13/03/2026 : जंग की छाया में गटर गैस का जयकारा | सीईसी को हटाने का नोटिस | ईरान से रास्ता मांगा, चीन से खाद के लिए केमिकल | ईरान ने भारत से ब्रिक्स का सक्षम नेतृत्व की बात कही |
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियाँ
विपक्ष ने भारत के इतिहास में पहली बार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए ऐतिहासिक नोटिस दिया.
ईरान युद्ध से भारत में गैस संकट गहराया, कतार में एक व्यक्ति की मौत और सोशल मीडिया पर भारी मीम वार शुरू.
शेयर बाजार में हाहाकार, पश्चिम एशिया तनाव से दो हफ्ते में उनतालीस लाख करोड़ रुपये स्वाहा.
गैस किल्लत के बीच भारत ने चीन से मांगा यूरिया, वहीं व्यावसायिक उपयोग के लिए सरकार ने दिए वैकल्पिक ईंधनों के सुझाव.
ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित मार्ग का दिया संकेत, भारतीय विदेश मंत्री से बातचीत कर ब्रिक्स में हस्तक्षेप की अपील की.
तेहरान पर इजरायल के भारी हवाई हमले जारी, सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की अमेरिका को सीधी चेतावनी.
व्हाइट हाउस में युद्ध को लेकर कलह, यूरोपीय नेताओं ने प्रतिबंध हटाने के ट्रंप के फैसलों की कड़ी आलोचना की.
श्रीलंका और भारत नौसैनिक युद्ध में उलझे, अमेरिकी टॉरपीडो ने श्रीलंका के तट पर ईरानी जहाज को किया तबाह.
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, पीरियड लीव अनिवार्य करने से महिलाओं के रोजगार पर पड़ेगा बुरा असर.
मणिपुर में फिर भड़की हिंसा, उखरूल में दो कुकी युवकों की हत्या से इलाके में भारी तनाव.
सीईसी को हटाने के लिए विपक्ष ने दिया नोटिस
‘पीटीआई’ की खबर है कि विपक्षी सांसदों ने संसद के दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए एक प्रस्ताव पेश करने हेतु नोटिस दिया है. एक सूत्र के अनुसार, लोकसभा के 130 सांसदों और राज्यसभा के 63 सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं.
हस्ताक्षर करने वालों में इंडिया ब्लॉक के सभी दलों के सदस्य शामिल हैं. आम आदमी पार्टी ने भी इस कदम का समर्थन किया है, भले ही वह अब औपचारिक रूप से विपक्षी गठबंधन का हिस्सा नहीं है. इसके अलावा कुछ स्वतंत्र सांसदों ने भी नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं और कई अन्य ने इस पहल में शामिल होने की इच्छा जताई है. यह पहली बार है जब मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए कोई नोटिस लाया गया है.
नोटिस में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सात आरोप लगाए गए हैं, जिनमें “पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण”, “चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझकर बाधा डालना” और “बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित करना” शामिल है. विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर कई मौकों पर सत्ताधारी भाजपा की मदद करने का आरोप लगाया है, विशेष रूप से मतदाता सूची के चल रहे ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) को लेकर, जिसके बारे में उनका दावा है कि इसका उद्देश्य केंद्र में सत्तारूढ़ दल की मदद करना है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस कदम की पहल की है. टीएमसी के वरिष्ठ सांसद संसद के दोनों सदनों के विपक्षी सदस्यों के हस्ताक्षर जुटाने में सबसे आगे रहे हैं. भारत के चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कई राज्यों में विवाद का विषय रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल में यह विशेष रूप से विवादास्पद मुद्दा बन गया है.
विपक्ष का यह कदम काफी हद तक प्रतीकात्मक माना जा रहा है, क्योंकि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में सत्ताधारी एनडीए के पास स्पष्ट संख्याबल है और वे बहुमत में हैं. हालांकि, इसका राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा है, क्योंकि यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब चुनाव आयोग जल्द ही पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी (केंद्र शासित प्रदेश) के लिए विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करने वाला है.
सीईसी को कैसे हटाया जाता है?
सीईसी को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज पर महाभियोग चलाने जैसी ही होती है. संविधान के अनुच्छेद 324 (5) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है”. इसके अलावा, पद से हटाने के आधार मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 की धारा 11 (2) में भी निर्धारित किए गए हैं.
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार, महाभियोग की शिकायत तभी विचार के लिए स्वीकार की जाती है जब उस पर लोकसभा के कम से कम 100 सदस्यों और राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर हों. एक बार प्रस्ताव प्रस्तुत होने के बाद, पीठासीन अधिकारी इसे स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय लेता है. यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो अध्यक्ष या सभापति एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं. जांच के बाद समिति अपनी रिपोर्ट सौंपती है. यदि रिपोर्ट में कदाचार साबित हो जाता है, तो प्रस्ताव पर बहस होती है. प्रस्ताव को पास होने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में “उपस्थित और मतदान करने वाले” कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का वोट जरूरी होता है, और पक्ष में पड़े वोटों की संख्या प्रत्येक सदन की “कुल सदस्यता” के 50 प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए. विशेष बहुमत से पारित होने के बाद ही इसे भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है.
सोशल मीडिया में एलपीजी संकट
एलपीजी की कमी के बाद पूरा भारत मोदी की ‘गटर गैस’ की शरण में
ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले ने न केवल भारत सहित दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों में उथल-पुथल मचा दी है और वैश्विक विमानन सेवा को अस्त-व्यस्त कर दिया है, बल्कि इसने एक भीषण “मीम युद्ध” को भी जन्म दिया है. सोशल मीडिया यूजर्स ने विशेष रूप से एलपीजी संकट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए राजनीति, संस्कृति, इतिहास और बॉलीवुड के संदर्भों का सहारा लिया है और अपने भीतर के हास्य कलाकार को बाहर निकाला है.
‘द टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, जहाँ एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें कच्चे तेल और एलपीजी की पर्याप्त आपूर्ति का दावा कर रही हैं, और देश भर में लोग गैस वितरण केंद्रों पर लंबी कतारें लगा रहे हैं, वहीं भारत के प्रसिद्ध ‘कीबोर्ड वॉरियर्स’ ने राजनीतिक वर्ग (अर्थात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार) पर एक के बाद एक हास्य—और कुछ के अनुसार, सत्य—के बम फोड़े हैं.
सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स की तीखी कलम — क्षमा करें, माउस — के नीचे आकर विक्की डोनर, केजीएफ, बदलापुर और पैडमैन जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों के पोस्टर अब ‘एलपीजी डोनर’, ‘एलपीजी- चैप्टर 1’, ‘सिलेंडरपुर- शुरुआत को मिस न करें’ और ‘एलपीजीमैन’ बन चुके हैं. न केवल फ़िल्में, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सहित देश के शीर्ष नेता भी इस चुटीले कटाक्ष का शिकार हुए हैं.
ऐसे अनगिनत सोशल मीडिया हैंडल्स हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के उस पुराने वीडियो क्लिप को, जिसमें वे “गटर गैस” के फायदों के बारे में बात कर रहे थे, आज गैस वितरण केंद्रों के बाहर लंबी कतारों में खड़े आम लोगों की तस्वीरों के साथ जोड़ दिया है.
निर्मला सीतारमण और स्मृति ईरानी भी इस ‘ऑपरेशन एपिक फनी’ के निशाने पर रहीं. कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में वित्त मंत्री पर चुटकी लेते हुए कहा गया कि उन्हें सिलेंडरों की चिंता नहीं है, क्योंकि वह ‘आयत’ (रेक्टेंगल) खरीदती हैं.
वहीं, स्मृति ईरानी को ‘लापता लेडीज’ के रूप में टैग किया गया. यूजर्स ने यूपीए शासन के दौरान एलपीजी संकट पर उनके द्वारा किए गए भारी विरोध प्रदर्शन और आज की उनकी चुप्पी के बीच के अंतर को उजागर किया.
क़तार में दो घंटे खड़े रहे 66 वर्षीय व्यक्ति की मौत
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब के बरनाला जिले में एलपीजी गैस एजेंसी के बाहर लाइन में खड़े एक 66 वर्षीय व्यक्ति की कथित दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई. यह घटना ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण गैस सप्लाई को लेकर लोगों में चिंता बढ़ी हुई है. मृतक की पहचान भूषण कुमार मित्तल के रूप में हुई है. वह सुबह करीब 8 बजे बरनाला के शेहना ब्लॉक की एक गैस एजेंसी पर सिलेंडर लेने पहुंचे थे और उन्हें टोकन नंबर 25 दिया गया था. लगभग दो घंटे तक लाइन में खड़े रहने के बाद वह थकान के कारण एक सिलेंडर पर बैठ गए और करीब 10 बजे अचानक गिर पड़े. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. शुरुआती जानकारी के अनुसार उनकी मौत कार्डियक अरेस्ट से हुई.
रिपोर्ट के अनुसार 11 मार्च की दोपहर से ऑनलाइन एलपीजी बुकिंग सिस्टम में खराबी की शिकायतें भी सामने आईं, जिसके कारण कई लोगों को गैस एजेंसी जाकर खुद बुकिंग या सिलेंडर लेना पड़ा. डीलरों ने बताया कि कई बार बुकिंग होने के बाद भी डिलीवरी के लिए ज़रूरी मोबाइल ओटीपी नहीं मिलता, जिससे वितरण में देरी हो रही है.
