12/02/2026: ट्रंप मोदी के लिए सिरदर्द? | डील के खिलाफ़ भारत बंद | देश का बदलता नैरेटिव | बांग्लादेश चुनाव | दीपक की बढ़ती लौ | 114 राफेल और खरीदेंगे | इमरान की नज़र | क्लासिकल अरिजीत
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
भारत-अमेरिका ट्रेड डील: न्यूयॉर्क टाइम्स का दावा, पीएम मोदी के लिए ‘सिरदर्द’ बनी ट्रंप की शर्तें.
किसानों का विरोध: अमेरिकी आयात के डर से भारत बंद, 30 करोड़ लोगों के शामिल होने का दावा.
राफेल डील: 114 राफेल जेट खरीदने को मंजूरी, 90 का निर्माण भारत में होगा.
संजय बारू का तंज: कहा- यह चाणक्य नीति नहीं, अमेरिका के सामने समर्पण है.
बांग्लादेश चुनाव: शेख हसीना के विरोध के बावजूद भारी मतदान, बीएनपी और जमात में टक्कर.
मोहम्मद दीपक: उत्तराखंड में नफरत को हराने वाले दीपक की मदद के लिए सुप्रीम कोर्ट के वकील आगे आए.
राहुल गांधी: बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल की सदस्यता रद्द करने का प्रस्ताव दिया.
इमरान खान: जेल में बंद पूर्व पाक पीएम की आंखों की रोशनी सिर्फ 15% बची.
कर्नाटक UAPA रिपोर्ट: 84% आरोपी मुसलमान, सबूतों के अभाव में बरी होने वालों की तादाद ज्यादा.
अरिजीत सिंह: प्लेबैक सिंगिंग छोड़ने के बाद क्लासिकल अवतार में वापसी, अनुष्का शंकर के साथ किया परफॉर्म.
भारत अमेरिका ट्रेड डील
मोदी के लिए ‘बड़ा सिरदर्द’: न्यूयॉर्क टाइम्स
“द न्यूयॉर्क टाइम्स” में एलेक्स ट्रेवेली ने लिखा है कि भारत के अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए “बड़ा सिरदर्द” बन गई है. ट्रेवेली के अनुसार, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 3 फरवरी को एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह घोषणा की कि संयुक्त राज्य अमेरिका भारत से निर्यात होने वाली अधिकांश वस्तुओं पर लगाए गए 50% के असाधारण टैरिफ (शुल्क) को तत्काल समाप्त कर रहा है, तो भारतीय व्यापारिक जगत ने राहत की सांस ली.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पोस्ट के साथ जवाब दिया: “इस शानदार घोषणा के लिए भारत के 1.4 अरब लोगों की ओर से राष्ट्रपति ट्रंप को बहुत-बहुत धन्यवाद.”
लेकिन इस सप्ताह व्हाइट हाउस की ओर से की गई अगली घोषणाओं ने उस सौदे को मोदी के लिए एक ‘क्लस्टर हेडेक’ (गंभीर सिरदर्द) में बदल दिया. उन्होंने मुख्य टैरिफ को घटाकर 18% करने में सफलता पाई, जो अब एशिया में भारत के मुख्य प्रतिस्पर्धियों के बराबर है. लेकिन, इसके बदले में व्यापार और विदेश नीति के मोर्चे पर “भारत द्वारा चुकाई जाने वाली संभावित लागत कई गुना बढ़ती हुई दिखाई दे रही है.”
पांच वर्षों के भीतर 500 अरब डॉलर मूल्य का अमेरिकी सामान खरीदने की प्रतिबद्धता, जिसका प्रभावी अर्थ भारत के आयात को दोगुना करना है, ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
भारतीय किसान, इस डर से कि अमेरिकी आयात उनकी आजीविका को नुकसान पहुँचाएगा, इस समझौते पर हस्ताक्षर न करने की मांग को लेकर गुरुवार को हड़ताल पर जा रहे हैं. मोदी के संसदीय विपक्ष ने इसे “थोक के भाव आत्मसमर्पण” करार देते हुए हंगामा किया है. उनका कहना है कि सौदे की शर्तें भारत के राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता करती हैं, महत्वपूर्ण बाजारों को अनुचित प्रतिस्पर्धा के लिए खोलती हैं और डिजिटल व्यापार नियमों पर से नियंत्रण छोड़ती हैं. मोदी के कैबिनेट मंत्रियों ने इन नई शर्तों के बारे में बुनियादी सवालों के जवाब देने से इनकार कर दिया है.
दोनों नेताओं के सोशल मीडिया पोस्ट के बाद शुरुआती कुछ दिनों में उत्साह का माहौल था. उन्होंने उस गतिरोध को तोड़ दिया था जो पिछले साल गर्मियों में शुरू हुआ था, जब ट्रंप ने भारत पर 25% टैरिफ लगाया था और फिर रूस से तेल खरीदने की सजा के रूप में इसे दोगुना कर दिया था.
नया सौदा घोषित होने के बाद भारत के शेयर बाजार में 3% की उछाल आई और डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में कुछ सुधार हुआ. भारत की बड़ी कंपनियों के बयानों की तरह ही, महिंद्रा ग्रुप के प्रबंध निदेशक अनीश शाह ने लिखा कि “यह सौदा भारत की विकास महत्वाकांक्षाओं को सार्थक गति प्रदान करता है.”
पिछले शुक्रवार को, अमेरिकी वार्ताकारों और उनके भारतीय समकक्षों ने एक संयुक्त बयान जारी कर एक अंतरिम समझौते की पुष्टि की. भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि दोनों देश मार्च में किसी समय व्यापार सौदे पर मुहर लगा देंगे.
हालांकि, भारत के लिए परिदृश्य तब धुंधला होने लगा जब भारतीय और अमेरिकी बयानों के बीच विसंगतियां सामने आईं. सोमवार को व्हाइट हाउस ने एक ‘फैक्ट शीट’ जारी की, जिसने नई दिल्ली में हड़कंप मचा दिया.
महज तीन दिनों के अंतराल पर आए इन दोनों दस्तावेजों में सबसे बड़ा अंतर यह था कि उनमें रूस से भारत की तेल खरीद के बारे में क्या कहा गया और क्या नहीं. संयुक्त बयान में रूस का कोई उल्लेख नहीं था और न ही इसमें भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद करने के बारे में कुछ कहा गया था. इसके सबसे करीब की बात “आर्थिक सुरक्षा संरेखण” का वादा थी, और यह कि उन 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामानों में ऊर्जा उत्पाद भी शामिल होंगे, जिन्हें भारत ने अगले पांच वर्षों में खरीदने का संकल्प लिया है.
लेकिन व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट ने इसे बिल्कुल स्पष्ट कर दिया. इसमें कहा गया कि दंडात्मक टैरिफ को “रूसी संघ के तेल की खरीद बंद करने की भारत की प्रतिबद्धता की मान्यता में” हटाया गया है. गोयल और मोदी के विदेश एवं तेल मंत्रियों ने इस बारे में सवालों को टाल दिया.
2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद से भारत ने तटस्थता बनाए रखने की कोशिश की है. रूस के साथ भारत के घनिष्ठ रक्षा संबंध हैं और सैन्य गठबंधनों से बचने की उसकी एक गौरवशाली परंपरा रही है.
सिर्फ तेल खरीद की भाषा ने ही भारतीयों को परेशान नहीं किया है. संयुक्त बयान में कहा गया था कि भारत संयुक्त राज्य अमेरिका से आने वाले कृषि उत्पादों पर अपना टैरिफ कम करेगा, जिसमें “ताजे और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल” और कई अन्य श्रेणियां शामिल थीं. लेकिन व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट ने फलों और सोयाबीन तेल के बीच सूची में एक वाक्यांश और जोड़ दिया: “कुछ दालें”. भारत में इन दो अतिरिक्त शब्दों के बड़े मायने हैं: ये फलियों के सूखे बीजों को संदर्भित करते हैं, जो दाल का आधार हैं और राष्ट्रीय आहार में प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं.
ठीक दो दिन पहले, भारत के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दालों में आत्मनिर्भरता की एक नई नीति की घोषणा की थी. चौहान ने घोषणा की थी, “विदेशों से दालें आयात करना खुशी की बात नहीं, बल्कि शर्म की बात है.” उसी कार्यक्रम में, उन्होंने व्यापारिक समझौते का बचाव करते हुए इसे भारतीय किसानों की रक्षा करने वाला बताया था.
