20/03/2026: खाली होती टंकी | 100 के और करीब रुपया | मगर मोदी चुप | मुज्तबा का जीत का एलान | ईरान की जमीन पर फौज उतारेंगे ट्रंप | बुझा नवरोज़ ईरान में | अल-अक्सा बंद | सुशांत सिंह: संप्रभुता से समझौता
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फलक अफ़शां, विश्वजीत कुमार
आज की सुर्खियां
डॉलर के मुकाबले 93.71 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा भारतीय रुपया, एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी.
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने से भारत में एलपीजी की भारी किल्लत, कालाबाज़ारी में 4000 रुपये तक पहुँचा दाम.
मध्य पूर्व में हज़ारों मरीन तैनात करेगा अमेरिका, सहयोगियों को कहा ‘कायर’, ईरान में ज़मीनी हमले के संकेत.
इज़रायल के हमलों से ट्रंप नाराज़, गैस पाइपलाइनों को निशाना बनाने पर अमेरिका और इज़रायल में मतभेद.
ईरान ने मारा अमेरिकी एफ-35 जंगी जहाज़? चीनी विशेषज्ञों का दावा- स्टील्थ तकनीक अब अजेय नहीं.
1967 के बाद पहली बार ईद पर अल-अक्सा मस्जिद बंद, श्रद्धालुओं ने सड़कों पर पढ़ी नमाज़.
रक्षा विशेषज्ञ सुशांत सिंह: भारत ने खोई अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’, अमेरिका के सामने झुकी दिल्ली.
एनडीटीवी के प्रणय और राधिका रॉय को राहत, दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द किया लुक-आउट सर्कुलर.
रुपया 93.71 पर बंद; चार वर्षों में सबसे बड़ी गिरावट, एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बना ‘₹’
मध्य-पूर्व में जारी युद्ध की चिंताएं गहराने के कारण शुक्रवार को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 82 पैसे (लगभग 0.95%) टूटकर 93.71 पर बंद हुआ, जो पिछले चार वर्षों से भी अधिक समय में इसकी सबसे बड़ी गिरावट है. इस गिरावट के साथ रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है. इस साल अब तक रुपया 5.5% से अधिक टूट चुका है, जबकि 2025 में इसमें 4.9% की गिरावट आई थी. ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में बेन कोचुवीदन की रिपोर्ट के अनुसार, केचू गोल्डमैन सैक्स और यूबीएस जैसे विश्लेषकों का मानना है कि रुपया जल्द ही 95 के स्तर को पार कर सकता है. कुलमिलाकर, रुपये की दिन पर दिन खस्ता होती जा रही है, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मामले में अब कुछ नहीं बोलते. 2014 में जब वह पीएम बने तो डॉलर के मुकाबले रुपये का दाम 58.58 था, जो अब सेंचुरी की तरफ बढ़ रहा है. हालत यह हो गई है कि रुपये की गिरावट के बारे में 2014 के पहले (बतौर गुजरात सीएम) के उनके बयानों को निकालकर अब तंज़ किए जा रहे हैं और चुटकुले बनाए जा रहे हैं. सोशल मीडिया यूज़र व्यंग्य करने और सवाल करने में कोई कसर बाकी नहीं रख रहे.
दिन के दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले 1.1% से अधिक गिरकर 93.7350 (103 पैसे) तक पहुंच गया था, जिसने बुधवार के अपने पिछले रिकॉर्ड निचले स्तर (92.63) को भी पीछे छोड़ दिया. साप्ताहिक आधार पर इसमें 1.3% की गिरावट आई है, जो 2022 के अंत के बाद से सबसे बड़ी गिरावट है. शेयर बाजार में सकारात्मक रुख के बावजूद रुपया 93.15 पर कमजोरी के साथ खुला और दिन भर गिरता रहा.
तेल संकट के कारण विदेशी निवेशकों ने इस महीने घरेलू शेयर बाजार से 8 अरब डॉलर से अधिक की निकासी की है. यह जनवरी 2025 के बाद का सबसे बड़ा बहिर्वाह (आउटफ़्लो) है. पिछले साल भी उन्होंने बाजार से 18.9 अरब डॉलर निकाले थे.
उल्लेखनीय है कि युद्ध शुरू होने के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में 53% का उछाल आया है. इस हफ्ते तेल 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, जो शुक्रवार को 110 डॉलर के आसपास रहा. इस मामले में हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व है. वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का 20% से अधिक इसी मार्ग से गुजरता है. भारत के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके कुल तेल और गैस आयात का आधा हिस्सा इसी रास्ते से आता है.
‘सुरक्षित निवेश’ माने जाने के कारण डॉलर दुनिया की सभी मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हो रहा है. साथ ही, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है.
रिपोर्ट कहती है कि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के परिणाम केवल रुपये तक सीमित नहीं रहेंगे. बल्कि कमजोर रुपया और महंगा कच्चा तेल मिलकर ईंधन और वस्तुओं की कीमतें बढ़ा सकते हैं. व्यवसायों और उपभोक्ताओं के लिए लागत बढ़ेगी. महंगाई को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को ब्याज दरों के मोर्चे पर कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.
