्र को दंडित किया जाता है. अपराधियों को पुरस्कृत किया जाता है. एजेंसियों को हथियार बनाया जाता है. चुनावों में हेरफेर किया जाता है. प्रदर्शनकारियों को जेल. बलात्कारियों को बेल (ज़मानत). यह भाजपा का ‘नया भारत’ है. भले ही देश के बाकी हिस्सों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया जाए, लेकिन बंगाल विरोध करेगा. हम पूरी ताकत लगाकर आपसे लड़ेंगे और आपको हराएंगे, चाहे आप कितनी भी शक्ति का प्रयोग क्यों न करें.
ईडी जब आई-पैक पर छापेमारी कर रही थी, नड्डा कोलकाता के होटल में बैठक ले रहे थे, तभी आईपीएस की एंट्री
कोयला तस्करी घोटाले में जब ईडी आई-पैक पर छापेमारी कर रही थी, तब भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा कोलकाता के साल्ट लेक के एक होटल में जिला अध्यक्षों, विभाग संयोजकों और प्रवासी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर रहे थे. नड्डा, आगामी विधानसभा चुनावों के लिए राज्य भाजपा की तैयारियों की समीक्षा करने हेतु गुरुवार को दो दिवसीय दौरे पर शहर पहुंचे थे. इस बीच अचानक, पश्चिम बंगाल पुलिस के उप महानिरीक्षक (सुरक्षा) सुमित कुमार होटल पहुंचे और गलियारे से होते हुए उस हॉल की ओर बढ़े जहां भाजपा की बैठक चल रही थी. हालांकि, वे जल्द ही वापस मुड़ गए और बाहर निकल गए. मीडिया द्वारा इस बारे में पूछे जाने पर कुमार ने कहा, “मैं यहां किसी को ढूंढ़ने आया था.” रजीब चौधरी के अनुसार, वहां मौजूद भाजपा नेता पुलिस अधिकारी की इस अचानक एंट्री और एग्जिट को देखकर उत्सुक और हैरान नजर आए.
शिवाजी पर विवादास्पद पुस्तक के लिए ओयूपी ने मांगी माफी
“पीटीआई” के अनुसार, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (ओयूपी) इंडिया ने छत्रपति शिवाजी महाराज के 13वें वंशज उदयनराजे भोसले से दो दशक से अधिक समय पहले प्रकाशित एक पुस्तक में महान मराठा राजा के बारे में दिए गए “असत्यापित बयानों” के लिए माफी मांगी है. ‘शिवाजी: हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया’ नामक यह पुस्तक अमेरिकी लेखक जेम्स लेन द्वारा लिखी गई थी और 2003 में प्रकाशित हुई थी. एक समाचार पत्र में जारी सार्वजनिक नोटिस में, ओयूपी ने स्वीकार किया कि पुस्तक के कुछ कथन ‘असत्यापित’ थे. जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई थी, तब संभाजी ब्रिगेड के 150 से अधिक कार्यकर्ताओं ने पुणे के प्रतिष्ठित ‘भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ में तोड़फोड़ की थी, यह दावा करते हुए कि संस्थान ने लेखक की मदद की थी.
