16/02/2026: निकोबार प्रोजेक्ट को हरी झंडी | फ्री किताब डाउनलोड | हिमंता की हेट स्पीच पर सुनवाई से इंकार | | वंदे मातरम पर आकार पटेल | भारत बिछ कैसे गया अमेरिका के आगे | आरएसएस मनीलांड्रिंग
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियाँ
निकोबार: 72,000 करोड़ के प्रोजेक्ट को NGT की मंजूरी, शोम्पेन जनजाति पर मंडराया खतरा.
सुप्रीम कोर्ट: असम CM हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ हेट स्पीच याचिका पर सुनवाई से इनकार.
कृषि संकट: अमेरिकी ट्रेड डील की खबरों से सोयाबीन के दाम धड़ाम, किसान परेशान.
सेंसरशिप: एक हफ्ते में नसीरुद्दीन शाह, आनंद तेलतुंबड़े और विनोद जोस के कार्यक्रम रद्द.
ओडिशा: आंगनवाड़ी में जातिगत विवाद खत्म, बच्चों ने दलित रसोइए के हाथ का खाना खाया.
कर्नाटक: कांग्रेस सरकार ने ‘वोटर डेटा चोरी’ मामले की जांच फिर से शुरू की.
ग्लोबल: म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में ट्रम्प की वापसी का डर और यूरोप की तैयारी.
आदिवासियों, प्रकृति, समुद्र, वन्यजीवों को ख़तरे में डालते निकोबार प्रोजेक्ट को एनजीटी की हरी झंडी
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी छोर, ग्रेट निकोबार द्वीप, अपनी शांति और प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) के लिए जाना जाता है. यह शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों का घर है. लेकिन अब यह शांति एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है. द हिंदू की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार ने ‘ग्रेट निकोबार द्वीप के समग्र विकास’ के लिए 72,000 करोड़ रुपये की एक मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर पहल को मंजूरी दी है. नीति आयोग के नेतृत्व में और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम द्वारा कार्यान्वित इस परियोजना का उद्देश्य इस दूरदराज के क्षेत्र को एक प्रमुख ट्रांसशिपमेंट और रक्षा केंद्र में बदलना है.
यह परियोजना लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करती है, जो द्वीप के कुल भूमि क्षेत्र का लगभग 18% है. रिपोर्ट में बताया गया है कि इसमें वाणिज्यिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक एकीकृत ‘सिटी-स्टेट’ की परिकल्पना की गई है. इसका मुख्य आकर्षण गलाथिया बे में बनने वाला इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल है. सरकार का दावा है कि यह टर्मिनल अंततः 1.42 करोड़ टीईयू कार्गो को संभालने में सक्षम होगा. इसके अलावा, नागरिक और सैन्य जरूरतों के लिए एक नया ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा भी बनाया जाएगा, जो पीक आवर्स में 4,000 यात्रियों को संभालने में सक्षम होगा.
भारत के लिए यह कदम भू-राजनीति और अर्थशास्त्र से प्रेरित है. मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित होने के कारण यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ से दुनिया का 40% व्यापार गुजरता है. यहाँ एक मजबूत सैन्य उपस्थिति भारत को हिंद महासागर में चीनी नौसैनिक गतिविधियों पर नज़र रखने में मदद करेगी.
हालांकि, इस परियोजना ने गंभीर विवादों को जन्म दिया है. आलोचकों का तर्क है कि सरकार ने उचित जांच-पड़ताल को दरकिनार कर दिया है. 2021 में नीति आयोग द्वारा एक प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार की गई और बहुत ही कम समय में पर्यावरण और वन मंजूरी दे दी गई. गलाथिया बे ‘जायंट लेदरबैक कछुओं’ के घोंसले बनाने का एक महत्वपूर्ण स्थल है, और विशेषज्ञों का कहना है कि बंदरगाह निर्माण से उनका आवास नष्ट हो जाएगा. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, टाउनशिप और हवाई अड्डे के निर्माण के लिए लगभग 9.64 लाख पेड़ काटे जाएंगे. पारिस्थितिकीविदों ने सरकार के उस प्रस्ताव का भी मज़ाक उड़ाया है जिसमें अंडमान के वर्षावनों के बदले हरियाणा के सूखे इलाके में पेड़ लगाने की बात कही गई है.
सबसे चिंताजनक पहलू जनजातियों पर इसका प्रभाव है. शोम्पेन जनजाति, जो विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) है, का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है. अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने चेतावनी दी है कि बाहरी लोगों के संपर्क से इन आदिवासियों में महामारियाँ फैल सकती हैं, जो उनके लिए ‘नरसंहार’ जैसा साबित हो सकता है. निकोबारी समुदाय, जिसे 2004 की सुनामी के बाद विस्थापित किया गया था, को अब अपनी पैतृक भूमि पर लौटने से प्रभावी रूप से रोका जा रहा है क्योंकि वह क्षेत्र परियोजना के लिए चिह्नित कर लिया गया है. ट्राइबल काउंसिल के नेताओं का आरोप है कि प्रशासन ने उनसे जबरन “समर्पण प्रमाण पत्र” पर हस्ताक्षर करवाए हैं. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने इस मामले में एक समिति का गठन किया था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की भारी कमी रही है.
हरकारा आर्काइव : पंकज सेखसरिया
ग्रेट निकोबार: जब विकास का नक्शा ज़मीन से नहीं, ऊपर से बनाया जाता है
संपादकीय नोट: यह बातचीत हमारे आर्काइव से है जो आठ जनवरी को हमने प्रकाशित की थी. पाठकों को इसे पूरे मामले की गंभीरता और संदर्भ समझने में मदद मिलेगी.
ग्रेट निकोबार अंडमान–निकोबार द्वीपसमूह का सबसे दक्षिणी और सबसे बड़ा द्वीप है. घने जंगलों, दुर्लभ जैव विविधता और सदियों से बसे आदिवासी समुदायों वाला यह इलाक़ा अब भारत की सबसे महंगी विकास परियोजनाओं में से एक का केंद्र है. हरकारा डीप डाइव के इस एपिसोड में शोधकर्ता पंकज सेखसरिया बताते हैं कि यह परियोजना किस तरह एक अनछुए भूभाग को एक विशाल व्यावसायिक प्रयोग में बदलने जा रही है. 70 से 90 हज़ार करोड़ रुपये की इस योजना में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, पावर प्लांट और नया शहर शामिल है. इसके लिए सरकार के अपने आंकड़ों के मुताबिक़ कम से कम 10 लाख पेड़ काटे जाएंगे, जबकि वैज्ञानिकों का अनुमान इससे कहीं ज़्यादा है. यह सब एक ऐसे क्षेत्र में हो रहा है जिसे हाल ही में सिस्मिक ज़ोन 6 में रखा गया है, यानी यह देश के सबसे भूकंप-संवेदनशील इलाक़ों में से एक है.
सरकार का तर्क है कि ग्रेट निकोबार मलक्का स्ट्रेट्स के पास स्थित होने के कारण आर्थिक और रणनीतिक रूप से अहम है. लेकिन बातचीत में यह सवाल बार-बार उभरता है कि क्या यह निवेश वाकई आर्थिक रूप से टिकाऊ है. पत्रकारों और शोधकर्ताओं का मानना है कि यह परियोजना उत्पादन आधारित नहीं, बल्कि केवल गुज़रते जहाज़ों पर निर्भर एक ट्रांजिट मॉडल है, जिसमें मुनाफ़े की संभावना बेहद सीमित है.
सबसे अहम सवाल आदिवासी समुदायों की सहमति का है. शॉम्पेन जैसे समुदायों से कभी औपचारिक बातचीत नहीं हुई. निकोबारी समुदाय ने पहले परियोजना को NOC दी, लेकिन बाद में लिखित रूप में उसे वापस ले लिया, यह कहते हुए कि उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई थी. फारेस्ट राइट एक्ट के उल्लंघन को लेकर मामला अदालत में भी है.
ग्रेट निकोबार का मामला यह दिखाता है कि जब विकास का खाका उन जगहों के लिए बनाया जाता है जहां आवाज़ें कम हैं, तो सवाल उठाने वाले भी कम रह जाते हैं. यह कहानी केवल एक द्वीप की नहीं है, बल्कि उस लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी की है जिसे अक्सर “राष्ट्रीय हित” के नाम पर टाल दिया जाता है.
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निकोबार के प्राकृतिक समृद्धि और सरकारी नीतियों के कारण उसकी चुनौतियों के बारें में ग्रेट निकोबार: कहानी विश्वासघात की एक महत्वपूर्ण किताब है. आप चाहें तो इस किताब की पीडीएफ फाइल यहां से डाउनलोड भी कर सकते हैं. पंकज सेखसरिया के साभार.
असम सीएम के खिलाफ ‘हेट स्पीच’ याचिका पर विचार से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, याचिकाकर्ताओं को हाई कोर्ट जाने की सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (16 फरवरी, 2026) को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ आपराधिक जांच की मांग वाली याचिकाओं पर विचार करने से इनकार कर दिया. हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने याचिकाकर्ताओं को गुवाहाटी उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया.
