16/03/2026: ट्रंप फंसे जंग में | मौकापरस्ती के उसूल पर आकार पटेल | लद्दाख में लोग सड़क पर | आरएसएस पर बैन की मांग | रसगुल्ले से मौत | शॉल वाले पर कविता | महमूदाबाद को राहत
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
ईरान युद्ध: ‘एस्केलेशन ट्रैप’ में फँसे डोनाल्ड ट्रंप, इज़रायल-ईरान तनाव से दुनिया भर में मंडराया तेल और गैस संकट.
भारत पर असर: होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने से भारत में LPG संकट, विदेश मंत्री एस. जयशंकर कर रहे हैं ईरान से जहाज़ों को निकालने की बातचीत.
लद्दाख बंद: पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर लद्दाख में हज़ारों लोग उतरे सड़कों पर, केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण लेकिन कड़ा विरोध.
अमेरिकी रिपोर्ट: US कमीशन ने धार्मिक आज़ादी का हवाला देते हुए भारत की एजेंसी RAW और RSS पर प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश की.
हवाई हादसा खुलासा: एयर इंडिया विमान दुर्घटना (जिसमें 260 मौतें हुईं) के मामले में अमेरिकी सुरक्षा संगठन का दावा- बोइंग ने जानबूझकर छिपाई ख़राबी की रिपोर्ट.
शिक्षक सस्पेंड: एमपी में एलपीजी की कीमतों पर तंज कसते हुए पीएम मोदी की मिमिक्री करने वाला शिक्षक सस्पेंड.
इमरान खान के बेटों को वीजा देने से पाकिस्तान का इनकार; जेल में बंद पूर्व पीएम के स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं बढ़ीं
6 बरस में सिर्फ एक बहस में भाग लिया, लेकिन सभापति ने कर दीं बड़ी-बड़ी बातें; रिटायर हो गए रंजन गोगोई
नरेंद्र मोदी का अपमानजनक पखवाड़ा; नेतन्याहू को गले लगाने से लेकर एलपीजी की भीख तक
ईरान जंग का 17 वां दिन
ईरान युद्ध में कैसे फंसा ट्रंप का ‘एस्केलेशन ट्रैप’
एक्सियोस की एक विस्तृत रिपोर्ट में मार्क कैपुटो, बराक रविड और ज़ैचरी बसु ने इस बात का विश्लेषण किया है कि कैसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ युद्ध में एक जटिल जाल में फंसते नज़र आ रहे हैं. अपने पांच साल के कार्यकाल में, राष्ट्रपति ट्रंप ने हमेशा अपने अंतर्ज्ञान, आवेग और बिना पूर्व तैयारी के काम किया है. लेकिन ईरान युद्ध, जो अब अपने तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर रहा है, पहली ऐसी घटना है जहां ट्रंप की कार्यशैली ने उनके लिए बातों से मामले को सुलझाना या रातों-रात कोई जादुई हल निकालना असंभव कर दिया है.
यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि ट्रंप अपनी मनमानी और युद्ध की वास्तविकताओं के बीच बुरी तरह फंस सकते हैं. उन्हें एक त्वरित और स्पष्ट जीत की उम्मीद है. लेकिन टैरिफ (शुल्क) के विपरीत, जिन्हें तुरंत लागू और रद्द किया जा सकता है, युद्ध का परिणाम एकतरफ़ा नियंत्रण और त्वरित समाधानों से परे है. इसमें ईरान का भी अपना दखल है. ट्रंप फ़ारस की खाड़ी में तेल संकट को दूर करने के लिए काम कर रहे हैं. लेकिन ऐसा करने में, वह एक ‘एस्केलेशन ट्रैप’ (लगातार हमले बढ़ाने का जाल) में फंसने का जोखिम उठा रहे हैं, जहां एक मज़बूत ताकत को घटते फ़ायदों के बावजूद अपना दबदबा दिखाने के लिए लगातार हमले करने के लिए मजबूर होना पड़ता है. ‘एक्सियोस’ के मार्क कैपुटो से बात करते हुए ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने व्यावहारिक रूप से यह स्वीकार किया कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरानियों की हरकतों ने ट्रंप को अपने रुख पर और अधिक अड़ा दिया है.
वर्तमान स्थिति यह है कि इज़रायल ईरान में सत्ता परिवर्तन और व्यापक सैन्य तबाही चाहता है, क्योंकि वह लेबनान पर आक्रमण पर विचार कर रहा है. बेंजामिन नेतन्याहू ने कई बार दिखाया है कि जब ईरान की बात आती है, तो उनके पास ट्रंप को अपने पक्ष में करने की क्षमता है. दूसरी ओर, ईरान अपना अस्तित्व बचाना चाहता है और यह साबित करना चाहता है कि वह भविष्य के हमलों को रोकने के लिए सैन्य और आर्थिक रूप से दर्द दे सकता है. वहीं अन्य देश मध्य पूर्व के जलमार्गों और हवाई क्षेत्र के माध्यम से तेल और व्यापार के मुक्त प्रवाह की उम्मीद कर रहे हैं.
ट्रंप और उनके सहयोगियों द्वारा दी गई समय-सीमा के औसत से यह मान लेना उचित है कि प्रशासन को लगभग 4 से 6 सप्ताह तक चलने वाले एक गहन सैन्य अभियान की उम्मीद थी. इससे 1 अप्रैल (युद्ध का 33वां दिन) एक वास्तविक चुनौती का क्षण बन जाता है. लेकिन वाशिंगटन और दुनिया भर की राजधानियों में, अधिकारी बहुत लंबे संकट की तैयारी कर रहे हैं. ‘एक्सियोस’ के बराक रविड के अनुसार, प्रशासन और सहयोगी देशों के तीन अलग-अलग लोगों का मानना है कि मध्य पूर्व में अस्थिरता और अमेरिकी संलिप्तता सितंबर तक जारी रह सकती है, भले ही युद्ध एक कम तीव्रता वाले संघर्ष में बदल जाए. इज़रायल ने पत्रकारों को बताया है कि वह ईरान में हज़ारों अतिरिक्त लक्ष्यों पर कम से कम तीन और सप्ताह के हमलों की योजना बना रहा है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने रविवार को ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ के एड लूस के साथ एक फोन कॉल में कहा कि उन्होंने मूल रूप से ईरान को तबाह कर दिया है. उनके पास कोई नौसेना नहीं है, कोई विमान भेदी प्रणाली नहीं है, कोई वायु सेना नहीं है, सब कुछ ख़त्म हो गया है. ट्रंप के मुताबिक ईरान केवल पानी में बारूदी सुरंगें बिछाकर थोड़ी परेशानी पैदा कर सकता है. व्हाइट हाउस की प्रमुख उप प्रेस सचिव एना केली ने ज़ोर देकर कहा कि ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ महीनों की सावधानीपूर्वक योजना का परिणाम है. लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई कुछ और है. ट्रंप प्रशासन के भीतर कुछ लोगों को अब लगने लगा है कि ईरान पर हमला करना एक बड़ी गलती थी. प्रशासन के करीबी एक सूत्र ने कहा कि ट्रंप ने यह मानकर भारी गलती की कि वह ज़मीनी सेना भेजे बिना ही ईरान की सत्ता को उखाड़ फेंकेंगे.
सैन्य दृष्टिकोण से देखा जाए तो ईरान के मिसाइल और ड्रोन लॉन्च में भारी कमी आई है, अमेरिकी और इज़रायली वायु सेना के पास बमबारी करने का पूर्ण वर्चस्व है, ईरानी नौसेना का बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका है, और अयातुल्ला व वरिष्ठ नेता मारे गए हैं (इस कार्रवाई में अमेरिकी सेना के कम से कम 13 जवानों की भी जान गई है). लेकिन अगर ट्रंप कल वापस भी हट जाएं, तो ईरानी होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद रख सकते हैं और तेल की कीमतों को इतना बढ़ा सकते हैं कि अमेरिका को फिर से युद्ध में उतरना पड़ेगा. ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल एक अस्थायी युद्धविराम नहीं, बल्कि युद्ध के पूर्ण अंत की गारंटी चाहता है.
ट्रंप को अब एक महत्वपूर्ण सैन्य विस्तार पर कड़ा निर्णय लेना पड़ सकता है. ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर शुक्रवार रात कहा कि ईरान पूरी तरह से हार गया है और एक सौदा चाहता है, लेकिन ऐसा सौदा नहीं जिसे वह स्वीकार करेंगे. कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि इस युद्ध में अपनी जीत का दावा करने के लिए, ईरानी शासन को केवल जीवित रहने की आवश्यकता है.
युद्ध के तीसरे हफ़्ते में ट्रम्प के सामने कड़ी चुनौतियां : खार्ग द्वीप पर हमले का जोखिम और चीन से मदद की गुहार
न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार डेविड ई. सेंगर, एरिक श्मिट और सीएनएन की रिपोर्ट्स के अनुसार, युद्ध के तीसरे हफ़्ते में प्रवेश करते ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने गंभीर रणनीतिक धर्मसंकट खड़ा हो गया है. ट्रम्प को यह तय करना है कि वह इस महत्वाकांक्षी युद्ध को जारी रखें या वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर पड़ रहे इसके विनाशकारी प्रभावों को देखते हुए खुद को पीछे खींच लें. अब तक इस युद्ध में 13 अमेरिकी सैनिकों की जान जा चुकी है और पूरे मध्य पूर्व में 2,100 से अधिक लोग मारे गए हैं.
रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए हमलों ने ईरान के मिसाइल शस्त्रागार और नौसेना को भारी नुकसान पहुंचाया है, और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो चुकी है. इसके बावजूद, ईरान के बचे हुए सैन्य ढांचे और होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक करने की उसकी क्षमता ने पूरी दुनिया को संकट में डाल दिया है. ट्रम्प प्रशासन अब ईरान के मुख्य तेल बंदरगाह ‘खार्ग द्वीप’ और इस्फ़हान स्थित भूमिगत परमाणु भंडारण सुविधाओं पर जमीनी हमले के भारी जोखिमों का मूल्यांकन कर रहा है.
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट यह भी उजागर करती है कि ट्रम्प और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच रणनीतिक तनाव बढ़ रहा है. ट्रम्प ने इजरायल को बड़े तेल डिपो पर हमला करने से मना किया था, लेकिन नेतन्याहू ने यह सलाह नज़रअंदाज़ कर दी. इसके परिणामस्वरूप ईरान ने सऊदी अरब और यूएई के ऊर्जा ठिकानों पर ड्रोन हमले किए, जिससे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं.
सीएनएन के विश्लेषण के मुताबिक, इस अभूतपूर्व वैश्विक तेल संकट को सुलझाने के लिए ट्रम्प अब चीन की ओर देख रहे हैं. उन्होंने जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने के लिए चीन से मदद मांगी है और धमकी दी है कि अगर बीजिंग ने साथ नहीं दिया तो वह राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपनी आगामी शिखर बैठक को टाल सकते हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के पास ट्रम्प की मांगें मानने की कोई ठोस वजह नहीं है. चीन ने रणनीतिक रूप से कच्चे तेल का बड़ा भंडार जमा कर रखा है और वह किसी ऐसे युद्ध में अपने सैन्य संसाधनों को खतरे में नहीं डालना चाहेगा जो अमेरिका ने शुरू किया हो.
अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले का 17वां दिन: तेहरान पर बमबारी जारी, दुबई एयरपोर्ट के पास आग और ट्रम्प की चेतावनी
अल जज़ीरा की पत्रकार सारा शमीम और सीएनएन की जेसी युंग की रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध के 17वें दिन इजरायल ने तेहरान पर हमलों की एक नई लहर शुरू कर दी है. खाड़ी क्षेत्र में तनाव लगातार भड़क रहा है. सोमवार को दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास एक ड्रोन घटना के बाद ईंधन टैंक में आग लग गई, जिससे उड़ानों को अस्थायी रूप से रोकना पड़ा. हालांकि बाद में सीमित उड़ानें फिर से शुरू कर दी गईं.
ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी के अनुसार, ताजा इजरायली हमलों में उनके एक क्लिनिक को नुकसान पहुंचा है. युद्ध में अब तक ईरान में 1,444 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और 18,551 घायल हुए हैं. लेबनान में भी मौतों का आंकड़ा 850 के पार पहुंच गया है, जिनमें 100 से अधिक बच्चे शामिल हैं. इराक और लेबनान में भी लगातार हमले जारी हैं और अबु धाबी में एक मिसाइल हमले में एक नागरिक की मौत हुई है.
सीएनएन और न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नाटो और अन्य सहयोगी देशों को चेतावनी दी है कि वे होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने के लिए अपने युद्धपोत भेजें. ट्रम्प ने कहा कि अगर सहयोगी देश मदद नहीं करते हैं तो नाटो का भविष्य “बहुत खराब” हो सकता है. दुनिया के तेल आपूर्ति के 20 प्रतिशत हिस्से वाले इस मार्ग को ईरान ने ब्लॉक कर दिया है, जिससे वैश्विक तेल संकट पैदा हो गया है और ब्रेंट क्रूड की कीमतें 106.12 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं.
ट्रम्प ने एयर फोर्स वन से बयान देते हुए दावा किया कि अमेरिका ने ईरान की ड्रोन निर्माण क्षमता को तबाह कर दिया है. उन्होंने बिना किसी सबूत के यह भी आरोप लगाया कि ईरान अपनी सैन्य विफलताओं को छिपाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर झूठी खबरें फैला रहा है. वहीं, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सीबीएस न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में ट्रम्प के इस दावे को खारिज कर दिया कि ईरान युद्धविराम चाहता है. उन्होंने दो टूक कहा, “हमने कभी बातचीत की मांग नहीं की. हम जब तक ज़रूरी होगा, अपना बचाव करने के लिए तैयार हैं.”
संकट में ट्रंप और भारत की ‘विश्वगुरु’ कूटनीति पर उठे सवाल
हरकारा के लाइव शो ‘टॉकिंग न्यूज़ विद निधीश’ के अनुसार, अमेरिका-इज़राइल और ईरान युद्ध अपने 17वें दिन पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैल चुका है. अल जज़ीरा और सीएनएन के मुताबिक, दुनिया की 20% तेल आपूर्ति का रास्ता ‘होर्मुज़ जलडमरूमध्य’ पूरी तरह ठप है. पिछले 24 घंटों में इज़राइल ने तेहरान के मेहराबाद एयरपोर्ट पर हमले किए. दुबई में ड्रोन हमले से फ्यूल टैंक में आग लगी और उड़ानें रोकी गईं, जबकि अबू धाबी में मिसाइल गिरने से एक की मौत हो गई. सऊदी अरब ने 37 ड्रोन्स नष्ट किए हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की ड्रोन फैक्ट्रियां तबाह करने का दावा किया, जिसे ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सीबीएस न्यूज़ पर ख़ारिज करते हुए लड़ाई जारी रखने की बात कही. युद्ध में अब तक 2,200 से अधिक लोग (1,444 ईरानी, 850 लेबनानी और 13 अमेरिकी) मारे जा चुके हैं.
‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के विश्लेषण के अनुसार, ट्रंप इस समय एक बड़े ‘धर्मसंकट’ में हैं. यदि वे युद्ध से पीछे हटते हैं, तो इस्फ़हान के बंकरों में रखे 440 किलो यूरेनियम से ईरान के परमाणु बम बनाने का ख़तरा रहेगा. ईरान अपनी वायुसेना तबाह होने के बावजूद छोटी नावों और हैकर ग्रुप्स के ज़रिए ‘असममित युद्ध’ जीत रहा है. सीएनएन के मुताबिक, इस संकट में चीन सबसे मज़बूत स्थिति में है, क्योंकि ईरान होर्मुज़ से केवल ‘चीनी युआन’ में व्यापार करने वाले जहाज़ों को ही गुज़रने दे रहा है.
इस भू-राजनीतिक तूफ़ान का भारत पर गंभीर असर पड़ रहा है. ब्रेंट क्रूड ऑयल 106 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुका है. 85% तेल और 90% एलपीजी मध्य पूर्व से आयात करने वाले भारत में महंगाई का भारी ख़तरा है. साथ ही, खाड़ी में मौजूद 95 लाख भारतीयों की सुरक्षा और 50 बिलियन डॉलर के रेमिटेंस पर भी संकट है. ‘द इकोनॉमिस्ट’ और वरिष्ठ पत्रकार बॉबी घोष के विश्लेषण के अनुसार, भारत की ‘विश्वगुरु’ और ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ की छवि बुरी तरह बेनक़ाब हो गई है. विडंबना देखिए कि ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ (जिसमें ईरानी सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए) से ठीक 48 घंटे पहले पीएम मोदी यरूशलम में बेंजामिन नेतन्याहू को गले लगा रहे थे, लेकिन होर्मुज़ ब्लॉक होने पर भारत को कुकिंग गैस के लिए ईरान से मिन्नतें करनी पड़ीं.
भारत की कूटनीतिक ख़ामोशी भी सवालों के घेरे में है. जब अमेरिकी नेवी ने हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत ‘आईरिस देना’ (जो हाल ही में भारतीय नेवी का मेहमान था) को डुबाया और 80 नौसैनिक मारे गए, तब भी भारत ने विरोध में एक शब्द नहीं कहा. इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50% का भारी टैरिफ लगा दिया है. ‘द इकोनॉमिस्ट’ के अनुसार, अमेरिका द्वारा भारत को 30 दिन के लिए रूसी तेल ख़रीदने की छूट देना ऐसा था जैसे कोई मालिक अपने नौकर को पर्ची थमा रहा हो. विदेश मंत्री एस. जयशंकर का दुनिया के सामने शांत दिखना महज़ दिखावा माना जा रहा है. मालदीव, कनाडा और बांग्लादेश की विफलताओं के बाद अब यह स्पष्ट है कि महज़ पीआर (PR) और प्रोपगैंडा से भारत इस वैश्विक अराजकता से नहीं बच सकता.
लद्दाख में पूर्ण बंद, सड़कों पर उतरे हज़ारों लोग: ‘जो हमारा हक़ है, उसे मांगना बंद नहीं करेंगे’
इंडियन एक्सप्रेस के लिए नवीन इक़बाल की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार के साथ बातचीत में गतिरोध के बीच क्षेत्रीय राजनीतिक नेतृत्व के आह्वान पर सोमवार को लद्दाख में हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए. लद्दाख के दो प्रतिनिधि निकायों, एपेक्स बॉडी लेह (एबीएल) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) ने लेह और कारगिल में इस पूर्ण बंद का आह्वान किया था. बता दें कि ये दोनों निकाय 15 सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) के हिस्से के रूप में केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) के साथ बातचीत कर रहे हैं.
