19/03/2026: रुपये के साथ शेयर भी लुढ़के | क्या ट्रंप को दिया बीबी ने धोखा? | अदालत का मोहम्मद दीपक से अजीब सवाल | गटर गैस से 622 मौतें और मुआवजों की आस | खुशी के असली ठिकाने?
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निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
वैश्विक ‘ऊर्जा युद्ध’ के कारण भारतीय निवेशकों को ₹12.5 लाख करोड़ का भारी नुकसान हुआ है. सेंसेक्स में 2,500 अंकों की बड़ी गिरावट दर्ज की गई.
इज़रायल द्वारा ईरान के सबसे बड़े गैस क्षेत्र पर हमला किए जाने के बाद खाड़ी देशों से आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ गया है, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें उछल गई हैं.
वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने भारत में जवाबदेही की कमी और सत्ता से सवाल पूछने पर बढ़ते जोखिमों की ओर इशारा करते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति पर चिंता जताई है.
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के एक कार्य समूह ने उमर खालिद की 5 साल की बिना मुकदमे की कैद को “मनमाना” बताया है और उनकी तत्काल रिहाई की मांग की है.
ADR की रिपोर्ट के अनुसार, राज्यसभा के 32% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि 14% सांसद अरबपति श्रेणी में आते हैं.
एक नई रिपोर्ट ने भारत के असंगठित क्षेत्र में आदिवासी श्रमिकों के शोषण और उन्हें कर्ज के जाल में फंसाए जाने के भयावह सच को उजागर किया है.
साल 2017 से अब तक देश में 622 मौतें दर्ज की गई हैं, और विडंबना यह है कि कई पीड़ित परिवार आज भी मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं.
भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट: वैश्विक ऊर्जा संकट गहराने से निवेशकों के ₹12.5 लाख करोड़ डूबे; रुपया भी 93.13/$
अरशद खान की रिपोर्ट है कि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और ऊर्जा बुनियादी ढांचों पर बड़े हमलों के कारण गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार को अब तक के सबसे भीषण बिकवाली के दौर का सामना करना पड़ा. होर्मुज जलडमरूमध्य की निरंतर नाकेबंदी ने कच्चे तेल की कीमतों को लगभग $119 प्रति बैरल तक पहुँचा दिया. इसके अतिरिक्त, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को स्थिर रखने के फैसले, रुपये की कमजोरी, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की बिकवाली और मुद्रास्फीति व आर्थिक विकास पर बढ़ती चिंताओं ने निवेशकों के उत्साह को ठंडा कर दिया.
सेंसेक्स 2,497 अंक या 3.26% गिरकर 74,207 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान यह 73,951 के निचले स्तर तक चला गया था. निफ्टी 776 अंक या 3.26% की गिरावट के साथ 23,002 पर स्थिर हुआ. दिन के दौरान निफ्टी 22,930 तक गिर गया था. जून 2024 (आम चुनाव के परिणामों के समय) के बाद से निफ्टी 50 इंडेक्स में यह एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट है.
इस क्रैश ने निवेशकों की संपत्ति से 12.50 लाख करोड़ रुपये साफ कर दिए. बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार पूंजीकरण (मार्केट-कैप) 438.63 लाख करोड़ रुपये से गिरकर 426.13 लाख करोड़ रुपये पर आ गया. वहीं, भारतीय रुपया भी 93.13 के रिकॉर्ड निचले स्तर (52-सप्ताह के निचले स्तर) पर बंद हुआ.
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के रिसर्च हेड विनोद नायर के अनुसार, “मध्य पूर्व में ऊर्जा बुनियादी ढांचों पर हमलों की श्रृंखला ने तेल की कीमतों में उछाल ला दिया है, जिससे घरेलू बाजार पिछले तीन दिनों की बढ़त खोकर तेजी से नीचे गिरा. अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने भी सख्त रुख अपनाया है, जो भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच उच्च मुद्रास्फीति का संकेत दे रहा है.”
ऊर्जा युद्ध में तब्दील होता संघर्ष
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव रातों-रात तब और गहरा गया जब ईरानी मिसाइलों ने खाड़ी के प्रमुख ऊर्जा ठिकानों पर हमला किया. ईरान के ‘साउथ पार्स’ गैस क्षेत्र पर इजरायल के हालिया हमले ने जवाबी कार्रवाइयों को तेज कर दिया है, जिससे तेल की कीमतें $115 प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं और एलएनजी की आपूर्ति बाधित हुई है.
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के रिसर्च हेड सिद्धार्थ खेमका ने कहा कि यह संघर्ष अब “ऊर्जा युद्ध” का रूप ले चुका है. दोनों पक्षों द्वारा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों पर हमलों ने कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल पैदा किया है और निवेशकों के भरोसे को हिला दिया है. बाजार में गिरावट का एक बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी भी रही है, जहाँ एफआईआई ने पिछले 12 सत्रों में 73,705 करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं.
हरकारा डीपडाइव | श्रवण गर्ग के साथ
सत्ता, संस्थाएं और सिमटती जवाबदेही
‘हरकारा’ डीप डाइव में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने नरेंद्र मोदी के बीते 11 वर्षों के शासन पर लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका, विदेश नीति, अर्थव्यवस्था और रोजगार जैसे मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखी है. यह चर्चा केवल बीते समय का मूल्यांकन नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीतिक माहौल की गंभीर पड़ताल भी करती है.
