14/01/2026: मोदी का मणिकर्णिका, अहिल्याबाई पर बुलडोज़र | व्हाट्सएप पर नियम बदलता केंचुआ | इकोनमी बढ़ रही है, टैक्स नहीं | नया विराट | मदरसा बता कर स्कूल इमारत ढहाई | नीला रंग | महाश्वेता | ईरान
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियाँ
वाराणसी विवाद: मणिकर्णिका घाट के जीर्णोद्धार के दौरान अहिल्याबाई होलकर की मूर्ति वाला ढांचा ढहाया गया. प्रशासन ने जांच के आदेश दिए.
बंगाल चुनाव धांधली: व्हाट्सएप पर गैरकानूनी आदेश भेजकर चुनाव आयोग के अधिकारियों ने मतदाता सत्यापन के नियम बदले. द रिपोर्टर्स कलेक्टिव का खुलासा.
अर्थव्यवस्था बनाम टैक्स: भारत की विकास दर 7.4 प्रतिशत है लेकिन टैक्स कलेक्शन लक्ष्य से 50 प्रतिशत कम. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में के शैप्ड रिकवरी की चेतावनी.
गिग इकोनॉमी का सच: इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्टर ने डिलीवरी बॉय बनकर देखा सच. 105 किलोमीटर स्कूटर चलाने के बाद कमाई मात्र 34 रुपये प्रति घंटा.
विराट कोहली 2.0: वनडे क्रिकेट में कोहली का नया रूप. अब एंकर नहीं बल्कि पहली गेंद से ही आक्रमण करने वाले विध्वंसक बल्लेबाज बने.
एमपी में बुलडोजर: बैतूल में एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा बनाए जा रहे स्कूल को अवैध मदरसा बताकर प्रशासन ने गिराया.
जुबीन गर्ग की मौत का कारण: सिंगापुर पुलिस ने बताया कि जुबीन गर्ग अत्यधिक नशे में थे और उन्होंने लाइफ जैकेट पहनने से मना कर दिया था.
ईरान अमेरिका तनाव: अमेरिका ने मध्य पूर्व के सैन्य ठिकानों से सैनिकों को निकालना शुरू किया. ईरान पर हवाई हमले की आशंका.
जिन अहिल्याबाई होलकर ने काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया, वाराणसी में उन्हीं की मूर्ति को ‘ढहाने’ पर विवाद
वाराणसी जिला प्रशासन ने उन आरोपों की जांच के आदेश दिए हैं, जिनमें कहा गया है कि मणिकर्णिका घाट के चल रहे जीर्णोद्धार कार्य के दौरान देवी अहिल्याबाई होलकर की मूर्ति वाले एक स्ट्रक्चर को हाल ही में ढहा दिया गया था.
“द इंडियन एक्सप्रेस” में मनीष साहू के मुताबिक, मराठा रानी अहिल्याबाई होलकर को 18वीं शताब्दी में वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का श्रेय दिया जाता है. मंगलवार को, पाल समुदाय के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेंद्र पाल पिंटू के नेतृत्व में लोगों के एक समूह ने उस स्थान पर विरोध प्रदर्शन किया जहाँ कथित तौर पर संरचना को ढहाया गया था. पिंटू, जो समाजवादी पार्टी के राज्य समिति सदस्य भी हैं, ने कहा, “हमने मांग की है कि अहिल्याबाई होलकर की मूर्ति, जिन्होंने देश के साथ-साथ वाराणसी और काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया, उसे उसी स्थान पर फिर से स्थापित किया जाए.”
पाल ने आरोप लगाया कि अहिल्याबाई होलकर की मूर्ति वाली यह संरचना लगभग 100 साल पुरानी थी और मणिकर्णिका घाट के नवीनीकरण के नाम पर रविवार को बिना किसी पूर्व सूचना या परामर्श के इसे गिरा दिया गया. उन्होंने दावा किया कि इस कार्रवाई से समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंची है. पाल ने विरोध स्थल पर पहुंचे सरकारी अधिकारियों को अपनी मांगों का एक ज्ञापन सौंपते हुए कहा, “यदि सरकार नवीनीकरण कार्य के लिए मूर्ति को हटाना चाहती थी, तो उसे क्षेत्र में किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ करने से पहले मूर्ति को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करना चाहिए था.”
अपर जिला मजिस्ट्रेट वाराणसी आलोक कुमार ने कहा कि मणिकर्णिका घाट के चल रहे जीर्णोद्धार के दौरान, एक मूर्ति वाले स्ट्रक्चर— जिसे अहिल्याबाई होलकर की मूर्ति होने का दावा किया जा रहा है — को ढहा दिया गया था. उन्होंने कहा कि घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं, और यह भी कहा कि जांच में यह भी पता लगाया जाएगा कि ढहाए गए ढांचे के भीतर किसकी मूर्ति थी.
मणिकर्णिका घाट के कायाकल्प की परियोजना, जहां प्रतिदिन लगभग 150 अंतिम संस्कार होते हैं, हाल ही में शुरू की गई थी. इसका उद्देश्य सड़कों को पुनर्जीवित करके, प्रवेश प्लाजा का निर्माण, आगंतुकों के लिए सुविधाएं स्थापित करके, मौजूदा श्मशान संरचनाओं को नया रूप देकर और शव यात्राओं के लिए उपयोग किए जाने वाले संकरे रास्तों को चौड़ा करके पवित्र स्थल को आधुनिक बनाना है. यह एक निजी कंपनी की कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है.
पश्चिम बंगाल | एसआईआर
आला चुनाव आयोग अधिकारी ने व्हाट्सएप पर नियम विरुद्ध आदेश भेजे
“द रिपोर्टर्स कलेक्टिव” के लिए नितिन सेठी और आयुषी कर की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव के पीछे चल रही प्रशासनिक धांधली का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है. भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के राज्य में सबसे वरिष्ठ अधिकारी, मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) ने आधिकारिक प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए व्हाट्सएप के ज़रिए अनौपचारिक निर्देश जारी किए. इन निर्देशों ने राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए तय किए गए नियमों को बदल दिया. ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने अपनी स्वतंत्र जांच में पुष्टि की है कि व्हाट्सएप पर भेजे गए ये आदेश आयोग द्वारा लिखित और सार्वजनिक रूप से घोषित नियमों का सीधा उल्लंघन करते थे.
