10/03/2026: युद्ध विराम की बात शुरू | दाम बढ़ाने के बाद भी एलपीजी की कमी | बुमरा सिख, संजू ईसाई, ट्राफी मंदिर में? | भारत के दब्बू होने पर आकार पटेल | कुछ 'बिरले' ही होते हैं | बैंड, बाजा, बिटिया
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
संसद में संग्राम, 40 साल बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के लिए विपक्ष लाया अविश्वास प्रस्ताव.
अमेरिका ईरान युद्ध के बीच डोनाल्ड ट्रंप के मिले जुले संकेत, दुनिया भर में मंडराया भीषण ऊर्जा संकट.
एलपीजी संकट से जूझा भारत, बेंगलुरु से लेकर मुंबई तक गैस न मिलने से रेस्तरां और होटल बंद होने की कगार पर.
मुस्लिम विरासत कानून पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा यूनिफॉर्म सिविल कोड ही है इसका असली समाधान.
वैज्ञानिकों की भारत सरकार को चेतावनी, कुनो नेशनल पार्क में जगह कम, तुरंत बंद हो अफ्रीकी चीतों का आयात.
हैप्पी होली बोलने पर लखनऊ में दलित युवक की चाकू मारकर हत्या, तीन लोग पुलिस की गिरफ्त में.
कोरोना वैक्सीन से क्यों बने थे खून के थक्के, वैज्ञानिकों ने खोज निकाली इसके पीछे की असली वजह.
“स्पीकर सरकार की आवाज़ नहीं हैं”: ओम बिरला को हटाने के प्रस्ताव पर लोकसभा में चर्चा
मंगलवार को लोकसभा में एक और बड़ा टकराव देखने को मिला, जब सदन ने औपचारिक रूप से अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के विपक्ष के प्रस्ताव पर चर्चा शुरू की. पिछले लगभग 40 वर्षों में किसी पीठासीन अधिकारी के खिलाफ यह इस तरह का पहला प्रस्ताव है. हालाँकि सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के संख्याबल के कारण यह कदम काफी हद तक प्रतीकात्मक है, लेकिन इस बहस ने विपक्ष को संसद के भीतर अध्यक्ष पर पक्षपात के अपने आरोपों को रिकॉर्ड पर लाने और सदन के कामकाज को लेकर सरकार पर अपना हमला तेज करने का अवसर दिया.
“द इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार, कांग्रेस सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद ने अध्यक्ष बिरला को हटाने का प्रस्ताव पेश किया और आरोप लगाया कि अध्यक्ष उस निष्पक्षता को बनाए रखने में विफल रहे हैं जो सदन के सभी वर्गों का विश्वास हासिल करने के लिए आवश्यक है.
सत्र की शुरुआत इस बात पर तत्काल टकराव के साथ हुई कि बहस के दौरान अध्यक्षता कौन करेगा. अध्यक्ष बिरला के “नैतिक आधार” पर स्वेच्छा से हटने और उपाध्यक्ष (डिप्टी स्पीकर) का पद खाली होने के कारण, सभापतियों के पैनल से भाजपा सांसद जगदंबिका पाल आसन पर विराजमान हुए. विपक्ष ने इस पर सवाल उठाए कि चर्चा के दौरान पाल के अध्यक्षता करने का निर्णय कैसे लिया गया.
सदन में चर्चा की शुरुआत करते हुए लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट के ‘नबाम रेबिया’ फैसले का हवाला देते हुए अपने भाषण की शुरुआत की और कहा कि अध्यक्ष से “उच्च स्तर की स्वतंत्रता” की अपेक्षा की जाती है और उन्हें “त्रुटिहीन वस्तुनिष्ठता और पूर्ण निष्पक्षता” प्रदर्शित करनी चाहिए.
गोगोई ने कहा कि कांग्रेस “व्यक्तिगत रूप से बिरला पर हमला करने की इच्छा” नहीं रखती है. “हम इसे भारतीय गणराज्य के लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए ला रहे हैं. अंबेडकर ने कहा था कि संवैधानिक नैतिकता निष्पक्षता की मांग करती है. अध्यक्ष सरकार की आवाज नहीं, बल्कि पूरे सदन के अधिकारों का संरक्षक होता है,” गोगोई ने कहा.
गोगोई ने राष्ट्रपति के अभिभाषण के जवाब के दौरान फरवरी की कार्यवाही का भी जिक्र किया और कहा कि जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी बोलना चाहते थे, तो “उन्हें 20 बार टोका गया.” उन्होंने कहा, “अध्यक्ष, सत्ता पक्ष के वरिष्ठ सदस्य, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री... सभी ने एक समन्वित तरीके से बाधा डाली. सिर्फ इसलिए क्योंकि वे यह कहना चाहते थे कि जब देश के मुखिया की जरूरत थी, तो उन्होंने कहा, ‘जो उचित लगे वह करो’. हमारे पास सैन्य नेतृत्व नहीं है. हमारी सेना राजनीतिक नेतृत्व के निर्देशों का इंतजार करती है.”
गोगोई पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण को उद्धृत करने के गांधी के प्रयास का जिक्र कर रहे थे, जब सरकार पक्ष ने संसदीय नियमों का हवाला देते हुए उन्हें कई बार टोका था.
लोकतंत्र का गला घोंटने में शामिल हैं बिरला, महुआ मोइत्रा का तीखा हमला
बहस के दौरान बिरला पर तीखा हमला करते हुए, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने उन पर अभूतपूर्व पक्षपात का आरोप लगाया—विपक्ष के हर स्थगन प्रस्ताव को अस्वीकार करने से लेकर, रिकॉर्ड संख्या में विपक्षी सांसदों के निलंबन की अध्यक्षता करने, संसदीय समितियों की जांच के लिए बहुत कम विधेयकों को भेजने और विपक्षी सांसदों को बोलने की अनुमति न देने, जबकि सत्ता पक्ष के सदस्यों की आपत्तिजनक टिप्पणियों की अनुमति देने तक.
मोइत्रा ने कहा, “आप कर्म से नहीं भाग सकते.” उन्होंने कहा कि अध्यक्ष की भूमिका एक तटस्थ मध्यस्थ की होती है, और यह व्यक्तिगत अहंकार का विषय नहीं हो सकता. मोइत्रा ने याद दिलाया कि पहले अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, और तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ऐसे संदर्भ में विपक्ष को अधिक समय दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि 2023 में जब ओम बिरला अध्यक्ष थे, तब विपक्षी सांसदों का अब तक का सबसे बड़ा सामूहिक निलंबन हुआ, जिसमें एक ही दिन में 100 सांसदों को निलंबित कर दिया गया—जो पिछले 20 वर्षों में कुल निलंबन का 40% है.
मोइत्रा ने कहा, “और हमारी गलती क्या थी? हम संसदीय सुरक्षा में चूक पर सरकार से बयान चाहते थे.” उन्होंने आगे कहा कि बिरला ने “बिना किसी ठोस चर्चा के” तीन आपराधिक (संशोधन) विधेयकों को पारित करने की अध्यक्षता की. मोइत्रा ने कहा, “वह लोकतंत्र का गला घोंटने में शामिल हैं,” जिस पर सत्ता पक्ष ने विरोध जताया. उन्होंने कहा कि 2004 से अब तक लोकसभा में सदस्यों के 245 निलंबन दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 120 तब हुए जब बिरला अध्यक्षता कर रहे थे.
मोइत्रा ने कहा कि विपक्ष के सभी नेताओं में, भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी, एल.के. आडवाणी और सुषमा स्वराज को सदन में उचित से अधिक समय दिया गया था. इसके विपरीत, उन्होंने दावा किया कि वर्तमान अध्यक्ष विपक्षी सांसदों के बोलते समय उन्हें “बीच में ही रोक” देते हैं, लेकिन सत्ता पक्ष के सांसदों को जितना वे चाहते हैं उतना समय देते हैं.
मोइत्रा ने कहा कि मणिपुर पर चर्चा के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाना पड़ा. उन्होंने आरोप लगाया कि अध्यक्ष ने रमेश बिधूड़ी द्वारा दानिश अली के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणियों पर उनके खिलाफ कुछ नहीं किया. उन्होंने कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार सौदे और एपस्टीन फाइलों पर किसी भी स्थगन प्रस्ताव की अनुमति नहीं दी गई.
पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण का जिक्र करते हुए मोइत्रा ने कहा कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी को किताब से पढ़ने की अनुमति नहीं दी गई, जबकि सत्ता पक्ष द्वारा “मुख्य टोका-टाकी करने वाले के रूप में नामित” एक सांसद (निशिकांत दुबे) को अन्य किताबों से उद्धृत करने की अनुमति दी गई.
‘सिद्धांत के वेश में अराजकता’: एनडीए के निशाने पर राहुल गांधी
दूसरी ओर विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को “बिना सार का तमाशा और सिद्धांत के वेश में अराजकता” करार देते हुए, एनडीए सदस्यों ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर निशाना साधा और बिरला की निष्पक्षता तथा विपक्षी सांसदों को अपने विचार व्यक्त करने के अवसर देने के लिए उनकी प्रशंसा की.
सत्ता पक्ष की ओर से बहस की शुरुआत करते हुए केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने पूर्व प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू और राजीव गांधी के बयानों का हवाला देते हुए दोहराया कि अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है और सभी सदस्यों को इसे स्वीकार करना चाहिए. उन्होंने यह दावा भी किया कि विपक्ष के 50 सांसदों ने “व्यक्तिगत रूप से उनसे कहा था कि वे बिरला के खिलाफ इस प्रस्ताव से खुश नहीं हैं” लेकिन “राजनीतिक मजबूरी के कारण उन्हें इसका समर्थन करना पड़ा.” राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए रिजिजू ने आरोप लगाया कि वे अक्सर सत्र के दौरान विदेश जाने के लिए कार्यवाही छोड़ देते हैं और अपना भाषण देने के बाद सदन के नियमों की अवहेलना करते हुए चले जाते हैं, जो उनके अनुसार उनकी “अपरिपक्वता” को दर्शाता है. उन्होंने कहा, “वे कभी दूसरों को बोलते हुए नहीं सुनते... क्या आपने कभी ऐसा विपक्ष का नेता देखा है?”, उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा “बेहतर” विपक्ष की नेता हो सकती थीं, लेकिन “कांग्रेस ने उन्हें मौका नहीं दिया.”