गर्ग ने कहा कि भारत में अब नागरिकों द्वारा सवाल पूछने की जरूरत महसूस हो रही है, लेकिन इसके साथ जोखिम भी बढ़ गया है. उन्होंने हाल के उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि एक तरफ लोगों से सवाल पूछने को कहा जाता है, वहीं दूसरी ओर ऐसा करने पर उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है, जो बढ़ती असहिष्णुता की ओर इशारा करता है.
सोनम वांगचुक के मामले में उन्होंने कहा कि उन्हें करीब 170 दिनों तक राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत में रखा गया, जबकि बाद में गृह मंत्रालय ने ही इसकी आवश्यकता से इनकार किया। इसी तरह, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के मामलों में भी जांच एजेंसियां ठोस सबूत पेश नहीं कर सकीं, इसके बावजूद उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा.
गर्ग ने सवाल उठाया कि क्या नागरिकों को केवल प्रधानमंत्री या गृह मंत्री ही नहीं, बल्कि अदालतों से भी जवाबदेही नहीं मांगनी चाहिए. उनके अनुसार, यह मुद्दा किसी एक घटना या फैसले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शासन ढांचे की कार्यप्रणाली से जुड़ा हुआ है.
यह संवाद दिखाता है कि मुद्दा केवल किसी एक फैसले या घटना का नहीं, बल्कि पूरे शासन ढांचे की कार्यप्रणाली का है. विदेश नीति से लेकर अर्थव्यवस्था और आंतरिक राजनीति तक, कई ऐसे फैसले हैं जिन पर सार्वजनिक बहस और जवाबदेही की कमी महसूस की जा रही है.
ईरान युद्ध: 20वां दिन
इज़राइल का ‘एनर्जी स्ट्राइक’ और ईरान का पलटवार: खाड़ी देशों में युद्ध की आग
ईरान-इज़राइल युद्ध के 20वें दिन ने पूरे मध्य पूर्व को एक ऐसी आग में झोंक दिया है जिसका असर सीधे दुनिया की रसोई और कारखानों पर पड़ रहा है. अल जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक़, इज़राइल ने ईरान के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक स्तंभ ‘साउथ पार्स’ गैस फ़ील्ड पर हमला किया. यह दुनिया का सबसे बड़ा गैस क्षेत्र है. इस हमले के कुछ ही घंटों बाद, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) ने अपनी धमकी को हक़ीक़त में बदलते हुए पड़ोसी खाड़ी देशों पर मिसाइलों की बौछार कर दी. कतर का रास लफ़ान इंडस्ट्रियल सिटी, जो दुनिया की एलएनजी आपूर्ति का केंद्र है, ईरानी हमलों के बाद आग की लपटों में घिरा नज़र आया. लारीजानी की हत्या के बाद उनके और उनके बेटे के लिए की गई शोक सभा.
राजनीतिक मोर्चे पर, ईरान के भीतर भारी ग़ुस्सा है. मोजतबा खामेनेई ने इज़राइल को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है, क्योंकि इज़राइल ने पिछले दो दिनों में ईरान के तीन शीर्ष अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया है. इनमें इंटेलिजेंस मंत्री इस्माइल खतीब, सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी और बासिज बल के प्रमुख गुलामरेज़ा सुलेमानी शामिल हैं. सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने कहा कि ईरान के हमले पूर्व-नियोजित और सोचे-समझे थे, जिसका मक़सद अरब देशों को ब्लैकमेल करना है. उन्होंने साफ़ किया कि सऊदी अरब का धैर्य अब सीमित है. कुवैत ने भी अपने यहाँ हिज़्बुल्लाह से जुड़े एक ‘टेरर सेल’ को पकड़ने का दावा किया है जो देश के बुनियादी ढाँचे को तबाह करने की साज़िश रच रहा था.
तेहरान पर हमलों के बाद ट्रम्प की चेतावनी: ‘कतर पर हमला हुआ तो ईरानी गैस फ़ील्ड तबाह कर देंगे’
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को कहा कि इज़रायल अब ईरान की मुख्य प्राकृतिक गैस सुविधा पर और हमले नहीं करेगा. यह बयान इज़रायल द्वारा ईरान के ‘साउथ पार्स’ गैस फ़ील्ड पर किए गए एक महत्वपूर्ण हमले के कुछ घंटों बाद आया है. साउथ पार्स पर इज़रायल का यह हमला पहली बार था, जो ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. इज़रायली और अमेरिकी अधिकारियों ने पुष्टि की कि यह हमला व्हाइट हाउस के साथ समन्वय के बाद किया गया था.
हालाँकि, इस हमले के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कतर की ‘रास लफ़ान इंडस्ट्रियल सिटी’ पर मिसाइलें दागीं. कतर एनर्जी ने बताया कि हमले में उनकी गैस सुविधाओं को “व्यापक नुक़सान” पहुँचा है. इस घटना के बाद कतर के अधिकारियों ने अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क कर कड़ी नाराज़गी जताई और पूछा कि क्या अमेरिका को इज़रायल के हमले की पहले से जानकारी थी. ट्रम्प ने बाद में ‘ट्रुथ सोशल’ पर दावा किया कि अमेरिका को इज़रायल के इस हमले के बारे में “कुछ नहीं पता” था, हालाँकि अमेरिकी और इज़रायली अधिकारियों ने इस दावे को ग़लत बताया है.
ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि इज़रायल ने “गु़स्से में आकर” हमला किया और कतर का इसमें कोई हाथ नहीं था. उन्होंने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा, “इज़रायल अब साउथ पार्स पर कोई और हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर ईरान ने दोबारा कतर पर हमला किया, तो अमेरिका इज़रायल की मदद के बिना भी पूरे साउथ पार्स गैस फ़ील्ड को इतनी ताक़त से उड़ा देगा जो ईरान ने पहले कभी नहीं देखी होगी.”
ट्रम्प ने स्पष्ट किया कि वह ईरान के भविष्य पर लंबे समय तक रहने वाले विनाशकारी प्रभाव नहीं डालना चाहते, लेकिन अगर कतर की एलएनजी सुविधाओं पर दोबारा हमला हुआ, तो वह संकोच नहीं करेंगे. इस बीच, ईरान ने चेतावनी दी है कि वह अपनी ऊर्जा सुविधाओं पर होने वाले हर हमले का जवाब देता रहेगा. ऊर्जा बुनियादी ढाँचे पर इन हमलों के कारण वैश्विक बाज़ार में तेल और गैस की क़ीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे अमेरिका और यूरोप में चिंता की लहर है.
तेल की क़ीमतों में विस्फोट और ट्रम्प प्रशासन का संकट: क्या अमेरिका युद्ध में घसीटा गया?
सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, इज़राइल द्वारा साउथ पार्स गैस फ़ील्ड को निशाना बनाने के बाद वैश्विक तेल बाज़ार में भूकंप आ गया है. ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर यह दावा करके पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि अमेरिका को इज़राइल के इस हमले की जानकारी नहीं थी. हालाँकि, सीएनएन को दिए गए सूत्रों के बयान इस दावे को झुठलाते हैं. एक इज़राइली सूत्र ने पुष्टि की कि हमला अमेरिका के साथ तालमेल बिठाकर किया गया था, जबकि एक अमेरिकी सूत्र ने कहा कि प्रशासन इस योजना से पूरी तरह वाक़िफ़ था.
युद्ध अब नए क्षेत्रों में फैल रहा है. इज़राइल ने पहली बार कैस्पियन सागर में ईरानी नौसैनिक संपत्तियों पर हमला किया है, जिससे रूस जैसे पड़ोसी देशों की चिंताएँ बढ़ गई हैं. लेबनान में मानवीय संकट गहराता जा रहा है, जहाँ अब तक लगभग 1,000 लोग मारे जा चुके हैं. ओमान के शीर्ष राजनयिक ने ‘द इकोनॉमिस्ट’ में एक लेख लिखकर अमेरिका पर तंज़ कसा है कि उसने अपनी विदेश नीति पर नियंत्रण खो दिया है और वह इज़राइल के हाथों का खिलौना बन गया है. इसके अलावा, अमेरिका के भीतर भी ट्रम्प की युद्ध शक्तियों को कम करने के डेमोक्रेट्स के प्रयासों को रिपब्लिकन ने एक बार फिर सीनेट में नाकाम कर दिया है.
अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर युद्ध की मार: तेल आपूर्ति के लिए ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ समाधान की तलाश
‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट बताती है कि ट्रम्प प्रशासन अब युद्ध के आर्थिक परिणामों से बुरी तरह घबराया हुआ है. ऊर्जा संकट इतना गहरा गया है कि ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने उन ईरानी तेल टैंकरों से प्रतिबंध हटाने का प्रस्ताव दिया है जो पहले से समुद्र में हैं. यह ट्रम्प प्रशासन की उस मजबूरी को दर्शाता है जहाँ उन्हें तेल की क़ीमतें कम करने के लिए अपने ही दुश्मन के तेल का सहारा लेना पड़ रहा है. इसके अलावा, ट्रम्प ने 100 साल पुराने ‘जोन्स एक्ट’ में अस्थायी छूट दी है ताकि विदेशी जहाज़ अमेरिकी बंदरगाहों के बीच ईंधन की ढुलाई कर सकें.
रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने पेंटागन में एक प्रेस ब्रीफ़िंग के दौरान दावा किया कि अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य बंदरगाहों को “अपंग” कर दिया है और युद्ध अमेरिकी शर्तों पर आगे बढ़ रहा है. लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त अलग कहानी बयां करती है. तेहरान की गलियों में इज़राइली हवाई हमलों के कारण दहशत का माहौल है, जहाँ घनी आबादी वाले इलाक़ों में स्थित पुलिस स्टेशनों और दफ़्तरों को निशाना बनाया जा रहा है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस तनाव को “लापरवाह” करार देते हुए चेतावनी दी है कि ऊर्जा ठिकानों की तबाही का असर दशकों तक रहेगा. ईरान ने साफ़ कर दिया है कि यदि उसके ऊर्जा ठिकानों पर हमले नहीं रुके, तो वह अपने दुश्मनों के सहयोगियों (खाड़ी देशों) के बुनियादी ढाँचे को मलबे में तब्दील करना जारी रखेगा.
‘क्या किसी ने आप पर हाथ उठाया है?’: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ‘मोहम्मद’ दीपक की याचिका को जाँच प्रभावित करने की कोशिश बताया
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गुरुवार को ‘मोहम्मद’ दीपक की उस याचिका पर कड़ी टिप्पणी की जिसमें उन्होंने पुलिस सुरक्षा की माँग की थी. अदालत ने कहा कि यह याचिका “जाँच को प्रभावित करने” और “जाँच एजेंसी पर दबाव बनाने” के प्रयास के अलावा और कुछ नहीं है. जस्टिस राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता की सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को निराधार करार दिया. कोर्ट ने मौखिक रूप से पूछा, “क्या किसी ने आप पर हाथ उठाया है?”
