13/02/2026: अमेरिका में हत्या की साजिश की बात गुप्ता ने कबूली| ढाका ने पन्ना पलटा | जर्मनी ने अमेरिकी नेतृत्व को नकारा | पढ़ने पर अपूर्वानंद | अरुंधति का बायकॉट | और बाकी पुलिस वाले?
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
अमेरिका: भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता ने पन्नून हत्या की साजिश और मनी लॉन्ड्रिंग का जुर्म कबूला.
बांग्लादेश: BNP की प्रचंड जीत, तारिक रहमान 17 साल बाद लंदन से वतन लौटे, शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग तेज.
समाज: उत्तराखंड के कोटद्वार में नफरत के खिलाफ ‘मोहम्मद दीपक’ बना इंसानियत का प्रतीक.
क्राइम: दिल्ली दंगों के 6 साल बाद राष्ट्रगान मामले में दो पुलिसवालों पर चार्जशीट, लेकिन सवाल बरकरार.
रक्षा: 114 नए राफेल जेट्स की खरीद को मंजूरी, विशेषज्ञों ने इसे रक्षा खरीद प्रक्रिया की नाकामी बताया.
विवाद: गृह मंत्रालय का आदेश- सरकारी कार्यक्रमों में पूरा ‘वंदे मातरम’ गाएं, वकीलों ने इसे संवैधानिक तौर पर गलत बताया.
कश्मीर: NHRC ने बारामुला में ट्रक ड्राइवर की हत्या पर सुरक्षा बलों के खिलाफ केस दर्ज किया.
शिक्षा: अपूर्वानंद का लेख- भारत में पढ़ने की संस्कृति खत्म हो रही है, रील्स और वीडियो ने जगह ले ली है.
अंतर्राष्ट्रीय: जर्मन चांसलर ने कहा- अमेरिका अपना नेतृत्व खो चुका है, यूरोप को परमाणु निवारक की जरूरत.
कला: अरुंधति रॉय ने गाजा नरसंहार पर चुप्पी के विरोध में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल का बहिष्कार किया.
निखिल गुप्ता ने अमेरिका में सिख अलगाववादी पन्नून की हत्या की साजिश रचने का जुर्म कबूला
न्यूयॉर्क शहर में एक सिख अलगाववादी की भाड़े पर हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोपी भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता ने शुक्रवार (13 फरवरी, 2026) को तीन आपराधिक आरोपों में अपना दोष स्वीकार कर लिया. मैनहटन में अमेरिकी अटॉर्नी कार्यालय के एक प्रवक्ता ने यह जानकारी दी. प्रवक्ता ने बताया कि 54 वर्षीय गुप्ता ने किराए पर हत्या, भाड़े पर हत्या करने की साजिश और मनी लॉन्ड्रिंग करने की साजिश के आरोपों में अपना दोष स्वीकार किया है. इन आरोपों में संयुक्त रूप से अधिकतम 40 साल की जेल की सजा का प्रावधान है.
उन्होंने मैनहट्टन संघीय अदालत में अमेरिकी मजिस्ट्रेट न्यायाधीश सारा नेटबर्न के समक्ष अपनी दलील पेश की. गुप्ता के वकीलों की ओर से तत्काल कोई टिप्पणी उपलब्ध नहीं हो सकी.
गुप्ता जून 2024 में चेक गणराज्य से अमेरिका प्रत्यर्पित किए जाने के बाद से ब्रुकलिन जेल में बंद हैं, जहाँ उन्हें एक साल पहले गिरफ्तार किया गया था. इससे पहले उन्होंने खुद को निर्दोष बताया था. भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता, जिन पर न्यूयॉर्क शहर में सिख अलगाववादी की हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप है, ने शुक्रवार (13 फरवरी, 2026) को तीन आपराधिक आरोपों में अपना जुर्म कबूल कर लिया है. मैनहट्टन में अमेरिकी अटॉर्नी कार्यालय के प्रवक्ता ने यह जानकारी दी.
प्रवक्ता ने बताया कि 54 वर्षीय गुप्ता ने ‘सुपारी देकर हत्या कराने’, इसकी साजिश रचने और मनी लॉन्ड्रिंग की साजिश रचने का जुर्म कबूला है. इन आरोपों के तहत उन्हें अधिकतम 40 साल तक की जेल की सजा हो सकती है. उन्होंने मैनहट्टन की संघीय अदालत में अमेरिकी मजिस्ट्रेट जज सारा नेटबर्न के सामने अपना जुर्म स्वीकार किया. गुप्ता के वकीलों की ओर से तुरंत कोई टिप्पणी नहीं आई है.
गुप्ता जून 2024 में चेक गणराज्य से अमेरिका प्रत्यर्पित किए जाने के बाद से ब्रुकलिन जेल में हैं. उन्हें चेक गणराज्य में एक साल पहले गिरफ्तार किया गया था. प्रत्यर्पण के तुरंत बाद उन्होंने खुद को निर्दोष बताया था.
अमेरिकी अभियोजकों ने गुप्ता पर एक भारतीय सरकारी अधिकारी के साथ मिलकर गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया था. पन्नून एक अमेरिकी निवासी और अमेरिका-कनाडा के दोहरे नागरिक हैं.
भारत सरकार ने पन्नून के खिलाफ किसी भी साजिश से खुद को अलग कर लिया है और कहा है कि यह सरकार की नीति के खिलाफ है. अमेरिका और कनाडा में सिख अलगाववादियों की हत्या की कथित साजिशों के खुलासे ने भारत के साथ संबंधों की परीक्षा ली है. भारत ने ऐसी साजिशों में शामिल होने से इनकार किया है.
ढाका ने पन्ना पलटा : कौन है तारिक़ रहमान?
बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आया है. 12 फरवरी 2026 को हुए आम चुनावों में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के बाद, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के चेयरमैन तारिक़ रहमान देश की कमान संभालने के लिए तैयार हैं. लंदन में आत्म निर्वासन के एक लंबे दौर के बाद उनकी वतन वापसी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रही. 25 दिसंबर 2025 को जब वे हज़रत शाहजलाल इंटरनेशनल एयरपोर्ट के वीवीआईपी लाउंज से बाहर निकले, तो उन्होंने सबसे पहले कार पार्किंग के पास घास के एक छोटे से टुकड़े पर अपने जूते उतारे और नंगे पैर अपनी ज़मीन को महसूस किया. यह एक भावुक संकेत था कि वे अपनी जड़ों से फिर जुड़ गए हैं. रहमान ने ढाका-17 और बोगुरा-6, दोनों सीटों से चुनाव जीता है.
‘डार्क प्रिंस’ से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक : तारिक़ रहमान का सफर आसान नहीं रहा. 2005 में विकिलीक्स द्वारा जारी अमेरिकी दूतावास के केबल्स में उन्हें “द डार्क प्रिंस” कहा गया था और उनकी छवि एक “क्रूर” और “ध्रुवीकरण करने वाले” नेता की बनाई गई थी. 2007 में सेना समर्थित कार्यवाहक सरकार के दौरान उन्हें हिरासत में भीषण यातनाएं दी गईं, जिससे उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई थी और उन्हें इलाज के लिए विदेश जाना पड़ा था. शेख हसीना ने अपने 15 साल के शासन (2009-2024) के दौरान लगातार उन्हें और उनकी पार्टी को पाकिस्तान-परस्त और भ्रष्ट बताया. लेकिन लंदन से लौटने के बाद अपने पहले भाषण में रहमान ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया. उन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम में अपने पिता जनरल ज़िया-उर-रहमान की भूमिका को याद दिलाया और एक समावेशी बांग्लादेश का वादा किया.
इधर ‘एएफपी’ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि लंबे समय तक अपने माता-पिता की छाया में रहे और बांग्लादेश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक राजवंशों में से एक के उत्तराधिकारी, तारिक रहमान आखिरकार अब सुर्खियों में आ गए हैं.
60 वर्ष की आयु में, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेता 17 करोड़ की आबादी वाले इस दक्षिण एशियाई राष्ट्र की कमान संभालने की तैयारी कर रहे हैं, जो उनके अनुसार “बेहतर करने” की महत्वाकांक्षा से प्रेरित है.
