17/02/2026: अडानी पर फिर धमाका | सनातनियों को नफरत के लिए सरकारी फंड | एआई समिट पहले दिन ही फ्लॉप, वैष्णव की माफ़ी | इमरान के लिए क्रिकेटर आगे आए | नोटबंदी के बाद से सरकारी धन में कमी | हरदीप पर हमले
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
अडानी का ‘सीक्रेट’: एफटी-ओसीसीआरपी रिपोर्ट का दावा, विनोद अडानी के जरिए आया 3 बिलियन डॉलर का गुप्त निवेश.
एआई समिट में ‘चोरी’: भारत मंडपम में अव्यवस्था, विदेशी मेहमानों के गैजेट्स चोरी, मंत्री ने मांगी माफी.
सरकारी फंडिंग पर सवाल: आरटीआई से पता चला, नफरती भाषण वाले ‘सनातन कार्यक्रम’ को सरकार ने दिए 63 लाख.
क्रिकेटर्स की अपील: गावस्कर और कपिल देव ने इमरान खान की रिहाई और इलाज के लिए पाक पीएम को लिखा खत.
अर्थव्यवस्था की चेतावनी: अर्थशास्त्री रथिन रॉय बोले- भारत ‘विकासात्मक’ नहीं, ‘भरपाई’ करने वाला राज्य बन रहा है.
मणिपुर का सच: सैटेलाइट डेटा ने खारिज किया सरकार का दावा, पोस्त खेती नहीं बल्कि लकड़ी माफिया है जंगल कटाई का जिम्मेदार.
बांग्लादेश यू-टर्न: बीएनपी के तारिक रहमान बने पीएम, भारत ने बदली अपनी कूटनीतिक चाल.
फाइनेंशियल टाइम्स और ओसीसीआरपी इन्वेस्टिगेशन
विनोद अडानी के कहने पर नासिर अली और चुंग लिंग ने गुपचुप लगाए थे 3 बिलियन डॉलर
अडानी समूह को लेकर चल रहे विवादों के बीच एक बेहद विस्फोटक और बड़ा ख़ुलासा सामने आया है. ओसीसीआरपी (ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट) और फाइनेंशियल टाइम्स (एफटी) द्वारा संयुक्त रूप से हासिल किए गए गोपनीय बैंकिंग दस्तावेज़ों ने उस सच पर मुहर लगा दी है, जिस पर सालों से बहस चल रही थी. इन दस्तावेज़ों से साफ़ हो गया है कि अडानी परिवार के बेहद क़रीबी सहयोगियों ने ग्रुप की कंपनियों में अरबों डॉलर का गुप्त निवेश कर रखा था और इसके पीछे गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद अडानी की मुख्य भूमिका थी.
क्या है ‘3 बिलियन डॉलर’ का सच?
रिपोर्टर रवि नायर (ओसीसीआरपी) की जांच और लीक हुए दस्तावेज़ बताते हैं कि जिनेवा स्थित स्विस बैंकिंग ग्रुप ‘रियल इंटेसा सैनपाओलो’ की दुबई स्थित सब्सिडियरी में दो अहम खाते थे. ये खाते नासिर अली शबान अहली (यूएई) और चांग चुंग-लिंग (ताइवान) के थे.
फरवरी 2023 में—ठीक उसी वक़्त जब हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी ग्रुप पर स्टॉक मैनिपुलेशन के आरोप लगाए थे—इन दोनों सहयोगियों ने अपने बैंकर्स के सामने क़बूल किया था कि उन्होंने अडानी स्टॉक्स में भारी निवेश कर रखा है. दस्तावेज़ों के मुताबिक़, अहली और चांग के पास उस समय संयुक्त रूप से लगभग $3 बिलियन (क़रीब 25,000 करोड़ रुपये) के अडानी शेयर्स थे.
यह आंकड़ा इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि अब तक माना जा रहा था कि इन सहयोगियों ने 2018 के बाद अपनी हिस्सेदारी कम कर दी थी, लेकिन बैंक के इंटरनल रिकॉर्ड्स बताते हैं कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने तक ये लोग ग्रुप में भारी-भरकम निवेश के साथ बने हुए थे.
विनोद अडानी थे ‘बिज़नेस इंट्रोड्यूसर’
फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा एक्सेस किए गए बैंक के इंटरनल मेमो में इस पूरे खेल के ‘मास्टरमाइंड’ की ओर इशारा किया गया है. बैंक के रिकॉर्ड्स में चांग और अहली के लिए “बिज़नेस इंट्रोड्यूसर” के तौर पर किसी और का नहीं, बल्कि गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद अडानी का नाम दर्ज था.
बैंक अधिकारियों के साथ हुई बैठक में अहली और चांग ने लिखित में स्वीकार किया कि अडानी परिवार के साथ उनके “निजी और व्यावसायिक रिश्तों” और गौतम अडानी की “बिज़नेस एक्यूमेन” (व्यापारिक समझ) पर भरोसे के चलते उन्होंने यह पैसा लगाया था. हालांकि, उन्होंने हिंडनबर्ग के आरोपों को ख़ारिज किया था.
स्विस जांच और ‘फ्रंट मैन’ का आरोप
मामला सिर्फ़ निवेश तक सीमित नहीं है. स्विस अथॉरिटीज (स्विस प्राधिकरण) चांग पर “मनी लॉन्ड्रिंग” और दस्तावेज़ों में हेर-फेर के आरोपों में आपराधिक जांच कर रही हैं. स्विस कोर्ट को संदेह है कि चांग दरअसल अडानी ग्रुप के लिए एक “फ्रंट मैन” (मुखौटा) के तौर पर काम कर रहे थे. इस जांच के चलते उनके 310 मिलियन डॉलर से ज़्यादा के एसेट्स फ्रीज़ किए जा चुके हैं. इसके अलावा, नवंबर 2024 में अमेरिकी प्रॉसीक्यूटर्स (अभियोजकों) ने भी गौतम अडानी और उनके भतीजे पर भारतीय अधिकारियों को रिश्वत देने का वादा करने के आरोपों में इंडिक्टमेंट (अभियोग) चलाया था.
अडानी ग्रुप और सेबी का पक्ष
भारत में मार्केट रेगुलेटर सेबी ने सितंबर 2025 में कुछ मामलों में अडानी ग्रुप को क्लीन चिट दी थी, लेकिन यह भी स्वीकार किया था कि वे विदेशी फंड्स के “अल्टीमेट ओनर्स” (असली मालिकों) तक पहुँचने में नाकाम रहे हैं.
