15/01/2026: भारी भसड़ के बीच बीएमसी चुनाव | ट्रिपल इंजन सरकार और निगम में गोमांस कारोबार | लिंचिंग | बंगाल, ईडी सुप्रीम कोर्ट में | रहमान, सांप्रदायिकता, बॉलीवुड | बंद गला | ईरान | चीनी विवि आगे बढ़े
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
भोपाल में 26 टन गोमांस जब्त, लैब रिपोर्ट में पुष्टि के बाद ट्रिपल इंजन सरकार सवालों के घेरे में
बालासोर में गौ तस्करी के शक में एक शख्स की मॉब लिंचिंग, दूसरा जख्मी, मवेशियों को ले जा रही थी वैन
सुप्रीम कोर्ट ने ईडी अधिकारियों पर दर्ज एफआईआर रोकी, बंगाल सरकार को सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश
बीएमसी चुनाव में मतदान के बाद मिट गई अमिट स्याही, विपक्ष ने उठाए धांधली के सवाल
मेरे साथ जो हुआ, उसके लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार, वोट कटने से नाराज़ वन मंत्री नाईक ने कहा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ‘मनु स्मृति’ का भी हवाला, विधवा बहू ससुराल की संपत्ति से भरण-पोषण पाने की हकदार
ऑस्कर विजेता संगीतकार का खुलासा, बॉलीवुड में 8 साल तक काम न मिलने के पीछे शायद कोई गैंग या सांप्रदायिक सोच थी
अफगानिस्तान में इंटरनेट शटडाउन पर भिड़े कंधार और काबुल गुट, ऑडियो लीक ने खोली कलह की पोल
रेल मंत्री ने बंद गला सूट को बताया गुलामी की निशानी, हटाने के आदेश पर छिड़ी बहस
एमपी गज़ब है: भोपाल नगर निगम में काटी जा रही थीं गायें, 26 टन गोमांस जब्त
भोपाल के बाहरी इलाके में कम से कम 26 टन गौ मांस ले जा रहे एक ट्रक की जब्ती मध्यप्रदेश में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है. लैब परीक्षणों में गौ मांस (बीफ) की पुष्टि होने के बाद सत्तारूढ़ भाजपा कटघरे में है और उससे तीखे सवाल किए जा रहे हैं, लिहाजा पार्टी को रक्षात्मक स्थिति में आना पड़ा है. दरअसल, इसका कारण ट्रिपल इंजन (केंद्र, राज्य और नगर निगम, तीनों में भाजपा) की हुकूमत है.
इंदौर में दूषित पेयजल के कारण कम से कम 15 लोगों की मौत के मामले को अभी भाजपा ने शांत ही किया था कि अब उसके सामने इस बात की जांच का सामना करने की चुनौती है कि भोपाल नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में चलने वाला एक बूचड़खाना प्रतिबंधित गतिविधियों से कैसे जुड़ा हो सकता है.
आनंद मोहन जे के अनुसार, पार्टी पदाधिकारियों ने स्वीकार किया कि राज्य सरकार, नगर निगम और स्थानीय प्रतिनिधित्व सभी भाजपा के नियंत्रण में होने के कारण, पार्टी के पास जिम्मेदारी से बचने के सीमित विकल्प हैं. विपक्ष ने इस मुद्दे को लपक लिया है और तर्क दिया है कि यह घटना गौ रक्षा के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता और वास्तविक शासन के परिणामों के बीच के अंतर को उजागर करती है.
अधिकारियों ने बताया कि जब्त किया गया मांस जिंसी क्षेत्र में स्थित बीएमसी द्वारा संचालित एक बूचड़खाने से जुड़ा था, जिसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर चलाया जाता है. इस केंद्र को केवल भैंस के वध की अनुमति है, गाय या उनके वंश के वध की नहीं. इन खुलासों के बाद, 9 जनवरी को बीएमसी द्वारा बूचड़खाने को सील कर दिया गया.
भोपाल की मेयर मालती राय ने कहा, “प्राप्त जानकारी संकेत देती है कि बूचड़खाने के नमूने गलत (बीफ की पुष्टि) पाए गए थे. जब बूचड़खाने के नमूने गलत मिले, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की गई... संबंधित अधिकारी, निजी वेंडर या किसी भी अन्य व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है. इसमें शामिल लोगों पर कार्रवाई हो रही है... बूचड़खाने को सील कर दिया गया है.”
यह बूचड़खाना एक फर्म को 4 लाख रुपये के वार्षिक किराए पर लीज पर दिया गया था. उस एजेंसी को काली सूची (ब्लैकलिस्ट) में डाल दिया गया है और कम से कम 12 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है.
पूरे भोपाल में विरोध प्रदर्शन देखे गए हैं, जिसमें दक्षिणपंथी समूहों और विपक्षी कांग्रेस दोनों ने भाजपा और राज्य सरकार पर गौकशी और गौमांस के अवैध परिवहन के लिए जिम्मेदार लोगों के साथ मिले होने का आरोप लगाया है. बजरंग दल, करणी सेना और अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं ने सोमवार और मंगलवार को विरोध प्रदर्शन किया और अक्टूबर 2025 में शुरू हुए इस बूचड़खाने को ढहाने की मांग की.
“हमारी भावनाएं आहत हुई हैं. हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे. मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन सौंपा जा रहा है, जिसमें कड़ी कार्रवाई की मांग की गई है,” जय माँ भवानी हिंदू संगठन के भानु हिंदू ने कहा.
मंगलवार को हुई बीएमसी परिषद की बैठक में विपक्षी कांग्रेस पार्षदों ने इस मुद्दे पर जमकर हंगामा किया. उन्होंने भाजपा शासित बीएमसी और महापौर पर आरोप लगाया कि दिसंबर से ही पार्टी पार्षदों द्वारा चिंता जताए जाने के बावजूद इस मामले को नजरअंदाज किया गया.
बीएमसी में विपक्ष के नेता एस. ज़की ने कहा, “हम दिसंबर से लगातार इस मामले को सभी के संज्ञान में लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हमारी बात अनसुनी कर दी गई. अब भी अगर कोई कार्रवाई शुरू नहीं की गई, तो हम कड़ी कार्रवाई करने के लिए मजबूर होंगे.”
भाजपा पार्षद देवेंद्र भार्गव ने अपना इस्तीफा पेश किया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया. उन्होंने कहा, “यह शर्मनाक है कि यह सब हमारी नाक के नीचे हुआ. मैंने निगम को समय सीमा दी है कि अगर कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो मैं इस्तीफा दे दूंगा.”
कैबिनेट मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, “गोमांस या गौकशी के मामलों में किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा. चाहे वह व्यापारी हो या अधिकारी, यदि कोई भी दोषी पाया जाता है, तो सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी... मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस मामले पर स्पष्ट और सख्त निर्देश दिए हैं.”
बालासोर में गौ तस्करी के शक में एक शख्स की मॉब लिंचिंग, दूसरा जख्मी, मवेशियों को ले जा रही थी वैन
ओडिशा के बालासोर में गौ तस्करी के शक में 35 वर्षीय शेख मकनदार महम्मद की लिंचिंग का सनसनीखेज मामला सामने आया है. हमलावरों ने बेरहमी के साथ इतना मारा कि अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. आरोपियों ने उस वैन में मवेशियों के परिवहन पर आपत्ति जताई थी, जिसमें मकनदार मोहम्मद यात्रा कर रहा था.
