11/03/2026: बिरला की स्पीकरी बची, सवाल बरकरार | ईरान जंग की आग अयोध्या पंहुची | बलात्कारी को अयोध्या में वीआईपी बंदोबस्त | नेपाली सत्ता बदलाव पर युवराज घिमिरे | ट्रंप ने हारी बाजी | राम तेरी गंगा मैली
हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
ईरान-अमेरिका युद्ध का भारत पर प्रहार: देशभर में गहराया LPG संकट; गैस न मिलने से अयोध्या की ‘राम रसोई’ अस्थायी रूप से बंद.
नेपाल में राजनीतिक चमत्कार: 35 वर्षीय रैपर और पूर्व मेयर बालेन शाह प्रचंड बहुमत के साथ देश के अगले प्रधानमंत्री बनने की राह पर.
संसद में हंगामा: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव ख़ारिज; चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग लाने की तैयारी में विपक्ष.
दवाएँ होंगी महँगी: ईरान संकट से सप्लाई चेन टूटी, भारत में जीवन रक्षक दवाओं के दाम 30-50% तक बढ़ने का ख़तरा.
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला: 13 साल से कोमा में पड़े मरीज़ के लिए भारत में पहली बार ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की दी गई मंज़ूरी.
ट्रंप की अमेरिकी रिफाइनरी में रिलायंस: अमेरिका में बन रही नई तेल रिफाइनरी में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ का बड़ा निवेश; डोनाल्ड ट्रंप ने जताया आभार.
ईरान का नया सुप्रीम लीडर: अयातुल्ला ख़ामेनेई की मौत के बाद रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने उनके बेटे मोजतबा ख़ामेनेई को ज़बरन सौंपी सत्ता.
गंगा में प्रदूषण चरम पर: CAG रिपोर्ट का ख़ुलासा— नमामि गंगे के बावजूद देवप्रयाग से हरिद्वार तक गंगा में बैक्टीरिया 32 गुना बढ़ा.
ईरान की जंग का असर अयोध्या के मंदिर तक
10 हजार लोगों को रोज़ाना भोजन कराने वाली अयोध्या की ‘राम रसोई’ भी बंद
गैस की किल्लत का असर अयोध्या की ‘राम रसोई’ पर भी हुआ है. रोजाना 10 हजार लोगों को निशुल्क भोजन कराने वाली यह रसोई अस्थाई तौर पर बंद कर दिया गया है. रसोई चलाने वाले अमावा मंदिर प्रशासन ने एक नोटिस लगाकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय युद्ध के तनाव से देश में गैस संकट की स्थिति पैदा हो गई है, जिसके कारण रसोई को समय से पहले बंद करना पड़ रहा है. यह तभी शुरू हो पाएगी, जब गैस की आपूर्ति सामान्य होगी. इस बीच ‘बिजनेस टुडे’ की खबर है कि ‘राम रसोई’ से मुफ्त भोजन और प्रसाद देने के लिए कोयले, जलाऊ लकड़ी और राइस कुकर के उपयोग की वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही है.
सज़ा याफ़्ता बलात्कारी आसाराम उर्फ असुमल हरपलानी को गिरते स्वास्थ्य के कारण हाईकोर्ट से 6 माह की अंतरिम जमानत मिली थी, लेकिन वह ठप्पे के साथ अयोध्या घूम रहा है. मंगलवार को वह अयोध्या पहुंचा था और आज बुधवार सुबह उसने “वीवीआईपी” के रूप में रामलला के दर्शन किए. जिस आदि शंकराचार्य गेट से सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे वीआईपी जाते हैं, उसी से आसाराम के तीन गाड़ियों के काफिले को राम मंदिर में प्रवेश दिया गया. राम मंदिर ट्रस्ट, पुलिस और प्रशासन की इजाजत के बगैर किसी को इस गेट से प्रवेश नहीं मिलता है. लेकिन आसाराम को अनुमति दी गई. और तो और राम मंदिर निर्माण के प्रभारी गोपाल जी ने उसे मंदिर के बारे में विस्तार से जानकारी दी. उसने 10 मिनट दर्शन किए और मंदिर में आधा घंटा बिताया. करीब छह लोग उसके साथ थे.
आसाराम को राजस्थान हाईकोर्ट ने 29 अक्टूबर, 2025 को 6 महीने की जमानत दी थी. इसके आधार पर 6 नवंबर को आसाराम को गुजरात हाईकोर्ट से भी 6 महीने की अंतरिम जमानत मिल गई थी. गुजरात हाईकोर्ट में आसाराम की ओर से जमानत की याचिका पर सुनवाई के दौरान दलील दी गई थी कि वह दिल से जुड़ी बीमारी से पीड़ित है. वह मंगलवार शाम को सरयू नदी के तट पर घूमा.राम मंदिर ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय से उसकी मुलाकात का कार्यक्रम भी बताया जाता है.
दिल्ली से बिहार और गोवा से यूपी-उत्तराखंड तक LPG संकट गहराया; होटल और रेस्टोरेंट उद्योग पर भारी असर; सिलेंडर के लिए कई जगह मारपीट
ईरान पर युद्ध के कारण छिड़े रसोई गैस संकट की खबरें बुधवार को पूरे भारत से आने लगीं, जिससे विपक्ष के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर निशाना साधा. बेंगलुरु से लेकर बिहार और यूपी से लेकर गोवा तक बुरा हाल है. यूपी और बिहार में तो पुलिस सुरक्षा में सिलेंडर बंट रहे हैं. कई जगहों पर सिलेंडर को लेकर परस्पर मारपीट और लात-घूंसे चलने की घटनाएं भी सामने आई हैं. रेस्टोरेंट, होटल और भोजनालयों पर इसका भारी असर देखने को मिल रहा है.
‘पीटीआई और द टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक, भारत प्रतिदिन लगभग 191 मिलियन मानक घन मीटर (एमएमएससीएमडी) गैस की खपत करता है, जिसमें से लगभग आधी आयात की जाती है. ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (होर्मुज जलडमरूमध्य) के माध्यम से टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण, मध्य पूर्व से होने वाली लगभग 60 एमएमएससीएमडी आपूर्ति बाधित हो गई है.
गोवा से चेन्नई तक, एक जैसी पुकार
दिल्ली में, एलपीजी की कमी के कारण दिल्ली उच्च न्यायालय की लॉयर्स कैंटीन ने अस्थायी रूप से मुख्य भोजन (मैन कोर्स) परोसना बंद कर दिया है. कैंटीन प्रबंधन ने कहा कि गैस सिलेंडरों की कमी के कारण नियमित भोजन बनाना असंभव हो गया है.
बेंगलुरु में, एलपीजी डीलरों ने कहा कि पिछले कुछ दिनों में घरेलू सिलेंडरों के लिए घबराहट भरी पूछताछ बढ़ गई है. हालांकि, कमर्शियल एलपीजी उपयोगकर्ताओं के लिए भारी किल्लत है. बेंगलुरु में एक गैस एजेंसी के प्रतिनिधि ने कहा, “कमर्शियल सिलेंडरों का संकट है, लेकिन घरेलू आपूर्ति में कोई समस्या नहीं है. पहले हम दो-तीन दिनों में सप्लाई कर देते थे, लेकिन अब संकट के बाद हम घरेलू उपयोग के लिए सप्लाई से इनकार नहीं कर सकते. एक परिवार के लिए एक सिलेंडर लगभग एक महीने चलता है, इसलिए स्टॉक के लिए 30 दिन की समय सीमा तय की गई है.”
