12/01/2026: 50 मुस्लिमों की न्यायेतर हत्या | जाति की पैदाइश और मौक़ापरस्ती | आत्मघाती अमेरिका | गायब जंगल | हाथी ने 20 को मारा | कौशल विकास में फर्जीवाड़ा | बाथरूम में कैद औरत | कुमार शानू के फैन
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
हेट क्राइम: 2025 में 50 मुसलमानों की न्यायेतर हत्या, 27 नफरती हिंसा का शिकार.
पर्यावरण: भारत में वन लाभ के मुकाबले 18 गुना ज़्यादा वनों का विनाश.
घोटाला: पीएम कौशल विकास योजना में 95% बैंक खाते अमान्य या खाली मिले.
ईरान संकट: आर्थिक तंगी से भड़के प्रदर्शन, 100 से ज़्यादा मौतें, इंटरनेट ब्लैकआउट.
चुनाव आयोग: महाराष्ट्र में ‘लाड़की बहिन’ की अग्रिम किस्त पर रोक, पूर्व नेवी चीफ को नागरिकता साबित करने का नोटिस.
समाज: हरियाणा में पति ने पत्नी को 2 साल बाथरूम में कैद रखा; झारखंड में हाथी ने 9 दिन में 20 लोगों को मारा.
स्पेस: इसरो का साल का पहला मिशन फेल, PSLV रॉकेट भटका, 15 सैटेलाइट नष्ट.
2025 में 50 मुसलमानों की ‘न्यायेतर’ हत्या, 27 तो सिर्फ़ नफ़रत की भेंट चढ़े
‘साउथ एशिया जस्टिस कैंपेन’ (एसएजेसी) ने 2025 के लिए जो रिपोर्ट जारी की है, वह किसी भी लोकतांत्रिक समाज की नींद उड़ाने के लिए काफ़ी है. ‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में भारत में कम से कम 50 मुसलमानों की ‘न्यायेतर हत्या’ हुई है. इनमें से 27 मामले ऐसे हैं जहां हिंदू चरमपंथियों ने सिर्फ़ धार्मिक पहचान की वजह से लोगों को मार डाला. वहीं, 23 लोग पुलिस या सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए.
रिपोर्ट में जो सबसे डराने वाला पहलू है, वह है बच्चों और शिशुओं की मौत. राजस्थान में पुलिस रेड के दौरान डेढ़ महीने की एक बच्ची की कुचलकर मौत हो गई. वहीं दिल्ली में एक शादी के समारोह के दौरान 14 साल के साहिल अंसारी को एक ऑफ-ड्यूटी सीआईएसएफ कांस्टेबल ने गोली मार दी. ‘इंडिया पर्सक्यूशन ट्रैकर’ बताता है कि दो मुसलमानों ने हिंदू चरमपंथियों की हिंसा और उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या कर ली.
सबसे ज़्यादा खून-खराबा जम्मू-कश्मीर में दर्ज किया गया, जहां कम से कम आठ कश्मीरी नागरिक सुरक्षा अभियानों के दौरान मारे गए. इन मामलों में हिरासत में टॉर्चर और फ़र्ज़ी एनकाउंटर के आरोप लगे हैं. उत्तर प्रदेश में पुलिस एनकाउंटर में छह मुसलमान मारे गए और दर्जनों को ‘हाफ़-एनकाउंटर’ (पैरों में गोली मारना) में हमेशा के लिए अपंग बना दिया गया. इसके अलावा, छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के लिए भी यह साल बेहद खूनी रहा, जहां सुरक्षा बलों ने 275 माओवादियों को मारने का दावा किया, लेकिन आरोप है कि इनमें से कई आम आदिवासी नागरिक थे.
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जैसे-जैसे 2026 में चुनाव नज़दीक आ रहे हैं और आर्थिक संकट गहरा रहा है, ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यकों पर हमले और तेज़ हो सकते हैं.
भारत ने 2015-2019 के बीच जितना जंगल कमाया, उससे 18 गुना ज्यादा गंवा दिया
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बॉम्बे और सस्त्र (SASTRA) डीम्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए और व्यापक अध्ययन ने भारत में वन संरक्षण के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. ‘द हिंदू’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 2015 से 2019 की अवधि के दौरान भारत के वन क्षेत्र में भारी गिरावट दर्ज की गई है. अध्ययन का सबसे चिंताजनक आंकड़ा यह है कि इस चार साल की अवधि में, देश ने जहां 1 वर्ग किलोमीटर जंगल प्राप्त किया, वहीं उसके बदले में लगभग 18 वर्ग किलोमीटर जंगल खो दिया. यह 18:1 का अनुपात भारत के वन पारिस्थितिकी तंत्र में चल रहे गहरे विखंडन और संकट को उजागर करता है.
वनों की गुणवत्ता और विखंडन का संकट
अध्ययन का नेतृत्व आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर राज रामशंकरन और SASTRA यूनिवर्सिटी के डॉ. वासु सत्यकुमार व श्रीधरन गौतम ने किया. शोधकर्ताओं ने कोपरनिकस ग्लोबल लैंड सर्विस (सीजीएलएस) के लैंड कवर मैप से प्राप्त डेटा पर ‘मॉर्फोलॉजिकल स्पैटियल पैटर्न एनालिसिस’ (एमएसपीए) नामक तकनीक लागू की.
अध्ययन की मुख्य विशेषता यह है कि इसने वनों को केवल ‘हरियाली’ के रूप में नहीं, बल्कि उनकी संरचनात्मक गुणवत्ता के आधार पर सात प्रकारों में वर्गीकृत किया है:
कोर : बड़े और अखंड आवास जो जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं.
ब्रिज और लूप्स : जो अलग-अलग कोरों को जोड़ते हैं.
आइलेट्स : छोटे, अलग-थलग पड़े वन के टुकड़े.
अन्य श्रेणियां जैसे शाखाएं, किनारे और छिद्र.
रिपोर्ट में पाया गया कि ‘कोर’ वन क्षरण के प्रति सबसे अधिक लचीले होते हैं, जबकि ‘आइलेट्स’ बेहद कमजोर होते हैं और तेजी से नष्ट हो जाते हैं. चिंता की बात यह है कि 2015-2019 के बीच जो नया वन क्षेत्र जुड़ा, उसमें से आधे से अधिक ‘आइलेट्स’ थे. इसका अर्थ है कि कागजों पर भले ही जंगल बढ़ता हुआ दिखे, लेकिन पारिस्थितिक रूप से इनका मूल्य बहुत कम है क्योंकि ये छोटे और खंडित हैं.
राज्यों की स्थिति और एफएसआई से तुलना
अध्ययन के मुताबिक, 2015 से 2019 तक भारत के सभी राज्यों ने वन क्षेत्र में शुद्ध हानि का अनुभव किया.
वन लाभ: कुल 56.3 वर्ग किमी का जो वन लाभ हुआ, उसका लगभग आधा हिस्सा आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और राजस्थान में देखा गया.
वन हानि: कुल 1,032.89 वर्ग किमी की वन हानि में से लगभग आधा हिस्सा अकेले तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल का था.
यह अध्ययन भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) की रिपोर्टों से अलग तस्वीर पेश करता है. FSI अक्सर वन क्षेत्र में वृद्धि दिखाता है क्योंकि वह 10% कैनोपी घनत्व और 23.5 मीटर रिज़ॉल्यूशन वाले डेटा का उपयोग करता है, जो खंडित और निरंतर जंगलों में भेद नहीं कर पाता. इसके विपरीत, इस अध्ययन ने 15% कैनोपी थ्रेशोल्ड और 100 मीटर रिज़ॉल्यूशन वाले डेटा का उपयोग किया, जो वनों की कनेक्टिविटी (जुड़ाव) को मापने में अधिक सटीक है.