मणिपुर संकट पर ‘द इकोनॉमिस्ट’ : 3 साल बाद भी कड़वाहट और बेचैनी
मणिपुर में तीन साल बाद भी विरोधी समूहों को एक-दूसरे से अलग रखने के लिए भारी सैन्य सुरक्षा की आवश्यकता पड़ रही है, जो विकास को बाधित कर रही है और सुलह को और अधिक कठिन बना रही है. “द इकोनॉमिस्ट” के ‘एसेंशियल इंडिया’ न्यूज़लेटर के अनुसार, हालांकि यह संकट भारत के कई लोगों को दूर का मामला लग सकता है, लेकिन यह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है. यह लेख मोदी सरकार के पिछले 11 वर्षों की प्रमुख विफलताओं को दर्शाता है: बढ़ती वैमनस्यता, खराब शासन, राजनीतिक नेतृत्व की अनुपस्थिति, कमजोर सुरक्षा, अपर्याप्त मानवीय राहत और भू-राजनीतिक चूक. इसके एक अंश को सुशांत सिंह ने “एक्स” पर साझा किया है, जिसमें लेखक ने कहा है-“ भारत दंगों के लिए कोई नया नहीं है—लेकिन बहुत कम दंगों का इतना स्थायी प्रभाव पड़ा है. लगभग तीन साल बाद भी, राज्य में कड़वाहट और बेचैनी व्याप्त है. म्यांमार की सीमा पर स्थित एक शहर, मोरे में, सड़कों पर जले हुए घरों के अवशेष दिखाई देते हैं. पूरे राज्य में आवाजाही प्रतिबंधित है. मैतेई और कुकी एक-दूसरे से अलग रहते हैं, जो ‘बफर जोन’ (मध्यवर्ती क्षेत्रों) द्वारा विभाजित हैं. राजधानी और मैतेई गढ़ इम्फाल से, मुख्य रूप से कुकी शहर चुराचांदपुर तक की यात्रा में पहले एक घंटा लगता था. अब, सैन्य चौकियों के कारण, इसमें उससे कहीं अधिक समय लगता है. सबसे बुरा यह है कि दसियों हज़ार लोग अभी भी शरणार्थी शिविरों में फंसे हुए हैं, अपने घरों से कटे हुए हैं जहाँ वे वापस नहीं लौट सकते.
ये शिविर गंदे और दयनीय स्थान हैं, लेकिन स्थितियों से ज्यादा वहां का मिजाज सबसे ज्यादा प्रभावित करता है. बहुत कम निवासी भविष्य को लेकर आशावादी हैं. आक्रोश चरम पर है. मैतेई शिविरों में, लोगों ने जोर देकर कहा कि कुकी समुदाय को उन सशस्त्र समूहों का समर्थन प्राप्त है जो कभी हथियार नहीं डालेंगे. कुकी शिविरों में, उन्होंने कहा कि सेना और स्वयं राज्य सरकार मैतेई लोगों का पक्ष ले रही है. हालांकि, दोनों एक बात पर सहमत थे: “कि फिर से एक साथ रहना बहुत कठिन होने वाला है.”
दिल्ली दंगा: शरजील इमाम ने अन्य आरोपियों से खुद को अलग करने की कोशिश की
दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट में अपनी दलील पेश करते हुए शरजील इमाम ने गुरुवार को खुद को उमर खालिद और दिल्ली दंगों की ‘बड़ी साजिश’ मामले के अन्य आरोपियों से अलग करने की कोशिश की. पिछले छह साल से जेल में बंद इमाम, जिन्हें सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया था, ने कहा कि अभियोजन पक्ष के अनुसार ही उन्होंने “विरोध की दिशा को देखते हुए” नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी आंदोलन छोड़ दिया था. “हिंदुस्तान टाइम्स” में अर्नबजीत सुर ने लिखा है कि इमाम के वकील ने अभियोजन पक्ष का हवाला देते हुए फिर से कहा कि सह-आरोपियों का मानना था कि वह विरोध प्रदर्शनों को ‘सांप्रदायिक रंग’ दे रहे थे और वह “2 जनवरी (2020) तक आंदोलन से पीछे हट गए थे.”
उमर खालिद को नोट लिखने के लिए ममदानी को भारत की झिड़की
इस बीच, भारत ने शुक्रवार को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी के उमर खालिद के साथ एकजुटता व्यक्त करने वाले नोट पर अपनी नाराजगी व्यक्त की और कहा कि जन प्रतिनिधियों को अन्य लोकतंत्रों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए. “द न्यू इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि चल रहे कानूनी मामलों पर व्यक्तिगत विचार व्यक्त करने वाली टिप्पणियां या इशारे सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों के लिए अनुचित हैं.