गोवा में, रेस्टोरेंट मालिकों ने कहा कि यदि कमर्शियल एलपीजी की कमी जारी रही तो इसका असर पर्यटन क्षेत्र पर पड़ सकता है. मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कहा कि सरकार इस मुद्दे को केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री के समक्ष उठाएगी. उन्होंने कहा, “यह पर्यटन उद्योग के लिए चिंता का विषय है.” भाजपा विधायक माइकल लोबो ने कहा कि यदि आपूर्ति में सुधार नहीं हुआ, तो राज्य के लगभग आधे रेस्टोरेंट बंद हो सकते हैं. गोवा होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष गौरीश धोंड ने बताया कि सदस्यों को मेन्यू कम करने और जहां संभव हो इलेक्ट्रिक उपकरणों का उपयोग करने को कहा गया है.
उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्सों में भी आपूर्ति बाधित होने की खबरों से उपभोक्ताओं में हड़कंप मच गया. लखीमपुर खीरी जिले में मंगलवार को लोग सिलेंडर लेने के लिए वितरण केंद्रों की ओर दौड़ पड़े. उत्तराखंड ने भी वैकल्पिक व्यवस्था करना शुरू कर दिया है. वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि यदि कमी और बढ़ती है, तो सरकार व्यावसायिक उपयोग के लिए जलाऊ लकड़ी उपलब्ध करा सकती है.
तमिलनाडु में, कई रेस्टोरेंट ने कमी के कारण परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या कम कर दी है. चेन्नई के ईस्ट कोस्ट रोड पर एक होटल मालिक ने कहा, “हमने केवल इडली, सांभर और वड़ा तैयार किया है. हमने डोसा की वैरायटी हटा दी है. दोपहर और रात के खाने में केवल ‘वैरायटी राइस’ ही होगा.” चेन्नई के कुछ प्रतिष्ठानों ने तो बुधवार को छुट्टी की घोषणा कर दी. एक होटल के बाहर लगे नोटिस पर लिखा था, “एलपीजी आपूर्ति की कमी के कारण, 11 मार्च 2026 को अवकाश घोषित किया गया है.”
पुडुचेरी में भी होटल मालिकों ने कहा कि यदि कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति जल्द शुरू नहीं हुई, तो उन्हें बंद करना पड़ सकता है. कई होटलों ने कामकाज जारी रखने के लिए जलाऊ लकड़ी से खाना बनाना शुरू कर दिया है, काम के घंटे कम कर दिए हैं या आंशिक रूप से इलेक्ट्रिक कुकर पर शिफ्ट हो गए हैं.
जलाऊ लकड़ी की कीमत 300 रुपये से बढ़कर 1,000 रुपये प्रति ‘कुंडू’ (एक स्थानीय माप) हो गई है. इसके बावजूद, इसका उपयोग केवल कुछ दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिए किया जा सकता है, चाइनीज फूड जैसी चीजों के लिए नहीं.
ट्रेन के भोजन पर संकट के बादल
इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन (आईआरसीटीसी) ने अपने पश्चिमी क्षेत्र के रेलवे स्टेशनों पर स्थित कैटरिंग इकाइयों को माइक्रोवेव और इंडक्शन प्लेटों पर शिफ्ट होने और यात्रियों के लिए ‘रेडी-टू-ईट’ (तैयार भोजन) वस्तुओं का स्टॉक बनाए रखने का निर्देश दिया है.
‘बिरला दाईं ओर देखकर मुस्कुराते हैं और दूसरी तरफ सिर्फ ‘नो, नो, नो’ कहते हैं’
लोकसभा अध्यक्ष के रूप में ओम बिरला को हटाने की मांग करने वाला प्रस्ताव लोकसभा में ध्वनि मत से गिर गया. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से माफी की मांग को लेकर विपक्ष के विरोध और नारेबाजी के बीच, पीठासीन सभापति जगदंबिका पाल ने घोषणा की कि अविश्वास प्रस्ताव खारिज कर दिया गया है.
पाल ने विपक्ष से अपनी सीटों पर बैठने का आग्रह किया ताकि वे प्रस्ताव पर मतदान करा सकें. लेकिन विरोध जारी रहने पर, उन्होंने सदन का मत लिया और प्रस्ताव को ध्वनि मत से खारिज कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने दिन भर के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी. विपक्ष ने “अमित शाह माफी मांगो” के नारे लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया, क्योंकि शाह ने 15वीं से 17वीं लोकसभा तक राहुल गांधी की सदन में उपस्थिति पर एक बयान दिया था.
‘टीएनआईई’ के अनुसार, शाह ने कहा, “17वीं लोकसभा में राहुल गांधी की उपस्थिति 51 प्रतिशत थी, जबकि औसत 66 प्रतिशत था; 16वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति 52 प्रतिशत थी और औसत 80 प्रतिशत था.” शाह ने कहा कि भारत के संसदीय इतिहास में अब तक केवल तीन बार लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है, लेकिन न तो भाजपा और न ही एनडीए ने कभी ऐसा प्रस्ताव पेश किया है.
ओम बिरला के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव की आलोचना करते हुए शाह ने जोर देकर कहा कि लोकसभा अध्यक्ष एक तटस्थ संरक्षक होता है और सदन किसी पार्टी के नियमों से नहीं बल्कि अपने नियमों से चलेगा. उन्होंने कहा कि लगभग चार दशकों के बाद अध्यक्ष के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव लाया जाना संसदीय राजनीति के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है.
दूसरी ओर, इस प्रस्ताव पर बहस के दौरान विपक्षी सांसदों ने दावा किया कि उन्हें अध्यक्ष की आसंदी से वह संरक्षण नहीं मिल रहा है जिसके वे हकदार हैं. राजद के अभय कुमार सिन्हा ने कहा, “मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि अब यह कुर्सी सदन की स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि सत्ता पक्ष के अत्याचार का प्रतीक बन गई है. इस सदन ने वह ‘काला दिन’ भी देखा जब एक ही दिन में 140 से अधिक सांसदों को निलंबित कर दिया गया था. यहाँ जब भी कोई विपक्षी सांसद बोलने के लिए खड़ा होता है, तो अध्यक्ष की ओर से केवल ‘नो, नो, नो’ ही सुनने को मिलता है.”
झामुमो के विजय कुमार हांसदा ने कहा कि अध्यक्ष के दूसरे कार्यकाल में ‘नेहरू’ के बाद सदन में सबसे ज्यादा बोला जाने वाला शब्द ‘नो’ है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब विपक्षी सांसद बोलते हैं, तो कैमरा दूसरी दिशा में घुमा दिया जाता है.
एनसीपी (एसपी) के बजरंग मनोहर सोनवणे ने कहा, “हम बिरला जी पर कोई व्यक्तिगत हमला नहीं कर रहे हैं. हम जानते हैं कि वोटिंग में क्या होगा, लेकिन हम यह अविश्वास प्रस्ताव अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को उजागर करने के लिए लाए हैं.” उन्होंने कुर्सी पर बैठीं संध्या राय को संबोधित करते हुए व्यंग्य किया, “जैसे टेबल फैन केवल एक तरफ हवा देता है... वैसे ही जब बिरला जी दाईं ओर देखते हैं तो मुस्कुराते हैं, और जब दूसरी तरफ देखते हैं, तो केवल ‘नो, नो, नो’ कहते हैं.”