रिजिजू ने कहा: “मुझे तब बुरा लगा जब विपक्ष के नेता ने यहाँ खड़े होकर कहा कि उन्हें सदन में बोलने के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने कहा कि सदन में बोलना उनका अधिकार है... आप प्रधानमंत्री हों, मंत्री हों या विपक्ष के नेता, सदन में बोलने के लिए हर किसी को अध्यक्ष की अनुमति की आवश्यकता होती है. फिर, आप कहेंगे कि आपका माइक चालू नहीं है.”
पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह ने आरोप लगाया कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य “किसी एक विशेष नेता को खुश करना” था और यह विपक्ष द्वारा “अध्यक्ष को दबाव में लाने” का अंतिम प्रयास था. उन्होंने कहा, “मेरी राय में, अध्यक्ष के बजाय विपक्ष के नेता के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जाना चाहिए.”
लड़ाई पर ट्रंप के मिले-जुले संकेत, कहा- ‘बहुत जल्द’ खत्म हो सकता है संघर्ष
‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार को ईरान पर अमेरिकी-इजरायली युद्ध के संभावित अंत को लेकर मिले-जुले संकेत दिए. उन्होंने कहा कि यह संघर्ष “बहुत जल्द” खत्म हो सकता है, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि यदि ईरानी नेताओं ने ऑयल टैंकरों की आवाजाही को रोकना जारी रखा तो और भी अधिक आक्रामक कार्रवाई की जाएगी.
वहीं ईरानी अधिकारियों ने इसका जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष खत्म करने का कोई इरादा नहीं है. ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़िर क़ालीबाफ़ ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनका देश “बिल्कुल भी” संघर्ष विराम की मांग नहीं कर रहा है. उधर, इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उम्मीद जताई कि ईरानी अवाम इस्लामिक रिपब्लिक को सत्ता से बेदख़ल कर देगी और अंततः युद्ध कब ख़त्म होगा, “यह उन पर ही निर्भर करता है.”
इन बयानों से संकेत मिलता है कि युद्ध के मुख्य पक्ष अपनी-अपनी ज़िद पर अड़े हुए हैं और 1,000 से अधिक लोगों की जान लेने वाले इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए किसी कूटनीतिक प्रयास की चर्चा नहीं हो रही है. इस युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को भी गंभीर रूप से बाधित कर दिया है.
युद्ध के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़ों की आवाजाही धीमी हो गई है, जहाँ से दुनिया का लगभग पाँचवां हिस्सा तेल गुज़रता है. खाड़ी देशों से ऊर्जा आयात पर काफ़ी हद तक निर्भर रहने वाले पाकिस्तान के युद्धपोत मंगलवार को व्यापारिक जहाज़ों की सुरक्षा करते नज़र आए, ताकि ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके.
मंगलवार को 11वें दिन भी जारी संघर्ष के दौरान संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने कहा कि वह ईरानी हमलों का जवाब दे रहा है, जबकि सऊदी अरब और कुवैत ने दावा किया कि उन्होंने ड्रोन मार गिराए हैं, हालाँकि यह नहीं बताया कि ये ड्रोन कहाँ से आए थे. बहरीन के गृह मंत्रालय ने बताया कि राजधानी मनामा में एक आवासीय इमारत पर हुए ईरानी हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई. इराकी कुर्दिस्तान के आतंकवाद-रोधी बलों के अनुसार, सोमवार रात एरबिल शहर के ऊपर विस्फोटकों से लदे तीन ड्रोन मार गिराए गए.
लेबनान में सोमवार को भारी इज़रायली बमबारी के बाद, ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह के लड़ाकों ने मंगलवार को इज़रायली बलों पर अपने हमलों की रफ़्तार तेज़ कर दी. इज़रायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ हवाई हमलों की एक नई लहर के साथ जवाब दिया और स्थानीय निवासियों से इलाक़ा खाली करने का आग्रह किया.
ईरानी अधिकारियों के अनुसार, ईरान में अमेरिकी और इज़रायली हमलों में लगभग 1,300 लोग मारे गए हैं, जबकि मध्य पूर्व में ईरानी हमलों में कम से कम 30 लोगों की जान गई है. स्टेट मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इज़रायली हमलों ने लेबनान में लगभग 500 लोगों की जान ले ली है, और राष्ट्रपति जोसेफ़ औन के अनुसार 600,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं. ईरानी ईंधन डिपो पर हमलों के कारण काले धुएँ के गुबार, काली बारिश और स्थानीय लोगों के लिए स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ पैदा हो गई हैं.
तुर्की के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि पूर्वी तुर्की में एक अमेरिकी पैट्रियट वायु रक्षा प्रणाली तैनात की जा रही है. वहीं, अमेरिका ने अदाना वाणिज्य दूतावास से अपने राजनयिकों और उनके परिवारों को वापस बुला लिया है. ए
एक नए वीडियो से संकेत मिलता है कि एक अमेरिकी मिसाइल ने संभवतः एक ईरानी प्राथमिक विद्यालय को निशाना बनाया, जहाँ 175 लोग मारे गए, जिनमें ज़्यादातर बच्चे थे.
ऑस्ट्रेलिया ने ईरान की राष्ट्रीय महिला फ़ुटबॉल टीम की पाँच सदस्यों को मानवीय वीज़ा दिया है, जिन्हें राष्ट्रगान गाने से इनकार करने पर ईरान में “ग़द्दार” करार दिया गया था.
टॉकिंग न्यूज
युद्ध का 11वां दिन
हरकारा प्लेटफॉर्म पर टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश में खाड़ी क्षेत्र में जारी अमेरिका-ईरान युद्ध के 11वें दिन की स्थिति और उसके वैश्विक प्रभावों का विश्लेषण किया गया.
पहले हिस्से में हमने बात कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहली बार संकेत दिया है कि युद्धविराम की संभावना दिखाई दे रही है. हालांकि ईरान ने अमेरिका के साथ सीधे समझौता या बातचीत करने से इनकार कर दिया है, जिससे यह स्पष्ट नहीं है कि संभावित शांति वार्ता किसके माध्यम से होगी. ट्रंप के बयानों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए. चर्चा में एक हमले का ज़िक्र किया गया जिसमें स्कूली बच्चियों की मौत हुई थी और आरोप लगाया गया कि इसमें अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल का इस्तेमाल हुआ, जबकि ट्रंप ने इसमें अमेरिका की भूमिका से इनकार किया.
एपिसोड में यह भी बताया गया कि युद्ध का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है. ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही रोकने के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया. यह मार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल व्यापार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. एपिसोड के अंत में यह भी कहा गया कि इस युद्ध का असर भारत जैसे देशों में भी दिखाई देने लगा है. तेल संकट के कारण एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है और भविष्य में पेट्रोल-डीजल के दाम भी बढ़ सकते हैं.
जब ट्रंप ने पत्रकारों को फोन मिलाना शुरू कर दिया...!
‘बीबीसी’ के उत्तर अमेरिका संवाददाता एंथनी ज़ुर्चर की रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार की उथल-पुथल भरी सुबह, जब अमेरिकी शेयर सूचकांक गिरे और तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घबराहट को शांत करने के लिए पत्रकारों को फोन मिलाना शुरू कर दिया. हालाँकि, जब उनसे और विवरण माँगा गया तो उनकी टिप्पणियों में स्पष्टता की कमी थी. ‘न्यूयॉर्क पोस्ट’ के एक पत्रकार ने जब तेल की बढ़ती कीमतों के बारे में पूछा तो ट्रंप ने कहा, “मेरे पास हर चीज़ की योजना है, ठीक है? आप बहुत ख़ुश होंगे.”
‘सीबीएस न्यूज़’ से उन्होंने कहा कि युद्ध “काफ़ी हद तक पूरा हो चुका है.” उन्होंने आगे जोड़ा, “हम तय कार्यक्रम से बहुत आगे चल रहे हैं.” जब पूछा गया कि क्या ऑपरेशन जल्द ही ख़त्म हो सकता है, तो ट्रंप ने कहा: “मुझे नहीं पता, यह निर्भर करता है. इसे ख़त्म करने का फ़ैसला सिर्फ़ मेरे दिमाग़ में है, किसी और के नहीं.”
हालांकि, ट्रंप की फोन कॉल्स का असर हुआ और शेयर बाज़ार में सुधार देखा गया. तेल के एक बैरल की कीमत—जो दिन में 120 डॉलर तक पहुँच गई थी—90 डॉलर से नीचे आ गई. कुछ ही दिन पहले ट्रंप ने कहा था कि वह ईरान के “बिना शर्त आत्मसमर्पण” तक युद्ध नहीं रोकेंगे. लेकिन सोमवार को उनकी टिप्पणियों के बाद ऐसा लग रहा था कि इस सैन्य अभियान का अंत क़रीब है. लेकिन, शाम तक ट्रंप अपने उन बयानों से पीछे हटते नज़र आए.
जानकारों का कहना है कि अगर शेयर बाज़ार स्थिर हो भी जाते हैं, तो पेट्रोल की कीमतों में उछाल को शांत होने में अधिक समय लग सकता है. अमेरिका में गैसोलीन (पेट्रोल) की औसत कीमत अब 3.48 डॉलर प्रति गैलन है, जो एक हफ़्ते पहले की तुलना में 48 सेंट अधिक है.
