16/01/2026: ट्रंंप का दबाव, चाबहार छोड़ा? | बीएमसी पर भाजपा काबिज | बीएलओ ने स्पीकर फ़ोन पर खुदकुशी की धमकी दी | ममता मुसीबत या मास्टरस्ट्रोक | ट्रंप को नोबेल | जर्जर विकास पर श्रवण गर्ग
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
चाबहार से एग्जिट: ट्रंप के प्रतिबंधों के डर से भारत ने ईरान का चाबहार पोर्ट छोड़ा, 120 मिलियन डॉलर चुकाए.
शाहरुख पर विवाद: यूपी के मंत्री की मांग- ‘शाहरुख खान को फांसी दो’, बताया देशद्रोही.
चुनाव नतीजे: मुंबई बीएमसी में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन उद्धव ठाकरे ने बचाई अपनी विरासत.
वोट काटने का दबाव: राजस्थान में बीएलओ का वीडियो वायरल- ‘मुस्लिम वोट काटने का प्रेशर है, जान दे दूंगा’.
गौरी लंकेश केस: पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या का आरोपी महाराष्ट्र में चुनाव जीता.
स्मार्ट सिटी फेल: इंदौर और गांधीनगर में दूषित पानी से मौतें और बीमारी, विकास मॉडल पर सवाल.
बुलडोज़र राज: भारत और इज़राइल में बुलडोज़र एक्शन की तुलना, रिपोर्ट में इसे ‘सामूहिक सजा’ बताया.
ट्रंप के दबाव में भारत ने चाबहार पोर्ट छोड़ा प्रतिबंधों से पहले पूरा पैसा चुकाया
इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक़ भारत ने ईरान के चाबहार पोर्ट से अपना कंट्रोल छोड़ दिया है. अपनी रिपोर्ट में इकनोमिक टाइम्स ने बताया है कि भारत अब चाबहार पोर्ट से पूरी तरह बाहर निकलने की स्थिति में है. भारत पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल), जो इस परियोजना को चला रही थी, उसके सरकारी निदेशकों ने इस्तीफा दे दिया है.
इसकी वजह अमेरिकी प्रतिबंध का ख़ौफ़ बताया जा रहा है. भारत पिछले एक दशक से ईरान के चाबहार पोर्ट को विकसित करने में शामिल रहा है. यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम था क्योंकि इससे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक समुद्री-स्थलीय रास्ता मिलता है. मार्च 2014 में भारत ने चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को 10 साल तक चलाने का समझौता किया था.
12 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया कि जो भी देश ईरान के साथ कारोबार करेगा, उस पर अमेरिका में होने वाले सभी व्यापार पर 25% टैरिफ लगाया जाएगा. इसके बाद भारत की चाबहार में मौजूदगी लगभग खत्म हो गई है.
अब इस ऐलान के बाद भारत पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड की वेबसाइट भी बंद कर दी गई है, ताकि किसी पर अमेरिकी प्रतिबंध न लगें. भारत के वहां कोई भौतिक संपत्ति नहीं है और संचालन ईरानी कर्मचारियों के ज़रिये हो रहा था.
भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए अपनी पूरी वित्तीय ज़िम्मेदारी पहले ही पूरी कर दी थी. सरकार के एक सूत्र के मुताबिक, अमेरिका द्वारा सितंबर 2025 में दोबारा प्रतिबंध लगाए जाने से पहले भारत ने करीब 12 करोड़ डॉलर (120 मिलियन डॉलर) ईरान को ट्रांसफर कर दिए थे.
कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी के सरकार की इस क़दम की निंदा की है. ट्विटर पर कांग्रेस ने लिखा कि ट्रंप के दबाव में नरेंद्र मोदी ने ईरान के चाबहार पोर्ट से अपना कंट्रोल छोड़ दिया है.चुपके से वेबसाइट भी बंद करवा दी. इस बेहद महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में मोदी सरकार ने देश की जनता के 120 मिलियन डॉलर लगाए थे और अब ये सब स्वाहा हैं. जब चाबहार पोर्ट का एग्रीमेंट हुआ था तो नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इकोनॉमी से जुड़ा बहुत बड़ा काम हुआ है। ये मेरी बहुत बड़ी सफलता है. अब जब चाबहार पोर्ट का कंट्रोल छोड़ दिया है तो इसपर कुछ नहीं बोल रहे हैं.
अमेरिकी छूट, लेकिन सीमित: अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के अधीन ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (ओएफएसी) ने भारत को छह महीने की अस्थायी छूट दी है. यह छूट 29 अक्टूबर 2025 से लागू हुई और 26 अप्रैल तक वैध है. यह छूट सिर्फ इसलिए दी गई क्योंकि भारत ने यह साफ कर दिया कि वह चाबहार पोर्ट से जुड़ी सभी गतिविधियां धीरे-धीरे बंद कर रहा है.
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत को पहले से अंदेशा था कि अमेरिका फिर से प्रतिबंध लगाएगा. ऐसे में बाद में पैसा भेजना मुश्किल हो जाता. इसलिए प्रतिबंधों से पहले ही पूरा पैसा ईरान को ट्रांसफर कर दिया गया. अब भारत की कोई वित्तीय देनदारी बाक़ी नहीं है.
ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित चाबहार पोर्ट भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच देता था. यह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) का भी अहम हिस्सा है, जो भारत को रूस, मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ता है. लेकिन मौजूदा हालात में यह रणनीतिक सपना ठहरता दिख रहा है.
महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनाव
बीएमसी के फैसले में दो सबक: भाजपा जीती, लेकिन अकेले नहीं; और उद्धव के पास ही बालासाहेब की विरासत
भाजपा का लंबे समय से बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) पर कब्जा करने का सपना था. उसने अपना लक्ष्य पूरा करने में कामयाबी हासिल की है और उद्धव ठाकरे की शिव सेना (यूबीटी) को बीएमसी की सत्ता से बेदखल कर दिया है, लेकिन वह अपने दम पर बहुमत का सपना पूरा नहीं कर सकी. पुणे, पिंपरी-चिंचवाड़, नासिक और नागपुर के नगर निगमों के विपरीत, मुंबई के मतदाताओं ने भाजपा को एक सीमित जनादेश दिया है. बीएमसी के प्रतिष्ठित पदों को सुरक्षित करने के लिए उसे शिंदे सेना के साथ समन्वय में काम करने की आवश्यकता है. इस प्रकार, एकनाथ शिंदे ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भाजपा उनकी पार्टी को हाशिए पर नहीं धकेल सकती.
दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे ने एकनाथ शिंदे पर एक राजनीतिक बढ़त हासिल की है क्योंकि बीएमसी में यूबीटी ने शिंदे सेना की तुलना में अधिक सीटें जीती हैं. इस प्रकार, 1997 के बाद बीएमसी चुनाव में अपनी पहली हार के बावजूद, शिवसेना (यूबीटी) ने खुद को शहर में बाल ठाकरे की विरासत के असली उत्तराधिकारी के रूप में साबित किया है. अविभाजित शिवसेना के दो अन्य गढ़ों—ठाणे और छत्रपति संभाजी नगर (तत्कालीन औरंगाबाद)—के विपरीत, उद्धव मुंबई में शिवसेना के निर्विवाद नेता के रूप में उभरे हैं. शिंदे ने ठाणे और छत्रपति संभाजी नगर में यूबीटी को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है.
कुल मिलाकर, राज्य के 29 नगर निगमों के चुनाव परिणाम नवंबर 2024 में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों के अनुरूप ही हैं. हालांकि, मुंबई में ठाकरे भाइयों (उद्धव और राज) के गठबंधन ने यूबीटी को बचा लिया. जहां महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) खुद बीएमसी में कोई प्रभावशाली बढ़त दर्ज करने में विफल रही, वहीं कार्यकर्ताओं के बीच जमीनी स्तर के गठबंधन ने एक जबरदस्त चुनावी मुकाबले का माहौल बनाने में मदद की.
“द इंडियन एक्सप्रेस” में परिमल माया सुधाकर ने लिखा है कि शिवसेना की ‘मराठी मानुस’ की मूल राजनीति अभी भी मुंबई की आबादी के एक बड़े हिस्से में गूंजती है. वास्तव में, 1980 के दशक के उत्तरार्ध के बाद यह पहली बार है जब ठाकरे की सेना ने पूरी तरह से ‘मराठी अस्मिता’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ा है. जब 1986 में भाजपा के प्रमोद महाजन ने बाल ठाकरे के साथ गठबंधन किया था, तब ठाकरे हिंदुत्व की राजनीति का प्रतीक बन गए थे. 1990 के दशक में शिवसेना मराठी लोगों के लिए नौकरियों और आवास के मुद्दे पर चुप हो गई थी, जिससे मनसे (एमएनएस) के उदय के लिए जगह बनी. अब, यूबीटी और मनसे ने मिलकर मुंबई में मराठी वोट बैंक को फिर से जीवित कर दिया है.
मुंबई में महाराष्ट्रियों के साथ ‘दोयम दर्जे के व्यवहार’ और राज्य में मराठी भाषा के मुद्दों पर चल रहे निरंतर अभियानों के बावजूद, भाजपा ने रणनीतिक रूप से अपने राजनीतिक प्रभाव का प्रबंधन किया. उसने आलोचनाओं का समाधान किया और चिंताओं को समायोजित किया, विशेष रूप से प्राथमिक स्कूलों में हिंदी थोपने के मुद्दे पर. इससे मराठी वोटों का पूर्ण ध्रुवीकरण रुक गया.
दूसरा, अन्य नगर निगमों के विपरीत, मुंबई में भाजपा ने शिंदे के प्रति एक उदार रवैया अपनाया. चूंकि शिंदे की पार्टी के पास शिवसेना का मूल चुनाव चिन्ह है, इसलिए भाजपा के लिए उन्हें साथ रखना महत्वपूर्ण था. अन्य शहरों में दोनों पार्टियां सीट-बंटवारे के समझौते तक पहुंचने में भी विफल रहीं. तीसरा, भाजपा ने चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री को मुंबई आमंत्रित करने के लालच से परहेज किया, यहां तक कि तब भी जब उद्धव ने नरेंद्र मोदी को उनके खिलाफ प्रचार करने की चुनौती दी थी. यदि प्रधानमंत्री आते, तो इससे मराठी-गुजराती विभाजन और गहरा होता और भाजपा के खिलाफ अल्पसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण भी तेज होता.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुंबई और आसपास के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास की भाजपा की केंद्रीय राजनीतिक अपील ने इसे यूबीटी-मनसे गठबंधन पर बढ़त दिलाई. इसी अपील के दम पर, नागपुर के एक व्यक्ति—देवेंद्र फडणवीस—ने मुंबई की राजनीति के दिग्गजों, ठाकरे भाइयों को मात दे दी है.
महाराष्ट्र में नगर निकाय चुनावों में महायुति की बड़ी जीत: मुंबई में शिवसेना का दबदबा खत्म, पुणे में भी परचम लहराया
लगभग तीन दशकों से चले आ रहे शिवसेना के वर्चस्व को तोड़ते हुए, भाजपा बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. इसके साथ ही भाजपा ने पुणे में भी निर्णायक जीत हासिल की, जहां उसने शरद पवार और अजीत पवार के नेतृत्व वाले एनसीपी गुटों के गठबंधन को पीछे छोड़ दिया.
भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन 227 सदस्यीय बीएमसी में 114 सीटों के बहुमत के आंकड़े को पार करने के लिए तैयार है. बीएमसी भारत का सबसे अमीर नागरिक निकाय है, जिसका 2025-26 का बजट भारी-भरकम 74,427 करोड़ रुपये है.
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दक्षिण मुंबई में उत्साहित पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मुंबई सहित उन 29 नगर निगमों में से 25 में भाजपा नीत महायुति गठबंधन सत्ता में आने वाला है, जहां 15 जनवरी को मतदान हुआ था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, “धन्यवाद महाराष्ट्र! राज्य के गतिशील लोगों ने एनडीए के जन-समर्थक सुशासन के एजेंडे को आशीर्वाद दिया है.”
गौरी लंकेश की हत्या का आरोपी महाराष्ट्र निकाय चुनाव जीता
“द हिंदू” की रिपोर्ट के मुताबिक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश की 2017 में हुई हत्या के आरोपी श्रीकांत पंगारकर ने शुक्रवार (16 जनवरी, 2026) को महाराष्ट्र के जालना नगर निगम चुनाव में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार जीत हासिल की है. पंगारकर ने चुनावी वार्ड नंबर 13 से चुनाव लड़ा और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, भाजपा के रावसाहेब ढोबले को हराया. एक चुनाव अधिकारी के अनुसार, पंगारकर को 2,661 वोट मिले, जबकि ढोबले को 2,477 वोट मिले.
रिपोर्ट बताती है कि शिवसेना को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने पंगारकर के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे थे. गौरी लंकेश की 5 सितंबर, 2017 को बेंगलुरु में उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जिससे देशभर में आक्रोश फैल गया था. अगस्त 2018 में महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) ने पंगारकर को विस्फोटक अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया था. कर्नाटक उच्च न्यायालय ने श्रीकांत को 4 सितंबर, 2024 को जमानत दी थी.
