13/01/2026: चीन से एक तरफ नोंकझोंक, दूसरी तरफ चाय नाश्ता | हेट स्पीच बढ़ी | गुजरात में बुलडोजर | एक इंसान से पूरी दुनिया हलाकान! | राज ठाकरे का अडानी नक्शा | मणिपुर का दु:ख | गिग वर्कर के 10 मिनट
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
चीन-पाक सीमा विवाद: चीन ने शाक्सगाम घाटी में निर्माण को जायज बताया. भारत ने 1963 के समझौते को अवैध करार दिया.
RSS और चीन: गलवान संघर्ष के बाद पहली बार चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का प्रतिनिधिमंडल RSS नेता दत्तात्रेय होसबोले से मिला.
हेट स्पीच में बढ़ोतरी: 2025 में भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरती भाषणों में 13 प्रतिशत की वृद्धि. इंडिया हेट लैब की रिपोर्ट.
गुजरात में बुलडोजर: अहमदाबाद के चंडोला झील क्षेत्र में 12 हजार घर ध्वस्त. हजारों लोग बेघर. सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर उठे सवाल.
बासमती निर्यात ठप: ईरान संकट के कारण पंजाब से चावल का निर्यात रुका. घरेलू बाजार में कीमतें गिरीं.
क्विक कॉमर्स डिलीवरी: ब्लिंकिट और जेप्टो ने 10 मिनट डिलीवरी का दावा छोड़ा. अब सुरक्षा पर जोर.
अडानी पर राज ठाकरे: मनसे प्रमुख ने अडानी के एकाधिकार का विरोध किया. कहा मैं विकास विरोधी नहीं. मोनोपोली विरोधी हूं.
मणिपुर में तनाव: कुकी-जो समुदाय ने अलग केंद्र शासित प्रदेश की मांग को लेकर विशाल रैली का ऐलान किया.
वैश्विक उथल-पुथल: ट्रंप की आक्रामक नीतियों से वैश्विक व्यवस्था को खतरा. ईरान में प्रदर्शनों के बीच हजारों मौतों की आशंका.
चीन और भारत में शाक्सगाम घाटी को लेकर नोंकझोंक, उधर चीन-दिल्ली में बढ़ती मुलाकातें
चीन ने जम्मू-कश्मीर के हिस्से, शाक्सगाम घाटी में अपनी निर्माण गतिविधियों पर भारत की आपत्तियों को खारिज कर दिया है और कहा है कि अब यह “आलोचना से परे” (पूरी तरह उचित) है. “पीटीआई” की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक प्रश्न के उत्तर में चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने दावा किया कि यह क्षेत्र चीन का है और बीजिंग को अपने क्षेत्र में निर्माण करने का पूरा अधिकार है.
माओ ने पत्रकारों से कहा कि शाक्सगाम चीन का हिस्सा है और अपने क्षेत्र में निर्माण कार्य करना न्यायसंगत है. उन्होंने 1963 में पाकिस्तान और चीन के बीच हुए समझौते का हवाला देते हुए कहा कि दोनों देश आपसी सहमति से सीमा पर सहमत हुए थे. उन्होंने आगे कहा कि एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में यह समझौता करना दोनों देशों के अधिकार क्षेत्र में था.
इस बीच, नई दिल्ली ने 1963 के उस समझौते को खारिज कर दिया है, जिसके तहत पाकिस्तान ने 5,180 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन को सौंप दी थी, क्योंकि विचाराधीन भूमि पाकिस्तान के अवैध कब्जे में थी. भारत का स्पष्ट रुख है कि यह पूरा क्षेत्र जम्मू-कश्मीर का अभिन्न अंग है.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “शाक्सगाम घाटी भारतीय क्षेत्र है. हमने 1963 में हस्ताक्षरित तथाकथित चीन-पाकिस्तान ‘सीमा समझौते’ को कभी मान्यता नहीं दी है. हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि यह समझौता अवैध और अमान्य है.” उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संपूर्ण केंद्र शासित प्रदेश “भारत के अभिन्न और अटूट अंग हैं”, और यह रुख कई मौकों पर “पाकिस्तान और चीन को स्पष्ट रूप से बता दिया गया है.”
सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भी चीनी दावों को खारिज करते हुए कहा कि भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच 1963 के सीमा समझौते को मान्यता नहीं देता है. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि भारत उक्त समझौते को अवैध मानता है.
जनरल द्विवेदी ने कहा, “हम वहां किसी भी गतिविधि को स्वीकार नहीं करते हैं. जहां तक चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का सवाल है, हम इसे स्वीकार नहीं करते और इसे दोनों देशों द्वारा की जा रही एक अवैध कार्रवाई मानते हैं.”
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि आरएसएस में दत्तात्रेय होसबोले से मिलने पंहुचे
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले से मुलाकात की. सूत्रों के अनुसार, 2020 में गलवान घाटी संघर्ष के बाद भारत और चीन के संबंधों में आए हालिया सुधार के बीच यह दोनों देशों के सत्तारूढ़ संगठनों के बीच पहला सीधा ‘पार्टी-टू-पार्टी’ संपर्क है.
“द टेलीग्राफ” के अनुसार, चीनी प्रतिनिधिमंडल ने सुबह 11 बजे संघ के दूसरे सर्वोच्च पदाधिकारी होसबोले से उनके कार्यालय में भेंट की. यह बैठक करीब एक घंटे तक चली. सूत्रों ने बताया कि यह एक “शिष्टाचार भेंट” थी और बैठक का अनुरोध चीनी पक्ष की ओर से ही आया था. भाजपा के विदेश मामलों के प्रभारी विजय चौथाईवाले ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि सीपीसी की वाइस मिनिस्टर सुन हयान के नेतृत्व में चीनी प्रतिनिधिमंडल ने भाजपा मुख्यालय का भी दौरा किया. वहां भाजपा महासचिव अरुण सिंह के नेतृत्व वाली टीम के साथ दोनों पार्टियों के बीच संचार बढ़ाने के उपायों पर विस्तार से चर्चा हुई. इस दौरान भारत में चीन के राजदूत शू फेहोंग भी मौजूद थे.
सूत्रों का कहना है कि चीनी टीम ने भाजपा नेताओं को चीन आने का निमंत्रण भी दिया है. यह घटनाक्रम अक्टूबर 2024 में रूस के कज़ान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच पांच वर्षों में पहली द्विपक्षीय बैठक के बाद सामने आया है. उस बैठक ने सीमा पर तनाव कम करने और अन्य संवादों को बहाल करने का मार्ग प्रशस्त किया था, जिसका असर अब राजनीतिक दलों के स्तर पर भी दिख रहा है.