नीतिगत बदलाव की जरूरत
प्रोफेसर रामशंकरन ने कहा, “हमारा लचीलापन-आधारित रैंकिंग सिस्टम नीति निर्माताओं के लिए एक व्यावहारिक उपकरण है. सभी वन क्षेत्रों को एक जैसा मानने के बजाय, हमें यह पहचानना होगा कि कौन से हिस्से कमजोर हैं (जैसे आइलेट्स) और कौन से दीर्घकालिक मूल्य प्रदान करते हैं (जैसे कोर्स).”
उन्होंने सुझाव दिया कि कैम्पा और ‘नेशनल मिशन फॉर ए ग्रीन इंडिया’ जैसी वनीकरण योजनाओं को मौजूदा ‘कोर’ वनों को मजबूत करने और उनके बीच ‘ब्रिज’ बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. इससे जंगल अधिक जुड़े हुए और टिकाऊ बनेंगे. सत्यकुमार ने चेतावनी दी कि हमें अब केवल “मात्रा-आधारित” वनीकरण से आगे बढ़कर “संरचनात्मक कनेक्टिविटी” को वन नियोजन में शामिल करना होगा.
अध्ययन की सीमाएं और भविष्य
हालांकि, 100 मीटर रिज़ॉल्यूशन के कारण यह अध्ययन सड़कों जैसी पतली संरचनाओं का पता नहीं लगा सका, लेकिन यह ओपन-सोर्स डेटा का उपयोग करने वाला अपनी तरह का पहला देशव्यापी आकलन है. शोधकर्ता अब इसे जिला स्तर और संरक्षित क्षेत्रों तक ले जाने की योजना बना रहे हैं ताकि बुनियादी ढांचे के विकास का वनों पर प्रभाव और सटीकता से मापा जा सके.
कौशल विकास योजना में बड़ा फर्जीवाड़ा
कांग्रेस का आरोप: पीएम कौशल विकास योजना में भारी डेटा हेरफेर और वित्तीय गड़बड़ी, 95% बैंक खाते अमान्य
कांग्रेस ने सोमवार (12 जनवरी, 2026) को केंद्र सरकार की प्रमुख योजना ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ (पीएमकेवीवाय) के क्रियान्वयन में भारी अनियमितताओं का आरोप लगाया है. पार्टी ने भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए एक निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की है.
घोटाले के मुख्य बिंदु
कांग्रेस नेता कन्नन गोपीनाथन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि 2015 से 2022 के बीच हुए ऑडिट में चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं:
फर्जी लाभार्थी: 95% से अधिक लाभार्थियों के बैंक खाते का विवरण या तो खाली था, अमान्य था या उपलब्ध ही नहीं था. यह सीधे तौर पर प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) में घोटाले की ओर इशारा करता है.
डेटा का दोहराव: 12,000 से अधिक बैंक खाता नंबरों का उपयोग 52,000 से अधिक उम्मीदवारों के लिए किया गया. लाखों ईमेल आईडी और मोबाइल नंबर भी फर्जी या डुप्लिकेट पाए गए.
प्रशिक्षक गायब: 61 लाख प्रमाणित उम्मीदवारों का रिकॉर्ड ऐसे ट्रेनर आईडी से जुड़ा था जो अस्तित्व में ही नहीं थे.
फंड का दुरुपयोग: बिहार, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जारी किए गए फंड का बहुत कम हिस्सा उपयोग किया गया. 34 लाख से अधिक प्रमाणित उम्मीदवारों (36%) को उनका प्रोत्साहन पैसा नहीं मिला.
कांग्रेस ने इसे करदाताओं के पैसे की खुली लूट बताया है और संसद में इस मुद्दे को उठाने की चेतावनी दी है.
महाराष्ट्र चुनाव में ‘लाड़की बहिन’ पर रोक
चुनाव आयोग ने ‘लाड़की बहिन’ जनवरी किस्त समय से पहले जारी करने पर रोक लगाई
महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग ने सोमवार (12 जनवरी, 2026) को राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह ‘लाड़की बहिन’ योजना की जनवरी की किस्त समय से पहले जारी नहीं कर सकती. यह निर्णय 15 जनवरी को होने वाले 29 नगर निगमों के चुनावों के मद्देनजर लागू आदर्श आचार संहिता के तहत लिया गया है.
विवाद की शुरुआत तब हुई जब भाजपा नेता और मंत्री गिरीश महाजन ने घोषणा की कि मकर संक्रांति (14 जनवरी) के उपहार के रूप में लाभार्थियों को दिसंबर और जनवरी दोनों महीनों की कुल ₹3,000 की राशि मतदान से पहले ही ट्रांसफर कर दी जाएगी. कांग्रेस ने इसे चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी.
आयोग ने स्पष्ट किया है कि योजना पुरानी है, इसलिए नियमित किस्तों का वितरण जारी रह सकता है, लेकिन चुनाव को प्रभावित करने के लिए कोई भी ‘अग्रिम भुगतान’ नहीं किया जा सकता. कांग्रेस ने तंज कसते हुए कहा कि सत्ताधारी दल सरकारी पैसे को “रिटर्न गिफ्ट” (वोट) पाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता था, जिसे आयोग ने रोक दिया है.
होमो ऑपर्चूनिस्टिकस: जाति व्यवस्था का निर्माण—धर्म नहीं, सियासत और अर्थशास्त्र की उपज
जाति की पैदाइश में मौक़ापरस्ती का कितना हाथ?
टोनी जोसेफ वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित किताब ‘अर्ली इंडियंस’ के लेखक हैं. यह किताब प्रागैतिहासिक आनुवंशिकी और पुरातत्व के ज़रिए यह बताती है कि भारतीय कौन हैं और कहां से आए हैं. हिंदू ने उनके इंडियन हिंस्ट्री कांग्रेस के आयोजन में यहां दिये गये भाषण पर बनाये इस इस लेख में, जोसेफ जाति व्यवस्था की उत्पत्ति को लेकर प्रचलित धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देते हैं और इसे एक राजनीतिक और आर्थिक ‘मौकापरस्ती’ का नतीजा बताते हैं. जाति व्यवस्था की जड़ें धार्मिक शुद्धता, प्रदूषण, नस्लीय भेद या हड़प्पा सभ्यता में नहीं हैं. यह प्राचीन राजनीतिक संयोगों और आर्थिक परिस्थितियों से पैदा हुई व्यवस्था है. जोसेफ इसे समाजशास्त्री लुईस ड्यूमॉन्ट के सिद्धांत ‘होमो हाइरार्किकस’ (ऊंच-नीच को स्वभावतः पसंद करने वाला इंसान) के बजाय ‘होमो ऑपर्चूनिस्टिकस’ (मौकापरस्त इंसान) की रचना मानते हैं. यानी, ताकतवर लोगों ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए यह सिस्टम बनाया.
तथ्य, तर्क और संदर्भ
ऋग्वेद और जाति का शुरुआती रूप:
ऋग्वेद के शुरुआती मंडल में जाति व्यवस्था का ज़िक्र नहीं है. चार वर्णों का ज़िक्र सिर्फ़ ‘पुरुष सूक्त’ में मिलता है, जिसे विद्वान बाद में जोड़ा गया हिस्सा (later insertion) मानते हैं.
ऋग्वेद में ‘शूद्र’ शब्द पुरुष सूक्त के अलावा कहीं नहीं है. यहां तक कि ‘ब्राह्मण’ शब्द भी सामाजिक श्रेणी के तौर पर बहुत कम और संदिग्ध रूप में आता है.
हवाला: 2014 में ऋग्वेद का अनुवाद करने वाले स्टेफ़नी डब्ल्यू. जैमिसन और जोएल पी. ब्रेरेटन का मानना है कि भारत की शुरुआती धार्मिक कविताओं में जाति व्यवस्था सिर्फ़ ‘भ्रूण’ अवस्था में थी, पूरी तरह विकसित नहीं.