‘टंकी का संकट’: ईरान संघर्ष के बीच भारत में गैस आपूर्ति गड़बड़ाई, व्यापक असर
नई दिल्ली से आकाश हसन ने “द गार्डियन” के लिए विस्तार से रिपोर्ट किया है कि कैसे ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते संघर्ष ने भारत और दक्षिण एशिया में रसोई गैस (एलपीजी) के संकट को जन्म दिया है.
आकाश लिखते हैं कि ईरान संघर्ष के कारण ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ के बंद होने या वहां से आवाजाही बाधित होने से भारत की एलपीजी आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है. भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% एलपीजी आयात करता है, जिसमें से 90% इसी रास्ते से आता है.
रिपोर्ट में ‘माया रानी’ जैसी आम महिलाओं की आपबीती सुनाई गई है, जिन्हें एक सिलेंडर के लिए गैस वितरकों के दफ्तरों के बाहर घंटों और दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है. कई परिवार दिन में केवल एक बार खाना बनाने या पड़ोसियों से मदद लेने को मजबूर हैं.
आपूर्ति कम होने से गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं. घरेलू सिलेंडर की कीमतों में वृद्धि के साथ-साथ कालाबाजारी की खबरें भी हैं, जहाँ ₹900 का सिलेंडर कथित तौर पर ₹4,000 तक में बेचा जा रहा है.
भारत सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए घरेलू उपभोक्ताओं, अस्पतालों और स्कूलों को प्राथमिकता दी है. इसके कारण वाणिज्यिक (कमर्शियल) उपयोग और उद्योगों (जैसे गुजरात का मोरबी टाइल उद्योग) को गैस की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है. सिलेंडर बुकिंग के बीच अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि को भी 21 से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया है.
विशेषज्ञों के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि भारत ने कच्चे तेल के लिए तो रणनीतिक भंडार बनाया है, लेकिन एलपीजी के लिए पर्याप्त बफर स्टॉक (सुरक्षित भंडार) तैयार नहीं किया. भारत के पास केवल 20 दिनों का एलपीजी स्टॉक है, जबकि वैश्विक मानक 40-60 दिनों का है. गैस की कमी के कारण शहरों में इंडक्शन चूल्हों और बिजली से चलने वाले उपकरणों की मांग में दस गुना तक की बढ़ोतरी देखी गई है.
कुलमिलाकर, यह रिपोर्ट रेखांकित करती है कि कैसे दूर स्थित एक भू-राजनीतिक संघर्ष (ईरान युद्ध) ने भारत के आम घरों की रसोई और अर्थव्यवस्था की स्थिरता को सीधे तौर पर खतरे में डाल दिया है.
प्रीमियम पेट्रोल की कीमत में ₹2 की वृद्धि, इंडस्ट्रियल डीजल ₹22 महंगा
इस बीच मध्य-पूर्व में संघर्ष के कारण वैश्विक तेल कीमतों में आए उछाल को देखते हुए, शुक्रवार को भारत में प्रीमियम (उच्च श्रेणी) पेट्रोल की कीमत में 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई, जबकि औद्योगिक उपयोगकर्ताओं को बेचे जाने वाले बल्क डीजल (थोक डीजल) की दर में लगभग 22 रुपये प्रति लीटर की भारी वृद्धि की गई है. इसके पहले एलपीजी के दामों में भी प्रति सिलेंडर 60 रुपये की वृद्धि की गई थी.
‘पीटीआई’ के अनुसार, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने स्पष्ट किया कि सामान्य पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई वृद्धि नहीं हुई है.
उन्होंने बताया कि मूल्य निर्धारण के निर्णय तेल कंपनियों द्वारा स्वतंत्र रूप से लिए जाते हैं, क्योंकि पेट्रोल और डीजल की कीमतों को क्रमशः 2010 और 2014 में नियंत्रण मुक्त कर दिया गया था. उन्होंने कहा, “यह तेल विपणन कंपनियों द्वारा तय किया जाता है. सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों को विनियमित नहीं करती है.”
ईरान युद्ध के तेज होने के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें गुरुवार को 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, जो बाद में घटकर लगभग 108 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं.
ईरान युद्ध 21वां दिन
ट्रंप उतारेंगे ईरान की जमीन पर अपनी फौज, सहयोगियों को ‘कायर’ कहा, युद्ध रुकने के आसार नहीं
रॉयटर्स के लिए अलेक्जेंडर कॉर्नवेल, टिमोर अज़हरी और एंड्रयू मिल्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेना मध्य पूर्व में एक बड़ा उभयचर हमलावर जहाज़ तैनात कर रही है, जिसमें हज़ारों अतिरिक्त मरीन और नाविक शामिल हैं. तीन अमेरिकी अधिकारियों ने शुक्रवार को इसकी पुष्टि की. यह तैनाती ऐसे समय में हो रही है जब ईरान के नए सर्वोच्च नेता ने देश की “एकता” और “प्रतिरोध” की सराहना की है. वाशिंगटन होर्मुज जलडमरूमध्य के तेल मार्ग को फिर से खोलने के लिए बेताब है, जिसे अमेरिका और इज़रायल के हमले के बाद ईरान ने लगभग तीन सप्ताह से बंद कर रखा है. रॉयटर्स के अनुसार, वाशिंगटन वहां सैनिकों को उतारने तक के विकल्पों पर विचार कर रहा है. युद्ध शुरू होने के बाद से तेल की कीमतों में लगभग 50% की वृद्धि हुई है.
