20/01/2026: हिंदू धर्म को हिंदुत्व से ख़तरा | चुनी सरकारों पर राज्यपालों की धौंस | नफ़रती भाषण पर सुप्रीम कोर्ट में फरियाद | नौकरियों का टोटा | ट्रंप की धौंस यूरोप की तैयारी | कोकराझार में
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां:
वाराणसी का कायाकल्प या विनाश? कॉरिडोर प्रोजेक्ट के लिए प्राचीन मंदिरों को तोड़े जाने पर गंभीर सवाल.
सुप्रीम कोर्ट में हेट स्पीच: याचिकाकर्ताओं की मांग, नफरती भाषण को ‘संवैधानिक अपराध’ माना जाए.
गवर्नर बनाम सरकार: तमिलनाडु और केरल में राज्यपालों के अभिभाषण पर सीएम और गवर्नर आमने-सामने.
नौकरियों का अकाल: जनवरी 2026 में एंट्री लेवल जॉब्स 6 साल के निचले स्तर पर.
कोकराझार में हिंसा: सड़क हादसे के बाद सांप्रदायिक तनाव, इंटरनेट सेवा निलंबित.
ट्रम्प का नया नक्शा: ग्रीनलैंड और कनाडा को अमेरिकी क्षेत्र बताया, यूरोप से व्यापार युद्ध के आसार.
कश्मीर का दर्द: दशकों से रह रहीं पाकिस्तानी पत्नियों को किया गया डिपोर्ट, टूटे परिवार.
विश्लेषण
हिंदुत्व के पैरोकार हिंदू धर्म के निशान मिटा रहे हैं
अरुण श्रीवास्तव का यह विश्लेषण काउंटर करंट्स में अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है. उसके ख़ास अंश.
यह वाकई चौंकाने वाली बात है कि खुद को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ कहने वाले नरेंद्र मोदी ने मणिकर्णिका घाट के आसपास सैकड़ों उन मंदिरों को तोड़ने का आदेश दे दिया, जो हिंदू देवी-देवताओं को समर्पित थे. मणिकर्णिका घाट वाराणसी में पौराणिक रूप से बेहद अहम स्थान है. यह सब वाराणसी कॉरिडोर बनाने के लिए किया गया, जिसका मकसद कथित तौर पर उनके पूंजीपति समर्थकों और दोस्तों के बिजनेस हितों को फायदा पहुंचाना है. इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि हिंदू धर्म के तथाकथित ठेकेदार, और खासकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, जिन्होंने मोदी को तैयार किया, इस पर चुप्पी साधे बैठे हैं.
कोई भी सच्चा हिंदू इन घिनौनी हरकतों पर शर्म से अपना सिर झुका लेगा, क्योंकि ये हरकतें हिंदू मोक्ष के दुनिया के सबसे पवित्र स्थलों में से एक को मिटाने का खतरा पैदा कर रही हैं. बनारस के पवित्र परिदृश्य को नष्ट करने के पीछे दो मुख्य वजहें बताई जा रही हैं. पहली, यह शहर पारंपरिक हिंदू धर्म का प्रतीक है—एक ऐसी चीज जिससे आरएसएस और बीजेपी नेतृत्व असहज महसूस करता है, क्योंकि यह उनके ‘हिंदुत्व’ के राजनीतिक प्रोजेक्ट के खिलाफ जाता है. दूसरी वजह यह है कि बनारस पौराणिक रूप से भगवान शिव से जुड़ा है. भले ही भगवान राम ने खुद कहा हो कि राम और शिव में कोई भेद नहीं है, लेकिन आरएसएस-बीजेपी प्रतिष्ठान ने शैव परंपराओं के प्रति एक स्पष्ट नापसंदगी दिखाई है. शायद यही वजह है कि राहुल गांधी अक्सर अपने भाषणों में भगवान शिव का जिक्र करते हैं, ताकि वे भगवा नेतृत्व पर तंज कस सकें.
मोदी की ये हरकतें उनके ‘परम भक्त’ और ‘हिंदू हृदय सम्राट’ होने के दावे पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं. अगर उन्हें हिंदू धर्म की रत्ती भर भी समझ होती, तो वे उन सैकड़ों छोटे मंदिरों को तोड़ने की इजाजत कभी नहीं देते जो वहां दशकों से खड़े थे. ये मंदिर हिंदुओं के आध्यात्मिक जीवन में गहरे रचे-बसे हैं. उनके एक वरिष्ठ सहयोगी का यह कहना कि “कमरे में मूर्ति रख देने से वह मंदिर नहीं बन जाता,” यह साफ दिखाता है कि मोदी के सलाहकारों को बनारस की धार्मिक आत्मा की कितनी कम समझ है.
आरएसएस के नेता अक्सर सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं—वह शाश्वत परंपरा जो वेदों में निहित है. लेकिन उनका आचरण, खास तौर पर पवित्र मंदिरों और 18वीं सदी की मराठा रानी अहिल्याबाई होलकर से जुड़ी विरासतों पर बुलडोजर चलाना, उनके दावों को खोखला साबित करता है. 17 जनवरी 2026 को प्रयागराज में जो हुआ, वह उनके ‘हिंदू धर्म रक्षक’ होने के ढोंग को और उजागर करता है.
उस दिन, मौनी अमावस्या के स्नान से पहले, प्रयागराज माघ मेले में एक गंभीर घटना घटी. ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपनी पारंपरिक पालकी में अनुयायियों के साथ संगम स्नान के लिए जा रहे थे, तभी पुलिस ने भीड़ नियंत्रण और अनुमति न होने का हवाला देकर उन्हें रोक दिया. बात बढ़कर धक्का-मुक्की तक पहुंच गई. उनके अनुयायियों ने लाठीचार्ज और बदसलूकी का आरोप लगाया, और शंकराचार्य ने दावा किया कि उनकी पालकी की छतरी क्षतिग्रस्त हो गई और उन्हें संगम से लगभग एक किलोमीटर पहले ही वापस लौटने पर मजबूर कर दिया गया. विरोध में वे धरने पर बैठ गए और उन्होंने पवित्र स्नान करने से इनकार कर दिया.
इस घटना ने एक राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया. शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर आरोप लगाया कि यह अपमान जानबूझकर कराया गया है, क्योंकि उन्होंने 2025 के महाकुंभ भगदड़ (जिसमें कम से कम 30 तीर्थयात्री मारे गए थे) को लेकर सरकार की आलोचना की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने शुरू में मौतों को छिपाया और खुले तौर पर मुख्यमंत्री को झूठा बताते हुए उनके इस्तीफे की मांग की.
अगर हम काशी में पवित्र संरचनाओं के विध्वंस और प्रयागराज में शंकराचार्य के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार को एक साथ देखें, तो यह बीजेपी-आरएसएस गठबंधन के ‘हिंदू धर्म के रक्षक’ होने के दावे की कलई खोल देता है. इसके बजाय, ऐसा लगता है कि वे व्यवस्थित रूप से हिंदू नैतिकता, परंपराओं और बहुलवाद को खत्म कर रहे हैं. एक सहिष्णु दार्शनिक परंपरा के रूप में ‘हिंदू धर्म’ और एक कठोर राजनीतिक विचारधारा के रूप में ‘हिंदुत्व’ के बीच का बढ़ता तनाव अब साफ दिखाई दे रहा है.
