09.02.2026: ओम बिरला पर अविश्वास? | ट्रंप, मोदी धौंस पर आकार पटेल | भारत के गले मढ़ा समझौता | हिमंता का वीडियो और नंगी नफ़रत | नरवणे की किताब लीक पर एफआईआर | लिट फेस्ट कितने सार्थक ? | मणिपुर
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुुर्खियां
संसद में संग्राम: राहुल गांधी का दावा, नरवणे की किताब के सच से डरे पीएम मोदी.
भारत-अमेरिका ट्रेड डील: ट्रंप के दबाव में क्या भारत ने सरेंडर किया? रूसी तेल पर टैरिफ की धमकी.
असम की राजनीति: सीएम हिमंत बिस्वा सरमा के ‘AI वीडियो’ पर बवाल, मुसलमानों को निशाना बनाने का आरोप.
मणिपुर हिंसा: उखरुल में फिर सुलगी आग, नागा और कुकी समुदायों के बीच संघर्ष में 20 घर जलेन.
किताब लीक: पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ लीक, दिल्ली पुलिस ने दर्ज की एफआईआर.
गायब फाइलें: कांग्रेस का आरोप, ट्रेड डील के बाद एपस्टीन लिस्ट से भारत से जुड़े दस्तावेज गायब.
नफरत की कीमत: कोटद्वार में मुस्लिम बुजुर्ग को बचाने वाले ‘दीपक’ का जिम खाली, मेंबरशिप छोड़ गए लोग.
भागवत का बयान: आरएसएस प्रमुख बोले, 75 साल के बाद नेताओं को हो जाना चाहिए रिटायर.
‘सुरक्षा खतरा नहीं, नरवणे की किताब के सच से डरे पीएम’: राहुल गांधी का मोदी सरकार और स्पीकर पर सीधा हमला
संसद के बजट सत्र में अभूतपूर्व टकराव देखने को मिल रहा है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सदन से अनुपस्थिति पर तीखा हमला बोला. रिपोर्ट्स के अनुसार, राहुल गांधी ने दावा किया कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का उत्तर इसलिए नहीं दिया क्योंकि वह “सुरक्षा कारणों” से नहीं, बल्कि पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे की किताब में छिपे तथ्यों और विपक्ष के सवालों से डरे हुए थे.
‘हमला करने की धमकी है, तो एफआईआर क्यों नहीं?’
विवाद तब गहरा गया जब स्पीकर ओम बिरला ने पिछले गुरुवार को दावा किया था कि उनके पास “पुख्ता जानकारी” थी कि कांग्रेस सदस्य पीएम की सीट की ओर बढ़ सकते हैं और कोई “अप्रत्याशित कृत्य” कर सकते हैं, इसलिए उन्होंने पीएम को सदन में न आने की सलाह दी. इस पर पलटवार करते हुए राहुल गांधी ने सोमवार को चुनौती दी. उन्होंने कहा, “अगर किसी ने सच में प्रधानमंत्री पर हमला करने की धमकी दी है, तो तुरंत एफआईआर (प्राथमिकी) दर्ज करें और उस व्यक्ति को गिरफ्तार करें. आप ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं?“ गांधी ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस सदस्यों द्वारा पीएम पर हमले का कोई सवाल ही नहीं उठता. सच यह है कि पीएम “सच्चाई का सामना करने से डरते हैं.”
नरवणे की किताब और ‘सेंसरशिप’ का आरोप
राहुल गांधी ने बताया कि सरकार की घबराहट की असली वजह पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवणे का संस्मरण है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस किताब में 2020 के भारत-चीन संघर्ष और अग्निवीर योजना को लेकर कुछ संवेदनशील खुलासे हैं. राहुल ने कहा, “सरकार नहीं चाहती थी कि मैं इस पर बोलूं. पहले उन्होंने कहा कि मैं किताब से कोट (उद्धृत) नहीं कर सकता, फिर कहा कि मैं मैगजीन से भी कोट नहीं कर सकता. जब मैंने कहा कि मैं बिना पढ़े अपनी बात रखूंगा, तो भी मुझे रोका गया.”
उन्होंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पर सदन को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा, “रक्षा मंत्री ने गलत दावा किया कि किताब प्रकाशित नहीं हुई है. जबकि तथ्य यह है कि किताब प्रकाशित हो चुकी है और हमारे पास उसकी कॉपी मौजूद है.”
बजट और अमेरिकी सौदे पर चर्चा से भाग रही सरकार
गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार बजट पर व्यापक बहस से भी बचना चाहती है. उन्होंने कहा, “मेरा अनुमान है कि सरकार अमेरिकी सौदे (यूएस डील), इसे करने के तरीके और किसानों पर इसके प्रभाव जैसे मुद्दों पर चर्चा से डर रही है, इसलिए सदन को बार-बार बाधित किया जा रहा है.”
स्पीकर की भूमिका पर सवाल और अविश्वास प्रस्ताव की सुगबुगाहट
सदन में उस वक्त तीखी नोकझोंक हुई जब पीठासीन अधिकारी संध्या राय ने राहुल गांधी को बजट चर्चा शुरू होने से पहले बोलने की अनुमति नहीं दी. राहुल का दावा था कि स्पीकर ने उन्हें बोलने का आश्वासन दिया था, जिसे सरकार और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने नकार दिया.
इस घटनाक्रम के बाद, द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, विपक्षी दल अब स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने इस संभावना पर कहा, “कार्रवाई का इंतजार करें .” उन्होंने आरोप लगाया कि सदन में विपक्ष के लिए कोई जगह नहीं बची है और सत्ता पक्ष जो चाहे बोल सकता है, जबकि विपक्ष का माइक बंद कर दिया जाता है.
वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी इसे “लोकतंत्र का हनन” बताया और कहा कि 70 साल की परंपरा रही है कि जब नेता प्रतिपक्ष और संसदीय कार्य मंत्री दोनों खड़े हों, तो पहले नेता प्रतिपक्ष को मौका मिलता है, लेकिन मौजूदा पीठासीन अधिकारी इसका पालन नहीं कर रहे.
विश्लेषण | भारत अमेरिका टैरिफ डील
आकार पटेल : हमारी धौंस सिर्फ हमें डराने के लिए है, ट्रंप के आगे क्यों मजबूर दिखती है मोदी सरकार
संप्रभुता के उल्लंघन को किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता पर अतिक्रमण या सरकारी कार्यों में हस्तक्षेप के रूप में परिभाषित किया जाता है. ‘आर्म-ट्विस्टिंग’ (हाथ मरोड़ना) का मतलब है किसी को कुछ ऐसा करने के लिए दबाव डालना जो वह नहीं करना चाहता. समर्पण तब होता है जब कोई विरोध करना बंद कर देता है और दूसरे पक्ष के अधिकार के आगे झुक जाता है.
संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच जो हुआ है, वह स्पष्टता और समझ का एक आदर्श है; इसे समझने के लिए जारी किए गए बयानों को पढ़ने से ज्यादा और कुछ नहीं चाहिए.
6 अगस्त, 2025 के अपने कार्यकारी आदेश 14329 में, डोनाल्ड ट्रम्प लिखते हैं:
“मैंने यह निर्धारित किया कि भारत की वस्तुओं के आयात पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त ‘एड वैलोरम’ (मूल्यानुसार) शुल्क लगाना आवश्यक और उचित था, जो उस समय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रशियन फेडरेशन (रूसी संघ) के तेल का आयात कर रहा था.”
अब, 6 फरवरी 2026 को, उनका कार्यकारी आदेश हमें बताता है: “विशेष रूप से, भारत ने रशियन फेडरेशन के तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आयात रोकने के लिए प्रतिबद्धता जताई है, यह बताया है कि वह संयुक्त राज्य अमेरिका से अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद खरीदेगा, और हाल ही में अगले 10 वर्षों में रक्षा सहयोग का विस्तार करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ एक ढांचे के लिए प्रतिबद्ध हुआ है.”
यह पाने के बाद कि भारत अब वैसा ही व्यवहार कर रहा है जैसा अमेरिका चाहता है, ट्रम्प कहते हैं कि:
“तदनुसार, मैंने भारत पर लगाए गए अतिरिक्त ‘एड वैलोरम’ शुल्क को हटाने का निर्धारण किया है.”
