10.02.2026: अमेरिकी डील इकतरफा और अपमानजनक | बिरला के ख़िलाफ अविश्वास प्रस्ताव आएगा | नरवणे की किताब और राहुल | सिर्फ लद्दाख नहीं, भूटान सीमा पर भी सक्रिय था चीन | मोदी की डिग्री | भारत और भ्रष्ट
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
ट्रेड डील विश्लेषण: विशेषज्ञों ने भारत-अमेरिका समझौते को ‘अपमानजनक’ और ‘एकतरफा’ बताया.
संसदीय गतिरोध: विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया.
किताब विवाद: पेंगुइन ने कहा नरवणे की किताब पब्लिश नहीं हुई. राहुल गांधी बोले- अमेज़न पर लिस्टेड थी.
चीन पर खुलासा: नरवणे के संस्मरण के अनुसार चीन ने 2020 में भूटान के ज़रिए भी भारत पर दबाव बनाया था.
यूपीआई संकट: तकनीकी खराबी से देशभर में डिजिटल भुगतान रुका. लोग परेशान.
भ्रष्टाचार रिपोर्ट: करप्शन इंडेक्स में भारत 91वें स्थान पर. स्थिति में सुधार नहीं.
सोशल मीडिया नियम: सरकार का आदेश. अब 3 घंटे में हटानी होगी गैरकानूनी सामग्री.
भारत अमेरिका व्यापार समझौता : तीन विश्लेषण
सुभाष चंद्र गर्ग : पूरी तरह से अपमान और आपदा
डेक्कन हेराल्ड में प्रकाशित अपने लेख में पूर्व वित्त और आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की कड़ी आलोचना की है. उनका मानना है कि भारत ने ट्रम्प को खुश करने के लिए बजट 2025-26 में व्हिस्की, मोटरसाइकिल और मेडिकल उपकरणों पर टैरिफ कम किए, लेकिन इसके बदले में भारत को एक ऐसा सौदा मिला जो अपमानजनक है.
गर्ग लिखते हैं कि फरवरी 2026 की शुरुआत में घोषित इस समझौते में भारत को रूसी तेल खरीदना बंद करने पर सहमत होना पड़ा है. इसके बदले में ट्रम्प ने केवल उस 25% अतिरिक्त शुल्क को हटाया है जो रूसी तेल खरीदने की सजा के रूप में लगाया गया था. लेकिन, भारत के निर्यात पर 18% का ‘पारस्परिक शुल्क’ अभी भी लागू रहेगा. वहीं, भारत ने अमेरिकी औद्योगिक सामानों और कृषि उत्पादों पर टैरिफ को ‘शून्य’ या बहुत कम करने का वादा किया है.
लेखक का विश्लेषण है कि इस सौदे में किसानों के लिए कोई सुरक्षा नहीं है. भारत ने जीएम सोयाबीन तेल, मक्का और पोल्ट्री उत्पादों के आयात के लिए दरवाजे खोल दिए हैं, जिससे घरेलू किसानों पर असर पड़ेगा. साथ ही, एमएसएमई सेक्टर को भी बड़ा झटका लगेगा क्योंकि भारत के लेबर-इंटेंसिव उत्पादों (कपड़ा, चमड़ा आदि) को अमेरिका में 18% टैरिफ देना होगा, जबकि वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के खिलाफ यह कोई लाभ नहीं देता. गर्ग ने निष्कर्ष निकाला है कि भारत को यह सौदा नहीं करना चाहिए था क्योंकि यह “पूरी तरह से अपमान और आपदा” है, जो आने वाले दशकों तक भारत को परेशान करेगा.
‘द क्विंट’ में सुभाष चंद्र गर्ग का यह लेख भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए व्यापार समझौते (ट्रेड डील) का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है. इसमें बताया गया है कि भारत ने एक ऐसी डील की है जो न केवल खराब है, बल्कि इसे टाला भी जा सकता था.
लेखक का तर्क है कि भारत ने यह समझौता भारी दबाव और गलत समय पर किया. अगस्त 2025 में जब अमेरिका ने भारतीय सामानों पर दंडात्मक शुल्क बढ़ाकर 50% कर दिए थे (खासकर रूसी तेल खरीदने के कारण), तब भारत ‘बैकफुट’ पर आ गया था.
समझौते के तहत अमेरिका ने शुल्क 50% से घटाकर 18% तो कर दिए, लेकिन गर्ग इसे जीत नहीं मानते. उनका कहना है कि 18% शुल्क भी पहले की तुलना में बहुत अधिक है और भारत को अमेरिका की “प्रतिकूल व्यापार नीतियों” (पारस्परिक शुल्कों) के सामने झुकना पड़ा.
समझौते के बदले भारत ने अगले 5 वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर के उत्पाद (ऊर्जा, विमान, तकनीक आदि) खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है. लेखक इसे एकतरफा और भारतीय हितों के लिए नुकसानदेह मानते हैं क्योंकि भारत पहले से ही व्यापार अधिशेष (ट्रेड सरप्लस) की स्थिति में था.
समझौते की एक बड़ी शर्त यह रही कि भारत को रूस से तेल की खरीद कम करनी पड़ी. लेख के अनुसार, अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की कीमत पर यह आर्थिक समझौता करना भारत की कूटनीतिक हार जैसा है.
इसमें कहा गया है कि भारत को अमेरिकी दबाव के आगे इतनी जल्दी घुटने टेकने के बजाय अन्य बाजारों (जैसे यूरोपीय संघ या ब्रिटेन) के साथ सौदेबाजी पर अधिक ध्यान देना चाहिए था.
सार यह है कि भारत ने ‘अल्पकालिक राहत’ (टैरिफ कम करवाने) के लिए ‘दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक हितों’ से समझौता कर लिया है. इसे एक “रक्षात्मक समझौता” कहा गया है जो भारत की उभरती वैश्विक शक्ति की छवि के अनुरूप नहीं है.
एंडी मुखर्जी: मोदी की अमेरिका के साथ ट्रेड डील किसी ‘आईएमएफ बेलआउट’ जैसी
ब्लूमबर्ग के कॉलमनिस्ट एंडी मुखर्जी ने अपने लेख में तर्क दिया है कि अमेरिका और भारत के बीच हालिया व्यापार समझौता दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक सम्मानजनक समझौता कम, और एक ‘आईएमएफ बेलआउट’ जैसा ज्यादा लगता है. अंतर सिर्फ इतना है कि सुधार के लिए मदद मिलने के बजाय, भारत अमेरिका के रणनीतिक दायरे में खुद को बहाल करने के लिए 500 अरब डॉलर का भुगतान करेगा.