बुधवार को, व्हाइट हाउस की वेबसाइट पर मौजूद फैक्ट शीट को बदल दिया गया: “कुछ दालें” वहां से गायब हो गया. इसके अलावा कुछ और संपादन भी किए गए. पहले दस्तावेज़ में कहा गया था कि भारत ने 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने के लिए “प्रतिबद्धता” जताई है, और अब इसमें कहा गया है कि भारत ऐसा करने का “इरादा” रखता है.
व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहा कि “राष्ट्रपति ट्रंप का भारत के साथ ऐतिहासिक व्यापार समझौता अमेरिकी किसानों, श्रमिकों और उद्योगों के लिए एक स्पष्ट जीत है,” और “हम उम्मीद करते हैं कि सभी व्यापारिक भागीदार अपनी समझौते की प्रतिबद्धताओं को बनाए रखेंगे.”
किसान संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ पहले से ही इस व्यापारिक समझौते से नाखुश था. इसी समूह के सदस्यों ने 2020 में कृषि व्यवस्था को बदलने की प्रधानमंत्री की योजना को रोकने के लिए नई दिल्ली तक मार्च किया था. किसान समूह ने इस व्यापार सौदे को भारत द्वारा “पूर्ण समर्पण” करार दिया और मोदी के वाणिज्य मंत्री को “देशद्रोही” बताते हुए उनके इस्तीफे की मांग की.
व्यापक स्तर पर, किसानों की तरह ही कुछ व्यावसायिक हितों को डर है कि मोदी और ट्रंप के बीच यह सौदा भारतीय उत्पादकों को विनाशकारी प्रतिस्पर्धा के सामने ला खड़ा करेगा. साथ ही, कुछ पूर्व अधिकारियों सहित आर्थिक नीति विशेषज्ञ भी यह शिकायत कर रहे हैं कि भारत अपनी स्वायत्तता का बहुत अधिक त्याग कर रहा है.
नई दिल्ली में एक स्वतंत्र थिंक टैंक का नेतृत्व करने वाले भारत के पूर्व व्यापार अधिकारी अजय श्रीवास्तव ने एक ज्ञापन में लिखा कि इस व्यापारिक समझौते ने रूस और संभवतः अन्य मुद्दों पर भारत के हितों को वाशिंगटन के साथ जोड़कर उसकी विदेश नीति की स्वतंत्रता का बलिदान कर दिया है. उन्होंने लिखा कि भारत के लिए, “अपनी आर्थिक और सुरक्षा नीतियों को किसी एक देश के साथ बहुत गहराई से जोड़ना बड़े जोखिम पैदा करता है.”
कपड़ा और परिधान निर्माताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले ‘कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल’ ने टैरिफ में कमी की खबर का दोनों नेताओं के प्रति “सच्ची कृतज्ञता” के साथ स्वागत किया था. फिर मंगलवार को, ट्रंप प्रशासन ने बांग्लादेश के साथ एक समझौता किया जो उसके परिधान उद्योग को भारत पर बढ़त दिला सकता है. कॉन्फेडरेशन के अध्यक्ष अश्विन चंद्रन ने लिखा कि इन दोनों समझौतों ने “भारत के कपड़ा और परिधान निर्यातकों के लिए एक नई चुनौती पेश की है.”
चीन और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों से भारतीय उत्पादकों को मिलने वाली चुनौतियों को देखते हुए, चंद्रन अब बांग्लादेश और अपने देश के साथ अमेरिकियों के समझौते पर “स्पष्टता की प्रतीक्षा” में असहज महसूस कर रहे हैं.
मैं मोदी का राजनीतिक करियर बरबाद नहीं करना चाहता, ट्रंप का ये वीडियो सरकार ने नहीं देखा
विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि उसने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में उस टिप्पणी का कोई वीडियो नहीं देखा है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि वह “मोदी का राजनीतिक करियर बर्बाद नहीं करना चाहते.”
‘द टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक एक मीडिया प्रश्न का उत्तर देते हुए, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “मैंने वीडियो नहीं देखा है... हालांकि, अगर ऐसा कोई वीडियो मौजूद है, चाहे वह सच हो या झूठ, हम उस पर उचित कार्रवाई करेंगे.”
यह विवादित टिप्पणी अक्टूबर में व्हाइट हाउस में पत्रकारों के साथ एक बातचीत की है, जब ट्रंप मोदी के साथ अपनी बातचीत के बारे में एक सवाल का जवाब दे रहे थे. अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था, “मोदी एक महान व्यक्ति हैं. वह ट्रंप को प्यार करते हैं.” उन्होंने तुरंत आगे जोड़ा, “मैं नहीं चाहता कि आप ‘प्यार’ शब्द को किसी और अर्थ में लें. मैं उनका राजनीतिक करियर बर्बाद नहीं करना चाहता.”
यह स्पष्टीकरण तब आया जब ट्रंप ‘प्यार’ शब्द की किसी भी वैकल्पिक व्याख्या के विरुद्ध चेतावनी देते नजर आए. उसी बातचीत में, उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा की, उन्हें अपना मित्र बताया और कहा कि भारत एक अविश्वसनीय देश है.
केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की जेफ्री एपस्टीन के साथ मुलाकात के संबंध में की गई टिप्पणियों पर जायसवाल ने कहा, “इस मामले में हमने लिखित और मौखिक दोनों स्पष्टीकरण जारी किए हैं.”
अमेरिका के संबंध में जायसवाल ने कहा कि भारत और अमेरिका 7 फरवरी को एक संयुक्त बयान पर सहमत हुए थे, जिसमें एक अंतरिम पारस्परिक व्यापार समझौते के ढांचे की रूपरेखा दी गई है. बांग्लादेश द्वारा भारत को चुनाव पर्यवेक्षक भेजने के निमंत्रण पर उन्होंने कहा, “हमें पर्यवेक्षक भेजने का निमंत्रण मिला था. हालांकि, हमने चुनावों की निगरानी के लिए बांग्लादेश में कोई पर्यवेक्षक नहीं भेजा है.”
ईरान में हिरासत में लिए गए भारतीय नाविकों के संबंध में उन्होंने पुष्टि की कि 16 नाविकों को कांसुलर एक्सेस (राजनयिक पहुंच) दी गई थी, जिनमें से 8 भारत लौट आए हैं, जबकि शेष आठ को वापस लाने के प्रयास जारी हैं.
संजय बारू : कई अनुत्तरित सवाल, मोदी को साफ करना होगा कि भारत कहाँ खड़ा है
राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े मामलों में, किसी भी सरकार के लिए सिर्फ़ सही काम करना ही काफ़ी नहीं होता, बल्कि उसे सही काम करते हुए ‘दिखना’ भी चाहिए. केवल दावों और गोलमोल संदेशों से काम नहीं चलता. चूंकि संसद का सत्र चल रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोकसभा में एक विस्तृत बयान देना चाहिए था, बजाय इसके कि वाणिज्य और विदेश मंत्री एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी टालते नज़र आएं. अंतरराष्ट्रीय संबंधों, चाहे वे आर्थिक हों या राजनीतिक, की अंतिम जवाबदेही प्रधानमंत्री की ही होती है. पत्रकार संजय बारू ने इंडियन एक्सप्रेस में मोदी सरकार के लिए तल्ख टिप्पणी की हैै.
मनमोहन सिंह बनाम मोदी: पारदर्शिता का अंतर
जुलाई 2005 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह वाशिंगटन डी.सी. से लौटे थे, तो उन्होंने संसद को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के साथ अपनी बातचीत का पूरा ब्यौरा दिया था. भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के मूल मुद्दे ‘ऊर्जा सुरक्षा’ पर उन्होंने संसद में साफ़ कहा था: “भारत की ऊर्जा सुरक्षा की खोज हमारे विकास के विज़न का एक अनिवार्य हिस्सा है... मैंने स्पष्ट किया कि हमें परमाणु ऊर्जा सहित ऊर्जा के सभी स्रोतों तक निर्बाध पहुँच की आवश्यकता है.”
तीन साल तक संसद ने उस डील के हर पहलू पर बारीकी से चर्चा की. उस पारदर्शिता ने ही मनमोहन सिंह को भारतीय मतदाताओं का भरोसा दिलाया था.
क्या यह ‘चाणक्य नीति’ है या समर्पण?
यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ अंतिम समझौते पर स्थिति को स्पष्ट करने के बजाय उसे धुंधला कर दिया है. पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (जो अब दोबारा सत्ता में हैं) ने दावा किया है कि इस डील के साथ ‘रूसी तेल’ न खरीदने की शर्त जुड़ी है. भारत ने इसे न तो पूरी तरह नकारा है और न ही स्वीकार किया है. विदेश सचिव विक्रम मिश्री ने एक कूटनीतिक बयान देकर पल्ला झाड़ लिया. कुछ लोग इसे ट्रम्प की ‘काउबॉय’ शैली के सामने भारत की ‘चाणक्य नीति’ या चतुराई बता रहे हैं. लेकिन संजय बारू के अनुसार, यह चालाकी नहीं बल्कि “चाणक्य नीति के भेष में किया गया समर्पण और छल” है.