क़िल्लत के बीच सरकार का केरोसीन और कोयले इस्तेमाल करने का सुझाव
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार भारत में एलपीजी यानी रसोई गैस के आयात पर असर पड़ा है. इसके चलते सरकार ने दबाव कम करने के लिए केरोसीन, फ्यूल ऑयल, बायोमास और यहां तक कि कोयले जैसे वैकल्पिक ईंधनों का इस्तेमाल करने को कहा है, खासकर रेस्तरां और होटलों जैसे व्यावसायिक उपभोक्ताओं के लिए.
सरकार ने यह भी फैसला किया है कि औसत मासिक कमर्शियल एलपीजी मांग का 20% हिस्सा व्यावसायिक उपयोग के लिए अलग से आवंटित किया जाएगा. यह आवंटन तेल विपणन कंपनियां (ओएमसीएस) राज्य सरकारों के साथ मिलकर करेंगी. वहीं घबराहट में सिलेंडर बुकिंग बढ़ने के कारण सरकार ने मांग नियंत्रित करने के लिए सिलेंडर बुकिंग के बीच न्यूनतम अंतराल बढ़ा दिया है. ग्रामीण और दूरदराज़ के इलाकों में यह अंतराल 45 दिन कर दिया गया है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 25 दिन रहेगा. पहले यह अंतराल 21 दिन था.
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने लोकसभा में कहा कि एलपीजी पर दबाव कम करने के लिए वैकल्पिक ईंधनों को सक्रिय किया जा रहा है. केरोसीन को रिटेल आउटलेट और पीडीएस के ज़रिए उपलब्ध कराया जा रहा है, जबकि उद्योगों और व्यावसायिक उपभोक्ताओं के लिए फ्यूल ऑयल उपलब्ध कराया जा रहा है. पर्यावरण मंत्रालय ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सलाह दी है कि संकट के इस दौर में एक महीने के लिए होटल और रेस्तरां सेक्टर को बायोमास, RDF पेलेट, केरोसीन और कोयले जैसे ईंधन इस्तेमाल करने की अनुमति दी जाए, ताकि एलपीजी को प्राथमिक उपभोक्ताओं के लिए बचाया जा सके.
भारत अपनी एलपीजी जरूरत का करीब 60% आयात करता है, और इसमें से लगभग 90% पश्चिम एशिया से आता है. यानी भारत की कुल एलपीजी खपत का लगभग 55% हिस्सा फिलहाल प्रभावित हुआ है.भारत में 33 करोड़ से अधिक घरेलू एलपीजी उपभोक्ता हैं. सरकार के अनुसार आपूर्ति बढ़ाने के कदमों से घरेलू एलपीजी उत्पादन संघर्ष से पहले के स्तर की तुलना में 28% बढ़ गया है और इसे घरेलू ज़रूरतों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. सरकार ने यह भी कहा कि कमर्शियल एलपीजी को नियंत्रित करने का उद्देश्य होटल उद्योग को दंडित करना नहीं बल्कि भंडारण और काला बाज़ारी रोकना है.
ईरान के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री ने भारत से कहा- ब्रिक्स को निभानी चाहिए बड़ी भूमिका
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को “ईरान का दोस्त” बताया है. इसके साथ ही तेहरान ने नई दिल्ली से आग्रह किया है कि ब्रिक्स, जिसकी अध्यक्षता वर्तमान में भारत कर रहा है, पश्चिम एशिया के बढ़ते संघर्ष को सुलझाने में एक “मजबूत” और “रचनात्मक” भूमिका निभाए. इस युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा और शिपिंग मार्गों को बुरी तरह से बाधित कर दिया है.
ईरान की ओर से जारी बयान के अनुसार, यह मुद्दा गुरुवार देर रात पेज़ेशकियन और मोदी के बीच फोन पर हुई बातचीत के दौरान उठाया गया. उसी रात ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची और भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच भी फोन पर बात हुई. 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद से यह उनके बीच चौथी बातचीत थी. जयशंकर ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट के जरिए इस बातचीत की पुष्टि करते हुए कहा कि दोनों ने “द्विपक्षीय मामलों और ब्रिक्स से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की.”
ईरानी सरकारी समाचार एजेंसी मेहर द्वारा प्रकाशित बयान के अनुसार, पेज़ेशकियन ने अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भारत की “संतुलित और रचनात्मक स्थिति” और तनाव कम करने के प्रयासों की सराहना की. उन्होंने कहा कि ईरान ने युद्ध शुरू नहीं किया है और इसे जारी रखने की उसकी कोई इच्छा नहीं है, लेकिन उसने अपने “आत्मरक्षा के वैध अधिकार” के तहत क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है. बयान के अनुसार, पीएम मोदी ने बातचीत में बढ़ते तनाव पर गहरी चिंता व्यक्त की, भारत को ईरान का मित्र बताया और कूटनीति को आगे बढ़ाने के लिए “अधिकतम प्रयास” करने की बात कही. पेज़ेशकियन ने ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के माध्यम से भारत के साथ सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई.
वर्तमान संघर्ष पर भारत की अध्यक्षता वाले ब्रिक्स ने अब तक कोई संयुक्त बयान जारी नहीं किया है, जबकि पिछले साल ब्राज़ील की अध्यक्षता में ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों की निंदा करते हुए कड़े बयान जारी किए गए थे. विस्तारित ब्रिक्स में अब ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) भी शामिल हैं, जो वर्तमान युद्ध में विरोधी पक्षों में हैं. भारत ने खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों पर ईरान के हमलों की निंदा की है, लेकिन ईरान पर शुरुआती अमेरिकी-इजरायली हमलों की औपचारिक आलोचना करने से बचा है.
यह कूटनीतिक बातचीत होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर जारी अनिश्चितता के बीच हो रही है, जहां भारत के दो दर्जन से अधिक जहाज फंसे हुए हैं. इस रास्ते के बंद होने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ा है. भारत अपनी कुल एलपीजी मांग का 62 से 65% आयात करता है, जिसका 90% हिस्सा होर्मुज़ के रास्ते आता है. इस व्यवधान ने भारत में एक घरेलू एलपीजी संकट पैदा कर दिया है, जिसका सबसे ज्यादा असर रेस्टोरेंट और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर पर पड़ा है. पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने संसद में बताया कि भारत ने अपने कच्चे तेल के 70% आयात को होर्मुज़ मार्ग से हटा लिया है और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए गैस की कोई कमी नहीं है.
इस युद्ध की कीमत भारतीय नाविकों को भी चुकानी पड़ी है. इराक के बसरा के पास एक अमेरिकी तेल टैंकर पर हुए हमले में एक भारतीय चालक दल के सदस्य की मौत हो गई. कुल मिलाकर तीन भारतीय नागरिकों की मौत हो चुकी है, एक लापता है और कई घायल हुए हैं.
ईरान ने हॉर्मुज से सुरक्षित मार्ग का संकेत दिया; युद्ध के बीच विदेश मंत्री जयशंकर और अराघची ने चर्चा की
जयंत जैकब की रिपोर्ट है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने ईरान के साथ अपने राजनयिक प्रयासों को तेज कर दिया है. तेहरान ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हॉर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से भारत के लिए सुरक्षित समुद्री मार्ग की संभावना का संकेत दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन के बीच फोन पर हुई बातचीत के कुछ ही घंटों बाद, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची से फोन पर चर्चा की. लगभग दो सप्ताह पहले शुरू हुए संघर्ष के बाद दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच यह पहला संपर्क था. जयशंकर ने बताया कि दोनों मंत्रियों ने द्विपक्षीय मुद्दों के साथ-साथ ब्रिक्स के माध्यम से समन्वय पर चर्चा की.
सूत्रों के अनुसार, भारत आ रहे दो एलपीजी टैंकरों को इस जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दे दी गई है. ईरानी विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, अराघची ने जयशंकर को हालिया क्षेत्रीय घटनाक्रमों और वैश्विक सुरक्षा पर उनके प्रभावों की जानकारी दी. ईरानी मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय संगठनों को उन कार्रवाइयों की निंदा करनी चाहिए, जिन्हें ईरान ने अपने खिलाफ ‘सैन्य आक्रामकता’ बताया है. अराघची ने संकट के इस समय में ब्रिक्स की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया और इसे क्षेत्रीय स्थिरता का समर्थन करने के लिए एक मंच के रूप में उपयोग करने का आह्वान किया.
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता खाड़ी में समुद्री मार्गों की सुरक्षा है. भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फताली ने संकेत दिया कि भारत को सुरक्षित मार्ग का आश्वासन मिल सकता है. जब उनसे पूछा गया कि क्या भारतीय जहाजों को सुरक्षित मार्ग मिलेगा, तो उन्होंने कहा: “हाँ, क्योंकि भारत हमारा मित्र है. आप इसे दो या तीन घंटों के भीतर देख लेंगे.”
फताली ने भारत को ईरान का एक महत्वपूर्ण भागीदार बताया और कहा कि दोनों देश साझा क्षेत्रीय हित साझा करते हैं। समुद्री मार्गों की सुरक्षा भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में लगभग 23,000 भारतीय नाविक मर्चेंट शिप और ऑफशोर वेसल्स पर काम कर रहे हैं.
युद्ध चीन को मजबूत बना रहा है
“द न्यूयॉर्क टाइम्स” में ‘ईरान का परमाणु कार्यक्रम’ शीर्षक से प्रकाशित एक विश्लेषण में बताया गया है कि कैसे मध्य पूर्व (ईरान) में अमेरिका की संलिप्तता एशिया में उसके प्रभुत्व को कम कर रही है और परोक्ष रूप से चीन को मजबूत बना रही है. इसमें कहा गया है कि अमेरिका का ‘इंडो-पैसिफिक’ पर ध्यान केंद्रित करने का वादा कमजोर पड़ता दिख रहा है, जिससे एशिया में शक्ति का संतुलन चीन की ओर झुक सकता है.