मुखर्जी लिखते हैं कि थाईलैंड, मलेशिया और वियतनाम जैसे प्रतिद्वंद्वियों ने जहां पक्के समझौते हासिल किए, वहीं भारतीयों के लिए यह एक “अंतरिम” ढांचे जैसा है. भारतीय निर्यातकों को अगस्त से लागू 50% शुल्क पर छूट मिल रही है—जिसमें से आधा शुल्क यूक्रेन युद्ध में रूस की मदद करने (रूसी तेल खरीदने) की सजा के रूप में था. लेकिन यह कोई माफी नहीं, बल्कि पैरोल है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक के नेतृत्व में एक समिति की घोषणा की है जो यह निगरानी करेगी कि भारत “प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से” रूसी तेल का आयात तो नहीं कर रहा. जरा सी चूक होने पर 25% दंडात्मक शुल्क फिर से लगाया जा सकता है.
लेख में तुलना की गई है कि दक्षिण पूर्व एशिया के लिए अमेरिका ने “स्केलपल” (सर्जिकल चाकू) का इस्तेमाल किया है, जहां केवल चीनी सामान की संदिग्ध खेप पर कार्रवाई होती है. लेकिन भारत के लिए “टूर्निकेट” (रक्तस्राव रोकने वाली पट्टी) का इस्तेमाल किया गया है, जहां एक गलती पूरे सौदे को रोक सकती है. यह अनिश्चितता भारतीय निर्यातकों की लागत बढ़ाएगी. वॉलमार्ट या टारगेट जैसी अमेरिकी कंपनियां अब भारतीय फैक्ट्रियों से यह शपथ पत्र मांग सकती हैं कि उन्होंने “अप्रत्यक्ष रूसी ऊर्जा” का उपयोग नहीं किया है.
राजनीतिक कीमत भी बहुत अधिक है. भारत ने अपने 580 अरब डॉलर के कृषि क्षेत्र के महत्वपूर्ण हिस्सों को खोलने पर सहमति व्यक्त की है. अमेरिका को जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) मक्का से बने पशु आहार के निर्यात की अनुमति मिल गई है, जो भारतीय किसानों के लिए चिंता का विषय है. एंडी मुखर्जी का मानना है कि 1991 के आर्थिक सुधारों की तरह, यह सौदा बाजार तक पहुंच बहाल करने के लिए भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का सौदा कर रहा है.
प्रताप भानु मेहता : भारत-अमेरिका सौदा एकतरफा है, यह कमजोरियां पैदा करता है
इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख में, प्रसिद्ध राजनीतिक टिप्पणीकार प्रताप भानु मेहता लिखते हैं कि व्यापार कभी भी केवल व्यापार नहीं होता. भारत का अमेरिका के साथ हुआ यह सौदा “सामरिक समर्पण” की कहानी कहता है. यह समझौता पारस्परिक मुक्त व्यापार समझौता नहीं है. जैसा कि ट्रम्प ने स्पष्ट किया है, अमेरिका समानता के लिए नहीं, बल्कि “साम्राज्यवादी प्रभुत्व” के लिए खेल रहा है.
मेहता का तर्क है कि यह सौदा 19वीं सदी के औपनिवेशिक व्यापार की याद दिलाता है. टैरिफ संरचना अमेरिका के पक्ष में है: भारत टैरिफ को शून्य कर देता है, जबकि अमेरिका 18% तक की दरें लगाता है. सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि भारत ने पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है. मेहता सवाल करते हैं कि कौन सा मुक्त-व्यापार समझौता किसी एक पक्ष पर दूसरे से बड़े पैमाने पर सामान खरीदने का एकतरफा दायित्व डालता है?
लेख में कहा गया है कि यूक्रेन युद्ध और रूसी तेल पर भारत का रुख अब बाहरी दबाव से तय हो रहा है. “यह दावा अब खोखला लगता है कि कोई भी शक्ति भारत के संबंधों को परिभाषित नहीं कर सकती.” मेहता चेतावनी देते हैं कि अमेरिका भारत को अपनी सुरक्षा के लिए एक स्वायत्त ध्रुव के रूप में नहीं, बल्कि चीन को प्रबंधित करने के लिए एक ‘उपकरण’ के रूप में देखता है. यह समझौता भारत की स्वतंत्र निर्णय क्षमता को कम करता है और यह “हमारी अपनी कमी की बदबू” को छिपा नहीं सकता.
ओम बिरला के खिलाफ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ लाएगा विपक्ष
कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के लिए ‘अविश्वास प्रस्ताव’ लाने का निर्णय लिया है. यह फैसला मंगलवार सुबह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में हुई ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं की बैठक के बाद लिया गया.
प्रीता नायर की रिपोर्ट के अनुसार, यह निर्णय संसद में जारी निरंतर व्यवधानों के बीच आया है, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष द्वारा कांग्रेस सांसद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी को सदन में बोलने की अनुमति न दिए जाने का विवाद भी शामिल है.
कांग्रेस के मुख्य सचेतक सुरेश कोडिकुन्निल और मोहम्मद जावेद द्वारा लोकसभा महासचिव उत्पल कुमार सिंह को प्रस्ताव का नोटिस सौंप दिया गया है. यह नोटिस कांग्रेस सांसदों और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बीच हुई बातचीत का कोई परिणाम न निकलने के बाद दिया गया. कांग्रेस नेताओं ने कहा कि उन्होंने सांसदों के 106 हस्ताक्षर जुटा लिए हैं, जो संसद में प्रस्ताव लाने के लिए आवश्यक 100 हस्ताक्षरों की शर्त को पूरा करता है. इस प्रस्ताव को समाजवादी पार्टी और द्रमुक का समर्थन प्राप्त है, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने अभी तक औपचारिक रूप से अपनी स्थिति घोषित नहीं की है. उसके नेता इस बैठक में शामिल नहीं हुए थे.
विपक्ष ने यह कदम सोमवार को सदन में हुई तीखी नोकझोंक के बाद उठाया है, जब अध्यक्ष ने विपक्षी दलों पर व्यवधान “नियोजित” करने का आरोप लगाया था. बजट चर्चा शुरू होने से पहले राहुल गांधी को बोलने की अनुमति देने की मांग पर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध के चलते लोकसभा की कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित कर दी गई थी.
संसद में 2 फरवरी से ही बार-बार व्यवधान देखा जा रहा है. विपक्ष कई मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन कर रहा है, जिसमें अध्यक्ष द्वारा राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे के संस्मरण (जो 2020 के भारत-चीन सीमा संघर्ष पर आधारित है) के एक लेख को उद्धृत करने से रोकना शामिल है. पिछले सप्ताह, सदन में हंगामे के बाद कांग्रेस के सात सांसदों और माकपा के एक सदस्य को शेष सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया था.
लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: क्या है हटाने की प्रक्रिया?
इंडियन एक्सप्रेस की ‘एक्सप्लेंड’ रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा के बीच यह जानना जरूरी है कि संविधान में स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया क्या है. क्या पहले भी किसी स्पीकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव लाया गया है?
संविधान के अनुच्छेद 94 (सी) के तहत, लोकसभा के स्पीकर या डिप्टी स्पीकर को सदन के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है. यह प्रक्रिया राज्यसभा पर लागू नहीं होती. अनुच्छेद 94 के अनुसार, स्पीकर को अपना पद छोड़ना होगा यदि वे सदन के सदस्य नहीं रहते, या वे इस्तीफा दे देते हैं, या सदन द्वारा संकल्प पारित करके उन्हें हटा दिया जाता है.
प्रक्रिया क्या है?
किसी भी सदस्य को स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा महासचिव को लिखित में नोटिस देना होता है. इस नोटिस पर कम से कम दो सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए और प्रस्ताव लाने के इरादे की सूचना कम से कम 14 दिन पहले दी जानी चाहिए. नोटिस मिलने के बाद, स्पीकर द्वारा तय किए गए दिन (जो नोटिस के 14 दिन बाद का हो) पर इसे ‘लिस्ट ऑफ बिजनेस’ में शामिल किया जाता है.
क्या पहले ऐसा हुआ है?
हाँ, इतिहास में तीन बार—1954 में जी.वी. मावलंकर, 1966 में हुकम सिंह और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. हालांकि, इनमें से किसी को भी इस प्रस्ताव के कारण अपनी कुर्सी नहीं गंवानी पड़ी.
नियम और शर्तें:
नियम 200ए के मुताबिक, आरोप विशिष्ट और स्पष्ट होने चाहिए. इसमें कोई अपमानजनक बयान या व्यंग्य नहीं होना चाहिए. प्रस्ताव पर चर्चा के लिए सदन में कम से कम 50 सदस्यों का अपने स्थान पर खड़े होकर समर्थन देना अनिवार्य है. यदि 50 से कम सदस्य खड़े होते हैं, तो प्रस्ताव गिर जाता है. जब स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर विचार हो रहा हो, तो वे सदन की कार्यवाही में भाग ले सकते हैं और बोल सकते हैं. वे पहली बार में वोट भी दे सकते हैं, लेकिन वोटों की बराबरी होने की स्थिति में वे निर्णायक वोट नहीं डाल सकते.
भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत 91वें स्थान पर, प्रगति की रफ्तार धीमी
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा मंगलवार को जारी ‘करप्शन परसेप्शन इंडेक्स 2025’ में भारत 182 देशों और क्षेत्रों में 91वें स्थान पर है. भारत का स्कोर 39 है, जो दर्शाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार अभी भी एक गंभीर समस्या बना हुआ है.
रिपोर्ट बताती है कि भारत की रैंकिंग वैश्विक औसत से नीचे है. 0 से 100 के पैमाने पर, जहां 0 सबसे अधिक भ्रष्टाचार और 100 सबसे स्वच्छ प्रशासन को दर्शाता है, भारत का 39 का स्कोर बताता है कि भ्रष्टाचार को एक ‘संरचनात्मक मुद्दे’ के रूप में देखा जा रहा है, न कि किसी इक्का-दुक्का घटना के रूप में. यह शासन, जवाबदेही और संस्थानों की पारदर्शिता को प्रभावित कर रहा है.
पिछले वर्षों की तुलना में भारत की स्थिति में बहुत कम बदलाव आया है. हालांकि सुधारों और डिजिटलीकरण ने स्थिति को और बिगड़ने से रोका है, लेकिन इसे पर्यवेक्षकों की नजर में निर्णायक सुधार नहीं माना जा रहा है. नौकरशाही में अपारदर्शिता, राजनीतिक प्रभाव और निगरानी तंत्र की कमजोरी जैसी समस्याएं अभी भी गहराई से जुड़ी हुई हैं. घरेलू स्तर पर भी, आलोचकों का तर्क है कि कानूनों के बावजूद भ्रष्टाचार विरोधी प्रवर्तन अक्सर राजनीतिक विचारों से प्रभावित होता है. 91वें स्थान पर होना इस बात की याद दिलाता है कि केवल प्रतीकात्मक लाभ काफी नहीं हैं, बल्कि ठोस संस्थागत सुधारों की जरूरत है.
कौन सच बोल रहा है- नरवणे या पेंगुइन? मुझे अपने आर्मी चीफ नरवणे जी पर विश्वास है: राहुल गांधी
पूर्व थल सेना प्रमुख एम. एम. नरवणे की किताब “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर चल रहा विवाद और गहराता जा रहा है. मंगलवार को प्रकाशक कंपनी पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया (पीआरएचआई) सामने आई और उसने कहा कि किसी पुस्तक की घोषणा या प्री-ऑर्डर लिस्टिंग को उसके वास्तविक प्रकाशन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. ‘पीटीआई और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक, यह स्पष्टीकरण कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा नरवणे के 15 दिसंबर 2023 के एक सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला देने के बाद आया है, जिसमें पूर्व सेना प्रमुख ने कहा था कि “हेलो दोस्तों. मेरी किताब अब उपलब्ध है. कृपया लिंक को फॉलो करें. हैप्पी रीडिंग. जय हिंद.” अपनी इस पोस्ट के साथ पूर्व आर्मी चीफ नरवणे ने ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के कवर पेज वाले पेंगुइन इंडिया की पोस्ट को भी शामिल किया था. इस पोस्ट ने इन सवालों को हवा दी थी कि क्या किताब पहले ही प्रकाशित हो चुकी थी.
“पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया में पुस्तक प्रकाशन कैसे काम करता है, इस पर एक त्वरित मार्गदर्शिका” शीर्षक वाले एक विस्तृत बयान में, प्रकाशक ने प्रकाशन प्रक्रिया के विभिन्न चरणों के बीच स्पष्ट अंतर बताने की कोशिश की. कहा, “एक घोषित पुस्तक, प्री-ऑर्डर के लिए उपलब्ध पुस्तक और एक प्रकाशित पुस्तक, ये तीनों एक ही चीज़ नहीं हैं.”