सरकार इस ट्रेड डील को एक बड़ी उपलब्धि बताकर जश्न मना रही है, जबकि ईमानदारी से यह स्वीकार करना चाहिए था कि निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों में आजीविका बचाने के लिए, मौजूदा हालात में यह सबसे बेहतर विकल्प था जो हम कर सकते थे. जब भारत आरसीईपी से बाहर हुआ था, तो ‘राष्ट्रीय हित’ की दुहाई दी गई थी. लेकिन सच यह था कि सरकार उन सेक्टर्स को वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बचाना चाहती थी. वही प्रेरणा ट्रम्प के साथ इस डील में भी दिखती है. फर्क बस इतना है कि पाकिस्तान के साथ व्यापार बंद करते समय पंजाब के किसानों और छोटे व्यापारियों की आजीविका का ध्यान नहीं रखा गया, लेकिन सूरत के व्यापारियों और कोरोमंडल तट के झींगा किसानों का रसूख शायद ज़्यादा है.
ट्रम्प ने दिखाया आईना
यह ट्रेड डील भारत पर किया गया कोई अहसान नहीं है. यह वह ‘कीमत’ है जो भारत ने अमेरिका को अपने पक्ष में रखने के लिए चुकाई है. और पूरी दुनिया इस डील को इसी नज़रिए से देखेगी. यह पहली बार नहीं है जब भारत को बड़ी ताकतों के दबाव में झुकना पड़ा है, लेकिन यह पहली बार है जब इस ‘झुकने’ को एक महान उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है.
ट्रम्प ने भारत को एक ‘रियलिटी चेक’ दिया है. भारतीय नेतृत्व का मज़ाक उड़ाने और “मैं उनका (मोदी का) राजनीतिक करियर ख़त्म नहीं करना चाहता” जैसी धमकियां देने के बाद, ट्रम्प ने जानबूझकर इस डील को भारतीय समर्पण के रूप में पेश किया है—यह साफ़ करके कि इसका लिंक रूसी तेल की खरीद बंद करने से है.
अतीत में, जब भारत ने अमेरिकी यहूदी लॉबी को खुश करने के लिए ईरान से तेल आयात कम किया था, तो वह एक स्वैच्छिक और अस्थायी कदम था जिसके बदले में हमें ‘परमाणु हथियार संपन्न देश’ की मान्यता मिली थी. लेकिन आज इस डील की उम्र को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है.
भविष्य के ख़तरे
क्या विभिन्न मोर्चों पर अमेरिका को भारत का समर्थन अब रोज़ाना की बुनियाद पर परखा जाएगा? अगर खाड़ी देशों में युद्ध छिड़ जाता है और वहां से तेल की आपूर्ति बाधित होती है, तो क्या भारत को रूसी तेल खरीदने पर भी दंडित किया जाएगा?
इस डील को लेकर अभी भी बहुत से सवाल हैं और सरकार ने समझदारी दिखाते हुए इसे ‘अंतरिम समझौते का ढांचा’ कहा है. बेहतर होगा कि प्रधानमंत्री सामने आएं और अपनी ‘चाणक्य’ छवि का नाटक करने के बजाय साफ़ बताएं कि अमेरिका और ब्रिक्स देशों के बीच भारत की आर्थिक नीतियां असल में कहाँ खड़ी हैं.
एपस्टीन फाइल्स, जनरल नरवणे की किताब और अमेरिका के साथ ‘कमजोर’ डील: मोदी सरकार के खिलाफ बदला नैरेटिव
एक ऐसी सरकार के लिए जो राजनीतिक नैरेटिव (विमर्श) को नियंत्रित करने के लिए जानी जाती है, पिछले चार हफ्ते विनाशकारी साबित हुए हैं. द वायर में अजय आशीर्वाद महाप्रशस्त के विश्लेषण के अनुसार, नरेंद्र मोदी सरकार को ऐसे आरोपों और दावों का सामना करना पड़ा है जिन्होंने सत्ताधारी प्रतिष्ठान को कमजोर और असुरक्षित दिखाया है. यह उस ‘मस्कुलर-राष्ट्रवादी’ छवि पर चोट है जिसे भाजपा ने बहुत सावधानी से बनाया था.
नुकसान की शुरुआत तब हुई जब ‘एपस्टीन फाइल्स’ ने यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन के साथ मोदी सरकार के मंत्रियों के कथित संपर्कों को उजागर किया. दस्तावेजों में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के साथ एपस्टीन के ईमेल का आदान-प्रदान सामने आया. हालांकि पुरी ने इसे संस्थागत बातचीत बताया. लेकिन स्थिति तब और बिगड़ गई जब एपस्टीन के एक कथित ईमेल में दावा किया गया कि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रम्प को खुश करने के लिए उनसे सलाह ली थी. विपक्ष ने इसे “राष्ट्रीय शर्म” बताया, जबकि सरकार ने इसे “बकवास” कहकर खारिज कर दिया. लेकिन हरदीप पुरी का बाद में यह स्वीकार करना कि वे एपस्टीन से मिले थे, सरकार पर दबाव बना गया.
यह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे के संस्मरण (किताब) के अंश सामने आ गए. नरवणे ने दावा किया कि गलवान 2020 झड़प के दौरान उन्हें सरकार से समय पर निर्देश नहीं मिले थे. अंततः उन्हें कहा गया, “जो उचित समझो, वो करो.” सरकार ने संसद में राहुल गांधी को इस पर बोलने से रोकने की कोशिश की और किताब के प्रकाशन को रोक दिया गया, यहां तक कि पुलिस ने किताब के “अवैध प्रसार” पर एफआईआर भी दर्ज की.
इसके बाद, अमेरिका के साथ व्यापार सौदे की घोषणा ने सरकार को असहज कर दिया. ट्रम्प ने भारत सरकार से पहले ही सौदे का ऐलान कर दिया. शर्तों को लेकर भ्रम की स्थिति ऐसी रही कि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर सवालों को एक-दूसरे पर टालते (ping-pong) नज़र आए. विपक्ष का आरोप है कि यह सौदा भारत के किसानों और छोटे व्यवसायों के लिए नुकसानदेह है और भारत ने अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेक दिए हैं.
विश्लेषण के अनुसार, सरकार की परेशानी तब और बढ़ गई जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि “अच्छे दिन भाजपा की वजह से नहीं, बल्कि हमारी मेहनत से आए हैं.” इन घटनाओं ने प्रधानमंत्री मोदी की ‘विश्वगुरु’ वाली छवि को धूमिल किया है और विपक्ष को यह कहने का मौका दिया है कि सरकार बड़ी ताकतों के सामने कमजोर साबित हुई है.
राष्ट्रव्यापी हड़ताल में भारी भागीदारी, यूनियनों का दावा- 30 करोड़ लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए
हड़ताल बुलाने वाली यूनियनों के अनुसार, गुरुवार की राष्ट्रव्यापी हड़ताल “अत्यधिक सफल” रही, जिसमें विभिन्न उद्योगों के लगभग 30 करोड़ लोगों ने भाग लिया. हालांकि, श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने संसद में कहा कि इस बंद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जनता का समर्थन प्रदर्शित किया है.
अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) की महासचिव अमरजीत कौर ने ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, “प्रतिक्रिया बहुत अच्छी रही है, जो उम्मीद से कहीं अधिक थी. केरल, तमिलनाडु, असम, ओडिशा, पुडुचेरी, पश्चिम बंगाल और पंजाब में पूर्ण बंद रहा.”
अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष राजन क्षीरसागर ने कहा, “देश भर के एक करोड़ से अधिक किसानों ने इसमें भाग लिया. अमेरिका के साथ व्यापार समझौता किसानों के लिए विनाशकारी होगा. कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के वे किसान जो सेब और अखरोट व बादाम जैसे मेवे उगाते हैं, उन्हें भारी नुकसान होगा. अमेरिका के किसानों से आने वाले उत्पादों पर आयात शुल्क घटाकर शून्य कर दिया गया है, जिन्हें वहां भारी सब्सिडी मिलती है. घरेलू उपज की तुलना में इन आयातित वस्तुओं को खरीदना सस्ता हो जाएगा. साथ ही, कपास, खाद्य तेल (सोया उत्पाद) और पशु आहार पर निर्यात शुल्क 18 प्रतिशत तय किया गया है, जो निर्यातकों की कमर तोड़ देगा.”