याचिकाकर्ताओं, जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शामिल हैं, ने सरमा पर सांप्रदायिक भाषण देने और एक सोशल मीडिया पोस्ट (जिसे अब हटा दिया गया है) के लिए कार्रवाई की मांग की थी. उस पोस्ट में कथित तौर पर उन्हें दो मुस्लिम पुरुषों की एनिमेटेड छवि की ओर बंदूक तानते हुए दिखाया गया था. याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि श्री सरमा “असम के बॉस” हैं, इसलिए स्थानीय स्तर पर निष्पक्ष जांच मुश्किल हो सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया.
अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालयों के पास भी व्यापक शक्तियां हैं और हर मामले को सीधे सुप्रीम कोर्ट में नहीं लाया जा सकता. सीजेआई कांत ने टिप्पणी की, “जो कुछ सुप्रीम कोर्ट कर सकता है, वह हाई कोर्ट भी कर सकता है.”
वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी ने तर्क दिया कि सरमा का आचरण “आदतन” है और उनके भाषण देश के लोकाचार और उनके संवैधानिक पद की पवित्रता पर हमला हैं. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के कद को देखते हुए यह मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट में सुना जाना चाहिए. हालांकि, पीठ ने कहा कि अगर लोग सीधे सुप्रीम कोर्ट आते रहेंगे तो इससे उच्च न्यायालयों का मनोबल गिरेगा. मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं से “सिस्टम” पर भरोसा रखने का आग्रह किया और गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि यदि याचिकाएँ वहां दायर की जाती हैं, तो उन्हें सूचीबद्ध कर तेजी से सुनवाई की जाए.
ओडिशा: आंगनवाड़ी में तीन महीने से चला आ रहा जातिगत विवाद खत्म, बच्चों ने दलित रसोइए के हाथ का बना खाना खाया
ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले के एक गांव में एक आंगनवाड़ी केंद्र पर पिछले तीन महीनों से चल रहा जातिगत विवाद सोमवार (16 फरवरी, 2026) को समाप्त हो गया. हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विवाद तब सुलझा जब उच्च जाति के बच्चों ने केंद्र में लौटना शुरू किया और एक दलित महिला रसोइए (हेल्पर) द्वारा पकाया गया भोजन खाया.
यह विवाद पिछले साल 21 नवंबर को शुरू हुआ था जब नुआगांव गांव में शर्मिष्ठा सेठी नामक एक दलित महिला को हेल्पर के रूप में नियुक्त किया गया था. इसके विरोध में कई उच्च जाति के परिवारों ने अपने बच्चों को केंद्र भेजना बंद कर दिया था और यहां तक कि गर्भवती महिलाओं के लिए सरकार द्वारा दिए जाने वाले पौष्टिक भोजन को भी लेने से इनकार कर दिया था. इस घटना ने देशव्यापी आक्रोश पैदा किया था और संसद में भी इस पर चर्चा हुई थी.
सोमवार को केंद्रपाड़ा की बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) दीपाली मिश्रा और राजनगर के विधायक ध्रुव चरण साहू बच्चों का स्वागत करने के लिए आंगनवाड़ी केंद्र पर मौजूद थे. शर्मिष्ठा सेठी ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, “मैंने बच्चों को रागी के लड्डू परोसे. बाद में मैंने चावल और ‘दालमा’ (सब्जी करी) पकाई और बच्चों को खिलाया. उन्हें खाना खाते देख मुझे बहुत खुशी हुई. वे खिलौनों से खेले, जिससे केंद्र में फिर से जान आ गई.”
सीडीपीओ मिश्रा ने बताया कि कुल 20 में से 16 बच्चे अपने अभिभावकों के साथ केंद्र आए. उन्होंने कहा कि बाकी बच्चे बीमार होने के कारण नहीं आ सके, लेकिन विवाद अब सुलझ गया है. यह समाधान अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों को संवेदनशील बनाने और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एससीपीसीआर) के हस्तक्षेप के बाद संभव हुआ है. भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बैजयंत पांडा ने भी इस सकारात्मक बदलाव की सराहना की और इसे समुदाय के लिए एक नई शुरुआत बताया.
कर्नाटक ‘वोट चोरी’ मामला: 2022 की मतदाता डेटा जांच की फिर तैयारी में सिद्धारमैया सरकार
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने 2022 के कथित ‘मतदाता डेटा चोरी’ मामले की जांच को पुनर्जीवित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. इंडियन एक्सप्रेस के जॉनसन टी.ए. की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने 27 नवंबर, 2025 को पूर्व एडवोकेट जनरल प्रो. रवि वर्मा कुमार को विशेष वकील नियुक्त किया है. उनका काम उन पुलिस जांचों को फिर से शुरू करने के लिए कानूनी पैरवी करना है, जिन पर उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी थी.
यह मामला ‘चिलूम एजुकेशनल कल्चरल एंड रूरल डेवलपमेंट ट्रस्ट’ नामक एक निजी समूह से जुड़ा है. चुनाव आयोग के अधिकारियों ने आरोप लगाया था कि इस ट्रस्ट ने ‘स्वीप’ कार्यक्रम की आड़ में महादेवपुरा और बेंगलुरु के अन्य हिस्सों में अवैध रूप से मतदाता डेटा एकत्र किया. नवंबर 2022 में पुलिस ने दो एफआईआर दर्ज की थीं, लेकिन बाद में उच्च न्यायालय ने गिरफ्तार अधिकारियों और ट्रस्ट के सदस्यों की याचिका पर जांच पर अंतरिम रोक लगा दी थी.
कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि चिलूम ग्रुप का संबंध भाजपा नेताओं से था और वे चुनावी रोल में हेरफेर करने की कोशिश कर रहे थे. अब सिद्धारमैया सरकार इस जांच को आगे बढ़ाना चाहती है. यह नियुक्ति लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा अगस्त और सितंबर 2025 में महादेवपुरा और कललबुर्गी में ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाए जाने के बाद की गई है.
जांच में पहले पाया गया था कि बीबीएमपी ने चिलूम ग्रुप को एक निजी ऐप (डिजिटल समीक्षा) पर अवैध रूप से मतदाता डेटा इकट्ठा करने और उसे विदेशी सर्वर पर स्टोर करने की अनुमति दी थी. सरकार के इस कदम को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह चुनावी कदाचार के गंभीर आरोपों को फिर से सतह पर ला सकता है.
विश्लेषण
आकार पटेल | वंदे मातरम आधार की तरह स्वैच्छिक है और आधार की ही तरह अनिवार्य भी
हमारे देश में राष्ट्रवाद की हमेशा कमी रहती है, क्योंकि इसकी माँग बहुत ज़्यादा लगती है. मेरे इतने दशकों में मुझे नहीं पता था कि वंदे मातरम को राष्ट्रगान के साथ जोड़ने की माँग है, पर अब हमें बताया गया है कि ऐसा ही होने वाला है. इस गीत में छह कड़ियाँ हैं जिन्हें हम में से उन लोगों को याद करना होगा जिन्हें ये नहीं आतीं. गृह मंत्रालय के आदेशानुसार इसका पाठ 3 मिनट 10 सेकंड लंबा होना चाहिए. आदेशों में यह स्पष्ट नहीं है कि यह गायन स्वैच्छिक है (आधार की तरह) या अनिवार्य (वो भी आधार की तरह).
यह उलझन शब्दावली से पैदा होती है. गृह मंत्रालय हमें बताता है कि ‘उन मौकों की विस्तृत सूची देना संभव नहीं है जिन पर राष्ट्रीय गीत के गाने — बजाने के विपरीत — की अनुमति दी जा सकती है’, लेकिन यह मददगार तौर पर जोड़ता है कि ‘गाने पर कोई आपत्ति नहीं है... जब तक यह उचित सम्मान के साथ किया जाए’. उचित सम्मान क्या है, इस पर कोई निर्देश नहीं हैं लेकिन हमें जल्द ही पता चल जाएगा कि उल्लंघन क्या है. हमारे बीच जो ज़्यादा राष्ट्रवादी हैं, वो उन्हें शिक्षित करेंगे जो कम राष्ट्रवादी हैं.
मैं क्यों कहता हूँ कि यह स्पष्ट नहीं है कि यह स्वैच्छिक है या नहीं, क्योंकि आदेश में जोड़ा गया है कि ‘राष्ट्रीय गीत उन मौकों पर गाया जा सकता है जो, हालाँकि सख्ती से रस्मी नहीं हैं, फिर भी मंत्रियों आदि की मौजूदगी के कारण महत्व रखते हैं’ और आगे यह कि ‘सामूहिक गायन वांछनीय है.’ ‘आदि’ में क्या शामिल है या क्या बाहर है? ‘वांछनीय’ की सही व्याख्या क्या है?
