12/03/2026: राहुल को फिर रोका | ईरानी स्कूल पर टोमाहॉक मिसाइल अमेरिका ने गिराई | ईरान की तीन शर्तें और नये अयातुल्ला की धमकी | तेल का दाम फिर 100 पार | नेतन्याहू और ट्रंप के रास्ते बंटे ? | धुरंधर
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
संसद में हंगामा: राहुल गांधी को हरदीप पुरी और जेफ़री एपस्टीन के लिंक पर बोलने से रोका गया.
ईरान का नेतृत्व सुरक्षित: अमेरिकी खुफ़िया रिपोर्ट के अनुसार भारी बमबारी के बाद भी ईरान सरकार के पतन का ख़तरा नहीं.
दुनिया का सबसे बड़ा तेल संकट: होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने से ग्लोबल ऑयल सप्लाई में 80 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट का अंदेशा.
कूटनीतिक असंतुलन: भारत ने खाड़ी देशों के यूएनएससी प्रस्ताव का समर्थन किया लेकिन अमेरिकी हमलों पर चुप्पी साधी.
इराक़ में भारतीय नाविक की मौत: अमेरिका के स्वामित्व वाले तेल टैंकर पर ड्रोन हमले में एक भारतीय की जान गई.
स्कूल पर अमेरिकी मिसाइल: ईरान के मिनाब में बच्चियों के स्कूल पर टॉमहॉक मिसाइल गिरने से 170 मौतें, एआई (AI) की ग़लती की आशंका.
रिलायंस का दबदबा: अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच रूस से तेल ख़रीदने की छूट दिलाने में रिलायंस की भूमिका अहम.
सुप्रीम कोर्ट से राहत: बिना पर्यावरण मंज़ूरी के बने हज़ारों करोड़ के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स को तोड़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने फ़िलहाल लगाई रोक.
संभल में करोड़ों का जुर्माना: राजस्व अदालत ने मस्जिद-मज़ार हटाने का आदेश दिया और इमामों पर लगाया लगभग 7 करोड़ रुपये का जुर्माना.
सिनेमा और हिंसा: युद्ध और महंगाई के दौर में फिल्म ‘धुरंधर 2’ में दिखाई गई अत्यधिक हिंसा पर समीक्षकों ने उठाए सवाल.
लोक सभा में फिर रोका गया राहुल को बोलने से
हरदीप पुरी के एपस्टीन और सोरोस से लिंक का ज़िक्र
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार (12 मार्च) को लोक सभा में भारी हंगामा देखने को मिला. पश्चिम एशिया के संघर्ष के बीच भारत के ऊर्जा संकट पर चिंता जताते हुए, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के तार सजायाफ़्ता अमेरिकी सेक्स ऑफ़ेंडर जेफ़री एपस्टीन से जुड़े होने का ज़िक्र किया, जिसके बाद उनका भाषण एक बार फिर बीच में ही रोक दिया गया.
राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने इस “पहेली को सुलझा लिया है” कि भारत जैसा देश अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल ख़रीदने की “इजाज़त” देने की अनुमति क्यों देगा. उन्होंने कहा कि यह पहेली एक “समझौते” की वजह से है. पुरी की ओर इशारा करते हुए गांधी ने कहा कि उन्होंने ख़ुद यह बात मानी थी कि वह एपस्टीन के “दोस्त” थे.
जैसे ही गांधी ने एक दस्तावेज़ दिखाना चाहा, जिसमें कथित तौर पर पुरी की बेटी और जॉर्ज सोरोस के बीच लिंक होने का दावा किया गया था, स्पीकर ओम बिरला ने उनका भाषण रोक दिया. स्पीकर ने कहा कि उन्हें केवल उसी विषय पर बोलना चाहिए जिसका उन्होंने नोटिस दिया है.
गांधी ने कहा, “किसी भी राष्ट्र की नींव उसकी ऊर्जा सुरक्षा होती है. मैं इसे हल्के में नहीं कह रहा हूं, लेकिन अमेरिका को यह तय करने की अनुमति देना कि हम किससे तेल ख़रीदें, किससे गैस ख़रीदें, हम रूस से तेल ख़रीद सकते हैं या नहीं, विभिन्न तेल आपूर्तिकर्ताओं के साथ हमारे रिश्ते हमारे द्वारा तय किए जा सकते हैं या नहीं, यही सब कुछ दांव पर लगा दिया गया है.”
उन्होंने आगे कहा, “यह मेरे लिए बहुत हैरान करने वाली बात रही है कि भारत के आकार का कोई राष्ट्र किसी अन्य राष्ट्र को, किसी दूसरे राष्ट्र के राष्ट्रपति को, हमें रूसी तेल ख़रीदने की अनुमति देने या यह तय करने की ताक़त क्यों देगा कि हमारे रिश्ते किसके साथ हैं. मैं इस पहेली को सुलझाने की कोशिश कर रहा था और मैंने इसे सुलझा लिया है. यह पहेली समझौते के बारे में है. हमारे बीच एक सज्जन बैठे हैं जो तेल मंत्री हैं. उन्होंने ख़ुद कहा है कि वह एपस्टीन के दोस्त हैं.”
जैसे ही गांधी ने एपस्टीन का ज़िक्र किया, बिरला ने तुरंत “नहीं” कहा. गांधी ने जवाब दिया कि वह “तेल सुरक्षा के बारे में बात कर रहे हैं”.
गांधी ने कहा, “मैं आर्थिक सुरक्षा की बात कर रहा हूं, मेरे पास यहां एक दस्तावेज़ है जो दिखाता है कि उनकी (पुरी की) बेटी को जॉर्ज सोरोस से पैसे मिले हैं.”
इस पर भारी हंगामे के बीच, स्पीकर बिरला ने कहा कि विपक्ष के नेता को देश में एलपीजी की कमी पर बोलने की अनुमति दी गई थी, जिसके लिए उन्होंने नोटिस दिया था और वह अन्य मुद्दों पर बात नहीं कर सकते.
बिरला ने कहा, “मैंने सुबह भी कहा है कि सदन नियमों के अनुसार चलता है. आपने जो नोटिस दिया है, उस पर बोलें. अगर आप इस मुद्दे पर बोलना चाहते थे, तो आपको नोटिस देना चाहिए था, तब मैं तय करता कि इसकी अनुमति दी जाए या नहीं.”
विपक्षी बेंचों से हो रहे हंगामे के बीच बिरला ने समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव को बोलने के लिए बुलाया. यादव ने कहा कि वह अपनी बात रखेंगे, लेकिन विपक्ष के नेता को अपना भाषण पूरा करने की अनुमति दी जानी चाहिए.
170 से अधिक की जान लेने वाला बम ईरानी गर्ल्स स्कूल पर किसने गिराया? अमेरिका ने.
अल जज़ीरा की रिपोर्टर एलिजाबेथ मेलिमोपोलोस और वाशिंगटन पोस्ट के एलेक्स हॉर्टन, तारा कॉप और उनकी टीम की विस्तृत जांच के अनुसार, अमेरिका-इजरायल युद्ध की सबसे खूनी घटना 28 फरवरी को दक्षिणी ईरान के मिनाब में ‘शजरेह तैयबेह’ गर्ल्स स्कूल पर हुआ मिसाइल हमला है. इस हमले में 170 से ज़्यादा लोग मारे गए, जिनमें ज़्यादातर स्कूल जाने वाली बच्चियां थीं. यह हमला उस समय हुआ जब घबराए हुए माता-पिता अपने बच्चों को सुरक्षित घर ले जाने के लिए स्कूल पहुंचे थे.