भारत पर लगाया गया यह अतिरिक्त शुल्क अच्छे व्यवहार के लिए, या कूटनीतिक भाषा में कहें तो, अनुपालन के लिए हटाया गया था. हालांकि, ट्रम्प ने हमें चेतावनी दी है, अमेरिका “निगरानी करेगा कि क्या भारत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रशियन फेडरेशन के तेल का आयात फिर से शुरू करता है” और यदि ऐसा होता है:
“मुझे भारत की वस्तुओं के आयात पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त ‘एड वैलोरम’ शुल्क फिर से लगा देना चाहिए.”
बस इतना ही नहीं है. झुकने वाले देश को और भी बहुत कुछ करना होगा. भारत द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि: “भारत अगले पांच वर्षों में 500 बिलियन डॉलर” के अमेरिकी उत्पाद खरीदने का इरादा रखता है. यानी साल का 100 बिलियन डॉलर. 2024 में यह 40 बिलियन डॉलर था. भारत ने अमेरिका से अतीत की तुलना में दोगुने से अधिक उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है.
बदले में इसे क्या मिला? 18% का ‘घटा हुआ’ टैरिफ, जहां पहले कोई टैरिफ नहीं था. यह हमारा इनाम है. संप्रभुता का उल्लंघन? चेक (हाँ). ‘आर्म-ट्विस्टिंग’ (दबाव)? चेक. समर्पण. दुर्भाग्य से, हाँ.
जैसा कि मैंने कहा, यह समझौता स्पष्टता का एक आदर्श है. किसी को यह सुनने की ज़रूरत नहीं है कि जयशंकर और भारत सरकार क्या कहती है; बस उस दस्तावेज़ को पढ़ने की ज़रूरत है जिस पर हमने हस्ताक्षर किए हैं.
सवाल यह है कि हमने घुटने क्यों टेक दिए. मेरे मित्र, अर्थशास्त्री अशोक बर्धन ने सौदा साइन होने से पहले एक संदेश भेजा था, जिसमें उन्होंने अनुमान लगाया था कि क्या होगा और इसे समझाने की कोशिश की थी.
वह लिखते हैं कि भारत की ओर से झुकने के दो कारण हैं:
“पहला, इस सरकार और उसके समर्थक आधार की तथाकथित राष्ट्रवादी साख को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है. राष्ट्रवादी कार्ड लेन-देन वाला है और ज्यादातर घरेलू उद्देश्यों के लिए है, जिसे चुनावों के संदर्भ में बाहर निकाला जाता है और पाकिस्तान का डर दिखाकर आधार को जोश में लाया जाता है, लेकिन जब बड़े खिलाड़ियों से निपटने की बात आती है तो इसका सहारा नहीं लिया जाता. कृषि के मोर्चे पर दी गई रियायतों पर हैरान करने वाली प्रतिक्रिया भी इस तथ्य को नजरअंदाज करती है कि, इन सबसे ऊपर, सत्तारूढ़ पार्टी शहरी अभिजात वर्ग की पार्टी है, चाहे वे किसानों के हितों को अपनी योजनाओं में सर्वोपरि रखने के बारे में कुछ भी कहें.”
इसके अलावा, भारत की अर्थव्यवस्था के कुछ गतिशील क्षेत्रों में, जो दो क्षेत्र सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं वे हैं टेक्नोलॉजी और फाइनेंस (वित्त), और “ये दोनों ही अमेरिकी बाजारों से गहराई से जुड़े हुए हैं और अमेरिकी फर्मों और फंडिंग के लिंक पर भारी रूप से निर्भर हैं.”
भारत के इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से जुड़े क्षेत्रों के कुल आउटपुट का लगभग 70% अमेरिका को निर्यात होता है. भारत ने 2024 में अमेरिका को लगभग 40 बिलियन डॉलर की सेवाओं का निर्यात किया. और अमेरिका अपने हेज फंड, पेंशन फंड और म्यूचुअल फंड के माध्यम से भारत में पोर्टफोलियो इनफ्लो का प्राथमिक स्रोत है. बर्धन कहते हैं, “सचमुच भारतीय वित्तीय बाजारों का हर पहलू और ढांचा मुख्य रूप से अमेरिका से जुड़ा है, वेंचर फंडिंग से लेकर फाइनेंशियल रिसर्च और फाइनेंशियल न्यूज आउटलेट्स आदि तक.”
तो बात यह है. हमारा राष्ट्रवाद, हमारी शेखी, हमारा 56 इंच का सीना अन्य भारतीयों को धमकाने और डराने के लिए है (हालांकि इस पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता होगी, यह देखते हुए कि हम महिला सांसदों से कितने डर गए हैं). एक असली विरोधी के सामने यह मुरझा जाता है. ट्रम्प हमें समझते हैं, इसे स्वीकार किया जाना चाहिए. यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने हमें अपनी मर्जी के आगे झुकाया है.
मई 2019 में, ट्रम्प द्वारा छूट अस्वीकार किए जाने के बाद भारत को ईरान से तेल खरीदना बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा था. ट्रम्प के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, जॉन बोल्टन ने अपनी किताब ‘द रूम वेयर इट हैपन्ड’ में लिखा है कि ट्रम्प ने मोदी की चिंताओं को खारिज कर दिया, और अपनी टीम से कहा कि वह इस फैसले के साथ “ठीक हो जाएंगे” (he’ll be okay).
इसका मतलब भारत को उस तेल से वंचित करना था जो मुफ्त परिवहन और बीमा और 60 दिनों के क्रेडिट जैसी रियायतों के साथ आता था. भारत ने समझाने की कोशिश की कि उसकी कई रिफाइनरियों को ईरानी कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए कैलिब्रेट किया गया था और वे अचानक बदलाव नहीं कर सकती थीं, और यह भी कि ईरान से आपूर्ति रोकने से कीमतों और महंगाई पर असर पड़ेगा. ट्रम्प ने एक न सुनी और हमने तब भी पालन किया जैसा कि हमने रूसी तेल के संदर्भ में और अब वेनेजुएला और अमेरिकी तेल की खरीद के साथ फिर से पालन किया है.
हमें वहीं लौटना होगा जहां से हमने शुरुआत की थी, क्योंकि यह महत्वपूर्ण है कि भारतीय जानें कि उनके नाम पर क्या किया गया है. सरकारी कार्यों में विदेशी हस्तक्षेप से संप्रभुता का उल्लंघन होता है. समर्पण तब होता है जब कोई विरोध करना बंद कर देता है और दूसरे पक्ष के अधिकार के आगे झुक जाता है.
अरुण कुमार: ‘विन-विन’ के नाम पर भारत के गले मढ़ा गया एकतरफा समझौता
भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित व्यापार समझौते को भले ही आधिकारिक तौर पर दोनों देशों की जीत (विन-विन) बताया जा रहा हो, लेकिन इसकी बारीकियां भारत के आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए गहरी चिंता का विषय हैं. द वायर के लिए अपने विस्तृत विश्लेषण में अरुण कुमार ने इस समझौते को “एकतरफा” और भारत की संप्रभुता पर दबाव डालने वाला करार दिया है.

अरुण कुमार बताते हैं कि अभी केवल एक ‘फ्रेमवर्क’ (ढांचा) घोषित किया गया है, जिसका लक्ष्य मार्च के मध्य तक एक अंतरिम समझौता और बाद में एक पूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौता (बीटीए) करना है. खतरा यह है कि जब तक अंतिम हस्ताक्षर नहीं होते, शर्तें बदली जा सकती हैं. दक्षिण कोरिया का उदाहरण सामने है, जहाँ अमेरिका ने प्रतिबद्धताओं को पूरा न करने का बहाना बनाकर डील की शर्तें बदल दी थीं. भारत का समझौते के लिए अति-उत्साह उसे और कमजोर कर सकता है.
समझौते में “संतुलित व्यापार” की शर्त सबसे ज्यादा नुकसानदेह है. इसका सीधा अर्थ है कि अमेरिका के साथ व्यापार में भारत का जो सरप्लस (लाभ) है, उसे खत्म करना होगा. इसके लिए भारत को या तो अपना निर्यात घटाना होगा या अमेरिकी आयात बढ़ाना होगा. अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 18% का संरक्षणवादी शुल्क लगा दिया है, जो पहले औसतन 2.5% था. इससे अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद महंगे हो जाएंगे और उनकी मांग गिरेगी. यह तर्क कि बांग्लादेश या वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों पर शुल्क ज्यादा है, बेमानी है क्योंकि वे पहले से ही भारत से ज्यादा प्रतिस्पर्धी हैं.