इस मामले का खुलासा सबसे पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने किया था, जब उनके संसदीय दल के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इन अनियमितताओं का आरोप लगाया था. अब ‘कलेक्टिव’ ने कई राज्य अधिकारियों और चुनाव आयोग के एक अंदरूनी सूत्र के माध्यम से उन व्हाट्सएप संदेशों की सामग्री को सत्यापित कर लिया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस भी जारी किया है.
व्हाट्सएप पर बदले गए नियम और समय सीमा
जांच में पता चला कि सीईओ और जिलाधिकारियों (जो जिला निर्वाचन अधिकारी भी हैं) के एक व्हाट्सएप ग्रुप पर अनौपचारिक आदेश भेजे गए थे. सबसे विवादास्पद निर्देश मतदाता प्रगणना की समय सीमा को लेकर था. लिखित नियमों के अनुसार, स्थानीय चुनाव अधिकारियों को एक निश्चित तारीख तक का समय दिया गया था. लेकिन व्हाट्सएप पर आए निर्देशों के ज़रिए इस तारीख को घटा दिया गया और अधिकारियों को समय सीमा समाप्त होने से पहले ही मतदाताओं को ‘अनुपस्थित’ चिह्नित करने का आदेश दिया गया. साथ ही, लिखित नियमों में अनिवार्य तीन गृह दौरों को भी इसी घटी हुई समय सीमा में पूरा करने का दबाव बनाया गया.
अधिकारियों को यह भी भरोसा दिलाया गया था कि डेटाबेस में ‘रोल बैक’ का विकल्प दिया जाएगा ताकि गलती से हटाए गए मतदाताओं को वापस जोड़ा जा सके, लेकिन यह विकल्प कभी मिला ही नहीं. सरकारी नियम स्पष्ट कहते हैं कि जवाबदेही तय करने के लिए सभी आदेश लिखित रिकॉर्ड में होने चाहिए, लेकिन यहाँ चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारी एक ‘ब्लैक बॉक्स’ की तरह काम कर रहे थे.
दोषपूर्ण सॉफ़्टवेयर और मतदाताओं की परेशानी
व्हाट्सएप पर अनौपचारिक आदेशों का यह सिलसिला तब चला जब चुनाव आयोग ने एक बिना दस्तावेज़ वाला सॉफ़्टवेयर इस्तेमाल करना शुरू किया. इस सॉफ़्टवेयर ने ‘तार्किक विसंगतियों’ के नाम पर केवल दो राज्यों में 3.66 करोड़ से अधिक मतदाताओं को ‘सदिग्घ’ करार दे दिया. इसके चलते, लाखों मतदाताओं को अपनी नागरिकता और मतदान का अधिकार साबित करने के लिए दस्तावेज़ पेश करने को मजबूर होना पड़ा, जबकि लिखित नियमों में दूसरे चरण के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं थी.
बाद में, पश्चिम बंगाल के सीईओ कार्यालय ने लिखित में स्वीकार किया कि सॉफ़्टवेयर में खराबी थी क्योंकि आधार डेटा (2002 की मतदाता सूची) का डिजिटलीकरण सही से नहीं हुआ था. एक जिला अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर सवाल उठाया, “अगर इन निर्देशों के कारण किसी मतदाता का अधिकार गलत तरीके से छीन लिया जाता है, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी?”
भारत की विकास दर 7.4% है, लेकिन टैक्स संग्रह के आंकड़े इससे मेल नहीं खा रहे
“ब्लूमबर्ग” में एंडी मुखर्जी ने लिखा है कि रूसी तेल खरीदने के कारण अमेरिका द्वारा लगाए गए दंडात्मक शुल्कों का सामना करने के बावजूद, भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है; फिर भी पूंजी देश से बाहर जा रही है और मुद्रा (रुपया) कमजोर हो रही है.
मुखर्जी के अनुसार, कर संग्रह के आंकड़े चिंता का विषय हैं. चालू वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों में केंद्र सरकार की शुद्ध कर प्राप्ति, 31 मार्च तक संग्रह किए जाने वाले अनुमानित लक्ष्य के आधे हिस्से तक भी नहीं पहुंच पाई है. 1 फरवरी को नया संघीय बजट पेश होने वाला है, और सरकार को कर राजस्व के इस अंतर को पाटने की आवश्यकता हो सकती है. इसके लिए सरकार संभावित रूप से निवेशकों से सहयोग की उम्मीद कर सकती है या पूंजीगत व्यय में कटौती जैसे उपायों के माध्यम से अपने खर्चों को कम कर सकती है.
मुखर्जी का कहना है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था (7.4% की दर से) होने का दावा कर रहा है. लेकिन, सरकार के खजाने में आने वाले टैक्स के आंकड़े इस विकास दर के साथ मेल नहीं खा रहे हैं.
चालू वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों में, सरकार का शुद्ध कर संग्रह (नेट टैक्स कलेक्शन) वार्षिक लक्ष्य के 50% तक भी नहीं पहुंच पाया है. ऐतिहासिक रूप से, इस समय तक इसे लक्ष्य के काफी करीब होना चाहिए था.
अर्थव्यवस्था की रफ़्तार के बावजूद, विदेशी पूंजी देश से बाहर जा रही है और भारतीय रुपया दबाव में है. रूसी तेल खरीदने की वजह से अमेरिका द्वारा लगाए गए कुछ व्यापारिक प्रतिबंधों ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है. 1 फरवरी को पेश होने वाले आगामी बजट में सरकार के सामने बड़ी चुनौती होगी. यदि टैक्स से पर्याप्त कमाई नहीं होती है, तो सरकार को अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ सकती है या फिर बाजार से और अधिक कर्ज लेना पड़ सकता है.
एंडी के मुताबिक, मौजूदा हालात आय असमानता का संकेत देते हैं. : शायद यह “के-शैप्ड” रिकवरी है, जहां कॉर्पोरेट मुनाफा और शेयर बाजार तो बढ़ रहे हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर उपभोग और छोटे व्यवसायों से मिलने वाला टैक्स उम्मीद के मुताबिक नहीं है. तर्क है कि अगर विकास दर वास्तव में इतनी मजबूत है, तो उसका असर टैक्स की रसीदों में दिखना चाहिए. राजस्व की यह कमी भारत के राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को खतरे में डाल सकती है और सरकार के पास विकास कार्यों पर खर्च करने के लिए कम पैसा बचेगा.
