09/03/2026: ज्ञानेश को हटाने की कोशिश | संसद मेें होहल्ला | खामेनेई के बेटे नया अयातुल्ला | जंग के 10 दिन | तेल के बढ़े दाम | पूरी दुनिया को जंग की तरफ घसीटते ट्रंप | ओड़िसा में बढ़ते हेट क्राइम
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
संसद में घमासान: विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को हटाने का प्रस्ताव किया तैयार.
राहुल गांधी का प्रहार: मध्य पूर्व संकट और अमेरिकी समझौतों पर पीएम मोदी की चुप्पी से अर्थव्यवस्था को नुक़सान का लगाया आरोप.
मिडिल ईस्ट युद्ध: 10वें दिन में पहुँचा संघर्ष, मुज़तबा ख़ामेनेई बने ईरान के नए सुप्रीम लीडर, कच्चा तेल $100 के पार.
भारत पर असर: तेल सप्लाई में बाधा और महंगाई का ख़तरा; विदेश मंत्री बोले- 67,000 भारतीयों को सुरक्षित निकाला गया.
बदले नियम: पीएम मोदी के विदेश दौरों में अंतरराष्ट्रीय समझौतों के लिए अब कैबिनेट की पूर्व मंज़ूरी ज़रूरी नहीं.
हथियार आयात: भारत अभी भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश, लेकिन स्वदेशी उत्पादन से 4% की आई गिरावट.
तेंदुओं का ट्रांसफ़र: महाराष्ट्र के जंगलों से 50 तेंदुए रिलायंस के ‘वंतारा’ भेजे जा रहे हैं, पर्यावरणविदों ने खड़े किए सवाल.
हेट क्राइम और दंगे: ओडिशा में 20 महीने में दंगों के 54 मामले; मोनू मानेसर को 74 गवाहों के बयान न होने पर मिली ज़मानत.
विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव किया तैयार
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा और राज्यसभा दोनों में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के स्पष्ट संख्या बल को देखते हुए यह कदम मुख्य रूप से प्रतीकात्मक है, लेकिन इसका बड़ा राजनीतिक महत्व है. यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के लिए विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करने की उम्मीद है. हालांकि इस नोटिस के ज़रिए मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की जाएगी, लेकिन विपक्ष का असली निशाना एनडीए सरकार है.
सूत्रों के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस ने कुछ दिन पहले कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से कहा था कि अगर वे ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग चलाने के प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए सहमत होते हैं, तो टीएमसी स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ प्रस्ताव का समर्थन करेगी. शुरुआत में टीएमसी बिरला के खिलाफ प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाली पार्टी नहीं थी क्योंकि वह स्पीकर को “विचार करने के लिए कुछ दिन” देना चाहती थी. शनिवार को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी ने घोषणा की कि वह स्पीकर को हटाने के बाकी विपक्ष के कदम का समर्थन करेगी. इसके बाद टीएमसी ने कुमार के खिलाफ नोटिस पर सभी राजनीतिक दलों से संपर्क किया. वह सोमवार को ही इस पर आगे बढ़ना चाहती थी, लेकिन कांग्रेस की इस इच्छा के कारण इसे टाल दिया गया कि दिन के दौरान दोनों सदनों में पश्चिम एशिया संघर्ष का मुद्दा उठाया जाए.
सूत्रों ने बताया कि विपक्ष जिन आधारों पर कुमार को हटाने की मांग करेगा, उनमें से एक उनका “पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण आचरण” है. नोटिस में सुप्रीम कोर्ट की उन टिप्पणियों और फ़ैसलों का भी ज़िक्र होगा जो चुनाव आयोग के अनुकूल नहीं थे.
महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल टीएमसी के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि यह “100% टीम वर्क” था. नेता ने कहा, “ड्राफ्टिंग और योजना बनाना वास्तव में सभी समान विचारधारा वाले दलों का एक सामूहिक प्रयास रहा है. दोनों सदनों में इसका निष्पादन भी पूरी टीम वर्क के साथ होगा. सीईसी ने उस महान पद की गरिमा को पूरी तरह से गिरा दिया है जिस पर वह बैठे हैं.”
मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जाता है?
सीईसी को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पर महाभियोग चलाने के समान है. संविधान के अनुच्छेद 324 (5) में कहा गया है कि “मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है, और नियुक्ति के बाद उनकी सेवा शर्तों में कोई ऐसा बदलाव नहीं किया जाएगा जो उनके लिए नुकसानदेह हो.”
सीईसी और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के आधार वर्ष 2023 के संबंधित अधिनियम की धारा 11 (2) में भी निर्धारित हैं. इसमें स्पष्ट किया गया है कि उन्हें केवल सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया के अनुसार ही पद से हटाया जा सकता है.
न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया ‘न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968’ में निर्धारित है. इसके अनुसार, किसी न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत पर तभी विचार किया जाता है जब लोकसभा में पेश किए जाने पर कम से कम 100 सदस्यों और राज्यसभा में 50 सदस्यों द्वारा इस पर हस्ताक्षर किए गए हों. प्रस्ताव प्रस्तुत होने के बाद, सदन का पीठासीन अधिकारी इसे स्वीकार या अस्वीकार करने का फ़ैसला लेता है.
अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो स्पीकर या सदन के सभापति एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं. इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होते हैं. समिति आरोपों की जांच करती है. जांच पूरी होने के बाद, समिति अपनी रिपोर्ट स्पीकर या सभापति को सौंपती है, जिसे फिर संबंधित सदन में पेश किया जाता है. अगर रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता का निष्कर्ष दर्ज होता है, तो प्रस्ताव पर विचार और बहस होती है.
प्रस्ताव पारित होने के लिए, लोकसभा और राज्यसभा दोनों में “उपस्थित और मतदान करने वाले” कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन ज़रूरी है. एक बार जब दोनों सदन विशेष बहुमत से प्रस्ताव को अपना लेते हैं, तो इसे भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है.
स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव टला, विपक्ष की मांग- पहले पश्चिम एशिया संकट पर हो चर्चा
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा सोमवार (9 मार्च, 2026) को स्पीकर ओम बिरला को हटाने के प्रस्ताव पर विचार करने में विफल रही. बार-बार स्थगन के बीच विपक्ष इस बात पर अड़ा रहा कि पहले पश्चिम एशिया संकट और उस क्षेत्र में रहने वाले करीब एक करोड़ भारतीयों पर इसके प्रभाव को लेकर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए.
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी दलों को “गैर-ज़िम्मेदार” करार दिया, जबकि पीठासीन अधिकारी ने उन पर सदन की कार्यवाही को अपनी मांगों का “बंधक” बनाने का आरोप लगाया. पहले दो बार स्थगित होने के बाद दोपहर 3 बजे सदन फिर से समवेत हुआ, लेकिन कुछ ही देर बाद इसे दिन भर के लिए स्थगित कर दिया गया.
सूत्रों ने संकेत दिया है कि सरकार के विपक्ष की मांग मानने की संभावना नहीं है, क्योंकि विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में पहले ही स्वतः संज्ञान लेते हुए बयान दे चुके हैं. लोकसभा में विपक्ष की लगातार नारेबाजी के बीच जयशंकर ने अपनी बात रखी.
सरकार की प्राथमिकता सबसे पहले स्पीकर को हटाने वाले प्रस्ताव पर बहस शुरू करने की है. गृह मंत्री अमित शाह और रिजिजू के इस मुद्दे पर बोलने की संभावना है, जबकि कांग्रेस लोकसभा में पार्टी के उपनेता गौरव गोगोई और मनीष तिवारी सहित अपने वरिष्ठ नेताओं को मैदान में उतारने की योजना बना रही है.
सदन में बोलते हुए किरेन रिजिजू ने कहा, “मैंने अपनी ज़िंदगी में ऐसा गैर-ज़िम्मेदार विपक्षी दल कभी नहीं देखा. यह विपक्ष इस सदन की बुनियादी नैतिकता, सदन के नियमों और संविधान के मूल्यों को नहीं समझता है.”
हालांकि, विपक्ष के नरम पड़ने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं. वे पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के मद्देनज़र ऊर्जा सुरक्षा और इस संकट पर व्यापक चर्चा की मांग कर रहे हैं. ‘इंडिया’ गठबंधन के विपक्षी दल अपनी अगली रणनीति तय करने के लिए मंगलवार सुबह बैठक करने वाले हैं. सोमवार शाम लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अधिक आक्रामक रुख के संकेत दिए.
संसद परिसर में पत्रकारों से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा, “[पश्चिम एशिया में] यह लड़ाई एक बड़ा बदलाव लाने की कोशिश है. हमारी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होने वाला है, और आपने देखा है कि शेयर बाज़ारों में क्या हुआ है. [प्रधानमंत्री नरेंद्र] मोदी जी ने अमेरिकी व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, और देश को एक बड़ा झटका लगने वाला है.”
गांधी ने सवाल उठाया कि सरकार स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव से पहले पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा करने से क्यों कतरा रही है. उन्होंने कहा, “क्या पश्चिम एशिया का मुद्दा ज़रूरी नहीं है? क्या ईंधन की कीमतें और आर्थिक तबाही महत्वपूर्ण मुद्दे नहीं हैं? ये लोगों के मुद्दे हैं, और हम इन्हें महत्वपूर्ण मानते हैं तथा चर्चा चाहते हैं. लेकिन सरकार चर्चा नहीं करना चाहती क्योंकि इससे अन्य बातें सामने आ जाएंगी. प्रधानमंत्री की स्थिति और उन्हें कैसे ब्लैकमेल किया जा रहा है, इस पर सवाल पूछे जाएंगे. इसीलिए वे चर्चा नहीं करना चाहते.”
लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों की नारेबाजी के कारण सदन को बार-बार स्थगित करना पड़ा. कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे जगदंबिका पाल ने विपक्ष पर सदन को “बंधक” बनाकर करदाताओं के रोज़ाना लगभग ₹9 करोड़ बर्बाद करने का आरोप लगाया. श्री पाल ने विपक्ष के व्यवहार को “अपरिपक्व और गैर-ज़िम्मेदार” बताया और आरोप लगाया कि यह श्री बिरला के खिलाफ प्रस्ताव को सदन में आने से रोकने के “राजनीतिक एजेंडे” के साथ काम कर रहा है.
कार्यवाही शुरू होने से पहले, ‘इंडिया’ ब्लॉक के सांसदों ने संसद के मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया.