इसी बीच, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर उन अमेरिकी सहयोगियों पर अपना गुस्सा निकाला है जिन्होंने युद्ध जारी रहने के दौरान इस जलडमरूमध्य को खोलने में मदद करने से इनकार कर दिया है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, “कायर, और हम याद रखेंगे!” हालांकि अतिरिक्त सैनिकों की सटीक भूमिका स्पष्ट नहीं की गई है, लेकिन ईरान की प्रमुख ऊर्जा सुविधाओं और पड़ोसी देशों की संपत्तियों को निशाना बनाया जा रहा है. रमज़ान के अंत और ईरानी नववर्ष ‘नवरोज़’ के बीच भी युद्ध रुकने के आसार कम ही दिख रहे हैं. इज़रायल ने ईरान के ‘साउथ पार्स’ गैस क्षेत्र पर और हमलों से बचने का वादा किया है, लेकिन कुवैत की सरकारी तेल कंपनी ने बताया कि उसके मीना अल-अहमदी रिफाइनरी पर शुक्रवार को कई ड्रोन हमले हुए जिससे वहां आग लग गई. जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों ने सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने के प्रयासों में शामिल होने का वादा तो किया है, लेकिन उन्होंने साफ़ कर दिया कि इसके लिए पहले लड़ाई रुकनी चाहिए.
सर्वोच्च नेता मुज्तबा ख़ामेनेई का संदेश: “दुश्मन की हार हुई”, एकता और प्रतिरोध की अपील
अल ज़जीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुज्तबा ख़ामेनेई ने फारसी नववर्ष (नवरोज़) के अवसर पर एक लिखित संदेश में कहा है कि अमेरिका और इज़रायल के हमलों के बावजूद ईरान के दुश्मन “हार” रहे हैं. शुक्रवार को ईरानी टेलीविजन पर पढ़े गए इस संदेश में ख़ामेनेई ने ईरानी लोगों की दृढ़ता की प्रशंसा की और कहा कि यह वर्ष “राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा के तहत प्रतिरोध की अर्थव्यवस्था” का वर्ष होगा. उन्होंने कहा कि दुश्मन का यह मानना गलत था कि नेतृत्व और प्रभावशाली हस्तियों को निशाना बनाकर वे लोगों में डर पैदा कर देंगे. उन्होंने कहा, “राष्ट्र ने एकता और प्रतिरोध के साथ जवाब दिया और दुश्मन को भ्रमित करने वाला झटका दिया.”
मुज्तबा ख़ामेनेई को उनके पिता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई की हत्या के बाद सर्वोच्च नेता मनोनीत किया गया था, लेकिन वे युद्ध शुरू होने के बाद से सार्वजनिक रूप से नहीं देखे गए हैं. अपने संदेश में उन्होंने तुर्किये और ओमान के खिलाफ हमलों में ईरान की संलिप्तता से इनकार किया और उन्हें “फॉल्स फ्लैग” घटनाएं बताया, जिनका उद्देश्य पड़ोसियों के बीच कलह पैदा करना है. उन्होंने अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान से भी अपनी लड़ाई खत्म करने की अपील की और मदद की पेशकश की. विश्लेषकों का कहना है कि ईरानी संविधान को इस तरह बनाया गया है कि नेतृत्व के अचानक खाली होने पर भी व्यवस्था बनी रहे, और मुज्तबा का संदेश इसी “उत्तरजीविता प्रोटोकॉल” का हिस्सा है.
जंग का धुआँ और ईरानी ‘नवरोज़’ का त्यौहार
सीएनएन की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, ईरान में इस साल ‘नवरोज़’ (फारसी नववर्ष) का अर्थ बदल गया है. जहाँ यह समय परिवार और नई शुरुआत का होता था, वहीं इस बार ईरानी लोग भारी डर और दुख के बीच हैं. अमेरिका और इज़रायल के लगातार हमलों ने देश के बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया है और हज़ारों लोग हताहत हुए हैं. तेहरान की रहने वाली नाज़नीन ने सीएनएन को बताया, “मुझमें ‘हफ्त सीन’ (पारंपरिक सजावट) तैयार करने की ताकत नहीं है. जब मैं अपने परिवार से मिल ही नहीं सकती, तो जश्न कैसे मनाऊं?” कई ईरानियों के लिए पिछले तीन हफ्ते निराशा और खौफ से भरे रहे हैं.
युद्ध के अलावा, ईरान की आर्थिक स्थिति भी बेहद खराब है. उच्च मुद्रास्फीति और बेरोजगारी के कारण आम लोगों के लिए बुनियादी चीज़ें भी महंगी हो गई हैं. हालांकि, कुछ लोग जैसे मेहरदाद अभी भी उम्मीद लगाए हुए हैं कि शायद यह वसंत आज़ादी लेकर आए. अहमद नाम के एक व्यक्ति ने कहा कि वे परंपराओं को जारी रखेंगे क्योंकि इन कठिन समय में जीवन का सम्मान करना ज़रूरी है. इस साल नवरोज़ का समय रमज़ान की समाप्ति और ईद-उल-फितर के साथ मिल रहा है, जिसे सरकार अपनी ताकत और एकता दिखाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है. लेकिन आम जनता के लिए भविष्य पूरी तरह धुंधला है और बाज़ार सजे होने के बावजूद खरीदारी करने की हिम्मत कम ही लोगों में है.