फिर से, हमें पता चल जाएगा कि क्या होता है जब कोई ‘सकते हैं’ और ‘वांछनीय’ शब्दों को स्वैच्छिक कार्रवाई का संकेत मानने का चयन करता है. लेकिन यह सब अंततः मुद्दे से हटकर है. मुद्दा, जो मुख्य है, वो यह है कि हमारे देश में राष्ट्रवाद की हमेशा कमी रहती है और यह एक तरीका है जिससे इस कमी को पूरा किया जा सकता है. और यह भी सच है कि इस तरह की चीज़ें काम करती हैं जैसा कि हमारा इतिहास हमें बताता है.
ठीक 50 साल पहले, 1976 में, तब की सरकार ने संविधान में ‘मौलिक कर्तव्य’ जोड़े थे. ये कर्तव्य हैं ‘धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय या वर्गीय विविधताओं से परे भारत के सभी लोगों के बीच सद्भाव और समान भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना; महिलाओं की गरिमा के लिए अपमानजनक प्रथाओं का त्याग करना’. कौन इनकार कर सकता है कि ऐसा हुआ है? भारत भाईचारे और महिलाओं की सुरक्षा के लिए वैश्विक मिसाल नहीं होता अगर ये निर्देश हमें नहीं मिले होते.
सूची में यह भी है ‘पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना जिसमें जंगल, झीलें, नदियाँ और वन्य जीवन शामिल हैं, और जीवित प्राणियों के लिए दया रखना’ और, मेरा पसंदीदा, ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जिज्ञासा तथा सुधार की भावना विकसित करना’.
ये कर्तव्य इसलिए जोड़े गए थे क्योंकि 1976 में राष्ट्रवाद की भारी माँग थी और आपूर्ति कम थी, और आज के समय में भी यही हाल है.
निंदक और मौजूदा व्यवस्था से नफरत करने वाले तर्क देंगे कि देश प्रेम दिखाने के और भी तरीके हैं. कि गान और नारे राष्ट्रीय प्रगति के लिए गौण हैं. कि हम एक राष्ट्र के रूप में बेहतर होते अगर हम ट्रैफ़िक में बेहतर व्यवहार करते, मिसाल के तौर पर, और अगर हम कचरा न फैलाते. राष्ट्रीय गीत नदियों के बारे में बात करता है और ऐसे देश का नाम लेना मुश्किल होगा जहाँ का पानी यहाँ के पानी से ज़्यादा गंदा हो.
हम अपनी देशभक्ति रिश्वत लेने या देने से इनकार करके दिखा सकते थे. या टैक्स में धोखाधड़ी न करके, कुछ ऐसा जो हमारे बीच सबसे ज़्यादा देशभक्त लोगों को इतने सहज रूप से आता है कि यह आश्चर्य की बात है कि टैक्स चोरी को मौलिक कर्तव्यों में शामिल नहीं किया गया है.
यहाँ एक लंबी सूची है चीज़ों की जो जोड़ी जा सकती हैं, लेकिन, जैसा कि हमारी सरकार और इसके रक्षक संभवतः कहेंगे: ये वो चीज़ें हैं जो कई देशों के नागरिक कर सकते हैं. ये खास नहीं हैं.
हमें अपना प्यार दिखाने के लिए कुछ अनोखा और अलग चाहिए. यह वही है जो इस नए आदेश ने हमें दिया है. गृह मंत्रालय का आदेश चेतावनी देता है, ‘जब भी राष्ट्रीय गीत का आधिकारिक संस्करण गाया या बजाया जाए, दर्शकों को सावधान मुद्रा में खड़ा होना चाहिए’. शायद इसका मतलब यह है कि एक बार जब वेन्यू द्वारा तय कर लिया गया कि गीत बजाया जाना है, तो दर्शकों को पालन करना होगा और तब भागीदारी स्वैच्छिक नहीं रह जाती. अगर ऐसा है, तो गीत और गान में क्या अंतर है? कोई नहीं जानता, लेकिन हमारी सरकार अपनी बुद्धिमानी में ज़रूर जानती है.
और भी है: ‘सभी स्कूलों में, दिन के काम की शुरुआत राष्ट्रीय गीत के सामूहिक गायन से हो सकती है.’ मेरी राय में यह अगली पीढ़ी में देशभक्ति का वही स्तर पैदा करने के लिए ज़रूरी है जो हमारी पीढ़ी में पाया जाता है, और हमारे पहले वाली में. इसके अन्य फ़ायदे भी हैं.
बेरोज़गार लोग अपने खाली समय का उपयोग छह कड़ियाँ याद करने में करेंगे. वे भीड़ की निगरानी करके और उत्पादक होंगे यह देखने के लिए कि कौन ध्यान नहीं दे रहा है और ‘उचित शिष्टाचार’ से भटक रहा है. उनके द्वारा ऐसा हिंसक रूप से करने की खबरें किसी भी पल हम तक पहुँचना शुरू होनी चाहिए.
आलसी लोग अतिरिक्त 3 मिनट और 10 सेकंड खड़े रहेंगे और अपनी फ़िटनेस में सुधार करेंगे.
हरकारा डीप डाइव: राजेश रपरिया
झुकना थोड़ा बहुत ठीक था, पर एकदम से क्यों बिछ गया ट्रंप के सामने मोदी का भारत?
भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर देश में बहस तेज़ होती जा रही है. इसी विषय पर हरकरा डीप डाइव में वरिष्ठ पत्रकार और बिजनेस जर्नलिज्म से लंबे समय तक जुड़े रहे राजेश रपरिया के साथ एक विशेष बातचीत की गई. इस विस्तृत चर्चा में न केवल डील के आर्थिक पहलुओं को समझने की कोशिश की गई, बल्कि इसके राजनीतिक, रणनीतिक और सामाजिक प्रभावों पर भी गंभीर विश्लेषण सामने आया.
बातचीत की शुरुआत इस सवाल से हुई कि क्या यह डील वास्तव में भारत के लिए लाभकारी है या इससे देश की आर्थिक संप्रभुता पर असर पड़ सकता है. चर्चा में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया कि डील को लेकर स्पष्ट जानकारी का अभाव है. भारत सरकार की ओर से आधिकारिक और विस्तृत बयान सामने नहीं आया, जबकि कई तथ्य अमेरिकी पक्ष से जारी दस्तावेज़ों और बयानों के आधार पर सामने आए हैं. इससे पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं.
तेल आयात का मुद्दा भी चर्चा का अहम हिस्सा रहा. पहले ईरान, फिर रूस और वेनेजुएला जैसे देशों से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव की पृष्ठभूमि में यह सवाल उठा कि क्या भारत अपनी ऊर्जा नीति स्वतंत्र रूप से तय कर पा रहा है. रूस से तेल आयात में कमी के संभावित आर्थिक नुकसान का भी ज़िक्र हुआ. समाधान के रूप में यह सुझाव सामने आया कि भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति तैयार करनी चाहिए, जिसमें विविध स्रोतों से आयात, सामरिक भंडारण और नवीकरणीय ऊर्जा पर निवेश को प्राथमिकता दी जाए ताकि बाहरी दबावों का असर कम किया जा सके.
कृषि क्षेत्र पर संभावित प्रभाव को लेकर बातचीत विशेष रूप से गंभीर रही. कपास, सोयाबीन, सेब, बादाम, डेयरी और पोल्ट्री जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी आयात बढ़ने से भारतीय किसानों पर दबाव बढ़ सकता है. विशेष रूप से महाराष्ट्र की कपास बेल्ट और मध्य प्रदेश के सोयाबीन किसानों की स्थिति को लेकर चिंता जताई गई. समाधान के रूप में यह सुझाव दिया गया कि सरकार को संवेदनशील कृषि क्षेत्रों की स्पष्ट सूची बनानी चाहिए और उनके लिए सुरक्षा उपाय, न्यूनतम समर्थन मूल्य की मज़बूती, निर्यात प्रोत्साहन और प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देना चाहिए. साथ ही स्थानीय उत्पादों की गुणवत्ता और ब्रांडिंग को मज़बूत कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया गया.
टेक्सटाइल सेक्टर को लेकर भी विस्तृत चर्चा हुई. यदि कच्चा माल और तैयार वस्त्र बड़े पैमाने पर आयात होने लगते हैं, तो “मेक इन इंडिया” के लक्ष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. समाधान के तौर पर यह कहा गया कि भारत को टेक्सटाइल और मैन्युफैक्चरिंग में मूल्य संवर्धन, तकनीकी उन्नयन और निर्यात विविधीकरण की रणनीति अपनानी चाहिए. छोटे और मध्यम उद्योगों को सस्ती पूंजी और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना भी आवश्यक बताया गया.
डिजिटल टेक्नोलॉजी और सर्विस सेक्टर को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई. डिजिटल टैक्स और अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर नियमन को लेकर संभावित समझौते भारत के IT उद्योग और स्टार्टअप इकोसिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं. रोज़गार के अवसरों पर इसका असर पड़ने की आशंका जताई गई. समाधान के रूप में यह सुझाव दिया गया कि भारत को डिजिटल संप्रभुता की स्पष्ट नीति बनानी चाहिए, डेटा संरक्षण कानूनों को सुदृढ़ करना चाहिए और घरेलू टेक कंपनियों को प्रोत्साहन देना चाहिए. साथ ही स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू कर युवाओं को उभरती तकनीकों में प्रशिक्षित करना आवश्यक है.