फरवरी 2025 में पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच 2030 तक 500 बिलियन डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार पर सहमति बनी थी. लेकिन ट्रम्प ने इसे बदलकर “भारत द्वारा 5 साल में 500 बिलियन डॉलर का आयात“ कर दिया है. लेखक सवाल उठाते हैं कि 2024-25 में जो आयात महज 42 बिलियन डॉलर था, वह अचानक 100 बिलियन डॉलर सालाना कैसे हो जाएगा? यदि यह लक्ष्य पूरा नहीं हुआ, तो यह भविष्य में भारत पर और कड़े प्रतिबंध लगाने का बहाना बन जाएगा.
रूसी कच्चे तेल के आयात को रोकने की शर्त आर्थिक कम और रणनीतिक ज्यादा है. 25% दंडात्मक शुल्क हटाने के लिए रूसी तेल का आयात शून्य करना शुद्ध रूप से ट्रम्प की जोर-जबरदस्ती है. यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर सीधा प्रहार है.
वाणिज्य मंत्री ने भले ही दावा किया हो कि जीएमओ, डेयरी, पोल्ट्री और चावल-गेहूं जैसे संवेदनशील उत्पादों को सुरक्षित रखा गया है, लेकिन समझौते में “अतिरिक्त उत्पादों” का प्रावधान एक बड़ा ‘चोर दरवाजा’ है. ट्रम्प प्रशासन अपनी मनमर्जी से किसी भी उत्पाद को इस श्रेणी में डाल सकता है. इसके अलावा, डिजिटल ट्रेड के नियम अमेरिकी टेक कंपनियों के पक्ष में झुके हुए हैं और भारत के प्रमाणीकरण नियमों को गैर-टैरिफ बाधाएं माना जा सकता है.
अरुण कुमार चेतावनी देते हैं कि यह समझौता भारत को पश्चिमी गुट के साथ इस तरह बांध देगा कि ब्रिक्स या एससीओ जैसे मंचों पर उसकी स्वायत्तता कम हो जाएगी. यह सौदा भारतीय किसानों और उद्योगों के लिए खतरे की घंटी है.
नंगी नफरत: असम बीजेपी के AI वीडियो में हिमंता को मुसलमानों पर ‘पॉइंट-ब्लैंक’ गोली चलाते दिखाया गया
असम में आगामी राज्य चुनावों से कुछ महीने पहले, सत्तारूढ़ भाजपा ने अपनी राजनीतिक बयानबाजी को एक नए और खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है. ‘ऑल्ट न्यूज़’ के लिए प्रांतिक अली की रिपोर्ट के अनुसार, 7 फरवरी को असम भाजपा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को प्रतीकात्मक रूप से मुसलमानों को गोली मारते हुए दिखाया गया था.
यह 18-सेकंड का क्लिप असली फुटेज और एआई जनरेटेड इमेजरी का मिश्रण था. इसमें सरमा एक एयर राइफल हाथ में लिए दिखाई देते हैं, और उनके निशाने पर टोपी और दाढ़ी वाले दो व्यक्ति (जो मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं) दिखाए गए हैं. वीडियो का कैप्शन था “पॉइंट ब्लैंक शॉट” (बिल्कुल करीब से गोली मारना). वीडियो में सरमा को एक ‘वेस्टर्न हीरो’ के रूप में दिखाया गया था और साथ में “जाति, माटी, भेटी” के नारे के साथ “घुसपैठिया मुक्त असम” और बांग्लादेशियों के लिए “कोई दया नहीं” जैसे संदेश लिखे थे.
इस वीडियो को तुरंत व्यापक निंदा का सामना करना पड़ा. प्लेटफॉर्म से हटाए जाने से पहले इसे 10 लाख से अधिक बार देखा जा चुका था. यह स्पष्ट नहीं है कि इसे पार्टी ने हटाया या ‘एक्स’ ने. रिपोर्ट बताती है कि “अवैध बांग्लादेशी” का मुद्दा असम की राजनीति में एक पुराना हथियार रहा है, जिसे सरमा अक्सर अपने भाषणों में इस्तेमाल करते हैं. हाल ही में उन्होंने “मिया मुसलमानों” (बंगाली मुस्लिम) को निशाना बनाते हुए कहा था कि अगर रिक्शा का किराया 5 रुपये है, तो उन्हें 4 रुपये दें ताकि वे परेशान होकर असम छोड़ दें.
इससे पहले भी असम भाजपा के हैंडल से विवादास्पद वीडियो शेयर किए गए हैं, जिसमें विपक्ष के नेता गौरव गोगोई को “भाईजान” और “पाकिस्तान” मिलाकर “पाइजान” कहा गया था. एक अन्य वीडियो में दावा किया गया था कि भाजपा के बिना असम की 90% आबादी मुस्लिम हो जाएगी.
विपक्ष ने इस वीडियो पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि वीडियो हटाने से पीएम मोदी नफरत फैलाने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाते. एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 9 फरवरी को सरमा के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को भड़काने और दुश्मनी को बढ़ावा देने के आरोप में पुलिस शिकायत दर्ज कराई. जवाब में सरमा ने कहा कि उन्हें वीडियो के बारे में नहीं पता, लेकिन वे जेल जाने को तैयार हैं. यह घटना ‘एक्स’ की हेट स्पीच पॉलिसी पर भी सवाल खड़े करती है, क्योंकि नियमों के उल्लंघन के बावजूद यह वीडियो लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर मौजूद रहा.
‘खुद को चाणक्य समझते थे, लेकिन अपनी कमजोरी उजागर कर दी’: गौरव गोगोई का हिमंता बिस्वा सरमा पर पलटवार
असम की राजनीति में जुबानी जंग तेज हो गई है. असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई पर ‘पाकिस्तानी लिंक’ और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाने के एक दिन बाद, गोगोई ने जोरदार पलटवार किया है. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, गोगोई ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मुख्यमंत्री ने इन आरोपों के जरिए “अपनी ही कमजोरी को उजागर कर दिया है” और असम की जनता अब देख सकती है कि वह “इस कुर्सी के लायक क्यों नहीं हैं.”
गोगोई ने समय सीमा पर सवाल उठाते हुए पूछा, “अगर यह इतना महत्वपूर्ण मुद्दा है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है, तो वह छह महीने तक इस पर चुप क्यों बैठे रहे?” उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री एसआईटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे. “उन्होंने पहले कहा था कि वे 10 सितंबर को इसे जारी करेंगे. लेकिन जब उन्होंने एसआईटी रिपोर्ट देखी, तो उन्हें पाकिस्तान में ट्रेनिंग या आईएसआई लिंक जैसा कोई सबूत नहीं मिला, जिसका वे दावा कर रहे थे,” गोगोई ने कहा.
कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि सीएम को यह रिपोर्ट इसलिए जारी करनी पड़ी क्योंकि कांग्रेस ने राज्य में उनके परिवार द्वारा कथित तौर पर 12,000 बीघा जमीन कब्जाने और अदानी, अंबानी व पतंजलि को आदिवासी क्षेत्रों की 40,000 बीघा जमीन देने के मुद्दे को उजागर करना शुरू कर दिया है. गोगोई ने तंज कसते हुए कहा, “वह खुद को महान चाणक्य समझते हैं. लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस ने उनकी सूचनाओं की कमजोरी को उजागर कर दिया. पहले उन्होंने कहा कि मैं 15 दिन पाकिस्तान गया, कल कहा 10 दिन. पहले कहा सांसद रहते हुए गया, अब कह रहे हैं सांसद बनने से पहले गया.”
अपने बच्चों के पासपोर्ट की तस्वीरें शेयर करने पर गोगोई ने सीएम पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा, “वह इतने नीचे गिर गए हैं कि मेरे पांच और नौ साल के बच्चों की निजी जानकारी उजागर कर दी, जो कानूनी रूप से सही नहीं है. हम दिल्ली में अपनी लीगल सेल के साथ किशोर न्याय अधिनियम की धारा 74 के तहत कार्रवाई के विकल्पों पर विचार करेंगे.” गोगोई ने अपने पिता, दिवंगत तरुण गोगोई और लाचित बोरफुकन की विरासत का हवाला देते हुए कहा कि वह हमलों से डरने वाले नहीं हैं, लेकिन अगर कांग्रेस कार्यकर्ताओं या असम के नागरिकों को निशाना बनाया गया, तो वह पीछे नहीं हटेंगे.