बैंक कर्मचारी भी हड़ताल में शामिल हुए
अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ के महासचिव वेंकटचलम ने कहा, “बैंक कर्मचारियों की ओर से मजबूत भागीदारी रही. 12 सरकारी बैंकों और कई निजी बैंकों के कर्मचारी इसमें शामिल हुए. हालांकि प्रबंधक उपस्थित थे, लेकिन कर्मचारियों की अनुपस्थिति के कारण चेक क्लीयरेंस सहित अन्य लेनदेन नहीं हो सके. हम हड़ताल इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि नई श्रम संहिताएं यूनियन बनाने की प्रक्रिया को प्रभावित करेंगी. साथ ही, स्थायी नौकरियों को निश्चित अवधि के पदों में बदलने से युवा कर्मचारियों को नुकसान होगा. अगर उन्हें चार या पांच साल बाद सेवा से हटा दिया गया, तो वे क्या करेंगे?”
जिम मेंबरशिप गिरी, अब ‘मोहम्मद’ दीपक की मदद को आगे आए सुप्रीम कोर्ट वकील
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद, जिसने हल्क जिम की मेंबरशिप 150 से घटकर 15 होने की खबर दी थी, अब एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है. 26 जनवरी को 38 वर्षीय दीपक ने पार्किंसंस बीमारी से पीड़ित एक 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार को परेशान कर रही भीड़ का सामना किया था. भीड़ दुकानदार से अपनी दुकान के नाम से “बाबा” शब्द हटाने के लिए कह रही थी. जब भीड़ ने दीपक से उनका नाम पूछा, तो उन्होंने अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया. इस घटना का वीडियो वायरल हो गया, जिसके बाद दीपक चर्चा में आ गए, लेकिन उन्हें धमकियां भी मिलने लगीं. 31 जनवरी को बजरंग दल के कई सदस्यों ने दीपक को घेरने की कोशिश की, जिन्हें पुलिस ने रोका.
एक हफ्ते बाद, शहर दो हिस्सों में बंट गया है—एक जो उनका समर्थन कर रहा है और दूसरा जो उनके काम से नाराज़ है. दीपक ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया था, “आधा शहर मेरा समर्थन करता है, लेकिन अच्छे काम के लिए लोग ताली नहीं बजाते. ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ती है.” जिम मेंबरशिप में भारी गिरावट के कारण दीपक के लिए 40,000 रुपये का मासिक किराया और घर के लिए लिया गया लोन चुकाना मुश्किल हो गया था.
खबर प्रकाशित होने के बाद, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने मदद का हाथ बढ़ाया है. उन्होंने 10,000 रुपये प्रति व्यक्ति का योगदान देकर एक साल की मेंबरशिप फीस जमा की है. वकीलों ने बताया कि वे सीपीआई (एम) सांसद जॉन ब्रिटास के कदम से प्रेरित थे, जिन्होंने जिम का दौरा कर मेंबरशिप खरीदी थी.
इस मुहीम का नेतृत्व करने वाले वकील ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि उन्होंने दीपक से बात की, लेकिन दीपक ने खैरात या पैसे लेने से इनकार कर दिया. इसके बाद वकीलों ने एक वैकल्पिक रास्ता निकाला. उन्होंने बिरादरी के लोगों को जुटाया और तय किया कि वे उन स्थानीय युवाओं की वार्षिक मेंबरशिप फंड करेंगे जो फीस वहन नहीं कर सकते. जिम जाने वाले को जारी किए गए कार्ड पर उस योगदानकर्ता (वकील) का नाम होगा जिसने फीस दी है. दीपक इस पर सहमत हो गए हैं और रसीदें जारी करना शुरू कर दिया है.
इसके अलावा, वकीलों के समूह ने दीपक को मुफ्त कानूनी सहायता देने का भी वादा किया है. एक वकील ने कहा, “अब 20 से अधिक वकील इस पहल में शामिल हो गए हैं, यह सुनिश्चित करने के लिए कि 26 जनवरी को सांप्रदायिक सद्भाव के लिए लिए गए उनके स्टैंड के किसी भी कानूनी परिणाम को चुनौती देने के लिए दीपक के पास सबसे अच्छा प्रो बोनो (मुफ्त) प्रतिनिधित्व हो.” अभिनेता स्वरा भास्कर और लेखक हर्ष मंदर ने भी मदद का प्रस्ताव रखा है.
वहीं दूसरी ओर, हिंदू रक्षा दल के नेता पिंकी चौधरी ने कई वीडियो पोस्ट कर दीपक को धमकियां दी हैं. चौधरी ने कहा, “उत्तराखंड सरकार ने हमें वहां जाने से रोक दिया है, लेकिन मेरे अनुयायी वहां जा रहे हैं... हम उसे ठीक कर देंगे.” इस धमकी के बाद पौड़ी गढ़वाल पुलिस ने सुरक्षा बढ़ा दी है और शहर में प्रवेश करने वाले सभी वाहनों की चेकिंग की जा रही है.
दुष्यंत अरोड़ा : उत्तराखंड के दीपक, बजरंग दल और भारत के ‘दूसरे बंटवारे’ को रोकने की लड़ाई
आर्टीकल 14 में वकील और टीकाकार दुष्यंत अरोड़ा ने कोटद्वार विवाद पर यह टिप्पणी लिखी है. उसके प्रमुख अंश.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का इकोसिस्टम भारत के विभाजन को लेकर एक बहुत ही सरल लेकिन खतरनाक कहानी बड़े पैमाने पर गढ़ता है: कि भारत से नफरत करने वाले “दुष्ट मुसलमानों” ने इसे तोड़ा और इस प्रक्रिया में लाखों हिंदुओं को मारा. यह काल्पनिक कथा एक ही झटके में ब्रिटिश साम्राज्य और हिंदू महासभा को उनकी भूमिका से बरी कर देती है. लॉर्ड कर्जन ने साफ़ लिखा था, “बंगाल एक होकर एक शक्ति है; विभाजित होकर यह अलग-अलग दिशाओं में खिंचेगा.” सच यह है कि भारत को ‘सांप्रदायिकता’ ने तोड़ा था—जिसे हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग और अंग्रेजों ने मिलकर भड़काया था. उत्तर भारत और पाकिस्तान में इसे एक ही शब्द से जाना जाता है: ‘बंटवारा’.
दूसरा बंटवारा
साल 2024 में, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों ने रेहड़ी-पटरी वालों को अपने नाम प्रदर्शित करने का आदेश दिया. इसका उद्देश्य साफ़ था—मुस्लिम विक्रेताओं की पहचान करना ताकि हिंदू उनसे सामान न खरीदें. गनीमत रही कि सुप्रीम कोर्ट ने इन आदेशों पर रोक लगा दी.
लेकिन बजरंग दल और हिंदू महासभा के राजनीतिक वारिस अब इसे अनौपचारिक रूप से लागू कर रहे हैं. इस साल गणतंत्र दिवस पर उत्तराखंड में, बजरंग दल के सदस्यों ने 70 वर्षीय दुकानदार वकील अहमद को घेरा. उनकी दुकान का नाम ‘बाबा स्कूल ड्रेस’ था. भीड़ ने मांग की कि वह ‘बाबा’ शब्द हटाएं. शब्द की व्युत्पत्ति या धर्मों के बीच इसका साझा उपयोग उनके लिए मायने नहीं रखता.
इस कवायद का मकसद दोतरफा है: आर्थिक बहिष्कार और अपमानित करने की पीड़ा देना. यह बिना कहे दिया गया संदेश है कि “भले ही कानून तुम्हें नहीं रोकता, लेकिन यहाँ तुम्हारे कोई अधिकार नहीं हैं.” इसका अंतर्निहित संदेश वही है जो जिन्ना, सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक साथ लाता था—”पाकिस्तान जाओ.” यही वह आग थी जिसने भारत का पहला बंटवारा कराया.
वीडियो: ‘धर्म’ का नया प्रमाण पत्र
एक समय था जब अपराध का वीडियो सबूत होता था, जिसे अपराधी नष्ट कर देते थे. अगर राज्य को पता चलता तो सज़ा मिलती. अब ऐसा नहीं है. अब नफरत भरे अपराध का वीडियो बनाना ‘धार्मिकता’ का प्रमाण है. यह समाज और सत्ता को संदेश है—”मुझे बचाओ और मेरा समर्थन करो.” हत्या तक के वीडियो बनाकर इंटरनेट पर डाले जाते हैं क्योंकि अपराधी जानते हैं कि इससे उन्हें सज़ा नहीं, बल्कि ‘सोशल कैपिटल’, वाहवाही और शायद राजनीति में करियर मिलेगा. गिग-इकोनमी और डिलीवरी जॉब्स में फंसे युवाओं के लिए यह एक ऐसा प्रलोभन है जिसे छोड़ना मुश्किल है.