इस दौरान लेह और कारगिल दोनों जगहों पर बाज़ार पूरी तरह बंद रहे. लोग हाथों में बैनर लेकर मुख्य बाज़ारों से गुज़रे, जिनमें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा की मांग की गई थी. केडीए और एबीएल द्वारा बुलाए गए इस बंद में जांस्कर के दूरदराज़ के इलाके भी शामिल हुए. पिछले साल सितंबर में हुए धरने के बाद यह इस क्षेत्र का पहला बड़ा विरोध प्रदर्शन था. गौरतलब है कि 24 सितंबर को पुलिस फायरिंग में चार लोगों की मौत हो गई थी और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था. केंद्र द्वारा उनकी हिरासत रद्द किए जाने के बाद शनिवार को वांगचुक को जोधपुर जेल से रिहा कर दिया गया है.
एचपीसी के सदस्य और एबीएल के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लाकरूक ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि भारी जनभागीदारी के बावजूद विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा. उन्होंने कहा कि पुलिस ने हमें रोकने के लिए कई बैरिकेड लगाए थे, लेकिन हमने लोगों से धैर्य बनाए रखने का आग्रह किया और हमने शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज कराया. उनका मुख्य लक्ष्य नई दिल्ली को यह स्पष्ट संदेश देना है कि वे अपना हक़ मांगना बंद नहीं करेंगे.
लद्दाख चार सूत्रीय एजेंडे पर गृह मंत्रालय के साथ बातचीत कर रहा है. इसमें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा, लद्दाख के युवाओं के लिए नौकरियों में आरक्षण और क्षेत्र के दो हिस्सों के लिए अलग-अलग संसदीय क्षेत्रों का निर्माण शामिल है. क्षेत्र की दो स्वायत्त पहाड़ी परिषदों (हिल काउंसिल) में से लेह में परिषद का पांच साल का कार्यकाल 1 नवंबर 2025 को समाप्त हो गया है, और परिषद के लिए नए चुनावों की घोषणा अभी नहीं की गई है. चूंकि लद्दाख को पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य से बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेश के रूप में अलग किया गया था, इसलिए क्षेत्र से केवल एक सांसद को छोड़कर, लोगों के लिए पर्याप्त लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की कमी को लेकर खासी चिंता बनी हुई है. वहीं, कारगिल में हिल काउंसिल वर्तमान में अपने कार्यकाल के तीसरे वर्ष में है.
लाकरूक ने कहा कि प्रतिनिधित्व में इस अंतर ने एक खालीपन छोड़ दिया है, जिससे लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वे अपनी समस्याएं लेकर किसके पास जाएं. केडीए सदस्य सज्जाद कारगिली ने चेतावनी दी कि यदि लद्दाख के लोगों की मांगें पूरी नहीं होती हैं, तो उनके पास अपना आंदोलन जारी रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. एचपीसी के भीतर बातचीत को रोकने के लिए गृह मंत्रालय को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कारगिली ने कहा कि केंद्र शासित प्रदेश बनाने का निर्णय बिना किसी परामर्श के उन पर थोपा गया था, इसलिए वर्तमान अशांति केंद्र की अपनी नीतियों का सीधा परिणाम है. लद्दाख के सांसद मोहम्मद हनीफ़ा जान ने भी इन विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया है और सोमवार को कारगिल में हुई रैली में शामिल हुए.
अमेरिकी आयोग ने आरएसएस और रॉ पर प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश की, कांग्रेस बोली- हमारी चिंताएं सही साबित हुईं
‘द वायर’ की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के एक संघीय सलाहकार निकाय ने धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन में कथित भूमिका के लिए भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (रॉ) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के खिलाफ़ लक्षित प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश की है. इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने तर्क दिया है कि आरएसएस राष्ट्रीय एकता के लिए ख़तरा है.
यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने 4 मार्च को जारी अपनी 2026 की वार्षिक रिपोर्ट में ये सिफ़ारिशें की हैं. साथ ही लगातार सातवें साल भारत को “विशेष चिंता वाले देश” के रूप में नामित करने का आह्वान किया है (हालांकि अमेरिकी विदेश विभाग ने पहले कभी इस पर कार्रवाई नहीं की है). रिपोर्ट में अमेरिकी सरकार से धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों के लिए रॉ और आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है. इससे पहले, 2025 की रिपोर्ट में न्यूयॉर्क में एक अमेरिकी नागरिक की कथित हत्या की साज़िश से जुड़े मामले में रॉ और उसके पूर्व अधिकारी विकास यादव पर प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश की गई थी. इस पर कांग्रेस ने ‘एक्स’ पर लिखा कि अमेरिकी निकाय ने चेतावनी दी है कि आरएसएस लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए ख़तरा है. पार्टी ने कहा कि आरएसएस संविधान का विरोध करता है, मनुस्मृति के अनुसार देश चलाना चाहता है और देश की एकता व भाईचारे के लिए ज़हर है.
आयोग ने अमेरिकी सरकार से भारत के साथ भविष्य की सुरक्षा सहायता और द्विपक्षीय व्यापार नीतियों को धार्मिक स्वतंत्रता में सुधार से जोड़ने को कहा है. अमेरिकी नागरिकों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ उत्पीड़न का हवाला देते हुए आयोग ने हथियार निर्यात नियंत्रण अधिनियम की धारा 6 लागू करके भारत को हथियारों की बिक्री रोकने की मांग की है.
रिपोर्ट में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के बीच “आपसी संबंधों” को रेखांकित किया गया है. आयोग का दावा है कि इससे नागरिकता, धर्मांतरण विरोधी और गोहत्या क़ानूनों जैसे भेदभावपूर्ण उपाय लागू हुए हैं. आरएसएस को एक “हिंदू राष्ट्रवादी समूह” बताते हुए कहा गया है कि इसका मुख्य मिशन ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाना है जो मुसलमानों, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों को बाहर करता है. रिपोर्ट में ईसाइयों पर भीड़ के हमलों, 2025 में वक्फ़ बिल के ख़िलाफ़ पश्चिम बंगाल में हुए हिंसक विरोध (जिसमें 3 मौतें हुईं), सुप्रीम कोर्ट द्वारा वक्फ़ क़ानून के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाने और उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड को भंग करने वाले क़ानून का भी ज़िक्र किया गया है.
रिपोर्ट में कश्मीर के पहलगाम में हिंदू पर्यटकों पर हुए भीषण हमले (26 की मौत) का ज़िक्र है, जहां बंदूकधारियों ने इस्लामी आयत न पढ़ पाने वालों की हत्या कर दी थी. आयोग ने आरोप लगाया कि भारत सरकार ने इस हमले का इस्तेमाल “अवैध” प्रवासियों के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के निर्वासन को सही ठहराने के लिए किया. असम से बंगाली भाषी मुसलमानों के निष्कासन और विदेशी अधिनियम के नए नियमों पर भी चिंता जताई गई. इसके अलावा, सीएए विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ़्तार उमर खालिद और शरजील इमाम के बिना मुक़दमे पांच साल से जेल में होने, ब्रिटिश सिख नागरिक जग्गी जोहल को बरी होने के बाद भी एकांत कारावास में रखने और कश्मीर हमले पर टिप्पणी के लिए प्रोफ़ेसर अली खान महमूदाबाद की गिरफ़्तारी का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया.
आयोग ने इस बात पर भी ग़ौर किया कि पीएम मोदी की वाशिंगटन यात्रा और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस की भारत यात्रा के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा सार्वजनिक चर्चा से नदारद रहा. भारत सरकार ने 2026 की इस रिपोर्ट पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन विदेश मंत्रालय पहले ही यूएससीआईआरएफ के आकलन को “पक्षपाती और राजनीति से प्रेरित” बताकर ख़ारिज कर चुका है.
आरएसएस अपने दावों के विपरीत काम करता है, जानिए इसके ‘विश्व विभाग’ की भूमिका
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) विदेशों में सक्रिय होने से इनकार करता है, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन, मॉरीशस और ऑस्ट्रेलिया की सरकारी रिपोर्टें वहां के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर हिंदुत्व समूहों के प्रभाव को रेखांकित करती हैं. जैसा कि एक नया डेटाबेस आरएसएस से जुड़े 2,500 से अधिक संगठनों की पहचान करता है, जिनमें भारत के बाहर काम करने वाले 200 से अधिक संगठन शामिल हैं, ‘आर्टिकल-14’ की जांच से पता चलता है कि विदेशों में जो संगठन आरएसएस के साथ कोई औपचारिक संबंध न होने का दावा करते हैं, वे वास्तव में आरएसएस और उसके सहयोगियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.