इस बीच ‘पीटीआई’ के मुताबिक, विपक्ष के बिरला को हटाने के प्रस्ताव पर अब मंगलवार दोपहर 12 बजे, प्रश्नकाल के तुरंत बाद विचार किए जाने की संभावना है. हालांकि संविधान अध्यक्ष को सदन में अपना बचाव करने का अधिकार देता है, लेकिन पता चला है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बिड़ला के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर बहस का जवाब देंगे. विपक्ष ने आरोप लगाया है कि बिड़ला ने सदन की कार्यवाही चलाने के दौरान “घोर पक्षपातपूर्ण” तरीके से काम किया.
ईरान के साथ नेतृत्व स्तर पर संपर्क इस समय कठिन: राज्यसभा में जयशंकर
इससे पहले, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद को बताया कि वर्तमान परिस्थितियों में ईरान के साथ ‘नेतृत्व स्तर’ पर संपर्क बनाए रखना ‘जाहिर तौर पर कठिन’ हो गया है, भले ही भारत संघर्ष प्रभावित क्षेत्र में राजनयिक पहुंच और निकासी प्रयासों को तेज कर रहा है.
उज्वल जलाली के मुताबिक, विपक्षी सदस्यों की भारी नारेबाजी के बीच राज्यसभा में बयान देते हुए जयशंकर ने कहा कि सरकार पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर करीब से नजर रख रखी है. उन्होंने आगाह किया कि बढ़ते संघर्ष ने सुरक्षा स्थिति को काफी खराब कर दिया है और इससे क्षेत्रीय स्थिरता, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) और भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर जोखिम पैदा हो गया है.
जयशंकर ने कहा कि यह संघर्ष भारत के लिए विशेष चिंता का विषय है. हम इस पड़ोस का हिस्सा हैं और पश्चिम एशिया को स्थिर बनाए रखने में हमारे स्पष्ट हित जुड़े हुए हैं. मंत्री ने उल्लेख किया कि लगभग एक करोड़ भारतीय खाड़ी क्षेत्र में रहते हैं और काम करते हैं, जबकि वर्तमान में कुछ हजार भारतीय शिक्षा और रोजगार के लिए ईरान में हैं.
उन्होंने कहा कि संघर्ष तीव्र हो गया है और अन्य देशों में फैल गया है, जिससे व्यापक विनाश हुआ है और सामान्य जीवन तथा आर्थिक गतिविधियों में स्पष्ट रूप से व्यवधान आया है. इस संकट में भारत को भी जनहानि उठानी पड़ी है. हमने व्यापारिक जहाजों से दो भारतीय नाविकों को खो दिया है, और एक अभी भी लापता है.
ईरान के साथ राजनयिक जुड़ाव पर, जयशंकर ने स्वीकार किया कि वर्तमान में प्रत्यक्ष नेतृत्व-स्तर का संपर्क सीमित है. हालांकि, उन्होंने कहा कि ईरान के विदेश मंत्री ने मानवीय दृष्टिकोण के नाते ईरानी युद्धपोत ‘लवन’ को कोच्चि बंदरगाह पर रुकने की अनुमति देने के लिए भारत के प्रति आभार व्यक्त किया है.
इस बीच, सरकार ने पूरे क्षेत्र में भारतीय नागरिकों की सहायता के लिए प्रयास तेज कर दिए हैं. जयशंकर ने कहा कि रविवार तक लगभग 67,000 भारतीय अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार कर घर लौट चुके हैं.
उन्होंने कहा, “हमारे दूतावास चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं। पश्चिम एशिया से अपने लोगों को वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है.” तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने कई भारतीय छात्रों को राजधानी से सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किया है और व्यापारिक यात्रियों को आर्मेनिया की सीमा पार करने में मदद की है ताकि वे भारत लौट सकें.
‘प्रधानमंत्री भाग गए’: राहुल गांधी ने अमेरिकी समझौते और पश्चिम एशिया पर चुप्पी को लेकर साधा निशाना
सदन के बाहर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव सहित विपक्षी सांसदों ने पश्चिम एशिया संघर्ष पर चर्चा की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया और महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार की “चुप्पी” की आलोचना की.
असद रहमान के अनुसार, सरकार द्वारा विपक्ष पर “गैर-जिम्मेदाराना” होने का आरोप लगाने के बाद, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पलटवार करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद से भाग रहे हैं, क्योंकि वह पश्चिम एशिया की स्थिति पर चर्चा करने से डरे हुए हैं. उन्हें डर है कि उनका “समझौता और ब्लैकमेल” सामने आ जाएगा.
बजट सत्र के दूसरे हिस्से का पहला दिन सोमवार को लोकसभा में धुल गया, क्योंकि विपक्ष पश्चिम एशिया की स्थिति पर “पूर्ण” चर्चा की मांग कर रहा था. लोकसभा की कार्यवाही न चलने के कारण देश को हो रहे “नुकसान” के बारे में पूछे जाने पर गांधी ने कहा, “पश्चिम एशिया में जो हो रहा है, उससे होने वाले आर्थिक नुकसान का क्या? यह एक केंद्रीय मुद्दा है.”
गांधी ने सोमवार दोपहर संसद परिसर में पत्रकारों से कहा, “एक तरह से, एक बुनियादी बदलाव लाने के लिए लड़ाई चल रही है. इसके परिणामस्वरूप हमारी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा. आपने देखा कि शेयर बाजार में क्या हुआ. मोदीजी द्वारा अमेरिकी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं. देश को बड़ा झटका लगने वाला है। इस पर चर्चा करने में क्या समस्या है? हम यही पूछ रहे हैं.”
गांधी ने आगे सवाल किया कि क्या पश्चिम एशिया का मुद्दा और उससे जुड़े मुद्दे, जैसे कि ईंधन की कीमतें, महत्वपूर्ण नहीं हैं? “ईंधन की कीमतें, आर्थिक तबाही. क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है? ये जनता के मुद्दे हैं, और हम इसे आवश्यक मानते हैं. इसके बाद, हम अध्यक्ष के प्रस्ताव (अविश्वास प्रस्ताव) पर चर्चा कर सकते हैं.”
गांधी ने कहा, “वे इस पर (पश्चिम एशिया) चर्चा नहीं करना चाहते क्योंकि अन्य चीजें बाहर आ जाएंगी. प्रधानमंत्री की स्थिति सामने आ जाएगी, प्रधानमंत्री का समझौता और ब्लैकमेल सामने आ जाएगा, और सवाल उठाए जाएंगे. आपने देखा कि प्रधानमंत्री भाग गए. वह अंदर नहीं आ पाएंगे. आप देख सकते हैं.”
विधायक की मौत पर निष्क्रियता के खिलाफ मणिपुर बीजेपी इकाई ने केंद्रीय और राज्य नेतृत्व का किया विरोध
हिंदू की विजेता सिंह की रिपोर्ट के अनुसार, मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के थानलॉन की भारतीय जनता पार्टी इकाई ने पार्टी विधायक वुंगजागिन वाल्टे की मौत के मामले में न्याय सुनिश्चित करने में विफल रहने पर केंद्रीय और राज्य बीजेपी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया.
थानलॉन निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले ज़ोमी जनजाति के बीजेपी विधायक वाल्टे का 21 फरवरी को हरियाणा के गुरुग्राम के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. 4 मई, 2023 को राज्य में कुकी-ज़ो और मैतेई लोगों के बीच जातीय हिंसा भड़कने पर एक भीड़ द्वारा उन पर जानलेवा हमला किया गया था. वे उन गंभीर चोटों से कभी उबर नहीं पाए.
उनका शव चुराचांदपुर जिला अस्पताल के मुर्दाघर में रखा गया है. परिवार और समुदाय के नेताओं ने तब तक अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया है, जब तक कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा जांच और राजनीतिक समाधान सहित उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं.
थानलॉन बीजेपी इकाई ने एक बयान में कहा कि परिवार और समुदाय अभी भी उस हमले के मामले में न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं, जिसमें अंततः वाल्टे की जान चली गई. बयान में कहा गया, “सत्तारूढ़ दल से ताल्लुक रखने वाले एक मौजूदा विधायक की मौत के बावजूद, इस हमले के ज़िम्मेदार लोगों की कोई जवाबदेही तय नहीं हुई है. एनआईए की जांच सहित निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांगों का अभी तक कोई आधिकारिक लिखित जवाब नहीं मिला है.”
बयान में आगे जोड़ा गया कि भले ही स्थिति अनसुलझी है, राज्य सरकार ने 9 मार्च को मणिपुर विधानसभा सत्र फिर से शुरू करने की घोषणा की है.
बयान के मुताबिक, “थानलॉन और पहाड़ी जिलों के कई लोगों के लिए इस फ़ैसले ने एक परेशान करने वाला सवाल खड़ा कर दिया है कि विधानसभा अपनी कार्यवाही कैसे फिर से शुरू कर सकती है जब उसके अपने ही एक सदस्य के लिए न्याय अनसुलझा है और उनके नश्वर अवशेष अभी भी अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा कर रहे हैं?”
इस मुद्दे को लेकर अस्पताल के बाहर करीब 50-60 लोग धरने पर बैठे. थानलॉन से बीजेपी की एक कार्यकर्ता चिंगनौ के हवाले से बयान में कहा गया, “बीजेपी समर्थकों के रूप में, हमने एक बीजेपी विधायक के लिए त्वरित न्याय की उम्मीद की थी. इसके बजाय, थानलॉन बीजेपी मंडल के सदस्यों को विरोध करने के लिए चुराचांदपुर तक 100 किलोमीटर से अधिक की यात्रा करनी पड़ी. अगर एक मौजूदा विधायक को न्याय नहीं मिल सकता है, तो हिंसा के आम पीड़ितों के लिए क्या उम्मीद बची है?”
बयान में इस बात का ज़िक्र किया गया कि वाल्टे एक बीजेपी विधायक थे, और बीजेपी राज्य और केंद्र दोनों जगह सत्ता में है. इसके बावजूद, उनके मामले में न्याय की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है. बयान में कहा गया कि अगर सत्तारूढ़ दल के किसी विधायक को भी न्याय नहीं मिल सकता है, तो थानलॉन में कई लोग अपने राजनीतिक विश्वास पर सवाल उठाने लगे हैं.
मणिकर्णिका घाट एएसआई का संरक्षित स्मारक नहीं, पुनर्विकास विवाद के बीच सरकार ने संसद को बताया
टेलीग्राफ और पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने सोमवार को संसद में बताया कि वाराणसी का मणिकर्णिका घाट भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के तहत संरक्षित स्मारक नहीं है. सरकार ने कहा कि वहां चल रहा काम घाट की मज़बूती को बहाल करने और सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है.
