19/01/2026: शंकराचार्य बनाम योगी सरकार | मणिपुर में रेप पीड़िता की मौत | आईटी नौकरियों का टोटा | एसआईआर पर चुनाव आयोग को नई हिदायत | ट्रंप के खिलाफ लामबंद होता यूरोप | टूटे सपनों के भारत पर आकार पटेल
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
प्रयागराज टकराव: माघ मेले में पुलिस और शंकराचार्य आमने सामने, शिष्य की पिटाई के आरोप पर संतों का अनशन.
नौकरियों का सूखा: देश की 5 बड़ी IT कंपनियों ने 9 महीने में दीं कुल मिलाकर सिर्फ 17 नई नौकरियां.
मणिपुर का दर्द: 2023 हिंसा की शिकार गैंगरेप पीड़िता ने तोड़ा दम, अलग प्रशासन की मांग तेज.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बंगाल में संदिग्ध वोटरों की लिस्ट सार्वजनिक करनी होगी, टीएमसी की बड़ी जीत.
शहादत: किश्तवाड़ मुठभेड़ में घायल 8 जवानों में से हवलदार गजेंद्र सिंह शहीद.
अनोखा भिखारी: इंदौर में पकड़ा गया करोड़पति भिखारी, जिसके पास हैं 3 मकान और पर्सनल ड्राइवर.
बीजेपी अध्यक्ष: नितिन नबीन बने बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष, निर्विरोध हुआ चुनाव.
रूस अमेरिका: पुतिन को गाजा शांति बोर्ड में शामिल होने का न्योता, ट्रंप की ग्रीनलैंड मांग से यूरोप नाराज.
प्रयागराज: माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और पुलिस के बीच टकराव, शिष्य की पिटाई का आरोप, संत अनशन पर
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में माघ मेले के दौरान 18 जनवरी, 2026 को मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर भारी हंगामा देखने को मिला. ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और स्थानीय पुलिस प्रशासन के बीच तीखी नोकझोंक और टकराव की स्थिति बन गई. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह विवाद तब शुरू हुआ जब शंकराचार्य अपने करीब 200 से 250 शिष्यों के साथ पारंपरिक पालकी (रथ) पर सवार होकर शाही स्नान के लिए ‘संगम नोज’ की तरफ बढ़ना चाहते थे.
पुलिस का पक्ष: सुरक्षा और भीड़ का हवाला
टाइम्स ऑफ इंडिया और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस ने शंकराचार्य और उनके काफिले को रोक दिया. प्रशासन ने तर्क दिया कि उस दिन मेले में करीब 3.82 करोड़ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी थी. पुलिस का कहना था कि प्रतिबंधित क्षेत्र में भीड़ के बीच रथ या पालकी ले जाने की कोई पूर्व अनुमति नहीं थी और न ही ऐसी कोई परंपरा रही है. पुलिस ने आशंका जताई कि ऐसे जुलूस से भगदड़ मच सकती थी और आम श्रद्धालुओं की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती थी. प्रशासन ने जोर देकर कहा कि पीक आवर्स के दौरान सभी भक्त बराबर हैं और किसी भी वीआईपी प्रवेश (एक्सेस) की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे व्यवस्था बिगड़ सकती थी.
शंकराचार्य का आरोप: संतों का अपमान और शिष्य से मारपीट
भास्कर इंग्लिश और आईबी टाइम्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, वापसी मार्ग पर करीब दो से तीन घंटे तक गतिरोध बना रहा. इस दौरान पुलिस और शिष्यों के बीच तीखी बहस हुई, बैरिकेड्स तोड़े गए और धक्का-मुक्की भी हुई. शंकराचार्य पक्ष का आरोप है कि पुलिस ने संतों के साथ बदसलूकी की. यह भी दावा किया गया कि पुलिस ने एक शिष्य को बालों से पकड़कर घसीटा और एक अस्थायी पुलिस चौकी में ले जाकर उसकी पिटाई की.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पुलिस पर संतों को बीच रास्ते में रोकने और दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया. उन्होंने इसे धार्मिक परंपराओं और संतों का अपमान बताया. अंततः, शंकराचार्य और उनके अनुयायी संगम में स्नान किए बिना ही अपने अखाड़े वापस लौट गए. इस घटना के विरोध में उन्होंने अन्न-जल त्यागकर अनशन शुरू कर दिया है.
राजनीतिक प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया
इस घटना ने अब राजनीतिक रूप भी ले लिया है. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने संतों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार की आलोचना की है और मामले की जांच की मांग की है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इस घटना के कई वीडियो वायरल हो रहे हैं. जहां @AlternateMediaX और @KushalSharma_89 जैसे हैंडल से शेयर किए गए वीडियो में टकराव और शंकराचार्य के बिना स्नान किए लौटने की क्लिप्स हैं, वहीं @07Eldho ने बुजुर्ग संतों के साथ पुलिस की कथित मारपीट का दावा किया है.
बंगाल वोटर लिस्ट विवाद: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, टीएमसी ने कहा- ‘तार्किक गड़बड़ी’ वाली लिस्ट सार्वजनिक करनी होगी
पश्चिम बंगाल में चल रहे वोटर लिस्ट के रिविजन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसला सुनाया, जिसे राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस अपनी बड़ी राजनीतिक जीत बता रही है. कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि जिन वोटरों के नाम ‘तार्किक गड़बड़ी’ की श्रेणी में रखे गए हैं, उनकी लिस्ट ग्राम पंचायत, ब्लॉक और वार्ड ऑफिसों में तीन दिन के भीतर चस्पा की जाए. साथ ही, सुनवाई के दौरान जन्म तिथि के सबूत के तौर पर ‘माध्यमिक’ (10वीं) के एडमिट कार्ड को भी वैध माना जाए, जिसे आयोग ने पहले मानने से इनकार कर दिया था.
तृणमूल कांग्रेस का आरोप था कि ‘एसआईआर’ प्रक्रिया के तहत करीब 1.36 करोड़ लोगों के नाम संदिग्ध माने गए हैं और बिना सही सुनवाई के 58 लाख नाम डिलीट किए जाने का खतरा है. टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने उत्तर 24 परगना में एक रैली में कहा, “हम यही चाहते थे. जो मुद्दा हमने संसद और सड़क पर उठाया, उसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने सही माना है. आज हमने उन्हें कोर्ट में हराया है, अप्रैल के चुनाव में भी हराएंगे.”
कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने चिंता जताते हुए कहा, “आम लोगों पर पड़ रहे तनाव और स्ट्रेस को देखिए... 1 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हैं.” कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वोटर अपनी सुनवाई के दौरान किसी भी राजनीतिक पार्टी के बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) की मदद ले सकते हैं. हाल ही में पश्चिम बंगाल के कई बीडीओ ऑफिसों में हुई हिंसा और हमलों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के डीजीपी को निर्देश दिया है कि वे सुनवाई प्रक्रिया के दौरान कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करें. वहीं, बीजेपी ने टीएमसी के जीत के दावे को खारिज करते हुए कहा कि ममता सरकार अपनी नाकामी छिपाने की कोशिश कर रही है.