500 बिलियन डॉलर की संभावित खरीद के पर भी बात की गई. व्यापार संतुलन में बदलाव और आयात बढ़ने से घरेलू उद्योगों पर दबाव पड़ सकता है. इस संदर्भ में यह सुझाव सामने आया कि भारत को किसी भी बड़े खरीद समझौते से पहले व्यापक लागत-लाभ विश्लेषण करना चाहिए, रक्षा और गैर-रक्षा खरीद के बीच स्पष्ट अंतर तय करना चाहिए और घरेलू उत्पादन क्षमता को प्राथमिकता देनी चाहिए.
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अन्य देशों की रणनीति का भी उल्लेख किया गया. कनाडा, ब्राजील और यूरोपीय देशों द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए अपनाए गए रुख की तुलना में भारत को संतुलित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता बताई गई. समाधान के तौर पर बहुपक्षीय व्यापार संबंधों को मज़बूत करने, यूरोप, एशिया और अफ्रीका के साथ साझेदारी बढ़ाने और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों को पुनर्संतुलित करने की बात कही गई.
बातचीत के अंत में यह निष्कर्ष सामने आया कि भारत के पास संसाधन, जनशक्ति और बाज़ार क्षमता की कोई कमी नहीं है. आवश्यकता है स्पष्ट नीति, पारदर्शिता, मज़बूत वार्ता कौशल और दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टि की.
ट्रंप के बाद अब रुबियो ने भी कहा, भारत ने रूसी तेल की और खरीद रोकने का वादा किया है
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में ट्रंप का दावा दुहराते हुए कहा है कि भारत ने रूस से ‘अतिरिक्त’ तेल खरीदना बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है. ‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, रुबियो ने कहा, “भारत के साथ हमारी बातचीत में हमें यह आश्वासन मिला है कि वे अब और रूसी तेल नहीं खरीदेंगे.”
यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत और अमेरिका ने हाल ही में एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा तैयार की है. हालांकि, भारत के विदेश मंत्रालय का रुख इससे अलग नजर आता है. इसी सम्मेलन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत अपनी ‘सामरिक स्वायत्तता’ के प्रति प्रतिबद्ध है. उन्होंने कहा, “भारत की तेल कंपनियां, यूरोप की कंपनियों की तरह ही, उपलब्धता, लागत और जोखिम को देखकर फैसले लेती हैं.”
इससे पहले, भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने भी संसदीय समिति और मीडिया ब्रीफिंग में कहा था कि ऊर्जा खरीद के मामले में ‘राष्ट्रीय हित’ ही एकमात्र मार्गदर्शक कारक होगा. गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने हाल ही में एक कार्यकारी आदेश जारी किया था, जिसमें रूसी तेल आयात को टैरिफ में छूट से जोड़ा गया था, जिस पर भारत ने अब तक कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है.
ईडी ने न्यूज़क्लिक, उसके संपादक पुरकायस्थ पर 184 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया
प्रवर्तन निदेशालय ने समाचार पोर्टल न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक व प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ पर विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के तहत 184 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाया है. आधिकारिक सूत्रों ने सोमवार को यह जानकारी दी.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, सूत्रों ने बताया कि आदेश में पोर्टल का स्वामित्व रखने वाली कंपनी—’पीपीके न्यूज़क्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड’—पर 120 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है. वहीं, प्रबीर पुरकायस्थ पर कथित उल्लंघनों के लिए व्यक्तिगत रूप से 64 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है.
जांच एजेंसी ने इन संस्थाओं को मुख्य रूप से दो मामलों में फेमा के प्रावधानों का “उल्लंघन” करते हुए पाया है. इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) फंड का गलत विवरण देना और सेवाओं व निर्यात की गलत घोषणा करना शामिल है.
गौरतलब है कि ईडी ने धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) के आरोपों में सबसे पहले सितंबर 2021 में राष्ट्रीय राजधानी के सैदुलाजाब इलाके में स्थित न्यूज़क्लिक के परिसर पर छापेमारी की थी.
साल 2023 में, भारतीय जनता पार्टी ने न्यूयॉर्क टाइम्स की एक खबर का हवाला देते हुए पोर्टल और उसके प्रवर्तकों पर गलत काम करने का आरोप लगाया था. उस समाचार रिपोर्ट में कहा गया था कि यह पोर्टल एक वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा था जिसे अमेरिकी अरबपति नेविल रॉय सिंघम से फंडिंग मिली थी. आरोप है कि सिंघम चीनी सरकारी मीडिया मशीनरी के साथ मिलकर काम करते हैं.
वहीं, 2009 में स्थापित इस पोर्टल का अपनी वेबसाइट पर कहना है कि वह एक स्वतंत्र मीडिया संगठन है, जो प्रगतिशील आंदोलनों पर ध्यान केंद्रित करते हुए भारत और अन्य जगहों से समाचार कवर करने के लिए समर्पित है.
प्रियांक खड़गे ने आरएसएस पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाया
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर फिर से हमला बोलते हुए, कर्नाटक के ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस पर “मनी लॉन्ड्रिंग” में शामिल होने का आरोप लगाया और उनकी आय के स्रोत पर सवाल उठाए.
‘द हिंदू ब्यूरो’ के अनुसार, आरएसएस के अपंजीकृत होने पर सवाल उठाते हुए खड़गे ने कहा कि वह यह सुनिश्चित करेंगे कि किसी न किसी दिन संघ का पंजीकरण जरूर हो. उन्होंने कहा, “आरएसएस का 2,500 से अधिक संगठनों का एक नेटवर्क है, जिसमें अमेरिका और इंग्लैंड के संगठन भी शामिल हैं. वे ‘गुरु दक्षिणा’ के नाम पर पैसा ले रहे हैं. गुरु को ध्वज (झंडे) के रूप में परिभाषित किया गया है, और ध्वज के नाम पर पैसा इकट्ठा किया जा रहा है. मैं कह रहा हूँ कि ये लोग मनी लॉन्ड्रिंग में लगे हुए हैं.”
गौरतलब है कि कुछ महीने पहले भी मंत्री खड़गे ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से आरएसएस की गतिविधियों पर लगाम लगाने का आग्रह करके विवाद खड़ा कर दिया था.
इसके जवाब में केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा, “बिना किसी सबूत के मनी लॉन्ड्रिंग जैसे व्यापक आरोप लगाना गैर-जिम्मेदाराना है और अनुशासित राष्ट्र-निर्माण एवं जनसेवा के लिए समर्पित लाखों स्वयंसेवकों का गहरा अपमान है.” उन्होंने सवाल किया, “यदि इसकी (आरएसएस) कार्यप्रणाली में रत्ती भर भी अवैधता होती, तो कांग्रेस सहित पिछली सरकारें कार्रवाई करने में विफल क्यों रहीं?”
जम्मू-कश्मीर के भाजपा सांसद ने अपने विकास फंड का 94% हिस्सा उत्तरप्रदेश में खर्च कर दिया
सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने जम्मू-कश्मीर से भाजपा के राज्यसभा सदस्य गुलाम अली खटाना पर निशाना साधा है. उन पर सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडी) के 94% फंड उत्तर प्रदेश में खर्च करने का आरोप है.
‘फ़ैयाज़ वानी” के अनुसार, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और विधायक तनवीर सादिक ने कहा, “अगर उनके विकास कोष का 94% हिस्सा उत्तर प्रदेश में खर्च किया जाता है, तो जम्मू-कश्मीर से सांसद मनोनीत करने का क्या उद्देश्य है? यह एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है: जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक बनकर रह गया है, जबकि यहाँ के लोगों को उनके उचित हिस्से से वंचित किया जा रहा है. यह शर्मनाक और अस्वीकार्य है. हमारे लोग प्रतिबद्धता के हकदार हैं, भाजपा के टोकनवाद (प्रतीकवाद) के नहीं. जम्मू को जागने की जरूरत है.”
भाजपा ने 56 वर्षीय गुर्जर नेता खटाना को 2022 में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया था.
पीडीपी नेता आदित्य गुप्ता ने कहा, “खटाना के एमपीएलएडी फंड के माध्यम से किए गए कुल 176 कार्यों में से 144 उत्तरप्रदेश में हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से संसद में प्रवेश किया, लेकिन उनका विकास फंड उत्तर प्रदेश में चला गया.”
हुड्डा से लेकर सैलजा तक: पूर्व सांसद की पदयात्रा पर हरियाणा कांग्रेस में उत्साह और रस्साकशी?
द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा में पूर्व सांसद बृजेंद्र सिंह की ‘सद्भावना यात्रा’ ने राज्य की राजनीति, विशेषकर कांग्रेस के भीतर नई हलचल पैदा कर दी है. राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ से प्रेरित होकर शुरू की गई इस यात्रा ने पिछले 4 महीनों में 1,800 किलोमीटर का सफर तय किया है. लेकिन सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जहां पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खेमे ने इससे दूरी बना रखी है, वहीं उनके विरोधी गुट के कई बड़े नेता इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं.