वहीं, अडानी ग्रुप के प्रवक्ता ने इन नए ख़ुलासों पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि उनके सभी “पब्लिक शेयरहोल्डर्स” क़ानून के दायरे में हैं. प्रवक्ता ने कहा, “एक लिस्टेड कंपनी होने के नाते, क़ानूनन हमारी यह ज़िम्मेदारी नहीं है कि हम पब्लिक शेयरहोल्डर्स के ‘सोर्स ऑफ फंड्स’ (फंड्स के स्रोत) की जांच करें.” उन्होंने इन आरोपों को “निराधार” बताते हुए क़ानूनी प्रक्रिया पर भरोसा जताया है.
यह रिपोर्ट न केवल हिंडनबर्ग के दावों को नई हवा देती है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या इन गुप्त निवशकों के ज़रिए कंपनी के शेयरों की क़ीमतों को कृत्रिम रूप से नियंत्रित किया जा रहा था?
मोदी के एआई कार्यक्रम में बदइंतजामी, चोरी का बजा दुनिया में डंका, वैष्णव ने माफ़ी मांगी
नई दिल्ली में 16 फरवरी से शुरू हुए बहुप्रचारित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ का पहला दिन आयोजन स्थल पर भारी साजो-सामान संबंधी समस्याओं की भेंट चढ़ गया, जिसके चलते केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव को माफी मांगनी पड़ी.
प्रतिभागियों के अनुसार, शिखर सम्मेलन में आने वाले आगंतुकों को प्रवेश द्वार पर विभिन्न सुरक्षा चौकियों और अन्य बाधाओं को पार करने के लिए संघर्ष करना पड़ा, जबकि ‘वीआईपी’ लंबी कतारों के बगल से तेजी से निकल गए. 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों वाले इस बड़े स्तर के आयोजन के लिए कई अन्य लोगों ने संगठनात्मक कमियों और योजना के अभाव की शिकायत की. इस शिखर सम्मेलन को ‘ग्लोबल साउथ’ में आयोजित होने वाला पहला एआई सम्मेलन होने के कारण अद्वितीय माना जा रहा है. इससे पहले के दो एआई शिखर सम्मेलन ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया में आयोजित किए गए थे.
खराब भीड़ प्रबंधन से नाराज प्रतिभागियों के सोशल मीडिया पोस्ट के अनुसार, कई प्रदर्शकों और स्टार्टअप संस्थापकों को आयोजन स्थल के बाहर ही फंसे रहना पड़ा, क्योंकि प्रधानमंत्री के आगमन से पहले सुरक्षा जांच के लिए मुख्य हॉल को बंद कर दिया गया था.
‘द वायर’ के अनुसार, एआई वॉयस स्टार्टअप ‘बोलना’ के सह-संस्थापक मैत्रेय वाघ ने ‘एक्स’ पर लिखा, “गेट बंद हैं इसलिए एआई समिट में मैं अपने ही बूथ तक नहीं पहुँच सका. यदि आप भी बाहर फंसे हुए हैं और ‘बोलना’ टीम से मिलना चाहते हैं, तो मुझे डीएम करें.”
दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ (के पहले दिन मची अफ़रातफ़री और कुप्रबंधन के बाद, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने माफ़ी मांगी है. ‘द टेलीग्राफ’ और ‘बीबीसी’ की रिपोर्ट्स के अनुसार, जिसे “दुनिया का सबसे बड़ा एआई शिखर सम्मेलन” बताया जा रहा था, उसके पहले दिन प्रतिभागियों को भारी भीड़, लंबी कतारों और ख़राब इंटरनेट कनेक्टिविटी का सामना करना पड़ा.
मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अश्विनी वैष्णव ने कहा, “यह पूरी दुनिया का सबसे बड़ा एआई समिट है. रिस्पॉन्स बहुत ज़बरदस्त है. अगर कल किसी को कोई परेशानी हुई, तो हम उसके लिए माफ़ी मांगते हैं.” उन्होंने बताया कि अब समस्याओं को सुलझाने के लिए एक ‘वॉर रूम’ बनाया गया है और 70,000 से ज़्यादा लोग इस इवेंट में शामिल हुए हैं.
हालाँकि, ‘बीबीसी’ और ‘द टेलीग्राफ’ की रिपोर्ट्स ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही बयां करती हैं. स्टार्टअप संस्थापकों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की. नियो-सेपियन के सीईओ धनंजय यादव ने आरोप लगाया कि सुरक्षा जांच के दौरान उनके स्टॉल से ‘वियरेबल डिवाइसेस’ चोरी हो गए. उन्होंने लिखा, “हमने उड़ान, रहने और बूथ के लिए भुगतान किया, लेकिन हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में हमारा सामान ग़ायब हो गया.”
खाने के लिए डिजिटल पेमेंट नहीं चला
पुनीत जैन, जो ‘रीस्किल’ के संस्थापक हैं, ने बताया कि सुबह 7 बजे से कतारें लगी थीं और बाद में पीएम मोदी के आगमन से पहले “पूरा खाली” कर दिया गया, जिससे एग्जिबिटर्स अपने ही स्टॉल पर नहीं जा सके. कई लोगों ने यह भी शिकायत की कि आयोजन स्थल पर खाने के स्टॉल पर डिजिटल पेमेंट काम नहीं कर रहा था और सिर्फ़ नक़द लिया जा रहा था, जिससे विदेशी मेहमानों को ख़ासी दिक़्क़त हुई.
उद्यमी प्रियांशु रत्नाकर ने कहा कि समिट में “एक्जीक्यूशन से ज़्यादा दिखावे “ पर ज़ोर था. मंत्री वैष्णव ने आश्वासन दिया है कि आने वाले दिनों में अनुभव को बेहतर बनाने के लिए उनकी पूरी टीम दिन-रात काम कर रही है.
बुनियादी सुविधाओं का अभाव और अव्यवस्था
‘एक्स’ पर एक अन्य उपयोगकर्ता ने आयोजन स्थल पर प्रतिबंधित वस्तुओं की सूची साझा करते हुए सवाल किया कि बैग, कार की चाबियाँ और पानी जैसी बुनियादी चीजों के बिना कोई सम्मेलन में कैसे शामिल हो सकता है. कार्यक्रम में देखी गई अन्य समस्याओं में बैठने की अपर्याप्त व्यवस्था, वाई-फाई की अनुपस्थिति और इसके परिणामस्वरूप डिजिटल भुगतान की अनुपलब्धता शामिल थी. केवल नकद स्वीकार करने वाले बूथों के कारण कई लोग भोजन और पानी तक नहीं पहुँच सके.
‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, आयोजकों के अस्पष्ट निर्देशों के कारण कई प्रतिनिधि अपने उपकरण और अन्य सामान वापस नहीं ले पाए. रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटल क्यूआर कोड और फिजिकल पास को लेकर भ्रम की स्थिति के कारण सम्मेलन को कवर करने वाले कई पत्रकार दिन के बड़े हिस्से में प्रवेश प्रक्रियाओं के बारे में ही पूछताछ करते रहे. कई लोगों ने आयोजन के दौरान पंजीकरण सिस्टम के कई बार क्रैश होने की भी शिकायत की.
चोरी के आरोप से किरकिरी
इस कार्यक्रम में चोरी के आरोपों ने और किरकिरी कर दी. एआई स्टार्ट-अप ‘नियोसैपियंस’ के संस्थापक धनंजय यादव ने आरोप लगाया कि जब प्रधानमंत्री के आगमन के लिए मुख्य हॉल को खाली कराया गया था, तब आयोजन स्थल से उनकी कंपनी के ‘वियरेबल एआई’ (पहने जाने वाले एआई उपकरण) चोरी हो गए.
यादव ने ‘एक्स’ पर एक विस्तृत पोस्ट में आरोप लगाया, “दोपहर 12 बजे, दोपहर 2 बजे पीएम मोदी की यात्रा से पहले सुरक्षाकर्मी इलाके को सैनिटाइज करने और घेराबंदी करने पहुंचे. मैंने समझाया कि हम नियोसैपियन में भारत का पहला पेटेंटेड एआई वियरेबल बना रहे हैं और इसे प्रदर्शित करने का मौका मांगा.”
उन्होंने आगे कहा, “एक अधिकारी ने दूसरों से मुझे रुकने देने को कहा और वे चले गए. फिर एक दूसरा समूह आया और हमें तुरंत जाने का आदेश दिया. ऐसा लगा कि सुरक्षाकर्मियों के बीच ही समन्वय की कमी थी. मैंने पूछा: ‘क्या हमें अपने वियरेबल साथ ले जाने चाहिए?’ उन्होंने कहा, ‘दूसरे लोग अपने लैपटॉप तक पीछे छोड़ रहे हैं, सुरक्षा इसका ख्याल रखेगी.’ उन पर भरोसा करके मैं चला गया. गेट दोपहर 12 से शाम 6 बजे तक बंद रहे—उम्मीद से कहीं ज्यादा समय तक. बाद में हमें पता चला कि हमारे वियरेबल चोरी हो गए हैं.”
मोदी सरकार के पैसों से चल रहा है सनातनियों का मुस्लिम हटाओ हेट कैम्पेन?
एक आरटीआई से चौंकाने वाला ख़ुलासा हुआ है कि जिस कार्यक्रम में “मुसलमानों के नरसंहार” और “हिंदू राष्ट्र” की मांग की गई थी, उसे केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने फंड किया था. ‘द क्विंट’ की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में, रिपोर्टर आदित्य मेनन ने बताया है कि सूचना का अधिकार के तहत दायर एक अर्ज़ी के जवाब में यह पुष्टि हुई है कि संस्कृति मंत्रालय ने ‘सनातन संस्था’ को 63 लाख रुपये दिए थे.
यह कार्यक्रम, ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’, 13-14 दिसंबर को दिल्ली के प्रतिष्ठित भारत मंडपम में आयोजित किया गया था. ‘द क्विंट’ ने पहले ही इस कार्यक्रम में दिए गए हेट स्पीच (नफ़रती भाषणों) की ख़बर को ब्रेक किया था और बताया था कि इसे केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और दिल्ली के पर्यटन मंत्रालय का समर्थन प्राप्त था. इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, श्रीपद नाइक, संजय सेठ और दिल्ली के पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने भी शिरकत की थी और अपनी बात रखी थी.
रिपोर्ट के मुताबिक़, मंत्रालय के जवाब में साफ़ तौर पर 63 लाख रुपये की फंडिंग की बात कही गई है. दिल्ली पर्यटन मंत्रालय से जवाब आना अभी बाक़ी है. इस कार्यक्रम में की गई कुछ बेहद आपत्तिजनक और नफ़रती टिप्पणियाँ इस प्रकार थीं:
सुदर्शन टीवी के प्रमुख सुरेश चह्वाणके: “भारत में मौजूदा 25% मुसलमान घुसपैठिए हैं. वे बांग्लादेशी, पाकिस्तानी और अफ़ग़ानी हैं. एनआरसी लाओ और उन्हें भारत से बाहर निकालो.” उन्होंने मुस्लिम आबादी पर रोक लगाने की भी मांग की.
बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय: “क्या सरकार के डर से मुसलमानों को हिंदू धर्म में परिवर्तित नहीं किया जा सकता?” उन्होंने यह भी कहा कि अगर हर हिंदू एक व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करा दे, तो लक्ष्य हासिल हो जाएगा.
हिंदू फंड के राहुल दीवान: “हमें एक आक्रामक रणनीति की ज़रूरत है... हमें एक संवैधानिक हिंदू राष्ट्र चाहिए.” उन्होंने यह भी कहा कि अगर वे लड्डुओं में अमोनियम नाइट्रेट मिला दें, तो लाखों हिंदू मारे जाएंगे.
रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि मुद्दा यह नहीं है कि 63 लाख रुपये बड़ी रक़म है या छोटी, बल्कि सवाल यह है कि करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल ऐसे कार्यक्रम के लिए क्यों किया जा रहा है जो एक समुदाय के सफ़ाए की बात करता है और संविधान के ख़िलाफ़ जाकर हिंदू राष्ट्र की मांग करता है?
इमरान ख़ान के समर्थन में उतरे गावस्कर, कपिल; पाक सरकार से कहा- ‘सम्मान के साथ पेश आएं’
क्रिकेट की दुनिया के सबसे दिग्गज खिलाड़ी, जिनमें भारत के सुनील गावस्कर और कपिल देव से लेकर ऑस्ट्रेलिया के ग्रेग चैपल शामिल हैं, ने पुरानी प्रतिद्वंद्विता को दरकिनार करते हुए पाकिस्तान सरकार से एक साझा अपील की है. इन दिग्गजों ने मांग की है कि जेल में बंद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और विश्व कप विजेता कप्तान इमरान ख़ान के साथ बुनियादी मानवीय गरिमा के साथ व्यवहार किया जाए और उन्हें तत्काल चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जाए.
द इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़, लंदन के ‘द टाइम्स’ में लिखते हुए इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल एथर्टन ने बताया कि इस मुहिम की शुरुआत ग्रेग चैपल ने की थी. 17 फ़रवरी को लिखे गए इस खुले पत्र में कहा गया है, “साथी क्रिकेटर्स के तौर पर, जो खेल भावना, सम्मान और निष्पक्षता के मूल्यों को समझते हैं, हमारा मानना है कि इमरान ख़ान जैसे क़द के व्यक्ति के साथ वह गरिमापूर्ण व्यवहार होना चाहिए जो एक पूर्व राष्ट्रीय नेता और वैश्विक खेल आइकॉन को शोभा देता है.”
73 वर्षीय इमरान ख़ान, जिन्होंने 1992 में पाकिस्तान को उसका इकलौता वनडे विश्व कप जिताया था, अगस्त 2023 से जेल में बंद हैं. उन पर कई आरोप हैं जिन्हें उनके समर्थक राजनीति से प्रेरित बताते हैं. हाल के हफ़्तों में उनकी सेहत को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. एथर्टन ने रिपोर्ट किया है कि इमरान ख़ान अपनी दाहिनी आँख की रौशनी खोने की कगार पर हैं.
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में माइकल ब्रियरली, डेविड गॉवर, नासिर हुसैन (इंग्लैंड), किम ह्यूजेस, स्टीव वॉ, बेलिंडा क्लार्क (ऑस्ट्रेलिया) जैसे नाम शामिल हैं. पत्र में तीन मुख्य मांगे रखी गई हैं: इमरान ख़ान को उनकी पसंद के डॉक्टरों से इलाज की इज़ाज़त, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हिरासत की मानवीय स्थितियां, और क़ानूनी प्रक्रियाओं तक निष्पक्ष पहुँच.
पत्र में क्रिकेट के इतिहास का हवाला देते हुए लिखा गया है, “मैदान पर हमारा साझा इतिहास हमें याद दिलाता है कि स्टंप्स उखाड़े जाने के बाद प्रतिद्वंद्विता ख़त्म हो जाती है — और सम्मान क़ायम रहता है.” यह पत्र मंगलवार दोपहर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ को सौंपा गया. पाकिस्तान के भीतर भी वसीम अकरम और वक़ार यूनिस जैसे दिग्गजों ने इमरान के स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई है.
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर साधा निशाना, कहा- ‘बीजेपी के लिए काम कर रहा है आयोग’
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि आयोग मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर भेदभावपूर्ण रवैया अपना रहा है. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, रिपोर्टर शुभेंदु माइती बताते हैं कि सीएम ने नबन्ना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि जो दस्तावेज़ बीजेपी शासित बिहार में मान्य हैं, वे बंगाल में अमान्य माने जा रहे हैं.
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को “कैप्चर कमीशन” और “तुग़लकी स्टाइल में चलने वाला कमीशन” क़रार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं कर रहा है, जहाँ उन्होंने बंगाल में एसआईआर अभियान के ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी. सीएम ने कहा, “एक बीजेपी महिला ने एआई का इस्तेमाल करके 58 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट रोल से हटा दिए हैं, जिनमें कई वैध मतदाता शामिल हैं.”
विवाद तब और गहरा गया जब चुनाव आयोग ने रविवार रात बंगाल के सात सहायक निर्वाचक पंजीयन अधिकारियों को निलंबित कर दिया. आयोग ने इन अधिकारियों को अपात्र लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल करने का दोषी पाया था. ममता बनर्जी ने इस कार्रवाई पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हम उन्हें प्रमोट करेंगे. उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना ही निलंबित कर दिया गया.”
सूत्रों के मुताबिक़, यह पहली बार है जब चुनाव आयोग ने राज्य सरकार से सिफ़ारिश करने के बजाय सीधे बंगाल में चुनावी ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों को निलंबित किया है. आयोग ने मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती को चार अधिकारियों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश भी दिया था. ममता बनर्जी का आरोप है कि पूरे लोकतांत्रिक सिस्टम को “सिर्फ़ एक पार्टी (बीजेपी) के हितों की रक्षा के लिए बुलडोज़ किया जा रहा है.”
तारिक़ रहमान बने बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री, भारत के लिए यह कितना बड़ा बदलाव?
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के अध्यक्ष तारिक़ रहमान ने आज मंगलवार को देश के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. द डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक़, राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने जातीय संसद भवन में उन्हें और उनके मंत्रिमंडल के 25 मंत्रियों व 24 राज्य मंत्रियों को शपथ दिलाई. यह शपथ ग्रहण समारोह एक ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है, क्योंकि बीएनपी गठबंधन ने शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद हुए चुनावों में सत्ता हासिल की है.
इस राजनीतिक बदलाव का भारत के लिए क्या मतलब है, इस पर स्क्रोल के लिए शोएब दानियाल का विश्लेषण बेहद अहम है. 2024 में शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद से दिल्ली और ढाका के रिश्ते अब तक के सबसे निचले स्तर पर थे. जब शेख हसीना ने इन चुनावों को “फर्जी” और “दिखावा” बताया, तो इसके विपरीत भारत सरकार ने चुनाव परिणामों का गर्मजोशी से स्वागत किया.
स्क्रॉल की रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारीक़ रहमान को सबसे पहले बधाई दी और शपथ ग्रहण में लोकसभा अध्यक्ष को भेजा. यह भारत की विदेश नीति में एक बहुत बड़ा “यू-टर्न” है. कुछ साल पहले तक, बीएनपी का सत्ता में आना दिल्ली के लिए “सबसे बुरा सपना” माना जाता था. 2001-2006 के अपने पिछले कार्यकाल में बीएनपी को भारत विरोधी माना जाता था.
लेकिन, शेख हसीना के 16 साल के शासन के बाद, जिस तरह से एक छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह ने उन्हें सत्ता से बेदख़ल किया, उसने भारत की कूटनीतिक विफलता को उजागर किया. भारत ने अपने सारे दांव हसीना पर लगा रखे थे, जिससे बांग्लादेश की जनता में भारत के प्रति ग़ुस्सा पनपा. अब, जब भारत ने अपना प्रभाव काफ़ी हद तक खो दिया है, दिल्ली बीएनपी के साथ संबंधों को सुधारने के लिए मजबूर है, भले ही इसके लिए उसे अपनी पुरानी सहयोगी शेख हसीना के बयानों को नज़रअंदाज़ करना पड़े.