शेख हसीना के कड़े शासन को उखाड़ फेंकने वाले घातक विद्रोह के डेढ़ साल बाद, बीएनपी ने कहा है कि उसने संसदीय चुनावों में “प्रचंड जीत” हासिल की है. संयुक्त राज्य अमेरिका ने रहमान को इस “ऐतिहासिक” जीत पर बधाई दी है. रहमान का उदय उस व्यक्ति के लिए एक उल्लेखनीय बदलाव है जो ब्रिटेन में 17 साल के निर्वासन के बाद, ढाका के राजनीतिक तूफानों से दूर रहने के बाद, पिछले दिसंबर में ही बांग्लादेश लौटा है.
व्यापक रूप से ‘तारिक जिया’ के नाम से जाने जाने वाले रहमान एक ऐसा राजनीतिक नाम साझा करते हैं जिसने उनके जीवन के हर चरण को आकार दिया है. 1981 में जब उनके पिता, राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या हुई थी, तब वह केवल 15 वर्ष के थे.
हालाँकि उनकी पार्टी को बहुमत मिला है, लेकिन आगे की राह आसान नहीं है.
जमात-ए-इस्लामी का उदय: जमात-ए-इस्लामी 11-पार्टी गठबंधन के साथ 71 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी ताकत बन गई है. जमात प्रमुख शफीकुर रहमान ने साफ कहा है कि वे तारिक़ रहमान पर “नज़र रखेंगे.” यह भविष्य के सियासी घमासान का संकेत है.
भारत के साथ रिश्ते: रहमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती भारत के साथ संबंधों को संतुलित करना होगा. शेख हसीना के जाने के बाद रिश्तों में खटास आई है. गंगा जल संधि और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उन्हें भारत के साथ कूटनीतिक सूझबूझ दिखानी होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें बधाई दी है, जो एक नई शुरुआत का संकेत है.
संवैधानिक बदलाव: ‘जुलाई चार्टर’ पर हुए जनमत संग्रह के बाद उन्हें संविधान में बदलाव करना होगा, जिससे प्रधानमंत्री की शक्तियां कम हो सकती हैं.
5 बड़े नतीजे: बदलाव की बयार और भारत के लिए सबक
12 फरवरी 2026 को हुए मतदान के बाद बांग्लादेश की राजनीति की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है. बीएनपी के गठबंधन ने 300 में से 216 सीटें जीती हैं, जबकि जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिली हैं. तारिक़ रहमान अगले प्रधानमंत्री बनने की कतार में हैं. हिंदू के मुताबिक इस जनादेश के पाँच बड़े मायने हैं:
बदलाव के साथ स्थिरता की चाह : अगस्त 2024 में हसीना सरकार गिरने के बाद देश में अनिश्चितता थी. 60% मतदान ने यह साफ कर दिया कि जनता लोकतंत्र में भरोसा करती है. लोगों ने सुधारों के लिए तो वोट दिया, लेकिन सत्ता की चाबी नए और अनुभवहीन छात्र नेताओं के बजाय एक पुरानी और स्थापित पार्टी (बीएनपी) को सौंपी. वे बदलाव चाहते थे, लेकिन अराजकता नहीं.
कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी का उभार: यह भारत और धर्मनिरपेक्ष ताकतों के लिए चिंता का विषय हो सकता है. जमात, जिसे कभी प्रतिबंधित किया गया था और जिसके नेताओं को 1971 के युद्ध अपराधों के लिए फांसी दी गई थी, अब मुख्यधारा की राजनीति में लौट आई है. दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर, जमात ‘नए बांग्लादेश’ की नीतियों को प्रभावित करने की ताकत रखती है.
छात्र आंदोलन का चुनावी विफलता : जिन छात्र नेताओं ने 2024 में हसीना के खिलाफ क्रांति का नेतृत्व किया था, उन्होंने ‘नेशनल सिटिजन पार्टी’ (एनसीपी) बनाई. लेकिन वोटरों ने उन्हें नकार दिया (सिर्फ 6 सीटें). जमात के साथ उनका गठबंधन भी उल्टा पड़ा, जिससे प्रगतिशील वोटर उनसे दूर हो गए. यह साबित करता है कि सड़क पर आंदोलन करना और सरकार चलाना दो अलग बातें हैं.
रहमान के सामने कांटों भरा ताज: तारिक़ रहमान को भारी जनादेश मिला है, लेकिन उनका पिछला रिकॉर्ड (2001-2006) हिंसा और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा है. अब उन्हें एक ऐसे देश को संभालना है जो गहरे ज़ख्मों से भरा है. उन्हें न केवल कानून-व्यवस्था सुधारनी होगी, बल्कि एक मजबूत विपक्ष (जमात) को भी साथ लेकर चलना होगा.
भारत के लिए ‘रीसेट’ का मौका: भारत के लिए यह एक कूटनीतिक अवसर है. हसीना के जाने के बाद भारत विरोधी भावनाएं चरम पर थीं. पाकिस्तान ने इस मौके का फायदा उठाकर ढाका में अपनी पैठ बना ली है. अब भारत को बीएनपी के साथ नए सिरे से रिश्ते बनाने होंगे. पीएम मोदी का बधाई संदेश एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन भारत को अपनी घरेलू राजनीति (घुसपैठिया बयानबाजी) और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाना होगा.
बीएनपी ने भारत से शेख हसीना को वापस भेजने की मांग रखी
बांग्लादेश में आम चुनावों में मिली भारी जीत के तुरंत बाद, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने अपना रुख साफ कर दिया है. न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक पार्टी ने भारत से दो टूक कहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को वापस भेजा जाए ताकि उन पर बांग्लादेश में मुकदमा चलाया जा सके. बीएनपी के वरिष्ठ नेता सलाहुद्दीन अहमद ने एक बयान में कहा, “हमारे विदेश मंत्री ने हसीना के प्रत्यर्पण का मामला पहले ही भारत के सामने रखा है, और हम इसका पूरा समर्थन करते हैं. यह दो देशों के विदेश मंत्रालयों के बीच का मामला है, लेकिन हम भारत सरकार से अपील करते हैं कि उन्हें कानून का सामना करने के लिए वापस भेजें.”
अगस्त 2024 में एक बड़े जन-विद्रोह के बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़कर भारत भागना पड़ा था. तब से वे नई दिल्ली में निर्वासन में हैं. नवंबर 2025 में, बांग्लादेश के एक विशेष ट्रिब्यूनल ने उन्हें विद्रोह को कुचलने के लिए मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी मानते हुए उनकी अनुपस्थिति में मौत की सज़ा सुनाई थी.
सलाहुद्दीन अहमद ने इस बात पर भी जोर दिया कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग का मतलब यह नहीं है कि बीएनपी भारत विरोधी है. उन्होंने कहा, “हम भारत सहित अपने सभी पड़ोसियों के साथ सामान्य और दोस्ताना रिश्ते चाहते हैं, लेकिन यह रिश्ते आपसी सम्मान और ‘बराबरी’ की शर्तों पर होने चाहिए.”
पार्टी ने उन आलोचनाओं को भी खारिज किया कि अवामी लीग के बिना चुनाव समावेशी नहीं थे. अहमद ने कहा कि जनता ने अगस्त 2024 की क्रांति के जरिए अवामी लीग को पहले ही खारिज कर दिया था, और यूनुस सरकार ने जांच के चलते उस पार्टी को निलंबित किया था, इसलिए उनके चुनाव लड़ने का सवाल ही नहीं था.
हरकारा डीप डाइव
मोहम्मद दीपक के जरिये देश, मजहब, इंसानियत को देखने की कोशिश
हरकारा डीप डाइव में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ उत्तराखंड के कोटद्वार में 26 जनवरी को हुए “मोहम्मद दीपक” मामले पर विस्तार से बातचीत हुई. चर्चा में यह सवाल केंद्र में रहा कि क्या एक व्यक्ति का साहस समाज में व्यापक नैतिक असर पैदा कर सकता है. 26 जनवरी को कोटद्वार में एक 71 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार की दुकान पर कुछ लोग पहुंचे और दुकान का नाम बदलने का दबाव बनाया. माहौल पहले से ही सांप्रदायिक तनाव से भरा था. इसी दौरान एक युवक ने विरोध किया. जब उससे नाम पूछा गया तो उसने जवाब दिया, “मोहम्मद दीपक.” यह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक जोखिम भरा नैतिक बयान था. अगर वह केवल “दीपक कुमार” कहता तो शायद विवाद वहीं खत्म हो जाता, लेकिन “मोहम्मद” जोड़कर उन्होंने साफ संदेश दिया कि अन्याय के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए धर्म की दीवार ज़रूरी नहीं है.