रिपोर्ट बताती है कि राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से बृजेंद्र सिंह अब तक 51 सीटों से गुजर चुके हैं. अंबाला और यमुनानगर को पार करने के बाद यह यात्रा अब कुरुक्षेत्र पहुंच चुकी है. यमुनानगर एकमात्र ऐसा जिला रहा जहां पार्टी के जिला अध्यक्ष और दोनों कांग्रेस विधायकों—रेणु बाला और अकरम खान—ने उनका साथ दिया. वहीं अंबाला में हुड्डा के करीबी निर्मल सिंह को छोड़कर बाकी पूरी यूनिट बृजेंद्र सिंह के साथ खड़ी नज़र आई.
दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में केवल 2 विधायक—आदित्य सुरजेवाला और विनेश फोगाट—ही इस यात्रा में शामिल हुए थे. लेकिन अब राज्यसभा सांसद रणदीप सुरजेवाला, सिरसा सांसद कुमारी सैलजा, कैप्टन अजय सिंह यादव और कुलदीप शर्मा जैसे कद्दावर नेता, जिन्हें हुड्डा का विरोधी माना जाता है, इस यात्रा को समर्थन दे रहे हैं.
हुड्डा खेमे की प्रतिक्रिया नपी-तुली रही है. हुड्डा ने कहा, “अगर यह कांग्रेस का कार्यक्रम होता तो मैं शामिल होता. हर कोई अपने तरीके से कार्यक्रम करने के लिए स्वतंत्र है.” हालांकि, उन्होंने इसे एक “अच्छी पहल” बताया. वहीं, हुड्डा के करीबी हिसार सांसद जय प्रकाश ने इसे “व्यक्तिगत यात्रा” करार दिया. सूत्रों के मुताबिक, हुड्डा खेमे के नेताओं ने “रणनीतिक दूरी” बना रखी है.
गौरतलब है कि बृजेंद्र सिंह के पिता, पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह और दादा सर छोटू राम की विरासत उन्हें किसानों और जाट समुदाय में एक मजबूत आधार देती है. बृजेंद्र सिंह का कहना है, “मेरी यात्रा गुटबाजी से परे है. यह वोट मांगने का अभ्यास नहीं है, बल्कि 36 बिरादरियों के भाईचारे को मजबूत करने का प्रयास है.” हालांकि, राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर यह यात्रा अपनी गति बनाए रखती है, तो 53 वर्षीय पूर्व आईएएस अधिकारी बृजेंद्र सिंह राज्य में एक प्रमुख शक्ति बनकर उभर सकते हैं.
अमेरिकी ट्रेड डील की कीमत चुका रहे सोयाबीन किसान, एमएसपी से नीचे लुढ़के दाम
हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते का सीधा और नकारात्मक असर महाराष्ट्र के किसानों पर देखने को मिल रहा है. ‘फ्रंटलाइन’ की रिपोर्ट के अनुसार, 7 फरवरी को इस समझौते की घोषणा होते ही घरेलू बाजार में सोयाबीन की कीमतें धड़ाम से गिर गईं. यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब महाराष्ट्र में चुनाव नजदीक हैं और सोयाबीन उत्पादक क्षेत्र राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं.
मराठवाड़ा के धाराशिव जिले के 68 वर्षीय किसान मधुकर कुलकर्णी ने अच्छे भाव की उम्मीद में अपनी 27 क्विंटल सोयाबीन रोक रखी थी. 25 जनवरी को भाव 5,750 रुपये प्रति क्विंटल था, जो इस साल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 5,328 रुपये से ज्यादा था. लेकिन जैसे ही अमेरिका के साथ डील की खबर आई, बाजार में मायूसी छा गई. 7 फरवरी को ही दाम गिरकर 5,300 रुपये पर आ गए और 11 फरवरी तक लातूर मंडी में यह 5,100 रुपये प्रति क्विंटल तक लुढ़क गए.
इस समझौते के तहत भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों जैसे सोयाबीन तेल, डिस्टिलर्स ग्रेन, और फलों पर शुल्क कम करने या हटाने की बात कही है. इसका असर यह हुआ कि डीटेल्स बाहर आने से पहले ही बाजार ने प्रतिक्रिया दे दी. लातूर के व्यापारी रमेश सूर्यवंशी बताते हैं, “किसी को ठीक से नहीं पता कि डील क्या है, लेकिन अब बड़ी कंपनियां जनवरी वाले रेट पर खरीद नहीं रही हैं.”
अमेरिका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक है और वह भारत के विशाल बाजार पर नजर गड़ाए हुए है. अमेरिकी कृषि विभाग का अनुमान है कि 2050 तक भारत में सोयाबीन की मांग 93 मिलियन टन तक पहुंच जाएगी.
राजनीतिक रूप से यह मुद्दा भाजपा के लिए मुसीबत बन सकता है. 2024 के लोकसभा चुनावों में मराठवाड़ा और विदर्भ के सोयाबीन बेल्ट में भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा था. अब जिला परिषद और स्थानीय चुनावों से पहले दामों का गिरना किसानों में गुस्सा पैदा कर रहा है. किसान सभा के नेता अजीत नवले ने इसे “किसानों के हितों के खिलाफ” बताया है, वहीं किसान संघर्ष समिति के माणिक कदम ने इसे “खेती को अमेरिका के पास गिरवी रखने” जैसा करार दिया है.
देश के पहले दलित कार्डिनल पूला एंथनी ने सरकार से माइनारिटी वर्गों की सुरक्षा मांगी
भारत के पहले दलित कार्डिनल और कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) के नवनिर्वाचित अध्यक्ष पूला एंथनी ने सरकार से स्पष्ट मांग की है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक साक्षात्कार में, कार्डिनल एंथनी ने कहा कि चर्च का भविष्य भारत में उज्ज्वल है क्योंकि यहाँ लोगों में आस्था और सामुदायिक जीवन के प्रति गहरा सम्मान है, जो कई यूरोपीय देशों से अलग है.
ईसाइयों पर हमलों की खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में किसी भी तरह की हिंसा या धमकी स्वीकार्य नहीं है. हमारा जवाब बदला लेना नहीं, बल्कि संवाद, कानूनी रास्ता और प्रार्थना है.” उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ घटनाओं और गलतफहमियों के कारण ईसाइयों में चिंता है, लेकिन वे दहशत में नहीं जी रहे हैं.
सरकार से उम्मीदों पर बोलते हुए कार्डिनल ने कहा, “हम तीन साधारण चीजें मांगते हैं—संवैधानिक अधिकारों की रक्षा, हिंसा की निष्पक्ष जांच और यह सार्वजनिक आश्वासन कि अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं. हम कोई विशेष विशेषाधिकार नहीं मांग रहे, बस संविधान का समान पालन चाहते हैं.” उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर कोई अपराध होता है, तो उसे अपराध की तरह देखा जाना चाहिए, विचारधारा से उसे सही नहीं ठहराया जाना चाहिए.
दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा देने के सवाल पर उन्होंने इसे न्याय और समानता का मुद्दा बताया. उन्होंने कहा, “धर्म बदलने से सामाजिक भेदभाव खत्म नहीं हो जाता. चर्च इस मांग का समर्थन करता है कि एससी का दर्जा धर्म तक सीमित नहीं होना चाहिए.”
धर्मांतरण विरोधी कानूनों पर उन्होंने स्पष्ट किया कि चर्च जबरन धर्मांतरण का समर्थन नहीं करता, लेकिन अस्पष्ट कानूनों का इस्तेमाल अक्सर उत्पीड़न के लिए किया जाता है. अपनी दृष्टि साझा करते हुए, कार्डिनल एंथनी ने कहा कि चर्च को गरीबों और दलितों के साथ खड़ा होना होगा और संस्था के भीतर भी जातिगत भेदभाव को मिटाना होगा.
पहलगाम आतंकी हमले के पीड़ित की बेटी का दर्द: 10 महीने बाद भी सरकारी नौकरी का इंतज़ार
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के दस महीने बीत जाने के बाद भी एक पीड़ित परिवार को सरकार द्वारा किए गए वादे पूरे होने का इंतज़ार है. टेलीग्राफ द्वारा पीटीआई के हवाले से प्रकाशित खबर के अनुसार, असावरी जगदाले, जिनके पिता संतोष जगदाले पिछले साल 22 अप्रैल को पहलगाम घाटी में हुए आतंकी हमले में मारे गए थे, अभी भी महाराष्ट्र सरकार द्वारा वादा की गई नौकरी की राह देख रही हैं.
संतोष जगदाले उन 26 लोगों में शामिल थे, जिन्हें आतंकवादियों ने बैसारन के मीडोज में गोलियों से भून दिया था. इस हमले के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के छह पीड़ितों के परिवारों के लिए 50 लाख रुपये की वित्तीय सहायता और उनके निकटतम परिजनों के लिए सरकारी नौकरी की घोषणा की थी.