पीएम केयर्स फंड को निजता का अधिकार, भले ही वह सरकारी संस्था हो: हाईकोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने मौखिक रूप से कहा है कि भले ही पीएम केयर्स फंड को सरकार द्वारा चलाया, प्रबंधित या नियंत्रित किया जाता हो, फिर भी यह सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत निजता के संरक्षण का हकदार है.
“बार एंड बेंच” के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा, “भले ही इसे (फंड को) संविधान के तहत ‘राज्य’ (स्टेट) मान लिया जाए, क्या केवल राज्य होने के कारण यह निजता का अधिकार खो देता है?”
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार से नहीं, बल्कि आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत वैधानिक निजता से संबंधित है, जो तीसरे पक्ष की व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे पर रोक लगाती है.
पीठ ने टिप्पणी की कि किसी संस्था के सार्वजनिक कार्य करने या सरकार द्वारा नियंत्रित होने से उसका कानूनी व्यक्तित्व खत्म नहीं होता. आरटीआई अधिनियम के तहत किसी सार्वजनिक ट्रस्ट और निजी ट्रस्ट के निजता अधिकारों में कोई अंतर नहीं किया जा सकता.
यह टिप्पणी आरटीआई कार्यकर्ता गिरीश मित्तल द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई के दौरान आई. उन्होंने पीएम केयर्स फंड द्वारा आयकर छूट प्राप्त करने के लिए जमा किए गए दस्तावेजों के खुलासे की मांग की थी. इससे पहले एकल न्यायाधीश ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसमें जानकारी देने का निर्देश दिया गया था.
न्यायालय ने कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 11 के तहत किसी भी गोपनीय जानकारी का खुलासा करने से पहले तीसरे पक्ष (इस मामले में पीएम केयर्स फंड) को नोटिस देना और उनकी बात सुनना अनिवार्य है.
गिग इकोनॉमी का कड़वा सच: 105 किमी का सफर, 23 डिलीवरी, कमाई 34 रुपये प्रति घंटा
द इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर सौम्येंद्र बारीक की ग्राउंड रिपोर्ट दिखाती है कि भारत की ‘सुविधा अर्थव्यवस्था’ यानी 10 मिनट में डिलीवरी की चकाचौंध के पीछे डिलीवरी वर्कर्स के पसीने और शोषण की एक स्याह कहानी छिपी है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के रिपोर्टर सौम्येंद्र बारीक ने इस सच्चाई को जानने के लिए तीन दिनों तक ज़ोमैटो, ब्लिंकिट और स्विगी के लिए डिलीवरी वर्कर के रूप में काम किया. दिल्ली की सड़कों पर 105 किलोमीटर स्कूटर चलाने और कुल 15 घंटे से अधिक की कड़ी मशक्कत के बाद, उनकी कुल कमाई मात्र 782 रुपये हुई. इसमें से 250 रुपये का पेट्रोल खर्च हटाने के बाद, उनके हाथ में सिर्फ 532 रुपये बचे. इसका औसत निकालें तो यह लगभग 34 रुपये प्रति घंटा होता है—जो किसी भी औपचारिक क्षेत्र के न्यूनतम वेतन से कोसों दूर है.
एल्गोरिदम का मायाजाल और जुर्माने का डर
बारीक ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इन कंपनियों का सिस्टम (एल्गोरिदम) इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि वर्कर लगातार काम करने पर मजबूर हो जाए. स्विगी पर काम करते समय, जब उन्होंने पहला ऑर्डर रिजेक्ट किया तो केवल चेतावनी मिली, लेकिन उसके बाद के तीन ऑर्डर रिजेक्ट करने पर उन पर 30-30 रुपये का जुर्माना लगाया गया. चौथा ऑर्डर मना करने पर उनका अकाउंट अगले दिन तक के लिए ब्लॉक कर दिया गया. ज़ोमैटो और ब्लिंकिट में भी लॉग-आउट करने या समय पर स्लॉट में न पहुंचने पर पेनाल्टी का डर बना रहता है. कंपनियां ‘लचीलेपन’ का दावा करती हैं, लेकिन सम्मानजनक कमाई के लिए एक वर्कर को दिन में 12-14 घंटे काम करना और ‘पीक आवर्स’ में मौजूद रहना अनिवार्य हो जाता है.
‘गारबेज लिफ्ट’ और अदृश्य श्रमिक
काम के दौरान रिपोर्टर को सामाजिक भेदभाव का भी सामना करना पड़ा. वसंत कुंज के एम्बिएंस मॉल में एक ऑर्डर पिक करने के लिए उन्हें मुख्य द्वार से प्रवेश नहीं करने दिया गया. उन्हें पीछे के रास्ते से ‘गारबेज लिफ्ट’ (कचरा ले जाने वाली लिफ्ट) का इस्तेमाल करने को कहा गया, जो विशेष रूप से डिलीवरी वर्कर्स और सफाई कर्मचारियों के लिए थी. यह वाकया बताता है कि जिन ग्राहकों की सुविधा के लिए ये वर्कर्स दौड़ते हैं, उनकी नज़रों में इनका कोई सम्मान नहीं है.
बिना वेतन की मेहनत
रिपोर्ट में यह भी उजागर हुआ कि डिलीवरी सिर्फ पैकेट पहुँचाना नहीं है. ब्लिंकिट के लिए काम करते समय, रिपोर्टर को 10-15 किलो वजन वाले ऑर्डर लेकर ऐसी इमारतों की तीसरी-चौथी मंज़िल तक सीढ़ियां चढ़नी पड़ीं जहाँ लिफ्ट नहीं थी. इस भारी शारीरिक श्रम के बदले उन्हें वजन के प्रोत्साहन के नाम पर मात्र 1 रुपये 24 पैसे मिले. ऐप से आने वाली तीखी आवाज़ें और अलार्म किसी अदृश्य बॉस की तरह व्यवहार करते हैं, जो गलती पर डांटते हैं और निर्देश देते हैं. इस पूरी व्यवस्था में वर्कर के लिए न तो कोई सामाजिक सुरक्षा है, न टिप की गारंटी और न ही मानवीय गरिमा.
भारत-पाक द्वारा न्यूज़ वेबसाइट्स को ब्लॉक करना लोकतंत्र की भावना के खिलाफ: एडिटर्स गिल्ड
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (ईजीआई) ने भारत और पाकिस्तान की सरकारों द्वारा एक-दूसरे की न्यूज़ वेबसाइट्स को ब्लॉक करने की प्रथा पर गहरी चिंता व्यक्त की है. बुधवार (14 जनवरी) को जारी एक कड़े बयान में, गिल्ड ने कहा कि दक्षिण एशिया में पड़ोसी देशों के बीच विश्वास और समझ बनाने के लिए समाचारों तक निर्बाध पहुंच अनिवार्य है. गिल्ड का मानना है कि सूचनाओं को रोकना अविश्वास का माहौल पैदा करता है.