‘वाशिंगटन पोस्ट’ के सूत्रों ने पुष्टि की है कि यह स्कूल अमेरिकी सेना की ‘टारगेट लिस्ट’ में था. प्रारंभिक जांच से पता चलता है कि यह पुरानी खुफिया जानकारी या एआई प्रणाली की गलती का परिणाम हो सकता है. यह स्कूल कभी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के नौसैनिक अड्डे का हिस्सा था, लेकिन 2015 के बाद से इसे अलग कर दिया गया था और इसके अपने प्रवेश द्वार थे. सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के मार्क कैन्सियन के अनुसार, अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने अपनी टारगेट सूची को अपडेट नहीं किया था. प्रत्यक्षदर्शी और एक छात्र के पिता अब्दुल्लाह कार्यानपाक ने बताया कि विस्फोट इतना भयानक था कि इमारत मलबे में तब्दील हो गई और बच्चों के शव क्षत-विक्षत हो गए.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी और इजरायली सेनाएं लक्ष्यों की पहचान करने के लिए पैलेंटिर के मैवेन और एंथ्रोपिक के क्लाउड जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) टूल्स का भारी इस्तेमाल कर रही हैं. एआई की मदद से कुछ ही सेकंड में डेटा छांटकर हज़ारों लक्ष्य निर्धारित किए जा रहे हैं. हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बिना किसी सबूत के इस हमले का दोष ईरान की “अचूक” मिसाइलों पर मढ़ दिया था, लेकिन वीडियो फुटेज से साफ़ होता है कि यह एक अमेरिकी नौसेना की टोमाहॉक क्रूज़ मिसाइल थी. अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने यह बेतुका दावा किया कि ईरानी स्कूलों से मिसाइलें दाग रहे हैं.
अमेरिका का नागरिक ठिकानों पर गलती से हमला करने का पुराना इतिहास रहा है. 1999 में पुरानी आकृतियों के कारण बेलग्रेड में चीनी दूतावास पर बमबारी और 1991 में बगदाद के अमीरिय्याह बंकर पर हमला इसके प्रमुख उदाहरण हैं. अब 46 अमेरिकी डेमोक्रेटिक सीनेटरों ने हेगसेथ को पत्र लिखकर इस स्कूल हमले की तत्काल और पारदर्शी जांच की मांग की है. इस घटना ने युद्ध में एआई के उपयोग और नागरिकों की सुरक्षा पर गंभीर अंतरराष्ट्रीय सवाल खड़े कर दिए हैं.
अमेरिकी खुफ़िया विभाग को भी पता है कि ईरान सरकार के पतन का कोई ख़तरा नहीं
रॉयटर्स के लिए एरिन बैंको की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी खुफ़िया एजेंसियों का मानना है कि क़रीब दो हफ़्ते की लगातार अमेरिकी और इजरायली बमबारी के बाद भी ईरान का शीर्ष नेतृत्व बड़े पैमाने पर सुरक्षित है और इसके जल्द पतन का कोई ख़तरा नहीं है. इस मामले से वाक़िफ़ तीन सूत्रों ने यह जानकारी दी है.
इस विषय पर बात करने के लिए नाम गुप्त रखने की शर्त पर एक सूत्र ने बताया कि “कई” खुफ़िया रिपोर्ट्स में यह “लगातार विश्लेषण सामने आ रहा है कि शासन को कोई ख़तरा नहीं है” और “ईरानी जनता पर उसका नियंत्रण क़ायम है.” सूत्र के अनुसार, यह ताज़ा रिपोर्ट पिछले कुछ दिनों के भीतर ही पूरी की गई है.
बढ़ती तेल क़ीमतों के कारण बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि वह 2003 के बाद के सबसे बड़े अमेरिकी सैन्य अभियान को “जल्द” ही समाप्त कर देंगे. लेकिन अगर ईरान के कट्टरपंथी नेता मज़बूती से जमे रहते हैं, तो युद्ध का कोई स्वीकार्य अंत खोजना मुश्किल हो सकता है.
खुफ़िया रिपोर्ट ईरान के धार्मिक नेतृत्व की एकजुटता को रेखांकित करती है, भले ही 28 फ़रवरी को अमेरिकी और इजरायली हमलों के पहले दिन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई हो. एक वरिष्ठ इजरायली अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि बंद कमरों में हुई चर्चाओं में इजरायली अधिकारियों ने भी यह माना है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि युद्ध के परिणामस्वरूप ईरान की धार्मिक सरकार का पतन हो जाएगा.
सूत्रों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ज़मीनी हालात तेज़ी से बदल रहे हैं और ईरान के भीतर के समीकरण बदल भी सकते हैं. इस मामले में द ऑफ़िस ऑफ़ द डायरेक्टर ऑफ़ नेशनल इंटेलिजेंस और सीआईए ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. व्हाइट हाउस ने भी टिप्पणी के अनुरोध का तुरंत कोई जवाब नहीं दिया.
अपने युद्ध की शुरुआत से ही अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई ठिकानों को निशाना बनाया है, जिनमें हवाई रक्षा प्रणालियां, परमाणु स्थल और शीर्ष नेतृत्व के सदस्य शामिल हैं. ट्रंप प्रशासन ने इस युद्ध के अलग-अलग कारण बताए हैं. अभियान की शुरुआत करते हुए ट्रंप ने ईरानियों से “अपनी सरकार पर कब्ज़ा करने” का आग्रह किया था, लेकिन शीर्ष सहयोगियों ने बाद में इस बात से इनकार किया कि उनका उद्देश्य ईरान के नेतृत्व को उखाड़ फेंकना था.
खामेनेई के अलावा, हमलों में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के कई वरिष्ठ अधिकारियों और शीर्ष कमांडरों की जान गई है. यह एक कुलीन अर्धसैनिक बल है जो अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्सों को नियंत्रित करता है. फिर भी, अमेरिकी खुफ़िया रिपोर्ट्स बताती हैं कि आईआरजीसी और खामेनेई की मौत के बाद सत्ता संभालने वाले अंतरिम नेताओं का देश पर नियंत्रण बना हुआ है. वरिष्ठ शिया धर्मगुरुओं के एक समूह, असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स ने इस हफ़्ते की शुरुआत में खामेनेई के बेटे मोजतबा को नया सर्वोच्च नेता घोषित किया था.
मामले से वाक़िफ़ एक चौथे सूत्र ने कहा कि इजरायल का पूर्व सरकार के किसी भी अवशेष को सुरक्षित रहने देने का कोई इरादा नहीं है. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि मौजूदा अमेरिकी-इजरायली सैन्य अभियान सरकार को कैसे गिराएगा. सूत्र ने कहा कि इसके लिए संभवतः एक ज़मीनी हमले की ज़रूरत होगी, जिससे ईरान के अंदर लोग सुरक्षित रूप से सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर सकें. ट्रंप प्रशासन ने ईरान में अमेरिकी सैनिकों को भेजने की संभावना से इनकार नहीं किया है.
रॉयटर्स ने पिछले हफ़्ते रिपोर्ट दी थी कि पड़ोसी इराक़ में स्थित ईरानी कुर्द मिलिशिया ने इस बात पर अमेरिका से सलाह ली थी कि ईरान के पश्चिमी हिस्से में सुरक्षा बलों पर हमला किया जाए या नहीं. कोमाला पार्टी ऑफ़ ईरानियन कुर्दिस्तान के प्रमुख अब्दुल्ला मोहतादी ने कहा कि पार्टियां ईरान के अंदर बेहद संगठित हैं और अगर उन्हें अमेरिकी समर्थन मिलता है तो “दसियों हज़ार युवा सरकार के ख़िलाफ़ हथियार उठाने को तैयार हैं.” उन्होंने दावा किया कि आईआरजीसी इकाइयां हमलों के डर से बेस छोड़ रही हैं.
लेकिन हालिया अमेरिकी खुफ़िया रिपोर्ट्स ने ईरानी सुरक्षा सेवाओं के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रखने की कुर्द समूहों की क्षमता पर संदेह जताया है. खुफ़िया जानकारी बताती है कि इन समूहों के पास ताक़त और संख्या की कमी है. कुर्द समूहों ने हाल ही में वाशिंगटन से हथियार और बख़्तरबंद वाहन मांगे थे, लेकिन ट्रंप ने शनिवार को कुर्द समूहों को ईरान में भेजने की संभावना से इनकार कर दिया.