द डेली स्टार का विश्लेषण (मोहिउद्दीन आलमगीर द्वारा) याद दिलाता है कि बांग्लादेश का लोकतंत्र हमेशा से पथरीला रहा है. 1971 की आज़ादी, 1975 की हत्याएं, 1990 का जन-विद्रोह और 2024 की क्रांति—हर बार लोकतंत्र की बहाली की उम्मीद जागी, लेकिन संस्थाएं कमज़ोर होती गईं. अब देखना यह है कि नई सरकार संसद और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को कितना मज़बूत कर पाती है.
मणिपुर: हिंसा प्रभावित उख्रुल में फंसे 51 कुकी छात्रों को नवोदय स्कूल से निकालना पड़ा
नगा-बहुल उख्रुल जिले के लिटन क्षेत्रों में हाल ही में हुई मारपीट की घटना के बाद जारी तनाव के बीच, मणिपुर पुलिस ने एक स्कूल से 51 कुकी छात्रों को सुरक्षित बाहर निकाला है.
प्रशांत मजूमदार की खबर के अनुसार, ये सभी उख्रुल के रामवा स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय (जेएनवी) के छात्र हैं. रेस्क्यू के बाद पुलिस ने उन्हें सैकुल पुलिस स्टेशन की टीम को सौंप दिया, ताकि उन्हें कुकी-बहुल जिले कांगपोकपी के जेएनवीभेजा जा सके.
उख्रुल जिले में मौजूदा कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए 18 छात्रों के कक्षा 10वीं और 12वीं के परीक्षा केंद्रों को भी जेएनवी कांगपोकपी में स्थानांतरित कर दिया गया है.
पुलिस ने बताया कि जेएनवी रामवा के कुकी समुदाय के छात्रों को एहतियात के तौर पर वहां से निकाला गया. बयान में कहा गया, “निकासी प्रक्रिया के दौरान, जनता के कुछ लोगों ने उन्हें गलती से उपद्रवी समझ लिया था. बयान में आगे कहा गया कि शांगशाक, रामवा, शोकवाओ, टीएम कासोम और एस लाहो क्षेत्रों के ग्रामीणों को समझाने के उनके प्रयासों ने क्षेत्र में भारी तनाव के बावजूद छात्रों को लिटन पुलिस स्टेशन तक सुरक्षित पहुँचाना सुनिश्चित किया.
मणिपुर पुलिस ने सभी समुदायों से संयम बरतने और अफवाहें न फैलाने की अपील की है. लिटन क्षेत्रों में हिंसा तब भड़की जब कथित तौर पर कुकी-ज़ो व्यक्तियों के एक समूह द्वारा एक तांगखुल (जनजाति) ग्रामीण के साथ मारपीट की गई. इस हिंसा के दौरान दोनों समुदायों के लगभग 30 घरों को आग लगा दी गई थी.
अमेरिका की बढ़ती सैन्य उपस्थिति के बीच रूस-चीन-ईरान जलडमरूमध्य के पास संयुक्त युद्धाभ्यास के लिए तैयार
संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच, ईरान, रूस और चीन की नौसेनाएं होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास के जलक्षेत्र में एक संयुक्त सैन्य अभ्यास करने के लिए तैयार हैं. यह अभ्यास खाड़ी में विस्तारित अमेरिकी सैन्य तैनाती और तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर चल रही अप्रत्यक्ष बातचीत के बीच हो रहा है.
जवारिया राणा की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन और रूस ने इस अभ्यास के लिए अपने जहाज तैनात किए हैं. रूसी राष्ट्रपति के सहयोगी निकोलाई पात्रुशेव ने मंगलवार को पुष्टि की कि ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी बेल्ट 2026’ अभ्यास की मेजबानी ईरान करेगा. एक रूसी दैनिक को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि प्रतिभागी नौसेनाएं समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित करने के प्रयासों के समन्वय पर ध्यान केंद्रित करेंगी.
इस अभ्यास में सतही लड़ाकू जहाजों, रसद जहाजों और नौसैनिक विमानन तत्वों से जुड़े समन्वित युद्धाभ्यास शामिल होंगे. इसके साथ ही पिछले संस्करणों की तरह समुद्री डकैती विरोधी और खोज-एवं-बचाव अभियान, संचार अभ्यास और वाणिज्यिक शिपिंग के लिए सिम्युलेटेड एस्कॉर्ट ऑपरेशन (सुरक्षा घेरा) भी आयोजित किए जाएंगे.
इस अभ्यास के समानांतर, संयुक्त राज्य अमेरिका ने खाड़ी में अपनी सैन्य स्थिति को और मजबूत किया है. अमेरिका ने यूएसएस अब्राहम लिंकन और यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड को तैनात किया है, जिससे अमेरिकी सेंट्रल कमांड के जिम्मेदारी वाले क्षेत्र में दो ‘कैरियर स्ट्राइक ग्रुप’ मौजूद हैं. इनके अलावा, आर्ले बर्क-क्लास डिस्ट्रॉयर और लिटोरल कॉम्बैट जहाज फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास सक्रिय हैं, जबकि अमेरिकी हवाई बेड़े कतर, जॉर्डन और अन्य खाड़ी भागीदार देशों के क्षेत्रीय ठिकानों पर तैनात हैं.
यह युद्धाभ्यास ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर वाशिंगटन और तेहरान के बीच जारी तनाव के बीच हो रहा है. अमेरिका ने बार-बार ईरान की यूरेनियम संवर्धन गतिविधियों और मिसाइल विकास को रोकने की कोशिश की है, जबकि ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम नागरिक उद्देश्यों के लिए है और उसने किसी भी भविष्य के समझौते के तहत प्रतिबंधों से राहत की मांग की है.
भारत ने ईरान से जुड़े और अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित तीन तेल टैंकरों को जब्त किया
‘रॉयटर्स’ की खबर है कि भारत ने इस महीने ईरान से जुड़े और अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित तीन तेल टैंकरों को जब्त किया है और अवैध व्यापार पर अंकुश लगाने के लिए अपने समुद्री क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी है. इस जानकारी ने फरवरी की शुरुआत में भारतीय अधिकारियों द्वारा ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर किए गए एक पोस्ट की पुष्टि की है, जिसे बाद में हटा दिया गया था.