भुवनेश्वर से सुजीत बिसोई की रिपोर्ट है कि पुलिस ने शुरुआत में वैन के चालक और मालिक के खिलाफ राज्य के गौवध निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था, जिसमें मारपीट का कोई जिक्र नहीं था. हालांकि, बाद में पीड़ित के भाई की शिकायत के आधार पर एक अन्य मामला दर्ज किया गया.
मारपीट की यह घटना बुधवार सुबह 5 बजे हुई. हमलावरों ने कथित तौर पर वैन के चालक और सहायक की बेरहमी से पिटाई की. दोनों घायल हो गए. इस घटना के एक कथित वीडियो में हमलावर पीड़ित को धार्मिक नारे लगाने के लिए मजबूर करते हुए दिखाई दे रहे हैं.
घटना के बाद, बालासोर सदर पुलिस स्टेशन के एक उप-निरीक्षक की शिकायत पर एक प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की गई, जिसमें वैन के चालक और मालिक को नामजद किया गया, लेकिन मारपीट का उल्लेख नहीं किया गया. चालक और मालिक पर पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, ओडिशा गौवध निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया.
प्रारंभिक प्राथमिकी के अनुसार, मवेशियों से लदी एक पिकअप वैन कथित तौर पर जयदेव कस्बा की ओर से लापरवाही और तेज गति से चलाई जा रही थी. प्राथमिकी में दावा किया गया कि वैन असंतुलित होकर सड़क किनारे पलट गई, और जब तक शिकायतकर्ता मौके पर पहुंचा, वैन के चालक को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जा चुका था और वहां एक गाय मिली थी.
प्राथमिकी में कहा गया है, “गाय को जब्त कर मां भारती गौशाला लाया गया, और पिकअप वाहन को थाने लाया गया. शिकायतकर्ता ने पिकअप वैन के मालिक और चालक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए एक लिखित रिपोर्ट प्रस्तुत की.”
मृतक के भाई शेख जितेंदर महम्मद की शिकायत के आधार पर बुधवार शाम पांच व्यक्तियों के खिलाफ एक और प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की गई. इसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने सड़क पर वैन को रोका और उसके भाई पर घातक हथियारों से बेरहमी से हमला किया. शिकायत में कहा गया कि हालांकि पुलिस की गश्ती गाड़ी मौके पर पहुंची और उसके भाई को बालासोर जिला मुख्यालय अस्पताल ले गई, लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103(2) के तहत मामला दर्ज किया गया, जो भीड़ द्वारा की गई हत्या (मॉब लिंचिंग) की सजा से संबंधित है.
बालासोर के पुलिस अधीक्षक प्रत्युष दिवाकर ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि प्राथमिकी में नामजद सभी पांचों आरोपियों को बुधवार रात कई छापेमारी के दौरान हिरासत में ले लिया गया है और उनसे पूछताछ की जा रही है. उन्होंने कहा कि मामले की आगे की जांच जारी है. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि आरोपियों से यह पता लगाने के लिए पूछताछ की जा रही है कि क्या इस घटना में अन्य लोग भी शामिल थे.
सुप्रीम कोर्ट ने ईडी अफसरों पर एफआईआर पर रोक लगाई, बंगाल सरकार को नोटिस जारी
टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राजनीतिक परामर्श फर्म ‘आई-पैक’ के कार्यालय पर 8 जनवरी को हुए छापों के संबंध में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दायर मामले में पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस जारी किया है. जस्टिस प्रशांत मिश्रा ने अपने आदेश में कहा, “नोटिस जारी करें. दो सप्ताह में जवाबी हलफनामा दायर किया जाए. इस बीच, यह निर्देश दिया जाता है कि प्रतिवादी (बंगाल सरकार) सीसीटीवी कैमरे और अन्य स्टोरेज डिवाइस को सुरक्षित रखें, जिनमें 8 जनवरी को तलाशी लिए गए दोनों परिसरों के फुटेज हैं.”
जस्टिस मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ ने अगली सुनवाई तक बंगाल में ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज चार एफआईआर पर भी रोक लगा दी है. ईडी ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस आयुक्त वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश मांगे थे. मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी को होगी.
इससे पहले गुरुवार को दायर एक अलग याचिका में, ईडी ने आरोप लगाया था कि राजीव कुमार और अन्य अधिकारियों ने मुख्यमंत्री की मदद की और केंद्रीय एजेंसी के अधिकारियों को छापेमारी करने से रोका व सबूत मिटाए. शीर्ष अदालत की पीठ ने चेतावनी दी कि गंभीर अपराधों की जांच कर रही केंद्रीय एजेंसियों को बाधित करने से अराजकता फैल सकती है और याचिका में राज्य एजेंसियों द्वारा ईडी की जांच में कथित हस्तक्षेप पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं.
स्याही मिटती रही बीएमसी चुनाव में
बृहनमुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव 2026 में 227 सीटों के लिए 15 जनवरी को मतदान हुआ, जिसमें 1700 उम्मीदवार मैदान में थे. यह चुनाव चार साल की देरी के बाद हुआ, जिसमें महायुति (बीजेपी-शिवसेना-एनसीपी) और विपक्ष (एमवीए) के बीच कड़ा मुकाबला देखा गया. एक्जिट पोल के अनुसार, बीजेपी-नीत गठबंधन को बहुमत मिलने की संभावना है. मुख्य विवाद मतदान के बाद लगाई जाने वाली ‘अमिट’ स्याही का आसानी से मिट जाना रहा. सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुए, जिसमें मतदाता नेल पॉलिश रिमूवर या सैनिटाइजर से स्याही हटा रहे थे, जिससे कई बार वोट डालने की आशंका बढ़ी. विपक्षी नेता जैसे राज ठाकरे और वर्षा गायकवाड़ ने चुनाव आयोग पर धांधली का आरोप लगाया. चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि स्थानीय चुनावों में मार्कर पेन का उपयोग होता है, न कि अमिट स्याही.कई मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से गायब थे, पुरानी लिस्ट के कारण वोट डालने से वंचित हुए. वेबसाइट क्रैश, अंतिम समय में रिश्वतखोरी और डुप्लिकेट एंट्रीज की शिकायतें आईं. एक्जिट पोल में 31% मतदाताओं ने ड्रेनेज, 20% ने स्वच्छता और 18% ने पीने के पानी की कमी को मुख्य मुद्दा बताया.महाराष्ट्र में बीएमसी के अलावा 28 अन्य नगर निगमों (जैसे पुणे, नागपुर, ठाणे, नवी मुंबई, नासिक, पिंपरी-चिंचवाड़) में भी 15 जनवरी को मतदान हुआ. कुल 2869 सीटों पर 15931 उम्मीदवारों के लिए 3.48 करोड़ मतदाताओं ने वोट डाला. जिला परिषद चुनाव 5 फरवरी को होंगे. इन चुनावों में भी स्याही विवाद और मतदाता समस्याएं देखी गईं.
मेरे साथ जो हुआ, उसके लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार, वोट कटने से नाराज़ वन मंत्री नाईक ने कहा
चुनाव आयोग और “एसआईआर” की कवायद को लेकर विपक्ष के आरोप आज उस वक्त सच मालूम पड़े, जब महाराष्ट्र के वन मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता गणेश नाईक नवी मुंबई नगर निगम चुनाव में मतदान नहीं कर पाए, क्योंकि उन्हें पता चला कि उनका नाम मतदाता सूची से गायब है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, नाईक ने कहा कि वह वर्षों से अपने परिवार के साथ नवी मुंबई के स्कूल नंबर 94 में मतदान करते आ रहे थे, लेकिन इस बार उन्हें सूचित किया गया कि उनका मतदान केंद्र सेंट मैरी हाई स्कूल में स्थानांतरित कर दिया गया है.
