17/01/2026: अब ईरान के भी तीखे तेवर | फडणवीस का कद | हिमालय में बर्फ़ के लाले | अरावली पर इंफ्लूएंसर्स को लालच और धमकियां | नीट छात्रा की मौत पर नीतीश सरकार के खिलाफ़ | इक्कीस | चर्च में रेप
हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
ईरान संकट: 16 भारतीय क्रू सदस्य हिरासत में, दूतावास ने मांगा कॉन्सुलर एक्सेस.
क्लाइमेट अलर्ट: हिमालय में ‘स्नो ड्रॉट’ (बर्फ का सूखा), जम्मू-कश्मीर में 96% कम बर्फबारी.
स्टिंग ऑपरेशन: अरावली खनन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में बोलने के लिए इन्फ्लुएंसर्स को मिले पैसे के ऑफर.
मणिपुर राजनीति: 13 फरवरी से पहले लोकप्रिय सरकार बनाने की कवायद, अमित शाह से मिले बीरेन सिंह.
क्राइम: पटना में नीट छात्रा की संदिग्ध मौत, पोस्टमॉर्टम में संघर्ष के निशान, एसआईटी गठित.
रक्षा सौदे: 114 राफेल विमानों की मंजूरी पर सवाल, पुराने एमएमआरसीए सौदे का नया रूप.
सियासत: महाराष्ट्र निकाय चुनावों में बीजेपी की बढ़त, देवेंद्र फडणवीस का कद बढ़ा.
ईरान में 16 भारतीय क्रू सदस्यों वाला जहाज़ हिरासत में, कॉन्सुलर एक्सेस की मांग
ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी ) द्वारा 8 दिसंबर को एक तेल टैंकर को ज़ब्त किए जाने का मामला सामने आया है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस जहाज़ पर 16 भारतीय क्रू सदस्य सवार हैं. आईआरजीसी ने यूएई के डिब्बा बंदरगाह के पास अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में इस जहाज़ को रोका था और आरोप लगाया है कि यह टैंकर कथित तौर पर 6,000 टन ईंधन की तस्करी कर रहा था.
भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जानकारी दी कि वे लगातार अपने नागरिकों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. दूतावास ने कहा, “कॉन्सुलर एक्सेस का अनुरोध कई बार दोहराया गया है. बंदर अब्बास और तेहरान में राजनयिक पत्राचार और व्यक्तिगत मुलाकातों, जिसमें राजदूत स्तर की बैठकें भी शामिल हैं, के ज़रिए यह मांग उठाई गई है. ईरानी अधिकारियों से यह भी अनुरोध किया गया है कि क्रू को भारत में अपने परिवारों से बात करने की अनुमति दी जाए.”
दूतावास ने बताया कि 15 दिसंबर को दुबई स्थित उस कंपनी से संपर्क स्थापित किया गया था जिसका यह जहाज़ है. इसके बाद से दूतावास कंपनी के ईरान स्थित एजेंटों के संपर्क में है ताकि जहाज़ के लिए भोजन, पानी और ईंधन की व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके और ईरानी अदालतों में क्रू के लिए कानूनी प्रतिनिधित्व का इंतज़ाम हो सके. रिपोर्ट के अनुसार, जब मिशन को जहाज़ पर भोजन और पानी की कमी के बारे में पता चला, तो उन्होंने ईरानी नौसेना के साथ हस्तक्षेप कर जनवरी की शुरुआत में आपातकालीन आपूर्ति उपलब्ध करवाई. दुबई में भारतीय वाणिज्य दूतावास भी कंपनी पर दबाव बना रहा है कि वे नियमित आपूर्ति और कानूनी मदद सुनिश्चित करें. दूतावास ने कहा कि यह मामला ईरान में न्यायिक प्रक्रिया के अधीन रहने की उम्मीद है, लेकिन वे जल्द से जल्द कॉन्सुलर एक्सेस और न्यायिक कार्यवाही को शीघ्र पूरा करने के लिए दबाव बनाना जारी रखेंगे.
विरोध प्रदर्शनों के बीच ईरान से कॉमर्शियल फ्लाइट्स से लौटे भारतीय, छात्रों ने बयां किए हालात
ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों और प्रशासन की सख़्त कार्रवाई के बीच कई भारतीय, जिनमें छात्र भी शामिल हैं, कॉमर्शियल उड़ानों के ज़रिए स्वदेश लौट आए हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान में कार्रवाई के दौरान 2,500 से अधिक लोगों के मारे जाने की खबर है. शुक्रवार देर रात दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरे इन भारतीयों की सही संख्या स्पष्ट नहीं है, लेकिन उनके लौटने से परिवारों ने राहत की सांस ली है.
वापस लौटे यात्रियों में से एक, अली नक़वी ने ‘पीटीआई’ को बताया, “हम तेहरान से लौटे हैं. हमें वहां कोई समस्या नहीं हुई. वहां आठ दिन रुकने के बाद हम भारत आए हैं.” वहीं, शिराज़ के एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाली एक छात्रा ने बताया कि सीमित कनेक्टिविटी के कारण देश के हालात का सही अंदाज़ा लगाना मुश्किल था. उसने कहा, “इंटरनेट काम नहीं कर रहा था, इसलिए हमें ठीक से नहीं पता था कि देश में क्या हो रहा है. लेकिन जिस शहर में मैं थी, वहां स्थिति ठीक थी.” उसने स्पष्ट किया कि उनकी वापसी भारत सरकार द्वारा आयोजित नहीं थी, बल्कि वे अपनी व्यवस्था से कॉमर्शियल फ्लाइट से आए हैं.
एयरपोर्ट पर अपने परिजनों का इंतज़ार कर रहे अब्बास काज़मी ने कहा, “इंटरनेट बंद होने पर चिंता ज़रूर हुई थी, लेकिन जैसे ही संचार बहाल हुआ, हमें तसल्ली हुई.” विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को बताया कि ईरान में लगभग 9,000 भारतीय नागरिक रह रहे हैं, जिनमें ज़्यादातर छात्र हैं. मंत्रालय ने एडवायज़री जारी कर भारतीयों को ईरान न जाने की सलाह दी है और वहां मौजूद लोगों को उपलब्ध साधनों (कॉमर्शियल फ्लाइट्स) से देश छोड़ने को कहा है. जायसवाल ने कहा कि नई दिल्ली स्थिति पर नज़र बनाए हुए है. ईरान में मुद्रा (रियाल) के गिरते स्तर और महंगाई को लेकर पिछले महीने से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं जो सभी 31 प्रांतों में फैल चुके हैं.