पीआरएचआई ने कहा कि किसी पुस्तक को प्री-ऑर्डर के लिए सूचीबद्ध करना उद्योग का एक मानक अभ्यास है, जो पाठकों और विक्रेताओं को रिलीज से पहले अग्रिम ऑर्डर देने की अनुमति देता है. प्रकाशक ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसी लिस्टिंग का मतलब यह नहीं है कि पुस्तक पहले ही प्रकाशित हो चुकी है या बाजार में उपलब्ध है. पीआरएचआई ने शुरुआत में कहा था कि पुस्तक की कोई भी प्रति—”प्रिंट या डिजिटल रूप में—प्रकाशित, वितरित या बेची नहीं गई है.”
इस बीच, संसद भवन परिसर में पत्रकारों से बात करते हुए, राहुल गांधी ने “एक्स” (तत्कालीन ट्विटर) पर नरवणे के 2023 के सोशल मीडिया पोस्ट को पढ़कर सुनाया. लोकसभा में विपक्ष के नेता ने कहा, “यह वह ट्वीट है जो पूर्व आर्मी चीफ नरवणे ने किया है. मेरा मुद्दा यह है कि या तो नरवणे झूठ बोल रहे हैं—और मेरा मानना है कि (पूर्व) सेना प्रमुख झूठ नहीं बोलेंगे—या फिर पेंगुइन झूठ बोल रहा है. दोनों सच नहीं बोल सकते. और मुझे नरवणे जी पर विश्वास है.”
उल्लेखनीय है कि दिल्ली पुलिस ने पांडुलिपि के डिजिटल और अन्य प्रारूपों में कथित अवैध प्रसार को लेकर प्राथमिकी दर्ज की है.
राहुल गांधी को पिछले हफ्ते संसद परिसर में किताब की एक कथित प्रति दिखाते हुए देखा गया था. वह 2 फरवरी से लोकसभा में इस संस्मरण के अंशों को उद्धृत करना चाहते थे, लेकिन उन्हें रोक दिया गया क्योंकि सरकार का कहना था कि किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है. लेकिन राहुल गांधी अगले ही दिन किताब लेकर संसद भवन पहुँच गए थे. उन्होंने कहा था कि वे इसे पीएम मोदी को भेंट करेंगे. यहां यह भी आश्चर्यजनक है कि प्रकाशक कंपनी पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया हफ्ते भर बाद अपना स्पष्टीकरण देने आई.
पूर्व आर्मी चीफ नरवणे ने भी प्रकाशक द्वारा जारी बयान साझा करते हुए मंगलवार को ‘एक्स’ पर लिखा, “किताब की स्थिति यही है.” यद्यपि दिसंबर 2023 के अपने ट्वीट (जिसका हवाला राहुल गांधी ने दिया) के बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा.
नरवणे का खुलासा: 2020 में चीन ने लद्दाख के साथ-साथ भूटान के जरिए भी बनाया था भारत पर दबाव
द वायर की रिपोर्ट (जो जनरल नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण के अंशों पर आधारित है) बताती है कि 2020 में जब पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव बढ़ रहा था, ठीक उसी समय चीन ने भूटान के माध्यम से भारत पर दबाव की दूसरी लाइन खोल दी थी. जनरल नरवणे ने लिखा है कि चीन “नेपाल और भूटान जैसे छोटे पड़ोसियों को धमका रहा था” और उसका व्यवहार “वुल्फ वॉरियर डिप्लोमेसी” और “सलामी स्लाइसिंग” रणनीति का हिस्सा था.
संस्मरण के अनुसार, 2017 के डोकलाम गतिरोध के बाद से ही पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने भूटान के साथ विवादित क्षेत्र में अपना दावा ठोकने के लिए जमफेरी रिज की ओर सड़क बनाने की कोशिश की थी. नरवणे ने खुलासा किया कि डोकलाम संकट के बाद, चीन ने अमो चू घाटी के साथ पूर्व की ओर एक सड़क पर काम शुरू किया, जो भारतीय सेना की “सीधी निगरानी” में नहीं थी. सैटेलाइट इमेजरी से पता चला कि चीनी सेना तोर्सा नाला और अमो चू के जंक्शन तक पहुंच गई थी. नरवणे ने चेतावनी दी थी कि दक्षिण की ओर चीन की कोई भी गतिविधि भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के लिए गंभीर सुरक्षा खतरा पैदा करेगी.
यही कारण था कि जनवरी 2020 में सेना प्रमुख का पद संभालने के कुछ ही दिनों बाद, जब नरवणे लद्दाख जाने वाले थे, उन्हें तत्काल दिल्ली वापस बुलाया गया. उन्हें एक गुप्त मिशन पर भूटान भेजा गया, जिसमें विदेश सचिव विजय गोखले और रॉ प्रमुख सामंत गोयल भी शामिल थे. वहां उन्होंने भूटानी राजाओं के साथ बैठकों में पीएलए को रोकने की आवश्यकता पर जोर दिया.
नरवणे ने यह भी लिखा है कि 6 मई, 2020 को (गलवान झड़प के अगले दिन) उन्होंने कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) को बताया कि चीन ने भूटान में “एक घोषित रेड लाइन का उल्लंघन किया है”. हालांकि, जब उन्होंने जमफेरी रिज के दक्षिणी ढलानों पर संयुक्त प्रशिक्षण का सुझाव दिया ताकि त्वरित प्रतिक्रिया के लिए सैनिक मौजूद रहें, तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यह तर्क देते हुए असहमति जताई कि यह क्षेत्र भूटान और चीन के बीच विवादित है और इसे उकसावे वाला कदम माना जा सकता है. नरवणे के अनुसार, अगली सुबह जयशंकर ने रिकॉर्ड देखने के बाद स्वीकार किया कि वह क्षेत्र विवादित नहीं था. यह घटनाक्रम दर्शाता है कि भारतीय तंत्र के भीतर भी चीन की चालों को लेकर कुछ हिचकिचाहट थी.
मणिपुर में कुकी-नगा हिंसा तेज होने पर इंटरनेट बंद, आगजनी और गोलीबारी, 10 घर जलाए
मंगलवार सुबह जलाए गए घरों की संख्या का अभी पता नहीं चल सका है, लेकिन स्थानीय लोगों का दावा है कि दस से अधिक घर जलाए गए हैं. मणिपुर के नगा-बहुल उखरुल जिले के लितन क्षेत्रों में आगजनी की घटनाएं मंगलवार को लगातार तीसरे दिन जारी रहीं, जिसके बाद राज्य सरकार को पूरे जिले में इंटरनेट सेवाएं निलंबित करनी पड़ीं.
शनिवार की रात लितन सरेईखोंग गांव में कथित तौर पर कुकी-ज़ो समुदाय के कुछ लोगों द्वारा एक तांगखुल (जनजाति) नगा व्यक्ति के साथ मारपीट की गई थी, जिसके बाद यह हिंसा भड़की.