गिल्ड ने स्वीकार किया कि दोनों देशों का मीडिया कई बार अतिशयोक्ति, गलत सूचनाएं और उन्माद फैलाता है, जिस पर कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन, इसके समाधान के रूप में “पूर्ण प्रतिबंध” लगाना लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भावना के विरुद्ध है. इंटरनेट पर रोक लगाने से ज़मीनी हकीकत नहीं बदलती, बल्कि यह केवल डर और संदेह को बढ़ाती है.
रिपोर्ट में पिछले साल की घटनाओं का हवाला दिया गया है. मई में, भारतीय न्यूज़ पोर्टल ‘द वायर’ को एक सीएनएन रिपोर्ट (राफेल जेट्स के बारे में) प्रकाशित करने के बाद कुछ घंटों के लिए ब्लॉक कर दिया गया था. इसके अलावा, भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान की कई प्रमुख न्यूज़ वेबसाइट्स जैसे डॉन, जियो न्यूज़, एआरवाई न्यूज़ और बोल न्यूज़ आदि को “भारत विरोधी प्रचार” का हवाला देकर ब्लॉक कर दिया था. इनमें से कई वेबसाइट्स आज भी भारत में प्रतिबंधित हैं. गिल्ड ने दोनों सरकारों से आग्रह किया है कि वे इन प्रतिबंधों को हटाएं और क्रॉस-बॉर्डर पत्रकारिता की बहाली करें.
कोहली 2.0: ‘चेज़ मास्टर’ से ‘आक्रामक विध्वंसक’ तक का सफर
विराट कोहली, जो पिछले डेढ़ दशक से भारतीय क्रिकेट की रीढ़ रहे हैं, अब अपने करियर के अंतिम पड़ाव में एक बिल्कुल नए और खतरनाक अवतार में नज़र आ रहे हैं. जनवरी 2026 तक टेस्ट और टी20 से संन्यास लेने के बाद, अब वे केवल वनडे क्रिकेट के खिलाड़ी रह गए हैं. लेकिन 38 साल की उम्र में धीमे पड़ने के बजाय, कोहली ने अपनी बल्लेबाजी की शैली को पूरी तरह से बदल लिया है. अब वे पुराने ‘कोहली’ नहीं रहे जो पारी को धीरे-धीरे संवारते थे और अंत तक टिकने की कोशिश करते थे; अब वे पहली गेंद से ही जोखिम उठाने और गेंदबाजों पर हावी होने वाले बल्लेबाज बन गए हैं.
जोखिम और आक्रामकता का नया गणित
हिंदू में आर कौशिक लिखते हैं कि पिछले कुछ महीनों में, विशेषकर दुबई में हुई चैंपियंस ट्रॉफी और उसके बाद के मैचों में, कोहली ने दिखाया है कि वे अब अपना विकेट बचाने की चिंता नहीं करते. उनका नया मंत्र है—शुरुआत से ही हमला बोलना. पाकिस्तान के खिलाफ शतक हो या ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सेमीफाइनल में 98 गेंदों पर 84 रन, उन्होंने एडम ज़म्पा जैसे गेंदबाजों के खिलाफ आक्रामक शॉट खेलने में संकोच नहीं किया, भले ही इसमें आउट होने का जोखिम हो. रांची में खेली गई उनकी 135 रनों की पारी, जिसमें 7 छक्के शामिल थे, इस बदलाव का सबसे बड़ा सबूत है. आंकड़ों पर गौर करें तो उनकी पिछली पारियों में छक्के मारने की औसत दर उनके करियर के औसत से कहीं अधिक हो गई है.
टीम पर भरोसा
कोहली का यह ‘फ्री-फ्लोइंग’ (मुक्त प्रवाह) अंदाज़ इस बात का भी संकेत है कि उन्हें अपनी टीम की गहराई पर पूरा भरोसा है. वे जानते हैं कि उनके बाद श्रेयस अय्यर, के.एल. राहुल और हार्दिक पांड्या जैसे बल्लेबाज हैं जो पारी को संभाल सकते हैं. इसलिए, अब वे ‘एंकर’ की भूमिका निभाने के बजाय ‘इम्पैक्ट प्लेयर’ बन गए हैं जो विपक्षी टीम को संभलने का मौका ही नहीं देते. कोहली का यह 2.0 वर्जन न केवल रोमांचक है, बल्कि यह भी सिखाता है कि महान खिलाड़ी कभी भी सुधार और बदलाव की प्रक्रिया को नहीं रोकते.
चूंकि एक मुसलमान बनवा रहा था स्कूल, प्रशासन ने “अवैध मदरसा” कहकर गिरा दिया, कहा-“ऊपर से बहुत प्रेशर है”
कोई क्या अब अपने पैसे या संसाधनों से स्कूल भी नहीं खोल सकता? खासकर, यदि व्यक्ति मुसलमान हो? मध्यप्रदेश में एक शख्स ने अपने गांव में कोशिश की तो “अवैध मदरसे” के आरोप में स्कूल के निर्माणाधीन ढांचे को प्रशासन ने गिरा दिया. जबकि गांव में सिर्फ तीन मुसलमान परिवार रहते हैं और आवेदन भी स्कूल के लिए था, न कि मदरसे के लिए. एसडीएम का कहना था कि “ऊपर से बहुत प्रेशर है, स्कूल तोड़ना पड़ेगा.” बहरहाल, स्कूल ढहाए जाने की इस घटना ने तीखी आलोचना को जन्म दिया है. सोशल मीडिया पर भाजपा की डबल इंजन सरकारों की खासी लानत मलामत की जा रही है.
“न्यूज़18” के मुताबिक, यह घटना बैतूल जिले के भैंसदेही तहसील के अंतर्गत आने वाले ढाबा गांव की है. स्थानीय निवासी अब्दुल नईम नर्सरी से कक्षा 8 तक शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से अपनी निजी भूमि पर लगभग 20 लाख रुपये खर्च करके एक छोटा निजी स्कूल बनवा रहे थे. लगभग 2,000 की आबादी वाले इस गांव में केवल तीन मुस्लिम परिवार हैं, बावजूद इसके “अवैध मदरसे” की अफवाह फैलाई गई.
