17/03/2026: ईरानी सुरक्षा प्रमुख की हत्या का दावा | ट्रंप के सरदर्द, न मागा मिला, न यूरोपीय समर्थन | संसद की सीढ़ी पर चाय बिस्कुट से एतराज | बेरोजगारी का खौफ़नाक डाटा | डिजीटल अरेस्ट के पैसे मिले
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
ईरान युद्ध में बड़ा बदलाव: इज़राइल के हवाई हमले में ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी की मौत का दावा.
ट्रंप पड़े अकेले: यूरोप ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने के अमेरिकी नौसैनिक गठबंधन से किया साफ़ इनकार.
डराने वाला आँकड़ा: भारत में 20 से 29 वर्ष के 1 करोड़ 10 लाख ग्रेजुएट युवा आज भी हैं बेरोज़गार.
असम बिजली सौदा विवाद: बिना ज़रूरत 3200 मेगावाट बिजली के लिए अडानी समूह को ₹12,500 करोड़ देगी असम सरकार.
राहुल गांधी पर विवाद: संसद की सीढ़ियों पर ‘चाय-बिस्कुट’ खाने पर 200 पूर्व अधिकारियों ने की माफ़ी की माँग, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस.
डिजिटल अरेस्ट से राहत: कोच्चि पुलिस ने त्वरित कार्रवाई से 81 वर्षीय बुज़ुर्ग के ठगे गए 1 करोड़ से अधिक रुपये बैंक खाते में कराए फ़्रीज़.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फ़ैसला: बच्चा गोद लेने वाली माताओं के लिए मातृत्व अवकाश की उम्र सीमा को बताया असंवैधानिक.
सोनम वांगचुक रिहा: साढ़े पाँच महीने जेल में रहने के बाद वांगचुक बाहर आए, सरकार से की सार्थक बातचीत की अपील.
ईरान युद्ध का 18वां दिन
ईरानी सुरक्षा प्रमुख अली हारीजानी की हत्या का इज़राइली दावा, उधर यूरोप ने ट्रंप से पल्ला झटका
होर्मुज़ जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव अभियान का सहयोगी देश कड़ा विरोध कर रहे हैं, जिससे व्हाइट हाउस में निराशा बढ़ रही है.
वहीं, इज़राइल ने दावा किया है कि उसने तेहरान में एक हवाई हमले में ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी को मार गिराया है.
इसके अलावा, इज़राइल लेबनान में एक बड़े ज़मीनी हमले की योजना बना रहा है, जिससे पश्चिमी नेता बेहद चिंतित हैं.
यूरोपीय संघ (ईयू) के विदेश मंत्रियों ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास अपने नौसैनिक अभियानों का विस्तार न करने का फ़ैसला किया है. एक जर्मन प्रवक्ता ने साफ़ कहा कि “यह नाटो का युद्ध नहीं है.”
कूटनीतिक मोर्चे पर, ईरानी अधिकारियों ने ट्रंप के मध्य पूर्व दूत से संपर्क कर कूटनीतिक रास्ता खोलने की कोशिश की थी, लेकिन ट्रंप ने अभी बातचीत से इनकार कर दिया है. अमेरिकी अधिकारियों को शक है कि ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई के हाथ में असल ताक़त नहीं है.
मैदानी हालात की बात करें तो इज़राइल, ईरान और हिज़्बुल्लाह के बीच लगातार हमले जारी हैं. लेबनान में 10 लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं. अमेरिका का एक युद्धपोत मध्य पूर्व की ओर बढ़ रहा है.
उधर, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में फ़ुजैरा तेल क्षेत्र और शाह गैस फ़ील्ड में ड्रोन हमलों के बाद आग लग गई, जिसके चलते यूएई ने अपना हवाई क्षेत्र अस्थायी रूप से बंद कर दिया है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक जांच में यह सामने आया है कि ईरान के मिनाब में एक प्राथमिक विद्यालय पर हुए अमेरिकी हमले में कम से कम 170 लोग मारे गए, जिनमें ज़्यादातर स्कूली लड़कियां थीं.
इस युद्ध के कारण कच्चे तेल की क़ीमतें 104 डॉलर प्रति बैरल के क़रीब पहुंच गई हैं.
मिडिल ईस्ट में एक भयानक ‘असिमेट्रिक वॉर’ (विषम युद्ध) लड़ा जा रहा है. लेकिन आज का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सच यह है कि डोनाल्ड ट्रंप—जिन्होंने इस युद्ध को हवा दी—अब वैश्विक और घरेलू मोर्चे पर पूरी तरह ‘अकेले’ पड़ते जा रहे हैं.
दूसरी तरफ, खुद अमेरिका के भीतर एक ‘मागा गृहयुद्ध’ छिड़ गया है. टकर कार्लसन जैसे ट्रंप के कट्टर समर्थक और युवा वोटर्स आज पूछ रहे हैं कि— क्या ‘अमेरिका फर्स्ट’ का वादा अब ‘इज़राइल फर्स्ट’ की भेंट चढ़ गया है?
लेकिन इस महायुद्ध का ‘भारत’ पर क्या असर हो रहा है? ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ चोक होने से कच्चा तेल 106 डॉलर के पार पहुँच गया है, जिससे हमारी इकॉनमी पर ‘ऑयल बम’ गिरने का खतरा है. खाड़ी देशों में काम करने वाले 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा दांव पर है और भारत की ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ अपने सबसे बड़े कूटनीतिक धर्मसंकट से गुज़र रही है. आज हम बिना किसी शोर-शराबे के, सिर्फ डेटा और फैक्ट्स के साथ इस युद्ध की ‘ग्राउंड रियलिटी’, मागा के भीतर की बगावत और भारत पर इसके सीधे असर को डिकोड करेंगे. सुनिये टाकिंग न्यूज़ विद निधीश का 17 मार्च का प्रसारण
ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी की मौत के बाद, सैन्य नियंत्रण का रास्ता साफ़
न्यूयॉर्क टाइम्स का विश्लषण है कि ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी की एक इज़राइली हवाई हमले में हुई मौत के बाद देश की सत्ता पर सेना की पकड़ और मज़बूत होने की संभावना है. लारीजानी को ईरान के कट्टरपंथी सैन्य तत्वों और उदारवादी राजनीतिक गुटों के बीच एक अहम कड़ी माना जाता था.
लारीजानी ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख थे और दिवंगत अयातुल्ला अली ख़ामेनेई के बेहद क़रीबी थे. युद्ध की शुरुआत में शीर्ष नेतृत्व के मारे जाने के बाद वह देश के वास्तविक नेता बन गए थे. हालांकि वह एक रूढ़िवादी राजनेता थे, लेकिन कट्टरपंथियों के दबदबे वाले सिस्टम में उन्हें अपेक्षाकृत यथार्थवादी और व्यावहारिक माना जाता था. उन्होंने ख़ामेनेई की जगह किसी उदारवादी नेता को सर्वोच्च नेता बनाने की वकालत की थी, लेकिन यह पद ख़ामेनेई के बेटे मोजतबा को मिल गया.
जर्मन इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफ़ेयर्स के विशेषज्ञ हामिदरेज़ा अज़ीज़ी का कहना है कि लारीजानी की मौत का मतलब सिस्टम का और ज़्यादा सैन्यीकरण होना है. उन्होंने कहा कि अब जब सब कुछ सैन्य अभिजात वर्ग के हाथों में है, तो यह कल्पना करना मुश्किल है कि वे युद्ध को समाप्त करने के लिए कोई लचीलापन दिखाएंगे.
होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए गठबंधन बनाने में ट्रंप को हो रही है मुश्किल
एक्सियोस के लिए बराक राविड की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सहयोगी देश होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक गठबंधन में शामिल होने के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव का विरोध कर रहे हैं.