जानकारी के अनुसार, जब्ती की ये कार्रवाई और बढ़ी हुई निगरानी भारत-अमेरिका संबंधों में सुधार के बाद देखी गई है. इस महीने की शुरुआत में वाशिंगटन ने घोषणा की थी कि नई दिल्ली द्वारा रूसी तेल आयात को रोकने की सहमति के बाद, वह भारतीय सामानों पर आयात शुल्क को 50% से घटाकर 18% कर देगा. एक सूत्र ने बताया कि तीन प्रतिबंधित जहाजों — स्टेलर रूबी, एस्फाल्ट स्टार और अल जाफ़्ज़िया— ने तटीय राज्यों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों से बचने के लिए बार-बार अपनी पहचान बदली थी.
हालांकि, ईरानी सरकारी मीडिया ने ‘नेशनल ईरानी ऑयल कंपनी’ के हवाले से कहा कि भारत द्वारा जब्त किए गए तीनों टैंकरों का कंपनी से कोई संबंध नहीं है. भारतीय अधिकारियों ने 6 फरवरी को ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा था कि उन्होंने भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र में एक टैंकर की संदिग्ध गतिविधि का पता चलने के बाद मुंबई से लगभग 100 समुद्री मील पश्चिम में तीन जहाजों को रोका है. हालांकि बाद में यह पोस्ट हटा दी गई थी, लेकिन सूत्र ने पुष्टि की कि जहाजों को आगे की जांच के लिए मुंबई ले जाया गया था. सूत्र के अनुसार, भारतीय तटरक्षक बल ने तब से अपने समुद्री क्षेत्रों में चौबीसों घंटे निगरानी के लिए लगभग 55 जहाज और 10 से 12 विमान तैनात किए हैं.
किसको बचा रहे पुरी; मोदी के पीएम बनने के बाद एपस्टीन से वे 14 बार मिले, 62 ईमेल संवाद भी
मंगलवार को कांग्रेस ने केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी पर ‘एपस्टीन फाइल्स’ के मुद्दे पर “झूठ बोलने” का आरोप लगाया और भाजपा नेता से दोषी अमेरिकी यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन के साथ 2014 से 2017 के बीच हुए “62 ईमेल संवादों” और “14 मुलाकातों” पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा. विपक्षी दल ने अपनी उस मांग को भी दोहराया कि पुरी को तत्काल इस्तीफा देना चाहिए. हालांकि, पुरी ने विपक्षी दल द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर दिया है.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस के मीडिया और प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने पूछा, “2014 और 2017 के बीच हरदीप पुरी और एपस्टीन के बीच 62 ईमेल का आदान-प्रदान हुआ था. इसके अलावा, 2014 में 5, 6, 8 और 9 जून; 19, 23 और 24 सितंबर; और 9 और 10 अक्टूबर को हुई मुलाकातों में क्या चर्चा हुई थी?”
खेड़ा ने सवाल किया, “पुरी ने 32 ईमेल लिखे जबकि एपस्टीन ने उन्हें 30 ईमेल भेजे. कुल 14 मुलाकातें हुईं, जो 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पद संभालने के तुरंत बाद शुरू हुईं और 2017 तक चलीं. सवाल यह है कि जून 2014 में हरदीप पुरी किस पद पर थे और उन्होंने किस हैसियत से एपस्टीन से मुलाकात की थी?”
एपस्टीन फाइल्स फाइनेंसर जेफरी एपस्टीन और उसकी सहयोगी घिसलेन मैक्सवेल द्वारा किए गए सेक्स ट्रैफिकिंग की दो आपराधिक जांचों से संबंधित हजारों पन्नों के दस्तावेज हैं. इनमें ट्रैवल लॉग, रिकॉर्डिंग और ईमेल शामिल हैं, जो 2019 में हिरासत के दौरान एपस्टीन की मृत्यु के बाद से ही चर्चा का विषय बने हुए हैं.
पुरी के एक हालिया साक्षात्कार का हवाला देते हुए, खेड़ा ने कहा कि भाजपा नेता ने कई “झूठ” बोले हैं. खेड़ा ने कहा, “हरदीप पुरी एक साधारण नागरिक की हैसियत से एपस्टीन के साथ सरकारी नीतियों को क्यों साझा कर रहे थे? उन्हें पहले इस्तीफा देना चाहिए और फिर इस मामले पर स्पष्टीकरण देना चाहिए.”
उन्होंने आगे जोड़ा, “हरदीप पुरी ने अपने साक्षात्कार में एक के बाद एक झूठ बोलकर खुद को गलत साबित कर दिया है. अब सवाल यह है कि हरदीप पुरी इतने झूठ बोलकर किसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं?”
खेड़ा ने दिल्ली में चल रहे हाई-प्रोफाइल ‘एआई इम्पैक्ट समिट’ में माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स की प्रस्तावित भागीदारी को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा. खेड़ा ने कहा, “सरकारी सूत्र कह रहे हैं कि बिल गेट्स एआई समिट में नहीं आएंगे, जबकि बिल गेट्स खुद कह रहे हैं कि मैं समिट में आऊंगा और भाषण दूंगा.”
हालांकि एपस्टीन के किसी भी पीड़ित ने गेट्स पर किसी गलत काम का आरोप नहीं लगाया है, लेकिन अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी रिकॉर्ड में एपस्टीन द्वारा लगाया गया एक आरोप शामिल है कि गेट्स को एक यौन संचारित रोग (एसटीडी) हुआ था. गेट्स के प्रवक्ता ने इस दावे को “पूरी तरह से बेतुका” बताया था.
कांग्रेस विधायक आतिफ अकील ने गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ का दर्जा देने की मांग की, विधानसभा में संकल्प पेश
कांग्रेस विधायक आतिफ अकील ने गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने की मांग करते हुए मध्यप्रदेश विधानसभा में एक निजी संकल्प पेश किया है.
मंगलवार को यहां पत्रकारों से बात करते हुए अकील ने कहा कि उन्होंने देश में पवित्र मानी जाने वाली गाय को भारत का राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने के लिए यह निजी संकल्प पेश किया है. उन्होंने आगे कहा कि यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि मृत गाय का अंतिम संस्कार उचित और गरिमापूर्ण तरीके से किया जाए.