दीपक कुमार (जिन्होंने अपना नाम बदलकर मोहम्मद दीपक रखा है) ने उन लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई थी जो उनके जिम के सामने इकट्ठा हुए थे और कथित तौर पर गालियाँ दीं और नफ़रती भाषण दिए थे. इसके बाद पुलिस ने एक अधिकारी की शिकायत पर अज्ञात अभियुक्तों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की थी. दीपक ने अपनी याचिका में कहा था कि वीडियो और अभियुक्तों की जानकारी होने के बावजूद पुलिस कार्रवाई करने में विफल रही है.
अदालत ने सुनवाई के दौरान नोट किया कि जिस एफ़आईआर को दीपक रद्द कराना चाहते हैं, उसमें वह ख़ुद एक “संदिग्ध अभियुक्त” हैं. कोर्ट ने कहा कि एक अभियुक्त द्वारा इस तरह की अतिरिक्त राहत की माँग करना जाँच एजेंसियों पर दबाव बनाने की रणनीति लगती है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता के पास बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास जाने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने सीधे हाईकोर्ट का रुख किया जो कि अनुचित है. राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि दीपक की शिकायत पर पहले ही 8 और 11 फ़रवरी को दो एफ़आईआर दर्ज की जा चुकी हैं, जबकि यह याचिका 20 फ़रवरी को दायर की गई थी.
जब अदालत ने सुरक्षा की माँग पर विचार किया, तो राज्य के वकील ने बताया कि जाँच अधिकारी के अनुसार दीपक की सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं है. कोर्ट ने कहा, “एक संदिग्ध अभियुक्त, जिसकी जाँच चल रही है, पुलिस सुरक्षा की प्रार्थना कैसे कर सकता है? यह पूरी तरह से अनुचित है.” याचिका में पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ विभागीय जाँच की माँग को भी अदालत ने जाँच को प्रभावित करने की कोशिश बताया. याचिकाकर्ता के वकील नवनिश नेगी ने बताया कि घटना के बाद दीपक को सोशल मीडिया के ज़रिए लगभग 80,000 रुपये की मदद मिली थी, जिसके बाद उन्होंने और पैसे न भेजने की अपील की थी. अदालत ने अंत में कहा, “आपकी आशंकाएँ बेसिर-पैर की हैं. मार्च का महीना है, घटना को एक महीने से ज़्यादा हो गया है. पूरी पुलिस की नज़र आप पर है, चिंता न करें.” मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को होगी.
भारत में आधुनिक गुलामी: कर्ज, दबदबे और असुरक्षित श्रम के जाल में कैसे फंसे रहते हैं आदिवासी मजदूर
‘आर्टिकल-14’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि कैसे भारत के आदिवासी श्रमिक (विशेषकर झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के) पीढ़ियों से कर्ज और शोषण के जाल में फंसे हुए हैं. रिपोर्ट में “ऋण, सम्मान/दबदबा और डिस्पोजेबल काम (एक बार इस्तेमाल कर फेंकने योग्य काम)” को एक खतरनाक त्रिकोण के रूप में परिभाषित किया गया है.
दानिया शाह और नील टैनन की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और अवसरों की कमी के कारण, आदिवासी परिवार ठेकेदारों (बिचौलियों) से अग्रिम धन (एडवांस) लेते हैं. यह कर्ज उन्हें बंधुआ मजदूरी की ओर धकेलता है, जहाँ वे ईंट भट्ठों, निर्माण स्थलों और गन्ने के खेतों में काम करने के लिए मजबूर होते हैं. यह केवल आर्थिक मामला नहीं है, बल्कि जाति और सामाजिक पदानुक्रम का भी है. ऊंची जाति के ठेकेदार और मालिक इन श्रमिकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव और सामाजिक दबदबा बनाए रखते हैं, जिससे वे अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा पाते. आदिवासी श्रमिकों को ‘डिस्पोजेबल’ यानी उपयोग के बाद छोड़ देने वाला माना जाता है. उनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा, बीमा या कानूनी सुरक्षा नहीं होती. यदि काम के दौरान उनकी मृत्यु हो जाती है या वे घायल हो जाते हैं, तो मालिक आसानी से उनकी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं.
रिपोर्ट में बताया गया है कि ‘बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976’ जैसे कानून होने के बावजूद, जमीन पर स्थिति नहीं बदली है. पुलिस और प्रशासन अक्सर मालिकों का साथ देते हैं, और आंकड़ों में इन मामलों को दर्ज ही नहीं किया जाता.
खेती के अलाभकारी होने और जंगलों से विस्थापन के कारण, आदिवासियों के पास शहरों की ओर पलायन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता. वहां वे ठेकेदारों के शोषण का आसान शिकार बन जाते हैं.
रिपोर्ट में कई व्यक्तिगत कहानियों के जरिए बताया गया है कि कैसे काम की परिस्थितियों में बुनियादी सुविधाओं (जैसे साफ पानी, शौचालय या रहने की जगह) का अभाव रहता है, जिससे उनकी स्थिति ‘आधुनिक गुलामों’ जैसी हो जाती है.
कुलमिलाकर, यह रिपोर्ट भारतीय अर्थव्यवस्था के उस काले पक्ष को उजागर करती है, जहाँ विकास की चमक के पीछे करोड़ों आदिवासियों का शोषण छिपा है. दानिया और नील का तर्क है कि जब तक इस ढांचागत शोषण और जाति-आधारित भेदभाव को खत्म नहीं किया जाता, तब तक इन श्रमिकों को वास्तविक आजादी नहीं मिलेगी.