सीईसी ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग प्रस्ताव: विपक्ष के मुख्य आधार क्या हैं?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, विपक्षी खेमे ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए संसद के दोनों सदनों के सांसदों के आवश्यक हस्ताक्षर एकत्र कर लिए हैं. सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा से 100 और राज्यसभा से 50 सांसदों के हस्ताक्षर पूरे हो चुके हैं और यह प्रस्ताव बुधवार शाम या गुरुवार सुबह भारत की राष्ट्रपति को सौंपा जाएगा.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने इस कदम की पहल की है. चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कई राज्यों में एक विवादास्पद मुद्दा रहा है, लेकिन बंगाल में इसे लेकर सबसे ज्यादा विवाद हुआ है.
हालांकि लोकसभा और राज्यसभा में सत्ताधारी एनडीए के स्पष्ट बहुमत को देखते हुए यह कदम प्रतीकात्मक है, लेकिन इसका राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब चुनाव आयोग जल्द ही पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा करने वाला है.
सीईसी को कैसे हटाया जाता है? इसकी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पर महाभियोग चलाने के समान है. संविधान के अनुच्छेद 324 (5) और 2023 के संबंधित अधिनियम के तहत सीईसी को केवल उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है. न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के अनुसार, शिकायत पर लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए. पीठासीन अधिकारी इस प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है. यदि यह स्वीकार होता है, तो 3 सदस्यीय जांच समिति बनती है. समिति की रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित होने पर, दोनों सदनों में “उपस्थित और मतदान करने वाले” सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत और सदन की “कुल सदस्यता” के 50% से अधिक मतों से प्रस्ताव पारित होना चाहिए, जिसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है.
टॉकिंग न्यूज़ | जंग का 12वां दिन
क्या ईरान जंग हार चुके हैं डोनल्ड ट्रंप?
‘हरकारा’ के लाइव शो टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश में बुधवार को अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के 12वें दिन की स्थिति, उसके वैश्विक प्रभाव और अमेरिकी रणनीति पर उठ रहे सवालों पर विस्तार से चर्चा की गई.
कार्यक्रम में बात हुई है कि ईरान सरकार का दावा है कि अमेरिका और इज़राइल ने अब तक करीब 10,000 नागरिक ठिकानों पर हमले किए हैं, जिनमें 1,300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. ईरान के तेल कुओं पर हमलों के बाद वहां “ब्लैक रेन” यानी तेल के कणों वाली बारिश की खबरें भी सामने आई हैं, जिससे पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर खतरे की आशंका जताई जा रही है.
कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का हवाला देते हुए कहा गया कि इस युद्ध को लेकर अमेरिकी रणनीति पर अब सवाल उठने लगे हैं. अमेरिकी कांग्रेस में हुई एक बंद बैठक के बाद कई सांसदों ने भी यह पूछा कि इस युद्ध का स्पष्ट लक्ष्य या “एंड गेम” क्या है. हमने चर्चा में राजनीतिक वैज्ञानिक जॉन मीरशाइमर का भी ज़िक्र करते हुए कहा कि संभव है कि अमेरिका, इजराइल की रणनीति के दबाव में इस युद्ध में फंस गया है और उसने ईरान की फौजी क़ाबिलयत को काम आँका.
कार्यक्रम में कच्चे तेल की कीमतों में आए तेज उछाल पर भी चर्चा हुई. युद्ध के दौरान कच्चे तेल का दाम 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया, जिससे वैश्विक बाज़ारों में दबाव बढ़ा है और इससे कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है. इसका असर भारत समेत कई देशों में एलपीजी और ईंधन की कीमतों पर देखने को मिल रहा है.
अमेरिका की यह उम्मीद कि ईरान के भीतर सत्ता के खिलाफ बड़े पैमाने पर जनविद्रोह होगा, जो अभी तक मुकम्मल तौर पर साबित करना उनके लिए नामुमकिन दिखाई दे रहा है. फिलहाल इस युद्ध का कोई स्पष्ट राजनीतिक समाधान दिखाई नहीं दे रहा और कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ अमेरिका और इज़राइल को युद्धविराम पर विचार करने की सलाह दे रहे हैं.
अल जज़ीरा के लिए एलिजाबेथ मेलिमोपोलोस और बीबीसी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान पर अमेरिका और इजरायल का युद्ध 12वें दिन में प्रवेश कर गया है.
तेहरान का कहना है कि 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक देश में लगभग 10,000 नागरिक ठिकानों पर बमबारी की गई है और 1,300 से अधिक नागरिक मारे गए हैं.
संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत अमीर सईद इरावानी ने अमेरिका और इजरायल पर जानबूझकर घरों और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे नागरिक बुनियादी ढांचों पर हमला करने का आरोप लगाया है.
ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी ) ने ‘सुपर-हैवी खुर्रमशहर’ मिसाइलें दागते हुए हमलों की 37वीं लहर शुरू की. ये मिसाइलें तेल अवीव, हाइफ़ा, पश्चिमी यरुशलम के साथ-साथ इराक के एरबिल, बहरीन और कुवैत में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर दागी गईं.
ईरानी मीडिया फ़ार्स और मेहर के अनुसार कुवैत में एक अमेरिकी बेस को निशाना बनाया गया है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि ईंधन डिपो पर हमलों के बाद उठने वाले धुएं के कारण ‘काली बारिश’ (ब्लैक रेन) हो सकती है, जो जहरीले प्रदूषकों के कारण गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकती है.
खाड़ी देशों में भी तनाव चरम पर है. सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई ) ने ईरानी ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराने का दावा किया है.
यूएई की रुवाइस रिफाइनरी, जो दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरियों में से एक है, ने ड्रोन हमले के बाद एहतियातन अपना काम रोक दिया है.
बीबीसी और यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य और दुबई के पास अज्ञात प्रोजेक्टाइल से तीन वाणिज्यिक जहाजों को नुकसान पहुंचा है.
इससे पहले अमेरिकी सेना ने 16 निष्क्रिय ईरानी माइन-लेइंग जहाजों को नष्ट करने की पुष्टि की थी.
अमेरिका में, पेंटागन ने बताया है कि ‘ऑपरेशन एपिक फ्युरी’ शुरू होने के बाद से लगभग 140 अमेरिकी सैनिक घायल हुए हैं और सात मारे गए हैं.
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रमों को निशाना बनाते हुए 5,000 से अधिक ठिकानों पर हमला किया है.
साथ ही, एक ईरानी गर्ल्स स्कूल पर हुए हमले की सैन्य जांच चल रही है, जिसमें अमेरिकी मिसाइल से लगभग 175 छात्राओं के मारे जाने की आशंका है.
इजरायली मीडिया का कहना है कि ईरान द्वारा दागी गई मिसाइलों को रोक दिया गया है. एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने इजरायल को ईरानी ऊर्जा सुविधाओं पर बिना वाशिंगटन की मंजूरी के हमला करने से मना किया है.
इस बीच, लेबनान में इजरायली हमलों में कम से कम 570 लोग मारे गए हैं और संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 6.67 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं.
बेरूत में एक इजरायली हमले में चार ईरानी राजनयिकों की भी मौत हो गई है, जिसे ईरान ने ‘आतंकवादी हमला’ करार दिया है.
मोजतबा खामेनेई को रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने बनाया है ईरान का सर्वोच्च नेता, गार्ड्स का बढ़ा दबदबा
रॉयटर्स के लिए परिसा हाफेजी की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के दूसरे बेटे मोजतबा खामेनेई को देश का नया सर्वोच्च नेता बनाने का फैसला जबरन लागू कर दिया है. वरिष्ठ ईरानी सूत्रों का कहना है कि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स मोजतबा को उनके पिता का एक अधिक लचीला संस्करण मानते हैं, जो उनकी कट्टरपंथी नीतियों का समर्थन करेंगे. उन्होंने सुधारवादियों और वरिष्ठ राजनीतिक चेहरों की चिंताओं को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है.