चाबहार डील पर पीएम मोदी का पुराना बयान वायरल- ‘भारत किसी तीसरे पक्ष के डर से फैसले नहीं लेता’
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट के ज़रिए सामने आई है. 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो क्लिप चर्चा में है. इसमें पीएम मई 2024 में ईरान के साथ हुए चाबहार पोर्ट समझौते को एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर गिना रहे हैं और इसे “बेहद फायदेमंद” बता रहे हैं. वीडियो में पीएम मोदी ने भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर ज़ोर देते हुए दावा किया कि भारत “किसी तीसरे पक्ष के आधार पर फैसले नहीं लेता,” भले ही इसके बारे में “किसी और को बुरा लगे.” यह टिप्पणी परोक्ष रूप से उन अंतरराष्ट्रीय दबावों (खासकर अमेरिकी प्रतिबंधों की आशंका) की ओर इशारा थी, जो अक्सर ईरान के साथ व्यापारिक समझौतों के आड़े आते रहे हैं. पीएम ने स्पष्ट किया था कि भारत अपने हितों को सर्वोपरि रखता है.
ट्रंप का फिर दावा- मैंने भारत-पाक युद्ध रोका, शहबाज़ ने ‘1 करोड़ लोगों को बचाने’ के लिए दिया धन्यवाद
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को फिर से दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को रोका. एक सड़क का नाम ‘डोनाल्ड जे. ट्रंप बुलेवार्ड’ रखे जाने के कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा, “हमने एक साल में आठ शांति समझौते किए... हमने भारत और पाकिस्तान, दो परमाणु संपन्न देशों को लड़ने से रोका. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ने कम से कम 10 मिलियन (एक करोड़) लोगों को बचाया.”
ट्रंप ने अपने पिछले दावों को दोहराते हुए कहा कि अमेरिकी दबाव ने दोनों पड़ोसियों के बीच तनाव कम किया. हालांकि, भारत ने ट्रंप के दावों को लगातार खारिज किया है. नई दिल्ली का कहना है कि अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले (जिसमें 26 लोग मारे गए थे) के जवाब में भारत द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद हुआ संघर्ष विराम सीधे दोनों देशों के बीच तय हुआ था, इसमें किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं थी. भारतीय अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तान के डीजीएमओ ने खुद संपर्क कर शत्रुता समाप्त करने का अनुरोध किया था.
ट्रंप की ये टिप्पणियां नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनकी दावेदारी के संदर्भ में भी देखी जा रही हैं. हाल ही में वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो ने अपना नोबेल पदक ट्रंप को भेंट किया था, जिसे ट्रंप ने स्वीकार किया. हालांकि, नोबेल समिति ने स्पष्ट किया है कि पुरस्कार को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता.
मणिपुर में लोकप्रिय सरकार की बहाली पर अमित शाह और बीरेन सिंह की बैठक
मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने शुक्रवार देर रात (16 जनवरी, 2026) दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की. सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक का मुख्य केंद्र पूर्वोत्तर राज्य में लोकप्रिय सरकार की बहाली से पहले “अनुकूल माहौल” बनाने और “जटिलताओं को दूर करने” पर था. हिंदू के मुताबिक एक सरकारी अधिकारी ने इसे “रूटीन मामला” बताते हुए कहा कि एक महीने में यह ऐसी दूसरी बैठक थी. इससे पहले 15 दिसंबर को भी दोनों की मुलाकात हुई थी.
शुक्रवार रात 10 बजे शुरू हुई यह बैठक एक घंटे तक चली. हालांकि, गृह मंत्रालय की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया, लेकिन सूत्रों का कहना है कि राज्य से जुड़े राजनीतिक मुद्दों और आंतरिक मतभेदों को सुलझाने पर चर्चा हुई. यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार 13 फरवरी से पहले मणिपुर में एक लोकप्रिय सरकार के गठन की इच्छुक है. ज्ञात हो कि मणिपुर में 13 फरवरी, 2025 को राष्ट्रपति शासन लगाया गया था और विधानसभा को निलंबित रखा गया था. अगले चुनाव फरवरी-मार्च 2027 में होने हैं.
मणिपुर 3 मई, 2023 से मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच जातीय हिंसा से प्रभावित रहा है, जिसमें अब तक लगभग 250 लोगों की जान जा चुकी है और 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं. इस बीच, सरकारी अधिकारी कुकी-ज़ो समुदाय के साथ अलग से बैठकें कर रहे हैं. 14 जनवरी को गृह मंत्रालय के सलाहकार ए.के. मिश्रा ने कुकी-ज़ो काउंसिल (केज़ेडसी) के चेयरमैन से मुलाकात कर सहयोग मांगा था. काउंसिल ने राष्ट्रपति शासन बढ़ाने की मांग की है, लेकिन 12 जनवरी को कुकी-ज़ो समूहों ने कहा कि वे सरकार में शामिल होने के लिए तैयार हैं, बशर्ते केंद्र और राज्य सरकार संविधान के तहत विधायिका के साथ केंद्र शासित प्रदेश के लिए बातचीत का लिखित आश्वासन दें. राज्य में 10 कुकी-ज़ो विधायक हैं.
तस्वीर बोलती है...सीजेआई ने ‘वैदिक मंत्रोच्चार’ के बीच न्यायालय परिसरों की आधारशिला रखी
एक कहावत है- “तस्वीर बोलती है.” यह तस्वीर भी बहुत कुछ बोल रही है. उत्तरप्रदेश के चंदौली, जहां भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शनिवार को “वैदिक मंत्रोच्चार” के बीच उत्तरप्रदेश के छह जिलों के लिए एकीकृत न्यायालय परिसरों की आधारशिला रखी, की इस तस्वीर में सीजेआई सूर्यकांत राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वेदी के सामने करबद्ध हो कर बैठे हैं और पंडितजी मंत्रोच्चार कर रहे हैं. इस अवसर पर एक सभा को संबोधित करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “एक बार जब ये (एकीकृत न्यायालय परिसर) बन जाएंगे, तो मुझे लगता है कि उत्तरप्रदेश पूरे भारत के लिए एक मिसाल कायम करेगा. ये परिसर पूरे राष्ट्र के लिए एक मानक बनेंगे.”
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि देश का यह क्षेत्र कई ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों के लिए जाना जाता है, अब मुख्यमंत्री ने यहां ‘न्यायिक मंदिरों’ की स्थापना करके उस इतिहास में एक नई कड़ी जोड़ दी है.शिलान्यास और भूमि पूजन कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पंकज मिथल, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति राजेश बिंदल, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली, उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और वरिष्ठ न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी सहित अन्य गणमान्य लोग शामिल हुए.
बीएमसी चुनाव: देवेंद्र फडणवीस का कद और बढ़ा
महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की शानदार बढ़त और एशिया की सबसे अमीर नगरपालिका ‘बीएमसी’ (बृहन्मुंबई नगर निगम) पर कब्ज़ा करने की ओर बढ़ते क़दमों ने देवेंद्र फडणवीस के राजनीतिक कद को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है. फडणवीस के नेतृत्व में बीजेपी मुंबई, पुणे, नवी मुंबई, नागपुर और नासिक जैसे प्रमुख नगर निगमों में जीत की ओर अग्रसर है. यह जीत इसलिए भी अहम है क्योंकि शिवसेना (अविभाजित) ने करीब 30 साल तक बीएमसी पर राज किया था.