मुलाकात पर कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधिमंडल की आरएसएस और भाजपा के नेताओं के साथ “बंद कमरे” में हुई चर्चा पर सवाल उठाए हैं. पार्टी ने पड़ोसी देश के संबंध में नीति को लेकर केंद्र सरकार से पूर्ण जवाबदेही और पूरी पारदर्शिता की मांग की है. कांग्रेस के मीडिया और प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने सीपीसी प्रतिनिधियों की आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसबोले के साथ मुलाकात की भी आलोचना की. उन्होंने जोर देकर कहा कि “गैर-राज्य संस्थाओं” को देश की नीति नियंत्रित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. खेड़ा ने मांग की कि सीपीसी और भाजपा/आरएसएस पदाधिकारियों के बीच हुई सभी बंद कमरे की बैठकों के एजेंडा, परिणाम और विवरण को सार्वजनिक किया जाए. उन्होंने कहा कि आरएसएस पर्दे के पीछे से काम करता है. यह एक गैर-पंजीकृत संगठन है; और ऐसे संगठन को, जो खुलकर सामने आने में भी शर्माता है, राज्य की नीति को नियंत्रित करने और ऐसी बैठकें करने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए?”
भारत में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ ‘हेट स्पीच’ 13% बढ़ी, अधिकांश भाजपा शासित राज्यों में
वाशिंगटन स्थित एक रिसर्च ग्रुप ने मंगलवार को दावा किया है कि 2025 में भारत में मुसलमानों और ईसाइयों सहित अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत भरे भाषणों (हेट स्पीच) में 13 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है. ‘रायटर्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से अधिकांश घटनाएं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित राज्यों में घटी हैं.
‘इंडिया हेट लैब’ के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में हेट स्पीच के 1,318 मामले दर्ज किए गए. यह आंकड़ा 2024 में 1,165 और 2023 में 668 था. ये घटनाएं राजनीतिक रैलियों, धार्मिक जुलूसों, विरोध मार्च और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान हुईं. रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल 1,318 घटनाओं में से 1,164 घटनाएं उन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में हुईं जहां भाजपा या तो सीधे तौर पर या गठबंधन के साथ सत्ता में है.
वाशिंगटन में भारतीय दूतावास ने इस पर तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. हालांकि, मोदी और उनकी पार्टी हमेशा भेदभाव के आरोपों से इनकार करते रहे हैं और उनका कहना है कि उनकी नीतियां, जैसे खाद्य सब्सिडी और बिजली अभियान, सभी समुदायों को लाभान्वित करती हैं.
डेटा के अनुसार, अप्रैल महीने में सबसे ज़्यादा उछाल देखा गया, जिसमें 158 घटनाएं दर्ज हुईं. इनमें से लगभग 100 घटनाएं 22 अप्रैल (भारत प्रशासित कश्मीर में एक घातक आतंकवादी हमले के बाद) से 7 मई के बीच हुईं, जब भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक भीषण लड़ाई चली थी.
एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे मानवाधिकार समूहों का कहना है कि 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से भारत में अल्पसंख्यकों के साथ दुर्व्यवहार बढ़ा है. वे नागरिकता क़ानून, धर्म परिवर्तन विरोधी क़ानूनों, कश्मीर से विशेष दर्जा हटाने और मुस्लिम स्वामित्व वाली संपत्तियों को ढहाने (बुलडोज़र कार्रवाई) का हवाला देते हैं.
‘इंडिया हेट लैब’ अमेरिका स्थित कश्मीरी पत्रकार रकीब हमीद नाइक द्वारा स्थापित ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज़्ड हेट’ का एक प्रोजेक्ट है. भाजपा इससे पहले ‘इंडिया हेट लैब’ को भारत की पक्षपाती तस्वीर पेश करने वाला बता चुकी है. ग्रुप का कहना है कि वह हेट स्पीच की संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा का उपयोग करता है, जो धर्म, राष्ट्रीयता, नस्ल या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति या समूह के प्रति पूर्वाग्रह या भेदभावपूर्ण भाषा को नफ़रती भाषण मानती है. पूरी रिपोर्ट यहां से डाउनलोड की जा सकती है.
मोदी बनाम ममता: बंगाल की अस्मिता, अडानी का हित और ‘गुजरात मॉडल’ की थोपी जा रही जंग
काउंटरकरेंट्स पर प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव के एक विश्लेषणात्मक लेख के अनुसार, पश्चिम बंगाल में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल अब केवल आरएसएस और भाजपा द्वारा एक राजनीतिक विमर्श स्थापित करने तक सीमित नहीं रह गई है. यह लड़ाई भारत के संघीय ढांचे की सीमाओं को लांघ चुकी है. लेख में तर्क दिया गया है कि भाजपा और संघ परिवार की बंगाल को जीतने की हताशा ने बंगाली उप-राष्ट्रवाद (Sub-nationalism) और वहां की सांस्कृतिक पहचान को खतरे में डाल दिया है.
गुजरात मॉडल बनाम बंगाली अस्मिता
लेखक का कहना है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की गुजराती जोड़ी बंगाल को “गुजरात मॉडल” की तर्ज पर विकसित करने का वादा कर रही है, लेकिन असल में उनकी मंशा बंगाल को एक “गुजरात कॉलोनी” में बदलने की है. विश्लेषण के मुताबिक, गुजरात का विकास मॉडल स्वयं सवालों के घेरे में है. नीति आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि गुजरात के दाहोद जैसे जिलों में गरीबी दर 38% से अधिक है और राज्य कुपोषण व स्वास्थ्य मानकों में पिछड़ा हुआ है. इसके बावजूद, इसे बंगाल पर थोपने का प्रयास बंगाली संस्कृति और सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा माना जा रहा है.
अडानी का आर्थिक कोण
लेख में दावा किया गया है कि मोदी की बंगाल में रुचि विशुद्ध रूप से राजनीतिक न होकर उद्योगपति गौतम अडानी को लाभ पहुंचाने से प्रेरित है. अडानी समूह पूर्वोत्तर भारत और बंगाल में बंदरगाहों, डेटा सेंटरों, लॉजिस्टिक्स और खाद्य तेल उत्पादन में 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करने का इच्छुक है. चूंकि बंगाल में औद्योगीकरण की सख्त जरूरत है, इसलिए केंद्र सरकार अडानी के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है. लेखक का मानना है कि ममता बनर्जी भले ही अडानी के प्रति नरम रही हों, लेकिन वे बंगाल को उन्हें प्लेट में सजाकर सौंपने के खिलाफ हैं.