गृह विभाग ने “अस्थिर स्थिति और इस आशंका को देखते हुए कि असामाजिक तत्व जनता की भावनाओं को भड़काने वाली छवियों, पोस्ट और वीडियो संदेशों के प्रसारण के लिए सोशल मीडिया का उपयोग कर सकते हैं, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है,” पांच दिनों के लिए ब्रॉडबैंड सहित इंटरनेट सेवाओं को निलंबित करने का आदेश दिया.
जिला मजिस्ट्रेट आशीष दास ने लितन से ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि मंगलवार को नगा और कुकी-ज़ो दोनों समुदायों के दस से अधिक घर जला दिए गए. इससे पहले रविवार और सोमवार को हुई आगजनी की कई घटनाओं में 27 से 28 घर जलकर राख हो गए थे.
डीएम ने हिंसा में किसी की जान जाने की खबरों को खारिज करते हुए कहा, “स्थिति नियंत्रण में नहीं है.” सोशल मीडिया पर मौजूद वीडियो में हथियारबंद लोग गोलीबारी करते देखे गए.
निषेधाज्ञा लागू होने, सेना और अर्धसैनिक बलों की तैनाती और मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह द्वारा शांति और सामान्य स्थिति बनाए रखने की अपील के बावजूद हिंसा जारी रही. दोनों समुदायों के नागरिक समाज संगठनों ने, जिन्होंने सोमवार को उपमुख्यमंत्री लोसी दिखो और दो स्थानीय विधायकों की उपस्थिति में लितन में मुलाकात की थी, संयम बरतने की अपील की, लेकिन शांति अब भी कोसों दूर है.
सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे वायरल वीडियो, जो कथित तौर पर कम रोशनी में फिल्माए गए थे, उनमें गोलियों जैसी आवाजें कैद हुई हैं. हिंसा के कारण उखरुल और इंफाल घाटी के बीच सड़क यातायात बाधित होने के बाद कई ग्रामीण सुरक्षित स्थानों पर भाग गए.
पीएम डिग्री मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने डीयू को आपत्ति दर्ज करने का समय दिया
द हिंदू की खबर के मुताबिक, दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार (10 फरवरी, 2026) को दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक की डिग्री के विवरण के खुलासे से इनकार करने वाले आदेश के खिलाफ अपील में देरी पर अपनी आपत्ति दर्ज करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है.
दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि “इस मामले में कुछ भी नहीं है” और यह “केवल सनसनी फैलाने के लिए” है. उन्होंने अगस्त 2025 में एकल न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश को चुनौती देने वाली अपीलों को दायर करने में देरी के पहलू पर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा. अदालत ने अब इस मामले को 27 अप्रैल के लिए सूचीबद्ध किया है.
अदालत आरटीआई कार्यकर्ता नीरज, आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह और अधिवक्ता मोहम्मद इरशाद द्वारा दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही थी. ये अपीलें एकल न्यायाधीश के 25 अगस्त के आदेश के खिलाफ थीं, जिसने केंद्रीय सूचना आयोग के उस फैसले को रद्द कर दिया था जिसमें पीएम मोदी की डिग्री का खुलासा करने का निर्देश दिया गया था. एकल न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा था कि केवल इसलिए कि श्री मोदी एक सार्वजनिक पद पर हैं, उनकी “व्यक्तिगत जानकारी” को सार्वजनिक प्रकटीकरण के लिए खुला नहीं माना जा सकता.
यूपीआई (UPI) सेवा ठप, भारत में डिजिटल भुगतान पूरी तरह रुका: लाखों लोग परेशान
न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, मंगलवार 10 फरवरी की शाम को भारत का सबसे लोकप्रिय डिजिटल पेमेंट नेटवर्क, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई), बड़े पैमाने पर ठप हो गया. इस रुकावट के कारण देशभर में लाखों यूजर्स अपने लेन-देन पूरे करने में असमर्थ रहे. सोशल मीडिया और आउटेज ट्रैकर्स पर आई रिपोर्ट्स से पता चला कि गूगल पे, फोन पे और पेटीएम जैसे प्रमुख यूपीआई ऐप्स पर पेमेंट, फंड ट्रांसफर और क्यूआर कोड स्कैनिंग जैसी सुविधाएं काम नहीं कर रही थीं. जब यूजर्स ने दुकानदारों को भुगतान करने या पैसे भेजने की कोशिश की, तो उन्हें “सर्विस प्रोवाइडर नॉट अवेलेबल” (सेवा प्रदाता उपलब्ध नहीं) जैसे एरर मैसेज मिले.
शिकायतों की बाढ़ मुख्य रूप से दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों से आई, जिससे यह साफ हो गया कि यह समस्या किसी एक क्षेत्र तक सीमित न होकर पूरे देश में थी. कई यूजर्स ने अलग-अलग बैंकों और ऐप्स को आज़माया, लेकिन सफलता न मिलने पर उन्हें नकदी या कार्ड का सहारा लेना पड़ा. आउटेज ट्रैकर्स पर बहुत कम समय में सैकड़ों शिकायतें दर्ज की गईं, जो यह दर्शाता है कि यह कोई मामूली तकनीकी खामी नहीं थी. खबर लिखे जाने तक यूपीआई का संचालन करने वाले एनपीसीआई ने कोई आधिकारिक पुष्टि जारी नहीं की थी, जबकि ऐप्स पर कुछ नोटिस में यूजर्स को इंतजार करने की सलाह दी जा रही थी.
इस घटना ने उन नियमित यूजर्स को निराश किया जो अपनी रोजमर्रा की खरीदारी के लिए पूरी तरह यूपीआई पर निर्भर हैं. एक वरिष्ठ बैंकिंग विशेषज्ञ और पूर्व वित्तीय पत्रकार ने टीएनआईई को बताया कि हालांकि अतीत में बैंकों के सर्वर या एपीआई की समस्याओं के कारण तकनीकी दिक्कतें आई हैं, लेकिन 10 फरवरी की घटना का पैमाना और समय भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की यूपीआई पर निर्भरता को रेखांकित करता है. उन्होंने कहा, “पिछले वर्षों में भी ऐसी रुकावटें आई हैं, लेकिन तब एनपीसीआई ने बैंकों के साथ मिलकर इसे जल्दी ठीक कर लिया था.” फिलहाल पूरा ध्यान सेवा को बहाल करने और शटडाउन की वजह जानने पर है.