इसमें कहा गया है कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए दक्षिण चीन सागर से अपने विमानवाहक पोत हटा लिए हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दक्षिण कोरिया से थाड और पैट्रियट मिसाइल जैसी उन्नत रक्षा प्रणालियाँ हटाकर मध्य पूर्व भेजी जा रही हैं. इससे एशियाई सहयोगियों (जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान) के मन में असुरक्षा पैदा हो रही है, क्योंकि वे उत्तर कोरिया और चीन के खतरों के बीच खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं.
विश्लेषण के अनुसार, चीन के लिए रणनीतिक अवसर है. एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं तेल के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर हैं. युद्ध के कारण तेल की बढ़ती कीमतों और आर्थिक अस्थिरता के बीच चीन खुद को अमेरिका की तुलना में अधिक “विश्वसनीय और स्थिर” महाशक्ति के रूप में पेश कर रहा है.
जब अमेरिका का ध्यान मध्य पूर्व के “दलदल” में फंसा है, तब चीन को विवादित क्षेत्रों (जैसे दक्षिण चीन सागर के द्वीपों) में अपनी सैन्य सक्रियता बढ़ाने का मौका मिल गया है.
युद्ध ने उजागर कर दिया है कि अमेरिका के पास हथियारों का पर्याप्त भंडार नहीं है. मिसाइलों की खपत उत्पादन क्षमता से कहीं अधिक है. जापान और ताइवान जैसे देशों को पहले से ही हथियारों की डिलीवरी में देरी का सामना करना पड़ रहा है. अब एशियाई देश यह समझ रहे हैं कि वे सुरक्षा के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकते. दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देश अब अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने और आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहे हैं.
पश्चिम एशिया संघर्ष के 14वें दिन तक निवेशकों के 39 लाख करोड़ रुपये स्वाहा
पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी संघर्ष की शुरुआत से अब तक निवेशकों की संपत्ति में 33.68 लाख करोड़ रुपये की भारी गिरावट आई है. यह युद्ध अब अपने 14वें दिन में प्रवेश कर चुका है. इस संघर्ष ने शेयर बाजारों को हिलाकर रख दिया है और तेल की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है. पश्चिम एशिया की तनावपूर्ण स्थिति के कारण इस महीने अब तक बीएसई सेंसेक्स 8 प्रतिशत से अधिक टूट चुका है. वहीं अरशद खान की रिपोर्ट है कि पश्चिम एशिया संकट से दलाल स्ट्रीट पस्त हो चुका है और दो हफ़्तों में 39 लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो चुके हैं.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लगभग बंद कर दिए जाने के बाद वैश्विक तेल और गैस की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है. यह फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच एक संकीर्ण समुद्री मार्ग है, जहाँ से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी (तरल प्राकृतिक गैस) की आपूर्ति होती है. वैश्विक तेल मानक, ब्रेंट क्रूड, उछलकर 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है.
27 फरवरी से अब तक, 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 6,723.27 अंक (8.27%) गिर चुका है. इस दौरान बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) 33,68,419 करोड़ रुपये घटकर 4,29,82,252.27 करोड़ रुपये (4.65 ट्रिलियन डॉलर) रह गया है.
एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर ने कहा, “मध्यपूर्व (पश्चिम एशिया) में जारी संघर्ष अब दूसरे सप्ताह में प्रवेश कर गया है और तनाव कम होने के कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिख रहे हैं. इस अनिश्चितता ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में जोखिम से बचने की भावना को बढ़ा दिया है.”
शुक्रवार का बाजार हाल (13 मार्च 2026): शुक्रवार को कारोबार के दौरान सेंसेक्स 1,579.82 अंक तक गिर गया था, लेकिन अंत में यह 1,470.50 अंक (1.93%) की गिरावट के साथ 74,563.92 पर बंद हुआ. बजाज ब्रोकिंग के अनुसार, कमजोर वैश्विक संकेतों और विदेशी फंडों की निरंतर निकासी ने निवेशकों के उत्साह को पस्त कर दिया है.
प्रभावित कंपनियां: तेल विपणन कंपनियां: कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच एचपीसीएल (4%), आइओसी (2.28%) और बीपीसीएल (2.19%) के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई. पेंट कंपनियां: कच्चे तेल पर निर्भरता के कारण एशियन पेंट्स, बर्जर पेंट्स, कंसाई नेरोलैक और शालिमार पेंट्स के शेयर भी लाल निशान में बंद हुए.
चॉइस इक्विटी ब्रोकिंग के शोध विश्लेषक आकाश शाह ने कहा कि 13 मार्च 2026 को सेंसेक्स की यह गिरावट हाल के हफ्तों में एक दिन की सबसे बड़ी गिरावटों में से एक है. पूरे सत्र के दौरान निवेशक भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली के दबाव में रहे.
युद्ध के कारण गैस संकट गहराने पर भारत ने चीन से मांगा यूरिया
ब्लूमबर्ग के लिए हैली गु और प्रतीक परिजा की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व में युद्ध के कारण गैस आपूर्ति में भारी कमी आ रही है. इसके चलते कृषि प्रधान देश भारत ने चीन से कुछ यूरिया कार्गो की बिक्री की अनुमति देने का अनुरोध किया है ताकि देश में उर्वरक उत्पादन प्रभावित न हो.
मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों के अनुसार, भारतीय अधिकारियों ने अपने चीनी समकक्षों से निर्यात प्रतिबंधों में ढील देने पर विचार करने को कहा है. यह कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि मध्य पूर्व का बढ़ता संघर्ष तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को बाधित कर रहा है. एलएनजी उर्वरक बनाने के लिए एक प्रमुख कच्चा माल है, और इसकी कमी के कारण भारत में कुछ उर्वरक निर्माताओं को अपने प्लांट बंद करने पड़े हैं. ईरान में अमेरिका-इजरायली हमलों के कारण वैश्विक व्यापार बुरी तरह उलझ गया है और खाद्य व ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारी जोखिम पैदा हो गया है. ऐसे में देशों द्वारा प्रमुख वस्तुओं को सुरक्षित करने के लिए उठाए जा रहे ये असाधारण कदम हालात की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं. अधिकारियों के बीच बातचीत अभी जारी है और कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है.
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में खाद्य उत्पादन के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन उर्वरक, यूरिया की वैश्विक बेंचमार्क कीमतों में युद्ध के पहले ही सप्ताह में 21% का उछाल आया है. कीमतें अब तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं. चीन एक सख्त कोटा प्रणाली के तहत यूरिया निर्यात को नियंत्रित करता है. यद्यपि पिछले साल भारत सहित कुछ शिपमेंट की अनुमति दी गई थी, लेकिन चीन ने 2026 में अभी तक निर्यात के लिए कोई हिस्सा आवंटित नहीं किया है. चीन दुनिया का शीर्ष यूरिया उत्पादक है और इस समय वहां के किसान वसंत की बुवाई की तैयारी कर रहे हैं, जो उर्वरक की मांग का चरम समय होता है.
भारत का यह ताजा अनुरोध ऐसे समय में आया है जब उसने हाल ही में स्थानीय विनिर्माण को समर्थन देने के लिए सीमावर्ती देशों के लिए निवेश नियमों में ढील दी है. यह कदम मुख्य रूप से चीन को ध्यान में रखकर उठाया गया है, जो भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी होने के बावजूद अपने सबसे बड़े पड़ोसी के साथ बेहतर आर्थिक संबंधों का संकेत देता है. यद्यपि भारत को फिलहाल तत्काल उर्वरक की कमी का सामना नहीं करना पड़ रहा है, लेकिन वह यूरिया का दुनिया का सबसे बड़ा आयातक है. गैस आपूर्ति में लंबे समय तक रहने वाली कोई भी रुकावट देश को जून में मानसून के आने के साथ मुख्य बुवाई का मौसम शुरू होने से पहले अधिक आपूर्ति तलाशने के लिए मजबूर कर सकती है. सूत्रों के अनुसार मध्य पूर्व से होने वाली कमी को पूरा करने के लिए चीन के अलावा रूस, इंडोनेशिया, मलेशिया और मिस्र संभावित विकल्प हो सकते हैं.
भारत ने 31 मार्च को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष में अब तक 9.8 मिलियन टन यूरिया का आयात किया है और अगले तीन महीनों में 1.7 मिलियन टन और आने की उम्मीद है. मध्य पूर्व में युद्ध भड़कने के बाद प्रमुख एलएनजी आपूर्तिकर्ता कतर ने पिछले सप्ताह भारतीय खरीदारों के लिए ईंधन शिपमेंट में कटौती कर दी थी. भारत में गैस आवंटन के मामले में उर्वरक निर्माता दूसरे स्थान पर आते हैं, फिर भी उन्हें उनकी आवश्यकता का केवल 70% ही मिल पा रहा है, जिससे कुछ कंपनियों ने अपना उत्पादन कम करना शुरू कर दिया है.
ईरान युद्ध: अमेरिका-इजरायल के हमलों के 14वें दिन क्या हो रहा है?
‘अल जज़ीरा’ के लिए एलिजाबेथ मेलिमोपोलोस की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की राजधानी तेहरान पर इजरायल के भारी हवाई हमले जारी हैं. वहीं, ईरान के सहयोगी गुटों ने खाड़ी देशों में हमले तेज़ कर दिए हैं. होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होने वाले व्यापार के बुरी तरह बाधित होने के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. इस बीच, वाशिंगटन में भी राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है क्योंकि यह संघर्ष अब पूरे क्षेत्र में फैलने लगा है. इस बीच की प्रमुख ख़बरें-
ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने अपना पहला बयान जारी करते हुए चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में इजरायल और अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले तब तक जारी रहेंगे, जब तक कि इस क्षेत्र में अमेरिकी बलों की मेज़बानी करने वाले बेस बंद नहीं कर दिए जाते.