नागा और कुकी-ज़ो हिंसा के बीच मणिपुर में दूसरे दिन भी आगजनी की घटनाएं , 20 घर फूंके
मणिपुर के नागा-बहुल उखरुल जिले का लिटान सारेइखोंग क्षेत्र सोमवार को भी तनावपूर्ण बना रहा. नागा और कुकी-ज़ो समुदायों के सदस्यों के बीच लगातार दूसरे दिन आगजनी की घटनाएं हुईं.
हिंसा में घायल हुए कई लोगों को इंफाल के क्षेत्रीय चिकित्सा विज्ञान संस्थान (रिम्स) में भर्ती कराया गया है. हिंसा के कारण दोनों समुदायों के निवासियों को सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह हिंसा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा के बावजूद हुई.
उखरुल के जिला मजिस्ट्रेट आशीष दास ने ‘टीएनआईई’ को बताया, “कल रात बीस घर जला दिए गए. शुरुआत में पाँच या छह घरों में आग लगाई गई थी, लेकिन तेज हवाओं के कारण लपटें तेजी से फैल गईं.” लिटान सारेइखोंग क्षेत्र में घर जलाए गए हैं. निषेधाज्ञा लागू की गई है, सेना और अर्धसैनिक बल तैनात किए गए हैं. विशेष हेलीकॉप्टर सेवाओं की घोषणा की गई है.
पूर्व आर्मी चीफ नरवणे की लीक हुई किताब पर दिल्ली पुलिस ने दर्ज की FIR
दिल्ली पुलिस ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे की विवादास्पद किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ की प्री-प्रिंट कॉपी ऑनलाइन लीक होने के मामले का संज्ञान लिया है. हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इस मामले में केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.
पुलिस ने बताया कि जांच करने पर यह पाया गया कि किताब की एक पीडीएफ कॉपी, जिसे संभवतः पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा तैयार किया गया था, कुछ वेबसाइटों पर उपलब्ध है. इसके अलावा, कुछ ऑनलाइन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म्स ने किताब के कवर को इस तरह प्रदर्शित किया है जैसे कि यह खरीद के लिए उपलब्ध हो.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, किताब के प्रकाशन के लिए अभी तक संबंधित अधिकारियों से आवश्यक मंजूरी नहीं मिली है. पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि यह अप्रकाशित किताब लीक कैसे हुई.
एपस्टीन फाइलों में भारत से जुड़े दस्तावेज गायब हुए, कांग्रेस का बड़ा दावा
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोमवार को दावा किया कि अमेरिकी न्याय विभाग की वेबसाइट पर जारी किए गए मृत यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन की संपत्ति से संबंधित दस्तावेजों के जत्थे में से भारत के संदर्भ वाली कम से कम 60 फाइलें गायब हो गई हैं. उन्होंने कहा कि यह घटनाक्रम भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद हुआ है.
‘समाचार एजेंसियों’ के अनुसार, खेड़ा ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया, “इस बीच जो एकमात्र प्रगति हुई है, वह है एकतरफा और अमेरिका-समर्थक व्यापार समझौता. इसलिए यह स्पष्ट प्रश्न टालना असंभव है: क्या इस अपमानजनक सामग्री को गायब करने की कीमत एक भारत-विरोधी व्यापार समझौता देकर चुकाई गई? क्या सरकार ने अपनी तेजी से गिरती प्रतिष्ठा को बचाने के लिए भारत के हितों का सौदा कर दिया?”
खेड़ा ने कहा कि कांग्रेस की एक टीम एपस्टीन के दस्तावेजों में भारत के संदर्भों की तलाश कर रही थी. खेड़ा ने लिखा, “6 फरवरी को, अमेरिकी न्याय विभाग की वेबसाइट पर एपस्टीन फाइलों में ‘भारत’ (इंडिया) शब्द की खोज करने पर 484 पन्नों के परिणाम मिले थे. प्रत्येक पृष्ठ पर 10 दस्तावेज हैं. हम यह इसलिए जानते हैं क्योंकि एक समर्पित टीम हर पन्ने की फाइलों की बारीकी से जांच कर रही थी और व्यवस्थित रूप से प्रत्येक पन्ने से महत्वपूर्ण दस्तावेजों की सूची बना रही थी.”
“आज, यदि आप इसी प्रक्रिया को दोहराते हैं, तो केवल 478 पन्ने ही दिखाई देंगे. इसका मतलब है कि छह पन्ने, यानी लगभग 60 फाइलें, खोज परिणामों से गायब हो गई हैं.”
उल्लेखनीय है कि वाशिंगटन और भारत द्वारा सप्ताहांत में जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया है कि भारत ने चुनिंदा अमेरिकी कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने या खत्म करने की पेशकश की है. व्यापक रूप से यह माना जा रहा है कि इस सौदे का भारत के कृषि क्षेत्र पर कुछ प्रभाव पड़ेगा. कांग्रेस ने इस सौदे को “आत्मसमर्पण” करार दिया है.
खेड़ा ने शनिवार को कहा था, “उन्होंने टैरिफ को 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया और फिर इसे घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया. सरकार ने लक्ष्य रखा है कि अगले पांच वर्षों में लगभग 500 बिलियन डॉलर, यानी करीब 44 लाख करोड़ रुपये का द्विपक्षीय व्यापार होगा. वाणिज्य मंत्री (पीयूष गोयल) ने यह नहीं बताया कि भारत ने निर्यात का कितना लक्ष्य रखा है.”
सोमवार को खेड़ा ने कहा, “बीजेपी, जो आमतौर पर अनावश्यक रूप से मुखर रहती है, एपस्टीन खुलासों पर रहस्यमयी रूप से चुप हो गई है. पार्टी चुप्पी की इस दीवार के पीछे क्या छिपाने की कोशिश कर रही है?”
‘मोहम्मद’ दीपक का जिम, जहां कभी 150 मेंबर थे, अब सिर्फ 15 रह गए
उत्तराखंड के कोटद्वार में एक बुजुर्ग मुस्लिम दुकानदार को भीड़ से बचाने वाले दीपक (38) आज अपनी बहादुरी की कीमत चुका रहे हैं. 26 जनवरी को जब पार्किंसंस बीमारी से जूझ रहे 70 वर्षीय दुकानदार वकील अहमद को ‘बजरंग दल’ के लोगों ने दुकान के नाम से “बाबा” शब्द हटाने के लिए धमकाया, तो दीपक उनके बचाव में खड़े हो गए थे. भीड़ द्वारा नाम पूछे जाने पर उन्होंने खुद को “मोहम्मद दीपक” बताया था. द इंडियन एक्सप्रेस और द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटना के बाद दीपक का जिम, जो कभी गुलजार रहता था, अब वीरान हो गया है.
दीपक ने बताया कि घटना के बाद शहर दो हिस्सों में बंट गया है. “आधा शहर मेरा समर्थन करता है, लेकिन अच्छे काम के लिए लोग खुलकर ताली नहीं बजाते. ईमानदारी की शायद यही कीमत है,” उन्होंने कहा. उनके जिम में पहले 150 मेंबर थे, जो अब घटकर सिर्फ 15 रह गए हैं. आर्थिक तंगी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “जिम का किराया 40,000 रुपये है और मैंने हाल ही में घर बनाया है जिसकी 16,000 रुपये की मासिक किस्त जाती है. परिवार में कमाने वाला मैं अकेला हूं.” हालांकि, जो सदस्य बचे हैं, उन्होंने साथ न छोड़ने का भरोसा दिया है.
इस बीच, विपक्ष के कई नेता दीपक के समर्थन में आए हैं. सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास ने कोटद्वार जाकर दीपक और पीड़ित दुकानदार से मुलाकात की और एकजुटता दिखाने के लिए जिम की मेंबरशिप भी ली. ब्रिटास ने पुलिस के रवैये पर भी सवाल उठाया, जिसने दंगाइयों को बचाने के बजाय दीपक के खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया है. द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दीपक की बहादुरी के लिए उन्हें 2 लाख रुपये का इनाम देने की पेशकश की थी, जिसे दीपक ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया और कहा कि यह राशि अंकिता भंडारी (उत्तराखंड रिसॉर्ट हत्या मामला) के परिवार को दी जानी चाहिए.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी दीपक को “भारत का हीरो” बताया. वहीं, दीपक का कहना है, “मुझे नहीं लगता कि मैंने कुछ गलत किया है. बाहर के लोग मेरा समर्थन कर रहे हैं, लेकिन शहर के लोग अभी भी साथ नहीं आए हैं. चीजें धीरे-धीरे ठीक होंगी.” पुलिस ने फिलहाल दीपक को सुरक्षा मुहैया कराई है.