हालांकि, जब वह नए स्थान पर पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि उन्हें आवंटित किया गया कमरा नंबर वहां मौजूद ही नहीं था और मतदाता सूची से उनका नाम भी नदारद था. स्कूल नंबर 94 के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए नाईक ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “नतीजतन, मैं अपना वोट नहीं डाल सका.”
मतदाताओं के आवंटन में विसंगतियों का दावा करते हुए नाईक ने कहा कि एक ही इमारत में रहने वाले उनके परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों के नाम तीन अलग-अलग मतदान केंद्रों में बांट दिए गए थे. नाईक ने इस चूक के लिए राज्य चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा, “अगर मेरे जैसे मंत्री को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, जहां मतदाता सूची से नाम गायब है, तो कोई कल्पना कर सकता है कि आम मतदाताओं को किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ रहा होगा.”
बेलूर मठ के संन्यासियों के सामने पहचान का संकट: माता-पिता को लेकर एसआई सुनवाई
टेलीग्राफ के रिपोर्टर संजय मंडल और किंशुक बसु की रिपोर्ट के अनुसार, रामकृष्ण मठ और मिशन के कई संन्यासियों को विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है, जिससे उनके सामने एक अजीब संकट खड़ा हो गया है. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि उनके जैविक माता-पिता (जिनसे उन्होंने संन्यास लेते समय संबंध तोड़ लिए थे) के नाम उन गुरुओं के नामों से अलग हैं जिन्हें वे अब अपना माता-पिता मानते हैं. कई भिक्षुओं के पास यह घोषित करने वाला हलफनामा भी नहीं है कि जन्म के समय का मूल नाम और दीक्षा के बाद का नाम एक ही व्यक्ति का है.
रामकृष्ण मठ के संन्यासी वोट तो नहीं देते, लेकिन पहचान के संकट, वीजा प्राप्त करने में कठिनाई या प्रशासनिक कार्यों में बाधा के डर से वे मतदाता सूची में अपना नाम शामिल रखना चाहते हैं. बुधवार को 90 संन्यासी बेलूर मठ में आयोजित विशेष ‘एसआईआर’ कैंप में पहुंचे. चुनाव आयोग के अधिकारियों के सामने अपनी बारी का इंतजार करते इन संन्यासियों के चेहरों पर चिंता साफ देखी जा सकती थी. सूत्रों के मुताबिक, इनमें से कई ने बीएलओ द्वारा दिए गए फॉर्म में पिता के रूप में अपने आध्यात्मिक गुरुओं के नाम लिखे थे, जबकि उनके पुराने दस्तावेजों में जैविक माता-पिता के नाम हैं.
एक 92 वर्षीय संन्यासी ने बताया, “मेरे पूर्व-संन्यासी जीवन में मुझे सुकुमार मुखर्जी कहा जाता था. अब मेरा नाम स्वामी वैद्यनाथानंद है. मैंने अपना पासपोर्ट जमा किया है.” अधिकारियों का कहना है कि स्वामी विवेकानंद द्वारा बनाए गए नियमों के मुताबिक मठ के संन्यासी राजनीति में भाग नहीं लेते और न ही वोट देते हैं. हावड़ा की डीएम पी. दीपा प्रिया ने बताया कि प्रक्रिया पूरी करने के लिए अभी और समय लगेगा क्योंकि कुछ संन्यासी बाहर हैं.
20 मिलियन डॉलर की डकैती: कनाडा ने भारत से प्रीत पनेसर के प्रत्यर्पण की मांग की
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा ने 2023 में हुए 20 मिलियन डॉलर मूल्य के सोने की चोरी के मामले में मुख्य आरोपियों में से एक, प्रीत पनेसर के प्रत्यर्पण के लिए भारत से औपचारिक अनुरोध किया है. पील रीजनल पुलिस द्वारा 12 जनवरी को जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, यह कनाडा की सबसे बड़ी डकैतियों में से एक है. ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) के अधिकारियों ने अखबार को बताया कि उन्हें अभी तक प्रत्यर्पण अनुरोध के बारे में सूचित नहीं किया गया है, लेकिन वे कनाडाई अधिकारियों के संपर्क में हैं ताकि पनेसर द्वारा भारत में कथित रूप से प्राप्त हवाला फंड को डकैती की आय से जोड़ा जा सके.
अधिकारियों ने कहा कि यह पैसा कथित रूप से संगीत उद्योग जैसे चैनलों के माध्यम से भेजा गया था, जिसका उपयोग मुख्य रूप से पनेसर की पत्नी प्रीति की फिल्म के निर्माण के लिए किया गया, जो एक उभरती हुई गायिका और अभिनेता हैं. पिछले साल जुलाई में यह खबर आई थी कि पनेसर ने कथित तौर पर हवाला चैनलों के माध्यम से 8.5 करोड़ रुपये से अधिक प्राप्त किए. ईडी के अनुसार, सबूत बताते हैं कि नकद राशि पनेसर दंपति द्वारा संचालित खातों में जमा की गई और फिर ‘मैसर्स स्टार मेकर्स एंटरटेनमेंट’ के खाते में निवेश के रूप में ट्रांसफर की गई.
फरवरी 2025 में जब पनेसर को चंडीगढ़ के बाहरी इलाके में ट्रैक किया गया था, तो उसने कानूनी कारणों का हवाला देकर बात करने से इनकार कर दिया था. इसके बाद ईडी ने तलाशी ली और मामला दर्ज किया. कनाडाई पुलिस की जांच रिपोर्ट के अनुसार, पनेसर एयर कनाडा का कर्मचारी था जिसने आने वाले शिपमेंट की पहचान की और कार्गो सिस्टम में हेरफेर कर कंटेनर को हटाने में मदद की. पुलिस ने उसे इस डकैती की साजिश में ‘फ़ूड चेन में सबसे ऊपर’ और बेहद अहम बताया है.
दिल्ली में मौजूद नहीं था, कोई नकदी बरामद नहीं हुई: जांच पैनल के सामने जस्टिस यशवंत वर्मा की दलील
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की जांच कर रही लोकसभा द्वारा नियुक्त समिति को बताया है कि पिछले साल मार्च में उनके दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास में लगी आग के दौरान नकदी मिलने के दावे गलत हैं. उन्होंने कहा कि वह उस दिन राजधानी में नहीं थे और यदि अधिकारी साइट को सुरक्षित करने में विफल रहे तो इसमें उनकी गलती नहीं है.
जस्टिस वर्मा ने कथित तौर पर कहा कि आग वाली जगह, जो कि एक आउटहाउस था और उनके रहने की जगह से अलग थी, से किसी भी तरह की बरामदगी का कोई रिकॉर्ड नहीं है. वह जगह सीआरपीएफ बैरक के करीब थी और कई अन्य लोगों की पहुंच में थी. उन्होंने यह भी दलील दी कि आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई सीसीटीवी फुटेज भी नहीं है. 14-15 मार्च की दरमियानी रात को आग लगने के दौरान उनके आवास पर नकदी मिलने के आरोपों के बाद विवाद खड़ा हो गया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया था.
भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित तीन सदस्यीय आंतरिक जांच पैनल ने आरोपों को विश्वसनीय पाया था, जिसके बाद मामला आगे बढ़ा. जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में आंतरिक जांच की संवैधानिकता को चुनौती दी थी, लेकिन 7 अगस्त, 2025 को एक पीठ ने इसे खारिज कर दिया. संसदीय समिति, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मनेंद्र मोहन श्रीवास्तव भी शामिल हैं, इन आरोपों की जांच कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जस्टिस वर्मा को संसदीय समिति के नोटिस का जवाब देने के लिए और समय देने से इनकार कर दिया है.
तालिबान के शीर्ष नेतृत्व में दरार: इंटरनेट शटडाउन के पीछे ‘कंधार बनाम काबुल’ की जंग
बीबीसी के ज़िया शहरयार और फ्लोरा ड्रूरी की एक साल लंबी चली जांच रिपोर्ट बताती है कि तालिबान के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है. बीबीसी को मिली एक लीक ऑडियो क्लिप में तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा को आंतरिक कलह के बारे में चेतावनी देते हुए सुना जा सकता है. जनवरी 2025 में कंधार के एक मदरसे में दिए गए भाषण में अखुंदज़ादा ने कहा कि अगर ये मतभेद जारी रहे, तो अमीरात ढह जाएगा.
रिपोर्ट के मुताबिक, अब तालिबान के शीर्ष पर दो अलग-अलग समूह स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं. एक समूह पूरी तरह से अखुंदज़ादा के प्रति वफादार है जो कंधार से देश को एक कट्टर इस्लामी अमीरात बनाने की दिशा में चला रहा है. दूसरा समूह काबुल स्थित शक्तिशाली मंत्रियों का है (जैसे सिराजुद्दीन हक्कानी और मुल्ला उमर के बेटे याकूब), जो थोड़े व्यावहारिक नजरिए की वकालत करते हैं और लड़कियों की शिक्षा और बाहरी दुनिया से जुड़ाव चाहते हैं. एक इनसाइडर ने इसे “कंधार हाउस बनाम काबुल” बताया.
यह तनाव सितंबर के अंत में तब चरम पर पहुंच गया जब अखुंदज़ादा ने इंटरनेट बंद करने का आदेश दिया. काबुल समूह ने इस आदेश के खिलाफ बगावत करते हुए तीन दिन बाद इंटरनेट वापस चालू करवा दिया. यह तालिबान के इतिहास में अभूतपूर्व था क्योंकि ‘अमीर’ के आदेश की अवहेलना हुई. विशेषज्ञों का कहना है कि काबुल स्थित गुट का मानना है कि आधुनिक देश इंटरनेट के बिना नहीं चल सकता. हालांकि, तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने किसी भी विभाजन से इनकार किया है, लेकिन अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि काबुल के मंत्री अब सुप्रीम लीडर की हर बात पर “हां” कहने को तैयार नहीं हैं.
ट्रंप प्रशासन के साथ मतभेद उभरने के बाद ग्रीनलैंड में यूरोपीय सैनिकों की तैनाती
फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे और स्वीडन सहित कई यूरोपीय देशों के सैनिक ग्रीनलैंड पहुंच रहे हैं. यह कदम बुधवार को डेनमार्क, ग्रीनलैंड और अमेरिका के प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत के बाद इस आर्कटिक द्वीप की सुरक्षा को बढ़ाने के लिए उठाया गया है, जिसमें ट्रंप प्रशासन और यूरोपीय सहयोगियों के बीच “मौलिक असहमति” उभर कर सामने आई.
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने बुधवार को घोषणा की कि “फ्रांसीसी सैन्य तत्व पहले से ही रास्ते में हैं” और “अन्य भी उनके पीछे आएंगे.” फ्रांसीसी अधिकारियों ने बताया कि पर्वतीय इन्फैंट्री यूनिट के लगभग 15 फ्रांसीसी सैनिक एक सैन्य अभ्यास के लिए पहले से ही नुक में मौजूद हैं. जर्मनी के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि वह गुरुवार को ग्रीनलैंड में 13 कर्मियों की एक टोही टीम तैनात करेगा.
डेनमार्क ने घोषणा की कि वह ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाएगा और नाटो सहयोगी भी उनके साथ शामिल होंगे. यह घोषणा ठीक उस समय हुई जब डेनिश और ग्रीनलैंडिक विदेश मंत्रियों ने वाशिंगटन में व्हाइट हाउस के प्रतिनिधियों से मुलाकात की. बैठक का उद्देश्य राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड पर अधिकार करने के इरादे पर चर्चा करना था, ताकि वहां के खनिज संसाधनों का उपयोग किया जा सके और रूस व चीन की बढ़ती दिलचस्पी के बीच आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा की जा सके.
डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन ने ग्रीनलैंड की अपनी समकक्ष विवियन मोत्ज़फेल्ड के साथ बुधवार को कहा कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ व्हाइट हाउस में हुई बहुप्रतीक्षित वार्ता के बाद भी ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के साथ “मौलिक असहमति” बनी हुई है. रासमुसेन ने आगे कहा कि यह “स्पष्ट है कि राष्ट्रपति की ग्रीनलैंड को अपने अधीन करने की इच्छा है.”
ट्रंप ने बैठक के बाद ओवल ऑफिस में मीडिया से कहा, “हमें वास्तव में इसकी जरूरत है. अगर हम वहां नहीं गए, तो रूस जाएगा और चीन जाएगा. डेनमार्क इसके बारे में कुछ नहीं कर सकता, लेकिन हम सब कुछ कर सकते हैं.”
इस बीच ग्रीनलैंड की राजधानी नुक में स्थानीय निवासियों ने ‘द एसोसिएटेड प्रेस’ को बताया कि वे खुश हैं कि पहली बैठक हुई, लेकिन उनका मानना है कि इससे जवाबों से ज्यादा सवाल खड़े हो गए हैं. कई लोगों ने कहा कि वे अधिक सैनिक भेजने के डेनमार्क के फैसले और अन्य नाटो सहयोगियों के समर्थन को संभावित अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के खिलाफ सुरक्षा के रूप में देखते हैं. हालांकि, यूरोपीय सैन्य अधिकारियों ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि इस कदम का उद्देश्य द्वीप के खिलाफ किसी अमेरिकी कार्रवाई को रोकना है.
‘विकसित भारत’ के दावों की हकीकत: यह समाधान नहीं, सिर्फ नारे बेच रहा है
फ्रंटलाइन में प्रकाशित अपने लेख में आनंद तेलतुंबडे लिखते हैं कि भाजपा द्वारा हाल के कानूनों को ‘विकसित भारत’ के तहत ब्रांड करना एक सोची-समझी वैचारिक रणनीति है. इसका उद्देश्य विकास के अभाव की जांच को रोकना और यह दिखाना है कि विकास हासिल कर लिया गया है. यह शासन नहीं, बल्कि केवल मंत्रोच्चारण जैसा है. वैश्विक मानकों पर भारत की स्थिति अभी भी शर्मनाक है. पोषण, बाल मृत्यु दर, और आय असमानता जैसे सूचकांकों में भारत बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों से भी पीछे है.