शुक्रवार सुबह इजरायली सेना ने तेहरान पर हवाई हमलों की एक और “व्यापक लहर” शुरू की, जिससे पूरा शहर धुएं की चादर में लिपट गया.
होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने से ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं.
ईरान ने साफ कर दिया है कि यह जलमार्ग उसके नियंत्रण में है और अमेरिका व इजरायल से जुड़े जहाजों के गुज़रने पर प्रतिबंध है.
संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत अमीर सईद इरावानी के मुताबिक, इन हमलों में अब तक आठ महीने के बच्चे से लेकर 88 साल के बुज़ुर्ग तक कम से कम 1,348 नागरिक मारे जा चुके हैं.
खाड़ी देशों में भी ईरान की जवाबी कार्रवाई जारी है.
बहरीन ने अब तक 114 मिसाइलों और 190 ड्रोनों को मार गिराने का दावा किया है.
सऊदी अरब ने अपने हवाई क्षेत्र में घुसे 38 ड्रोनों को नष्ट किया है.
यूएई ने दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और कुछ होटलों पर हुए ईरानी हमलों की कड़ी निंदा की है.
इस बिगड़ते हालात को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया ने यूएई और इजरायल से अपने “गैर-ज़रूरी” अधिकारियों को वापस बुला लिया है.
कतर का हवाई क्षेत्र आधिकारिक तौर पर बंद है, लेकिन कतर एयरवेज फंसे हुए लोगों को निकालने के लिए विशेष उड़ानें संचालित कर रहा है.
कतर ने इजरायली मीडिया के उन दावों को खारिज किया है जिनमें कहा गया था कि उसने जानबूझकर एलएनजी उत्पादन रोका है; अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह रोक एक ईरानी ड्रोन हमले के कारण लगानी पड़ी.
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में पत्रकारों से कहा कि ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध “बहुत तेज़ी” से आगे बढ़ रहा है और अमेरिकी सेना का कोई सानी नहीं है.
हालांकि, अमेरिका के भीतर विरोध भी तेज़ हो गया है. 250 से ज़्यादा अमेरिकी संगठनों ने कांग्रेस से युद्ध की फंडिंग रोकने की अपील की है, उनका तर्क है कि युद्ध के शुरुआती छह दिनों में खर्च किए गए 11.3 अरब डॉलर घरेलू ज़रूरतों से छीने गए हैं.
रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने ईरान में जमीनी सेना भेजने की संभावना से इनकार किया, लेकिन माना कि यह युद्ध लंबा खिंच सकता है.
इजरायल में भी तनाव चरम पर है. शुक्रवार तड़के ईरान ने इजरायल पर मिसाइलों की नई बौछार की, जिसके बाद लोगों को शेल्टरों में जाने का निर्देश दिया गया.
इजरायली सेना ने तेहरान में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के बासीज फोर्स के चेकप्वाइंट्स को भी निशाना बनाया है.
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि उनका मक़सद ईरान में सत्ता परिवर्तन के हालात बनाना है, लेकिन इसे अंजाम देना वहां की जनता के हाथ में है. लेबनान और इराक में भी युद्ध का असर दिख रहा है.
पश्चिमी इराक में एक अमेरिकी केसी-135 ईंधन भरने वाला विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया.
इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र में एक ड्रोन हमले में छह फ्रांसीसी सैनिक घायल हो गए.
वहीं, लेबनान में इजरायली हमलों में अब तक 98 बच्चों समेत 687 लोग मारे जा चुके हैं और लगभग 7.5 लाख लोग विस्थापित हुए हैं.
फ़लस्तीनियों के समर्थन में निकाले गए तेहरान के अल-कुद्स दिवस मार्च के पास धमाके
अल जज़ीरा के स्टाफ की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी राजधानी तेहरान में अल-कुद्स दिवस के मौके पर आयोजित मार्च के पास कई धमाके सुने गए, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई. यह घटना ऐसे समय में हुई है जब देश भर में अमेरिका-इजरायल के हमले 14वें दिन भी जारी हैं. हजारों की संख्या में ईरानी नागरिक फ़लस्तीनियों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए इस वार्षिक रैली में हिस्सा ले रहे थे.
ईरानी सरकारी टेलीविजन के अनुसार, शुक्रवार दोपहर तेहरान के फिरदौसी स्क्वायर पर हुए एक बड़े धमाके ने प्रदर्शनकारियों से भरे इलाके को हिलाकर रख दिया. धमाके का कारण तुरंत स्पष्ट नहीं हो सका, लेकिन यह घटना इजरायल की उस धमकी के ठीक बाद हुई जिसमें उसने लोगों को उस इलाके को खाली करने की चेतावनी दी थी क्योंकि वहां हवाई हमले की योजना थी. सरकारी मीडिया आउटलेट प्रेस टीवी ने बताया कि अमेरिका-इजरायली हवाई हमले के छर्रे लगने से एक महिला की मौत हो गई. अल जज़ीरा अरबी ने यह भी रिपोर्ट किया कि तेहरान में प्रदर्शनकारियों की भीड़ से कुछ ही मीटर की दूरी पर एक हवाई हमला हुआ, हालांकि यह स्पष्ट नहीं हो सका कि इससे कोई हताहत हुआ या नहीं.
लगातार हो रहे हमलों के बावजूद तेहरान और अन्य शहरों में भारी भीड़ उमड़ी. अल-कुद्स (जिसका अरबी में अर्थ यरूशलेम है) दिवस फिलिस्तीन का समर्थन करने और इजरायली कब्जे का विरोध करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है. प्रदर्शन में शामिल हुए सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी ने दावा किया कि इजरायल डर के मारे कुद्स दिवस पर बमबारी कर रहा है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह नहीं पता कि ईरानी एक मज़बूत और दृढ़ संकल्पी अवाम हैं. समाचार एजेंसी तस्नीम की रिपोर्ट के अनुसार, सड़क व खेल मंत्री भी प्रदर्शनकारियों के बीच देखे गए.
प्रदर्शनकारियों ने ईरानी झंडे और फ़लस्तीनी लड़ाकों की तस्वीरें लिए हुए “इजरायल मुर्दाबाद” और “अमेरिका मुर्दाबाद” के नारे लगाए. अल जज़ीरा के पत्रकार तोहिद असदी ने तेहरान से रिपोर्ट करते हुए बताया कि हालांकि इस आयोजन का मक़सद फ़लस्तीनी लोगों के साथ “एकजुटता व्यक्त करना” था, लेकिन यह देश में हो रहे मौजूदा हमलों पर लोगों के गुस्से को ज़ाहिर करने का भी एक मौका बन गया. उन्होंने कहा कि पिछले नौ महीनों में यह दूसरी बार है जब देश पर हमला हो रहा है, और इस बार युद्ध का दायरा अभूतपूर्व है. ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने युद्ध के बावजूद लोगों से बड़ी संख्या में भाग लेने का आग्रह किया था.
ईरान के सर्वोच्च नेता के पहले कथित संदेश ने एक बड़ा सवाल अनसुलझा छोड़ दिया
सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के नए सर्वोच्च नेता के रूप में अपनी नियुक्ति के चार दिन बाद, दुनिया को आखिरकार मोजतबा खामेनेई के दृष्टिकोण की एक झलक मिली. लेकिन अयातुल्ला के पद पर आसीन और “इस्लामिक क्रांति के सर्वोच्च नेता” कहलाने वाले मोजतबा न तो किसी वीडियो में दिखाई दिए और न ही उनका कोई ऑडियो बयान सामने आया. इसके बजाय, उन्होंने कथित तौर पर एक लंबा लिखित संदेश जारी किया, जिसे सरकारी टेलीविजन पर पढ़ा गया. इस संदेश में युद्ध की दिशा को लेकर उनके विचार रखे गए, ईरानी सशस्त्र बलों की प्रशंसा की गई और देश पर हमला करने वालों से हर्जाने की मांग की गई.
यह संदेश उनके कार्यालय द्वारा बनाए गए एक नए टेलीग्राम चैनल के माध्यम से तेज़ी से फैलाया गया. इसे उनके समर्थकों को लुभाने के लिए प्रतीकात्मक रूप से डिज़ाइन किया गया था. इसके साथ ही तीन हैंडराइटिंग सैंपल भी जारी किए गए - एक पहले सर्वोच्च नेता रूहुल्लाह खुमैनी का, दूसरा मारे गए अली खामेनेई का और तीसरा खुद मोजतबा का. संदेश साफ़ था: एक नए युग की शुरुआत हो रही थी, और नया नेता खुद को अपने पूर्ववर्तियों के वास्तविक उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित कर रहा था. संदेश के मुताबिक, मोजतबा खामेनेई को अपनी नियुक्ति के बारे में सरकारी टीवी से पता चला, जो यह दर्शाता है कि वह भी इससे हैरान थे. उन्होंने अपने दिवंगत पिता (जो युद्ध की शुरुआत में अमेरिकी-इजरायली हमलों में मारे गए थे) का ज़िक्र करते हुए कहा कि मृत्यु के बाद उनकी मुट्ठी बंधी हुई थी, जो प्रतिरोध का अंतिम संकेत था.
