20/02/2026: ट्रंप टैरिफ को अदालत की ना | बेकसूर गलगोटिया | कफ सिरप कंपनियों पर 'क़त्ल' का दाग़ | भारत के टूटे पंख | एपस्टीन और पेंटागन बिल्डिंग | भारत के असली दानवीर कौन?
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ लगाने के अधिकार को रद्द किया.
उज्बेकिस्तान में बच्चों की मौत पर भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने दवा कंपनी को फटकार लगाई.
प्रधानमंत्री के नए आवास के पास सुरक्षा कारणों से 700 परिवारों को घर खाली करने का नोटिस.
अमेरिकी अधिकारी का दावा 2020 में मुंबई बिजली गुल होने के पीछे चीन का हाथ था.
इंदौर में हज़ारों मुस्लिम मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाने की साज़िश का आरोप.
गुजरात सरकार का प्रस्ताव लव मैरिज करने पर माता पिता को व्हाट्सएप अलर्ट जाएगा.
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ को रद्द किया
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुनाया कि डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक व्यापार को अस्त-व्यस्त करने वाले टैरिफ (आयात शुल्क) लगाकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है. इसके साथ ही अदालत ने उस प्रमुख हथियार पर रोक लगा दी है जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति अपने आर्थिक एजेंडे को लागू करने के लिए कर रहे थे.
“एएफपी” के मुताबिक, रूढ़िवादी बहुमत वाली शीर्ष अदालत ने छह-तीन के बहुमत से यह निर्णय सुनाते हुए कहा कि ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (आईईईपीए) “राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने के लिए अधिकृत नहीं करता है.”
हालाँकि ट्रंप लंबे समय से टैरिफ का उपयोग दबाव और बातचीत के एक माध्यम के रूप में करते रहे हैं, लेकिन पिछले साल राष्ट्रपति पद पर लौटने के बाद उन्होंने लगभग सभी अमेरिकी व्यापारिक भागीदारों पर नए शुल्क थोपने के लिए आपातकालीन आर्थिक शक्तियों का अभूतपूर्व उपयोग किया था.
इनमें उन व्यापारिक प्रथाओं पर लगाए गए “पारस्परिक” टैरिफ शामिल थे जिन्हें वाशिंगटन ने अनुचित माना था, साथ ही अवैध नशीले पदार्थों के प्रवाह और आव्रजन के मुद्दे पर प्रमुख भागीदारों—मेक्सिको, कनाडा और चीन—को निशाना बनाने वाले शुल्कों के अलग सेट भी शामिल थे.
अदालत ने शुक्रवार को उल्लेख किया कि “यदि कांग्रेस (अमेरिकी संसद) का इरादा आईईईपीए के माध्यम से टैरिफ लगाने की विशिष्ट और असाधारण शक्ति प्रदान करना होता, तो उसने स्पष्ट रूप से ऐसा किया होता, जैसा कि उसने अन्य टैरिफ कानूनों में लगातार किया है.”
यह फैसला उन क्षेत्र-विशिष्ट शुल्कों को प्रभावित नहीं करता है जो ट्रंप ने स्टील, एल्युमीनियम और विभिन्न अन्य वस्तुओं के आयात पर अलग से लगाए हैं. औपचारिक जाँचें, जो अंततः इस तरह के और अधिक क्षेत्रीय टैरिफ का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं, अभी भी प्रक्रिया में हैं.
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय निचली अदालतों के उन पिछले निष्कर्षों की पुष्टि करता है, जिनमें कहा गया था कि आईईईपीए के तहत ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ अवैध थे.
मई में एक निचली व्यापार अदालत ने फैसला सुनाया था कि ट्रंप ने व्यापक स्तर पर लगाए गए शुल्कों के साथ अपने अधिकार का उल्लंघन किया है और उनमें से अधिकांश को प्रभावी होने से रोक दिया था, लेकिन सरकार द्वारा अपील किए जाने के कारण उस फैसले पर रोक लगा दी गई थी.
एक्सियोस के मुताबिक इस फैसले ने राष्ट्रपति की शक्तियों की एक सीमा तय कर दी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति कांग्रेस (संसद) की मंजूरी के बिना अपनी मर्जी से अनचाहे टैक्स नहीं थोप सकते.
फैसले में कहा गया कि ट्रंप प्रशासन ने ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (आईईईपीए) का गलत इस्तेमाल किया. प्रशासन का मानना था कि यह कानून राष्ट्रपति को एकतरफा तौर पर असीमित टैरिफ लगाने और जब चाहे बदलने की शक्ति देता है. लेकिन अदालत ने इस व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि ऐसा करना टैरिफ नीति पर राष्ट्रपति के अधिकार का “परिवर्तनकारी और अवैध विस्तार” होगा.
नवंबर में हुई एक त्वरित सुनवाई के बाद आए इस फैसले ने न केवल ट्रंप की नीतियों को रोका है, बल्कि एक नई प्रशासनिक अराजकता का खतरा भी पैदा कर दिया है. खतरा यह है कि जिन कंपनियों ने अब तक ये टैरिफ भरे हैं, वे अब रिफंड की मांग करेंगी. यह रकम अरबों डॉलर में हो सकती है. इसी मुद्दे पर जस्टिस ब्रेट कावानो ने अपनी असहमति (डिसेंट) जताते हुए लिखा कि कोर्ट ने आज यह नहीं बताया कि सरकार उन अरबों डॉलर को वापस कैसे करेगी जो उसने आयातकों से वसूले हैं.
इसका असर बाजारों पर भी दिखा. फैसले के बाद शेयर बाजार और कीमती धातुओं में उछाल आया. एसएंडपी 500 इंडेक्स में बढ़त देखी गई, जबकि चांदी की कीमतों में 5% से ज्यादा और सोने में 1.7% की तेजी आई. हालांकि, कहानी यहीं खत्म नहीं होती. ट्रंप प्रशासन ने पहले ही संकेत दे दिया था कि अगर कोर्ट उनके टैरिफ को अवैध करार देता है, तो वे अन्य व्यापारिक कानूनों (ट्रेड पावर्स) का सहारा लेकर नए तरीके से टैक्स लगाएंगे. यानी टैरिफ पूरी तरह खत्म नहीं होंगे, बस उनका रूप बदल सकता है.