कुरु साम्राज्य और ‘ब्राह्मण’ जाति का जन्म:
माइकल विट्ज़ेल और टी. महादेवन के शोध के अनुसार, ऋग्वेद में वर्णित ‘दस राजाओं के युद्ध’ (दाशराज्ञ युद्ध) के बाद ‘कुरु’ कबीले का वर्चस्व बढ़ा.
वैदिक सभ्यता का केंद्र पंजाब से खिसक कर कुरुक्षेत्र (दिल्ली के पास) आ गया. कुरु राजाओं ने अपनी सत्ता मज़बूत करने के लिए अलग-अलग कबीलों के मंत्रों को मिलाकर एक साझा वेद बनाने की ठानी.
1000 ईसा पूर्व के आसपास, जिन परिवारों के पास मंत्रों का संग्रह था, उन्होंने अपनी विशिष्टता बनाए रखने के लिए ‘गोत्र’ के नियम बनाए.
नियम: गोत्र के बाहर शादी लेकिन अपने ही समूह के 50 गोत्रों के भीतर शादी. इस तरह ‘ब्राह्मण’ पहली असली जाति बनी.
क्षत्रिय और वैश्य की असलियत:
जो लोग सत्ता हथियाने में कामयाब रहे, वे क्षत्रिय कहलाए.
हवाला: इतिहासकार डी.डी. कोसांबी ने लिखा है, “भारतीय क्षत्रिय जाति से भ्रमित न हों, यह अक्सर ब्राह्मणों द्वारा गढ़ा गया एक मिथक था.”
बाकी बचे आम लोग ‘वैश्य’ कहलाए और जो आर्य संस्कृति से बाहर थे, उन्हें मज़दूर या ‘शूद्र’ बना दिया गया.
जाति के बारे में 5 बड़े मिथक:
शुद्धता-अशुद्धता: ऋग्वेद में इसका कोई आधार नहीं है.
खान-पान: शाकाहार की अवधारणा बहुत बाद में जैन और बौद्ध (श्रमण) परंपराओं से आई, जो मगध (बिहार) में पनपीं. यह वैदिक मूल नहीं है.
नस्ल : शुरुआत में तीनों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) खुद को ‘आर्य’ मानते थे, इसलिए यह नस्लीय भेद नहीं था.
हड़प्पा: यह व्यवस्था हड़प्पा सभ्यता से नहीं आई.
विदेशी मूल: जो स्टेपी चरवाहे (आर्य) बाहर से आए, वे अपने साथ जाति व्यवस्था नहीं लाए थे. यह भारत में ही राजनीतिक ज़रूरत के हिसाब से बनी.
धर्मशास्त्रों का षड्यंत्र:
बाद के ब्राह्मण ग्रंथों ने इस सामाजिक ऊंच-नीच को ‘प्राकृतिक’ और ‘पवित्र’ बताने के लिए देवताओं, मौसमों और जानवरों तक को वर्ण व्यवस्था से जोड़ दिया.
हवाला: प्रोफेसर ब्रायन के. स्मिथ अपनी किताब ‘क्लासिफाइंग द यूनिवर्स’ (1994) में लिखते हैं कि यह कुछ इंसानों द्वारा अपनी मनमानी हैसियत को पवित्र बताने का तरीका था.
बौद्ध धर्म का विरोध और ‘मनुस्मृति’:
अशोक के ‘धम्म’ और बौद्ध/जैन धर्म के उदय ने वर्ण व्यवस्था को चुनौती दी.
इसके जवाब में ब्राह्मणों ने धर्मसूत्र और मनुस्मृति जैसे ग्रंथ लिखे, जिनमें जाति के नियमों को बेहद कड़ा कर दिया गया—पालने से लेकर चिता तक.
कृषि का विस्तार और जाति का फैलाव:
235-284 ईसवी के बीच रोमन साम्राज्य के संकट से वैश्विक व्यापार ठप हो गया. भारतीय राजाओं को आय के लिए अब खेती पर निर्भर होना पड़ा.
खेती के विस्तार के लिए जंगलों को साफ़ करना और आदिवासियों को मज़दूर बनाना ज़रूरी था.
राजाओं ने ब्राह्मणों को ज़मीनें देकर अपने राज्यों में बसाया. ब्राह्मणों ने इस नई आबादी को कंट्रोल करने के लिए वर्ण-जाति व्यवस्था का इस्तेमाल किया.
यहीं से अंबेडकर द्वारा वर्णित “सम्मान का आरोही क्रम और अवमानना का अवरोही क्रम” पूरे देश में फैल गया.
जाति व्यवस्था किसी दैवीय विधान का नतीजा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक घटनाओं और आर्थिक ज़रूरतों की उपज थी. जिसे बाद में धर्म का लबादा ओढ़ा दिया गया. 20वीं सदी में अंबेडकर ने इसी ऐतिहासिक झूठ को पहचानने और इसे ‘नष्ट’ करने का आह्वान किया.
विश्लेषण
आकार पटेल | आत्मघात की राह पर अमेरिका
अमेरिका में ऐसा बहुत कुछ है जिसकी तारीफ़ की जा सकती है, और काफ़ी कुछ ऐसा भी जिसे नापसंद किया जाए. सबसे बड़ी खूबी तो यही है कि वह दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली लोगों को अपनी ओर खींच पाता है और उन्हें खुले दिल से अपना लेता है.
अमेरिका की कुल आबादी का करीब 15% हिस्सा बाहर से आया है. इसमें 50 लाख भारतीय भी शामिल हैं. यह उनके लिए असल में एक बहुत बड़ी संपत्ति है. सोचिए, भारत जैसा कोई देश अपने संसाधन एक बच्चे को पालने-पोसने, पढ़ाने-लिखाने, कपड़ा और छत देने में लगाता है. वह बच्चा हमारे बेहतरीन सरकारी संस्थानों में पढ़ता है—जो हम भारतीयों के पैसों (सब्सिडी) से चलते हैं—और फिर अपनी जवानी में हमेशा के लिए अमेरिका चला जाता है. माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और टेस्ला जैसी अमेरिकी कंपनियां और वहां की यूनिवर्सिटीज़ ऐसे बाहरी लोगों की मेहनत और काबिलियत का फल खाती हैं.
लागत सारी यहां लगी, और मुनाफ़ा वहां मिला.
अमेरिका की यह क्षमता कुछ हद तक यूरोप में भी दिखती है, लेकिन चीन या भारत जैसे देशों में ऐसा नहीं है. न तो हम बाहरी टैलेंट को बुलाते हैं और न ही हमें उसकी चाहत है. सच कहा जाए तो हममें से जिसे भी मौका मिले, वो विदेश भागना चाहता है, और आंकड़े यही गवाही देते हैं. लेकिन आज अमेरिका इस सिलसिले को ख़त्म कर रहा है. वह इस पर इतना अड़ा हुआ है कि अपनी ही मिलिशिया (ICE) के हाथों प्रवासियों के शिकार को सही मान रहा है, भले ही इसमें उसके अपने नागरिक मारे जाएं. अमेरिका को चाहने वालों ने इसकी उम्मीद नहीं की थी.
दूसरी तरफ़, जो लोग दुनिया में अमेरिका के चाल-चलन को जानते हैं, ख़ासकर दूसरे विश्व युद्ध के बाद, उन्हें वहां नापसंद करने के लिए हमेशा बहुत कुछ मिला है. एशिया, अफ़्रीका, लैटिन अमेरिका और यहां तक कि यूरोप में उसकी अंतहीन दखलंदाजी ने करोड़ों लोगों का नुकसान किया है. यह सिलसिला पुराना है—1950 के दशक में कोरियाई युद्ध से लेकर 1990 के दशक में सर्बिया तक, और फिर 9/11 के बाद की उनकी मनमानियां.