हिंदुत्व के समर्थकों का तर्क है कि वाराणसी कॉरिडोर एक विकास परियोजना है जिसे शहर को आधुनिक बनाने और काशी विश्वनाथ मंदिर को सीधे गंगा से जोड़कर तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बनाया गया है. हालांकि, इसे लागू करने में शहर के प्राचीन आध्यात्मिक चरित्र को संरक्षित करने की बहुत कम कोशिश की गई है. भारत का आध्यात्मिक हृदय और भगवान शिव का निवास स्थान वाराणसी अब एक शॉपिंग और मनोरंजन केंद्र में बदला जा रहा है. भले ही यह पर्यटकों को आकर्षित करे, लेकिन यह शहर के धार्मिक सार को नष्ट करने का खतरा पैदा करता है.
सदियों से लोग काशी घूमने-फिरने नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मुक्ति के लिए आते रहे हैं. मोदी का विजन तीर्थयात्रियों की जगह पर्यटकों को लाने का है, जिससे शहर की पहचान मिट रही है. जो विनाश चल रहा है, उसने हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व की बहस को फिर से जिंदा कर दिया है. हिंदू धर्म बहुलवाद और सहिष्णुता पर जोर देता है, जबकि हिंदुत्व एक पत्थर की तरह कठोर बहुसंख्यक पहचान को बढ़ावा देता है.
मणिकर्णिका घाट का हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में अद्वितीय महत्व है. माना जाता है कि यहां अंतिम संस्कार से तत्काल मोक्ष मिलता है. किंवदंतियां कहती हैं कि भगवान शिव खुद मरते हुए व्यक्ति के कान में तारक मंत्र कहते हैं. हिंदुओं के लिए, मणिकर्णिका केवल एक घाट नहीं बल्कि मुक्ति का द्वार है.
यह बात बेहद परेशान करने वाली है कि ये मान्यताएं मोदी और आरएसएस के विचारकों के लिए कोई मायने नहीं रखतीं. मणिकर्णिका घाट पर बुलडोजर चलने पर आरएसएस की चुप्पी उसके पाखंड को उजागर करती है. अहिल्याबाई होलकर से जुड़ी मूर्तियों और सदियों पुरानी कलाकृतियों को कथित तौर पर क्षतिग्रस्त या फेंक दिया गया है, जिसके खिलाफ सोशल मीडिया पर #SaveManikarnika जैसे अभियान चले हैं.
उत्तर प्रदेश सरकार का रवैया टालमटोल वाला रहा है. वीडियो सबूत होने के बावजूद, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस पर “एआई-जनित” वीडियो फैलाने का आरोप लगाया. इस तरह का इनकार नैतिक कायरता को दर्शाता है. प्रशासन का दावा है कि क्षतिग्रस्त पत्थर केवल वास्तुशिल्प के टुकड़े थे और होलकर की प्रतिमा सुरक्षित है. हालांकि, वायरल वीडियो में मूर्ति मलबे के बीच पड़ी दिखाई दे रही है, जो सरकारी बयानों का खंडन करती है.
विडंबना यह है कि 55,000 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजना सीवेज सिस्टम और भीतरी सड़कों जैसी बुनियादी नागरिक जरूरतों के बजाय लक्जरी होटलों और पर्यटन बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता देती है. वाराणसी की मार्केटिंग एक ग्लोबल टूरिज्म हब के रूप में की जा रही है, लेकिन इसके लिए आस्था, इतिहास और जीवित संस्कृति की बलि दी जा रही है.
लोग वाराणसी इसकी आध्यात्मिकता, जीवन-मृत्यु के अनुष्ठानों और प्राचीन मंदिरों के लिए आते हैं—न कि लक्जरी होटलों के लिए. विदेशी पर्यटक यहां फाइव-स्टार सुविधाओं में रहने नहीं, बल्कि शहर की कच्ची, पवित्र आत्मा को महसूस करने आते हैं. इसकी प्राचीनताओं और परंपराओं को नष्ट करने से केवल इसकी वैश्विक अपील कम होगी.
जैसा कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने अपने 16 जनवरी के ज्ञापन में सही कहा है, आज वाराणसी में विकास का मतलब आस्था, इतिहास और संस्कृति का व्यवस्थित विनाश है. वाराणसी केवल एक शहर नहीं है—यह करोड़ों सनातन विश्वासियों की एक जीवित सभ्यता है. दुख की बात है कि विकास के नाम पर इस विरासत को एक सुनियोजित तरीके से खत्म किया जा रहा है.
नफरती भाषण को सिर्फ पुलिसिया मुद्दा नहीं, ‘संवैधानिक टॉर्ट’ माना जाए: सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की दलील
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार (20 जनवरी, 2026) को प्रमुख कार्यकर्ताओं और धार्मिक नेताओं ने मांग की कि ‘हेट स्पीच’ यानी नफरती भाषण को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या न मानकर इसे “संवैधानिक टॉर्ट” के रूप में मान्यता दी जाए. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नफरती भाषण अपनी प्रकृति में “भेदभावपूर्ण” होते हैं और ये सीधे तौर पर संवैधानिक गारंटियों पर चोट करते हैं.
संवैधानिक टॉर्ट एक न्यायिक उपाय है जिसके तहत जब राज्य के एजेंट संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, तो राज्य को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ नफरती भाषण की बढ़ती घटनाओं और ऐसी प्रथाओं को बढ़ावा देने वाली धार्मिक सभाओं को विनियमित करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है और पक्षों को दो सप्ताह के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है.
कार्यकर्ता सईदा हामिद और अकादमिक आलोक राय की ओर से पेश वकील शाहरुख आलम ने दलील दी कि हेट स्पीच को एक नियमित पुलिसिंग चिंता तक सीमित नहीं किया जा सकता. उन्होंने कोर्ट से कहा, “इसके भेदभावपूर्ण प्रभाव को देखते हुए इसे कानून-व्यवस्था के चश्मे से परे देखा जाना चाहिए. इसे संवैधानिक टॉर्ट (क्षति) मानने से अधिक जवाबदेही सुनिश्चित होगी.”
पत्रकार शाहीन अब्दुल्ला और कुर्बान अली की ओर से पेश वकील निजाम पाशा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 21 अक्टूबर, 2022 के आदेश के बावजूद, जिसमें राज्यों को नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था, जमीन पर बहुत कम बदलाव आया है. पाशा ने कहा, “ऐसे भाषण अक्सर आदतन अपराधियों द्वारा दिए जाते हैं, जिन्हें धार्मिक सभाओं की प्रकृति के बारे में पहले से जानकारी होती है, फिर भी राज्य की जांच एजेंसियां निष्क्रिय रहती हैं.”
पाशा ने बेंच को बताया कि हेट स्पीच और हेट क्राइम (नफरती अपराध) के बीच सीधा संबंध है, और अक्सर भड़काऊ सार्वजनिक भाषणों के बाद हिंसा की घटनाएं होती हैं. उन्होंने कहा कि जब पीड़ित एफआईआर के लिए पुलिस के पास जाते हैं, तो पुलिस कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन करती है. कई बार एफआईआर दर्ज नहीं की जाती या हल्की धाराएं लगाई जाती हैं.
मामले में एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) के रूप में सहायता कर रहे वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने तर्क दिया कि नफरती भाषण को व्यावसायिक रूप से लाभदायक बनाने वाले बड़े मीडिया निगमों पर लगाम लगाने के लिए सुधारों की आवश्यकता है. उन्होंने सवाल उठाया, “बाजार की अफवाह के रूप में शुरू होने वाली बात तुरंत सोशल मीडिया पर फैल जाती है... नफरती भाषण को लाभहीन बनाने के लिए एक तंत्र होना चाहिए.”
2018 में तहसीन पूनावाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग और नफरती अपराधों को रोकने के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति के निर्देश दिए थे, लेकिन हेगड़े ने बताया कि इसका प्रभावी कार्यान्वयन नहीं हो रहा है. 2022 में कोर्ट ने देश में “नफरत के माहौल” पर चिंता जताई थी.