युद्ध शुरू होने के बाद से ही शक्तिशाली रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का प्रभाव और बढ़ गया है. मोजतबा खामेनेई के चयन के लगभग 48 घंटे बाद भी उनका कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. इस युद्ध में अब तक एक हजार से ज्यादा ईरानी मारे जा चुके हैं. अफवाहें हैं कि अमेरिका-इजरायल के जिस हमले में उनके पिता की मौत हुई, उसमें मोजतबा भी घायल हुए हैं. एक सरकारी टीवी एंकर ने उन्हें मौजूदा ‘रमज़ान युद्ध’ का “जांबाज़” (घायल सैनिक) बताकर इन अफवाहों को बल दिया है, हालांकि रॉयटर्स इसकी पुष्टि नहीं कर सका है.
सूत्रों का कहना है कि गार्ड्स के इस कदम से ईरान एक सैन्य राज्य में तब्दील हो सकता है, जहां धार्मिक वैधता सिर्फ नाममात्र की रह जाएगी. गार्ड्स का दबदबा इस बात से भी साबित होता है कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन को खाड़ी देशों पर हुए हमलों के लिए माफी मांगने के बाद गार्ड्स के गुस्से का शिकार होना पड़ा और उन्हें अपने शब्द वापस लेने पड़े.
विशेषज्ञों की 88-सदस्यीय असेंबली, जो नए नेता का चुनाव करती है, पर गार्ड्स ने भारी दबाव डाला. गार्ड्स ने तर्क दिया कि युद्ध के समय तेजी से फैसले लेने और अमेरिका को चुनौती देने वाले उम्मीदवार की जरूरत है. गुप्त स्थान पर हुए मतदान में उपस्थित सदस्यों में से 85-90% ने मोजतबा का समर्थन किया. वाशिंगटन डी.सी. में मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो एलेक्स वतंका का कहना है, “मोजतबा अपनी स्थिति के लिए रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कर्जदार हैं और इसलिए वह अपने पिता की तरह स्वतंत्र नहीं रह पाएंगे.”
जंग ने कैसे एक हफ्ते में दुनिया को बदल दिया
न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए बर्लिन, वाशिंगटन और हीथ्रो एयरपोर्ट से जिम टैंकर्सले की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध को एक ‘संक्षिप्त व्यवधान’ बताया है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के लिए एक ऐसा भयंकर झटका है, जो मध्य पूर्व के हालिया संघर्षों से कहीं अधिक गंभीर है.
लगभग दो सप्ताह पुराना यह युद्ध यात्रा के तरीकों, ऊर्जा निर्भरता, जीवन यापन की लागत, व्यापार मार्गों और कूटनीतिक गठबंधनों को तेजी से बदल रहा है. साइप्रस और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश, जो आमतौर पर क्षेत्रीय संघर्षों से सुरक्षित माने जाते थे, उन्हें भी ईरानी हमलों का सामना करना पड़ा है. अमेरिकी युद्ध मॉनिटर के अनुसार, ईरान ने इजरायल से ज्यादा खाड़ी देशों पर हमले किए हैं, जिसमें पांच सितारा होटल और पानी साफ करने वाले (विलवणीकरण) संयंत्र शामिल हैं. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के विशेषज्ञ एमिल होकायम कहते हैं कि खाड़ी देशों की असली पूंजी उनका ‘सुरक्षित विश्वास’ था, जो अब खतरे में है.
दुनिया भर में युद्ध का सबसे पहला असर पेट्रोल पंपों पर महसूस किया गया. होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही रुकने से वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं. फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने जहाजों की सुरक्षा के लिए 10 युद्धपोत भेजने की घोषणा की है. अर्थशास्त्रियों को डर है कि अगर यह तेल संकट हफ्तों तक चला, तो 1979 की ईरानी क्रांति के बाद जैसी ‘स्टैगफ्लेशन’ (मुद्रास्फीति और मंदी का दौर) की स्थिति पैदा हो सकती है.
महंगे तेल से चीन की अर्थव्यवस्था को भी खतरा है, क्योंकि उसके निर्यातक मध्य पूर्वी उपभोक्ताओं पर अत्यधिक निर्भर हैं. दूसरी ओर, तेल की बढ़ती कीमतों से रूस को फायदा हो रहा है, जिससे यूक्रेन में उसके युद्ध अभियान को वित्तीय मदद मिल रही है. यूरोपीय देशों को चिंता है कि अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ मिसाइलें खर्च करने से यूक्रेन की रक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है.
अमेरिका में, यह युद्ध ट्रंप के लिए एक राजनीतिक चुनौती बन रहा है. मध्यावधि चुनावों से पहले डेमोक्रेट्स ऊर्जा की बढ़ती कीमतों को मुद्दा बना रहे हैं. इसके अलावा, आगामी पुरुष सॉकर विश्व कप पर भी संकट मंडरा रहा है, जिसकी सह-मेजबानी अमेरिका को करनी है और ईरान की टीम को भी इसमें हिस्सा लेना है. यूरोप में ईरान की चरमराती अर्थव्यवस्था के कारण शरणार्थियों की एक नई लहर का डर सता रहा है. जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने चिंता जताते हुए कहा, “हमें चिंता है कि इस युद्ध को जल्द और ठोस निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए कोई साझा योजना नहीं है.”
ट्रंप को नहीं पता युद्ध खत्म कैसे किया जाए
न्यूयॉर्क टाइम्स के ओपिनियन कॉलम में थॉमस एल. फ्रीडमैन लिखते हैं कि सितंबर 1996 में जब वे पहली बार तेहरान गए थे, तो उन्होंने एक होटल की लॉबी में ‘डाउन विद यूएसए’ का एक स्थायी बोर्ड देखा था. आज, जब अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर छेड़े गए युद्ध को एक सप्ताह से अधिक हो गया है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है: क्या इस व्यवस्था को हटाना ईरान को एक भयानक अराजकता में धकेले बिना संभव है?
ईरान का क्षेत्रफल अमेरिका के छठे हिस्से के बराबर है और यहां 9 करोड़ लोग रहते हैं. इस शासन की जड़ें सेना, स्कूलों और बैंकिंग प्रणाली में इतनी गहरी हैं कि युद्ध में मारे गए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की जगह उनके कट्टरपंथी बेटे मोजतबा खामेनेई को तुरंत नया नेता बना दिया गया. फ्रीडमैन के अनुसार, यह स्पष्ट है कि राष्ट्रपति ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बिना किसी स्पष्ट ‘एंडगेम’ (अंतिम लक्ष्य) के यह युद्ध शुरू कर दिया है. नेतन्याहू शायद ईरान को एक और गाजा में बदलना चाहते हैं, ताकि वे हमेशा युद्ध की स्थिति में रहकर सत्ता में बने रहें और अपने भ्रष्टाचार के मुकदमों से बच सकें. दूसरी ओर, ट्रंप हर दिन अपने लक्ष्य बदल रहे हैं. कभी वे शासन बदलने की बात करते हैं, तो कभी बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग करते हैं.
हालांकि, अमेरिका और इजरायल ने ईरान की परमाणु और सैन्य क्षमताओं को काफी हद तक नष्ट कर दिया है, जो एक बड़ी उपलब्धि है. लेकिन अब सबसे समझदारी भरा कदम यह होगा कि युद्ध को रोका जाए. जब हमले रुकेंगे, तो ईरानी शासन के भीतर और जनता के बीच भारी असंतोष और बहस छिड़ेगी. लोग सवाल करेंगे कि इस युद्ध से उन्हें क्या मिला, जब उनकी अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचा नष्ट हो चुके हैं.