लेखक तर्क देते हैं कि ‘विकसित भारत’ एक भ्रम है जो नागरिकों को यह मानने पर मजबूर करता है कि वे एक विकसित राष्ट्र में रह रहे हैं, भले ही उनकी वास्तविक स्थिति अभावग्रस्त हो. जब आर्थिक संकेतक लड़खड़ाते हैं, तो विमर्श को ‘विश्वगुरु’ जैसे सभ्यतागत गौरव की ओर मोड़ दिया जाता है. यह गौरव भौतिक प्रगति का विकल्प बन जाता है. इस आख्यान (narrative) को बनाए रखने के लिए आंकड़ों को दबाया जाता है और स्वतंत्र शोध को खारिज किया जाता है.
लेख के अनुसार, विकास का अर्थ अब सड़कों और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक सीमित कर दिया गया है, जबकि सामाजिक समानता और पुनर्वितरण गायब हैं. कानूनों को ‘विकसित भारत’ से जोड़कर, किसी भी आलोचना को ‘विकास विरोधी’ करार दिया जाता है, जिससे लोकतांत्रिक बहस खत्म हो जाती है. लेखक चेतावनी देते हैं कि यह एक निर्मित भ्रम है, और जब भविष्य में यह नारा वास्तविकता से टकराएगा, तो इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. कोई भी देश सिर्फ खुद को महान घोषित करके महान नहीं बनता.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ‘मनु स्मृति’ का हवाला, विधवा बहू ससुराल की संपत्ति से भरण-पोषण पाने की हकदार
सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि एक हिंदू विधवा बहू हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम के तहत अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण पाने की हकदार है, चाहे उसके पति की मृत्यु ससुर के जीवनकाल में हुई हो या उनके बाद. न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने कहा कि हिंदू विधवा बहू को ऐसा अधिकार न केवल वैधानिक अधिनियम के तहत, बल्कि संविधान और प्राचीन मनुस्मृति के तहत भी प्राप्त है.
“द टेलीग्राफ ब्यूरो” के अनुसार, न्यायमूर्ति मित्तल ने फैसले में लिखा: “एक बेटा या कानूनी उत्तराधिकारी विरासत में मिली संपत्ति से उन सभी आश्रित व्यक्तियों का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य हैं, जिनका भरण-पोषण करने के लिए मृतक कानूनी और नैतिक रूप से बाध्य था. इसलिए, पुत्र की मृत्यु पर, ससुर का यह पवित्र दायित्व है कि वह विधवा बहू का भरण-पोषण करे यदि वह स्वयं या मृत पति द्वारा छोड़ी गई संपत्ति के माध्यम से अपना गुजारा करने में असमर्थ है. यह अधिनियम ससुर के अपनी विधवा बहू के भरण-पोषण के उपरोक्त दायित्व को खारिज करने की कल्पना नहीं करता है, चाहे वह ससुर की मृत्यु से पहले विधवा हुई हो या बाद में.”
शीर्ष अदालत ने यह फैसला कंचना राय और उमा देवी (डॉ. महेंद्र प्रसाद के रिश्तेदार) द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए सुनाया. इन अपीलों में उच्च न्यायालय के उस निर्देश को चुनौती दी गई थी, जिसमें डॉ. प्रसाद की संपत्ति से उनकी विधवा बहू गीता शर्मा की भरण-पोषण याचिका पर विचार करने को कहा गया था.
मस्जिदों और दरगाहों के खिलाफ बार-बार पीआईएल दायर करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एनजीओ को फटकार लगाई
दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को ‘सेव इंडिया फाउंडेशन’ नामक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की कड़ी आलोचना की. ‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी में मस्जिदों और दरगाहों द्वारा अतिक्रमण का आरोप लगाते हुए बार-बार जनहित याचिकाएं (पीआईएल) दायर करने पर संगठन को फटकार लगाई और कहा कि वह अदालत के अधिकार क्षेत्र का “दुरुपयोग” कर रहा है.
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह संगठन केवल एक ही प्रकार के धार्मिक ढांचे को निशाना बना रहा है. मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने कहा, “आपको केवल एक ही प्रकार का अतिक्रमण दिखाई देता है? हम इसकी सराहना नहीं करते. आप अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रहे हैं. हर हफ्ते आप शहर में घूमते हैं, कोई धार्मिक ढांचा ढूंढते हैं और जनहित याचिका दायर कर देते हैं.”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि समाज में कई अन्य मुद्दे हैं जो ध्यान देने योग्य हैं. उन्होंने कहा: “क्या आप गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं? क्या आपको समाज में कोई और बुराई नहीं दिखती? जिन्हें साफ पानी नहीं मिल रहा, जो लोग भूखे मर रहे हैं, उनमें से कुछ भी आपको दिखाई नहीं देता? आपको केवल अतिक्रमण दिखता है? कृपया जनहित याचिकाओं का इस तरह दुरुपयोग न करें. ये याचिकाएं हमें विचलित करती हैं.”
बुधवार को कोर्ट के सामने सेव इंडिया फाउंडेशन द्वारा दायर दो जनहित याचिकाएं सूचीबद्ध थीं, जिनमें से एक जामा मस्जिद और मदरसा गिरी नगर से संबंधित थी. याचिकाकर्ता ने दावा किया कि यह ढांचा “हरित और धर्मनिरपेक्ष” सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करके बनाया गया था. मामले की कुछ देर सुनवाई करने के बाद अदालत ने कहा कि वह इस पर 21 जनवरी को फिर से सुनवाई करेगी.
‘बिना एफआईआर पुलिस किसी को भी तलब नहीं कर सकती, न पूछताछ’
मद्रास उच्च न्यायालय ने पत्रकार विमल चिनप्पन को जारी पुलिस नोटिस को रद्द कर दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज किए बिना पुलिस के पास किसी को भी तलब या पूछताछ करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
पुलिस ने पत्रकार को एक लेख के संबंध में नोटिस भेजा था, जिसमें पुलिस पर कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी की गई थी. पुलिस का दावा था कि यह नोटिस 2023 के एक पुराने मामले (एससी/एसटी एक्ट से संबंधित) की जांच से जुड़ा है.
न्यायमूर्ति सुंदर मोहन ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35 पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तार करने की परिस्थितियों के बारे में बताती है, लेकिन यह पुलिस को बिना मामला दर्ज किए किसी को भी पूछताछ के लिए बुलाने का अधिकार नहीं देती. जज ने स्पष्ट किया कि अगर पुलिस किसी से पूछताछ करना चाहती है, तो नोटिस में स्पष्ट रूप से अपराध संख्या का उल्लेख होना चाहिए. इस मामले में चूंकि कोई एफआईआर दर्ज नहीं थी, इसलिए नोटिस अवैध था.
कुकी-ज़ो समूहों ने ‘केंद्र शासित’ प्रदेश की लिखित प्रतिबद्धता मांगी
एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, कुकी-ज़ो विद्रोही समूहों और इस समुदाय के विधायकों ने यह संकल्प लिया है कि वे मणिपुर में एक लोकप्रिय सरकार (निर्वाचित सरकार) के गठन का समर्थन तभी करेंगे, जब उन्हें राज्य और केंद्र दोनों सरकारों द्वारा राज्य के कुकी-ज़ो बहुल क्षेत्रों के लिए एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने की लिखित प्रतिबद्धता दी जाएगी. मंगलवार को गुवाहाटी में हुई एक बैठक में, जिसमें अधिकांश हितधारक शामिल हुए, प्रतिभागियों ने यह भी जोर देकर कहा कि यह समझौता “राज्य की वर्तमान विधानसभा के सामान्य कार्यकाल की समाप्ति से पहले अंतिम रूप दिया जाना चाहिए और इस पर हस्ताक्षर होने चाहिए.” वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल, जो अभी निलंबित अवस्था में है, 2027 में समाप्त होने वाला है.