उन्होंने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि जन प्रतिनिधि अन्य लोकतंत्रों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे. व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों को व्यक्त करना पद पर बैठे लोगों को शोभा नहीं देता. ऐसी टिप्पणियों के बजाय, बेहतर होगा कि वे उन्हें सौंपी गई जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित करें.” भारतीय मूल के राजनेता ममदानी ने पिछले महीने खालिद को एक हस्तलिखित नोट भेजा था, जिसमें उन्होंने तब एकजुटता व्यक्त की थी जब खालिद के माता-पिता ने संयुक्त राज्य अमेरिका में उनसे मुलाकात की थी.
महाराष्ट्र निकाय चुनाव में 68 उम्मीदवार अचानक मैदान से हटे
सुकन्या शांता की रिपोर्ट है कि महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में अव्यवस्था केवल पार्टियों द्वारा अपनी वैचारिक सीमाओं या राज्य-स्तरीय गठबंधनों की अनदेखी तक सीमित नहीं है. नामांकन वापस लेने के आखिरी दिन स्थानीय निकायों के 68 उम्मीदवारों के अचानक हटने से इन चुनावों में खलबली मच गई है, जिसके चलते सत्ताधारी महायुति गठबंधन की पार्टियों ने अनौपचारिक रूप से कुछ सीटें निर्विरोध जीत ली हैं. विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि उम्मीदवारों को हटाने के लिए भारी रिश्वत दी गई, जबकि कुछ उम्मीदवारों का कहना है कि उनके पार्टी आलाकमान ने आखिरी समय में उन्हें बिना किसी स्पष्ट कारण के अपरिचित निर्वाचन क्षेत्रों में भेज दिया.
टी20 वर्ल्ड कप: बांग्लादेशी क्रिकेट टीम में अनिश्चितता
बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) के एक अधिकारी के अनुसार, अगले महीने होने वाले टी20 वर्ल्ड कप में खेलने को लेकर बांग्लादेश की पुरुष क्रिकेट टीम के बीच अनिश्चितता बनी हुई है. खिलाड़ियों के लिए यह “बहुत कठिन समय” है और वे “काफी तनाव में” हैं. यह अनिश्चितता तब शुरू हुई जब ‘बीसीबी’ ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) से अपने मैच भारत से बाहर स्थानांतरित करने का अनुरोध किया. यह कदम भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) द्वारा बांग्लादेशी गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को कोलकाता नाइट राइडर्स से हटाए जाने के बाद खिलाड़ियों की ‘सुरक्षा और भलाई’ की चिंताओं के कारण उठाया गया है. ‘पीटीआई’ के अनुसार, बीसीबी ने आईसीसी को इस बारे में दूसरा विशिष्ट पत्र लिखा है. इस बीच, पूर्व कप्तान तमीम इकबाल ने इस मामले पर सावधानी बरतने की सलाह दी, जिसके बाद एक शीर्ष बीसीबी अधिकारी ने उन्हें “भारतीय एजेंट” करार दे दिया, जिसकी काफी निंदा हो रही है.
गुजरात में 57% घरों में नलों का कनेक्शन नहीं
“नल से जल” योजना के तहत सफलता के दावों के बावजूद, जल शक्ति मंत्रालय की एक रिपोर्ट ने गुजरात में सुरक्षित पेयजल की पहुंच को लेकर गंभीर कमियों का खुलासा किया है. रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के लगभग 57% घरों में नलों के माध्यम से पीने योग्य पानी के कनेक्शन की पहुंच नहीं है. रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया है कि राज्य में केवल 58.7% घरों को ही प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 55 लीटर या उससे अधिक पानी मिल रहा है — जो कि जल जीवन मिशन के तहत निर्धारित लक्ष्य है. इसके विपरीत, इस मामले में राष्ट्रीय औसत 80.2% है.