गौर करने वाली बात यह है कि पंगारकर 2001 से 2006 तक अविभाजित शिवसेना के सदस्य के रूप में जालना नगर परिषद के सदस्य रह चुके हैं. 2011 में टिकट न मिलने पर वे दक्षिणपंथी संगठन ‘हिंदू जनजागृति समिति’ में शामिल हो गए थे. हालांकि पंगारकर ने भाजपा उम्मीदवार को हराया है, लेकिन रुझानों के मुताबिक भाजपा जालना नगर निगम पर नियंत्रण हासिल करने की ओर बढ़ रही है.
राजस्थान में मुस्लिम वोट हटाने का दबाव, बीएलओ ने कहा- मैं अपनी जान दे दूंगा
राजस्थान में एक बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) पर मुसलमान वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाने का जब ज्यादा दबाव पड़ा तो उन्होंने कहा कि “मैं कलेक्टर कार्यालय जाऊंगा और वहां अपनी जान दे दूंगा.” सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में बीएलओ कीर्ति कुमार को फोन पर यह चिल्लाते हुए सुना जा सकता है.
जयपुर के हवा महल विधानसभा क्षेत्र में बीएलओ कुमार का कहना है कि उन्हें धमकाया जा रहा है और उनकी क्षमता से अधिक काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. मामला भाजपा की उन आपत्तियों से जुड़ा है, जिनमें मतदाता सूची के मसौदे से 470 मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई है—जो उनके बूथ के कुल मतदाताओं का लगभग 40 प्रतिशत है. उन्होंने आरोप लगाया कि इन अनुरोधों में मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाया गया है, जबकि वह पहले ही इन सभी मतदाताओं का सत्यापन कर चुके थे.
गौरतलब है कि हवा महल एक मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र है, जहां भाजपा विधायक बालमुकुंद आचार्य—जिन्हें स्थानीय स्तर पर “महाराज” कहा जाता है—ने 2023 के विधानसभा चुनाव में महज 974 वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी. जयपुर के दक्षिणमुखी बालाजी मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य, मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने वाले अपने बयानों और कार्यों के कारण बार-बार विवादों में रहे हैं.
सुमेधा मित्तल की रिपोर्ट कहती है कि राजस्थान में काम के दबाव और ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) के तरीके (ऐप की खराबी से लेकर अपर्याप्त प्रशिक्षण तक) को लेकर लगे आरोपों के बीच अब तक कम से कम तीन बीएलओ की मौत हो चुकी है.
‘शायद मुझे पूरी बस्ती के नाम हटा देने चाहिए’
सोशल मीडिया पर मौजूद क्लिप में कुमार को भाजपा पार्षद सुरेश सैनी से फोन पर यह कहते सुना जा सकता है: “शायद मुझे पूरी बस्ती के मतदाताओं को हटा देना चाहिए, इससे आपको और महाराज को चुनाव आसानी से जीतने में मदद मिलेगी.” एक सरकारी स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने वाले कुमार ने कहा कि ‘एसआईआर’ के काम के बोझ के कारण उनके छात्रों की पढ़ाई पहले ही प्रभावित हो चुकी है. और अब उन्हें “वरिष्ठ चुनाव अधिकारियों” द्वारा इन 470 फॉर्मों को “दो दिनों के भीतर” संसाधित करने के लिए कहा गया है—ऐसा काम जिसमें उनके अनुसार कम से कम 78 घंटे लगेंगे, क्योंकि प्रत्येक फॉर्म को डिजिटल करने में 10 मिनट का समय लगता है. उन्होंने कहा, “यह पूरी प्रक्रिया को फिर से दोहराने जैसा है.”
उन्होंने आगे कहा, “और फिर मुझे इन मतदाताओं के सत्यापन के लिए दोबारा जमीन पर उतरना होगा. हम पहले ही एसआईआर में बहुत परेशान हो चुके हैं... भाजपा नेता हमें निलंबित कराने की धमकी दे रहे हैं. मैं उनकी राजनीति अच्छी तरह जानता हूँ. मैंने अपने वरिष्ठों को सूचित कर दिया है कि मैं यह नहीं कर सकता.”
कम से कम पाँच पड़ोसी बूथों के बीएलओ, जहां अधिकांश मतदाता हिंदू हैं, ने कहा कि उन्हें कोई आपत्ति प्राप्त नहीं हुई है. इसी क्षेत्र के एक अन्य बूथ की बीएलओ सरस्वती मीणा ने दावा किया कि उन्हें 158 मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां मिलीं. उन्होंने कहा, “ये सभी भाजपा एजेंटों द्वारा मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ दायर की गई हैं. जबकि वे सभी मतदाता वहीं रहते हैं. हमने एसआईआर में उनका सत्यापन किया है. यह गलत है. हम पर इस तरह दबाव नहीं बनाया जा सकता.”
हवा महल में कुल 264 बूथ हैं. राजस्थान में जल्द ही निकाय चुनाव होने की उम्मीद है, राज्य सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया है कि शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव इस साल अप्रैल तक पूरे कर लिए जाएंगे.
इस बीच भाजपा पार्षद सुरेश सैनी ने “न्यूज़लॉन्ड्री” को बताया कि पार्टी के बूथ लेवल एजेंट ने 8 और 9 जनवरी को कुमार के बूथ पर 467 मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दर्ज की थीं, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम मतदाता थे. सैनी ने कहा, “मेरा मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ कोई एजेंडा नहीं है. लेकिन मुझे 100 प्रतिशत यकीन है कि ये मतदाता यहां नहीं रहते हैं. हम और अधिक मतदाताओं के खिलाफ आपत्ति दर्ज करना चाहते हैं, इसलिए समय सीमा बढ़ाने का अनुरोध करेंगे.”
चुनाव आयोग के 2023 के चुनावी रोल मैनुअल के अनुसार, एक बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) को दावा और आपत्ति अवधि के दौरान एक दिन में 10 से अधिक आपत्तियां दर्ज करने की अनुमति नहीं है. यदि पूरी पुनरीक्षण अवधि के दौरान 30 से अधिक आपत्तियां दर्ज की जाती हैं, तो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ईआरओ) या सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (एईआरओ) को व्यक्तिगत रूप से मामले की दोबारा पुष्टि करनी होगी.