यह ऐसे समय में हो रहा है जब अर्थव्यवस्था के बारे में कुछ चिंताजनक संकेत मिल रहे हैं. पिछले शुक्रवार को, ब्यूरो ऑफ़ लेबर स्टैटिस्टिक्स ने घोषणा की कि अमेरिका में फरवरी में 92,000 नौकरियाँ चली गईं, बेरोज़गारी बढ़कर 4.4% हो गई और लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट 62% पर आ गया है, जो दिसंबर 2021 के बाद सबसे कम है.
अमेरिका में बढ़ती महंगाई और रहने का खर्च लोगों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है. चुनाव नज़दीक हैं और उत्तर-पश्चिमी जॉर्जिया जैसे रूढ़िवादी इलाक़ों में भी मतदाता असहज हैं. बॉब स्टिनेट जैसे स्वतंत्र मतदाता और पेशे से नर्स रहीं एंजी ने तेल की बढ़ती कीमतों और युद्ध में अमेरिका के शामिल होने पर चिंता जताई है. ट्रंप ने वादा किया है कि कीमतें जल्द नीचे आएँगी, लेकिन इस युद्ध की आर्थिक और राजनीतिक कीमत क्या होगी, यह अभी तय होना बाक़ी है.
नए सुप्रीमो मोजतबा के समर्थन में लाखों ईरानियों ने तेहरान में रैली निकाली
‘अल जज़ीरा’ की रिपोर्टर एलिज़ाबेथ मेलिमोपोलोस के अनुसार, ईरान पर अमेरिका-इज़रायल युद्ध के दूसरे हफ़्ते में, तेहरान को “अब तक की सबसे भीषण बमबारी” का सामना करना पड़ रहा है. साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई से “ख़ुश नहीं” हैं. लेकिन, इसके विपरीत मोजतबा के समर्थन में लाखों ईरानियों ने तेहरान में रैली निकाली.
मंगलवार को विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची ने भी कहा कि ईरान जब तक ज़रूरी होगा तब तक लड़ता रहेगा. उनके इस बयान ने ट्रंप के इस दावे पर सवालिया निशान लगा दिया है कि युद्ध “जल्द” ख़त्म हो जाएगा. इस बीच ईरानी न्यूज़ एजेंसी ‘इसना’ की रिपोर्ट है कि पश्चिमी ईरान के अराक़ शहर में एक आवासीय इमारत पर हुए अमेरिकी-इज़रायली हवाई हमले में पाँच लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए. पूर्वी तेहरान में आवासीय इमारतों पर हुए हमले में कम से कम 40 लोग मारे गए, जबकि तेल प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों से राजधानी ज़हरीले धुएँ से भर गई. ईरान का कहना है कि युद्ध में अब तक 1,255 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं और लगभग 10,000 घायल हुए हैं.
ईरानी स्टेट टीवी के अनुसार, उप विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने कहा कि चीन, रूस और फ़्रांस सहित कुछ देशों ने युद्धविराम के संबंध में ईरान से संपर्क किया है. पर ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़िर क़ालीबाफ़ ने रिहायशी इलाक़ों पर हमलों का “कड़ा जवाब” देने का संकल्प लिया है.
ऊर्जा बाज़ारों पर असर: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि रूस वैश्विक ऊर्जा संकट से निपटने के लिए यूरोपीय ग्राहकों के साथ फिर से काम करने को तैयार है. फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि वे होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए एक मिशन की तैयारी कर रहे हैं. ईरानी तेल प्रतिष्ठानों पर बमबारी से वैश्विक तेल और गैस की कीमतें बढ़ गई हैं, जिसके बाद G7 देशों ने बाज़ार को स्थिर करने के लिए अपने रिज़र्व खोलने की तैयारी की है.
वैश्विक स्तर पर फैल रहा है ईरान संघर्ष; चीन अगर ताइवान पर अटैक कर दे तो क्या होगा?
‘एक्सियोस’ के लिए ज़ाचरी बसु की रिपोर्ट के अनुसार, यह युद्ध अब वैश्विक रूप ले चुका है. कम से कम 20 देश अब सैन्य रूप से इसमें शामिल हैं—कुछ गोलियाँ चला रहे हैं, कुछ ढाल बने हैं, तो कुछ चुपचाप हथियारों की आपूर्ति कर रहे हैं. वहीं, ऊर्जा संकट का व्यापक झटका युद्ध के मोर्चे से दूर स्थित देशों को भी दंडित कर रहा है.
यह क्यों मायने रखता है: यह तीसरा विश्व युद्ध नहीं है. लेकिन हम शायद उसके सबसे करीब आ पहुँचे हैं. शीत युद्ध के बाद किसी भी संकट की तुलना में यह युद्ध अधिक देशों, अधिक महाशक्तियों और कई ओवरलैपिंग (एक-दूसरे से जुड़े) संघर्षों को अपनी चपेट में ले रहा है.
युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने कम से कम 10 देशों पर हमला किया है. वाशिंगटन और उसके सहयोगियों को अधिकतम दर्द पहुँचाने की कोशिश में ईरान ने अमेरिकी और इज़रायली ठिकानों, फ़ारस की खाड़ी की राजधानियों, तेल के बुनियादी ढांचों और नागरिक क्षेत्रों को निशाना बनाया है. ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को प्रभावी ढंग से बंद कर दिया है, जहाँ से दुनिया का 20% तेल गुज़रता है. इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में तेल, गैस, प्लास्टिक और उर्वरकों की कीमतें आसमान छू रही हैं. इज़रायल दो मोर्चों पर लड़ रहा है—एक तरफ ईरान पर बमबारी कर रहा है, तो दूसरी तरफ लेबनान में ज़मीनी स्तर पर हिज़्बुल्लाह से जूझ रहा है, जहाँ एक सप्ताह में 500,000 से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं.
युद्ध मध्य पूर्व से बहुत दूर तक फैल गया है. इसने यूरोपीय सेनाओं को भी संघर्ष में खींच लिया है और नाटो को पहली बार मित्र देशों के क्षेत्र में ईरानी मिसाइलों को मार गिराने के लिए मजबूर किया है. साइप्रस (जो यूरोपीय संघ का सदस्य है) में एक ब्रिटिश हवाई अड्डे पर ईरानी ड्रोन के हमले के बाद, फ़्रांस ने पूर्वी भूमध्य सागर में अपने परमाणु-संचालित विमान वाहक पोत को ब्रिटिश युद्धपोतों के साथ तैनात कर दिया है. नाटो के भीतर कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे ग्रीस और तुर्की ने भी साइप्रस में अपनी सेनाएँ भेज दी हैं, जहाँ 50 वर्षों से विभाजित द्वीप की सीमा रेखा पर अब उनके लड़ाकू विमान एक-दूसरे के आमने-सामने हैं.
यहाँ तक कि ऑस्ट्रेलिया ने भी सोमवार को कहा कि वह यूएई और अन्य खाड़ी देशों को ईरान से बचाने में मदद करने के लिए मिसाइलें और एक रडार विमान भेज रहा है. इस बीच, पिछले सप्ताह श्रीलंका के तट पर एक अमेरिकी पनडुब्बी ने एक ईरानी युद्धपोत को डुबो दिया—जो द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों के बाद से अमेरिका द्वारा टारपीडो से किया गया पहला शिकार है.
छिपे हुए मायने: जहाँ एक तरफ गोलियों और बमों का युद्ध छिड़ा है, वहीं दुनिया की महाशक्तियों के बीच एक ‘शैडो वॉर’ (पर्दे के पीछे का युद्ध) भी चल रहा है. ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, रूस ईरान के साथ अमेरिकी युद्धपोतों और विमानों की उपग्रह (सॅटॅलाइट) इमेजरी साझा कर रहा है, जिससे तेहरान को अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने में मदद मिल रही है. दूसरी ओर, यूक्रेन—जो चार साल से उन्हीं ईरानी ड्रोन्स का सामना कर रहा है जो अब खाड़ी देशों पर कहर बरपा रहे हैं—ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की रक्षा के लिए अपने विशेषज्ञ और कम लागत वाले इंटरसेप्टर तैनात किए हैं.
चीन, जो कुछ ही हफ्तों में ट्रंप के राजकीय दौरे की मेज़बानी करने वाला है, दोनों पक्षों से लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है. अरबों डॉलर के आर्थिक जोखिम का सामना करते हुए, चीन युद्धविराम की मांग कर रहा है और ईरान पर होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का दबाव बना रहा है, क्योंकि बीजिंग अपने 40% तेल आयात के लिए इसी मार्ग पर निर्भर है. सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी खुफिया जानकारी यह भी दर्शाती है कि चीन ईरान को वित्तीय सहायता, स्पेयर पार्ट्स और मिसाइल कंपोनेंट्स की आपूर्ति करने की तैयारी कर रहा है.
आगे क्या देखना है: ईरान युद्ध ट्रंप के एजेंडे पर मौजूद हर दूसरे बड़े संघर्ष को नया रूप दे रहा है. इस सप्ताह अबू धाबी में होने वाली अमेरिका-मध्यस्थता वाली यूक्रेन शांति वार्ता को युद्ध के कारण अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है. ऊर्जा संकट को प्रबंधित करने के लिए अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों में छूट देने के बाद भारत ने फिर से रूसी तेल खरीदना शुरू कर दिया है.
ग़ज़ा के लिए ट्रंप की प्रमुख शांति योजना भी रुक गई है, क्योंकि ग़ज़ा के पुनर्निर्माण के लिए अरबों का वादा करने वाले खाड़ी देश अब ईरानी मिसाइलों से खुद को बचाने में लगे हैं. इसके अलावा, ताइवान को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं. यह युद्ध अमेरिका के उन मिसाइल भंडारों को तेज़ी से खाली कर रहा है जिन्हें उसने प्रशांत महासागर में चीन को रोकने के लिए वर्षों से जमा किया था—जिससे यह गंभीर सवाल उठता है कि अगर बीजिंग ताइवान पर हमला कर दे, तो क्या होगा.