किश्तवाड़ मुठभेड़ में घायल 8 जवानों में से हवलदार शहीद
जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में रविवार रात आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में घायल हुए आठ सैनिकों में से सेना के एक हवलदार ने सोमवार को दम तोड़ दिया. सेना ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, “#GOC, व्हाइट नाइट कोर और सभी रैंक के सैन्यकर्मी स्पेशल फोर्सेज के हवलदार गजेंद्र सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने 18 जनवरी 2026 की रात को चल रहे ‘ऑपरेशन त्राशी-I’ के दौरान सिंहपुरा क्षेत्र में एक आतंकवाद विरोधी अभियान को वीरतापूर्वक अंजाम देते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया.”
रविवार दोपहर सिंहपुरा इलाके में उस समय आठ जवान घायल हो गए थे, जब ऊंचाई वाले स्थानों पर अपनी मजबूत स्थिति का फायदा उठाते हुए आतंकवादियों ने तलाशी दलों पर ग्रेनेड और एके-47 से हमला किया था.
“द इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार, इलाके में जैश-ए-मोहम्मद के तीन आतंकवादी छिपे हुए हैं, लेकिन अंधेरे के कारण ऑपरेशन को रात में स्थगित कर दिया गया था. सूत्रों ने बताया कि पिछले 12 घंटों से आतंकवादियों के साथ कोई संपर्क नहीं हुआ है.
घायल सैनिकों को स्थानीय ग्रामीणों द्वारा जंगलों से नीचे लाया गया और फिर अस्पताल ले जाया गया. आतंकवादियों के दो समूह, जिनमें से एक का नेतृत्व सैफुल्लाह और दूसरे का आदिल (दोनों पाकिस्तानी नागरिक) कर रहा है, पिछले करीब दो वर्षों से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. माना जाता है कि चिनाब घाटी क्षेत्र के पहाड़ी डोडा और किश्तवाड़ जिलों के घने जंगलों में लगभग 35 पाकिस्तानी आतंकवादी छिपे हुए हैं.
नितिन नबीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष
“द हिंदू” के मुताबिक, बिहार से पांच बार के विधायक रहे नितिन नबीन को निर्विरोध भाजपा का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है. भाजपा मुख्यालय में दिन भर चली नामांकन प्रक्रिया के बाद वह इस दौड़ में एकमात्र उम्मीदवार थे. 45 वर्ष की आयु में, वह अब तक के सबसे युवा भाजपा अध्यक्षों में से एक हैं. उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे भाजपा में एक ‘पीढ़ीगत बदलाव’ के सूत्रधार बनेंगे, क्योंकि पार्टी अगले दशक और उसके आगे के भविष्य की ओर देख रही है.
इसकी घोषणा करते हुए राज्यसभा सदस्य के. लक्ष्मण, जो नए भाजपा अध्यक्ष के चुनाव की पूरी प्रक्रिया के लिए रिटर्निंग ऑफिसर (निर्वाचन अधिकारी) के रूप में कार्य कर रहे थे, ने बताया कि नबीन के पक्ष में नामांकन पत्रों के 37 सेट दाखिल किए गए थे और दिन के अंत में वे सभी वैध पाए गए.
मणिपुर गैंगरेप पीड़िता की मौत ,अलग प्रशासन की मांग, “उसने वो सहा जो कोई इंसान न सहे”
मणिपुर की जातीय हिंसा की एक बेहद दर्दनाक दास्तान 10 जनवरी, 2026 को एक दुखद अंत पर पहुंची. 20 साल की एक कुकी-जो युवती, जिसे 2023 की हिंसा के दौरान अगवा कर गैंगरेप का शिकार बनाया गया था, ने लंबी बीमारी के बाद दम तोड़ दिया. कुकी-जो संगठनों का कहना है कि उस हादसे के बाद वह कभी पूरी तरह उबर ही नहीं पाई. उसके परिवार में अब माता-पिता और तीन भाई-बहन रह गए हैं. इस घटना ने एक बार फिर आदिवासी संगठनों और लेफ्ट पार्टियों को आंदोलित कर दिया है. कुकी-जो इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम (आईटीएलएफ) ने कड़े शब्दों में कहा कि “उसकी मौत इस बात का एक और दर्दनाक सबूत है कि कुकी-जो लोगों को किस तरह बेरहमी से निशाना बनाया गया है.” संगठन ने साफ कर दिया है कि अब उनके पास अपनी सुरक्षा, सम्मान और अस्तित्व के लिए ‘अलग प्रशासन’ की मांग करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है.
कुकी-जो विमेंस फोरम (दिल्ली) की मीडिया प्रभारी किम हाओकिप ने बताया कि पीड़िता पिछले करीब तीन साल से उस दर्द को ढो रही थी जो किसी इंसान को नहीं सहना चाहिए. शुरुआत में वह इतनी डरी हुई थी कि एफआईआर दर्ज कराने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही थी. लेकिन जब दो महिलाओं को नग्न घुमाने वाला वीडियो वायरल हुआ, तब उसने हिम्मत दिखाई. हाओकिप के मुताबिक, उसे गर्भाशय (यूटेरस) से जुड़ी गंभीर दिक्कतें हो गई थीं और वह लगातार अस्पतालों के चक्कर काट रही थी.
पुलिस रिकॉर्ड और एफआईआर एक खौफनाक कहानी बयां करते हैं. 21 मई, 2023 को तब 18 साल की यह लड़की इम्फाल के न्यू चेकोन इलाके में एक एटीएम पर गई थी, जहाँ से चार हथियारबंद लोगों ने उसे कार में खींच लिया. वे उसे एक पहाड़ी पर ले गए, जहाँ तीन लोगों ने उसका गैंगरेप किया. एफआईआर में लिखा है कि जब आरोपी इस बात पर झगड़ रहे थे कि उसे मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए, तभी कार घुमाते वक्त वह गाड़ी से टकराकर गिर गई. वह किसी तरह बचकर एक ऑटो रिक्शा की मदद से घर पहुंची. बाद में उसका परिवार इम्फाल छोड़कर कांगपोकपी चला गया. कांगपोकपी से उसे नगालैंड के कोहिमा रेफर किया गया क्योंकि उसकी हालत बेहद नाजुक थी.
कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (केएसओ) ने आरोप लगाया है कि बार-बार अपील करने के बावजूद आरोपियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि उसकी मौत को आधिकारिक तौर पर 2023 की हिंसा का परिणाम माना जाए. बता दें कि मई 2023 से जारी हिंसा में अब तक 260 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और राज्य फरवरी 2025 से राष्ट्रपति शासन के अधीन है.
आईएमएफ ने भारत की विकास दर का अनुमान घटाया, मौजूदा साल के लिए उम्मीद बरकरार
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (आईएमएफ़) ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6.4% कर दिया है. हालांकि, मौजूदा वित्त वर्ष (जो मार्च में खत्म होगा) के लिए आईएमएफ ने 7.3% की मजबूत ग्रोथ की भविष्यवाणी की है. यह नया अनुमान पिछले साल अक्टूबर में लगाए गए 6.2% के अनुमान से थोड़ा बेहतर है, लेकिन मौजूदा साल की रफ्तार से कम है.