मेरी नज़र में यह पहली बार है जब अमेरिका एक ऐसा रास्ता अपना रहा है जहां वह अपनी खूबियों को मिटा रहा है और अपनी बुराइयों को दोगुना कर रहा है. अपने दरवाज़े बंद करके अमेरिका खुद को चोट पहुंचा रहा है. H1B वीज़ा का सबसे ज़्यादा फ़ायदा भारतीयों को मिलता है—कुल संख्या का करीब दो-तिहाई. यह सच है कि ये लोग भारत में नहीं रहना चाहते और मौका मिले तो अमेरिका जाना चाहते हैं, लेकिन वे वहां के काम-काज में ऐसी क्वालिटी लाते हैं जिसकी बराबरी करना आसान नहीं.
इसी तरह, जो लोग बिना कागज़ों के अमेरिका जाते हैं, वे भी इसलिए जाते हैं क्योंकि वे मेहनत करना और आगे बढ़ना चाहते हैं. उन्हें निकालना या दूसरों को आने से रोकना, जैसा अभी हो रहा है, अमेरिका को भारी पड़ रहा है और आगे भी पड़ेगा. वहां बेरोज़गारी पिछले साल बढ़ी है क्योंकि आप्रवासन पर हमले तेज़ हुए हैं.
वजह साफ़ है—काम करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई से पूरी अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ है. जो खूबी थी, उसे ख़त्म कर दिया गया है.
अब ज़रा दूसरे पहलू को देखें. अमेरिका एक ऐसा रास्ता अपना रहा है जो विदेशों में हिंसा के मामले में उसकी पुरानी साम्राज्यवादी आदतों को जारी रखता है, लेकिन अब उसमें एक नई धार आ गई है. इस साम्राज्यवाद को वेनेज़ुएला पर हमले, वहां के नेता और उसकी पत्नी के अपहरण, और उनके तेल भंडारों पर खुलेआम कब्ज़ा मांगने में देखा जा सकता है. इसमें दर्जनों लोग मारे गए लेकिन अमेरिकी मीडिया में न इसकी चर्चा है, न कोई हमदर्दी. ईरान पर बमबारी और इज़रायल को उसके पड़ोसियों पर हमले के लिए मदद देना भी उसी पुराने ढर्रे का हिस्सा है.
ट्रंप ने इसमें जो नया पागलपन जोड़ा है, वो है अपने ही दोस्तों को दुश्मन बना लेना. उन्हें कनाडा चाहिए, ग्रीनलैंड चाहिए, पनामा नहर चाहिए. बेचारे यूरोपीय, जो अब तक सिर्फ़ चमड़ी के रंग के आधार पर अमेरिका को अपना भाई मानते थे, अब डरे हुए हैं. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि क्या करें. उन्होंने एकजुट होने का दिखावा तो किया है, लेकिन अगर ट्रंप अपनी फौज ग्रीनलैंड भेज दें, तो वे कुछ नहीं कर पाएंगे.
जापान और कोरिया, जो सुरक्षा और व्यापार में अमेरिका के पक्के साथी थे, अब खुद को ब्लैकमेल होता देख रहे हैं. भारत, जो अमेरिका के करीब जाना चाहता था (ख़ासकर पिछले दो प्रधानमंत्रियों के दौर में, और जिसके नेता ने अमेरिका जाकर भारतीयों से ट्रंप को वोट देने को कहा था), वो भी सदमे में है. हमारी सरकार ने किस नादानी और अक्षमता से ट्रंप को हैंडल किया, उस पर फिर कभी बात करेंगे. आज बात सिर्फ़ अमेरिका की, जो अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है.
इतिहास के महान साम्राज्य आमतौर पर धीरे-धीरे ख़त्म हुए. रोम को मिटने में सदियां लगीं. आधुनिक दौर में यह तेज़ी से हो रहा है. अंग्रेज़ 1911 में दिल्ली के तख्त पर थे और 1945 आते-आते उनकी हालत ख़राब हो गई. सोवियत संघ कुछ ही हफ़्तों में बिखर गया. लेकिन इनमें से किसी ने भी जानबूझकर अपना इतना नुकसान नहीं किया जितना आज अमेरिका कर रहा है.
ट्रंप उस बाहरी टैलेंट को दुत्कार रहे हैं जिसने अमेरिका को इतना कुछ दिया, और उस ‘नियम-कानून वाली व्यवस्था’ को तोड़ रहे हैं जिसे खुद अमेरिका ने दुनिया पर राज करने के लिए बनाया था. उन्होंने जो किया है और कर रहे हैं, उससे अमेरिका को अभी और आगे भी गहरा नुकसान होगा. यह उन लोगों के लिए उतना ही दुखद है जो लंबे समय से अमेरिका को पसंद करते आए हैं, और उनके लिए उतना ही सुखद है जो उसे नापसंद करते थे.
आकार लेखक, पत्रकार होने के अलावा मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंडिया के प्रमुख हैं.
तेलतुंबडे: जब मतदाता ही संपादित होने लगे; सामूहिक मताधिकार वंचन का संवैधानिक संकट
लेखक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबडे ने “द वायर” में लिखा है कि बिना जनगणना के आंकड़ों के किया गया ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) कोई प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि जनसांख्यिकीय वास्तविकता को नजरअंदाज कर राजनीतिक समुदाय को फिर से परिभाषित करने का प्रयास है. जब राज्य बिना ठोस प्रमाण के 6.5 करोड़ लोगों को मतदाता सूची से हटा देता है, तो वह लोकतंत्र का प्रशासन नहीं, बल्कि उसका ‘संपादन’ कर रहा होता है.
अपने इस लंबे लेख में तेलतुंबडे कहते हैं कि प्रशासनिक अभ्यास कभी तटस्थ नहीं होते. मतदाता सूची से बाहर होने वाले लोग पूरी तरह पूर्वानुमानित हैं: बदलते पतों वाले प्रवासी मजदूर, झुग्गियों में रहने वाले गरीब, दलित, आदिवासी और मुसलमान. ये वे लोग हैं जिन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए भारतीय लोकतंत्र ने लंबा संघर्ष किया है, लेकिन सत्ताधारियों के लिए ये चुनावी रूप से ‘असुविधाजनक’ हैं.
जब असमान आबादी पर समान नियम थोपे जाते हैं, तो प्रक्रिया के बहाने असमानता ही पैदा होती है. ‘एसआईआर’ की शर्तें (निवास प्रमाण, दस्तावेजी सत्यापन) संपत्ति वाले लोगों को लाभ पहुँचाती हैं, जबकि प्रवासियों और गरीबों को बाहर कर देती हैं. यह परिणाम अनपेक्षित नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित पैटर्न है.
नागरिकता को ‘प्रशासनिक परिणाम’ बनाया जा रहा : यहां नागरिकता को एक संवैधानिक दर्जे से बदलकर ‘प्रशासनिक परिणाम’ बनाया जा रहा है. मतदान का अधिकार अब अधिकारियों के विवेक और कागजी संतुष्टि पर निर्भर है. यह बदलाव बिना किसी संसदीय बहस या कानून के, केवल प्रशासनिक आदेशों के जरिए किया गया है. जब मतदान नौकरशाही की मंजूरी का मोहताज हो जाए, तो लोकतंत्र केवल एक कर्मकांड बनकर रह जाता है.
