18/02/2026: आरएसएस में जाति को लेकर भागवत और मेघवंशी में फर्क | एआई समिट की छीछालेदर जारी | बस्तर में माइनिंग और आदिवासियों का हक | पढ़िये मंटो के टैटवाल का कुत्ता | कश्मीर डर के साये में
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आज की सुर्खियां
मोहन भागवत का ‘जाति मुक्त’ दावा बनाम एक दलित स्वयंसेवक का कड़वा अनुभव
मोदी के समिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीनी रोबोट को बताया ‘मेड इन इंडिया’
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद रोकने के लिए 50-30-20 फ़ॉर्मूले का सुझाव
विजय माल्या ने कोर्ट से कहा- पासपोर्ट नहीं है, भारत कब आऊँगा पता नहीं
महाराष्ट्र सरकार ने मुस्लिम आरक्षण की प्रक्रिया को पूरी तरह रद्द किया
छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों के शव उखाड़ने पर सुप्रीम कोर्ट सख़्त
पर्यटकों के लिए जन्नत, लेकिन हक़ीक़त में ‘खुली जेल’ जैसा माहौल
इज़राइल के ख़िलाफ़ 85 देशों का प्रस्ताव, भारत ने बनाई दूरी
मोहन भागवत बनाम भंवर मेघवंशी: संघ के दावों पर एक दलित स्वयंसेवक का सवाल
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भगवत हालिया वक़्त में लगातार जाति और सामाजिक समरसता के प्रश्न पर मुखर होते नज़र आए हैं. लखनऊ के निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित सामाजिक समरसता बैठक में उन्होंने स्पष्ट कहा कि जातियाँ संघर्ष का कारण नहीं बननी चाहिए. उनके अनुसार अगर समाज में अपनापन और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना बढ़े, तो भेदभाव अपने आप कम हो जाएगा और धीरे-धीरे खत्म हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि “जो पीछे रह गए हैं, उन्हें उठाना समाज की ज़िम्मेदारी है” और प्रगति संघर्ष से नहीं, समन्वय से होती है.
इससे पहले मुंबई में संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम में भागवत ने कहा था कि आज जाति का अस्तित्व सिर्फ़ राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बचा हुआ है. उनका तर्क था कि पारंपरिक पेशागत आधार अब समाप्त हो चुका है, लेकिन समाज के मन में जातिवाद है, जिसे नेता वोट के लिए इस्तेमाल करते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि संघ का अगला सरसंघचालक “सिर्फ हिंदू” होगा, वह किसी जातिगत पहचान से परिभाषित नहीं होगा.
अलीगढ़ में स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए उन्होंने “एक कुआँ, एक मंदिर, एक श्मशान” का सिद्धांत रखा और कहा कि सामाजिक समरसता के बिना हिंदू एकता संभव नहीं है. भागवत ने यह भी दोहराया कि संघ आरक्षण का समर्थन करता है और जब तक जाति-आधारित भेदभाव समाप्त नहीं होता, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए.
संघ की इस वैचारिकी में “समाज” एक ऐसी इकाई के रूप में सामने आता है जहाँ शाखाओं में विभिन्न जातियों के लोग साथ बैठते-खाते हैं और भेदभाव को व्यवहारिक स्तर पर खत्म करने का प्रयास किया जाता है.
लेकिन इसी संगठन के भीतर का एक भिन्न अनुभव राजस्थान के दलित कार्यकर्ता और लेखक भंवर मेघवंशी ने अपनी किताब’ मैं एक कारसेवक था’ में बताते हैं की संघ में कारसेवक के तौर पर काम करने के दौरान उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा और इस वजह से उन्हें संघ भी छोड़ना पड़ा.
द “कारवां” में दिए गए एक इंटरव्यू में भंवर मेघवंशी ने बताया कि वह 1987 से 1991 के बीच संघ से जुड़े रहे. वह 13 साल के थे जब शाखा से जुड़कर उन्होंने स्वयं को हिंदू राष्ट्र के विचार के लिए समर्पित किया और 1990 की कारसेवा में भाग लेने अयोध्या निकल गए थे.
उनके जीवन में शाखा छोड़ने का निर्णायक मोड़ 1991 में आया, जब भिलवाड़ा की एक रैली के बाद उनके घर पर तैयार भोजन को संघ से जुड़े लोगों ने स्वीकार तो किया, लेकिन बाद में उसे फेंक दिया गया, सिर्फ इसलिए की उनका ताल्लुक़ एक दलित परिवार से था. मेघवंशी के अनुसार, जब उन्होंने पूर्णकालिक प्रचारक बनने की इच्छा जताई, तो उन्हें संकेत दिया गया कि उनकी जाति संगठन के लिए असुविधा पैदा कर सकती है.
यह अनुभव उनके लिए वैचारिक मोहभंग का कारण बना. उन्होंने संगठन छोड़ दिया और बाद में पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हुए. उनका मूल प्रश्न था कि जिस हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए वे समर्पित थे, उसमें दलित की वास्तविक जगह क्या है?
एक तरफ संघ नेतृत्व बड़े मंचों से जाति-भेद खत्म करने, सामाजिक समरसता लाने और “सिर्फ हिंदू” की पहचान का दावा करता है. शब्दों में बराबरी, अपनत्व और एकता की बात होती है. लेकिन दूसरी तरफ एक पूर्व स्वयंसेवक का अनुभव यह सवाल खड़ा करता है कि क्या ये बातें सिर्फ भाषणों तक सीमित हैं? यदि व्यवहार में जाति की दीवारें अब भी कायम हैं, तो “सिर्फ हिंदू” का दावा कितना सच है?
मोहन भागवत का दावा कि संघ प्रमुख बनने के लिए जाति बाधा नहीं, पर अभी तक ब्राह्मणों को ही मिला
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने पिछले सप्ताह मुंबई में एक अहम बयान दिया. उन्होंने कहा कि “कोई भी हिंदू, चाहे उसकी जाति कुछ भी हो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरसंघचालक बन सकता है.” हालाँकि, संघ के अब तक के इतिहास और शीर्ष पद पर रहे व्यक्तियों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि यह पद पारंपरिक रूप से उच्च जातियों, विशेषकर ब्राह्मणों के पास ही रहा है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि संघ में शीर्ष कार्यकारी पद यानी ‘सरकार्यवाह’ के लिए तो चुनाव की एक स्पष्ट प्रक्रिया है, लेकिन ‘सरसंघचालक’ के पद के लिए कोई चुनाव नहीं होता. संघ की परंपरा के अनुसार, मौजूदा सरसंघचालक के पास यह विशेषाधिकार होता है कि वह अपने उत्तराधिकारी का चयन करे. सरसंघचालक को संगठन का मार्गदर्शक और दार्शनिक माना जाता है और उन्हें एक विशेष ‘सरसंघचालक प्रणाम’ दिया जाता है. वहीं, कार्यकारी प्रमुख ‘सरकार्यवाह’ (महासचिव) होते हैं, जिनका चुनाव नागपुर में हर तीन साल में ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ (ABPS) द्वारा किया जाता है. सरसंघचालक और सरकार्यवाह जैसे पदनामों पर मराठी भाषा का प्रभाव स्पष्ट है, क्योंकि संघ की स्थापना 1925 में महाराष्ट्र के नागपुर में हुई थी.
संघ के नेतृत्व का इतिहास बताता है कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (नागपुर के एक ब्राह्मण) ने संघ की स्थापना की और 1940 में अपनी मृत्यु तक इसके प्रमुख रहे. उन्होंने एक बंद लिफ़ाफ़े में अपने उत्तराधिकारी का नाम छोड़ा था, जो 33 वर्षीय एम.एस. गोलवलकर थे. गोलवलकर भी ब्राह्मण थे. गोलवलकर ने 33 वर्षों तक संघ का नेतृत्व किया और उन्होंने भी हेडगेवार की तरह ही एक बंद लिफ़ाफ़े के ज़रिए अपना उत्तराधिकारी चुना. 1973 में उनकी मृत्यु के बाद लिफ़ाफ़ा खोला गया और बालासाहब देवरस (ब्राह्मण) का नाम सामने आया.