भागवत की 75 साल वाली टिप्पणी से मोदी की रिटायरमेंट पर फिर छिड़ी बहस
मुंबई में आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर आयोजित दो दिन के व्याख्यान कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि “अच्छे दिन” बीजेपी की वजह से नहीं आए, बल्कि संघ की मेहनत से आए. उन्होंने कहा कि “अच्छे दिन बीजेपी से नहीं आए, बल्कि उल्टा हुआ… हमारे अच्छे दिन हमारी मेहनत से आए हैं. हम राम मंदिर निर्माण के लिए प्रतिबद्ध रहे. जिन्होंने हमारा साथ दिया, उन्हें फायदा हुआ.” उन्होंने कहा कि विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और बीजेपी सभी संघ परिवार का हिस्सा हैं, लेकिन स्वतंत्र संगठन हैं. “ ज़रुरत पड़ने पर हम सलाह देते हैं, लेकिन फैसले उनके होते हैं. कभी-कभी उनके पापों का ठीकरा हमारे सिर फूटता है क्योंकि वे स्वयंसेवक रहे हैं.” उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दबाव वोटरों से आता है, आरएसएस से नहीं, और देश की व्यवस्था “वोटवादी” बन गई है.
भागवत ने फिर दोहराया कि 75 साल की उम्र के बाद नेता को पद छोड़कर मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए. उन्होंने कहा कि वे खुद 75 साल के हो चुके हैं और संगठन को बताया था, लेकिन संघ ने उनसे काम जारी रखने को कहा. “जब संघ कहेगा, मैं पद छोड़ दूंगा, लेकिन काम से कभी रिटायर नहीं होऊंगा.” पिछले साल जुलाई में भी उनके इसी तरह के बयान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में देखा गया था, क्योंकि मोदी और भागवत दोनों पिछले साल 75 साल के हुए हैं.
अगले सरसंघचालक को लेकर भागवत ने कहा कि केवल हिंदू ही आरएसएस प्रमुख बन सकता है, लेकिन जाति कोई शर्त नहीं है. “एससी/एसटी होना अयोग्यता नहीं है और ब्राह्मण होना योग्यता नहीं है. भविष्य में एससी/एसटी समुदाय से भी कोई प्रमुख बन सकता है. ”
उन्होंने कहा कि चयन इस आधार पर होगा कि कौन सबसे योग्य और उपलब्ध है. भागवत ने कहा कि सभी भारतीय एक हैं और हिंदू-सिख समाज में एक हैं. इस्लाम और ईसाई धर्म पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “इस्लाम को शांति का धर्म कहा जाता है, लेकिन शांति दिखाई नहीं देती. धर्म में आध्यात्मिकता न हो तो वह आक्रामक बन जाता है. आज जो इस्लाम और ईसाई धर्म दिख रहा है, वह पैगंबर मोहम्मद और यीशु मसीह की शिक्षाओं जैसा नहीं है. हमें सच्चा इस्लाम और सच्ची ईसाईयत अपनानी चाहिए.
भीषण गर्मी से महिलाओं की कमाई पर चोट: असंगठित क्षेत्र की करोड़ों महिला कामगारों पर बढ़ता संकट
इंडियास्पेंड के अनुसार, भारत में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोग हर साल गर्मी में अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा खो देते हैं. लेकिन इसका सबसे ज़्यादा नुक़सान महिलाओं को होता है. वे पहले से ही असंगठित क्षेत्र के सबसे असुरक्षित कामों में लगी हैं और साथ ही घर और बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर होती है. तेज़ गर्मी में काम की रफ्तार धीमी हो जाती है, कई बार बिना वेतन छुट्टी लेनी पड़ती है या काम पूरी तरह बंद करना पड़ता है. उनके पास न पेड लीव है, न सुरक्षित कार्यस्थल और न ही कोई आर्थिक सहारा.
द लैंसेट (2024) की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में भीषण गर्मी के कारण भारत में करीब 181 अरब संभावित काम के घंटे बर्बाद हुए, जिससे लगभग 13 लाख करोड़ रुपये (करीब 141 अरब डॉलर) की आय का नुक़सान हुआ. भारत में 92% कामकाजी महिलाएं असंगठित क्षेत्र में हैं. इनमें से लगभग 60% महिलाएं कृषि में काम करती हैं, जहां 99.7% काम अनौपचारिक है. निर्माण, घरेलू काम और घर-आधारित कामों में भी महिलाएं बड़ी संख्या में हैं. 2023 में हर व्यक्ति लगभग 2,400 घंटे यानी करीब 100 दिन ऐसी गर्मी में रहा, जिसमें बाहर हल्का काम करना भी जोखिम भरा था. 2024 और 2025 में तापमान सामान्य से ज़्यादा रहा.
एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (2025) के सर्वे में 3,300 महिलाओं में से 97% ने बताया कि अप्रैल-जून की गर्मी में उनकी आय घटी. औसतन हर महिला को 1,500 रुपये से ज़्यादा का नुकसान हुआ. स्व रोजगार महिला संघ (सेवा) (2023) के सर्वे में 82% महिलाओं ने कहा कि गर्मी से उनकी काम करने की क्षमता घटी है. दिल्ली में बिना छाया वाले कामगारों की उत्पादकता 25% तक घटी. दक्षिण भारत के एक अध्ययन में पाया गया कि 91% असंगठित कामगारों की उत्पादकता गर्मी से घटी और महिलाओं पर इसका असर ज़्यादा था.
सरकार ने कई राज्यों में हीट एक्शन प्लान बनाए हैं, लेकिन 2024 की समीक्षा में पाया गया कि 37 में से सिर्फ 2 योजनाओं में सही जोखिम आकलन था और सिर्फ 11 में फंडिंग का प्रावधान था. इन योजनाओं में आय के नुकसान या महिलाओं के लिए खास सुरक्षा पर कम ध्यान है. छोटे स्तर पर ‘सेवा’ जैसी संस्थाएं माइक्रो-इंश्योरेंस और नकद सहायता दे रही हैं. 2024 में लगभग 50,000 महिलाओं को करीब 5 करोड़ रुपये की मदद दी गई.
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक ठोस कानून, फंडिंग और महिलाओं के लिए खास सुरक्षा उपाय नहीं होंगे, तब तक असंगठित क्षेत्र की महिला कामगार गर्मी में आय का नुकसान झेलती रहेंगी.
महाराष्ट्र में ग्राम सभाओं को फिर मिला लघु वन उपज पर अधिकार, लेकिन ज़मीन पर चुनौतियाँ बरक़रार
स्क्रॉल की रिपोर्ट के मुताबिक़ नवंबर में महाराष्ट्र सरकार ने दो सरकारी आदेश (जीआर) जारी कर ग्राम सभाओं को लघु वन उपज (जैसे बांस, तेंदू पत्ता आदि) के परिवहन परमिट देने का अधिकार फिर से बहाल कर दिया. इससे एक दशक से ज़्यादा समय से वन विभाग के नियंत्रण का अंत हुआ. ये वन उपज मुख्य रूप से आदिवासी लोग इकट्ठा करते हैं, जिन्हें इससे पोषण और मौसमी आय मिलती है. यह फैसला वन अधिकार कानून (2006) और पेसा कानून के तहत ग्राम सभाओं को मिले अधिकारों के अनुरूप है, क्योंकि इन कानूनों में साफ लिखा है कि लघु वन उपज का मालिकाना हक और परिवहन की अनुमति देने का अधिकार ग्राम सभा के पास होगा.
13 नवंबर के पहले आदेश में 2013 और 2015 के उन सरकारी फैसलों को रद्द किया गया, जिनके ज़रिए वन विभाग को परमिट देने का अधिकार दिया गया था. पहले वन विभाग की सख्त पकड़ के कारण आदिवासियों को परमिट लेने में देरी होती थी, कई बार बार-बार दफ्तर जाना पड़ता था और अनौपचारिक भुगतान भी करना पड़ता था. गढ़चिरौली में लोगों ने बताया कि कभी-कभी परमिट के लिए करीब 1 लाख रुपये तक की मांग होती थी. इससे बांस और तेंदू पत्ते जैसी उपज समय पर बाज़ार नहीं पहुंच पाती थी और किसानों को नुकसान होता था. 2021 में वाघेजरी ग्राम सभा के 1,323 बोरे तेंदू पत्ते (कीमत करीब 63.79 लाख रुपये) ज़ब्त कर लिए गए थे, क्योंकि ग्राम सभा खुद परमिट जारी कर रही थी.