संस्थागत पतन: चुनाव आयोग की भूमिका : चुनाव आयोग की कल्पना कार्यपालिका के हस्तक्षेप से चुनावी शुचिता की रक्षा के लिए की गई थी. लेकिन पारदर्शी मानदंडों के बिना इतने बड़े पैमाने पर विलोपन करके आयोग ने एक तटस्थ मध्यस्थ के बजाय ‘इलेक्टोरल इंजीनियरिंग’ के भागीदार के रूप में कार्य किया है. जब संवैधानिक संस्थाएं कार्यपालिका की प्राथमिकताओं का अनुमान लगाने लगें, तो स्वायत्तता केवल नाम मात्र की रह जाती है. यह व्यक्तिगत ईमानदारी की नहीं, बल्कि ‘संस्थागत कब्जे’ की समस्या है.
यह त्रुटि नहीं, एक पद्धति है बचाव पक्ष का तर्क है कि विलोपन को सुधारा जा सकता है, लेकिन समस्या ‘त्रुटि’ नहीं बल्कि ‘डिज़ाइन’ है. 6.5 करोड़ नागरिकों से उनके वोट के लिए “फिर से आवेदन” कराना एक संवैधानिक अधिकार को ‘नवीकरणीय परमिट’ में बदल देता है. यह प्रक्रिया केवल उन्हीं के लिए सुलभ है जिनके पास समय, पैसा और साक्षरता है. अंततः, जो संशोधित हो रहा है वह मतदाता सूची नहीं, बल्कि ‘अपनेपन’ का अर्थ है.
नागरिकता ‘कृतज्ञता’ में बदल गई है जनसंख्या के बड़े हिस्से को अब प्रतिनिधित्व के बजाय ‘कल्याणकारी योजनाओं’ के माध्यम से प्रबंधित किया जा रहा है. राशन और सब्सिडी को अधिकार के बजाय कार्यपालिका के ‘एहसान’ के रूप में पेश किया जा रहा है, जिससे नागरिकता ‘कृतज्ञता’ में बदल गई है. इस व्यवस्था में स्वतंत्र राजनीतिक आवाज एक जोखिम है. जो लोग वोट नहीं दे सकते, उन पर शासन करना और उन्हें लाभार्थी बनाकर मौन रखना सत्ता के लिए आसान है.
बिना ड्रामे के अधिनायकवाद इस स्थिति का सबसे खतरनाक पहलू इसका ‘प्रक्रियात्मक छलावा’ है. यहां कोई घोषित आपातकाल या सड़कों पर टैंक नहीं हैं. इसके बजाय, डेटाबेस और सर्कुलर के माध्यम से लोकतंत्र को चुपचाप कमजोर किया जा रहा है. तकनीकी भाषा (जैसे ‘क्लीन-अप’) लोकतांत्रिक चोट पर एनेस्थीसिया का काम करती है.
वह लिखते हैं कि सार्वभौमिक मताधिकार वह नींव थी, जिसने प्रजा को नागरिक बनाया. यदि राज्य बिना उचित प्रक्रिया के करोड़ों नाम मिटा सकता है, तो यह संप्रभुता से पीछे हटना है. अब प्रश्न यह नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि किसे भाग लेने दिया जाएगा. जब मतदाता ‘संपादन योग्य’ हो जाते हैं और अधिकार रद्द करने योग्य, तब लोकतंत्र केवल एक खोल के रूप में बचता है—जिसकी भाषा तो मौजूद है, लेकिन तत्व नष्ट हो चुका है. अंग्रेजी में तेलतुंबडे का पूरा लेख यहां पढ़ा जा सकता है.
झारखंड में मौत का तांडव: एक अकेला हाथी, 9 दिन और 20 लाशें
झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले के चाईबासा और कोल्हान के जंगलों में सन्नाटा और दहशत है. बीबीसी हिंदी के लिए मोहम्मद सरताज आलम की रिपोर्ट बताती है कि पिछले सिर्फ़ 9 दिनों (1 से 9 जनवरी) के भीतर एक जंगली हाथी ने 20 लोगों को कुचल कर मार डाला है. यह इलाका एशिया के सबसे बड़े साल के जंगलों में आता है.
वन विभाग के अधिकारी कुलदीप मीणा ने इसे ‘अभूतपूर्व स्थिति’ बताया है. 100 से ज़्यादा वनकर्मी हाथी को खोजने में लगे हैं, लेकिन वह अब तक पकड़ में नहीं आया है. ज़्यादातर हमले रात में हुए जब ग्रामीण अपने खेतों या खलिहानों में फसल की रखवाली कर रहे थे. यह संघर्ष जंगलों के सिकुड़ने और हाथियों के कॉरिडोर में इंसानी दखल का नतीजा है.
हादसे कितने दर्दनाक हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि 5 जनवरी को कुंद्रा बाहोदा और उनके दो छोटे बच्चे (6 और 8 साल) मारे गए. उनकी पत्नी पुंडी किसी तरह अपनी 2 साल की घायल बच्ची को लेकर भागने में सफल रहीं, और उन्हें बाद में पता चला कि उनका परिवार ख़त्म हो चुका है. अधिकारियों का कहना है कि हाथी संभवतः ‘मेटिंग फेज’ में है, जिस वजह से उसका टेस्टोस्टेरोन लेवल बढ़ा हुआ है और वह आक्रामक हो गया है.
बंगाल वोटर लिस्ट : ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’, वॉट्सऐप वाले आदेश पर कोर्ट ने मांगा जवाब
पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (एसआईआर) को लेकर घमासान अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर है. न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है.
सांसदों की तरफ़ से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग बिना किसी औपचारिक आदेश के सिर्फ़ वॉट्सऐप के ज़रिए निर्देश जारी कर रहा है और बूथ लेवल अफ़सरों से काम करवा रहा है. सिब्बल ने आयोग द्वारा बनाई गई एक नई श्रेणी ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (तार्किक गड़बड़ी) पर भी सवाल उठाए, जिसके तहत वोटरों को उनकी पात्रता पर अर्द्ध-न्यायिक सुनवाई के नोटिस भेजे जा रहे हैं.
उधर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पांचवीं चिट्ठी लिखी है. उन्होंने आरोप लगाया है कि 2002 की वोटर लिस्ट को डिजिटाइज़ करने के लिए जिस ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (एआई) का इस्तेमाल हो रहा है, वह भारी गड़बड़ियां कर रहा है. ममता ने इसे “बिना इंसानी दिमाग और संवेदना के चल रही मशीनी प्रक्रिया” बताया है. उनका कहना है कि इस दबाव में कई BLOs आत्महत्या तक कर चुके हैं. ममता का सीधा आरोप है कि आयोग का मक़सद सुधार नहीं, बल्कि वोटरों को हटाना है.
नेवी के पूर्व चीफ़ को चुनाव आयोग का नोटिस: ‘साबित करें कि आप कौन हैं’
गोवा में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर एक अजीबोगरीब सवाल खड़ा हो गया है. टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश (रिटायर्ड), जो 1971 के युद्ध के वीर चक्र विजेता हैं, उन्हें चुनाव आयोग ने नोटिस भेजकर अपनी पहचान साबित करने के लिए पेश होने को कहा है.
एडमिरल प्रकाश रिटायर्मेंट के बाद से 20 साल से गोवा में रह रहे हैं. चुनाव आयोग का कहना है कि उनका नाम ‘अनमैप्ड’ (अज्ञात) श्रेणी में है, यानी 2002 की लिस्ट में उनका रिकॉर्ड नहीं मिल रहा. साउथ गोवा की कलेक्टर एग्ना क्लीटस ने इसे प्रक्रिया का हिस्सा बताया है.