ईरान के पानी साफ करने वाले संयंत्रों पर हमले हो रहे हैं, और जवाब में ईरान बहरीन के संयंत्रों पर हमला कर रहा है. अगर बुनियादी ढांचे को लगातार नष्ट किया जाता रहा, तो ईरान पूरी तरह से रहने लायक नहीं बचेगा और एक बहुत बड़ी पर्यावरणीय आपदा बन जाएगा. ट्रंप प्रशासन का लगातार बदलता लक्ष्य यह साबित करता है कि उनके पास युद्ध खत्म करने की कोई राजनीतिक योजना नहीं है. सैन्य बल इमारतों को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन वे उस राजनीतिक योजना का विकल्प नहीं हो सकते जिसके बिना एक खतरनाक शून्यता पैदा हो जाएगी.
‘कोई अंतिम लक्ष्य नहीं’: ईरान युद्ध पर गुप्त सुनवाई के बाद अमेरिकी डेमोक्रेट्स चिंतित
अल जज़ीरा के लिए एलिजाबेथ मेलिमोपोलोस की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के अधिकारियों से गुप्त (क्लासिफाइड) ब्रीफिंग मिलने के बाद यूनाइटेड स्टेट्स सीनेट में डेमोक्रेट्स का एक समूह ईरान युद्ध पर सार्वजनिक सुनवाई की मांग कर रहा है. सांसदों का कहना है कि व्हाइट हाउस ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि अमेरिका इस युद्ध में क्यों उतरा, इसके लक्ष्य क्या हैं, और यह कितने समय तक चलेगा.
कनेक्टिकट के डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस मर्फी ने कहा, “मैंने युद्ध पर दो घंटे की ब्रीफिंग ली है, जिससे यह साबित हो गया कि यह रणनीति पूरी तरह से बेतुकी और असंगत है. अगर राष्ट्रपति कांग्रेस से इस युद्ध के लिए अनुमति मांगते, तो उन्हें कभी नहीं मिलती.” विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने सांसदों को सैन्य अभियान की जानकारी दी है. सीनेटरों को इस बात का गहरा डर है कि ट्रंप ईरान में अमेरिकी जमीनी सेना भेज सकते हैं.
सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि राष्ट्रपति एक तरफ कहते हैं कि युद्ध लगभग खत्म हो गया है और दूसरी तरफ कहते हैं कि यह अभी शुरू हुआ है, जो पूरी तरह विरोधाभासी है. मैसाचुसेट्स की सीनेटर एलिजाबेथ वारेन ने युद्ध की भारी लागत पर सवाल उठाते हुए कहा, “ईरान पर बमबारी करने के लिए रोज एक अरब डॉलर खर्च किए जा रहे हैं, जबकि डेढ़ करोड़ अमेरिकियों की स्वास्थ्य देखभाल के लिए पैसा नहीं है.” इस बीच, छह डेमोक्रेटिक सीनेटरों ने दक्षिणी ईरान के मिनाब में एक गर्ल्स स्कूल पर हुए हमले की सख्त जांच की मांग की है. इस हमले में अमेरिकी मिसाइल के शामिल होने का अंदेशा है और इसमें कम से कम 170 लोग मारे गए हैं, जिनमें ज्यादातर बच्चे हैं.
दूसरी ओर, रिपब्लिकन पार्टी लगभग सर्वसम्मति से ट्रंप के अभियान का समर्थन कर रही है. उनका तर्क है कि ईरान की सैन्य क्षमता को नष्ट करने के लिए ये हमले आवश्यक हैं. हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के चेयरमैन ब्रायन मास्ट ने ‘आसन्न खतरे’ का हवाला देकर ट्रंप का बचाव किया. हालांकि, रैंड पॉल और नैन्सी मेस जैसे कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी युद्ध को लेकर चिंता व्यक्त की है. रैंड पॉल ने प्रशासन पर रोज नए बहाने बनाने का आरोप लगाया. इस विवाद ने वाशिंगटन में राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों (वॉर पावर्स एक्ट) की सीमाओं पर एक पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है.
बेकाबू होता ईरान युद्ध और दुनिया पर इसके विनाशकारी परिणाम
ग्लेन डिसेन के साथ एक विस्तृत इंटरव्यू में प्रोफेसर जॉन मर्शीमर ने स्पष्ट किया कि युद्ध अमेरिका या इजरायल की योजना के अनुसार नहीं चल रहा है. यह कोई निर्णायक जीत नहीं है. ईरान हार नहीं मान रहा है और इस लंबी खींचतान वाले युद्ध में समय ईरान के पक्ष में है. अमेरिका के पास इस युद्ध से बाहर निकलने का कोई सुरक्षित रास्ता (ऑफ़-रैंप) नहीं है. ईरान के पास सटीक बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन हैं, जिनसे वह खाड़ी देशों और इजरायल के महत्वपूर्ण पानी और तेल के बुनियादी ढांचे को आसानी से तबाह कर सकता है. मर्शीमर के अनुसार, अमेरिका और इजरायल एक ‘रणनीतिक जाल’ में बुरी तरह फंस गए हैं.
‘द इकोनॉमिस्ट’ के ‘द इंटेलिजेंस’ पॉडकास्ट में रोजी ब्लाउ और एडवर्ड कैर ने चर्चा की कि युद्ध के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, लेकिन ट्रंप के युद्ध जल्द खत्म करने के संकेत के बाद यह 90 डॉलर पर आ गया. हालांकि, ट्रंप के बयानों में काफी विरोधाभास है. गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि अगर खाड़ी का तेल 60 दिनों तक बंद रहता है, तो कीमतें 93 डॉलर से ऊपर बनी रह सकती हैं. विश्लेषकों का मानना है कि इस भयंकर बमबारी के बावजूद ईरानी शासन का सिर्फ बचे रहना ही तेहरान के लिए एक बड़ी ‘जीत’ है.
वहीं, एलिस्टेयर कैंपबेल और रोरी स्टीवर्ट के पॉडकास्ट ‘द रेस्ट इज पॉलिटिक्स’ में बताया गया कि ट्रंप को वेनेजुएला की तरह ईरान में भी शासन के जल्दी गिरने की उम्मीद थी, जो पूरी तरह गलत साबित हुई. ईरान ने जानबूझकर सीमित प्रतिक्रिया दी है, लेकिन इसके आर्थिक परिणाम दुनिया के लिए विनाशकारी रहे हैं. कतर का एलएनजी निर्यात रुक गया है और यूएई का तेल निर्यात भारी मात्रा में गिर गया है. अमेरिका 10-20 हजार डॉलर के सस्ते ईरानी ड्रोन्स को गिराने के लिए अपनी बेहद महंगी पैट्रियट मिसाइलें बर्बाद कर रहा है. विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि ट्रंप ने एक ऐसा घटनाक्रम शुरू कर दिया है जिसे अब कोई नियंत्रित नहीं कर सकता. इस युद्ध ने अमेरिकी सुरक्षा साख को चकनाचूर कर दिया है और दुनिया को एक गंभीर मंदी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है.
ईरान संघर्ष से सप्लाई प्रभावित, भारत में दवाओं की कीमत बढ़ने का ख़तरा
ईरान संघर्ष के कारण कंटेनर जहाज़ों की कमी और कच्चे माल की बढ़ती क़ीमतों की वजह से भारत में दवाओं की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ सकती हैं. यह जानकारी इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के हवाले से दी गई है.