पुणे में पत्रकारों से बात करते हुए असावरी ने अपनी पीड़ा व्यक्त की. उन्होंने कहा, “वादा किए हुए 10 महीने हो चुके हैं कि मुझे सरकार में नौकरी मिलेगी, लेकिन दुर्भाग्य से इस संबंध में अभी तक कोई प्रगति नहीं हुई है.” असावरी ने बताया कि राज्यसभा सांसद मेधा कुलकर्णी ने राज्य सरकार द्वारा दिए गए आश्वासनों के संबंध में केंद्रीय मंत्री अमित शाह को पत्र लिखा है. उन्होंने यह भी कहा कि वह उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के कार्यालयों के संपर्क में हैं, लेकिन अधिकारी केवल यही कह रहे हैं कि वे मामले पर नज़र बनाए हुए हैं.
असावरी के अनुसार, पिता की मृत्यु के बाद से उनका परिवार गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहा है और उनकी बचत लगभग खत्म हो चुकी है. उन्होंने अधिकारियों से प्रक्रिया में तेजी लाने और जल्द से जल्द वादा पूरा करने का आग्रह किया है.
इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए, महाराष्ट्र भाजपा के मीडिया प्रभारी नवनाथ बन ने कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करेंगे और मुख्यमंत्री के सामने यह मुद्दा उठाएंगे. उन्होंने संवाददाताओं से कहा, “भाजपा का रुख जगदाले परिवार और आतंकी हमले से प्रभावित अन्य परिवारों का समर्थन करना है. मैं आश्वासन देता हूं कि मैं व्यक्तिगत रूप से मुख्यमंत्री और राज्य पार्टी नेतृत्व के साथ इस मामले को उठाऊंगा.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि मुख्यमंत्री फडणवीस एक संवेदनशील नेता हैं और वे जल्द से जल्द न्याय सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे.
उर्वरक उद्योग पर सरकारी नियंत्रण का शिकंजा: यूपी में गैर-सब्सिडी वाले उत्पादों पर रोक
भारत में उर्वरक उद्योग निजी हो सकता है, लेकिन यह क्या बेचेगा, कहाँ बेचेगा और किस कीमत पर बेचेगा, यह पूरी तरह सरकार तय करती है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस नियंत्रण को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है. 13 जनवरी को जारी एक आदेश के जरिए यूपी सरकार ने यूरिया निर्माताओं द्वारा ‘गैर-सब्सिडी’ वाले उर्वरकों की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगा दी है. यह प्रतिबंध इफको, चंबल फर्टिलाइजर्स और कोरोमंडल जैसी लगभग 15 बड़ी कंपनियों पर लागू होता है. दरअसल, ये कंपनियां सब्सिडी वाले यूरिया और डीएपी के अलावा प्रीमियम उत्पाद (जैसे कैल्शियम नाइट्रेट, जिंक सल्फेट, पानी में घुलनशील एनपीके) भी बेचती हैं. ये उत्पाद ड्रिप सिंचाई और फलों-सब्जियों की खेती के लिए बेहद कारगर होते हैं और इनका बाजार बहुत छोटा (मात्र 0.4 मिलियन टन) है. यूपी सरकार का तर्क है कि कंपनियां किसानों को यूरिया के साथ जबरदस्ती ये महंगे उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर कर रही थीं, जिसे ‘टैगिंग’ कहा जाता है. हालांकि, उद्योग जगत का कहना है कि 13,000 करोड़ रुपये के सब्सिडी वाले बाजार के सामने गैर-सब्सिडी वाला बाजार मात्र 1,300 करोड़ का है, इसलिए बड़े पैमाने पर ‘टैगिंग’ का आरोप तार्किक नहीं लगता. उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ये उत्पाद केंद्र सरकार के ‘फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर, 1985’ के तहत मान्य हैं. प्रधानमंत्री मोदी खुद मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए इन पोषक तत्वों के इस्तेमाल की वकालत करते रहे हैं. ऐसे में राज्य सरकार का यह प्रतिबंध न केवल निवेश के माहौल के लिए बुरा है, बल्कि यह किसानों को आधुनिक और कुशल खेती से भी वंचित करेगा. रिपोर्ट के अनुसार, यूरिया की कालाबाजारी या ज्यादा दाम पर बिक्री की असली वजह घरेलू उत्पादन में कमी और भारी मांग है, न कि ये प्रीमियम उत्पाद.
82 साल की लेखिका की ओसीआई अर्जी पर आईबी के बंद लिफाफे के बाद हाईकोर्ट की ना.
भारत को बदनाम करने की इजाजत नहीं दी जा सकती: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि देश को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बदनाम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. ‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने यह टिप्पणी यूके स्थित 82 वर्षीय लेखिका और अकादमिक अमृत विल्सन के ओसीआई कार्ड रद्द करने के मामले की सुनवाई के दौरान की. केंद्र सरकार ने एक सीलबंद लिफाफे में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की रिपोर्ट अदालत को सौंपी थी. रिपोर्ट देखने के बाद जस्टिस कौरव ने कहा, “हमें इतना सहिष्णु राज्य नहीं होना चाहिए कि हम अपने ही देश की आलोचना और बदनामी अंतरराष्ट्रीय मंच पर होने दें. आपके खिलाफ आईबी की रिपोर्ट है. यह सिर्फ दो ट्वीट्स की बात नहीं है, बल्कि भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप हैं.” अमृत विल्सन का ओसीआई कार्ड 2023 में ‘भारत विरोधी प्रचार’ के आरोप में रद्द कर दिया गया था. उनकी ओर से पेश वरिष्ठ वकील त्रिदीप पेस ने तर्क दिया कि विल्सन का कोई भी काम भारत विरोधी नहीं है और सीलबंद लिफाफे की प्रक्रिया का सुप्रीम कोर्ट ने भी विरोध किया है. हालांकि, कोर्ट ने आरोपों को गंभीर मानते हुए मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त तय की है.
क्या भारत एआई में अमेरिका और चीन का विकल्प बन सकता है?
भारत विकासशील देशों में ‘एआई इम्पैक्ट समिट’ की मेजबानी करने वाला पहला देश बन गया है. ‘रेस्ट ऑफ वर्ल्ड’ में अंबा काक और आस्था कपूर की रिपोर्ट के अनुसार, भारत खुद को अमेरिका और चीन के वर्चस्व वाले एआई मॉडल के विकल्प यानी “तीसरे रास्ते” के रूप में पेश कर रहा है. यह मॉडल ‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ पर आधारित है, जिसका उद्देश्य कॉर्पोरेट मुनाफे के बजाय जनहित है. हालांकि, लेख में सवाल उठाया गया है कि क्या भारत बिग टेक कंपनियों के सामने आत्मसमर्पण किए बिना यह कर पाएगा? भारत एक तरफ ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बनने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर और निवेश के लिए अमेरिकी कंपनियों (जैसे गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट) का स्वागत कर रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, ‘एआई फॉर गुड’ का नारा अक्सर सत्ता के असंतुलन और श्रम शोषण को छिपा लेता है. डेटा लेबलिंग और कंटेंट मॉडरेशन के लिए विकासशील देशों के सस्ते श्रम का इस्तेमाल किया जा रहा है. भारत का डीपीआई मॉडल भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है; उदाहरण के लिए, यूपीआई पर गूगल पे और फोनपे का दबदबा है. शिखर सम्मेलन में भारत के सामने चुनौती यह है कि वह केवल बिग टेक कंपनियों के लिए एक बाजार बनकर न रह जाए, बल्कि सही मायने में एआई की शक्ति का विकेंद्रीकरण करे.
म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन
म्यूनिख में रूबियो ने पेश किया ‘मागा’ का विदेश नीति सिद्धांत, यूरोप को दी चेतावनी
एक्सियोस के रिपोर्टर मार्क कैपूटो की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी विदेश मंत्री (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) मार्को रूबियो ने शनिवार को जर्मनी में ‘म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन’ के दौरान ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति का खाका दुनिया के सामने रखा. अपने भाषण में रूबियो ने ‘मेक द वेस्ट ग्रेट अगेन’ का संदेश दिया. यह पिछले साल इसी मंच पर उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस द्वारा दिए गए भाषण से मिलता-जुलता था, लेकिन उनका लहज़ा वेंस के मुकाबले थोड़ा नरम और कूटनीतिक था.
रूबियो ने स्पष्ट किया कि ट्रंप-वेंस-रूबियो का यह सिद्धांत पुरानी मान्यताओं को खारिज करता है कि मुक्त व्यापार से दुनिया में शांति आती है या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था वास्तव में “नियम-आधारित” है. इसके बजाय, उन्होंने राष्ट्रीय संप्रभुता, सैन्य शक्ति और पश्चिमी सभ्यता के मूल्यों पर जोर दिया.