सांस्कृतिक विसंगति और ‘बाहरी’ का मुद्दा
आरएसएस बंगाल में अपने “हिंदू राष्ट्र” के एजेंडे को लागू करना चाहता है, लेकिन बंगाली हिंदू धर्म और संघ के हिंदुत्व में बुनियादी अंतर है. बंगाली संस्कृति में ‘मां दुर्गा’ सर्वोच्च हैं, जबकि संघ वहां ‘जय श्री राम’ के नारे और आक्रामक धार्मिक प्रदर्शनों (शक्ति प्रदर्शन) के जरिए सांस्कृतिक बदलाव लाना चाहता है. लेखक लिखते हैं कि बंगाली संस्कृति जहां शिक्षा और कला को महत्व देती है, वहीं गुजराती संस्कृति व्यापार और उद्यम पर केंद्रित है—ये दोनों संस्कृतियां एक-दूसरे के अनुकूल नहीं हैं. इसी वजह से ममता बनर्जी भाजपा को “बोहिरागतो” (बाहरी) कहती हैं जो बंगाल की विरासत का सम्मान करना नहीं जानते.
2026 चुनाव और ध्रुवीकरण
लेख के अनुसार, 2026 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा और आरएसएस ने “जिहादी तत्वों” और घुसपैठ के मुद्दे को हवा दी है. हालांकि, लेखक का तर्क है कि कोलकाता का मेडिकल टूरिज्म और व्यापार बांग्लादेश के साथ अच्छे संबंधों पर निर्भर है, जिसे संघ की विचारधारा नुकसान पहुंचा रही है. 2016 के बाद से संघ ने बंगाल में अपनी पैठ बढ़ाई है और अब वहां 1,700 से अधिक शाखाएं सक्रिय हैं.
अंत में, यह चुनावी लड़ाई अब टीएमसी द्वारा बंगाली गौरव की रक्षा और भाजपा द्वारा एक हिंदी-केंद्रित राष्ट्रीय पहचान थोपने के बीच का संघर्ष बन गई है.
चुनाव आयोग ने बिना पक्ष सुने बंगाल के 54 लाख ‘असली मतदाताओं’ के नाम हटाए, 1 करोड़ हटाने की योजना: ममता
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार को आरोप लगाया कि राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूची के मसौदे से जो 54 लाख नाम हटाए गए हैं, वे चुनाव आयोग द्वारा एकतरफा तरीके से हटाए गए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग ने इस काम को अंजाम देने के लिए निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) की शक्तियों का “दुरुपयोग” किया है.
“पीटीआई” के मुताबिक, बनर्जी ने आरोप लगाया कि हटाए गए मतदाताओं में से अधिकांश “असली मतदाता” थे, जिन्हें अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया, क्योंकि उन्हें नाम हटाए जाने के आधारों के बारे में सूचित तक नहीं किया गया था.
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बनर्जी ने आरोप लगाया, “चुनाव आयोग ने उन महिलाओं के नाम हटा दिए जिन्होंने शादी के बाद अपना उपनाम बदल लिया था. राज्य भर के कई ऐसे मतदाताओं को भी ‘मृत’ घोषित कर दिया है, जो अभी भी जीवित हैं.” उन्होंने आगे कहा कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों को 54 लाख नाम हटाने की जिम्मेदारी दी गई थी, जबकि कई मामलों में इन अधिकारियों को यह पता भी नहीं था कि चिन्हित किए गए नामों को हटाया जा रहा है. बनर्जी ने कहा कि “भाजपा-चुनाव आयोग की साठगांठ” अंतिम सूची से एक करोड़ और नाम हटाने की योजना बना रही है.
मुख्यमंत्री ने कहा, “आयोग ने तार्किक विसंगति के आधार पर सत्यापन सुनवाई के लिए 1.36 करोड़ अन्य मतदाताओं को चिन्हित किया है. नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन, कवि जॉय गोस्वामी, क्रिकेटर मोहम्मद शमी और लक्ष्मी रतन शुक्ला जैसी जानी-मानी हस्तियां उस सूची का हिस्सा हैं. यह सूची इसलिए बनाई गई ताकि एक करोड़ मतदाताओं को हटाया जा सके.” तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ने कहा, “चुनाव आयोग ने बीएलए (बूथ स्तर के एजेंट) को सुनवाई में शामिल होने की अनुमति नहीं दी है, क्योंकि भाजपा इस काम के लिए अपने कार्यकर्ताओं को इकट्ठा नहीं कर पाई थी.”
गुजरात में बुलडोज़र राजनीति: अपने ही शहर में शरणार्थी बने हजारों, ईंटों के ढेर और टूटे हुए अरमान बिखरे पड़े हैं
“मैंने अपनी मेहनत की कमाई से जो कुछ भी खरीदा था, और वह घर जिसमें मैंने अपने बच्चों को पाला, अब उसका कोई अस्तित्व नहीं है,” मुमताज की आँखों में आँसू और आवाज में भारीपन था. मुमताज उन हजारों बदनसीबों में से एक हैं, जिनका जीवन अप्रैल 2025 के उस “मेगा डिमोलिशन ड्राइव” (ध्वस्तीकरण का महा अभियान) की भेंट चढ़ गया, जिसने अहमदाबाद के चंडोला झील क्षेत्र की सूरत ही बदल दी.
यह विध्वंस अभियान ऐसे समय में चलाया गया, जब महज पांच महीने पहले भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आवास के अधिकार को मौलिक अधिकार के करीब बताया था और राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे “न्यायेतर विध्वंस” की कड़ी आलोचना की थी. इसके बावजूद, अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) ने कम से कम 12,000 घरों को मलबे में तब्दील कर दिया. आज नौ महीने बीत जाने के बाद भी चंडोला झील के किनारे सिर्फ ईंटों के ढेर और टूटे हुए अरमान बिखरे पड़े हैं.
स्वतंत्र पत्रकार तरुशी असवानी ने “द वायर” के लिए लिखी लंबी रिपोर्ट में कहा है कि सियासत नगर के पूर्व निवासी सैयद मिन्हाजुद्दीन उस दिन को याद करते हुए सिहर उठते हैं. वे कहते हैं, “जहां तक मेरी नज़र जा रही थी, मुझे सिर्फ पुलिसकर्मियों का एक समंदर दिखाई दे रहा था.” मिन्हाजुद्दीन और उनके जैसे हजारों लोगों के लिए वह दिन केवल घर खोने का नहीं, बल्कि गरिमा और आत्मसम्मान के हनन का दिन था.