जब इस नियम के बारे में पूछा गया, तो सैनी ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी. कुमार के बूथ के लिए भाजपा के बीएलए विशाल सैनी ने दावा किया कि उन्होंने 8 और 9 जनवरी को दो दिनों में “कम से कम 200 मतदाताओं” के खिलाफ आपत्तियां दर्ज की थीं. यह पूछे जाने पर कि उन्होंने इतने सारे मतदाताओं पर आपत्ति क्यों जताई, जबकि बीएलओ ने हाल ही में एसआईआर में 124 मतदाताओं को हटाकर सूची साफ की थी, उन्होंने अपने “ग्राउंड वेरिफिकेशन” का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि “दूसरी बस्ती के मतदाता एसआईआर के दौरान इस बूथ पर आ गए थे, लेकिन वे वास्तव में यहां नहीं रहते हैं.” उन्होंने यह भी जोड़ा, “चूंकि कॉलोनी में ज्यादातर मुस्लिम मतदाता हैं, इसलिए यह स्वाभाविक है कि अधिकांश आपत्तियां मुस्लिमों के खिलाफ होंगी.”
नड्डा के उत्तराधिकारी की घोषणा 20 जनवरी को, भाजपा ने चुनाव कार्यक्रम जारी किया
भारतीय जनता पार्टी ने शुक्रवार को अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा कर दी है.
जतिन आनंद के मुताबिक, यह प्रक्रिया वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के छह साल के कार्यकाल को ध्यान में रखकर पूरी की जा रही है. उनके उत्तराधिकारी की घोषणा 20 जनवरी को निर्धारित की गई है—यह वही तारीख है जब नड्डा ने 2020 में आधिकारिक तौर पर यह पद संभाला था.
भाजपा सांसद और राष्ट्रीय चुनाव अधिकारी के. लक्ष्मण ने नामांकन प्रक्रिया की शुरुआत करते हुए बताया कि इस पद के लिए नामांकन सोमवार सुबह से स्वीकार किए जाएंगे. इसके बाद 19 जनवरी को संभावित उम्मीदवारों के नामांकनों की समीक्षा की जाएगी. यदि आवश्यक हुआ, तो आंतरिक मतदान के बाद परिणामों की घोषणा की जाएगी.
संकेत है कि यह समय-सीमा इसलिए तय की गई है क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और बिहार के पूर्व मंत्री, 45 वर्षीय नितिन नबीन के राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्णय के आधार पर इस पद के लिए एकमात्र उम्मीदवार होने की उम्मीद है. यदि वे चुने जाते हैं, तो वह इस पद को संभालने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति होंगे.
अल-फलाह यूनिवर्सिटी; ईडी ने 140 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क की
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शुक्रवार को कहा कि उसने हरियाणा स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी की लगभग 140 करोड़ रुपये की जमीन और इमारतों को कुर्क कर लिया है. यह संस्थान 10 नवंबर 2025 को लाल किला क्षेत्र में हुए विस्फोट के बाद सुरक्षा एजेंसियों की रडार पर आया था. इसके साथ ही ईडी ने अल-फलाह ग्रुप के चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी और उनके चैरिटेबल ट्रस्ट के खिलाफ आरोप पत्र (चार्जशीट) भी दाखिल किया है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, फरीदाबाद के धौज इलाके में स्थित इस विश्वविद्यालय की 54 एकड़ जमीन, विभिन्न स्कूलों और विभागों की इमारतों के साथ-साथ छात्र छात्रावासों को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत जारी एक अंतरिम आदेश के हिस्से के रूप में कुर्क किया गया है.
अब सलमान की जगह शाहरुख को फांसी पर लटका हुआ देखना चाहता है यूपी का मंत्री
उत्तरप्रदेश में राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त ठाकुर रघुराज सिंह ने अब अपनी सफाई में कहा है कि “मैं सलमान खान के बारे में नहीं, बल्कि शाहरुख खान के बारे में बात कर रहा हूं. सलमान इस मामले में एक संजीदा व्यक्ति हैं; वे शाहरुख खान की तरह कभी भी मुसलमानों का समर्थन नहीं करते. शाहरुख खान खुले तौर पर केवल मुसलमानों का समर्थन करता है. वह किसी अन्य धर्म को धर्म के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, केवल अपने मुस्लिम धर्म को ही धर्म मानता है. उसने हमारी जितनी हिंदू लड़कियां बिगाड़ी हैं कि ऐसे व्यक्ति को तो फांसी ही होना चाहिए. और अगर कभी मौका मिला तो उसको जेल के कटघरे में खड़ा कर दूंगा.”
बता दें इसके पहले सिंह ने अलीगढ़ प्रवास के दौरान सलमान खान को देशद्रोही बताते हुए फांसी देने की मांग की थी. उन्होंने कहा था कि सलमान खान को पाकिस्तान से ज्यादा प्यार है. वह पाकिस्तान चला जाए. क्योंकि हिंदुस्तान के हिंदुओं को अपना नैन-मटक्का दिखाकर पैसा कमाता है और सपोर्ट पाकिस्तान को करता है. बांग्लादेश को सपोर्ट करता है. केवल मुसलमानों को सपोर्ट करता है और हिंदुओं से कमाता है. ‘एबीपी न्यूज़’ के मुताबिक, सिंह ने कहा “इसकी फिल्म कभी नहीं देखना चाहिए. ये बेईमान, चोर, डकैत और बदमाश है.”
बता दें कि ठाकुर रघुराज सिंह पहले भी कई विवादित बयान दे चुके हैं. बल्कि वे ऐसे ही विवादास्पद बयानों के लिए पहचाने जाते हैं. मसलन पिछले साल होली के मौके पर उन्होंने मुसलमानों के लिए कहा था कि “तिरपाल का हिजाब पहनकर निकलें. सफेद टोपी वालों को रंग का डर तो घर में नमाज पढ़ें.”
बहरहाल, पहले सलमान और अब शाहरुख के बारे में विवादित बयान देने के कारण सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना की जा रही है, तंज़ कसे जा रहे हैं और नाराजगी जाहिर की जा रही है. लेकिन, आश्चर्य इस बात का है कि विवादित टिप्पणियों के बावजूद सिंह का पद कायम रहता है और उन्हें कोई समझाइश भी नहीं दी जाती. रोशन राय नामक एक यूज़र ने ‘एक्स’ पर लिखा- “शाहरुख खान उन सबसे देशभक्त भारतीयों में से एक हैं, जिन्होंने जहां भी कदम रखे भारत का गौरव बढ़ाया है; दुनिया के कई देशों में भारत को ‘शाहरुख खान की धरती’ के रूप में जाना जाता है. यह मंत्री उन्हें सिर्फ इसलिए फांसी पर लटकाना चाहता है, क्योंकि वह एक मुस्लिम हैं. ‘नया भारत’ हर दिन अधिक खुलेआम और जहरीला होता जा रहा है. इस मंत्री का कुछ नहीं बिगड़ेगा, बल्कि उसका महिमामंडन किया जाएगा, जबकि शाहरुख खान को मोदी के पक्ष में ‘टूलकिट’ वाली प्रशंसा करने के लिए मजबूर किया जाएगा.”