इस जलडमरूमध्य का बंद होना व्हाइट हाउस के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया है. जब तक ईरान की नाकेबंदी जारी है और खाड़ी का तेल फंसा हुआ है, ट्रंप युद्ध ख़त्म करके अपनी जीत की घोषणा नहीं कर सकते. कूटनीतिक बातचीत से वाक़िफ़ सूत्रों के मुताबिक़, ब्रिटेन ने संभावित सहयोगियों के बीच एक योजना साझा की है, लेकिन कई अन्य देशों की प्रतिक्रिया संशय से लेकर साफ़ इनकार तक रही है.
ट्रंप प्रशासन चाहता है कि ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, इटली, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, खाड़ी देश और जॉर्डन इस गठबंधन का हिस्सा बनें. अमेरिका ने जापान और दक्षिण कोरिया से भी संपर्क किया है. लेकिन जर्मनी, इटली और जापान के नेताओं ने अपने युद्धपोत भेजने से स्पष्ट इनकार कर दिया है. यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कलास ने कहा कि ट्रंप के गठबंधन में शामिल होने की यूरोप की कोई इच्छा नहीं है और “यह यूरोप का युद्ध नहीं है.” ट्रंप ने इस पर निराशा जताते हुए कहा कि जिन देशों की अमेरिका ने दशकों से रक्षा की है, वे अब बिल्कुल भी उत्साह नहीं दिखा रहे हैं.
‘यह हमारा युद्ध नहीं है’: यूरोप, ब्रिटेन ने ट्रंप की मांगों को किया ख़ारिज
न्यूयॉर्क टाइम्स के माइकल डी. शियर की रिपोर्ट के मुताबिक़, जैसे-जैसे ईरान पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हमला अपने तीसरे हफ़्ते में प्रवेश कर रहा है, यूरोपीय नेता होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने में मदद करने की उनकी युद्धक मांगों का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं.
ट्रंप ने सप्ताहांत में नाटो सहयोगियों से ईरान की नाकेबंदी को समाप्त करने में मदद का आह्वान किया था. ट्रंप ने इसे एक “बहुत छोटा प्रयास” बताया और चेतावनी दी कि अगर यूरोप मदद नहीं करता है, तो यह नाटो के भविष्य के लिए बहुत बुरा होगा. उन्होंने खुलेआम कहा कि वह उन देशों के नाम सार्वजनिक करेंगे जो मदद के लिए आगे नहीं आए.
हालाँकि, यूरोपीय नेता अपनी जनता और बढ़ते आर्थिक दबावों के बीच इस युद्ध से दूरी बना रहे हैं. जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने साफ़ कहा, “यह हमारा युद्ध नहीं है; हमने इसे शुरू नहीं किया है.” फ़्रांस ने भी स्पष्ट किया है कि उसकी नौसेना पूर्वी भूमध्य सागर में अपनी रक्षात्मक मुद्रा में ही रहेगी. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने भी घोषणा की कि उनका देश इस व्यापक युद्ध में नहीं घसीटा जाएगा. इटली और पोलैंड ने भी सैन्य जहाज़ भेजने से साफ़ इनकार कर दिया है. यूरोपीय नेताओं को 2003 के इराक युद्ध की याद आ रही है, जिसे यूरोप में एक महंगी और भयानक ग़लती माना जाता है.
खाड़ी युद्ध ने अमेरिका और चीन के रिश्तों में पैदा की खटास
न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए लिली कुओ की रिपोर्ट के मुताबिक़, ईरान में चल रहे युद्ध ने चीन और अमेरिका के बीच नाज़ुक रिश्तों को ख़तरे में डाल दिया है. राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा चीन से खाड़ी में युद्धपोत भेजने की मांग के बाद दोनों देशों के बीच होने वाला अहम शिखर सम्मेलन अब टलने की कगार पर है.
ट्रंप ने सोमवार को कहा कि उन्होंने युद्ध के कारण इस महीने के अंत में होने वाली अपनी बीजिंग यात्रा को स्थगित करने का अनुरोध किया है. इससे पहले उन्होंने धमकी दी थी कि अगर चीन ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ख़त्म करने के लिए अपने युद्धपोत नहीं भेजे, तो वह चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपनी बैठक रद्द कर देंगे. चीनी अधिकारियों ने ट्रंप के इस प्रस्ताव पर ठंडी प्रतिक्रिया दी है और केवल सैन्य अभियान तुरंत रोकने की औपचारिक अपील की है.
विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग के लिए इस अभियान में शामिल होने का मतलब ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध में उतरना होगा, जो क्षेत्र में उसका सबसे क़रीबी रणनीतिक साझेदार है. इसके अलावा, चीनी युद्धपोत भेजने का मतलब अमेरिकी नेतृत्व के सामने झुकना होगा, जो वैश्विक ताक़त बनने की चाह रखने वाले शी जिनपिंग को मंज़ूर नहीं है. हालांकि जलडमरूमध्य बंद होने से चीन भी काफ़ी प्रभावित हो रहा है, क्योंकि उसका 40 प्रतिशत तेल आयात इसी रास्ते से होता है. चीन की कोशिश है कि वह पर्दे के पीछे से ईरान पर दबाव बनाए, लेकिन वह अमेरिका की धमकियों के आगे नहीं झुकेगा.
क्या ‘मागा’ का चार्म अब ख़त्म हो रहा है? ईरान युद्ध से ट्रंप के कट्टर समर्थक नाराज़
वाशिंगटन पोस्ट के लिए कारा वोग्ट की रिपोर्ट और हालिया घटनाक्रम दर्शाते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप का ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) आंदोलन अब गंभीर आंतरिक कलह से गुज़र रहा है. एक साल पहले जो समर्थक ट्रंप की वापसी को एक सांस्कृतिक बदलाव के रूप में देख रहे थे, वे अब ईरान युद्ध को लेकर बगावत पर उतर आए हैं. मागा का आकर्षण उसकी बेबाकी और ‘सिस्टम-विरोधी’ छवि में था. लेकिन प्रशासन के कुछ फ़ैसलों ने इस आंदोलन की ‘कूल’ छवि को नुक़सान पहुंचाया है. सबसे बड़ा झटका अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए साझा हमले से लगा है. मागा के कई प्रभावशाली चेहरे अब ट्रंप पर ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ के वादे से मुकरने और ‘इज़राइल फ़र्स्ट’ की नीति अपनाने का आरोप लगा रहे हैं.
टकर कार्लसन, मेगन केली, मार्जोरी टेलर ग्रीन और निक फ़ुएंटस जैसे दिग्गजों ने इन हमलों की कड़ी आलोचना की है. उनका मानना है कि इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप को उस अंतहीन युद्ध में धकेल दिया है जिससे बचने का उन्होंने वादा किया था. मार्जोरी टेलर ग्रीन ने साफ़ कहा, “मागा का मतलब अमेरिका फ़र्स्ट होना चाहिए था, न कि इज़राइल फ़र्स्ट.” कई ताज़ा पोल्स भी दिखाते हैं कि अमेरिकी जनता और विशेषकर युवा रिपब्लिकन इस विदेशी युद्ध के सख़्त ख़िलाफ़ हैं. 11 अरब डॉलर से ज़्यादा का ख़र्च और बढ़ते तेल के दामों ने इस ग़ुस्से को और भड़का दिया है.