रिपोर्ट के मुताबिक कच्चे माल की कीमतों में करीब 30% तक बढ़ोतरी हुई है. जहाज़ों की कमी के कारण चीन से आने वाले एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट (एपीआई) की आपूर्ति प्रभावित हुई है. चीन भारतीय दवा कंपनियों के लिए कच्चे माल का सबसे बड़ा सप्लायर है. बाज़ार के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर से मार्च के बीच कई अन्य कच्चे पदार्थों की कीमत भी तेज़ी से बढ़ी है. निमेसुलाइड की क़ीमत 425 रुपये से बढ़कर 650 रुपये हो गई, जो लगभग 53% बढ़ोतरी है. नॉरफ्लॉक्सासिन की क़ीमत 2,375 रुपये से बढ़कर 2,700 रुपये हो गई, जबकि ऑर्निडाजोल की क़ीमत 960 रुपये से बढ़कर 1,200 रुपये हो गई. वहीं क्लोबेराजोल प्रोपियोनेट की कीमत 39,500 रुपये से बढ़कर 58,000 रुपये तक पहुंच गई, यानी करीब 47% की बढ़ोतरी.
दवा उद्योग के विशेषज्ञ मेहुल शाह ने कहा कि पेट्रोकेमिकल्स से बनने वाले फार्मा सॉल्वेंट्स की कीमतें भी 20% से 30% तक बढ़ गई हैं, चूंकि ये सॉल्वेंट दवा बनाने में सीधे इस्तेमाल होते हैं, इसलिए इससे उत्पादन लागत बढ़ रही है और सप्लायर यह अतिरिक्त लागत कंपनियों पर डाल रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि दवा कंपनियां आम तौर पर जस्ट-इन-टाइम इन्वेंट्री सिस्टम पर काम करती हैं और कम स्टॉक रखती हैं. अगर यह संकट 10 से 15 दिन और जारी रहा तो कच्चे माल का भंडार खत्म हो सकता है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह संकट अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और ओमान जैसे कई देश सस्ती दवाओं के लिए भारत पर काफी हद तक निर्भर हैं. वहीं माल ढुलाई की लागत दोगुनी हो गई है और हर शिपमेंट पर 4,000 से 8,000 डॉलर तक अतिरिक्त शुल्क लग रहा है, जिससे भारतीय दवा कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है.
जंग को लेकर टकर कार्लसन की ‘मागा’ बगावत
अमेरिकी रूढ़िवादी नेता का क्रिश्चियन ज़ायोनीज़्म और इज़रायल समर्थन का कड़ा विरोध
हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के जाने-माने रूढ़िवादी टिप्पणीकार टकर कार्लसन ने इज़रायल और ईरान पर थोपे गए युद्ध का पुरज़ोर विरोध करते हुए अमेरिकी ईसाई रूढ़िवादी आंदोलन में हलचल मचा दी है. 28 फरवरी, 2026 को दक्षिणी ईरान के मिनाब में एक गर्ल्स स्कूल पर हुए अमेरिकी हवाई हमले में 168 बच्चों और 14 शिक्षकों की मौत हो गई थी. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कार्लसन ने कहा, “अगर आप सुबह उठकर ऐसे देश में रहते हैं जो मानता है कि सैन्य अधिकारियों की बेटियों को मारना ठीक है... तो वह देश लड़ने लायक नहीं है.”
कार्लसन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, सीनेटर लिंडसे ग्राहम, टेड क्रूज़, मार्को रुबियो और माइक हकाबी जैसे युद्ध-समर्थक राजनेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. ये राजनेता इज़रायल के समर्थन को अपना ‘ईसाई दायित्व’ मानते हैं. लिंडसे ग्राहम ने हाल ही में कहा था, “अगर अमेरिका ने इज़रायल का साथ छोड़ा, तो भगवान हमारा साथ छोड़ देंगे.” लेकिन कार्लसन इसका खंडन करते हुए कहते हैं कि निर्दोषों की हत्या का विरोध करना ही असली ईसाई धर्म है. उन्होंने कहा, “न्यू टेस्टामेंट निर्दोषों की हत्या के खिलाफ है... जो राष्ट्र इसका समर्थन करेंगे, उन्हें दंडित किया जाएगा.” कार्लसन ने गाजा में हो रहे “नरसंहार” की भी कड़ी निंदा की.
यह विवाद ‘क्रिश्चियन ज़ायोनीज़्म’ की विचारधारा पर केंद्रित है, जो ओल्ड टेस्टामेंट (बाइबिल का पुराना भाग) की शाब्दिक व्याख्या पर आधारित है. इसके समर्थक यहूदियों को भगवान के चुने हुए लोग और आधुनिक इज़रायल को ऐतिहासिक इज़रायल का विस्तार मानते हैं. उनका मानना है कि महाविनाश और युद्ध के बाद ही ईसा मसीह वापस लौटेंगे. इसके विपरीत, मुख्यधारा के ईसाई चर्च इस वैचारिक विशिष्टता को खारिज करते हैं और ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ का समर्थन करते हैं.
कार्लसन ने रणनीतिक और धर्मनिरपेक्ष आधार पर भी अमेरिका-इज़रायल संबंधों की आलोचना की है. दोहा फोरम में उन्होंने इज़रायल को ‘बिना संसाधनों वाला एक महत्वहीन देश’ बताया और कहा कि अमेरिका को इस रिश्ते से भारी कीमत के अलावा कुछ नहीं मिल रहा है. उनके अनुसार, ऊर्जा से भरपूर खाड़ी देशों के साथ संबंध अमेरिका के लिए “अनंत रूप से अधिक महत्वपूर्ण” हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि इज़रायल के लिए लड़ा गया युद्ध इराक और अफगानिस्तान की तरह अमेरिका को भारी आर्थिक और आध्यात्मिक नुकसान पहुंचाएगा.
कभी ट्रंप और ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) आंदोलन के करीबी रहे कार्लसन अब युद्ध के मुद्दे पर ट्रंप से दूर हो गए हैं. कार्लसन का प्रभाव इतना है कि रिपब्लिकन सांसद भी इसे स्वीकार करते हैं. वह उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के भी करीबी हैं, जो खुद इस युद्ध के विरोधी हैं. कार्लसन ने यहूदी-विरोध और इस्लामोफोबिया के आरोपों को भी खारिज करते हुए कहा है कि किसी से उसके जन्म के आधार पर नफरत करना अनैतिक है. ओल्ड टेस्टामेंट के मिथकों पर प्रहार करके कार्लसन ने अमेरिकी रूढ़िवादी परिदृश्य में एक बहुत बड़ा बदलाव ला दिया है.
लड़ाई अमेरिका की, जीत रूस की?
रूस और तेल निर्यातक देश ईरान युद्ध में जीत रहे हैं
एक्सियोस के लिए एमिली पेक की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व से बाहर के तेल निर्यातक देश, विशेष रूप से रूस, जो इस संघर्ष में सीधे तौर पर नहीं फंसे हैं, ईरान युद्ध में आर्थिक विजेताओं के रूप में उभर रहे हैं.