रिपोर्ट के मुताबिक, फडणवीस ने अपनी रणनीति को सिर्फ़ हिंदुत्व तक सीमित नहीं रखा, बल्कि खुद को एक ‘इन्फ्रा मैन’ के रूप में पेश किया. मेट्रो नेटवर्क, अटल सेतु और कोस्टल रोड जैसे प्रोजेक्ट्स के ज़रिए उन्होंने मुंबई के विकास का नैरेटिव सेट किया, जिसने मराठी और गैर-मराठी दोनों वोटर्स को आकर्षित किया. ख़ास बात यह रही कि फडणवीस ने इस चुनाव को मोदी-शाह के चेहरों के बजाय स्थानीय मुद्दों और सीधे ‘फडणवीस बनाम ठाकरे’ की लड़ाई के तौर पर लड़ा. इससे शिवसेना (यूबीटी) को ‘मराठी बनाम गुजराती’ का कार्ड खेलने का मौका नहीं मिला.
इसके अलावा, फडणवीस ने रणनीतिक रूप से नवाब मलिक के दाऊद इब्राहिम से कथित संबंधों के कारण अजित पवार की एनसीपी से दूरी बनाए रखी, जिससे बीजेपी अपनी वैचारिक स्पष्टता बनाए रखने में सफल रही. उन्होंने मुंबई में शिवसेना के पुराने ‘शाखा मॉडल’ की तर्ज़ पर बीजेपी का नेटवर्क खड़ा किया, जिससे पार्टी की ज़मीनी पकड़ मज़बूत हुई. इस जीत ने फडणवीस को बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए एक संभावित चेहरा बना दिया है.
पटना में नीट छात्रा की मौत पर सियासत गरमाई, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में संघर्ष और यौन हमले के संकेत
पटना के एक हॉस्टल में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत के मामले में बिहार की राजनीति गरमा गई है. पुलिस ने शुरुआत में इसे आत्महत्या बताते हुए कहा था कि छात्रा ने गोलियां खाई थीं और यौन हमले के सबूत नहीं मिले हैं. लेकिन, पीएमसीएच (पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल) के मेडिकल बोर्ड द्वारा तैयार की गई पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने पुलिस के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट में यौन हमले की आशंका को ख़ारिज नहीं किया गया है और शरीर पर चोट के निशान मिले हैं जो मौत से पहले हुए संघर्ष की ओर इशारा करते हैं.
इस मामले में विपक्ष ने नीतीश कुमार सरकार पर तीखा हमला बोला है. कांग्रेस सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने पीड़िता के परिवार से मुलाक़ात कर आरोप लगाया कि पुलिस मामले को रफा-दफा करने की कोशिश कर रही थी. उन्होंने दोषियों के लिए फांसी की सज़ा की मांग की. जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने भी परिवार से मिलकर एसएसपी से जवाब तलब किया. मामले की गंभीरता को देखते हुए डीजीपी ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में निजी अंगों पर गहरी चोटें और अत्यधिक रक्तस्राव का ज़िक्र है, जो ज़बरदस्ती की ओर इशारा करते हैं. रिपोर्ट को दूसरी राय के लिए एम्स-पटना भेजा गया है. हॉस्टल की वार्डन को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है.
यूपी में ‘एसआईआर’: मुस्लिम परिवारों के पते हिंदुओं के नाम जोड़ दिए गए, जांच
उत्तरप्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत हाल ही में जारी मसौदा मतदाता सूची में कथित विसंगतियां पाए जाने के बाद बुलंदशहर जिला प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है. यह मामला तब प्रकाश में आया जब शिकारपुर तहसील के पहासू कस्बे के पठान टोला मोहल्ले के कई निवासियों ने दावा किया कि “उनके पते पर अज्ञात मतदाताओं के नाम जोड़े जा रहे हैं.”
राहुल सिंह की रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय निवासी सगीर खान ने प्रशासन को एक लिखित शिकायत सौंपी, जिसमें दावा किया गया है कि पिछले महीने पुनरीक्षण प्रक्रिया शुरू होने से पहले मतदाता सूची सटीक थी, लेकिन नई मसौदा सूची प्रकाशित होने के बाद त्रुटियां सामने आईं.
खान ने कहा, “आधे दर्जन से अधिक मुस्लिम परिवारों के घरों में ‘56 अतिरिक्त हिंदू मतदाता’ पंजीकृत दिखाए गए हैं.”
उन्होंने आगे बताया, “इस मोहल्ले में कम से कम आठ घरों में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या में अचानक वृद्धि देखी गई. मेरे अपने निवास (मकान नंबर 125) में कम से कम सात अतिरिक्त नाम जोड़े गए हैं, जो सभी हिंदू हैं. हमारे मोहल्ले के आठ अन्य घरों में भी पंजीकृत मतदाताओं में इसी तरह की वृद्धि देखी गई है. हमारे क्षेत्र से सूची में लगभग 56 मतदाता जोड़े गए हैं.” शिकारपुर के एसडीएम अरुण कुमार ने कहा कि पाई गई विसंगतियों को सुधारा जा रहा है.
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है कि वह केरल में तैयार मसौदा मतदाता सूची से हटाए गए व्यक्तियों के नामों को प्रकाशित करे (यदि अभी तक नहीं किया गया है), ताकि जो मतदाता अपने नाम हटाए जाने को चुनौती देना चाहते हैं, वे ऐसा कर सकें. इतना ही नहीं, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव आयोग को आपत्तियां दर्ज करने की समय-सीमा बढ़ाने पर विचार करने के लिए भी कहा है.
114 राफेल विमानों की मंज़ूरी: नई बोतल में पुरानी शराब, उठ रहे हैं सवाल
द वायर के लिए राहुल बेदी ने लिखा है कि रक्षा मंत्रालय द्वारा 114 फ्रेंच डसॉल्ट राफेल विमानों को मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (एमआरएफए) प्रोग्राम के तहत मंज़ूरी दिए जाने को एक बड़ा कदम बताया जा रहा है, लेकिन हकीकत में यह अतीत से अलग नहीं है. 16 जनवरी को मंत्रालय द्वारा दी गई यह मंज़ूरी असल में 2007 के उस 126 विमानों वाले एमएमआरसीए सौदे का ही नया रूप है, जिसे 2014 में बीजेपी सरकार ने रद्द कर दिया था. रिपोर्ट के अनुसार, अब यह सौदा लगभग 30-35 बिलियन डॉलर (मूल अनुमान से तीन गुना ज़्यादा) का होगा और इसमें एक दशक से ज़्यादा की देरी हो चुकी है.
वरिष्ठ वायुसेना दिग्गजों का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया नौकरशाही की भेंट चढ़ गई है, जिससे वायुसेना को अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है और लंबा इंतज़ार करना पड़ रहा है. वायुसेना की फाइटर स्क्वाड्रन की क्षमता घटकर 29-30 रह गई है, जबकि ज़रूरत 42.5 की है. एक पूर्व थ्री-स्टार फाइटर पायलट ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “भारत को एमआरएफए सौदे के लिए भारी प्रीमियम चुकाना पड़ेगा. यह राजनीतिक गौरव का नतीजा है जिसने समझदारी को पीछे छोड़ दिया.” उनका मानना है कि अगर मूल एमएमआरसीए सौदा आगे बढ़ा होता, तो आज भारत के पास ‘होमग्रोन’ (स्वदेश निर्मित) राफेल होते.