बातचीत में सामने आया कि इस कदम के बाद दीपक को भारी सामाजिक और आर्थिक दबाव झेलना पड़ा. उसके जिम की सदस्य संख्या लगभग 150 से घटकर करीब 15 रह गई. किराया देना मुश्किल हो गया. सोशल मीडिया पर धमकियां दी गईं. बिहार से एक व्यक्ति द्वारा ₹10 लाख की सुपारी देने की बात सामने आई. भीड़ उसके जिम तक पहुंची और वीडियो वायरल हुए. सामाजिक बहिष्कार और प्रशासनिक दबाव दोनों का सामना उसे करना पड़ा. हालांकि, कहानी का दूसरा पक्ष भी चर्चा में आया. कुछ लोग उनके समर्थन में खड़े हुए. उन्हें ऑनलाइन समर्थन भी मिला. श्रवण गर्ग ने सवाल उठाया कि क्या ऐसे “सिंगल एक्ट ऑफ ब्रेवरी” यानी अकेले साहसिक कदम समाज में गुणा होकर फैल सकते हैं?
इसी संदर्भ में मथुरा का उदाहरण सामने आया, जहां एक मुस्लिम प्रधानाचार्य पर बच्चों का ब्रेनवॉश करने और राष्ट्रगान से रोकने के आरोप लगे थे. उन्हें निलंबित किया गया, लेकिन 200 से अधिक हिंदू अभिभावक और बच्चे उनके समर्थन में सड़कों पर उतर आए. जांच में आरोप निराधार पाए गए और प्रधानाचार्य बहाल हुए. महाराष्ट्र के अहिल्या नगर जिले के सोंडला गांव में रक्तदान शिविर के बाद गांव को “कास्ट-फ्री” घोषित करने का प्रस्ताव भी चर्चा में रहा, जहां कहा गया कि “सबके खून का रंग एक है.” बातचीत में यह भी कहा गया कि उत्तराखंड जैसे राज्य, जिसे हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जाता है, वहां इस तरह का कदम सत्ता और कट्टरपंथ दोनों के लिए असहज है. यह केवल बहुसंख्यक कट्टरता को नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक कट्टरता को भी चुनौती देता है.
बांग्लादेश का संदर्भ भी चर्चा में आया, जहां लगभग 8–9% हिंदू आबादी है और चुनावी माहौल में असुरक्षा की बात होती है. सवाल उठाया गया कि अगर वहां अल्पसंख्यकों पर दबाव बढ़े तो क्या वहां भी “दीपक मोहम्मद” जैसे साहस की ज़रुरत नहीं पड़ेगी. हरकारा डीप डाइव की इस बातचीत का निष्कर्ष यही रहा कि “मोहम्मद दीपक” एक नाम से ज़्यादा एक प्रतीक हैं. असली सवाल यह है कि हम अपनी पहचान पहले किस रूप में तय करते हैं, धर्म के आधार पर या इंसान के रूप में. दीपक का कदम यह दिखाता है कि समाज का एक हिस्सा अब भी अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ा होने की हिम्मत रखता है. यही वह जगह है, जहां से उम्मीद की शुरुआत होती है.
‘राष्ट्रगान’ मामले में मुस्लिम युवक की मौत: 6 साल, 2 पुलिसवाले और इंसाफ का इंतज़ार
दिल्ली दंगों (फरवरी 2020) की सबसे डरावनी तस्वीरों में से एक थी—पाँच घायल मुस्लिम युवक सड़क पर पड़े हैं, पुलिसवाले उन्हें घेरकर लाठियों से पीट रहे हैं और जबरन “वंदे मातरम” और “राष्ट्रगान” गाने का हुक्म दे रहे हैं. इसी घटना में 23 साल के फैज़ान की मौत हो गई थी. आर्टिकल 14 में बेतवा शर्मा का रिपोर्ताज इस वाकये पर है. अब, 6 साल बाद, सीबीआई ने इस मामले में हेड कॉन्स्टेबल रविंदर कुमार और कॉन्स्टेबल पवन यादव के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है. लेकिन सवाल यह है—बाकी पुलिसवाले कहाँ हैं?
क्या हुआ था उस दिन? 24 फरवरी 2020 को फैज़ान और अन्य को कर्दमपुरी पुल के पास पुलिस ने बुरी तरह पीटा. वीडियो में पुलिस वाले उन्हें “आज़ादी” के नारे लगाकर चिढ़ा रहे थे. इसके बाद, घायल हालत में उन्हें अस्पताल ले जाने के बजाय ज्योति नगर पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जहाँ उन्हें अवैध हिरासत में रखा गया. फैज़ान की माँ, किस्मतुन की याचिका के मुताबिक, थाने में उसे और प्रताड़ित किया गया. जब उसकी हालत बिगड़ी, तब उसे छोड़ा गया और 26 फरवरी को एलएनजेपी अस्पताल में उसकी मौत हो गई.
परिवार का दर्द : फैज़ान की माँ किस्मतुन ने कहा, “उस वीडियो में कई पुलिसवाले थे. सिर्फ दो को क्यों पकड़ा? मेरे सीने में बहुत दर्द है. अगर मेरे मरने से पहले वे सबको पकड़ लें, तो मुझे चैन मिलेगा. अगर मैं मर गई, तो मैं उनकी गर्दन पर लटकूँगी.” फैज़ान के भाई नदीम ने सिस्टम की लेटलतीफी पर सवाल उठाया, “अगर यह कोई आम नागरिक होता तो अब तक जेल में होता. क्योंकि यह खाकी वर्दी वाले हैं, इसलिए 6 साल लग गए सिर्फ दो लोगों की पहचान करने में.” दिल्ली हाई कोर्ट ने जुलाई 2024 में इसे “नफरती अपराध” (हेट क्राइम) करार देते हुए सीबीआई जांच के आदेश दिए थे. लेकिन न्याय की रफ्तार इतनी धीमी है कि एक अन्य पीड़ित, मोहम्मद वसीम, को उस समय के एसएचओ के खिलाफ केस दर्ज कराने के लिए 5 साल तक अदालतों के चक्कर काटने पड़े.
मेरठ में ‘लव जिहाद’ के तहत मुस्लिम व्यक्ति पर केस दर्ज; बौद्ध दुल्हन ने हिंदुत्ववादी दावों को नकारा, मगर शादी नहीं हो पाई
उत्तरप्रदेश के धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत एक मुस्लिम व्यक्ति पर मामला दर्ज किया गया है. यह कार्रवाई उसकी मंगेतर के चाचा द्वारा उनके अंतरधार्मिक विवाह पर आपत्ति जताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बाद की गई है. इस शादी को लेकर पिछले कुछ दिनों से मेरठ में तनाव की स्थिति बनी हुई है. निकाह के विरोध में हिंदू महापंचायत का ऐलान किया गया था, मगर प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद इसे रद्द कर दिया गया. लेकिन, दोनों की शादी भी नहीं हो सकी, जो आज शुक्रवार को होना थी.
‘मकतूब मीडिया’ के अनुसार, यह मामला शाहवेज़ राणा का है, जो मेरठ की एक बौद्ध महिला आकांक्षा गौतम से शादी करने वाले थे. राणा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की आपराधिक धमकी से संबंधित धाराओं और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है.
गंगा नगर थाने में यह शिकायत आकांक्षा के चाचा प्रेमचंद गौतम ने दर्ज कराई है. उन्होंने आरोप लगाया कि राणा ने वधू पक्ष द्वारा बांटे गए शादी के कार्ड में अपनी पहचान “साहिल” के रूप में गलत तरीके से पेश की थी. प्रेमचंद गौतम ने आरोप लगाया, “उसने संपत्ति हड़पने के इरादे से उसे धोखा दिया और उसे बरगलाकर तथा ब्रेनवाश करके शादी करने की साजिश रची. मुझे अपनी भतीजी की सुरक्षा को लेकर का डर है.” हालांकि, दुल्हन और उसकी मां ने इन आरोपों को निराधार और राजनीति से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया है.