स्निग्धेंदु भट्टाचार्य की यह खोजी रिपोर्ट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैश्विक उपस्थिति और इसके कामकाज के तरीकों पर विस्तृत प्रकाश डालती है. रिपोर्ट के अनुसार, संघ के दावों और वास्तविकता में अंतर है. आरएसएस आधिकारिक तौर पर यह दावा करता रहा है कि वह भारत के बाहर सक्रिय नहीं है और विदेशी संगठनों से उसका कोई औपचारिक नाता नहीं है. लेकिन पता करने पर यह जानकारी सामने आती है कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और मॉरीशस जैसे देशों में हिंदुत्ववादी समूहों का प्रभाव बढ़ रहा है. एक नए डेटाबेस के अनुसार, आरएसएस से जुड़े लगभग 2,500 संगठन हैं, जिनमें से 200 से अधिक संगठन भारत के बाहर सक्रिय हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, आरएसएस के भीतर एक ‘विश्व विभाग’ (वर्ल्ड डिपार्टमेंट) काम करता है, जिसके पास विशेष रूप से विदेशी गतिविधियों की देखरेख करने की जिम्मेदारी है. इसका काम विदेशों में रहने वाले हिंदुओं के बीच ‘हिंदू राष्ट्र’ की विचारधारा का प्रसार करना और वहां सक्रिय संगठनों के साथ समन्वय बैठाना है.
रिपोर्ट के अनुसार, विदेशों में हिंदू स्वयंसेवक संघ (एचएसएस) सबसे प्रमुख संगठन है. हालांकि एचएसएस खुद को आरएसएस से अलग और स्वायत्त बताता है, लेकिन रिपोर्ट का दावा है कि इसके संस्थापक और प्रचारक अक्सर आरएसएस के ही पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे हैं. इनकी कार्यप्रणाली, प्रार्थना और ‘शाखा’ मॉडल पूरी तरह आरएसएस पर आधारित है और आरएसएस के शीर्ष नेता नियमित रूप से इन विदेशी संगठनों के कार्यक्रमों में शिरकत करते हैं.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि ये संगठन विदेशों में सीधे राजनीतिक संगठन के बजाय सांस्कृतिक और धर्मार्थ संस्थाओं के रूप में काम करते हैं. वे योग, सेवा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय प्रवासियों के बीच पैठ बनाते हैं. इससे उन्हें विदेशी सरकारों की निगरानी से बचने और वहां की राजनीति को प्रभावित करने में मदद मिलती है. लेकिन संघ की गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय चिंताओं का कारण भी बन रही हैं. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों की सरकारी रिपोर्टों में यह उल्लेख किया गया है कि इन समूहों की गतिविधियों से वहां के स्थानीय समुदायों में ध्रुवीकरण बढ़ रहा है. ये संगठन विदेशी मंचों पर भारत सरकार की नीतियों के पक्ष में पैरवी भी करते हैं.
कुलमिलाकर, भट्टाचार्य की इस रिपोर्ट से मालूम होता है कि आरएसएस ने एक ऐसा जटिल और गुप्त नेटवर्क तैयार किया है, जहाँ संगठन नाम से तो अलग दिखते हैं, लेकिन वैचारिक और सांगठनिक रूप से वे आरएसएस के ‘विश्व विभाग’ के निर्देशों पर ही काम करते हैं.
भारतीय जहाजों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता सुरक्षित करने में जुटा भारत, जयशंकर को ईरान वार्ता से उम्मीद
‘द इंडियन एक्सप्रेस’, ‘द वायर’ और ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से भारतीय जहाजों के सुरक्षित मार्ग के लिए ईरान के साथ बातचीत चल रही है. फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में जयशंकर ने कूटनीति पर ज़ोर देते हुए कहा कि नई दिल्ली और तेहरान के बीच बातचीत के परिणामस्वरूप ही दो भारतीय गैस टैंकरों को जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति मिली है.
जयशंकर ने कहा, “मैं इस समय उनसे बात कर रहा हूं और मेरी बातचीत के कुछ नतीजे निकले हैं. अगर मुझे इसके नतीजे मिल रहे हैं, तो मैं स्वाभाविक रूप से इसे जारी रखूंगा.” जयशंकर जिन दो जहाजों का ज़िक्र कर रहे थे, वे शिवालिक और नंदा देवी हैं. ये टैंकर लगभग 92,712 मीट्रिक टन तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) लेकर गुजरात के मुंद्रा और कांडला बंदरगाहों की ओर जा रहे हैं.
‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारतीय जहाजों के लिए ईरान के साथ कोई ‘ब्लैंकेट एग्रीमेंट’ (एकमुश्त समझौता) नहीं हुआ है. इसके बजाय हर जहाज को गुजरने के लिए अलग से अनुमति लेनी होगी. यह स्थिति बांग्लादेश और चीन से अलग है, जिन्होंने अपने सभी जहाजों के लिए बिना शर्त सुरक्षा सुनिश्चित कर ली है. घरेलू स्तर पर गैस की कमी की चिंताओं से जूझते हुए भारत ने खाड़ी देशों पर ईरानी हमलों की निंदा तो की है, लेकिन अमेरिका-इजरायल के शुरुआती हमलों की औपचारिक आलोचना नहीं की है.
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सीबीएस नेटवर्क को बताया कि ईरान उन देशों के लिए “खुला” है जो अपने जहाजों के सुरक्षित मार्ग पर चर्चा करना चाहते हैं. हालांकि, उन्होंने किसी भी तरह के ‘लेन-देन’ या सौदेबाजी से इनकार किया. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमले के बाद से जयशंकर और अराघची के बीच चार बार बात हो चुकी है. 12 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच भी फोन पर बातचीत हुई थी, जो युद्ध शुरू होने के बाद पहला शीर्ष स्तरीय संपर्क था.
आकार पटेल | कूटनीतिक भटकाव
जब मौकापरस्ती ही उसूल बन जाए देश का
4 नवंबर 2013 को, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय मिशनों के 120 से ज़्यादा प्रमुखों से बात की और अपनी विदेश नीति को तय करने वाले पाँच सिद्धांतों के बारे में बताया. ये थे: पहला, यह मानना कि दुनिया (बड़ी ताक़तों और एशियाई पड़ोसियों) के साथ भारत के रिश्ते उसकी विकास संबंधी प्राथमिकताओं से तय होते हैं.
सिंह ने कहा था कि “भारतीय विदेश नीति का सबसे ज़रूरी और इकलौता मक़सद हमारे महान देश की भलाई के लिए एक अनुकूल वैश्विक माहौल बनाना होना चाहिए.”
दूसरा, विश्व अर्थव्यवस्था के साथ ज़्यादा से ज़्यादा जुड़ने से भारत को फ़ायदा होगा और इससे भारतीय लोग अपनी रचनात्मक क्षमता को पहचान सकेंगे. तीसरा, सभी बड़ी ताक़तों के साथ स्थिर, लंबे समय तक चलने वाले और आपसी फ़ायदे वाले रिश्ते बनाना, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर एक ऐसा वैश्विक आर्थिक और सुरक्षा माहौल बनाना जो सभी देशों के लिए फ़ायदेमंद हो.
चौथा, यह समझना कि भारतीय उपमहाद्वीप के साझा भविष्य के लिए ज़्यादा क्षेत्रीय सहयोग और कनेक्टिविटी की ज़रूरत है. पाँचवाँ, एक ऐसी विदेश नीति जो सिर्फ़ हितों से नहीं बल्कि भारतीयों के लिए अज़ीज़ मूल्यों से भी तय हो: “एक बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष और उदार लोकतंत्र के ढाँचे के अंदर आर्थिक विकास हासिल करने के भारत के प्रयोग ने दुनिया भर के लोगों को प्रेरित किया है और आगे भी ऐसा करते रहना चाहिए.”
यह इस बात का एकदम साफ़ बयान था कि हम क्या हासिल करना चाहते थे. भारत अपने आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने के लिए विदेश नीति का इस्तेमाल करेगा; यह दुनिया की बड़ी ताक़तों और अपने पड़ोसियों के साथ दोस्ताना रवैया रखेगा; और एक बहुलवादी और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बने रहने से उसे ऐसा करने में मदद मिलेगी.
मैं मौजूदा सरकार की विदेश नीति के सिद्धांतों पर बात नहीं करूँगा, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि उनके पास कोई सिद्धांत है ही नहीं. यह कोई आरोप या यूँ ही कही गई बात नहीं है, और मैंने अपनी एक किताब का पूरा अध्याय यह समझाने के लिए लिखा है कि ऐसा क्यों है. असल में बात यह है कि विदेश मंत्री न सिर्फ़ यह मानते हैं कि हमारी नीति का कोई सिद्धांत नहीं है; बल्कि वो यह भी कहते हैं कि सिद्धांतों का न होना ही हमारी नीति का आधार है.
अपने लेखों और भाषणों से तैयार की गई एक किताब में एस. जयशंकर ने बताया है कि उनका क्या मतलब है.
भारत जो चाहता था वह एक “बहु-ध्रुवीय एशिया” था, जिसका मतलब है एक ऐसा एशिया जहाँ भारत, चीन के बराबर होने का दावा कर सके. वो ऐसा करने का कोई तरीक़ा नहीं बताते, बल्कि यह मान लेते हैं कि हम ऐसा कर सकते हैं सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हम ऐसा चाहते हैं.
वो लिखते हैं कि कई गेंदों को हवा में उछाल कर रखना होगा (जयशंकर को मुहावरों का शौक़ है), और भारत बड़ी कुशलता से उन्हें सँभालेगा. यह अवसरवाद था, लेकिन यह ठीक था क्योंकि अवसरवाद भारत की संस्कृति थी. जयशंकर लिखते हैं कि महाभारत की सीख यह है कि छल और अनैतिकता सिर्फ़ “नियमों से न खेलने” के तरीक़े हैं. द्रोण का एकलव्य का अँगूठा माँगना, इंद्र का कर्ण का कवच ले लेना, और अर्जुन का शिखंडी को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल करना—ये सब बस “प्रथाएँ और परंपराएँ” थीं.