ओपिनियन: क्रिकेट अब ‘ब्रिंकमैनशिप’ का खेल बन गया है
क्रिकेट एट अल पर प्रकाशित येल यूनिवर्सिटी के लेक्चरर सुशांत सिंह के लेख के अनुसार, टी20 वर्ल्ड कप को लेकर हुआ हालिया गतिरोध भले ही सुलझ गया हो, लेकिन इसने वैश्विक क्रिकेट की नाजुक संरचना को उजागर कर दिया है. पाकिस्तान द्वारा भारत के साथ अपने मैच को ‘वीटो’ की तरह इस्तेमाल करना यह दिखाता है कि खेल अब राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का अखाड़ा बन गया है.
लेख में तर्क दिया गया है कि पाकिस्तान की धमकी बांग्लादेश को बाहर किए जाने के खिलाफ कोई नैतिक रुख नहीं था, बल्कि यह आईसीसी के सबसे आकर्षक मैच (भारत-पाक) को बाधित करने की क्षमता का प्रदर्शन था. आईसीसी का पूरा वित्तीय मॉडल इस एक मैच पर निर्भर है, इसलिए पाकिस्तान जानता था कि उसकी अनुपस्थिति पूरे टूर्नामेंट की नींव हिला सकती है. इस संकट ने आईसीसी चेयरमैन जय शाह की स्थिति को भी चुनौती दी, क्योंकि एक असफल टूर्नामेंट उनकी और उनके पिता (गृह मंत्री अमित शाह) की साख के लिए नुकसानदेह होता.
लेखक बताते हैं कि बांग्लादेश इस प्रकरण का आश्चर्यजनक विजेता बनकर उभरा, जिसे टूर्नामेंट से बाहर होने के बावजूद भविष्य के आयोजनों का वादा मिला. वहीं, श्रीलंका के राष्ट्रपति का हस्तक्षेप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बयान यह दर्शाते हैं कि दक्षिण एशियाई क्रिकेट में राज्य और राजनीति कितनी गहराई तक घुस चुके हैं. अंत में, यह समझौता किसी सिद्धांत पर नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति को साधने और ‘फेस-सेविंग’ (साख बचाने) के लिए किया गया. क्रिकेट बच गया, लेकिन इसकी संरचना अब ब्लैकमेलिंग और राजनीतिक दबाव के प्रति और अधिक संवेदनशील हो गई है.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को तीन घंटे के भीतर हटानी होगी गैरकानूनी सामग्री: सरकार का आदेश
सरकार ने मंगलवार को कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को गैरकानूनी सामग्री की सूचना मिलने के तीन घंटे के भीतर उसे हटाना होगा. पहले इसके लिए 36 घंटे की समय सीमा तय थी, जिसे अब काफी सख्त कर दिया गया है. यह नया नियम मेटा, यूट्यूब और एक्स जैसी कंपनियों के लिए अनुपालन की एक बड़ी चुनौती बन सकता है. ये बदलाव भारत के 2021 के आईटी नियमों में संशोधन करते हैं, जो पहले से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और वैश्विक तकनीकी कंपनियों के बीच विवाद का मुद्दा रहे हैं.
‘रॉयटर्स’ के अनुसार, संशोधित नियमों ने उस पुराने प्रस्ताव में ढील दी है, जिसमें प्लेटफार्मों के लिए एआई-जनित सामग्री के 10 प्रतिशत हिस्से या अवधि पर दृश्यमान लेबल लगाना अनिवार्य था. इसके बजाय, अब ऐसी सामग्री को “प्रमुखता से लेबल” करना अनिवार्य कर दिया गया है.
ये नए नियम 20 फरवरी से प्रभावी होंगे. संशोधनों में “ऑडियो, विजुअल या ऑडियो-विजुअल जानकारी” और “सिंथेटिक रूप से जनित जानकारी” को परिभाषित किया गया है, जिसमें ऐसी एआई-निर्मित या परिवर्तित सामग्री शामिल है, जो वास्तविक या प्रामाणिक प्रतीत होती है. हालांकि, सामान्य संपादन, पहुंच में सुधार, और नेक नीयत से किए गए शैक्षिक या डिजाइन कार्यों को इस परिभाषा से बाहर रखा गया है. मुख्य बदलावों में ‘सिंथेटिक कंटेंट’ (कृत्रिम सामग्री) को ‘सूचना’ के रूप में मानना शामिल है. आईटी नियमों के तहत गैरकानूनी कार्यों के निर्धारण के लिए एआई-जनित सामग्री को अन्य सामान्य जानकारी के बराबर माना जाएगा.
रूस का आरोप: भारत को रूसी तेल खरीदने से रोकने की कोशिश कर रहा है अमेरिका
‘पीटीआई’ के मुताबिक़ रूस ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि वह भारत और अन्य देशों को रूसी तेल खरीदने से रोकने की कोशिश कर रहा है. रूस का कहना है कि वॉशिंगटन वैश्विक आर्थिक प्रभुत्व हासिल करने के लिए टैरिफ, प्रतिबंध (सैंक्शन) और सीधे प्रतिबंध जैसे “दबावपूर्ण” उपायों का इस्तेमाल कर रहा है. रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाकर प्रतिस्पर्धियों को दबाने के लिए “नामुनासिब तरीके” अपना रहा है.
सोमवार को टीवी ब्रिक्स को दिए इंटरव्यू में लावरोव ने कहा कि अमेरिका, भारत और अन्य ब्रिक्स देशों जैसे प्रमुख रणनीतिक साझेदारों के साथ रूस के व्यापार, निवेश सहयोग और सैन्य-तकनीकी संबंधों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है.
उन्होंने कहा कि पश्चिमी देश अपना रसूख़ बरक़रार रखने के लिए यह सब कर रही है. लावरोव के अनुसार, अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद प्रतिस्पर्धियों को दबाने की यह कोशिश और पहले से ज़्यादा खुल कर की जा रही है.
लावरोव ने यूक्रेन मुद्दे पर भी बात की. उन्होंने कहा कि पिछले साल अलास्का के एंकोरेज में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बीच हुई बातचीत में रूस ने अमेरिका के प्रस्ताव को स्वीकार किया था.
उन्होंने कहा, “हमें बताया गया कि यूक्रेन मुद्दे का समाधान होना चाहिए. एंकोरेज में हमने अमेरिका का प्रस्ताव स्वीकार किया. साफ शब्दों में, उन्होंने प्रस्ताव रखा और हमने सहमति दी कि समस्या का समाधान होना चाहिए. ”
उन्होंने कहा कि प्रस्ताव स्वीकार करने के बाद रूस ने यूक्रेन मुद्दे को सुलझाने और व्यापक, पारस्परिक रूप से लाभकारी सहयोग की दिशा में कदम बढ़ाने का काम किया.