विवाद तब और गहरा गया जब हिंदुत्ववादी संगठनों के सदस्य शिकायतकर्ता के साथ पुलिस स्टेशन पहुँचे और सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि यह मामला “लव जिहाद” का है. हालांकि, केंद्रीय गृह मंत्रालय संसद में स्पष्ट कर चुका है कि भारतीय कानून में इस तरह के शब्द (लव जिहाद) को परिभाषित करने वाला कोई प्रावधान नहीं है.
आकांक्षा गौतम ने स्पष्ट रूप से इन आरोपों का खंडन किया. उन्होंने मीडिया घरानों से कहा, “लव-जिहाद तब होगा जब यह हिंदू-मुस्लिम मामला हो. मैं तो हिंदू भी नहीं हूँ, मैं बौद्ध हूँ. मैं बौद्ध धर्म को मानती हूँ और मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करती.” उन्होंने आगे कहा कि वह अपनी मर्जी से राणा से शादी कर रही हैं और अपने चाचा पर संपत्ति विवाद के कारण हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया.
114 राफेल फाइटर जेट डील: रक्षा मंत्रालय की ‘रणनीतिक चूक’ या मजबूरी?
रक्षा मंत्रालय ने 114 और डसॉल्ट राफेल जेट खरीदने को मंजूरी दी है, जिसे वायु सेना की गिरती ताकत को संभालने के लिए ज़रूरी बताया जा रहा है. लेकिन गहराई से देखें, तो यह भारतीय रक्षा खरीद प्रक्रिया की नाकामी की कहानी है. द वायर में राहुल बेदी यही सवाल उठा रहे हैं. उनके मुताबिक 2007 में भारत ने 126 फाइटर जेट्स (एमएमआरसीए) खरीदने की प्रक्रिया शुरू की थी. उस समय राफेल को चुना गया था और योजना थी कि 108 जेट भारत में ही बनेंगे (एचएएल के जरिए), जिससे भारत को तकनीक मिलती. लेकिन 2016 में मोदी सरकार ने उस डील को रद्द कर दिया और जल्दबाजी में सिर्फ 36 राफेल जेट्स खरीदे. तर्क दिया गया कि यह “इमरजेंसी” है. अब, 10 साल बाद, सरकार फिर से 114 राफेल खरीदने जा रही है. अगर पुरानी डील रद्द नहीं होती, तो आज भारत के पास अपना राफेल बेड़ा होता.
सवालों के घेरे में डील
लागत: पुरानी डील (126 जेट) लगभग 10-12 बिलियन डॉलर की थी. 36 जेट्स के लिए ही हमने लगभग 8.8 बिलियन डॉलर दे दिए. अब नई 114 जेट्स की डील 30-35 बिलियन डॉलर तक जा सकती है. यानी कम विमानों के लिए कई गुना ज़्यादा पैसा.
मेक इन इंडिया का क्या हुआ? यह नई डील ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ (एसपी) मॉडल के तहत होनी है. लेकिन यह साफ नहीं है कि भारत में इनका पार्टनर कौन होगा? क्या फिर से सरकारी कंपनी एचएएल को मौका मिलेगा? या टाटा, अडानी, या रिलायंस जैसी निजी कंपनियों को? रिलायंस डिफेंस, जो पिछली डील में ऑफसेट पार्टनर थी, अब आर्थिक मुश्किलों में है. अडानी ने एम्ब्रेयर के साथ हाथ मिलाया है, और टाटा के पास एयरबस का अनुभव है.
तकनीक हस्तांतरण : पुरानी डील में तकनीक मिलने की गारंटी थी. इस नई डील में यह कितना होगा, इस पर अभी कोहरा छाया हुआ है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह “कोर्स करेक्शन” नहीं, बल्कि योजना बनाने में हुई भारी विफलता है जिसने भारत के रक्षा बजट पर भारी बोझ डाला है.
वंदे मातरम विवाद: गृह मंत्रालय का आदेश और संविधान की कसौटी
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में एक आदेश जारी किया है कि सभी सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण (सभी 6 छंद) गाया जाएगा और इस दौरान सबको सावधान की मुद्रा में खड़ा होना होगा. हिंदू में प्रकाशित विश्लेषण में वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े का मानना है कि यह आदेश न केवल ऐतिहासिक समझौतों को तोड़ता है, बल्कि संवैधानिक रूप से भी गलत है.
1937 का ऐतिहासिक फैसला : 1937 में, कांग्रेस वर्किंग कमेटी (जिसमें गांधी, नेहरू, पटेल और बोस शामिल थे) ने एक समझदारी भरा फैसला लिया था. उन्होंने माना कि वंदे मातरम के पहले दो छंद देश की मिट्टी, पानी और हवा की तारीफ करते हैं और पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष हैं. लेकिन बाद के छंदों में हिंदू देवियों—दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती—की स्तुति है. एक बहु-धार्मिक देश में, किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति को इन पंक्तियों को गाने के लिए मजबूर करना गलत होगा. इसलिए केवल पहले दो छंदों को ‘राष्ट्रीय गीत’ का दर्जा मिला. संविधान सभा ने भी इसी को अपनाया.
कानून क्या कहता है?
अनुच्छेद 51A: संविधान नागरिकों से राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान (जन गण मन) का सम्मान करने की अपेक्षा करता है, लेकिन इसमें ‘राष्ट्रीय गीत’ का जिक्र नहीं है.
बिजय इमैनुएल केस (1986): सुप्रीम कोर्ट ने केरल के स्कूली बच्चों के मामले में फैसला सुनाया था कि किसी को भी राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, अगर यह उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है. सम्मानपूर्वक चुपचाप खड़े रहना भी देशभक्ति है और यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है.
हेगड़े का तर्क है कि जब राष्ट्रगान (जिसे संवैधानिक सुरक्षा मिली है) के लिए भी मजबूर नहीं किया जा सकता, तो ‘राष्ट्रीय गीत’ (जिसे वह सुरक्षा प्राप्त नहीं है) के उन धार्मिक छंदों को गाने के लिए मजबूर करना, संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन है. यह “देशभक्ति” नहीं, बल्कि “संवैधानिक तोड़फोड़” है.
एनएचआरसी ने कश्मीरी ट्रक ड्राइवर की हत्या मामले में केस दर्ज किया
उत्तरी कश्मीर के बारामुला में एक कश्मीरी ट्रक चालक की गोली मारकर हत्या किए जाने के एक साल से अधिक समय बाद, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इस घटना के संबंध में मामला दर्ज किया है. वकीलों का कहना है कि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से घाटी में सशस्त्र बलों से जुड़ा इस तरह का यह पहला मामला है.
‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट है कि आयोग ने दिल्ली की वकील तमन्ना पंकज द्वारा बारामुला जिले के सोपोर स्थित गोरीपोरा बोमई के निवासी वसीम अहमद मीर की हत्या के खिलाफ दायर शिकायत के बाद केस दर्ज किया है. इससे पहले इस शिकायत को “फर्जी मुठभेड़” की श्रेणी में डायरी में दर्ज किया गया था.
अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले ट्रक चालक मीर की फरवरी 2025 में उस समय हत्या कर दी गई थी, जब सुरक्षा बलों ने श्रीनगर-बारामुला राजमार्ग पर उनके वाहन पर कथित तौर पर तब गोलियां चलाईं, जब वह सेब की पेटियां लेकर जा रहे थे.
इस घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए पंकज ने ‘मकतूब’ को बताया कि उन्हें मंगलवार को आयोग से इस संबंध में एक ईमेल प्राप्त हुआ है. फरवरी 2025 में सौंपी गई अपनी शिकायत में पंकज ने कहा था कि मीर सेब की पेटियों से लदा ट्रक चला रहे थे, तभी उन्हें उत्तरी कश्मीर में सुरक्षा बलों द्वारा लगाए गए एक नाके पर रुकने का इशारा किया गया. सेना के बयान का हवाला देते हुए उन्होंने उल्लेख किया कि संग्राम चौक के पास रोके जाने से पहले वाहन का लगभग 23 किलोमीटर तक पीछा किया गया था.