विध्वंस शुरू होने से पहले पुलिस की कार्रवाई ने दहशत का माहौल बना दिया था. मिन्हाजुद्दीन ने बताया कि बंगाली वास इलाके के 457 पुरुषों को इकट्ठा किया गया और उन्हें चार किलोमीटर तक सड़क पर पैदल चलाया गया (परेड कराई गई). उन पर आरोप लगाया गया कि वे ‘अवैध बांग्लादेशी’ हैं. इस सांप्रदायिक विमर्श के तुरंत बाद जेसीबी की गर्जना ने हजारों लोगों को उनके ही शहर में शरणार्थी बना दिया.
विस्थापन का दर्द और ‘पहचान’ की जद्दोजहद
विस्थापन के बाद की कहानी और भी हृदयविदारक है. सरकारी बानो, जिनका मानना है कि गरीब लोग बिना किसी अधिकार के पैदा होते हैं, कहती हैं कि इस फैसले ने उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से 20 साल पीछे धकेल दिया है. बेवाओं (विधवाओं), यतीमों (अनाथों) और गरीबों से उनकी छत छीन ली गई.
आज, सियासत नगर के कई लोग अपने ही ऑटो-रिक्शा को ‘लिविंग रूम’ की तरह इस्तेमाल करने पर मजबूर हैं. मिन्हाजुद्दीन अब एक तंग कमरे में किराए पर रहते हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी चिंता उनके घर के दस्तावेज हैं. अलमारी न होने के कारण उन्होंने अपने पासपोर्ट और राशन कार्ड अपने स्कूटर की डिक्की में छिपा रखे हैं. विडंबना देखिए, जिस पुलिस ने उन्हें ‘बांग्लादेशी’ कहकर घसीटा था, आज उनके पास मौजूद पासपोर्ट ही उनकी भारतीयता का एकमात्र सबूत बचा है.
पुनर्वास के नाम पर एक क्रूर मज़ाक
गुजरात सरकार की 2010 और 2013 की ‘झुग्गी पुनर्वास और पुनर्विकास’ नीतियां कागजों पर तो प्रभावशाली हैं, लेकिन धरातल पर उनकी सच्चाई कुछ और ही है. अधिवक्ता होजेफा उज्जैनी बताते हैं कि जिन लोगों के पास अपने पक्के घर थे, उन्हें अब ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) आवास के लिए आवेदन करने को कहा जा रहा है. केवल फॉर्म भरने की लागत 7,500 रुपये है. घर पाने के लिए पात्र व्यक्ति को 3.5 लाख रुपये चुकाने होंगे. लेकिन कई लोग, जैसे मिन्हाजुद्दीन, 2018 की आगजनी में अपने पुराने दस्तावेज खो चुके हैं, जिससे वे इस योजना के लिए अपात्र हो जाते हैं. ‘एएमसी’ ने विध्वंस से पहले कोई सर्वेक्षण नहीं किया, जो कि स्थापित कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है. लोगों को विकल्प दिए बिना ही सड़क पर फेंक दिया गया.
‘बुलडोजर राजनीति’ का पैटर्न
वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद याज्ञनिक के अनुसार, चंडोला का विध्वंस कोई अकेली घटना नहीं है. यह गुजरात में 2022 से चल रहे एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा है, जिसे आलोचक “बुलडोजर पॉलिटिक्स” कहते हैं. देवभूमि द्वारका (मार्च 2022) : 200 से अधिक मुस्लिम स्वामित्व वाली संरचनाएं ढहाई गईं. पोरबंदर (अक्टूबर 2022): मुरादशाह पीर दरगाह सहित 12 धार्मिक ढांचे नष्ट किए गए. जखौ बंदरगाह (नवंबर 2022): मेमन समुदाय के 300 घर और गोदाम ध्वस्त किए गए. वेरावल और जामनगर (2024-25): दर्जनों दरगाहों और मुस्लिम घरों को ‘अवैध’ बताकर साफ कर दिया गया.
याज्ञनिक का तर्क है कि इन कार्रवाइयों के पीछे दो मुख्य उद्देश्य हैं: पहला, अहमदाबाद को ओलंपिक या राष्ट्रमंडल खेलों जैसे आयोजनों के लिए एक ‘स्वच्छ’ वैश्विक शहर के रूप में पेश करना. दूसरा, उन क्षेत्रों को निशाना बनाना जो विपक्षी दल (कांग्रेस) के गढ़ माने जाते हैं.
कानूनी विफलता और मानवाधिकारों का हनन
जब निवासियों ने गुजरात उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, तो उन्हें वहां से भी निराशा हाथ लगी. अदालत ने गुजरात भू-राजस्व संहिता का हवाला देते हुए इसे “जलाशय का संरक्षण” करार दिया और विध्वंस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. हालांकि याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि उन्हें बिना नोटिस दिए निकाला गया, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन हुआ, लेकिन अदालती आदेश ने अंततः प्रशासनिक बुलडोजर का ही रास्ता साफ किया. सामाजिक कार्यकर्ता कलीम सिद्दीकी बताते हैं कि मानवीय संवेदनाएं इस हद तक मर चुकी थीं कि पुलिस ने विध्वंस के बाद एनजीओ को पीड़ितों तक खाना और पानी पहुंचाने से भी रोक दिया.
कुलमिलाकर, चंडोला झील का विध्वंस केवल ‘अतिक्रमण हटाने’ की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह एक सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की पराकाष्ठा थी. किसी भी लोकतांत्रिक ढांचे में विस्थापन के साथ पुनर्वास अनिवार्य होता है, लेकिन यहां विस्थापितों को निजी रेंटल मार्केट के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया, जहां मकान मालिक उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर तीन गुना किराया वसूल रहे हैं.
पूर्व निवासियों और कानूनी विश्लेषकों के लिए यह घटना एक कड़वी याद दिलाती है कि हाशिए पर खड़े समुदायों के लिए ‘घर’ का मतलब सिर्फ ईंट और पत्थर नहीं, बल्कि उनके नागरिक होने की आखिरी पहचान भी है, जिसे राज्य की ताकत कभी भी मलबे में बदल सकती है. चंडोला आज एक उजाड़ मैदान है, जो भारत के विकास मॉडल और उसकी न्याय प्रणाली पर कई असहज सवाल खड़े कर रहा है.
दो महीने तक जेल में रहे मुस्लिम नाबालिग को 5 लाख मुआवजे का आदेश, गिरफ्तारी को “अवैध” बताया
पटना उच्च न्यायालय ने बिहार पुलिस द्वारा एक मुस्लिम नाबालिग छात्र की गिरफ्तारी को “अवैध” करार दिया है. छात्र को दो महीने से अधिक समय तक जेल में रखा गया था. अदालत ने राज्य सरकार को उसे 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश देते हुए कहा कि वह इस मामले में “मूक दर्शक” बनी नहीं रह सकती.