लोकसभा में एक लिखित जवाब में, केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस कार्य को एक “जीर्णोद्धार और संरक्षण परियोजना” करार दिया.
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ऐतिहासिक श्मशान घाट पर पुनर्विकास कार्य को लेकर हाल ही में राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था. कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि निर्माण कार्य से पत्थर से बनी संरचना के कुछ हिस्सों को भारी नुकसान पहुंचा है और इसका ऐतिहासिक स्वरूप प्रभावित हुआ है.
समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने सरकार से पूछा था कि क्या परिवर्तन के नाम पर किए जा रहे निर्माण कार्य के कारण यह प्राचीन स्थल अपनी “ऐतिहासिक और पौराणिक मौलिकता” खो रहा है. उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या घाट के पुरातात्विक स्वरूप को हुए नुकसान की जांच के लिए कोई स्वतंत्र ऑडिट किया गया है.
इस सवाल का जवाब देते हुए शेखावत ने स्पष्ट किया कि यह घाट एएसआई के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है. उन्होंने कहा, “मणिकर्णिका घाट भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकार क्षेत्र में एक संरक्षित स्मारक नहीं है. हालांकि, वाराणसी के जिलाधिकारी से प्राप्त सूचना के अनुसार, मणिकर्णिका घाट पर चल रहा काम एक जीर्णोद्धार और संरक्षण परियोजना है. इसका उद्देश्य गंगा नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखते हुए घाट की मज़बूती को बहाल करना और अंतिम संस्कार के लिए आने वाले परिवारों के लिए बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना है.”
यादव ने यह भी पूछा था कि क्या भारी कंक्रीट निर्माण से गंगा के प्राकृतिक प्रवाह और घाट की स्थिरता को कोई ख़तरा है. इसके जवाब में मंत्री ने कहा कि यह काम संरचना को मज़बूत करने के लिए ही किया जा रहा है.
उन्होंने जवाब दिया कि “चल रहे जीर्णोद्धार और संरक्षण कार्य नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखते हुए घाटों की आधारभूत स्थिरता को मज़बूत करेंगे.” मंत्री ने यह भी ज़िक्र किया कि, “स्थानीय प्रशासन घाटों पर सभी सुविधाएं प्रदान करने के लिए सभी ज़रूरी कदम उठाता है. इस संरक्षण परियोजना की रूपरेखा स्थानीय समुदायों के समन्वय से स्थानीय प्रशासन द्वारा तैयार की गई है और उसी के द्वारा इसे निष्पादित किया जा रहा है.”
पश्चिमी देशों से खरीद बढ़ने के बावजूद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है भारत
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि भारत, यूक्रेन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है, और इतनी बड़ी मात्रा में हथियार आयात करने वाली एकमात्र प्रमुख अर्थव्यवस्था है.
थिंक टैंक के अनुसार, रूस, फ्रांस और इजरायल भारत के शीर्ष हथियार आपूर्तिकर्ता बने हुए हैं, जिनकी भारत के कुल आयात में क्रमशः 40 प्रतिशत, 29 प्रतिशत और 15 प्रतिशत की हिस्सेदारी है.
जवारिया राणा के अनुसार, आंकड़ों से पता चलता है कि 2021 और 2025 के बीच वैश्विक हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी 8.3 प्रतिशत रही, जिससे यह दुनिया भर में दूसरे स्थान पर रहा. इसी अवधि के दौरान, वर्तमान में रूस के साथ युद्ध में लगे यूक्रेन ने 9.7 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त किया.
‘ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स, 2025’ रिपोर्ट के निष्कर्ष यह भी संकेत देते हैं कि आयातित हथियारों पर भारत की निर्भरता में मामूली कमी आई है. पिछले पांच वर्षों की अवधि (2016-2020) की तुलना 2021-2025 से करने पर, रिपोर्ट में पाया गया कि भारतीय हथियार आयात में 4 प्रतिशत की गिरावट आई है.
रिपोर्ट में इस गिरावट का कारण आंशिक रूप से भारत की अपनी हथियार प्रणालियों को डिजाइन और निर्माण करने की बढ़ती क्षमता को बताया गया है, हालांकि घरेलू कार्यक्रमों को अक्सर महत्वपूर्ण देरी का सामना करना पड़ता है.
रिपोर्ट में कहा गया, “2016-20 और 2021-25 के बीच भारतीय हथियार आयात में 4.0 प्रतिशत की गिरावट आई. इस कमी का श्रेय आंशिक रूप से भारत की अपने हथियारों को डिजाइन और उत्पादन करने की बढ़ती क्षमता को दिया जा सकता है, हालांकि घरेलू उत्पादन में अक्सर काफी देरी होती है.”
खाड़ी में जंग | 10वां दिन
कच्चा तेल 100$ पार, खामेनेई का बेटा अब नया सुप्रीम लीडर
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व में लंबे संघर्ष की वैश्विक चिंताओं के बीच सोमवार को दुनिया भर के शेयर बाज़ारों में भारी गिरावट दर्ज़ की गई. इज़राइल और अमेरिका ने ईरान पर ताज़ा हमले किए हैं, जबकि ईरान ने भी अपने पड़ोसियों पर हमले तेज़ कर दिए हैं. मौतों और तबाही का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है. सोमवार को तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई, जो 28 फ़रवरी को युद्ध शुरू होने से ठीक पहले की तुलना में 30 फ़ीसदी से अधिक है. अंतर्राष्ट्रीय बेंचमार्क क्रूड की कीमत कुछ समय के लिए 120 डॉलर तक पहुंच गई थी, लेकिन अमेरिका और छह अन्य औद्योगिक देशों के शीर्ष अधिकारियों की बैठक के बाद इसमें कमी आई. इन देशों ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि दुनिया में ईंधन की कमी न हो.
अयातुल्ला अली खामेनेई के उत्तराधिकारी को जान से मारने की इज़राइली धमकियों के बाद, वरिष्ठ मौलवियों ने सोमवार को मोजतबा खामेनेई को ईरान का नया सर्वोच्च नेता नियुक्त किया. ईरान की सेना और कट्टरपंथी राजनीतिक ताकतों ने इस चुनाव का जश्न मनाया, लेकिन तेहरान में सरकार के विरोधियों को अपनी खिड़कियों से “मोजतबा मुर्दाबाद” के नारे लगाते हुए सुना गया, जो व्यापक लेकिन दबे हुए असंतोष को दर्शाता है.
ग्रुप ऑफ़ 7 (G7) देशों ने सोमवार को वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए बैठक की और फ़ैसला किया कि वे अभी अपने तेल भंडार का इस्तेमाल नहीं करेंगे. हालांकि, उन्होंने यह विकल्प खुला रखा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे अभी भारी कमी को लेकर चिंतित नहीं हैं. AAA मोटर क्लब के अनुसार, अमेरिका में गैसोलीन की कीमत सोमवार को फिर से बढ़कर औसतन 3.48 डॉलर प्रति गैलन हो गई. यह 28 फ़रवरी को ईरान पर पहले अमेरिकी-इज़राइली हमले के बाद से लगभग 17 फ़ीसदी की वृद्धि है और 2024 के बाद का उच्चतम स्तर है.
निवेशक इस बात से काफ़ी चिंतित हैं कि लड़ाई को रोकने का कोई स्पष्ट रास्ता नज़र नहीं आ रहा है. यह युद्ध पूरे मध्य पूर्व में फैल गया है, जिसने तेल की आपूर्ति को बाधित कर दिया है और उपभोक्ताओं व व्यवसायों के लिए लागत बढ़ा दी है. युद्ध के अगले कदमों और इसके अंत को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की योजनाएं अभी भी अस्पष्ट हैं. वहीं ईरान ने बिना शर्त आत्मसमर्पण की उनकी मांग के आगे झुकने का कोई संकेत नहीं दिया है. इसके उलट, ईरान ने अपने मारे गए सर्वोच्च नेता के बेटे को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है, भले ही राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा था कि यह चुनाव “अस्वीकार्य” है.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सोशल मीडिया पर बढ़ती तेल की कीमतों के बारे में शेखी बघारते हुए अपने देश पर हुए हमलों को “ऑपरेशन एपिक मिस्टेक” (महाकाव्य जैसी बड़ी गलती) करार दिया. उन्होंने आगे कहा, “हमारे पास भी कई चौंकाने वाली चीज़ें मौजूद हैं.”
ईरानी अधिकारियों के अनुसार, संघर्ष के 10वें दिन में प्रवेश करते ही ईरान में अमेरिकी और इज़राइली हमलों में लगभग 1,300 लोग मारे गए हैं, जबकि पूरे मध्य पूर्व में ईरानी हमलों में 30 से अधिक लोगों की जान गई है. लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन के अनुसार, इज़राइली हमलों में लेबनान में लगभग 500 लोग मारे गए हैं और 600,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं. ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह द्वारा रॉकेट दागे जाने के जवाब में, इज़राइली सेना दक्षिणी लेबनान में घुस गई है और हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर बमबारी कर रही है.
तुर्की के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि ईरान से दागी गई एक बैलिस्टिक मिसाइल ने तुर्की को निशाना बनाया, जिसे नाटो के रक्षा तंत्र ने मार गिराया. छह दिनों में यह ऐसी दूसरी घटना है. अधिकारियों ने कहा कि 4 मार्च को हुए पिछले ईरानी हमले का निशाना दक्षिणी तुर्की में इन्सिर्लिक एयर बेस था. तुर्की नाटो गठबंधन का सदस्य है, जिसके देश एक-दूसरे की रक्षा करने के लिए बाध्य हैं. ईरान ने तुर्की को निशाना बनाने से इनकार किया है.
इज़राइली आपातकालीन सेवा, मैगन डेविड एडोम के अनुसार, सोमवार सुबह ईरानी मिसाइल हमले के दौरान इज़राइल में कम से कम एक व्यक्ति की मौत हो गई, जिससे देश में मरने वालों की संख्या कम से कम 11 हो गई है. सऊदी अरब ने सोमवार को कहा कि उसने रियाद के ऊपर ड्रोन, सऊदी एयर बेस को निशाना बनाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों और साम्राज्य के विशाल शेबाह तेल क्षेत्र की ओर होने वाले हमलों को रोक दिया है. बहरीन में, राज्य के स्वामित्व वाली ऊर्जा कंपनी ने मौजूदा लड़ाई और अपने रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स पर हाल ही में हुए हमले का हवाला देते हुए घोषणा की कि वह अब अपने अनुबंधों को पूरा नहीं कर सकती.