ट्रंप को ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड का जवाब, ‘युद्ध का अंत हम तय करेंगे, हमले बंद नहीं हुए तो एक लीटर तेल निर्यात नहीं होने देंगे’
‘एक्सियोस’ के लिए बराक राविड की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की टिप्पणियों के जवाब में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने कहा कि “युद्ध का अंत हम तय करेंगे.” आईआरजीसी ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका और इज़रायल के हमले जारी रहे तो तेहरान क्षेत्र से “एक लीटर तेल” भी निर्यात नहीं होने देगा. इसके जवाब में ट्रंप ने बढ़ती तेल की कीमतों के बारे में दावा किया कि यह एक अल्पकालिक स्थिति है. उन्होंने कहा कि एक बार जब ईरान क्षेत्र या वाणिज्यिक शिपिंग के लिए ख़तरा पैदा करना बंद कर देगा, तो तेल बाज़ार काफ़ी स्थिर हो जाएगा.
ट्रंप ने ईरान के सर्वोच्च नेता के बेटे मोजतबा ख़ामेनेई को नया नेता नियुक्त किए जाने के फ़ैसले पर “निराशा” ज़ाहिर की. उन्होंने कहा, “इससे देश के लिए वैसी ही समस्याएँ और बढ़ेंगी.” हालाँकि, ट्रंप ने यह कहने से इनकार कर दिया कि क्या मोजतबा ख़ामेनेई “निशाने पर हैं.” उन्होंने पत्रकारों से कहा कि उनके लिए इस पर बात करना “अनुचित” होगा. वह चाहते हैं कि ईरान का एक नया नेता उसी देश के भीतर से उभरे, जैसा कि वेनेज़ुएला में हुआ था, बजाय इसके कि देश के सिस्टम को पूरी तरह से नष्ट कर दिया जाए जैसा अमेरिका ने इराक में किया था. लेकिन उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि नए ईरानी नेता को अपने पूर्ववर्ती की तुलना में एक अलग नीति अपनानी चाहिए. “हमें एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जो कई वर्षों तक शांति बनाए रख सके, और अगर हमें वह नहीं मिल सकता है, तो हमें इसे अभी ख़त्म कर देना चाहिए,”
नेतन्याहू की मौत या घायल होने का किया दावा
‘द यरूशलम पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की तस्नीम न्यूज़ एजेंसी ने सोमवार को एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें इस झूठी अटकल को बढ़ावा दिया गया कि इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू मारे गए होंगे या घायल हो गए होंगे. इस रिपोर्ट ने युद्ध के दौरान ऑनलाइन फैलने वाली उन अफ़वाहों को फिर से हवा दे दी है जो वर्तमान इज़रायल-ईरान संघर्ष के दौरान बार-बार सामने आती रही हैं.
फ़ारसी भाषा की इस ख़बर में नेतन्याहू पर किसी भी हमले का कोई सबूत या उनके ज़ख़्मी होने की कोई आधिकारिक पुष्टि पेश नहीं की गई. इसके बजाय, रिपोर्ट ने सार्वजनिक जानकारी के कई टुकड़ों को एक साथ जोड़कर एक भ्रामक कहानी गढ़ दी. इसमें नेतन्याहू के हालिया वीडियो क्लिप्स का न होना, हिब्रू मीडिया में उनके घर के आसपास सुरक्षा बढ़ाए जाने की रिपोर्ट्स, जारेड कुशनर और अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़ की संभावित यात्रा का टलना, और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और नेतन्याहू के बीच हुई फोन कॉल का फ्रांसीसी विवरण (जिसमें बातचीत की तारीख नहीं बताई गई थी) शामिल हैं.
ईरानी ड्रोन्स से घबराए अमेरिका के रुख में बदलाव, एक बार ऑफर ठुकराने के बाद ज़ेलेंस्की से मदद मांगी
‘एक्सियोस’ की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, लगभग सात महीने पहले, यूक्रेनी अधिकारियों ने अमेरिका को ईरानी निर्मित हमलावर ड्रोन्स को मार गिराने की अपनी युद्ध-परीक्षित (बैटल-प्रूवन) तकनीक बेचने की कोशिश की थी. उन्होंने बाक़ायदा एक पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन भी दिया था, जिसमें यह दिखाया गया था कि कैसे यह तकनीक मध्य पूर्व के युद्ध में अमेरिकी बलों और उनके सहयोगियों की रक्षा कर सकती है. ट्रंप प्रशासन ने तब यूक्रेन की इस पेशकश को ठुकरा दिया था, लेकिन अब ईरान से उम्मीद से अधिक ड्रोन हमले होने के कारण अमेरिका को अपना रुख बदलना पड़ा है.
अमेरिकी अधिकारियों ने एक्सियोस को बताया कि यूक्रेन के प्रस्ताव को ठुकराना ईरान पर बमबारी शुरू होने के बाद से प्रशासन की सबसे बड़ी रणनीतिक भूलों में से एक है. ईरान के सस्ते ‘शाहेद’ ड्रोन्स को सात अमेरिकी सैनिकों की मौत से जोड़ा गया है, और इन ड्रोनों को रोकने के लिए अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को लाखों डॉलर खर्च करने पड़े हैं. एक अमेरिकी अधिकारी ने स्वीकार किया, “अगर इस युद्ध की दिशा में हमसे कोई सामरिक भूल या गलती हुई है, तो वह यही थी.”
गहराई से देखें: यूक्रेन शाहेद ड्रोनों का मुक़ाबला करने में दुनिया का सबसे अनुभवी देश है. रूस ने पश्चिमी यूक्रेन पर अपने आक्रमण के लिए ईरान से भारी मात्रा में इन ड्रोनों को खरीदा है और ‘गेरान’ नाम से उनका उत्पादन किया है. शाहेद-शैली के ड्रोनों को मार गिराने के लिए यूक्रेन ने अन्य सेंसरों और वायु रक्षा प्रणालियों के साथ-साथ एक कम लागत वाला इंटरसेप्टर ड्रोन भी विकसित किया है.
बैठक के अंदर क्या हुआ: 18 अगस्त को व्हाइट हाउस की एक बंद कमरे की बैठक में, यूक्रेनी राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने राष्ट्रपति ट्रंप को ये इंटरसेप्टर ड्रोन देने की पेशकश की थी. एक अधिकारी के अनुसार, इसका मक़सद द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करना और रूसी आक्रामकता के ख़िलाफ़ अमेरिकी समर्थन के लिए आभार जताना था.
यूक्रेनी टीम के पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन में मध्य पूर्व का एक नक़्शा दिखाया गया था और उसमें एक सटीक चेतावनी दी गई थी: “ईरान अपने ‘शाहेद वन-वे-अटैक’ ड्रोन के डिज़ाइन में सुधार कर रहा है.” इस प्रेजेंटेशन में तुर्की, जॉर्डन और फ़ारस की खाड़ी के देशों (जहाँ अमेरिकी बेस हैं) में “ड्रोन कॉम्बैट हब” बनाने का विचार शामिल था. एक यूक्रेनी अधिकारी ने कहा, “हम ड्रोन की दीवारें और रडार जैसी ज़रूरी चीज़ें बनाना चाहते थे. अगस्त की उस बैठक में ट्रंप ने अपनी टीम को इस पर काम करने को कहा था, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया.”
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, अब जाकर अमेरिका ने औपचारिक रूप से ज़ेलेंस्की से ड्रोन-रोधी मदद मांगी है.
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता एना केली ने इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “ईरानी जवाबी हमलों में 90% की गिरावट आई है क्योंकि उनकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं को पूरी तरह से नष्ट किया जा रहा है.” उन्होंने गुमनाम स्रोतों को ‘कायर’ बताते हुए कहा कि रक्षा सचिव पीट हेगसेथ और सशस्त्र बलों ने हर संभावित प्रतिक्रिया के लिए बेहतरीन योजना बनाई थी.
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने ज़्यादातर ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों को मार गिराया है, और अब तक 7 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है, जो युद्ध की शुरुआत में 40 मौतों के अनुमान से बहुत कम है. क्षेत्रीय सहयोगियों की शिकायतों के बाद, अमेरिका ने शुक्रवार को ‘मेरोप्स’ नामक अपना खुद का शाहेद-किलर ड्रोन सिस्टम तैनात करने की योजना की घोषणा की. एक अमेरिकी अधिकारी ने एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि ईरान के ड्रोनों को रोकने का प्रदर्शन अब तक “निराशाजनक” रहा है, जबकि एक अन्य ने माना कि अगर यूक्रेनी ड्रोनों को पहले तैनात किया गया होता तो मदद मिलती.
ड्रोन की लागत का खेल: एक ईरानी शाहेद ड्रोन की कीमत $20,000 से $50,000 के बीच होती है. इसकी तुलना में यूक्रेनी इंटरसेप्टर और भी सस्ते हैं. यमन में हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ लड़ाई के दौरान भी इतने सस्ते लक्ष्यों को रोकने के लिए करोड़ों डॉलर की मिसाइलें दागने की लागत को लेकर अमेरिका में चिंताएँ थीं.
छिपे हुए मायने: ट्रंप की “आर्ट ऑफ़ द डील” वाली मानसिकता को समझते हुए, यूक्रेन ने इस ड्रोन रक्षा प्रस्ताव को एक बिज़नेस पार्टनरशिप के रूप में ढाला था, जिसमें अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग नौकरियाँ पैदा करने का वादा किया गया था. इसके बदले में, यूक्रेन चाहता था कि अमेरिका इसमें 50% का निवेश करे और यूक्रेन को अमेरिकी हथियार खरीदने की सुविधा मिले. यूक्रेन का अनुमान था कि वह 2 करोड़ तक ऐसे ड्रोन बनाने में मदद कर सकता है जिससे “अमेरिकी ड्रोन वर्चस्व” स्थापित किया जा सके.