अमेरिका के शीर्ष आतंकवाद विरोधी अधिकारी का इस्तीफ़ा, ईरान युद्ध को बताया कारण
न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए जूलियन ई. बार्न्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, अमेरिका के शीर्ष आतंकवाद विरोधी अधिकारियों में से एक, जो केंट ने मंगलवार को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर के निदेशक केंट ने अपने इस्तीफ़े का कारण ईरान युद्ध का खुला विरोध और ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर इज़राइल के अत्यधिक प्रभाव को बताया है.
केंट ने सोशल मीडिया पर लिखे एक पोस्ट में कहा, “मैं सच्चे मन से ईरान में चल रहे युद्ध का समर्थन नहीं कर सकता.” उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप को भेजे अपने त्यागपत्र में स्पष्ट रूप से लिखा कि ईरान से अमेरिका को कोई तात्कालिक ख़तरा नहीं था और यह युद्ध पूरी तरह से इज़राइल तथा उसकी शक्तिशाली अमेरिकी लॉबी के दबाव में शुरू किया गया है. केंट ने उच्च पदस्थ इज़राइली अधिकारियों और मीडिया पर ‘ग़लत सूचना अभियान’ चलाने का आरोप लगाया, जिसने ट्रंप के ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ के एजेंडे को कमज़ोर कर दिया.
इराक युद्ध के अनुभवी सैनिक केंट ने चेतावनी दी कि ईरान पर हमले के तर्क बिल्कुल 2003 के इराक युद्ध के झूठे वादों जैसे हैं. उन्होंने अपनी दिवंगत पत्नी शैनन का भी ज़िक्र किया, जो सीरिया में एक सैन्य क्रिप्टोलॉजिस्ट के रूप में मारी गई थीं. केंट ने कहा कि वह इज़राइल द्वारा गढ़े गए इस युद्ध में अपनी अगली पीढ़ी को मरने के लिए नहीं भेज सकते.
‘अब बाज़ी उनके हाथ में है’: ट्रंप के सहयोगियों को डर, ईरान हो रहा है नियंत्रण से बाहर
पोलिटिको की मेगन मेसर्ली की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वे समर्थक, जिन्होंने मध्य पूर्व में नए युद्धों से बचने के उनके वादे का समर्थन किया था, अब इस बात से डरे हुए हैं कि ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध उनके नियंत्रण से बाहर जा रहा है. उन्हें डर है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों पर ईरान के हमले अमेरिका को एक लंबे ज़मीनी युद्ध की ओर धकेल सकते हैं.
व्हाइट हाउस के एक क़रीबी सूत्र ने कहा, “हमने मैदान में भले ही उनकी बुरी हालत कर दी हो, लेकिन अब बड़ी हद तक बाज़ी ईरान के हाथ में है. वे ही तय करेंगे कि हम कब तक इसमें शामिल रहेंगे और क्या हमें अपनी ज़मीनी सेना उतारनी पड़ेगी.” शुरुआत में ट्रंप के सहयोगियों को लगा था कि यह एक तेज़ और सीमित ऑपरेशन होगा, लेकिन अब असममित युद्ध के कारण स्थिति पलट गई है. कच्चे तेल की क़ीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के क़रीब पहुंच गई हैं और अमेरिका में पेट्रोल के दाम 25 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं, जो आगामी मध्यावधि चुनावों में ट्रंप के लिए भारी राजनीतिक नुक़सान का कारण बन सकता है.
अमेरिका ने क्षेत्र में अतिरिक्त बल भेजे हैं, जिसमें यूएसएस त्रिपोली और लगभग 2,000 मरीन सैनिक शामिल हैं. हालांकि व्हाइट हाउस का दावा है कि सैन्य अभियान पूरी तरह सफल रहा है, लेकिन ट्रंप के कई ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ सहयोगी ज़मीनी युद्ध से बचने की गुहार लगा रहे हैं. उनका मानना है कि जैसे-जैसे अमेरिका सैन्य कदम बढ़ा रहा है, वैसे-वैसे बिना चेहरा गँवाए पीछे हटने के विकल्प ख़त्म होते जा रहे हैं.
‘संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय और बिस्कुट खाना’ ही तो हमारे लोकतंत्र की असली समस्या है
‘ऐश्वर्या जैन’ की रिपोर्ट के अनुसार, संसद परिसर में हाल की घटनाओं को लेकर कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की भूमिका पर सवाल उठाते हुए 200 से अधिक सेवानिवृत्त नौकरशाहों और पूर्व सैनिक अधिकारियों ने एक संयुक्त पत्र जारी किया है. इस पत्र में संसद की गरिमा और मर्यादा को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाते हुए राहुल गांधी से सार्वजनिक रूप से माफी की मांग की गई है.17 मार्च को जारी इस पत्र में कहा गया है कि भारतीय संसद देश की संवैधानिक व्यवस्था का सर्वोच्च मंच है, जहां जनता की सामूहिक इच्छा अभिव्यक्त होती है और कानूनों का निर्माण होता है.संसद की गरिमा केवल परंपरा का विषय नहीं बल्कि लोकतंत्र की संवैधानिक आत्मा का अनिवार्य तत्व है. इसलिए संसद भवन और उसके पूरे परिसर में सांसदों के आचरण का स्तर सर्वोच्च होना चाहिए.
पत्र में आगे कहा गया है कि संसदीय परंपराओं के अनुसार लोकसभा और राज्यसभा के कक्षों के साथ-साथ संसद की सीढ़ियां, गलियारे और लॉबी भी संसद परिसर का अभिन्न हिस्सा हैं और इन सभी स्थानों पर वही मर्यादा लागू होती है. लेकिन, सोशल मीडिया में इस पत्र पर प्रतिक्रियाएं आने लगीं. पत्रकार अरविंद गुणसेकर ने ‘एक्स’ पर लिखा, “84 पूर्व नौकरशाहों, चार वरिष्ठ अधिवक्ताओं और अन्य लोगों ने एक खुला पत्र लिखकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी की आलोचना की है, क्योंकि वे “संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय और बिस्कुट खा रहे थे...”. इस बात की गंभीरता को समझिये (जरा सोचिए), ये लोग राहुल गांधी से संसद की सीढ़ियों पर चाय और बिस्कुट खाने के लिए देश से माफी मांगने की मांग कर रहे हैं.
पत्रकार वीर सांघवी ने व्यंग्यात्मक शैली में ‘एक्स’ पर टिप्पणी की, “”हाँ भाई, क्योंकि ‘संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय और बिस्कुट खाना’ ही तो हमारे लोकतंत्र की असली समस्या है.” रविशंकर नामक यूजर ने लिखा कि ये तथाकथित नौकरशाह, वरिष्ठ अधिवक्ता और अन्य लोग मणिपुर की समस्याओं के बारे में (पत्र) क्यों नहीं लिखते? लक्ष्मीकांत आयंगर ने तंज़ के अंदाज़ में लिखा, “”यह भारत के सामने आने वाली सबसे गंभीर समस्या है... और इस पर तुरंत ध्यान दिया जाना चाहिए. बाकी सभी मुद्दे इंतजार कर सकते हैं... जैसे सीएनजी, ईंधन की कमी, कीमतों में बढ़ोतरी, इत्यादि-इत्यादि.” हिमांशु नाम के शख्स ने लिखा कि ये लोग रमेश विधूड़ी से कभी माफी की मांग नहीं करेंगे. देशभक्त नामक एक ‘एक्स’ यूजर ने टिप्पणी की, “आज के विपक्ष ने खुद को केवल नाटकबाजी तक सीमित कर लिया है. न कोई विज़न (दृष्टि), न कोई समाधान— बस लगातार शोर-शराबा और प्रासंगिक बने रहने की हताशा.” “लोग इस सब को समझ चुके हैं. भरोसा रचनात्मक राजनीति से कमाया जाता है, न कि सुर्खियों के लिए किए गए स्टंटों से.” नवेश राज ने लिखा- “लेकिन, एपस्टीन के साथ चाय पीना देश के हित में है.”