हालाँकि, देवरस ने इस परंपरा में थोड़ा बदलाव किया. अपने गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए उन्होंने अपने जीवनकाल में ही 1994 में अपने उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी. उन्होंने राजेंद्र सिंह, जिन्हें रज्जू भैया के नाम से जाना जाता है, को अगला सरसंघचालक नियुक्त किया. रज्जू भैया संघ के इतिहास में अब तक के एकमात्र ‘गैर-ब्राह्मण’ सरसंघचालक रहे हैं. वे मूल रूप से बुलंदशहर के एक ठाकुर (राजपूत) परिवार से थे और उन्होंने इलाहाबाद में भौतिकी पढ़ाई और पढ़ाई भी थी. उनका कार्यकाल सबसे छोटा (लगभग 6 साल) रहा.
वर्ष 2000 में, रज्जू भैया ने गिरते स्वास्थ्य के कारण पद छोड़ दिया और के.एस. सुदर्शन को अपना उत्तराधिकारी चुना. सुदर्शन कर्नाटक के एक ब्राह्मण परिवार से थे. इसके बाद 2009 में एक नाटकीय घटनाक्रम में, सुदर्शन ने खराब याददाश्त और स्वास्थ्य का हवाला देते हुए पद छोड़ दिया और मोहन भागवत को सरसंघचालक की ज़िम्मेदारी सौंपी. मोहन भागवत, जो उस समय सरकार्यवाह थे, एक पशु चिकित्सक हैं और महाराष्ट्र के चंद्रपुर के ब्राह्मण परिवार से आते हैं. रज्जू भैया को छोड़कर, संघ के सभी सरसंघचालक ब्राह्मण ही रहे हैं. भागवत आपातकाल के दौरान प्रचारक बने थे और वे गोलवलकर की मृत्यु के बाद प्रचारक बनने वाले पहले सरसंघचालक हैं.
मोदी की पसंदीदा गिलगोटिया यूनिवर्सिटी रातोंरात पूरी दुनिया में फेमस हुई, भारत का मज़ाक उड़ना जारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रचारित भारत के पहले प्रमुख एआई समिट, इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में गलगोटियास विश्वविद्यालय को बड़ा झटका लगा है. विश्वविद्यालय को अपने स्टॉल को खाली करने का आदेश दिया गया, क्योंकि उसने एक चीनी कंपनी द्वारा निर्मित रोबोट डॉग को अपनी खुद की इनोवेशन के रूप में पेश किया. यह घटना समिट के आयोजकों के लिए बड़ी शर्मिंदगी का कारण बनी, क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी इस वीडियो को अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर शेयर किया था, जो बाद में बैकलैश का शिकार हुआ.
वायरल वीडियो में विश्वविद्यालय की कम्युनिकेशंस प्रोफेसर नेहा सिंह ने रोबोट को ‘ओरियन’ नाम से पेश करते हुए दावा किया कि इसे गलगोटियास के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने विकसित किया है. हालांकि, सोशल मीडिया यूजर्स ने जल्द ही इसे चीनी फर्म यूनिट्री रोबोटिक्स का गो2 मॉडल बताया, जो व्यावसायिक रूप से उपलब्ध है और करीब 2,200 अमेरिकी डॉलर में खरीदा जा सकता है. इसके अलावा, विश्वविद्यालय ने एक ‘ड्रोन सॉकर एरिना’ को भी अपनी इन-हाउस इनोवेशन बताया, लेकिन इसे कोरियाई उत्पाद के रूप में पहचाना गया, जिससे विवाद और बढ़ गया.
सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं. विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे ‘वैश्विक हंसी का पात्र’ बताते हुए मोदी सरकार पर निशाना साधा और कहा कि यह एआई के मामले में भारत को हास्यास्पद बना रहा है. एक्स (पूर्व ट्विटर) पर यूजर्स ने इसे ‘राष्ट्रीय शर्मिंदगी’ करार दिया, जिसमें एक यूजर ने लिखा कि यह मोदी की शिक्षा नीति का उदाहरण है जहां ब्रांडिंग और फोटो-ऑप्स को असली रिसर्च से ज्यादा महत्व दिया जाता है. पत्रकार और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने इसे मोदी से जुड़े फ्रॉड का हिस्सा बताया, जबकि सागरिका घोष ने समिट को ‘फोटोजीवी’ मोदी की पीआर की असफलता करार दिया.
मोदी से संबंध: प्रधानमंत्री मोदी ने पहले गलगोटियास को ‘टॉप’ प्राइवेट यूनिवर्सिटी के रूप में मान्यता दी थी और व्यक्तिगत रूप से ‘डीक्यू आईसीटी’ अवॉर्ड प्रदान किया था. “आलोचक कहते हैं कि यह मोदी के शिक्षा मॉडल को दर्शाता है, जहां आयातित तकनीक को री-पैकेज करके पेश किया जाता है, जबकि असली भारतीय टैलेंट को दरकिनार किया जाता है.
वैश्विक प्रभाव: बीबीसी, रॉयटर्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस घटना को कवर किया, भारत की एआई महत्वाकांक्षाओं पर सवाल उठाते हुए इसे बड़ा झटका बताया. विश्वविद्यालय ने सफाई दी कि यह ‘गलतफहमी’ है और उन्होंने कभी निर्माण का दावा नहीं किया, लेकिन नेटिजेंस ने इसे ‘शर्मनाक’ बताते हुए खारिज कर दिया. यह घटना गलगोटियास के पिछले विवादों को भी याद दिलाती है, जैसे 2024 में छात्रों का अज्ञानतापूर्ण विरोध प्रदर्शन, जो ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के रूप में वायरल हुआ था.
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट (विभिन्न एजेंसियों के इनपुट के साथ) के अनुसार, दिल्ली में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 एक्सपो में चीन निर्मित रोबोट डॉग्स का जलवा देखने को मिला, लेकिन बाद में वे गायब हो गए. एक्सपो के दूसरे दिन ये रोबोट डॉग्स प्रदर्शनी हॉल में आम थे. कई कंपनियों ने प्रदर्शित किया कि कैसे इनका उपयोग सुरक्षा, निगरानी और तेल रिग्स जैसी खतरनाक जगहों पर किया जा सकता है. इनमें से एक रोबोट डॉग तो केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा पोस्ट किए गए (और अब डिलीट किए जा चुके) एक वीडियो में भी नज़र आया था.
लेकिन तीसरे दिन इनमें से ज्यादातर डॉग्स गायब हो गए. इन रोबोट डॉग्स का गायब होना गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा प्रदर्शित “ओरियन” नामक रोबोट डॉग से जुड़े विवाद के बाद हुआ, जो वास्तव में चीन निर्मित था, न कि कोई इन-हाउस इनोवेशन. सोशल मीडिया यूज़र्स ने खुलासा किया कि यह चीन की यूनिट्री रोबोटिक्स द्वारा बेचा जाने वाला ‘यूनिट्री गो2’ था, जिसकी कीमत लगभग 2,800 डॉलर है और वैश्विक स्तर पर इसका उपयोग शोध के लिए किया जाता है.