सिर्फ दिल्ली ही नहीं, भारत के लगभग 44% शहर झेल रहे हैं स्थाई वायु प्रदूषण: रिपोर्ट
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के एक नए विश्लेषण के अनुसार, भारत के लगभग 44 प्रतिशत शहर निरंतर उत्सर्जन स्रोतों के कारण स्थाई (क्रोनिक) वायु प्रदूषण से जूझ रहे हैं, फिर भी इनमें से केवल एक छोटा हिस्सा ही केंद्र के प्रमुख स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के अंतर्गत आता है.
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के पीएम2.5 मूल्यांकन में असम का बर्नीहाट भारत का सबसे प्रदूषित शहर रहा, उसके बाद दिल्ली और गाजियाबाद का स्थान है. नोएडा, गुरुग्राम और ग्रेटर नोएडा भी इस सूची में करीब रहे, जो शहरी भारत में वायु गुणवत्ता की व्यापक और निरंतर विफलता को दर्शाता है.
गैर-प्राप्ति वाले शहरों, जहां प्रदूषण मानक से अधिक है, की सूची में उत्तरप्रदेश 416 शहरों के साथ शीर्ष पर है. इसके बाद राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश का स्थान आता है. राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत आने वाले 130 शहरों में से 28 में अभी भी निरंतर परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन नहीं हैं. निगरानी बुनियादी ढांचे वाले 102 शहरों में से 100 ने पीएम10 का स्तर 80 प्रतिशत या उससे अधिक दर्ज किया. यह रिपोर्ट भारत की स्वच्छ वायु पहल की पहुंच और प्रभावशीलता पर सवाल उठाती है.
सैटेलाइट डेटा का उपयोग करते हुए, सीआरईए ने देश भर के 4,041 शहरों में पीएम2.5 स्तरों का आकलन किया. अध्ययन में पाया गया कि 2019 और 2024 के बीच (कोविड प्रभावित वर्ष 2020 को छोड़कर) कम से कम 1,787 शहर हर साल राष्ट्रीय वार्षिक पीएम2.5 मानक से ऊपर रहे. “इसका अर्थ है कि लगभग 44 प्रतिशत भारतीय शहर दीर्घकालिक वायु प्रदूषण का सामना कर रहे हैं, जो अल्पकालिक घटनाओं के बजाय निरंतर उत्सर्जन स्रोतों से संचालित एक संरचनात्मक समस्या का संकेत देता है.”
समस्या के इतने बड़े पैमाने के बावजूद, केवल 130 शहर ही एनसीएपी के अंतर्गत आते हैं, जिनमें से केवल 67 शहर ही उन शहरों में शामिल हैं जो लगातार मानकों का उल्लंघन कर रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है, “नतीजतन, एनसीएपी वर्तमान में भारत के दीर्घकालिक रूप से प्रदूषित शहरों में से केवल 4 प्रतिशत को ही संबोधित करता है.”
‘एआई’ वॉइस-क्लोनिंग फ्रॉड का पहला मामला; प्ले स्कूल संचालिका ने गंवाई पूरी जमापूंजी
यह मध्यप्रदेश में एआई-आधारित वॉइस मॉड्यूलेशन (आवाज बदलने वाली तकनीक) से जुड़े साइबर फ्रॉड का संभवतः पहला मामला है. इंदौर में छोटा सा प्ले स्कूल चलाने वाली मध्यम आयु वर्ग की एक महिला को जालसाज ने अपनी ठगी का शिकार बनाया. जालसाज ने उनके चचेरे भाई, जो उत्तरप्रदेश पुलिस में तैनात हैं, की आवाज को क्लोन करके उनसे 97,500 रुपये की पूरी बचत ठग ली.
‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ पीड़िता स्मिता सिन्हा (नाम परिवर्तित) की अपने चचेरे भाई से, जो उत्तरप्रदेश पुलिस की आपातकालीन सेवा (यूपी 112) में कार्यरत हैं, आखिरी बार करीब दो साल पहले बात हुई थी. जालसाज ने दावा किया कि उसका एक करीबी दोस्त इंदौर के एक निजी अस्पताल में भर्ती है और उसे ‘लाइफ-सेविंग कार्डियक सर्जरी’ (हृदय के ऑपरेशन) के लिए तत्काल पैसों की जरूरत है. उसने कहा कि वह सीधे अस्पताल को पैसे नहीं भेज पा रहा है, इसलिए वह टुकड़ों में स्मिता के डिजिटल पेमेंट खाते में पैसे भेज रहा है. उसने स्मिता से अनुरोध किया कि वह वही राशि “अस्पताल के डॉक्टर के नंबर” पर फॉरवर्ड कर दें, जिसका क्यूआर कोड उसने पहले ही भेज दिया था.
स्मिता ने बताया, “बातचीत के दौरान मुझे मैसेज मिले कि मेरे खाते में पैसे आ गए हैं. मेरी बेटी ने चार बार में कुल 97,500 रुपये उस क्यूआर कोड पर ट्रांसफर कर दिए. लेकिन कॉल कटने के बाद जब मैंने बैंक अकाउंट चेक किया, तो पता चला कि एक रुपया भी क्रेडिट नहीं हुआ था.” अगले दिन जब स्मिता ने उत्तर प्रदेश में अपने भाई से संपर्क किया, तो उन्होंने ऐसी किसी भी कॉल से इनकार किया.
इंदौर के अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (अपराध) राजेश दंडोतिया के अनुसार, प्रारंभिक जांच से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि इसमें एआई-आधारित वॉइस मॉड्यूलेशन तकनीक का उपयोग किया गया है. भोपाल स्थित साइबर क्राइम सेल के सूत्रों का कहना है कि यह न केवल इंदौर, बल्कि संभवतः पूरे प्रदेश का ऐसा पहला मामला है. पुलिस ने बताया कि ऐसे मामलों में जालसाज टारगेट और उनके करीबी संपर्कों पर गहन शोध करते हैं. वे आवाज के नमूने हासिल कर एआई टूल्स के जरिए उसे हूबहू दोहराते हैं ताकि शिकार को धोखा दिया जा सके.
दूषित पानी से मौतों के बाद इंदौर कलेक्टर और महापौर की आरएसएस कार्यालय में बैठक, विवाद
इंदौर में बुधवार देर रात कलेक्टर शिवम वर्मा और महापौर पुष्यमित्र भार्गव के आरएसएस कार्यालय में एक बैठक में शामिल होने के बाद गुरुवार को राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. यह बैठक भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से कम से कम आठ लोगों की मौत (हालांकि सरकार ने 18 मृतकों के परिवारजनों को 2-2 लाख रुपये मुआवजा दिया है) और अधिकारियों की जांच के घेरे में आने के कुछ दिनों बाद हुई है.
कई स्रोतों ने इस बैठक की पुष्टि की है और महापौर ने भी आंशिक रूप से इसे स्वीकार किया, हालांकि उन्होंने इसके महत्व को कम बताया. भार्गव ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा, “एक स्वयंसेवक के रूप में, मैं अक्सर आरएसएस कार्यालय जाता रहता हूं. इसका वर्तमान संकट से कोई लेना-देना नहीं है.” कलेक्टर वर्मा ने इस बैठक पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
सुदर्शन रोड स्थित आरएसएस की मालवा क्षेत्रीय इकाई के मुख्यालय में हुई इस बंद कमरे की चर्चा से वाकिफ लोगों ने बताया कि बैठक मालवा प्रांत प्रचारक राजमोहन द्वारा बुलाई गई थी. सूत्रों ने इसे ‘संकट प्रबंधन की विफलताओं’ पर केंद्रित चर्चा बताया.