राज्यपाल अभिभाषण की परंपरा को खत्म करने के लिए संविधान संशोधन लाने की द्रमुक की योजना
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने घोषणा की है कि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक), अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर, एक ऐसे संवैधानिक संशोधन के लिए प्रयास करेगी जो हर साल विधानसभा के पहले सत्र की शुरुआत राज्यपाल के पारंपरिक अभिभाषण से करने की प्रथा को समाप्त कर देगा. यह घोषणा मंगलवार को तमिलनाडु विधानसभा के सत्र के दौरान हुई, जहां राज्यपाल आर.एन. रवि के अभिभाषण को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया.
हिंदू के मुताबिक राज्यपाल रवि ने राज्य सरकार द्वारा तैयार किया गया भाषण पढ़ने से इनकार कर दिया और सदन से वॉकआउट कर गए. इस कार्रवाई को विधानसभा के नियमों और परंपराओं का उल्लंघन मानते हुए, मुख्यमंत्री स्टालिन ने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसे सदन ने सर्वसम्मति से पारित कर दिया. इस प्रस्ताव में राज्यपाल की कार्रवाई को अस्वीकार किया गया और यह तय किया गया कि सरकार द्वारा तैयार किए गए भाषण को ही सदन में पढ़ा हुआ माना जाएगा.
मुख्यमंत्री स्टालिन ने कहा कि राज्यपाल के पास सरकार द्वारा तैयार किए गए भाषण में अपनी व्यक्तिगत टिप्पणी जोड़ने या उसे संपादित करने का कोई अधिकार नहीं है. उन्होंने बताया कि राज्यपाल ने 19 जनवरी को भाषण के संबंध में कुछ स्पष्टीकरण मांगे थे, जिनका जवाब दे दिया गया था, फिर भी उन्होंने जानबूझकर संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया. स्टालिन ने इस कार्रवाई को विधानसभा के गरिमा और परंपराओं का अपमान बताया.
स्टालिन ने 10 अप्रैल 2023 के अपने भाषण का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि पूर्व मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि राज्यपाल के पद को अनावश्यक मानते थे, लेकिन उन्होंने इस पद का सम्मान किया, जब तक वह मौजूद था. स्टालिन ने स्वयं भी इसी सिद्धांत का पालन किया और राज्यपाल के अभिभाषण के लिए कदम उठाए. उन्होंने कहा, “यह खेदजनक है कि राज्यपाल ने पहले की तरह ही कार्य किया है.”
मुख्यमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि राज्यपाल को लोगों की कल्याण और विकास के प्रति सच्ची चिंता दिखानी चाहिए और सरकार के साथ सहयोग करना चाहिए, जैसा कि संविधान उनसे अपेक्षा करता है. उन्होंने कहा कि राज्यपाल का व्यवहार इसके विपरीत था.
स्टालिन ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि यह समस्या केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है; कई अन्य राज्यों में भी राज्यपाल निर्वाचित सरकारों के लिए “बाधा” बन रहे हैं. उन्होंने कहा, “जब कोई बार-बार इस तरह से कार्य करता है, तो यह स्वाभाविक है कि कोई भी यह सवाल उठाएगा कि नियम क्यों मौजूद होने चाहिए.” इसी के चलते डीएमके और अन्य समान विचारधारा वाले दल मिलकर राज्यपाल के अभिभाषण की प्रथा को खत्म करने के लिए संविधान में संशोधन की वकालत करेंगे.
मुख्यमंत्री ने दिन में बाद में ‘द हिंदू‘ में 19 जनवरी 2026 को प्रकाशित ‘रिकैलसिट्रेंट गवर्नर’ (अड़ियल राज्यपाल) शीर्षक वाले संपादकीय का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि राज्यपाल आर.एन. रवि के कार्य ने संपादकीय की बातों को सही साबित कर दिया है कि राज्यपाल न तो संविधान का सम्मान करते हैं, न ही लोगों की सरकार का, और न ही निर्वाचित विधानसभा का. उन्होंने कहा कि राज्यपाल अपने कार्यों से सरकार की उपलब्धियों को छिपा नहीं सकते.
केरल विधानसभा में भारी हंगामा: केबिनेट द्वारा अनुमोदित भाषण को राज्यपाल ने बदल दिया
केरल विधानसभा में बजट सत्र के पहले दिन मंगलवार को उस समय भारी हंगामा देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर द्वारा पारंपरिक ‘नीतिगत संबोधन’ में संपादन करने (काटछाँट करने) पर उन्हें टोका.
अनीसा पीए की रिपोर्ट है कि राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने लगभग दो घंटे तक अपना भाषण पढ़ा. लेकिन उनके भाषण के तुरंत बाद, मुख्यमंत्री ने कमान संभाली और यह स्पष्ट किया कि राज्यपाल ने मंत्रिपरिषद द्वारा अनुमोदित कुछ पैराग्राफों में बदलाव कर दिए. मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के अनुसार, राज्यपाल ने उन वाक्यों को हटा दिया, जिनमें विधेयकों को पारित करने में देरी के लिए उनकी (राज्यपाल की) आलोचना की गई थी और केंद्रीय करों में राज्य के उचित हिस्से को देने से इनकार करने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की गई थी.
मुख्यमंत्री ने कहा, “मंत्रिपरिषद द्वारा अनुमोदित नीतिगत संबोधन के पैराग्राफ 12, 15 और 16 में, राज्यपाल के भाषण के दौरान कुछ बदलाव किए गए. संविधान की भावना और सदन की परंपराओं के अनुसार, मंत्रिपरिषद द्वारा अनुमोदित नीतिगत संबोधन ही मान्य होता है.” उन्होंने आगे कहा कि संपादित किए गए पैराग्राफ कैबिनेट द्वारा अनुमोदित मूल रूप में ही रहेंगे.
हालांकि, राजभवन (लोक भवन) ने इस विवाद को “निराधार” बताया है. राजभवन से जारी एक बयान में कहा गया: “सरकार ने प्रतिक्रिया दी थी कि भाषण को उन संशोधनों के साथ तैयार और पढ़ा जा सकता है जिन्हें राज्यपाल उचित समझें. यह संकेत भी दिया गया था कि सुझाव दिए गए बदलावों के साथ भाषण दोबारा भेजा जा सकता है. हालांकि, कल आधी रात के बाद वही भाषण बिना किसी संशोधन के वापस राज्यपाल को भेज दिया गया था.”
बाज़ार में नौकरी नहीं है, 6 साल में सबसे कम एंट्री लेवल की रिक्तियां दर्ज की गईं
मोदी सरकार ‘विकास’ का दम भरती है, लेकिन इस साल के अंत में नौकरी के बाजार में प्रवेश करने के लिए तैयार एक करोड़ से अधिक युवा भारतीयों के लिए पर्याप्त नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं. कमल कारंत के अनुसार, जनवरी 2026 में पिछले छह वर्षों में सबसे कम एंट्री-लेवल (शुरुआती स्तर) की रिक्तियां दर्ज की गईं, जिनकी संख्या मात्र 42,000 थी; यह आंकड़ा सरकार के बड़े-बड़े दावों के खोखलेपन को उजागर करता है.
‘बिजनेसलाइन’ में कारंत ने लिखा है कि कोविड ने हमें जो कई चीजें विरासत में दी हैं, उनमें से एक समय और प्रवृत्तियों को ‘महामारी से पहले’ और ‘महामारी के बाद’ के रूप में विभाजित करने का एक मानक भी है. लॉकडाउन के बाद के समय में ‘टैलेंट मार्केट’ (प्रतिभा बाजार) में भी कई बदलाव आए, जिससे हमें महामारी से पहले की नौकरियों के रुझानों की तुलना करने का मौका मिला. जून 2020 में महामारी के शुरुआती चरण के दौरान सक्रिय रिक्तियों की संख्या 1,32,000 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिरने के बाद, टीकाकरण के बाद भर्ती की प्रक्रिया फिर से शुरू हुई और जनवरी 2022 में सक्रिय मांग बढ़कर 3,25,000 रिक्तियों तक पहुंच गई.