बांग्लादेश ने विश्वविद्यालय बंद किए
अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष से बढ़े ऊर्जा संकट के बीच बांग्लादेश सरकार ने बिजली और ईंधन बचाने के लिए देश के सभी सरकारी और निजी विश्वविद्यालय बंद कर दिए हैं और ईद-उल-फितर की छुट्टियां पहले ही घोषित कर दी हैं.
बढ़ते संकट के बीच सरकार ने ईंधन की बिक्री पर भी रोज़ाना की सीमा लगा दी है. विदेशी पाठ्यक्रम वाले स्कूलों और निजी कोचिंग संस्थानों को भी इस दौरान बंद रखने को कहा गया है. पांच में से चार सरकारी उर्वरक कारखाने बंद करने पड़े हैं और उपलब्ध गैस को बिजली संयंत्रों की ओर मोड़ा गया है.
कई शहरों में कमर्शियल एलपीजी की कमी, होटल-रेस्तरां बंद होने की चेतावनी
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के कई शहरों में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की कमी की शिकायत सामने आई है. यह स्थिति उस समय बनी है जब हाल ही में देशभर में कमर्शियल और घरेलू दोनों एलपीजी सिलेंडरों की कीमतें बढ़ाई गई हैं. बेंगलुरु और चेन्नई के होटल संगठनों ने कहा है कि अगर गैस की आपूर्ति बहाल नहीं हुई तो 10 मार्च से कई रेस्तरां बंद करने पड़ सकते हैं.
बेंगलुरु के होटल संगठन ने समाचार एजेंसी ‘पीटीआई’ से कहा, “गैस की आपूर्ति बंद हो गई है, इसलिए कल से होटल बंद करने पड़ सकते हैं.” संगठन ने यह भी कहा कि अगर होटल बंद होते हैं तो इसका असर आम लोगों, छात्रों और मेडिकल पेशेवरों पर पड़ेगा, जो रोज़ाना भोजन के लिए इन होटलों पर निर्भर रहते हैं.
चेन्नई होटल्स एसोसिएशन ने भी इसी तरह का बयान जारी किया और इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप की मांग की. कमर्शियल एलपीजी वितरकों ने यह कहते हुए सिलेंडर देना बंद कर दिया है कि उनके पास स्टॉक उपलब्ध नहीं है. इसके कारण कई रेस्तरां बंद करने की नौबत आ गई है. संगठन के अनुसार इससे होटलों में पहले से बुक किए गए बैंक्वेट कार्यक्रमों, आईटी पार्कों और कॉलेज हॉस्टलों में भोजन की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है.
सिर्फ दक्षिण भारत ही नहीं, गुरुग्राम और मुंबई के रेस्तरां में भी कमर्शियल एलपीजी की कमी की खबरें सामने आई हैं. गुरुग्राम के एक रेस्तरां के मैनेजर रोहित अरोड़ा ने बताया कि उनके गैस सप्लायर ने कमर्शियल एलपीजी की डिलीवरी रोक दी है. उन्होंने कहा कि उनके पास बैकअप सिलेंडर हैं, जो लगभग तीन दिन चल सकते हैं. अगर स्थिति जारी रहती है तो उन्हें घरेलू सिलेंडर इस्तेमाल करने या मेन्यू में कुछ चीज़ें कम करनी पड़ सकती हैं.
‘एनडीटीवी’ की एक रिपोर्ट के अनुसार मुंबई के दादर, अंधेरी और माटुंगा जैसे इलाकों में कई रेस्तरां ने गैस बचाने के लिए धीमी आंच पर पकने वाले व्यंजन मेन्यू से हटा दिए हैं और काम के घंटे भी कम कर दिए हैं. वहीं पुणे नगर निगम ने शहर के गैस श्मशानों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है, ताकि उपलब्ध प्रोपेन और ब्यूटेन गैस को घरेलू एलपीजी आपूर्ति के लिए प्राथमिकता दी जा सके.
इस बीच नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने भी सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है. संगठन ने कहा कि रेस्तरां उद्योग का कामकाज काफी हद तक कमर्शियल एलपीजी पर निर्भर करता है और इसकी आपूर्ति बाधित होने से बड़ी संख्या में रेस्तरां बंद होने की स्थिति पैदा हो सकती है.
हरकारा डीप डाइव:
बंगाल की राजनीति में बढ़ता टकराव: राष्ट्रपति विवाद से लेकर चुनावी रणनीति तक
हरकारा डीप डाइव के हालिया एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने पश्चिम बंगाल की राजनीति पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्र था राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की हालिया बंगाल यात्रा, उससे जुड़ा विवाद और चुनाव से पहले तेज़ी से बदलता राजनीतिक माहौल किस तरफ इशारा कर रहा है.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 7 तारीख को पश्चिम बंगाल गई थीं. यह कार्यक्रम संथाल समुदाय से जुड़े एक आयोजन से संबंधित बताया गया. इसी दौरान राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें इस बात का अफसोस है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कार्यक्रम में नहीं आईं. उन्होंने ममता को अपनी “छोटी बहन” बताते हुए कहा कि उनकी अनुपस्थिति उन्हें खली. इस बयान के बाद विवाद शुरू हो गया। ममता बनर्जी ने जवाब देते हुए कहा कि राष्ट्रपति को भाजपा की ब्रीफ पर राजनीति नहीं करनी चाहिए और उन्हें अपने संवैधानिक पद की गरिमा बनाए रखनी चाहिए.
इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी और इसे एक आदिवासी महिला राष्ट्रपति का अपमान बताया. उन्होंने कहा कि बंगाल की जनता इसे माफ नहीं करेगी. तृणमूल कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पलटवार करते हुए सोशल मीडिया पर एक तस्वीर साझा की. इसमें आडवाणी के जन्मदिन के कार्यक्रम की तस्वीर दिखाई गई जिसमें मोदी और आडवाणी बैठे हुए हैं जबकि राष्ट्रपति मुर्मू किनारे खड़ी दिखाई देती हैं.
श्रवण गर्ग के अनुसार यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक संकेत भी हो सकता है. उनका कहना है कि बंगाल में चुनाव नज़दीक आने की वजह से केंद्र सरकार अपनी रणनीति को मज़बूत करना चाहती है. बंगाल की राजनीति में ध्रुवीकरण एक महत्वपूर्ण कारक बन सकता है. लोकसभा चुनाव में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के वोट शेयर में केवल लगभग 7 प्रतिशत का अंतर था. गर्ग के अनुसार अगर सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है तो चुनावी गणित बदल सकता है.
श्रवण गर्ग का मानना है कि बंगाल का चुनाव केवल राज्य की सत्ता का सवाल नहीं है. इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है. अगर ममता बनर्जी सत्ता में बनी रहती हैं तो विपक्ष की राजनीति को मज़बूती मिल सकती है. वहीं अगर भाजपा बंगाल में सत्ता हासिल करती है तो यह राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा राजनीतिक बदलाव माना जाएगा.
कुछ ‘बिरले’ ही होते हैं…
लाइव एपिसोड के दूसरे हिस्से में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के ख़िलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को लेकर विस्तार से चर्चा हुई. इस बातचीत में पत्रकार राजेश चतुर्वेदी शामिल हुए, जो लंबे समय से संसदीय कार्यवाही को कवर करते रहे हैं.
कार्यक्रम में चर्चा की शुरुआत इस सवाल से हुई कि स्पीकर जैसे संवैधानिक पद के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने का क्या मतलब है और इसे किस नज़र से देखा जाना चाहिए. राजेश चतुर्वेदी ने इस मुद्दे को समझाने के लिए संसदीय इतिहास का उदाहरण भी दिया. उन्होंने 2008 में लोकसभा के पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी का मामला याद दिलाया. उस समय अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर वामपंथी दलों ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था और चटर्जी से स्पीकर पद छोड़ने को कहा था. लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इस्तीफा देने से इनकार कर दिया कि स्पीकर का पद किसी राजनीतिक दल का नहीं बल्कि संवैधानिक और पूरी तरह निष्पक्ष पद होता है. बाद में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया, लेकिन उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया.
चर्चा में संसद की कुछ अन्य परंपराओं पर भी बात हुई. 2014 के बाद पहले कार्यकाल में विपक्ष को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं दिया गया. वहीं उपसभापति का पद, जो परंपरागत रूप से विपक्ष को दिया जाता रहा है, पिछले दो लोकसभा कार्यकालों से खाली पड़ा है. इस पर भी सवाल उठाए गए कि स्पीकर के रूप में इस पद को भरने की पहल क्यों नहीं हुई.
चर्चा के अंत में यह सवाल उठाया गया कि इस अविश्वास प्रस्ताव से विपक्ष को क्या हासिल होगा. इस पर राजेश चतुर्वेदी ने कहा कि संख्या बल के लिहाज़ से इस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना कम है, लेकिन इससे विपक्ष मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है. साथ ही पिछले छह-सात वर्षों में संसद की कार्यवाही को लेकर जो आरोप लगाए गए हैं, उन्हें फिर से सार्वजनिक चर्चा में लाने का मौका भी मिलेगा.
AI समिट विरोध पर सवाल उठाने वाला पत्रकार का ट्वीट सरकार ने ब्लॉक कराया
आर्टिकल 14 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में हुए AI समिट के दौरान इंडियन यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के एक विरोध प्रदर्शन पर सवाल उठाने वाले एक पत्रकार के ट्वीट को केंद्र सरकार ने ब्लॉक करने का आदेश दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने यह आदेश सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A के तहत दिया.