सीएनएन के अनुसार, मोजतबा खामेनेई का यह बयान उसी पुरानी कड़े तेवर वाली बयानबाजी से भरा था. उन्होंने “प्रतिरोध के मोर्चे” की सराहना की, पड़ोसी देशों से अमेरिकी ठिकानों को बंद करने का आह्वान किया और अमेरिकी हितों को निशाना बनाने की धमकी दी. वैश्विक बाज़ारों को और भी घबराहट में डालते हुए, उन्होंने एक प्रमुख तेल मार्ग, होर्मुज़ जलडमरूमध्य को वैश्विक व्यापार के लिए बंद रखने पर ज़ोर दिया. ईरान के विश्लेषक अराश अज़ीज़ी ने सीएनएन को बताया कि इस संदेश में सुधार का कोई वादा नहीं है और यह दर्शाता है कि वह अपने पिता की किसी भी मूल नीति को छोड़ने का इरादा नहीं रखते हैं. अज़ीज़ी ने इसे “धमकियों और खोखली बहादुरी से भरा” बताया, जो ईरानियों को बेहतर भविष्य की कोई उम्मीद नहीं देता.
हालांकि, सबसे बड़ा सवाल अभी भी अनसुलझा है: ईरानी जनता और दुनिया ने अभी तक नए नेता को न तो देखा है और न ही सुना है. ऐसी खबरें थीं कि युद्ध के शुरुआती दिनों में वे घायल हो गए थे. जिनेवा स्थित ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स में मध्य पूर्व की प्रमुख दीना इस्फंदियारी ने सीएनएन को बताया कि यह बयान महज़ अवज्ञा दिखाने का एक तरीका है. उन्होंने कहा कि ईरान यह दिखाना चाहता है कि वह युद्धविराम नहीं चाहता और उसे लगता है कि उसने अभी तक अमेरिका और उसके सहयोगियों को पर्याप्त कीमत नहीं चुकाई है. इससे यह प्रतीत होता है कि यह संघर्ष अभी लंबा चलेगा.
7 कारण कि ट्रंप ने अब तक युद्ध नहीं जीता है
सीएनएन के लिए स्टीफन कोलिन्सन के विश्लेषण के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान में एक बेहद जटिल चौराहे की तरफ बढ़ रहे हैं. वह ईमानदारी से अपनी जीत की घोषणा नहीं कर सकते, एक फैलते हुए युद्ध पर से उनका नियंत्रण खिसकता हुआ दिख रहा है, और इस युद्ध से बाहर निकलने के रणनीतिक और आर्थिक परिणाम इसमें टिके रहने से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकते हैं. हालांकि ट्रंप अभी तक लिंडन जॉनसन और जॉर्ज डब्ल्यू बुश जैसे राष्ट्रपतियों की तरह उस विकट स्थिति का सामना नहीं कर रहे हैं जिन्होंने हारे हुए युद्धों को लंबा खींचा, लेकिन खतरे के संकेत हर जगह मौजूद हैं. इस युद्ध में जो चीज़ ट्रंप के नियंत्रण खोने को सबसे ज़्यादा दर्शाती है, वह है ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य का बंद किया जाना. जलडमरूमध्य का बंद होना ट्रंप के सामने एक ऐसी सैन्य पहेली पेश करता है जिसे सुलझाना अमेरिकी नौसेना के लिए बेहद खतरनाक होगा. अमेरिकी नौसेना के सेवानिवृत्त कैप्टन लॉरेंस ब्रेनन ने सीएनएन को बताया कि यदि आप होर्मुज़ जलडमरूमध्य का उपयोग नहीं कर सकते तो आप जीत हासिल नहीं कर सकते, और वर्तमान परिस्थितियों में इसे खोलना असंभव नहीं तो बेहद मुश्किल ज़रूर है.
युद्ध का यह व्यापक प्रभाव केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है. इराक के ऊपर एक अमेरिकी टैंकर विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने और अमेरिका के भीतर वर्जीनिया और मिशिगन में हुई हिंसक घटनाओं ने घरेलू स्तर पर इस युद्ध के खौफनाक परिणामों की आशंका बढ़ा दी है. “ऑपरेशन एपिक फ्युरी” को पूरी तरह से विफल कहना जल्दबाजी होगी. अमेरिका-इजरायल के हवाई हमलों ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को भारी नुकसान पहुंचाया है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि युद्ध जीत लिया गया है.
इसका दूसरा कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य का संकट है, जिसका कोई त्वरित सैन्य समाधान नहीं है.
तीसरा कारण सर्वोच्च नेता की हत्या से जुड़ा है. अली खामेनेई की हत्या के बाद उनके कट्टरपंथी बेटे मोजतबा का सत्ता में आना ट्रंप की जीत की कहानी को धुंधला करता है. डेमोक्रेटिक प्रतिनिधि जेक औचिनक्लोस का कहना है कि नया नेता अपने पिता से भी कहीं अधिक चरमपंथी है.
चौथा कारण यह है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इजरायल युद्ध रोकेगा. इजरायल मध्य पूर्व में क्षेत्रीय सुरक्षा को एक निरंतर मिशन के रूप में देखता है और इसके रणनीतिक लक्ष्य अमेरिका से अलग हो सकते हैं.
पांचवां, युद्ध के लक्ष्यों को लेकर प्रशासन का नैरेटिव स्पष्ट नहीं है.
छठा कारण परमाणु खतरा है; ईरान के पास अभी भी अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का भंडार हो सकता है, और जब तक उसे खत्म नहीं किया जाता, अमेरिका कभी सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता.
सातवां और अंतिम कारण अमेरिका की घरेलू राजनीति है. युद्ध के कारण बढ़ रही तेल की कीमतें और सैनिकों की मौत अमेरिकी जनता के लिए चिंता का विषय है, जो लंबे समय में ट्रंप की राजनीतिक ज़मीन को कमज़ोर कर सकती है. युद्ध शुरू करना आसान है, लेकिन एक कमज़ोर दुश्मन के ख़िलाफ़ भी युद्ध को एक निर्णायक अंत तक ले जाना ट्रंप के लिए भारी चुनौती बन गया है.
टॉकिंग न्यूज़
व्हाइट हाउस में कलह, क्या अमेरिका उस देश से हार सकता है जिसके पास खोने को कुछ नहीं?
आज के हरकारा के लाइव शो टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश में हमने ईरान-अमेरिका-इज़राइल के बीच चल रही जंग के 14वें दिन की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की. इस बात पर सवाल उठाया गया कि लगभग दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी यह साफ नहीं है कि इस युद्ध में कौन जीत रहा है. अमेरिका और इज़राइल लगातार हमले कर रहे हैं और जीत के दावे कर रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त उससे अलग दिखाई दे रहे हैं.
चर्चा के दौरान यह भी बताया गया कि जब हमला शुरू हुआ था तब डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि यह युद्ध बहुत जल्दी खत्म हो जाएगा और ईरान में सत्ता परिवर्तन होगा. शुरुआती हमलों में ईरान के कई बड़े नेताओं को निशाना बनाया गया था, लेकिन इसके बावजूद ईरान में कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव नहीं हुआ बल्कि उससे उलट लोग और अधिक एकजुट दिखाई दे रहे हैं और सरकार के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं.
कार्यक्रम में ट्रंप के दूसरे दावे पर भी चर्चा हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि इस युद्ध का लक्ष्य ईरान की परमाणु क्षमता को खत्म करना है. लेकिन इस बात को लेकर दुनिया में पहले से ही विवाद रहा है कि ईरान के पास वास्तव में परमाणु हथियार बनाने की क्षमता है भी या नहीं.
इसी बीच युद्ध का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है. तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई हैं और तेल की आपूर्ति को लेकर पूरी दुनिया में चिंता बढ़ गई है. चर्चा में बताया गया कि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज
के समुद्री मार्ग को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया है, जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई गुजरती है.
पिछले 24 घंटों के अपडेट्स में इराक के ऊपर दो अमेरिकी फ्यूलिंग विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गए, जिसमें उनके पायलटों की मौत की खबर है. इसी बीच ईरान के नए नेता मुज्तबा खामेनेई का संदेश सामने आया, जिसमें उन्होंने अपने पिता की मौत का बदला लेने की बात कही है. चर्चा के दौरान यह भी बताया गया कि चीन ने इस घटना के बाद मृतकों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता भेजी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वैश्विक राजनीति में ईरान अकेला नहीं है.
वहीं व्हाइट हाउस के अंदर अलग-अलग समूह ट्रंप को अलग-अलग सलाह दे रहे हैं. कुछ लोग युद्ध से जल्दी बाहर निकलने की बात कर रहे हैं, जबकि कुछ नेता ईरान के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रखने की मांग कर रहे हैं. वहीं अमेरिका में कई राजनीतिक समूह यह सवाल उठा रहे हैं कि इस युद्ध में अमेरिका का वास्तविक हित क्या है. यह युद्ध सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और आम लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है.
ट्रंप प्रशासन ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान युद्ध के प्रभाव को कम आंका
सीएनएन की रिपोर्ट नताशा बर्ट्रेंड और जेनिफर हैन्सलर के योगदान के साथ के मुताबिक, अमेरिकी सैन्य अभियान की योजना बनाते समय पेंटागन और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करने की ईरान की क्षमता और इच्छाशक्ति को बहुत कम आंका था. सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा टीम उन संभावित और सबसे बुरे परिणामों का पूरी तरह से अनुमान लगाने में विफल रही जिसका प्रशासन अब सामना कर रहा है.
हालांकि इस अभियान की योजना बैठकों में ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट और ऊर्जा सचिव क्रिस राइट शामिल थे, लेकिन ट्रंप की अपने करीबी सलाहकारों के एक छोटे घेरे पर निर्भर रहने की आदत ने उन अंतर-विभागीय बहसों को दरकिनार कर दिया जो इस तरह के युद्ध के आर्थिक परिणामों का आकलन करने के लिए ज़रूरी थीं. नतीजा यह है कि इस गंभीर आर्थिक संकट को कम करने में प्रशासन को कई सप्ताह लग सकते हैं. इसमें तेल टैंकरों को जलमार्ग से सुरक्षित निकालने के लिए नौसैनिक एस्कॉर्ट भी शामिल हैं, जिसे पेंटागन फिलहाल बहुत अधिक खतरनाक मान रहा है. एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी ने सीएनएन से कहा कि दशकों से अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का आधार ही होर्मुज़ में किसी भी रुकावट को रोकना रहा है, और जो हालात बने हैं वे हैरान करने वाले हैं.