जहां भाजपा ने इन दावों को खारिज करते हुए इसे दोनों अधिकारियों का एक नियमित दौरा बताया, वहीं मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने महापौर का आरएसएस कार्यालय के बाहर खड़े होने का वीडियो साझा करते हुए कहा, “जब इंदौर के नलों से जहर बह रहा हो, जब मासूम नागरिकों की मौत से घरों में मातम छाया हो, जब सरकार विफल हो गई हो, तो क्या कलेक्टर को फील्ड में, अस्पतालों में, प्रभावित परिवारों के बीच होना चाहिए या आरएसएस कार्यालय के अंदर?”
पटवारी ने कहा कि इंदौर कलेक्टर और महापौर का देर रात आरएसएस कार्यालय पहुंचना “कोई नियमित दौरा नहीं” था. उन्होंने इसे “प्रशासनिक निष्पक्षता की नाक काटने” का मामला बताया. पार्टी ने आरोप लगाया कि “कलेक्टर वर्मा भाजपा कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं.” आरोपों को खारिज करते हुए भाजपा प्रवक्ता शिवम शुक्ला ने कहा, “यह एक शिष्टाचार भेंट थी और इसमें कुछ भी गलत नहीं था. क्या अधिकारी लोगों से नहीं मिल सकते?”
बहरहाल, इस बैठक ने संस्थानिक प्रोटोकॉल पर बहस तेज कर दी है. जिला कलेक्टर, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी के रूप में, राज्य सरकार के अधीन कार्य करते हैं. वहीं महापौर नगर निगम कानूनों के तहत काम करते हैं.
उल्लेखनीय है कि इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में हुई इस घटना ने शहर के अधिकारियों को जांच के घेरे में ला दिया. मौतों के अलावा, नगर निगम की आपूर्ति वाले पेयजल नलों से बहने वाले सीवेज-मिश्रित (गंदे) पानी के सेवन से 2,000 से अधिक लोग बीमार पड़ गए. क्षेत्र के 100 से अधिक निवासियों को अस्पताल में इलाज की आवश्यकता पड़ी. इस बीच, पिछले सप्ताह तक नगर निगम इंदौर के अधिकारियों का कहना था कि वे पानी में संदूषण (गंदगी) के निश्चित स्रोत का पता नहीं लगा पाए हैं.
हेट क्राइम
यूपी के गाँव में खौफ का साया: “24 घंटे में गाँव छोड़ो वरना जिंदा जला देंगे” - नफरत भरे पर्चे
उत्तर प्रदेश के सिकंदराबाद क्षेत्र के भोंखेड़ा गाँव में मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 1 जनवरी की सुबह गाँव के मुस्लिम परिवारों को अपने घरों के बाहर धमकी भरे पर्चे मिले. इन पर्चों पर साफ शब्दों में लिखा था: “सभी कठमुल्लों 24 घंटे के अंदर गाँव खाली कर दो, वरना जिंदा जला दिए जाओगे.” पर्चे के नीचे ‘कट्टर सनातनी विक्रम’ का नाम लिखा था और साथ में धार्मिक नारे भी थे.
स्थानीय निवासी साजिद अली ने बताया कि जब वह सुबह फजर की नमाज के बाद दूध लेने निकले, तो उन्होंने यह पर्चा देखा. देखते ही देखते पूरे गाँव के करीब 15 मुस्लिम परिवारों के घरों के बाहर ऐसे ही पर्चे मिले. साजिद ने कहा, “हम डर गए हैं. एक सामान्य सुबह हमारे लिए खौफ में बदल गई. हम यहाँ से जाने वाले नहीं हैं, लेकिन पुलिस की ढिलाई को देखते हुए लगता है कि कभी भी कुछ भी हो सकता है.”
गाँव की महिलाओं और बच्चों पर इसका गहरा असर पड़ा है. मिड-डे मील बनाने वाली 65 वर्षीय हाजरा ने कहा, “मेरा दिल जोर-जोर से धड़कता रहता है. रात को हम में से कोई एक जागकर पहरा देता है.” वहीं, शमशीदा ने बताया कि वे अपने बच्चों को अकेले बाहर भेजने से डर रहे हैं. उन्होंने सवाल किया, “पर्चे में 24 घंटे लिखा था, लेकिन डर तो खत्म नहीं होता. हम बच्चों को इतनी नफरत कैसे समझाएं?”