पुरी का दावा, देश में ईंधन की कोई कमी नहीं; लेकिन राज्यों से खबरें एलपीजी किल्लत की
सरकार की तरफ से भले ही केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी यह कहें कि देश में ईंधन का कोई संकट नहीं है, लेकिन राज्यों से आ रही खबरें एलपीजी की किल्लत की तस्वीर पेश कर रही हैं. मीडिया में समाचार हैं कि कई जगहों पर आम लोगों को सिलेंडर हासिल करने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. बुकिंग के बावजूद गैस की टंकी नहीं मिल पा रही है. ऑनलाइन बुकिंग सेवा के ठप होने की भी खबरें हैं. मगर लोकसभा में गुरुवार को पुरी द्वारा दिए गए वक्तव्य में लोगों को हो रही परेशानियों के संदर्भ में कोई उल्लेख नहीं था. उन्होंने यह जरूर कहा कि सभी रिफाइनरियों को एलपीजी की पैदावार को अधिकतम करने का निर्देश दिया गया था. लिहाजा पिछले पांच दिनों में, रिफाइनरी निर्देशों के माध्यम से एलपीजी उत्पादन में 28 प्रतिशत की वृद्धि की गई है और आगे की खरीद प्रक्रिया सक्रिय रूप से जारी है. उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की बुकिंग से लेकर डिलीवरी तक का मानक समय अब भी ढाई दिन है. पुरी का कहना था कि कुछ इलाकों में रश-बुकिंग (जल्दबाजी में बुकिंग) का दबाव मांग में आए असंतुलन को दर्शाता है, न कि उत्पादन या आपूर्ति की विफलता को. उन्होंने कहा कि डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (डीएसी) का दायरा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 90 प्रतिशत उपभोक्ताओं तक किया जा रहा है. इससे यह सुनिश्चित होगा कि सिलेंडर को ‘डिलीवर्ड’ तभी दर्ज किया जाए जब पंजीकृत मोबाइल नंबर पर आए वन-टाइम कोड (ओटीपी) के माध्यम से इसकी पुष्टि हो जाए, जिससे बिना दस्तावेज के होने वाली कालाबाजारी या डायवर्जन को रोका जा सके. मांग को नियंत्रित करने के लिए शहरी क्षेत्रों में बुकिंग के बीच न्यूनतम 25 दिन और ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों में 45 दिन का अंतराल भी लागू किया गया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी का नाम लिए बगैर कहा कि वर्तमान में एलपीजी को लेकर काफी चर्चा हो रही है, और कुछ व्यक्ति “अनावश्यक दहशत फैला रहे हैं.” मोदी ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण कोई भी राष्ट्र अप्रभावित नहीं रहा है, लेकिन भारत इस चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और अपनी ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग वर्तमान स्थिति का फायदा उठाकर कुछ उत्पादों की कालाबाजारी करने की कोशिश कर रहे हैं, और चेतावनी दी कि ऐसे अनैतिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.
इस बीच अधिकारियों ने बताया कि खाड़ी क्षेत्र में जारी संकट के बाद रसोई गैस की संभावित कमी को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक एडवाइजरी जारी की है. इसमें उन्हें एलपीजी बुनियादी ढांचे पर पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करने और रसोई गैस सिलेंडरों की जमाखोरी और कालाबाजारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है. देश के कई हिस्सों में एलपीजी की किल्लत होने के कारण भारत में इंडक्शन कुकटॉप की मांग में भारी उछाल देखा जा रहा है. फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार (12 मार्च) तक स्विगी और ज़ेप्टो जैसे क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर कई प्रमुख शहरों में इंडक्शन कुकटॉप ‘आउट ऑफ स्टॉक’ (स्टॉक खत्म) दिखाए दे रहे थे.
फ्लिपकार्ट के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि पिछले तीन-चार हफ्तों की तुलना में पिछले चार से पांच दिनों में इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री तीन गुना हो गई है. दिल्ली, कोलकाता और उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में मांग में विशेष रूप से तीव्र वृद्धि दर्ज की गई है. बेंगलुरु में भी इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री में काफी इजाफा हुआ है. चेन्नई में भी यही स्थिति है.
भारत ने ईरान के हमलों की निंदा करने वाले यूएनएससी प्रस्ताव को को-स्पॉन्सर किया
द हिंदू के लिए सुहासिनी हैदर की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार ने “सभी नागरिकों” की सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता बताया है. यह बयान उन आलोचनाओं को टालने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है, जिनमें कहा गया था कि पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध में भारत ने केवल ईरान की कार्रवाइयों की निंदा की है, और अमेरिका व इजरायल के हमलों पर चुप्पी साध रखी है.
बुधवार (11 मार्च, 2026) को, भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में खाड़ी सहयोग परिषद के एक प्रस्ताव को 134 अन्य देशों के साथ को-स्पॉन्सर किया. इस प्रस्ताव में जीसीसी देशों- बहरीन, कुवैत, ओमान, क़तर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन के ख़िलाफ़ “ईरान के इस्लामी गणराज्य द्वारा किए जा रहे सभी हमलों को तुरंत रोकने” की मांग की गई थी. यह प्रस्ताव यूएनएससी के 13 सदस्यों के पक्ष में मतदान करने के साथ पारित हो गया, जबकि रूस और चीन ने इस मतदान से दूरी बनाए रखी. इस प्रस्ताव में ईरान द्वारा “हर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय नेविगेशन को बंद करने, बाधित करने या किसी अन्य तरीक़े से हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से की गई किसी भी कार्रवाई या धमकी” की भी निंदा की गई है.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार (12 मार्च, 2026) को एक साप्ताहिक प्रेस ब्रीफ़िंग में कहा, “यह प्रस्ताव हमारे कई रुख़ को दर्शाता है.” उन्होंने कहा, “जीसीसी देशों में हमारा एक बड़ा प्रवासी समुदाय है, और उनकी भलाई व कल्याण हमारे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. खाड़ी क्षेत्र हमारी ऊर्जा सुरक्षा ज़रूरतों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है.” यह संदर्भ उन लगभग 1 करोड़ भारतीयों की ओर था जो पश्चिम एशिया में रहते और काम करते हैं. इसके अलावा, भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 50% कच्चा तेल और 90% एलपीजी इसी क्षेत्र से आयात करता है. इसके विपरीत, ईरान में केवल 9,000 भारतीय हैं और भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के ख़तरे के तहत 2019 से ईरान से अपना ऊर्जा आयात बंद कर दिया है.
यूएनएससी प्रस्ताव को दिया गया भारतीय समर्थन, विदेश मंत्रालय द्वारा जारी किए गए उन कई बयानों के बाद आया है जिनमें दुबई की इमारतों, ओमान की सुविधाओं और भारत आ रहे एक थाई जहाज़ समेत पश्चिम एशियाई क्षेत्र में ईरान द्वारा किए गए विशिष्ट हमलों की निंदा की गई थी.
हालांकि, भारत ने इसी तरह अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों की निंदा नहीं की है, जिनमें अनुमानित 1,255 लोग मारे गए हैं. इन मौतों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, उनका परिवार और सलाहकार शामिल हैं. भारत ने हिंद महासागर में ईरानी जहाज़ आईआरआईएस डेना को डुबोए जाने या मुबीन में एक स्कूल पर हुई बमबारी (जिसमें 150 स्कूली छात्राओं के मारे जाने की आशंका है) की भी निंदा नहीं की है. इसके अलावा, लेबनान पर इजरायल के हमलों के बारे में भी भारत या जीसीसी के प्रस्ताव में कोई ज़िक्र नहीं किया गया है, जहां सरकार के अनुसार 630 से अधिक लोग मारे गए हैं और आठ लाख लोग बेघर हो गए हैं.
जब ‘द हिंदू’ ने इस असंतुलित प्रतिक्रिया के बारे में सवाल पूछा, तो जायसवाल ने कहा कि विदेश मंत्रालय ने बयान जारी किए हैं और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद के दोनों सदनों में स्वतः संज्ञान लेते हुए बयान दिए हैं जिनमें जानमाल के नुक़सान पर खेद व्यक्त किया गया है.