इंटरव्यू: ‘इस युद्ध में कोई विजेता नहीं होगा, केवल हारने वाले होंगे,’ प्रसिद्ध यहूदी-अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक का कथन
ईरान के साथ जारी अमेरिका-इजरायल संघर्ष पर ‘द वायर’ को दिए गए इस इंटरव्यू में, इराक में जन्मे यहूदी-अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक और पश्चिम एशिया के अनुभवी वार्ताकार एलोन बेन-मेयर कहते हैं कि “बहुसंख्यक रिपब्लिकन, विशेष रूप से इवेंजेलिकल ईसाई, इजरायल का समर्थन करते हैं, चाहे इजरायल कुछ भी करे या न करे.” बेन-मेयर, इजरायल, अरब देशों और तुर्की के बीच अनौपचारिक वार्ताओं का हिस्सा रहे हैं. एक प्रखर टिप्पणीकार के रूप में बेन-मेयर ‘द जेरूसलम पोस्ट’ के लिए लिखते हैं और ‘सीएनएन’ व ‘अल जजीरा’ जैसे मंचों पर दिखाई देते हैं. इस साक्षात्कार के दौरान, उन्होंने फारूक शाह से कहा: “वर्तमान इजरायली सरकार अपनी क्षमता से अधिक जोखिम ले रही है; गाजा युद्ध के कारण उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी है.” उनके अनुसार, “परमाणु हथियार प्राप्त करने की ईरान की आकांक्षा इजरायल को नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में ईरान पर और हमले करने से इजरायल को रोकने के लिए है.”
वे कहते हैं कि हमलों के पहले दिन ईरान के मीनाब स्थित स्कूल पर हुई बमबारी में 175 बच्चों का मारा जाना “ऐसी बात है जिसे ईरानी कभी नहीं भूलेंगे”, जबकि अमेरिका और ईरान दोनों ने इस संघर्ष के पैमाने और प्रभाव का गलत आकलन किया. उन्होंने अमेरिकी नीति में दिशाहीनता के बारे में भी बात की, जिसने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को इस उलझन में छोड़ दिया है कि “आगे क्या किया जाए”, विशेष रूप से ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किए जाने के बाद. साक्षात्कार के मुख्य अंश:
कुछ टिप्पणीकारों के इस तर्क को वे गलत बताते हैं कि इज़राइल ने ईरान के साथ संघर्ष की शुरुआत स्वतंत्र रूप से की और अमेरिका वास्तव में इसके शुरू होने के बाद इसमें शामिल हुआ. उन्होंने कहा कि इज़राइल और अमेरिका ने इस दुर्भाग्यपूर्ण हमले के लिए पूर्ण समन्वय किया है. हालांकि, बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सहमत होने के लिए प्रेरित किया. नेतन्याहू ने यह तर्क दिया कि जब तक ईरान में शासन परिवर्तन नहीं होता, तब तक हमें इस शासन से अपने परमाणु कार्यक्रम और निश्चित रूप से अपने बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन को खत्म करने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. इसके अलावा, नेतन्याहू ने तर्क दिया कि इस समय ईरान अपनी सबसे कमजोर स्थिति में है, जो हमले का एक अवसर प्रदान करता है—ऐसा अवसर जो शायद बाद में न मिले.
एलोन बेन-मेयर के अनुसार, इज़राइल अमेरिका की विदेश नीति पर काफी प्रभाव डालता है, विशेष रूप से पश्चिम एशिया के संदर्भ में और खास तौर पर ईरान और फिलिस्तीनियों के संबंध में. शक्तिशाली इज़राइल समर्थक लॉबी – एआईपीएसी – सभी अमेरिकी राजनीतिक हलकों, विशेष रूप से कांग्रेस (संसद) के नीति निर्माताओं के बीच इज़राइल के हितों को बढ़ावा देने में एक प्रमुख भूमिका निभाती है, और वह ऐसा वित्तीय योगदान के माध्यम से करती है. और निश्चित रूप से, इसमें एक धार्मिक आयाम भी है; बहुसंख्यक रिपब्लिकन, विशेष रूप से इवेंजेलिकल ईसाई, इज़राइल का समर्थन करते हैं, चाहे इज़राइल कुछ भी करे या न करे. वे प्रशासन पर जबरदस्त प्रभाव डालते हैं कि वह किसी भी परिस्थिति में इज़राइल की मदद के लिए आगे आए.
बेन-मेयर ने कहा कि इस हमले के उद्देश्य के बारे में कोई स्पष्ट विचार नहीं था, क्योंकि ट्रंप इसके पीछे के कारणों को लगातार बदलते रहे—कभी शासन परिवर्तन, तो कभी ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विनाश, तो कभी ईरान के बैलिस्टिक मिसाइलों के जखीरे को खत्म करना ताकि वह अपने पड़ोसियों को न डरा सके. इनमें से किसी भी उद्देश्य को प्राप्त करने में विफल रहने के बाद, अब ट्रंप इस उलझन में फंसे हैं कि आगे क्या किया जाए, खासकर अब जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का फैसला कर लिया है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला में हाहाकार मच गया है.