आईएमएफ की रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा साल में भारत की अर्थव्यवस्था ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है, खासकर तीसरी और चौथी तिमाही में अच्छी गति देखी गई. नवंबर 2025 में आए आंकड़ों ने सबको चौंका दिया था जब जीडीपी ग्रोथ 8.2% दर्ज की गई थी.
हालांकि, इस रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण पेंच है. आईएमएफ ने साफ किया है कि ये अनुमान भारत सरकार द्वारा जीडीपी डेटा में किए जा रहे बड़े बदलावों को शामिल नहीं करते. भारत सरकार 27 फरवरी को जीडीपी का नया ‘बेस ईयर’ जारी करने वाली है, जो 2011-12 से बदलकर 2022-23 हो जाएगा. आईएमएफ ने भारत के पुराने डेटा को ‘सी ग्रेड’ दिया था और सुधार की वकालत की थी. जब नई सीरीज आएगी, तो सभी रेटिंग एजेंसियों को अपने अनुमान फिर से बदलने पड़ेंगे.
वैश्विक स्तर पर भी तस्वीर बदल रही है. आईएमएफ ने अमेरिका की ग्रोथ का अनुमान 2.4% और चीन का 4.5% तक बढ़ा दिया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी में हो रहे भारी निवेश से दुनिया की अर्थव्यवस्था को सहारा मिल रहा है, हालांकि ट्रेड पॉलिसी में अनिश्चितता एक चुनौती बनी हुई है.
हिंदुत्व के नाम पर देश को ठगने का खेल
राजनीतिक विश्लेषक संजय के. झा अपने लेख में तीखा सवाल पूछते हैं: “क्या हमारे प्रधानमंत्री को वाकई लगता है कि हिंदू धर्म इतना नाजुक है कि उसे गाली-गलौज करने वाले ट्रोल्स और तलवार बांटने वाले गुंडों की सुरक्षा की ज़रूरत है?” लेख में उस विडंबना को उजागर किया गया है जहाँ पीएम मोदी ‘वर्ल्ड बुक फेयर’ में शिक्षा का संदेश देते हैं, वहीं उनकी पार्टी के एक विधायक—जिन्हें यूपी में मंत्री का दर्जा मिला है—सलमान खान और शाहरुख खान जैसे अभिनेताओं को ‘गद्दार’ और ‘डकैत’ बताकर फांसी की मांग करते हैं.
लेखक पूछते हैं कि क्या पीएम मोदी संविधान की एक कॉपी अपने विधायक रघुराज सिंह या एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) अजीत डोभाल को भेजेंगे, जो युवाओं को ‘बदला’ लेने के लिए उकसा रहे हैं? लेख में ‘स्किल इंडिया मिशन’ में हुए कथित महाघोटाले का भी विस्तार से जिक्र है. सीएजी (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि कैसे “न खाऊँगा, न खाने दूँगा” का दावा करने वाली सरकार में 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की लूट हुई. एक ही तस्वीर को फोटोशॉप करके मध्य प्रदेश के कटनी, केरल के कोल्लम और मुंबई के इवेंट्स का सबूत बना दिया गया. कई फर्जी कंपनियों ने बिना किसी इंफ्रास्ट्रक्चर के हजारों युवाओं को ट्रेनिंग देने का दावा किया.
लेख में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर ऐतिहासिक धरोहरों को नष्ट करने की भी आलोचना की गई है. लेखक का कहना है कि मणिकर्णिका घाट और अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति जैसी विरासतों को ‘सौंदर्यीकरण’ के नाम पर तोड़ा गया, जिसे स्थानीय लोग और शंकराचार्य धर्म और संस्कृति पर हमला मानते हैं. लेखक का निष्कर्ष है कि यह सब कुछ गुजराती कॉन्ट्रैक्टर्स को फायदा पहुँचाने के लिए किया जा रहा है, न कि धर्म की सेवा के लिए.
हेट क्राइम
यूपी: खाली घर में नमाज पढ़ने पर 12 लोग हिरासत में, पुलिस बोली- ‘नई परंपरा ’
स्क्रोल के मुताबिक उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में पुलिस ने एक अजीबोगरीब कार्रवाई करते हुए 12 मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में ले लिया. उनका जुर्म सिर्फ इतना था कि वे एक खाली घर में सामूहिक नमाज अदा कर रहे थे. पुलिस का कहना है कि यह “बिना अनुमति” के किया जा रहा था.
घटना मोहम्मदगंज गांव की है. पुलिस को सूचना मिली थी कि गांव के हनीफ नाम के एक व्यक्ति के खाली घर को ‘अस्थाई मदरसे’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. सोशल मीडिया पर नमाज का वीडियो वायरल होने और कुछ ग्रामीणों द्वारा आपत्ति जताने के बाद पुलिस ने यह कार्रवाई की. एसपी (साउथ) अंशिका वर्मा ने कहा, “बिना प्रशासन की अनुमति के कोई भी नई धार्मिक गतिविधि या सभा करना कानून का उल्लंघन है. अगर दोबारा ऐसा हुआ तो सख्त कार्रवाई होगी.”
पुलिस ने इन 12 लोगों का शांति भंग की धाराओं में चालान किया. बाद में उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहाँ से उन्हें जमानत मिल गई. यह घटना एक बार फिर सवाल खड़ा करती है कि क्या अब निजी स्थानों पर प्रार्थना करने के लिए भी सरकारी अनुमति की ज़रूरत होगी?
बालासोर मॉब लिंचिंग का सच: ‘गौ रक्षक’ थे कातिल, मृतक उन्हें पहले से पहचानता था
ओडिशा के बालासोर में 14 जनवरी (मकर संक्रांति) को हुई 35 वर्षीय शेख मकंदर मोहम्मद की हत्या (लिंचिंग) के मामले में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. मृतक के भाई ने दावा किया है कि मकंदर पर हमला करने वाली भीड़ अनजान नहीं थी, बल्कि वे स्थानीय ‘गौ रक्षक’ थे जिन्हें मकंदर पहले से जानता था.
ऑल्ट न्यूज़ की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, मकंदर एक वैन ड्राइवर की मदद के लिए उसके साथ गया था जिसमें मवेशी ले जाए जा रहे थे. रास्ते में भीड़ ने वैन को रोका और ‘मुस्लिम पहचान’ की वजह से मकंदर को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया. वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि खून से लथपथ मकंदर को डंडों से पीटा जा रहा है और जबरन ‘जय श्री राम’ और ‘गौ माता’ के नारे लगवाए जा रहे हैं. ऑल्ट न्यूज़ में ओशानी भट्टाचार्य ने विस्तार से रिपोर्ट की है.