बुधवार सुबह पीटीआई, रॉयटर्स, एनडीटीवी और सीएनएन न्यूज़ 18 जैसी समाचार एजेंसियों और चैनलों ने अज्ञात सूत्रों के हवाले से बताया कि ग्रेटर नोएडा की इस निजी यूनिवर्सिटी को एक्सपो से अपना स्टॉल हटाने के लिए कह दिया गया था. पीटीआई ने बताया कि बुधवार दोपहर करीब 2 बजे उनके स्टॉल की बिजली काट दी गई और बैरिकेड्स लगा दिए गए. यूनिवर्सिटी ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी यह दावा नहीं किया कि रोबोट डॉग को उन्होंने खुद विकसित किया है, हालांकि दूरदर्शन की एक अब डिलीट की जा चुकी वीडियो क्लिप कुछ और ही कहानी बयां कर रही थी. यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों ने कहा कि दूरदर्शन के साक्षात्कार की “गलत व्याख्या” की गई.
सॉफ्टवेयर दिग्गज विप्रो ने भी एक रोबोट डॉग प्रदर्शित किया था जो यूनिट्री गो2 के समान दिखता था. हालांकि विप्रो या किसी अन्य संगठन ने इसे खुद विकसित करने का दावा नहीं किया था, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि भारत को एक तकनीकी दिग्गज के रूप में प्रदर्शित करने वाले आयोजन में चीन निर्मित गैजेट को गर्व का स्थान क्यों मिलना चाहिए.
इस घटना का हवाला देते हुए कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर कहा कि मोदी सरकार ने एआई को लेकर वैश्विक स्तर पर भारत का मज़ाक बना दिया है. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने टिप्पणी की कि भारत की प्रतिभा और डेटा का लाभ उठाने के बजाय, यह एआई शिखर सम्मेलन एक अव्यवस्थित पीआर तमाशा बन गया है, जहां भारतीय डेटा बिक्री के लिए है और चीनी उत्पादों का प्रदर्शन किया जा रहा है.
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित यह समिट शनिवार तक चलेगा. इसे ग्लोबल साउथ में आयोजित पहली बड़ी एआई सभा बताया जा रहा है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गूगल के सुंदर पिचाई, ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन और एंथ्रोपिक के डारियो एमोदेई जैसे दिग्गज शामिल हैं. इस समिट में 100 अरब डॉलर से अधिक के निवेश का संकल्प भी लिया गया है.
एआई समिट एक्सपो में चोरी हुए उपकरण मिलने पर टेक सीईओ ने दिल्ली पुलिस को दिया धन्यवाद, ऑनलाइन हुए ट्रोल
‘द टेलीग्राफ’ की ब्यूरो रिपोर्ट के अनुसार, एक टेक्नोलॉजी उद्यमी, जिन्होंने सोमवार को इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 एक्सपो से अपनी कंपनी के पहनने योग्य (वियरेबल) उपकरणों के चोरी होने की बात कही थी, उन्होंने मंगलवार रात उपकरण बरामद करने के लिए दिल्ली पुलिस को धन्यवाद दिया. लेकिन इसके तुरंत बाद वह ऑनलाइन ट्रोल्स के निशाने पर आ गए.
नियो सेपियंस के सह-संस्थापक और सीईओ धनंजय यादव ने यह उम्मीद करते हुए अपने उपकरण एक्सपो में छोड़ दिए थे कि शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नज़र उन पर पड़े. यह स्पष्ट नहीं है कि प्रधानमंत्री ने उन उपकरणों की झलक देखी या नहीं, क्योंकि यादव ने उनके चोरी होने की सूचना दे दी थी. एक दिन बाद, यादव ने “सुपर फास्ट” प्रतिक्रिया और उपकरणों की बरामदगी के लिए दिल्ली पुलिस को धन्यवाद दिया. यादव ने अपने ‘एक्स’ हैंडल पर पोस्ट किया, “सभी को अपडेट करना चाहता हूं कि हमारे डिवाइस बरामद कर लिए गए हैं. सुपर फास्ट प्रतिक्रिया और समर्थन के लिए दिल्ली पुलिस को बहुत-बहुत धन्यवाद.”
लेकिन इसके बाद सोशल मीडिया पर सवालों की झड़ी लग गई. संदीप रॉय (वागाबोंग) नामक एक यूज़र ने पूछा: “तो, यहां क्या हुआ? चोर कौन थे? इसका पता कैसे लगाया गया और कैसे बरामद किया गया?” एक अन्य यूज़र ने लिखा, “भाई, कृपया एफआईआर की कॉपी और उस पर हुई कार्रवाई साझा करें. इतनी कड़ी सुरक्षा में इसे किसने चुराया? ज़ाहिर तौर पर टॉम क्रूज़ ने नहीं.”
सोमवार को अपनी लंबी पोस्ट में यादव ने बताया था कि उन्हें अपने वियरेबल्स (कंपनी का दावा है कि वह भारत का पहला पेटेंट एआई वियरेबल बना रही है) को पीछे छोड़ने के लिए कहा गया था. यादव ने कहा था कि सोमवार दोपहर 12 बजे से शाम 6 बजे तक गेट बंद थे. उन्होंने निराशा जताते हुए लिखा था कि भारी-भरकम खर्च और लॉजिस्टिक्स के बाद एक उच्च-सुरक्षा ज़ोन से उपकरणों का गायब होना बेहद निराशाजनक है.
पुलिस को धन्यवाद देने के बाद, कुछ लोगों को आश्चर्य हुआ कि क्या वह राजनीतिक दबाव में थे. एक यूज़र ने तंज़ कसते हुए कहा, “अगर आपको यह पोस्ट करने के लिए मजबूर किया जा रहा है तो दो बार पलकें झपकाएं.” एक अन्य यूज़र ने चुटकी लेते हुए कहा: “शानदार. वे 6 साल में कोमल शर्मा को नहीं ढूंढ पाए हैं!!” ज्ञात हो कि जनवरी 2020 में जेएनयू छात्रों पर हमले के वीडियो में नकाबपोश महिला की पहचान कोमल शर्मा के रूप में हुई थी, जिसे कभी गिरफ्तार नहीं किया जा सका.
सआदत हसन मंटो | टेटवाल का कुत्ता
कुत्ते को लेकर पढ़िये मंटो की शानदार कहानी, टेटवाल का कुत्ता
चीनी रोबोडॉग को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया, देश और दुनिया में गलगोटिया यूनिवर्सिटी, मंत्री के पोस्ट, और उसके बाद की कार्रवाई देखते हुए ‘हरकारा’ को मंटो की यह शानदार कहानी याद आई, जिसमें इंसान अपनी कमतरी का शिकार कुत्ते को बनाता है. जैसे भारत मंडपम में रोबोडॉग के साथ हो गया.
जमादार हरनाम सिंह ने बिस्कुट फेंका जो कुत्ते ने फ़ौरन दबोच लिया. एक जवान ने अपने बूट की एड़ी से ज़मीन खोदते हुए कहा, “अब कुत्तों को भी या तो हिंदुस्तानी होना पड़ेगा या पाकिस्तानी!”
जमादार ने अपने थैले से एक बिस्कुट निकाला और फेंका, “पाकिस्तानियों की तरह पाकिस्तानी कुत्ते भी गोली से उड़ा दिए जाऐंगे!”
एक ने ज़ोर से नारा बुलंद किया, “हिंदुस्तान ज़िंदाबाद!”
कुत्ता जो बिस्कुट उठाने के लिए आगे बढ़ा था डर के पीछे हट गया. उसकी दुम टांगों के अंदर घुस गई. जमादार हरनाम सिंह हंसा, “अपने नारे से क्यों डरता है चपड़ झुन झुन... खा... ले एक और ले.” उसने थैले से एक और बिस्कुट निकाल कर उसे दिया.
पूरी कहाना पढ़िये रेख्ता की वेबसाइट पर
शुभ्रांशु चौधरी : माओवादियों के बाद जंगलों में माइनिंग के नए प्रतिमान बनाने का समय!