चीनी इंटेल की मदद से ईरान ने निशाना लगाया अमेरिकी जंगी जहाज पर
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के हमले में एक अमेरिकी F-35 स्टील्थ फाइटर जेट के क्षतिग्रस्त होने की खबर है, जो इस युद्ध में इस आधुनिक विमान के नुकसान का पहला मामला हो सकता है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने पुष्टि की कि गुरुवार को ईरान पर एक कॉम्बैट मिशन के दौरान विमान को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी. चीनी सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना साबित करती है कि स्टील्थ विमानों को इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रारेड (ईओ /आईआर) सेंसर सिस्टम के ज़रिए पकड़ा जा सकता है. सेवानिवृत्त पीएलए कर्नल यू गैंग ने कहा कि विमान को शायद किसी संशोधित एयर-टू-एयर मिसाइल से निशाना बनाया गया जिसमें इन्फ्रारेड गाइडेंस का इस्तेमाल किया गया था.
विशेषज्ञों का कहना है कि F-35 रडार से बचने में तो माहिर है, लेकिन इंजन की गर्मी (इन्फ्रारेड सिग्नल) को पूरी तरह छिपाना मुश्किल है. यदि यह हमला किसी बड़े एयर डिफेंस सिस्टम जैसे S-300 से हुआ होता, तो विमान का वापस लौट पाना असंभव था. चीनी सैन्य विश्लेषक सोंग झोंगपिंग ने कहा कि “स्टील्थ तकनीक एक मिथक है” और चीन के पास ऐसे विमानों को पकड़ने के लिए उन्नत रडार नेटवर्क मौजूद है. यह घटना अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका मानी जा रही है, क्योंकि अब तक F-35 को युद्ध के मैदान में अजेय माना जाता था. अमेरिका पहले ही इस संघर्ष में कई रीपर ड्रोन और अन्य विमान खो चुका है.
ईरान को लेकर अमेरिका-इज़रायल में रणनीतिक मतभेद उभरे, दोनों की अलग सोच
वॉशिंगटन पोस्ट के लिए स्टीव हेंड्रिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के खिलाफ युद्ध के तीन हफ्तों बाद अमेरिका और इज़रायल के बीच रणनीतिक मतभेद उभरने लगे हैं. जहाँ शुरुआत में दोनों देश “सत्ता परिवर्तन” की बात कर रहे थे, वहीं अब राष्ट्रपति ट्रंप केवल त्वरित सैन्य जीत और कम आर्थिक नुकसान चाहते हैं, जबकि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान के शासन को पूरी तरह उखाड़ फेंकने के अपने 40 साल पुराने सपने को पूरा करने में लगे हैं. ट्रंप ने हाल ही में ईरान के ‘साउथ पार्स’ गैस फील्ड पर इज़रायल के हमले की आलोचना की, क्योंकि इससे वैश्विक तेल और गैस की कीमतें बढ़ गईं और कतर जैसे अमेरिकी सहयोगी के हितों को नुकसान पहुंचा.
अधिकारियों का कहना है कि नेतन्याहू इस अवसर का लाभ उठाकर ईरान की सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक नेतृत्व को खत्म करना चाहते हैं. इज़रायल ने अब तक लगभग 8,000 हमले किए हैं, जिनमें से 40% ईरानी सुरक्षा बलों पर केंद्रित थे. हालांकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसी की निदेशक तुलसी गबार्ड ने स्वीकार किया है कि राष्ट्रपति ट्रंप के लक्ष्य इज़रायली सरकार के लक्ष्यों से अलग हैं. ट्रंप युद्ध की वैश्विक आर्थिक मार से डरे हुए हैं, जबकि नेतन्याहू ईरान की ऊर्जा बुनियादी संरचना को नष्ट करने पर आमादा हैं. यह तनाव तब और बढ़ गया जब ट्रंप के शीर्ष आतंकवाद विरोधी अधिकारी जो केंट ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि अमेरिका को इज़रायल के दबाव में एक और मध्य पूर्व युद्ध में घसीटा गया है. फिलहाल ट्रंप ज़मीनी सेना भेजने से कतरा रहे हैं, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने के लिए दबाव बढ़ता जा रहा है.
यरूशलेम में मुस्लिम श्रद्धालुओं के लिए सबसे दुखद दिन: ईद पर अल-अक्सा मस्जिद बंद
यरूशलेम और गाज़ा से “द गार्डियन” की रिपोर्ट है कि 1967 के बाद पहली बार, रमजान के अंत और ईद के मौके पर अल-अक्सा मस्जिद परिसर को मुस्लिम श्रद्धालुओं के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया है. इजरायली अधिकारियों ने इस बंदी के पीछे ‘सुरक्षा चिंताओं’ का हवाला दिया है, जो विशेष रूप से ईरान के साथ चल रहे क्षेत्रीय तनाव और युद्ध की स्थिति से जुड़ी हैं. 28 फरवरी से ही मस्जिद में पहुंच को काफी सीमित कर दिया गया था.