नीति में असंगति न सिर्फ़ ठीक थी बल्कि ज़रूरी भी थी क्योंकि बदलते हालात में “निरंतरता या एकरूपता को लेकर पागलपन” का कोई तुक नहीं बनता था.
यह एक ऐसे इंसान की बात थी जो किसी खोखली चीज़ को भी शब्दों में पिरोकर ऐसे पेश कर सकता था जैसे वह बहुत सही बात हो. लेकिन ऐसे सिद्धांत को क्या कहा जाए? एक भाषण में जहाँ उन्होंने पहली बार अवसरवाद और असंगति के इस सिद्धांत को पेश किया था, जयशंकर ने कहा था कि इसे कोई नाम देना मुश्किल है. उन्होंने “मल्टी-अलाइनमेंट” (यानी बहु-गुटबाज़ी - “बहुत ज़्यादा अवसरवादी लगता है”) और “इंडिया फ़र्स्ट” (”स्वार्थी लगता है”) जैसे शब्दों पर विचार किया और उन्हें खारिज़ कर दिया. वो “समृद्धि और प्रभाव को बढ़ाना” पर आकर टिके, जिसे उन्होंने सटीक बताया लेकिन माना कि यह सुनने में बहुत आकर्षक नहीं है.
उनका मानना था कि अगर इसे काफ़ी लंबे समय तक अपनाया गया तो इसका कोई न कोई नाम आख़िरकार सामने आ ही जाएगा, क्योंकि चुनौती का एक हिस्सा यह भी था कि हम अभी एक बड़े बदलाव के शुरुआती दौर में थे.
यह कुछ समय पहले, इस सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रकाशित हुआ था. दुनिया, जैसा कि हम अपने चारों ओर देख सकते हैं, बदल गई है. यह अनिश्चित और ख़तरनाक हो गई है, ख़ासकर उन देशों के लिए जो हमारी तरह ऊर्जा और बाहर रोज़गार पर निर्भर हैं, ख़ास तौर पर खाड़ी देशों में.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस तीसरे अमेरिकी खाड़ी युद्ध को शुरू करने का कोई ठोस कारण नहीं दिया है और सामरिक लक्ष्यों के अलावा कोई ऐसा असल मक़सद नहीं बताया है जिसे वो हासिल करना चाहते हों.
अमेरिका के रक्षा विभाग को सँभालने वाले मंत्री अपनी प्रेस ब्रीफ़िंग में पूरी तरह से बेकाबू और अक्षम लगते हैं. यह युद्ध कैसे ख़त्म होगा, यह कोई नहीं जानता, क्योंकि यह कैसे और कब ख़त्म होगा, इसमें ईरान की भी मर्ज़ी चलेगी. इस हमले में इज़रायल के शामिल होने से यह युद्ध और भी ज़्यादा चिंताजनक हो जाता है क्योंकि अमेरिका की तरह वह बीच में ही छोड़कर नहीं भाग सकता, चूँकि वह इसी क्षेत्र का हिस्सा है और परमाणु हथियारों से लैस है.
ऐसे समय में भारत को क्या करना चाहिए, और उसे कौन सी नीति अपनानी चाहिए? शायद हम उस तरीक़े से काम चला लेंगे जो जयशंकर के हिसाब से हमें करना चाहिए. हम जो कर रहे हैं उसे देखकर यह साफ़ लगता है कि हम अवसरवाद की राह पर आगे बढ़े हैं.
युद्ध से कुछ ही घंटे पहले, जब नौसैनिक बेड़ा तैनात था, हम एक मेडल लेने के लिए तेल अवीव उड़ गए, जो एक तरह से आने वाले हालात का समर्थन करना ही था. हमने बिना युद्ध की घोषणा के किसी देश द्वारा की गई हत्याओं, स्कूली लड़कियों के सामूहिक हत्याकांड और नौसैनिकों की हत्या की निंदा करने से परहेज़ किया है. जहाँ हमें मौक़ा दिखता है—जैसे कि कुछ तेल के टैंकर बाहर निकालना—हम उसका फ़ायदा उठा लेते हैं. शांति क़ायम करने या नियमों पर आधारित व्यवस्था को फिर से स्थापित करने की बड़ी प्रक्रिया में हमारी कोई भूमिका नहीं है क्योंकि हमारा उसूल ही अवसरवाद है.
इसका मतलब दुनिया को दिशा देना नहीं है बल्कि जहाँ हम कर सकें वहाँ थोड़े समय का फ़ायदा उठाना है. शायद यह काम कर जाए, लेकिन हो सकता है कि न भी करे.
इसी वजह से, हमें वापस अपने बुनियादी सिद्धांतों पर लौटना चाहिए. मनमोहन सिंह ने भारत की विदेश नीति के बारे में जो कहा था—कि इसका मक़सद क्या हासिल करना था और किस वजह से—उस पर फिर से विचार करना एक अच्छी शुरुआत है.
नरेंद्र मोदी का अपमानजनक पखवाड़ा; नेतन्याहू को गले लगाने से लेकर एलपीजी की भीख तक
‘सबस्टैक’ पर बॉबी घोष का यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया इज़राइल दौरे और उसके बाद उत्पन्न हुए वैश्विक भू-राजनीतिक संकट का एक आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है. लेख की मुख्य विषय-वस्तु इस बात पर केंद्रित है कि कैसे भारत की विदेश नीति ‘विश्वगुरु’ की छवि और ज़मीनी हकीकत के बीच संघर्ष कर रही है.
इज़राइल के साथ घनिष्ठता और तत्काल संकट
घटनाक्रम की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी की यरूशलेम यात्रा से होती है, जहाँ उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू के साथ गहरी मित्रता और वैचारिक समानता का प्रदर्शन किया. मोदी ने इज़राइल के साथ “पूर्ण विश्वास” और “बिना शर्त एकजुटता” की घोषणा की. हालांकि, इस यात्रा के 48 घंटों के भीतर ही स्थिति बदल गई. अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मृत्यु हो गई, जिसने पूरे मध्य पूर्व को युद्ध की कगार पर धकेल दिया. इस हमले के बाद खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा और भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर खतरा मंडराने लगा.
राजनयिक दुविधा और ‘चुप्पी’ की नीति
लेख के अनुसार, भारत सरकार इस संकट को भांपने में विफल रही. खामेनेई की मृत्यु पर मोदी सरकार की चुप्पी और शोक व्यक्त करने में की गई देरी ने ईरान के साथ संबंधों में खटास पैदा कर दी. जहाँ 2024 में राष्ट्रपति रायसी की मृत्यु पर भारत ने राष्ट्रीय शोक मनाया था, वहीं खामेनेई के मामले में केवल एक अधीनस्थ अधिकारी के माध्यम से औपचारिक संवेदना भेजी गई. यह विरोधाभास ईरानी नेतृत्व की नज़र में खटक गया, विशेषकर तब जब भारत ने इज़राइल के साथ खुलकर पक्ष लिया था.
सामरिक चोट: ‘आईआरआईएस डेना’ का डूबना
भारत के सम्मान को सबसे बड़ी ठेस तब लगी जब अमेरिकी पनडुब्बी ने हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत ‘आईआरआईएस डेना’ को डुबो दिया. विडंबना यह थी कि यह जहाज कुछ ही दिन पहले भारतीय नौसेना का अतिथि था और ‘अभ्यास मिलन’ में शामिल हुआ था. भारत सरकार और नौसेना द्वारा इस घटना पर कोई कड़ा विरोध न जताना उसकी “कायरतापूर्ण चुप्पी” के रूप में देखा गया. विपक्षी दलों और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने इसे भारत की संप्रभुता और साख के लिए अपमानजनक बताया.
ऊर्जा संकट और ईरान के समक्ष समर्पण
ईरान ने जवाबी कार्रवाई में ‘होर्मुज़ जलडमरूमध्य’ को बंद कर दिया, जिससे भारत की 90% एलपीजी आपूर्ति बाधित हो गई. भारतीय टैंकर समुद्र में फंस गए और देश में ऊर्जा संकट पैदा हो गया. जिस “विश्वगुरु” ने दो हफ्ते पहले इज़राइल को बिना शर्त समर्थन दिया था, उसे अब ईरान के राष्ट्रपति से रसोई गैस के लिए गुहार लगानी पड़ी. ईरान ने “मित्रता” का हवाला देते हुए आपूर्ति तो बहाल कर दी, लेकिन उनके लहज़े में छिपा तंज भारत की कूटनीतिक विफलता को दर्शा रहा था.
कुलमिलाकर, घोष ने लिखा है कि सावधानीपूर्वक तटस्थता और सिद्धांतों के बिना किसी एक पक्ष का चुनाव करना भारत जैसी उभरती शक्ति के लिए घातक हो सकता है. ईरान के नए नेतृत्व (मोजतबा खामेनेई) के साथ भारत के रिश्ते अब पहले जैसे नहीं रहेंगे. ‘विश्वगुरु’ बनने की आकांक्षा और वास्तविक शक्ति के प्रदर्शन के बीच का अंतर इस पखवाड़े में साफ दिखाई दिया. अंततः, भारत को यह सबक मिला कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भावनाओं और ‘स्ट्रॉन्गमैन केमिस्ट्री’ से ज़्यादा राष्ट्रीय हित और संतुलित कूटनीति मायने रखती है.