जायसवाल ने कहा, “जहां तक स्कूली बच्चों का सवाल है... हमने चल रहे संघर्ष पर कई बयान जारी किए हैं. हमने सभी नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है. हम जो क़ीमती जानें गई हैं उस पर खेद जताते हैं और इस संबंध में अपना दुख व्यक्त करते हैं.”
पिछले कुछ दिनों में, अमेरिका और इजरायल की कार्रवाइयों पर भारत की “चुप्पी” की कई पूर्व वरिष्ठ राजनयिकों ने आलोचना की है. पूर्व विदेश सचिव और अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत निरुपमा मेनन राव ने गुरुवार (12 मार्च, 2026) को विदेश मंत्रालय के बयान का ज़िक्र करते हुए कहा, “कूटनीति को जटिलता को पहचानना चाहिए, न कि इसे किसी एक दोषी तक सीमित कर देना चाहिए.” उन्होंने सुझाव दिया कि भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन उस नैरेटिव का समर्थन करना है जो कहानी की शुरुआत ईरान की जवाबी कार्रवाई से करता है, न कि उस तनाव से जो इससे पहले शुरू हुआ था.
आईआरआईएस डेना को डुबाने वाले 4 मार्च के पनडुब्बी टॉरपीडो हमले (जो “भारतीय तटों के बहुत क़रीब” हुआ था) के बारे में बोलते हुए पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने कहा कि अमेरिका की कार्रवाइयों के सामने भारत को अपना पक्ष मज़बूती से रखना चाहिए. गुरुवार को दिल्ली में सिनर्जिया कॉन्क्लेव में अपने संबोधन में उन्होंने कहा, “रणनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए, सामरिक अधीनता से बचना ज़रूरी है.”
ईरान युद्ध: अमेरिका-इजरायल के हमलों के 13वें दिन क्या हो रहा है?
अल जज़ीरा की रिपोर्टर एलिजाबेथ मेलिमोपोलोस और सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले लगातार जारी हैं. ईरान ने ऊर्जा बाज़ारों को बाधित करने के लिए अपने जवाबी हमले तेज़ कर दिए हैं, जिसके कारण तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है. संयुक्त राष्ट्र में ईरान के प्रतिनिधि अमीर सईद इरावनी के अनुसार, युद्ध के 13वें दिन (गुरुवार) तक कम से कम 1,348 नागरिक मारे जा चुके हैं और 17,000 से अधिक घायल हुए हैं. यूनिसेफ ने इस स्थिति को “विनाशकारी” बताया है, जिसमें 1,100 से अधिक बच्चे हताहत हुए हैं.
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने युद्ध समाप्त करने के लिए तीन शर्तें रखी हैं: तेहरान के वैध अधिकारों की मान्यता, युद्ध हर्जाने का भुगतान, और भविष्य में हमलों के खिलाफ ठोस अंतरराष्ट्रीय गारंटी. इस बीच, ईरान से जुड़े साइबर समूह ‘हंडाला’ ने मिनाब स्कूल हमले (जिसमें 170 से अधिक स्कूली बच्चे मारे गए) के प्रतिशोध में मेडिकल डिवाइस दिग्गज स्ट्राइकर के नेटवर्क को ठप करने और 50TB डेटा चुराने का दावा किया है.
खाड़ी देशों में भी इस युद्ध का व्यापक असर दिख रहा है. सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने शेबा तेल क्षेत्र की ओर आ रहे कई ड्रोन नष्ट करने की बात कही है. ओमान के सलालाह बंदरगाह पर ड्रोन हमले से ईंधन टैंकों को नुकसान पहुंचा, जिसकी कतर ने निंदा की. संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने 11 मार्च को 39 ड्रोन और 13 मिसाइलों के ईरानी हमले को नाकाम किया. इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर है, जहां ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने कथित तौर पर चेतावनियों को नज़रअंदाज़ करने वाले जहाज़ों पर फायरिंग की है. वैश्विक स्तर पर तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है, जिसके जवाब में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी 400 मिलियन बैरल कच्चा तेल बाज़ार में उतार रही है.
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अमेरिकी हमलों ने ईरान को हरा दिया है और उन्होंने घोषणा की कि “हम जीत गए हैं.” दूसरी ओर, न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया कि एक ईरानी स्कूल पर संभवतः “टारगेटिंग की गलती” के कारण अमेरिकी टोमाहॉक मिसाइल से हमला हुआ था. वहीं, इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने स्पष्ट किया है कि जब तक सभी लक्ष्य हासिल नहीं हो जाते, तब तक इस सैन्य अभियान की कोई समय सीमा नहीं है. लेबनान और इराक में भी हिंसा भड़क उठी है; बेरूत में इजरायली हमलों में विस्थापित लोगों के मारे जाने की खबर है, जबकि इराक के तट पर दो तेल टैंकरों को निशाना बनाया गया है.
टॉकिंग न्यूज़
बच्चियों के स्कूल पर टोमाहॉक मिसाइल ! और पेंटागॉन में से कौन सच बोल रहा है
आज के ‘हरकारा’ के लाइव शो टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश में ईरान-इज़राइल जंग के 13वें दिन की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की गई. कार्यक्रम में इस बात पर खास तौर पर बात हुई कि क्या अमेरिका और इज़राइल अब भी एक ही रणनीति पर चल रहे हैं या दोनों के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं. चर्चा में युद्ध के बढ़ते दायरे, मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव, वैश्विक तेल बाज़ार पर असर और आम लोगों पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव को भी समझाने की कोशिश की गई. साथ ही यह सवाल भी उठाया गया कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति पर ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है.
ईरान के साथ जारी जंग के 13वें दिन यह सवाल और गहरा हो गया है कि अमेरिका और इज़राइल वास्तव में एक ही दिशा में बढ़ रहे हैं या नहीं. खबरों के अनुसार अमेरिका का जोर ईरान को सैन्य रूप से कमज़ोर करके उसे बातचीत की ओर लाने पर बताया जा रहा है, जबकि इज़राइल की प्राथमिकता ईरान की सत्ता और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को पूरी तरह खत्म करना मानी जा रही है.
चर्चा के दौरान मिनाब शहर की शजराह तैयबा प्राइमरी स्कूल गर्ल्स स्कूल पर हुए हमले का मुद्दा भी उठाया गया. 28 फरवरी को हुए इस हमले में 170 से ज़्यादा मौतें हुईं, जिनमें अधिकतर बच्चे थे. शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हमले में अमेरिका की भूमिका से इनकार किया था और कहा था कि इसके पीछे ईरान या कोई अन्य देश भी हो सकता है. लेकिन बाद में सामने आई जांच रिपोर्टों में यह संकेत मिला कि हमले में इस्तेमाल किया गया हथियार अमेरिकी था. मिसाइल के टुकड़ों पर अमेरिकी टोमाहॉक मिसाइल के निशान मिलने की भी बात कही गई. जांच में यह भी सामने आया कि उस जगह को पुरानी खुफिया जानकारी में सैन्य ठिकाना बताया गया था, क्योंकि लगभग 15 साल पहले वहां आईआरजीसी का बेस हुआ करता था, जिसके बाद वहां स्कूल बना दिया गया था.
इसी के साथ युद्ध का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है. तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है और स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज में बढ़ते तनाव के कारण दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है.
इसका असर भारत में भी महसूस किया जा रहा है. हाल के दिनों में एलपीजी गैस सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई है, जिससे आम लोगों पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है. अगर युद्ध लंबा चलता है तो तेल और गैस की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका सीधा असर भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ेगा.