यरूशलेम के निवासियों ने इसे ‘सबसे दुखद दिन’ बताया है. दशकों से वहां नमाज पढ़ने वाले लोगों का कहना है कि यह एक “खतरनाक मिसाल” कायम करता है.
मस्जिद बंद होने के कारण हजारों फिलिस्तीनी श्रद्धालुओं को ओल्ड सिटी की सड़कों और मस्जिद के बंद द्वारों के बाहर नमाज पढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. भारी सुरक्षा बलों की उपस्थिति के कारण माहौल तनावपूर्ण रहा.
अरब लीग, इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) और अफ्रीकी संघ ने इस कदम की कड़ी निंदा की है. उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया है. इस बीच ओल्ड सिटी के बाजार, जो आमतौर पर ईद के समय भीड़भाड़ से भरे रहते थे, पूरी तरह वीरान नजर आए. केवल आवश्यक वस्तुओं की दुकानों को ही खोलने की अनुमति दी गई थी. यह रिपोर्ट दर्शाती है कि कैसे क्षेत्रीय युद्ध और सुरक्षा प्रतिबंधों ने यरूशलेम के सबसे पवित्र स्थलों में से एक पर धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित किया है, जिससे मुस्लिम समुदाय में गहरा दुख और आक्रोश है. अंग्रेजी में पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ सकते हैं.
सुशांत सिंह: भारतीय एक ऐसे नेता के हकदार, जो उनके लिए खड़ा हो, न कि सिर्फ अपने ब्रांड या चुनिंदा लोगों के लिए
पत्रकार, लेखक और रक्षा मामलों के जानकार सुशांत सिंह ने “द टेलीग्राफ” में प्रकाशित अपने ताज़ा लेख में वर्तमान मोदी सरकार की विदेश नीति की तीखी आलोचना की है. उनका तर्क है कि भारत अपनी ऐतिहासिक ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ खोकर अमेरिका और इजरायल के प्रति झुक गया है.
अपने इस लेख में उन्होंने ऐतिहासिक तुलना करते हुए 1971 के युद्ध का उदाहरण दिया है. वह कहते हैं कि तब (पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में) भारत अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुका था, जबकि वर्तमान सरकार अमेरिकी और इजरायली हितों के सामने अपनी संप्रभुता से समझौता कर रही है.
उनका मानना है कि इजरायल के साथ ‘कंधे से कंधा मिलाकर’ खड़े होने की घोषणा ने भारत के पारंपरिक संतुलन को बिगाड़ दिया है. इससे ईरान जैसे पुराने सहयोगियों के साथ संबंध खराब हुए हैं, जिसका परिणाम यह है कि अब भारत को अपने जहाजों की सुरक्षा के लिए ईरान से गुहार लगानी पड़ रही है.
लेख के अनुसार, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर भारतीय जनता पर पड़ रहा है. अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान से सस्ता तेल खरीदना बंद करना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए आत्मघाती साबित हुआ है.
सुशांत लिखते हैं कि भारत ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की आवाज होने का दावा तब तक नहीं कर सकता, जब तक वह एक मित्र राष्ट्र के प्रमुख की लक्षित हत्या, स्कूलों पर बमबारी और भारतीयों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र में हजारों नागरिकों की मौत की अनदेखी करता है. दिल्ली की कभी एक नैतिक स्थिति हुआ करती थी जो विकासशील दुनिया के लिए बोलती थी और पश्चिम के आधिपत्य को चुनौती देती थी. आज, भारत को ब्रिक्स जैसे समूहों के भीतर एक ‘आउटलियर’ (अलग-थलग) के रूप में देखा जाता है, क्योंकि इसके रुख अमेरिका और इजरायल के साथ बहुत अधिक मेल खाते हैं. ईरान और लेबनान में नागरिक हताहतों पर दिल्ली की चुप्पी की व्याख्या अन्य विकासशील देशों द्वारा ‘दोषपूर्ण संलिप्तता’ के रूप में की जा रही है, और इसने उस विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाया है जिसे मोदी से पहले के भारतीय नेताओं ने दशकों की मेहनत से बनाया था.
रणनीतिक स्वायत्तता की यह हानि शायद मोदी युग का सबसे दुखद पहलू है. 1947 के बाद से, दिल्ली की स्वायत्तता का अर्थ तटस्थता या दुनिया से अलग होना नहीं था; इसका अर्थ था बड़ी शक्तियों के दबाव की परवाह किए बिना अपने लिए बोलने और अपने हितों की रक्षा करने की स्वतंत्रता होना. इसी तरह भारत उनके संघर्षों का हिस्सा बने बिना इराक, ईरान, इजरायल और सऊदी अरब के साथ एक साथ व्यवहार करने में सफल रहा. दिल्ली उनकी आंतरिक राजनीति से दूर रही और भारत के अपने परिवर्तन के लिए एक अनुकूल वातावरण पर ध्यान केंद्रित किया. मोदी के शासन में, उस संस्थागत बुद्धिमत्ता को एक व्यक्तिगत नीति के पक्ष में त्याग दिया गया है, जिसने सब कुछ जोखिम में डाल दिया है.