रबींद्रनाथ चौधरी के अनुसार, अकील ने बताया कि उनके दिवंगत पिता आरिफ अकील, जो 2023 के चुनावों में अपने बेटे के लिए सीट छोड़ने तक भोपाल उत्तर विधानसभा क्षेत्र से लगातार छह बार निर्वाचित हुए थे, उन्होंने भी पहले सदन में इसी तरह का निजी संकल्प पेश किया था. उन्होंने कहा कि उस समय राज्य में भाजपा का शासन होने के बावजूद यह संकल्प विधानसभा से पारित होने में विफल रहा था.
बाद में सत्ताधारी भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने पत्रकारों से कहा कि वह इस कदम का स्वागत करते हैं. हालांकि, उन्होंने अकील को चुनौती दी कि वे इस संकल्प को अपने (मुस्लिम) समुदाय के धर्मगुरुओं से अनुमोदित कराकर दिखाएं.
विश्लेषण
रथिन रॉय : नोटबंदी के बाद से भारत सरकार का आकार लगातार सिकुड़ रहा है
भारत के प्रमुख अर्थशास्त्री और एनआईपीएफपी के पूर्व निदेशक, रथिन रॉय ने भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान दिशा पर तीखा हमला बोला है. हैदराबाद में ‘मंथन’ के मंच पर “वित्तीय स्थिति: भारत की चुनौती, प्रायद्वीप की दुविधा” विषय पर बोलते हुए, रॉय ने कहा कि भारतीय राज्य (सरकार)अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि मजबूरी में ‘सिकुड़’ रहा है.
उन्होंने चेतावनी दी कि भारत एक “विकासात्मक राज्य” से बदलकर अब एक “क्षतिपूर्ति राज्य” (कम्पेन्सेटरी स्टेट) बनता जा रहा है, जहाँ सरकार विकास के बजाय अपनी विफलताओं की भरपाई के लिए पैसा खर्च कर रही है.
सिकुड़ती सरकार और राजस्व का संकट
बजट और राजकोषीय विवेक के सरकारी दावों की धज्जियां उड़ाते हुए, रथिन रॉय ने तर्क दिया कि सरकार का खर्च कम करना कोई रणनीति नहीं, बल्कि उसकी विवशता है.
रॉय ने कहा, “नोटबंदी के बाद से भारत सरकार का आकार लगातार सिकुड़ रहा है.” उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि जीडीपी के हिस्से के रूप में कुल सरकारी खर्च लगभग 17% से गिरकर 13.6% पर आ गया है. यह गिरावट इतनी बड़ी है कि यह देश के पूरे स्वास्थ्य बजट को खत्म करने के बराबर है.
इसका मुख्य कारण राजस्व जुटाने में सरकार की विफलता है. विनिवेश कार्यक्रम पूरी तरह से विफल हो गया है (जो वित्त वर्ष 2018 में जीडीपी का 6% था, अब 2027 में केवल 2% रह गया है) और कर संग्रह स्थिर है.
आरबीआई पर खतरनाक निर्भरता
रॉय ने इस बात पर चिंता जताई कि सरकार अब अपनी कमाई के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के लाभांश पर खतरनाक रूप से निर्भर हो गई है.
उन्होंने कहा, “आरबीआई अब सरकार को इंडियन ऑयल, एचपीसीएल, ओएनजीसी और एसबीआई की कुल कमाई से भी ज्यादा पैसा दे रहा है.” रॉय ने इसे “लेखांकन की बाजीगरी” करार दिया और कहा कि एक G20 देश के लिए यह शर्मनाक स्थिति है कि उसकी गैर-कर आय का 50% से अधिक हिस्सा केंद्रीय बैंक के लाभांश से आ रहा है.
‘विकास’ नहीं, ‘मुआवजा’ बांट रही सरकार
रथिन रॉय ने “कम्पेन्सेटरी स्टेट” की अवधारणा को समझाते हुए कहा कि लगभग 2005-06 के बाद से भारत ने एक विकासशील राज्य की तरह व्यवहार करना बंद कर दिया है. शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी “मेरिट गुड्स” पर होने वाला खर्च अब मुआवजे पर होने वाले खर्च का सिर्फ पांचवां हिस्सा रह गया है.
उन्होंने स्पष्ट किया, “आप 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज इसलिए नहीं दे रहे हैं क्योंकि आप समृद्ध हैं, बल्कि इसलिए दे रहे हैं क्योंकि आप समावेशी विकास देने में विफल रहे हैं.” यह मॉडल चुनाव तो जिता सकता है, लेकिन इससे उत्पादकता और युवाओं की समृद्धि खत्म हो रही है, जिनकी वास्तविक पगार स्थिर हो गई है.
उत्तर और दक्षिण भारत के बीच बढ़ती खाई
अपने संबोधन के दूसरे हिस्से में, रॉय ने दक्षिण भारतीय राज्यों (प्रायद्वीप) और उत्तर भारत के बीच बढ़ती आर्थिक असमानता पर बात की. उन्होंने कहा कि दक्षिण के राज्य (और महाराष्ट्र) चीन की गति से विकास कर रहे हैं और उनकी समृद्धि इंडोनेशिया के स्तर तक पहुंच गई है. वहीं, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य नेपाल और बांग्लादेश से भी पिछड़ रहे हैं.
यह आर्थिक विचलन 16वें वित्त आयोग के लिए एक बड़ा संकट पैदा करता है. अमीर दक्षिण भारत, गरीब उत्तर भारत को भारी सब्सिडी दे रहा है.
रॉय ने चेतावनी दी, “आर्थिक शक्ति प्रायद्वीप (दक्षिण) में चली गई है, लेकिन राजनीतिक शक्ति उत्तर भारत के पास है.” यह स्थिति देश के संघीय ढांचे के लिए एक अस्तित्वगत खतरा है.
16वें वित्त आयोग की आलोचना: ‘ऐतिहासिक जिम्मेदारी से भागा’
रथिन रॉय ने 16वें वित्त आयोग की कड़ी आलोचना की. उन्होंने आयोग द्वारा ‘रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट’ (राजस्व घाटा अनुदान) को खत्म करने के फैसले को “बेहद अज्ञानतापूर्ण” बताया. उन्होंने कहा कि केरल जैसे राज्यों के लिए यह अनुदान जरूरी था, जो रेमिटेंस (विदेश से आने वाले पैसे) पर निर्भर हैं और उस पर टैक्स नहीं लगा सकते.