हालांकि, जुलाई 2022 में यह ग्राफ उतनी ही तेजी से गिरा जितनी तेजी से चढ़ा था, क्योंकि वैश्विक स्तर पर ‘फंडिंग विंटर’ (निवेश में कमी) शुरू हो गई थी. साथ ही रूस-यूक्रेन संघर्ष और कई बड़ी आईटी कंपनियों को इस बात का देर से एहसास हुआ कि उन्होंने ज़रूरत से ज़्यादा भर्तियां कर ली हैं. 2023 तक प्रमुख टैलेंट सेक्टरों में भर्ती की गतिविधियों पर मंदी का असर दिखने लगा और तब से इसमें सुधार नहीं हुआ है.
यदि हम सांख्यिकीय रूप से 2021 और 2022 को भर्ती के लिए ‘सुनहरे वर्ष’ कहें, तो उसके बाद की अवधि भी उतनी खराब नहीं रही थी. जनवरी 2023 की शुरुआत 2,72,000 सक्रिय नौकरियों के साथ हुई, और 2024 की शुरुआत 2,65,000 के साथ. फिर 2025 की शुरुआत एक आशाजनक 3,10,000 सक्रिय टैलेंट मांग के साथ हुई. लेकिन जनवरी 2026 की शुरुआत जनवरी 2021 के बाद से दूसरी सबसे कम सक्रिय मांग — 2,00,000 रिक्तियों के साथ हुई है.
आईटी और बीएफएसआई (बैंकिंग और वित्तीय सेवाएं) क्षेत्र पारंपरिक रूप से नई नौकरियों के सबसे बड़े स्रोत रहे हैं. लेकिन पिछले साल, नए एफटीई (पूर्णकालिक कर्मचारी) जोड़ने के मामले में बीएफएसआई की वृद्धि 1 प्रतिशत से भी कम रही. इस वित्तीय वर्ष के पहले नौ महीनों में, कर्मचारी जोड़ने के मामले में आईटी सेवा कंपनियां भी स्थिर रही हैं. यदि आप नौकरी के बाजार में हैं और आपकी ईमेल या कॉल का जवाब नहीं मिल रहा है, तो कृपया ध्यान दें कि वर्तमान रिक्तियां महामारी के समय के निचले स्तर के करीब हैं.
असम के कोकराझार में सड़क दुर्घटना के बाद भड़की हिंसा, प्रशासन ने इंटरनेट पर लगाई रोक
असम के कोकराझार जिले में सोमवार रात एक सड़क दुर्घटना ने दो समुदायों, बोडो और आदिवासियों के बीच गंभीर सांप्रदायिक तनाव को जन्म दिया. इस हिंसा के कारण प्रशासन को मंगलवार को जिले में इंटरनेट सेवाओं को निलंबित करना पड़ा.
घटना सोमवार रात तब हुई जब बोडो समुदाय के तीन लोगों को ले जा रही एक गाड़ी ने आदिवासी समुदाय के दो लोगों को टक्कर मार दी. इस हादसे में एक आदिवासी व्यक्ति, सिखना जव्हलाओ बिस्मित, की मौत हो गई, जबकि चार अन्य घायल हो गए, जिनका कोकराझार मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में इलाज चल रहा है. जैसे ही दुर्घटना की खबर फैली, इलाके में तनाव बढ़ गया. मंगलवार को, दोनों समुदायों के लोगों ने पास के करिगांव पुलिस चौकी के निकट राष्ट्रीय राजमार्ग को अवरुद्ध कर दिया. उन्होंने टायर जलाए, कुछ घरों में आग लगा दी, एक सरकारी कार्यालय को भी फूंक दिया और पुलिस चौकी पर हमला करने का भी प्रयास किया. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए त्वरित कार्रवाई बल (रैपिड एक्शन फोर्स) को तैनात किया गया है.
पुलिस अधीक्षक आखत गर्ग ने बताया कि उन्होंने रात में 19 लोगों को हिरासत में लिया है और कानून के अनुसार कार्रवाई की जा रही है. तनाव को फैलने से रोकने और अफवाहों को फैलने से रोकने के लिए, राज्य सरकार ने पूरे कोकराझार जिले में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का आदेश दिया है. यह प्रतिबंध अगले आदेशों तक लागू रहेगा. पड़ोसी चिरांग जिले में भी इसी तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं.
बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद (बीटीसी) के प्रमुख हाग्रामा मोहिलरी ने शांति की अपील करते हुए कहा कि यह एक “गलतफहमी” थी जिसे “तीसरे पक्ष” द्वारा भड़काया जा रहा है ताकि वे इस स्थिति का राजनीतिक लाभ उठा सकें. उन्होंने दोनों समुदायों से मिलकर रहने और शांति बनाए रखने का आग्रह किया. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी सभी से शांति बनाए रखने और सामान्य स्थिति बहाल करने में सरकार का सहयोग करने की अपील की है.
“तुम्हारा करियर बर्बाद हो गया है,” जी एन साईंबाबा को याद करने वाले छात्रों को जज की चेतावनी
मुंबई की एक अदालत ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान-टिस्स) के नौ छात्रों को प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा की पुण्यतिथि मनाने के संबंध में दर्ज मामले में गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी है. हालांकि, इस दौरान न्यायाधीश ने छात्रों को उनके भविष्य और करियर पर पड़ने वाले संभावित गंभीर परिणामों के बारे में कड़ी चेतावनी दी. अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए, सत्र न्यायालय के न्यायाधीश ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, “तुम्हारे ऊपर अब एक आपराधिक मामला दर्ज है. यह जानकारी सिर्फ यहाँ नहीं, बल्कि पूरे देश के पुलिस रिकॉर्ड में उपलब्ध है. तुमने अपने करियर की शुरुआत से पहले ही एक बड़ी गलती कर दी है. तुम्हारा करियर बर्बाद हो गया है.“ न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यह केस उनके भविष्य की रोजगार संभावनाओं को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है, चाहे वे सरकारी नौकरी की तलाश करें या निजी क्षेत्र में.
यह मामला 12 अक्टूबर 2025 को टिस्स परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम से संबंधित है, जिसे पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा की पहली पुण्यतिथि के रूप में मनाया गया था. प्रोफेसर साईबाबा को मार्च 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया था. 2017 में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने पलट दिया था. न्यायाधीश ने छात्रों के वकील से उनके पाठ्यक्रमों के बारे में पूछा. जब उन्हें पता चला कि छात्र ‘मास्टर्स इन सोशल वर्क’ कर रहे हैं, तो न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “तुम्हें लगता है कि तुम वैज्ञानिक या इंजीनियर हो? आजकल तो इंजीनियरों को भी नौकरी नहीं मिल रही है.” उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे अपनी पढ़ाई और करियर पर ध्यान केंद्रित करें, बजाय इसके कि वे ऐसे मामलों में फंसें. अदालत ने छात्रों की अग्रिम जमानत याचिकाओं पर सुनवाई को महीने के अंत तक के लिए स्थगित कर दिया और उन्हें गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की. इस मामले में छात्रों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, जैसे मोबाइल फोन और लैपटॉप, को भी जांच के दौरान जब्त कर लिया गया था.
जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तानी नागरिकों का निर्वासन: बिछड़े परिवारों की दर्द भरी दास्तान
अप्रैल 2025 में कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान से आए नागरिकों के निर्वासन (डिपोर्टेशन) के फैसले ने कई परिवारों को बेरहमी से अलग कर दिया है. ‘आर्टिकल-14’ के लिए आकिब जावेद की रिपोर्ट के अनुसार, इन निर्णयों का सबसे गहरा असर उन पाकिस्तानी महिलाओं पर पड़ा है, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर के स्थानीय पुरुषों से शादी की थी और लॉन्ग टर्म वीज़ा (एलटीवी) पर दशकों से रह रही थीं.
पुंछ जिले के रहने वाले अंजुम तनवीर की पत्नी, अतिया असलम, जो उस समय गर्भवती थीं, को 28 अप्रैल 2025 को 59 अन्य पाकिस्तानी नागरिकों के साथ भारत से निर्वासित कर दिया गया था. तनवीर ने अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए महीनों तक सरकारी दफ्तरों और नेताओं के चक्कर लगाए, लेकिन उनकी गुहार अनसुनी कर दी गई. 5 सितंबर को, अतिया ने पाकिस्तान में एक बेटे को जन्म दिया, जिसे उसके पिता ने आज तक नहीं देखा है. तनवीर की दो साल की बेटी अपनी माँ की अनुपस्थिति में गुमसुम रहती है और हर दिन रोती है.
इसी तरह, उत्तरी कश्मीर के बारामूला के 73 वर्षीय गुलाम रसूल जरगर, जो 40 साल से अपनी पाकिस्तानी पत्नी परवीना अख्तर के साथ रह रहे थे, को भी अचानक अलग कर दिया गया. जरगर का कहना है, “हमने 40 साल साथ बिताए. अब, जब हम जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं, उन्होंने मेरी आत्मा मुझसे छीन ली.” कई रिपोर्टों से पता चलता है कि जिन लोगों को निर्वासित किया गया, उनमें से कई महिलाएं एलटीवी पर भारत में कानूनी रूप से रह रही थीं. उनके वीज़ा समय-समय पर नवीनीकृत होते रहे थे. परिवारों का दावा है कि निर्वासन के समय उनके वीज़ा नवीनीकरण के आवेदन लंबित थे, फिर भी उन्हें अचानक देश छोड़ने का नोटिस दिया गया.
मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील इस कार्रवाई को मनमाना और अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन बता रहे हैं. उनका कहना है कि आतंकवादी हमलों के लिए निर्दोष परिवारों को सजा देना मानवीय मूल्यों के खिलाफ है. यह घटना भारत के विभाजन के बाद से परिवारों के बिछड़ने की दर्दनाक यादों को ताजा करती है, खासकर नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास रहने वाले लोगों के लिए, जिन्होंने सीमा पार रिश्तों को फिर से जोड़ने के लिए विवाह को एक माध्यम बनाया था.
नागरहोल में आदिवासियों का मार्च. ज़मीन के अधिकार की मांग और टाइगर सफारी के विरोध में सड़कों पर उतरे
कर्नाटक के नागरहोल क्षेत्र में आदिवासी समुदायों ने अपने अधिकारों और पैतृक जमीन की मान्यता की मांग को लेकर पदयात्रा निकाली. मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह पदयात्रा नागरहोल आदिवासी जम्मा पाले हक्कू स्थापना समिति के नेतृत्व में हुई, जिसमें 52 हाड़ियों के लोग शामिल हुए. उन्होंने कोडागु और मैसूरु जिलों के 29 गांवों से होकर करीब 70 किलोमीटर की यात्रा की.
आदिवासियों की मुख्य मांग वन अधिकार कानून 2006 के तहत उनके अधिकारों की मान्यता और नागरहोल टाइगर रिजर्व में चल रही कथित अवैध टाइगर सफारी को बंद करना है. समुदाय का कहना है कि यह सफारी उनकी ज़मीन पर ग्राम सभा की अनुमति के बिना चलाई जा रही है.
कराड़ी कल्लू वन अधिकार समिति के अध्यक्ष जे. ए. शिवु ने कहा कि यह यात्रा वन अधिकार कानून को लागू कराने और सामुदायिक अधिकारों को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए थी. उन्होंने बताया कि नागरहोल को 2007 में बिना ग्राम सभा की सहमति के टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था.
पदयात्रा के दौरान कई गांवों में ग्राम सभाएं हुईं और वन अधिकार कानून के उल्लंघन पर चर्चा की गई. इसके बाद समुदाय ने कोडागु और मैसूरु प्रशासन को एक सप्ताह में बैठक बुलाने की मांग की. उनकी एक मांग यह भी है कि ताज होटल परियोजना से जुड़े जर्जर भवनों को समुदाय को सौंपा जाए ताकि वहां सामुदायिक शिक्षा केंद्र बनाया जा सके.
इस संघर्ष की जड़ें पुरानी हैं. मई 2025 में जेनु कुरुबा समुदाय के 52 परिवार अपने पैतृक गांव लौटे थे, जहां वे अब भी अस्थायी तंबुओं में रह रहे हैं. खराब मौसम और सुविधाओं की कमी से कई महिलाएं और बच्चे बीमार हो चुके हैं. समुदाय का आरोप है कि वन विभाग उन्हें डराता है और उनके अधिकारों को नज़रअंदाज़ करता है.
आदिवासियों का कहना है कि उन्हें 1970 और 1980 के दशक में जबरन जंगलों से निकाला गया और बाद में कॉफी बागानों में बेहद कम मज़दूरी पर काम करने को मजबूर किया गया. वे खुद को जंगल का मूल निवासी बताते हैं और कहते हैं कि संरक्षण के नाम पर उन्हें बेदखल किया जा रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि देश में संरक्षण की नीतियां अक्सर आदिवासियों को हटाकर पर्यटन और व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देती हैं. नागरहोल के आदिवासियों ने साफ कहा है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो उनका आंदोलन और तेज होगा
इंदौर जल संकट के बाद बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, नगर निगम आयुक्त दिलीप यादव का तबादला
इंदौर नगर निगम के पूर्व आयुक्त दिलीप कुमार यादव को मध्य प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम का प्रबंध निदेशक बनाया गया है. यह उनका बीते पंद्रह दिनों में दूसरा तबादला है. इससे पहले 3 जनवरी को उन्हें पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में उप सचिव के पद पर तैनात किया गया था.
यह तबादला इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले के बाद हुआ है. इस घटना में कम से कम 15 लोगों की मौत की पुष्टि एक सरकारी मेडिकल रिपोर्ट में हुई है. स्थानीय लोगों का दावा है कि अब तक उल्टी-दस्त की बीमारी से 24 लोगों की जान जा चुकी है.
मौतों के एक दिन पहले ही दिलीप यादव को इस मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था. इसके बाद राज्य सरकार ने 20 जनवरी को एक उच्चस्तरीय समिति गठित की, जो इस पूरे मामले की जांच कर रही है. इस समिति की अध्यक्षता सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय कुमार शुक्ला कर रहे हैं. समिति यह जांच करेगी कि घटना किन कारणों से हुई और प्रशासनिक या तकनीकी स्तर पर क्या लापरवाही रही.
रिपोर्ट के मुताबिक़, यह तबादला मध्य प्रदेश सरकार द्वारा किए गए बड़े प्रशासनिक फेरबदल का हिस्सा है. इस फेरबदल में 1994 से 2018 बैच के कुल 26 आईएएस अधिकारियों का तबादला किया गया है.
इसी मामले में इंदौर नगर निगम के अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया और कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव को निलंबित कर दिया गया है. इस बीच, दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि हाल ही में इंदौर में आयोजित एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच के दौरान खिलाड़ी शुभमन गिल के साथ आए दल ने पीने के पानी को और साफ करने के लिए तीन लाख रुपये की वाटर प्यूरीफिकेशन मशीन का इस्तेमाल किया था.