माओवादी आंदोलन अभी ख़त्म नहीं हुआ है लेकिन सरकार ने मध्य भारत में नई माइनिंग परियोजनाओं में तेज़ी लाना शुरू कर दिया है. और लोग ग़ुस्से में विरोध कर रहे हैं. माओवादी हों या न हों, अब तक यह सबको साफ़ हो जाना चाहिए कि यहाँ हिंसा के बिना माइनिंग अब संभव नहीं है.
लेकिन अगर भारत को अभी भी माइनिंग की ज़रूरत है तो क्या हम किसी बेहतर मॉडल के बारे में सोच सकते हैं ताकि लोग विरोध करना बंद कर दें? इसका जवाब ढूँढने के लिए मैंने छत्तीसगढ़ में माइनिंग के इतिहास को देखना शुरू किया. हालाँकि ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने 19वीं सदी के अंत में बुनियादी जाँच-पड़ताल की थी, लेकिन असल शुरुआत महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के साथ हुई, जिन्होंने 1912 में भूवैज्ञानिकों को बुलाया था.
महाराजा ने 1948 में स्वतंत्र भारत को सौंपे जाने तक अपने कोरिया नाम के राज्य में (जो अब उत्तरी छत्तीसगढ़ में है) माइनिंग पर 5% लेवी लगाई थी. लेकिन लोकतांत्रिक भारत में यह राशि ख़तरनाक अनुपात तक बढ़ती गई है और आज 75% तक पहुँच गई है.
हालाँकि प्रदर्शनकारी “सरकार द्वारा कंपनियों के लिए गंदा काम करने” की बात करते हैं, लेकिन अगर कोई फाइनेंस को देखे तो कहानी अलग है. यह सुनने में हैरान करने वाला लग सकता है, लेकिन आज के भारत में सरकारें (केंद्र और राज्य मिलकर) माइनिंग से पैदा हुई दौलत का लगभग 75% हिस्सा ले लेती हैं और कंपनियों को मौजूदा 75-5-20 मॉडल में लगभग 20% मिलता है. लोगों को लगभग 5% या उससे कम मिल रहा है (सिर्फ़ पिछले 10 सालों से), जब से डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड (डीएमएफ) का विचार सामने आया था.
अफ़सरशाही से भरे डीएमएफ ने लोगों की ज़्यादा मदद नहीं की है और अब लोगों को हिस्सेदार बनाकर मुनाफ़े में उनका हिस्सा 30% तक बढ़ाने की ज़रूरत है. चुनाव जीतने की तरह, विरोध कर रहे आदिवासियों का दिल और दिमाग़ जीतने के लिए यहाँ भी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) आज़माए जाने चाहिए.
दुनिया की ज़्यादातर सरकारें माइनिंग से पैदा हुई दौलत का 50% से कम हिस्सा रखती हैं. यहाँ मॉडल 50-30-20 होना चाहिए, जिसमें 50% दौलत राष्ट्र निर्माण के लिए बाक़ी देश (सरकार) के लिए, 30% स्थानीय लोगों के लिए और 20% कंपनी के लिए हो. महाराजा के 5% से 75% तक पहुँचना एक बड़ी छलांग है!
यह स्थानीय लोगों के लिए भी एक बड़ी छलांग लगती है, लेकिन अगर हम आँकड़ों को देखें तो यह तर्कसंगत लगने लगता है. फ़िलहाल सरकारें बस्तर जैसी जगहों पर माओवादियों से लड़ने के लिए हर साल 3-4000 करोड़ से ज़्यादा ख़र्च कर रही हैं (किसी स्पष्ट डेटा की कमी में कुछ लोग इसका हिसाब इससे दोगुना लगाते हैं). अगर सरकार सुरक्षा बजट को लोगों की तरफ़ मोड़ दे, तो हम उस जादुई आँकड़े तक पहुँच सकते हैं.
कोरिया के महाराजा के समय में जब यहाँ माइनिंग शुरू हुई थी, तब लोगों के पास ज़मीन का कोई मालिकाना हक़ नहीं था. लेकिन स्वतंत्र भारत में उस “ऐतिहासिक अन्याय को पलट दिया गया है” और फ़ॉरेस्ट राइट्स एक्ट (वन अधिकार क़ानून) के बाद लोग वन भूमि के मालिक हैं और उन्हें जंगल के नीचे की दौलत का भी मालिक माना जाना चाहिए, अगर क़ानूनी तौर पर अभी नहीं तो तार्किक तौर पर ही सही. यह राजनीतिक रूप से समझ में आना चाहिए.
केंद्र और राज्य मिलकर छत्तीसगढ़ से माइनिंग के ज़रिये हर साल लगभग 25-30,000 करोड़ कमाते हैं. अगर आप इसमें से सुरक्षा ख़र्च निकाल दें, तो आप दक्षिण बस्तर के सभी ग्रामीण और इनकम टैक्स न देने वाले परिवारों को लाभांश के रूप में लगभग 5,000 रुपये प्रति माह सीधे दे सकते हैं.
उत्तर बस्तर और उत्तरी छत्तीसगढ़ के माइनिंग इलाक़ों में घनत्व ज़्यादा है, लेकिन वहाँ भी हर ग्रामीण परिवार को 5, 10, 15-25 kms के दायरे में (और सड़क किनारे के गाँव जहाँ लोग प्रभावित होते हैं) इसी तरह की राशि दी जा सकती है, जो खदानों से नज़दीकी के हिसाब से घटते क्रम में हो.
2011 की जनगणना के अनुसार बस्तर संभाग की कुल आबादी 39 लाख है, तो अगर सरकार सुरक्षा पर 3-4000 करोड़ ख़र्च कर रही थी, तो यह लगभग 5000 प्रति परिवार प्रति माह होता है. और वही राशि पुलिस से लोगों की तरफ़ मोड़ने से इस क्षेत्र में शांति और माइनिंग दोनों आ सकते हैं!
ये डीबीटी मुनाफ़े का एक हिस्सा होंगे, इसलिए पूरी तरह से मुनाफ़े पर निर्भर करेंगे. तो अगर माइनिंग नहीं, तो डीबीटी नहीं. लोग इसलिए विरोध करते हैं क्योंकि पिछले 100 सालों में उन्हें माइनिंग से लगभग कुछ नहीं मिला. पिछले 10 सालों में डीएमएफ ने भी उनकी बहुत कम मदद की है, जिसे डीबीटी बदल सकता है.
कंपनियों को यहाँ स्थानीय लोगों की मदद करनी चाहिए क्योंकि इस नए मॉडल में उनके मुनाफ़े का अनुपात बदलता नहीं है और उन्हें सहयोगी के रूप में लोग मिल जाते हैं, जो फ़िलहाल सोचते हैं कि सरकार कंपनी के लिए सारा गंदा काम कर रही है, जबकि हक़ीक़त सरकार के हिस्से में बदलाव की माँग करती है!
और लोगों को भी कंपनी के साथ काम करना चाहिए क्योंकि अगर कंपनी नहीं होगी, तो कोई मुनाफ़ा नहीं होगा और कोई डीबीटी नहीं होगा. हालाँकि माइनिंग वन क्षेत्रों के 10% से कम भौगोलिक हिस्से को कवर करती है, लेकिन माइनिंग में राशि वानिकी के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बड़ी होती है.
हर परिवार की आमदनी दोगुनी करने के लिए हमें संभावित वानिकी को-ऑपरेटिव परियोजनाओं पर भी काम करना होगा, जैसे कि अबूझमाड़ महुआ यूनियन लिमिटेड (एएमयूएल), जहाँ महुआ शराब बेचने का मुनाफ़ा वापस हर परिवार के पास जाएगा. पुराने तरीक़े की महुआ शराब की फ़ैक्टरियाँ आदिवासियों की मदद नहीं करेंगी.