हालांकि, लावरोव ने कहा कि व्यवहार में इसके उलट हो रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि नए प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में टैंकरों पर हमले किए जा रहे हैं, जो समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीएलओएस) का उल्लंघन है. उन्होंने कहा कि भारत और अन्य साझेदारों को सस्ता रूसी ऊर्जा खरीदने से हतोत्साहित किया जा रहा है, जबकि यूरोप में पहले से ही ऐसे खरीद पर रोक है और उसे महंगे अमेरिकी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका ने प्रभावी रूप से आर्थिक प्रभुत्व का लक्ष्य घोषित कर दिया है.
लावरोव ने कहा कि अमेरिका सभी प्रमुख देशों के लिए ऊर्जा आपूर्ति मार्गों को नियंत्रित करना चाहता है. उन्होंने यूरोप में नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन, यूक्रेनी गैस परिवहन प्रणाली और तुर्कस्ट्रीम पाइपलाइन का उल्लेख किया.
लावरोव ने कहा कि रूस, भारत, चीन, इंडोनेशिया और ब्राजील की तरह, अमेरिका सहित सभी देशों के साथ सहयोग के लिए खुला है. लेकिन उन्होंने कहा कि अमेरिका खुद ही रास्ते में कृत्रिम बाधाएं पैदा कर रहा है.
पिछले हफ्ते नई दिल्ली के साथ व्यापार समझौते की घोषणा करते समय राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया था कि भारत ने रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने पर सहमति जताई है.
एक कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने भारत पर लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ वापस ले लिया, जो उन्होंने पिछले साल अगस्त में रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण लगाया था. आदेश में अमेरिका ने कहा कि वह यह निगरानी करेगा कि भारत सीधे या परोक्ष रूप से फिर से रूसी तेल खरीदता है या नहीं. इसके आधार पर 25 प्रतिशत टैरिफ दोबारा लगाया जा सकता है.
भारत में क्यों नहीं हैं मजदूरों के मजबूत संगठन, गिग वर्करों की हड़ताल ने बताईं बाधाएं
“स्क्रोल” में सहस्रांशु दास लिखते हैं कि भारत में मज़दूरों को सही तरीके से संगठित होने से राजनीति रोकती है. यहां ज़्यादातर मज़दूर यूनियनें राजनीतिक दलों से जुड़ी हुई हैं और आपस में बंटी हुई हैं. इसी वजह से मज़दूरों की अपनी स्वतंत्र और स्थायी ताकत नहीं बन पाती.
31 दिसंबर को नए साल से पहले देशभर में ऐप-आधारित टैक्सी और डिलीवरी कामगारों, यानी गिग वर्कर्स, ने हड़ताल की. इस हड़ताल से कुछ समय के लिए खराब कामकाजी हालात और डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों की ज़्यादा ताकत पर चर्चा हुई. सरकार ने क्विक-कॉमर्स कंपनियों से 10 मिनट में डिलीवरी की गारंटी खत्म करने को कहा, लेकिन इसके अलावा कोई बड़ा फायदा नहीं मिला.
यह हड़ताल दिखाती है कि भारत के मज़दूरों में विरोध की ताकत तो है, लेकिन उस विरोध को लंबे समय तक टिकाए रखने की क्षमता नहीं है. इसकी वजह यह है कि मज़दूर आंदोलन राजनीति से गहराई से जुड़ा रहा है, और संगठित होने के जो साझा तरीके विकसित किए जाने थे, वे नहीं हुए. आज भी कई गिग यूनियनें राजनीतिक दलों से जुड़ी हुई हैं, जैसे सीपीआई (एम) से ऑल इंडिया गिग वर्कर्स यूनियन और कांग्रेस से ऑल इंडिया गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन. इसके अलावा कई संगठन एनजीओ पर निर्भर रहते हैं.
गिग वर्कर्स को कानूनी रूप से कर्मचारी नहीं माना जाता. उनके पास पारंपरिक मज़दूरों जैसी सुरक्षा या राजनीतिक ताकत नहीं है. बेहतर हालात पाने का रास्ता अनुशासित और मज़दूरों द्वारा चलाया गया संगठन है, लेकिन यह क्षमता भारत में व्यवस्थित रूप से विकसित नहीं हुई.
भारत में यूनियनों की शुरुआत 1800 के दशक के अंत में हुई, लेकिन उन्हें राष्ट्रवादी नेताओं और संभ्रांत वर्ग ने आगे बढ़ाया. एन.एम. जोशी और वी.वी. गिरि जैसे नेता यूनियनों को सामाजिक सुधार और राष्ट्रवादी आंदोलन का हिस्सा मानते थे. आज़ादी के बाद कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टियों और अन्य दलों ने अपनी-अपनी यूनियनें बनाईं. यूनियनों की ताकत राजनीतिक जुड़ाव से बढ़ी, अपने दम पर नहीं. इससे एक ही जगह पर कई यूनियनें बनीं और आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ी.
अमेरिका की यूनियन आयोजक जेन मैकालेवी का मानना था कि संगठन बनाना एक अनुशासन है, जिसे सीखा जा सकता है. उन्होंने “होल-वर्कर ऑर्गनाइजिंग” का तरीका दिया, जिसमें बड़े बहुमत को साथ लाना ज़रूरी है. उनके नेतृत्व में अस्पताल कर्मचारियों को 10% वेतन बढ़ोतरी और बेहतर सुविधाएं मिलीं. उनके प्रशिक्षण से कई देशों में सफल आंदोलन हुए.
भारत में 1970 के दशक में मज़दूरों को संगठित किया, लेकिन उनका काम भी पार्टी ढांचे में सीमित रहा. स्व रोजगार महिला संघ (सेल्फ-एमप्लॉयड वीमेंस एसोसिएशन-सेवा) ने 1972 से अनौपचारिक क्षेत्र की महिलाओं को संगठित किया और आज उसके 37 लाख सदस्य हैं.
भारत में गिग वर्क तेजी से बढ़ रहा है. अभी करीब 77 लाख गिग वर्कर्स हैं और 2030 तक यह संख्या 2.4 करोड़ हो सकती है. फिर भी केवल 15% मज़दूर ही यूनियन समझौतों के दायरे में आते हैं. आईएलओ (अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन) और संयुक्त राष्ट्र ने भी नए तरीकों से मज़दूरों को संगठित करने की बात कही है.
भारत के पास संगठन का अनुभव है, लेकिन उसे राजनीति से अलग व्यवस्थित रूप देने की ज़रूरत है. जब तक ऐसा नहीं होगा, मज़दूर आंदोलन संघर्ष तो करेगा, पर स्थायी ताकत नहीं बना पाएगा.