ईरान युद्ध का भारत पर असर: कूटनीति, तेल और बढ़ती चुनौतियां
द वायर, ब्लूमबर्ग, द इकोनॉमिस्ट और रॉयटर्स की विभिन्न रिपोर्ट्स के आधार पर, पश्चिम एशिया के संघर्ष का असर भारत पर स्पष्ट दिखने लगा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एर्नाकुलम में एनडीए की एक रैली में इस संघर्ष पर अपनी पहली प्रतिक्रिया दी. हालांकि उन्होंने अमेरिका-इजरायल हमले या अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या का सीधा ज़िक्र नहीं किया, लेकिन कहा कि “खाड़ी में चल रहे युद्ध ने हमें एक बार फिर आत्मनिर्भरता का महत्व सिखाया है.” उन्होंने विपक्ष पर डर फैलाने का आरोप लगाया. दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रम्प ने टेक्सास में 300 बिलियन डॉलर की “ऐतिहासिक डील” की घोषणा की है, जिसमें भारत की रिलायंस द्वारा निवेश कर एक नई तेल रिफाइनरी बनाई जाएगी. ब्लूमबर्ग और वरिष्ठ पत्रकार गोविंदराज एथिराज ने इस 300 बिलियन डॉलर के अवास्तविक आंकड़े और रिलायंस द्वारा भारत की जगह टेक्सास को चुनने के औचित्य पर सवाल उठाए हैं.
भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची से तीसरी बार फोन पर बात की. ईरान के अनुसार, बातचीत होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक बाधाओं पर केंद्रित थी. ईरान ने भारत और श्रीलंका के तटों के पास अमेरिकी नौसेना द्वारा अपने जहाज़ ‘आईआरआईएस डेना’ को डुबाने की भी कड़ी निंदा की. श्रीलंका की एक अदालत ने अमेरिकी दबाव को दरकिनार करते हुए, मारे गए 84 ईरानी नाविकों के शव तेहरान को सौंपने का आदेश दिया है. इस बीच, ईरान ने चीन और बांग्लादेश को आश्वासन दिया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले उनके तेल जहाजों को नहीं रोका जाएगा. वहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने मोजतबा खामेनेई को नया नेता बनने पर बधाई दी है.
द इकोनॉमिस्ट ने अपनी रिपोर्ट में चेताया है कि इस वैश्विक उथल-पुथल से भारत को भारी नुकसान होगा. अगर चीन अधिक रूसी तेल खरीदता है, तो रूस पर चीन का प्रभाव बढ़ेगा, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से खतरनाक है. साथ ही, ऊर्जा संकट के कारण भारत की सौर पैनल और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए चीन पर निर्भरता और बढ़ जाएगी. युद्ध के कारण एविएशन सेक्टर भी प्रभावित है; एयर इंडिया ने 400 रुपये का सरचार्ज लगाया है क्योंकि पाकिस्तानी और पश्चिम एशियाई हवाई क्षेत्र बंद होने से उड़ानों का रूट लंबा हो गया है. इसके अलावा, लाल सागर और होर्मुज में जहाज़ों की कमी के कारण चीन से आने वाले कच्चे माल (APIs) की आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे भारत में दवाओं की कीमतें 30% तक बढ़ सकती हैं.
नये अयातुल्ला का कड़क स्टैंड
मोजतबा खामेनेई ने अमेरिका पर साधा निशाना
अल जज़ीरा स्टाफ और तेहरान से रिपोर्टर तोहिद असदी की रिपोर्ट के मुताबिक, अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने अपना पहला कड़ा बयान जारी किया है. अमेरिका और इजरायल द्वारा युद्ध की शुरुआत में उनके पिता और परिवार के कई सदस्यों की हत्या कर दी गई थी. प्रेस टीवी पर पढ़े गए अपने बयान में मोजतबा खामेनेई ने राष्ट्रीय एकता का आह्वान किया और चेतावनी दी कि ईरान के दुश्मनों पर दबाव बनाने के लिए वैश्विक व्यापार की अहम जीवन रेखा ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को बंद रखा जाएगा.
सर्वोच्च नेता ने कहा कि क्षेत्र में मौजूद सभी अमेरिकी ठिकानों को तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए, अन्यथा उन पर हमले जारी रहेंगे. उन्होंने स्पष्ट किया कि यमन और इराक में सक्रिय सशस्त्र गुट भी इस इस्लामी क्रांति की मदद करना चाहते हैं और वे “अपना काम करेंगे.” खामेनेई ने ईरानी सेना की बहादुरी की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने देश को दुश्मनों के प्रभुत्व और विभाजन से बचाया है. उन्होंने संकल्प लिया कि ईरान अपनी लड़ाई जारी रखेगा.
ईरान के नवनियुक्त सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई ने गुरुवार को जारी युद्ध में मारे गए लोगों का बदला लेने और होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद रखने का संकल्प लिया. अपने पहले सार्वजनिक बयानों में उन्होंने अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने का संकेत दिया.
टेलीग्राफ के अनुसार, ईरानी सरकारी टेलीविजन पर पढ़े गए एक बयान में, खामेनेई ने कहा कि ईरान खाड़ी में शिपिंग और ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमले जारी रखेगा और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाएगा. उन्होंने यह मांग भी की कि अमेरिका मध्य पूर्व में अपने सभी सैन्य ठिकाने बंद कर दे.
खामेनेई ने कहा, “हमारे शहीदों के खून का बदला लिया जाएगा.“ उन्होंने आगे जोड़ा कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य — जहाँ से दुनिया की लगभग एक-पांचवीं तेल आपूर्ति गुजरती है — को ईरान के दुश्मनों पर दबाव बनाने के लिए बंद रखा जाना चाहिए. खामेनेई कैमरे के सामने नहीं आए. इजरायली अधिकारियों का अनुमान है कि युद्ध के शुरुआती हमलों के दौरान वह घायल हो गए होंगे.
खामेनेई का यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान समुद्री यातायात और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे पर हमले तेज कर रहा है. इसी के चलते गुरुवार को तेल की कीमतें फिर से $100 प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गईं क्योंकि वैश्विक बाजारों में लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने का डर फैल गया.
ईरान ने यह भी कहा है कि वह अमेरिका और इजरायल को बमबारी रोकने के लिए मजबूर करने हेतु वैश्विक स्तर पर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है. उसकी चेतावनी है कि जब तक ईरान पर हमले नहीं रुकते, वह होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से तेल की शिपमेंट को रोकता रहेगा. ईरान के राष्ट्रपति ने संकेत दिया कि युद्धविराम घोषित होने के बाद भी संघर्ष जारी रह सकता है. उन्होंने कहा कि देश तब तक अपना सैन्य अभियान जारी रखेगा जब तक उसे भविष्य के हमलों के खिलाफ ठोस गारंटी नहीं मिल जाती.
अल जज़ीरा के विश्लेषक ज़ेइदान अलकिनानी का मानना है कि सशस्त्र प्रतिरोध पर ध्यान केंद्रित करके नए नेता ने आर्थिक सुधारों और राज्य निर्माण जैसी आम ईरानियों की मूलभूत चिंताओं से बचने की कोशिश की है. अलकिनानी ने यह भी बताया कि मोजतबा का यह आक्रामक रुख राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के उस बयान से मेल नहीं खाता, जिसमें शर्तों के साथ युद्ध खत्म करने की बात कही गई थी. चूंकि यह बयान मोजतबा ने खुद नहीं पढ़ा, इसलिए उन अफवाहों को बल मिला है कि वे हालिया हमलों में घायल हो सकते हैं. किंग्स कॉलेज लंदन के सुरक्षा विशेषज्ञ रॉब गीस्ट पिनफोल्ड के अनुसार, ट्रम्प प्रशासन ईरान से बयानबाजी में बदलाव की उम्मीद कर रहा था, लेकिन मोजतबा ने पुरानी कट्टर नीतियों को ही आगे बढ़ाया है.
ट्रम्प और नेतन्याहू अब एक ही पेज पर नहीं हैं?
द न्यूयॉर्क टाइम्स के ओपिनियन कॉलम में डब्ल्यू.जे. हेनिगन लिखते हैं कि ईरान पर चल रहे युद्ध में अमेरिका और इजरायल के अंतिम लक्ष्य अब टकराने लगे हैं. तेहरान में तेल डिपो पर बमबारी के बाद आसमान में छाए काले धुएं ने वाशिंगटन को भी अपनी चपेट में ले लिया है. संक्षेप में कहें तो, राष्ट्रपति ट्रम्प ईरान को ‘झुकाना’ चाहते हैं, जबकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू वहां के शासन को पूरी तरह ‘तोड़ना’ चाहते हैं.