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 353(1)(सी) के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है. स्थानीय वकील मोहम्मद हनीफ ने बताया कि गाँव में ‘विक्रम’ नाम का कोई व्यक्ति नहीं रहता और यह सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की एक साजिश लगती है. उन्होंने कहा कि यह “आपराधिक धमकी” है, लेकिन अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है. पुलिस अधिकारी इसे “शरारती तत्वों” का काम बता रहे हैं और गश्त बढ़ाने का दावा कर रहे हैं. गौरतलब है कि इस गाँव में हिंदू बहुसंख्या में हैं और आज तक यहाँ कभी कोई सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई थी.
अंकिता भंडारी हत्याकांड: भारी विरोध के बाद सीएम धामी ने की सीबीआई जांच की सिफारिश
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार (9 जनवरी, 2026) को अंकिता भंडारी हत्याकांड की सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी है. यह बड़ा फैसला राज्य भर में पिछले दो हफ्तों से चल रहे व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद लिया गया है.
“द हिंदू” के मुताबिक अंकिता भंडारी के माता-पिता ने बुधवार (7 जनवरी, 2026) की रात सीएम धामी से मुलाकात की थी और उन्हें एक पत्र सौंपा था. इस पत्र में उन्होंने मांग की थी कि मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में सीबीआई से कराई जाए.
अंकिता के पिता ने अपने पत्र में एक गंभीर मुद्दा उठाया है. उनका कहना है कि उनकी बेटी की हत्या एक ‘वीआईपी’ की वजह से हुई, जिसकी पहचान अभी तक उजागर नहीं हुई है और वह कानून की पकड़ से बाहर है. उन्होंने लिखा, “मैं सरकार से अपील करता हूँ कि उस ‘वीआईपी’ को पकड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में इस मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए.”
मुलाकात के बाद सीएम धामी ने आश्वासन दिया था, “मैंने उनकी बात सुनी है. उनकी चिंताओं पर विचार करने के बाद जल्द ही फैसला लिया जाएगा.” उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी सरकार अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के लिए “हर संभव कदम” उठाएगी.
आपको याद दिला दें कि साल 2022 में पौड़ी के वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करने वाली 19 वर्षीय अंकिता भंडारी की रिसॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य और उसके दो कर्मचारियों ने हत्या कर दी थी. इस मामले में तीनों दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है. हालांकि, हत्या में किसी ‘वीआईपी’ की संलिप्तता के दावे सामने आने के बाद से ही 2022 के इस हत्याकांड की सीबीआई जांच की मांग ने फिर से जोर पकड़ लिया था.
सरकार के ‘गोल्डीलॉक्स’ जश्न के बीच पूर्व सलाहकार की चेतावनी: अर्थव्यवस्था की रिकवरी स्पष्ट नहीं, ट्रंप का खतरा मंडराया
भले ही केंद्र सरकार चालू वित्त वर्ष में 7.4% जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को “गोल्डीलॉक्स मोमेंट” (अर्थव्यवस्था की आदर्श स्थिति) बताकर अपनी पीठ थपथपा रही हो, लेकिन मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने इसे लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है. ‘द टेलीग्राफ’ की रिपोर्ट के अनुसार, ब्लूमबर्ग को दिए एक साक्षात्कार में सुब्रमण्यम ने कहा, “हमें इन आंकड़ों को सावधानी से पढ़ना चाहिए.”