हरकारा डीप डाइव:
जब मोदी झूठ बोल सकते हैं, तो गलगोटिया क्या चीज़ है!
भारत में आयोजित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंपैक्ट समिट के दौरान सामने आए “चीनी रोबोट कुत्ता” विवाद ने केवल एक विश्वविद्यालय को कठघरे में नहीं खड़ा किया, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था, संस्थागत विश्वसनीयता और बौद्धिक माहौल पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए. हरकारा डीप डाइव पर इस विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ हुई बातचीत में इस पूरे प्रकरण को व्यापक संदर्भ में समझने की कोशिश की गई.
विवाद तब शुरू हुआ जब गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीन में निर्मित एक रोबोट कुत्ते को अपना प्रोजेक्ट बताकर प्रदर्शित किया. मामला उजागर होते ही सोशल मीडिया पर मज़ाक़ शुरू हुआ, विश्वविद्यालय ने बयान जारी किया, संबंधित प्रोफेसर को ज़िम्मेदार ठहराया गया और सरकार की ओर से उनका स्टॉल हटवा दिया गया.
अपूर्वानंद ने इस बातचीत में कहा है कि इस घटना को अलग-थलग नहीं देखा जाना चाहिए. उनके अनुसार, झूठ को “इरादा नेक था” कहकर वैध ठहराने की जो प्रवृत्ति सार्वजनिक जीवन में मज़बूत हुई है, उसी माहौल में ऐसी घटनाएँ संभव होती हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब सार्वजनिक मंचों पर वैज्ञानिक तथ्यों की जगह मिथकीय व्याख्याएँ प्रस्तुत की जाती हैं तो संस्थागत स्तर पर सत्यापन और बौद्धिक अनुशासन कमज़ोर पड़ते हैं.
समिट स्वयं एक बड़े वैश्विक आयोजन के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जिसमें कई देशों के प्रतिनिधि शामिल थे. इसे भारत की एआई में उपस्थिति और नेतृत्व के प्रदर्शन के रूप में प्रचारित किया गया. लेकिन बुनियादी स्तर पर सत्यापन, चयन और प्रबंधन में कमी ने आयोजन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए. बातचीत में यह भी रेखांकित किया गया कि जब हर आयोजन को व्यक्तित्व-निर्माण और छवि विस्तार का माध्यम बना दिया जाता है, तो चेक-एंड-बैलेंस की व्यवस्था कमज़ोर हो जाती है.
चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निजी विश्वविद्यालयों की स्थिति पर केंद्रित रहा. अपूर्वानंद ने कहा कि कई निजी संस्थानों की रैंकिंग और शोध दावों पर गंभीर संदेह है. भारी फीस के कारण छात्र “ग्राहक” बन जाते हैं और मूल्यांकन की स्वतंत्रता प्रभावित होती है.
अपूर्वानंद ने यह भी कहा कि गलगोटिया प्रकरण को केवल उपहास का विषय बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है. असली प्रश्न यह है कि क्या हमारे संस्थान सत्य, तर्क और बौद्धिक ईमानदारी के प्रति प्रतिबद्ध हैं. यदि हम वास्तव में एआई और विज्ञान के क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना चाहते हैं, तो हमें पहले अपने शैक्षणिक ढांचे, नियामक संस्थाओं और जवाबदेही तंत्र को मज़बूत करना होगा.
बातचीत के अंत में सबसे बड़ी चिंता युवाओं को लेकर व्यक्त की गई. छात्र उम्मीद लेकर विश्वविद्यालयों में आते हैं. यदि संस्थागत स्तर पर गुणवत्ता और विश्वसनीयता कमज़ोर होगी, तो सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं का होगा. यह केवल एक रोबोट कुत्ते का मामला नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में गहराते संकट का संकेत है.
कफ़ सिरप कंपनी पर “हत्या का केस चलना चाहिए”
उज्बेकिस्तान में कफ सिरप पीने से हुई 18 बच्चों की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा स्थित दवा कंपनी ‘मैरियन बायोटेक’ को कड़ी फटकार लगाई है. गुरुवार (19 फरवरी) को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कंपनी के अधिकारियों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ जारी समन को चुनौती दी थी.
अदालत का रुख बेहद सख्त था. जजों ने कंपनी के वकीलों से साफ कहा, “आपका सिरप बच्चों की मौत के लिए जिम्मेदार पाया गया है. आप पर तो हत्या का आरोप (मर्डर चार्ज) भी लगना चाहिए. इतने बच्चों की जान गई है, और आप राहत की उम्मीद कर रहे हैं? आपको कोई रियायत (इंडलजेंस) नहीं मिलेगी.” कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी घटनाओं से पूरी दुनिया में देश का नाम खराब होता है, इसलिए कंपनी पर आईपीसी की और भी सख्त धाराएं लगनी चाहिए थीं, जो फिलहाल गायब दिख रही हैं.
मामला 2022 का है जब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने मैरियन बायोटेक के ‘डोक-1 मैक्स’ और ‘एम्ब्रोनॉल’ कफ सिरप को लेकर अलर्ट जारी किया था. जांच में ड्रग इंस्पेक्टर ने पाया था कि कंपनी के सैंपल “मानक गुणवत्ता के नहीं” (नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी) थे और उनमें मिलावट थी. इसके बाद कंपनी के निदेशकों और अधिकारियों को समन भेजा गया था.
कंपनी के अधिकारी पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट गए थे, लेकिन 14 जनवरी को हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. अब सुप्रीम कोर्ट से भी याचिका खारिज होने के बाद, कंपनी के अधिकारियों के पास कोई रास्ता नहीं बचा है. उन्हें अब गौतम बुद्ध नगर की निचली अदालत में पेश होना होगा और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत आपराधिक कार्यवाही का सामना करना होगा.
प्रधानमंत्री के नए आवास के कारण 700 से अधिक परिवारों को बेदखली का नोटिस
आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा गुरुवार को जारी एक नोटिस के अनुसार, रेस कोर्स रोड के किनारे स्थित भाई राम कैंप, मस्जिद कैंप और डीआईडी कैंप के निवासियों को क्षेत्र खाली करने या कानूनी कार्रवाई का सामना करने का निर्देश दिया गया है.