सरकार अभी भी 31 मार्च 2026 तक मध्य भारत को माओवादियों से मुक्त करने की बात कर रही है. इन वन क्षेत्रों के लिए नए वित्तीय वर्ष में नए उपाय होने होंगे जो बहुमत की मदद करें, वरना यह अलग बोतलों में वही पुरानी शराब होगी और जवाबी हिंसा वापस आएगी.
यह मध्य भारत के लिए 15 अगस्त 1947 का पल है. इसका पूरा श्रेय सरकार को दिया जाना चाहिए. लेकिन साथ ही इस जीत को लंबा चलाने के लिए उन्हें दूरदर्शी होने की ज़रूरत है. मध्य भारत के जंगलों को भी अपने 26 जनवरी 1950 के पल की ज़रूरत होगी! एक नया संविधान?
भगोड़े विजय माल्या ने कहा, वह भारत नहीं लौट सकता; कोर्ट को वजह बताई
भगोड़े व्यवसायी विजय माल्या ने बुधवार को बॉम्बे हाईकोर्ट को सूचित किया कि वह यह बताने में असमर्थ हैं कि वह भारत कब लौटेंगे. उन्होंने इसके पीछे यूनाइटेड किंगडम (यूके) छोड़ने पर लगी कानूनी पाबंदियों का हवाला दिया.
‘पीटीआई’ के अनुसार, अपने वकील अमित देसाई के माध्यम से प्रस्तुत एक बयान में, माल्या ने कहा कि उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया गया है, इसलिए वह अपनी वापसी के लिए कोई निश्चित समयसीमा नहीं बता सकते.
यह बयान मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अनखड़ की पीठ द्वारा पिछले सप्ताह दी गई चेतावनी के बाद आया है. पीठ ने स्पष्ट कर दिया था कि जब तक माल्या भारत नहीं लौटते, अदालत उन्हें ‘भगोड़ा आर्थिक अपराधी’ घोषित करने वाले आदेश को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सुनवाई नहीं करेगी. अदालत ने पूर्व शराब कारोबारी से यह स्पष्ट करने को कहा था कि क्या उनका देश वापस आने का इरादा है.
माल्या, जो 2016 से यूके में रह रहे हैं, ने हाईकोर्ट के समक्ष दो याचिकाएं दायर की हैं. एक याचिका खुद को ‘भगोड़ा आर्थिक अपराधी’ घोषित किए जाने वाले आदेश के खिलाफ है और दूसरी में भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. पीठ ने केंद्र सरकार को माल्या के इस बयान पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई अगले महीने के लिए तय की है.
जो मुस्लिम आरक्षण कभी लागू ही नहीं हुआ था, महाराष्ट्र सरकार ने अब उसे औपचारिक रूप से समाप्त किया
महाराष्ट्र सरकार ने 17 फरवरी 2026 को एक आदेश जारी कर राज्य में मुसलमानों के लिए आरक्षण से जुड़े जाति सत्यापन और वैधता प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को रद्द कर दिया. इससे मौजूदा स्थिति में कोई नया बदलाव नहीं हुआ है, क्योंकि यह आरक्षण पहले से लागू नहीं था. लेकिन इस आदेश के बाद सरकार और अर्ध-सरकारी नौकरियों तथा शिक्षा में मुस्लिम आरक्षण की प्रक्रिया औपचारिक रूप से खत्म मानी जा रही है. यह रिपोर्ट ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित हुई है.
2014 में कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने मराठा और मुस्लिम समुदाय को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग (एसईबीसी) घोषित कर आरक्षण देने की घोषणा की थी. यह घोषणा 2014 के विधानसभा चुनाव से पहले की गई थी और उस समय के मंत्री और कांग्रेस नेता आरिफ नसीम खान ने इसका ऐलान किया था.
इसमें मराठा समुदाय को 16% और मुस्लिम समुदाय को 5% आरक्षण देने का प्रस्ताव था. मराठा आरक्षण नारायण राणे समिति की रिपोर्ट के आधार पर दिया गया था. मुस्लिम आरक्षण की मांग भी लंबे समय से चल रही थी, और सच्चर समिति ने भी इसकी सिफारिश की थी.
2014 में एक अध्यादेश लाकर मुसलमानों को 5% आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था. यह आरक्षण सरकार और अर्ध-सरकारी नौकरियों तथा शिक्षा में एसईबीसी श्रेणी (स्पेशल बैकवर्ड कैटेगरी-A या एसबीसी-A) के तहत दिया गया था.
लेकिन चुनाव के बाद बीजेपी की सरकार आ गई. छह महीने के अंदर इस अध्यादेश को कानून में नहीं बदला गया, इसलिए यह 23 दिसंबर 2014 को लैप्स हो गया.
2014 में संजीत शुक्ला ने इस आरक्षण को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी. सुनवाई के दौरान अदालत ने नौकरियों में 5% मुस्लिम आरक्षण पर रोक लगा दी, लेकिन शिक्षा में आरक्षण की अनुमति दी थी. हालांकि, अध्यादेश के खत्म हो जाने के कारण शिक्षा में भी आरक्षण लागू नहीं हो सका. उस समय 2014 और 2015 में सरकार ने कुछ आदेश जारी किए थे, जिनमें जाति प्रमाणपत्र और सत्यापन प्रक्रिया शुरू करना भी शामिल था. अब 2026 में राज्य सरकार ने उन सभी पुराने आदेशों को भी रद्द कर दिया है.
इस फैसले पर विपक्ष ने सरकार की आलोचना की है. एनसीपी (एसपी) के राष्ट्रीय प्रवक्ता क्लाइड क्रास्टो ने कहा कि यह फैसला दिखाता है कि बीजेपी अपने मुस्लिम नेताओं को महत्व नहीं देती और वे पार्टी से न्याय नहीं दिला पा रहे हैं. वहीं शिवसेना नेता कृष्णा हेगड़े ने कहा कि कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने स्थायी कानून बनाने के बजाय केवल अस्थायी अध्यादेश लाया था. उन्होंने दावा किया कि महायुति सरकार ने पिछड़े वर्गों का पूरा आरक्षण बहाल कर दिया है.
छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों के शव कब्र से निकालने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्य सरकार को नोटिस
मूकनायक की रिपोर्ट के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के गांवों में आदिवासी ईसाइयों के शवों को क़ब्र से जबरन निकालकर दूसरी जगह दफनाने के आरोपों पर कड़ा रुख अपनाया है. बुधवार को अदालत ने छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा और आगे किसी भी शव को कब्र से निकालने की कार्रवाई पर तुरंत रोक लगा दी.
यह आदेश उस याचिका पर दिया गया जिसमें कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों को उनके ही गांवों में अपने मृत परिजनों को दफनाने से रोका जा रहा है. वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने अदालत को बताया कि एक मामले में याचिकाकर्ता की मां के शव को बिना परिवार की जानकारी के क़ब्र से निकालकर दूसरी जगह दफ़ना दिया गया. एक अन्य मामले में एक महिला के पति के शव को बहुसंख्यक समुदाय के लोगों ने जबरन निकालकर दूर स्थान पर दोबारा दफ़न कर दिया.
यह याचिका ‘छत्तीसगढ़ एसोसिएशन फॉर जस्टिस एंड इक्वलिटी’ और अन्य की ओर से अधिवक्ता सत्य मित्रा के माध्यम से दायर की गई है. याचिका में कहा गया है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 25 का उल्लंघन है. अनुच्छेद 21 जीवन और गरिमा के अधिकार की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है. याचिका में कहा गया है कि शवों को 50 किलोमीटर से ज़्यादा दूर ले जाकर दफ़नाना क्रूर और अपमानजनक व्यवहार है.