विश्लेषण के मुताबिक, 2016 में 36 फ्लाईअवे राफेल खरीदने का फैसला एक ‘राजनीतिक शॉर्टकट’ था, जिसने अंततः 2018-19 में एमआरएफए कार्यक्रम को जन्म दिया. अब, 114 विमानों के लिए मंज़ूरी के बाद भी प्रक्रिया लंबी है. इसमें ‘एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी’ (आवश्यकता की स्वीकार्यता), कीमत पर बातचीत, तकनीक हस्तांतरण और भारतीय साझीदार का चयन शामिल है. विशेषज्ञों का मानना है कि अंतिम समझौता होने में 2-3 साल लग सकते हैं और डिलीवरी 2028-29 से पहले शुरू होने की उम्मीद नहीं है. साथ ही, डसॉल्ट के पास अन्य देशों के भी बड़े ऑर्डर पेंडिंग हैं, जिससे डिलीवरी में और देरी हो सकती है. यह सौदा देरी से उठाया गया एक कदम है जो उस गिरावट को रोकने की कोशिश है जिसे बहुत पहले रोका जा सकता था.
राजस्थान में अवैध खनन की 77% FIR सिर्फ अरावली ज़िलों से, नियमों में बदलाव से बढ़ सकता है खतरा
द हिंदू के लिए देव्यांशी बी. के मुताबिक आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान के वे ज़िले, जहां अरावली पर्वतमाला का लगभग 70% हिस्सा मौजूद है, अवैध खनन से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं. रिपोर्ट के अनुसार, अरावली के इन ज़िलों में राज्य की 45% से भी कम खनन लीज़ हैं और वे कुल खनिज उत्पादन में केवल 40% का योगदान देते हैं, लेकिन अवैध खनन के मामलों में उनकी हिस्सेदारी 56% से ज़्यादा है. चौंकाने वाली बात यह है कि राज्य में अवैध खनन के लिए दर्ज की गई कुल एफआईआर में से 77% से अधिक इन्हीं अरावली ज़िलों से आती हैं.
अरावली का यह क्षेत्र राजस्थान के खनन संकट का केंद्र बिंदु बन गया है. हाल ही में ‘अरावली पहाड़ी’ की कानूनी परिभाषा में प्रस्तावित बदलावों ने इस स्थिति को और गंभीर बनाने का खतरा पैदा कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने मई 2024 में पाया था कि राज्यों के बीच अरावली की परिभाषा में एकरूपता की कमी अवैध खनन को बढ़ावा दे रही है. इसके लिए एक तकनीकी समिति बनाई गई थी. हालांकि, पर्यावरण मंत्रालय ने सुझाव दिया कि केवल वे भू-आकृतियां जो 100 मीटर ऊंची हों, उन्हें ही पहाड़ी माना जाए. विशेषज्ञों और एफएसआई ने चेतावनी दी है कि इस परिभाषा से अरावली की कई छोटी पहाड़ियां खनन के लिए खुल जाएंगी.
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 के आदेश को स्थगित रखा है और केंद्र सरकार ने नई लीज़ पर रोक लगा दी है. 2020 से 2023 के बीच राजस्थान में अवैध खनन के 28,166 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 15,772 अरावली ज़िलों से थे. अरावली न केवल खनिज संसाधन है, बल्कि यह थार रेगिस्तान को पूर्वी राजस्थान और हरियाणा की तरफ बढ़ने से रोकने में भी अहम भूमिका निभाती है. यह क्षेत्र भूजल रीचार्ज और वन्यजीवों के लिए एक महत्वपूर्ण कॉरिडोर भी है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में माहौल बनाने के लिए इन्फ्लुएंसर्स को पैसे का ऑफर, मना करने पर मिली धमकियां
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और सुप्रीम कोर्ट के 100-मीटर एलिवेशन वाले फॉर्मूले को लेकर चल रहे विवाद के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है. ऑल्ट न्यूज़ में अंकिता महालनोबिश की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने दावा किया है कि पीआर (जनसंपर्क) एजेंसियों ने उनसे संपर्क कर सुप्रीम कोर्ट के शुरुआती फैसले (जिसमें 100 मीटर की ऊंचाई वाले हिस्से को ही पहाड़ मानने की बात कही गई थी) के पक्ष में ‘पेड कंटेंट’ बनाने की पेशकश की. इन एजेंसियों का मक़सद जनता की राय को प्रभावित करना था. इतना ही नहीं, कुछ क्रिएटर्स का आरोप है कि मना करने पर उन्हें धमकियां भी दी गईं.
रिपोर्ट में बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में सरकार के उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था जिसमें 100 मीटर से ऊंची भूमि को ही ‘अरावली हिल्स’ मानने की बात थी. इसका पर्यावरणविदों ने कड़ा विरोध किया था, जिसके बाद दिसंबर में कोर्ट ने अपने ही आदेश पर रोक लगा दी थी. इसी बीच, ‘जज़्बाती सक्सेना’ के नाम से मशहूर इंस्टाग्राम क्रिएटर अनमोल सक्सेना ने 24 दिसंबर को एक वीडियो जारी कर बताया कि एक एजेंसी ने उन्हें अरावली प्रोजेक्ट के ‘विकास और इन्फ्रास्ट्रक्चर’ वाले पहलू को उभारने के लिए संपर्क किया. उन्हें पुरानी रील हटाने और एजेंसी द्वारा तय नैरेटिव पर वीडियो बनाने के लिए लाखों रुपयों का ऑफर दिया गया. अनमोल ने इसे ठुकरा दिया. इसी तरह मौलिक जैन और शाहबाज़ आलम जैसे अन्य क्रिएटर्स ने भी बताया कि उन्हें 50-60 हज़ार रुपये तक का ऑफर मिला और ‘आधा ज्ञान खतरनाक होता है’ जैसी लाइनें बोलने की स्क्रिप्ट दी गई.
जांच में सामने आया कि 23 दिसंबर, 2025 को करीब 13 इंस्टाग्राम अकाउंट्स ने एक साथ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में वीडियो पोस्ट किए, जिनमें एक जैसे तर्क और जुमले इस्तेमाल किए गए थे. शाहबाज़ आलम के मुताबिक, एजेंसियों ने क्रिएटर्स को हूबहू स्क्रिप्ट कॉपी करने को कहा था. जब कुछ इन्फ्लुएंसर्स ने इस ‘पेड प्रमोशन’ का भंडाफोड़ किया, तो उन्हें कानूनी कार्रवाई और अन्य अंजाम भुगतने की धमकियां मिलीं. ‘सोशल एरो मीडिया’ नामक एक एजेंसी का नाम भी इस मामले में सामने आया है. यह मामला दिखाता है कि कैसे जनमत को प्रभावित करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है.