‘टीएनआईई’ के मुताबिक, नोटिस में कहा गया है कि यह भूमि सरकारी स्वामित्व वाली है और इस पर किसी भी प्रकार का निरंतर कब्जा अनधिकृत माना जाएगा. यह नोटिस कम से कम एक निवासी को व्यक्तिगत रूप से दिया गया है और माना जा रहा है कि यह इन तीन बस्तियों के सभी निवासियों (लगभग 700 परिवार) पर लागू होता है. शुक्रवार की रिपोर्टों के अनुसार, अधिकारियों ने संकेत दिया है कि निर्देश का पालन न करने पर बेदखली की कार्रवाई और संबंधित कानूनों के तहत अन्य कानूनी उपाय किए जा सकते हैं.
स्थानीय निवासियों और पर्यवेक्षकों द्वारा इस कदम को क्षेत्र में सुरक्षा कारणों से भी जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि रेस कोर्स रोड के पड़ोस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नया आधिकारिक आवास बन रहा है. हालांकि इस संबंध की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन उच्च सुरक्षा वाले सरकारी परिसरों से निकटता को बेदखली नोटिस की जल्दबाजी के पीछे एक प्रमुख कारक माना जा रहा है.
इस सूचना ने भाई राम कैंप, मस्जिद कैंप और डीआईडी कैंप के निवासियों के बीच चिंता पैदा कर दी है. उनमें से कई का कहना है कि वे वर्षों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं और काम तथा बुनियादी सेवाओं के लिए आसपास के मोहल्लों पर निर्भर हैं. कुछ निवासियों ने कहा कि उन्हें अभी तक परिसर खाली करने की समय सीमा या पुनर्वास या वैकल्पिक आवास की पेशकश के बारे में स्पष्टता नहीं मिली है.
मामले से परिचित अधिकारियों ने कहा कि यह कार्रवाई राजधानी के उच्च सुरक्षा और केंद्रीय क्षेत्रों में सरकारी भूमि को वापस लेने और सुरक्षित करने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है. रेस कोर्स रोड, जहाँ प्रमुख सरकारी और आधिकारिक आवास स्थित हैं, एक संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है, और अधिकारी समय-समय पर इसके आसपास से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करते रहे हैं.
नोटिस में परिसर खाली करने के लिए किसी सटीक समय सीमा का उल्लेख नहीं है, लेकिन चेतावनी दी गई है कि यदि निवासी पालन नहीं करते हैं तो प्रवर्तन कार्रवाई की जा सकती है. बेदखली की आशंका से विस्थापन और आजीविका की चिंताएं बढ़ रही हैं, ऐसे में उम्मीद है कि निवासी स्पष्टीकरण, राहत या पुनर्वास के लिए स्थानीय अधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों से संपर्क करेंगे.
मंत्रालय ने अभी तक अगले कदमों की रूपरेखा या पुनर्वास योजनाओं के विवरण के बारे में कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया है, जिससे निवासी अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता में हैं.
‘पैक्स सिलिका कार्यक्रम’ में जैकब हेलबर्ग ने पुष्टि कर दी कि 2020 में मुंबई की बिजली गुल होने के पीछे चीन का हाथ था?
अमेरिकी आर्थिक मामलों के अवर सचिव जैकब हेलबर्ग ने शुक्रवार को “सीमा पार से एक की-स्ट्रोक (कंप्यूटर बटन दबाने) के माध्यम से भारत के एक महान शहर की बत्तियाँ बुझ जाने” के बारे में बात की, जिससे उन अटकलों को बल मिला है कि अमेरिकी आर्थिक मामलों के अवर सचिव ने 12 अक्टूबर, 2020 को मुंबई में बिजली गुल होने की घटना के बारे में वही पुष्टि की है, जिसका लंबे समय से संदेह जताया जा रहा था.
द टेलीग्राफ के अनुसार, हेलबर्ग की यह टिप्पणी तब आई जब अमेरिका और भारत ने पैक्स सिलिका घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए, जो महत्वपूर्ण खनिजों, सेमीकंडक्टर्स और उभरती प्रौद्योगिकियों में रणनीतिक सहयोग को और गहरा करता है.
अपने भाषण में, हेलबर्ग ने बढ़ते आर्थिक दबाव और साइबर खतरों के प्रति आगाह किया. उन्होंने कहा, “हम देख रहे हैं कि हमारे मित्र और सहयोगी देश दैनिक आधार पर आर्थिक दबाव और ब्लैकमेल के खतरों का सामना कर रहे हैं, जहाँ उन्हें अपनी संप्रभुता और अपनी समृद्धि के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर किया जाता है.”
उन्होंने आगे जोड़ा: “हमने सीमा पार से एक ‘की-स्ट्रोक’ (कंप्यूटर का एक बटन दबाने) के माध्यम से भारत के एक महान शहर की बत्तियाँ बुझते हुए देखी हैं...”
हेलबर्ग संभवतः मुंबई के उस ब्लैकआउट का जिक्र कर रहे थे, जिसके बारे में व्यापक रूप से यह संदेह जताया गया था कि वह चीनी साइबर घुसपैठ से जुड़ा था.
हेलबर्ग ने आगे कहा, “...आज, जब हम ‘पैक्स सिलिका’ घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर रहे हैं, तो हम हथियारों के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली निर्भरता को ‘ना’ कहते हैं, और हम ब्लैकमेल को ‘ना’ कहते हैं. और साथ मिलकर, हम यह कहते हैं कि आर्थिक सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा है...”
2020 का मुंबई बिजली ग्रिड फेलियर
12 अक्टूबर, 2020 को मुंबई और मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) के कई हिस्सों में भारी बिजली कटौती हुई थी, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया और उपनगरीय ट्रेन सेवाएं भी ठप हो गई थीं. इस बिजली कटौती का कारण शहर को बिजली आपूर्ति करने वाली लाइनों में कई बार ‘ट्रिपिंग’ होना बताया गया था, जिससे लगभग 360 मेगावाट बिजली प्रभावित हुई थी.
बाद की रिपोर्टों में यह संकेत दिया गया कि 2020 के मध्य में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर बढ़ते सीमा तनाव के बीच, चीनी सरकार द्वारा प्रायोजित तत्वों ने भारतीय बिजली ग्रिड और बंदरगाहों को निशाना बनाने के लिए मैलवेयर तैनात किया होगा.