इसके अलावा, उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर राज्यों के लिए कर्ज की सीमा तय करने की सिफारिश की है, जो कि अवैध है और केंद्र के पक्ष में झुका हुआ है.
‘सैड कंट्री’ बनने का खतरा
अंत में, रॉय ने कहा कि 2047 के सुनहरे सपने देखने के बजाय हमें 2030 की चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हमने अपनी जनसांख्यिकी और डेटा के साथ ईमानदारी नहीं दिखाई, तो भारत एक “सैड कंट्री” (उदास देश) बन सकता है—जैसे ब्राजील या दक्षिण अफ्रीका—जहाँ प्रति व्यक्ति आय तो अधिक हो सकती है, लेकिन गरीबी और असमानता समाज को जकड़े रहती है.
सैटेलाइट जांच और आरटीआई से खुलासा: मणिपुर में जंगल कटाई और हिंसा के लिए पोस्त खेती को ज़िम्मेदार ठहराने का दावा सवालों में
सैटेलाइट तस्वीरों, सरकारी नक्शों और सूचना के अधिकार से मिले रिकॉर्ड के आधार पर की गई जांच से यह सामने आया है कि मणिपुर में जंगलों की कटाई और 2023 से चल रही जातीय हिंसा, जिसमें करीब 300 लोगों की मौत हुई, के लिए सिर्फ पोस्त (अफीम) की खेती को ज़िम्मेदार ठहराने का दावा सही नहीं है. सैटेलाइट डेटा दिखाता है कि पोस्त की खेती ज़्यादातर उन इलाकों में फैली है, जहां पहले से ही जंगल कट चुके थे, न कि घने और नए जंगलों में. रिकॉर्ड और गवाहों के बयान बताते हैं कि आदिवासी किसानों को बलि का बकरा बनाया गया, जबकि लकड़ी के व्यापार और राजनीतिक संबंधों की भी बड़ी भूमिका रही है.
कांगपोकपी जिले के चांगौबुंग गांव के पूर्व मुखिया लुन्होकाम न्गैलुत (90 वर्ष) ने आर्टिकल 14 बताया कि 1950 के दशक में मणिपुर के पहाड़ी इलाकों से लकड़ी इम्फाल घाटी तक जाती थी. उनके अनुसार, उस समय के बड़े लकड़ी व्यापारी गौरव सिंह थे, जो पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के पिता थे.
10 आदिवासी मुखियाओं और लकड़ी व्यापारियों ने कहा कि गौरव सिंह आदिवासी इलाकों से लकड़ी खरीदते थे और स्थानीय कुकी व नागा समुदायों पर लागू परमिट नियमों को दरकिनार किया जाता था. न्गैलुत ने कहा, “हमने पांच–छह एकड़ जंगल साफ किया था. कोई परमिट नहीं चाहिए था, क्योंकि वे राज्य विभागों और पुलिस से जुड़े थे.” यह ज़मीन रिज़र्व फॉरेस्ट के तहत थी, जहां समुदायों को संसाधन निकालने के लिए अनुमति ज़रूरत होती है.
बीजेपी सरकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने कहा कि जंगलों के नष्ट होने का मुख्य कारण पोस्त की अवैध खेती है और यह 2023 की हिंसा से भी जुड़ा है. उन्होंने 3 दिसंबर 2025 को सोशल मीडिया पर लिखा कि 877 वर्ग किमी जंगल “ख़ास कर, पोस्त की खेती” से नष्ट हुए.
लेकिन सैटेलाइट विश्लेषण से पता चला कि जिन इलाकों को सरकार ने 2021–24 के बीच पोस्त खेती के रूप में चिन्हित किया, वहां 2017 से ही जंगल कटना शुरू हो गया था. एक उदाहरण में करीब 40 हेक्टेयर जंगल 2017 से 2025 के बीच साफ हुआ, और बाद में वहां खेती दिखी. कटाई का पैटर्न संगठित लकड़ी कटाई जैसा था, न कि पारंपरिक झूम खेती जैसा.
सूचना के अधिकार के जवाबों से पता चला कि 2020 के बाद भी बड़े पैमाने पर लकड़ी निकासी जारी रही, जबकि कई जगह “वर्किंग प्लान” की अवधि खत्म हो चुकी थी. सेनापति जिले में 2,290 घन मीटर लकड़ी निकाली गई, लेकिन परिवहन पास जारी नहीं होने की बात कही गई. कुछ जिलों में लकड़ी कटाई दर्ज हुई, पर निगरानी में विरोधाभास दिखा.
बरेली के डीएम और एसएसपी को अवमानना नोटिस भेजा, निजी घर में नमाज़ रोकने पर सवाल
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को बरेली के जिला अधिकारी अविनाश सिंह और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अनुराग आर्य को अदालत की अवमानना का नोटिस जारी किया. मामला मोहम्मदगंज गांव का है, जहां मुसलमानों को एक निजी घर में नमाज़ पढ़ने से रोका गया था. कोर्ट ने कहा कि निजी परिसर में इबादत करने की अनुमति देने वाला उसका पुराना फैसला इस मामले पर भी लागू होता है. ग़ज़ाला अहमद की यह रिपोर्ट ‘मकतूब मीडिया’ में प्रकाशित हुई है.
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने 12 फरवरी को अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई शुरू की. कोर्ट ने याचिकाकर्ता तारिक ख़ान के ख़िलाफ़ किसी भी सख्त कार्रवाई पर रोक लगाई और अधिकारियों से जवाब मांगा. अगली सुनवाई 11 मार्च को होगी.
यह विवाद 16 जनवरी से जुड़ा है, जब कुछ मुसलमानों को हसीन खान के खाली पड़े घर में नमाज़ पढ़ने के बाद हिरासत में लिया गया था. हसीन खान की पत्नी रेशमा ने कहा था कि उन्होंने अपने निजी घर में नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी थी और यह कार्यक्रम पूरी तरह निजी संपत्ति तक सीमित था.
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के पुराने फैसले (मरणाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि निजी परिसर में बिना पूर्व अनुमति इबादत की जा सकती है, बशर्ते वह सार्वजनिक स्थान तक न फैले. तारिक खान ने कहा कि यह फैसला ईसाई प्रार्थना सभा से जुड़ा था, लेकिन वही सुरक्षा सभी अल्पसंख्यकों पर लागू होनी चाहिए.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.