सुरक्षा बलों ने ट्रक के टायरों पर तब गोलियां चलाईं जब वह कथित तौर पर बार-बार दी गई चेतावनियों को अनसुना कर भागता रहा. सेना ने बाद में कहा कि गोलीबारी का उद्देश्य वाहन को सुरक्षित रूप से रोकना था. पीड़ित के परिवार का दावा है कि वसीम एक निर्दोष नागरिक था और किसी भी गैर-कानूनी गतिविधि में शामिल नहीं था.
इस घटना ने सोपोर और बारामुला के अन्य हिस्सों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया था, जहाँ स्थानीय नेताओं और निवासियों ने इसे एक नागरिक की ‘लक्षित हत्या’ करार दिया था.
अपूर्वानंद : भारत में पढ़ने से बेरुखी की जड़ें
ऐसी जनता जो वीडियो और रील्स को बस देखते रहना पसंद करती है, वो उस शिक्षा प्रणाली का कुदरती नतीजा है जो मौलिक सोच और अभिव्यक्ति की कद्र नहीं करती.
अपूर्वानंद दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाते हैं. यह लेख स्क्रोल में यहां अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है.
इस हफ्ते ‘द गार्डियन’ में भारत में पढ़ने की संस्कृति की कमी पर एक रिपोर्ट आई थी. उस पर लोगों का जो गुस्सा देखने को मिला, उसने मुझे एक ऑनलाइन हिंदी जर्नल के संपादक के साथ हुई बातचीत की याद दिला दी. उन्होंने बड़े दुख के साथ कहा था कि उनके पोर्टल पर छपी रिपोर्ट्स अक्सर बिना पढ़े ही रह जाती हैं.
इन लेखों पर मेहनत करना, वो भी लगातार आर्थिक तंगी के बीच, उन्हें लोगों तक लाना एक ऐसी अग्नि-परीक्षा है जिसे वही समझ सकते हैं जो इस संघर्ष में शामिल हैं. राइटर की उंगलियां कीबोर्ड को छुएं, उससे बहुत पहले ग्राउंडवर्क की थका देने वाली मेहनत होती है, बारीक रिसर्च होती है और जांच-पड़ताल का नैतिक बोझ होता है. इस थका देने वाली मेहनत के लिए राइटर्स को ढंग से पैसे भी नहीं मिलते.
फिर आता है एडिटिंग का दूसरा काम, जिसे बहुत कम लोगों की टीम संभालती है. फिर भी, वे एक खामोश विद्रोह के साथ डटे हुए हैं, और ऐसी खबरें छाप रहे हैं जिन्हें पैसे वाले, बड़े कॉरपोरेट प्रेस हाथ लगाने से भी कतराएंगे.
डिजिटल मेट्रिक्स का विश्लेषण करना और यह महसूस करना कि इन कोशिशों को ज्यादातर नजरअंदाज कर दिया गया है, दिल तोड़ने वाला होता है. हालांकि, एक अजीब और दर्दनाक विडंबना सामने आती है: जब यही रिपोर्ट्स अंग्रेजी में ट्रांसलेट की जाती हैं, तो पढ़ने वालों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है. यह अंतर उन लोगों के जख्म को और गहरा कर देता है जिन्होंने अपनी बौद्धिक जिंदगी मूल भाषा – इस मामले में हिंदी – को सौंप दी है.
मेरे संपादक दोस्त के मुताबिक, आज की जनता रिपोर्ट या निबंध पढ़ने में दिमाग लगाने के बजाय बस वीडियो का ‘पैसिव कंजम्पशन’ (निष्क्रिय होकर देखना) पसंद करती है. यह हमारे अपने अनुभव जैसा ही है. अलग-अलग जगहों पर हम ऐसे लोगों से मिलते हैं जो हमसे कहते हैं, “मैंने आपको देखा है.” शायद ही कभी सुनने को मिलता है, “मैंने आपको पढ़ा है.”
शायद, कोई यह तर्क दे सकता है कि मेरा लिखा हुआ रीडर के वक्त के लायक ही नहीं है – वह एक अलग मसला है. लेकिन यह ट्रेंड एक ‘सिस्टमिक इरोजन’ (व्यवस्थागत क्षरण) को दिखाता है. जब मैंने यह अनुभव एक युवा पत्रकार के साथ शेयर किया, तो वह मुस्कुराया, मुझ पर तरस खाते हुए, और बोला कि अब तो वीडियो भी पुरानी बात हो गई हैं. यह रील्स का जमाना है.
मैं एक बार लाइब्रेरी में एक नौजवान से मिला जिसने मुझे मेरे वीडियो से पहचान लिया. जब उसने अपना परिचय दिया, तो मुझे पता चला कि वह मेरा ही स्टूडेंट था, जो क्लास में कम ही दिखता था. वह अपने घंटे लाइब्रेरी में इसलिए नहीं बिताता कि उसे किताबों से प्यार है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए. इन परीक्षाओं के लिए तैयार की गई किताबों की एक अलग ही इंडस्ट्री है और वह वही पढ़ता है. वह क्लासरूम लेक्चर या किसी गहरी बात-चीत पर वक्त बर्बाद करना अफोर्ड नहीं कर सकता. कॉम्पिटिटिव मार्केट में इसका कोई उपयोग नहीं है.
क्लासरूम से यह पलायन एक संकट है जिसे यूनिवर्सिटीज और हायर एजुकेशन के रेगुलेटर्स ने खुद बनाया है. चाहे मास्टर्स लेवल हो या पीएचडी, एंट्रेंस एग्जाम बस तथ्यों को याद करने (रटने) की एक्सरसाइज बनकर रह गए हैं: बात इस हद तक बेतुकी हो चुकी है कि स्टूडेंट्स से यह उम्मीद की जाती है कि वे किसी कैरेक्टर की टोपी का रंग या उनके जूतों का शेड याद रखें.
साहित्य, चाहे वह नॉवल हो या कविता, उसे ट्रिविया (मामूली जानकारियों) के गोदाम में बदल दिया गया है. क्योंकि क्लासरूम की चर्चाओं में ‘क्रिटिकल इंक्वायरी’ (गहन पूछताछ) के लिए इन छोटी, बेजान डिटेल्स को छोड़ दिया जाता है, इसलिए क्लासेज स्टूडेंट के तुरंत सर्वाइवल के लिए बेकार हो जाती हैं.
यह बीमारी स्कूल से शुरू होती है. क्लासरूम एग्जामिनेशन बोर्ड के भारी बोझ के नीचे दबकर काम करता है. ज्यादातर एग्जाम्स में अब स्टूडेंट को एक सुलझा हुआ विचार लिखने की जरूरत नहीं होती, उन्हें बस कुछ अलग-अलग शब्द देने होते हैं. यहां तक कि सेकेंडरी एजुकेशन में भी, फैक्ट-बेस्ड सवाल ही सबसे ऊपर हैं. नतीजतन, टीचर्स पूरा टेक्स्ट पढ़ने पर जोर नहीं देते बल्कि “जरूरी” टुकड़ों पर जोर देते हैं.
इसका नतीजा है एक ऐसी पीढ़ी जो सिर्फ वही पढ़ती है जो “कम्पल्सरी” है. एक शॉर्ट स्टोरी को पूरा पढ़ने का बदल देने वाला अनुभव, या पूरी किताब के ढांचे को समझना, यह सब धीरे-धीरे गायब हो रहा है.
यह संकट साहित्य से कहीं आगे विज्ञान, इतिहास और राजनीति विज्ञान तक फैला हुआ है, जिनकी अपनी अलग भाषाई शैली होती है. फिर भी, इन विषयों में भी, शायद ही कोई चैप्टर शुरू से अंत तक पढ़ा जाता हो. “ऑब्जेक्टिव” सवाल ने वाक्य की जरूरत को ही खत्म कर दिया है.
मैं अपने संपादक दोस्त के दुख को गहराई से महसूस करता हूं क्योंकि, एक शिक्षक के तौर पर, यह एक लड़ाई है जो मैं रोज लड़ता हूं. हर सेमेस्टर बस स्टूडेंट्स को क्लास में एक फिजिकल किताब लाने के लिए मनाने का संघर्ष है. वे टेक्स्ट के साथ जुड़ने की जरूरत ही नहीं समझते. गहराई से सोचने या क्रिटिकल राइटिंग की कमी के अलावा, नॉवल या निबंध को पूरा खत्म करने से भी इनकार दिखता है. मैं अक्सर उनसे कहता हूं: जिसे दूसरे लोग हॉबी की तरह करते हैं वो तुम्हारा चुना हुआ प्रोफेशन है – इससे ज्यादा खुशकिस्मती क्या हो सकती है? फिर भी, उनमें पहले पन्ने से आखिरी पन्ने तक जाने का धैर्य नहीं है. उनके बढ़ने के सालों में पढ़ने को कभी एक कीमती चीज की तरह सिखाया ही नहीं गया.