इकोनॉमिस्ट के अनुसार, विदेश मंत्री एस. जयशंकर भले ही नए वैश्विक ‘डिसऑर्डर’ में अवसरों की बात करें, लेकिन सच्चाई यह है कि यह अराजकता भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक है. इसके अलावा, कनाडा के साथ निज्जर विवाद, मालदीव का ‘इंडिया आउट’ अभियान और बांग्लादेश में शेख हसीना के पतन को भी भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति की बड़ी विफलताओं के रूप में दर्ज़ किया जा रहा है.
‘समर्पण, धैर्य और निष्पक्षता’ के साथ संसद चलाने के लिए स्पीकर ओम बिरला की मोदी ने सराहना की
हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की सराहना की. उन्होंने कहा कि बिरला ने “समर्पण, धैर्य और निष्पक्षता” के साथ सदन की कार्यवाही का संचालन किया है, जिससे देश के संसदीय लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी. स्पीकर ओम बिरला को लिखे एक पत्र में, प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अध्यक्ष के खिलाफ लाए गए विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को गिराकर “राजनीतिक कदाचार” को खारिज करने के लिए सदन के सदस्यों को बधाई दी.
पीएम मोदी ने अपने पत्र में लिखा, “अविश्वास प्रस्ताव के गिरने के बाद, मैंने सदन में दिए गए आपके वक्तव्य को ध्यान से सुना. आपने जिस संतुलन, धैर्य और स्पष्टता के साथ संसदीय इतिहास, पीठ की ज़िम्मेदारियों और नियमों की सर्वोच्चता का उल्लेख किया, वह बेहद प्रभावशाली है. मैं इसके लिए आपको बधाई देता हूं.” संसद को लोकतांत्रिक संस्थाओं का सर्वोच्च मंच बताते हुए, पीएम मोदी ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी केवल कार्यवाही का संचालन करना ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं, नियमों और संस्थागत गरिमा की रक्षा करना भी है.
प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब राजनीतिक असहमति संसदीय गरिमा के प्रति अनादर में बदल जाती है, तो यह चिंता का विषय है. मोदी ने स्पीकर की तारीफ़ करते हुए कहा, “ऐसे क्षणों में पीठ पर बैठे व्यक्ति की परीक्षा होती है. आपने जिस शालीनता, संतुलन और निष्पक्षता के साथ इन स्थितियों का सामना किया, वह काबिले तारीफ़ है.” उन्होंने पूर्व स्पीकर सुमित्रा महाजन के कार्यकाल का भी ज़िक्र किया और कहा कि दुर्भाग्य से आज भी कुछ सदस्यों का व्यवहार अपेक्षित गरिमा के अनुरूप नहीं है, जो पूरे लोकतंत्र की प्रतीक संस्था को प्रभावित करता है. उन्होंने आगे कहा कि “वंशवादी और सामंती मानसिकता वाले कुछ लोग” किसी भी नए व्यक्ति के आगे आने या नए और युवा सांसदों को बोलने का समान अवसर मिलने को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते हैं.
स्पीकर ओम बिरला ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर इस पत्र को साझा करते हुए कहा कि पीएम मोदी का संदेश दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर संसद, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के सभी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को प्रेरित करेगा. बिरला ने मोदी की प्रशंसा करते हुए संवाद, बहस और विचार-विमर्श में उनके गहरे विश्वास का उल्लेख किया. इसके अलावा, सभी राजनीतिक दलों को लिखे एक पत्र में बिरला ने संसदीय लोकतंत्र में जनता का विश्वास मज़बूत करने के लिए मिलकर काम करने की अपील की. उन्होंने सदन के भीतर बैनर और तख्तियां दिखाने, खराब भाषा का इस्तेमाल करने और कुछ सदस्यों के आचरण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सभी से आत्ममंथन करने का आग्रह किया है.
मोदी की ‘मिमिक्री’ करने पर शिक्षक निलंबित, कहा- ‘मैं तो बस लोगों को हंसाना चाहता था’
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश के शिवपुरी ज़िले में एक स्थानीय ‘हैप्पीनेस डिपार्टमेंट’ (आनंद विभाग) इकाई के प्रभारी और स्कूल शिक्षक साकेत पुरोहित को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री (नकल) करने के आरोप में निलंबित कर दिया गया है. एलपीजी की कमी पर उनका यह मिमिक्री एक्ट एक सामाजिक कार्यक्रम में हुआ था, जिसका वीडियो वायरल होने के बाद शिकायत दर्ज की गई और उन पर यह कार्रवाई हुई.
शिवपुरी शहर से 170 किलोमीटर दूर एक गांव में रहने वाले पुरोहित के परिवार ने भी यह वीडियो देखा था, जिसमें उन्होंने कुछ सेकंड के लिए पीएम मोदी के बोलने के अंदाज़ की नकल की थी. इस निलंबन से बेपरवाह पुरोहित का कहना है, “अपनी आवाज़ उठाना लोगों का अधिकार है. शिक्षकों को बोलने का अधिकार है. पिछले कुछ सालों में मैंने देखा है कि व्यंग्य और कॉमेडी पर पाबंदियां लग गई हैं. लोग आहत हो रहे हैं और इस पर कार्रवाई हो रही है. अगर लोगों को बोलने से डर लगता है, तो यह उनकी समस्या है. मुझे लगा कि मुझे अपने मन की बात कहनी चाहिए.”
यह वीडियो स्थानीय ‘आनंद भवन’ में हुए एक कार्यक्रम का था, जो हैप्पीनेस विभाग के अंतर्गत आता है. वहां पुरोहित ने एलपीजी आपूर्ति संकट पर मिमिक्री करने का फ़ैसला किया था. उन्होंने कहा, “लोग मनोरंजन के लिए आते हैं. कोई गाता है, कोई एक्टिंग करता है. मैंने मिमिक्री की.” इस एक्ट में पुरोहित ने पीएम मोदी के बोलने के तरीके की नकल करते हुए एलपीजी सिलेंडर की बढ़ती कीमतों पर कटाक्ष किया था. उन्होंने कहा कि वह इस बात का मज़ाक उड़ा रहे थे कि कीमतें लोगों को वापस पारंपरिक चूल्हों पर खाना पकाने के लिए मजबूर कर सकती हैं. वीडियो वायरल होने पर उन्होंने इसे डिलीट कर दिया था और कहा कि उन्हें नहीं पता एक मज़ाक से उन्होंने कैसे शांति भंग कर दी.
वीडियो वायरल होने की रात तक, पिछोर से बीजेपी विधायक प्रीतम लोधी ने ज़िला प्रशासन को लिखित शिकायत सौंप दी थी. इसमें आरोप लगाया गया था कि एक सरकारी कर्मचारी द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री का “मज़ाक उड़ाना” सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन है. ज़िला शिक्षा अधिकारी विवेक श्रीवास्तव ने मध्य प्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियमों का हवाला देते हुए निलंबन की पुष्टि की. पुरोहित को बदरवास के ब्लॉक शिक्षा कार्यालय से संबद्ध कर दिया गया है और उन्हें जीवन निर्वाह भत्ते पर रखा गया है.
पुरोहित का दावा है कि आदेश आने से पहले उन्हें कोई कारण बताओ नोटिस तक जारी नहीं किया गया. 2014 में स्थानीय प्राथमिक विद्यालय (कक्षा 1-5) में नियुक्त हुए पुरोहित 2017 तक आनंद भवन में “मास्टर ट्रेनर इन हैप्पीनेस” बन गए थे. उनका काम कठिन समय में खुशियां फैलाना था. इससे पहले वे रक्तदान शिविरों और कोविड-19 के दौरान ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए 3.5 लाख रुपये जुटाने जैसे सामाजिक कार्यों के लिए चर्चा में रहे थे. उन्होंने अफ़सोस जताते हुए कहा कि जिन अख़बारों ने कभी उनके सामाजिक कार्यों की तारीफ़ की थी, आज वही उन पर शांति भंग करने का आरोप लगा रहे हैं.
मानहानि मामले में प्रिया रमानी की रिहाई के खिलाफ एम. जे. अकबर की अपील; हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई तय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री एम. जे. अकबर की उस याचिका को 24 सितंबर को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया, जिसमें उन्होंने पत्रकार प्रिया रमानी को आपराधिक मानहानि मामले में बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी है.
‘टेलीग्राफ वेब डेस्क और पीटीआई’ के मुताबिक, न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा, “ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड प्राप्त हो गया है. दोनों पक्षों द्वारा लिखित दलीलें दाखिल कर दी गई हैं. अगली तारीख पर अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करें.” अकबर ने ट्रायल कोर्ट के 17 फरवरी, 2021 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें रमानी को बरी कर दिया गया था. कोर्ट ने तब तर्क दिया था कि एक महिला को दशकों बाद भी अपनी पसंद के किसी भी मंच पर शिकायत रखने का अधिकार है. हाईकोर्ट ने 13 जनवरी, 2022 को अकबर की अपील स्वीकार की थी और मामले की जांच करने पर सहमति जताई थी. अपनी अपील में, अकबर ने तर्क दिया है कि ट्रायल कोर्ट ने उनके आपराधिक मानहानि मामले का फैसला “अंदाजों और अटकलों” के आधार पर किया.