मनोज आनंद के अनुसार, बैठक के आधिकारिक प्रस्ताव में कहा गया, “नई सरकार को संविधान के तहत विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेश के लिए बातचीत के जरिए राजनीतिक समझौते का समर्थन करने की लिखित प्रतिबद्धता प्रदान करनी होगी. इस प्रतिबद्धता को समयबद्ध तरीके से, विशेष रूप से वर्तमान विधानसभा के कार्यकाल के भीतर ही पूरा किया जाना चाहिए. केंद्र और राज्य दोनों सरकारों से ऐसी राजनीतिक प्रतिबद्धता के अभाव में, यह बैठक मणिपुर में निर्वाचित सरकार के गठन में कोई भी हिस्सा न लेकर जनता की राजनीतिक इच्छा का सम्मान करने का संकल्प लेती है.”
यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब मेइती समुदाय से संबंधित भाजपा विधायकों द्वारा राज्य में “लोकप्रिय सरकार” बनाने के लिए दबाव बढ़ाया जा रहा है, जहां फरवरी 2025 से राष्ट्रपति शासन लागू है. कुकी-ज़ो नेताओं द्वारा अपनाया गया यह रुख कुकी विधायकों के समर्थन से सरकार बहाल करने के भाजपा के प्रयासों के लिए एक बड़े झटके के रूप में उभरा है. भाजपा 60 सदस्यीय विधानसभा में 30 मेइती विधायकों, नगा पीपुल्स फ्रंट के पांच विधायकों और निर्दलीय सदस्यों के समर्थन से सरकार बना सकती है.
क्या ‘बंद गला’ औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक है? रेलवे से इसे हटाने पर छिड़ी बहस
द गार्डियन में हन्ना एलिस-पीटरसन की रिपोर्ट बताती है कि भारत के सबसे विशिष्ट परिधानों में से एक ‘बंदगला’ (जिसे जोधपुरी भी कहा जाता है) अब एक विवाद के केंद्र में है. भारतीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे “औपनिवेशिक मानसिकता” का प्रतीक बताते हुए रेलवे कर्मचारियों की वर्दी से इसे तुरंत हटाने का आदेश दिया है. वैष्णव ने कहा, “हमें औपनिवेशिक मानसिकता के हर निशान को मिटाना होगा, चाहे वह हमारी कार्यशैली में हो या वेशभूषा में.”
हालांकि, इस जैकेट की उत्पत्ति को लेकर ऐतिहासिक तथ्य मंत्री के दावों से अलग कहानी कहते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, 19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश राज के दौरान यह रेलवे की वर्दी का हिस्सा जरूर बना था, लेकिन यह जैकेट औपनिवेशिक अवशेष नहीं है. जोधपुर राजघराने के वंशज और प्रसिद्ध फैशन डिजाइनर राघवेंद्र राठौर ने इसे “भारतीय सिलाई कला की सबसे परिष्कृत अभिव्यक्ति” बताया है.
राठौर का कहना है कि यह जैकेट 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के दरबारों और राजस्थान की रियासतों में विकसित हुई थी. 19वीं सदी तक, जोधपुर शाही परिवार ने इसे घुड़सवारी और पोलो खेलने के लिए अनुकूलित किया था, और बाद में यह पश्चिम में भी लोकप्रिय हुई. राठौर ने जोर देकर कहा कि अंग्रेजों ने इसकी शैली के कुछ तत्वों को जरूर अपनाया, लेकिन “जैकेट की आत्मा हमेशा भारतीय रही”. मोदी सरकार के इस फैसले के बाद अब यह सवाल बना हुआ है कि रेलवे कर्मचारियों के लिए इसकी जगह कौन सी नई वर्दी लाई जाएगी.
मंत्री जी, बंद गला विदेशी नहीं, पूरी तरह से भारतीय
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के संपादकीय में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा रेलवे कर्मचारियों की वर्दी से बंदगला हटाने के फैसले की आलोचना की गई है. संपादकीय का तर्क है कि बंदगला को प्रतिबंधित करना “औपनिवेशिक मानसिकता” पर प्रहार नहीं है, बल्कि यह उस चीज को विदेशी बना देना है जो इतिहास और उपयोग के लिहाज से पूरी तरह भारतीय है.
लेख में सवाल उठाया गया है कि किसी चीज को “भारतीय” क्या बनाता है? भारत जैसे देश में, जहां प्रवासियों, कवियों और इतिहास का संगम है, वहां यह तय करना आसान नहीं है. बंदगला की जड़ें राजस्थान के राजघरानों और मुगल दरबारों में हैं. भले ही ब्रिटिश राज के दौरान इसका स्वरूप थोड़ा बदला हो और इसे रेलवे ने अपनाया हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह औपनिवेशिक हो गया. खुद भारतीय रेलवे और उपन्यास जैसी साहित्यिक विधाएं भी ब्रिटिश काल में ही भारत में आईं, लेकिन आज वे भारतीय जीवन का अभिन्न अंग हैं.
संपादकीय में रुडयार्ड किपलिंग के उपन्यास ‘किम’ का हवाला देते हुए कहा गया है कि रेलवे औपनिवेशिक जड़ों के बावजूद अत्यधिक “भारतीय” है. भारतीयता की खोज उत्पत्ति की शुद्धता में नहीं, बल्कि अनुभव में होनी चाहिए—जैसे तंदूरी मोमोज या गोभी मंचूरियन. औपनिवेशिक काल के कुछ अवशेषों (जैसे अहंकारी राज्य सत्ता या जनता से कटा हुआ अभिजात वर्ग) को छोड़ने की जरूरत है, लेकिन बंदगला जैसे परिधान को हटाना समझदारी नहीं है.
दिल्ली दंगों के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की हिरासत अन्यायपूर्ण है
‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक लेख में, दिल्ली के वकील गौतम भाटिया ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली दंगा साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न दिए जाने के फैसले का विश्लेषण किया है. 5 जनवरी, 2026 को शीर्ष अदालत ने पांच अन्य आरोपियों को जमानत दी, लेकिन खालिद और इमाम की याचिका खारिज कर दी. भाटिया लिखते हैं कि यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भारत की कानूनी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
लेखक का तर्क है कि ये आरोपी बिना किसी ट्रायल के पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं. अदालत का यह तर्क कि इन दोनों ने दंगों की “परिकल्पना” की थी, इसलिए वे दूसरों से अलग हैं, गले नहीं उतरता. इस स्तर पर ये केवल आरोप हैं, और बिना ट्रायल के अनिश्चित काल तक कैद में रखना मानवाधिकारों का हनन है. अदालत ने देरी के लिए आंशिक रूप से आरोपियों को जिम्मेदार ठहराया, जिसे भाटिया ने खारिज करते हुए कहा कि मुकदमे की गति न्यायाधीश तय करते हैं, आरोपी नहीं.