पूर्वोत्तर में कथित आतंकी गतिविधियों के आरोप में भाड़े के अमेरिकी सैनिक सहित सात विदेशी हिरासत में, यूक्रेन का विरोध
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने भारत में कथित तौर पर अवैध प्रवेश और पूर्वोत्तर में आतंकी गतिविधियों से संदिग्ध संबंधों के मामले में पूछताछ के लिए सात विदेशी नागरिकों को 11 दिनों की हिरासत में लिया है, जिनमें छह यूक्रेनी और एक अमेरिकी नागरिक शामिल है.
हिरासत में लिए गए सात विदेशी नागरिकों में एक अमेरिकी नागरिक मैथ्यू आरोन वैन डायक और छह यूक्रेनी नागरिक— पेट्रो हुरबा, तारास स्लीव्याक, इवान सुकमानोवस्की, मैरियन स्टीफनकिवा, मक्सिम होंचारुक और विक्टर कामिंस्की शामिल हैं.
‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, एजेंसी ने वैन डायक को एक ‘भाड़े का सैनिक’ बताया है. एनआईए के अनुसार, यह समूह वैध वीजा पर मिजोरम (जो एक संरक्षित क्षेत्र है) में दाखिल हुआ था, लेकिन बाद में वे सीमा पार कर म्यांमार चले गए, जहाँ उन्होंने कथित तौर पर विद्रोही समूहों के साथ संपर्क स्थापित किया.
एजेंसी ने आरोप लगाया है कि ये आरोपी आतंकवादियों को प्रशिक्षण देने और एक संदिग्ध सीमा पार आतंकी नेटवर्क के हिस्से के रूप में ड्रोन सहित हथियारों की आपूर्ति की सुविधा प्रदान करने में शामिल थे.
एजेंसी ने आगे दावा किया कि यूरोप से ड्रोन की एक बड़ी खेप भारत लाई गई थी. इस बीच, यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि हिरासत में लिए गए यूक्रेनी नागरिकों के भारत या म्यांमार में गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल होने का कोई पुख्ता सबूत नहीं है. मंत्रालय ने “विकृत और निराधार आरोप” पेश करने के लिए कुछ मीडिया रिपोर्टों की आलोचना भी की.
मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत स्थित यूक्रेन के दूतावास ने बंदियों को कानूनी सहायता प्रदान की है, लेकिन उन्हें अभी तक सीधे कांसुलर एक्सेस (राजनयिक पहुंच) नहीं दी गई है.
यूक्रेन ने आगे दावा किया कि उसे इन गिरफ्तारियों के संबंध में भारतीय अधिकारियों से कोई औपचारिक सूचना नहीं मिली है और उसने विरोध दर्ज कराते हुए अपने नागरिकों की तत्काल रिहाई और उन तक पहुंच की मांग की है. भारत में यूक्रेन के राजदूत ओलेक्सांद्र पोलिशचुक ने इस मामले को भारत के विदेश मंत्रालय के समक्ष उठाया.
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अमेरिकी वैन डायक ‘सन्स ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल’ के संस्थापक हैं, जो एक गैर-लाभकारी संगठन है और संघर्ष वाले क्षेत्रों में सैन्य प्रशिक्षण और सहायता प्रदान करता है. वह पहले लीबिया और यूक्रेन के संघर्षों में शामिल रहे हैं और एक सुरक्षा विश्लेषक एवं वृत्तचित्र निर्माता (डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर) के रूप में काम कर चुके हैं.
गंगा में नाव पर इफ़्तार पार्टी के दौरान चिकन बिरयानी खाने पर मुकदमा, 14 गिरफ्तार
वाराणसी में एक पूजा स्थल को अपवित्र करने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप में 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. यह कार्रवाई एक वीडियो सामने आने के बाद की गई है, जिसमें वे कथित तौर पर गंगा नदी में एक नाव पर इफ्तार के भोजन में शामिल होते और चिकन बिरयानी खाते दिख रहे हैं. मनीष साहू के अनुसार, गिरफ्तार किए गए सभी आरोपी वाराणसी में साड़ी की दुकानों पर काम करते हैं और उनकी उम्र 20 वर्ष के आसपास की है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, यह कार्रवाई भाजपा युवा मोर्चा के नगर इकाई अध्यक्ष रजत जायसवाल द्वारा दर्ज कराई गई एक लिखित शिकायत पर की गई. जायसवाल ने आरोप लगाया कि गंगा में एक नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित की गई थी, जिसके दौरान बिरयानी का सेवन किया गया.
जायसवाल ने कहा, “सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए गंगा गहरी और अटूट आस्था का केंद्र है. देश और दुनिया भर से हजारों श्रद्धालु हर दिन काशी आते हैं और गंगा जल का उपयोग करके अनुष्ठान करते हैं और प्रार्थना करते हैं.”
ऐसी स्थिति में, नदी के बीचों-बीच नाव पर बिरयानी खाना और उसके अवशेषों (बचे हुए खाने) को पानी में फेंकना पूरी तरह से अनुचित है. ऐसा प्रतीत होता है कि यह कृत्य हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के इरादे से किया गया है,” उन्होंने कहा.
एफ़आईआर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं 298 (किसी वर्ग के धर्म का अपमान करने के इरादे से पूजा स्थल को नुकसान पहुँचाना या अपवित्र करना), 299 (धार्मिक भावनाओं को भड़काने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य करना), 196(1) B (धर्म, जाति, स्थान आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना), 270 (सार्वजनिक उपद्रव), 279 (सार्वजनिक झरने या जलाशय के पानी को गंदा करना) और जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत दर्ज की गई है.
देश में 1.1 करोड़ स्नातक बेरोजगार: युवा स्नातकों में बेरोजगारी दर अभी भी काफी ऊपर
अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 20 से 29 वर्ष की आयु के 6.3 करोड़ स्नातकों में से 1.1 करोड़ (11 मिलियन) बेरोजगार हैं. स्नातक होने के एक साल के भीतर केवल एक छोटा हिस्सा ही स्थिर वेतन वाली नौकरियां सुरक्षित कर पाता है.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया’ रिपोर्ट में पाया गया कि खुद को बेरोजगार बताने वाले स्नातकों में से केवल 7 प्रतिशत ही एक वर्ष के भीतर स्थायी वेतन वाली नौकरी पा पाते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, स्नातकों में बेरोजगारी दर अभी भी उच्च बनी हुई है—15 से 25 वर्ष की आयु वालों में यह लगभग 40 प्रतिशत और 25 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में 20 प्रतिशत है.
रिपोर्ट में कहा गया है, “स्नातक होने के एक साल के भीतर केवल एक छोटा हिस्सा ही स्थिर वेतन वाली नौकरियां हासिल कर पाता है. हाल के वर्षों में स्नातक आबादी के बढ़ते आकार के कारण स्नातक बेरोजगारी की समस्या और बढ़ गई है.” रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ दशकों में युवा आबादी में काफी वृद्धि हुई है और उच्च शिक्षा में नामांकन दर भी बढ़ी है, जिससे युवा स्नातकों की कुल संख्या में इजाफा हुआ है.
रिपोर्ट में कहा गया है, “इसके साथ ही बेरोजगारी की उच्च दर के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में स्नातक बेरोजगार हैं—2023 तक 20 से 29 वर्ष की आयु के 6.3 करोड़ स्नातकों में से 1.1 करोड़ बेरोजगार थे.” रिपोर्ट में यह भी नोट किया गया कि आजादी के बाद से भारत ने शिक्षा के पुराने अंतर को पाटने में उल्लेखनीय प्रगति की है.
“उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात भारत के विकास के स्तर के अनुरूप है. शिक्षा तक पहुंच में लिंग और जाति की सामाजिक-आर्थिक बाधाएं कम हुई हैं (हालांकि अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है), और इसके परिणामस्वरूप श्रम बाजार में बहुत अधिक जुड़ा हुआ और सक्षम कार्यबल प्रवेश कर रहा है.”
“हालांकि, इसके साथ रोजगार में प्रभावी बदलाव नहीं हुआ है. युवा स्नातकों के लिए बेरोजगारी दर लगातार ऊँची बनी हुई है. शिक्षा तक पहुंच असमान है. स्कूल से काम (रोजगार) तक का सफर अनिश्चित है और कई लोगों के लिए यह स्थिर, लाभकारी रोजगार में नहीं बदल पा रहा है.”
रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षा में लगे युवा पुरुषों की हिस्सेदारी 2017 के 38 प्रतिशत से गिरकर 2024 के अंत में 34 प्रतिशत हो गई, जिसमें एक बड़े हिस्से ने अपनी पढ़ाई छोड़ने का कारण घरेलू आय में सहायता करने की आवश्यकता को बताया.
रिपोर्ट के अनुसार, “शिक्षा छोड़ने का सबसे आम कारण घरेलू आय में सहायता करना है. 2017 में इस कारण को बताने वालों की संख्या 58 प्रतिशत थी, जो 2023 तक बढ़कर 72 प्रतिशत हो गई.”
2004-05 से 2023 के बीच, जबकि हर साल लगभग 50 लाख (5 मिलियन) स्नातक जुड़े, उनमें से केवल 28 लाख को ही रोजगार मिला, और उससे भी कम हिस्से को वेतन वाली नौकरियां मिलीं, जिससे स्नातक बेरोजगारी बढ़ी और कमाई की वृद्धि धीमी हो गई.
“रोजगार में प्रवेश के समय और पूरे जीवनकाल में स्नातकों की कमाई गैर-स्नातकों से अधिक होती है: श्रम बाजार में प्रवेश के समय स्नातकों का वेतन गैर-स्नातकों की तुलना में दोगुना होता है और यह अंतर जीवन भर बढ़ता जाता है.”
रिपोर्ट में कहा गया है, “पुरुषों के लिए, हाल के वर्षों में कमाई का यह अंतर स्थिर हो गया है. हालांकि, युवा स्नातक पुरुषों के शुरुआती वेतन की वृद्धि धीमी हो गई है. वहीं, स्नातक कमाई में लैंगिक अंतर काफी कम हुआ है, जो युवा महिलाओं के लिए श्रम बाजार के बेहतर परिणामों का संकेत देता है.”
कोच्चि साइबर पुलिस ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटाले में बुजुर्ग से ठगे गए 1 करोड़ रुपये से अधिक बरामद किए
कोच्चि शहर की साइबर पुलिस ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ ऑनलाइन घोटाले में एक 81 वर्षीय बुजुर्ग से ठगे गए 1 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बरामद कर ली है. अधिकारियों ने बताया कि त्वरित कार्रवाई की मदद से जम्मू-कश्मीर के एक बैंक खाते में मौजूद इन पैसों को फ्रीज (लेनदेन रोकना) करने में सफलता मिली.
‘पीटीआई’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह धोखाधड़ी पिछले साल नवंबर में हुई थी जब कानून प्रवर्तन अधिकारी बनकर आए जालसाजों ने कथित तौर पर पीड़ित को लगभग 1.30 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया था. पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने बुजुर्ग को अवैध गतिविधियों में शामिल होने का झूठा आरोप लगाकर डराया और मामले को निपटाने के बहाने पैसों की मांग की. ठगी का एहसास होने से पहले पीड़ित ने पैसे ट्रांसफर कर दिए थे.
समय पर की गई शिकायत से फंड फ्रीज करने में मिली मदद
कोच्चि के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज होने के बाद, अधिकारियों ने मामला दर्ज किया और विवरण ‘नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल’ पर अपलोड कर दिया. अधिकारियों ने ‘पीटीआई’ को बताया, “समय रहते हस्तक्षेप के कारण, खोई हुई राशि में से लगभग 1.06 करोड़ रुपये जम्मू-कश्मीर के एक बैंक से बरामद कर लिए गए.” जांचकर्ताओं ने बाद में श्रीनगर के एक बैंक खाते में 1,06,27,914 रुपये फ्रीज कर दिए, जहाँ पीड़ित के पैसे भेजे गए थे. अदालत के आदेश के बाद, फ्रीज की गई राशि शिकायतकर्ता को वापस कर दी गई.
पुलिस ने कहा कि साइबर धोखाधड़ी की घटनाओं की तत्काल रिपोर्ट करने से खोए हुए पैसे वापस मिलने की संभावना काफी बढ़ जाती है. अधिकारियों ने कहा, “यदि नुकसान के तुरंत बाद संपर्क किया जाए और नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल के माध्यम से शिकायत दर्ज की जाए, तो रिकवरी की संभावनाएं बेहतर हो जाती हैं.”
3 माह में दहेज हत्या के 510 में से 508 मामलों में जमानत; इलाहाबाद हाईकोर्ट जज को फटकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जिस जज ने हाल ही में मुख्य न्यायाधीश से उन्हें जमानत रोस्टर आवंटित न करने का अनुरोध किया था, पता चला है कि उन्होंने अपनी पीठ द्वारा सुने गए दहेज हत्या के मामलों में भारी संख्या में जमानत के आदेश दिए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने उनके एक जमानत आदेश को “बेहद चौंकाने वाला और निराशाजनक” बताया था.
“द इंडियन एक्सप्रेस” द्वारा अक्टूबर और दिसंबर 2025 के बीच न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल-न्यायाधीश पीठ द्वारा दहेज हत्या के मामलों में पारित 510 सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नियमित जमानत आदेशों के विश्लेषण से पता चलता है कि उन्होंने 508 मामलों में जमानत दी — जो कुल मामलों का 99.61% है.
इसके अलावा, न्यायमूर्ति भाटिया द्वारा दिए गए जमानत आदेशों की संरचना, भाषा और बांड राशि सभी मामलों में लगभग एक समान थी, भले ही मृत्यु की परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं.
9 फरवरी को न्यायमूर्ति भाटिया के एक जमानत आदेश को रद्द करते हुए, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी की, “हमें विवादित आदेश को पढ़ने पर यह समझ नहीं आ रहा है कि हाईकोर्ट क्या कहना चाह रहा है... दहेज हत्या जैसे बेहद गंभीर अपराध में आरोपी के पक्ष में जमानत देने के लिए हाईकोर्ट ने अपने विवेक का इस्तेमाल किस आधार पर किया, यह स्पष्ट नहीं है.”
जमानत रद्द करने और आरोपी को आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का आदेश देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने उल्लेख किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण गला घोंटना बताया गया था, और यह घटना पीड़िता की शादी के महज तीन महीने बाद हुई थी, जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 के तहत आरोपों को आमंत्रित करती है. अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपराध की प्रकृति, निर्धारित सजा, आरोपी और मृतक के बीच संबंध, घटनास्थल और रिकॉर्ड पर मौजूद मेडिकल साक्ष्यों की जांच करे.
कुछ दिनों बाद, मुख्य न्यायाधीश से उन्हें जमानत रोस्टर आवंटित न करने का अनुरोध करते हुए, न्यायमूर्ति भाटिया ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का उन पर “व्यापक हतोत्साहित करने वाला और डराने वाला प्रभाव” पड़ा है.