ममता का मास्टरस्ट्रोक: ईडी को कुछ नहीं मिला, टीएमसी ने छापे को सियासी जीत में बदला
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने हाल ही में पुष्टि की है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ‘आई-पैक’ के कार्यालयों से खाली हाथ लौटा था और उसने कुछ भी जब्त नहीं किया. तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इस कानूनी तथ्य को एक बड़ी राजनीतिक जीत में बदल दिया है. कागजों पर भले ही अदालत ने एक फाइल बंद कर दी हो, लेकिन बंगाल की सड़कों पर ममता बनर्जी की छवि एक ऐसे “स्ट्रीट फाइटर” की बन गई है, जिसने केंद्र सरकार की “ताकत” को अपनी दहलीज पर रोक दिया.
लेखक का तर्क है कि टीएमसी के लिए यह मुद्दा सर्च वारंट की वैधता का नहीं, बल्कि ‘ऑप्टिक्स’ (धारणा) का था. अदालत का दरवाजा खटखटाकर पार्टी ने जनता को दो संदेश दिए: पहला, उनके पास ऐसे राजनीतिक रहस्य हैं जिन्हें भाजपा चुराना चाहती है, और दूसरा, वे उन्हें रोकने के लिए पर्याप्त साहसी हैं. जब ईडी ने अदालत में स्वीकार किया कि उसने कुछ भी जब्त नहीं किया, तो धारणा यह बनी कि “कुछ भी दिया नहीं गया.” यह ममता बनर्जी की उस छवि को और मजबूत करता है, जो न्याय के लिए अदालत का इंतजार नहीं करतीं, बल्कि मौके पर ही लड़ती हैं.
विश्लेषण में बताया गया है कि टीएमसी ने इसमें ‘जेंडर डायनेमिक्स’ (लैंगिक समीकरण) का भी बखूबी इस्तेमाल किया. बंगाल में भाजपा को अक्सर एक आक्रामक, पौरुषवादी शक्ति के रूप में चित्रित किया जाता है, जो केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग करती है. इसके विपरीत, ममता को घर (राज्य) की रक्षा करने वाली अकेली महिला के रूप में पेश किया गया. हर बार जब कोई एजेंसी खाली हाथ लौटती है, तो यह धारणा मजबूत होती है कि यह “दादागिरी” ममता बनर्जी, जिन्हें ‘अग्निकन्या’ कहा जाता है, को हराने में असमर्थ है. अंततः ‘धारणा की राजनीति’ में यह मायने नहीं रखता कि पंचनामे में क्या लिखा है, बल्कि यह मायने रखता है कि धूल जमने के बाद कौन अधिक शक्तिशाली दिखाई दिया. और इस मामले में, वह ममता बनर्जी ही थीं.
डबल इंजन सरकार के “विकास मॉडल” पर इंदौर से गांधीनगर तक उठते सवाल
पिछले एक दशक से देश में “गुजरात मॉडल”, “स्मार्ट सिटी” और “डबल इंजन सरकार” को विकास की गारंटी के तौर पर पेश किया जाता रहा है. दावा किया गया कि शहर साफ़ होंगे, हर घर नल से पानी पहुँचेगा, बुनियादी सुविधाएँ मज़बूत होंगी और भारत एक “विकसित राष्ट्र” की ओर बढ़ेगा. लेकिन हरकारा डीप डाइव के आज के एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ हुई बातचीत में इन दावों की ज़मीनी सच्चाई पर गंभीर सवाल खड़े किए गए.
इंदौर, जिसे 2017 से लगातार देश का “सबसे साफ़ शहर” घोषित किया जाता रहा है, वहां हाल ही में दूषित पेयजल से लोगों की मौत और बड़े पैमाने पर बीमारी सामने आई. शहर की भागीरथपुरा कॉलोनी में पीने के पानी में मलमूत्र की मिलावट के कारण कम से कम 23 लोगों की मौत की खबरें आईं, जबकि 3500 से अधिक लोग अस्पताल पहुँचे. कई मरीज़ों की हालत गंभीर बताई गई, कुछ को वेंटिलेटर पर रखा गया. यह वही शहर है जिसे स्वच्छता, स्मार्ट सिटी और शहरी विकास का राष्ट्रीय रोल मॉडल बताया जाता रहा है.
इसी तरह का संकट गुजरात की राजधानी गांधीनगर में भी सामने आया, जहाँ दूषित पानी के कारण टाइफाइड फैलने और सैकड़ों लोगों के बीमार पड़ने की खबरें आईं. गांधीनगर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र का प्रतीक है. सवाल यह उठा कि अगर “विकास मॉडल” की प्रयोगशाला में ही बुनियादी सुविधा फेल हो रही है, तो पूरे राज्य और देश की स्थिति क्या होगी?
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2024 में गुजरात के 50 प्रतिशत से भी कम घरों को नल के ज़रिये गुणवत्तापूर्ण पानी मिल पाया. इसके बावजूद गुजरात को लगातार विकास का आदर्श बताया जाता रहा.
बातचीत में बताया गया कि इंदौर में चमचमाती सड़कों, ब्रिज, मेट्रो और एयरपोर्ट विस्तार के पीछे ज़मीन के नीचे की हक़ीक़त बेहद जर्जर है. नगर निगम की रिपोर्ट के मुताबिक़ शहर की लगभग 3500 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन में से क़रीब 650 किलोमीटर पूरी तरह सड़ चुकी है. क्रॉस कनेक्शन, लीकेज और तकनीकी खामियाँ आम हैं.
30–40 लाख की आबादी वाले शहर के लिए जहां 35 इंजीनियरों की ज़रूरत बताई जाती है, वहां केवल चार इंजीनियर तैनात हैं. पानी की जांच के लिए प्रयोगशालाएं या तो हैं ही नहीं या आंशिक रूप से काम कर रही हैं.
हरकारा डीप डाइव में यह भी सामने आया कि इस पूरे संकट पर जवाबदेही तय करने की बजाय सवाल पूछने वालों को निशाने पर लिया जाता है. इंदौर की स्वच्छता रैंकिंग पर सवाल उठाने पर सार्वजनिक विरोध, एफआईआर और धमकियों तक की बात हुई.
मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठे. कई गंभीर रिपोर्टें राष्ट्रीय अखबारों में छपीं, लेकिन स्थानीय स्तर पर या तो उन्हें जगह नहीं मिली या नज़रअंदाज़ कर दिया गया. जो पत्रकार सवाल पूछने की कोशिश करते हैं, उन्हें सत्ता के प्रतिनिधियों की नाराज़गी झेलनी पड़ती है.
बातचीत सिर्फ शहरी अव्यवस्था तक सीमित नहीं रही. भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर भी आंकड़ों के ज़रिये सवाल उठाए गए जैसे बढ़ता व्यापार घाटा, बढ़ता क़र्ज़ और घटते निर्यात. तुलना की गई कि जहां दूसरे देश अपनी अर्थव्यवस्था, रोज़गार और उत्पादन क्षमता पर फोकस कर रहे हैं, वहीं भारत में विकास का विमर्श ज़्यादातर प्रचार और इवेंट मैनेजमेंट तक सिमट गया है.
श्रवण गर्ग ने कहा कि इंदौर या गांधीनगर को अलग-थलग घटनाओं की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. ये शहर पूरे देश के उस विकास मॉडल का रूपक हैं, जिसमें ऊपर से चमक दिखाई जाती है, लेकिन अंदर की बुनियाद सड़ती जा रही है.अगर सबसे साफ शहर और सबसे शक्तिशाली राजनीतिक केंद्रों में हालात ऐसे हैं, तो इससे बाकी देश की तस्वीर समझी जा सकती है.
जले हुए नोट; जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, संसदीय जांच को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
“द न्यू इंडियन एक्सप्रेस” की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह फैसला सुनाया. जस्टिस वर्मा ने दलील दी थी कि जज जांच अधिनियम, 1968 का पालन नहीं किया गया और उन्हें हटाने का प्रस्ताव दोनों सदनों द्वारा एक ही दिन पारित नहीं किया गया था.
जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में कहा था कि उनके निष्कासन का प्रस्ताव दोनों सदनों में लाया जाना चाहिए था और तीन सदस्यीय समिति का गठन लोकसभा और राज्यसभा द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए था, न कि केवल लोकसभा अध्यक्ष द्वारा एकतरफा. हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संसद के दोनों सदनों का प्रतिनिधित्व करते हुए इन तर्कों का विरोध किया.
इससे पहले, तीन सदस्यीय जांच पैनल ने 55 से अधिक गवाहों की जांच के बाद जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास (30 तुगलक क्रिसेंट) पर जले हुए और बिना जले नकदी के ढेर पाए थे. अपनी 64 पृष्ठों की रिपोर्ट में समिति ने उन्हें कदाचार का दोषी ठहराया और उन्हें हटाने की सिफारिश की. रिपोर्ट में कहा गया है कि जस्टिस वर्मा का यह बयान “अविश्वसनीय” है कि उन्हें अपने घर के स्टोररूम में पड़ी नकदी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. समिति ने सवाल उठाया कि “अगर कोई साजिश थी, तो उन्होंने शिकायत क्यों दर्ज नहीं कराई?” जस्टिस वर्मा ने खुद को निर्दोष बताते हुए किसी भी गलत काम से इनकार किया है.
भारत की ऊन अर्थव्यवस्था: पहले उदारीकरण ने तोड़ा, अब विदेशी टैरिफ की दोहरी चोट
“स्क्रॉल डॉट इन” के लिए अनिरुद्ध सेठ की रिपोर्ट भारत की ऊन अर्थव्यवस्था की बदहाली और वैश्विक व्यापार नीतियों की विडंबना को उजागर करती है. 1991 के आर्थिक उदारीकरण ने भारत के ऊन क्षेत्र को तबाह कर दिया था, जब आयात शुल्क (टैरिफ) घटा दिए गए थे. इससे सस्ते और महीन विदेशी ऊन की बाढ़ आ गई, जिससे देसी ऊन की मांग गिर गई. 1990 के दशक की शुरुआत में भारतीय ऊन की कीमत लगभग 300 रुपये प्रति किलो (आज की कीमतों पर) थी, जो गिरकर 45-50 रुपये प्रति किलो रह गई है.
तीन दशक बाद, अब कहानी में एक नया मोड़ आया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में टैरिफ वापस आ गए हैं. जिन भारतीय उत्पादकों ने उच्च गुणवत्ता वाले ऊन के निर्यात के लिए जगह बनाई थी, वे अब अमेरिकी बाजार से बाहर हो रहे हैं क्योंकि वहां उन पर भारी शुल्क लगाया जा रहा है. यह एक क्रूर विडंबना है: पहले टैरिफ हटने से उद्योग बर्बाद हुआ, और अब टैरिफ लगने से बचा-खुचा निर्यात खत्म हो रहा है.
रिपोर्ट बताती है कि इसका सबसे ज्यादा खामियाजा चरवाहों (गड़रियों) को भुगतना पड़ रहा है. हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के चरवाहे अब ऊन बेचने के बजाय उसे जलाने या फेंकने को मजबूर हैं, क्योंकि उसे बाजार तक ले जाने का खर्च भी नहीं निकलता. 1991 में जो ऊन अर्थव्यवस्था 4,000 करोड़ रुपये की थी, वह आज गिरकर महज 600 करोड़ रुपये की रह गई है. 2026 को ‘अंतराष्ट्रीय रेंजलैंड्स और चरवाहा वर्ष’ घोषित किया गया है, लेकिन भारत के चरवाहों के लिए यह नीतिगत विफलताओं की एक चेतावनी भरी कहानी है.
महाराष्ट्र में तेंदुए के हमलों का कारण बनी गन्ने की खेती, डर के साये में मजबूर किसान
“स्क्रॉल डॉट इन” की तबस्सुम बरनागरवाला की एक विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि महाराष्ट्र के जुन्नार (पुणे) में गन्ने की खेती ने कैसे इंसानों और तेंदुओं के बीच एक खूनी संघर्ष को जन्म दिया है. रिपोर्ट में सलुराम करगल नामक किसान की आपबीती बताई गई है, जिन पर उनके घर के बाड़े में ही दो तेंदुओं ने हमला कर दिया था. जुन्नार में तेंदुओं की आबादी घनत्व बहुत अधिक है—हर 100 वर्ग किलोमीटर में लगभग 6-7 तेंदुए, जो आमतौर पर संरक्षित टाइगर रिजर्व में ही देखा जाता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि 1970 के बाद बने बांधों और गन्ने की खेती ने इस क्षेत्र का भूगोल बदल दिया. गन्ने के खेत घने होते हैं और 15 फीट तक ऊंचे हो जाते हैं, जो तेंदुओं को छिपने और प्रजनन करने के लिए आदर्श आवास प्रदान करते हैं. साथ ही, गांवों में कुत्ते और मवेशी आसानी से शिकार बन जाते हैं. वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2002 से अब तक जुन्नार में 56 लोग मारे गए हैं और 156 घायल हुए हैं.