नौसेना ने अब तक शिपिंग उद्योग के अधिकारियों द्वारा सैन्य एस्कॉर्ट के अनुरोधों को ठुकरा दिया है. बेसेंट ने स्काई न्यूज़ को बताया कि जैसे ही सैन्य रूप से संभव होगा, ये एस्कॉर्ट शुरू कर दिए जाएंगे. लेकिन बंद दरवाज़ों के पीछे हुई ब्रीफिंग में शीर्ष अधिकारियों ने सांसदों के सामने स्वीकार किया कि उन्होंने जलडमरूमध्य बंद होने की स्थिति के लिए योजना नहीं बनाई थी, क्योंकि उन्हें लगा था कि ऐसा करने से अमेरिका से ज़्यादा नुकसान खुद ईरान को होगा. ट्रंप प्रशासन अब इस संकट को “लंबे समय के फायदे के लिए अल्पकालिक दर्द” के रूप में पेश कर रहा है. ऊर्जा सचिव राइट का मानना है कि इसके बाद दुनिया अधिक शांतिपूर्ण होगी.
नए ईरानी सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के इस बयान के बाद कि जलडमरूमध्य दबाव बनाने के लिए बंद रहेगा, अमेरिका के पास बहुत कम विकल्प बचे हैं. ईरानी ड्रोन, मिसाइलों और माइंस के खतरे के कारण अमेरिकी नौसेना जहाजों को एस्कॉर्ट करने की स्थिति में नहीं है. इस बीच, प्रशासन घरेलू स्तर पर राहत देने के लिए कुछ अन्य विकल्पों पर विचार कर रहा है. ट्रेजरी विभाग ने समुद्र में फंसे रूसी तेल से अस्थायी रूप से प्रतिबंध हटा लिए हैं. व्हाइट हाउस जोन्स एक्ट (Jones Act) में ढील देने पर भी विचार कर रहा है, ताकि अमेरिकी बंदरगाहों के बीच माल ढुलाई की लागत कम की जा सके. साथ ही, गर्मियों के दौरान गैसोलीन उत्पादकों के लिए नियमों में ढील देने की भी योजना है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की वैश्विक कमी के सामने ये कदम सिर्फ ऊंट के मुंह में जीरा साबित होंगे.
ट्रंप ‘गलत’ हैं: यूरोपीय नेताओं ने रूस पर तेल प्रतिबंधों में ढील देने के अमेरिकी फैसले की कड़ी आलोचना की
पेरिस से क्लिया कॉल्कट्ट की रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय नेताओं ने ईरान में अमेरिका और इजरायल के हमलों के बीच बढ़ती ऊर्जा कीमतों को कम करने के प्रयास में रूसी तेल पर से प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से हटाने के लिए ट्रंप प्रशासन की कड़ी आलोचना की है. नॉर्वे के एंडेनेस में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और यूक्रेनी नेता वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने समुद्र में फंसे रूसी तेल की डिलीवरी और बिक्री की अनुमति देने के इस फैसले की निंदा की. उनका मानना है कि इस कदम से क्रेमलिन को यूक्रेन पर अपने पूर्ण पैमाने के आक्रमण के लिए फिर से खजाना भरने का मौका मिल जाएगा.
नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर के साथ बोलते हुए जर्मन चांसलर मर्ज़ ने कहा कि अमेरिका का यह कदम गलत है. उन्होंने कहा, “वर्तमान में कीमत की समस्या है, आपूर्ति की समस्या नहीं है. मैं जानना चाहूंगा कि अमेरिकी सरकार ने किन कारणों से यह फैसला लिया.” मर्ज़ ने कहा कि यह फैसला उनके लिए हैरानी भरा था, क्योंकि G7 सदस्यों ने बुधवार को एक वीडियो कॉल के दौरान ट्रंप से आग्रह किया था कि वे मॉस्को पर से दबाव कम न करें. मर्ज़ ने कड़े शब्दों में कहा, “हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि रूस यूक्रेन को कमज़ोर करने के लिए ईरान के युद्ध का फायदा न उठाए.” उन्होंने यह भी आशंका जताई कि अमेरिका और इजरायल के पास इस संघर्ष को समाप्त करने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है.
ईरान पर अमेरिका-इजरायली हमलों और खाड़ी में अमेरिकी सहयोगियों पर तेहरान की जवाबी कार्रवाई के कारण दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में यातायात ठप हो गया है, जिससे ऊर्जा की कीमतें बढ़ गई हैं. मर्ज़ ने बताया कि जर्मनी सहित अन्य देशों ने ऊर्जा की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए अपने अंतरराष्ट्रीय तेल भंडार जारी किए हैं.
रूसी तेल पर प्रतिबंधों में ढील देने के अमेरिकी कदम ने यूक्रेनी नेतृत्व को भारी निराशा में डाल दिया है. पेरिस में बोलते हुए राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कहा कि अमेरिकी फैसला “तर्कसंगत नहीं” है. उन्होंने कहा, “प्रतिबंधों को हटाने का मतलब है कि रूस को अधिक धन मिलेगा और मध्य पूर्व में अधिक ड्रोन हमले होंगे. रूस को अपनी युद्ध मशीन के लिए पैसा मिलेगा और ऐसे बहुत से ड्रोन हैं जो मध्य पूर्व को अस्थिर करने के लिए रूसी धरती पर बनाए जाते हैं.” फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों ने भी वाशिंगटन के इस कदम पर निराशा जताते हुए कहा कि कीमतों के बढ़ने का मतलब यह कतई नहीं है कि हमें रूस के खिलाफ अपनी प्रतिबंध नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए. यह G7 और यूरोप का स्पष्ट रुख है.
क्या ईरान युद्ध नेतन्याहू के पतन का कारण बनेगा?
द अटलांटिक में यायर रोसेनबर्ग के लेख के अनुसार, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पिछले दो दशकों में खुद को राजनीतिक संकटों से बचाने की कला में महारत हासिल की है. जब भी लगता है कि वे भ्रष्टाचार के आरोपों या टूटते गठबंधन के बोझ तले दब जाएंगे, वे सत्ता में अपनी पकड़ और मज़बूत कर लेते हैं. आज जब इजरायल ईरान और उसके प्रॉक्सी गुटों के साथ एक बहु-मोर्चों वाले युद्ध में उलझा है, नेतन्याहू एक बार फिर राष्ट्रीय संकट को अपनी निजी राजनीतिक संजीवनी में बदलने की कोशिश कर रहे हैं.
सबसे पहले नेतन्याहू अपने भ्रष्टाचार के मुकदमे को रद्द करवाने की कोशिश कर रहे हैं. वे 2020 से रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के मामलों का सामना कर रहे हैं. इस युद्ध के बहाने, उन्हें डोनाल्ड ट्रंप का भी साथ मिल गया है. ट्रंप ने एक्सियोस को दिए एक इंटरव्यू में इजरायल के राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग को “कलंक” बताया कि उन्होंने अब तक नेतन्याहू को माफ़ी नहीं दी है. ट्रंप ने कहा कि वे चाहते हैं कि नेतन्याहू का पूरा ध्यान युद्ध पर रहे, न कि किसी अदालती मामले पर. इसके अलावा, नेतन्याहू युद्ध का इस्तेमाल अपने गठबंधन को बचाने के लिए भी कर रहे हैं. इजरायल में हरेदी या अति-कट्टरपंथी यहूदी छात्रों को सैन्य सेवा से छूट मिली हुई है, जिसे खत्म करने की मांग तेज़ हो गई है. हरेदी पार्टियों ने धमकी दी थी कि अगर उन्हें छूट नहीं मिली तो वे बजट पास नहीं होने देंगे, जिससे सरकार गिर सकती थी. लेकिन युद्ध के कारण उन्होंने फिलहाल अपना कड़ा रुख नरम कर लिया है.
कुछ पत्रकारों का मानना है कि अगर ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान सफल रहता है, तो नेतन्याहू जल्दी चुनाव की घोषणा कर सकते हैं. उन्हें उम्मीद है कि युद्ध की जीत उनकी पुरानी नाकामियों—जैसे 7 अक्टूबर के हमले को रोकने में विफलता—पर पर्दा डाल देगी. लेकिन नेतन्याहू का यह दांव इस बार उल्टा भी पड़ सकता है. इजरायल के राष्ट्रपति हर्ज़ोग ने ट्रंप के दबाव के बावजूद माफ़ी देने से इनकार कर दिया है और न्याय मंत्रालय ने भी कहा है कि माफ़ी के मापदंड पूरे नहीं होते. इसके अलावा, सैन्य सेवा में हरेदी छात्रों की छूट का मुद्दा भी जनता के बीच भारी आक्रोश पैदा कर रहा है. जब आम इजरायलियों के बच्चे दो मोर्चों (ईरान और लेबनान) पर लड़ रहे हैं, तब 90 हरेदी छात्रों का पोलैंड यात्रा पर जाना जनता को नागवार गुज़रा है.