यह मामला राज्य में जल आपूर्ति, प्रशासनिक लापरवाही और जनस्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.
भारत में खेलने के लिए आईसीसी की “अनुचित शर्तों” को बांग्लादेश ने नकारा
बांग्लादेश ने आगामी आईसीसी टी20 विश्व कप 2026 में अपनी भागीदारी के संबंध में आईसीसी द्वारा थोपी गई “अनुचित शर्तों” को खारिज कर दिया है. बांग्लादेश के युवा एवं खेल सलाहकार आसिफ नजरूल ने मंगलवार को कहा, “अगर आईसीसी भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) के दबाव में झुकती है और हम पर अनुचित शर्तें थोपती है, तो हम उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे.”
दरअसल, आईसीसी और बीसीबी (बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड) अधिकारियों के बीच कई दौर की चर्चा के बावजूद, कोई समाधान नहीं निकल पाया है, जिससे आगामी टी20 विश्व कप में बांग्लादेश की भागीदारी अनिश्चित हो गई है. ‘एएनआई’ के मुताबिक, आसिफ नजरूल ने कहा, “अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जब भारत ने पाकिस्तान में खेलने से इनकार कर दिया था, तो आईसीसी ने वेन्यू (स्थल) बदल दिया था. हमने भी वेन्यू बदलने की मांग की है.”
उल्लेखनीय है कि बांग्लादेशी तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को आगामी आईपीएल2026 से बाहर किए जाने के बाद, बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा परिस्थितियों में टीम भारत में नहीं खेलेगी.
हरियाणा में शॉल विक्रेता कश्मीरी युवकों से बदसलूकी, ‘जय श्रीराम’ बोलने के लिए दबाव डाला
हरियाणा के यमुनानगर में शॉल बेचने वाले दो कश्मीरी युवकों पर जय श्री राम और भारत माता की जय बोलने का दबाव डालने का मामला सामने आया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ स्थानीय युवकों ने कश्मीरी युवकों नज़ीर अहमद ख्वाजा और इम्तियाज़ अहमद को पाकिस्तानी बताया. ‘न्यूज़18 उर्दू’ के मुताबिक, एक युवक वीडियो बनाते हुए कश्मीरी युवकों को धमकाता नजर आ रहा है. वीडियो में आरोपी युवक कहता सुनाई दे रहा है- अब यहां दिखाई नहीं देना, नहीं तो और युवकों को बुलाकर कपड़े भी छीन लेंगे. युवक यह भी कहता है कि हिंदुस्तान में रहकर हिंदुस्तान के नहीं हो सकते तो तुम्हारे कपड़े छिनेंगे ही. बातचीत के दौरान कश्मीरी युवक खुद को हिंदुस्तानी बताता है और कहता है कि हम भी देश से प्यार करते हैं. लेकिन सबकी अपनी-अपनी धार्मिक आस्था है. “यदि हम आपसे कलमा पढ़ने को कहेंगे तो आप पढ़ेंगे?”, कश्मीरी युवक वीडियो में सवाल करता सुनाई दे रहा है.
बहरहाल, घटना की सूचना फैलते ही आसपास के लोग भी मौके पर एकत्र हो गए, जिससे कुछ देर के लिए तनाव जैसी स्थिति बन गई. हालांकि गांव के कुछ जिम्मेदार लोगों ने बीचबचाव कर मामला शांत कराया, जिसके बाद दोनों युवक वहां से दूसरे गांव की ओर चले गए. पिछले 25 दिन में यह तीसरा मामला है, जिसमें कश्मीरी युवकों के साथ इस तरह की घटना हुई है.
आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट: ‘अज़मल कसाब ने अवमानना नहीं की थी, लेकिन मेनका गांधी ने की है’
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में शीर्ष अदालत के आदेशों की आलोचना करने पर पूर्व मंत्री मेनका गांधी के प्रति नाराजगी व्यक्त की और कहा कि उन्होंने ‘कोर्ट की अवमानना’ की है.
“द न्यू इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि पूर्व मंत्री ने बिना सोचे-समझे हर किसी के खिलाफ “हर तरह की टिप्पणियां” की हैं. हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह अपनी उदारता के कारण मेनका गांधी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं कर रही है.
गांधी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से सवाल करते हुए पीठ ने कहा, “आपने कहा कि अदालत को अपनी टिप्पणी में संयत रहना चाहिए, लेकिन क्या आपने अपनी मुवक्किल से पूछा है कि उन्होंने किस तरह की टिप्पणियां की हैं? क्या आपने उनका पॉडकास्ट सुना है? उन्होंने बिना सोचे-समझे सबके खिलाफ हर तरह की बातें की हैं. क्या आपने उनके हाव-भाव देखे हैं?”
सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी से यह भी सवाल किया कि आवारा कुत्तों की समस्या को हल करने के लिए उन्होंने कितना बजटीय आवंटन दिलाने में मदद की है. इस पर रामचंद्रन ने उत्तर दिया कि वह आतंकवादी अजमल कसाब की ओर से भी पेश हो चुके हैं और बजटीय आवंटन एक नीतिगत मामला है. इस दलील पर न्यायमूर्ति नाथ ने टिप्पणी की, “अजमल कसाब ने अदालत की अवमानना नहीं की थी, लेकिन आपकी मुवक्किल ने की है.”
उल्लेखनीय है कि 13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह राज्यों को कुत्ते के काटने की घटनाओं के लिए “भारी मुआवजा” देने का निर्देश देगा और कुत्ते को खाना खिलाने वालों (डॉग फीडर्स) को जवाबदेह ठहराएगा.
भारत में मेडिकल मारिजुआना का बढ़ता चलन
भारत में औषधीय भांग (मेडिकल मारिजुआना) दर्द, तनाव और नींद की समस्याओं के इलाज के लिए एक मुख्य विकल्प बनती जा रही है. लंबे समय तक सामाजिक कलंक और कानूनी अस्पष्टता के कारण मेडिकल मारिजुआना से दूरी बनाई गई थी. लेकिन बीते साल-डेढ़ साल के भीतर, पौधों पर आधारित प्राकृतिक उपचारों के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण इसमें लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है.
परन बालाकृष्णन लिखते हैं कि भारतीय कंपनियां इस क्षेत्र में अग्रणी हैं. ये कंपनियां दर्द, चिंता, अनिद्रा और यहां तक कि पालतू जानवरों के लिए भी 40 से अधिक प्रकार के उत्पाद (जैसे तेल, टैबलेट, कैप्सूल और स्प्रे) बना रही हैं.
भारत में एनडीपीएस (स्वापक औषधि एवं नशीला पदार्थ) अधिनियम के तहत भांग के फूल (गांजा) और राल (चरस) प्रतिबंधित हैं, लेकिन पौधे की पत्तियों और बीजों का औषधीय उपयोग वैध है. कंपनियां आयुष मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के तहत और लाइसेंस प्राप्त करके काम कर रही हैं. रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर अब कैंसर के रोगियों, पुराने दर्द से जूझ रहे लोगों और अनिद्रा के शिकार मरीजों को इसकी सलाह दे रहे हैं. ये दवाएं केवल डॉक्टर के पर्चे पर ही उपलब्ध हैं. कई कंपनियां ऑनलाइन परामर्श के माध्यम से भी मरीजों को सही खुराक और उत्पाद चुनने में मदद करती हैं.