बिशप रेप केस: 8 साल बाद नन ने तोड़ी चुप्पी, कहा- ‘मैं अब विक्टिम नहीं, सर्वाइवर हूं’
बिशप फ्रेंको मुलक्कल के खिलाफ रेप की शिकायत दर्ज कराने के आठ साल बाद, सिस्टर रानित ने अपनी चुप्पी तोड़ी है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मुलक्कल, जो जालंधर डायोसिस के बिशप थे, उन पर 2014 से 2016 के बीच 13 बार रेप करने का आरोप था. 2022 में ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया था, लेकिन सिस्टर रानित ने हाई कोर्ट में अपील की है, जिसकी सुनवाई 2026 में होनी है. उन्होंने कहा, “मैंने बाहर आने का फैसला इसलिए किया क्योंकि इससे कई महिलाओं को ताकत मिलेगी. मैं हार नहीं मानूंगी.”
कोट्टायम के कुराविलांगड़ स्थित सेंट फ्रांसिस मिशन होम में, जहां कथित घटनाएं हुई थीं, सिस्टर रानित आज भी रहती हैं. उन्होंने बताया कि कैसे ‘रूम नंबर 20’ में उनके साथ ज्यादती हुई. उन्होंने कहा, “मैं चिल्लाना चाहती थी, लेकिन डर गई थी क्योंकि वह बिशप थे.” उन्होंने चर्च के भीतर हर दरवाज़ा खटखटाया, वेटिकन के प्रतिनिधि को लिखा, लेकिन जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो उन्हें पुलिस के पास जाना पड़ा. शिकायत के बाद उन्हें और उनका साथ देने वाली पांच अन्य ननों को अलग-थलग कर दिया गया.
आज मिशन होम में केवल तीन नन बची हैं. सिस्टर रानित का आरोप है कि उनकी कॉन्ग्रिगेशन ने उन्हें वित्तीय मदद देना बंद कर दिया है. गुज़ारा करने के लिए वे अब सब्ज़ियां उगाती हैं और ‘स्टैंड बाय मी’ नाम से बैग व कपड़े सिलती हैं. हालांकि, वर्तमान बिशप का दावा है कि डायोसिस अब भी उनकी मदद कर रहा है. सिस्टर रानित कहती हैं, “मेरे पिता, जो सीआरपीएफ में थे, कहते थे कि किसी काम को बीच में मत छोड़ना. मैं आखिरी सांस तक नन बनी रहूंगी. इन सभी वर्षों में मैं एक पीड़िता थी, लेकिन अब मैं एक सर्वाइवर हूं.”
उज्जैन में नाबालिग के साथ बर्बरता, पिटाई के बाद चेहरा काला किया और नग्न घुमाया
लोगों के कानून हाथ में लेने की मामले बढ़ने लगे हैं. ताज़ा खबर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के गृह नगर उज्जैन की है, जहां एक नाबालिग (16 वर्षीय) लड़के के साथ कथित तौर पर मारपीट की गई, उसका चेहरा काला किया गया और फिर सार्वजनिक रूप से लगभग 1.5 किलोमीटर तक नंगा करके घुमाया गया. यह घटना एक नाबालिग लड़की के साथ भागने के प्रतिशोध में की गई.
घटना का वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर चार आरोपियों को हिरासत में ले लिया है.
“एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस” के अनुसार, जिस लड़की के साथ वह तीन महीने पहले भागा था, उसके परिवार के सदस्यों ने उज्जैन के पंवासा इलाके में उस पर हमला किया. लड़के ने बताया कि वे तीन हफ्ते से भी कम समय में वापस लौट आए थे. उसने दावा किया कि उसे एक महीने से अधिक समय के लिए जेल भेज दिया गया था, जबकि लड़की को सुधार गृह भेजा गया था.
उसकी माँ के देवास में अस्पताल में भर्ती होने के बाद, वह उनके इलाज के लिए पैसों का इंतजाम करने उज्जैन लौटा था. किशोर ने बताया, “लड़की के रिश्तेदारों ने मुझे देख लिया और जबरन एक एमयूवी गाड़ी में ले गए. इसके बाद उन्होंने मुझे करीब एक घंटे तक एक कमरे में बंद कर बेरहमी से पीटा. मुझे निर्वस्त्र कर दिया, मेरा चेहरा काला किया और पहले मुझे कंकड़ों पर घसीटा, फिर सार्वजनिक रूप से लगभग 1.5 किलोमीटर तक नग्न घुमाया. पुलिस को मामले की जानकारी मिल गई है और उन्होंने मुझे आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है. अगर उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, तो मैं आत्महत्या करने को मजबूर हो जाऊंगा.”
राज्यसभा में 19 सरकारी विधेयक लंबित, सबसे पुराना 1992 का जनसंख्या नियंत्रण बिल
राज्यसभा में कुल 19 सरकारी विधेयक लंबित हैं, जिनमें सबसे पुराना विधेयक जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित है जो 1992 का है. इस विधेयक में राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों में संशोधन का प्रस्ताव दिया गया था, ताकि यह प्रावधान किया जा सके कि राज्य जनसंख्या नियंत्रण और छोटे परिवार के मानक को बढ़ावा देगा. साथ ही, मौलिक कर्तव्यों में छोटे परिवार के मानक को अपनाने और बढ़ावा देने को शामिल करने का प्रस्ताव था. इसमें यह भी प्रस्ताव दिया गया था कि यदि किसी सांसद या विधायक के दो से अधिक बच्चे हैं, तो उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए.
लंबित विधेयकों में ‘दिल्ली किराया (संशोधन) विधेयक, 1997’ भी शामिल है. ‘पीटीआई’ के मुताबिक, सरकार ‘बीज विधेयक 2025’ लाने पर काम कर रही है, वहीं लंबित विधेयकों में ‘बीज विधेयक, 2004’ भी शामिल है. इसका उद्देश्य बिक्री, आयात और निर्यात के लिए बीजों की गुणवत्ता को विनियमित करना और गुणवत्तापूर्ण बीजों के उत्पादन और आपूर्ति को सुगम बनाना था.
एक अन्य विधेयक जो अभी भी लंबित है, वह ‘अंतर-राज्यीय प्रवासी श्रमिक (रोजगार का विनियमन और सेवा की शर्तें) संशोधन विधेयक, 2011’ है. इसे तब पेश किया गया था जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे श्रम मंत्री थे.
यूपीए-2 शासन के दौरान पेश किए गए अन्य लंबित विधेयकों में ‘भवन और अन्य निर्माण श्रमिक संबंधित कानून (संशोधन) विधेयक, 2013’; ‘रोजगार कार्यालय (रिक्तियों की अनिवार्य अधिसूचना) संशोधन विधेयक, 2013’; और ‘संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व का पुनर्समायोजन (तीसरा) विधेयक, 2013’ शामिल हैं.
एनडीए शासन के दौरान पेश किए गए लंबित विधेयकों में ‘संविधान (एक सौ पच्चीसवां संशोधन) विधेयक, 2019’ शामिल है, जिसका उद्देश्य असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में ‘स्वायत्त परिषदों’ की वित्तीय और कार्यकारी शक्तियों को बढ़ाकर पूर्वोत्तर में जनजातीय स्वायत्तता को मजबूत करना और निर्वाचित ग्राम एवं नगर पालिकाओं की शुरुआत करना था. इसके अलावा, ‘अनिवासी भारतीय विवाह पंजीकरण विधेयक, 2019’ भी लंबित है. सबसे हालिया लंबित विधेयक ‘कीटनाशक प्रबंधन विधेयक’ है, जो 2020 का है.