लेकिन सोशल मीडिया पर लोग भड़के हुए हैं. सवाल पूछा जा रहा है कि जिस व्यक्ति का ‘पेंशन पेमेंट ऑर्डर’ (पीपीओ) और ‘लाइफ सर्टिफिकेट’ सरकार के डेटाबेस में मौजूद है, उसे अपनी पहचान बताने के लिए लाइन में क्यों लगना पड़ रहा है? एडमिरल प्रकाश ने सोशल मीडिया पर अपनी पीड़ा साझा करते हुए लिखा, “हम 82 और 78 साल के बुजुर्ग दंपति हैं और हमें 18 किलोमीटर दूर बुलाया गया है. बीएलओ हमारे घर तीन बार आए, वो तभी जानकारी ले सकते थे.” साथी वेटर्न्स ने इसे सॉफ़्टवेयर की गड़बड़ी और कॉमन सेंस की कमी बताया है.
सिंगल मदर, बीजेपी विधायक और मारवाड़ी व्यापारी: बंगाल में वोटर लिस्ट की ‘जांच’ से सब परेशान
‘स्क्रोल’ के लिए अनंत गुप्ता की एक विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि बंगाल में चल रहा SIR अभियान ज़मीन पर कैसे आम लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन गया है. चुनाव आयोग 2002 की वोटर लिस्ट को आधार बनाकर ‘अनमैप्ड’ वोटरों की पहचान कर रहा है, जिसके चलते करीब 32 लाख लोग शक के दायरे में हैं.
रिपोर्ट में सुमाना नाम की एक सिंगल मदर की कहानी है, जिन्हें अपनी बेटी का नाम जुड़वाने के लिए अपने उन ससुराल वालों का रिकॉर्ड खंगालना पड़ा, जिनसे उनका बरसों से कोई रिश्ता नहीं था और जिनके साथ उनकी कड़वी यादें जुड़ी थीं. 64 साल के नवरतन झावर, जो दशकों से कोलकाता में रह रहे हैं, उन्हें सिर्फ़ इसलिए नोटिस मिला क्योंकि उन्होंने 2006 में अपने नाम की स्पेलिंग बदली थी.
हैरानी की बात यह है कि बीजेपी, जो इस अभियान की मांग करती रही है, उसके अपने विधायक भी इसकी चपेट में हैं. कृष्णगंज से बीजेपी विधायक आशीष कुमार बिस्वास, जो एक शरणार्थी परिवार से आते हैं, उन्हें भी अपनी नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ दिखाने पड़े. साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कवि जॉय गोस्वामी, जो बीमार हैं और बेड रेस्ट पर हैं, उन्हें भी आयोग ने पेश होने का नोटिस थमा दिया. लोगों का कहना है कि यह प्रक्रिया उन्हें मानसिक तनाव दे रही है और उनकी नागरिकता पर सवाल उठा रही है.
स्मार्टफोन के ‘सोर्स कोड’ पर बवाल: सरकार का इनकार, लेकिन डर बरकरार
टेक की दुनिया में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट ने हलचल मचा दी, जिसमें दावा किया गया था कि भारत सरकार स्मार्टफोन कंपनियों से उनके हैंडसेट का ‘सोर्स कोड’ मांग रही है. ‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने अब पीआईबी के ज़रिए इसे ‘फ़ेक न्यूज़’ बताते हुए खंडन किया है. सरकार का कहना है कि मोबाइल सुरक्षा के लिए इंडस्ट्री से बातचीत चल रही है, लेकिन सोर्स कोड मांगने का कोई प्रस्ताव नहीं है.
हालांकि, रॉयटर्स की रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकार 83 सुरक्षा मानकों पर काम कर रही है, जिसमें पहले से इंस्टॉल ऐप्स को हटाने और बैकग्राउंड में कैमरा/माइक के इस्तेमाल को रोकने जैसे नियम शामिल हो सकते हैं. एक्टिविस्ट्स और टेक जानकारों का कहना है कि अगर सरकार को सोर्स कोड या अपडेट्स को कंट्रोल करने की ताक़त मिल गई, तो यह ‘ओनरशिप’ यानी मालिकाना हक़ की अवधारणा को ख़त्म कर देगा और यूज़र्स की प्राइवेसी के लिए ख़तरा बन जाएगा.
विश्लेषण: प्रधानमंत्री मोदी आज अकेले क्यों पड़ गए हैं?
‘द वायर’ में संजय के. झा अपने लेख में तर्क देते हैं कि वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ने के बाद, प्रधानमंत्री मोदी को यह समझ लेना चाहिए कि असली लड़ाइयां ट्रोल आर्मी और चाटुकारों के दम पर नहीं जीती जा सकतीं.
लेखक का कहना है कि लोकतंत्र को अब सैन्य तख्तापलट से नहीं, बल्कि चालाक नेताओं, बिकाऊ अफ़सरों और डरपोक जजों के ज़रिए भीतर से खोखला किया जाता है. भारत में ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल सिर्फ़ विपक्ष को तोड़ने के लिए हो रहा है—चाहे वो हेमंत सोरेन हों या अरविंद केजरीवाल. चुनाव से ठीक पहले विपक्षी नेताओं को जेल भेजना और कांग्रेस के खाते फ्रीज़ करना, यह सब ‘समान अवसर’ को ख़त्म करता है.
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोदी अलग-थलग दिख रहे हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप भारत को टैरिफ के नाम पर धमका रहे हैं, पाकिस्तानी जनरल की तारीफ कर रहे हैं, लेकिन भारत सरकार चुप है. लेखक का मानना है कि मोदी आज अकेले इसलिए खड़े हैं क्योंकि उन्होंने देश की लोकतांत्रिक आवाज़ और विविधता को दबाकर, सिर्फ़ ‘संघ परिवार’ की आवाज़ को भारत की आवाज़ बनाने की कोशिश की है.
ममता पर FIR की मांग: ईडी पहुंची सुप्रीम कोर्ट, पुलिस पर सबूत छीनने का आरोप
बंगाल में केंद्र और राज्य के बीच टकराव अपने चरम पर है. टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के डीजीपी और कोलकाता पुलिस कमिश्नर के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने की मांग की है.
मामला आई-पैक (राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर से जुड़ी संस्था) के दफ्तर पर छापे से जुड़ा है. ईडी का गंभीर आरोप है कि जब उसके अधिकारी छापे मारने गए, तो पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें डराया-धमकाया और सबूतों वाली फाइलें व इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस उनसे छीन लिए. एजेंसी ने कहा कि ‘क़ानून के रखवाले ही गंभीर अपराध में शामिल हो गए हैं’. ममता बनर्जी का कहना है कि एजेंसी उनके चुनाव अभियान का डेटा चोरी करने आई थी.
इसरो की साल की ख़राब शुरुआत: PSLV मिशन फ़ेल, 15 सैटेलाइट नष्ट
साल 2026 के पहले ही स्पेस मिशन में इसरो को बड़ा झटका लगा है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार सुबह श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया PSLV-C62 रॉकेट अपने रास्ते से भटक गया और मिशन फेल हो गया. इसमें 15 सैटेलाइट थे, जिनमें भारत का ‘अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट’ और 8 विदेशी सैटेलाइट शामिल थे—सब नष्ट हो गए.
यह लगातार दूसरी बार है जब इसरो का सबसे भरोसेमंद माना जाने वाला PSLV रॉकेट फेल हुआ है. पिछले साल मई में भी PSLV-C61 मिशन में दिक्कत आई थी. इसरो चेयरमैन एस. सोमनाथ ने बताया कि रॉकेट के तीसरे स्टेज में कुछ गड़बड़ी आई, जिससे वो अपने तय रास्ते से भटक गया. विफलता के कारणों की जांच के लिए कमेटी बना दी गई है.
यूरोप और ब्रिटेन ने एलोन मस्क को घेरा: ‘नग्न तस्वीरें बनाना बंद करो’
एलोन मस्क का सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ और उनका एआई टूल ‘ग्रोक’ पूरी दुनिया में निंदा का शिकार हो रहा है. ‘पोलिटिको’ और ‘बीबीसी’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस टूल का इस्तेमाल करके महिलाओं और बच्चों की नग्न ‘डीपफेक’ तस्वीरें बनाई जा रही हैं. यह टूल कपड़ों वाली तस्वीरों को सेकंडों में ‘अनड्रेस’ कर देता है.