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब तक मामला लंबित है, दफनाए गए शवों को बाहर निकालने की कोई अनुमति नहीं दी जाएगी. मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी.
एक पर्यटक के रूप में भी कश्मीर में भारत के सैन्य नियंत्रण को अनदेखा करना मुश्किल
‘कश्मीर टाइम्स’ में जूलिया नॉर्मन का यह लेख बतौर एक पर्यटक, अनुभवों पर आधारित है. इसमें उन्होंने अपनी छह दिनों की कश्मीर यात्रा के दौरान वहां की स्थिति का विवरण दिया है. हिंदी में मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
पार्ट-1 में लेखिका बताती हैं कि कश्मीर के पर्यटन क्षेत्रों में भी भारी संख्या में सैनिकों और पुलिसकर्मियों की मौजूदगी को नजरअंदाज करना असंभव है. उनके अनुसार, हर मुख्य सड़क और चौराहे पर स्वचालित हथियारों के साथ सुरक्षा बल तैनात हैं, जो निरंतर निगरानी और नियंत्रण का अहसास कराते हैं.
लेख में कहा गया है कि वहां की सुरक्षा व्यवस्था और घेराबंदी स्थानीय लोगों के दैनिक जीवन को गहराई से प्रभावित करती है. चेकपॉइंट्स और बार-बार होने वाली जांच वहां की सामान्य जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है.
लेखिका ने एक घटना का जिक्र किया है जहां उन्होंने सार्वजनिक स्थान पर सुरक्षा बलों द्वारा किसी के साथ दुर्व्यवहार होते देखा. उन्होंने गौर किया कि आसपास के लोग इसे अनदेखा कर रहे थे. लेखिका के अनुसार, यह स्थानीय लोगों के बीच व्याप्त उस डर को दर्शाता है जहाँ विरोध करने का अर्थ और भी गंभीर परिणाम भुगतना हो सकता है.
एक विदेशी पर्यटक होने के नाते, लेखिका का कहना है कि भारत सरकार यह संदेश देने की कोशिश करती है कि क्षेत्र पूरी तरह नियंत्रित और सुरक्षित है, लेकिन वर्दीधारी सुरक्षा बलों की इतनी व्यापक उपस्थिति एक तरह के “सैन्य शासन” जैसा अनुभव कराती है.
लेख का मुख्य तर्क यह है कि कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था इतनी सघन है कि एक बाहरी व्यक्ति (पर्यटक) भी वहां के लोगों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दबाव को स्पष्ट रूप से महसूस कर सकता है. कुलमिलाकर, यह लेख कश्मीर के जमीनी हालातों को सैन्य नियंत्रण के चश्मे से देखता है इस दावे पर सवाल उठाता है कि वहां की स्थिति सामान्य है.
बंकर, कांटेदार तार और बैरिकेड्स के पीछे छिप गई कश्मीर की सुंदरता
पार्ट-2 में जूलिया लिखती हैं कि कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता अब बंकरों, लोहे के बैरिकेड्स और कांटेदार तारों के पीछे छिप गई है. श्रीनगर सहित पूरी घाटी में इन सैन्य संरचनाओं की इतनी अधिक मौजूदगी है कि एक आम नागरिक या पर्यटक के लिए इन्हें नजरअंदाज करना नामुमकिन है.
पहले के समय में बंकर रेत की थैलियों से बने होते थे, लेकिन अब वे स्थायी कंक्रीट की संरचनाओं, टिन की चादरों और लकड़ी के ढांचों में तब्दील हो चुके हैं. ये बंकर अब केवल सुरक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि निरंतर निगरानी के साधन बन गए हैं.
कांटेदार तारों और सड़कों पर लगे बैरिकेड्स ने स्थानीय लोगों की आवाजाही को सीमित कर दिया है. ये बाधाएं केवल भौतिक नहीं हैं, बल्कि ये कश्मीरी लोगों के मन में डर और अनिश्चितता का भाव पैदा करती हैं. “कांटेदार तार” वहां एक शक्तिशाली प्रतीक बन गए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि कौन सी सड़क कब बंद कर दी जाएगी, इसका कोई भरोसा नहीं है.
लेखिका का तर्क है कि सरकार भले ही कश्मीर में “सामान्य स्थिति” का दावा करे, लेकिन सड़कों पर स्वचालित हथियारों के साथ तैनात सुरक्षा बल और हर कुछ मीटर पर होने वाली चेकिंग एक अलग ही कहानी बयां करती है. यह सैन्यीकरण वहां के लोगों के दैनिक जीवन, उनकी बातचीत और उनके व्यवहार को प्रभावित करता है.
सुरक्षा चौकियों और सैन्य शिविरों की व्यापकता के कारण कश्मीर का स्थानीय भूगोल भी बदल रहा है. जो जगहें कभी खेल के मैदान या सार्वजनिक स्थल हुआ करती थीं, वे अब सुरक्षा घेरों में तब्दील हो गई हैं. इससे स्थानीय लोगों का अपने ही परिवेश से जुड़ाव कम हो रहा है.
कश्मीर में सुरक्षा के नाम पर जो बुनियादी ढांचा तैयार किया गया है, उसने घाटी को एक “खुली जेल” जैसा अनुभव दे दिया है. लेख के अनुसार, यह सैन्य नियंत्रण वहां की शांति के दावों को खोखला साबित करता है, क्योंकि एक भयमुक्त समाज में इतने भारी सैन्यीकरण की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए.
एपस्टीन की दुनिया में प्रवेश की कीमत: खामोशी
जब जेफरी एपस्टीन ने 2009 में जेल से बाहर आने के बाद के वर्षों में “मसाज” (मालिश) शब्द का इस्तेमाल किया, तो उसके दोस्तों और सहयोगियों ने इसका क्या अर्थ समझा होगा? एपस्टीन को 2008 में फ्लोरिडा की एक अदालत ने नाबालिगों के साथ यौन अपराधों का दोषी ठहराया था. उस समय ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में रिपोर्ट की गई उनकी कार्यप्रणाली यह थी कि वह 14 साल तक की कम उम्र की लड़कियों को अपने घर बुलाता था और उन्हें कपड़े उतारने व मालिश करने के लिए राजी करता था. इसके बाद, वह उन्हें यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करता था और उन्हें नकद भुगतान करता था.
अमेरिकी अखबार “द न्यूयॉर्क टाइम्स” में लिसा मिलर ने एपस्टीन के क्रियाकलापों के बारे में विस्तार से लिखा है. वह लिखती हैं कि जब उस पर 2018 में फिर से यौन अपराधों के आरोप लगाए गए, इस बार संघीय सरकार द्वारा, जिसने उस पर 2000 के दशक की शुरुआत में नाबालिग लड़कियों की तस्करी करने का आरोप लगाया था. यदि उसने 2009 से लेकर 2019 में न्यूयॉर्क शहर की जेल की कोठरी में संघीय मुकदमे की प्रतीक्षा के दौरान हुई अपनी मृत्यु के बीच के वर्षों में कोई अपराध किया था, तो उनके लिए उस पर आरोप नहीं लगाए गए थे. लेकिन एपस्टीन की फाइलें दिखाती हैं कि उस दशक के दौरान, वह अपने विशाल और विशिष्ट सामाजिक नेटवर्क को फिर से बना रहा था और संवार रहा था, जबकि उसी समय वह अपने निजी द्वीप ‘लिटिल सेंट जेम्स’ पर एक नए मसाज रूम की योजना बना रहा था और न्यूयॉर्क में अपने मसाज रूम के लिए संगमरमर चुन रहा था.