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अदालत ने यूएपीए की धारा 15 की व्याख्या करते हुए “चक्का जाम” (सड़क जाम) को भी संभावित रूप से “आतंकवादी कृत्य” की परिभाषा में शामिल कर लिया है. यह एक खतरनाक मिसाल है जो राज्य को विरोध प्रदर्शनों को दबाने की असीमित शक्ति देता है. लेख में कहा गया है कि अभियोजन पक्ष के पास हिंसा के सीधे सबूतों की कमी है, इसलिए वे “साजिश” के सिद्धांत का सहारा ले रहे हैं. इतिहास गवाह है कि सबूतों के अभाव को छिपाने के लिए अक्सर ‘साजिश’ का इस्तेमाल किया जाता है. भाटिया निष्कर्ष निकालते हैं कि पांच साल बाद भी बिना ट्रायल जेल में रखना स्पष्ट अन्याय है.
एआर रहमान को ‘बॉलीवुड में 8 साल से काम नहीं मिला, शायद सांप्रदायिक एंगल…’
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान ने बॉलीवुड में अपने अनुभव और पिछले कुछ वर्षों में हिंदी फिल्म उद्योग में काम न मिलने को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं. रहमान ने स्वीकार किया कि मणिरत्नम की ट्रिलॉजी (रोजा, बॉम्बे, दिल से..) और ‘रंगीला’ जैसी सुपरहिट फिल्में करने के बावजूद उन्हें हिंदी सिनेमा में एक ‘बाहरी व्यक्ति’ जैसा महसूस होता था. रहमान ने कहा कि पिछले आठ वर्षों में उन्हें हिंदी फिल्मों में काम का नुकसान उठाना पड़ा है और इसके पीछे के कारणों पर भी बात की. बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने आशंका जताई कि शायद उद्योग में उनके खिलाफ “सांप्रदायिक सोच” काम कर रही है या फिर अब सत्ता उन लोगों के हाथ में है जो “रचनात्मक नहीं हैं”.
उन्होंने कहा, “हो सकता है कि यह बात मुझसे छुपाई गई हो, लेकिन मुझे सीधे तौर पर कभी इसका अहसास नहीं हुआ. लेकिन यह ‘चाइनीज व्हिस्पर्स’ (कानों-कान खबर) की तरह मेरे पास आती है कि लोगों ने मुझे बुक तो किया, लेकिन म्यूजिक कंपनी ने अपनी मर्जी चलाकर अपने 5 संगीतकारों को रख लिया. मैं कहता हूं, अच्छा है, मुझे अपने परिवार के साथ बिताने के लिए और समय मिल गया. मैं काम की तलाश में नहीं भागता, मैं चाहता हूं कि काम मेरे पास आए.”
रहमान ने बताया कि 1999 में सुभाष घई की फिल्म ‘ताल’ के बाद ही उन्हें हिंदी सिनेमा में अपनापन महसूस हुआ. घई ने उनसे कहा था कि अगर यहां लंबी पारी खेलनी है तो हिंदी और उर्दू सीखनी होगी. इसके बाद रहमान ने हिंदी, उर्दू और पंजाबी भी सीखी, जिसका परिणाम सुखविंदर सिंह के साथ ‘छैया छैया’ और ‘जय हो’ जैसे गीतों के रूप में सामने आया. उन्होंने एनडीटीवी को यह भी बताया कि जब उन्होंने देखा कि उनकी तमिल फिल्मों के हिंदी डब गानों के अनुवाद का मजाक उड़ाया जा रहा है, तो उन्होंने डब फिल्मों के बजाय सीधे हिंदी फिल्मों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया.
झूठ की राजनीति और नैरेटिव का कारख़ाना
भारत में मिसइन्फ़ॉर्मेशन (भ्रामक जानकारी) अब महज़ सोशल मीडिया की समस्या नहीं रह गई है. यह एक संगठित उद्योग बन चुका है, जिसमें राजनीतिक दलों के आईटी सेल, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म, मेनस्ट्रीम मीडिया और अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तक इस आग को फैलाने में शामिल हैं. हरकारा डीप डाइव की इस बातचीत में ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा बताते हैं कि 2025 में भारत में मिसइन्फ़ॉर्मेशन का पैमाना क्या रहा, इसके सबसे बड़े स्रोत कौन रहे और यह झूठ किस तरह समाज को ध्रुवीकृत करता है.
ऑल्ट न्यूज़ की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि फैलाई गई भ्रामक सूचनाओं में से 61 प्रतिशत सीधे सत्तारूढ़ दल के पक्ष में जाती हैं. इन झूठों का सबसे बड़ा निशाना मुस्लिम समुदाय रहा है, जिसे साल-दर-साल अपराधी, देशद्रोही या दूसरे दर्जे का नागरिक बताने की कोशिश की जाती है.
हर बड़े घटनाक्रमचाहे वह चुनाव हों, किसान आंदोलन, दिल्ली दंगे, कोविड या युद्ध, के साथ एक तय नैरेटिव खड़ा किया जाता है. कभी झूठ सीधे टीवी पर बोला जाता है, कभी सोशल मीडिया पर फैलाया जाता है और फिर मेनस्ट्रीम मीडिया उसे “सोशल मीडिया पर चल रही चर्चा” बताकर वैधता देता है.
इस प्रक्रिया का सबसे खतरनाक पहलू है रेडिकलाइज़ेशन (कट्टरता). आज नफ़रत किसी संगठन की बैठक में नहीं, बल्कि बच्चों के स्टडी टेबल पर पैदा हो रही है. सस्ता डेटा, वीडियो आधारित कंटेंट और कम मीडिया साक्षरता ने एक ऐसी पीढ़ी तैयार की है जो बिना सवाल किए नफ़रत को सच मान लेती है.
2025 में एआई-जनरेटेड फेक कंटेंट ने इस संकट को और गहरा कर दिया है. डीपफेक वीडियो, नकली क्लिप और झूठे बयान अब पहले से कहीं ज़्यादा विश्वसनीय लगते हैं. प्रतीक सिन्हा का कहना है कि इस संकट का समाधान सिर्फ फैक्ट-चेकिंग नहीं है. इंटरनेट के बढ़ते मोनोपोलीकरण को तोड़ना, स्कूल स्तर पर मीडिया लिटरेसी सिखाना और जर्नलिज़्म को एक साझा नागरिक ज़िम्मेदारी के रूप में देखना, ये तीन ज़रूरी कदम हैं. क्योंकि अगर झूठ को सामान्य मान लिया गया, तो सवाल पूछने वाला नागरिक सबसे पहले ख़ामोश होगा और उसके बाद लोकतंत्र.’
क्या ईरान के विरोध प्रदर्शन इस बार अलग हैं? आंतरिक और बाहरी दबावों का अभूतपूर्व मिलन
अल जजीरा की रिपोर्टर वर्जीनिया पिएत्रोमार्ची की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, ईरान में विरोध प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से प्रतिबंधों की मार झेल रहा यह देश कई बार प्रदर्शनों का गवाह बना है. लेकिन, विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान उथल-पुथल अभूतपूर्व है. इसका कारण बढ़ते घरेलू दबाव और अमेरिका की आक्रामक धमकियों का एक खतरनाक मिश्रण है, जिसने ईरानी नेतृत्व के पास बहुत कम विकल्प छोड़े हैं.