भारत में भांग का उपयोग सदियों से आयुर्वेद में होता रहा है. आधुनिक कंपनियां इसी प्राचीन ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और शुद्धता के मानकों के साथ जोड़कर बाजार में ला रही हैं. बेंगलुरु जैसे शहरों में इसके विशेष स्टोर खुल रहे हैं. रतन टाटा जैसे बड़े निवेशकों ने भी इस क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए शुरुआती निवेश किया है. हालांकि, कीमतें अभी भी थोड़ी अधिक हैं, क्योंकि कच्चा माल सीधे सरकार से लेना पड़ता है और प्रक्रिया काफी जटिल है.
सार यह है कि मेडिकल मारिजुआना अब केवल एक ‘विदेशी विचार’ नहीं रह गया है, बल्कि भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र का एक वैज्ञानिक और कानूनी हिस्सा बनता जा रहा है.
पहलगाम हमले के बाद टूटीं ज़िंदगियां, कश्मीर में पाकिस्तानी पत्नियों की बेदखली ने उजाड़े परिवार
जम्मू-कश्मीर में अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद सरकार की कार्रवाई का सबसे बड़ा असर उन परिवारों पर पड़ा है, जिनकी महिलाएं पाकिस्तान से शादी कर भारत आई थीं. कई ऐसी महिलाएं, जो वर्षों से भारत में रह रही थीं और वैध लॉन्ग टर्म वीज़ा (एलटीवी) पर थीं, उन्हें अचानक देश छोड़ने को मजबूर कर दिया गया.
पुंछ के रहने वाले अंजुम तनवीर की कहानी इस त्रासदी की एक मिसाल है. ‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ उनकी पत्नी अतिया असलम, जो गर्भवती थीं, को 28 अप्रैल को अन्य पाकिस्तानी नागरिकों के साथ पाकिस्तान भेज दिया गया. उस वक्त वह छह महीने की गर्भवती थीं. 5 सितंबर को उन्होंने पाकिस्तान में एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन अब तक भारत लौट नहीं पाई हैं. तनवीर रोज़ पुलिस और नेताओं के दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन कोई मदद नहीं मिली.
इसी तरह बारामूला के 73 वर्षीय गुलाम रसूल ज़रगर की पत्नी परवीना अख्तर को भी 40 साल साथ रहने के बाद पाकिस्तान भेज दिया गया. उनकी बहू ने हाल में बच्चे को जन्म दिया था, इसलिए उसे रुकने दिया गया, लेकिन पत्नी को सीमा पार भेज दिया गया. ज़रगर कहते हैं, ‘ज़िंदगी के आख़िरी पड़ाव पर मेरी आत्मा मुझसे छीन ली गई’.
इन महिलाओं के पास वैध दस्तावेज थे और उनके वीज़ा समय-समय पर बढ़ाए जाते रहे थे. इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें यह कहकर निकाला कि उनके वीज़ा की अवधि समाप्त हो चुकी है, जबकि कई मामलों में नवीनीकरण के आवेदन लंबित थे. सरकार ने 24 अप्रैल को कहा था कि पाकिस्तानी नागरिकों के वीज़ा रद्द करने का आदेश लॉन्ग टर्म वीज़ा धारकों पर लागू नहीं होगा, फिर भी ज़मीनी स्तर पर इसका पालन नहीं हुआ. पुलिस अधिकारियों ने माना कि आदेश गृह मंत्रालय से आया था और उन्होंने सिर्फ उसे लागू किया.
मानवाधिकार संगठनों ने इस कार्रवाई को अमानवीय बताया है. ह्यूमन राइट्स वॉच की मीनाक्षी गांगुली ने कहा कि यह कदम परिवारों को तोड़ने वाला और बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है. एमनेस्टी इंडिया के आकार पटेल ने कहा कि ऐसी कार्रवाई न तो न्याय दिलाती है और न ही आतंकवाद से लड़ने में मदद करती है.
कई परिवार अब अदालतों का दरवाज़ा खटखटा रहे हैं. वकील अंकुर शर्मा का कहना है कि गर्भवती महिलाओं और वर्षों से भारत में रह रही पत्नियों को इस तरह निकालना संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन है. आज कश्मीर में दर्जनों परिवार ऐसे हैं जो अपनों से बिछड़ चुके हैं. सीमा के इस पार और उस पार बसे ये लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि “क्या हमारी ज़िंदगी की क़ीमत इतनी भी नहीं थी?
भारत और पोलैंड के बीच तीखी नोकझोंक: जयशंकर ने पाकिस्तान के आतंकवाद पर दी चेतावनी, रूस तेल पर ईयू के रवैये पर उठाए सवाल
भारत और पोलैंड के विदेश मंत्रियों के बीच नई दिल्ली में हुई मुलाकात में दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय मुद्दों, विशेष रूप से पाकिस्तान से उत्पन्न आतंकवाद और रूस के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए. भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने पोलैंड समकक्ष राडोस्लाव सिकोरस्की से कहा कि भारत उम्मीद करता है कि उसके साझेदार “पड़ोस में आतंकवादी ढांचे को बढ़ावा देने” में मदद न करें. जयशंकर का यह बयान सिकोरस्की की हालिया पाकिस्तान यात्रा के संदर्भ में देखा जा रहा है. उन्होंने जोर देकर कहा कि आतंकवाद के प्रति “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनाई जानी चाहिए.
जयशंकर ने यूरोपीय संघ (ईयू) द्वारा रूस से तेल आयात करने वाले भारतीय कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंधों को “चुनिंदा लक्ष्यीकरण” करार दिया और इसे “अनुचित और अन्यायपूर्ण” बताया. उन्होंने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए स्वतंत्र निर्णय लेता है और इस पर बाहरी दबाव स्वीकार्य नहीं है. पोलैंड के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की ने स्वीकार किया कि दोनों देशों के बीच “ईमानदार” बातचीत हुई. उन्होंने आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के साथ सहमति जताई, लेकिन साथ ही रूस और बेलारूस में भारत की भागीदारी वाले “ज़ापद-2025” सैन्य अभ्यासों को “खतरनाक” बताया. सिकोरस्की ने यह भी कहा कि पोलैंड भी “आगजनी और राज्य-संबद्ध तोड़फोड़” जैसी घटनाओं का सामना कर चुका है.
यह कूटनीतिक तकरार ऐसे समय में हुई है जब भारत और यूरोपीय संघ एक बड़े व्यापार समझौते (एफटीए) को अंतिम रूप देने के करीब हैं, जिसकी उम्मीद अगले सप्ताह है. दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत हो रहे हैं, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद स्पष्ट रूप से सामने आए हैं. जयशंकर की तीखी टिप्पणियों को भारत की विदेश नीति में बढ़ती मुखरता के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें वह राष्ट्रीय हितों से समझौता करने को तैयार नहीं है.
ट्रंप ने पोस्ट किया अमेरिका का नया नक्शा, कनाडा और ग्रीनलैंड को दिखाया ‘अमेरिकी क्षेत्र’
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर ग्रीनलैंड पर अपना दावा जताते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर अमेरिका का एक नया नक्शा पोस्ट किया है, जिसमें कनाडा और ग्रीनलैंड को अमेरिकी क्षेत्र के रूप में दिखाया गया है. यह कदम उनके उस पुराने रुख को दर्शाता है जिसमें वे राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए आर्कटिक द्वीप ग्रीनलैंड पर नियंत्रण चाहते हैं. ट्रम्प द्वारा साझा की गई एआई-जनित तस्वीरों में से एक में उन्हें ओवल ऑफिस में नाटो नेताओं, जैसे फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के साथ दिखाया गया है, और पृष्ठभूमि में अमेरिका का एक ऐसा नक्शा है जिसमें ग्रीनलैंड और कनाडा शामिल हैं. एक अन्य तस्वीर में ट्रम्प, उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ ग्रीनलैंड में अमेरिकी झंडा फहराते हुए दिख रहे हैं, जिस पर “ग्रीनलैंड, यूएस टेरिटरी, EST. 2026” लिखा है.