हालांकि, चीन के विदेश मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को “गैर-जिम्मेदाराना” बताते हुए खारिज कर दिया था और तर्क दिया था कि बीजिंग को इन कथित साइबर गतिविधियों से जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत नहीं है. प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा था, “पर्याप्त सबूत न होने पर किसी विशेष पक्ष पर आरोप लगाना बेहद गैर-जिम्मेदाराना है.”
कोई विकल्प नहीं बचा: सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल के ‘एसआईआर’ में न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का आदेश दिया
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभ्यास के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के लिए सेवारत और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों सहित न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का आदेश दिया. कोर्ट ने इसके लिए राज्य सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के बीच सहयोग की स्पष्ट कमी का हवाला दिया.
सुचित्रा कल्याण मोहंती के अनुसार, निर्वाचन आयोग (ईसी) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेतृत्व वाली सरकार के बीच चल रहे “दुर्भाग्यपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप के खेल” पर दुख व्यक्त करते हुए, मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने ये निर्देश जारी किए. पीठ ने कहा कि “असाधारण परिस्थितियों” के कारण उसे यह “असाधारण आदेश” पारित करना पड़ा है.
पीठ ने टिप्पणी की, “आरोपों और जवाबी आरोपों का एक दुर्भाग्यपूर्ण खेल चल रहा है, जो दो संवैधानिक संस्थाओं—राज्य सरकार (पश्चिम बंगाल) और चुनाव आयोग—के बीच विश्वास की कमी को दर्शाता है. अब यह प्रक्रिया उन व्यक्तियों के दावों और आपत्तियों के स्तर पर अटकी हुई है, जिन्हें तार्किक विसंगति सूची में शामिल किया गया है. “
शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को 28 फरवरी तक राज्य में मतदाताओं की मसौदा सूची प्रकाशित करने की अनुमति दे दी, साथ ही आयोग को बाद में पूरक सूचियाँ जारी करने की भी छूट दी.
पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया में दावों और आपत्तियों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति का निर्देश देते हुए पीठ ने कहा कि उसके पास राज्य न्यायपालिका (सेवानिवृत्त अधिकारियों सहित) को शामिल करने के अलावा “कोई विकल्प नहीं” बचा था ताकि इस अभ्यास को पूरा किया जा सके.
अदालत ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि वे एसआईआर ड्यूटी के लिए जिला न्यायाधीश या उससे ऊपर के रैंक के सेवारत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को उपलब्ध कराएं. कोर्ट ने यह कदम तब उठाया जब उसने इस बात पर गंभीर संज्ञान लिया कि राज्य सरकार इस कार्य के लिए पर्याप्त ‘ग्रेड-ए’ अधिकारी उपलब्ध नहीं करा रही है.
पीठ ने कहा, “हमारे पास कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से यह अनुरोध करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है कि वे कुछ सेवारत न्यायिक अधिकारियों के साथ-साथ अतिरिक्त जिला न्यायाधीश या जिला न्यायाधीश रैंक के कुछ पूर्व न्यायिक अधिकारियों को उपलब्ध कराएं, जो प्रत्येक जिले में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट’ (तार्किक विसंगति सूची) के तहत दावों के निपटारे या उनके पुनरीक्षण में सहायता कर सकें.”
भाजपा कार्यकर्ताओं के ज़रिये मुस्लिम मतदाताओं के ख़िलाफ़ फॉर्म-7 का इस्तेमाल, इंदौर में हज़ारों नामों पर आपत्ति
बिहार, पश्चिम बंगाल और असम के बाद अब मध्य प्रदेश के इंदौर में भी बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने की कोशिश का मामला सामने आया है. इंदौर में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान हज़ारों मतदाताओं के ख़िलाफ़ आपत्तियां दर्ज की गई हैं, जिनमें अधिकतर मुस्लिम हैं. यह रिपोर्ट तबस्सुम बड़नगरवाला ने लिखी है और ‘स्क्रॉल’ में प्रकाशित हुई है.
इंदौर के बीजलपुर इलाके के 81 वर्षीय फकीर मोहम्मद का नाम भी हटाने के लिए आवेदन दिया गया. फकीर मोहम्मद का जन्म 1945 में इंदौर में हुआ था. उन्होंने 60 साल से एक भी लोकसभा चुनाव नहीं छोड़ा, लेकिन उन्हें पता चला कि उनके नाम को मतदाता सूची से हटाने के लिए यह कहते हुए आपत्ति दी गई है कि वह भारतीय नागरिक नहीं हैं. शुरू में उन्हें यह मज़ाक़ लगा, लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनकी कॉलोनी के कम से कम 53 लोगों के नाम पर आपत्ति लगी है और वे सभी मुस्लिम हैं, तो उनकी चिंता बढ़ गई. उन्होंने 1961 के ज़मीन के रिकॉर्ड समेत कई दस्तावेज़ दिखाकर अपनी नागरिकता साबित की.
इंदौर में आठ विधानसभा सीटों को मिलाकर बनने वाली लोकसभा सीट में अब तक 11,682 फॉर्म-7 आवेदन अपलोड हो चुके हैं, लेकिन वास्तविक संख्या 50,000 से अधिक बताई जा रही है, क्योंकि कई आवेदन अभी अपलोड नहीं हुए हैं.
फॉर्म-7 के ज़रिये किसी मतदाता का नाम हटाने की मांग की जा सकती है, यदि वह स्थानांतरित हो गया हो, मर चुका हो, किसी और बूथ में दर्ज हो या भारतीय नागरिक न हो. 2022 से पहले ऐसा आवेदन उसी बूथ का मतदाता या बूथ लेवल अधिकारी ही दे सकता था, लेकिन नियम बदलने के बाद अब उसी विधानसभा क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति यह आवेदन दे सकता है.
कांग्रेस के जिला समन्वयक अब्दुल वसीम राजावत का आरोप है कि ज़्यादातर फॉर्म-7 आवेदन भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा मुस्लिम मतदाताओं के ख़िलाफ़ दिए गए हैं. स्क्रॉल ने जिन सात लोगों से बात की, उनमें से छह ने खुद को भाजपा से जुड़ा बताया. फकीर मोहम्मद के ख़िलाफ़ शिकायत करने वाले महेंद्र भाटिया ने भी स्वीकार किया कि वह भाजपा से जुड़े हैं. उनका कहना था कि “देश में घुसपैठिए वोटर बने हैं, उन्हें हटाना ज़रूरी है.” हालांकि वह यह नहीं बता सके कि उन्होंने नागरिकता की जांच कैसे की.