हम वर्तमान में इतिहास के एक ऐसे मोड़ पर हैं जहाँ पुरानी विश्व व्यवस्था टूट रही है और एक नई, अधिक अव्यवस्थित प्रणाली उभर रही है. ऐसे समय में, एक देश को अपने पैरों पर खड़ा होने और अपने सिद्धांतों के आधार पर गठबंधन बनाने में सक्षम होना चाहिए. इसके विपरीत मोदी सरकार ने भारत को अमेरिका और इजरायल के साथ एक कठोर संरेखण में बांधना चुना है, जो हमारे विकल्पों को सीमित करता है और हमारी संवेदनशीलता को बढ़ाता है. हमने अपने ही पड़ोस में भारत के प्रभाव को सिमटते देखा है, क्योंकि हिंदुत्व शासन दक्षिण एशियाई देशों के साथ प्रभावी ढंग से जुड़ने में विफल रहा है.
भारत, नेतृत्व और ईमानदारी की आवश्यकता वाली दुनिया में ‘सन्नाटे और बचाव’ का एक द्वीप बनता जा रहा है. यदि भारत को इस नए युग में जीवित रहना और फलना-फूलना है, तो उसे वास्तविक रणनीतिक स्वतंत्रता की नीति पर लौटना होगा. संप्रभुता कोई उपहार नहीं है जो दूसरों द्वारा प्रदान की जाती है, बल्कि एक शक्ति है जिसका अभ्यास साहस और स्पष्टता के साथ किया जाना चाहिए. सरकार को विदेश नीति को व्यक्तिगत सफलताओं की एक श्रृंखला के रूप में देखना बंद करना चाहिए और इसे एक गंभीर, संस्थागत कार्य के रूप में मानना शुरू करना चाहिए. 1.4 अरब लोगों का देश, जिसकी अर्थव्यवस्था विशाल है और जनसंख्या विविध एवं प्रतिभाशाली है, उसे अपने लोगों की रक्षा के लिए वाशिंगटन की अनुमति या तेल अवीव के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है. भारत की ताकत उसकी अपनी विविधता और उसके उत्तर-औपनिवेशिक लोकतांत्रिक मूल्यों में निहित है.
जब तक भारत को ऐसी सरकार नहीं मिलती जो अपने घर को व्यवस्थित करे और अपने नैतिक अधिकार को फिर से स्थापित करे, वह खुद को तेजी से अलग-थलग और कमजोर पाएगा. 1.4 अरब भारतीय एक ऐसे नेता के हकदार हैं, जो उनके लिए खड़ा हो, न कि केवल अपने ब्रांड या कुछ चुनिंदा लोगों के हितों के लिए. भारत को बहुत देर होने से पहले अपनी आवाज और अपनी आजादी को वापस पाना होगा. दुनिया इसके लिए बेहतर होगी.
रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सिंह, येल विश्वविद्यालय में लेक्चरर हैं.
अमेरिकी एफडीए ने भारत में बनी बच्चों की आइबुप्रोफेन दवा की लगभग 90,000 बोतलें वापस मंगवाईं
अमेरिकी संघीय नियामकों के अनुसार, काले कणों और अन्य दूषित पदार्थों की रिपोर्ट के बाद बच्चों के दर्द निवारक (पेन रिलीवर) की लगभग 90,000 बोतलों को वापस मंगवाया गया है.
‘एपी’ के अनुसार, खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने ‘टारो फार्मास्यूटिकल्स’ की ‘चिल्ड्रन्स आइबुप्रोफेन ओरल सस्पेंशन’ को वापस लेने के संबंध में एक ऑनलाइन नोटिस जारी किया है. कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, यह उत्पाद बेरी-फ्लेवर में आता है और 2 से 11 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए अनुशंसित है.
एफडीए के नोटिस में कहा गया है कि यह कार्रवाई इस महीने की शुरुआत में ग्राहकों द्वारा “उत्पाद में जेल जैसा द्रव्यमान और काले कण” दिखने की शिकायत के बाद शुरू की गई थी. एजेंसी के नियामकों ने इस कार्रवाई को उस श्रेणी में रखा है जिसमें उपभोक्ताओं को गंभीर चोट या स्वास्थ्य संबंधी परिणामों का जोखिम “बहुत कम” होता है.
यह दवा भारत में ‘स्ट्राइड्स फार्मा इंक’ द्वारा निर्मित की गई थी, जो अमेरिका और कई अन्य देशों की कंपनियों के लिए जेनेरिक और ओवर-द-काउंटर (बिना पर्ची वाली) दवाएं बनाती है.
प्रणय और राधिका रॉय के खिलाफ लुक-आउट सर्कुलर रद्द
‘पीटीआई’ के अनुसार, दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एनडीटीवी के संस्थापकों प्रणय रॉय और राधिका रॉय के खिलाफ सीबीआई द्वारा दर्ज मामलों में जारी लुक-आउट सर्कुलर (एलओसी) को रद्द कर दिया. न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने कहा कि यह राहत तब तक प्रभावी रहेगी जब तक यह दंपति जांच में सहयोग करता रहेगा. उन्होंने कहा, “याचिकाकर्ताओं द्वारा जांच में सहयोग करने की शर्त पर विवादित एलओसी को रद्द किया जाता है.” रॉय दंपति ने 2017 और 2019 में सीबीआई द्वारा दर्ज दो एफआईआर के बाद जारी किए गए एलओसी को चुनौती देते हुए 2021 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था.