नईम के अनुसार, परेशानी तब शुरू हुई जब यह अफवाह फैली कि निर्माणाधीन इमारत एक अनधिकृत मदरसा है. उन्होंने इन दावों को निराधार बताते हुए इस बात पर जोर दिया कि ढांचा अधूरा था और वहां कोई शैक्षणिक गतिविधि शुरू नहीं हुई थी. उन्होंने स्पष्ट किया, “वहां कोई मदरसा नहीं था, कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा रही थी और न ही कोई छात्र था.” लेकिन 11 जनवरी को, ग्राम पंचायत ने औपचारिक अनुमति न होने का हवाला देते हुए उन्हें नोटिस जारी किया और ढांचे को हटाने का निर्देश दिया. नईम ने बताया कि वे दस्तावेज जमा करने के लिए पंचायत के पास गए थे, लेकिन कथित तौर पर उन्हें बाद में आने के लिए कह दिया गया.
नईम ने दावा किया कि उन्होंने 30 दिसंबर को ही स्कूल शिक्षा विभाग में आवेदन कर दिया था, जिसमें भूमि के दस्तावेज संलग्न थे और एक नियमित स्कूल खोलने की अनुमति मांगी गई थी. जैसे ही ग्रामीणों ने तोड़फोड़ के नोटिस का विरोध किया, पंचायत ने अगले ही दिन अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी कर दिया. सरपंच ने बाद में कहा कि उन्हें किसी मदरसे के बारे में कोई शिकायत नहीं मिली थी और उन्होंने पुष्टि की कि सहमति दे दी गई थी.
हालांकि, इस स्पष्टीकरण के बावजूद, 13 जनवरी को प्रशासनिक अधिकारी जेसीबी और अन्य मशीनों के साथ पहुंचे और इमारत के एक हिस्से और वहां बने शेड को ढहा दिया. यह कार्रवाई उस समय हुई जब गांव के लोग जिला अधिकारियों से मिलने गए हुए थे. लिहाजा इस तोड़फोड़ ने निवासियों को विचलित और क्रोधित कर दिया है. नईम ने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि पंचायत से अलग से एनओसी की आवश्यकता है. उन्होंने प्रशासन से अपील की थी कि ढांचे को नष्ट करने के बजाय उन पर जुर्माना लगाया जाए. उन्होंने कहा, “मैंने स्कूल खोलने के लिए एमपी बोर्ड में आवेदन किया था, मदरसे के लिए नहीं. यहां केवल तीन मुस्लिम परिवार होने के कारण, यह आरोप अपने आप में तर्कहीन है.” पत्रकार काशिफ काकवी के अनुसार, नईम जब एसडीएम से बात करने गए तो उन्होंने कहा, “ऊपर से बहुत प्रेशर है, स्कूल तोड़ना पड़ेगा.”
स्थानीय निवासियों ने भी उनकी बात का समर्थन किया. समुदाय के सदस्यों ने कहा कि स्कूल गांव के समर्थन से बनाया जा रहा था ताकि बच्चों को शिक्षा के लिए लंबी दूरी तय न करनी पड़े. ‘जय आदिवासी युवा शक्ति’ (जयस) के कार्यकर्ता सोनू पंसे ने आरोप लगाया कि झूठी अफवाहों के कारण अधिकारियों ने अतिरंजित कार्रवाई की. बैतूल कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी ने कहा कि यह कार्रवाई अनधिकृत निर्माण की शिकायत के बाद की गई थी और अधिकारी कानून के तहत कार्रवाई करने के लिए बाध्य थे, चाहे मंशा कुछ भी रही हो.
मुंबई बीएमसी चुनाव: सांप्रदायिक घृणा और भय की राजनीति पर आधारित अभियान
मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनावों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और घृणा की राजनीति ने नई ऊंचाइयां छू ली हैं. स्वतंत्र पत्रकार कुणाल पुरोहित, जो 2009 से मुंबई के चुनावों पर नजर रख रहे हैं, ने दावा किया है कि यह अब तक का सबसे अधिक सांप्रदायिक रूप से आरोपित और नफरत भरा चुनाव है. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक थ्रेड के माध्यम से बताया कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा एक पूर्ण अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें मुंबईवासियों को डराया जा रहा है कि अगर बीजेपी नहीं जीती तो शहर पर इस्लामी कब्जा हो जाएगा.
पुरोहित के अनुसार, बीजेपी के आधिकारिक हैंडल से जारी एक वीडियो इस अभियान का स्पष्ट उदाहरण है. इस वीडियो में मुंबई के मुस्लिम बहुल इलाकों को हरे रंग में चिह्नित किया गया है, जो शहर के “रंग बदलने” की ओर इशारा करता है. यह वीडियो ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ शैली में बनाया गया है, जिसमें हरे रंग के इलाकों का विस्तार दिखाया गया है और अंत में भगवा रंग के नक्शे के साथ बीजेपी नेताओं की तस्वीरें जोड़ी गई हैं. नारा है - “मुंबईचा रंग बदलू देणार नाही” (हम मुंबई का रंग बदलने नहीं देंगे). पुरोहित ने इसे घृणा फैलाने का सीधा प्रयास बताया.
बीजेपी के शीर्ष शहर नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे शहर को मुस्लिम महापौर नहीं बनने देंगे. पुरोहित ने इसे समस्याग्रस्त करार दिया, साथ ही हास्यास्पद भी, क्योंकि अधिकांश प्रमुख पार्टियों ने मुसलमानों को पर्याप्त टिकट भी नहीं दिए हैं. हिंदुत्व प्रभावक ऑनलाइन और ऑफलाइन दुनिया में साजिश सिद्धांत फैला रहे हैं, जैसे “लैंड जिहाद”, “हॉकर जिहाद”, “कोस्टल जिहाद” और “वोट जिहाद”. इनके माध्यम से मुंबईवासियों को उनके वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है.
एक शहर चुनाव में पाकिस्तान का जिक्र भी किया गया है. बीजेपी कैबिनेट मंत्री नितेश राणे ने कहा कि शिवसेना (यूबीटी) को वोट देना पाकिस्तान को वोट देने जैसा है. पुरोहित ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि यह अभियान भय पर आधारित है.