मकंदर के भाई जितेंद्र ने बताया, “अस्पताल में दम तोड़ने से पहले मेरे भाई ने मुझे बताया कि पीटने वाले कौन थे. उसने 5-8 लोगों का जिक्र किया जो उसे पहचानते थे.” हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने पहली एफआईआर में मारपीट या लिंचिंग का जिक्र ही नहीं किया था, उसे सिर्फ एक ‘एक्सीडेंट’ बताया था. परिवार द्वारा दूसरी शिकायत दर्ज कराने के बाद ही पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया.
अब तक पुलिस ने 5 लोगों को गिरफ्तार किया है—जिनके नाम चिन्मय दास, सरोज बेहरा और सागर मोहलिक आदि हैं. दूसरी तरफ, बजरंग दल ने अपनी स्थानीय इकाई के ‘गौ सुरक्षा प्रमुख’ पवन भाई की गिरफ्तारी के विरोध में एसपी ऑफिस के बाहर प्रदर्शन किया और दावा किया कि उनके कार्यकर्ताओं को झूठा फंसाया जा रहा है.
गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को बंद करने के आदेश पर सवाल; हाईकोर्ट ने कहा—मान्यता न होने का अर्थ बंदी नहीं
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 16 जनवरी, 2026 को आदेश दिया, “इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने के 24 घंटे के भीतर मदरसे पर लगाई गई सील खोल दी जाएगी.”
गज़ाला अहमद की रिपोर्ट के मुताबिक, एक गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को बंद करने के उत्तरप्रदेश सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने टिप्पणी की कि आधिकारिक मान्यता का न होना स्वतः ही किसी शैक्षणिक संस्थान को बंद करने का आधार नहीं बनता है.
अदालत ‘मदरसा अहले सुन्नत इमाम अहमद रजा’ द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी. न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने उल्लेख किया कि ‘उत्तर प्रदेश गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता, प्रशासन और सेवा विनियम, 2016’ के तहत, मान्यता न होने का परिणाम केवल सरकारी अनुदान से वंचित होने तक सीमित है और यह अपने आप में किसी संस्थान को बंद करने का आदेश नहीं देता है.
याचिकाकर्ता की ओर से पेश होते हुए अधिवक्ता सैयद फारूक अहमद ने पीठ को सूचित किया कि मदरसा सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं मांग रहा था, जिससे बंद करने का आदेश कानूनी रूप से अस्थिर हो गया. अहमद ने तर्क दिया, “याचिकाकर्ता राज्य से किसी अनुदान की मांग नहीं कर रहा है. इसलिए, गैर-मान्यता के आधार पर मदरसे को बंद करने का निर्देश देना विनियम के दायरे से बाहर है.”
अदालत ने राज्य के अधिकारियों से जवाब मांगा है और उम्मीद है कि वह आगे इस बात की जांच करेगी कि क्या मदरसों के खिलाफ की गई कार्यकारी कार्रवाई अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को नियंत्रित करने वाले नियामक ढांचे के अनुरूप है.
यह मामला उत्तरप्रदेश में मदरसों को लक्षित करने वाले प्रशासनिक आदेशों के खिलाफ बढ़ती कानूनी चुनौतियों की सूची में शामिल हो गया है, जो चयनात्मक जांच और मान्यता के नियमों को बंदी की शक्तियों के साथ जोड़ने की चिंताओं के बीच आया है.
याचिकाकर्ता के वकील सैयद फारूक अहमद ने कहा, “कानून बहुत स्पष्ट है. मदरसे की गैर-मान्यता का मतलब केवल यह है कि उसे सरकारी अनुदान नहीं मिल सकता. कहीं भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो प्रशासन को केवल इसलिए बंद करने का आदेश देने की अनुमति देता हो, क्योंकि वह गैर-मान्यता प्राप्त है.”
सुप्रीम कोर्ट की एमपी सरकार को दो टूक: मंत्री विजय शाह पर केस चलाने की मंजूरी पर 2 हफ्ते में फैसला लें
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (19 जनवरी, 2026) को मध्य प्रदेश सरकार के रवैये पर नाराजगी जताते हुए उसे दो हफ्ते का अल्टीमेटम दिया है. मामला राज्य के मंत्री कुंवर विजय शाह से जुड़ा है, जिन पर सेना की महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप है. कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि मंत्री पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने में इतनी देरी क्यों हो रही है?
यह मामला ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान कर्नल कुरैशी द्वारा मीडिया को दी गई ब्रीफिंग और उस पर मंत्री की टिप्पणी से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे इतनी गंभीरता से लिया था कि जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) गठित की थी. मुकदमे की मंजूरी के लिए अगस्त 2025 में ही राज्य सरकार से अनुरोध किया गया था. चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील श्रीधर पोटा-राजू को याद दिलाया, “अब हम जनवरी 2026 में हैं.” वकील ने दलील दी कि देरी इसलिए हो रही है क्योंकि मंत्री ने एफआईआर रद्द कराने के लिए एक याचिका दायर कर रखी है, जो पेंडिंग है.
वहीं, मंत्री विजय शाह की तरफ से पेश हुए सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल ने ऑनलाइन माफी मांग ली है और वे जांच में पूरा सहयोग कर रहे हैं. इस पर चीफ जस्टिस कांत ने सख्त लहजे में कहा, “आप सहयोग करते रहिए. अब माफी-वाफी का समय निकल चुका है .” कोर्ट ने याद दिलाया कि जुलाई 2025 में भी कोर्ट ने मंत्री की “ऑनलाइन माफी” पर सवाल उठाए थे और कहा था कि वह “कोर्ट के धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं.” कोर्ट ने तब पूछा था कि एक पब्लिक अपोलॉजी रिकॉर्ड पर कहां है? अब राज्य सरकार को अगली सुनवाई से पहले एक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करनी होगी.
आईटी नौकरियां : देश की पांच शीर्ष कंपनियों ने बीते 9 माह में सिर्फ 17 नए लोगों को जॉब दिया
भारत का आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) उद्योग, जो कभी देश का सबसे विश्वसनीय और प्रचुर मात्रा में रोजगार पैदा करने वाला क्षेत्र था, उसने बड़े पैमाने पर भर्ती रोक दी है. एक चौंकाने वाले बदलाव के रूप में, देश की शीर्ष पांच आईटी कंपनियों ने इस वित्तीय वर्ष के पहले नौ महीनों में कुल मिलाकर केवल 17 नए कर्मचारी जोड़े हैं. यह पिछले वर्ष की इसी अवधि में पैदा हुई लगभग 18,000 नौकरियों की तुलना में भारी गिरावट है, जो इस क्षेत्र के काम करने के तरीके में एक निर्णायक बदलाव का संकेत देती है.
पारीक कंसल्टिंग के सीईओ पारीक जैन कहते हैं, “अब शुद्ध नई भर्ती बहुत कम होगी.” वे आगे जोड़ते हैं: “नई भर्ती तो होगी, लेकिन वह केवल नौकरी छोड़ने वालों और सेवानिवृत्त होने वाले लोगों की जगह लेने के लिए होगी. शुद्ध नई भर्तियां मामूली होंगी. कंपनियां अब कमोबेश स्थिर कर्मचारियों की संख्या के साथ आगे बढ़ेंगी, जैसा कि अन्य उद्योगों में होता है.”