‘मोहम्मद दीपक’ को राहत नहीं: हाई कोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से किया इनकार
द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कोटद्वार के चर्चित ‘मोहम्मद दीपक’ की उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग खारिज कर दी है.
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने दीपक को “सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा सक्रिय” बताते हुए फटकार भी लगाई. कोर्ट ने कहा, “आप सोशल मीडिया पर प्रवचन दे रहे हैं. आपको आवश्यक जानकारी देने के बाद पुलिस को अपना काम करने देना चाहिए.”
अदालत ने इस दलील पर भी ध्यान दिया कि दीपक ने यह जानकारी भी नहीं दी कि उन्हें एक महीने से अधिक समय तक पुलिस सुरक्षा प्रदान की गई थी. कोर्ट ने पूछा, “आपने हमें यह क्यों नहीं बताया कि आपको 3 फरवरी से 13 मार्च तक सुरक्षा दी गई थी?”
दीपक कुमार के खिलाफ 26 जनवरी की घटना के बाद दंगा, चोट पहुंचाने और शांति भंग करने के इरादे से अपमान करने जैसे आरोपों में मामला दर्ज हुआ था. उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर एफआईआर रद्द करने, अपने और परिवार की सुरक्षा, पुलिस की कथित पक्षपातपूर्ण भूमिका की जांच और नफरती भाषण देने वालों पर कार्रवाई की मांग की थी.
यह मामला तब सुर्खियों में आया जब कोटद्वार में एक मुस्लिम दुकानदार की दुकान का नाम बदलने को लेकर विवाद हुआ. दीपक ने विरोध करते हुए खुद को “मोहम्मद दीपक” बताया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था.
गंगा में नाव पर इफ्तार पार्टी: सभी आरोपियों की 14 दिनों की न्यायिक रिमांड मंजूर
नमिता वाजपेयी की रिपोर्ट के अनुसार, वाराणसी की एक अदालत ने गंगा नदी के बीचों-बीच नाव पर कथित तौर पर रोजा इफ्तार पार्टी आयोजित करने, मांसाहारी भोजन करने और हड्डियां नदी में फेंकने के आरोपी 14 लोगों की 14 दिनों की न्यायिक रिमांड मंजूर कर ली है.
गुरुवार को आदेश जारी करते हुए एसीजेएम-9 अमित ने यह फैसला सुनाया. आरोपियों की पहचान वायरल हुए वीडियो के आधार पर की गई. पुलिस ने नाविक के बयान और चश्मदीदों के गवाहों के साथ अदालत में रिपोर्ट पेश की. जांच के दौरान अपहरण सहित कई अतिरिक्त आरोप जोड़ने की याचिका भी दायर की गई.
आरोपियों के वकील ने न्यायिक रिमांड का विरोध करते हुए कहा कि उनके मुवक्किल निर्दोष हैं और उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है. उन्होंने तर्क दिया कि एफआईआर में जो कुछ भी कहा गया है वह कोई गंभीर अपराध नहीं है. अभियोजन अधिकारी दीपक कुमार ने रिमांड का समर्थन करते हुए कहा कि नाविकों के बयान दर्ज किए गए हैं, जिन्होंने बताया कि आरोपी उनकी मर्जी के खिलाफ जबरन नाव पर सवार हुए और उन्हें धमकाया गया. इस आधार पर जांच में बीएनएस की धारा 308 जोड़ी गई है, जिसमें 10 साल की कैद का प्रावधान है.
शिकायतकर्ता के वकीलों ने जमानत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि आरोपियों ने गंगा और पंचगंगा घाट जैसी पवित्र जगह को जानबूझकर अपवित्र कर धार्मिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश की है. अदालत ने अभियोजन और शिकायतकर्ता के तर्कों से सहमत होते हुए संबंधित थाने से आरोपियों का आपराधिक रिकॉर्ड तलब किया है और मामले की अगली सुनवाई के लिए 23 मार्च की तारीख तय की है.
रमज़ान में तीसरी बार नजरबंद मीरवाइज उमर फारूक, जुमे की नमाज से रोका
स्क्रोल के रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर के मीरवाइज (प्रमुख धर्मगुरु) उमर फारूक ने अपने सोशल मीडिया एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के जरिए दावा किया है कि उन्हें नजरबंद कर दिया गया और जामिया मस्जिद में सामूहिक नमाज अदा करने की अनुमति नहीं दी गई.
मीरवाइज ने बताया कि उनकी नजरबंदी के संबंध में कोई लिखित आदेश नहीं दिया गया, लेकिन उनके घर के बाहर भारी संख्या में पुलिस और सुरक्षाबलों की तैनाती की गई. गलियों और रास्तों को कंटीले तारों से बंद किया गया और यातायात रोक दिया गया.
उनके अनुसार, यह पूरी कार्रवाई उन्हें नौहट्टा स्थित जामिया मस्जिद तक पहुंचने से रोकने के लिए की गई. उन्होंने कुछ तस्वीरें भी साझा कीं, जिनमें इलाके में सुरक्षा घेराबंदी साफ दिखाई देती है.