अमेरिका में गैस स्टेशनों पर बढ़ती कीमतों के कारण तेहरान के जलते तेल क्षेत्रों की तस्वीरें ट्रम्प प्रशासन के लिए राजनीतिक सिरदर्द बन रही हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों से वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में हाहाकार मचा हुआ है और जनता युद्ध से ऊब चुकी है. फिलहाल, दोनों देशों के अल्पकालिक लक्ष्य समान हैं: ईरान के मिसाइल, परमाणु कार्यक्रम और नौसेना को नष्ट करना. लेकिन दीर्घकालिक जीत को लेकर उनके दृष्टिकोण अलग हैं. ट्रम्प राष्ट्र-निर्माण के दलदल (जैसे इराक या अफगानिस्तान) से बचना चाहते हैं. रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने भी स्पष्ट किया है कि “यह 2003 नहीं है.” फिर भी, युद्ध लंबा खिंचता दिख रहा है और अब तक सात अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं.
विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अजीबोगरीब दावा किया कि अमेरिका ने इसलिए हमला किया क्योंकि उसे पता था कि इजरायली हमले के बाद ईरान अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा. अमेरिका में इस युद्ध को केवल 41 प्रतिशत जनसमर्थन हासिल है. इसके विपरीत, नेतन्याहू के लिए यह युद्ध राजनीतिक रूप से फायदेमंद है क्योंकि इज़रायल में इसे भारी समर्थन मिल रहा है और उन्हें जल्द ही चुनाव का सामना करना है. ट्रम्प चाहते हैं कि वेनेज़ुएला की तरह ईरान में भी वे खुद एक ‘कठपुतली’ नेता नियुक्त करें (जैसे मादुरो की जगह डेल्सी रोड्रिग्ज), लेकिन ईरान ने मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता चुन लिया है जो झुकने को तैयार नहीं हैं. ऐसे में, साथ मिलकर युद्ध शुरू करने वाले इन दोनों देशों के लिए इसे साथ मिलकर खत्म करना मुश्किल नज़र आ रहा है.
ट्रंप ने कहा—तेल की कीमतों में उछाल से अमेरिका को फायदा
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को कहा कि तेल की बढ़ती कीमतों का मतलब संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए अधिक मुनाफा है, लेकिन उनकी प्राथमिकता ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है. ट्रंप ने कहा, “जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो हम बहुत पैसा कमाते हैं.” उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका ने “वास्तव में ईरान को नष्ट कर दिया है” लेकिन सैन्य अभियान जारी रहेगा. बुधवार को केंटकी के हेब्रोन में एक रैली में ट्रंप ने कहा, “आप कभी भी बहुत जल्दी यह नहीं कहना चाहते कि आप जीत गए. पहले ही घंटे में यह खत्म हो गया था... हम जल्दी नहीं छोड़ना चाहते... हमें काम पूरा करना है.”
दुनिया में सबसे बड़ा तेल आपूर्ति संकट; सप्लाई में 80 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट की आशंका
अन्तर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने गुरुवार को कहा कि मध्य पूर्व में युद्ध इतिहास में तेल की आपूर्ति में अब तक का सबसे बड़ा व्यवधान पैदा कर रहा है. यह बयान उस निर्णय के एक दिन बाद आया है, जिसमें एजेंसी ने तेल की कमी और कीमतों में भारी उछाल की भरपाई के लिए अपने रणनीतिक भंडार से रिकॉर्ड मात्रा में तेल जारी करने पर सहमति व्यक्त की थी.
‘रॉयटर्स’ के अनुसार, अपनी नवीनतम मासिक तेल बाजार रिपोर्ट में, आईईए ने कहा कि मार्च में वैश्विक आपूर्ति में 80 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट आने की आशंका है—जो विश्व मांग के लगभग 8% के बराबर है. इसका मुख्य कारण होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी है. ईरानी तट पर स्थित यह संकरा मार्ग 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों की शुरुआत के बाद से अवरुद्ध है.
अन्तर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए), जो औद्योगिक देशों को सलाह देती है, का यह दृष्टिकोण उसकी पिछली चेतावनियों के बिल्कुल विपरीत है, जिनमें उसने 2026 की पहली तिमाही के लिए बाजार में बड़े अधिशेष की संभावना जताई थी.
हालाँकि, एजेंसी ने आगे कहा कि अप्रैल में आपूर्ति बढ़ सकती है, क्योंकि मध्य पूर्व खाड़ी के कुछ उत्पादक होर्मुज जलडमरूमध्य से बचने के लिए वैकल्पिक निर्यात मार्गों का उपयोग कर रहे हैं. साथ ही, एजेंसी ने यह भी कहा कि पूरे वर्ष के लिए उत्पादन अभी भी वैश्विक मांग की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ेगा.
संघर्ष के बीच खाड़ी देशों के उत्पादन में भारी कटौती
ईरान द्वारा मध्य पूर्व में तेल और परिवहन सुविधाओं पर हमले तेज करने के कारण गुरुवार को तेल की कीमतों में उछाल आया, जिससे लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से तेल की आपूर्ति में निरंतर बाधा आने की आशंका बढ़ गई है.
ब्रेंट क्रूड, जो सोमवार को $119.50 प्रति बैरल पर पहुँच गया था (मध्य-2022 के बाद का उच्चतम स्तर), गुरुवार को 5% की बढ़त के साथ $97 प्रति बैरल के ठीक नीचे रहा.
आईईए ने कहा कि इराक, कतर, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब सहित मध्य पूर्व खाड़ी देशों ने संघर्ष के परिणामस्वरूप कुल तेल उत्पादन में कम से कम 1 करोड़ (10 मिलियन) बैरल प्रतिदिन की कटौती की है. एजेंसी ने यह भी जोड़ा कि यदि शिपिंग प्रवाह तेजी से बहाल नहीं हुआ, तो यह नुकसान और बढ़ सकता है.
एजेंसी ने कहा, “बंद किए गए उत्पादन को संकट-पूर्व स्तर पर लौटने में हफ्तों और कुछ मामलों में महीनों लग सकते हैं, जो तेल क्षेत्रों की जटिलता और क्षेत्र में श्रमिकों, उपकरणों और संसाधनों की वापसी के समय पर निर्भर करेगा.”
बाजार एक ‘महत्वपूर्ण दौर’ में है
आईईए ने बुधवार को ईरान पर युद्ध शुरू होने के बाद से कीमतों में आए उछाल से निपटने के लिए सदस्य देशों द्वारा रखे गए रणनीतिक भंडार से रिकॉर्ड 40 करोड़ (400 मिलियन) बैरल तेल जारी करने पर सहमति जताई.
इस्तांबुल में बोलते हुए, आईईए के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने कहा कि एजेंसी के इस फैसले का ऊर्जा बाजारों पर पहले ही “मजबूत प्रभाव” पड़ा है, जो वर्तमान में “बेहद नाजुक दौर” से गुजर रहे हैं. उन्होंने भंडार से तेल जारी करने की दैनिक गति से जुड़े सवाल पर जवाब देने से इनकार कर दिया.
आईईए ने कहा कि मध्य पूर्व का संकट तेल की मांग में भी कमी ला रहा है, क्योंकि एयरलाइंस अपनी उड़ानें रद्द कर रही हैं, जबकि अनिश्चित आर्थिक दृष्टिकोण और ऊँची कीमतें मांग के पूर्वानुमान के लिए जोखिम पैदा कर रही हैं.