वन विभाग ने समाधान के लिए सौर बाड़ लगाने, पिंजरे रखने और अलार्म सिस्टम जैसे उपाय अपनाए हैं, लेकिन वे नाकाफी साबित हो रहे हैं. तेंदुओं को पकड़कर दूसरे जंगलों में छोड़ने (ट्रांसलोकेशन) की रणनीति भी विफल रही है, क्योंकि अध्ययन बताते हैं कि इससे हमले और बढ़ जाते हैं या तेंदुए वापस लौट आते हैं. सरकार अब तेंदुओं की नसबंदी और उन्हें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की ‘अनुसूची-I’ से हटाने पर विचार कर रही है, जिसकी विशेषज्ञ आलोचना कर रहे हैं. फिलहाल, स्थानीय लोग शाम 8 बजे के बाद घरों में कैद हो जाते हैं और अपनी जान बचाने के लिए तरह-तरह के जतन कर रहे हैं.
ट्रंप की ‘ग्रीनलैंड धमकी’ पर यूरोप में खलबली, अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करने पर हो रहा गुप्त विचार
“पोलिटिको” की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की धमकी देने के बाद यूरोपीय अधिकारियों और राजनयिकों के बीच एक ऐसी बात पर चर्चा शुरू हो गई है, जो अब तक अकल्पनीय थी— “क्या यूरोप को अमेरिका के खिलाफ पलटवार करना चाहिए?” टिम रॉस और विक्टर जैक की रिपोर्ट बताती है कि यूरोपीय राजधानियों में निजी तौर पर इस बात पर मंथन हो रहा है कि अगर ट्रंप अपनी जिद पर अड़े रहे, तो यूरोप में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और संपत्तियों का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए कैसे किया जा सकता है.
राजनयिकों का मानना है कि अमेरिका अपने इन ठिकानों का इस्तेमाल अफ्रीका और मध्य पूर्व में अपनी ताकत दिखाने के लिए करता है. सवाल उठाया जा रहा है कि अगर अमेरिका नाटो सहयोगी डेनमार्क के संप्रभु क्षेत्र को हथियाने की कोशिश करता है, तो उसे इन ठिकानों तक पहुंच क्यों दी जाए? फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपने मंत्रियों से कहा है कि अगर किसी सहयोगी देश की संप्रभुता पर हमला हुआ, तो इसके परिणाम अभूतपूर्व होंगे.
हालांकि, रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि यूरोपीय देश इस तरह के टकराव से डरते भी हैं. सबसे बड़ा डर यह है कि अगर अमेरिका से रिश्ते बिगड़े, तो यूक्रेन युद्ध में रूस के खिलाफ सुरक्षा की गारंटी कौन देगा. एक नाटो राजनयिक ने कहा कि अमेरिकी ठिकानों का इस्तेमाल ‘सौदेबाजी’ के लिए किया जा सकता है, लेकिन इससे दोनों पक्षों को नुकसान होगा. फिलहाल, यूरोप ट्रंप को शांत करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अंदरखाने एक बड़े भू-राजनीतिक संकट की तैयारी भी चल रही है.
चीन और कनाडा ने किया ‘रिश्तों में सुधार’, ट्रंप के टैरिफ वार के बीच मार्क कार्नी का बड़ा दांव
“बीबीसी” की रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की चीन यात्रा के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ एक अहम बैठक में दोनों देशों ने टैरिफ कम करने की घोषणा की है. यह समझौता दोनों देशों के तनावपूर्ण रिश्तों में सुधार का संकेत है. मार्क कार्नी ने घोषणा की कि चीन 1 मार्च से कनाडाई कैनोला तेल पर टैरिफ 85% से घटाकर 15% कर देगा, जबकि ओटावा ने चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर टैक्स को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ दर यानी 6.1% पर रखने की सहमति दी है.
विशेषज्ञ इसे ट्रंप की अनिश्चित टैरिफ नीतियों का परिणाम मान रहे हैं, जिसने अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक, कनाडा को उसके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी चीन के करीब धकेल दिया है. कार्नी ने कहा कि “दुनिया नाटकीय रूप से बदल गई है” और उन्होंने चीन के साथ संबंधों को “यथार्थवादी और सम्मानजनक” बताया. हालांकि, उन्होंने मानवाधिकारों और विदेशी हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर अपनी “रेड लाइन्स” (लक्ष्मण रेखा) भी स्पष्ट कीं.
बीजिंग में हुई इस बैठक में शी जिनपिंग ने इसे “विन-विन” की स्थिति बताया. कनाडा चीन के साथ अपने व्यापार में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है क्योंकि अमेरिका के साथ व्यापार में अनिश्चितता बनी हुई है. यह कदम पिछले कुछ वर्षों के तनाव के बाद आया है, जिसमें 2018 में हुवावे की सीएफओ की गिरफ्तारी और उसके बाद चीन द्वारा दो कनाडाई नागरिकों को हिरासत में लेने की घटनाएं शामिल थीं. कार्नी की यह यात्रा एक नए “विश्व व्यवस्था” के निर्माण की दिशा में एक कदम मानी जा रही है.
वेनेजुएला की मचाडो ने ट्रंप को दिया नोबेल पुरस्कार, बदले में समर्थन का वादा नहीं
“सीएनएन” की रिपोर्ट के अनुसार, वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो ने व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की और उन्हें अपना नोबेल शांति पुरस्कार भेंट किया. मचाडो, जिन्होंने पिछले साल यह पुरस्कार जीता था, उम्मीद कर रही थीं कि इस भावुक उपहार के बदले उन्हें वेनेजुएला में मादुरो के बाद नेतृत्व के लिए अमेरिका का समर्थन मिलेगा. हालांकि, उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा.
जेसी येंग की रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वे मादुरो की पूर्व उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज का समर्थन करते हैं, जिन्हें ट्रंप ने ‘कार्यवाहक राष्ट्रपति’ के रूप में स्थापित किया है. मचाडो जब व्हाइट हाउस से निकलीं, तो उनके हाथ में केवल ट्रंप के नाम वाला एक ‘गिफ्ट बैग’ था. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर नोबेल पदक के साथ फोटो शेयर करते हुए इसे “आपसी सम्मान का अद्भुत संकेत” बताया.