“द टेलीग्राफ” में परन बालाकृष्णन की रिपोर्ट के मुताबिक, यह भारत के टेक क्षेत्र में नौकरियों का संकट लग सकता है, लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल है. जहां देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनियों ने भर्ती की गति को तेजी से धीमा कर दिया है, वहीं वैश्विक कंपनियां भारत स्थित अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (वैश्विक क्षमता केंद्र- जीसीसी) का विस्तार कर रही हैं.
बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा संचालित ये केंद्र दुनिया भर में अपनी मूल कंपनियों के लिए टेक्नोलॉजी, एनालिटिक्स, डिजिटल सेवाओं, वित्त, अनुसंधान, विकास और रणनीति का काम संभालते हैं. ये केंद्र नई नौकरियां पैदा कर रहे हैं, लेकिन एक अलग तरह के कर्मचारियों के लिए: बड़ी संख्या में नए स्नातकों (फ्रेशर्स) के बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), क्लाउड कंप्यूटिंग और उन्नत इंजीनियरिंग में विशेष कौशल रखने वाले लोगों के लिए.
बालाकृष्णन लिखते हैं कि भारत का आईटी क्षेत्र, जो दशकों से देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार का सबसे मजबूत स्तंभ रहा है, वर्तमान में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव से गुजर रहा है. यह बदलाव केवल नौकरियों की संख्या में गिरावट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस उद्योग के काम करने के मूलभूत तरीके में आए बदलाव का संकेत है.
पारंपरिक आईटी दिग्गजों में भर्ती का संकट है. पिछले एक दशक में, भारत की ‘बिग फाइव’ (पांच बड़ी कंपनियां टीसीएस, इंफ़ोसिस, विप्रो आदि) कंपनियों में हर साल हजारों की संख्या में भर्तियां होना एक मानक माना जाता था. 2016 के दौर में अकेले टीसीएस ने 60,000 से अधिक नियुक्तियां की थीं. यहां तक कि वित्तीय वर्ष 2023 तक भी इन शीर्ष कंपनियों ने लगभग 84,000 कर्मचारी जोड़े थे.
हालांकि, वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. इस वर्ष के पहले नौ महीनों में देश की शीर्ष पांच कंपनियों ने शुद्ध रूप से (नेट) केवल 17 नए कर्मचारी जोड़े हैं. टीसीएस जैसी दिग्गज कंपनी ने इसी अवधि में 25,000 से अधिक पदों की कटौती की है. यह मंदी दर्शाती है कि पारंपरिक ‘हाइपर-ग्रोथ’ का युग अब समाप्त हो चुका है और कंपनियां अब ‘स्थिर कर्मचारियों की संख्या’ के मॉडल पर आगे बढ़ रही हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, इस गिरावट के पीछे दो मुख्य कारक हैं. पहला- वैश्विक आर्थिक दबाव. अमेरिका और यूरोप के ग्राहक (क्लाइंट्स) अब ‘विवेकाधीन खर्च’ में कटौती कर रहे हैं. वे नए प्रोजेक्ट्स शुरू करने के बजाय पुराने सिस्टम से ही बेहतर परिणाम मांग रहे हैं.
दूसरा- एआई और ऑटोमेशन का प्रभाव. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) अब केवल एक चर्चा का विषय नहीं रह गया है. कोडिंग, टेस्टिंग और डॉक्यूमेंटेशन जैसे कार्य, जो पहले बड़ी टीमों द्वारा किए जाते थे, अब मशीनों द्वारा संभाले जा रहे हैं. उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, भारत के टेक सेक्टर का 20% से 40% तकनीकी कार्य अब एआई टूल्स द्वारा किया जा रहा है.
बालाकृष्णन ने लिखा है कि पारंपरिक आईटी सेवाएं जहां सुस्त हैं, वहीं ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) भारत के नए विकास इंजन बनकर उभरे हैं. भारत वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा जीसीसी हब है, जहां वैश्विक स्तर के 50% से अधिक केंद्र स्थित हैं. भारत का जीसीसी इकोसिस्टम वर्तमान में 19 लाख लोगों को रोजगार दे रहा है, और 2030 तक इसके 28 लाख से 40 लाख तक पहुंचने का अनुमान है.
ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स थोक भर्ती के बजाय ‘गुणवत्ता’ पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. यहां 14% से 22% नियुक्तियां ही फ्रेशर्स की होंगी, जबकि बड़ा हिस्सा उन अनुभवी पेशेवरों का होगा जिनके पास एआई, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और साइबर सुरक्षा जैसे उन्नत कौशल हैं.
टीसीएस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने जेनरेटिव एआई को एक “सभ्यतागत बदलाव” करार दिया है. अब कंपनियां ‘लो-हायर, लो-फायर’ के युग में हैं, जहां भर्ती बहुत सोच-समझकर की जा रही है. भविष्य की नौकरियां केवल ‘कोडर्स’ के लिए नहीं, बल्कि उन ‘विशेषज्ञों’ के लिए होंगी जो एआई के साथ मिलकर जटिल समस्याओं का समाधान कर सकें.
कंपनियां अब बड़े पैमाने पर बाहर से भर्ती करने के बजाय अपने मौजूदा कर्मचारियों को री-ट्रेनिंग और अपस्किलिंग के माध्यम से तैयार कर रही हैं. इंफ़ोसिस जैसे दिग्गज अब ऐसे प्लेटफॉर्म विकसित कर रहे हैं, जो न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप के साथ काम कर सकें.
कुलमिलाकर, भारत के टेक क्षेत्र का परिदृश्य अब द्विभाजित हो गया है. एक तरफ पारंपरिक आईटी सेवा फर्मों में बड़े पैमाने पर होने वाली नियुक्तियों का अंत हो गया है, तो दूसरी तरफ ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स के माध्यम से उच्च-मूल्य वाली और नवाचार-आधारित भूमिकाओं का उदय हो रहा है. स्पष्ट है कि आने वाले समय में सफलता का आधार ‘डिग्री की संख्या’ नहीं बल्कि ‘कौशल की गहराई’ होगी. जो पेशेवर एआई और डेटा इंजीनियरिंग जैसी नई तकनीकों में खुद को ढाल लेंगे, उनके लिए अवसरों की कोई कमी नहीं होगी.
विश्लेषण
आकार पटेल : न हम ढंग की अर्थव्यवस्था हो पाए, न सलीके का लोकतंत्र
मेरी पीढ़ी (मैं अब 56 साल का हूँ) इस उम्मीद के साथ बड़ी हुई थी कि भारत अपनी लाइफ-टाइम में चीन से मुक़ाबला करेगा और दुनिया की बड़ी ताक़तों में शामिल हो जाएगा. यह कॉन्फिडेंस सिर्फ़ हम में ही नहीं था, बल्कि पॉलिटिक्स में भी इसकी चर्चा थी और दुनिया भर के पत्रकार इसके बारे में लिख रहे थे. 1990 के दशक में और फिर 2000 के दशक में, पूरे दो दशकों तक यही माहौल बना रहा.