विडंबना यह है कि बीजेपी पिछले तीन दशकों से शिवसेना के साथ बीएमसी पर शासन कर रही है और राज्य में पिछले 12 वर्षों में से 10 वर्ष सत्ता में रही है. फिर भी, अभियान भय और घृणा पर केंद्रित है, जो उनके शासन की विफलताओं को दर्शाता है.
पुरोहित ने मुंबई की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान दिलाया: हर दिन लोकल ट्रेनों में 6 लोग मरते हैं, सड़क दुर्घटनाओं में 1 व्यक्ति की मौत होती है. शहर की लगभग आधी आबादी झुग्गी-झोपड़ियों में रहती है. खुले स्थान दुर्लभ हैं और फुटपाथ अस्तित्व में नहीं हैं. फिर भी, मतदाताओं से भय पर वोट करने की अपील की जा रही है. उन्होंने इसे शर्मनाक बताया और हैशटैग #BMCElection2026 के साथ अपनी बात समाप्त की.
यह थ्रेड सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें उपयोगकर्ता बीजेपी की रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं. हालांकि, कुछ ने थैकरे परिवार द्वारा उत्तर और दक्षिण भारतीयों के खिलाफ फैलाई गई घृणा का भी जिक्र किया. चुनावों में इस तरह की राजनीति लोकतंत्र के लिए चुनौतीपूर्ण है, जहां विकास के बजाय विभाजन पर जोर दिया जा रहा है.
हरकारा डीप डाइव | ह्यूमन स्टोरी
एसिड अटैक के बाद 16 साल: शाहीन मलिक की लंबी और हारी हुई लड़ाई
‘हरकारा डीप डाइव’ के ताज़ातरीन एपिसोड में एसिड अटैक सर्वाइवर और सामाजिक कार्यकर्ता शाहीन मलिक ने अपनी 16 साल लंबी कानूनी और व्यक्तिगत लड़ाई को विस्तार से साझा किया.
19 नवंबर 2009 को पानीपत में हुए एसिड अटैक ने उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी. उस समय एमबीए की पढ़ाई कर रहीं शाहीन पर ऑफिस से निकलते वक्त एसिड फेंका गया. तत्काल इलाज में देरी, लोगों की अनभिज्ञता और पुलिस की लापरवाही ने नुकसान को और गहरा कर दिया.
शाहीन बताती हैं कि शुरुआती चार साल तक पुलिस ने मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की. सबूत नष्ट होते गए और पीड़िता को ही धमकियाँ मिलने लगीं. बाद में केस री-ओपन हुआ और 2014 में दिल्ली ट्रांसफर किया गया, लेकिन 16 साल बाद आए फैसले में मुख्य आरोपियों को बरी कर दिया गया.
एसिड अटैक के बाद शाहीन को 25 से अधिक सर्जरी से गुज़रना पड़ा. स्थायी विकलांगता, मानसिक आघात और सामाजिक भेदभाव उनकी रोज़मर्रा की सच्चाई बन गए. नौ साल बाद उन्हें ₹3 लाख का मुआवज़ा मिला, जिसे वह पर्याप्त नहीं मानतीं.
इस बातचीत में वह साफ़ कहती हैं कि मुआवज़ा नहीं, इंसाफ़ ज़रूरी है. साथ ही वह एसिड की आसान उपलब्धता, कम कन्विक्शन रेट और क़ानून के कमज़ोर अमल पर गंभीर सवाल उठाती हैं.
आज शाहीन मलिक ‘ब्रेव सोल्स फाउंडेशन’ के ज़रिए एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए इलाज, लीगल सहायता, शेल्टर और आत्मनिर्भरता की राह बना रही हैं. उनका मानना है कि यह लड़ाई सिर्फ़ उनकी नहीं, बल्कि हर उस लड़की की है जिसे सिस्टम ने अकेला छोड़ दिया.
यह एपिसोड हमें याद दिलाता है कि जब तक क़ानून और समाज दोनों नहीं बदलते, तब तक इंसाफ़ सिर्फ़ एक शब्द बना रहेगा.
सिंगापुर पुलिस: जुबीन गर्ग अत्यधिक नशे में थे, डूबने से पहले लाइफ वेस्ट पहनने से इनकार कर दिया था
सिंगापुर के मीडिया ने बुधवार को अदालत के समक्ष पुलिस सहित गवाहों के बयानों के हवाले से बताया कि असम के संगीत जगत के दिग्गज जुबीन गर्ग पिछले साल सितंबर में सिंगापुर के लैज़ारस द्वीप के पास समुद्र में तैरते समय “अत्यधिक नशे” में थे और उन्होंने लाइफ जैकेट पहनने से इनकार कर दिया था, जिसके कारण डूबने से उनकी मृत्यु हो गई.
सिंगापुर के समाचार पत्र ‘द स्ट्रेट्स टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, सहायक पुलिस अधीक्षक (एएसपी) डेविड लिम ने अदालत के समक्ष गवाही दी कि जब उनके दोस्तों ने उन्हें वापस यॉट तक तैरकर आने के लिए मनाने की कोशिश की, तो गर्ग अचानक निश्चल हो गए और पानी में औंधे मुंह (चेहरा नीचे की ओर) तैरने लगे.
“टीएनआईई ऑनलाइन डेस्क” के मुताबिक अधिकारी ने कहा कि गर्ग को वापस यॉट पर खींच लिया गया, जहां उन्हें पुनर्जीवित करने के प्रयास किए गए, लेकिन बाद में 19 सितंबर, 2025 को अस्पताल में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. गर्ग की मृत्यु के कारणों की जांच में गवाही देने वाले 35 गवाहों में एएसपी लिम भी शामिल हैं. लिम के अलावा, बुधवार को छह अन्य गवाहों ने भी अदालत के सामने गवाही दी.
अदालत में गवाही देते हुए लिम ने यह भी कहा कि गर्ग की कोई आत्मघाती प्रवृत्ति नहीं थी और मृत्यु से पहले उन पर किसी भी तरह का दबाव या जबरदस्ती नहीं की गई थी. यॉट (नौका) के कप्तान और उनके सहायक की गवाही के अनुसार, गर्ग को नौका पर सवार होने से पहले अपने दोस्तों के साथ शराब पीते हुए देखा गया था.
गायक की स्थिति इतनी डगमगाई हुई थी कि नौका पर चढ़ते समय उनके दोस्तों को उनके हाथ पकड़ने पड़े थे. नौका पर भी गर्ग लड़खड़ाकर चल रहे थे और उन्हें इधर-उधर जाने के लिए अक्सर मदद की ज़रूरत पड़ रही थी.