इजरायली मतदाता सब समझते हैं. पोल लगातार दिखा रहे हैं कि लोग नेतन्याहू और उनकी कट्टरपंथी सरकार पर भरोसा नहीं करते. हिज़्बुल्लाह नेता नसरल्लाह की हत्या या परमाणु ठिकानों पर बमबारी जैसी सामरिक जीतों ने भी उनके घटते समर्थन को नहीं सुधारा है. वर्तमान युद्ध की कोई स्पष्ट अंतिम रेखा नहीं दिख रही है. अगर ईरान सत्ता में बना रहता है और वैश्विक तेल आपूर्ति को बंधक बनाए रखता है, तो इजरायल के लिए हालात और मुश्किल होंगे. यदि नेतन्याहू उसी तरह के अंतहीन युद्ध में फंस जाते हैं जिसके बारे में उन्होंने खुद आगाह किया था, तो यह उनके राजनीतिक करियर का अंत भी साबित हो सकता है.
ईरान युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता धुंधला, ट्रंप के सहयोगी नतीजे को प्रभावित करने की होड़ में
रॉयटर्स के लिए हुमैरा पामुक की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस के अंदर चल रही एक जटिल रस्साकशी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उन बदलते बयानों के पीछे का मुख्य कारण है जो वे ईरान युद्ध को लेकर दे रहे हैं. जैसे-जैसे यह संघर्ष पूरे मध्य पूर्व में फैल रहा है, ट्रंप के सलाहकार इस बात पर बहस कर रहे हैं कि जीत की घोषणा कब और कैसे की जाए. इस आंतरिक मंथन से जुड़े सूत्रों ने बताया कि कुछ अधिकारी ट्रंप को चेतावनी दे रहे हैं कि तेल की बढ़ती कीमतें राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकती हैं, जबकि कुछ कट्टरपंथी सलाहकार इस्लामिक गणराज्य के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान जारी रखने का दबाव बना रहे हैं.
यह आंतरिक खींचतान दिखाती है कि 2003 के इराक युद्ध के बाद के सबसे बड़े अमेरिकी सैन्य अभियान में ट्रंप कितने ऊंचे दांव खेल रहे हैं. उन्होंने हाल के दिनों में अपने संदेशों को बदला है और कहा है कि युद्ध एक सीमित अभियान है जिसके उद्देश्य लगभग पूरे हो चुके हैं. बुधवार को केंटकी में एक रैली में उन्होंने पहले कहा “हम जीत गए,” और फिर अचानक पलटते हुए कहा, “हमें काम पूरा करना होगा.” ऊर्जा और आर्थिक सलाहकारों ने ट्रंप को स्पष्ट चेतावनी दी है कि गैस की बढ़ती कीमतें युद्ध के लिए घरेलू समर्थन को तेज़ी से खत्म कर सकती हैं. राजनीतिक सलाहकार सूसी वाइल्स और जेम्स ब्लेयर भी इसी तरह का तर्क दे रहे हैं और युद्ध को जल्द समाप्त घोषित करने की वकालत कर रहे हैं.
दूसरी तरफ, सीनेटर लिंडसे ग्राहम और टॉम कॉटन जैसे रिपब्लिकन नेता ट्रंप पर सैन्य दबाव बनाए रखने का ज़ोर डाल रहे हैं ताकि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोका जा सके. इन सबके बीच ट्रंप के “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” समर्थक बेस और स्टीव बैनन जैसे रणनीतिकार चाहते हैं कि अमेरिका मध्य पूर्व के एक और लंबे युद्ध में न फंसे. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने इन दावों को गपशप करार देते हुए कहा कि राष्ट्रपति ही अंतिम निर्णय लेते हैं.
इस युद्ध में अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों ने ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता और नौसेना को भारी नुकसान पहुंचाया है, लेकिन ईरान की होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करने की रणनीति ने दुनिया भर में तेल व्यापार को रोक दिया है. प्रशासन की सबसे बड़ी गलतफहमी यह थी कि वे वेनेज़ुएला में निकोलस मादुरो के ख़िलाफ़ मिली त्वरित सफलता जैसी ही उम्मीद ईरान से कर बैठे थे. ईरान एक बहुत ही मज़बूत और सैन्य रूप से संपन्न प्रतिद्वंद्वी साबित हुआ है. अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, अमेरिकी सैनिक हताहत होते हैं और आर्थिक लागत बढ़ती है, तो आने वाले मध्यावधि चुनावों में ट्रंप को अपनी ही राजनीतिक ज़मीन खिसकती हुई नज़र आ सकती है.
टॉरपीडो हमले से पहले अपने जहाजों को बचाने की ईरान की हताश कोशिश
न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए अनुप्रीता दास और पामोडी वराविटा की रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीलंका के तट से कुछ दूरी पर एक अमेरिकी टॉरपीडो द्वारा एक ईरानी युद्धपोत को डुबाए जाने के कुछ घंटों बाद ही, गाले का सबसे बड़ा अस्पताल घायलों से भरने लगा. एंबुलेंस लगातार बंदरगाह और अस्पताल के बीच दौड़ रही थीं, जबकि मृतकों को ट्रकों में लाया जा रहा था. दिन के अंत तक मुर्दाघर में जगह खत्म हो गई. अस्पताल के कर्मचारियों को रेफ्रिजरेटेड वाहनों के आने तक शवों को लकड़ी के बुरादे और सूखी बर्फ के मिश्रण में रखना पड़ा, जो मछुआरे अपनी मछलियों को ताज़ा रखने के लिए इस्तेमाल करते हैं.
श्रीलंका, जो फारस की खाड़ी से 2,000 मील से अधिक दूर है, खुद को इस युद्ध और ईरान के साथ एक अप्रत्याशित राजनयिक विवाद में फंसा हुआ पा रहा है. ईरानी राजनयिक इस बात से खफा थे कि श्रीलंका ने उनके एक बेशकीमती युद्धपोत ‘देना’ (Dena) को अपने क्षेत्रीय जल में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी, जबकि उसने पहले ईरानी नौसेना को आमंत्रित किया था. दरअसल, 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया, तो श्रीलंका ने यह सोचकर ईरानी जहाजों को आश्रय देने में देरी की कि इससे युद्ध में उसकी तटस्थता प्रभावित होगी और उसकी सुरक्षा को खतरा होगा. इसी देरी के दौरान 4 मार्च को ‘देना’ पर हमला हो गया और 80 से अधिक लोग मारे गए.
श्रीलंका ने डूबते जहाजों से नाविकों को बचाया, लेकिन इसके बाद भी एक अन्य ईरानी जहाज ‘बुशहर’ को आश्रय देने का फैसला करने में एक और दिन लगा दिया. तब तक तीसरा जहाज ‘लावन’ पड़ोसी देश भारत के कोच्चि बंदरगाह पर पहुंच चुका था. ईरान ने ‘देना’ पर हुए हमले को “अत्याचार” करार दिया, जबकि अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इस टॉरपीडो हमले का जश्न मनाया. श्रीलंका, जो पहले ही गंभीर आर्थिक संकट और कर्ज से जूझ रहा है, के लिए यह एक मुश्किल कूटनीतिक परीक्षा बन गई है. श्रीलंका के रक्षा मंत्रालय ने 200 से अधिक बचाए गए ईरानी नाविकों के भविष्य को लेकर तेहरान को एक संदेश भेजा है और वे जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं.
दूसरी ओर, भारत भी इस युद्ध में खुद को अमेरिका और ईरान के बीच फंसा हुआ पा रहा है. भारत ने ‘लावन’ को कोच्चि में सुरक्षित आश्रय दिया है और उसके 183 चालक दल के सदस्यों को नौसैनिक सुविधाओं में रखा है. घटना की शुरुआत भारत के विशाखापट्टनम में आयोजित एक नौसैनिक अभ्यास के बाद हुई, जहां ईरानी जहाज हिस्सा लेने आए थे. जब जहाज लौट रहे थे, तभी युद्ध छिड़ गया. भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत ने मानवीय आधार पर जहाजों को सुरक्षित पनाह दी है, क्योंकि वे “घटनाओं के गलत पक्ष में फंस गए थे.” लेकिन अमेरिकी चेतावनी के बिना ‘देना’ पर हुए इस हमले ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र की सुरक्षा और कूटनीतिक तटस्थता पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
ट्रंप चाहकर भी ईरान के साथ शुरू किया गया युद्ध शायद ख़त्म न कर पाएं
सीएनएन के लिए निक पैटन वॉल्श के विश्लेषण के मुताबिक, एक ऐसा युद्ध जो “जीत” लिया गया है लेकिन अभी “ख़त्म नहीं” हुआ है—राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ये बयानबाज़ी उनकी अपनी शैली के अनुरूप तो है, लेकिन जब यह ज़मीनी हकीकत से टकराती है तो औंधे मुंह गिर पड़ती है. ट्रंप ने बुधवार को केंटकी में कहा कि “हम जीत गए,” लेकिन खेल की तरह युद्ध में कोई स्कोरबोर्ड नहीं होता जो तुरंत विजेता तय कर दे. अमेरिकी सरकार की यह गलतफहमी कि एक त्वरित, सर्जिकल सैन्य अभियान से जल्द और स्थायी राजनीतिक परिणाम मिलेंगे, आधुनिक युद्ध के सबसे पुराने जाल में से एक है.
सोवियत संघ ने अफ़गानिस्तान में, अमेरिका ने इराक में और पुतिन ने यूक्रेन में यही गलती की थी. व्हाइट हाउस ने इजरायली खुफिया जानकारी का फायदा उठाते हुए ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने के लिए युद्ध में जल्दबाजी की. लेकिन 28 फरवरी को सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत ने जितनी समस्याएं सुलझाई हैं, उससे कहीं ज़्यादा पैदा कर दी हैं. ईरान के कट्टरपंथियों ने अली खामेनेई के बेटे मोजतबा को सत्ता सौंप दी है, जिसे ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर अयोग्य बताया था. इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) अपने कमांडरों की हत्या का बदला लेने के लिए खून की प्यासी है. यह गुस्सा ट्रंप के युद्ध को जल्दी खत्म करने के मंसूबों पर पानी फेर रहा है.