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे “अकल्पनीय व्यवहार” बताया है. उन्होंने मस्क को चेतावनी देते हुए कहा, “हम सिलिकॉन वैली के भरोसे बच्चों की सुरक्षा नहीं छोड़ सकते.” उधर ब्रिटेन की संस्था ‘ऑफकॉम’ ने भी ‘एक्स’ के ख़िलाफ़ जांच शुरू कर दी है. अगर ‘एक्स’ दोषी पाया गया तो उस पर भारी जुर्माना (दुनिया भर की कमाई का 10%) लग सकता है. दबाव में आकर ‘एक्स’ ने फ़िलहाल इस फ़ीचर को सिर्फ़ पैसे देने वाले यूज़र्स तक सीमित कर दिया है, लेकिन जांच जारी है.
जर्मनी ने भारतीय यात्रियों के लिए ट्रांजिट वीजा की अनिवार्यता खत्म की
जर्मनी ने घोषणा की है कि भारतीय नागरिकों को अब उसके अंतर्राष्ट्रीय ट्रांजिट क्षेत्रों में रुकने (ले-ओवर) के लिए एयरपोर्ट ट्रांजिट वीजा की आवश्यकता नहीं होगी. यह घोषणा सोमवार को जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की पहली भारत यात्रा के दौरान की गई. इससे पहले, भारतीयों को सुरक्षित कनेक्शन (अगली उड़ान पकड़ने) के लिए भी शेंगेन ट्रांजिट वीजा की जरूरत पड़ती थी.
“एएनआई” के मुताबिक, जर्मन चांसलर मर्ज़ के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय नागरिकों के लिए वीजा-मुक्त ट्रांजिट की घोषणा करने के लिए मर्ज़ का आभार व्यक्त किया.
खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर तीन महीने के उच्चतम स्तर पर
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) द्वारा मापी जाने वाली भारत की खुदरा मुद्रास्फीति दिसंबर में तीन महीने के उच्च स्तर 1.33% पर पहुँच गई. 0.25% के रिकॉर्ड निचले स्तर को छूने के बाद, यह नवंबर में मामूली रूप से बढ़कर 0.71% हुई थी और साल के अंत तक 1% के आंकड़े को पार कर गई.
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने कहा, “दिसंबर 2025 के दौरान हेडलाइन मुद्रास्फीति और खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि का मुख्य कारण व्यक्तिगत देखभाल के सामान, सब्जियों, मांस, मछली, अंडे, मसालों और दालों की कीमतों में उछाल है.”
हिंदू कार्यकर्ताओं का हंगामा, यूपी के शाहजहाँपुर में अंतरधार्मिक निकाह का वलीमा रुकवाया
रविवार रात उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र में “हिंदू कार्यकर्ताओं” की एक भीड़ एक अंतरधार्मिक जोड़े के वलीमा (शादी के रिसेप्शन) में जबरन घुस गई, जिसके कारण परिवार को कार्यक्रम रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा.
शाहजहाँपुर शहर के जिया खेल इलाके के निवासी और पेशे से दंत चिकित्सक डॉ. अदनान अंसारी ने पिछले साल 12 सितंबर को दिल्ली की एक अदालत में 35 वर्षीय नीलम से शादी की थी. नीलम एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत एमबीए प्रोफेशनल हैं. शादी का रिसेप्शन रविवार रात उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ से लगभग 177 किमी उत्तर-पश्चिम में स्थित शाहजहाँपुर के एक स्थानीय बैंक्वेट लॉन में आयोजित किया जा रहा था.
“पीटीआई” की रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी संख्या में “हिंदू कार्यकर्ता” कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे और वहां जमकर हंगामा किया. इस घटना का एक कथित वीडियो भी सामने आया है.
बाथरूम में कैद वह औरत: समाज और सिस्टम दोनों को कटघरे में खड़ा करती रामरती की दास्तां
हरियाणा के रिषपुर गांव की यह कहानी सिर्फ एक महिला की पीड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की निष्ठुरता और सरकारी तंत्र की विफलता का एक जीता-जागता दस्तावेज है. 12 अक्टूबर 2020 की शाम को हरियाणा की महिला संरक्षण अधिकारी रजनी गुप्ता को एक गुप्त सूचना मिली. एक अजनबी ने बताया कि नरेश नामक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को दो साल से अमानवीय परिस्थितियों में कैद कर रखा है. रोमिता सलूजा ने हिमाल पत्रिका में लम्बी खोजी रिपोर्ट लिखी है.
वो भयावह मंजर
अगली सुबह जब रजनी गुप्ता और पुलिस टीम ने नरेश के घर पर छापा मारा, तो उन्हें पहली मंजिल पर एक छोटा सा बाथरूम मिला, जो बाहर से ताले में बंद था. ताला तोड़ने पर अंदर जो दिखा, वह रूह कंपा देने वाला था. रामरती, जो कभी एक हंसमुख महिला थी, अब हड्डियों का ढांचा बन चुकी थी. उसका वजन मात्र 35 किलो रह गया था. वह 3x3 फीट के बाथरूम में अपने ही मल-मूत्र के बीच बैठी थी. उसके शरीर पर कपड़े नाममात्र थे, बाल बेतरतीब थे और वह इतनी कमजोर थी कि अपने पैरों पर खड़ी भी नहीं हो सकती थी.
नरेश ने दावा किया कि उसकी पत्नी “मानसिक रूप से बीमार” और “पागल” थी, इसलिए उसे बंद करना पड़ा. लेकिन सच्चाई यह थी कि रामरती की बीमारी को उसके परिवार और ससुराल वालों ने अपनी सुविधा के अनुसार बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था.
समाज की चुप्पी और बच्चों की बेरुखी
सबसे दुखद पहलू यह था कि पूरा गांव यह जानता था. पड़ोसियों ने रामरती की चीखें सुनी थीं, उसे पानी और रोटी मांगते सुना था, लेकिन किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया. उन्हें डर था कि नरेश से झगड़ा हो जाएगा. जब रामरती को बाहर निकाला गया, तो उसके खुद के बच्चे—जो अब किशोर थे—अपनी मां को छूने से कतरा रहे थे. रजनी गुप्ता ने बताया, “मुझे यह देखकर गुस्सा आया कि घर की भैंसें उस घर की मालकिन से ज्यादा साफ-सुथरी थीं.”
सिस्टम की नाकामी
रामरती को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां अच्छी डाइट और देखभाल से उसमें सुधार हुआ. डॉक्टरों ने पुष्टि की कि उसे कोई गंभीर मानसिक बीमारी (जैसे सिज़ोफ्रेनिया) नहीं थी, बल्कि वह कुपोषण और कैद के कारण पीटीएसडी (PTSD) का शिकार हो सकती थी.
बावजूद इसके, नरेश को गिरफ्तारी के अगले ही दिन जमानत मिल गई. हरियाणा में घरेलू हिंसा के मामलों में पुलिस अक्सर महिलाओं को “समझौता” करने और वापस उसी घर में जाने के लिए मजबूर करती है. आश्रय गृहों (Shelter homes) में केवल 5 दिन रहने की अनुमति होती है, जो ऐसे गंभीर मामलों के लिए नाकाफी है.
नतीजा यह हुआ कि बचाव के नौ महीने बाद, रामरती को वापस उसी नरक में लौटना पड़ा. नरेश आज भी अपने किए पर कोई पछतावा नहीं दिखाता और दावा करता है कि रामरती खुद बाथरूम में बैठती थी. आज भी रामरती उसी घर के बरामदे में बैठी रहती है, जहां उसका अस्तित्व सिर्फ एक “जिंदा लाश” की तरह रह गया है.