28 दिसंबर को तेहरान के ग्रैंड बाज़ार में दुकानदारों द्वारा ईरानी मुद्रा के गिरते मूल्य को लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन देखते ही देखते एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदल गया. ईरानी रियाल (मुद्रा) में रिकॉर्ड गिरावट संकटों की एक लंबी श्रृंखला की ताजा कड़ी थी—जिसमें पानी और बिजली की कमी, बढ़ती बेरोज़गारी और बेतहाशा महंगाई शामिल है. 2018 में अमेरिकी प्रतिबंधों के दोबारा लागू होने ने आम ईरानियों का जीवन कठिन बना दिया था. स्थिति तब और गंभीर हो गई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जून में ईरान के परमाणु केंद्रों पर हवाई हमलों का आदेश दिया और अब वे प्रदर्शनकारियों की “मदद” करने के नाम पर फिर से हमले की धमकी दे रहे हैं.
क्विंसी इंस्टीट्यूट के कार्यकारी उपाध्यक्ष त्रिता पारसी का कहना है, “यह ईरान के लिए बहुत कमज़ोर आर्थिक स्थिति और बदतर भू-राजनीतिक हालात हैं, और सिस्टम के भीतर असहमति स्पष्ट रूप से एक अलग स्तर पर है.”
शुरुआत में सरकार ने कुछ आर्थिक सुधारों, जैसे केंद्रीय बैंक के गवर्नर को बदलना और 7 डॉलर का मासिक नकद हस्तांतरण, के जरिए गुस्से को शांत करने की कोशिश की, लेकिन ये कदम नाकाफी साबित हुए. 8 जनवरी से अधिकारियों ने लगभग पूर्ण संचार ब्लैकआउट लागू कर दिया है. ईरानी अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि झड़पों में 300 लोग मारे गए हैं, जबकि विपक्षी कार्यकर्ताओं का दावा है कि मरने वालों की संख्या 1,000 से अधिक है.
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में आधुनिक मध्य पूर्व राजनीति की प्रोफेसर रॉकसेन फरमानफरमायन के अनुसार, “शासन बहुत अलग-थलग है और आर्थिक समस्याओं को हल करने के लिए उसके पास अधिक विकल्प नहीं हैं, जिससे यह महसूस होता है कि वे एक बंद गली में हैं.” राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने भी प्रदर्शनों की पूर्व संध्या पर अपनी लाचारी जाहिर करते हुए कहा था, “मैं कुछ नहीं कर सकता.”
ईरान केवल आंतरिक ही नहीं, बल्कि बाहरी दबाव का भी सामना कर रहा है. 2023 में शुरू हुए इज़राइल के बहु-मोर्चे वाले क्षेत्रीय युद्धों और इज़राइल के साथ 12-दिन के संघर्ष ने ईरान की रक्षा क्षमताओं को कमज़ोर कर दिया है. सेना, जो आमतौर पर घरेलू मामलों से दूर रहती है, ने सरकार के समर्थन में बयान जारी किया है, जो इस बात का संकेत है कि वे इसे एक अस्तित्वगत खतरे के रूप में देख रहे हैं.
विशेष रूप से, 3 जनवरी को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अपहरण जैसी ट्रम्प की कार्रवाई ने ईरान को चिंतित कर दिया है. जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वली नस्र कहते हैं कि ईरान को डर है कि अमेरिका ‘वेनेजुएला मॉडल’ अपना सकता है—यानी शासन को पूरी तरह खत्म किए बिना नेतृत्व परिवर्तन के लिए लक्षित हमले करना. अरब गल्फ स्टेट्स इंस्टीट्यूट के अली अल्फोनेह का मानना है कि ईरान एक नाजुक मोड़ पर है: या तो वह ट्रम्प के साथ वेनेजुएला जैसी कोई व्यवस्था करे या फिर आर्थिक गिरावट और शासन के पतन का सामना करे.
वैश्विक रैंकिंग में चीनी विश्वविद्यालयों की लंबी छलांग, अमेरिकी संस्थान पिछड़े; हार्वर्ड भी
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, शैक्षणिक प्रकाशन और शोध को मापने वाली एक वैश्विक रैंकिंग में चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को पछाड़कर शीर्ष स्थान हासिल कर लिया है. हाल तक, हार्वर्ड दुनिया का सबसे अधिक उत्पादक शोध विश्वविद्यालय था, लेकिन अब यह तीसरे स्थान पर खिसक गया है. यह गिरावट अमेरिकी शिक्षा जगत के लिए एक चिंताजनक प्रवृत्ति का संकेत है.
टाइम्स हायर एजुकेशन के मुख्य वैश्विक मामलों के अधिकारी फिल बैटी ने कहा, “उच्च शिक्षा और अनुसंधान में वैश्विक प्रभुत्व को लेकर एक बड़ा बदलाव आ रहा है, एक तरह की नई विश्व व्यवस्था बन रही है.” विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बदलाव न केवल अमेरिकी विश्वविद्यालयों के लिए, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए एक समस्या है.
लीडेन रैंकिंग के अनुसार, 2000 के दशक की शुरुआत में शीर्ष 10 में सात अमेरिकी स्कूल थे और हार्वर्ड नंबर 1 पर था. उस समय चीन का केवल एक स्कूल शीर्ष 25 में था. आज, झेजियांग पहले स्थान पर है और शीर्ष 10 में सात चीनी विश्वविद्यालय हैं. हालांकि हार्वर्ड आज दो दशक पहले की तुलना में काफी अधिक शोध का उत्पादन कर रहा है, लेकिन चीनी स्कूलों ने अपनी गति बहुत तेज़ कर दी है. एमआईटी के पूर्व अध्यक्ष राफेल रीफ ने कहा कि चीन से आने वाले शोध पत्रों की संख्या और गुणवत्ता उत्कृष्ट है और वे अमेरिका के काम को बौना साबित कर रहे हैं.
इस उलटफेर के पीछे एक बड़ा कारण ट्रम्प प्रशासन द्वारा अमेरिकी स्कूलों के लिए शोध कार्यों पर राशि आवंटन कटौती करना है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसके विपरीत रुख अपनाया है और तर्क दिया है कि किसी राष्ट्र की वैश्विक शक्ति उसके वैज्ञानिक प्रभुत्व पर निर्भर करती है. चीन अपने विश्वविद्यालयों में अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है.
ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों के लिए अनुसंधान अनुदान में अरबों डॉलर की कटौती करने का लक्ष्य रखा है. इसके अलावा, यात्रा प्रतिबंधों और आव्रजन विरोधी कार्रवाई ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों और शिक्षाविदों को प्रभावित किया है. अगस्त 2025 में अमेरिका आने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या पिछले साल की तुलना में 19 प्रतिशत कम थी. हार्वर्ड और अन्य प्रमुख संस्थानों को संघीय धन में कटौती और वीजा प्रतिबंधों से जूझना पड़ रहा है, जिससे भविष्य में उनकी रैंकिंग और प्रतिष्ठा पर और बुरा असर पड़ सकता है.
हालांकि, प्रतिष्ठा-आधारित रैंकिंग (जैसे टाइम्स हायर एजुकेशन) में अभी भी ऑक्सफोर्ड और अमेरिकी विश्वविद्यालय शीर्ष पर बने हुए हैं, लेकिन वहां भी अमेरिकी संस्थान नीचे खिसक रहे हैं. टोरंटो के शिक्षा सलाहकार एलेक्स अशेर का कहना है कि आज की फंडिंग कटौती का असली असर कुछ सालों बाद की रैंकिंग में दिखाई देगा, क्योंकि शोध और प्रकाशन में समय लगता है.
अपील :
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