रोहित वेमुला और भारतीय विश्वविद्यालयों में जारी जातिगत भेदभाव: क्या नाम में ही सब कुछ है?
न्यू इंडियन एक्स्प्रेस में अखिलेश कुमार लिखते हैं कि 17 जनवरी, 2016 को रोहित वेमुला की “संस्थागत हत्या” को अब दस साल हो चुके हैं. अगर रोहित आज ज़िंदा होते, तो 36 साल के होते—शायद एक शिक्षक या वैज्ञानिक. लेखक का तर्क है कि रोहित की मौत ने यह उजागर कर दिया कि विश्वविद्यालय, जिन्हें तर्क और आधुनिकता का केंद्र माना जाता है, असल में जातिवादी संरचनाओं से गहरे जुड़े हैं. यह भेदभाव अब खुले तौर पर गाली-गलौज के रूप में नहीं, बल्कि ‘मेरिट’ (योग्यता) और ‘सभ्यता’ की आड़ में होता है.
लेख में कहा गया है कि उच्च शिक्षा में दलित छात्रों को अक्सर “अस्पष्ट” या “आत्मविश्वास की कमी” बताकर इंटरव्यू और वाइवा में कम अंक दिए जाते हैं. पियरे बोर्दियो के सिद्धांतों का हवाला देते हुए लेखक समझाते हैं कि कैसे सवर्ण छात्रों की सांस्कृतिक पूंजी (भाषा, आत्मविश्वास) को ‘मेरिट’ मान लिया जाता है, जबकि दलित छात्रों के संघर्ष और ज्ञान को खारिज़ कर दिया जाता है. यह संस्थागत अपमान उन्हें अलग-थलग कर देता है, जो अंततः ‘संस्थागत हत्या’ का कारण बनता है.
रोहित वेमुला का यह कथन कि “मेरा जन्म ही मेरी घातक दुर्घटना है,” उस व्यवस्था पर चोट करता है जो इंसान को सिर्फ एक पहचान या नंबर तक सीमित कर देती है. लेखक शेक्सपियर के “नाम में क्या रखा है?” वाले मुहावरे को चुनौती देते हुए कहते हैं कि एक जातिवादी समाज में, एक सरनेम ही सम्मान या अपमान तय कर देता है. रोहित की मृत्यु महज एक घटना नहीं, बल्कि उस पैटर्न का हिस्सा है जो पायल तड़वी से लेकर दर्शन सोलंकी तक जारी है.
हिमालय में ‘स्नो ड्रॉट’ (बर्फ का सूखा): लाखों लोगों के लिए खतरे की घंटी
निधि जमवाल ने कश्मीर टाइम्स में स्नो ड्रॉट पर लंबी रिपोर्ट लिखी है. पर्यावरण पत्रकारों के लिए सूखा हमेशा गर्मियों की कहानी हुआ करता था, लेकिन हिमालय में एक “मौन सूखा” या ‘स्नो ड्रॉट’ (बर्फ का सूखा) आकार ले रहा है, जिसके गंभीर आर्थिक और पारिस्थितिक परिणाम सामने आ रहे हैं. जनवरी 2026 के मध्य तक, जम्मू-कश्मीर में माइनस 96% और उत्तराखंड में 100% (यानी शून्य बारिश/बर्फबारी) की कमी दर्ज की गई है. गुलमर्ग जैसे स्थान, जिन्हें इस समय बर्फ की चादर में लिपटे होना चाहिए था, सूखे पड़े हैं.
इस ‘शीतकालीन सूखे’ का असर 5 करोड़ से अधिक लोगों पर पड़ेगा जो पानी के लिए ग्लेशियरों और झरनों पर निर्भर हैं. सर्दियों की बर्फबारी रबी की फसलों, विशेषकर गेहूं, और सेब की खेती के लिए रीढ़ की हड्डी के समान है. उत्तराखंड के जंगलों में अभी से आग लगने की घटनाएं शुरू हो गई हैं. मौसम विज्ञानियों का कहना है कि इसका मुख्य कारण ‘वेस्टर्न डिस्टर्बेंस’ (पश्चिमी विक्षोभ) के पैटर्न में बदलाव है. जलवायु परिवर्तन के कारण जेट स्ट्रीम उत्तर की ओर खिसक गई है, जिससे इन तूफानों की आवृत्ति और तीव्रता में कमी आई है. हालांकि, आने वाले हफ्तों में कुछ वेस्टर्न डिस्टर्बेंस की उम्मीद है जो थोड़ी राहत दे सकते हैं.
सुरक्षा कारणों से भारत में नहीं खेलना चाहता बांग्लादेश, आईसीसी से श्रीलंका में मैच शिफ्ट करने की मांग
बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) से अपने टी-20 वर्ल्ड कप मैचों के ग्रुप को बदलने की मांग की है, ताकि वे भारत के बजाय श्रीलंका में खेल सकें. ढाका में आईसीसी के दो सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई बैठक के दौरान बीसीबी ने यह अनुरोध किया. बीसीबी चाहता है कि उसे ग्रुप सी (जिसमें वेस्टइंडीज, इंग्लैंड, नेपाल और भारत में मैच होने हैं) से हटाकर ग्रुप बी में शिफ्ट कर दिया जाए, ताकि वे श्रीलंका में खेल सकें.
रिपोर्ट के अनुसार, बीसीबी के अधिकारियों ने आईसीसी के जनरल मैनेजर गौरव सक्सेना और एंड्रयू एफग्रेव के साथ बैठक में अपनी सरकार और खिलाड़ियों की सुरक्षा चिंताओं को रखा. बीसीबी ने सुझाव दिया है कि उनकी जगह आयरलैंड को ग्रुप सी में भेजा जाए और उन्हें आयरलैंड की जगह ग्रुप बी में शामिल किया जाए. हालांकि, आयरलैंड क्रिकेट बोर्ड के सूत्रों ने अख़बार को बताया कि उन्हें आईसीसी से “ठोस आश्वासन” मिला है कि उनके शेड्यूल में कोई बदलाव नहीं होगा और वे श्रीलंका में ही अपने मैच खेलेंगे. बीसीबी का यह रुख कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) द्वारा बांग्लादेशी पेसर मुस्तफिजुर रहमान को ड्रॉप किए जाने के विवाद के बाद और सख़्त हुआ है. आईसीसी द्वारा इस मांग को स्वीकार करना मुश्किल माना जा रहा है क्योंकि इससे लॉजिस्टिक्स से जुड़ी बड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.
भारत का व्यापार घाटा बढ़ा, हालांकि निर्यात में भी मामूली इजाफ़ा
वाणिज्य विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ जारी टैरिफ (शुल्क) वार्ताओं के बावजूद, दिसंबर में भारत का वस्तु निर्यात सालाना आधार पर 1.8% बढ़कर 38.51 बिलियन डॉलर हो गया. ‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, आयात 8.8% बढ़कर 63.55 बिलियन डॉलर रहा. हालांकि, व्यापार घाटा बढ़कर 25 बिलियन डॉलर हो गया, जबकि दिसंबर 2024 में यह 20.63 बिलियन डॉलर था.