हरकारा एक्सप्लेनर
ईरान में भड़के प्रदर्शन अब सत्ता परिवर्तन की मांग में बदले, 100 से ज्यादा मौतें और इंटरनेट ब्लैकआउट
ईरान में दिसंबर 2025 के अंत में बढ़ती कीमतों और आर्थिक बदहाली को लेकर शुरू हुए प्रदर्शन अब 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से वहां के शासकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं. अल जजीरा मे सारा शमीम की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विरोध अब केवल महंगाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की लिपिकीय सत्ता को उखाड़ फेंकने के एक व्यापक आंदोलन में बदल चुका है.
आर्थिक पतन और युद्ध का प्रभाव
ईरान की अर्थव्यवस्था कई कारणों से रसातल में जा रही है:
मुद्रा का गिरना: ईरानी मुद्रा ‘रियाल’ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है. सोमवार को 1 डॉलर की कीमत 14 लाख रियाल तक पहुंच गई, जो जनवरी 2025 में 7 लाख रियाल थी.
महंगाई: खाद्य पदार्थों की कीमतें पिछले साल की तुलना में औसतन 72% बढ़ गई हैं. सरकार ने ईंधन सब्सिडी में कटौती की है और दवाओं व गेहूं को छोड़कर बाकी आयात पर रियायती दरें खत्म कर दी हैं.
युद्ध और प्रतिबंध: जून 2025 में इजराइल के साथ हुए 12-दिवसीय युद्ध ने कई ईरानी शहरों के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया. इसके अलावा, सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर उस पर आर्थिक प्रतिबंध फिर से लागू कर दिए.
बाजार से शुरू हुआ विद्रोह सड़कों तक पहुंचा
विरोध प्रदर्शन की शुरुआत 28 दिसंबर 2025 को तेहरान के ग्रैंड बाज़ार से हुई, जहां दुकानदारों ने शटर गिरा दिए. अब यह देश के अन्य प्रांतों में फैल चुका है. शुरुआत में नारे गिरती अर्थव्यवस्था पर केंद्रित थे, लेकिन अब प्रदर्शनकारी सीधे इस्लामी सरकार का विरोध कर रहे हैं. कई जगह अपदस्थ शाह (पहलवी वंश) के बेटे रज़ा पहलवी के समर्थन में भी नारे लगाए गए हैं, जो निर्वासन में रह रहे हैं.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर मरियम अलेमजादेह का कहना है कि प्रदर्शनकारियों की मांगें अब महज आर्थिक सुधारों से आगे निकल चुकी हैं. लोग दशकों से दबी हुई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवनशैली की आजादी की मांग कर रहे हैं.
दमन, मौतें और इंटरनेट बंदी
ईरान सरकार ने विरोध को कुचलने के लिए कड़ी कार्रवाई की है.
मौतें: सरकारी मीडिया का दावा है कि हाल के दिनों में 100 से अधिक सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं. वहीं, विपक्षी कार्यकर्ताओं का कहना है कि मरने वालों में सैकड़ों प्रदर्शनकारी शामिल हैं. चूंकि इंटरनेट पूरी तरह ठप है, इसलिए स्वतंत्र रूप से आंकड़ों की पुष्टि करना मुश्किल है.
इंटरनेट ब्लैकआउट: वॉचडॉग नेटब्लॉक्स के अनुसार, सोमवार को ईरान में इंटरनेट ब्लैकआउट का चौथा दिन था. हालांकि, विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने दावा किया है कि सेवाएं जल्द बहाल कर दी जाएंगी.
अमेरिका की भूमिका और धमकियां
इस उथल-पुथल के बीच भू-राजनीतिक तनाव भी बढ़ गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान ने प्रदर्शनकारियों पर हिंसक कार्रवाई जारी रखी, तो वाशिंगटन सैन्य हस्तक्षेप कर सकता है. इसके जवाब में, ईरानी विदेश मंत्री ने आरोप लगाया है कि ये प्रदर्शन विदेशी तत्वों द्वारा भड़काए गए हैं और ट्रम्प की धमकियां “आतंकवादियों” को सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए उकसा रही हैं. उन्होंने कहा, “हम युद्ध के लिए तैयार हैं, लेकिन बातचीत के लिए भी.”
भविष्य की अनिश्चितता
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रदर्शनकारियों की मांगों को संबोधित नहीं किया गया, तो स्थिति और विस्फोटक हो सकती है. प्रोफेसर अलेमजादेह के अनुसार, “शिकायतें इस बार शांत नहीं होने वाली हैं. भले ही अत्यधिक हिंसा से इसे दबा दिया जाए, लेकिन एक और विद्रोह जल्द ही उभर सकता है, जब तक कि कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव न हो.”
साक्षात्कार: ‘अगर मैं कलम नहीं उठाती, तो शायद हथियार उठा लेती’
झारखंड की मशहूर आदिवासी कवयित्री और पत्रकार जसिंता केरकेट्टा ने ‘डाउन टू अर्थ’ को दिए एक साक्षात्कार में अपने जीवन के संघर्ष और आदिवासी समाज की पीड़ा साझा की है.
प्रीथा बनर्जी से बात करते हुए जसिंता बताती हैं कि उन्होंने बचपन में सारंडा के जंगलों को उजड़ते देखा. उन्होंने देखा कि कैसे बाहर से आए लोग उनके इलाके में रसूखदार बन गए (राजा और ज़मींदार) और आदिवासी अपने ही घर में हाशिए पर चले गए. उनके चाचा की ज़मीन विवाद में लिंचिंग कर दी गई थी और परिवार को ख़त्म करने की धमकी मिली थी.
जसिंता कहती हैं, “अगर मैं कलम नहीं उठाती, तो पक्का हथियार उठा लेती. मेरे अंदर भावनाओं का तूफ़ान था. लिखने ने मुझे बचाया, मुझे पागल होने से बचाया.” उनका मानना है कि प्रकृति को बचाना और इंसानों को बचाना अलग-अलग नहीं है. जब हम प्रकृति को लूटते हैं, तो हम इंसानियत को भी लूट रहे होते हैं. वो कहती हैं कि आदिवासी ही हैं जो कभी देश छोड़कर नहीं भागेंगे और अपनी ज़मीन के लिए लड़ते रहेंगे.
तो कुमार शानू के फैन मुझे मार डालेंगे
मध्यप्रदेश के पत्रकार काशिफ काकवी ने अपने ट्विटर हैंडल पर एक अजीब मामला उद्धृत किया है. उनके मुताबिक,
“आपने सुना होगा, लोग क़र्ज़, इश्क़ या ग़रीबी के मारे आत्महत्या करते हैं पर यह वज़ह कभी नहीं सुनी होगी. जबलपुर में एक 30 साल के व्यक्ति ने एक दिन में दो बार सुसाइड करने की कोशिश की. वह बॉलीवुड प्लेबैक सिंगर कुमार शानू का फैन था और सालों से सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं के गाने सुनता था. लेकिन कुछ वक्त से उसने दूसरे सिंगर को सुनना या रील में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. उसे इस बात का डर था कि कुमान शानू के फैन इस “दग़ाबाज़ी” और “धोखेबाजी” के लिए उसे मार डालेंगे. इस ख़ौफ़ में उसने पहले ट्रेन के टॉयलेट में अपने गर्दन पर छुरी चलाई. उस से पहले वह स्टेशन पर उतर कर ट्रेन के सामने कूदने की कोशिश की. और जब उसे हॉस्पिटल ले जाया गया तो उसने पहले माले से कूद कर जाने देने की कोशिश की. वह मूलतः छपरा बिहार का रहने वाला हैं. और नागपुर से छपरा घर जा रहा था. यह कौन लोग हैं?”
अपील :
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