इससे भी बुरी बात यह है कि ट्रंप के पास अभी भी इस युद्ध से बाहर निकलने की कोई रणनीति नहीं है. यह युद्ध चाहे जैसे भी समाप्त हो, इसमें कोई विजेता नहीं होगा, केवल हारने वाले होंगे. निश्चित रूप से, यह युद्ध शुरू से ही दुर्भाग्यपूर्ण था.
उन्होंने कहा कि इज़राइल की इस आकांक्षा के बारे में बहुत चर्चा होती है कि वह क्षेत्र की प्रमुख शक्ति बनना चाहता है. यह सच है, लेकिन इज़राइल की इन आकांक्षाओं को पूरा करना इज़राइल या अमेरिका के हाथ में नहीं है. वर्तमान इज़राइली सरकार अपनी क्षमता से अधिक जोखिम ले रही है; गाजा युद्ध के कारण उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी है, और ईरान के खिलाफ युद्ध भड़काने के लिए उसे और भी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. जो लोग यह सुझाव देते हैं कि इज़राइल ने इस युद्ध से काफी कुछ हासिल किया है, वे बुरी तरह गलतफहमी में हैं, जैसा कि समय बताएगा.
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि परमाणु विस्तार का जोखिम अधिक है. हालांकि इज़राइल ईरान को नेस्तनाबूद करना चाहता है, लेकिन परमाणु हथियारों का उपयोग चर्चा में नहीं है. इज़राइल के अस्तित्व पर कोई खतरा नहीं है, और इज़राइली सरकार या सेना के शीर्ष स्तर पर कोई भी इस भयानक विचार पर विचार नहीं कर रहा है, यह जानते हुए कि इसके परिणाम अकल्पनीय होंगे.
इस बारे में कि ईरान के पास 10 परमाणु बम बनाने लायक यूरेनियम है, उन्होंने कहा कि यह डरावना लगता है, लेकिन वास्तविक नहीं है. ईरान के परमाणु बुनियादी ढांचे को जो नुकसान हुआ है, उसे देखते हुए उसे बम बनाने और उसे मिसाइल पर फिट करने में दो साल से अधिक का समय लगेगा. और यह तभी होगा जब ईरान को बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के काम करने दिया जाए, जो कि संभव नहीं है. इसके अलावा, ईरान का लक्ष्य इज़राइल को मिटाना नहीं बल्कि उसे भविष्य के हमलों से रोकना है. सभी परमाणु शक्तियां समझती हैं कि इनका उपयोग “आपसी सुनिश्चित विनाश” की ओर ले जाता है.
अली खामेनेई 86 वर्ष के थे और कुछ वर्षों में प्राकृतिक रूप से चले जाते. लेकिन उन्हें मारकर क्या ट्रंप और नेतन्याहू ने उन्हें एक शक्तिशाली ‘शहीद’ बनाने और मोहभंग झेल रहे ईरानियों को शासन के पीछे एकजुट करने का जोखिम नहीं उठाया? इसके जवाब में बेन-मेयर ने कहा—हाँ. अली खामेनेई के बेटे मुजतबा, जिन्हें सर्वोच्च नेता चुना गया है, अपने पिता से भी अधिक कट्टरपंथी माने जाते हैं. ट्रंप ने बहुत गलत आकलन किया है. नेतन्याहू और ट्रंप ने खामेनेई को शहीद बना दिया है और अब आम ईरानी भी शासन के साथ खड़े हो रहे हैं.
उन्होंने कहा कि युद्ध किसी न किसी रूप में समाप्त होगा. अंततः किसी न किसी प्रकार के समझौते पर पहुँचना ही होगा. इसमें एक साल या उससे अधिक समय लग सकता है, लेकिन चूँकि न तो ईरान, न इज़राइल और न ही अमेरिका गायब होने वाले हैं, उन्हें एक ऐसी कार्यप्रणाली ढूंढनी होगी जिसके साथ वे रह सकें. यह युद्ध सभी पक्षों को इस कड़वी सच्चाई के प्रति जगा सकता है कि स्थायी शांति ही एकमात्र रास्ता है.
भारत और इज़राइल के बीच बढ़ते संबंधों पर कहा कि दोनों देश कई क्षेत्रों, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी में सहयोग करते हैं. हालाँकि, भारत ने फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन जारी रखा है. भारत ने 1988 में ही फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दे दी थी और अपनी स्थिति नहीं बदली है. मुझे नहीं लगता कि इससे भारत की प्रतिष्ठा या रणनीतिक हितों को कोई नुकसान होगा.
2017 से अब तक 622 सफाई कर्मचारियों की मौत, 52 परिवारों को कभी नहीं मिला मुआवजा
स्वच्छता को जाति-आधारित के बजाय “व्यवसाय-आधारित” गतिविधि बताते हुए, सरकार ने लोकसभा को सूचित किया है कि 2017 से पूरे भारत में सीवर और सेप्टिक टैंकों की खतरनाक सफाई के कारण 622 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई है.
‘द वायर’ के अनुसार, समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा चौधरी के एक प्रश्न के लिखित उत्तर में, सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने लोकसभा में पेश राज्य-वार आंकड़ों के माध्यम से बताया कि 539 परिवारों को पूर्ण मुआवजा दिया गया है, जबकि 25 परिवारों को आंशिक मुआवजा मिला है. हालांकि, आंकड़ों से पता चला है कि प्रभावित परिवारों में से 52 को कभी कोई मुआवजा नहीं मिला, और छह मामलों को बिना किसी समाधान के बंद कर दिया गया. इसमें उत्तर प्रदेश के आंकड़े बताते हैं कि 13 परिवारों को कोई मुआवजा नहीं मिला और तीन मामले बंद कर दिए गए.