बीजलपुर के 53 मतदाताओं की जांच बूथ लेवल अधिकारी ने की और सभी भारतीय नागरिक पाए गए, लेकिन अब तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई है. राजेंद्र नगर थाने के वरिष्ठ निरीक्षक प्रदीप कुमार यादव ने कहा कि मामले पर उच्च अधिकारियों से चर्चा होगी.
चंदन नगर वार्ड के पूर्व पार्षद रफीक खान ने बताया कि उनके वार्ड में 16,000 मतदाताओं में से 5,000 के ख़िलाफ़ फॉर्म-7 आपत्तियां दर्ज हुईं और वे सभी मुस्लिम हैं. खजराना इलाके में एक वार्ड में 40,000 मुस्लिम मतदाताओं में से 7,000 के नाम हटाने की मांग की गई. एक अन्य वार्ड में 11,000 मुस्लिम मतदाताओं में से 7,000 के ख़िलाफ़ आपत्ति दर्ज की गई. कई मामलों में यह आरोप लगाया गया कि मतदाता अपने पते पर नहीं रहते, जबकि जांच में यह गलत पाया गया.
कई बूथ लेवल अधिकारियों ने बताया कि उन्हें सैकड़ों आपत्तियों की जांच करनी पड़ी. रेशमा खान नाम की अधिकारी को 350 आपत्तियां मिलीं और 90% से ज़्यादा मामलों में आरोप झूठे निकले. एक अन्य अधिकारी शाहिना खान के बूथ पर 533 में से 240 मतदाताओं के खिलाफ एक ही दिन में आपत्ति दर्ज हुई.
कुछ मामलों में लोगों के नाम और वोटर आईडी की जानकारी का दुरुपयोग कर उनकी जानकारी के बिना फॉर्म-7 भरा गया. नवदीप शर्मा नाम के कॉलेज शिक्षक के नाम से खजराना के मतदाताओं के ख़िलाफ़ आपत्तियां दर्ज हुईं, जबकि वह उस इलाके में रहते भी नहीं हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें फॉर्म-7 के बारे में जानकारी भी नहीं थी.
भाजपा पार्षद महेश चौधरी का दावा है कि उनके कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर 4,000 मतदाताओं को पते पर नहीं पाया, जिसके बाद उन्होंने निरीक्षण की मांग की. हालांकि जिन दो मतदाताओं, मोहम्मद कुरैशी और हीना कुरैशी, के खिलाफ आपत्ति की गई, वे अपने पते पर ही रह रहे हैं.
इंदौर भाजपा प्रवक्ता सुमित मिश्रा ने इन आरोपों से इनकार किया है. वहीं कांग्रेस ने पुलिस में शिकायत दी है, लेकिन अब तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है.
रक्षा : वायु सेना की खरीद
टूटे पंख : जिन सवालों से जूझ रही है वायु शक्ति
टेलीग्राफ में येल यूनिवर्सिटी के अध्यापक और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सिंह का लेख “टूटे पंख” भारत की गिरती वायु शक्ति और मोदी सरकार की रक्षा खरीद नीतियों, विशेष रूप से राफेल सौदे की तीखी आलोचना करता है. मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
भारतीय वायु सेना की कमज़ोर स्थिति: भारतीय वायु सेना के पास स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन के मुकाबले केवल 29 स्क्वाड्रन बचे हैं. अलग-अलग तरह के विमानों का मिश्रण लॉजिस्टिक्स और ट्रेनिंग को महंगा और मुश्किल बना रहा है.
राफेल सौदा और लागत: लेखक का तर्क है कि 126 विमानों के मूल सौदे (जिसमें हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड शामिल था) को रद्द कर 36 विमानों का सौदा करना एक बड़ी गलती थी. ‘भारत-विशिष्ट संवर्द्धन’ की लागत 1.3 बिलियन यूरो थी. यह लागत 126 विमानों पर बंट सकती थी, लेकिन सिर्फ 36 विमानों पर यह बेहद महंगी साबित हुई. साथ ही, भारत को टेक्नोलॉजी या सोर्स कोड भी नहीं मिला, जिसका असर मई 2025 में पाकिस्तान के साथ झड़प में दिखा.
निजी कंपनियों और भ्रष्टाचार के सवाल: लेख में अनिल अंबानी की कंपनी को चुनने पर सवाल उठाए गए हैं, जिनके पास एयरोस्पेस का अनुभव नहीं था और जो जेफ्री एपस्टीन जैसे विवादित व्यक्ति से जुड़े थे. लेखक आशंका जताते हैं कि नए 114 जेट्स के सौदे में गौतम अडानी को फायदा पहुँचाया जा सकता है. यह भी सवाल है कि अनुभवी सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को दरकिनार क्यों किया गया. लेख में कहा गया हैैै
यह हमें 114 और राफेल के लिए मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट सौदे के इर्द-गिर्द वर्तमान प्रचार पर लाता है. यह प्रभावी रूप से वही टेंडर है जो दो दशक पहले शुरू हुआ था. एक पूरा राजनीतिक चक्कर लगाने में 10 साल बिताने के बाद, मोदी सरकार उसी ज़रूरत पर आ गई है जहाँ यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) सरकार थी. फर्क यह है कि कीमत तीन गुना हो गई है, और भारत का सुरक्षा वातावरण खराब हो गया है — चीन अब पाकिस्तान को बहुत ही उचित दरों पर अपने सबसे आधुनिक विमान मुहैया करा रहा है. इस बीच, भारत में स्वदेशी कार्यक्रम लड़खड़ा रहे हैं. एलसीए तेजस को वायुसेना बेड़े की रीढ़ माना जाना था लेकिन यह उत्पादन और इंजन की देरी से ग्रस्त है. एएमसीए पाँचवीं पीढ़ी का फाइटर चित्रों के एक सेट से ज़्यादा कुछ नहीं है. रूस के साथ संयुक्त पाँचवीं पीढ़ी के फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट को मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान चुपचाप ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था और तब से इसे पुनर्जीवित नहीं किया गया है. अगर मोदी सरकार ज़ोर-ज़ोर से ‘आत्मनिर्भरता’ चिल्लाते हुए इसी रास्ते पर चलती रही, तो भारत के रक्षा बल हमेशा विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहेंगे.