27 नवंबर के दूसरे आदेश में प्रक्रिया तय की गई. अब ग्राम सभाओं को खुद परमिट छापने, रजिस्टर रखने और रिकॉर्ड साझा करने की ज़िम्मेदारी दी गई है. लेकिन इसमें यह साफ नहीं किया गया कि ग्राम सभाओं को प्रशिक्षण, कानूनी जानकारी या आर्थिक सहायता कैसे मिलेगी. साथ ही “संस्थाओं” या “संगठनों” को परिवहन की अनुमति देने का प्रावधान रखा गया है, जिसकी परिभाषा स्पष्ट नहीं है. इससे डर है कि ठेकेदार या अन्य बाहरी लोग फिर से इस व्यवस्था में दखल दे सकते हैं. गढ़चिरौली में ठेकेदार पहले ही परमिट की किताबें छपवाकर ग्राम सभाओं के पास पहुंच रहे हैं.
इस स्थिति को देखते हुए गढ़चिरौली की ग्राम सभाओं ने मिलकर “गांव गणराज्य ग्राम सभा परिषद” नाम से एक जिला स्तरीय मंच बनाया है, ताकि परमिट व्यवस्था और अधिकार सुरक्षित रह सकें. आदिवासी नेताओं का कहना है कि असली विकेंद्रीकरण तभी होगा जब सरकार ग्राम सभाओं को पूरी तरह सक्षम बनाए और उनके पारंपरिक संस्थागत ढांचे को सम्मान दे. सिर्फ कागज़ पर अधिकार देना, लेकिन ज़मीनी समर्थन न देना, असली स्वशासन नहीं कहलाएगा.
औराई में दलित युवक पर हमला, आंख में चाबी घोंपकर घायल किया
द ऑब्ज़र्वर पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के औराई में एक 20 वर्षीय दलित युवक राहुल के साथ उच्च समुदाय के लड़के ने मारपीट की. पुलिस के अनुसार, राहुल नहर के पास शौच के लिए गया था, तभी शंकर बिंद नाम के व्यक्ति ने वहां होने पर आपत्ति जताई. दोनों के बीच कहासुनी हुई और आरोपी ने कथित तौर पर जातिसूचक गालियां दीं. जब राहुल वहां से भागने लगा तो आरोपी ने मोटरसाइकिल की चाबी उसकी बाईं आंख में घोंप दी और जान से मारने की धमकी दी.
गंभीर दर्द में राहुल गिर पड़ा. आसपास के लोग जुटने लगे तो आरोपी मौके से फरार हो गया. पुलिस ने राहुल को पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और फिर जिला अस्पताल पहुंचाया. आंख की गंभीर चोट के कारण रविवार को उसे वाराणसी के बीएचयू ट्रॉमा सेंटर रेफर किया गया. पुलिस अधीक्षक अभिमन्यु मंगलीक ने बताया कि मामले में केस दर्ज कर जांच की जा रही है.
कर्नाटक में यूएपीए के 80% फैसले आरोपियों के दोष स्वीकार करने से: नया अध्ययन
कर्नाटक में जनवरी 2005 से जनवरी 2025 के बीच यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत 925 लोगों पर केस दर्ज हुए. इनमें से केवल 46 लोगों को सज़ा हुई. जनवरी 2005 से फरवरी 2025 के बीच कर्नाटक में यूएपीए के इस्तेमाल पर आधारित यह आर्टिकल 14 में प्रकाशित हुए चार भागों की श्रृंखला का तीसरा हिस्सा है. यह रिपोर्ट लंदन की स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ (एसओएएस) यूनिवर्सिटी के शोध पर आधारित है. इसमें सामने आया है कि यूएपीए मामलों में सज़ा दिलाने में मजबूरी में कराए गए ‘दोष स्वीकार’ (गिल्टी प्ली) की बड़ी भूमिका रही है.
चौंकाने वाली बात यह है कि इन 46 में से 36 (करीब 80%) ने अदालत में खुद को दोषी माना था. इनमें से अधिकतर ने औसतन 4.5 साल जेल में बिना ज़मानत के बिताने के बाद “गुनाह कबूल” किया. आर्टिकल 14 की यह रिपोर्ट, जो एसओएएस यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के शोध पर आधारित है, बताती है कि देशभर में एनआईए द्वारा जांचे गए 62 मामलों में 2012 से फरवरी 2025 के बीच 261 दोषसिद्धियों में से 40% मामलों में आरोपी ने खुद दोष स्वीकार किया. जब ज़मानत लगभग असंभव हो और निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद कम हो, तो कई आरोपियों के लिए दोष स्वीकार करना ही सालों की कैद खत्म करने का एकमात्र रास्ता बन जाता है.
रिपोर्ट में ‘क्यू’ नाम के एक कर्नाटक निवासी (पहचान गुप्त) का मामला सामने आया है. उन पर आरोप था कि वे स्थानीय मुसलमानों को देश के ख़िलाफ़ जंग के लिए भर्ती कर रहे थे. वे लगभग चार साल जेल में रहे. ज़मानत कई बार ख़ारिज हुई. जांच अधिकारी कहते थे कि केस खत्म होने में सालों लगेंगे. जेल में उन्होंने ऐसे कई लोगों को देखा जो 10 साल से अधिक समय से बिना ज़मानत बंद थे. जब उन्हें पता चला कि कुछ आरोपी दोष कबूल कर कम सज़ा पाकर रिहा हो रहे हैं, तो उन्होंने भी यही रास्ता चुना. एनआईए ने सज़ा कम करने पर सहमति दी और अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया, लेकिन सज़ा इतनी थी जितना वे पहले ही जेल में काट चुके थे. क्यू कहते हैं कि “लोग हैरान थे कि सज़ा मिलने के बाद भी हम खुश थे, क्योंकि अब घर जाने की तारीख तय हो गई थी.”
रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक में हुई 46 दोषसिद्धियों में से 29 मामलों में एनआईए शामिल थी और इन सभी में आरोपी ने मुकदमे के दौरान दोष स्वीकार किया. देशभर के 62 एनआईए मामलों के अध्ययन में पाया गया कि 115 लोगों (40% से अधिक) ने अदालत में दोष कबूल किया. इनमें से 75 पर हिंसा का नहीं, बल्कि साज़िश या प्रतिबंधित संगठनों से संबंध का आरोप था. केवल तीन लोगों ने शुरुआती चरण में दोष स्वीकार किया, बाकी 112 ने पहले “निर्दोष” कहा, लेकिन 4–5 साल बाद मुकदमे की धीमी रफ्तार से परेशान होकर दोष कबूल किया. 2020 के बाद यह रुझान और बढ़ा, 2012 से 2019 के बीच 27 लोगों ने दोष कबूला, जबकि 2020 से 2025 के बीच 88 लोगों ने.
रिपोर्ट के पहले भाग में बताया गया था कि कर्नाटक में 925 आरोपियों में से 783 (84.6%) मुस्लिम थे. भाजपा शासन के दौरान यूएपीए का इस्तेमाल कांग्रेस की तुलना में 5.2 गुना अधिक हुआ. गृह मंत्रालय के अनुसार 2014 से 2022 के बीच देशभर में यूएपीए मामलों में केवल 28% मुकदमों में सज़ा हुई. कानून की धाराएं (सीआरपीसी धारा 229 और बीएनएसएस धारा 252) आरोपी को किसी भी चरण में दोष स्वीकार करने की अनुमति देती हैं. अदालतों के आदेशों में अक्सर “पश्चाताप”, “गलत रास्ता” और “मुख्यधारा में लौटने की इच्छा” जैसे शब्द लिखे मिलते हैं. लेकिन कई आरोपियों का कहना है कि यह मजबूरी में किया गया फैसला होता है.
एक अन्य आरोपी ‘आर’ ने बताया कि चार साल बाद भी उनके ख़िलाफ़ आरोप तय नहीं हुए थे और 300 से अधिक गवाह सूची में थे. सुनवाई की तारीखें महीनों आगे बढ़ती रहीं. जांच अधिकारी ने कम सज़ा का आश्वासन दिया, लेकिन कोई लिखित गारंटी नहीं थी. उन्होंने भी अंततः दोष कबूल किया और पांच साल की सज़ा मिली, जिसमें चार साल वे पहले ही काट चुके थे.