सुब्रमण्यम ने जीडीपी गणना में इस्तेमाल किए गए असामान्य रूप से कम ‘डेफ्लेटर’ (मुद्रास्फीति को समायोजित करने वाला कारक) की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि अर्थव्यवस्था वास्तव में रिकवर कर रही है या नहीं. उन्होंने कहा कि अगर अगले साल भी यही आंकड़े बने रहते हैं, तो ही भारत को इसे एक उपलब्धि माननी चाहिए.
सबसे बड़ी चिंता का विषय अमेरिका की नई व्यापार नीतियां हैं. सुब्रमण्यम ने कहा, “अब यह कम संभावना लग रही है कि (अमेरिका के साथ) कोई ट्रेड डील होगी.” उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा टैरिफ की दरें और भी ऊंची हो सकती हैं. यह बयान ऐसे समय आया है जब खबर है कि ट्रम्प ने उस बिल को हरी झंडी दे दी है जो रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों (जैसे भारत, चीन और ब्राजील) पर 500% तक का टैरिफ लगाने का प्रस्ताव करता है. यह बिल रूसी तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ ट्रम्प को “जबरदस्त लाभ” देगा.
सुब्रमण्यम ने “चीनी व्यापारिकता” का भी जिक्र किया, जिसके तहत सस्ते चीनी सामानों को भारत जैसे विकासशील देशों में डंप किया जा रहा है, जिससे घरेलू उत्पादकों पर दबाव बढ़ रहा है. इसके अलावा, उन्होंने राजकोषीय स्थिति को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि जीएसटी दरों में कटौती इसका प्रमाण है कि स्थिति उतनी मजबूत नहीं है जितनी होनी चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया कि आरबीआई को रुपये की विनिमय दर में अधिक लचीलापन लाना चाहिए ताकि निर्यातक बाहरी झटकों का सामना कर सकें.
“तानाशाह को मौत”: ईरान में विरोध की आग भड़की, खामेनेई ने कहा- हम पीछे नहीं हटेंगे
महंगाई और बदहाल अर्थव्यवस्था के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों ने ईरान में एक विकराल रूप ले लिया है. न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पिछले कई वर्षों में ईरानी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. तेहरान, तबरीज, मशहद और अन्य शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं और “तानाशाह को मौत” के नारे लगा रहे हैं, जिसका इशारा सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की तरफ है.
इंटरनेट और फोन कॉल्स पर पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद सामने आए वीडियो में प्रदर्शनकारी सरकारी इमारतों में आग लगाते और अलाव के चारों ओर नारे लगाते देखे जा सकते हैं. मानवाधिकार समूहों के अनुसार, हिंसा में अब तक कम से कम 42 लोग मारे गए हैं और 2,270 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है.
इस बीच, 86 वर्षीय अयातुल्ला खामेनेई ने शुक्रवार को सरकारी टेलीविजन पर दिए एक भाषण में प्रदर्शनकारियों को “तोड़फोड़ करने वाले” करार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि ये प्रदर्शनकारी “किसी दूसरे देश के राष्ट्रपति (डोनाल्ड ट्रम्प) को खुश करने के लिए अपनी ही सड़कों को बर्बाद कर रहे हैं.” खामेनेई ने दो टूक कहा कि इस्लामिक रिपब्लिक इन दबावों के आगे “पीछे नहीं हटेगा” .
दूसरी तरफ, अमेरिका में निर्वासित जीवन जी रहे ईरान के पूर्व शाह के बेटे रजा पहलवी ने इस आंदोलन को और हवा दे दी है. उनके आह्वान पर गुरुवार और शुक्रवार को बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे. प्रदर्शनकारी “पहलवी की वापसी” के नारे भी लगा रहे हैं. ईरानी स्टेट मीडिया ने आरोप लगाया है कि प्रदर्शनकारी अमेरिका और इज़राइल के “आतंकवादी एजेंट” हैं. नेटब्लॉक्स ने पुष्टि की है कि विरोध को दबाने के लिए ईरान ने दुनिया से अपना संपर्क काट लिया है और इंटरनेट सेवाएं ठप कर दी हैं.
अपील :
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