बाजार का यह तंत्र स्पष्ट है: तेल की उच्च कीमतें उन देशों के लिए फायदेमंद हैं जो तेल बेचते हैं. वैनगार्ड की मुख्य अर्थशास्त्री कियान वांग ने अपने एक नोट में लिखा है कि तेल की कीमतों में बदलाव “देशों के बीच आय पुनर्वितरण का एक शक्तिशाली तंत्र है.” इस स्थिति में असली विजेता नॉर्वे, कनाडा और नाइजीरिया व कोलंबिया जैसे उभरते बाजार वाले देश हैं. वांग के अनुसार, “उन्हें मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ेगा, लेकिन निर्यात और जीडीपी वृद्धि मजबूत बनी रहेगी.”
इन सबके बीच, रूस सबसे स्पष्ट आर्थिक विजेता के रूप में सामने आ रहा है. रूसी कच्चे तेल की कीमत अब वैश्विक बेंचमार्क से ऊपर कारोबार कर रही है. कॉर्नेल विश्वविद्यालय के आर्थिक इतिहासकार और प्रतिबंधों के विशेषज्ञ निकोलस मुल्डर का कहना है, “प्रतिबंधित रूसी तेल का अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क से ज्यादा कीमत पर बिकना पागलपन है.” मुल्डर बताते हैं कि सप्लाई चेन में रुकावट के कारण रूसी तेल व्यापारियों ने आज तक इतना पैसा कभी नहीं कमाया.
रूस दुनिया के शीर्ष तेल निर्यातकों में से एक है. पिछले हफ्ते, ट्रंप प्रशासन ने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों पर 30 दिन की छूट दी थी, जिससे वह भारत को तेल बेच सके. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक व्हाइट हाउस और अधिक प्रतिबंधों में छूट देने पर विचार कर रहा है.
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने स्पष्ट किया कि भारत को तेल स्वीकार करने की अनुमति देना एक अल्पकालिक उपाय था, जिससे रूस को कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं होगा. उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप को पूरी उम्मीद थी कि ईरान वैश्विक बाजारों को बाधित करने की कोशिश करेगा.” प्रशासन जोखिम बीमा और टैंकरों को सुरक्षा प्रदान करके कीमतों को कम करने का प्रयास कर रहा है. लेविट ने भरोसा दिलाया कि मूल्य वृद्धि अस्थायी है और अमेरिकी जल्द ही गैस की कीमतों में भारी गिरावट देखेंगे. हालांकि, वास्तविकता यह है कि यह एक अस्थिर स्थिति है और जो आज विजेता हैं, वे भविष्य में हारने वाले भी बन सकते हैं.
हरकारा डीप डाइव
नेपाल की राजनीति में नई पीढ़ी की दस्तक, क्या बदलने जा रहा है सियासत का पुराना ढांचा
नेपाल में हुए हालिया चुनावों के नतीजे अभी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं, लेकिन शुरुआती रुझान देश की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दे रहे हैं. हरकारा डीप डाइव में इस विषय पर वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे से विस्तार से बातचीत की. इस चर्चा में नेपाल की बदलती राजनीति, नई पीढ़ी के उभार और अंतरराष्ट्रीय समीकरणों पर बात हुई.
युवराज घिमिरे ने कहा कि नेपाल में यह बदलाव किसी हिंसक आंदोलन के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ज़रिए आया है. उनके मुताबिक पिछले लगभग 20 वर्षों से नेपाल की राजनीति तीन मुख्य दलों के बीच घूमती रही है, नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) और माओवादी पार्टी, इन दलों की सरकारें बारी-बारी से बनती रहीं, लेकिन भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर जनता में गहरी नाराज़गी लम्बे वक़्त से पनप रही थी और यही असंतोष अब चुनावी नतीजों में दिखाई दे रहा है.
इस बार के चुनाव में सबसे दिलचस्प पहलू नई पीढ़ी का उभार है. युवराज घिमिरे के अनुसार नेपाल की संसद में बड़ी संख्या में 40 साल से कम उम्र के सांसद पहुंच सकते हैं. यह बदलाव सिर्फ चेहरों का नहीं बल्कि राजनीतिक शैली का भी हो सकता है. इस नई राजनीति का सबसे चर्चित चेहरा बालेन शाह हैं, जो पहले इंजीनियर थे, फिर रैपर बने और बाद में काठमांडू के मेयर चुने गए, अब वह राष्ट्रीय राजनीति में तेज़ी से उभरते हुए दिख रहे हैं.
घिमिरे का कहना है कि बालेन शाह सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि युवाओं की उम्मीद का प्रतीक बनकर सामने आए हैं. जब पूरे देश में राजनीतिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ निराशा और गुस्सा था, तब उन्होंने एक नए विकल्प की छवि बनवाई. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि नई राजनीति के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं.
चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन सरकार चलाना उससे कहीं ज़्यादा कठिन काम है. प्रशासनिक अनुभव, नीति निर्माण और संस्थागत समझ जैसे सवाल अब नई पीढ़ी के नेताओं के सामने खड़े होंगे. बालेन शाह की लोकप्रियता बहुत बड़ी है, लेकिन यह देखना होगा कि वह राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर कितनी स्थिरता ला पाते हैं.
नेपाल की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू उसका अंतरराष्ट्रीय संदर्भ भी है. घिमिरे के मुताबिक नेपाल भौगोलिक और रणनीतिक रूप से बेहद अहम स्थान पर है, इसलिए भारत, चीन और अमेरिका जैसे देशों की नज़र हमेशा वहां की राजनीति पर रहती है. नेपाल और भारत के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते बहुत गहरे हैं, जबकि हाल के वर्षों में चीन ने भी वहां अपना प्रभाव और निवेश बढ़ाया है.
चर्चा के अंत में यह बात सामने आई कि नेपाल का यह चुनाव सिर्फ सरकार बदलने का मामला नहीं है. यह देश की राजनीति में एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत भी हो सकता है. अगर नई पीढ़ी सत्ता में आती है और अपने वादों को पूरा करने में सफल होती है, तो नेपाल की राजनीति का चेहरा आने वाले वर्षों में काफी अलग दिखाई दे सकता है.
नेपाल के अगले प्रधानमंत्री बनने की राह पर बालेन्द्र शाह: एक रैपर जो बदलाव का वादा करता है
न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए हन्ना बीच, बिनोद घिमिरे और सजल प्रधान की रिपोर्ट के अनुसार, 35 वर्षीय बालेन्द्र शाह, जिन्हें प्यार से ‘बालेन’ कहा जाता है, नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बनने की कगार पर हैं. एक रैपर, इंजीनियर, काठमांडू के पूर्व मेयर और हमेशा आयताकार (रेक्टेंगुलर) धूप का चश्मा पहनने वाले बालेन ने पिछले हफ्ते हुए चुनावों में अपनी पार्टी को भारी बहुमत से जीत दिलाई है.
यह चुनाव जेन-ज़ी के नेतृत्व वाली उस क्रांति के बाद हुआ है, जिसने उस सरकार को उखाड़ फेंका था जिसे कई नेपाली भ्रष्ट मानते थे. मंगलवार को जारी आधिकारिक नतीजों के अनुसार, बालेन की ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ (आरएसपी) ने नेपाल के आधुनिक चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा जनादेश हासिल करते हुए 275 संसदीय सीटों में से एक महत्वपूर्ण बहुमत जीता है.
लोग उन्हें वोट क्यों दे रहे हैं? तकनीकी रूप से नेपाल के मतदाताओं ने आरएसपी को चुना है, लेकिन असल में कई लोगों ने पार्टी को नहीं, बल्कि बालेन को वोट दिया है. नेपाल ओपन यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञानी संजीव हुमागाईं कहते हैं, “लोग कह रहे हैं कि बालेन नेपाल के तारणहार हैं. वे लोकलुभावन तरीके से कह रहे हैं कि वह एक भगवान हैं.” एक सामाजिक रूप से जागरूक रैपर के तौर पर बालेन ने खुद को नेपाल की पारंपरिक राजनीति से अलग रखा है. चार साल पहले उन्होंने काठमांडू के मेयर का निर्दलीय चुनाव जीता था और कचरा प्रबंधन, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतरीन काम करके अपनी छवि एक ऐसे नेता की बनाई जो काम करना जानता है.