सम्मेलन में रूबियो ने बड़े पैमाने पर प्रवास के खतरों पर चेतावनी दी. उन्होंने कहा, “अपने देशों में कौन और कितने लोग आते हैं, इसे नियंत्रित करना ज़ेनोफोबिया (विदेशी लोगों से नफरत) नहीं है. यह राष्ट्रीय संप्रभुता का मूल कार्य है.” उन्होंने इसे पश्चिमी सभ्यता के अस्तित्व के लिए जरूरी बताया.
रूबियो ने चीन का नाम लिए बिना कहा कि अमेरिका के सबसे बड़े रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी ने व्यापार नियमों का फायदा उठाकर अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को खोखला कर दिया है. उन्होंने “क्लाइमेट कल्ट” (जलवायु परिवर्तन को लेकर कट्टरता) की भी आलोचना की और कहा कि प्रतिद्वंद्वी देश इसका इस्तेमाल अमेरिका के खिलाफ हथियार के रूप में कर रहे हैं. रूबियो ने यूरोप को याद दिलाया कि वे और अमेरिका “पश्चिमी सभ्यता” के साझा इतिहास और ईसाई आस्था से जुड़े हैं. उन्होंने कहा कि सेनाएं “अमूर्त विचारों” के लिए नहीं, बल्कि अपने लोगों और जीवन जीने के तरीके के लिए लड़ती हैं. उनका संदेश साफ़ था: अमेरिका अकेले दम पर भी अपनी रक्षा करने को तैयार है, लेकिन वह चाहता है कि यूरोप इस मिशन में उसका साथ दे.
ट्रंप के ‘लेम डक’ साबित होने पर डेमोक्रेट्स की नज़र, भविष्य की तैयारी में यूरोप
पोलिटिको के रिपोर्टर जोनाथन मार्टिन की म्यूनिख से रिपोर्ट बताती है कि इस साल का सुरक्षा सम्मेलन वर्तमान खतरों से ज्यादा ‘भविष्य’ पर केंद्रित रहा. फरवरी 2026 के इस माहौल में, राष्ट्रपति डोलाल्ड ट्रंप का प्रभाव कमज़ोर होता दिख रहा है और वह “लेम डक” (प्रभावहीन शासक) की तरह महसूस किए जा रहे हैं.
सम्मेलन में अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के कई संभावित राष्ट्रपति उम्मीदवार, जैसे कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम और न्यूयॉर्क की सांसद एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज (एओसी), की मौजूदगी चर्चा का विषय रही. उन्होंने यूरोपीय नेताओं को भरोसा दिलाया कि “ट्रंप अस्थायी हैं, लेकिन अटलांटिक रिश्ते स्थायी हैं.” एओसी ने कहा कि डेमोक्रेटिक पार्टी अपने सहयोगियों के प्रति प्रतिबद्ध है.
पूर्व स्पीकर नैन्सी पेलोसी भी वहां मौजूद थीं और उन्होंने भविष्यवाणी की कि 10 महीने बाद होने वाले चुनावों में डेमोक्रेट्स जीतेंगे और हकीम जेफरीज स्पीकर बनेंगे. उन्होंने कहा कि ट्रंप द्वारा चुनावों में हस्तक्षेप की संभावना के लिए उनकी पार्टी तैयार है.
यूरोपीय नेता भी ट्रंप के बाद की दुनिया की तैयारी कर रहे हैं. जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यूरोप को अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय एक स्वतंत्र भू-राजनीतिक शक्ति बनने और अपना खुद का ‘न्यूक्लियर अम्ब्रेला’ (परमाणु सुरक्षा कवच) बनाने की बात कही.
सम्मेलन के बाहर ईरान में लोकतंत्र की मांग को लेकर भारी प्रदर्शन हुए, जिसमें अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने “मेक ईरान ग्रेट अगेन” की टोपी पहनकर हिस्सा लिया. लेकिन सम्मेलन के भीतर असली चर्चा 2026 और 2028 के अमेरिकी चुनावों पर थी. गवर्नर न्यूसम ने ट्रंप को “विध्वंसक राष्ट्रपति” करार दिया और कहा कि “किसी खलिहान को गिराना आसान है, लेकिन उसे बनाने के लिए एक अच्छे बढ़ई की ज़रूरत होती है,” और अब अमेरिका को रिश्तों को सुधारने वाले उसी ‘बढ़ई’ की तलाश है.
विश्लेषण: दुष्यंत अरोड़ा
नसीर, तेलतुंबड़े और जोस तीन बदतमीज़, बल्कि जिद्दी भी
दुष्यंत टिप्पणीकार होने के साथ वकील हैं. यह लेख उनके सब्सटैक पन्ने और क्विंट में छपा है.
तथ्य: आनंद तेलतुंबड़े, नसीरुद्दीन शाह और विनोद जोस को एक ही हफ्ते में तीन कार्यक्रमों से आने के लिए मना कर दिया गया.
शाह को 1 फरवरी को मुंबई यूनिवर्सिटी में जश्न-ए-उर्दू में बोलना था. एक रात पहले, यूनिवर्सिटी ने फोन करके कहा कि मत आना. बाद में उन्होंने दर्शकों को बताया कि शाह ने मना कर दिया था. उन्होंने नहीं किया था.
‘द कारवां’ के पूर्व कार्यकारी संपादक विनोद जोस को केरल के सेंट थॉमस कॉलेज में “भारतीय लोकतंत्र की स्थिति” पर व्याख्यान देने के लिए दो महीने पहले आमंत्रित किया गया था. 5 फरवरी के कार्यक्रम से दो दिन पहले, कॉलेज ने उन्हें “विवादास्पद” कहा और रद्द कर दिया.
आनंद तेलतुंबड़े को 5 फरवरी को काला घोड़ा आर्ट्स फेस्टिवल में अपने जेल संस्मरण पर चर्चा करनी थी. एक दिन पहले, मुंबई पुलिस ने रद्द करने का मौखिक निर्देश दिया - कोई कागजी सबूत नहीं. आयोजकों को अपनी पोस्ट हटाने के लिए कहा गया. तेलतुंबड़े भीमा कोरेगांव मामले में 31 महीने जेल में बिता चुके हैं और जमानत पर बाहर हैं.
ये रद्दीकरण 31 जनवरी, 3 फरवरी और 4 फरवरी को हुए. मुंबई में आरएसएस का शताब्दी समारोह 7-8 फरवरी को होना था. केवल अधिनायकवाद, सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में बात करना और आगे बढ़ जाना बहुत सरल होगा. हालाँकि, इसे पूरी तरह से समझने के लिए, हमें आरएसएस माफिया के काम करने के तरीके पर गौर करना होगा और इसके लिए हमें खुद से कुछ सवाल पूछने होंगे.
पहला, वे ही क्यों? शाह, तेलतुंबड़े और जोस में क्या समानता है? जवाब है उनके समान अपराध, उनमें से दो. उनका पहला अपराध यह है कि वे इस ज़िद की वेदी के भक्त हैं कि वे व्यक्तियों की तरह सोचेंगे. वे इस बात के जीते-जागते सबूत हैं कि ‘ग्रुप थिंक’ (भीड़ की तरह सोचना) को नकारना संभव है.
तेलतुंबड़े हिंदुत्व की आलोचना करते हैं, हाँ, लेकिन मार्क्सवादियों, अंबेडकरवादियों और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भी आलोचना करते हैं. वह मिस्टर राहुल गांधी की जाति जनगणना की माँग के विरोधी हैं, जिसे अब बीजेपी ने स्वीकार कर लिया है.
विनोद जोस, जो 2023 तक द कारवां पत्रिका के कार्यकारी संपादक थे, को पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के आलोचनात्मक प्रोफाइल के लिए वैश्विक प्रशंसा मिली, जो उन्होंने प्रकाशन के लिए तब किया था जब डॉ. सिंह प्रधानमंत्री थे. प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल के दौरान कारवां की पत्रकारिता भी असाधारण रूप से साहसी रही है और केवल नाम के लिए नहीं. आप ऐसे आदमी और ऐसे प्रकाशन को किस श्रेणी में रखेंगे जो अपना काम करता रहता है, चाहे सत्ता में कोई भी हो?
नसीरुद्दीन शाह अपनी खुद की इंडस्ट्री के आगे भी न झुकने के लिए मशहूर हैं, जहाँ इधर-उधर की थोड़ी सी चापलूसी आपके बैंक खातों में कुछ करोड़ जोड़ सकती है. वे उनका लगातार मज़ाक उड़ाते हैं, फिल्मफेयर अवार्ड्स को दरवाज़े के हैंडल के रूप में इस्तेमाल करने का दावा करते हैं, राजेश खन्ना को एक औसत अभिनेता कहा और कहा कि अमिताभ बच्चन ने एक भी महान फिल्म नहीं की है. उन्होंने भाई-भतीजावाद की आलोचना का ट्रेंड बनने से शायद बहुत पहले ही इंडस्ट्री पर इसका आरोप लगाया था. वे सत्ता के घोर आलोचक रहे हैं, और उन्होंने जीवन भर ऐसी फिल्मों में अभिनय किया है जो सत्ता को चुनौती देती हैं.