“द इंडियन एक्सप्रेस” द्वारा मेल सहित संपर्क करने के बार-बार प्रयासों के बावजूद न्यायमूर्ति भाटिया ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को भेजे गए प्रश्नों का भी कोई उत्तर नहीं मिला.
असम सरकार और अडानी समूह के बीच बिजली सौदे पर सवाल, अतिरिक्त बिजली के लिए पांच वर्षों में ₹12,500 करोड़ के भुगतान पर सहमति
‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ में श्रीगिरीश जलिहल की एक खोजी रिपोर्ट असम की भाजपा सरकार और अडानी समूह के बीच हुए एक बिजली खरीद समझौते पर गंभीर सवाल उठाती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, असम सरकार ने अडानी समूह से 3,200 मेगावाट बिजली खरीदने का समझौता किया है. रिपोर्ट के अनुसार, राज्य को वास्तव में इतनी बिजली की आवश्यकता नहीं है. सरकारी दस्तावेजों और ‘केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण’ (सीईए) के अनुमानों से पता चलता है कि असम आने वाले वर्षों में इस अतिरिक्त बिजली का उपभोग नहीं कर पाएगा, फिर भी उसे इसके लिए भुगतान करना होगा.
अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में असम सरकार अडानी समूह को लगभग 12,500 करोड़ रुपये का भुगतान करेगी. यह भुगतान उस बिजली के लिए होगा जिसका उपयोग राज्य नहीं करेगा. यदि आर्थिक विकास की गति धीमी रहती है, तो यह बोझ 19,000 करोड़ रुपये तक भी जा सकता है.
यह रिपोर्ट आंकड़ों में हेरफेर की तरफ इशारा करती है. रिपोर्ट का दावा है कि असम सरकार ने केंद्र सरकार को अपनी बिजली की जरूरतों के बढ़ा-चढ़ाकर आंकड़े दिए. जहाँ सीईए ने कहा था कि असम को 2035-36 तक केवल 2,829 मेगावाट अतिरिक्त बिजली की जरूरत है, वहीं असम सरकार ने अपनी जरूरत 6,000 मेगावाट बताई ताकि अडानी के साथ बड़े सौदे को सही ठहराया जा सके.
इस सौदे के लिए टेंडर की शर्तों में अडानी समूह को विशेष रियायतें दी गईं. आमतौर पर कंपनियों को खुद जमीन और वन विभाग की मंजूरी (फॉरेस्ट क्लियेरेंस) लेनी होती है, लेकिन इस मामले में असम सरकार ने यह जिम्मेदारी खुद ली है. इसके अलावा, कोयला आपूर्ति के नियमों में भी केंद्र सरकार द्वारा विशेष छूट दी गई.
बिजली विभाग के कर्मचारियों और इंजीनियरों की समितियों ने इस समझौते का विरोध किया है. उनका कहना है कि राज्य की वर्तमान मांग केवल 2,500 मेगावाट के आसपास है, ऐसे में अचानक 3,200 मेगावाट का नया सौदा समझ से परे है. इससे सरकारी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा, जिसका बोझ अंततः जनता पर महंगे बिजली बिलों के रूप में आएगा.
हालांकि, असम के मुख्य सचिव रवि कोटा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि राज्य की बिजली मांग भविष्य में बढ़ेगी और यह सौदा बिजली की कमी को दूर करने के लिए जरूरी है. लेकिन, रिपोर्ट बताती है कि उनके सार्वजनिक लेख और सरकार के वास्तविक कदम विरोधाभासी हैं.
कुलमिलाकर, श्रीगिरीश की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि चुनाव से कुछ महीने पहले किया गया यह सौदा पारदर्शिता की कमी और नियमों की अनदेखी के कारण विवादों में है, जिससे राज्य के खजाने पर भारी चपत लग सकती है.
सुप्रीम कोर्ट ने गोद लेने के लिए मातृत्व अवकाश पर आयु सीमा को रद्द कर दिया.
डाउन टू अर्थ के नंदिता बनर्जी के रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में गोद लेने वाली माताओं के लिए मातृत्व अवकाश पर लगी उम्र सीमा को असंवैधानिक घोषित कर दिया है. पहले कानून के अनुसार केवल उन महिलाओं को मातृत्व अवकाश मिलता था, जो 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती थीं, जिससे कई माताएँ इस अधिकार से वंचित रह जाती थीं.
कोर्ट ने माना कि यह प्रावधान समानता के अधिकार के खिलाफ है और अनुचित भेदभाव पैदा करता है. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मातृत्व केवल बच्चे को जन्म देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी देखभाल, पालन-पोषण और भावनात्मक जुड़ाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
अब नए फैसले के अनुसार, गोद लेने वाली माँ को बच्चे की उम्र की परवाह किए बिना 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलेगा. कोर्ट ने यह भी माना कि गोद लेना भी एक वैध पारिवारिक विकल्प है और इसे समान सम्मान मिलना चाहिए.
यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने के साथ-साथ समाज में समानता और न्याय को बढ़ावा देता है, और दत्तक माताओं को भी बराबरी का दर्जा दिलाता है.
रसोई गैस की कमी पर सरकार के ‘सब ठीक है’ के दावे हकीकत
आर्टिकल 14 की बेतवा शर्मा की रिपोर्ट के अनुसार भारत में रसोई गैस (एलपीजी) की कमी को लेकर सरकार का “सब ठीक है” वाला दावा हकीकत से मेल नहीं खाता. सरकार का कहना है कि घरेलू आपूर्ति सामान्य है और लोग घबराकर अधिक बुकिंग कर रहे हैं, लेकिन वास्तविकता अलग है. कई इलाकों में गैस की कमी से छोटे व्यवसाय, ढाबे, रेस्तरां और सड़क किनारे खाने वाले विक्रेता प्रभावित हैं.
सरकारी प्राथमिकता घरेलू उपभोक्ताओं को देने और नियंत्रण के कारण व्यावसायिक गैस की आपूर्ति बाधित हुई है. इससे खाना बनाने और रोज़मर्रा की आजीविका पर असर पड़ा है. रिपोर्ट बताती है कि आपूर्ति की कमी और बाजार में असमान वितरण गरीब और असंगठित क्षेत्र के लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा के जोखिम पैदा कर रही है.
अर्णब के खिलाफ़ मानहानि के सम्मन
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अर्णब गोस्वामी और उनकी चैनल रिपब्लिक टीवी को कांग्रेस द्वारा दायर ₹2 करोड़ के मानहानि मुकदमे में समन जारी किया है. मामला मई 2025 के एक प्रसारण से जुड़ा है, जिसमें अर्णव गोस्वामी ने दावा किया था कि कांग्रेस पार्टी का एक अंतरराष्ट्रीय कार्यालय तुर्की में स्थित है. कांग्रेस ने इस दावे को झूठा और देशद्रोही बताया और ₹2 करोड़ हर्जाने की मांग की थी.
दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस पर सुनवाई करते हुए कहा कि दोनों पक्षों को जवाब देने का अवसर मिलेगा और अगली सुनवाई 19 मई को होगी. कांग्रेस का तर्क है कि इस प्रसारण ने उनकी छवि को नुकसान पहुँचाया और जनता में गलत धारणा फैलाई.
यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब चैनल ने इस्तांबुल में दिखाई गई एक बिल्डिंग को कांग्रेस का अंतरराष्ट्रीय कार्यालय बताया था. बाद में कई फैक्ट चेक्स में यह स्पष्ट हुआ कि वह भवन इस्तांबुल कांग्रेस सेंटर है, जिसे स्थानीय नगरपालिका द्वारा संचालित किया जाता है और इसका कांग्रेस से कोई लेना-देना नहीं है.