इसके अलावा, ईरान के नए नेता के कट्टरपंथी होने और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के साथ उनके करीबी संबंधों की चर्चा है. वे केवल धार्मिक और राजनीतिक प्राधिकारी नहीं हैं, बल्कि सशस्त्र बलों के कमांडर इन चीफ़ भी हैं. खाड़ी देशों में ईरानी हमलों में नागरिक हताहतों की संख्या बढ़ रही है. बहरीन के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि सित्रा द्वीप पर ईरानी ड्रोन हमले में बच्चों सहित 32 लोग घायल हुए हैं. कतर ने सऊदी अरब में दो नागरिकों की मौत के लिए ईरान को ज़िम्मेदार ठहराया है. वहीं एक वीडियो से पता चला है कि एक अमेरिकी मिसाइल ने संभवतः एक ईरानी प्राथमिक विद्यालय को निशाना बनाया, जहां 175 लोगों के मारे जाने की खबर है, जिनमें से कई बच्चे थे. यह सबूत श्री ट्रम्प के उस दावे का खंडन करता है जिसमें उन्होंने हमले के लिए ईरान को ज़िम्मेदार ठहराया था. लेबनान में इज़राइली जमीनी बलों ने दक्षिणी इलाके में एक बफ़र ज़ोन बनाने के लिए नए क्षेत्रों पर छापा मारा है. इस बीच, राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने द न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में बताया कि यूक्रेन ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा में मदद करने के लिए इंटरसेप्टर ड्रोन और विशेषज्ञों की एक टीम भेजी है.
सीएनएन की लाइव न्यूज़ रिपोर्ट के मुताबिक, ज़मीनी स्तर पर इज़राइल ने ईरान के तीन क्षेत्रों में शासन के बुनियादी ढांचे पर “बड़े पैमाने पर हमलों की लहर” शुरू कर दी है. वहीं तुर्की ने बताया कि नाटो की वायु रक्षा प्रणालियों ने तुर्की के हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने वाले एक और ईरानी मिसाइल को मार गिराया है. खाड़ी देशों ने भी रात भर हमलों की सूचना दी है.
फ्रांस के वित्त मंत्री के अनुसार, G7 देश तेल भंडार जारी करने के मामले में “अभी वहां तक नहीं पहुंचे हैं”. इस बीच 2022 के बाद पहली बार तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं. युद्ध के कारण ऊर्जा स्थलों पर मंडराते खतरे को देखते हुए बहरीन की राष्ट्रीय तेल कंपनी ने ‘फ़ोर्स मेज्योर’ (अपरिहार्य परिस्थिति) की घोषणा कर दी है.
ईरान के नेतृत्व में एक बड़ा बदलाव आया है. अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को अगला सर्वोच्च नेता नामित किया गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पहले ही कह दिया था कि मोजतबा एक “अस्वीकार्य” विकल्प होंगे और इज़राइल ने किसी भी उत्तराधिकारी को निशाना बनाने की कसम खाई थी.
इस बीच एक नए वीडियो से यह पुष्टि होती दिख रही है कि एक अमेरिकी हवाई हमले ने एक ईरानी स्कूल के बगल में स्थित एक नौसैनिक अड्डे को निशाना बनाया था. अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका “अभी भी जांच कर रहा है”, जबकि ट्रम्प ने इसका दोष ईरान पर मढ़ दिया है.
अमेरिका और इज़राइल ईरान पर लगातार बमबारी कर रहे हैं. इज़राइली हमलों के कारण ईरानी राजधानी में फैले ज़हरीले धुएं के कुछ ही घंटों बाद, कोम और तेहरान में विस्फोटों की सूचना मिली है. ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई का कहना है कि इन हमलों का उद्देश्य “हमारे तेल भंडार पर कब्ज़ा करने के लिए हमारे देश का विभाजन करना है”.
युद्ध के विस्तार के कारण तेल की कीमतों में 25 फ़ीसदी से अधिक का उछाल आया है और यह 2022 के मध्य के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है. कुछ प्रमुख उत्पादक देशों द्वारा आपूर्ति में कटौती और लंबे समय तक शिपिंग में व्यवधान की आशंकाओं ने बाज़ार को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा संघर्ष में जान गंवाने वाले सैनिकों को सम्मानित करने के लिए आयोजित एक समारोह में श्रद्धांजलि देने के एक दिन बाद, आठवें अमेरिकी सैनिक के मारे जाने की पुष्टि हुई है.
द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की के रक्षा मंत्रालय ने सोमवार को कहा कि ईरान से दागी गई एक बैलिस्टिक मिसाइल को नाटो रक्षा प्रणालियों द्वारा तुर्की के हवाई क्षेत्र में रोक दिया गया. पांच दिनों में यह ऐसी दूसरी घटना है. यूएई के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि उसने 15 बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाया, जिनमें से 12 को नष्ट कर दिया गया और तीन समुद्र में गिर गईं. बीबीसी न्यूज़ की पिछली रिपोर्ट के अनुसार, मंत्रालय ने 18 ड्रोनों का पता लगाया, जिनमें से 17 को हवा में ही रोक दिया गया, जबकि एक यूएई क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया.
कतर के रक्षा मंत्रालय ने ‘एक्स’ पर जानकारी दी कि उनकी वायु रक्षा प्रणालियों ने सोमवार को 17 बैलिस्टिक मिसाइलों और छह ड्रोनों को हवा में ही नष्ट कर दिया. मंत्रालय के अनुसार, ये हवाई हमले ईरान की तरफ़ से हुए थे. ईरान ने मोजतबा खामेनेई को उनके मारे गए पिता अली खामेनेई के बाद सर्वोच्च नेता घोषित किया है, जो इस बात का संकेत है कि कट्टरपंथी अभी भी सत्ता में हैं.
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने संघर्ष विराम की संभावनाओं को खारिज़ कर दिया है. ईरान के स्टूडेंट न्यूज़ नेटवर्क ने सोमवार को बताया कि जब तक हमले जारी रहेंगे, ईरान अपनी रक्षा करना जारी रखेगा. मध्य पूर्व में इज़राइल और ईरान के नए मिसाइल और ड्रोन हमलों की गूंज के साथ युद्ध अपने 10वें दिन में प्रवेश कर गया है. मध्य इज़राइल पर दागे गए एक हवाई हमले में एक व्यक्ति की मौत के बाद, इज़राइली सेना ने सोमवार को कहा कि उसने तेहरान, इस्फ़हान और दक्षिणी ईरान में “बड़े पैमाने पर हमलों की लहर” शुरू कर दी है. इज़राइली सेना ने बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में ‘अल-कर्द अल-हसन’ को निशाना बनाना शुरू कर दिया है, जो एक अमेरिकी-प्रतिबंधित वित्तीय संगठन है और जिस पर इज़राइल ने हिज़्बुल्लाह को वित्तपोषित करने का आरोप लगाया है.
लेबनान की राज्य-संचालित राष्ट्रीय समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि सोमवार को दो अलग-अलग हवाई हमलों में इज़राइली सेना ने दो पैरामेडिक्स की हत्या कर दी और छह अन्य को घायल कर दिया. ह्यूमन राइट्स वॉच ने सोमवार को कहा कि इज़राइली सेना ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर में गैरकानूनी रूप से सफ़ेद फ़ॉस्फ़ोरस के गोले दागे हैं. यह अत्यधिक ज़हरीला होता है और इसका इस्तेमाल सेनाओं द्वारा अभियानों को छिपाने के लिए किया जा सकता है. हालांकि इसे रासायनिक हथियार सम्मेलन (सीडब्ल्यूसी) के तहत रासायनिक हथियार के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया है, लेकिन नागरिक परिवेश में मनुष्यों के ख़िलाफ़ इसका उपयोग कुछ पारंपरिक हथियारों पर सम्मेलन (सीसीसीडब्ल्यू) के प्रोटोकॉल III का उल्लंघन माना जाता है.
साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स ने सोमवार को कहा कि साइप्रस ईरान संघर्ष से जुड़े किसी भी सैन्य अभियान में शामिल नहीं होगा, बल्कि अपनी मानवीय भूमिका पर ध्यान केंद्रित करेगा. वहीं यूएन एजेंसी यूनिसेफ़ का अनुमान है कि संघर्ष की शुरुआत के बाद से लेबनान में कम से कम 83 बच्चे मारे गए हैं और 254 घायल हुए हैं. इस दौरान लगभग 200,000 बच्चों सहित 700,000 लोग अपने घरों से विस्थापित हुए हैं.
सप्ताहांत में तेल डिपो पर हुए हवाई हमलों के कारण आसमान में काला धुआं भर गया है और तेहरान के निवासी अभी भी शहर में “प्रलयंकारी” दृश्यों से जूझ रहे हैं. एक निवासी ने द गार्जियन को बताया कि “स्थिति इतनी भयानक है कि इसका वर्णन करना मुश्किल है. धुएं ने पूरे शहर को ढक लिया है. मुझे सांस लेने में तकलीफ़ हो रही है और मेरी आंखों और गले में जलन है. लोग घरों से बाहर जाने को मज़बूर हैं क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है.” इस बीच, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा कि उन्होंने मध्य पूर्वी नेताओं को युद्ध समाप्त करने के लिए वीडियो कॉन्फ़्रेंस में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया है. वैश्विक तेल की कीमतें 2022 के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, क्योंकि युद्ध के कारण बाज़ार से हर दिन 2 करोड़ बैरल तेल गायब हो रहा है.
‘टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश’
ट्रंप की जंग सिर्फ ईरान के खिलाफ नहीं, पूरी दुनिया के खिलाफ है… चाहे बच्चियां हो, या खाड़ी के बाकी देश, या फिर यूरोप, सबको घसीट लिया गया है.
“जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति कहते हैं कि विश्व शांति के लिए यह युद्ध एक ‘बहुत छोटी सी कीमत’ है, तो हमें रुककर सोचना चाहिए कि यह भारी कीमत आखिर चुका कौन रहा है?”
हरकारा के ‘टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश’ के आज के न्यूज़लेटर वीडियो में आपका स्वागत है. मध्य पूर्व का युद्ध अब अपने 10वें दिन में प्रवेश कर चुका है. बमों के धमाकों और राजनीति के शोर के बीच, आज हम उस ‘रोशनी’ यानी उन दूरगामी परिणामों पर बात करेंगे जो सीधे आपकी जेब और भविष्य से जुड़े हैं.
ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई नए ‘सुप्रीम लीडर’ बन गए हैं. दूसरी तरफ़, 2022 के बाद पहली बार कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं. जो खाड़ी देश अपनी शानदार अर्थव्यवस्था के लिए जाने जाते थे, वे भी अब इस विनाशकारी युद्ध की चपेट में आ गए हैं. निर्दोष बच्चों के स्कूलों पर गिरती मिसाइलें और ठप्प होती ग्लोबल सप्लाई चेन साफ़ बता रही है कि आईएमएफ (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) ने दुनिया को मंदी के ‘अनर्थ’ के लिए तैयार रहने की चेतावनी क्यों दी है.
क्या यह सच में शांति की ओर बढ़ता कदम है या किसी बड़ी वैश्विक त्रासदी की शुरुआत? आइए, इस वीडियो में गहराई से समझते हैं कि भू-राजनीति के इन क्रूर फ़ैसलों में आम आदमी कैसे पिस रहा है. वीडियो को अंत तक देखें और अपनी बेबाक राय कमेंट्स में ज़रूर साझा करें.
युद्ध के बीच कौन हैं ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई?
सरकारी मीडिया की खबरों के अनुसार, मुजतबा खामेनेई को ईरान का नया सर्वोच्च नेता चुना गया है. मुजतबा, अयातुल्ला अली खामेनेई के दूसरे बेटे हैं, जो ईरान पर अमेरिका और इजरायल द्वारा शुरू किए गए युद्ध के पहले दिन मारे गए थे.
‘अल जज़ीरा’ की रिपोर्ट के अनुसार, मुजतबा खामेनेई ने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है और न ही वे कभी सार्वजनिक मतदान के दायरे में आए हैं, लेकिन वे दशकों से पिछले सर्वोच्च नेता के आंतरिक घेरे में एक अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति रहे हैं और उन्होंने अर्धसैनिक बल इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के साथ गहरे संबंध विकसित किए हैं.
हाल के वर्षों में, उन्हें उनके पिता के शीर्ष संभावित उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा था. उनके पिता लगभग आठ वर्षों तक राष्ट्रपति रहे और फिर 36 वर्षों तक पूर्ण सत्ता संभाली, जिसके बाद शनिवार, 28 फरवरी को तेहरान में उनके परिसर पर हुए हमलों में वे मारे गए.
छोटे खामेनेई का सत्ता में आना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि ईरानी तंत्र के कट्टरपंथी गुटों का वर्चस्व कायम है. यह इस ओर भी इशारा करता है कि सरकार की अल्पावधि में किसी समझौते या बातचीत की बहुत कम इच्छा है. मुजतबा खामेनेई ने कभी भी उत्तराधिकार के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं की है, जो कि एक संवेदनशील विषय है. ऐसा इसलिए क्योंकि सर्वोच्च नेता के पद पर उनका आसीन होना प्रभावी रूप से एक ऐसे राजवंश का निर्माण करेगा जो 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले के पहलवी राजतंत्र की याद दिलाता है.
इसके बजाय, मुजतबा ने काफी हद तक ‘लो प्रोफाइल’ बनाए रखा है. उन्होंने सार्वजनिक व्याख्यान, शुक्रवार के उपदेश या राजनीतिक संबोधन नहीं दिए हैं—यहाँ तक कि कई ईरानियों ने उनकी आवाज तक नहीं सुनी है, जबकि वे वर्षों से जानते थे कि वह धर्मशास्त्रीय व्यवस्था के भीतर एक उभरता हुआ सितारा हैं.
लगभग दो दशकों से, स्थानीय और विदेशी विरोधियों ने मुजतबा खामेनेई का नाम ईरानी प्रदर्शनकारियों के हिंसक दमन से जोड़ा है. ईरान के भीतर सुधारवादी खेमे ने पहली बार उन पर 2009 के ‘ग्रीन मूवमेंट’ के दौरान चुनावों में हेरफेर करने और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर नकेल कसने के लिए आईआरजीसी के बसीज बल का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था. यह आंदोलन लोकलुभावन नेता महमूद अहमदीनेजाद के विवादास्पद चुनाव जीतने के बाद शुरू हुआ था.
मुजतबा खामेनेई ने युवावस्था से ही आईआरजीसी के भीतर करीबी संबंध विकसित करने शुरू कर दिए थे, जब उन्होंने 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध के दौरान ‘हबीब बटालियन’ में सेवा दी थी. उनके कई साथी, जिनमें अन्य धर्मगुरु भी शामिल थे, आगे चलकर तत्कालीन नवोदित इस्लामी गणराज्य के सुरक्षा और खुफिया तंत्र में प्रमुख पदों पर आसीन हुए.
पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, मुजतबा खामेनेई, जो अमेरिका और पश्चिमी प्रतिबंधों के दायरे में हैं, ने कई देशों में संपत्ति सहित एक आर्थिक साम्राज्य भी खड़ा किया है. माना जाता है कि उनका नाम कथित लेन-देन में सीधे तौर पर नहीं आता है, लेकिन उन्होंने कथित तौर पर ईरानी तंत्र से जुड़े अंदरूनी सूत्रों और सहयोगियों के नेटवर्क के माध्यम से वर्षों में अरबों डॉलर का हस्तांतरण किया है.
मुजतबा खामेनेई की धार्मिक योग्यताएं भी विवाद का विषय रही हैं, क्योंकि वे एक ‘होजतोलेस्लाम’ (एक मध्य-स्तरीय धर्मगुरु) हैं, न कि उच्च पद वाले ‘अयातुल्ला’. लेकिन उनके पिता भी 1989 में देश के नेता बनने के समय अयातुल्ला नहीं थे, और उनके लिए कानून में संशोधन किया गया था. मुजतबा के लिए भी इसी तरह का समझौता संभव हो सकता है.
ईरान को मिला रूस का एक बार और समर्थन, नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई को पुतिन की बधाई
हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक़ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सोमवार को अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के बीच ईरान को अपना “अडिग समर्थन” देने की बात दोहराई है. पुतिन ने कहा कि रूस “अपने ईरानी दोस्तों के साथ एकजुटता और समर्थन” के साथ खड़ा रहेगा.
पुतिन ने ईरान के नए लीडर मुजतबा खामेनेई को पद संभालने पर बधाई भी दी. उन्होंने कहा कि उन्हें भरोसा है कि मुजतबा खामेनेई अपने वालिद के काम को “सम्मान के साथ आगे बढ़ाएंगे” और कठिन हालात में ईरानी जनता को एकजुट करेंगे. पुतिन ने कहा कि ऐसे समय में जब ईरान भारी हमलों का सामना कर रहा है, देश को ऐसे रहनुमा की ज़रूरत है जो इस पद की ज़िम्मेदारी साहस और समर्पण के साथ निभा सके.
तेल $100 के पार: बढ़ते ईरान युद्ध के बीच, भारत के लिए कीमत से बड़ी प्राथमिकता आपूर्ति की सुरक्षा
जैसे-जैसे ईरान युद्ध तेज हो रहा है, सोमवार सुबह कच्चे तेल की कीमतें 30% उछलकर लगभग $120 प्रति बैरल तक पहुंच गईं, जो 2022 के बाद से नहीं देखी गई थीं. हालांकि, उन खबरों के बाद कीमतों में थोड़ी गिरावट आई जिनमें कहा गया था कि G7 देश आपूर्ति की स्थिति सुधारने के लिए अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से समन्वित रूप से तेल छोड़ने पर चर्चा करेंगे, लेकिन फिर भी कीमतें $100 प्रति बैरल से काफी ऊपर बनी रहीं. भारतीय समयानुसार दोपहर 12:30 बजे, ब्रेंट क्रूड अभी भी 16% से अधिक की बढ़त के साथ लगभग $108 प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था.
सुकल्प शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक, यह संघर्ष, जो 28 फरवरी को शुरू हुआ था और फिलहाल जिसका कोई अंत नजर नहीं आ रहा है, उसने लंबे समय तक आपूर्ति बाधित होने की चिंताओं को बढ़ा दिया है. इसका मुख्य कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से टैंकरों की आवाजाही का प्रभावी रूप से रुक जाना और खाड़ी के प्रमुख तेल उत्पादकों द्वारा भंडारण क्षमता समाप्त होने के कारण तेल उत्पादन में कटौती करना है.
इसके अलावा, सप्ताहांत में क्षेत्र के तेल बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) पर बढ़ते हमलों और ईरान द्वारा दिवंगत अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मुजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता नियुक्त किए जाने ने भी कीमतों में उछाल लाने में भूमिका निभाई है. मुजतबा खामेनेई की नियुक्ति ईरान के नेतृत्व में निरंतरता का संकेत देती है; जबकि शासन परिवर्तन ईरान पर अमेरिका-इजरायल हमले का एक प्रमुख उद्देश्य था.
तेल की कीमतों में इस उछाल के साथ, वैश्विक स्तर पर बढ़ती मुद्रास्फीति और ब्याज दरों की चिंताओं के बीच सोमवार को एशियाई शेयर बाजार धराशायी हो गए. भारत में, प्रमुख शेयर बाजार सूचकांक निफ्टी और सेंसक्स शुरुआती कारोबार में लगभग 3% गिर गए, और रुपया भी डॉलर के मुकाबले अपने नए निचले स्तर पर आ गया.
ईरान युद्ध: डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से जूझ रही वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नया खतरा
जॉन पावर ने अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ बढ़ते सैन्य संघर्ष का विश्लेषण किया है. उनका मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा ऊर्जा की बढ़ती कीमतें हैं. ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी ढंग से बंद करने और कतर व सऊदी अरब में ऊर्जा उत्पादन केंद्रों पर हमलों ने दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के एक बड़े हिस्से को ठप कर दिया है. इससे वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ने और आर्थिक विकास रुकने का खतरा पैदा हो गया है.
हॉर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है. इस संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि देखी गई है. ब्रेंट क्रूड की कीमतें संघर्ष-पूर्व के स्तर से लगभग 15% बढ़ गई हैं और $84 प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं (अन्य रिपोर्टों के अनुसार यह $100 के पार भी जा चुका है).
वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ (शुल्क) और उनके द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की स्थापित वैश्विक व्यवस्था को बदलने की कोशिशों से अस्थिर थी. अब यह नया युद्ध अनिश्चितता को और बढ़ा रहा है.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का अनुमान है कि तेल की कीमतों में हर 10% की वृद्धि वैश्विक विकास को 0.15% कम कर देती है. इसका सबसे ज्यादा असर एशिया पर पड़ रहा है, क्योंकि हॉर्मुज से गुजरने वाले तेल का 80% हिस्सा एशियाई देशों में जाता है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान पर हमला अभी कई हफ्तों तक जारी रह सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और इजरायल तेल टैंकरों की सुरक्षा सुनिश्चित कर पाते हैं, तो शायद दुनिया मंदी से बच जाए, लेकिन लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष एक बड़ा आर्थिक संकट पैदा कर सकता है.
ईरान युद्ध से व्लादिमीर पुतिन को कैसे मिल रहा है सबसे बड़ा फायदा
पोलिटिको न्यूज़ के लिए रिपोर्टर इवा हार्टोग की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व में अमेरिकी-इज़राइली हमलों ने तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है. इस स्थिति ने अपने सैन्य अभियानों के वित्तपोषण के लिए क्रेमलिन की क्षमता को काफी मज़बूत कर दिया है.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नए साल में प्रवेश करते हुए एक दर्दनाक विकल्प का सामना किया था - या तो यूक्रेन में अपने तथाकथित विशेष सैन्य अभियान को सीमित करें या अपनी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाने का जोखिम उठाएं. लेकिन रातों-रात, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उन्हें इसका समाधान सौंप दिया. ईरान पर हुए अमेरिकी-इज़राइली हमलों ने तेल की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है, जिससे क्रेमलिन के राजस्व का मुख्य स्रोत बढ़ गया है और पुतिन के लिए अपना युद्ध जारी रखना आसान हो गया है.
इस सप्ताहांत इज़राइल द्वारा ईरानी तेल सुविधाओं पर बमबारी के बाद, बेंचमार्क क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर हो गईं. यह 2022 की गर्मियों के बाद का उच्चतम स्तर है, जब रूस द्वारा यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के बाद बाज़ारों में तेज़ी आई थी. रूस के लिए तेल की कीमतों में यह उछाल एक ऐसे महत्वपूर्ण समय में आर्थिक वरदान के रूप में आया है, जब यूक्रेन में चार साल के युद्ध की लागत घरेलू आर्थिक संकट में बदलने का खतरा पैदा कर रही थी. ईरान पर हमला अपने सहयोगियों के साथ खड़े होने के मॉस्को के दावे को कमज़ोर कर सकता है, लेकिन यह पहले से ही रूस की अर्थव्यवस्था और यूक्रेन के ख़िलाफ़ उसके युद्ध को लाभ पहुंचा रहा है.
कुछ हफ़्ते पहले तक रूस के आर्थिक अभिजात वर्ग में निराशा का माहौल था. रूसी वित्त मंत्रालय की बजट योजना ने देश के मुख्य निर्यात मिश्रण, यूराल्स क्रूड के लिए 59 डॉलर प्रति बैरल का आधारभूत बेंचमार्क माना था. लेकिन जनवरी में, ऊर्जा राजस्व गिरकर अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया था. पश्चिमी प्रतिबंधों, उच्च ब्याज दरों और श्रमिकों की कमी ने अर्थव्यवस्था पर दबाव डाला. कार्नेगी रूस यूरेशिया सेंटर के एक वरिष्ठ फेलो सर्गेई वाकुलेंको ने कहा, “यह पतन से बहुत दूर था. लेकिन सरकार को कड़े विकल्पों का सामना करना पड़ रहा था. यूक्रेन में युद्ध रोकना कभी भी विकल्प नहीं था, लेकिन यह स्पष्ट होता जा रहा था कि उस मोर्चे पर भी रूस को थोड़ी बचत करनी होगी.”
पूर्व उप ऊर्जा मंत्री और निर्वासन में रह रहे क्रेमलिन के आलोचक व्लादिमीर मिलोव ने कहा, “अचानक, मॉस्को को यह उपहार मिल गया. उन्हें अपनी जीवन रेखा मिल गई. इन दिनों रूसी अधिकारी बहुत, बहुत खुश हैं.” पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण छूट पर बेचने के बजाय, रूसी क्रूड अब प्रीमियम कीमतें प्राप्त कर सकता है क्योंकि इसके मुख्य खरीदार - भारत और चीन - आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
ऊर्जा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मॉस्को के लिए जीत का दावा करना अभी जल्दबाज़ी होगी. मिलोव ने कहा कि अर्थव्यवस्था के लिए सार्थक अंतर लाने के लिए रूस को लगभग एक वर्ष तक तेल की कीमतों को वर्तमान स्तर पर बनाए रखने की आवश्यकता होगी. कार्नेगी के विश्लेषक वाकुलेंको ने कहा कि कीमतों में एक संक्षिप्त उछाल केवल “कठिन निर्णयों को स्थगित करने में मदद करेगा.”
मॉस्को को यह भी उम्मीद होगी कि युद्ध लंबा खिंचे, क्योंकि लड़ाई के हर दिन के साथ अमेरिका उन हथियारों के भंडार को कम कर रहा है जिन पर यूक्रेन अपनी रक्षा के लिए निर्भर है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस ईरान को खुफिया जानकारी मुहैया करा रहा है ताकि उसे अमेरिकी युद्धपोतों और विमानों को निशाना बनाने में मदद मिल सके. अमेरिकी-इज़राइली हवाई हमले में ईरान के नेता अली खामेनेई की हत्या ने शायद अपने सहयोगियों की रक्षा करने के रूस के वादे को झटका दिया हो, लेकिन पुतिन अंततः यह तय कर सकते हैं कि यह एक ऐसी कीमत थी जिसे चुकाना उनके लिए फायदेमंद रहा.
ईरान युद्ध में अमेरिका को प्रतिदिन 16 हजार करोड़ रुपये का खर्च आ रहा है?
‘अल जज़ीरा’ में प्रियंका शंकर ने अपनी लंबी रिपोर्ट में लिखा है कि ईरान युद्ध में अमेरिका को प्रतिदिन $1 बिलियन से $2 बिलियन (लगभग ₹8,300 करोड़ से ₹16,600 करोड़) का खर्च आ रहा है. युद्ध के पहले 100 घंटों में ही अमेरिका $3.7 बिलियन खर्च कर चुका है. इसमें से $3.5 बिलियन बजट से बाहर का अतिरिक्त बोझ है.
खर्च का प्रमुख कारण रसद, विमानों की तैनाती और विशेष रूप से गोला-बारूद पर भारी खर्च हो रहा है. अकेले मिसाइलों और गोला-बारूद के भंडार को फिर से भरने में $3.1 बिलियन की आवश्यकता है. एक इंटरसेप्टर मिसाइल की औसत लागत करीब $2 मिलियन है. 2003 के इराक युद्ध के बाद से मध्य पूर्व में यह अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा है. इसमें 120 से अधिक आधुनिक विमान (F-35, F-22 आदि) और दो विमानवाहक पोत तैनात किए गए हैं. ताइवान जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से संसाधनों को हटाकर ईरान के तट पर भेजने से अमेरिका की अन्य वैश्विक मोर्चों पर प्रतिक्रिया देने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
शंकर की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट आई है, क्योंकि उन्होंने चुनाव के समय जीवन-यापन की लागत कम करने का वादा किया था, जबकि अब अरबों डॉलर युद्ध में खर्च हो रहे हैं. विपक्षी नेताओं (जैसे हकीम जेफ्रीज़) और जनता का मानना है कि यह पैसा स्वास्थ्य सेवा, आवास और राशन की कीमतों को कम करने में इस्तेमाल होना चाहिए था.
विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध की यह बढ़ती लागत आने वाले अमेरिकी चुनावों में मतदाताओं के मूड को प्रभावित कर सकती है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि यद्यपि शुरुआती खर्च बहुत अधिक है, लेकिन लंबी अवधि में यह लगभग $800 मिलियन से $1 बिलियन प्रतिदिन के स्तर पर रह सकता है. वर्तमान में अमेरिकी प्रशासन कांग्रेस से युद्ध के लिए और अधिक धन मांगने की तैयारी कर रहा है.
नासिर-जुनैद हत्याकांड: 74 गवाह, लेकिन दो साल में एक के भी बयान नहीं, जमानत मिलने पर आरोपी मोनू मानेसर का ‘हीरो’ जैसा स्वागत
हरियाणा में गौरक्षकों द्वारा दो मुस्लिम पुरुषों की हत्या के 2023 के मामले में आरोपी हिंदुत्व कार्यकर्ता मोनू मानेसर को राजस्थान उच्च न्यायालय से जमानत मिलने के बाद शनिवार शाम भरतपुर केंद्रीय जेल से रिहा कर दिया गया. ‘मकतूब मीडिया’ के अनुसार, गुरुग्राम स्थित अपने पैतृक गाँव पहुँचने पर समर्थकों ने बुलेटप्रूफ जैकेट पहने मोनू का फूलों की मालाओं और ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत किया. 25 वर्षीय नासिर और 35 वर्षीय जुनैद 15 फरवरी, 2023 को लापता हो गए थे और एक दिन बाद उनके जले हुए शव हरियाणा के भिवानी जिले के लोहारू में मिले थे.
आरोप है कि गौरक्षकों ने अवैध रूप से मवेशी ले जाने के संदेह में उनकी हत्या कर दी थी. हालांकि, पुलिस के अनुसार, जब गौरक्षकों को कोई मवेशी नहीं मिला, तो उन्होंने कथित तौर पर सबूत मिटाने के प्रयास में दोनों पुरुषों के साथ मारपीट की और उन्हें आग के हवाले कर दिया.
न्यायमूर्ति अनिल कुमार उपमन की अध्यक्षता वाली राजस्थान उच्च न्यायालय की पीठ ने 5 मार्च को मोनू मानेसर को जमानत देते हुए कहा कि वह दो साल से अधिक समय से हिरासत में है और इस अवधि के दौरान अभियोजन पक्ष के 74 गवाहों में से किसी का भी परीक्षण (बयान) नहीं हुआ है.
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मुकदमे के जल्द समाप्त होने की संभावना नहीं है, क्योंकि अभियोजन पक्ष द्वारा बताए गए 74 गवाहों में से अब तक एक का भी परीक्षण नहीं हुआ है. उनके वकीलों ने कहा कि मानेसर 7 अक्टूबर, 2023 से हिरासत में है और दो साल चार महीने से अधिक समय जेल में बिता चुका है, “याचिकाकर्ता को और अधिक हिरासत में रखने से कोई सार्थक उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा.”
हालांकि, लोक अभियोजक विजय सिंह और शिकायतकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद शाहिद हसन ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि अपराध की गंभीरता और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों को देखते हुए आरोपी जमानत का हकदार नहीं है.