ईरान ने मात्र 13 दिनों में इस युद्ध को एक सहनशक्ति की परीक्षा में बदल दिया है. अमेरिका महीनों तक बमबारी कर सकता है, लेकिन इससे उसका अपना गोला-बारूद खत्म होगा और आगामी चुनावों से पहले राजनीतिक नुकसान का जोखिम भी बढ़ेगा. भले ही ईरान अपने ड्रोन और मिसाइल खो दे, लेकिन आईआरजीसी की प्रेरणा खत्म नहीं होगी. यह ठीक वैसा ही है जैसा अमेरिका ने इराक और अफ़गानिस्तान में अनुभव किया था. सटीक हमलों से ईरान की जनता बगावत कर देगी, यह विचार अब एक भ्रम साबित हो चुका है. युद्ध ने ईरान के अंदरूनी मतभेदों को भुलाकर लोगों को एकजुट कर दिया है.
ईरान के लिए जीत का रास्ता अब साफ है—उसे बस टिके रहना है. वे होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों को नष्ट कर सकते हैं, जिससे तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर बनी रहेंगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था अमेरिका पर सवाल उठाएगी. ट्रंप अब युद्ध को ख़त्म करने की जल्दबाज़ी में दिख रहे हैं, जो दुश्मन को यह संदेश देता है कि अमेरिका थक रहा है. भले ही मौन कूटनीति से आने वाले हफ्तों में हिंसा कम हो जाए, लेकिन इस युद्ध के बाद ईरान और अधिक कट्टरपंथी और हिंसक होकर उभरेगा. यह ईरान की एक बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत होगी कि पूरी अमेरिकी सैन्य ताकत उनका सफाया नहीं कर सकी. युद्ध शुरू करना सबसे गंभीर निर्णय होता है, और ट्रंप ने 12 दिनों में ही जीत का ऐलान कर दिया जिसे उनके दुश्मन ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है. अब उनके पास थकने का इंतज़ार करने के अलावा कोई ठोस योजना नहीं दिखती.
मणिपुर: उखरूल में लापता दो कुकी युवकों के शव मिले
मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार मणिपुर के उखरूल जिले में बुधवार को तंगखुल नागा और कुकी समुदाय के बीच हिंसा के बाद दो कुकी युवकों की मौत हो गई. ये दोनों युवक बुधवार सुबह से लापता थे और गुरुवार सुबह उनके शव मैपिथेल पहाड़ी इलाके के पास जंगल में मिले. मृतकों की पहचान थवई कुकी गांव के थेंगिन बैते और शंगकई गांव के थांगबोइमंग खोंगसाई के रूप में हुई है.
रिपोर्ट के अनुसार बुधवार सुबह करीब 6:30 से 9 बजे के बीच मैपिथेल पहाड़ी इलाके में दोनों समुदायों के हथियारबंद समूहों के बीच गोलीबारी हुई. गृह मंत्री गोविंददास कोथौजम ने विधानसभा में बताया कि यह टकराव कथित तौर पर दो कुकी ग्रामीणों के अपहरण के बाद शुरू हुआ. एक सुरक्षा अधिकारी के मुताबिक तंगखुल समुदाय के कुछ स्वयंसेवक अफीम की खेती रोकने के लिए कुकी इलाके में गए थे, जहां से उन्होंने दो ग्रामीणों को पकड़ लिया. इसके बाद दोनों पक्षों में गोलीबारी शुरू हो गई. इस दौरान लालमिनथांग हाओकिप नामक व्यक्ति के पैर में गोली लगी, जिसे कांगपोकपी के स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया.
इस घटना के बाद तनाव और बढ़ गया. कुकी समूहों ने इंफाल-उखरूल सड़क पर वाहनों की आवाजाही रोक दी. इसी दौरान विरोध के बीच तीन गाड़ियों में यात्रा कर रहे 21 लोगों को बंधक बना लिया गया. इनमें 18 तंगखुल नागा और तीन अन्य समुदायों के लोग थे. सरकार और सुरक्षा बलों की कोशिशों के बाद देर रात बातचीत हुई. बातचीत में मांग रखी गई कि पकड़े गए लोगों को छोड़ा जाए और लापता लोगों की तलाश की जाए, रात करीब 3 बजे सभी 21 बंधकों को रिहा कर दिया गया.
अनुसूचित जाति, ओबीसी छात्रों की स्कॉलरशिप के हज़ारों करोड़ रुपये खर्च नहीं हुए: रिपोर्ट
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग और विमुक्त जनजाति के छात्रों के लिए तय छात्रवृत्ति राशि का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाया है.
सीपीआई (एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने राज्यसभा में कहा कि सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार इन छात्रों के लिए तय हज़ारों करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति राशि खर्च नहीं हुई. राज्यसभा में 11 मार्च को पूछे गए सवाल के जवाब में सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने छात्रवृत्ति योजनाओं और उनके बजट व खर्च की जानकारी दी.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में विभाग को 14,164.42 करोड़ रुपये मिले लेकिन केवल 8,679.02 करोड़ रुपये खर्च हुए. उसी वर्ष 9,163.98 करोड़ में से 8,008.79 करोड़ खर्च हुए. 2023-24 में 8,874.14 करोड़ में से 7,762.82 करोड़, 2022-23 में 8,165 करोड़ में से 6,372.38 करोड़, और 2021-22 में 6,220.62 करोड़ में से 4,446.24 करोड़ रुपये ही खर्च हुए.
छात्रवृत्ति पाने वाले छात्रों की संख्या भी कम हुई है. अनुसूचित जाती में 2020-21 प्री-मैट्रिक लाभार्थी 31.22 लाख से घटकर 2024-25 में 21.65 लाख हो गए, जबकि पोस्ट-मैट्रिक लाभार्थी 50.16 लाख से 48.04 लाख रह गए. वहीं ओबीसी, आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग और विमुक्त जनजाति के प्री-मैट्रिक लाभार्थी 54.95 लाख से घटकर 20.61 लाख और पोस्ट-मैट्रिक लाभार्थी 45.45 लाख से घटकर 24.53 लाख रह गए.
पीरियड लीव अनिवार्य करने से महिलाओं के रोज़गार पर पड़ सकता है असर: सुप्रीम कोर्ट
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के लिए सभी संस्थानों में पेड मासिक धर्म अवकाश (पीरियड लीव) लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इसे कानून के ज़रिए अनिवार्य बनाने से महिलाओं के रोज़गार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. अदालत ने कहा कि इससे नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से हिचक सकते हैं. अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार से कहा कि वह इस विषय पर सभी पक्षों से सलाह लेकर नीति बनाने पर विचार करे.
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अनिवार्य पीरियड लीव का प्रावधान उल्टा असर भी डाल सकता है. उन्होंने कहा कि इससे यह संदेश जा सकता है कि महिलाएं कुछ दिनों में पुरुषों के बराबर काम नहीं कर सकतीं. न्यायमूर्ति बागची ने भी कहा कि नौकरी के बाज़ार की वास्तविकता को देखना ज़रूरी है और अगर किसी कर्मचारी को अतिरिक्त छुट्टी का अधिकार दिया जाएगा तो नियोक्ता उसे नियुक्त करने से बच सकते हैं.
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने बताया कि कर्नाटक सरकार ने हाल ही में मासिक धर्म अवकाश की नीति बनाई है और ओडिशा में 1992 से ऐसी नीति मौजूद है, जबकि केरल में स्कूलों में कुछ राहत दी गई है. उन्होंने यह भी कहा कि कई निजी संस्थान स्वेच्छा से ऐसी छुट्टी दे रहे हैं. इस पर अदालत ने कहा कि अगर संस्थान स्वेच्छा से ऐसा करते हैं तो यह अच्छी बात है, लेकिन इसे कानून के ज़रिए अनिवार्य बनाना महिलाओं के करियर को नुकसान पहुंचा सकता है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की. अदालत ने याचिकाकर्ता शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी से यह भी पूछा कि इस मामले में उनकी क्या भूमिका है, क्योंकि कोई महिला खुद अदालत में नहीं आई है.
सुप्रीम कोर्ट: ओबीसी ‘क्रीमी लेयर’ तय करने में सिर्फ माता-पिता की आय आधार नहीं हो सकती
मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में “क्रीमी लेयर” तय करने के लिए केवल माता-पिता की आय को आधार नहीं बनाया जा सकता. अदालत ने स्पष्ट किया कि इसके साथ-साथ माता-पिता का पद और सामाजिक स्थिति भी देखी जानी चाहिए. यह फैसला न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और आर. महादेवन की पीठ ने दिया.
अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से दाखिल कई अपीलों को खारिज कर दिया और उन उम्मीदवारों को राहत दी जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास की थी लेकिन उन्हें क्रीमी लेयर मानकर नियुक्ति नहीं दी गई थी. अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने गलत तरीके से केवल आय के आधार पर इन उम्मीदवारों को ओबीसी गैर-क्रीमी लेयर से बाहर कर दिया.
यह मामला तब शुरू हुआ जब कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने कुछ उम्मीदवारों को क्रीमी लेयर बताते हुए आरक्षण का लाभ देने से इनकार कर दिया था. विभाग ने 14 अक्टूबर 2004 के एक स्पष्टीकरण पत्र का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि कुछ मामलों में माता-पिता की सैलरी को भी आय की सीमा तय करने में शामिल किया जा सकता है. इसी आधार पर जिन उम्मीदवारों के माता-पिता की आय तय सीमा से अधिक थी, उन्हें आरक्षण से वंचित कर दिया गया.
अपील :
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