चैनल ने बाद में सार्वजनिक रूप से माफी भी जारी की थी. हालांकि, कांग्रेस ने कहा कि नुकसान पहले ही हो चुका है और कानूनी कार्रवाई जरूरी है.
भारत में कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग के बजट आवंटन में कटौती
डाउन टू अर्थ के राजू साजवान के रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कृषि अनुसंधान पर सरकारी खर्च धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. वित्तीय वर्ष 2021-22 में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग को कुल बजट का 0.24 मिलता था, जो 2026-27 में घटकर 0.19 प्रतिशत रह गया. संसदीय स्थायी समिति (कृषि, पशुपालन एवं खाद्य प्रसंस्करण) ने बजट कटौती पर गंभीर चिंता जताई है, खासकर तब जब विभाग ने 2047 तक कृषि उत्पादन 2.1 बिलियन टन तक बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. विभाग ने 11,427 करोड़ रुपए की मांग की थी, लेकिन वित्त मंत्रालय ने केवल 9,967 करोड़ रुपए का आवंटन किया.
समिति ने कहा कि लगातार कम बजट मिलने से अनुसंधान एवं विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं और नवाचार तथा तकनीकी विकास पर असर पड़ सकता है. कृषि अनुसंधान पर खर्च केवल 0.5-0.6 प्रतिशत कृषि जीडीपी है, जो वैश्विक औसत 0.93 प्रतिशत से कम है.
देश में 638 जिलों में 731 कृषि विज्ञान केंद्र हैं, लेकिन नए जिलों में 121 केंद्र खोलने की योजना में भूमि, अनुमतियों और वित्तीय संसाधन जैसी बाधाएं हैं. मौजूदा केंद्रों में लगभग 29 प्रतिशत पद रिक्त हैं. विभाग ने बताया कि सीमित संसाधनों के बावजूद प्राथमिक योजनाओं को चलाया जाएगा, लेकिन कुछ योजनाओं को टालना पड़ सकता है.
दैनिक भास्कर समेत कई मीडिया समूहों ने 2023 के वीडियो को ईरान-इज़राइल युद्ध का बताकर चलाया
ऑल्ट न्यूज़ के पवन कुमार के रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच 10 सेकंड का एक वीडियो सोशल मीडिया और कई मीडिया हाउस द्वारा शेयर किया गया. वीडियो में एक रोती महिला और सड़क पर जलती कारें दिखाई देती हैं. कई न्यूज चैनल्स और सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे हालिया ईरान-इज़राइल युद्ध से जोड़कर शेयर किया. भाजपा गुजरात के विदेश मामलों के संयोजक मनोज कपाड़िया ने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स पर इसे ईरानी मिसाइलों द्वारा पेटाह टिकवा, तेल अवीव पर हमले का वीडियो बताते हुए पोस्ट किया. इसी तरह, 4 मार्च 2026 को दैनिक भास्कर ने अपने हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करण में इसे हालिया विजुअल बताते हुए शेयर किया है.
‘ऑल्ट न्यूज़’ ने वीडियो का रिवर्स इमेज सर्च किया और पाया कि यह वीडियो वास्तविकता में 9 अक्टूबर 2023 को @AzukaDM द्वारा X-हैंडल पर अपलोड किया गया था. उस समय यह वीडियो इज़राइल-हमास युद्ध के दौरान अशदोद शहर में रॉकेट हमलों के बाद बताया गया था. फोर्ब्स ब्रेकिंग न्यूज़ और Sky न्यूज़ ने भी इस वीडियो को प्रकाशित किया था.
ऑल्ट न्यूज़ के मुताबिक यह वायरल वीडियो पुराना है, लेकिन कई मीडिया हाउस और सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे ईरान और इज़राइल के वर्तमान संघर्ष से जोड़कर गलत जानकारी फैलाई.
जेल से बाहर आए वांगचुक का पहला प्रेस संवाद
स्क्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत से रिहा होने के बाद प्रेस वार्ता को संबोधित किया और केंद्र सरकार के साथ संवाद की अपील की है. उन्होंने कहा कि सरकार और लद्दाख के लोगों के बीच ऐसा समाधान संभव है, जिससे दोनों पक्षों को लाभ हो और देश की वैश्विक छवि भी बेहतर हो.
वांगचुक लगभग साढ़े पाँच महीने से हिरासत में थे.उन्हें सितंबर 2025 में लद्दाख में राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के बाद गिरफ्तार किया गया था. इन प्रदर्शनों के दौरान झड़पों में कई लोग घायल हुए थे और पुलिस फायरिंग में चार लोगों की मौत हुई थी.
रिहाई के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में वांगचुक ने कहा कि वह सरकार के साथ रचनात्मक और प्रभावी बातचीत की उम्मीद करते हैं. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग जारी रहेगी और किसी भी समझौते में क्षेत्र के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा.
विश्लेषण
राकेश कायस्थ | क्या जस्टिस गोगोई को इतिहास माफ करेगा?
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई राज्यसभा का अपना कार्यकाल पूरा करके रिटायर हो गये. हर जगह खबर चल रही है कि अपने कार्यकाल के दौरान ना तो उन्होंने बहसों में हिस्सा लिया और ना सवाल पूछे. जस्टिस गोगोई का राज्यसभा में आना ही एक सवाल था. एक ऐसा सवाल जो प्रश्नवाचक फंदे की तरह भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के गले में उस वक्त तक पड़ा रहेगा, जब तक ये व्यवस्थाएं जीवित रहेंगी.
मौजूदा दौर को सिर्फ मोदी युग कहा जाता है लेकिन यह दौर रंजन गोगोई, ज्ञानेश गुप्ता और अर्णब गोस्वामी युग भी उतना ही है.
कहानी शुरू होती है, सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों के अचानक सड़क पर उतर आने के साथ. इन जजों ने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और इल्जाम लगाया कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा मुकदमों के बंटवारे में मनमानी कर रहे हैं.
जस्टिस मिश्रा कुछ खास वजहों से कुछ केस एक या विशेष जजों को देते हैं. न्याय व्यवस्था के लिए यह स्थिति अत्यंत खतरनाक है. अगर हम जनता के सामने आकर अपनी बात नहीं रखते तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करता.
दीपक मिश्रा ‘न्यायप्रिय’ मुख्य न्यायधीश के रूप में अपार ‘यश’ बटोर चुके थे. कुछ समय बाद रंजन गोगोई चीफ जस्टिस बने तो देश ने यह माना कि इंसाफ की सबसे ऊंची कुर्सी पर अब एक ऐसा आदमी बैठ चुका है, जो अदालतों के गिरते हुए सम्मान की गहरी चिंता है और अब स्थितियां बेहतर होंगी.
अपने कार्यकाल के दौरान ही जस्टिस गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट में काम करने वाली एक महिला ने यौन उत्पीड़न का इल्जाम लगाया. फिर खबर आई कि वह महिला गायब हो गई, शायद रहस्यमय परिस्थियों मे सस्पेंड कर दी गई.
उसके कुछ समय बाद राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया. फैसला आने से पहले बीजेपी लाखों की तादाद में छोट-छोटे बुकलेट छपवा चुकी थी कि निर्णय आने के बाद जनता के बीच किस तरह तरह जाएं और क्या कहें. ये बुकलेट पार्टी नेताओं से होते हुए पत्रकारों तक पहुंचने लगे थे. इससे साफ था कि पार्टी को पहले से पता है कि निर्णय क्या होगा.