ट्रायल कोर्ट ने अकबर द्वारा दायर मानहानि की शिकायत को खारिज कर दिया था और रमानी को बरी करते हुए कहा था कि उनके खिलाफ कोई आरोप साबित नहीं हुए. अदालत ने यह टिप्पणी भी की थी कि यह शर्मनाक है कि जिस देश में महिलाओं के सम्मान को लेकर ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ जैसे महाकाव्य लिखे गए, वहां महिलाओं के खिलाफ अपराध हो रहे हैं. रमानी ने 2018 में #मी टू आंदोलन के दौरान अकबर के खिलाफ यौन दुराचार के आरोप लगाए थे.
अहमदाबाद विमान दुर्घटना; अमेरिकी विमानन समूह ने कहा-‘जांच में जानबूझकर जानकारी छिपाई’
‘द ट्रिब्यून’ में शेखर सिंह की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका स्थित एक विमानन सुरक्षा संगठन ने आरोप लगाया है कि जून 2025 में एयर इंडिया की उड़ान AI-171 की दुर्घटना से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेजों को जांचकर्ताओं से छिपाया गया था. इस खुलासे ने उस आधिकारिक जांच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें भाजपा के वरिष्ठ नेता और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी समेत 260 लोग मारे गए थे.
जांचकर्ताओं और निगरानी अधिकारियों को भेजे गए एक ईमेल में, ‘फाउंडेशन फॉर एविएशन सेफ्टी’ के कार्यकारी निदेशक एड पियर्सन ने दावा किया कि समूह ने कुछ “गैर-सार्वजनिक दस्तावेज” प्राप्त किए हैं. ये दस्तावेज उस विमान (जो अहमदाबाद में दुर्घटनाग्रस्त हुआ) में बिजली की विफलता के एक परेशान करने वाले इतिहास की ओर इशारा करते हैं.
बोइंग 787 ड्रीमलाइनर (पंजीकरण संख्या वीटी-एएनबी) 12 जून, 2025 को दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. पियर्सन के अनुसार, दस्तावेज वीटी-एएनबी पर “गंभीर विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों की विफलताओं का एक पुराना इतिहास” प्रकट करते हैं, जिसमें धुएं और गंध की घटनाएं, जले हुए तार, इलेक्ट्रिकल शॉर्ट्स (शॉर्ट सर्किट), आर्किंग और बिजली की आग शामिल है.
फाउंडेशन फॉर एविएशन सेफ्टी के अनुसार, दस्तावेज वीटी-एएनबी पर गंभीर विद्युत विफलताओं के इतिहास को दर्शाते हैं. समूह के कार्यकारी निदेशक एड पियर्सन ने कहा, “हमें ऐसा प्रतीत होता है कि बोइंग और/या एयर इंडिया द्वारा विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) और बाकी अंतर्राष्ट्रीय जांच टीम से जानकारी छिपाने का जानबूझकर प्रयास किया गया है.”
पियर्सन ने कहा कि विमान को एक प्रमुख विद्युत घटक में समस्याओं के कारण कई बार खड़ा भी किया गया था. उन्होंने लिखा, “विमान को ग्राउंड किया गया था और पी100 पावर पैनल को तीन अलग-अलग मौकों पर बदला गया था.” पी100 पावर पैनल एक प्रमुख बिजली वितरण प्रणाली है जो विमान के बाएं इंजन से बिजली प्राप्त करती है और इसे कई ऑनबोर्ड प्रणालियों में वितरित करती है.
पियर्सन ने कहा कि इस प्रणाली की विफलता ने पहले भी महत्वपूर्ण नुकसान पहुंचाया था, जिसके कारण डिजाइन में बदलाव और सॉफ्टवेयर अपडेट किए गए थे. विमानन सुरक्षा समूह ने आरोप लगाया कि ये दस्तावेज दुर्घटना से पहले और बाद में एयर इंडिया और बोइंग के नियंत्रण में थे, लेकिन जांचकर्ताओं को कभी नहीं बताए गए.
पियर्सन ने आगे लिखा कि विमान के “अस्त-व्यस्त डिजाइन और विनिर्माण इतिहास” और बार-बार होने वाली बिजली की विफलताएं “प्रमुख विमान दोषों से जुड़ी एक से अधिक संभावित स्थितियों” की ओर इशारा करती हैं. उन्होंने यह भी कहा कि “हमें विश्वास है कि बोइंग के कुछ कर्मचारियों ने आपराधिक कृत्य किया हो सकता है.”
सुरक्षा संगठन ने कहा कि उसने दुर्घटनाग्रस्त विमान से संबंधित कई सौ आंतरिक रिपोर्टों और अन्य बोइंग 787 विमानों से जुड़ी हजारों विफलता रिपोर्टों का विश्लेषण किया है. पियर्सन ने एक एनटीएसबी जांचकर्ता को लिखे ईमेल में कहा, “इस मोड़ पर, हमें इस दुर्घटना जांच में शून्य विश्वास है.”
इमरान खान के बेटों को वीजा देने से पाकिस्तान का इनकार; जेल में बंद पूर्व पीएम के स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं बढ़ीं
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, पाकिस्तान सरकार उनके बेटों को वीजा देने से इनकार कर रही है. अपनी कैद के दौरान, खान को मुख्य रूप से एकांत कारावास में रखा गया है. उनके वकीलों और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेताओं का कहना है कि उन्हें पिछले कई महीनों से खान से मिलने की अनुमति नहीं दी गई है.
‘पीटीआई’ ने एक बयान में कहा कि खान के स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं तब और बढ़ गईं, जब रिपोर्ट आई कि उनकी दाहिनी आंख की रेटिना नस में खतरनाक ब्लॉकेज पाया गया है. यदि इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह स्थिति स्थायी अंधेपन का कारण बन सकती है.
इमरान खान की बहन अलीमा खान ने ‘ड्रॉप साइट न्यूज़’ को बताया कि सुलेमान और कासिम खान (जो अपनी मां जेमिमा गोल्डस्मिथ के साथ लंदन में रहते हैं) ने जुलाई 2025 में पाकिस्तान उच्चायोग में वीजा आवेदन दिया था. उन्होंने इस साल 15 जनवरी को दोबारा आवेदन किया, लेकिन उनके आवेदन गृह मंत्रालय में अटके हुए हैं. मंत्रालय के एक सूत्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह देरी जानबूझकर की जा रही है. सूत्र ने कहा, “उन्हें वीजा नहीं दिया जाएगा. सरकार बस इस फैसले को जितना हो सके टालना चाहती है.”
सरकार की रणनीति तकनीकी आधार पर (जैसे हालिया यूएई यात्रा का खुलासा न करना) वीजा खारिज करने की है, ताकि भाइयों के पास 8 फरवरी से पहले आवेदन सुधारने का समय न रहे. 8 फरवरी एक संवेदनशील तारीख है, जो पिछले विवादित चुनावों की दूसरी बरसी है. इससे पहले, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ और प्रधानमंत्री के सलाहकार मुशर्रफ जैदी ने सार्वजनिक रूप से बेटों को पिता से मिलने की “गारंटी” और सुविधा देने की बात कही थी.
73 वर्षीय खान पिछले दो महीनों से रावलपिंडी की अदियाला जेल में बाहरी दुनिया से लगभग कटे हुए हैं. पीटीआई के अनुसार, उन्हें लगभग 100 दिनों से अपने वकीलों से मिलने नहीं दिया गया है. 24 जनवरी को, अधिकारियों ने खान को गुप्त रूप से इस्लामाबाद के ‘पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज’ में एक “छोटी चिकित्सा प्रक्रिया” के लिए स्थानांतरित किया और उनके परिवार या वकीलों को सूचित किए बिना ही उन्हें वापस जेल भेज दिया.
डॉक्टरों ने पुष्टि की है कि खान सेंट्रल रेटिनल वेन ऑक्लूजन से पीड़ित हैं, जो एक गंभीर स्थिति है. खान के निजी चिकित्सक डॉ. आसिम यूसुफ ने कहा कि इसके लिए आंखों में विशेष इंजेक्शन और स्टेरॉयड की आवश्यकता होती है, जिसे जेल की कोठरी में प्रबंधित नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि खान को अगले कई महीनों या 2-3 सालों तक नियमित उपचार की आवश्यकता होगी.
इमरान खान अगस्त 2023 से भ्रष्टाचार, राजद्रोह और अवैध विवाह जैसे कई मामलों में जेल में हैं, हालांकि इनमें से कुछ सजाओं को अदालतों ने पलट दिया है. खान इन आरोपों को राजनीतिक प्रतिशोध बताते हैं. उनकी पत्नी बुशरा बीबी भी इसी परिसर में बंद हैं और दिसंबर से दोनों को परिवार से मिलने से रोक दिया गया है.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने खान की कैद को “मनमाना” करार दिया है, जबकि एक विशेष दूत ने चेतावनी दी है कि उनके साथ किया जा रहा व्यवहार “अमानवीय या अपमानजनक” हो सकता है. इन चिंताओं के बावजूद, पाकिस्तान की सैन्य समर्थित सरकार और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर वाशिंगटन के साथ संबंध मजबूत कर रहे हैं. हाल ही में यह घोषणा की गई कि पाकिस्तान डोनाल्ड ट्रंप की नई पहल “बोर्ड ऑफ पीस” में भाग लेगा, जिसका उद्देश्य गाजा पट्टी पर राजनीतिक समाधान थोपना है.