23 फरवरी 2026 को पत्रकार को ‘एक्स’ की कानूनी टीम की ओर से एक ई-मेल मिला. इसमें बताया गया कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने उनके एक ट्वीट को ब्लॉक करने का आदेश दिया है. ई-मेल में यह भी कहा गया कि अगर वह चाहें तो इस आदेश को चुनौती दे सकते हैं. यह ट्वीट उन्होंने तीन दिन पहले किया था. पत्रकार ने उस समय सवाल उठाया था कि दिल्ली में हुए AI समिट के दौरान इंडियन यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए शर्टलेस विरोध प्रदर्शन को “भारत की छवि खराब करने वाला” क्यों बताया जा रहा है.
पत्रकार ने अपने ट्वीट में कहा था कि अगर किसी चीज़ से भारत की छवि खराब होती है तो वह मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ हिंसा, दलितों पर अत्याचार, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की गिरफ्तारी या हत्या और सरकार के सदस्यों द्वारा दिए जाने वाले नफरती बयान हैं. सरकार ने इस ट्वीट को भारत में ब्लॉक कराने के लिए धारा 69A का इस्तेमाल किया, जिसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या देश की संप्रभुता से जुड़े कारणों के आधार पर कोई भी कंटेंट हटाने का आदेश दिया जा सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार ऐसे आदेशों का उद्देश्य केवल सोशल मीडिया पोस्ट हटवाना नहीं होता, बल्कि इससे लोगों को डराकर आत्म-सेंसरशिप की ओर धकेलना भी हो सकता है. पिछले एक दशक में सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को ऑनलाइन धमकियों, गालियों और संगठित ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा है, खासकर महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले लोगों को.
विश्लेषण
आकार पटेल: एक कमज़ोर राष्ट्र के रूप में हमने दब्बू बने रहना चुना है
मुझे इस हकीक़त से कोई परेशानी नहीं है कि एक राष्ट्र के रूप में हम हमेशा, या ज़्यादातर समय, वह हासिल नहीं कर सकते जो हम चाहते हैं. कोई भी देश इस मायने में पूरी तरह से संप्रभु (स्वतंत्र) नहीं है कि वह दुनिया पर अपनी मर्ज़ी थोप सके. इतिहास के सबसे ताक़तवर देशों के लिए भी यह बात सच है. अगर यह सच नहीं होता, तो अमेरिका वियतनाम, अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ के मैदान से भाग खड़ा नहीं होता, और अब ईरान में हार का सामना करने की कगार पर नहीं होता. अमेरिका हिंसा के ज़रिए ईरानी राष्ट्र को घुटनों पर लाना चाहता है और ऐसा होने वाला नहीं है.
हम कोई ताक़तवर देश नहीं हैं और इसलिए हमें अपनी चादर देखकर ही पैर पसारने चाहिए. यह महज़ तथ्यों को उसी रूप में स्वीकार करना है जैसे वे हैं, और आइने में अपनी असलियत देखने में कोई शर्म की बात नहीं है. आइने से जो तस्वीर नज़र आती है, वह एक ग़रीब आबादी की है, जिसके एक बड़े हिस्से को मुफ़्त अनाज के लिए हर महीने लाइन में लगने के लिए मजबूर होना पड़ता है. हम भारतीय संख्या में बहुत हैं, हाँ, लेकिन उस बात की ताक़त का अभी एहसास नहीं हुआ है. यह ताक़त भविष्य की संभावनाओं में छिपी है, वर्तमान की हकीक़त में नहीं.
और इसलिए, नहीं, मुझे यह मानने में कोई दिक़्क़त नहीं है कि हम मज़बूत नहीं हैं और इसलिए हमारी क्षमता में कमी है, और हम ताक़तवर देशों की तुलना में कम संप्रभु हैं.
हालाँकि, मुझे एक परेशानी है, मान लीजिए कि यह एक छोटी सी परेशानी है, कि हम अपनी इस सीमित संप्रभुता का इस्तेमाल कैसे करते हैं. हम जो कड़ा राष्ट्रवाद दिखाते हैं, वह कमज़ोर देशों और आमतौर पर हमारे पड़ोसियों के लिए ही रिज़र्व रहता है. बड़ी ताक़तें, मेरा मतलब है सचमुच की बड़ी ताक़तें, न कि क्षेत्रीय दबंग, अपनी ऊर्जा यह रोकने में बर्बाद नहीं करतीं कि आईपीएल टीमें बांग्लादेश से खिलाड़ी न चुनें, जैसा कि हम करते हैं. वे खेल के मैदान में मुँह फुलाकर विरोधियों से हाथ मिलाने से इनकार नहीं करतीं. भारत ऐसा ही करता है, क्योंकि हम बस यही कर सकते हैं.
जहाँ सच्चे राष्ट्रीय हितों का सवाल उठता है, जहाँ विरोध करना मुश्किल और बात मानना आसान होता है, वहाँ हम अक्सर और शायद हमेशा घुटने टेक देते हैं. रूसी तेल मत खरीदो. जी सर. रूसी तेल खरीदो. ठीक है सर. कोई ईरानी तेल नहीं. जी सर. अब अमेरिका को हमें यह बताने की भी ज़रूरत नहीं है कि हमें क्या कहना है या क्या नहीं कहना है. हम अपने दिल में जानते हैं कि ईरान के इस बेवकूफ़ी भरे युद्ध पर सच बोलने से ट्रम्प नाराज़ हो जाएँगे और इसलिए हम दूसरी तरफ़ देखने लगते हैं, क्योंकि अगर हम उस दबंग की आँखों में आँखें डालेंगे, तो वह हमें सीधा कर देगा.
इस बात को इतने सीधे तौर पर कहना क्रूर लग सकता है, लेकिन हमें कम से कम कभी-कभार ही सही, ख़ुद को आइने में देखने की कोशिश करनी चाहिए. 30 दिन की छूट एक उस पैरोल की तरह है जिस पर हमारे सज़ायाफ़्ता बाबा हमेशा नज़र आते हैं. अप्रैल में हम फिर से ख़ुद को क़ैद में सौंप देंगे और हमें यह बात माननी होगी.
क्या किसी को लगता है कि चीन, जो भारत की तरह ही बाहरी ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर है, उससे इस लहज़े में बात की जा सकती है? बिल्कुल नहीं. सख्त मिज़ाज और कभी न हँसने वाले, गले न मिलने वाले शी से ऐसा कहने के खयाल से ही ट्रम्प काँप उठेंगे.
हमने तय कर लिया है कि हम किसी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या पर टिप्पणी नहीं करेंगे, उसकी निंदा करना तो दूर की बात है, एक ऐसे धर्मगुरु जिन्हें लाखों भारतीय अपना धार्मिक नेता मानते थे. कि हम छोटी स्कूली बच्चियों के सामूहिक नरसंहार पर शोक नहीं मनाएँगे. हमने ज़मीन की तरफ़ घूरते रहने का फ़ैसला किया है, जब बिना युद्ध की घोषणा के अंधेरे में उन निहत्थे नाविकों को उड़ा दिया जाता है, जो कुछ घंटे पहले तक हमारे सम्मानित मेहमान थे.
यह सब, एक बार फिर, मेरी नज़र में केवल एक छोटी सी परेशानी है, भले ही मैं हमारे द्वारा किए गए किसी भी काम से सहमत न हूँ, क्योंकि मुझे यह बात समझ में आती है कि एक कमज़ोर राष्ट्र के रूप में हमने दब्बू बने रहना चुना है.
हालाँकि, मुझे हमारी डींगों और दिखावे से गंभीर दिक़्क़त है. यह पाखंड भले ही घरेलू जनता के लिए हो, लेकिन दुनिया इसे देख सकती है. जब हम ख़ुद से कहते हैं कि हम विश्वगुरु हैं और जी20 के घोषित मुखिया हैं और ऐसी ही अन्य कल्पनाएँ करते हैं, तो कोई यही उम्मीद करता है कि हम ऐसा सिर्फ़ इस यक़ीन के साथ कर रहे हैं कि भारतीय लोग सीधे-सादे और अनजान हैं, और वे ऐसी बकवास पर विश्वास कर लेंगे. यह काफ़ी डरावना होगा अगर हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि सरकार असल में इस पर विश्वास करती है, लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि हम पक्के तौर पर जानते हैं कि सरकार और ये प्रधानमंत्री इस पर विश्वास नहीं करते हैं. हम यह इसलिए जानते हैं क्योंकि जब बड़ी ताक़तों से निपटने की बात आती है तो उनकी कायरता साफ़ नज़र आती है. दूसरों के साथ हमारे काम, ख़ुद से कहे गए हमारे शब्दों से ज़्यादा ज़ोर से बोलते हैं.
उन भारतीयों में से एक होने के नाते जो हमारी महानता के बारे में होर्डिंग्स और टेलीविज़न पर परोसे गए झूठ को नहीं मानते, मुझे हमारा ऐसा करना बहुत खीज दिलाने वाला लगता है. लेकिन मुझे यह समस्याग्रस्त भी लगता है और इसलिए मेरी राय में यह एक बड़ी समस्या है. लोकतांत्रिक सरकारों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने मतदाताओं के प्रति ईमानदार रहें, न केवल नैतिकता और उसूलों के ज़ाहिर कारणों से, बल्कि इसलिए भी क्योंकि इससे सरकार का काम आसान हो जाता है.
भारतीय जनता पार्टी को यह समझाने के लिए ख़ुद को तोड़ना-मरोड़ना नहीं पड़ता कि हमारा आत्मसमर्पण वास्तव में आत्मसमर्पण क्यों नहीं है, और 30 दिन की छूट पाना असल में एक कूटनीतिक जीत कैसे है, अगर वे बता देते कि हमारी मजबूरियाँ क्या थीं.