उधर, ओस्लो स्थित नोबेल शांति केंद्र ने स्पष्ट किया है कि पदक का स्वामित्व बदला जा सकता है, लेकिन ‘नोबेल पुरस्कार विजेता’ की उपाधि हस्तांतरित नहीं की जा सकती. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि ट्रंप का मानना है कि मचाडो के पास वेनेजुएला का नेतृत्व करने के लिए आवश्यक समर्थन नहीं है. यह घटना कूटनीति की दुनिया में एक अजीबोगरीब स्थिति बन गई है, जहां एक नेता ने अपना सबसे प्रतिष्ठित सम्मान दे दिया, लेकिन बदले में उसे राजनीतिक वैधता नहीं मिली.
भारत और इज़राइल में बुलडोज़र की राजनीति: सज़ा का औज़ार बनता राज्य
इज़राइल और भारत दोनों देशों में बुलडोज़र अब सिर्फ़ मशीन नहीं रहे, बल्कि राज्य सत्ता के प्रतीक बनते जा रहे हैं. घरों को तोड़ना अब केवल अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई नहीं, बल्कि सज़ा देने और डर पैदा करने का तरीक़ा बन गया है. इज़राइल के कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी इलाक़ों में दशकों से फ़िलिस्तीनियों के घर गिराए जाते रहे हैं. यह कार्रवाई अक्सर किसी एक आरोपी तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके पूरे परिवार और कई बार पूरे समुदाय को निशाना बनाती है. समाजकर्मी हर्ष मंदर ने भारत और इज़राइल के बीच बढ़ती राजनीतिक समानताओं पर आर्टिकल 14 में लिखे अपने लेख में चेतावनी दी है कि भारत किस तेज़ी से इज़राइल जैसी दमनकारी राजनीति की राह पर बढ़ता जा रहा है.
वह इसे “दंडात्मक घर ध्वस्तीकरण” कहते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून के ख़िलाफ़ है. चौथे जेनेवा कन्वेंशन का अनुच्छेद 33 साफ़ कहता है कि किसी व्यक्ति को उस अपराध के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, जो उसने ख़ुद नहीं किया हो. सामूहिक सज़ा और डराने की कार्रवाई पूरी तरह प्रतिबंधित है.
भारत में भी पिछले पाँच वर्षों में, ख़ासकर भाजपा-शासित राज्यों में, ऐसी ही तस्वीर उभरकर सामने आई है. कई मामलों में विरोध प्रदर्शन, किसी कथित अपराध या आरोपी से कथित संबंध के बाद मुस्लिमों के घर और संपत्तियाँ गिरा दी गईं. यह सब सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद जारी रहा, जिससे राज्य सत्ता की मनमानी और दंडहीनता साफ़ दिखती है.
जून 2022 में सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च के शोधकर्ता अंग्शुमान चौधरी ने कहा था कि भारत और इज़राइल की नीतियों में चौंकाने वाली समानता है. जैसे इज़राइल फ़िलिस्तीनियों को डराने के लिए बुलडोज़र का इस्तेमाल करता है, वैसे ही भारत में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ इसका इस्तेमाल “डर का माहौल” बनाने के लिए हो रहा है.
हिंदुत्व और ज़ायोनिज़्म दोनों विचारधाराएँ बहुसंख्यक राष्ट्र की कल्पना करती हैं और अल्पसंख्यकों को ख़तरे के रूप में पेश करती हैं. दोनों ही जगह बहुसंख्यक समुदाय को पीड़ित बताया जाता है, अल्पसंख्यकों को शक की नज़र से देखा जाता है और असहमति को “राष्ट्र-विरोधी” क़रार दिया जाता है.
इज़राइल में कई बार घर गिराने का नोटिस रात में दिया जाता है और सुबह होते ही बुलडोज़र चल जाता है. भारत में भी अक्सर बिना पर्याप्त समय दिए नोटिस थमा दिए जाते हैं. अतिक्रमण या भवन नियमों का हवाला देकर कार्रवाई को क़ानूनी रंग दिया जाता है, जबकि असल मक़सद सज़ा देना होता है.
प्रयागराज में सामाजिक कार्यकर्ता जावेद मोहम्मद का घर गिराया गया, जिससे उनकी पत्नी और बेटियाँ बेघर हो गईं. नूंह में आस मोहम्मद का घर और चाय की दुकानें दंगों के बाद तोड़ दी गईं. इसी तरह फ़िलिस्तीन में घरों के साथ-साथ खेत, बाग़ और पानी के स्रोत भी नष्ट किए जाते हैं, ताकि समुदाय की जड़ें ही उखाड़ दी जाएँ.
भारत और इज़राइल दोनों जगह ध्वस्तीकरण खुलेआम किया जाता है, कई बार मीडिया की मौजूदगी में यह किया जाता है. जावेद मोहम्मद की बेटी अफ़रीन फ़ातिमा ने कहा था कि “हिंदुओं को दिखाया जाता है कि मुसलमानों को उनकी जगह बता दी गई है, और मुसलमानों को संदेश दिया जाता है कि लाइन में रहो, वरना घर गिरा दिया जाएगा.”
फ़िलिस्तीन में हालात और भयावह हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, पश्चिमी तट और ग़ाज़ा में हज़ारों लोग घरों, ज़मीन और पानी के ढाँचे टूटने से विस्थापन के ख़तरे में हैं. 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग़ाज़ा की 87% खेती योग्य ज़मीन तबाह हो चुकी है.
भारत में मस्जिदें, दरगाहें, मज़ार और मदरसे भी निशाना बने हैं. विद्वानों का मानना है कि यह सांस्कृतिक मिटाने की कोशिशों जैसा ही है. न्यूयॉर्क स्थित द पोलिस प्रोजेक्ट का कहना है कि क़ानून अकेले बुलडोज़र को नहीं रोक सकता, क्योंकि क़ानून को ही हिंसा का औज़ार बना दिया गया है.
सुप्रीम कोर्ट के वकील कपिल सिब्बल ने लिखा था कि घर सिर्फ़ एक ढांचा नहीं होता, वह इंसान की साँस, उसकी हँसी-रोना और उसकी आज़ादी का ठिकाना होता है. वह लिखते हैं की“जब बुलडोज़र घर पर चलता है तो वह सिर्फ़ इमारत नहीं, बल्कि इंसान की हिम्मत और आवाज़ भी तोड़ने की कोशिश करता है. ”
यह कहानी बताती है कि जब राज्य बुलडोज़र को सज़ा का औज़ार बना लेता है, तो वह सिर्फ़ घर नहीं गिराता, वह लोकतंत्र, इंसानियत और न्याय की नींव को भी हिलाता है.
अपील :
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