हाँ, भारत की ग्रोथ थोड़ी धीमी थी, और हाँ, भारत वैसे इंडस्ट्रियलाइज़ नहीं हो रहा था जैसे चीन हो रहा था, लेकिन हमें लगता था कि बस कुछ वक़्त की बात है, हम बराबरी कर लेंगे. एक मशहूर राइटर ने इन दोनों देशों के फ़्यूचर को कम्पेयर करते हुए कहा था कि चीन के विकास का रास्ता स्मूथ है लेकिन आगे एक बड़ा स्पीड-ब्रेकर है, जो कि डेमोक्रेसी की तरफ़ बदलाव है. वहीं भारत की सड़क गड्ढों से भरी है लेकिन विकास के रास्ते में कोई बड़ी रुकावट नहीं है.
वक़्त के साथ यह बात न सिर्फ़ सरलीकृत साबित हुई बल्कि पूरी तरह ग़लत भी. किसी बिंदू पर, मुझे लगता है पिछले एक दशक में या शायद थोड़ा बाद में, यह अहसास हो गया कि सारे अनुमान ग़लत थे. भारत एक इकोनॉमिक पावर या ग्रेट पावर के तौर पर चीन को टक्कर नहीं दे पाएगा—यानी एक ऐसी ताक़त जो दुनिया पर असर डाल सके. हम जापान, कोरिया, सिंगापुर और चीन जैसे दूसरे एशियन देशों की तरह अपने नागरिकों के लिए समृद्धि वाला रास्ता नहीं अपना पाएँगे. हम वैसे ही चलते रहेंगे जैसे दुनिया के कई देश चलते हैं, जहाँ ज़्यादातर लोग दुनिया के स्टैंडर्ड के हिसाब से ग़रीब ही रहेंगे. भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी दुनिया के एवरेज का सिर्फ़ एक-चौथाई है.
मेरी पीढ़ी, जिसने अपनी जवानी के 30 साल ‘पोस्ट-लिबरलाइज़ेशन’ दौर में बिताए और जो अपनी जी हुई हक़ीक़त के दम पर नतीजे निकालने की हालत में थी, उसकी यह महत्वाकांक्षा अब ख़त्म हो गई है. राजनीति में यह महत्वाकांक्षा ग़ायब है, और हम देख सकते हैं कि भारत अब वापस पाकिस्तान और बांग्लादेश से कम्पेयर करने लगा है. यही वो जगह है जहाँ हम सबसे ज़्यादा सहूलियत महसूस करते हैं और जहाँ हमारा राष्ट्रवाद असल में वहीं खिलता है. दुनिया भर के विशेषज्ञों को भी अहसास हो गया कि हम चीन के बराबर नहीं हैं, और अब इकोनॉमिस्ट और वॉल स्ट्रीट जर्नल जैसे मैगज़ीन के कवर पर दोनों देशों की तुलना करने वाली स्टोरीज़ नहीं दिखतीं.
जो लोग भारत को गौर से देखते हैं, उन्हें पिछले एक दशक में एक दूसरा अहसास भी हुआ है. अब तक यह माना जाता था कि भले ही भारत उम्मीद के मुताबिक़ आर्थिक चमत्कार नहीं दिखा पा रहा, लेकिन कम से कम वहाँ लोकतंत्र है, और इस वजह से वो अलग है. दूसरा अहसास यह हुआ कि भारत अब लोकतंत्र और निजी आज़ादी से दूर हटकर ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ और सीधा-सीधा तानाशाही की तरफ़ बढ़ गया है.
एक एक्टिविस्ट और लिबरल होने के नाते मुझसे ऐसी बातें कहने की उम्मीद की जा सकती है, इसलिए ज़रूरी है कि हम उन लोगों के नज़रिए से देखें जो देशों का अध्ययन और वर्गीकरण करते हैं. चार साल पहले, भारत सरकार को बुरा लगा जब एक अमेरिकन थिंक-टैंक ने भारत को ‘पार्टली फ्री’ (आंशिक रूप से स्वतंत्र) और कश्मीर को अलग से ‘नॉट फ्री’ का दर्जा दिया. सरकार का जवाब एक प्रेस रिलीज़ के रूप में आया जिसमें कहा गया: ‘भारत के फ़ेडरल स्ट्रक्चर में कई राज्यों में वो पार्टियाँ शासन करती हैं जो नेशनल लेवल पर नहीं हैं, और यह चुनाव प्रोसेस फ्री और फेयर होती है जिसे एक इंडिपेंडेंट इलेक्शन बॉडी करवाती है. यह एक वाइब्रेंट डेमोक्रेसी को दर्शाता है जहाँ अलग-अलग विचार रखने वालों के लिए जगह है.’
यह बात बेईमानी थी. उस रिपोर्ट के दो हिस्से थे. पहला हिस्सा, जिसका वेटेज 40 परसेंट था, राजनैतिक अधिकार पर था. यहाँ भारत को 40 में से 34 नंबर मिले थे—जिसमें फ्री और फेयर इलेक्शन्स, इलेक्शन कमीशन की निष्पक्षता, नई पोलिटिकल पार्टीज़ बनाने की आज़ादी और विपक्ष के लिए अपनी ताक़त बढ़ाने के मौक़े शामिल थे. इस हिस्से में भारत को पूरे नंबर नहीं मिले कि क्या वोटिंग बिना हिंसा और सांप्रदायिक तनाव के होती है. इस पर बहस की गुंजाइश कम ही है. हक़ीक़त तो यह है कि सरकार को पारदर्शिता पर 4 में से 3 नंबर मिले, जो शायद ज़रूरत से ज़्यादा ही लचीला था.
सरकार का जवाब बस वही दोहरा रहा था जो पहले ही मान लिया गया था. भारत की रेटिंग को नुक़सान दूसरे 60 परसेंट हिस्से में हुआ, जो सिविल लिबर्टीज़ (नागरिक आज़ादी) के लिए था, जो आज़ादी का ही एक हिस्सा है. यहाँ भारत का प्रदर्शन ख़राब रहा (60 में से 33). फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन, धर्म की आज़ादी, एकेडमिक फ्रीडम, इकट्ठा होने की आज़ादी, एनजीओ के काम करने की आज़ादी (रिपोर्ट ने स्पेसिफिकली मेरी संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया पर हुए हमले का ज़िक्र किया), क़ानून का राज , ज्यूडिशियरी की आज़ादी और पुलिस द्वारा ड्यू प्रोसेस—इन सब मुद्दों पर भारत की रेटिंग ख़राब थी.