“मकतूब मीडिया” के मुताबिक, लड़के के परिवार की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति रितेश कुमार की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि छात्र की हिरासत अनुचित थी और इसके लिए पुलिस को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए. पीठ ने कहा, “जांच अधिकारी ने बिना किसी ठोस आधार या सबूत के 16 साल से कम उम्र के छात्र को गिरफ्तार किया. उन्हें इस मामले में ऐसा नहीं करना चाहिए था.”
ईरान संकट से पंजाब का बासमती निर्यात ठप, घरेलू बाजार में कीमतें धड़ाम
ईरान में बिगड़ते हालात और भू-राजनीतिक तनाव को देखते हुए भारतीय बासमती चावल निर्यातकों ने एहतियात के तौर पर वहां चावल का निर्यात अस्थायी रूप से रोक दिया है. पंजाब के निर्यातकों के लिए यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि ईरान परंपरागत रूप से भारतीय बासमती का दूसरा सबसे बड़ा और विश्वसनीय बाजार रहा है. निर्यात रुकने का सीधा और गहरा असर घरेलू बाजार पर पड़ा है, जहां बासमती की कीमतें 300 रुपये से 800 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गई हैं. औसतन 8,000 रुपये प्रति क्विंटल वाला भाव अब काफी नीचे लुढ़क गया है.
पिछले छह दिनों से निर्यातकों का ईरानी आयातकों से संपर्क पूरी तरह टूट चुका है, जिससे पुराने भुगतानों में देरी और नई शिपमेंट को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है. ‘बासमती राइस मिलर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन’ के रंजीत सिंह जोसन ने ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि संकट केवल सीधे व्यापार तक सीमित नहीं है. ईरान के रास्ते, विशेष रूप से रणनीतिक चाबहार या बंदर-अब्बास पोर्ट के जरिए अफगानिस्तान, तुर्की और रूस जाने वाला ‘ट्रांजिट ट्रेड’ भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है. आपूर्ति शृंखला में बाधा आने से कई वस्तुओं की आवाजाही रुक गई है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. भारत ने चालू वित्त वर्ष में अप्रैल-नवंबर के दौरान ईरान को 468.10 मिलियन डॉलर का बासमती निर्यात किया था. इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन के अध्यक्ष प्रेम गर्ग ने निर्यातकों को सलाह दी है कि वे ईरान के लिए बने स्टॉक को लेकर सतर्क रहें और भुगतान सुरक्षित होने पर ही कदम बढ़ाएं. उन्होंने चेतावनी दी कि मौजूदा हालात में बिना सावधानी के आगे बढ़ना किसानों और मिलर्स के लिए आर्थिक संकट पैदा कर सकता है.
सरकार के दखल के बाद ‘10 मिनट में डिलीवरी’ की जिद छोड़ेंगी कंपनियां, बदलेंगी टैगलाइन
केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया के हस्तक्षेप के बाद ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी और जोमैटो जैसी प्रमुख क्विक कॉमर्स कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म से विवादास्पद ‘10 मिनट डिलीवरी’ सिस्टम को हटाने का फैसला किया है. 31 दिसंबर को गिग वर्कर्स द्वारा की गई एक दिवसीय हड़ताल और सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए यह महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है. श्रमिकों की यूनियनों ने शिकायत की थी कि यह मॉडल उनकी जान को जोखिम में डाल रहा है.
“द हिंदू” की खबर है कि मंडाविया ने पिछले सप्ताह एग्रीगेटर कंपनियों के साथ एक अहम बैठक की थी. कंपनियों ने तर्क दिया था कि वे गोदामों के घने नेटवर्क के जरिए यह स्पीड हासिल करते हैं न कि वर्कर पर दबाव डालकर. हालांकि, मंत्री ने श्रमिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं के मद्देनजर इस आक्रामक ब्रांडिंग को बंद करने का आग्रह किया, जिसे कंपनियों ने मान लिया है.
ब्लिंकिट ने मंत्रालय को सूचित किया है कि उसने अपनी प्रमुख टैगलाइन “10,000+ उत्पाद 10 मिनट में डिलीवर” को संशोधित कर अब “30,000+ उत्पाद आपके दरवाजे पर डिलीवर” कर दिया है. इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स के महासचिव शेख सलाउद्दीन ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि 10 मिनट का मॉडल डिलीवरी पार्टनर्स को सड़क पर खतरनाक व्यवहार, रेड लाइट जंप करने और अत्यधिक तनाव की ओर धकेल रहा था. उन्होंने इसे मुनाफा कमाने की समयसीमा पर श्रमिकों की सुरक्षा की जीत बताया है.
मैं विकास विरोधी नहीं, अडानी के बढ़ते एकाधिकार के खिलाफ हूं: राज ठाकरे
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) प्रमुख राज ठाकरे ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, बल्कि “एक ही उद्योगपति के बढ़ते एकाधिकार” के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. पुणे में पत्रकारों से बात करते हुए ठाकरे ने तीखे शब्दों में कहा, “सीमेंट से लेकर स्टील तक, हर क्षेत्र में प्रोजेक्ट सिर्फ अडानी समूह को दिए जा रहे हैं. उन्हें इस तरह का एकाधिकार देने का मतलब है देश पर उनका असंतुलित प्रभाव होने देना.”
राज ठाकरे उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के उस आरोप का जवाब दे रहे थे, जिसमें उन्होंने एमएनएस और उद्धव ठाकरे को विकास विरोधी बताया था. “द हिंदू” के मुताबिक, राज ठाकरे ने गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा कि अडानी को इतने नए कारोबार स्थापित करने के लिए पैसा कहां से मिल रहा है? किन बैंकों और संस्थाओं पर उन्हें लोन देने का दबाव डाला जा रहा है? उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इसकी गहराई में जाया गया तो देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है.
उन्होंने इंडिगो एयरलाइंस के हालिया संकट का उदाहरण देते हुए कहा कि हवाई अड्डों और बंदरगाहों का नियंत्रण एक समूह को सौंपना खतरनाक है. ठाकरे ने तर्क दिया कि पिछले 10 सालों में अडानी सीमेंट सेक्टर में दूसरे सबसे बड़े खिलाड़ी बन गए हैं, जबकि यह उनका मूल क्षेत्र कभी नहीं था. उन्होंने कहा, “नवी मुंबई हवाई अड्डे को छोड़कर अडानी ने किसी का विकास नहीं किया, फिर भी उन्हें सरकारी हवाई अड्डे सौंपे जा रहे हैं. 65% ऑपरेशंस इंडिगो को देने का नतीजा हम देख चुके हैं, जब नागरिकों को भयानक अनुभव से गुजरना पड़ा.”
राज ठाकरे ने अडानी घराने की चमत्कारी बढ़त पर ये वीडियो जारी किया था.