सबसे अधिक 86 मौतें उत्तर प्रदेश में दर्ज की गईं. अन्य प्रमुख राज्यों की स्थिति इस प्रकार है: महाराष्ट्र: 82, तमिलनाडु: 77, हरियाणा: 76, गुजरात: 73 और दिल्ली में 62 मौतें दर्ज हुईं.
अठावले ने यह भी कहा कि एक “नए सर्वेक्षण” में देश के किसी भी जिले में “कोई भी हाथ से मैला ढोने वाला” नहीं पाया गया है. हालांकि, उन्होंने बताया कि, 2013 और 2018 में किए गए दो सर्वेक्षणों के दौरान 58,098 हाथ से मैला ढोने वालों की पहचान की गई थी, जिनमें से 32,473 उत्तरप्रदेश में थे.
वर्ष 2025 में, दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच ने देश में हाथ से मैला ढोने से जुड़ी मौतों के मामले में तत्काल एफआईआर दर्ज करने और स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की थी. संगठन का दावा है कि हाथ से मैला ढोने के काम में लगे 116 श्रमिकों की 2024 में और 158 की 2025 में मौत हुई है. पिछले साल जनवरी में, सुप्रीम कोर्ट ने भी छह महानगरों में हाथ से मैला ढोने की प्रथा पर रोक लगाने का आदेश पारित किया था और इसके उन्मूलन में अस्पष्टता को लेकर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी.
मंत्री ने यह भी कहा कि स्वच्छता एक “जाति-आधारित के बजाय व्यवसाय-आधारित गतिविधि” है और श्रमिकों की सुरक्षा बढ़ाने तथा सफाई कर्मचारियों का पूर्ण पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए गए हैं. हालांकि, आंकड़ों से पता चला है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से वेतन का भुगतान न होने, सुरक्षा उपकरण देने से इनकार करने और जाति-आधारित भेदभाव के संबंध में कुल 842 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 130 शिकायतें अकेले उत्तरप्रदेश से थीं.
राज्यसभा के 30% से अधिक सांसदों पर आपराधिक मामले; 14% अरबपति हैं: रिपोर्ट
‘पीटीआई’ की खबर है कि एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान राज्यसभा सदस्यों के एक बड़े हिस्से ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जबकि एक उल्लेखनीय संख्या अरबपतियों की है.
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यसभा के लगभग 32 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि 14 प्रतिशत सांसद अरबपति हैं. यह रिपोर्ट राज्यसभा के 233 में से 229 सांसदों के शपथ पत्रों के विश्लेषण पर आधारित है. वर्तमान में झारखंड की एक सीट खाली है, जबकि तीन सांसदों के शपथ पत्र उपलब्ध नहीं थे. इस विश्लेषण में हाल ही में चुने गए 37 सदस्य भी शामिल हैं.
विश्लेषण किए गए 229 सांसदों में से 73 (32 प्रतिशत) सांसदों ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं. 36 (16 प्रतिशत) सांसदों पर गंभीर आपराधिक धाराएं लगी हैं. 1 सांसद पर हत्या का मामला है, 4 सांसदों पर हत्या के प्रयास के मामले हैं, और 3 सांसदों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित मामले दर्ज हैं.
बीजेपी के 99 में से 27, कांग्रेस के 28 में से 12, टीएमसी के 13 में से 4, और आप के 10 में से 4 सांसदों ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं. इसके अलावा, सीपीआई (एम) और बीआरएस के 3-3 सांसदों ने भी आपराधिक मामलों का खुलासा किया है.
रिपोर्ट में पाया गया कि 31 सांसद (14 प्रतिशत) अरबपति हैं (जिनकी कुल संपत्ति अरबों रुपये में है). प्रमुख दलों में ₹100 करोड़ से अधिक की संपत्ति वाले सांसदों की संख्या इस प्रकार है: बीजेपी: 6 सांसद, कांग्रेस: 5 सांसद, वाईएसआरसीपी: 4 सांसद, आप: 2 सांसद, बीआरएस: 2 सांसद और एनसीपी: 3 सांसद.
रिपोर्ट के अनुसार, एक राज्यसभा सांसद की औसत संपत्ति ₹120.69 करोड़ है. पार्टियों के अनुसार औसत संपत्ति: बीजेपी: ₹28.29 करोड़, कांग्रेस: ₹128.61 करोड़, टीएमसी: ₹17.70 करोड़, आप: ₹574.09 करोड़, वाईएसआरसीपी: ₹522.63 करोड़ और सपा: ₹399.71 करोड़.
सबसे अमीर और सबसे कम संपत्ति वाले सांसद
बीआरएस सांसद बंदी पार्थ सारथी ने सबसे अधिक ₹5,300 करोड़ से अधिक की संपत्ति घोषित की है. इसके बाद आप के राजिंदर गुप्ता (₹5,053 करोड़ से अधिक) और वाईएसआरसीपी के अल्ला अयोध्या रामी रेड्डी (₹2,577 करोड़ से अधिक) का स्थान है. आम आदमी पार्टी के सांसद संत बलबीर सिंह सबसे गरीब सांसद हैं, जिनकी संपत्ति लगभग ₹3 लाख है. उनके बाद मणिपुर के महाराजा सनाजाओबा लीशेम्बा (लगभग ₹5 लाख) और टीएमसी के प्रकाश चिक बड़ाईक (लगभग ₹9 लाख) हैं.