“पहले बता तेरा नाम क्या है”
वकील अहमद की दुकान पर जब एक राहगीर ने भीड़ का विरोध किया, तो भीड़ ने अपना सबसे बड़ा हथियार निकाला. उन्होंने पूछा—”पहले बता तेरा नाम क्या है?”
इस सवाल में शक्ति संतुलन तय करने की कोशिश है. सवाल पूछने वाला जानता है कि अगर जवाब “अब्दुल खान” हुआ, तो उसका भविष्य तय है—भीड़ बिना डर के उस पर टूट पड़ेगी. अगर जवाब “गोविंद मिश्रा” हुआ, तो भीड़ भ्रमित होगी और समझाने की कोशिश करेगी. यह प्रतिक्रिया सिर्फ़ भीड़ की नहीं, बल्कि राज्य के समर्थन और सामाजिक स्वीकृति की भी कहानी कहती है. हमने देखा है कि जब कोई हिंदू “गलती से” लिंचिंग का शिकार हो जाता है, तो हत्यारे यह कहकर अफ़सोस जताते हैं कि “हमें लगा वह मुस्लिम है”—यानी मुस्लिम होने पर हिंसा करना उनके नैतिक तर्क में जायज़ है.
दीपक, जो एक रोशनी है
इस अंधेरे सवाल के बीच दीपक का जवाब असाधारण है. जब भीड़ ने उससे पूछा, तो उसने कहा—”मेरा नाम मोहम्मद दीपक है.”
यह जवाब सुनते ही पूछने वाला स्तब्ध रह गया और उसे दोहराना पड़ा, “मोहम्मद दीपक है आपका नाम?”
यह जवाब असाधारण इसलिए है क्योंकि इसने भीड़ के उस तर्क को ही ध्वस्त कर दिया जिसके आधार पर वे हिंसा करते हैं. यह जवाब 1950 से 2014 तक के भारत के उस बुनियादी तर्क को वापस लाता है कि “हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, आपस में सब भाई-भाई.”
दीपक हमें, हमारे समाज को, और सबसे बढ़कर ‘राज्य’ को यह याद दिलाता है कि मेरा नाम क्या है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. फर्क सिर्फ़ इससे पड़ना चाहिए कि कार्य सही है या गलत, संवैधानिक है या असंवैधानिक, मानवीय है या क्रूर.
आज भारत में संघर्ष उन लोगों के बीच है जो ‘दूसरा बंटवारा’ चाहते हैं और वे जो भारत को एक रखना चाहते हैं. यह कहानी है दीये की और तूफ़ान की.
भाजपा सांसद का राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करने और उन पर आजीवन चुनाव लड़ने का प्रतिबंध लगाने के लिए प्रस्ताव
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद निशिकांत दुबे ने गुरुवार (12 फरवरी, 2026) को कहा कि उन्होंने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ कथित तौर पर “देश विरोधी” ताकतों के साथ “मिलेभगत” के लिए एक ‘मूल प्रस्ताव’ (सबस्टेंटिव मोशन) पेश किया है, जिसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करने और उनके आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है.
“द हिंदू” के अनुसार, भाजपा नेता निशिकांत दुबे का कहना है कि राहुल गांधी ने “जन भावनाओं को भड़काने के लिए” बहुत “चालाकी से संसद के सबसे पवित्र मंच पर कब्जा कर लिया है” और वे “निराधार आरोप लगा रहे हैं.” भाजपा सांसद ने यह भी दावा किया कि राहुल गांधी कथित तौर पर “राष्ट्र-विरोधी” ताकतों के साथ मिले हुए हैं.
दुबे ने लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को दिए अपने नोटिस में दावा किया कि राहुल गांधी सोरोस फाउंडेशन, फोर्ड फाउंडेशन और यूएसएआईडी जैसे विदेशी संगठनों के साथ जुड़े हुए हैं और भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं. ‘पीटीआई’ के अनुसार, बुधवार को केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि सरकार राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाएगी. राहुल गांधी ने केंद्रीय बजट पर चर्चा के दौरान भारत-अमेरिका व्यापार सौदे की आलोचना की थी और आरोप लगाया था कि वाशिंगटन का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर “चोकहोल्ड” (कड़ा नियंत्रण) है.
झारखंड के गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने पीटीआई वीडियो से कहा, “कोई विशेषाधिकार प्रस्ताव नहीं है. मैंने एक मूल प्रस्ताव (सबस्टेंटिव मोशन) सौंपा है, जिसमें मैंने उल्लेख किया है कि वे थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम तथा अमेरिका जैसे स्थानों की यात्रा करते हैं, और वे भारत विरोधी ताकतों के साथ कैसे जुड़े हैं.
‘मूल प्रस्ताव’ एक स्वतंत्र और स्व-निहित प्रस्ताव होता है, जिसे किसी विधायी सदन या विधानसभा की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाता है. इसे किसी निर्णय या राय को व्यक्त करने के लिए तैयार किया जाता है. यदि नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है और प्रस्ताव पेश किया जाता है, तो इस पर बहस और उसके बाद अनिवार्य मतदान होता है.
‘मोदी ट्रंप की गिरफ्त में’: राहुल गांधी का निशिकांत दुबे के प्रस्ताव पर पलटवार
इसके जवाब में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपना हमला तेज कर दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ एक व्यापार सौदे के माध्यम से भारत के किसानों और खाद्य सुरक्षा के साथ समझौता किया है. एक वीडियो संदेश में, राहुल ने प्रधानमंत्री पर भारत के कृषि बाजारों को विदेशी हितों के लिए खोलने का आरोप लगाया, जिससे कपास, मक्का, सोयाबीन, सेब और फल उत्पादक प्रभावित होंगे.
उन्होंने दावा किया कि यह कदम बड़े कॉरपोरेट्स और बाहरी ताकतों को फायदा पहुँचाता है, जबकि छोटे भारतीय किसानों को पर्याप्त एमएसपी या मशीनीकरण के बिना छोड़ देता है. इस फैसले को किसान विरोधी बताते हुए राहुल ने कहा कि कांग्रेस इसका कड़ा विरोध करेगी. उन्होंने सरकार को कानूनी या संसदीय कार्रवाई शुरू करने की चुनौती दी और जोर देकर कहा कि वे किसानों के साथ खड़े होने और संसद में उस “सच्चाई” को उजागर करने से पीछे नहीं हटेंगे, जिसे वे देश के सामने लाना चाहते हैं.
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ‘एक्स’ पर कहा- एफआईआर हो, मुकदमा दर्ज हो या प्रिविलेज प्रस्ताव लाएं. मैं किसानों के लिए लड़ूंगा. जो भी ट्रेड डील किसानों की रोजी-रोटी छीने या देश की खाद्य सुरक्षा को कमजोर करे, वह किसान-विरोधी है.
बांग्लादेश में भारी मतदान, शुरुआती रुझानों में बीएनपी और जमात के बीच कड़ा मुकाबला
शुरुआती मतगणना के अनुसार, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और दक्षिणपंथी जमात-ए-इस्लामी के बीच गुरुवार को कड़ा मुकाबला देखा गया. यह महत्वपूर्ण राष्ट्रीय चुनाव करोड़ों बांग्लादेशियों द्वारा मतदान किए जाने के बाद हुआ है—जो 2024 में ‘जनरेशन जेड’ (जेन-जी) के नेतृत्व वाले उस विद्रोह के बाद पहला चुनाव है, जिसने लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना की सत्ता को उखाड़ फेंका था.
विश्लेषकों का कहना है कि 17.5 करोड़ की आबादी वाले इस देश में स्थिरता के लिए एक स्पष्ट चुनावी परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण है. इससे पहले, हसीना विरोधी महीनों तक चले घातक प्रदर्शनों ने दैनिक जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया था और गारमेंट सेक्टर (कपड़ा उद्योग) सहित प्रमुख उद्योगों को प्रभावित किया था, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है. यह चुनाव दुनिया भर में 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं (जेन-जी) के नेतृत्व में हुए हालिया विद्रोहों की कड़ी में है; इसी क्रम में नेपाल में भी अगले महीने मतदान होने वाला है.