भारत को श्रमिकों के निर्यात की नहीं, बल्कि विदेशी पूंजी के आयात की सख्त ज़रूरत है: रुचिर शर्मा
रॉकफेलर इंटरनेशनल के चेयरमैन और प्रसिद्ध लेखक रुचिर शर्मा ने अपने लेख में कहा है कि भले ही भारत 8% से अधिक जीडीपी वृद्धि दिखा रहा है, लेकिन विदेशी निवेशकों का उत्साह ठंडा पड़ चुका है. देश में विदेशी पैसा आना कम हो गया है, जो संकेत देता है कि बाहरी दुनिया को इन हेडलाइन आंकड़ों पर पूरा भरोसा नहीं है. उनका मानना है कि जीडीपी के मुकाबले कॉर्पोरेट रेवेन्यू की वृद्धि दर काफी कम है, जो अंतर्निहित कमजोरियों को उजागर करती है.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि भारत से ‘प्रतिभा पलायन’ तेजी से बढ़ा है. इस दशक में हर साल औसतन 6.75 लाख लोग देश छोड़ रहे हैं, जो 2010 के दशक में 3.25 लाख था. सिलिकॉन वैली की तकनीकी वर्कफोर्स का एक तिहाई हिस्सा अब भारतीय है. यह वही स्किल्ड वर्कफोर्स है जिसकी भारत को आधुनिक क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए जरूरत थी. यहां तक कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी 2024 में 38% छात्र बिना नौकरी के रहे.
शर्मा लिखते हैं कि ‘लाइसेंस राज’ की छाया और कठिन व्यावसायिक माहौल के कारण भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ़डीआई) जीडीपी का मात्र 0.1% रह गया है, जबकि चीन और वियतनाम जैसे देशों में उनके बूम के दौरान यह 4% तक था. इसके अलावा, पड़ोसियों के साथ बिगड़ते संबंध, अमेरिका के साथ टैरिफ युद्ध और आरएंडडी (शोध) पर जीडीपी का मात्र 0.65% खर्च करना भारत की तकनीकी क्षमता पर सवाल खड़े करता है. भारत को अमीर बनने के लिए घरेलू बचत काफी नहीं है, उसे तेजी से बढ़ने के लिए विदेशी पूंजी के आयात की सख्त ज़रूरत है, न कि श्रमिकों को बाहर भेजने की.
कश्मीर में मस्जिदों और मदरसों की ‘प्रोफाइलिंग’ शुरू, पुलिस जुटा रही इमामों की निजी जानकारी
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने घाटी में मस्जिदों और मदरसों की व्यापक जानकारी जुटाने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया है. इसमें इमामों, मुअज़्ज़िनों, प्रबंधन समितियों के सदस्यों और यहां तक कि मस्जिद के चैरिटी विंग (बैत-उल-माल) के सदस्यों के बेहद निजी विवरण मांगे जा रहे हैं. चार पन्नों का एक विस्तृत फॉर्म गांव के नंबरदारों (राजस्व कर्मचारी) के जरिए वितरित किया जा रहा है.
फ़ैयाज़ वानी की रिपोर्ट है कि पहली बार पुलिस मस्जिदों के संप्रदाय (जैसे बरेलवी, हनफी, देवबंदी या अहले-हदीस) के बारे में भी पूछ रही है. फॉर्म में मस्जिद के निर्माण की लागत, फंड का स्रोत, मासिक बजट, बैंक खाता विवरण और जमीन की प्रकृति (सरकारी, मिलकियत या शामिलात) का ब्योरा देना अनिवार्य किया गया है. इसके अलावा, मस्जिद से जुड़े लोगों के मोबाइल का आईएमईआई नंबर, आधार, पैन कार्ड, सोशल मीडिया हैंडल (व्हाट्सएप, ईमेल आदि), और उनके परिवार के विदेश में रहने वाले सदस्यों की जानकारी भी मांगी गई है.
मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा (एमएमयू) ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे मौलिक अधिकारों और निजता का उल्लंघन बताया है. एमएमयू ने कहा है कि यह धार्मिक संस्थानों को नियंत्रित करने और डराने का प्रयास है. नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा रूहुल्लाह मेंहदी ने इसे “आरएसएस की विचारधारा थोपने की कोशिश” करार दिया. उन्होंने कहा, “सुरक्षा एजेंसियों के पास पहले से ही आधार और सारा डेटा है. किसी खास धर्म के लोगों को अलग-थलग कर उन पर निगरानी रखना उत्पीड़न जैसा है.” वहीं, अधिकारियों का कहना है कि यह कदम पिछले साल पकड़े गए “व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल” की जांच के बाद उठाया गया है, जिसमें कुछ मदरसों और इमामों के जरिए कट्टरपंथ फैलाने की बात सामने आई थी.
असम के ‘कहीं के नहीं’ लोग: 24 घंटे में भारत छोड़ने का आदेश, बांग्लादेश बॉर्डर पर धक्के
असम के नागांव निवासी 58 वर्षीय किसान तहेर अली की कहानी एक मानवीय त्रासदी को बयां करती है. पिछले आठ महीनों में उन्हें तीन बार भारत से निकालकर बांग्लादेश सीमा पर धकेला (पुश-बैक) गया है. “स्क्रोल.इन” में रोकीबुज़ ज़मान ने लिखा है कि असम की भाजपा सरकार ने मई 2024 से घोषित विदेशियों को औपचारिक निर्वासन प्रक्रिया के बजाय “पुश-बैक” के जरिए सीमा पार भेजने की सख्त नीति अपनाई है. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इसके लिए 1950 के एक पुराने कानून का हवाला दिया है.
दिक्कत यह है कि बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड्स (बीजीबी) इन लोगों को स्वीकार नहीं करते, जिसके चलते वे ‘नो-मैन्स लैंड’ में फंस जाते हैं या वापस भारत में धकेल दिए जाते हैं. नवंबर से अब तक 22 लोगों को “24 घंटे के भीतर देश छोड़ने” का नोटिस दिया गया, जिससे उन्हें अदालत जाने या अपील करने का मौका भी नहीं मिला. तहेर अली के बेटे हसन अली ने बताया, “मेरे पिता भारतीय हैं, 1965 की वोटर लिस्ट में उनके दादा का नाम है. उन्हें पेंडुलम की तरह दो देशों के बीच फेंका जा रहा है. बांग्लादेश उन्हें अपना नहीं मानता और भारत उन्हें निकाल रहा है, तो हमारा देश कौन सा है?”