एजेंसी के अनुसार, मार्च और अप्रैल के दौरान वैश्विक मांग पिछले अनुमानों की तुलना में लगभग 10 लाख (1 मिलियन) बैरल प्रतिदिन कम रहने की उम्मीद है. वर्ष 2026 के लिए, विश्व स्तर पर मांग में 6,40,000 बैरल प्रतिदिन की वृद्धि का अनुमान है, जो पिछले पूर्वानुमान से 2,10,000 बैरल प्रतिदिन कम है. यह वृद्धि दर उत्पादक समूह ‘ओपेक’ द्वारा बुधवार को जारी किए गए अनुमान से लगभग आधी है.
2026 में भी विश्व आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद
मार्च के उत्पादन में कटौती के बावजूद, एजेंसी को अभी भी उम्मीद है कि 2026 में औसतन तेल की आपूर्ति वैश्विक मांग की तुलना में तेजी से बढ़ेगी.
आईईए ने कहा कि वैश्विक आपूर्ति में 11 लाख (1.1 मिलियन) बैरल प्रतिदिन की वृद्धि होगी, जो पिछले महीने अनुमानित 24 लाख (2.4 मिलियन) बैरल प्रतिदिन से कम है. कुल मिलाकर, आईईए का पूर्वानुमान यह संकेत देता है कि 2026 में आपूर्ति मांग से 24.6 लाख (2.46 मिलियन) बैरल प्रतिदिन अधिक रहेगी, जो पिछले महीने की रिपोर्ट में बताए गए 37.3 लाख (3.73 मिलियन) बैरल प्रतिदिन के अधिशेष से कम है.
एजेंसी ने यह भी बताया कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से बचकर निकलने वाले निर्यात मार्गों का उपयोग करने के प्रयास तेजी से बढ़ रहे हैं. ये उन योजनाओं का हिस्सा हैं जो नुकसान की आंशिक रूप से भरपाई करने और अप्रैल से जून तक वैश्विक तेल आपूर्ति में वृद्धि सुनिश्चित करने में मदद कर सकती हैं.
होर्मुज़ मार्ग पर भारत के लिए राहत? ईरान के अनुमति देने का दावा
द टेलीग्राफ ने अपनी एक रिपोर्ट में एक भारतीय स्त्रोत का हवाला देते हुए लिखा है कि ईरान भारत के झंडे वाले तेल टैंकरों को होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने की अनुमति देगा. इसी समुद्री रास्ते से भारत के लगभग 40% कच्चे तेल का आयात होता है. हालांकि ईरान से जुड़े एक अन्य स्रोत ने ऐसे किसी समझौते से इनकार किया है. भारतीय विदेश मंत्रालय और नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास ने इस मामले पर तुरंत कोई टिप्पणी नहीं की. भारतीय स्रोत ने मीडिया से बात करने की अनुमति न होने के कारण अपना नाम नहीं बताया, जबकि ईरानी स्रोत ने कहा कि मामला संवेदनशील है.
बसरा के पास तेल टैंकर पर हमला, भारतीय क्रू सदस्य की मौत
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार ईरान–इज़राइल और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष के दौरान एक हमले में एक भारतीय नाविक की मौत हो गई. वह अमेरिका के स्वामित्व वाले तेल टैंकर एम टी सेफसी विष्णु के क्रू का हिस्सा था. इस जहाज़ पर कुल 16 भारतीय नाविक सवार थे.
भारत के बगदाद स्थित दूतावास ने सोशल मीडिया पर बताया कि मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाले इस टैंकर पर इराक के बसरा के पास हमला हुआ, जिसमें एक भारतीय क्रू सदस्य की मौत हो गई. बाकी 15 भारतीय नाविकों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया है. वेसल फाइंडर के अनुसार जहाज़ की आखिरी लोकेशन फारस की खाड़ी में बसरा ऑयल टर्मिनल एंकरिज के पास दर्ज की गई थी. मुंबई स्थित डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग ने बताया कि 11 मार्च को लगभग 9 बजे यह टैंकर करीब 48,000 मीट्रिक टन नैफ्था लेकर जा रहा था, तभी विस्फोटक से भरी एक बिना चालक वाली तेज नाव (स्पीडबोट) ने इसे टक्कर मार दी. यह घटना खोर अल जुबैर बंदरगाह के पास कार्गो लोडिंग ऑपरेशन के दौरान हुई.
इस घटना के बाद भारत ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के दौरान व्यावसायिक जहाज़ों को सैन्य हमलों का निशाना बनाना चिंताजनक है.
रूस से तेल खरीदने की 30 दिन की अमेरिकी छूट दिलाने में रिलायंस की भूमिका
द वायर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका द्वारा भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए दी गई 30 दिन की छूट हासिल कराने में रिलायंस इंडस्ट्रीज के नेतृत्व की सक्रिय भूमिका रही. जिसके बाद भारत की विदेश नीति की आज़ादी और प्रभावशीलता को लेकर पहले से उठ रहे सवाल और तेज हो सकते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक ब्लूमबर्ग ने कहा है कि रिलायंस के नेतृत्व की “सक्रिय बातचीत” के कारण ही भारत को अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रूस से तेल खरीदने की 30 दिन की “इजाज़त” मिली है. पिछले सप्ताह भारतीय जनता पार्टी ने अमेरिकी छूट को मोदी सरकार की ऊर्जा कूटनीति की सफलता बताया था, लेकिन ब्लूमबर्ग के सूत्रों के अनुसार इसमें निर्णायक भूमिका रिलायंस की व्यावसायिक कोशिशों की थी. इसी सप्ताह यह भी सामने आया कि ट्रंप के आदेश के बाद कुछ समय के लिए भारतीय कंपनियों ने फिर से 3 करोड़ बैरल रूसी कच्चा तेल खरीदा.
इस बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की कि टेक्सास में 300 अरब डॉलर की एक नई रिफाइनरी परियोजना प्रस्तावित है जिसमें रिलायंस निवेश करेग. दैनिक भास्कर की 12 मार्च की रिपोर्ट के अनुसार रिलायंस के कार्यकारी निदेशक अनंत अंबानी, जिन्होंने पिछले साल यह पद संभाला, पिछले कुछ महीनों से इस सौदे पर काम कर रहे थे. रिपोर्ट में कहा गया कि रिफाइनरी का शिलान्यास इस साल के दूसरे हिस्से में हो सकता है.
हज़ारों करोड़ के अवैध प्रोजेक्ट्स पर डिमोलिशन का ख़तरा, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
आर्टिकल 14 के लिए अक्षय देशमाने की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 60 से 300 तक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करते हुए बनाए गए हैं. यह जानकारी ऐसे सरकारी दस्तावेज़ों और इंटरव्यू से सामने आई है जो पहले सार्वजनिक नहीं किए गए थे. इन परियोजनाओं में हज़ारों करोड़ रुपये का निवेश लगा है. मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों पर सख्त फैसला दिया था, जिससे इन प्रोजेक्ट्स को इंहिदाम किये जाने का ख़तरा पैदा होगया था. लेकिन करीब सात महीने बाद आए एक आदेश ने उस फैसले का असर फिलहाल रोक दिया.
रिपोर्ट में मुंबई के कामाठीपुरा इलाके के पुनर्विकास का उदाहरण दिया गया है. यहां मुंबई की कंपनी गोल्डन रियल्टी “गोल्डन रेजिडेंसी” नाम से एक प्रोजेक्ट बना रही है, जिसे 2023 में महाराष्ट्र सरकार ने मंज़ूरी दी थी. यह प्रोजेक्ट 2016 में शुरू हुआ था. लेकिन जब कंपनी बाद में नियामकों के पास पहुंची तब तक 30 से ज़्यादा मंजिलों वाले दो टावर बन चुके थे, जबकि निर्माण शुरू करने से पहले पर्यावरण मंज़ूरी नहीं ली गई थी.
भारत के 2006 के पर्यावरण नियमों के अनुसार अगर किसी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट का क्षेत्र 20,000 वर्ग मीटर से ज़्यादा हो तो निर्माण शुरू करने से पहले पर्यावरण मंज़ूरी लेना ज़रूरी होता है. इसका उद्देश्य यह देखना होता है कि परियोजना का असर पानी, कचरा, सीवेज, ट्रैफिक और आसपास के इलाके पर क्या पड़ेगा. लेकिन गोल्डन रियल्टी ने यह सीमा पार करने के बावजूद मंजूरी नहीं ली, जिससे प्रोजेक्ट ग़ैरक़ानूनी बन गया.