‘रॉयटर्स और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ की रिपोर्ट के अनुसार निर्वाचन आयोग के अधिकारियों ने बताया कि अधिकांश मतदान केंद्रों पर मतदान समाप्त होने के तुरंत बाद शाम 4:30 बजे मतगणना शुरू हो गई. आधी रात के आसपास स्पष्ट रुझान मिलने की उम्मीद है और परिणाम शुक्रवार सुबह तक आने की संभावना है. यह मुकाबला पूर्व सहयोगियों, बीएनपी और जमात के नेतृत्व वाले दो गठबंधनों के बीच था, जिसमें जनमत सर्वेक्षणों ने बीएनपी को मामूली बढ़त दी थी. स्थानीय टीवी समाचार स्टेशनों की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 20 सीटों के शुरुआती रुझानों में बीएनपी 10 और जमात 7 सीटों पर आगे चल रही थी.
प्रधानमंत्री पद के दोनों उम्मीदवारों, बीएनपी के तारिक रहमान और जमात प्रमुख शफीकुर रहमान ने जीत का भरोसा जताया है. इन दोनों व्यक्तियों के बीच कोई पारिवारिक संबंध नहीं है.
हसीना की ‘अवामी लीग’ पर प्रतिबंध लगा हुआ है और वह अपने पुराने सहयोगी देश भारत में स्व-निर्वासित निर्वासन में रह रही हैं. इससे चीन के लिए बांग्लादेश में अपना प्रभाव बढ़ाने का रास्ता खुल गया है, क्योंकि ढाका के नई दिल्ली के साथ संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं.
व्हाट्सएप पर पत्रकारों को भेजे गए एक बयान में, हसीना ने इस चुनाव को एक “सुनियोजित स्वांग” बताते हुए इसकी निंदा की और कहा कि यह उनकी पार्टी के बिना और वास्तविक मतदाता भागीदारी के बिना आयोजित किया गया है. उन्होंने कहा कि अवामी लीग के समर्थकों ने इस प्रक्रिया को खारिज कर दिया है.
उन्होंने कहा, “हम इस मतदाता-विहीन, अवैध और असंवैधानिक चुनाव को रद्द करने... अवामी लीग की गतिविधियों पर लगाए गए निलंबन को हटाने; और एक तटस्थ कार्यवाहक सरकार के तहत स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनाव के आयोजन के माध्यम से लोगों के मतदान के अधिकार को बहाल करने की मांग करते हैं.”
चुनाव के साथ-साथ संवैधानिक सुधारों के एक सेट पर जनमत संग्रह भी आयोजित किया गया था. इन सुधारों में चुनाव अवधि के लिए एक तटस्थ अंतरिम सरकार की स्थापना, संसद को द्विसदनीय विधायिका में पुनर्गठित करना, महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना, न्यायिक स्वतंत्रता को मजबूत करना और प्रधानमंत्री के लिए दो कार्यकाल की सीमा तय करना शामिल है. मैदान में 2,000 से अधिक उम्मीदवार थे, जिनमें कई निर्दलीय शामिल थे. कम से कम 50 दलों ने चुनाव लड़ा, जो एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड है.
डीएसी ने फ्रांस से 114 राफेल जेट खरीदने के प्रस्ताव को दी मंजूरी, 90 भारत में बनेंगे
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने भारतीय वायु सेना और नौसेना की ताकत बढ़ाने के लिए बड़े फैसले लिए हैं. मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार, डीएसी ने अनुमानित 3.60 लाख करोड़ रुपये के कई प्रस्तावों के लिए ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ प्रदान की है. इसमें फ्रांस से 114 राफेल फाइटर जेट और अमेरिका से 6 अतिरिक्त P-8I समुद्री निगरानी विमान खरीदने का प्रस्ताव शामिल है.
अधिकारियों ने गुरुवार को बताया कि पहले इन जेट्स में 30 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री की बात की गई थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर लगभग 50 प्रतिशत करने पर चर्चा है. इन 114 जेट्स में से 90 का निर्माण भारत में ही किया जाएगा. इसके अलावा, भारत को विमान में भारतीय हथियारों और प्रणालियों को एकीकृत करने का पूरा अधिकार होगा. अंतिम समझौता वाणिज्यिक वार्ता पूरी होने और कैबिनेट की सुरक्षा समिति की मंजूरी के बाद ही होगा.
आधुनिक राफेल जेट्स भारतीय वायु सेना की घटती स्क्वाड्रन ताकत को भरने में महत्वपूर्ण होंगे, जो वर्तमान में 29 है, जबकि स्वीकृत संख्या 42 है. ये जेट्स भारत के अपने स्वदेशी फाइटर जेट कार्यक्रमों (जैसे LCA Mk 2 और AMCA) के परिपक्व होने तक क्षमता के अंतर को पाटेंगे. AMCA के 2035 के बाद ही सेवा में आने की उम्मीद है.
डीएसी ने अमेरिका से छह अतिरिक्त P-8I समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्धक विमानों की खरीद को भी मंजूरी दी है. सूत्रों के अनुसार, P-8I और राफेल की खरीद को मंजूरी देने का फैसला अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में सफलता पाने में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारत के साथ व्यापार सौदे और टैरिफ में कटौती की घोषणा की थी. P-8I विमानों को ‘फ्लाई-अवे’ (उड़ने के लिए तैयार) स्थिति में खरीदा जाएगा और इसमें कोई टेक्नोलॉजी ट्रांसफर शामिल नहीं होगा.
इसके अतिरिक्त, डीएसी ने सेना के लिए एंटी-टैंक माइंस (विभव) और बख्तरबंद रिकवरी वाहनों, T-72 टैंकों और BMP-II के ओवरहॉल (मरम्मत) के प्रस्तावों को भी मंजूरी दी है. कोस्ट गार्ड के डोर्नियर विमानों के लिए इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रा-रेड सिस्टम खरीदने को भी हरी झंडी मिली है.
कानपुर लेम्बोर्गिनी क्रैश: तंबाकू कारोबारी के बेटे शिवम मिश्रा को गिरफ्तारी के कुछ घंटों बाद ही मिली ज़मानत
कानपुर में वीआईपी रोड पर लेम्बोर्गिनी कार दुर्घटना मामले में स्थानीय तंबाकू कारोबारी के.के. मिश्रा के बेटे शिवम मिश्रा को गुरुवार को गिरफ्तार किया गया. हालांकि, गिरफ्तारी के कुछ घंटों बाद ही उन्हें ज़मानत मिल गई. इस हाई-प्रोफाइल दुर्घटना में कई लोग घायल हो गए थे.
पुलिस ने सुबह करीब 10 बजे शिवम मिश्रा को गिरफ्तार किया और अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया. जांचकर्ताओं ने 14 दिनों की न्यायिक हिरासत की मांग की थी. आरोपी के वकील अनंत शर्मा ने बताया कि अदालत ने न्यायिक हिरासत की अनुमति नहीं दी और इसके बजाय 20,000 रुपये के निजी मुचलके पर उन्हें ज़मानत दे दी.
कर्नाटक में यूएपीए के 20 साल: कमज़ोर जांच, झूठे गवाह और लंबी जेल के बाद बरी आरोपी
जनवरी 2005 से फरवरी 2025 के बीच कर्नाटक में यूएपीए के इस्तेमाल पर आधारित यह आर्टिकल 14 में प्रकाशित हुए चार भागों की श्रृंखला का आखिरी हिस्सा है. इस चार भागों की सीरीज़ में बताया गया है कि कर्नाटक में पिछले 20 सालों (2005 से) के यूएपीए मामलों के डेटा से पता चलता है कि बीजेपी के सत्ता में रहने के दौरान इस आतंकवाद विरोधी कानून का इस्तेमाल मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़्यादा हुआ है. यह चौथा और आखिरी भाग दिखाता है कि जिन मामलों में ट्रायल हुआ, उनमें कमज़ोर सबूत और खराब जांच की वजह से लोग बरी हुए. 75 बरी हुए मामलों में से 82.67% में स्वतंत्र गवाहों ने अदालत में पुलिस की कहानी का विरोध किया. करीब एक-तिहाई मामलों में पंच गवाहों ने कहा कि उन्होंने पुलिस को कोई बरामदगी करते नहीं देखा या बिना पढ़े कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिए.
पोस्टर से आतंकवाद का केस : बेंगलुरु के एक मुस्लिम डिज़ाइनर,‘यू’, जिनका नाम और पहचान गुप्त रखा गया है, की कहानी इसका उदाहरण है. 17 साल पहले उनसे बाबरी मस्जिद गिराए जाने के जश्न के ख़िलाफ़ एक पोस्टर बनाने को कहा गया. उन्होंने कारसेवकों की तस्वीर के साथ कैप्शन लिखा: “अल्लाह पर फ़तह हासिल करने की पूरी और इस आख़िरी लड़ाई में बाबरी मस्जिद भी शामिल है.”