और हमारे दोस्त, जिस हद तक दुनिया भर में (ईरान समेत) हमारे दोस्त अभी बचे हैं, यह जान पाते कि हमने उनका साथ इसलिए नहीं छोड़ा है क्योंकि हम उनके साथ हो रहे सुलूक से सहमत हैं (जो कि हम नहीं हैं), बल्कि इसलिए छोड़ा है क्योंकि हममें हिम्मत की कमी है. और आख़िर में, यह हम में से करोड़ों लोगों को आत्म-बोध की क्रूरता और तकलीफ़ से बचा लेता, जैसा कि अब हो रहा है, जब एक वैश्विक महाशक्ति होने की हमारी छवि अमेरिका के एक झटके से चकनाचूर हो जाती है.
आकार पटेल स्तंभकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.
‘यूनिफॉर्म सिविल कोड ही समाधान’: मुस्लिम विरासत कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में विरासत से जुड़े नियमों को महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाला बताने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि ऐसे मामलों का हल यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) हो सकता है. मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने की.
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण से पूछा कि क्या अदालत पर्सनल लॉ की संवैधानिकता पर फैसला दे सकती है. अदालत ने यह भी चिंता जताई कि अगर शरीयत के विरासत कानून को रद्द कर दिया जाता है तो कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है, क्योंकि मुस्लिम विरासत को नियंत्रित करने वाला कोई अलग वैधानिक कानून नहीं है. इस पर प्रशांत भूषण ने कहा कि ऐसी स्थिति में इंडियन सक्सेशन एक्ट लागू किया जा सकता है और अदालत यह घोषणा कर सकती है कि मुस्लिम महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर विरासत का अधिकार मिलना चाहिए.
पीठ ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में कानून बनाना विधायिका का काम है और इसका व्यापक समाधान यूनिफॉर्म सिविल कोड हो सकता है. अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपनी याचिका में यह भी स्पष्ट करे कि अगर शरीयत के प्रावधान रद्द होते हैं तो आगे क्या व्यवस्था होनी चाहिए. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई फिलहाल स्थगित कर दी.
वैज्ञानिकों की राय: भारत को प्रोजेक्ट चीता के तहत अफ्रीकी चीतों का आयात रोक देना चाहिए
द हिन्दू में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार कई वैज्ञानिकों और वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को प्रोजेक्ट चीता के तहत अफ्रीकी चीतों को आयात करना अब बंद कर देना चाहिए, क्योंकि देश में उनके लिए पर्याप्त आवास और शिकार उपलब्ध नहीं है. हाल ही में बोत्सवाना से 9 जंगली अफ्रीकी चीतों को भारत लाया गया. उन्हें मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में बनाए गए बड़े क्वारंटीन बाड़ों में रखा गया है. यह प्रक्रिया प्रोजेक्ट चीता का हिस्सा है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 सितंबर 2022 को शुरू किया था.
नए चीतों के आने के बाद भारत में अब कुल 53 चीते हो गए हैं. इनमें 33 शावक भारत में पैदा हुए हैं जबकि 20 वयस्क चीते विदेश से लाए गए हैं.सरकार का लक्ष्य है कि 2032 तक लगभग 17,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 60-70 चीतों की आत्मनिर्भर आबादी तैयार की जाए.
हालांकि कई वैज्ञानिक इस परियोजना की दिशा पर सवाल उठा रहे हैं. वन्यजीव जीवविज्ञानी और मेटास्ट्रिंग फाउंडेशन के सीईओ रवि चेल्लम का कहना है कि परियोजना में चीतों के कैद में प्रजनन पर ज़रुरत से ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है, जबकि चीता एक्शन प्लान में इसका उल्लेख भी नहीं है. उनके अनुसार 748.76 वर्ग किलोमीटर के कुनो नेशनल पार्क में अधिकतम लगभग 10 वयस्क चीते ही रह सकते हैं, लेकिन लगातार शावकों के जन्म से संख्या बढ़ती जा रही है. चेल्लम का कहना है कि भारत में अभी पर्याप्त ऐसे घास के मैदान और आवास नहीं हैं जहां जंगली और स्वतंत्र रूप से घूमने वाले चीतों की स्थायी आबादी रह सके. उनका यह भी कहना है कि बोत्सवाना जैसे देशों से, जहां जंगली चीतों की संख्या घट रही है, उन्हें लाकर भारत में लंबे समय तक कैद में रखना सही नहीं है.
इसी तरह अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरमेंट के शोधकर्ता नितिन राय ने भी कहा कि प्रोजेक्ट चीता के सफल होने की संभावना कम है क्योंकि बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त आवास नहीं है. उनके अनुसार पहले बड़े पैमाने पर घास के मैदानों का पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए, उसके बाद ही चीतों को बसाने पर विचार करना चाहिए. उनका कहना है कि “चीते अपने लिए खुद आवास नहीं बना सकते”.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में लाए गए चीतों की स्थिति अब तक बहुत अच्छी नहीं रही है. अब तक विदेश से लाए गए 9 चीतों और भारत में जन्मे 12 शावकों की मौत हो चुकी है.
होली की बधाई देने पर दलित युवक की हत्या, तीन गिरफ्तार
‘द ऑब्जर्वर पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ के बाहरी इलाके के एक गांव में 22 वर्षीय दलित युवक सूरज गौतम की कथित तौर पर चाकू मारकर हत्या कर दी गई. यह घटना 4 मार्च को दुबग्गा थाना क्षेत्र के बेगरिया गांव में हुई. सूरज गौतम ने होली के मौके पर अपने पड़ोसियों को “हैप्पी होली” कहा था, जिसके बाद कथित तौर पर एक ब्राह्मण परिवार के सदस्यों के साथ विवाद हो गया. परिवार और चश्मदीदों का आरोप है कि बहस के दौरान उस परिवार की एक महिला ने चाकू निकालकर सूरज पर कई वार किए.
पुलिस का कहना है कि उसे ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया था, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. पीड़ित परिवार की शिकायत पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धाराओं और अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत हत्या का मामला दर्ज किया है. पुलिस ने इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है और घटना में इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद कर लिया है.
कोरोना टीकाकरण के बाद कुछ लोगों में ब्लड क्लॉट क्यों बने, यह है वजह
द हिन्दू में प्रकाशित एक लेख के अनुसार वैज्ञानिकों ने अब समझ लिया है कि कुछ लोगों में कोविड -19 टीका लगने के बाद दुर्लभ मामलों में ब्लड क्लॉट क्यों बने. यह समस्या पहली बार 2021 में सामने आई थी, जब दुनिया भर में टीकाकरण शुरू हुआ था. शुरुआती मामले यूरोप में मिले और बाद में अमेरिका में भी देखे गए.
रिपोर्ट के मुताबिक यह समस्या ज़्यादातर एस्ट्राज़ेनेका और जॉनसन एंड जॉनसन के टीके लेने वालों में देखी गई. इन टीकों में एक बदला हुआ और हानिरहित वायरस एडेनोवायरस इस्तेमाल होता है, जो शरीर को कोरोना वायरस को पहचानना सिखाता है. लेकिन लगभग 10 लाख में 3 से 10 लोगों में एक दुर्लभ स्थिति देखी गई, जिसमें असामान्य खून के थक्के बनने लगे और प्लेटलेट्स कम हो गए. इस स्थिति को VITT (वैक्सीन-इंड्यूस्ड इम्यून थ्रोम्बोसाइटोपीनिया एंड थ्रोम्बोसिस) कहा जाता है.
शोध में पाया गया कि कुछ मरीज़ों के शरीर में PF4 नाम के प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बनने लगे. आम तौर पर यह प्रोटीन खून के थक्के बनने को नियंत्रित करता है, लेकिन इन मामलों में एंटीबॉडी उससे जुड़कर प्लेटलेट्स को सक्रिय कर देती थीं, जिससे क्लॉट बनने लगे.वैज्ञानिकों के अनुसार एडेनोवायरस के अंदर मौजूद प्रोटीन VII का एक हिस्सा PF4 से मिलता-जुलता है. इसी कारण कुछ दुर्लभ मामलों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही PF4 प्रोटीन पर हमला करने लगती है.
लेख में कहा गया है कि इस नई खोज से इस समस्या का कारण साफ़ हुआ है और इससे भविष्य में ऐसे टीकों को और सुरक्षित तरीके से बनाने में मदद मिल सकती है. यह लेख अरुण पंचपकेसन, सहायक प्रोफेसर, वाई.आर. गैटोंडे सेंटर फॉर एड्स रिसर्च एंड एजुकेशन, चेन्नई ने लिखा है.
इस टीम में ‘प्लेयर ऑफ़ द मैच’ जसप्रीत बुमराह (सिख) और ‘प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट’ संजू सैमसन (ईसाई) थे. इतने योगदान के बाद भी ट्रॉफ़ी को गुरुद्वारे, चर्च या मस्जिद में नहीं ले जाया गया.
सुशांत सिंह क्रिकेट एटआल में उस दिक्कत की तरफ इशारा करते हैं, जिसके कारण भारतीय क्रिकेट का सेक्यूलर कैरेक्टर अब ख़तरे में है. भारत की टी20 विश्व कप जीत एक शानदार खेल उपलब्धि थी. लेकिन इसके जश्न के दौरान आईसीसी अध्यक्ष और बीसीसीआई सचिव जय शाह की मौजूदगी ने संस्थागत तटस्थता पर कई सवाल खड़े कर दिए. आईसीसी की निष्पक्षता, शेड्यूलिंग और पिच तैयार करने में घरेलू टीम का पक्ष लेने की जो चिंताएं थीं, वे शाह के एक पक्षपाती संरक्षक जैसे रवैये से सच साबित होती दिखीं. यह जीत खेल से ज़्यादा मौजूदा राजनीतिक सत्ता की जीत के रूप में पेश की गई.