‘द स्ट्रेट्स टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, कप्तान के सहायक ने गवाही दी कि किसी ने भी गर्ग को शराब पीने या पानी में उतरने के लिए मजबूर नहीं किया था. उन्होंने आगे बताया कि यॉट पर सवार होने के दौरान गायक और उनके साथियों को यह निर्देश दिए गए थे कि तैरने से पहले उन्हें लाइफ जैकेट पहननी चाहिए. अखबार द्वारा उद्धृत पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, गर्ग के शरीर में प्रति 100 मिलीलीटर रक्त में 333 मिलीग्राम अल्कोहल पाया गया था, जिसने निश्चित रूप से उनके शारीरिक संतुलन को प्रभावित किया होगा.
एएसपी की गवाही के मुताबिक, जब दोपहर करीब 2:30 बजे यॉट लैज़ारस द्वीप के पास पहुंची, तो गर्ग ने लाइफ जैकेट पहनी और तैरने के लिए पानी में कूद गए. हालांकि, पानी में रहने के दौरान उन्होंने अपनी लाइफ जैकेट उतार दी क्योंकि उन्हें लगा कि वह उनके लिए बहुत बड़ी थी. जांच अधिकारी ने आगे बताया कि गर्ग बाद में यॉट पर वापस लौटे और उन्हें ऊपर चढ़ने में मदद करनी पड़ी, क्योंकि उनकी सांसें फूल रही थीं. लिम ने यह भी जोड़ा कि गवाहों ने उनके मुंह से झाग निकलते भी देखा था.
उल्लेखनीय है कि जुबीन की मृत्यु की जांच के लिए असम सरकार द्वारा गठित एक विशेष जांच दल (एसआईटी) ने 12,000 पन्नों का आरोप पत्र दाखिल किया है. इसमें एनईआईएफ के आयोजक श्यामकानु महंत और गर्ग के मैनेजर सिद्धार्थ शर्मा सहित चार लोगों पर हत्या और आपराधिक साजिश के आरोप लगाए गए हैं. महंत और शर्मा के अलावा, इस मामले में पांच अन्य लोगों जुबीन गर्ग के चचेरे भाई संदीपान गर्ग, निजी सुरक्षा अधिकारी नंदेश्वर बोरा और प्रबीन बैश्य, बैंड सदस्य शेखर ज्योति गोस्वामी और गायिका अमृतप्रभा महंत को गिरफ्तार किया गया है.
ईरान से युद्ध की आहट: अमेरिका ने मध्य पूर्व के सैन्य ठिकानों से सैनिकों की निकासी शुरू की
एक्सियोस के लिए बराक रविद की रिपोर्ट है कि मध्य पूर्व में संभावित सैन्य संघर्ष के मद्देनजर अमेरिका ने कतर के अल-उदीद एयर बेस (Al-Udeid Air Base) और क्षेत्र के अन्य प्रमुख ठिकानों से अपने सैनिकों को निकालना शुरू कर दिया है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान में हुए प्रदर्शनकारियों के नरसंहार के जवाब में ईरान पर हवाई हमले करने पर विचार कर रहे हैं. ईरान ने भी धमकी दी है कि यदि उस पर हमला हुआ तो वह क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी बलों पर जवाबी कार्रवाई करेगा.
रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस में मंगलवार को उपराष्ट्रपति वेंस की अध्यक्षता में कई उच्च स्तरीय बैठकें हुईं, जिनमें राष्ट्रपति ट्रंप भी शामिल हुए. सूत्रों का कहना है कि ट्रंप ने कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले ईरान में मारे गए लोगों की “सटीक संख्या” जानने की मांग की है. मानवाधिकार समूहों का दावा है कि ईरान में विरोध प्रदर्शनों के दौरान अब तक 2,500 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जबकि इज़राइल ने अमेरिका को खुफिया जानकारी दी है कि मरने वालों की संख्या 5,000 तक हो सकती है.
ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के एयरोस्पेस कमांडर ने सरकारी टीवी पर कहा है कि उनकी सेना किसी भी हमले का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है. वहीं, कतर के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए अल-उदीद बेस को खाली कराया जा रहा है. स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बात की है और रणनीतिक चर्चाएं जारी हैं.
भारतीय दूतावास की नागरिकों को ईरान छोड़ने की सलाह, विरोध प्रदर्शनों में मरने वालों की संख्या बढ़ी
तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने बुधवार को एक एडवाइजरी (परामर्श) जारी कर छात्रों, तीर्थयात्रियों, व्यापारियों और पर्यटकों सहित सभी भारतीय नागरिकों को व्यावसायिक उड़ानों सहित उपलब्ध साधनों का उपयोग करके ईरान छोड़ने के लिए कहा है. यह कदम देश में हफ्तों से चल रहे घातक विरोध प्रदर्शनों के बीच सुरक्षा स्थिति के तेजी से बिगड़ने के कारण उठाया गया है. दूतावास ने कहा, “ईरान में मौजूद सभी भारतीय नागरिकों से अनुरोध है कि वे उपलब्ध साधनों का उपयोग करके देश छोड़ दें.”
जयंत जैकब के अनुसार, यह एडवाइजरी ऐसे समय में आई है जब ईरान में देशव्यापी विरोध प्रदर्शन 20वें दिन में प्रवेश कर गए हैं और लगभग 280 स्थानों पर प्रदर्शनों की खबरें हैं. यह अशांति, जो दो अंकों की मुद्रास्फीति (महंगाई) और मुद्रा के भारी अवमूल्यन को लेकर शुरू हुई थी, अब सुरक्षा बलों के साथ हिंसक झड़पों में बदल गई है.
अमेरिका स्थित ‘ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी’ के अनुसार, इन विरोध प्रदर्शनों में अब तक कम से कम 2,571 लोग मारे गए हैं. ईरान ने कई क्षेत्रों में संचार माध्यमों पर पाबंदी (ब्लैकआउट) लगा दी है और प्रदर्शनकारियों पर की गई कार्रवाई को लेकर वह बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है.
मंगलवार को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ईरानी प्रदर्शनकारियों से सरकारी संस्थानों पर कब्जा करने और पीछे न हटने का आग्रह किया. उन्होंने बिना कोई विस्तृत जानकारी दिए दावा किया कि “मदद रास्ते में है.” उनके इस बयान ने बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच अमेरिकी संलिप्तता की अटकलों को हवा दे दी है.