लेकिन ये स्कोर्स बस हक़ीक़त दिखा रहे थे. जब एक और रिपोर्ट आयी, इस बार द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की, जिसने भारत को डाउनग्रेड करके ‘फ़्लॉड डेमोक्रेसी’ कहा, तो सरकार ने पैरामीटर्स की डिटेल माँगी, जबकि रिपोर्ट में साफ़ लिखा था कि ‘प्राइमरी कॉज़ (मुख्य कारण) सिविल लिबर्टीज़ का हनन’ और नागरिकता में धर्म को लाना था. ध्यान रहे कि ये रिपोर्ट्स कुछ साल पुरानी हैं. ‘बुलडोज़र न्याय’ का दौर तो इनके बाद आया है और इलेक्शन कमीशन द्वारा वोटिंग अधिकारों को कम करने की मुहिम चली है. क़ानून के राज और डेमोक्रेसी के तौर पर भारत का आज का आकलन उन रिपोर्ट्स से भी बदतर होगा जिन पर सरकार ने एतराज़ जताया था.
दूसरी तरफ़, अब सरकार ऐसी रिपोर्ट्स पर न तो एतराज़ करती है और न ही जवाब देती है. उसे बाहर की आलोचना से अब कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, जैसे उसे अंदर की आलोचना से फ़र्क़ नहीं पड़ता. जैसे विकास की नाकामी को हमने मान लिया है, वैसे ही हमने डेमोक्रेसी की नाकामी को भी अपने अंदर बसा लिया है. जो है सो है, जैसा कि हम में से वो लोग जानते हैं जो अब काफ़ी उम्र देख चुके हैं.
आकार पटेल एक वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के प्रमुख हैं.
एआर रहमान: ‘इरादों को कभी-कभी गलत समझ लिया जाता है, मेरा मकसद दुख पहुंचाना नहीं था’
मशहूर संगीतकार एआर रहमान ने हाल ही में अपने एक इंटरव्यू में “सांप्रदायिक चीज़” वाले बयान पर हुए विवाद को लेकर एक वीडियो संदेश जारी किया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करते हुए कहा कि कभी-कभी इरादों को “गलत समझ लिया जाता है”, लेकिन उनका मकसद अपनी बातों से किसी को दुख पहुंचाना नहीं था.
‘रोजा’, ‘बॉम्बे’ और ‘दिल से’ जैसी फिल्मों में अपने संगीत के लिए पहचाने जाने वाले रहमान ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर एक पोस्ट शेयर कर यह सफाई दी. 59 वर्षीय संगीतकार ने कहा कि संगीत हमेशा से “भारत की संस्कृति को जोड़ने, उसका जश्न मनाने और सम्मान करने का जरिया” रहा है.
वीडियो में एआर रहमान कहते हैं, “भारत मेरी प्रेरणा है, मेरा शिक्षक है और मेरा घर है. मैं समझता हूं कि कभी-कभी इरादों को गलत समझा जा सकता है. लेकिन मेरा मकसद हमेशा संगीत के जरिए उत्थान करना, सम्मान देना और सेवा करना रहा है. मैंने कभी किसी को दुख पहुंचाना नहीं चाहा, और मुझे उम्मीद है कि मेरी ईमानदारी महसूस की जाएगी.”
वीडियो संदेश में उन्होंने आगे कहा, “मैं भारतीय होने पर धन्य महसूस करता हूं, जो मुझे एक ऐसी जगह बनाने में सक्षम बनाता है जहां हमेशा अभिव्यक्ति की आजादी मिलती है और जो बहुसांस्कृतिक आवाजों का जश्न मनाता है. माननीय प्रधानमंत्री के सामने वेव्स समिट में पेश किए गए ‘झाला’ और ‘रूह-ए-नूर’ को संवारने से लेकर, नागालैंड के युवा संगीतकारों के साथ सहयोग करने तक; स्ट्रिंग ऑर्केस्ट्रा बनाने से लेकर सनशाइन ऑर्केस्ट्रा को गाइड करने तक; साथ ही भारत का पहला मल्टीकल्चरल वर्चुअल बैंड ‘सीक्रेट माउंटेन’ बनाने और हैंस ज़िमर के साथ ‘रामायण’ का संगीत देने का सम्मान—हर सफर ने मेरे मकसद को और मजबूत किया है.”
इंदौर में मिला करोड़पति भिखारी: 3 मकान और ऑटोरिक्शा के बेड़े का मालिक, कार ड्राइवर भी
इंदौर में प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे भिक्षावृत्ति-मुक्त अभियान के दौरान एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने अधिकारियों को भी हैरान कर दिया है. जिस भिखारी को ‘रेस्क्यू’ किया गया, वह उन लोगों से कहीं ज्यादा अमीर निकला जो उसे भीख देते थे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मांगीलाल नाम का यह शख्स तीन पक्के मकानों का मालिक है, एक अवैध ब्याज का धंधा चलाता है और उसके पास ऑटोरिक्शा का एक छोटा बेड़ा भी है जिसे वह किराये पर चलाता है. अधिकारियों के अनुसार, रेस्क्यू टीम को शनिवार रात 10 बजे मांगीलाल के बारे में सूचना मिली थी, जिसके बाद उसे ट्रैक किया गया.
भिक्षावृत्ति उन्मूलन अभियान के नोडल अधिकारी दिनेश मिश्रा ने बताया, “हमें पता चला है कि इस आदमी के पास तीन पक्के मकान हैं, जिनमें एक तीन मंजिला इमारत भी शामिल है. उसके पास तीन ऑटोरिक्शा हैं जो किराये पर चलते हैं. हद तो यह है कि यह शख्स एक कार का भी मालिक है और उसने भीख मांगने जाने के लिए एक ड्राइवर भी रखा हुआ है.”
अधिकारियों ने खुलासा किया कि मांगीलाल का ब्याज का धंधा भी तगड़ा है. उसने सराफा इलाके में लोगों को 4 से 5 लाख रुपये ब्याज पर दे रखे हैं, जिसकी वसूली वह रोज़ करता है. इसके अलावा भीख मांगकर वह अलग से 400-500 रुपये रोज़ कमा लेता है. मिश्रा ने बताया कि उसका तरीका बड़ा ही कारगर था—वह कभी सीधे पैसे नहीं मांगता था, बस खरीदारों के पास जाकर खड़ा हो जाता था जब तक कि वे खुद उसे पैसे न दे दें.
उसकी संपत्तियों में भगत सिंह नगर में एक तीन मंजिला घर, शिवनगर में 600 वर्ग फुट का मकान और अलवास में एक फ्लैट शामिल है. फिलहाल मांगीलाल अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ अलवास में रहता है, जबकि उसके भाई अलग रहते हैं. उसे उज्जैन के सेवाधाम आश्रम भेज दिया गया है.
इंदौर के जिला कलेक्टर शिवम वर्मा ने पुष्टि की है कि सभी तथ्यों की जांच के बाद दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने कहा, “इंदौर एक भिक्षावृत्ति-मुक्त शहर है और सरकार भिखारियों के पुनर्वास की व्यवस्था कर रही है.” बता दें कि इंदौर प्रशासन फरवरी 2024 से यह अभियान चला रहा है और शहर में भीख मांगने या देने पर कानूनी रोक है.
यूक्रेन के हमलावर पुतिन को गाजा के शांति मंडल में शामिल होने का न्यौता
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” में शामिल होने का न्योता मिला है. यह कमेटी गाजा के पुनर्निर्माण की निगरानी करेगी. सोमवार को क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने इसकी पुष्टि की है.