इसका लिखने के गिरते स्तर के साथ एक गहरा संबंध है. स्टूडेंट्स से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे अपने विचारों को अपनी भाषा में व्यक्त करें. सेंट्रल बोर्ड फॉर सेकेंडरी एजुकेशन , जो शायद देश का सबसे प्रभावशाली स्कूल बोर्ड है, एग्जामिनर्स को निर्देश देता है कि स्टूडेंट्स को “मॉडल आंसर्स” के हिसाब से इवैल्यूएट करें. कोई भी भटकाव, या मौलिक अभिव्यक्ति की कोई भी चिंगारी, मतलब कम मार्क्स.
यह समझाता है कि क्यों स्टूडेंट्स अक्सर एक उदासी के साथ यह मानते हैं कि उन्हें ओरिजिनल टेक्स्ट भारी या मुश्किल लगते हैं. हर सेमेस्टर इस अफसोस के साथ खत्म होता है कि टीचर्स स्टूडेंट्स को अज्ञेय, मुक्तिबोध या प्रेमचंद जैसे हिंदी लेखकों के दो-चार निबंधों से ज्यादा के साथ जुड़ने के लिए राजी नहीं कर पाए. यह संघर्ष खुद को दोहराता है, साल दर साल.
एक रिसर्च स्कॉलर ने मुझे एक बार बताया कि स्टूडेंट्स अब लाइब्रेरी में समरीज देखकर नॉवेल्स “समझ” लेते हैं. ये वीडियो बस कहानी का एक ढांचा देते हैं, जिसकी आत्मा गायब होती है. पढ़ने की तकलीफ क्यों उठाएं? इस तरह, लाइब्रेरी वीडियो कंजम्पशन का एक थिएटर बन गई है. नौकरी के लिए कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स – और यूनिवर्सिटी एंट्रेंस – ने साहित्यिक काम को भाषा की समग्रता से मिलने के बजाय, बस सूचनाओं के ढेर में बदल दिया है.
यहां तक कि लाइब्रेरी की परिभाषा भी बदल गई है. हिंदी हार्टलैंड (हिंदी पट्टी) में आने वाले किसी विदेशी ऑब्जर्वर को हर कोने पर लाइब्रेरी के बोर्ड दिख सकते हैं और वह सोच सकता है कि यहां पढ़ने का कल्चर फूल-फल रहा है. लेकिन ये जगहें बस एग्जाम की तैयारी के लिए बने बाड़े हैं. नौजवान वहां पढ़ने के प्यार के लिए नहीं, बल्कि वाई-फाई और डेस्क स्पेस के लिए आते हैं.
पढ़ने का यह क्षरण, बुनियादी तौर पर, हमारे लोकतांत्रिक चरित्र का क्षरण है. जब हम पढ़ते हैं, हम सिर्फ कंटेंट कंज्यूम नहीं करते, बल्कि एक अलग आवाज, अभिव्यक्ति के एक अनोखे तरीके से रूबरू होते हैं. विचार जरूरी है, हां, लेकिन उसका अंदाज, स्टाइल और भाषाई टेक्सचर भी उतने ही जरूरी हैं. एक राइटर का असली संघर्ष एक ऐसी भाषा हासिल करना है जो सिर्फ सूचना पहुंचाने का जरिया न हो. कोई शायद ही किसी लेखक का काम सिर्फ इसलिए पढ़ता है क्योंकि वह उनकी पॉलिटिक्स से मेल खाता है.
एक समरी, जिसमें पर्सनालिटी नहीं होती, वह कभी किताब की जगह नहीं ले सकती. इस समझ को स्कूल में ही पाला-पोसा जाना चाहिए; जब तक कोई स्टूडेंट अपनी मास्टर्स लेवल की पढ़ाई तक पहुंचता है, दिमाग की आदतें पहले ही एक स्थायी अफसोस में बदल चुकी होती हैं.
हिंदी को लेकर एक और चुप्पी है जिसे तोड़ा जाना जरूरी है. “हिंदी” इलाकों में, हिंदी लोगों की पहली भाषा कम ही होती है. यह भोजपुरी, अवधी, मैथिली और दूसरी भाषाओं के साथ रहती है. यह एक ऐसी भाषा है जिसे जान-बूझकर सीखना पड़ता है. बहुमत के लिए, यह सिर्फ लेन-देन का एक औजार है. सेंसस (जनगणना) का डेटा भी गुमराह करने वाला है. “हिंदी बोलने वालों” की संख्या बढ़ाने की होड़ में, लोग इसे अपनी मातृभाषा दर्ज करा देते हैं, और अपनी असली भाषाई जड़ों को मिटा देते हैं. इस सच को मानने से इनकार करने की वजह से भाषा सिखाने का तरीका ही गलत हो जाता है.
स्कूल हिंदी की खूबसूरती या उसकी बहुवादी आत्मा के बजाय एक बेजान शुद्धता और सही होने पर जोर देते हैं. यह क्लिनिकल अप्रोच स्टूडेंट को भाषा का प्यारा नहीं बना पाती. रीडर और भाषा के बीच लगाव का कोई बंधन नहीं बनता.
कोई भाषा में जरूरी हुनर और देखभाल की कद्र करना कैसे सीख सकता है? सिर्फ उस्तादों को पढ़कर. अक्सर, आज के हिंदी गद्य में, यह अहसास होता है कि राइटर्स अपनी आइडियोलॉजी की तो परवाह करते हैं लेकिन उस भाषा के प्रति ज्यादातर उदासीन हैं जिसमें वे रहते हैं और काम करते हैं. आज बहुत ही कम ऐसे राइटर्स हैं जिन्हें कोई उनके वाक्यों की निरी सादगी और ग्रेस के लिए पढ़ेगा. किसी कहानी की क्या कीमत है अगर वह भाषा की दुनिया के आपके अनुभव में कुछ न जोड़े?
लेकिन जैसे ही मैं यह लिख रहा हूं, एक चुभने वाला शक मन में रेंग रहा है: इन शब्दों को कौन पढ़ेगा? और उन्हें क्यों पढ़ना चाहिए?
आंध्र प्रदेश के गांवों की ज़मीनी सच्चाई के बीच: मनरेगा से VB-G RAM G तक, रोज़गार की चिंता बढ़ी
द हिन्दू के लिए पी. सुजाता वर्मा ने संसद में मनरेगा की जगह वीबी-जी राम-जी कानून पेश किए जाने के बाद आंध्र प्रदेश के दो गांवों, बंदरुगुडेम और अंपापुरमका दौरा किया. उनकी रिपोर्ट में सामने आया कि दोनों गांवों में मनरेगा की स्थिति अलग-अलग है.
कृष्णा जिले के बापुलापाडु मंडल का बंदरुगुडेम गांव छोटा और संसाधनों की कमी वाला है. यहां कई मज़दूरों को साल भर में 20 से 30 दिन ही काम मिल पाया. कुछ महिलाओं ने बताया कि हमें 100 दिन रोज़गार मिलने का हक़ सिर्फ दस्तावेज़ तक सिमित है क्यूंकि असल में उन्हें काम के लिए अधिकारियों के पास बार-बार जाना पड़ता है. गांव का तालाब, जहां पहले सफाई और मरम्मत से रोज़गार मिलता था, अब मछली पालन के लिए लीज़ पर दे दिया गया है. इससे काम का एक बड़ा जरिया खत्म हो गया. गांव की महिलाओं का कहना है कि “जब 100 दिन का काम ही पूरा नहीं मिलता, तो नई योजना से क्या फायदा?” उनके लिए सबसे बड़ा सवाल नियमित रोज़गार है.
इसके विपरीत, पास के अंपापुरम गांव में मनरेगा के तहत कई काम हुए हैं. यहां पशु शेड बनाए गए, खेती से जुड़े काम हुए और कुछ लोगों ने ऑयल पाम की खेती शुरू की. गांव में 280 जॉब कार्ड हैं और अधिकांश परिवारों को ज़्यादा दिनों का रोज़गार मिला है. कई लोगों ने अपने काम के 70–80% दिन पूरे कर लिए हैं. मज़दूरों का कहना है कि यहां योजना से उन्हें असली फायदा हुआ है.