एक संबंधित घटनाक्रम में, रॉयटर्स ने खबर दी है कि कतर स्थित ‘अल उदैद एयर बेस’, जो पश्चिम एशिया में सबसे बड़ा अमेरिकी सैन्य अड्डा है, वहां के कई कर्मियों को बुधवार शाम तक एहतियातन वहां से हटने की सलाह दी गई है. इसी तरह के कदम पिछले साल जून में ईरान पर अमेरिकी हवाई हमलों से पहले भी उठाए गए थे.
महाश्वेता देवी आज सौ की हो गईं.
फ्रंटलाइन पत्रिका में निर्मल कांति भट्टाचार्जी ने महाश्वेता देवी के सौ साल होने पर एक लंबा लेख लिखा है..महाश्वेता देवी (14 जनवरी 1926 - 2016) केवल एक लेखिका नहीं थीं, बल्कि भारतीय साहित्य में शोषितों और वंचितों की सबसे बुलंद आवाज़ थीं. लगभग आधी सदी तक उन्होंने अपने लेखन के ज़रिए राजनीति, लिंग, वर्ग और जाति के उन कड़वे सच को उजागर किया, जिनसे अक्सर मुख्यधारा का साहित्य मुंह मोड़ लेता है. ढाका में एक विशेषाधिकार प्राप्त और शिक्षित परिवार में जन्मीं महाश्वेता की परवरिश शांतिनिकेतन के खुले और कलात्मक माहौल में हुई थी, लेकिन उनका दिल हमेशा समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के लिए धड़कता रहा.
जीवन के संघर्ष और पलामू का मोड़ : उनका जीवन संघर्षों से भरा था. 1940 के दशक में अकाल के दौरान राहत कार्य करने से लेकर, कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े अपने पति बिजन भट्टाचार्य के साथ गरीबी के दिन देखने तक, उन्होंने जीवन को बहुत करीब से देखा. एक समय ऐसा भी आया जब परिवार का पेट पालने के लिए उन्हें फेरी लगाकर साबुन और यहां तक कि शोध के लिए बंदर तक बेचने पड़े. लेकिन 1965 में पलामू (झारखंड) की उनकी यात्रा उनके जीवन और लेखन का ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुई. वहां उन्होंने बंधुआ मजदूरी की जो बर्बरता देखी, उसने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया. उन्होंने न केवल इस पर लिखा, बल्कि आदिवासियों को संगठित कर आंदोलन भी चलाया.
साहित्य और प्रतिरोध : उनकी कालजयी कृतियां जैसे ‘अरण्येर अधिकार’ (बिरसा मुंडा के जीवन पर), ‘हजार चौराशीर मां’ (नक्सल आंदोलन की पृष्ठभूमि पर) और ‘रुदाली’ ने बांग्ला साहित्य की दिशा बदल दी. ‘द्रौपदी’ और ‘स्तनदायिनी’ जैसी कहानियों में उन्होंने महिलाओं के शरीर और अस्तित्व पर होने वाले शोषण को एक तीखे राजनीतिक स्वर में प्रस्तुत किया. महाश्वेता देवी ने अपनी कहानियों में मिथक (Myth) और वास्तविकता का ऐसा ताना-बाना बुना जो सत्ता के खिलाफ एक हथियार बन गया. उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक यह सुनिश्चित किया कि आदिवासियों और गरीबों की ज़िंदगियां इतिहास के फुटनोट्स में दबकर न रह जाएं.
टी.एम. कृष्णा: कैसे बना नीला रंग प्रतिरोध और दलित अस्मिता का प्रतीक
भारत के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में रंगों का अपना महत्व रहा है, लेकिन ‘नीले’ रंग की यात्रा सबसे विशिष्ट है. 1859 में बंगाल में नील की खेती करने वाले किसानों ने ब्रिटिश बागान मालिकों के शोषण के खिलाफ ऐतिहासिक विद्रोह किया था. इसके लगभग 60 साल बाद, 1917 में महात्मा गांधी ने बिहार के चंपारण में अपना पहला सत्याग्रह भी नील की खेती (तिनकठिया प्रणाली) के विरोध में ही शुरू किया था. उस दौर में, नीला रंग कुछ समय के लिए अहिंसा, सत्याग्रह और न्याय का प्रतीक बना.
लेकिन आज़ादी के बाद, इस रंग को असली राजनीतिक और सामाजिक पहचान डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने दिलाई. आज देश के हर कोने में अंबेडकर की मूर्तियों में उन्हें नीले सूट में देखा जाता है, जो संविधान थामे आगे बढ़ने का इशारा करते हैं. आखिर अंबेडकर और दलित आंदोलनों ने नीला रंग ही क्यों चुना? इसके पीछे कई सिद्धांत हैं. कुछ मानते हैं कि यह अंबेडकर का पसंदीदा रंग था. कुछ इसे आकाश की तरह व्यापक और भेदभाव-रहित मानते हैं.
टी.एम. कृष्णा अपने लेख में एक गहरा विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं. अंबेडकर ने हिंदू धर्मग्रंथों का गहन अध्ययन किया था. ‘हरिवंश’ और ‘महाभारत’ जैसे ग्रंथों में वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए शूद्रों के वर्ण को ‘काला’ या गहरे रंग (जो नीले का ही एक रूप माना जाता है) से जोड़ा गया था. ग्रंथों में उच्च जातियों के लिए श्वेत, लाल या पीला रंग बताया गया, जबकि सबसे निचले पायदान के लिए गहरा रंग. संभव है कि अंबेडकर ने शोषितों और वंचितों के साथ थोपे गए इस ‘हीनता’ के रंग को ही अपनाकर इसे गर्व, प्रतिरोध और अस्मिता के प्रतीक में बदल दिया.
1942 में जब अंबेडकर ने ‘ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन’ की स्थापना की, तो उन्होंने इसके झंडे के लिए नीला रंग चुना. आज यह रंग सिर्फ एक पहचान नहीं, बल्कि अधिकारों की सशक्त मांग का प्रतीक बन चुका है. हमारे राष्ट्रीय ध्वज के केंद्र में स्थित ‘अशोक चक्र’ भी नीला है, जो धर्म और न्याय के पहिये का प्रतिनिधित्व करता है. यह याद दिलाता है कि पहिया तभी घूमता है जब परिधि (हाशिये) पर खड़े लोग केंद्र में आते हैं.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.


