विद्वान न्यायधीशों के खंडपीठ ने माना कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता, जिससे माना जा सके कि बाबरी मस्जिद को राम मंदिर तोड़कर ही बनाया गया था. टाइटिल सूट पर हुई सुनवाई में सभी पक्षों की समुचित प्रशंसा करने के बाद खंडपीठ ने निर्णय दिया कि राम मंदिर उसी विवादित स्थल पर बनेगा और बाबरी मस्जिद के लिए अलग से पांच एकड़ जमीन दी जाएगी.
जस्टिस गोगोई इसके बाद बड़ी शान से रिटायर हुए, सस्पेंड की गई महिला के बारे में खबर आई कि उसकी नौकरी फिर से बहाल हो गई है. अवकाश ग्रहण करते ही राष्ट्रपति ने जस्टिस गोगोई को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत कर दिया. उनसे जब ये पूछा गया कि क्या ये भ्रष्ट्राचार का मामला नहीं है तो जस्टिस गोगोई ने बेफिक्री से जवाब दिया-- भ्रष्टाचार करना ही होता तो क्या बदले में मैं इतनी छोटी चीज़ लेता.
आगे चलकर चीफ जस्टिस बने डी.वाई.चंद्रचूड़ ने एक इंटरव्यू में साफ किया कि राम जन्मभूमि की निर्णय प्रक्रिया में शामिल होते वक्त उन्हें ‘ ईश्वरीय प्रेरणा’ ने मदद दी. संघ के प्रिय ‘बुद्धिजीवी’ और नफरती भाषणों के लिए चर्चित रहे पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ जैसे लोगों ने जनसभाओं में खुलकर यह दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी खुद एक कागज लेकर जस्टिस गोगोई से मिले थे, जिसमें उनके कारनामों को कच्चा-चिट्ठा था. उसके बाद रामजन्मभूमि पर फैसला आया.
जो बातें अदालत के गलियारों में फुसफुसाहट के तौर पर सुनाई देती थी, वो सार्वजनिक हो गई. प्रशांत भूषण सरीखे लोग बकायदा खुलकर कह रहे हैं कि जजों की ब्लैकमेलिंग के लिए बीजेपी ने एक पूरा तंत्र बना रखा है.
इस दावे की प्रमाणिकता कोई साबित नहीं कर सकता लेकिन जस्टिस गोगोई के बाद से यह जरूर हुआ है कि अगर कोई ऊंची अदालत अगर अच्छी-अच्छी बातें करे तो जनता मान लेती है कि फैसला उसका ठीक उल्टा होगा.
अगर ईडी-सीबीआई को फटकार लगाई जाती है तो मान लिया जाता है कि महीनों से बंद किसी बेकसूर को बेल के लिए अभी और लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा. अगर संविधान की आत्मा को बचाने की बात हो तो ये साफ हो जाता है कि ऐसा कोई फैसला जरूर ऐसा आएगा जिससे संविधान और देश का संघीय ढांचा कमज़ोर होंगे. राम जन्मभूमि के बारे में लगातार मैं यह लिख रहा था कि अगर सरकार चाहे तो संविधान संशोधन जैसी किसी व्यवस्था से मंदिर बनवाने का रास्ता साफ कर सकती है. आपके एजेंडे में है, आप करवा लीजिये. 1990 को वक्त बहुत पीछे छूट चुका है लेकिन ऐसा लगता है कि इसके लिए जानबूझकर एक ऐसा रास्ता चुना गया जिससे इस देश के सर्वोच्च न्याय व्यवस्था हमेशा के लिए संदिग्ध हो गई.
जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि वो सामने नहीं आते तो इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं कर पाता. क्या जस्टिस गोगोई अकेले में दिल पर हाथ रखकर अपने आप से पूछ पाएंगे कि क्या वो वाकई माफी के लायक हैं?
चलते चलते
प्रगति सक्सेना : एक महिला सिनेमेटोग्राफ़र का बढ़ता जलवा
ऑटम ड्यूरॉल्ड आर्कापॉ सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफी के लिए ऑस्कर जीतने वाली पहली महिला बनीं और इस पुरस्कार की पहली ब्लैक विजेता भी.
यह पुरस्कार उन्हें बहुचर्चित सुपरनैचुरल थ्रिलर ‘ सिनर्स ‘ के लिए मिला. इससे पहले भी उन्होंने सिनर्स के निर्देशक रायन कुगलर के साथ बॉक्स ऑफिस हिट ‘ ब्लैक पैंथर : वाकांडा फॉरएवर’ में भी गजब की फोटोग्राफी की मिसाल दी थी.
अपने धन्यवाद भाषण में उन्होंने फिल्म ‘सिनर्स’ की टीम का शुक्रिया अदा किया और हॉल में मौजूद सभी महिलाओं से खड़े होने की गुजारिश की क्योंकि “यह आपकी वजह से ही है कि मैं यहां खड़ी हूं! “
हाल ही में अमेरिका की बदनाम ऐप्सटीन फाइल्स ने दुनिया भर की राजनीति को झकझोर दिया है और उसमें दर्ज कमउम्र लड़कियों के शोषण से जुड़े दिल दहला देने वाले ब्यौरे सामने आ रहे हैं, ऐसे में ऑस्कर पुरस्कारों में महिलाओं की यह उपलब्धि मायने रखती है. सिनेमेटोग्राफी के क्षेत्र में ऑस्कर पुरस्कारों के 98 वर्षों के इतिहास में अब तक सिर्फ चार महिला सिनेमेटोग्राफर्स नामित हुई हैं. इसे अभी तक पुरुष वर्चस्व वाला काम ही माना जाता रहा है.
कैलिफोर्निया में जन्मी 46 वर्षीय आर्कापॉ फिल्म शूटिंग के दौरान आईमैक्स एंड अल्ट्रा पैनाविजन 70 के करीब 30 किलोग्राम वजन वाले कैमरे का संचालन खुद ही करती थीं. यह अपने आप में एक बड़ी जिम्मेदारी थी. निर्देशक कुगलर उनके साथ लगातार बने रहते थे, इतना कि कई बार आर्कापॉ को उन्हें दूर खड़े होने के लिए कहना पड़ता.
आर्कापॉ की मां फिलिपिनो और पिता ब्लैक क्रियोल मूल के हैं. फिल्म के निर्देशक की तरह वे भी मिसिसिपी और न्यू ऑर्लिंस में पली बढ़ी जहां यह फिल्म शूट की गई है.
चूंकि उन्हें पता था कि फिल्म निर्देशक के निजी संस्मरणों और अनुभवों पर आधारित है, तो वे भी शूटिंग के दौरान स्मृतियों और पूर्वजों के इतिहास का जिम्मा महसूस करती रहीं. लेकिन सुपरनैचुरल तत्व ना सिर्फ ग्रांड था बल्कि उसे फिल्माना मुश्किल भी था. और उसके बाद ऐसी फिल्म को हॉलीवुड के बाजार में बेचना भी एक बड़ी चुनौती थी. बहरहाल, इस फिल्म ने बॉक्सऑफिस पर अच्छा कारोबार किया और समीक्षकों ने भी इसे बहुत सराहा.
आर्कापॉ हमेशा से एक ‘ भव्य ‘ और ‘ बड़ा ‘ काम करना चाहती थीं. यह फिल्म उनकी इसी इच्छा को सशक्त तौर से पर्दे पर उकरती है.
बेशक वे एक बेहतरीन महिला सिनेमेटोग्राफर के रूप में तो उभरी ही हैं, साथ ही वे अमरीकी संस्कृति के मूल में निहित विविध संस्कृतीय, बहुनस्लीय विशिष्टता को भी उजागर करती हैं जो अमरीकी समाज को पोसती है, उसे समावेशी बनाता है, लेकिन अफसोस, आज राजनीतिक माहौल इसी के खिलाफ भी हो गया है.
अपील :
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