आप ऐसे लोगों के साथ क्या करते हैं? आप उन पर क्या ठप्पा लगाते हैं? यह एक समस्या है. वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर, मेरे सबसे प्यारे दोस्त जिनका पिछले साल निधन हो गया, उन्होंने एक बार मुझे बताया कि उनकी रेजिडेंशियल सोसाइटी के मैनेजमेंट ने सभी निवासियों को एक पत्र भेजा जिसमें माँग की गई थी कि वे सोसाइटी द्वारा बनाए गए नियमों - वर्तमान और भविष्य - के सामने “बिना शर्त समर्पण” करें. उन्होंने जवाब में लिखा, “मैं अपने आप के खिलाफ भी लगातार विद्रोह में रहता हूँ, मैं किसी और के सामने बिना शर्त समर्पण कैसे कर सकता हूँ?”
यही जोस, तेलतुंबड़े और शाह की समस्या है. वे किसी के भी अस्तबल में भेड़ बनने से इनकार करते हैं. इस दौर और समय में जहाँ हर कोई आपको एक जैसी श्रेणियों में समेटने पर तुला है, उनका वर्णन करने का एकमात्र तरीका है - निहायती बदतमीज़.
दूसरा, वे ढीठ भी हैं. जोस पर लगभग एक दर्जन राजद्रोह के मामले चल रहे हैं. तेलतुंबड़े ने जेल में साल बिताए हैं. शाह बदनामी के एक निरंतर सार्वजनिक अभियान का शिकार रहे हैं. हाल ही में, टाइम्स नाउ के एक कर्मचारी ने, जो मानता है कि वह जो कर रहा था वह पत्रकारिता है, मुंबई हवाई अड्डे पर शाह को घेर लिया और उनके चेहरे पर माइक ठूँस दिया. राजद्रोह के मामले, जेल, उत्पीड़न, और फिर भी ये लोग सुधरने वाले नहीं हैं.
निजी तौर पर, आरएसएस के लोग विभिन्न प्रगतिशील कलाकारों और शिक्षाविदों के साथ बैठकें करना चाहते हैं और संक्षेप में - आप बस हमारे साथ क्यों नहीं जुड़ जाते, हम वहां इस संवाद को जारी रख सकते हैं, हम उतने बुरे नहीं हैं जितना आप सोचते हैं.
जो मुझे इसके अन्य पहलुओं पर लाता है - टाइमिंग और प्रक्रिया . आप शाह, तेलतुंबड़े, जोस को, जो आरएसएस के नज़रिए की बुराइयों का सबसे विस्तृत इतिहास लिखने वालों में से एक हैं, उन दिनों से ठीक पहले खुले तौर पर बोलने नहीं दे सकते जब आरएसएस के सामने फिल्म उद्योग के “ए-लिस्टर्स” दंडवत हो रहे हैं और एक के बाद एक उन्हें एक ही शब्द कह रहे हैं - “प्रेरक”.
यह अधिनायकवाद की कमज़ोरी है. एक छोटी सी पिन भी एक बहुत बड़े गुब्बारे को फोड़ सकती है. जब आप भागवत का भाषण सुनते हैं, तो आपको कैंसिलेशन के बारे में और समझ मिलती है. भागवत कहते हैं कि आप घुसपैठियों को उनकी भाषा से पहचान सकते हैं. नसीरुद्दीन शाह को उर्दू के बारे में एक फेस्टिवल में उर्दू पर बोलना था.
भागवत का तर्क है कि भारतीय समाज अब लगभग परिपूर्ण है. अंबेडकर के दामाद तेलतुंबड़े न केवल अपने जेल में बिताए समय के बारे में बल्कि अन्य कैदियों की कहानियों और स्थिति के बारे में भी बात करने वाले थे. जेल एक ऐसा कैनवास है जहाँ स्टेट (राज्य) अपनी अक्षमता और क्रूरता को स्पष्ट रूप से चित्रित करता है.
भागवत का तर्क है कि सभी नागरिकों को एक-दूसरे पर शक करना चाहिए और जो कोई भी घुसपैठिये जैसा दिखता है उसकी रिपोर्ट करनी चाहिए. यहीं पर वह भाषा का ज़िक्र करते हैं. वह कहते हैं कि रोज़गार सभी को दिया जाना चाहिए “यहाँ तक कि मुसलमानों को भी”. वह कहते हैं कि आप हाथ से किए जाने वाले छोटे कामों में घुसपैठिये पा सकते हैं और ये वो काम हैं जिन्हें हिंदुओं ने छोड़ दिया है.
तो, घुसपैठिये उस सेक्टर में पाए जा सकते हैं जहाँ बहुत कम मुसलमान हैं और उन घुसपैठियों की पहचान उनकी भाषा से की जानी चाहिए. हालाँकि, हमें “यहाँ तक कि” मुसलमानों को भी नौकरी देनी चाहिए. यह आरएसएस के सदियों पुराने दोहरेपन का एक मास्टरक्लास है. उनका कैडर, जिसे यह संदेश दिया गया है, इसे पूरी तरह से समझ लेता है और इस प्रकार कई गोडसे पैदा होते हैं, जिन्हें बेशक आरएसएस अपना मानने से इनकार कर देता है.
इन सबसे कुछ दिन पहले, क्या आप किसी को लोकतंत्र के विचार के बारे में बात करने दे सकते हैं? यह तो रंग में भंग डालने वाली बात होगी. टाइमिंग के बारे में एक और महत्वपूर्ण बात है. बीजेपी, जिसने सोचा होगा कि बिहार विधानसभा और महाराष्ट्र बीएमसी चुनावी जीत के बाद सब कुछ आसान होगा, अब यूजीसी नियमों पर सवर्ण जातियों के विद्रोह, महाराष्ट्र में किसानों के मार्च, देश भर में शहरी बुनियादी ढांचे के पूरी तरह से ढहने के सबूतों से भरे सोशल मीडिया का सामना कर रही है. कई हलकों से गुस्सा है. उच्च सत्यनिष्ठा वाले लोग जो आलोचना को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सकते हैं, उनसे बचना ही बेहतर है.
जहाँ तक प्रक्रिया की बात है, ध्यान दें कि कैंसिलेशन आखिरी पल में आता है. ऐसा न केवल किसी भी आक्रोश, पुनर्विचार, वगैरह को रोकने के लिए किया जाता है, बल्कि अपमानित करने के लिए भी किया जाता है. एक दिहाड़ी मज़दूर ने, जिसने मुंबई में एक छोटा सा घर बनाया था जिसे बाद में तुरंत गिरा दिया गया, मुझे बताया कि अधिकारी घर का निर्माण पूरा होने का इंतज़ार करते हैं, बजाय इसके कि वे पता चलते ही हस्तक्षेप करें.
“दुष्ट हैं, कष्ट देने से खुशी मिलती है इन्हें”.
यह संभावित ए-लिस्टर उपस्थित लोगों के लिए एक संदेश के रूप में कार्य करता है. लाइन पर न चलने के परिणाम होते हैं. दुर्भाग्य से, कुछ ऐसे लोग हैं जो, नसीरुद्दीन शाह के शब्दों में, कोई परवाह नहीं करते. शाह ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख के साथ जवाब दिया. जोस ने कहा कि व्याख्यान पहले ही दिया जा चुका है, बिना उनके एक शब्द बोले. तेलतुंबड़े की किताब खरीदने और पढ़ने के लिए स्वतंत्र रूप से उपलब्ध है, और बीजेपी एक बार फिर ‘स्ट्रेइसैंड इफ़ेक्ट’ के चमत्कारों की खोज करने वाली है.
इतना ही नहीं. तीनों कार्यक्रमों में, दर्शक मुख्य रूप से युवा लोग होने वाले थे. ऐसे समय में जब ‘जेन ज़ी’ दुनिया भर में जवाबदेही की माँग कर रहा है, बीजेपी बिल्कुल नहीं चाहती कि युवा भारतीयों को आरएसएस शाखाओं में लाठियाँ भांजने के बजाय खुद के लिए सोचने की संभावना की भनक भी लगे.
जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने अंततः निमंत्रण वापस लेने का फैसला किया, चाहे दबाव के कारण या जानबूझकर, मेरे पास साझा करने के लिए एक किस्सा है.
महान महेश भट्ट ने एक बार मेरे साथ साझा किया कि फिल्म उद्योग में किसी ने उन्हें सूचित किया कि वे बीजेपी-आरएसएस को अपनाने जा रहे हैं. बहुत हो चुका, जीवन सरल होना चाहिए, वगैरह.
उनका जवाब था - कृपया हर तरह से ऐसा करें लेकिन बस याद रखें, यह मत सोचिए कि जब आपकी बारी आएगी तो यह आपको बचा लेगा.
इस पोस्ट के साथ दुष्यंत ने हबीब जालिब का एक वीडियो लिंक भी साझा किया है, जो है तो पाकिस्तान के बारे में. पर थोड़ा सोचेंगे तो तार थोड़े जुड़े हुए मिलें.
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