लेकिन हिंदुत्व संगठनों ने इसे प्रतिबंधित संगठन सिमी का काम बताया. पुलिस ने 6 केस दर्ज किए, 15 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें एक नाबालिग और पांच हिंदू प्रिंटिंग प्रेस मालिक भी थे. उन पर देशद्रोह और यूएपीए लगाया गया. 10 साल बाद चार मामलों में वे बरी हो गए, लेकिन दो केस अब भी निचली अदालत में लंबित हैं. 17 साल बाद भी उन्हें हर महीने अदालत जाना पड़ता है.
मुसलमानों पर ज़्यादा कार्रवाई: यह रिपोर्ट लंदन की स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ (एसओएएस) यूनिवर्सिटी के शोध पर आधारित है. तीन साल के इस शोध के मुताबिक़, 2005 से कर्नाटक में 925 लोगों पर यूएपीए लगा. इनमें 783 यानी 84.6% मुसलमान थे. बीजेपी के 10.5 साल के शासन में करीब 80% मामलों में यूएपीए लगाया गया. कांग्रेस करीब 9 साल सत्ता में रही.
पहले भाग में बताया गया कि 244 लोग बरी हुए, जबकि सिर्फ 46 दोषी ठहराए गए. यानी बरी होने वालों की संख्या सज़ा पाने वालों से पांच गुना ज़्यादा थी. 169 बरी मामले वामपंथी गतिविधियों से जुड़े थे.
तीसरे भाग में बताया गया कि कर्नाटक में पिछले 20 साल में 80% दोषसिद्धियां पूरी सुनवाई से नहीं, बल्कि आरोपियों के ‘गुनाह कबूल’ करने से हुईं.
इस आखिरी भाग में 75 बरी मामलों का विश्लेषण किया गया, जो वामपंथी गतिविधियों से अलग थे. इनमें 92% आरोपी मुसलमान थे. अदालतों ने कई मामलों में जांच को “शौडी”, “गलत” या “संदिग्ध” कहा.
विस्फोटक की फॉरेंसिक जांच में देरी पायी गई. चार्जशीट में हथियार बरामदगी का ज़िक्र तो हुआ, लेकिन अदालत में इसे पेश नहीं किया गया. प्लास्टिक डिब्बे और तार जैसी सामान्य चीज़ों को बम सामग्री बताया गया. बरामद किये गए उर्दू-अरबी साहित्य का अनुवाद तक नहीं किया गया.
13 में से 6 मामलों में यूएपीए लगाने के लिए ज़रूरी सरकारी मंज़ूरी नहीं ली गई. एक मामले में पंच गवाहों ने माना कि उन्होंने एक ही दिन में 20 से ज़्यादा कागज़ बिना पढ़े साइन किए.
इकबाल जाकती 2008 में गिरफ्तार हुए थे. उन पर आरोप था कि वे बेलगावी में SIMI मॉड्यूल चलाकर बम बनाने की साज़िश कर रहे थे. उन्होंने कहा कि पुलिस को किसी के कंप्यूटर में अफगानिस्तान युद्ध का वीडियो मिला और वहां से सबको पकड़ लिया गया. “हम फुटबॉल खेलने के बाद बैठते थे. पुलिस ने उसे आतंकी साज़िश की बैठक बना दिया,” उन्होंने कहा.
अदालत ने कहा कि साज़िश का एकमात्र सबूत पुलिस हिरासत में दिए गए “स्वैच्छिक बयान” थे. एक घड़ी को केले में छुपाकर जेल में बम बनाने का दावा किया गया, लेकिन कोई गवाह इसका समर्थन नहीं कर पाया. 2011 में वे बरी हो गए.
यूएपीए मामलों का जाल ऐसा है कि एक केस में बरी होने के बाद भी आरोपी दूसरे केस में फंस जाते हैं. 2008 में पुलिस ने उत्तर कर्नाटक में तीन सिमी मॉड्यूल पकड़े. एक केस से जुड़े लोगों को दूसरे राज्यों के मामलों से जोड़ दिया गया.
‘वाई’ नाम के एक आरोपी ने कहा कि “हर बार बरी होता हूं, दूसरे केस में जेल भेज दिया जाता हूं. यह मेरे सिर पर लटकी तलवार जैसा है.”
16 लाख की नकली नोट बरामदगी का मामला
2012 में बेंगलुरु में नकली नोट और हथियार बरामद करने का दावा हुआ. 29 लोगों पर केस दर्ज हुआ. ‘ज़ेड’ नाम के 28 साल के युवक को भी गिरफ्तार किया गया, जो अपनी बहन की शादी के कार्ड बांटने गया था. उसे बताया गया कि वह आतंकवादी साज़िश का आरोपी है. 2014 में ज़मानत तो मिली, लेकिन अब भी हर महीने एनआईए की विशेष अदालत में पेशी देनी पड़ती है.
अब 15 आरोपी मर चुके हैं या केस हट गया है. बाकी 14 लोग ट्रायल झेल रहे हैं. अदालत में हथियार पेश नहीं किए गए, और गवाह पहचान नहीं कर पाए. कानून कहता है कि एनआईए कोर्ट में रोज़ सुनवाई होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता.
ज़ेड अब 41 साल के हैं, अविवाहित हैं और एक कमरे में रहते हैं. “कोई आतंकवादी आरोपी से शादी नहीं करना चाहता. यह केस मेरी जिंदगी बर्बाद कर चुका है,” उन्होंने कहा.
दलित महिला की नियुक्ति के बाद आंगनवाड़ी केंद्र तीन महीने से बंद, संसद में उठा मामला
राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने ओडिशा के एक आंगनवाड़ी केंद्र में जातीय भेदभाव का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में भी एक दलित महिला द्वारा बनाया गया खाना बच्चो को न खिलाया जाना जातिगत भेदभाव की गंभीरता को दिखाता है.
खड़गे ने बताया कि पिछले तीन महीनों से एक आंगनवाड़ी केंद्र का बहिष्कार किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह बच्चों के शिक्षा के अधिकार (अनुच्छेद 21A) और पोषण व जनस्वास्थ्य सुधार से जुड़े राज्य के कर्तव्य (अनुच्छेद 47) के ख़िलाफ़ है. उन्होंने इसे कार्यस्थल पर जातिगत भेदभाव बताया और कहा कि ऐसे मामले देश के अन्य हिस्सों में भी सामने आए हैं.
मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह मामला ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले के राजनगर ब्लॉक के घड़ियामल ग्राम पंचायत के नुआगांव गांव का है. यहां 20 नवंबर 2025 को 20 वर्षीय स्नातक शरमिष्ठा सेठी को हेल्पर-कम-कुक नियुक्त किया गया था. उनके अनुसार, नियुक्ति के तुरंत बाद गांव वालों ने अपने बच्चों को आंगनवाड़ी भेजना बंद कर दिया. परिवार सत्तू और अंडे जैसे मुफ्त खाद्य पदार्थ भी लेने से इनकार कर रहे हैं. शरमिष्ठा का आरोप है कि यह विरोध केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि वह दलित हैं. उन्होंने कहा कि उनका परिवार बहुत गरीब है और उन्हें यह नौकरी काफी संघर्ष के बाद मिली है. वह शिक्षक बनना चाहती हैं, लेकिन गांव वालों ने उनकी अपील नहीं सुनी.
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने भी पुष्टि की कि केंद्र में 20 बच्चे नामांकित हैं, लेकिन कोई भी नहीं आ रहा. उन्होंने घर-घर जाकर समझाने की कोशिश की, लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ. जिला प्रशासन की ओर से बैठक बुलाई गई, लेकिन उसमें केवल सरपंच, वार्ड सदस्य और दो ग्रामीण ही पहुंचे.
रूस ने वॉट्सऐप पर लगाया बैन, अपने सरकारी ऐप को दे रहा बढ़ावा
रूस ने कथित कानूनी उल्लंघनों का हवाला देते हुए मैसेजिंग सर्विस वॉट्सऐप को ब्लॉक कर दिया है. इसे यूक्रेन युद्ध के बीच बोलने की आज़ादी पर नकेल कसने की एक और कोशिश माना जा रहा है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने गुरुवार को इसकी घोषणा करते हुए कहा कि वॉट्सऐप रूसी कानूनों का पालन करने में आनाकानी कर रहा था.
सरकार ने अब रूसी नागरिकों को ‘मैक्स’ नामक एक सरकारी ऐप इस्तेमाल करने की सलाह दी है. इसे मैसेजिंग, सरकारी सेवाओं और पेमेंट के लिए ‘वन-स्टॉप शॉप’ बताया जा रहा है. लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि मैक्स में एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन नहीं है, जिसका मतलब है कि सरकार जब चाहे यूज़र्स के मैसेज पढ़ सकती है. यह ऐप खुद भी स्वीकार करता है कि वह अधिकारियों के मांगने पर डेटा साझा करेगा.