हालांकि यह फैसला हमेशा सुरक्षित नहीं होता. 2018 बोधगया ब्लास्ट केस में तीन आरोपियों ने दोष कबूल किया और उन्हें उम्रकैद मिली. बाद में हाईकोर्ट ने इसे न्याय की गलती माना और सज़ा घटाकर सात साल कर दी.
रिहाई के बाद भी ज़िन्दगी आसान नहीं होती. क्यू और आर दोनों कहते हैं कि वे हमेशा सरकारी रिकॉर्ड में “आतंकवाद” के आरोपी रहेंगे. नौकरी, सामाजिक जीवन और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका गहरा असर पड़ता है. फिर भी वे अपने फैसले पर पछतावा नहीं जताते, क्योंकि उनके लिए सालों की अनिश्चित कैद से बाहर आना ही सबसे बड़ी राहत है.
क्या भारत में बच्चों पर सोशल मीडिया बैन समाधान है या समस्या का आसान रास्ता?
4 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में 12, 14 और 16 साल की तीन बहनों ने आत्महत्या कर ली. इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया. शुरुआती पुलिस जांच में स्क्रीन की लत (मोबाइल/सोशल मीडिया) और घर में माता-पिता से विवाद को वजह बताया गया है. इस दुखद घटना के बाद नेताओं, अभिभावकों और कई लोगों ने सख्त कार्रवाई और सोशल मीडिया पर रोक लगाने की मांग की है. जब बच्चे की मौत होती है तो गुस्सा और किसी को दोष देने की भावना स्वाभाविक है. लेकिन किसी जटिल समस्या का हल सीधे बैन लगाकर निकालना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इससे असली ज़िम्मेदारी से प्लेटफॉर्म बच जाते हैं और बच्चों के डिजिटल अधिकार भी छिन सकते हैं.
द हिन्दू के लिए इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के फाउंडर डायरेक्टर अपार गुप्ता अपने एक आर्टिकल में लिखते हुए बताते हैं कि कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में पाया गया है कि सोशल मीडिया का ज़्यादा इस्तेमाल करने वाले किशोरों में चिंता, डिप्रेशन, आत्म-नुकसान की प्रवृत्ति और शरीर को लेकर असंतोष जैसे लक्षण बढ़ सकते हैं, खासकर लड़कियों में. हालांकि ज़्यादातर रिसर्च भारत में नहीं हुई है, फिर भी यह चेतावनी देती है कि सोशल मीडिया का असर गंभीर हो सकता है.
दुनिया के कई देशों में इस मुद्दे पर सख्त कदम उठाए जा रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया ने 2024 में कानून बनाकर 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब, स्नैपचैट और एक्स जैसे 10 बड़े प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने पर रोक लगा दी. यह कानून 10 दिसंबर 2025 से लागू हुआ और नियम तोड़ने पर 50 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक जुर्माना है. 3 फरवरी 2026 को स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज़ ने भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने की योजना की घोषणा की. उन्होंने इसे “डिजिटल जंगल” से बच्चों की सुरक्षा का कदम बताया.
लेकिन भारत में ऐसा कानून लागू करना आसान नहीं होगा. पहला कारण यह है कि ऐसे बैन को तकनीकी रूप से लागू करना मुश्किल होता है. बच्चे अक्सर कानून बनाने वालों से ज़्यादा तकनीकी समझ रखते हैं. वे वीपीएन का इस्तेमाल कर सकते हैं या अनियंत्रित और ख़तरनाक प्लेटफॉर्म तक न चाह कर भी उनकी पहुँच बढ़ सकती है. अगर हर अकाउंट को सरकारी पहचान पत्र से जोड़ा गया, तो यह बड़े स्तर पर निगरानी (सर्विलांस) का ख़तरा भी पैदा कर सकता है.
दूसरा, सोशल मीडिया पूरी तरह नुकसानदह नहीं है. कई ग्रामीण इलाकों, झुग्गी बस्तियों या एलजीबीटीक्यू और दिव्यांग युवाओं के लिए यही प्लेटफॉर्म सहारा और समुदाय का एहसास देते हैं. तीसरा, भारत में अक्सर युवाओं से पूछे बिना उनके लिए फैसले ले लिए जाते हैं. क्या हमने उनसे पूछा कि वे क्या चाहते हैं?
चौथा और सबसे अहम कारण यह है कि बैन से लड़कियों पर ज़्यादा असर पड़ेगा. राष्ट्रीय नमूना सर्वे के अनुसार, भारत में सिर्फ 33.3% महिलाओं ने इंटरनेट का उपयोग किया है, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 57.1% है. कई घरों में लड़कियों के मोबाइल इस्तेमाल को पहले से ही शक की से देखा जाता है. अगर सरकार सख्ती करेगी तो परिवार सबसे पहले लड़कियों के फोन छीन सकते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई और आगे बढ़ने के मौके कम हो सकते हैं.
तो फिर समाधान क्या है? सरकार को सिर्फ बैन और कंटेंट हटाने की नीति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. बड़ी टेक कंपनियों की ज़िम्मेदारी तय करने के लिए सख्त कानून, डिजिटल प्रतियोगिता कानून और बच्चों के लिए “ड्यूटी ऑफ केयर” जैसे नियम बनाए जाने चाहिए. इन नियमों को लागू करने के लिए एक स्वतंत्र और विशेषज्ञ नियामक संस्था होनी चाहिए.
भारत में यह भी ज़रूरी है कि सरकार सोशल मीडिया के असर पर गंभीर और लंबी अवधि का शोध कराए, जिसमें अलग-अलग वर्ग, जाति, लिंग और क्षेत्र के युवाओं की स्थिति को समझा जाए. 2023 का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट भी दिखाता है कि बिना सही सोच के बनाए गए कानून उल्टा असर डाल सकते हैं.
सवाल सिर्फ सोशल मीडिया का नहीं है. आजकल बच्चे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) चैटबॉट्स का भी इस्तेमाल कर रहे हैं. कुछ शुरुआती रिसर्च बताती है कि ज़्यादा एआई उपयोग से सोचने-समझने की क्षमता कमज़ोर हो सकती है. कई बच्चे मानसिक सलाह के लिए भी एआई का सहारा ले रहे हैं.
आखिर में, बैन लगाने से सरकार को यह दिखाने का मौका मिल सकता है कि उसने “कुछ किया”, लेकिन इसकी कीमत युवाओं को चुकानी पड़ेगी. जैसा कि मीडिया विशेषज्ञ नील पोस्टमैन ने कहा था, “मैं तकनीक के पक्ष या विरोध में नहीं हूं.ऐसा होना मूर्खता है, जैसे भोजन के पक्ष या विरोध में होना.”
कश्मीरी पत्रकार इरफान मेहराज की गिरफ्तारी को ‘मनमाना’ बताते हुए संयुक्त राष्ट्र में शिकायत
मकतूब मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक़ ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन और एशियन फोरम फॉर ह्यूमन राइट्स एंड डेवलपमेंट ने 30 जनवरी को कश्मीरी पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता इरफान मेहराज की ओर से संयुक्त राष्ट्र के मनमानी हिरासत पर कार्य समूह (UN Working Group on Arbitrary Detention – WGAD) में शिकायत दर्ज कराई है. संगठनों ने मांग की है कि मेहराज की हिरासत को मनमाना और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन घोषित किया जाए.
इरफान मेहराज एक स्वतंत्र पत्रकार हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय मीडिया संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग की है. उन्हें 20 मार्च 2023 को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने गिरफ्तार किया था. लगभग तीन साल बाद भी वह तिहाड़ जेल में विचाराधीन कैदी के रूप में बंद हैं. अदालतें उनकी न्यायिक हिरासत लगातार बढ़ा रही हैं, जबकि उनकी ज़मानत याचिका पर अभी तक फैसला नहीं हुआ है और मुकदमा भी शुरू नहीं हुआ है.
ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन की लीगल एंड रिसर्च अधिकारी हन्ना वैन डिज्के ने कहा, “मेहराज का मामला भारत में ‘ट्रायल बाय जेल’ यानी मुकदमे से पहले ही जेल में सज़ा देने की प्रवृत्ति को दिखाता है. असहमति रखने वालों को अनिश्चितकाल तक जेल में रखा जाता है, जहां कानूनी प्रक्रिया ही सज़ा बन जाती है.”