योगी को एक ब्राह्मण की चुटिया खींचते हुए दिखाया तो पत्रकार को जेल भेजा
‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तरप्रदेश पुलिस ने मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के एक पत्रकार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कथित “आपत्तिजनक” और “भड़काऊ” तस्वीर फेसबुक पर पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार किया है. यह मामला सोमवार को शहर कोतवाली थाने में दर्ज हुआ. शिकायत भाजपा के हनुमानगंज मंडल के महामंत्री अमरीश कुमार पांडेय ने की थी.
एफआईआर के अनुसार, आरोपी पवन तिवारी के ख़िलाफ़ भारतीय न्याय संहिता की धारा 196(1)(b) के तहत मामला दर्ज किया गया है, जो धर्म, जाति या जन्मस्थान के आधार पर अलग-अलग समूहों के बीच दुश्मनी फैलाने से संबंधित है. पुलिस के मुताबिक़, रविवार को शेयर की गई पोस्ट में मुख्यमंत्री की एक “आपत्तिजनक” तस्वीर और “विवादित कैप्शन” शामिल था. शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह पोस्ट सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने और एक समुदाय को भड़काने के इरादे से शेयर की गई थी.
बताया गया कि पवन तिवारी ने फेसबुक पर एक तस्वीर साझा की थी, जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक ब्राह्मण की चोटी खींचते हुए दिखाया गया था. इसके साथ उन्होंने लिखा था कि “संतों की भूमि में एक रावण ने देश की मर्यादा तार-तार कर दी. जो अपने को योगी कहते हैं और ब्राह्मण युवाओं को चोटी पकड़कर जूते मरवाते हैं, सनातनी कभी नहीं भूलेंगे.”
थाना प्रभारी क्षितिज त्रिपाठी ने बताया कि 35 वर्षीय पवन तिवारी को सोमवार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. वह मूल रूप से बलिया जिले के सुखपुरा थाना क्षेत्र के निवासी हैं, लेकिन फिलहाल उज्जैन में रहकर पत्रकारिता करते हैं. पुलिस के अनुसार, पोस्ट शेयर के समय वह अपने गांव में एक पारिवारिक शादी में शामिल होने आए थे, जिसके बाद यह पोस्ट वायरल हो गई.
इंसान खुद को बतौर “कच्चा माल” बाज़ार में शामिल कर रहा है
“द हिंदू” में न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के मीडिया स्टडीज़ के प्रोफेसर अर्जुन अप्पादुरई लिखते हैं कि आज हमारी आंखों के सामने एक नई वैश्विक मंडी तेज़ी से बढ़ रही है. यह न आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) है, न कोई दुर्लभ खनिज, न नई ऊर्जा, और न ही सिर्फ दवा, मीडिया या वित्त का कारोबार. लेकिन यह इन सब से जुड़ी है और इनके भविष्य को भी तय कर सकती है. यह चीज़ खुद इंसान है, यानी उसकी पहचान, उसकी ज़िंदगी, उसके रिश्ते और उसकी कहानी. यह ऐसा संसाधन है जो कभी खत्म नहीं होगा, जब तक इंसान और यह दुनिया मौजूद हैं.
आज का पूंजीवादी दौर सिर्फ सामान नहीं, बल्कि इंसानों की ज़िंदगी और उनके रिश्तों से भी मुनाफा कमा रहा है. पहले फैक्ट्रियां चीजें बनाकर लाभ कमाती थीं, अब इंसान खुद को बतौर “कच्चा माल” बाज़ार में शामिल कर रहा है. हमारी दोस्ती, प्रेम, परिवार, बच्चों से रिश्ता, सहकर्मी, पड़ोसी, यहां तक कि हमारी डिजिटल ज़िंदगी और राजनीतिक विचार, सब कुछ डेटा बनकर इकट्ठा किया जा रहा है. यह एक तरह की गहरी प्रोफाइलिंग है, जहां हमारी निजी बातें, भरोसा और गोपनीयता कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं.
आज दुनिया भर में “कहानियों” की खोज चल रही है. मैक्सिको से नेपाल, स्पेन से इंडोनेशिया तक, स्थानीय लोककथाएं, मिथक और छोटे कस्बों की कहानियां भी वैश्विक बाजार का हिस्सा बन रही हैं. फिल्म महोत्सव, प्रकाशक, मीडिया और पुरस्कार समितियां नई कहानियां खोज रही हैं, चाहे वे ड्रग्स, प्रवासी, युद्ध, आतंक या सीमापार घटनाओं से जुड़ी हों. वैश्विक घटना का लोकल एंगल तलाशा जा रहा है. अब कोई भी व्यक्ति, जिसके पास कैमरा या मोबाइल है और जो किसी घटना का गवाह है, वैश्विक मीडिया का हिस्सा बन सकता है. “स्थानीय” और “वैश्विक” की पुरानी सीमाएं धुंधली हो चुकी हैं. स्थानीय खबरें भी अब वैश्विक नज़र से देखी जाती हैं.
इस नए बाज़ार में सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि बैंक, देश, खेल टीमें, कंपनियां, शहर और यहां तक कि अलग-अलग जेंडर पहचान भी अपनी “कहानी” बेच रहे हैं. ‘एआई’ की दुनिया में भी सिरी, चैटजीपीटी जैसे बॉट इंसानों की तरह भावनाएं और संवेदनाएं दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. ओटीटी प्लेटफॉर्म जैसे नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम और डिज़्नी इस कहानी बाज़ार की सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं. अब बड़े फिल्म स्टूडियो की जगह इंटरनेट आधारित स्ट्रीमिंग ले रही है. 2018 में नेटफ्लिक्स के सीईओ ने कहा था कि भारत में उनके 10 करोड़ ग्राहक हो सकते हैं, यह दिखाता है कि यह कितना बड़ा है.
अब हर व्यक्ति अपनी कहानी सुनाना चाहता है, चाहे वह नायक की हो, पीड़ित की, शहीद की या बदलाव की. लोग अपनी कहानी बेहतर ढंग से पेश करने के लिए इन्फ्लुएंसर, ऐप, कोच या पब्लिशिंग प्लेटफॉर्म की मदद लेते हैं. ‘यूट्यूब’ सितारों का करियर अक्सर छोटी-छोटी निजी कहानियों के वायरल होने से बना है. अब हमारी पहचान, हमारे रिश्ते और हमारी निजी दुनिया, सब कुछ एक ऐसे बाजार का हिस्सा बन गए हैं, जिसकी कोई सीमा नहीं, सिवाय हमारी खुद को बेचने और दिखाने की भूख के.
अपील :
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