सवाल इस बात पर भी घूमते हैं कि इस बार भारत में इन जेट्स का निर्माण कौन करेगा. पिछले सौदे ने अनिल अंबानी की डिफेंस कंपनी, एक निजी खिलाड़ी जिसे एयरोस्पेस का कोई पूर्व अनुभव नहीं था, को सुर्खियों में ला दिया था. यह विवादास्पद विकल्प यौन-अपराधी, जेफ्री एपस्टीन के साथ अंबानी के संबंधों और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) में प्रभावशाली राजनीतिक हलकों तक पहुँचने के उनके प्रयासों के खुलासे से और भी दागी हो गया है. जबकि मोदी सरकार इन्हें भटकाने वाली बातें कहकर खारिज करती है, लेकिन यह सवाल अनुत्तरित है कि एक स्थापित, राज्य के स्वामित्व वाली फर्म के बजाय एक दिवालिया इकाई को क्यों चुना गया. अगर नया 114-विमानों का सौदा किसी विशिष्ट निजी खिलाड़ी और वर्तमान शासन के पसंदीदा, गौतम अडानी का पक्ष लेने के उसी रास्ते पर चलता है, तो नतीजा कुछ अलग क्यों होना चाहिए? वैकल्पिक रूप से, अगर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड मैन्युफैक्चरिंग का नेतृत्व करता है, तो यह सवाल उठता है कि सरकार ने मूल एमएमआरसीए में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की केंद्रीय भूमिका को क्यों छोड़ दिया?
स्वदेशी कार्यक्रमों की विफलता: ‘आत्मनिर्भरता’ के नारों के बावजूद, एलसीए तेजस और एएमसीए जैसे स्वदेशी प्रोजेक्ट्स देरी का शिकार हैं. रूस के साथ 5th जेनरेशन फाइटर का प्रोजेक्ट भी बंद कर दिया गया.
भ्रष्टाचार के आरोप: फ्रांस की एजेंसी ने राफेल सौदे में 7.5 मिलियन यूरो के संदिग्ध कमीशन का खुलासा किया था, लेकिन भारतीय एजेंसियों ने इसकी जांच नहीं की. लेखक इसे चुनावी बांड और पीएम-केयर्स फंड से भी जोड़कर देखते हैं.
लेखक का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को केवल फोटो खिंचवाने और प्रेस रिलीज से नहीं चलाया जा सकता. पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (जैसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) को मज़बूत किए बिना भारत की सुरक्षा से समझौता जारी रहेगा. असली समस्या विमानों में नहीं, बल्कि सरकार द्वारा किए जा रहे सौदों में है.
दलित परिवारों के बिजली-पानी कनेक्शन काटे जाने पर मानवाधिकार आयोग का हस्तक्षेप
तेलंगाना राज्य मानवाधिकार आयोग ने हनमकोंडा जिले के चेराबांडा राजू नगर में रहने वाले दलित परिवारों के बिजली और पानी के कनेक्शन तुरंत बहाल करने का निर्देश दिया है.’मूकनायक’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह फैसला 300 से अधिक लोगों की शिकायत के बाद लिया गया, जिनका आरोप है कि उनके कनेक्शन गैरकानूनी तरीके से काटे गए और उनके साथ जातिगत भेदभाव हुआ. निवासियों का कहना है कि पड़ोसी सोसायटियों की शिकायत के आधार पर उन्हें घर खली करने के नोटिस दिए गए. उनका आरोप है कि घर के वैध पट्टे होने के बावजूद पानी के कनेक्शन काटे गए और उन्हें धमकियां दी गईं.
वहीं ग्रेटर वारंगल नगर निगम ने जातीय भेदभाव के आरोपों से इनकार किया है. अधिकारियों का कहना है कि जिन घरों के बिल लंबे समय से बकाया थे, उन्हीं के कनेक्शन काटे गए हैं. प्रशासन का यह भी दावा है कि अवैध क़ब्ज़ा करने वालों को ही बेदखली नोटिस दिए गए हैं.
जस्टिस शमीम अख्तर की अध्यक्षता वाले आयोग ने कहा कि अगर वैध दस्तावेज़ होने के बावजूद पानी और बिजली काटी गई है, तो यह समानता और सम्मान के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है. आयोग ने जिला कलेक्टर, नगर निगम को तुरंत आपूर्ति बहाल करने और जबरन बेदखली से बचने के निर्देश दिए. साथ ही वारंगल के पुलिस आयुक्त को जातिगत धमकियां रोकने और सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा गया है. मुख्य सचिव और डीजीपी को निगरानी की ज़िम्मेदारी दी गई है. अगली सुनवाई 9 मार्च 2026 को होगी.
निगम अधिकारियों ने दोहराया कि कार्रवाई बकाया बिल और प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण के कारण की गई है और इसमें कोई जातिगत भेदभाव नहीं है.
प्यार पर पहरे
लव मैरिज पर गुजरात सरकार की सख्त नज़र: अब व्हाट्सएप पर माता-पिता को जाएगा अलर्ट, पहचान छिपाने वालों पर शिकंजा
गुजरात सरकार प्रेम विवाह (लव मैरिज) के नियमों में एक बड़ा और विवादास्पद बदलाव करने जा रही है. ‘गुजरात रजिस्ट्रेशन ऑफ मैरिज रूल्स’ में संशोधन के प्रस्ताव के तहत, अब जैसे ही कोई जोड़ा प्रेम विवाह के लिए रजिस्ट्रार के पास आवेदन करेगा, लड़की के माता-पिता को तुरंत व्हाट्सएप के जरिए अलर्ट भेज दिया जाएगा. इस प्रक्रिया का मकसद पारदर्शिता बढ़ाना और पहचान छिपाकर की जाने वाली शादियों (फ्रॉड) को रोकना बताया जा रहा है, लेकिन इसने निजता (प्राइवेसी) और वयस्कों की सहमति के अधिकार पर बहस छेड़ दी है.