गांव की महिलाओं को नई योजना की पूरी जानकारी नहीं है. उन्हें बस इतना बताया गया है कि काम के दिन 100 से बढ़ाकर 125 किए गए हैं और भुगतान में देरी कम होगी. उनके लिए असली सवाल कानून नहीं, काम है.
मनरेगा के तहत हर ग्रामीण परिवार को साल में कम से कम 100 दिन मजदूरी का कानूनी अधिकार था. लेकिन हर गांव में स्थिति अलग रही. 50 वर्षीय मेदाबालिमी धनलक्ष्मी कहती हैं, “मेरे रिश्तेदारों को दूसरे गांवों में 100 दिन काम मिलता है, लेकिन मुझे दो हफ्ते का काम पाने के लिए भी अधिकारियों से लड़ना पड़ता है.” उनकी पड़ोसी चिंतलापुडी अलुवेलम्मा को पिछले साल सिर्फ 28 दिन काम मिला. बंदरुगुडेम छोटा ग्राम पंचायत है और यहां ऐसे सामुदायिक काम कम हैं, जिनसे ज़्यादा रोज़गार मिल सके.
गांव के फील्ड असिस्टेंट के अनुसार, 20 समूहों में काम बांटना मुश्किल है और पिछले साल यहां औसतन 30 दिन ही काम मिला. इसके विपरीत अंपापुरम गांव ज़्यादा विकसित दिखता है. चिलकंती ज्योति ने योजना के तहत ऑयल पाम की खेती शुरू की, जिसमें गड्ढा खोदने से लेकर सिंचाई और देखभाल तक मदद मिली. अंपापुरम में 280 जॉब कार्ड हैं और अधिकांश लोगों ने अपने काम के 70–80% दिन पूरे कर लिए हैं.
बापुलापाडु मंडल में इस साल 9,818 परिवारों को मनरेगा के तहत काम मिला और ₹10.44 करोड़ मज़दूरी पर खर्च हुए. जिला स्तर पर 2024–25 में 1,39,739 परिवारों को रोज़गार मिला और 7,580.66 लाख मानव-दिवस सृजित हुए. 2025–26 में अब तक 5,490.37 लाख मानव-दिवस बने हैं. महिलाओं ने 2,956.87 लाख मानव-दिवस का योगदान दिया. औसत मजदूरी ₹280.54 रही. 3,900 से ज़्यादा परिवारों ने 100 दिन का काम पूरा किया.
हालांकि, बंदरुगुडेम और अंपापुरम जैसे गांवों के अंतर से साफ है कि योजना हर जगह समान रूप से लागू नहीं हुई. छोटे गांवों में सामुदायिक ज़मीन कम होने से काम के अवसर सीमित हैं. अधिकारी निजी तालाब जैसे कामों को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन छोटे किसान ज़मीन देने से हिचकते हैं.
अब मनरेगा की जगह VB-G RAM G लाने के फैसले पर विवाद है. विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि मनरेगा की सबसे बड़ी ताकत उसका कानूनी रोज़गार अधिकार था. उन्हें डर है कि नई योजना में काम मांगने का स्पष्ट अधिकार नहीं रहेगा और इसे प्रशासनिक नियंत्रण में चला दिया जाएगा.
लिबटेक इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 2024–25 में आंध्र प्रदेश में प्रति परिवार औसतन 51.6 दिन काम मिला और केवल 11% परिवारों ने 100 दिन पूरे किए. रिपोर्ट का कहना है कि नई योजना में काम मांगने का अधिकार हट सकता है और इससे आदिवासी जैसे कमजोर समुदाय प्रभावित हो सकते हैं. गांव की जयम्मा जैसी महिलाओं के लिए ये बहसें दूर की बातें हैं. उनके लिए सबसे ज़रूरी है काम मिलना.
‘जब उस्मान तारिक़ रुकें तो हट जाओ’: पाकिस्तान से मुकाबले से पहले भारतीय बल्लेबाजों को अश्विन की सलाह
उस्मान तारिक़ के अनोखे एक्शन ने क्रिकेट की दुनिया को बांट दिया है, लेकिन रविचंद्रन अश्विन ने पहले उनका समर्थन किया था.
पूर्व भारतीय स्पिनर आर. अश्विन ने रविवार को टी20 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के खिलाफ होने वाले मैच से पहले भारतीय बल्लेबाजों को एक सीधी सलाह दी है. उन्हें पाकिस्तान के ऑफ स्पिनर उस्मान तारिक़ के अनोखे ‘साइड-आर्म एक्शन’ का सामना करना होगा.
अपने यूट्यूब चैनल ‘ऐश की बात’ पर एक संवाद में अश्विन ने कहा, “अगर वह गेंद फेंकने से पहले रुकते हैं, तो बल्लेबाज के पास हट जाने का अधिकार है. वह कह सकता है कि ‘मुझे लगा कि वह रुक रहे हैं’. यह एक दिलचस्प मामला होगा और अंपायर के लिए बड़ा सिरदर्द. अगर मैं वहां होता तो मैं यही करता. नियमों के भीतर मैच जीतने के लिए सब कुछ करना चाहिए. मैं बस कह देता कि मुझे नहीं पता कि वह कब गेंद छोड़ेंगे और मैं हट जाता. अगर मैं हट जाता हूँ, तो यह अंपायर की जिम्मेदारी है.”
30 साल के तारिक ने अपने चार टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में काफी हलचल मचाई है. उन्होंने छह रन प्रति ओवर से भी कम की इकॉनमी से 11 विकेट लिए हैं. भारत-पाकिस्तान मैच से पहले की चर्चाओं के अलावा, तारिक भी बातचीत का एक अहम मुद्दा बनने वाले हैं.
तारिक के एक्शन ने क्रिकेट जगत को दो हिस्सों में बांट दिया है, लेकिन अश्विन ने पहले उनका समर्थन किया था. पाकिस्तान तारिक का इस्तेमाल बहुत संभलकर कर रहा है. अश्विन ने यह जांचने के लिए कि क्या उनका साइड-आर्म एक्शन आईसीसी के नियमों के अनुसार 15 डिग्री की सीमा के भीतर है, ‘रियल-टाइम कॉम्पिटिशन टेस्टिंग टूल’ की मांग की थी.
अश्विन ने कहा, “15 डिग्री का नियम है जिसके तहत गेंदबाज को अपनी कोहनी सीधी रखनी होती है, और मैदानी अंपायर के लिए यह तय करना असंभव है कि कोई गेंदबाज उस 15 डिग्री के निशान के भीतर गेंदबाजी कर रहा है या नहीं. इसका एकमात्र समाधान रियल-टाइम टेस्टिंग टूल है. यह एक ग्रे एरिया है और किसी पर इसका फायदा उठाने का आरोप लगाना गलत है.”
अश्विन ने समझाया कि वह बल्लेबाजों को हटने की सलाह क्यों दे रहे हैं, क्योंकि इससे मुकाबले में और रोमांच जुड़ जाएगा. उन्होंने कहा, “कल्पना कीजिए मैच के बीच में उस्मान तारिक पर क्या दबाव होगा. यह एक मजेदार स्थिति होगी. वह उनका तुरुप का इक्का हैं, सोचिए अगर बल्लेबाज ऐसा रिएक्शन दे तो क्या होगा.”
ट्रम्प की सत्ता पर पकड़ ढीली? प्रतिरोध की नई लहर
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है. जो ट्रम्प पहले कार्यकाल में अजेय लगते थे, अब उन्हें कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. यह कोई बड़ा विप्लव नहीं है, लेकिन “सियासी गुरुत्वाकर्षण” अब काम करने लगा है. सीएनएन और एक्सियोस दोनों ने इस पर लंबे विश्लेषण लिखे हैं.
कहाँ-कहाँ मिल रही है चुनौती?
सड़क पर और राज्यों में: मिनेसोटा में भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद, ट्रम्प के ‘बॉर्डर ज़ार’ टॉम होमन को वहां से संघीय पुलिस (आईसीई) को वापस बुलाना पड़ा. डेमोक्रेटिक गवर्नर टिम वाल्ज़ ने इसे “संघीय आक्रमण” कहा था और ट्रम्प को पीछे हटना पड़ा.