उसी समय, वह दुनिया भर की युवा महिलाओं की उनके यौन आकर्षण के आधार पर जाँच-परख कर रहा था, उनकी विशेषताओं को श्रेणीबद्ध कर रहा था, यौन संबंध बनाने की कोशिश कर रहा था और उन्हें अपनी सेवा में भर्ती कर रहा था. साल 2011 में एक स्काउट ने एपस्टीन को करीब 5 फीट 8 इंच लंबी एक 21 वर्षीय महिला के बारे में लिखा, “बहुत सुंदर, फ्रेश.” उसी स्काउट ने एक अन्य 22 वर्षीय महिला के बारे में लिखा, “अच्छी लड़की है, लेकिन अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती.”
यह रिकॉर्ड में दर्ज था कि एपस्टीन न्यूयॉर्क और फ्लोरिडा में एक पंजीकृत यौन अपराधी था. यह भी आम जानकारी थी कि वह आमतौर पर “लड़कियों” के एक दल के साथ यात्रा करता था — अपने पत्राचार में, वह उन्हें “सहायक” या “छात्र” भी कहता था. रिचर्ड ब्रैनसन ने इस दल को एपस्टीन का “हरम” कहा था. ब्रैनसन ने 2013 में लिखा, “जब तक आप अपना हरम साथ लाते हैं!” (ब्रैनसन के एक प्रतिनिधि ने कहा है कि वह एपस्टीन से केवल कुछ ही बार व्यावसायिक माहौल में मिले थे, और उन्होंने उसे केवल वयस्क महिलाओं के साथ देखा था. प्रतिनिधि ने कहा कि ब्रैनसन एपस्टीन के कृत्यों को “घृणित” मानते हैं.)
एपस्टीन के कम से कम कुछ दोस्त जानते थे कि जब वह “मसाज” (मालिश) कहता था, तो उसका क्या मतलब होता था. 2010 में, गेट्स फाउंडेशन के तत्कालीन विज्ञान सलाहकार बोरिस निकोलिक को भेजे एक ईमेल में एपस्टीन ने कहा कि वह अभी एक मसाज खत्म कर रहा है. निकोलिक ने जवाब दिया, “आशा है कि ‘हैप्पी एंडिंग’ (सुखद अंत) के साथ होगा,” और अपने नोट के अंत में पलक झपकाने वाली इमोजी लगाई. एपस्टीन ने अपने विशिष्ट बेतरतीब विराम चिह्नों के साथ उत्तर दिया, “मैं बहुत अधीर हूँ, ‘हैप्पी बिगिनिंग’ (सुखद शुरुआत).”
ईमेल यह भी दिखाते हैं कि एपस्टीन दोस्तों के लिए मसाज का आयोजन कर रहा था और एहसान या उपहार के रूप में दोस्तों को महिलाओं से मिलवा रहा था. जब 2017 में दीपक चोपड़ा ने एक क्रेजी दिन की शिकायत की, तो एपस्टीन ने जवाब दिया, “मैं फ्लोरिडा में हूँ, लेकिन दो लड़कियाँ भेजना चाहूँगा.” (चोपड़ा ने इस महीने की शुरुआत में एक बयान में लिखा, “मैं इस मामले में पीड़ितों की पीड़ा से गहरा दुखी हूँ.”)
राष्ट्रपति बराक ओबामा के अधीन पूर्व व्हाइट हाउस काउंसिल कैथरीन रुएमलर ने परोक्ष रूप से स्वीकार किया था कि वह एक सामान्य मसाज और एपस्टीन के कारनामों के बीच का अंतर जानती थीं; उन्होंने एक ईमेल में इसे “आपके प्रकार की मसाज” कहा था. वह एपस्टीन के इतिहास से भी वाकिफ थीं. वह कभी-कभी उनसे कानूनी सलाह मांगता था, और 2015 में उन्होंने उसे स्पष्ट रूप से बताया था कि एक नाबालिग “वेश्यावृत्ति में शामिल होने के लिए कानूनी रूप से सहमति नहीं दे सकता. “ लेकिन 2017 में, एपस्टीन उनके साथ था, जब वह अपार्टमेंट देख रही थीं.
3 फरवरी को उन्होंने एक प्रतिनिधि के माध्यम से कहा, “मुझे उसकी ओर से चल रही किसी भी आपराधिक गतिविधि की जानकारी नहीं थी, और मैं उसे उस ‘राक्षस’ के रूप में नहीं जानती थी जैसा वह अब उजागर हुए हैं.” गुरुवार को उन्होंने गोल्डमैन सैक्स से इस्तीफा दे दिया, जहाँ वह फर्म की शीर्ष वकील थीं.
यहाँ तक कि ऐसी दुनिया में जहाँ एक राष्ट्रपति इंटर्न से यौन सुख प्राप्त कर सकता है, उसके बारे में झूठ बोल सकता है, महाभियोग का सामना कर सकता है और पद पर बना रह सकता है; जहाँ राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को यह कहते सुना जा सकता है कि वह बिना किसी डर के महिलाओं को “निजी अंगों से पकड़ सकता है” और वह दो बार चुना जाता है, वहां भी एपस्टीन की सामाजिक प्रमुखता आश्चर्यजनक है. यह दिखाता है कि कैसे एक समूह काले रहस्यों के साथ मिलीभगत कर सकता है यदि वे पर्याप्त रूप से अस्पष्ट हों और उनके हितों की रक्षा करते हों. कम से कम एक दोस्त ने एपस्टीन को महिलाओं के साथ उसके व्यवहार से होने वाले संभावित प्रतिष्ठा के नुकसान के बारे में चेतावनी दी थी. आखिर उसकी सजा सार्वजनिक थी, और दोस्त ने लिखा था कि इसे “एक शक्तिशाली व्यक्ति द्वारा शक्तिहीन युवा महिलाओं का फायदा उठाने के रूप में समझा जा सकता है—और वास्तव में समझा गया.” (उस व्यक्ति का नाम हटा दिया गया था.)
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि किसी ने कुछ नहीं कहा.
ऐसा कैसे हुआ कि “लड़कियाँ” (जैसा कि एपस्टीन उन्हें बुलाता था)—उनकी उपस्थिति, उनके आने का स्रोत, उनकी भूमिका—एपस्टीन की मेज पर भोजन करने वाले अति-शक्तिशाली पुरुषों और महिलाओं के बीच एक धीमी फुसफुसाहट से ऊपर कोई संदेह पैदा करने में विफल रही? एपस्टीन की मेहमाननवाज़ी का लाभ उठाने वाले बड़े नामों की सूची अब जानी-पहचानी है. एलोन मस्क, स्टीव बैनन, पीटर अट्टिया. इस तरह के मेहमान सहायकों, सलाहकारों और चापलूसों की अपनी आकाशगंगाओं के भीतर रहते हैं. क्या यह संभव है कि किसी ने भी महिलाओं के प्रति एपस्टीन के व्यवहार के बारे में कोई सवाल नहीं उठाया, सिवाय एक संकोची या कूटबद्ध प्रशंसा के, जिसे वे उसकी “शानदार पसंद” के रूप में देखते थे?
बिल गेट्स ने 2011 में एपस्टीन से मुलाकात के बाद सहयोगियों को लिखा, “उसकी जीवनशैली बहुत अलग और काफी दिलचस्प है, हालांकि यह मेरे लिए काम नहीं करेगी.” (गेट्स ने एपस्टीन के साथ अपने संबंधों को “बड़ी गलती” बताया है और एक ड्राफ्ट ईमेल में एपस्टीन के उस दावे का खंडन किया है कि गेट्स विवाहेतर संबंधों में शामिल थे.) अंग्रेजी में मिलर की पूरी रिपोर्ट यहां भी पढ़ी जा सकती है.