ग्रीनलैंड पर ट्रम्प के इस नए जोर ने यूरोप, विशेष रूप से डेनमार्क, जो ग्रीनलैंड का प्रशासन करता है, में चिंता पैदा कर दी है. डेनमार्क के मंत्रियों ने चेतावनी दी है कि अगर तनाव बढ़ता है तो यूरोप को एक सामूहिक जवाब देना होगा. हालांकि, ट्रम्प ने अपने ट्रेजरी सचिव के माध्यम से उन्माद को खारिज करते हुए कहा है कि वे अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच समाधान निकालने के लिए आश्वस्त हैं. ट्रम्प ने अपने पुराने तर्क को दोहराते हुए कहा कि ग्रीनलैंड राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और रूस व चीन जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अमेरिका को इस पर नियंत्रण रखना चाहिए. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जो यूरोपीय देश ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण का विरोध करेंगे, उन्हें टैरिफ (आयात शुल्क) का सामना करना पड़ सकता है. यह भी उल्लेखनीय है कि ट्रम्प ने पहले कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने का सुझाव दिया था, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ा था. हालांकि, उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि कनाडा अमेरिका का हिस्सा नहीं बनेगा.
ट्रम्प की ग्रीनलैंड धमकियों के बाद अब पीछे हटने का रास्ता नहीं: ईयू प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन
यूरोपीय संघ (ईयू) की मुख्य कार्यकारी उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने मंगलवार को दावोस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामकता के जवाब में अमेरिका से “स्थायी” स्वतंत्रता का आह्वान किया. ‘एक्सियोस’ के लिए ज़ैचरी बसु की रिपोर्ट के मुताबिक, वॉन डेर लेयेन ने ट्रम्प के रवैये की तुलना 1971 के “निक्सन शॉक” से करते हुए इसे संबंधों में एक बड़ी दरार बताया.
यह बयान वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में गहरे तनाव के बीच आया है, जहां ट्रम्प के बुधवार को पहुंचने की उम्मीद है. ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर नियंत्रण करने की जिद और इसका विरोध करने वाले सहयोगियों पर टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने की धमकियों ने यूरोपीय नेताओं को झकझोर दिया है. ट्रम्प ने नाटो प्रमुख मार्क रुटे और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के कथित निजी संदेशों को सोशल मीडिया पर पोस्ट करके तनाव को और बढ़ा दिया है.
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष वॉन डेर लेयेन ने अपने भाषण में चेतावनी दी कि ट्रम्प की धमकियों पर ईयू की प्रतिक्रिया “अडिग, एकजुट और समानुपातिक” होगी उन्होंने संकेत दिया कि अगर वाशिंगटन अपनी धमकियों पर आगे बढ़ता है, तो पिछली गर्मियों में हुआ अमेरिका-ईयू व्यापार समझौता—जिसे ट्रम्प ने “अब तक का सबसे बड़ा सौदा” कहा था—खतरे में पड़ जाएगा ईयू जवाबी कार्रवाई के तौर पर 93 अरब यूरो के टैरिफ पैकेज पर विचार कर रहा है
वॉन डेर लेयेन ने कहा, “राजनीति में, व्यापार की तरह, सौदा एक सौदा होता है और जब दोस्त हाथ मिलाते हैं, तो इसका कोई मतलब होना चाहिए.” उन्होंने चेतावनी दी कि अब “समय काटने” की कोशिश यूरोप की कमजोरी को ही बढ़ाएगी. उन्होंने कहा कि “दुनिया स्थायी रूप से बदल गई है,” और यूरोप अब अपनी अर्थव्यवस्था को जोखिम मुक्त करने और अमेरिका के बिना सौदे करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
ईयू प्रमुख ने कहा कि ट्रम्प का ग्रीनलैंड संकट हमें एक “गिरावट के चक्र” में धकेल रहा है जिससे रूस और चीन को फायदा होगा. ईयू ग्रीनलैंड की स्थानीय अर्थव्यवस्था का समर्थन करने के लिए एक निवेश पैकेज तैयार कर रहा है और यूके, कनाडा, नॉर्वे और आइसलैंड जैसे भागीदारों के साथ सुरक्षा साझेदारी मजबूत करने की योजना बना रहा है.
यूरोप ने अमेरिकी टैरिफ समझौते की मंजूरी को निलंबित करने की योजना बनाई
यूरोपीय संसद ने जुलाई में हुए अमेरिकी टैरिफ समझौते की मंजूरी को निलंबित करने की योजना बनाई है. ‘बीबीसी’ के रिपोर्टर जोनाथन जोसेफ्स और निक एडसर के अनुसार, संसद की अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समिति के करीबी सूत्रों ने यह जानकारी दी है कि इस निलंबन की घोषणा बुधवार को स्ट्रासबर्ग, फ्रांस में किए जाने की उम्मीद है.
यह कदम अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव में एक और वृद्धि को दर्शाता है, क्योंकि डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड के अधिग्रहण के अपने प्रयासों को तेज कर दिया है और सप्ताहांत पर इस मुद्दे को लेकर नए टैरिफ की धमकी दी है. इस गतिरोध ने वित्तीय बाजारों को हिला दिया है, जिससे व्यापार युद्ध और अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की चर्चा फिर से शुरू हो गई है.
मंगलवार को अटलांटिक के दोनों किनारों पर शेयर बाजार नीचे गिरे. यूरोपीय शेयर बाजारों में लगातार दूसरे दिन गिरावट देखी गई और तीन मुख्य अमेरिकी शेयर सूचकांक सुबह के कारोबार में 1% से अधिक गिर गए. मुद्रा बाजारों में अमेरिकी डॉलर में भारी गिरावट आई, जबकि यूरो और पाउंड में मजबूती देखी गई. दुनिया भर में कर्ज लेने की लागत भी बढ़ गई है.
अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापार तनाव तब से कम हो गया था, जब दोनों पक्षों ने जुलाई में स्कॉटलैंड में ट्रम्प के टर्नबेरी गोल्फ कोर्स में एक समझौता किया था. उस समझौते के तहत यूरोपीय सामानों पर अमेरिकी शुल्क 15% निर्धारित किया गया था, लेकिन शनिवार को ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प की धमकी के कुछ घंटों के भीतर, यूरोपीय संसद के प्रभावशाली सदस्य मैनफ्रेड वेबर ने कहा कि “इस स्तर पर मंजूरी संभव नहीं है.”
ईयू ने अमेरिकी टैरिफ के जवाब में 93 अरब यूरो के अपने जवाबी पैकेज को रोके रखा था, लेकिन यह राहत 6 फरवरी को समाप्त हो रही है. इसका मतलब है कि अगर ईयू विस्तार के लिए कदम नहीं उठाता या नया सौदा मंजूर नहीं करता, तो 7 फरवरी से ईयू के शुल्क लागू हो जाएंगे.
दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में बोलते हुए, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय नेताओं को जवाबी कार्रवाई के खिलाफ चेतावनी दी और कहा, “मैं सभी से कहता हूं, शांत हो जाओ लंबी सांस लो प्रतिशोध मत लो.”
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दावोस में एक भाषण में “बीच की शक्तियों” से एकजुट होने का आग्रह किया, ताकि महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का मुकाबला किया जा सके. उन्होंने चेतावनी दी, “जब हम केवल एक आधिपत्य के साथ द्विपक्षीय बातचीत करते हैं, तो हम कमजोरी से बातचीत करते हैं... यह संप्रभुता नहीं है.”
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.