घरेलू रक्षा कंपनियों में विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए नियमों में ढील देगा भारत
“रॉयटर्स” की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार घरेलू रक्षा कंपनियों में विदेशी निवेश (एफ़डीआई) बढ़ाने के लिए नियमों को और उदार बनाने की योजना बना रही है.
वर्तमान में जिन रक्षा कंपनियों के पास लाइसेंस है, उनमें ‘ऑटोमैटिक रूट’ (बिना सरकारी अनुमति के) विदेशी निवेश की सीमा 49% से बढ़ाकर 74% की जा सकती है. वर्तमान में 74% की यह सीमा केवल नई लाइसेंस वाली कंपनियों के लिए है.
सरकार उस शर्त को हटाने पर भी विचार कर रही है, जिसके तहत 74% से अधिक विदेशी निवेश के लिए ‘आधुनिक तकनीक’ उपलब्ध कराने की आवश्यकता होती थी. विशेषज्ञों ने इस शब्द को काफी अस्पष्ट बताया था, जिससे निवेश में बाधा आती थी.
पूरी तरह से निर्यात पर केंद्रित रक्षा निर्माताओं के लिए अब भारत में ही रखरखाव और सपोर्ट सेंटर स्थापित करना अनिवार्य नहीं होगा. अब वे इन सेवाओं को आउटसोर्स (बाहर से करवा) सकेंगे, जिससे विदेशी कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना आसान होगा.
इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य वैश्विक रक्षा कंपनियों को भारतीय उपक्रमों में बहुमत हिस्सेदारी लेने के लिए प्रोत्साहित करना और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना है. यह कदम पिछले वर्ष (2025) पाकिस्तान के साथ हुए संघर्ष के बाद रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के तहत उठाया जा रहा है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 25 वर्षों में भारत में कुल 765 बिलियन डॉलर का विदेशी निवेश आया है, लेकिन रक्षा क्षेत्र में यह निवेश बहुत ही कम (सिर्फ 26.5 मिलियन डॉलर) रहा है. सरकार अगले कुछ महीनों में इन सुधारों को लागू कर सकती है, जिससे भारत को रक्षा विनिर्माण का एक वैश्विक केंद्र बनाने में मदद मिलेगी.
चीन को महान बनाने में मदद कर रहा ट्रंप का एजेंडा
इसी बीच, ‘यूरोपीय काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस’ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, ट्रंप का “अमेरिका फर्स्ट” एजेंडा चीन को फिर से महान बनाने में मदद कर रहा है और एक “वास्तविक बहुध्रुवीय दुनिया” की शुरुआत कर रहा है. कई देश चीन के नजदीक आ रहे हैं. अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और ब्राजील सहित 21 देशों का सर्वेक्षण करने के बाद थिंक टैंक ने कहा, “ट्रंप की वापसी के एक साल बाद, दुनिया भर के देशों में कई लोगों का मानना है कि चीन और भी अधिक शक्तिशाली होने की कगार पर है.”
हालांकि, ‘द साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ ने लिखा है “यह बदलाव भारत में और भी बड़ा है. नई दिल्ली और बीजिंग के बीच संबंध पारंपरिक रूप से तनावपूर्ण रहे हैं; इसके बावजूद, लगभग आधे भारतीय चीन को या तो एक सहयोगी या एक आवश्यक भागीदार के रूप में देखते हैं.”
सुशांत सिंह : इसलिए इक्कीस दमदार फिल्म है
कैरेवन में प्रकाशित अपने लेख में सुशांत सिंह श्रीराम राघवन की फिल्म ‘इक्कीस’ की तारीफ करते हुए कहते हैं कि यह भारतीय वॉर सिनेमा में एक दुर्लभ और बेहतरीन फिल्म है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह शोर-शराबे और दिखावटी देशभक्ति से दूर रहती है. 1971 युद्ध के सबसे युवा परम वीर चक्र विजेता अरुण खेत्रपाल की कहानी सुनाते हुए, यह फिल्म 1818 की कोरेगांव की लड़ाई और 1971 की बसंतर की लड़ाई के ऐतिहासिक तार जोड़ती है. यह फिल्म नायक को कोई ‘सुपरहीरो’ बनाकर पेश नहीं करती, बल्कि उसके साधारण जीवन को दिखाती है, जिससे उसकी शहादत और भी ज्यादा प्रभावशाली लगती है.
अंधाधुंध राष्ट्रवाद से दूरी: ज़्यादातर भारतीय युद्ध फिल्मों के उलट, जो शोर को देशभक्ति और तमाशे को वीरता समझती हैं, ‘इक्कीस’ “चिल्लाने से इनकार” करती है. यह दिखाती है कि साहस कोई फिल्मी पोज़ नहीं, बल्कि अराजकता और डर के बीच स्पष्टता का नाम है.
दुश्मन का मानवीकरण: फिल्म पाकिस्तानी सैनिकों को विलेन या कार्टून की तरह पेश नहीं करती. नासिर का किरदार (जिसने असल में खेत्रपाल के टैंक को उड़ाया था) एक पेशेवर सैनिक के रूप में दिखाया गया है जो सिर्फ अपना फर्ज निभा रहा है. यह उपमहाद्वीप के सैनिकों के बीच मौजूद आपसी पेशेवर सम्मान को दर्शाता है.
साझा अतीत का संदर्भ: लेख इस बात पर जोर देता है कि 1971 का युद्ध अनोखा था क्योंकि दोनों तरफ के नेतृत्व (जैसे सैम मानेकशॉ और याह्या खान) ने पुरानी ब्रिटिश इंडियन आर्मी में साथ काम किया था, साथ खाया-पिया था. फिल्म बंटवारे के बाद भी दोनों सेनाओं के अफसरों के बीच बची हुई इस आत्मीयता को बखूबी पकड़ती है.
युद्ध कोई तमाशा नहीं: लेखक का तर्क है कि यूरोप या रूस के विपरीत, भारत ने अपनी ज़मीन पर “पूर्ण युद्ध” की वैसी तबाही नहीं देखी है, इसलिए यहाँ की जनता अक्सर युद्ध को एक ‘इवेंट’ या तमाशे (जैसे कारगिल के समय) की तरह देखती है. लेकिन ‘इक्कीस’ दर्शकों को हिंसा की असली, बिना ग्लैमर वाली मानवीय कीमत याद दिलाती है.
मिथक नहीं, असलियत: फिल्म मेलोड्रामा (जैसे बचपन में मगरमच्छ से लड़ने वाले फर्जी किस्से) से बचती है और खेत्रपाल के साधारण संघर्षों पर ध्यान केंद्रित करती है. लेखक अंत में कहते हैं कि अल्बर्ट एक्का और अब्दुल हमीद जैसे भुला दिए गए नायकों पर भी ऐसी ही प्रमाणिक फिल्में बननी चाहिए.