प्रस्तावित नियमों के मुताबिक, आवेदन करने के बाद शादी का सर्टिफिकेट तुरंत नहीं मिलेगा, बल्कि इसके लिए 40 दिनों का इंतजार करना होगा. सरकार का तर्क है कि यह 40 दिन का ‘बफर पीरियड’ यह सुनिश्चित करने के लिए है कि शादी में कोई जबरदस्ती, ब्लैकमेलिंग या फर्जीवाड़ा तो नहीं है. इसके अलावा, अब गवाहों की भी कड़ी जांच होगी—उनकी फोटो, आधार कार्ड और पूरी पहचान जमा करनी होगी. सबसे अहम बात यह है कि नोटरी के सामने सभी पक्षों (लड़का, लड़की और गवाह) का शारीरिक रूप से मौजूद होना अनिवार्य होगा.
विधानसभा में इस प्रस्ताव का बचाव करते हुए राज्य के गृह मंत्री हर्ष संघवी ने बेहद तल्ख टिप्पणी की. उन्होंने कहा, “हम प्यार के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन अगर कोई ‘सलीम’ अपनी पहचान बदलकर ‘सुरेश’ बन जाता है और किसी बेटी को अपने जाल में फंसाता है, तो राज्य सरकार ऐसे धोखे को सफल नहीं होने देगी.” उन्होंने साफ किया कि जिन जोड़ों के पास माता-पिता की सहमति है, उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी, लेकिन जो लोग परिवार से छिपकर या पहचान बदलकर शादी करना चाहते हैं, उन्हें सख्त जांच से गुजरना होगा.
सरकार एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल भी तैयार कर रही है, जहां हर आवेदन को डिजिटली ट्रैक किया जा सकेगा. जैसे ही आवेदन फाइल होगा, माता-पिता को रियल-टाइम जानकारी मिल जाएगी. आलोचक इसे ‘मोरल पुलिसिंग’ बता रहे हैं, जबकि प्रशासन इसे एक जरूरी ‘कानूनी कवच’ मान रहा है.
“जहां दिखेंगे बाबू-शोना, तोड़ देंगे कोना-कोना”, लाठियों की पूजा और पार्कों में रेड
ऑल्ट न्यूज़ की शिंजिनी मजूमदार ने इस वैलेंटाइन डे पर जोड़ों के खिलाफ गुंडागर्दी करने वाले मामलों का कच्चा चिट्ठा तैयार किया है.
हर साल की तरह इस बार भी 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे के मौके पर बजरंग दल और अन्य राइट-विंग संगठनों ने उत्तर भारत के कई राज्यों में प्रेमी जोड़ों के खिलाफ मोर्चा खोला. “जहां दिखेंगे बाबू-शोना, तोड़ दिया जाएगा शरीर का कोना-कोना” और “बंटी-बबली जहां मिलेंगे, हड्डी-पसली तोड़ देंगे” जैसे हिंसक नारों के साथ कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे.
मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार में भगवा गमछे पहने कार्यकर्ताओं ने पार्कों, होटलों और रेस्टोरेंट्स में छापेमारी की. भोपाल और सागर (मध्य प्रदेश) में तो हद ही हो गई, जहां इन संगठनों ने ‘दंड पूजन’ का आयोजन किया. इसमें बाकायदा पुजारियों को बुलाकर लाठियों पर तेल लगाया गया और मंत्रोच्चार के साथ उनकी पूजा की गई, जैसे कि वे किसी युद्ध पर जा रहे हों. भोपाल में नेता राकेश प्रजापति ने धमकी दी कि अगर कपल्स मिले तो उनका सिर मुंडवाकर और मुंह काला करके गधे पर घुमाया जाएगा.
इंदौर के निम्स कॉलेज में वीएचपी और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने घुसकर तोड़फोड़ की. उनका आरोप था कि कॉलेज में वेलेंटाइन डे का कार्यक्रम चल रहा था जो ‘भारतीय संस्कृति’ के खिलाफ है. वहां उन्होंने हनुमान चालीसा का पाठ किया. रायपुर (छत्तीसगढ़) के पार्कों में भी कार्यकर्ताओं ने कपल्स को घेरकर सवाल-जवाब किए और उन्हें जबरन हनुमान चालीसा थमाई. पटना में ‘हिंदू शिव भवानी सेना’ ने प्रदर्शन करते हुए इसे ‘लव जिहाद’ और धर्मांतरण की साजिश बताया.
सोशल मीडिया पर इन संगठनों के कई वीडियो वायरल हुए. एक वीडियो में कार्यकर्ता लाठियों पर तेल लगाते हुए “ट्यूटोरियल” दे रहे थे कि वेलेंटाइन डे पर कपल्स का “इलाज” कैसे किया जाएगा. हालांकि, जयपुर के एक पार्क में एक अलग नजारा देखने को मिला. वहां जब डंडा लेकर पहुंचे बजरंग दल के लोगों से आम जनता ने आई-कार्ड मांग लिया, तो वे यह कहते हुए भाग खड़े हुए कि “बजरंग दल वालों के पास कार्ड नहीं होता.” यह घटना बताती है कि अब आम लोग भी इस तरह की स्वयंभू पुलिसिंग (विजिलांटिज्म) का विरोध करने लगे हैं.
यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन को पेंटागन, एफबीआई बिल्डिंग्स खरीदने का ऑफर मिला था
अमेरिका के न्याय विभाग (डीओजे) द्वारा जारी की गई नई फाइलों से एक हैरान करने वाला खुलासा हुआ है. यौन शोषण के दोषी और अब मृत जेफ्री एपस्टीन को 2016 में अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) और एफबीआई से जुड़ी बेहद संवेदनशील सरकारी इमारतों को खरीदने का प्रस्ताव दिया गया था. यह खबर यूके के ब्रॉडकास्टर आईटीवी न्यूज़ ने दी है.