जांच एजेंसियों का आरोप है कि मेहराज की गिरफ्तारी उनके मानवाधिकार संगठन जम्मू कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी से जुड़े रहने के कारण हुई है. उन पर तथाकथित “एनजीओ टेरर फंडिंग केस” में आतंकवाद और अलगाववाद से जुड़े आरोप लगाए गए हैं. यह मामला 2020 में सोसायटी और अन्य कश्मीरी एनजीओ के ख़िलाफ़ शुरू की गई व्यापक जांच का हिस्सा है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हो चुकी है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र का कार्य समूह भी शामिल है.
इसी मामले में कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज भी अब तक हिरासत में हैं.
ट्रम्प की सनक से दुनिया में खलबली: नस्लवादी वीडियो से लेकर मिनेसोटा गोलीबारी तक, अस्थिरता का नया दौर
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल अनुशासन से शुरू होकर अब अराजकता और व्यक्तिगत प्रतिशोध की ओर बढ़ता दिख रहा है. सीएनएन के लिए स्टीफन कोलिन्सन की रिपोर्ट बताती है कि “जीवित स्मृति में सबसे अस्थिर राष्ट्रपति” अब पूरी तरह अपनी व्यक्तिगत सनक से देश चला रहे हैं, जिससे न केवल वाशिंगटन बल्कि पूरी दुनिया में चिंता बढ़ गई है.
नस्लवादी वीडियो और माफी से इनकार
पिछले हफ्ते ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक बेहद आपत्तिजनक कार्टून वीडियो री-पोस्ट किया, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल को बंदरों के रूप में दिखाया गया था. व्हाइट हाउस ने पहले प्रतिक्रिया दी कि जो लोग आहत हुए हैं गलती उन्हीं की है, लेकिन बाद में एक स्टाफ मेंबर को दोषी ठहराया गया. ट्रम्प ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया और कहा, “मैंने कुछ गलत नहीं किया.” रिपब्लिकन सीनेटर टिम स्कॉट और सांसद माइक लॉलर जैसे नेताओं ने भी इसे “घिनौना” बताते हुए ट्रम्प की आलोचना की है.
नीतियों में यू-टर्न और भ्रम
ट्रम्प की आक्रामकता का खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है. मिनेसोटा में ट्रम्प द्वारा भेजे गए संघीय एजेंटों ने दो अमेरिकी नागरिकों को गोली मार दी. इसके बाद मचे बवाल को देखते हुए ट्रम्प अब “नरम रुख” और ‘सुधार’ की बात कर रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, यह केवल छवि सुधारने की कोशिश है क्योंकि पुलिस के सैन्यीकरण की मांग खुद ट्रम्प ने ही की थी. आव्रजन विभाग की फंडिंग को लेकर डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन के बीच इस हफ्ते सरकार के शटडाउन की नौबत आ सकती है.
हवाई अड्डे और स्टेशन का नाम बदलने की जिद
ट्रम्प अपनी विरासत को लेकर इतने जुनूनी हो गए हैं कि डलेस इंटरनेशनल एयरपोर्ट और न्यूयॉर्क के पेन स्टेशन का नाम बदलकर अपने नाम पर रखने की मांग कर रहे हैं. इतना ही नहीं, उन्होंने सुपर बाउल के हाफ-टाइम शो में प्यूर्टो रिकन स्टार बैड बनी की परफॉर्मेंस को “अमेरिका का अपमान” बताया और अमेरिकी ओलंपिक स्कीयर हंटर हेस पर भी निशाना साधा क्योंकि उन्होंने कहा था कि वे अमेरिका की हर बात का प्रतिनिधित्व नहीं करते.
गिरती लोकप्रियता और आर्थिक दावे
ट्रम्प ने दावा किया है कि उन्होंने किराना सामान की कीमतें कम की हैं, जो भ्रामक है. भले ही डॉउ जोन्स 50,000 के पार पहुंच गया हो, लेकिन आम अमेरिकी को इसका फायदा नहीं मिल रहा. ‘सीएनएन’ के पोल के मुताबिक, ट्रम्प की लोकप्रियता अब तक के सबसे निचले स्तर पर है—केवल 36% लोग मानते हैं कि उनकी प्राथमिकताएं सही हैं.
ग्रीनलैंड को खरीदने की बेतुकी मांग हो या 2020 के चुनाव में धोखाधड़ी खोजने के लिए इंटेलिजेंस चीफ तुलसी गबार्ड को जॉर्जिया भेजना, ट्रम्प की हरकतों में एक पैटर्न है: पहले आक्रामक बयान, फिर अधिकारियों की अफरातफरी और अंत में राजनीतिक वास्तविकता से टकराकर पीछे हटना. आगामी मध्यावधि चुनाव यह तय करेंगे कि अमेरिकी जनता ट्रम्प को और छूट देती है या उन पर लगाम लगाती है.
ज्यादातर भारतीय मजे के लिए नहीं पढ़ते - तो फिर देश में 100 साहित्य उत्सव क्यों होते हैं?
भारत में साहित्य उत्सवों (लिटरेचर फेस्टिवल्स) में भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि लोग किताबें भी पढ़ रहे हैं? द गार्डियन की एक रिपोर्ट में अमृत ढिल्लों ने इस विरोधाभास की पड़ताल की है. रोली बुक्स के संस्थापक प्रमोद कपूर एक किस्सा साझा करते हैं जब महान क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी यह जानकर हैरान रह गए थे कि उनकी आत्मकथा की केवल 3,000 प्रतियां छप रही हैं, जबकि उन्हें देखने के लिए स्टेडियम भर जाते थे. सच्चाई यह है कि भारत में अंग्रेजी की औसत किताब 3,000-4,000 प्रतियां ही बिकती हैं; अगर आंकड़ा 10,000 पार कर जाए तो उसे ‘बेस्टसेलर’ माना जाता है.
इसके बावजूद, हर साल सर्दियों में देश भर में 100 से अधिक लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित होते हैं. इसका जवाब यह है कि भारत में ये उत्सव केवल किताबों के बारे में नहीं हैं. यह एक “तमाशा” है, जिसमें संगीत, नृत्य, भोजन, हस्तशिल्प और बॉलीवुड सितारे शामिल होते हैं. बनारस लिट फेस्ट का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट बताती है कि वहां गंभीर साहित्यिक चर्चाओं के साथ-साथ स्टैंड-अप कॉमेडी, साड़ियों की बिक्री और फैशन शो भी चल रहा था.
फुल सर्कल पब्लिशिंग की सीईओ प्रियंका मल्होत्रा कहती हैं, “कई लोगों के लिए, बुक फेस्टिवल एक सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभव है जहां किताब अक्सर मुख्य कार्यक्रम न होकर पृष्ठभूमि में होती है.” मध्यम वर्ग के लिए किताबें खरीदना अभी भी एक विलासिता है. बनारस लिट फेस्ट के अध्यक्ष दीपक मधोक स्वीकार करते हैं कि भीड़ जुटाने के लिए एक “मसाला मिक्स” जरूरी है. वे कहते हैं कि अगर सेल्फी बूथ के बहाने बच्चे किसी एक लेखक को भी सुन लें, तो शायद पढ़ने की आदत का बीज पड़ जाए.
लेखक और पूर्व राजनयिक पवन वर्मा को लगता है कि पढ़ने की संस्कृति में गिरावट आई है. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में युवाओं की भीड़ देखकर वे खुश तो थे, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि अब पाठक साहित्यिक मूल्य वाली गंभीर रचनाओं के बजाय आसान, छोटी और सारांशित सामग्री चाहते हैं. मोबाइल फोन और रील कल्चर ने बचे-खुचे समय पर भी कब्जा कर लिया है.
हालांकि, अंग्रेजी किताबों से इतर क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य जीवंत है, लेकिन उसका डेटा मिलना मुश्किल है. कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक का उदाहरण दिया गया है, जो अपने राज्य में बहुत प्रसिद्ध थीं लेकिन अंग्रेजी अनुवाद के बाद ही उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली. अमेरिकी लेखक डैन मॉरिसन कहते हैं कि इन उत्सवों का कोई नुकसान नहीं है. यह “साहित्य का लोकतंत्रीकरण” है. वहीं, बीएचयू की छात्रा आर्या मोहन आशावादी हैं; उनका मानना है कि अगर मुट्ठी भर लोग भी जागरूक होते हैं, तो यह आयोजन सार्थक है.
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