आमिर अली : एक कमज़ोर पड़ती ताकत और ‘हम भारत के लोग’
अगले पंद्रह दिनों से भी कम समय में भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाएगा. हर साल की तरह इस बार भी सरकारी समारोहों की चकाचौंध होगी, हथियारों और झांकियों का प्रदर्शन होगा. लेकिन अक्सर ये भारी-भरकम सरकारी तामझाम हमें इस दिन के असली ऐतिहासिक और राजनीतिक मतलब को देखने से रोक देता है.
इस दिन की बुनियाद में एक ही बात है—हमारी संप्रभुता का जश्न. वो पल जब ‘हम भारत के लोग’ यानी ‘We the People’ ने खुद को वो संविधान सौंपा जिससे हमारा देश चलता है. याद रखिये, यह जनता की ताकत थी जिसने राज्य (स्टेट) और उसकी संस्थाओं को बनाया, न कि राज्य ने जनता को.
1928 में लीगल थियरिस्ट (विधि सिद्धांंतकार) कार्ल श्मिट ने एक बहुत गहरी बात कही थी. उन्होंने कहा था कि जैसे ईश्वर अपनी इच्छा से प्राकृतिक दुनिया को बनाता है, वैसे ही जनता अपनी सामूहिक इच्छा से एक राजनीतिक व्यवस्था को जन्म देती है. और ईश्वर की तरह, जनता को इस निर्माण के बाद गायब नहीं हो जाना चाहिए, बल्कि उसे अपनी बनाई व्यवस्था के ऊपर और साथ में एक सक्रिय ताकत बनकर मौजूद रहना चाहिए. इसलिए, गणतंत्र दिवस का असली मक़सद यह है कि हम एक ‘पब्लिक’ यानी जनता के तौर पर इकट्ठा हों, अपनी रचना को देखें और इसे बचाने का संकल्प लें.
लेकिन आज हक़ीक़त क्या है?
आज गणतंत्र दिवस के कार्यक्रमों में आम नागरिक की भागीदारी ‘गणतंत्र के मालिक’ जैसी नहीं, बल्कि ‘आश्रित’ जैसी हो गई है. जनता, जो कभी ईश्वर सरीखी रचयिता थी, आज ‘डिस्ट्रैक्टेड बच्चों’ की भीड़ बनकर रह गई है. आज हमसे सिर्फ़ तीन भूमिकाओं की उम्मीद की जाती है:
दर्शक: जो फ़ोन की स्क्रीन पर मिलिट्री परेड और झांकियां देख रहे हैं.
प्रतियोगी: जो सरकार के आदेश पर “वंदे मातरम” गा रहे हैं या ‘आत्मनिर्भर भारत’ पर पेंटिंग बना रहे हैं.
उपभोक्ता: जो गणतंत्र दिवस की छुट्टियों में अमेज़न या फ्लिपकार्ट की ‘रिपब्लिक डे सेल’ में सस्ते टीवी और मोबाइल ख़रीदने के लिए स्क्रॉल कर रहे हैं.
इन सबमें हम एक संगठित ‘जनता’ की तरह नहीं, बल्कि बिखरी हुई भीड़ की तरह बर्ताव करते हैं. वहीं दूसरी तरफ़, राज्य की ताक़त जनता की ताक़त पर हावी हो गई है. सुरक्षा के नाम पर गणतंत्र दिवस के आसपास आम लोगों की जासूसी और पाबंदियां बढ़ा दी जाती हैं. मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चल रहे हैं और मोबाइल पर वीपीएन बैन कर दिया गया है—जो सीधे तौर पर नागरिक आज़ादी का हनन है.
सवाल यह है कि अपनी बात मनवाने वाली ‘जनता’ की यह ताकत आख़िर ख़त्म कैसे हो गई?
लेखक आसिम अली का मानना है कि हमारे गणतंत्र में जनता की ताकत खोखली हो गई है और इसके दो बड़े कारण हैं: पब्लिक स्फीयर (सार्वजनिक क्षेत्र) का ग़ैर-राजनीतिक होना और राजनीतिक पार्टियों का वैचारिक रूप से नपुंसक हो जाना.
पहले हमारी सार्वजनिक संस्थाओं को देखिए—स्कूल, अस्पताल, बसें. केरल और तमिलनाडु को छोड़ दें, तो भारत की सार्वजनिक सुविधाएं दुनिया में सबसे ख़राब मानी जाएंगी. इसका जिम्मेदार वो अफ़सरशाही सोच है जिसने इन मुद्दों को राजनीति से काट दिया. यह नेहरू के ज़माने से चला आ रहा है और बाद में बाज़ारवाद ने इसे और बढ़ा दिया. अब इन चीज़ों को या तो प्राइवेट कंपनियों को दे दिया गया है या एनजीओ को. जब सब कुछ सिर्फ़ ‘मुनाफ़े और क्षमता’ से तौला जाता है, तो ‘लोक-कल्याण’ की भावना ख़त्म हो जाती है. हमारा मीडिया भी सिर्फ़ कॉर्पोरेट और सरकार के हितों की रक्षा करता है और हर प्रगतिशील बदलाव को ग़लत बताता है.
दूसरा कारण है राजनीतिक पार्टियों का बदलना. 2000 के दशक की शुरुआत तक आते-आते ज़्यादातर पार्टियों की अपनी कोई विचारधारा नहीं बची. बाज़ारवाद और पैसे की आमद ने खेल के नियम बदल दिए. पार्टियों ने जनता को बड़े मुद्दों पर लामबंद करना छोड़ दिया. अब राजनीति सिर्फ़ ‘वोट बैंक’ का खेल बन गई है—जाति, भाषा या धर्म के आधार पर वोटों को जोड़ना और सरकार बनाना. गठबंधन की राजनीति और जोड़-तोड़ ने जनता की ‘सामूहिक इच्छा’ को और कमज़ोर कर दिया.
इसी सूखे और बंजर ज़मीन पर हिंदू राष्ट्रवाद को पनपने का मौका मिला. बीजेपी ने भी जनता के लिए स्कूल-अस्पताल जैसे मुद्दे नहीं उठाए, उन्होंने भी उसी अफ़सरशाही सोच को अपनाया जो कांग्रेस की थी. फ़र्क बस इतना है कि बीजेपी ने कुछ ‘दुश्मनों’ (ख़ासकर मुसलमानों) को चिन्हित कर दिया और उन्हें राजनीतिक बिरादरी से बाहर कर दिया. हिंदू पहचान की इस राजनीति ने उच्च मध्यम वर्ग को एक नया ‘मकसद’ दे दिया है. लेकिन नतीजा यह है कि हम कांग्रेस के ज़माने वाली उपभोक्तावादी (कन्ज़्यूमर) सोसायटी से बाहर नहीं निकले, बस अब उस सोसायटी में बहुसंख्यक हिंसा का तड़का लग गया है.
और इस बीच, ‘हम भारत के लोग’ संविधान की प्रस्तावना में किए गए न्याय, स्वतंत्रता और समानता के वादों को पूरा करने से आज भी उतना ही दूर हैं.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.