अदालतों में: न्यायपालिका ट्रम्प की मनमानी पर लगाम लगा रही है. हाल ही में एक जज ने रक्षा मंत्री के उस आदेश को रोक दिया जिसमें वे रिटायर्ड नेवी अफसर और सीनेटर मार्क केली पर ‘देशद्रोह’ का मुकदमा चलाना चाहते थे.
अपनी ही पार्टी में: रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी दरारें दिख रही हैं. छह रिपब्लिकन सांसदों ने ट्रम्प के टैरिफ प्लान के खिलाफ वोट किया. सीनेटर थॉम टिलिस ने फेडरल रिज़र्व के चेयरमैन पर हो रही जांच का विरोध किया. जेफरी एपस्टीन की फाइलों को सार्वजनिक होने से रोकने की ट्रम्प की कोशिश भी नाकाम रही.
डेमोक्रेटिक सीनेटर एलिसा स्लोटकिन ने इसे सही शब्दों में पिरोया: “डर संक्रामक होता है, लेकिन साहस भी संक्रामक होता है.” जैसे-जैसे ट्रम्प की लोकप्रियता (39% अप्रूवल रेटिंग) गिर रही है, वैसे-वैसे डर का माहौल कम हो रहा है और संस्थाएं उनके खिलाफ खड़ी होने लगी हैं.
अमेरिका अपना नेतृत्व खो चुका है, जर्मन चांसलर ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में कहा
पॉलिटिको के मुताबिक चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने म्यूनिख में अपने भाषण में पुष्टि की कि एक ‘यूरोपीय परमाणु निवारक’ पर चर्चा चल रही है.
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने म्यूनिख में विश्व नेताओं को एक कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिकी नेतृत्व को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता और यूरोप को अपने पैरों पर और मजबूती से खड़े होने के लिए तैयार रहना चाहिए. म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के उद्घाटन के दौरान मर्ज़ ने कहा, “अमेरिका के नेतृत्व के दावे को चुनौती दी जा रही है, शायद वह खो चुका है.” बर्लिन की तरफ से यह अब तक का सबसे स्पष्ट आकलन था कि दुनिया अब बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता से परिभाषित हो रही है. उन्होंने कहा, “महाशक्तियों के दौर में, हमारी आज़ादी की अब कोई गारंटी नहीं है. यह खतरे में है.”
उन्होंने तर्क दिया कि वैश्विक व्यवस्था शायद पहले ही ध्वस्त हो चुकी है. उन्होंने कहा, “अधिकारों और नियमों पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था... अब उस तरह मौजूद नहीं है जैसी कभी हुआ करती थी.”
मर्ज़ ने जर्मनी के इतिहास से भी सबक लिया. उन्होंने कहा, “हम जर्मन जानते हैं कि जिस दुनिया में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली बात हो, वह एक अंधेरी जगह होगी. हमारा देश 20वीं सदी में इस रास्ते पर कड़वे और भयानक अंत तक जा चुका है.”
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि चांसलर ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन के साथ एक ‘यूरोपीय परमाणु निवारक’ के बारे में चर्चा की पुष्टि की. यह भाषण जर्मनी की रणनीतिक स्थिति में बदलाव का संकेत था: वह अभी भी नाटो में है, लेकिन ऐसे भविष्य की तैयारी कर रहा है जहाँ अमेरिकी गारंटी कम भरोसेमंद हो सकती है और यूरोप को अधिक जिम्मेदारी उठानी होगी.
यह संदेश अमेरिकी उप रक्षा सचिव एलब्रिज कोल्बी की टिप्पणी से मेल खाता है, जिन्होंने “नाटो 3.0” का आह्वान किया था, जिसमें यूरोपीय सहयोगी रक्षा का बड़ा बोझ उठाएंगे. मर्ज़ ने संकेत दिया कि बर्लिन पहले से ही यूरोप में अमेरिका की कम उपस्थिति वाले परिदृश्य की तैयारी कर रहा है. उन्होंने कहा, “हम यूरोपीय एहतियात बरत रहे हैं. ऐसा करते हुए, हम वाशिंगटन प्रशासन से अलग निष्कर्ष पर पहुँचते हैं.”
यूरोपीय परमाणु निवारक
फ्रांस अपने सहयोगियों को परमाणु हथियारों से सुरक्षा का भरोसा देने के लिए कितना आगे जाएगा, यह यूरोप की सुरक्षा का सबसे संवेदनशील सवाल है. मर्ज़ ने कहा, “मैंने इमैनुएल मैक्रॉन के साथ यूरोपीय परमाणु निवारक के बारे में बात की,” जो यह दर्शाता है कि जर्मनी अमेरिकी सुरक्षा की अनिश्चितता के बीच खुले तौर पर विकल्पों पर विचार कर रहा है.
मर्ज़ ने वाशिंगटन के साथ बढ़ते राजनीतिक और आर्थिक मतभेदों को भी रेखांकित किया, जिसमें डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों से जुड़े व्यापार विवाद शामिल हैं. उन्होंने कहा, “यूरोप और अमेरिका के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई है. अमेरिका के ‘कल्चर वॉर’ हमारे नहीं हैं. और हम टैरिफ और संरक्षणवाद में नहीं, बल्कि मुक्त व्यापार में विश्वास करते हैं.”
मर्ज़ ने चीन के प्रति भी कड़ा रुख अपनाया और चेतावनी दी कि चीन जल्द ही अमेरिकी सैन्य शक्ति को चुनौती दे सकता है. उन्होंने कहा, “यह युद्ध (यूक्रेन में) तभी खत्म होगा जब रूस कम से कम आर्थिक रूप से, और संभवतः सैन्य रूप से, थक जाएगा.”
मर्ज़ ने ग्रीनलैंड की संप्रभुता के लिए यूरोपीय एकजुटता की भी तारीफ की, जब ट्रम्प ने इस डेनिश क्षेत्र को अपने में मिलाने के लिए दबाव डाला था. उन्होंने कहा, “हम इस दुनिया में असहाय नहीं हैं. हम नए दरवाजे खोलेंगे.”
‘शर्मनाक और अनैतिक’: अरुंधति रॉय ने बर्लिन फिल्म फेस्टिवल का बहिष्कार किया
प्रसिद्ध लेखिका और बुकर प्राइज विजेता अरुंधति रॉय ने बर्लिन फिल्म फेस्टिवल (Berlinale) से अपना नाम वापस ले लिया है. उनका यह कदम कला और राजनीति के बीच चल रही वैश्विक बहस को और तेज़ कर गया है. अरुंधति रॉय को इस साल फेस्टिवल में अपनी 1989 की फिल्म ‘In Which Annie Gives It Those Ones’ की स्क्रीनिंग के लिए जाना था, जिसकी पटकथा उन्होंने लिखी थी. यह उनके लिए एक भावुक पल होने वाला था. लेकिन उन्होंने जाने से इनकार कर दिया. वजह बनी फेस्टिवल की जूरी के अध्यक्ष, जर्मन फिल्ममेकर विम वेंडर्स की एक टिप्पणी. वेंडर्स ने कहा था कि “फिल्ममेकर्स को राजनीति से दूर रहना चाहिए” और फिल्में राजनीतिक फैसले नहीं बदल सकतीं. अरुंधति रॉय ने इस बयान को “शर्मनाक” और “अनैतिक” बताया. उन्होंने एक कड़े बयान में कहा:
“मैं साफ कर दूँ, गाज़ा में जो हो रहा है वह इज़राइल द्वारा किया जा रहा फिलिस्तीनियों का नरसंहार है. ऐसे समय में जब मानवता के खिलाफ अपराध हो रहा हो, कला की तटस्थता की बात करना उस अपराध पर पर्दा डालने जैसा है. अगर आज के दौर के कलाकार इसके खिलाफ नहीं बोल सकते, तो इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा.”
रॉय ने कहा कि भले ही उन्हें जर्मन दर्शकों से हमेशा प्यार मिला है, लेकिन वे ऐसे मंच का हिस्सा नहीं बन सकतीं जो गाज़ा में चल रहे कत्लेआम पर चुप रहने की वकालत करता हो.
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