जमानत देते हुए न्यायमूर्ति उपमन ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही सह-आरोपी अनिल कुमार को जमानत दे चुका है और मुकदमे में काफी समय लगने की संभावना है, क्योंकि अब तक कोई गवाह नहीं परखा गया है. मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी किए बिना, अदालत ने हिरासत की अवधि को ध्यान में रखते हुए जमानत आवेदन स्वीकार कर लिया.
ओडिशा: 20 माह में 54 सांप्रदायिक दंगे और मॉब लिंचिंग की सात घटनाएं
मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी द्वारा सोमवार को विधानसभा में दिए गए एक लिखित बयान के अनुसार, जून 2024 और फरवरी 2026 के बीच (20 माह) ओडिशा में 54 सांप्रदायिक दंगे और मॉब लिंचिंग की सात घटनाएं दर्ज की गईं. राज्य में भाजपा सरकार ने 12 जून, 2024 को कार्यभार संभाला था.
‘पीटीआई’ के अनुसार पांच जिलों (भद्रक, मलकानगिरी, बालासोर, कोरापुट और खुर्दा) में सांप्रदायिक दंगे की 54 घटनाएं हुईं, जबकि चार जिलों (देवगढ़, ढेंकानाल, बालासोर और रायगढ़ा) में मॉब लिंचिंग के सात मामले दर्ज किए गए.
इन 20 महीनों के दौरान ओडिशा पुलिस ने दंगों की घटनाओं में कथित तौर पर शामिल 298 लोगों और मॉब लिंचिंग के मामलों में कथित संलिप्तता के लिए 61 अन्य लोगों को गिरफ्तार किया है. मुख्यमंत्री ने कहा कि सांप्रदायिक दंगों और मॉब लिंचिंग की घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाए गए हैं और विभिन्न पुलिस स्टेशनों में शांति समितियां गठित की गई हैं.
ब्रिटिश मीडिया मुसलमानों के प्रति पक्षपातपूर्ण; 40,000 लेखों का विश्लेषण करने वाले समूह ने कहा
एक नए अध्ययन के अनुसार, ब्रिटेन में जहाँ एक ओर मुस्लिम विरोधी नफरती अपराधों (हेट क्राइम्स) में वृद्धि हो रही है, वहीं दूसरी ओर मीडिया में मुसलमानों के प्रति पक्षपातपूर्ण कवरेज भी बढ़ी है.
मुसलमानों और इस्लाम को मीडिया में किस तरह पेश किया जाता है, इसका अध्ययन करने वाले एक गैर-लाभकारी संगठन ‘सेंटर फॉर मीडिया मॉनिटरिंग’ ने सोमवार को जारी एक रिपोर्ट में कहा कि 30 मीडिया संस्थानों के लगभग 40,000 लेखों के आकलन में पाया गया कि 70 प्रतिशत लेखों में मुसलमानों या इस्लाम को नकारात्मक पहलुओं या व्यवहारों से जोड़ा गया.
‘अलजज़ीरा’ में अनेला सफ़दर की रिपोर्ट के अनुसार, समूह की निदेशक रिज़वाना हामिद ने कहा, “ब्रिटेन में अपनी तरह के अब तक के सबसे बड़े अध्ययन के रूप में, यह रिपोर्ट ब्रिटेन के प्रेस में मुसलमानों के चित्रण में संरचनात्मक पक्षपात के चिंताजनक प्रमाण प्रस्तुत करती है.”
रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटेन में मुसलमानों के बारे में प्रकाशित लगभग आधे लेखों, यानी करीब 20,000 लेखों में “उच्च स्तर का पक्षपात” पाया गया.
हामिद ने कहा कि ये आँकड़े हमारे मीडिया तंत्र के भीतर एक “व्यवस्थागत समस्या” की ओर इशारा करते हैं. “जब पूरे समुदायों को बार-बार संदेह या खतरे के नजरिए से पेश किया जाता है, तो यह अनिवार्य रूप से जनता के दृष्टिकोण, राजनीतिक बहस और ब्रिटिश मुसलमानों के दैनिक जीवन को प्रभावित करता है.”
रिपोर्ट में पाया गया कि ब्रिटेन में दक्षिणपंथी मतदाताओं की चिंताओं और हितों को संबोधित करने वाले समाचार संगठनों द्वारा मुसलमानों के बारे में पक्षपातपूर्ण कवरेज करने की संभावना अधिक थी.
यह अध्ययन ऐसे समय में जारी किया गया है जब पूरे ब्रिटेन में मुसलमानों को बढ़ती शत्रुता का सामना करना पड़ रहा है, जिसका आंशिक कारण कट्टर-दक्षिणपंथी सार्वजनिक हस्तियों की बढ़ती लोकप्रियता और अप्रवासन विरोधी भावना का उबाल है. रिपोर्ट में कहा गया है, “मुसलमानों के नकारात्मक चित्रण और बढ़ते नफरती अपराधों, रोजगार में भेदभाव और प्रतिबंधात्मक नीतियों के समर्थन के बीच गहरा संबंध है.”
अक्टूबर में, ब्रिटेन ने रिपोर्ट दी कि मार्च 2025 को समाप्त होने वाले वर्ष के दौरान मुसलमानों के खिलाफ धार्मिक नफरत के अपराध पिछले वर्ष की तुलना में 19 प्रतिशत बढ़ गए. गृह मंत्रालय ने कहा कि 2024 में साउथपोर्ट में लड़कियों की डांस क्लास में हुई सामूहिक चाकूबाजी के बाद मुस्लिम विरोधी नफरती अपराधों में भारी उछाल आया, जिसका दोष सोशल मीडिया पर प्रदर्शनकारियों ने एक काल्पनिक मुस्लिम प्रवासी पर मढ़ा था.
हाल ही में, मस्जिदों को निशाना बनाया गया है, और ब्रिटिश मुसलमानों के साथ-साथ अन्य जातीय अल्पसंख्यक समूहों ने असुरक्षा और बेचैनी की बढ़ती भावना की रिपोर्ट की है, क्योंकि सुदूर-दक्षिणपंथी ‘रिफॉर्म यूके’ पार्टी के उभार के साथ-साथ राष्ट्रवाद की भावना भी बढ़ रही है.
पर्यवेक्षकों का कहना है कि ब्रिटेन में जिस तरह का नस्लवाद वापस लौट रहा है, उसमें 1970 और 1980 के दशक में देखे गए भेदभाव की गूँज सुनाई देती है. प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने पिछले साल के अंत में आईटीवी से कहा था कि यह “हमारे देश को छिन्न-भिन्न कर रहा है.”
‘सेंटर फॉर मीडिया मॉनिटरिंग’ ने अपने अध्ययन के एक उदाहरण में बताया कि दक्षिणपंथी मीडिया ने संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे को बढ़ावा दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि लंदन “शरिया कानून” द्वारा शासित है.
सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में ट्रंप ने कहा था: “मैं लंदन को देखता हूँ, जहाँ आपके पास एक भयानक मेयर है, बहुत ही भयानक मेयर, और वह बदल गया है. वह इतना बदल गया है... अब वे शरिया कानून लागू करना चाहते हैं. लेकिन आप एक अलग देश में हैं. आप ऐसा नहीं कर सकते.”
शरजील इमाम को भाई की शादी के लिए 10 दिन की अंतरिम ज़मानत
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली की एक अदालत ने सोमवार को 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी कार्यकर्ता शरजील इमाम को अपने भाई की शादी में शामिल होने के लिए 10 दिन की अंतरिम ज़मानत दी है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी शरजील इमाम की उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे जिसमें उन्होंने इस महीने होने वाली अपने भाई की शादी में शामिल होने के लिए छह हफ्तों की अंतरिम ज़मानत मांगी थी.
अदालत ने अपने आदेश में इमाम को 20 मार्च से 30 मार्च तक अंतरिम ज़मानत देने की अनुमति दी.
फैक्ट चेक
सेना प्रमुख के नाम से वायरल वीडियो फ़र्ज़ी
सोशल मीडिया पर भारत के सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी का 57 सेकंड का एक वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है. इस वीडियो के साथ दावा किया जा रहा है कि उन्होंने स्वीकार किया है कि भारत ने ईरान के नौसैनिक जहाज़ की लोकेशन इज़राइल को बताई थी, यह वही आईरिस डेना जहाज़ है जिसकी श्रीलंका के दक्षिणी तट के पास अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा टॉरपीडो से निशाना बनाए जाने की खबर आई थी.
‘ऑल्ट न्यूज़’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह वीडियो फ़र्ज़ी है. उनकी जांच में सामने आया कि यह फर्स्टपोस्ट का 7 मार्च को अपलोड किया गया 21 मिनट का एक इंटरव्यू है. इस इंटरव्यू में उपेंद्र द्विवेदी पत्रकार हर्ष वी. पंत के साथ ऑपरेशन सिंदूर और भविष्य की युद्ध रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं. पूरे इंटरव्यू में कहीं भी उन्होंने अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष या ईरानी जहाज़ डूबने की घटना का ज़िक्र नहीं किया. इससे साफ है कि वायरल वीडियो उसी इंटरव्यू से लिया गया है.
इस वायरल वीडियो में सेना प्रमुख के नाम से कहा जा रहा है कि भारत ईरान की स्थिति पर नज़र रख रहा है, इज़राइल उसका करीबी सहयोगी है और जब तक ईरानी जहाज़ भारतीय जलक्षेत्र में था तब तक सुरक्षित था. लेकिन अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में पहुंचने के बाद “रणनीतिक समझौते” के तहत इज़राइल को उसकी सटीक लोकेशन बताना भारत का कर्तव्य था. वीडियो में यह भी कहा जा रहा है कि ईरानी जहाज़ भारतीय क्षेत्र में नष्ट नहीं हुआ और भारत का हमले में कोई सीधा रोल नहीं था.
पीएम के विदेश दौरों में होने वाले समझौतों के लिए अब कैबिनेट की मंज़ूरी ज़रूरी नहीं
द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री के विदेश दौरों के दौरान होने वाले कुछ अंतरराष्ट्रीय समझौतों के लिए अब पहले से केंद्रीय कैबिनेट की मंज़ूरी लेना ज़रूरी नहीं होगा. अख़बार के मुताबिक उसने कैबिनेट सचिवालय की नई गाइडलाइन देखी है, जिसमें कहा गया है कि प्रधानमंत्री के किसी विदेशी दौरे के दौरान या किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की भारत यात्रा के समय होने वाले कुछ अंतरराष्ट्रीय समझौतों के लिए पहले कैबिनेट की स्वीकृति ज़रूरी नहीं होगी.