दस्तावेजों के मुताबिक, एपस्टीन को वर्जीनिया के अर्लिंग्टन में स्थित 84,710 वर्ग मीटर के एक विशाल कॉम्प्लेक्स में निवेश करने का मौका दिया गया था. यह जगह पेंटागन से महज 1.6 किलोमीटर (1 मील) की दूरी पर है. निवेशकों के लिए बनाए गए प्रेजेंटेशन में इसे “मिशन-क्रिटिकल” (अति-महत्वपूर्ण) साइट बताया गया था और कहा गया था कि “पेंटागन के अलावा यह एकमात्र ऐसी प्रॉपर्टी है जो रक्षा विभाग की जरूरतों को पूरा कर सकती है.” सौदे की कीमत लगभग 116 मिलियन डॉलर (करीब 960 करोड़ रुपये) प्रस्तावित थी. अगर यह डील हो जाती, तो एक सजायाफ्ता यौन अपराधी अमेरिकी सरकार का ‘लैंडलॉर्ड’ (मकान मालिक) बन जाता, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा हो सकता था.
इन फाइलों में एपस्टीन के इजरायल के साथ संबंधों पर भी रोशनी डाली गई है. एक एफबीआई मुखबिर (एफबीआई इन्फॉर्मन्ट) ने एक मेमो में दावा किया था कि एपस्टीन “मोसाद एजेंट” था और उसने इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री एहूद बराक के अधीन जासूसी की ट्रेनिंग ली थी. रिकॉर्ड्स बताते हैं कि एहूद बराक 2013 से 2017 के बीच 30 से ज्यादा बार न्यूयॉर्क में एपस्टीन के घर गए थे.
इस पेंटागन डील का प्रस्ताव डेविड स्टर्न ने भेजा था, जो खुद को एपस्टीन का “सिपाही” बताता था. स्टर्न ब्रिटेन के शाही परिवार, खास तौर पर प्रिंस एंड्रयू का भी करीबी रहा है. दिलचस्प बात यह है कि 2015 में स्टर्न ने एपस्टीन को एक और प्रस्ताव भेजा था जिसे “सेक्सी एसेट्स” नाम दिया गया था—इसमें रिचमंड और बाल्टीमोर में एफबीआई के फील्ड ऑफिस और कोर्टहाउस शामिल थे. हालांकि, इस बात के सबूत नहीं हैं कि ये सौदे अंतिम रूप ले पाए, लेकिन इनका प्रस्ताव दिया जाना ही सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है.
गिरफ्तारी के बाद किंग चार्ल्स का भाई एंड्रयू रिहा
किंग चार्ल्स के छोटे भाई एंड्रयू माउंटबेटन-विंडसर को सार्वजनिक पद पर कदाचार के संदेह में गिरफ्तार किए जाने के बाद गुरुवार शाम पुलिस हिरासत से रिहा कर दिया गया. उन पर आरोप है कि उन्होंने जेफरी एपस्टीन को सरकार के गोपनीय दस्तावेज भेजे थे. माउंटबेटन-विंडसर, जो गुरुवार को ही 66 वर्ष के हुए हैं, से टेम्स वैली पुलिस के खुफिया अधिकारियों ने दिन भर पूछताछ की.
टेम्स वैली पुलिस ने गुरुवार देर रात बताया कि “गिरफ्तार व्यक्ति” को “जांच के अधीन” रिहा कर दिया गया है.
शाही परिवार के एक वरिष्ठ सदस्य, जो सिंहासन के उत्तराधिकार की पंक्ति में आठवें स्थान पर हैं, की यह गिरफ्तारी आधुनिक समय में अभूतपूर्व है.
‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन के किंग चार्ल्स के छोटे भाई एंड्रयू माउंटबेटन-विंडसर, जिन्हें पहले प्रिंस एंड्रयू के नाम से जाना जाता था, गुरुवार को ब्रिटेन के एलेशम पुलिस स्टेशन से बाहर निकलते हुए देखे गए.
‘दानवीर भारत’: रिपोर्ट में खुलासा- अमीर नहीं, आम भारतीय हैं असली हीरो जो हर साल अरबों रुपये दान करते हैं
भारत में खैरात या दानवीरता की चर्चा अक्सर बड़े अरबपतियों, कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) और बड़ी संस्थाओं तक सीमित रह जाती है. लेकिन अशोका यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर फॉर सोशल इंपैक्ट एंड फिलैंथ्रपी’ (सीएसआईपी) की ताज़ा रिपोर्ट ‘हाउ इंडिया गिव्स 2025’ ने इस धारणा को पलट दिया है. बीबीसी में सौतिक बिस्वास की रिपोर्ट बताती है कि भारत की उदारता की असली रीढ़ बड़े अमीर नहीं, बल्कि आम मध्यम और निम्न वर्गीय परिवार हैं.
आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय परिवार हर साल लगभग 540 अरब रुपये (6 बिलियन डॉलर) का दान करते हैं. यह दान केवल नकद में नहीं होता. रिपोर्ट बताती है कि दान में सबसे बड़ा हिस्सा (48%) ‘वस्तुओं’ का है, जैसे भोजन, कपड़े या घरेलू सामान. इसके बाद 44% नकद दान है और 30% लोग अपना समय (वॉलिंटियरिंग) देकर सेवा करते हैं. सर्वे में शामिल 68% लोगों ने माना कि वे किसी न किसी रूप में दान करते हैं.
अशोका यूनिवर्सिटी की जिन्नी उप्पल कहती हैं, “भारत एक बेहद उदार देश है और यह उदारता हमारी संस्कृति में रची-बसी है.” सर्वे का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि 90% से अधिक लोगों के लिए दान करने का मुख्य कारण “धार्मिक कर्तव्य” (रिलिजियस ड्यूटी) है. लगभग 40-45% दान धार्मिक संगठनों को जाता है, और इसके बाद सबसे ज्यादा मदद भिखारियों और बेसहारा लोगों की होती है. ग्रामीण भारत में धार्मिक संस्थानों को दान देने का चलन शहरों से ज्यादा है.
यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि दान का अमीरी से सीधा संबंध नहीं है. कम आय वाले परिवार (4,000-5,000 रुपये मासिक खर्च वाले) भी अपनी हैसियत के हिसाब से दान करते हैं. जैसे-जैसे आय बढ़ती है, दान में भागीदारी भी बढ़ती जाती है. रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि भारत में परोपकार ‘सिस्टमैटिक’ है, न कि कभी-कभार होने वाली घटना. पश्चिमी देशों के विपरीत, जहां दान टैक्स बचाने और रजिस्टर्ड संस्थाओं के जरिए होता है, भारत में दान अनौपचारिक (इन्फॉर्मल) और सीधे जरूरतमंदों तक पहुंचने वाला होता है.
अपील :
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