यूएन विशेषज्ञों ने उमर खालिद की हिरासत को ‘मनमाना’ बताया; तुरंत रिहाई की मांग की
पांच साल से अधिक समय तक जेल में रहने के बाद, ‘यूएन वर्किंग ग्रुप ऑन आर्बिट्रेरी डिटेंशन’ (यूएनडब्ल्यूजीएडी) के विशेषज्ञों ने यह निर्धारित किया है कि मानवाधिकार कार्यकर्ता उमर खालिद की हिरासत संयुक्त राष्ट्र निकाय द्वारा स्थापित ‘मनमानी हिरासत’ की चार श्रेणियों के तहत आती है.
‘मकतूब मीडिया’ के अनुसार, यूएनडब्ल्यूजीएडी ने निष्कर्ष निकाला कि उमर खालिद की स्वतंत्रता का हनन उनके “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने, संगठन बनाने और सार्वजनिक मामलों में भागीदारी के अधिकारों के प्रयोग” का परिणाम है.
उमर खालिद को कई अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं (जिनमें अधिकांश मुस्लिम थे) के साथ 2020 में गिरफ्तार किया गया था. वह विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शनों में एक प्रमुख आवाज बनकर उभरे थे, जो भारतीय नागरिकता के त्वरित मार्ग से मुसलमानों को बाहर रखता है. तब से खालिद जेल में ही हैं और उनकी जमानत बार-बार खारिज की गई है. उनकी गिरफ्तारी के पांच साल बाद भी अभी तक उनका ट्रायल (मुकदमा) शुरू नहीं हुआ है.
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने नोट किया कि ऐसी गतिविधियाँ अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत संरक्षित हैं. उन्होंने भारत सरकार से खालिद को तुरंत रिहाई करने और अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार उन्हें “मुआवजे और अन्य क्षतिपूर्ति का प्रवर्तनीय अधिकार” देने का आव्हान किया है.
मार्च 2025 में, ‘ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन’ (एचआरएफ) ने खालिद की ओर से यूएनडब्ल्यूजीएडी में एक याचिका दायर की थी, जिसमें तर्क दिया गया था कि उनकी हिरासत कानूनी रूप से आधारहीन, भेदभावपूर्ण और उनके मौलिक अधिकारों के शांतिपूर्ण प्रयोग का सीधा परिणाम थी.
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026: सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग युवाओं की खुशहाली में ला रहा है भारी गिरावट
क्या डिजिटल दुनिया युवाओं को कम खुश बना रही है? ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026’ के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, इसका उत्तर ‘हाँ’ है. रिपोर्ट में पाया गया है कि सोशल मीडिया का भारी उपयोग विशेष रूप से अंग्रेजी भाषी देशों और पश्चिमी यूरोप में युवाओं, खासकर लड़कियों की खुशहाली में गिरावट का एक प्रमुख कारण बन रहा है. यह रिपोर्ट 20 मार्च को संयुक्त राष्ट्र के ‘अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस’ से ठीक पहले जारी की गई है.
ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के ‘वेलबीइंग रिसर्च सेंटर’ द्वारा गैलप और संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से तैयार की गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में 25 वर्ष से कम उम्र के युवाओं के जीवन मूल्यांकन स्कोर में पिछले दशक में लगभग 1 अंक की भारी गिरावट आई है. पीआईएसए के डेटा के अनुसार, 15 साल के छात्रों में जीवन संतुष्टि का स्तर तब सबसे अधिक होता है जब सोशल मीडिया का उपयोग कम हो. रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि संचार, समाचार और सीखने के लिए इंटरनेट का उपयोग सकारात्मक है, लेकिन केवल मनोरंजन के लिए सोशल मीडिया और गेमिंग का उपयोग नकारात्मक प्रभाव डालता है.
रिपोर्ट के अनुसार, जो युवा दिन में 1 घंटे से कम सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, वे सबसे अधिक खुश पाए गए. इसके विपरीत, किशोर वर्तमान में औसतन 2.5 घंटे प्रतिदिन सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं. रैंकिंग की बात करें तो फ़िनलैंड लगातार 9वें साल दुनिया का सबसे खुशहाल देश बना हुआ है. फ़िनलैंड के बाद आइसलैंड और डेनमार्क का स्थान है. कोस्टा रिका चौथे स्थान पर पहुँच गया है, जो किसी भी लातिन अमेरिकी देश के लिए अब तक की सबसे ऊँची रैंकिंग है. स्विट्ज़रलैंड ने फिर से टॉप 10 में जगह बनाई है, जबकि कोसोवो, स्लोवेनिया और चेकिया जैसे देशों में सुधार देखा गया है.
भारत इस सूची में 116वें स्थान पर है. रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि 2012 के बाद पहली बार अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे प्रमुख अंग्रेजी भाषी देश टॉप 10 से बाहर हो गए हैं. ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफेसर जान-इमैनुएल डी नेवे ने कहा कि सोशल मीडिया और खुशहाली का संबंध इस पर निर्भर करता है कि कौन सा प्लेटफ़ॉर्म और कितने समय तक इस्तेमाल किया जा रहा है. उन्होंने सुझाव दिया कि हमें सोशल मीडिया में ‘सोशल’ यानी सामाजिक जुड़ाव को वापस लाने की ज़रूरत है. यह रिपोर्ट उन नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए ऑनलाइन सुरक्षा कानून बनाने की प्रक्रिया में हैं.
अपील :
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