2021 में केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने एक अमनेस्टी योजना शुरू की थी, जिसके तहत वह प्रोजेक्ट दुबारा मंज़ूरी के लिए आवेदन कर सकते थे जिन्होंने पहले मंज़ूरी नहीं ली थी. कई रियल एस्टेट और अन्य कंपनियों ने इस योजना के तहत आवेदन किया. लेकिन जनवरी 2024 में पर्यावरण संगठन वनशक्ति की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना पर रोक लगा दी और मई 2025 में इसे अवैध घोषित कर दिया. न्यायमूर्ति अभय ओका और उज्जल भुइयां ने कहा कि पहले नियम तोड़कर निर्माण करना और बाद में मंज़ूरी लेना कानून के ख़िलाफ़ है.
इस फैसले के बाद रियल एस्टेट लॉबी संगठन क्रेडाई और कई कंपनियों ने अदालत में पुनर्विचार की मांग की. नवंबर 2025 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने मई 2025 के फैसले को फिलहाल वापस लेने और मामले की दोबारा सुनवाई का आदेश दिया. विशेषज्ञों के अनुसार इस आदेश से हज़ारों करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट फिलहाल टूटने से बच गए. क्रेडाई से जुड़े वकील समित शुक्ला के अनुसार लगभग 300 प्रोजेक्ट्स पर तोड़फोड़ का खतरा था, जबकि उद्योग के एक प्रतिनिधि के मुताबिक प्रभावित निवेश 12,000 करोड़ रुपये तक हो सकता है. फरवरी 2026 में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले की दोबारा सुनवाई शुरू की है और अंतिम फैसला अभी आना बाकी है
संभल में मस्जिद- मज़ार हटाने का आदेश, इमामों पर लगभग 7 करोड़ रुपये का जुर्माना
मकतूब मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश के संभल जिले की एक राजस्व अदालत ने सैफ खान सराय गांव में एक मस्जिद, एक मज़ार और कुछ घरों को हटाने का आदेश दिया है. इसके साथ अदालत ने गांव के दो इमामों पर 6.95 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया है.
तहसीलदार अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ये ढांचे गांव की सामुदायिक ज़मीन पर अवैध रूप से बनाए गए हैं. अदालत ने कहा कि अगर 30 दिनों के भीतर इस फैसले को चुनौती नहीं दी गई तो प्रशासन इन ढांचों को हटाएगा. मामले में मस्जिद के इमाम आफताब हुसैन और मेहताब हुसैन को ज़िम्मेदार ठहराया गया है. आरोप है कि उन्होंने लगभग 0.134 हेक्टेयर जमीन पर क़ब्ज़ा किया, जिसे राजस्व रिकॉर्ड में गांव की सामुदायिक जमीन बताया गया है और जो पौधारोपण के लिए आरक्षित थी.अदालत ने यह दावा भी खारिज कर दिया कि यह ज़मीन वक़्फ़ बोर्ड की है.
फैसले के बाद इमाम आफताब हुसैन ने कहा कि यह आदेश उनके लिए बड़ा झटका है और इतनी बड़ी रकम भरना उनके लिए संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि वे कई वर्षों से गांव में नमाज़ पढ़ा रहे हैं और लोगों की मदद करते रहे हैं. उनके अनुसार इतना बड़ा जुर्माना गरीब लोगों के लिए “मौत की सज़ा जैसा” है. इमाम मेहताब हुसैन ने कहा कि गांव के लोग लंबे समय से इस मस्जिद और मज़ार का इस्तेमाल करते आ रहे हैं और उन्हें हमेशा बताया गया था कि ज़मीन वक़्फ़ की है.
प्रगति सक्सेना: युद्ध विभीषिका से त्रस्त समय में हिंसा को ग्लैमराइज करती फिल्म धुरंधर का सीक्वल आपको सम्मोहित करने के लिए तैयार है!
5 दिसंबर को रिलीज हुई फिल्म धुरंधर ने ना सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर कमाई के रिकॉर्ड तोड़े बल्कि पर्दे पर उकेरी गई हिंसा, खून खराबा, और भड़कीले संगीत व राष्ट्रभक्ति के भी नए आयाम कायम किए. एक और संदर्भ में इस फिल्म ने नई मिसाल कायम की कि जिन फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म की आलोचना की थी उन्हें सोशल मीडिया पर शर्मिंदगी की हद तक गरियाया गया.
अब 19 मार्च को इसकी सीक्वल फिल्म ‘धुरंधर : बदला’ रिलीज होगी.
एक तो यह सीक्वल का पाश्चात्य कॉन्सेप्ट अपने यहां ज्यादा जमता नहीं है, हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सीक्वल वाली फिल्मों की बहार आ गई. इनमें कुछ चलीं, कुछ बैठ गईं. लेकिन बतौर एक ठेठ देसी फिल्म दर्शक मैं यह कह सकती हूं कि सीक्वल वाली फिल्में एक फ्रेंचाइजी को स्थापित करने या लोकप्रिय बनाने के लिए तो कारगर हो सकती हैं लेकिन हमारे कथा-जगत में फिट नहीं बैठतीं.
बहरहाल, धुरंधर 2 का ट्रेलर हाल में रिलीज हुआ और उसमें पहली फिल्म से कहीं ज्यादा मारधाड़ और हिंसा नजर आती है.
मगर अब हमारे स्थिति जरा अलग है. धुरंधर 1 तक तो दुनिया के हालात फिर भी ठीक थे, सब लोग अपने अपने देशों में अपने अपने आसपास के समुदायों से नफरत में सुलग रहे थे लेकिन फिर भी खूनखराबे पर ज़रा लगाम थी.
कुछ ही महीनों में अमेरिका - इजरायल द्वारा ईरान पर हमले ने वक्त और जज्बात दोनों ही बदल दिए हैं.
अब असल जीवन में हमारे आसपास हिंसा है, भय है, असुरक्षा है, गैस -पट्रोल की कमी भी है. तिस पर महंगाई का भूत अब हमारे निकट भविष्य को लील रहा है.
ऐसे में धुरंधर टाइप का ईंधन और हौंसला कितना काम आता है, लोगों को कितना लुभा पाता है - यह उत्सुकता का विषय है.
ट्रेलर को देखने के बाद इसका टैगलाइन संवाद ‘ हौंसला, ईंधन, बदला ‘ बहुत देर तक चुभता रहा. दुनिया भर में इतनी हिंसा, लड़ाई के बावजूद हमारे देश में लोग नफरत के चलते बिलावजह एक - दूसरे को पीट कर, या तरह तरह से मार ही रहे हैं. जिंदगी बहुत सस्ती हो गई है, बाकी सब काफी महंगा. ऐसे में क्या दर्शक अपने फ्रस्ट्रेशन को मनोरंजन में साक्षात उतरते देखने से संतुष्ट होंगे या इसे नकार देंगे; क्या तमाम समस्याओं और अब युद्ध के चलते हम पर मंडराती चुनौतियों के बरक्स हमें ‘ बदले ‘ यानी प्रतिशोध के लिए ईंधन और हौंसले की दरकार है या सीधेसादे मनोरंजन की, जिसमें खून खच्चर नहीं बल्कि सरल मानवीय संवेदनाओं की बात हो - ये सवाल लगातार पीछा करते हैं.
अब बस यही उम्मीद है कि निर्देशक आदित्य धर और अन्य हिंदी फिल्म निर्देशक हिंसा का यह ईंधन परोसना बंद कर दें और कुछ ‘फील गुड ‘ फिल्में भी बनाएं.
बाकी सत्ता के लिए खींचतान और जासूसी वगैरह तो एक स्तर पर चलती ही रहती है. काश, इस पर भी कुछ लगाम लग जाए.
अपील :
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