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह “स्टेटलेसनेस” (राज्यविहीनता) पैदा करने जैसा है और भारत के संविधान व अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है. बिना नागरिकता सत्यापन के किसी को दूसरे देश में धकेलना मानवाधिकारों के खिलाफ है. तहेर अली और इद्रिश अली जैसे लोग अब पुलिस और बॉर्डर गार्ड्स के बीच फंसकर रह गए हैं, और उनका भविष्य पूरी तरह अंधकारमय है.
आरएसएस विवाद के बीच दिग्विजय का राज्यसभा से किनारा, कांग्रेस की ज़मीन करेंगे मज़बूत
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब राज्यसभा के लिए एक और कार्यकाल की मांग नहीं करेंगे. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि सिंह को अब कांग्रेस के ज़मीनी नेटवर्क को मज़बूत करने और पार्टी के पुनर्निर्माण के लिए तैनात किए जाने की संभावना है.
हाल ही में, कांग्रेस के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के प्रदेशाध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने सिंह से अपील करते हुए कहा था, “मध्य प्रदेश की लगभग 17 फ़ीसदी अनुसूचित जाति (एससी) की आबादी की उम्मीदों को आपके सामने रखते हुए, मैं आपसे आग्रह करता हूं कि इस बार राज्यसभा में एससी वर्ग से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करें.” इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सिंह ने कहा, “यह मेरे हाथ में नहीं है. मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैं अपनी सीट ख़ाली कर रहा हूं.”
आंतरिक चर्चाओं से परिचित कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि यह क़दम नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के विजन के अनुरूप है, जो युवा नेताओं को बढ़ावा देकर कांग्रेस का पुनर्निर्माण करना चाहते हैं. नेता ने कहा कि दिग्विजय सिंह, जिनकी संगठनात्मक पकड़ काफ़ी मज़बूत है, को ज़मीनी स्तर के संगठन को मज़बूत करने के लिए भेजा जाएगा. इसके साथ ही, अगले विधानसभा चुनावों से पहले युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए वे एक और ‘नर्मदा परिक्रमा’ भी कर सकते हैं.
यह रणनीति राहुल गांधी के ‘संगठन सृजन’ पहल का हिस्सा है. इसका उद्देश्य वरिष्ठ नेताओं को ज़मीनी काम के लिए तैनात करना और युवाओं के लिए ज़िम्मेदारी के रास्ते खोलना है. 2017-18 में दिग्विजय सिंह द्वारा की गई 3,300 किलोमीटर की नर्मदा परिक्रमा ने मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला दिया था, जिसने 2018 के चुनावों में पार्टी में नई ऊर्जा भर दी थी. एक पार्टी पदाधिकारी के अनुसार, दूसरी परिक्रमा से भी बंटी हुई राज्य इकाई को एकजुट करने और युवा नेताओं का मार्गदर्शन करने में मदद मिलेगी.
हालांकि, दिग्विजय सिंह के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. दो दशकों की विपक्षी राजनीति, 2020 में विधायकों के दलबदल और संसाधनों की कमी के कारण मध्य प्रदेश कांग्रेस संगठन अंदर से खोखला हो चुका है. अपने राज्यसभा कार्यकाल के दौरान सिंह आरएसएस और भाजपा के ख़िलाफ़ वैचारिक लड़ाई में हमेशा मुखर रहे, जिससे वे धर्मनिरपेक्ष हलकों में तो लोकप्रिय हुए, लेकिन विवादों के केंद्र में भी रहे.
ग़ौरतलब है कि पिछले महीने ही सिंह ने भाजपा और आरएसएस की संगठनात्मक शक्ति और एक आम कार्यकर्ता से प्रधानमंत्री बनने तक नरेंद्र मोदी के सफर की तारीफ़ की थी. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस के भीतर ‘सत्ता के विकेंद्रीकरण’ की वकालत की थी. हालांकि, बाद में उन्होंने सफ़ाई दी थी कि वे आरएसएस की विचारधारा और मोदी की नीतियों के “सबसे बड़े आलोचकों में से एक” हैं.
मणिपुर: अलग प्रशासन की मांग को लेकर कुकी-ज़ो समुदाय करेगा विशाल रैली, विधायकों पर एनडीए सरकार में न शामिल होने का दबाव
जातीय संघर्ष से झुलसे मणिपुर में कुकी-ज़ो आदिवासी समुदाय केंद्र सरकार से राजनीतिक समाधान की मांग को लेकर बुधवार (14 जनवरी, 2026) को एक विशाल रैली आयोजित कर रहा है. द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, यह रैली ऐसे समय में हो रही है जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लगे हुए लगभग एक साल पूरा होने वाला है. राज्य में 13 फरवरी, 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया था. अब अटकलें हैं कि जल्द ही एनडीए सरकार का गठन हो सकता है.
मंगलवार को कुकी-ज़ो काउंसिल ने पूरी जनता से अपील की कि वे अपने राजनीतिक समाधान को तेज़ करने के लिए कुकी-ज़ो बहुल ज़िलों में आयोजित इस रैली में शामिल हों. समुदाय का मानना है कि वे मैतेई समुदाय के साथ सह-अस्तित्व में नहीं रह सकते. काउंसिल ने एक बयान में कहा, “कुकी-ज़ो लोगों ने अभूतपूर्व अत्याचार सहे हैं. घरों और पूजा स्थलों का बड़े पैमाने पर विनाश हुआ है और 40,000 से अधिक निर्दोष लोग विस्थापित हुए हैं. इन हक़ीक़तों के बीच कुकी-ज़ो लोगों के लिए उसी प्रशासनिक व्यवस्था के तहत रहना असंभव हो गया है.”
इसी आधार पर, समुदाय ने भारत सरकार से विधायिका के साथ एक अलग केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) की औपचारिक और लोकतांत्रिक मांग की है. 3 मई, 2023 को शुरू हुए इस जातीय संघर्ष के लगभग तीन साल बाद भी कोई ठोस राजनीतिक समाधान न निकाल पाने के लिए काउंसिल ने सरकार की आलोचना की. इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फ़ोरम (आईटीएलएफ) चुराचांदपुर ज़िले में रैली का नेतृत्व करेगा और एकजुटता के प्रतीक के रूप में स्कूलों व संस्थानों को बंद रखने का अनुरोध किया है.
दिलचस्प बात यह है कि 10 कुकी-ज़ो विधायकों में से सात भाजपा से हैं. जैसे-जैसे केंद्र राज्य में सरकार बनाने की कोशिश कर रहा है, इन 10 विधायकों पर भारी दबाव है कि वे सरकार में शामिल न हों. अधिकांश कुकी-ज़ो संगठन इनके सरकार में शामिल होने के ख़िलाफ़ हैं.