6 बरस में सिर्फ एक बहस में भाग लिया, लेकिन सभापति ने कर दीं बड़ी-बड़ी बातें; रिटायर हो गए रंजन गोगोई
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के रूप में कार्यकाल समाप्त हो गया है. सुबह 11 बजे जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई, तो राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने गोगोई की सेवानिवृत्ति की घोषणा करते हुए उन्हें विदाई दी. सभापति ने कहा, “एक प्रतिष्ठित न्यायविद के रूप में, उन्होंने राज्यसभा की चर्चाओं में अद्वितीय कानूनी सूक्ष्मता और अनुभव प्रदान किया. राज्यसभा में उनके हस्तक्षेप विधायी प्रक्रिया और जनहित की उनकी गहरी समझ को दर्शाते थे. सदन उनके विद्वतापूर्ण परामर्श, संतुलित हस्तक्षेप और उस गंभीरता की कमी महसूस करेगा जो वे सदन में लेकर आए थे.”
‘लाइव लॉ’ के अनुसार, यह 16 मार्च, 2020 की बात है जब केंद्र सरकार द्वारा गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था. इस कदम ने कई लोगों को अचंभित कर दिया था, क्योंकि यह भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद से उनकी सेवानिवृत्ति के चार महीने के भीतर ही हुआ था. इस नामांकन की व्यापक आलोचना हुई थी, क्योंकि इसे कार्यपालिका के पक्ष में निर्णय देने के बदले ‘प्रतिफल’ के रूप में देखा गया था. तब बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष ने गोगोई के नामांकन का स्वागत करते हुए कहा था कि वे “न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच एक सेतु” के रूप में कार्य करेंगे.
हालाँकि, एक मनोनीत सदस्य के रूप में गोगोई के प्रदर्शन का रिकॉर्ड विशेष रूप से सक्रिय विधायी भागीदारी नहीं दर्शाता है. पीआरएस द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, उनकी उपस्थिति लगभग 53% थी. राज्यसभा की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि अपने छह साल के कार्यकाल में, उन्होंने केवल एक बहस में भाग लिया, जो अगस्त 2023 में दिल्ली सेवा विधेयक से संबंधित थी. इस विधेयक का समर्थन करते हुए—जिसका उद्देश्य सेवाओं को नियंत्रित करने में निर्वाचित दिल्ली सरकार की शक्तियों को छीनना था—गोगोई ने ‘मूल संरचना सिद्धांत’ की आलोचना करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि इसका “न्यायशास्त्रीय आधार बहुत विवादास्पद है”. उनका यह बयान मुख्य न्यायाधीश के रूप में ‘रोजर मैथ्यू’ मामले में स्वयं उनके द्वारा लिखे गए एक फैसले के विपरीत था, जिसमें उन्होंने मूल संरचना सिद्धांत का समर्थन किया था और न्यायिक स्वतंत्रता को कम करने के लिए ‘ट्रिब्यूनल नियम 2017’ को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि न्यायिक स्वतंत्रता मूल संरचना का हिस्सा है.
यद्यपि संसद ने इस कार्यकाल के दौरान विभिन्न महत्वपूर्ण कानूनों पर चर्चा की, जैसे कि कृषि कानून, नए आपराधिक कानून, ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम, वक्फ संशोधन अधिनियम और महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक, लेकिन इस न्यायविद ने उन बहसों में कोई योगदान नहीं दिया. यह नोट करना भी प्रासंगिक है कि गोगोई ने इस पूरे कार्यकाल के दौरान एक भी प्रश्न नहीं उठाया है, और न ही उन्होंने कोई निजी सदस्य विधेयक पेश किया है.
दिसंबर 2021 में, एक पत्रकार ने रंजन गोगोई से उनकी कम उपस्थिति के बारे में सवाल किया, तो उन्होंने उत्तर दिया कि यह मुख्य रूप से कोविड के कारण था. उन्होंने यह भी कहा कि वे महामारी के दौरान बैठने की व्यवस्था से सहज नहीं थे. उस साक्षात्कार में गोगोई ने कहा था, “मैं राज्यसभा तब जाता हूँ जब मेरा मन करता है, जब मुझे लगता है कि ऐसे महत्वपूर्ण मामले हैं जिन पर मुझे बोलना चाहिए. मैं वहां अपनी मर्जी से जाता हूँ और अपनी मर्जी से बाहर आता हूँ. मैं किसी पार्टी व्हिप से बंधा नहीं हूँ.”
गले में रसगुल्ला फंसने से मौत; झारखंड में शादी की खुशियां मातम में बदलीं
‘एनडीटीवी’ की खबर है कि झारखंड के जमशेदपुर में एक शादी समारोह के दौरान ‘रसगुल्ला’ गले में फंसने से 41 वर्षीय व्यक्ति की दम घुटने के कारण मौत हो गई.
यह घटना सोमवार सुबह की है, जब ललित सिंह मलियान्ता गाँव में एक विवाह समारोह में शामिल होने गए थे. शादी की खुशियाँ उस समय मातम में बदल गईं जब रसगुल्ला खाने के कुछ ही सेकंड बाद सिंह को सांस लेने में दिक्कत होने लगी. आसपास खड़े लोगों ने उनके गले से रसगुल्ला निकालने की कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे. सिंह के पिता उन्हें तुरंत पास के एमजीएम अस्पताल ले गए, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.
डॉक्टरों के अनुसार, रसगुल्ले ने उनकी श्वासनली को पूरी तरह से अवरुद्ध कर दिया था, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति रुक गई. उन्होंने बताया कि सिंह की मृत्यु कुछ ही मिनटों के भीतर हो गई थी. पोस्टमार्टम के बाद सिंह का शव उनके परिजनों को सौंप दिया गया है.
हरियाणा ने प्रोफेसर महमूदाबाद के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इनकार किया
हरियाणा सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि उसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर अशोक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देने का फैसला किया है. सरकार ने कहा कि वह इस मामले में “एक बार की उदारता” दिखा रही है.
‘पीटीआई’ की खबर है कि हरियाणा सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ को बताया कि राज्य ने महमूदाबाद के खिलाफ मुकदमा न चलाने का फैसला किया है. राजू ने पीठ से कहा, “ हमने इस मुद्दे को बंद कर दिया है.”
महमूदाबाद को 18 मई को हरियाणा पुलिस ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर उनके सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर दर्ज दो एफआईआर के बाद गिरफ्तार किया था, जिसमें कथित तौर पर देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने की बात कही गई थी. उन पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 (भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य), 353 (सार्वजनिक शरारत पैदा करने वाले बयान), 79 (महिला की गरिमा का अपमान करने के उद्देश्य से किए गए कार्य) और 196 (1) (धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) के तहत मामला दर्ज किया गया था.
कविता
हतो | कश्मीरी शॉल बेचने वाले का नाम
अतहर ज़िया की यह कविता कश्मीरी शॉल बेचने वालों के जीवन पर आधारित है, जो मौसमी काम के लिए पूरे भारत की यात्रा करते हैं और अक्सर संदेह व शत्रुता का सामना करते हैं. यहाँ शॉल बेचने वाला कश्मीरी लोगों के प्रति भारत की कल्पना का एक प्रतीक बन जाता है. ‘हतो’ कश्मीरी भाषा का एक संबोधन है, जिसका उपयोग किसी को पुकारने या ध्यान आकर्षित करने के लिए किया जाता है, जैसे हिंदी में ‘ओ’ या ‘अरे’ कहा जाता है. अतहर ज़िया एक राजनीतिक मानवविज्ञानी, कवि, लघु कथाकार और स्तंभकार हैं. वह यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्दर्न कोलोराडो, ग्रीली में नृविज्ञान विभाग और जेंडर स्टडीज कार्यक्रम में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.
हतो,
यह उपहार एक बोझ है
तुम्हारे युद्ध से जर्जर कंधों पर
ये शॉलें
लिपटी हैं उन चमकते शरीरों पर
एक ऐसा ऊँचा समाज
जो तुम्हारा नाम तक नहीं जानता
लाखों चुभनों से पैदा हुए तुम्हारे ये ‘पेंस्ले’ (कैरियां)
घर पर इंतज़ार कर रहे बच्चों के लिए चावल और साग का जरिया हैं
हतो,
तुम्हारी शॉल, इतनी महीन
कि एक अंगूठी से सरक जाए
आज किन गलियों में चलोगे तुम
खाली हाथ –
हमारे गिरे हुए फरिश्ते
हर नुक्कड़ और कोने में रूहें बेचते
कीड़ों की तरह छटपटाते,
आधे दबे हुए, रेंगते हुए
एक ऐसी स्थिति जो हम सब पर थोप दी गई है
हतो,
गलियों में बहता तुम्हारा खून,
नफरत का सैलाब कहलाता है
अनदेखी है वह गरजती नदी
जिसे पार कर तुम आते हो
इन मैदानी इलाकों तक,
एक तयशुदा प्याले से पानी पीने,
और एक निर्धारित जगह पर बैठने के लिए,
दरवाजों पर और कदमों में
हतो,
शॉल वाले भैया,
शॉल वाले अंकल,
साले कश्मीरी-कश्मीरी
मुल्ला-कटवे-मुस्लिम दहशतगर्द
जब लाठियां और गालियां
तुम्हारे सिर पर बरसती हैं
तब कौन सा जामावार
तुम्हारे खून के रंगों से खिल उठेगा
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.