कैबिनेट सचिवालय समय-समय पर 1961 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया (ट्रांजैक्शन ऑफ बिज़नेस) रूल्स के तहत सभी केंद्रीय मंत्रालयों के सचिवों को निर्देश जारी करता है. इन निर्देशों में यह बताया जाता है कि किन मामलों को कैबिनेट के सामने पहले मंज़ूरी के लिए, बाद में मंज़ूरी के लिए या केवल जानकारी के लिए रखा जाना ज़रूरी है.
नई गाइडलाइन के मुताबिक विदेश मंत्रालय हर छह महीने में एक कैबिनेट नोट तैयार करेगा, जिसमें उस अवधि के दौरान हुए सभी ऐसे समझौतों की सूची कैबिनेट के सामने सिर्फ जानकारी के लिए रखी जाएगी. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस गाइडलाइन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है. आलोचकों का कहना है कि इससे कैबिनेट की भूमिका कम हो सकती है, जबकि भारत में शासन प्रणाली कैबिनेट आधारित है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति ज़िम्मेदार होती है और प्रधानमंत्री को “बराबरों में पहला” माना जाता है.
हेट क्राइम
रमज़ान के दौरान बढ़ते हमले: छात्रों से बदसलूकी, नमाज़ पढ़ने पर केस और कई जगहों पर कार्रवाई
आर्टिकल-14 ने रमज़ान के महीने के दौरान देश में मुसलमानों के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा और उत्पीड़न पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. रिपोर्ट के अनुसार पंजाब, लखनऊ और उत्तराखंड समेत कई जगहों से ऐसे मामले सामने आए हैं.
पंजाब के लुधियाना स्थित सीटी यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे कश्मीरी मुस्लिम छात्रों के मुताबिक़ पिछले कुछ सालों में जब भी देश के अन्य हिस्सों में कश्मीरी मुस्लिम छात्रों के साथ भेदभाव हुआ, तब भी उन्हें अपने कैंपस में सुरक्षित महसूस होता था, लेकिन पिछले सप्ताह स्थिति तब बदल गई, जब कुछ छात्रों ने विश्वविद्यालय से पुरानी परंपरा के अनुसार रमज़ान के दौरान गरीब मुस्लिम छात्रों के लिए इफ्तार खाना एक घंटा पहले देने की मांग की.
शुरुआत में विश्वविद्यालय ने इस मांग को अनदेखा कर दिया. बाद में बहस के दौरान छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर नितिन टंडन ने उन्हें गालियां दीं. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें टंडन को कहते हुए सुना गया: “इन सब को बाहर निकालो… इन सबका एडमिशन कैंसिल.” छात्रों को कमरों में वापस जाने की अनुमति नहीं दी गई. उन्होंने केवल पानी और केले से रोज़ा रखा.
लखनऊ यूनिवर्सिटी में भी लाल बारादरी इमारत के भीतर बने मुसलमानों के लिए बने इबादतगाह को मरम्मत का कारण बताकर बंद कर दिया गया. छात्रों के मुताबिक़ 22 फरवरी को उन्होंने देखा कि इमारत के दरवाजे बंद किए जा रहे हैं और खिड़कियों को ईंट से बंद किया जा रहा है. विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने बताया कि इमारत की मरम्मत ज़रूरी है. इबादतगाह के बंद होजाने के बाद जब छात्रों ने बाहर लॉन में नमाज़ पढ़ी, जिसके दो दिन बाद हिंदुत्व संगठनों के लोगों ने “जय श्री राम” के नारे लगाए और हनुमान चालीसा का पाठ किया और उस जगह को “शुद्ध” करने की मांग की. इतना ही नहीं विश्वविद्यालय ने उन छात्रों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराई जिन्होंने वहां नमाज़ पढ़ी थी या सुरक्षा के लिए खड़े थे.
उत्तराखंड में एक मुस्लिम व्यक्ति शाहिद को खेत में अकेले नमाज़ पढ़ते समय एक हिंदू व्यक्ति ने लात-घूंसे और लकड़ी से पीटा. हमलावर ने उससे “जय श्री राम” के नारे लगवाए और कहा, “मेरी ब्राह्मण की ज़मीन पर नमाज़ कैसे पढ़ रहा है.” मध्य प्रदेश के जबलपुर में 19 फरवरी को मस्जिद में तरावीह की नमाज़ के दौरान कुछ हिंदू लोग पुलिस आदेश के बावजूद आरती करने पर अड़े रहे, जिसके बाद झड़प हो गई. महाराष्ट्र के मालेगांव में नगर निगम की इमारत के एक कमरे में नमाज़ पढ़ने के वीडियो के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की.
मुंबई के डोंगरी, भेंडी बाजार और पायधोनी इलाकों में रमज़ान बाज़ार के लिए मशहूर सैकड़ों स्ट्रीट वेंडरों को रमज़ान से ठीक पहले हटाया गया. यह कार्रवाई उस बयान के बाद हुई जिसमें मुंबई की भाजपा मेयर ऋतु तावड़े ने “बांग्लादेशी हॉकरों” को हटाना प्राथमिकता बताया था. तेलंगाना के संगारेड्डी जिले में अधिकारियों ने बिना नोटिस एक कथित अवैध मस्जिद को गिरा दिया, जबकि रमज़ान की नमाज़ शुरू हो चुकी थी. उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ में भी एक नगरपालिका हॉल को सील कर दिया गया, जहां मुसलमान रमज़ान में नमाज़ पढ़ते थे. इसके बाद लोगों को जुमे की नमाज़ घरों में पढ़नी पड़ी.
महाराष्ट्र से 50 तेंदुए ‘वंतारा’ भेजे जाएंगे; आरोप- “जंगलों में निवेश को आसान बनाने हटाए जा रहे शिकारी जानवर”
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक़ महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के कुछ इलाकों में बढ़ रहे मानव-तेंदुआ टकराव को कम करने के लिए 50 तेंदुओं को गुजरात के जामनगर स्थित वंतारा भेजने का फैसला किया है, जिसपर पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने ऐतराज़ ज़ाहिर किया है. वंतारा रिलायंस समूह का वन्यजीव बचाव और पुनर्वास केंद्र है. ‘पीटीआई’ की रिपोर्ट में कहा गया कि यह कदम महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में बढ़ रही मानव-तेंदुआ मुठभेड़ों को कम करने के उद्देश्य से उठाया गया है. हालांकि कई संरक्षण विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस फैसले की ज़रुरत पर सवाल उठाए हैं. वंतारा ने 8 मार्च को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा कि 50 में से 20 तेंदुए पहले ही वहां पहुंच चुके हैं.
वंतारा ने एक बयान में कहा कि उसने यह सहायता महाराष्ट्र वन विभाग के अनुरोध पर दी है और इन तेंदुओं को “लंबे समय तक देखभाल” के लिए रखा जाएगा. बयान में विद्या आत्रेया और अन्य वैज्ञानिकों की 2011 की एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा गया कि संघर्ष वाले क्षेत्रों से तेंदुओं को पकड़कर दूसरी जगह छोड़ना प्रभावी समाधान नहीं है और इससे कई बार संघर्ष बढ़ भी सकता है. वंतारा के अनुसार ऐसे मामलों में पकड़े गए तेंदुए अक्सर लंबे समय तक छोटे पिंजरों में रहने के कारण तनाव और सदमे में होते हैं, इसलिए उन्हें लंबे समय तक पशु-चिकित्सा और व्यवहार संबंधी देखभाल की जरूरत होती है.
हालांकि उसी अध्ययन में यह भी कहा गया है कि तेंदुओं को पकड़कर कैद में रखना भी कई समस्याएं पैदा करता है. इस अध्ययन में महाराष्ट्र के जुन्नर क्षेत्र में रेडियो कॉलर लगाए गए 29 तेंदुओं की गतिविधियों का विश्लेषण किया गया था और पाया गया कि जब तेंदुओं को एक जगह से पकड़कर दूसरी जगह छोड़ा गया, तो उस इलाके में मानव-तेंदुआ हमलों की घटनाएं लगभग चार गुना बढ़ गईं. अध्ययन में कहा गया है कि जंगली जानवरों को पकड़कर जीवन भर कैद में रखना आर्थिक, व्यवस्थागत और पशु कल्याण से जुड़ी समस्याएं पैदा करता है. इसलिए विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि मानव-तेंदुआ संघर्ष को कम करने के लिए संघर्ष-निवारण उपाय अपनाए जाएं, जैसे पशुधन के नुकसान का बेहतर मुआवजा, पशुओं की सुरक्षा के बेहतर तरीके और लोगों में इस बात की स्वीकृति बढ़ाना कि तेंदुए भी उसी इलाके में रह सकते हैं.
वन्यजीव जीवविज्ञानी अरित्रा क्षेत्री, जिन्होंने पश्चिम बंगाल में मानव-तेंदुआ संबंधों पर अध्ययन किया है, कहते हैं कि कुछ खास मामलों में तेंदुओं को पकड़ना जरूरी हो सकता है, खासकर जब वे लोगों पर हमला करते हों. लेकिन बड़े पैमाने पर तेंदुओं को पकड़ना उचित नहीं है, क्योंकि खाली हुए क्षेत्र में जल्दी ही दूसरे तेंदुए आ जाते हैं. जुन्नर वन प्रभाग, जहां से ये 50 तेंदुए पकड़े गए हैं, पुणे वन मंडल के अंतर्गत आता है और इसके पास कलसुबाई-हरिश्चंद्रगढ़ वन्यजीव अभयारण्य और भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य भी स्थित हैं.
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने तेंदुओं को वंतारा भेजने के फैसले पर सवाल उठाए हैं. मुंबई की संस्था वनशक्ति के संस्थापक स्टालिन दयानंद का कहना है कि जंगलों में तेजी से बन रहे बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट और निवेश को आसान बनाने के लिए शिकारी जानवरों को हटाया जा रहा है. उनके अनुसार जब जंगलों में बड़े शिकारी जानवर होते हैं तो वह इलाका निवेशकों के लिए कम आकर्षक बन जाता है, इसलिए उन्हें हटाने की कोशिश की जाती है. पर्यावरणविद विमलेंदु झा ने कहा कि जंगली जानवर कोई “राजनीतिक उपहार या कॉर्पोरेट संपत्ति” नहीं हैं जिन्हें मनचाहे तरीके से स्थानांतरित किया जा सके.
अपील :
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