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, पेसकोव ने पत्रकारों को बताया, “राष्ट्रपति पुतिन को राजनयिक चैनलों के माध्यम से इस बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का निमंत्रण मिला है.” उन्होंने कहा कि क्रेमलिन अभी इस निमंत्रण की समीक्षा कर रहा है और अमेरिका की तरफ से और विवरण मिलने का इंतजार कर रहा है. इसके साथ ही, बेलारूस के विदेश मंत्रालय ने भी बताया कि राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लुकाशेंको को भी इसका न्योता मिला है. लुकाशेंको को पुतिन का करीबी और यूरोप का ‘आखिरी तानाशाह’ माना जाता है.
डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता वाला यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र समर्थित अमेरिकी योजना का एक अहम हिस्सा है, जिसका मकसद गाजा को फिर से बसाना और वहां से हथियार खत्म करना है. ट्रंप ने इसे “अब तक का सबसे महान और प्रतिष्ठित बोर्ड” बताया है. इस कमेटी में ब्रिटेन के पूर्व पीएम टोनी ब्लेयर, कनाडा के मार्क कार्नी और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो शामिल होंगे.
एक वरिष्ठ इजराइली अधिकारी ने सीएनएन को बताया कि ट्रंप ने इजराइल को एक ‘संस्थापक सदस्य’ के तौर पर शामिल होने का न्योता दिया है. यह निमंत्रण पीएम बेंजामिन नेतन्याहू या उनके प्रतिनिधि के लिए है. वहीं, भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के अनुसार, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसमें शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है. इसके अलावा तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन, अर्जेंटीना के जेवियर माइली, मिस्र के अल-सीसी और हंगरी के विक्टर ओर्बन को भी न्योता मिला है.
एक अमेरिकी अधिकारी ने सीएनएन को बताया कि जो देश इस बोर्ड में ‘स्थायी सीट’ चाहते हैं, उन्हें 1 बिलियन डॉलर (करीब 8300 करोड़ रुपये) का भुगतान करना होगा. जो यह रकम नहीं देंगे, उनका कार्यकाल तीन साल का होगा. इकट्ठा हुआ सारा पैसा गाजा के पुनर्निर्माण में लगेगा.
पुतिन का इस बोर्ड में शामिल होना उनकी वैश्विक मंच पर वापसी मानी जाएगी, क्योंकि 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद से पश्चिमी देश उनसे दूरी बनाए हुए हैं. हालांकि, इस बोर्ड को लेकर विरोध के सुर भी उठने लगे हैं. आयरलैंड की विदेश मंत्री हेलेन मैकएंटी ने चेतावनी दी है कि ट्रंप द्वारा प्रस्तावित यह संस्था संयुक्त राष्ट्र के अधिकार क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को कमजोर कर सकती है.
ट्रंप की ‘ग्रीनलैंड’ खरीदने की जिद से यूरोप, अमेरिका रिश्तों में दरार, अब ‘तलाक’ की तैयारी
पोलिटिको में टिम रॉस का विश्लेषण अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच बढ़ते फासलों को लेकर है. साल 2026 में डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी के बाद से अटलांटिक के दोनों किनारों पर तनाव बढ़ता जा रहा है, लेकिन अब बात ‘तलाक’ तक पहुंच गई है. ट्रंप द्वारा डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ‘ग्रीनलैंड’ पर कब्जा करने की धमकी और इसका विरोध करने वालों पर भारी टैरिफ लगाने की बात ने यूरोप के सब्र का बांध तोड़ दिया है. पोलिटिको का विश्लेषण बताता है कि यूरोपीय देश अब अमेरिका को एक भरोसेमंद साथी नहीं मानते और उसके बिना आगे बढ़ने की तैयारी कर रहे हैं.
यूरोपीय अधिकारियों ने निजी बातचीत में ट्रंप के इस कदम को “पागलपन” और “वारियर मोड” करार दिया है. उनका कहना है कि वेनेजुएला के बाद अब ग्रीनलैंड पर नजर गड़ाना एक हद पार करना है. इसके जवाब में, यूरोप अब “कोलिशन ऑफ द विलिंग” (इच्छुक देशों का गठबंधन) तैयार कर रहा है. इसमें ब्रिटेन, नॉर्वे और यूरोपीय यूनियन के देश शामिल हैं जो व्हाट्सएप ग्रुप्स और टेक्स्ट मैसेज के जरिए सीधे संपर्क में हैं—इसे “वाशिंगटन ग्रुप” कहा जा रहा है.
सबसे बड़ी बात यह है कि नाटो का भविष्य अब खतरे में है. यूरोप अपनी खुद की सुरक्षा व्यवस्था बनाने पर विचार कर रहा है, जिसमें अमेरिका की भूमिका न के बराबर होगी. इस नए गठबंधन में यूक्रेन को एक बड़ी सैन्य ताकत के रूप में देखा जा रहा है. यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन ने भी साफ कर दिया है कि वे ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए मजबूती से खड़े रहेंगे. अब सवाल यह है कि क्या 80 साल पुराना पश्चिमी गठबंधन ट्रंप की जिद के आगे टूट जाएगा?
चीन का जनसांख्यिकीय संकट: जन्म दर ऐतिहासिक निचले स्तर पर, सरकारी कोशिशें फेल
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन एक गहरे संकट में फंसती जा रही है. बीबीसी के मुताबिक 2025 में चीन की जन्म दर अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है—प्रति 1,000 लोगों पर सिर्फ 5.63 जन्म. यह 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद का सबसे खराब आंकड़ा है. वहीं, मृत्यु दर 1968 के बाद सबसे ऊंचे स्तर (8.04) पर है. इसका नतीजा यह हुआ कि चीन की आबादी लगातार चौथे साल घटी है और अब यह 1.4 बिलियन से भी कम होती जा रही है.
सरकार ने इस गिरावट को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है. वन-चाइल्ड पॉलिसी खत्म करके अब तीन बच्चों की इजाजत दी गई है, नकद पैसे (बेबी बोनस) दिए जा रहे हैं, और यहां तक कि गर्भनिरोधक पर 13% का टैक्स लगाकर उन्हें महंगा भी कर दिया गया है. लेकिन बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि युवा पीढ़ी पर इसका कोई असर नहीं हो रहा. महंगी पढ़ाई, करियर की चिंता और एक ‘बेफिक्र जीवन’ की चाहत के चलते लोग बच्चे पैदा नहीं करना चाहते.
संयुक्त राष्ट्र का अनुमान डराने वाला है—अगर यही हाल रहा तो वर्ष 2100 तक चीन की आबादी आधी रह जाएगी. इसका सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. काम करने वाले हाथ कम हो रहे हैं और बूढ़ों की संख्या बढ़ रही है. सरकारी पेंशन फंड सूख रहा है और बुजुर्गों की देखभाल का संकट गहराता जा रहा है, जो चीन के ‘सुपरपावर’ बनने के सपने पर भारी पड़ सकता है.
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