एपस्टीन फाइलों ने अमेरिका में अविश्वास को और गहराया; 69% लोग बोले- शक्तिशाली का कुछ नहीं बिगड़ता
दिवंगत यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन के अमेरिकी व्यापारिक और राजनीतिक हलकों के विशिष्ट लोगों के साथ संबंधों से जुड़े लाखों रिकॉर्ड जारी होने के बाद, एक नए रॉयटर्स/इप्सोस पोल में यह पाया गया है कि अमेरिकियों का मानना है कि अमीर और शक्तिशाली लोगों को शायद ही कभी जवाबदेह ठहराया जाता है.
सोमवार को समाप्त हुए चार दिवसीय सर्वेक्षण में लगभग 69% लोगों ने कहा कि उनके विचार इस बयान से “बहुत अच्छी तरह” या “बेहद अच्छी तरह” मेल खाते हैं कि एपस्टीन की फाइलें “दिखाती हैं कि अमेरिका में शक्तिशाली लोगों को उनके कार्यों के लिए शायद ही कभी जवाबदेह ठहराया जाता है.” अन्य 17% ने कहा कि यह बयान “कुछ हद तक” उनके विचारों का वर्णन करता है, जबकि 11% ने कहा कि यह उनकी सोच को नहीं दर्शाता है. रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ही पक्षों के 80% से अधिक लोगों ने कहा कि यह बयान कम से कम कुछ हद तक उनकी सोच का वर्णन करता है.
कांग्रेस के आदेशों के तहत, अमेरिकी न्याय विभाग ने दस्तावेजों का वह जखीरा जारी किया है जो एपस्टीन को राजनीति, वित्त, शिक्षा और व्यवसाय के कई प्रमुख लोगों से जोड़ता है. ये संबंध 2008 में नाबालिग लड़की को वेश्यावृत्ति के लिए उकसाने के आरोपों में दोषी ठहराए जाने से पहले और बाद के हैं. 2019 में नाबालिगों की यौन तस्करी के आरोपों में गिरफ्तारी के बाद मैनहट्टन जेल की कोठरी में एपस्टीन की मृत्यु को आत्महत्या करार दिया गया था.
यह घोटाला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक निरंतर राजनीतिक सिरदर्द साबित हुआ है, जिन्होंने लंबे समय तक एपस्टीन के आसपास के संदेहों को हवा दी थी. अब वे इस आलोचना से घिरे हैं कि उनका प्रशासन इस मामले के बारे में अमेरिकी सरकार की पूरी जानकारी का खुलासा करने में विफल रहा है.
इन खुलासों ने प्रमुख लोगों के पतन की शुरुआत कर दी है. गोल्डमैन सैक्स और हयात होटल्स के अधिकारियों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है. वहीं, अन्य लोग अपने शक्तिशाली पदों पर बने हुए हैं. ईमेल्स से पता चलता है कि ट्रंप के वाणिज्य सचिव (मंत्री) हावर्ड लुटनिक ने स्पष्ट रूप से 2012 में दोपहर के भोजन के लिए एपस्टीन के निजी द्वीप का दौरा किया था और 2015 में हिलेरी क्लिंटन (2016 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंद्वी) के लिए एक फंडरेज़र (धन जुटाने वाले कार्यक्रम) में उन्हें आमंत्रित किया था.
न्याय विभाग के दस्तावेजों के अनुसार, ‘यू.एस. सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज’ के ट्रंप द्वारा नियुक्त प्रशासक डॉ. मेहमत ओज़ ने 2016 में एपस्टीन को वेलेंटाइन डे पार्टी का निमंत्रण ईमेल किया था. न तो लुटनिक और न ही ओज़ पर किसी गलत काम का आरोप है.
रिपब्लिकन राष्ट्रपति ट्रंप, जिन्होंने 1990 और 2000 के दशक में एपस्टीन के साथ काफी मेल-जोल रखा था, उन्होंने फाइनेंसर के अपराधों के बारे में किसी भी जानकारी से इनकार किया है. उनका कहना है कि उन्होंने 2000 के दशक की शुरुआत में, एपस्टीन के ‘प्ली डील’ (दोष स्वीकार करने के समझौते) से पहले ही उनसे संबंध तोड़ लिए थे.
यद्यपि अमेरिकियों को आम तौर पर इस बात की बहुत कम उम्मीद है कि विशिष्ट वर्ग (एलीट्स) को जवाबदेह ठहराया जाएगा, लेकिन देश को एपस्टीन मामले पर और कितने समय तक चर्चा करनी चाहिए, इस पर वे दलीय आधार पर विभाजित हैं.
85 संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों ने इज़राइल के वेस्ट बैंक विस्तार की निंदा की, भारत इस सूची में शामिल नहीं
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, 85 संयुक्त राष्ट्र (यूएन) सदस्य देशों ने कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में इज़राइल के वास्तविक विस्तार की निंदा की है, लेकिन भारत इन देशों में शामिल नहीं है.
संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीनी मिशन ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर देशों और तीन वैश्विक समूहों - अरब राज्यों की लीग, इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) और यूरोपीय संघ - द्वारा जारी संयुक्त बयान पोस्ट किया है. बयान पर हस्ताक्षर करने वाले राष्ट्रों में ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, चीन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, यूके, दक्षिण अफ्रीका जैसे कई प्रमुख देश शामिल हैं. बयान में कहा गया है, “हम वेस्ट बैंक में इज़राइल की अवैध उपस्थिति का विस्तार करने के उद्देश्य से लिए गए एकतरफ़ा इज़राइली निर्णयों और उपायों की कड़ी निंदा करते हैं. ऐसे निर्णय अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इज़राइल के दायित्वों के विपरीत हैं और इन्हें तुरंत वापस लिया जाना चाहिए.” इज़राइल हाल के महीनों में कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में निर्माण बढ़ा रहा है, लेकिन 15 फरवरी को उसकी सरकार के एक हालिया फ़ैसले ने एक भूमि विनियमन प्रक्रिया शुरू कर दी है जो उसे इस क्षेत्र में भूमि के विशाल हिस्सों पर कब्ज़ा करने की अनुमति देगी. एसोसिएटेड प्रेस (एपी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह 1967 के युद्ध के बाद से जमी हुई ‘भूमि स्वामित्व के निपटान’ प्रक्रियाओं को फिर से शुरू करने का मार्ग प्रशस्त करता है. इज़राइली समझौता-विरोधी समूह ‘पीस नाउ’ ने एपी के हवाले से कहा है कि यह प्रक्रिया संभवतः फ़िलिस्तीनियों से “मेगा लैंड ग्रैब” (बड़े पैमाने पर भूमि हड़पने) के समान है. यह बयान इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि गाज़ा में इज़राइल के निरंतर हमलों का दृढ़ता से समर्थन करने वाले जर्मनी जैसे देशों ने भी वेस्ट बैंक में इसके कदम की निंदा की है.
ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित लोगों का समर्थक रहा भारत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इज़राइल के खुले समर्थन में अपना रुख बदल चुका है. पिछले साल जून में और 2024 में भी, भारत ने गाज़ा में तत्काल युद्धविराम और इज़राइल पर हथियार प्रतिबंध का आह्वान करने वाले संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों से ख़ुद को दूर रखा था. भारत का तर्क रहा है कि स्थायी शांति केवल सीधी बातचीत के माध्यम से ही आ सकती है. बयान में आगे कहा गया है, “हम 1967 से कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्र, जिसमें पूर्वी यरुशलम भी शामिल है, की जनसांख्यिकीय संरचना और स्थिति को बदलने के उद्देश्य से किए गए सभी उपायों की अस्वीकृति को दोहराते हैं.” देशों ने 1967 की सीमाओं के आधार पर द्वि-राष्ट्र समाधान (टू-स्टेट सॉल्यूशन) को लागू करने की बात भी दोहराई है. 17 फरवरी को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी व्यक्तिगत रूप से इज़राइल के कार्यों की निंदा की थी.
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