मेयर के रूप में उन्होंने जेन-जेड प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया था, जो भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सोशल मीडिया बैन के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे. जब सुरक्षा बलों ने निहत्थे युवाओं को मार डाला, तो बालेन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को “आतंकवादी” करार दिया. इसके बाद ओली ने इस्तीफा दे दिया और सरकार गिर गई. हालिया चुनावों में बालेन ने ओली की ही संसदीय सीट से चुनाव लड़ा और उनसे साढ़े तीन गुना ज्यादा वोटों से जीत हासिल की.
बालेन का अंदाज़ काफी आक्रामक और रहस्यमयी है. वह हमेशा अपना आयताकार चश्मा घर के अंदर भी पहने रखते हैं. वह प्रेस कॉन्फ्रेंस या इंटरव्यू कम ही देते हैं और 3.7 मिलियन फेसबुक फॉलोअर्स के साथ सीधे सोशल मीडिया के जरिए बात करते हैं. उन्होंने अमेरिका, चीन और भारत जैसे बड़े देशों के साथ-साथ नेपाल की तीन बड़ी पार्टियों की भी तीखी आलोचना की है. दिलचस्प बात यह है कि जनवरी में आरएसपी में शामिल होने से पहले उन्होंने यह कहते हुए इस पार्टी की भी आलोचना की थी कि “सभी राजनेता, नए और पुराने, चोर हैं.” उन्होंने सोशल मीडिया पर हिटलर के प्रबंधकीय कौशल की प्रशंसा भी की है, जो उनके आवेगी स्वभाव को दर्शाता है.
संगीत की बात करें तो, ट्यूपैक शकूर और 50 सेंट से प्रेरित होकर बालेन ने हमेशा शोषितों के हक में और सत्ता के खिलाफ रैप लिखा है. मधेस (भारत से सटा निचला प्रांत) के मूल निवासी होने के नाते, वह इस क्षेत्र से आने वाले नेपाल के पहले प्रधानमंत्री बन सकते हैं. उनका एक हालिया गीत उन मधेसी नेपालियों की दुर्दशा बयां करता है, जिन्हें देश में भ्रष्टाचार के कारण रोजगार न मिलने पर विदेश जाना पड़ता है.
हालांकि, बतौर नेता उनके सामने बड़ी चुनौतियां हैं. मेयर रहते हुए उन्होंने कई बार मनमाने फैसले लिए, जैसे झुग्गियों पर बुलडोज़र चलाना या सड़क विभाग के सामने कचरा गिरवा देना. अब प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें समझौता करना सीखना होगा, क्योंकि निचले सदन में बहुमत होने के बावजूद उच्च सदन में उनकी पार्टी के पास एक भी सीट नहीं है.
गंगा में देवप्रयाग से हरिद्वार तक कोलिफॉर्म बैक्टीरिया 32 गुना बढ़ा, CAG की रिपोर्ट
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ऑडिट रिपोर्ट में उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम के क्रियान्वयन में कई गंभीर कमियां सामने आई हैं.रिपोर्ट में कहा गया है कि देवप्रयाग और हरिद्वार के बीच गंगा में कोलिफॉर्म बैक्टीरिया का स्तर 32 गुना बढ़ गया है. इसके अलावा कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं और लगभग 32% प्लांट गंदे पानी को साफ किए बिना ही गंगा में छोड़ रहे हैं.
2018 से 2023 के बीच किए गए इस ऑडिट में 42 में से 23 परियोजनाओं की जांच की गई. रिपोर्ट के अनुसार देवप्रयाग तक गंगा का पानी ऐ श्रेणी में था, जबकि ऋषिकेश और हरिद्वार में अधिकतर समय बी श्रेणी में पाया गया. ए श्रेणी का पानी कीटाणुशोधन के बाद पीने योग्य माना जाता है, जबकि बी श्रेणी का पानी केवल स्नान के लिए उपयुक्त होता है.
ऑडिट में पाया गया कि सात शहरों में बने 21 सीवेज प्लांट किसी भी घर से जुड़े नहीं हैं, जिससे वे उपयोग में नहीं आ रहे. इसके अलावा 37 प्लांटों के निरीक्षण में 12 प्लांट बिना उपचारित सीवेज गंगा और उसकी सहायक नदियों में छोड़ते पाए गए. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जिन जिलों से गंगा और उसकी सहायक नदियां गुजरती हैं, उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, देहरादून और हरिद्वार, उनमें जिला स्तर पर नदी प्रबंधन योजना तैयार नहीं की गई. कार्यक्रम की प्रगति भी कम रही.
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टेक्सास के ब्राउनस्विल में एक नई तेल रिफाइनरी बनाने की योजना की घोषणा की है और इस परियोजना में भारतीय कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की भूमिका के लिए उसका धन्यवाद किया है.
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग नाम की कंपनी अमेरिका-मेक्सिको सीमा के पास ब्राउनस्विल बंदरगाह पर 168,000 बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली रिफाइनरी बनाएगी. कंपनी का कहना है कि इसके शुरू होने पर यह अमेरिका के व्यापार घाटे में लगभग 300 अरब डॉलर तक की कमी लाने में मदद कर सकती है. निर्माण कार्य इस साल की दूसरी तिमाही में शुरू करने की योजना है.
ट्रंप ने कहा कि यह परियोजना अमेरिकी ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने, राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत करने और अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाने में मदद करेगी. कंपनी के चेयरमैन जॉन वी. कैल्से के अनुसार लगभग पचास साल बाद अमेरिका में पहली बार ऐसी रिफाइनरी बनाई जाएगी जो खास तौर पर अमेरिकी शेल ऑयल को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन की जाएगी.
रिपोर्ट में कहा गया है कि रिलायंस ने इस परियोजना में कई सौ मिलियन डॉलर का निवेश किया है और अमेरिका फर्स्ट के साथ 20 साल का ऑफटेक समझौता भी किया है, जिसके तहत वह रिफाइनरी से बनने वाले उत्पाद खरीदेगी.
पहली बार पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति देने का आदेश दिया है. यह फैसला कोर्ट के 2018 के कॉमन कॉज़ मामले के उस निर्णय के आधार पर दिया गया है, जिसमें सम्मान के साथ मरने के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया था.
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 32 वर्षीय हर्ष राणा के मामले में जीवन रक्षक इलाज हटाने की अनुमति दी. हर्ष राणा पिछले 13 साल से स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में हैं. वह 13 साल पहले अपने पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके दिमाग को गंभीर चोट लगी और उनका शरीर लगभग पूरी तरह लकवाग्रस्त हो गया था. मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार इन वर्षों में उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ.
अदालत ने बताया कि वह अभी केवल क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन के ज़रिए जीवित हैं. क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन एक तरह का चिकित्सीय इलाज है, जिसे मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर हटाया जा सकता है. अदालत ने यह भी कहा कि इलाज जारी रखने से केवल उनका जैविक जीवन बढ़ रहा था, लेकिन इससे कोई चिकित्सीय सुधार नहीं हो रहा था. इसके लिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि हर्ष राणा को एम्स के पेलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती कराया जाए, जहां से क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी.
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