देश के दूसरे सबसे ताक़तवर नेता अमित शाह के बेटे जय शाह का व्यवहार निष्पक्ष प्रशासक के बजाय राजनेता जैसा दिखा. मुख्य कोच गौतम गंभीर का उन्हें सार्वजनिक रूप से धन्यवाद देना, सत्ता और क्रिकेट के बीच के गहरे गठजोड़ को दर्शाता है. अब भारतीय क्रिकेट व्यवस्था पूरी तरह एक राजनीतिक मशीनरी का हिस्सा बन गई है. राज्य तंत्र और मीडिया हर जीत को एक ‘सभ्यतावादी पुनरुत्थान’ के रूप में पेश कर रहे हैं.
सबसे चिंताजनक बात इस जश्न का विशेष धार्मिक रंग था. विश्व कप ट्रॉफ़ी को बहुसंख्यक पहचान को बढ़ावा देने के लिए एक हिंदू मंदिर (हनुमान टेकरी) ले जाया गया. मीडिया ने टीम को आशीर्वाद देते हिंदू संतों की तस्वीरें प्रमुखता से दिखाईं. यह महज़ निजी आस्था नहीं, बल्कि एक सोची-समझी जनसंपर्क रणनीति थी. 2014 के बाद से भारतीय सार्वजनिक संस्कृति में बहुसंख्यकवादी प्रतीकों को पूरी तरह से संस्थागत रूप दे दिया गया है.
हैरानी की बात है कि इस टीम में ‘प्लेयर ऑफ़ द मैच’ जसप्रीत बुमराह (सिख) और ‘प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट’ संजू सैमसन (ईसाई) थे. इतने अहम योगदान के बावज़ूद ट्रॉफ़ी को किसी गुरुद्वारे, चर्च या मस्जिद में नहीं ले जाया गया. एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में राज्य को किसी एक आस्था को दूसरों पर तरजीह नहीं देनी चाहिए. ट्रॉफ़ी का इस्तेमाल उस एजेंडे के लिए हो रहा है जो देश की बहुलवादी नींव को मिटाना चाहता है.
इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान धार्मिक आधार पर होने वाले ‘पेंटांगुलर’ क्रिकेट टूर्नामेंट (हिंदू, मुस्लिम और पारसी टीमों) का कड़ा विरोध किया था. उनका मानना था कि क्रिकेट को सांप्रदायिक विभाजन के बजाय धर्मनिरपेक्ष एकता का प्रतीक होना चाहिए. लेकिन आज का शासन आरएसएस की विचारधारा पर चलते हुए, क्रिकेट को ‘हिंदू राष्ट्र’ की परिकल्पना का हिस्सा बना रहा है. शिक्षा और सिनेमा के बाद अब खेल को भी संकीर्ण राष्ट्रवाद का ज़रिया बनाया जा रहा है, जो बिल्कुल ‘हिंदू पाकिस्तान’ जैसी सोच है.
क्रिकेट कभी वह साझा जगह थी जहाँ नागरिक एक साथ आते थे. जो प्रशंसक केवल बल्ले और गेंद की लय से प्यार करते हैं, उनके लिए अब बिना किसी राजनीतिक नैरेटिव के खेल का जश्न मनाना मुश्किल हो गया है. यह राजनीतिकरण राज्य और आस्था के बीच के अंतर को ख़त्म कर रहा है. खेल को प्रोपेगैंडा का हथियार बनाने का यह ज़हरीलापन इसकी सार्वभौमिकता को नष्ट कर रहा है. अगर यह सब जारी रहा, तो अंततः भारतीय क्रिकेट की साख और इस महान खेल की आत्मा ही खो जाएगी.
प्रगति सक्सेना: 3.5 मिनट में बैंड बाजा बिटिया…
मेरी एक दोस्त हैं जिन्हें पिछले 20 वर्षों से मैंने एक सड़े गले वैवाहिक जीवन में तिल तिल कर मरते देखा. मगर वह तमाम जिम्मेदारियों में फंसी इस डर से कभी किसी से कुछ कह ना सकी कि लोग क्या कहेंगे, मेरे मां - बाप का क्या होगा.
अंततः जब एक बार भाई को उसकी असल हालत का अंदाजा हुआ तो वह उसके साथ खड़ा हो गया. पति से यह बर्दाश्त ना हुआ और शादी के 24 साल बाद वह उसे उसके मां बाप के पास छोड़ गया.
इस हृदय विदारक घटना का जिक्र यहां इसलिए कर रही हूं कि हमारे समाज की हकीकत यही है - आंकड़ों के मुताबिक तीन में से एक भारतीय महिला घरेलू हिंसा का शिकार होती है. केवल वर्ष 2023 में पुलिस ने महिलाओं पर पति या परिवार द्वारा हिंसा और निर्दयता के करीब 133, 676 मामले दर्ज किए.
इसी मसले पर हाल ही में एक छोटी सी फिल्म ‘बैंड , बाजा, बिटिया’ सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. करीब साढ़े तीन मिनट की इस फिल्म में कोई खास संवाद नहीं हैं. बस एक पिता है और फोन पर उसके बेहद संक्षिप्त संवाद से जाहिर होता है कि उसकी बेटी पर एक बार फिर ज्यादती हुई है. सामने बैंड बाजे वालों का एक ग्रुप अपनी धुन बजाने में व्यस्त है. पिता कुछ ठिठकता है और फिर उनसे कहता है कि जरा जोर और उत्साह से बजाएं, इतने हल्के से नहीं.
बहुत से स्वर और किरदार उभरते हैं जो पिता को बताते रहते हैं कि अब बेटी उसकी जिम्मेदारी नहीं, मियां बीवी में थोड़ा बहुत नौंक झोंक तो चलती रहती है. अब यही उसकी बेटी की किस्मत है, वगैरह. इस ऊहापोह से गुजरता पिता खुद ड्रम लेकर बजाने लगता है.
फिल्म की खास बात ये है कि बगैर स्पष्टतः हिंसा, अपमान तनाव इत्यादि दिखाए यह उस पीड़ा और असहायता को अभिव्यक्त करती है जो एक पिता अपनी बेटी की दुर्दशा पर महसूस करता है. गजराज राव एक मंझे हुए अभिनेता हैं और पिता के किरदार में खरे उतरते हैं. इन तीन मिनटों में पिता की पीड़ा से उसके संकल्प तक का गहरा और कष्टदाई सफर हमारी आंखों के सामने घूम जाता है, मानो हम खुद उसके साक्षी हों.
तमाम परंपराओं और परंपरागत सलाहों से जूझते हुए पिता अंततः गाजे बाजे और उत्साह के साथ अपनी बेटी को ससुराल से घर वापिस ले आता है. और हमारे सामने घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाने का एक ठोस उपाय पेश कर देता है. अधिकतर औरतें इस हिंसा और अपमान को झेलती रहती हैं क्योंकि एक तो उन्हें समझाया जाता है कि पति का घर और वैवाहिक जीवन उनकी किस्मत है, दूसरे उनके घरवाले भी ‘ कन्यादान ‘ करके उससे मुक्ति पा लेते हैं.
यदि ऐसे ही माता - पिता अपनी बच्चियों के साथ खड़े हो जाएं, तो प्रताड़ित महिलाएं इतना अकेला और असहाय महसूस नहीं करेंगी.
मेरी दोस्त अब भी स्टॉकहोम सिंड्रोम में जी रही है. 24 साल के बेहद कष्टप्रद और अपमानजनक वैवाहिक जीवन की कैद के बाद भी यह स्वीकार करना उसे मुश्किल लगता है कि उसके साथ अत्याचार हो रहा था और यह तो अच्छा हुआ कि खुद उसका पति उसे घर छोड़ गया, और उसके भाई ने उसका साथ दिया.
मेरे लिए, मेरी यह दोस्त उन सभी महिलाओं की प्रतिनिधि की तरह है, जो वैवाहिक जिंदगी में भयावह और अकथनीय कष्ट झेलती रहती हैं और विरोध की बात भी नहीं सोचतीं.
यह फिल्म देख कर अनायास ही यह उम्मीद जागी कि संभवतः हमारे परिवार भी धीरे धीरे बेटी को बेशर्त सपोर्ट करने लगेंगे और ‘कन्यादान’ के बाद उसे उसके हाल पर नहीं छोड़ेंगे. इसकी एक मिसाल तो 2023 में झारखंड के प्रेम गुप्ता ने पेश की ही थी, जब वे खुशी खुशी, बैंड बाजे के साथ अपनी लड़की को ससुराल की प्रताड़ना से मुक्त करा घर वापिस ले आए थे. ‘बैंड बाजा बिटिया’ ऐसे ही कुछ पिताओं के दृढ़ संकल्प, और स्नेह को भावपूर्ण तरीके से व्यक्त करती है. सोशल मीडिया पर इसकी पॉपुलरिटी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गजराज राव को लोग, खासकर लड़कियां और महिलाएं एयरपोर्ट पर पहचान कर उनके साथ तस्वीरें लेने लगे है . बहुत सी युवा महिलाओं ने सोशल मीडिया पर यह भी साझा किया है कि किस तरह उनके परिवार की सपोर्ट की वजह से वे एक कष्टदाई वैवाहिक जीवन से निकल कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकीं. कुछ लोग इसे ‘2026 की सर्वश्रेष्ठ विज्ञापन फिल्म’ का खिताब भी दे रहे हैं.
यह छोटी सी फिल्म इस बात का सुबूत है कि समाज को प्रेरित करने, बदलाव लाने के लिए बहुत बड़ी रकम, भरी भरकम नामों से बनी कमर्शियल फिल्म नहीं बल्कि एक सरल, स्नेहपूर्ण, सूक्ष्म और लघु फिल्म ही काफी है. हालांकि समाज की मानसिकता में बदलाव और महिलाओं के साथ बराबरी का बर्ताव अभी बहुत दूर की बात है, लेकिन अगर इसी तरह हम छोटे छोटे कदमों से कला, साहित्य और विचार के स्तर पर परंपराओं को चुनौती देते रहे तो उस मंजिल तक की राह कुछ आसान हो सकती है.
प्रगति वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया ट्रेनर हैं.
अपील :
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