मानवाधिकार समूहों, जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल, का कहना है कि मैसेजिंग ऐप्स पर यह पाबंदी निगरानी और नियंत्रण बढ़ाने का एक स्पष्ट प्रयास है. वॉट्सऐप के एक प्रवक्ता ने कहा कि 10 करोड़ लोगों को प्राइवेट कम्युनिकेशन से काटना उनकी सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है.
उल्लेखनीय है कि पिछले साल से ही रूस ने वॉट्सऐप और टेलीग्राम पर कुछ कॉल्स को सीमित करना शुरू कर दिया था. इसके अलावा ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पहले से ही वहां ब्लॉक हैं.
एक साल बाद, वोटर्स की राय: ट्रम्प से बेहतर थे बाइडन
एक्सियोस के ज़ाकरी बासु की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रम्प राजनीतिक रूप से इतने ‘जहरीले’ हो गए हैं कि अब मतदाता यह मान रहे हैं कि जो बाइडन—जिन्हें अलोकप्रियता के कारण समय से पहले रिटायर होना पड़ा—ने राष्ट्रपति के रूप में बेहतर काम किया था. यह दावा तीन ताज़ा ओपिनियन पोल्स के नतीजों पर आधारित है.
अपने दूसरे कार्यकाल के एक साल के भीतर ही, ट्रम्प ने उन लगभग सभी फायदों को गंवा दिया है जिनकी बदौलत उन्होंने चुनाव जीता था. अब व्हाइट हाउस के पास केवल नौ महीने हैं हालात सुधारने के लिए, वरना रिपब्लिकन पार्टी को मध्यावधि चुनावों में भारी हार का सामना करना पड़ सकता है.
तीन राष्ट्रीय सर्वेक्षण एक ही चिंताजनक ट्रेंड की ओर इशारा करते हैं:
Harvard CAPS/Harris (जनवरी 28–29): मार्क पेन की पोलिंग फर्म ने पाया कि 51% रजिस्टर्ड वोटर्स का मानना है कि ट्रम्प, बाइडन की तुलना में ख़राब काम कर रहे हैं, जबकि 49% उन्हें बेहतर मानते हैं.
Rasmussen Reports (फरवरी 2–4): ट्रम्प-समर्थक माने जाने वाले इस पोलस्टर को भी अब मागा (एमएजीए) समर्थकों की आलोचना झेलनी पड़ रही है क्योंकि उनके सर्वे में 48% संभावित मतदाताओं ने कहा कि बाइडन ने बेहतर काम किया था, जबकि केवल 40% ने ट्रम्प को चुना.
YouGov/Economist (फरवरी 6–9): इस सर्वे में 46% अमेरिकी वयस्कों ने कहा कि ट्रम्प, बाइडन से ख़राब काम कर रहे हैं, जबकि 40% ने उन्हें बेहतर बताया.
जब बाइडन की लोकप्रियता गिर रही थी, तो उनके सहयोगी अक्सर “ट्रम्प एमनीज़िया” की शिकायत करते थे—यानी वोटर्स ट्रम्प के पहले कार्यकाल की अराजकता को भूल चुके थे. अब ट्रम्प 2.0 के एक साल बाद, उनका मागा (एमएजीए) दोलन भी यही तर्क दे रहा है कि अमेरिकी जनता यह भूल रही है कि ट्रम्प ने बाइडन के दौर की महंगाई और सीमा घुसपैठ को रोकने के लिए कितना काम किया है.
व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने एक बयान में कहा, “करीब 8 करोड़ अमेरिकियों ने राष्ट्रपति ट्रम्प को जो बाइडन की आर्थिक आपदा और इमिग्रेशन संकट को ख़त्म करने का स्पष्ट जनादेश दिया था. ट्रम्प प्रशासन महंगाई कम करने, आर्थिक विकास बढ़ाने और आपराधिक अवैध प्रवासियों को डिपोर्ट करने पर पूरी तरह केंद्रित है.”
ट्रम्प के लिए चिंता की बात यह है कि उनके मुख्य मुद्दे ही अब उनकी कमजोरी बन गए हैं. एनबीसी न्यूज के पोल के मुताबिक, 49% लोग बॉर्डर सिक्योरिटी पर ट्रम्प के काम को “सख्ती से नापसंद” करते हैं. अर्थव्यवस्था पर उनकी रेटिंग उनके पहले कार्यकाल के मुकाबले 26 पॉइंट नीचे है. सबसे बढ़ा झटका युवाओं में लगा है—18 से 29 वर्ष के युवाओं के बीच उनकी नेट अप्रूवल रेटिंग -42 है. सीएनएन के एनालिस्ट हैरी एंटन के अनुसार, बिना कॉलेज डिग्री वाले वोटर्स, जो ट्रम्प का आधार थे, अब उनसे दूर हो रहे हैं. गैलप की रिपोर्ट बताती है कि भविष्य को लेकर अमेरिकियों की उम्मीदें दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर हैं.
इमरान खान की दाहिनी आंख की रोशनी सिर्फ़ 15% बची, वकील का दावा
पाकिस्तान के जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की सेहत को लेकर एक गंभीर ख़बर सामने आई है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त वकील सलमान सफदर ने बताया है कि रावलपिंडी की अदियाला जेल में बंद 73 वर्षीय इमरान खान की दाहिनी आंख की रोशनी अब केवल 15% रह गई है.
मामला क्या है: एडवोकेट सलमान सफदर ने 10 फरवरी को जेल में इमरान खान से मुलाकात के बाद सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट सौंपी. ‘द हिंदू’ द्वारा देखी गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि खान अपनी गिरती हुई नज़र और समय पर इलाज न मिलने के कारण बेहद परेशान और व्यथित दिखे. खान ने बताया कि पिछले साल अक्टूबर से ही उन्हें दिखने में दिक़्क़त हो रही थी, लेकिन जेल प्रशासन ने उनकी शिकायतों को नज़रअंदाज़ किया.
मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें “सेंट्रल रेटिनल वेन ऑक्लूज़न” डायग्नोस किया गया है, जिसमें आंख के रेटिना से खून ले जाने वाली नस ब्लॉक हो जाती है. हाल ही में उन्हें एक इंजेक्शन भी दिया गया, लेकिन इसके बावजूद उनकी नज़र में सुधार नहीं हुआ.
वकील की रिपोर्ट के बाद, पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अधिकारियों को तत्काल एक मेडिकल बोर्ड गठित करने और इमरान खान की आंखों की जांच कराने का आदेश दिया है. साथ ही उन्हें अपने बच्चों से बात करने की भी अनुमति दी गई है. इमरान खान की पार्टी PTI ने कहा है कि यह आदेश उनकी पुरानी शिकायतों को सही साबित करता है कि जेल में उन्हें उचित चिकित्सा नहीं दी जा रही थी.
अरिजीत सिंह का नया अवतार: प्लेबैक सिंगिंग से संन्यास के बाद क्लासिकल अंदाज़ में वापसी
रविवार की शाम कोलकाता का नेताजी इंडोर स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा, जब अरिजीत सिंह कंधे पर गिटार टांगे, कुर्ता-जैकेट और पायजामे में मंच पर आए. प्लेबैक सिंगिंग से संन्यास की घोषणा के कुछ ही दिनों बाद, अरिजीत एक बिल्कुल नए संगीत अवतार में नज़र आए. इस बार वे फ़िल्मी गानों की भीड़ से दूर, महान सितार वादक पंडित रवि शंकर की बेटी अनुष्का शंकर के साथ मंच साझा कर रहे थे.
वायरल हो रहे वीडियो में अरिजीत की शास्त्रीय संगीत की तालीम साफ़ झलक रही है. उन्होंने अनुष्का शंकर और मशहूर तबला वादक बिक्रम घोष के साथ मिलकर बंगाली क्लासिक ‘माया भरा राती’ गाया. अरिजीत ने यह भी साझा किया कि कैसे उन्होंने एक गाना कंपोज़ करने के लिए अनुष्का के घर का दौरा किया था. इसके बाद उन्होंने ‘Traces of You’ गाया, जो मूल रूप से अनुष्का और नोरा जोन्स का ट्रैक है.
यह शाम अरिजीत के सफ़र के एक नए अध्याय का संकेत थी—जहाँ संगीत सिर्फ़ चार्टबस्टर हिट्स के लिए नहीं, बल्कि रूहानियत और रचनात्मकता के लिए होगा. भले ही उनके फ़िल्मी गानों के दीवाने थोड़े निराश हों, लेकिन एक कलाकार के तौर पर अरिजीत अब अपनी शर्तों पर संगीत को तलाश रहे हैं.
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