मंगलवार को गुवाहाटी में 10 विधायकों, कुकी-ज़ो काउंसिल के नेताओं और ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस’ पर हस्ताक्षर करने वाले सशस्त्र समूहों के प्रतिनिधियों की एक बंद कमरे में बैठक हुई. बैठक के बाद, उन्होंने सर्वसम्मति से पांच सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया. इसमें केंद्र पर दबाव डाला गया है कि कुकी-ज़ो समुदाय के लिए अलग यूटी की मांग पूरी की जाए और भूमि स्वामित्व की सुरक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधान किए जाएं.
इस बीच मणिपुर के लोकसभा सदस्य अंगोमचा बिमोल एकोईजाम ने वहां की हालात पर एक वीडियो जारी किया है. जिसमें गृह मंत्री अमित शाह को सीधे निशाने पर लिया गया है.
ट्रम्प द्वारा शक्ति का नग्न प्रदर्शन वैश्विक व्यवस्था को ध्वस्त कर रहा है, दोस्त और दुश्मन दोनों हैरान
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल के उद्घाटन से कुछ दिन पहले ही आक्रामक कदमों की झड़ी लगा दी है, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी ‘नियमों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था’ पर प्रहार किया है. वेनेजुएला के नेता मादुरो को हटाना, ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात करना और ईरान को सैन्य हमले की धमकी देना—ये सब तथाकथित ‘डोनरो सिद्धांत’ का हिस्सा लगता है, जो 19वीं सदी के ‘मुनरो सिद्धांत’ का एक आक्रामक और आधुनिक रूप है.
“रॉयटर्स” का विश्लेषण बताता है कि ट्रम्प “स्फेयर ऑफ इन्फ्लुएंस” (प्रभाव के क्षेत्र) वाली पुरानी दुनिया की ओर लौट रहे हैं, जहां बड़ी शक्तियां कमजोर देशों पर अपनी मर्जी थोपती हैं. जर्मनी और जापान जैसे अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी इससे बेहद चिंतित हैं. जापानी सांसद इतसुनोरी ओनोडेरा ने कहा कि वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई “बलपूर्वक यथास्थिति बदलने” का उदाहरण है.
विशेषज्ञों का कहना है कि रूस और चीन इसे ध्यान से देख रहे हैं क्योंकि ट्रम्प की यह नीति परोक्ष रूप से उनकी अपनी विस्तारवादी नीतियों (जैसे ताइवान या यूक्रेन पर) को वैधता प्रदान करती है. ट्रम्प का संदेश दुनिया को स्पष्ट है कि अब अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं, बल्कि “बल का नियम” (लॉ ऑफ फोर्स) चलेगा. मेक्सिको और यूरोपीय देशों को डर है कि अमेरिका अपनी सेना और टैरिफ का इस्तेमाल कर अब बिना किसी नैतिक संकोच के अपनी शर्तें मनवाएगा.
भारत को अमेरिका की खुशामद छोड़कर एक ठोस ‘प्लान बी’ की ज़रूरत
जनवरी 2026 की घटनाएं बताती हैं कि वाशिंगटन में मोदी सरकार की कूटनीतिक पहुंच और प्रभाव कमजोर पड़ गया है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अन्य शीर्ष भारतीय अधिकारियों को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस और रक्षा सचिव जैसे अधिकारियों से मिलने के लिए एक लॉबिंग फर्म (जिसका नेतृत्व ट्रम्प के पूर्व प्रवक्ता जेसन मिलर कर रहे हैं) का सहारा लेना पड़ा. रक्षा और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सिंह अपने विश्लेषण में लिखते हैं कि जब किसी देश के विदेश मंत्री को अपने समकक्षों से बात करने के लिए लॉबिस्ट की ज़रूरत पड़े, तो यह कूटनीतिक ढांचे की विफलता का संकेत है.
लेख में तर्क दिया गया है कि भारत ने पिछले 12 वर्षों में ट्रम्प के साथ संबंधों में “व्यक्तिगत केमिस्ट्री” और “फोटो-ऑप्स” को “रणनीतिक लाभ” समझ लेने की गलती की. ट्रम्प ने हाल ही में पीएम मोदी के बारे में कहा था कि “वे मुझे खुश करना जानते हैं,” जो एक बराबरी के साथी की भाषा नहीं है बल्कि एक अधीनता का संकेत देती है. भारत के पास ट्रम्प की आक्रामकता और टैरिफ युद्ध से निपटने के लिए कोई ‘प्लान बी’ नहीं था.
विश्लेषण के अनुसार, भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बचाने के लिए यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते करने चाहिए थे या क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) जैसे व्यापार गुटों में शामिल होकर अपनी जगह पक्की करनी चाहिए थी. इसके बजाय, भारत ने सब कुछ अमेरिका के भरोसे छोड़ दिया और अब ट्रम्प की शर्तों, अपमानजनक टिप्पणियों और टैरिफ का सामना कर रहा है. “एक्ट ईस्ट” पॉलिसी के बावजूद भारत अब चीन से मुकाबला करने के बजाय बांग्लादेश के साथ अपनी तुलना करने की स्थिति में आ गया है.
ईरान में विरोध प्रदर्शनों पर खूनी कार्रवाई: हजारों के मारे जाने की आशंका, ट्रम्प ने दी टैरिफ की धमकी
“बीबीसी न्यूज़” की रिपोर्ट है कि ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों को कुचलने के लिए की गई कार्रवाई में हजारों लोगों के मारे जाने की आशंका है. एक ईरानी सुरक्षा अधिकारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि मरने वालों की संख्या 2,000 के करीब हो सकती है. हफ्तों से चल रहे ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ के बाद, ईरान से बाहर आईं पहली कुछ फोन कॉल्स में लोगों ने तबाही और मौत का भयानक मंजर बयां किया है. मानवाधिकार समूहों ने चेतावनी दी है कि एफरान सुल्तानी नामक एक प्रदर्शनकारी को जल्द ही फांसी दी जा सकती है, और न्यायिक प्रक्रिया असामान्य रूप से तेज गति से चल रही है.
इस मानवीय संकट के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आक्रामक रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापार जारी रखेंगे, उन्हें अमेरिका के साथ व्यापार पर 25% टैरिफ का सामना करना पड़ेगा. ट्रम्प की राष्ट्रीय सुरक्षा टीम ईरान में हस्तक्षेप के लिए सैन्य और गुप्त विकल्पों पर विचार करने के लिए बैठक करने वाली है. उधर, ईरान के विदेश मंत्री ने कहा है कि उनका देश “किसी भी कार्रवाई के लिए तैयार” है. इंटरनेट बंद होने के कारण वहां से आ रही सूचनाओं की पुष्टि करना बेहद मुश्किल हो रहा है.
अपील :
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