मीरवाइज ने इस कदम को सरकार की “घबराहट” करार देते हुए कहा कि जामिया मस्जिद कश्मीर के मुसलमानों के लिए एक अहम धार्मिक और सामाजिक केंद्र है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार मुस्लिम संस्थाओं और उनकी पहचान को कमजोर करने की कोशिश कर रही है
हालांकि, सरकार और प्रशासन की ओर से इस मामले पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
काबुल पर हमला; भारत ने भेजी 2.5 टन मेडिकल राहत सामग्री
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में हुए हवाई हमले में घायल लोगों के इलाज के लिए त्वरित कदम उठाते हुए 2.5 टन मेडिकल सहायता भेजी है. इस राहत सामग्री में आपातकालीन दवाइयां, मेडिकल डिस्पोजेबल्स, किट्स और जरूरी उपकरण शामिल हैं, जो घायलों के इलाज और उनकी रिकवरी में मदद करेंगे.
भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जानकारी साझा करते हुए कहा गया, “16 मार्च को हुए जघन्य हमले में घायल लोगों के इलाज और शीघ्र स्वस्थ होने में सहायता के लिए भारत ने काबुल को आपातकालीन दवाओं, मेडिकल डिस्पोजेबल्स, किट और उपकरणों की 2.5 टन की खेप भेजी है ”
विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत अफगान जनता के साथ एकजुटता से खड़ा है और इस कठिन समय में हर संभव मानवीय सहायता देना जारी रखेगा.
16 मार्च की रात हुए इस हमले में काबुल के एक बड़े अस्पताल को निशाना बनाया गया. हमले में 400 से ज्यादा लोग मारे गए और कम से कम 250 लोग घायल हुए.
भाई की शादी है, इसलिए 10 दिन के लिए जेल से बाहर शरजील इमाम
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, दिल्ली दंगे के आरोप में करीब छह साल की लंबी कैद के बाद शरजील इमाम को तिहाड़ जेल से जमानत मिली है, लेकिन यह रिहाई स्थायी नहीं, बल्कि सिर्फ 10 दिनों की है. अदालत ने 25 मार्च को उनके भाई की शादी के लिए यह छूट दी है. शुक्रवार को जेल से बाहर निकलते समय इमाम के चेहरे पर मुस्कान थी और उन्होंने विक्ट्री साइन भी दिखाया.
पूरा मामला 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे से जुड़ा है, जिसमें 53 लोगों की जान गई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे. पुलिस के अनुसार, इमाम ने उस दौरान विरोध प्रदर्शनों और चक्का जाम की रणनीति बनाने में भूमिका निभाई थी और अलग-अलग जगहों पर लोगों को संगठित किया था. इन आरोपों के आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया गया और तब से वह न्यायिक हिरासत में थे.
अदालत का फैसला: राहत, लेकिन सीमित
दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने 9 मार्च को शरजील इमाम को 10 दिन की अंतरिम जमानत दी थी. हालांकि उन्होंने 6 हफ्तों की मांग की थी.
जमानत की शर्तें:
किसी भी गवाह या केस से जुड़े व्यक्ति से संपर्क नहीं
जांच अधिकारी को मोबाइल नंबर देना अनिवार्य
परिवार और करीबी रिश्तेदारों तक ही मुलाकात सीमित
सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक
30 मार्च तक आत्मसमर्पण अनिवार्य
शरजील इमाम को लेकर देश में राय हमेशा बंटी रही है. एक पक्ष उन्हें भड़काऊ भाषणों के लिए जिम्मेदार ठहरता है, तो दूसरी तरफ उन्हें असहमति की आवाज के रूप में देखा जाता है. यही कारण है कि उनकी यह अस्थायी रिहाई सिर्फ एक कानूनी घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक बहस को भी जीवित करती है. अभी के लिए यह सिर्फ 10 दिनों की राहत है. इसके बाद मामला फिर अदालत में ही आगे बढ़ेगा.
चीन वर्षों से वैश्विक ऊर्जा संकट की तैयारी कर रहा है; उसे अब इसका लाभ मिल रहा है
‘द गार्डियन’ में डिप्टी बिजनेस एडिटर कैलम जोंस ने एक विश्लेषण में बताया है कि कैसे चीन की दूरगामी ऊर्जा नीतियों ने उसे वर्तमान वैश्विक ऊर्जा संकट (जो ईरान युद्ध के कारण उत्पन्न हुआ है) से सुरक्षित रखा है.
जोंस के मुताबिक, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वर्षों पहले ही यह लक्ष्य निर्धारित किया था कि चीन को अपनी ऊर्जा सुरक्षा “अपने हाथों में” रखनी चाहिए. 2021 के एक तेल क्षेत्र के दौरे के दौरान उन्होंने इस पर विशेष जोर दिया था. जब अन्य एशियाई देश ऊर्जा बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, चीन के पास तेल और गैस का विशाल भंडार है. कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अनुमान के अनुसार, चीन के पास लगभग 1.4 अरब बैरल का कच्चा तेल भंडार है, जो मौजूदा संकट के समय उसे बड़ी राहत दे रहा है.
रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) में निवेश: चीन ने केवल जीवाश्म ईंधन पर निर्भर रहने के बजाय सौर, पवन और बैटरी तकनीक में भारी निवेश किया है. पिछले साल चीन के निवेश विकास का 90% हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा से आया था. 2026 तक चीन में सौर ऊर्जा कोयले को पीछे छोड़ने की राह पर है.
कम निर्भरता: अन्य एशियाई देशों (जैसे जापान जो 95% तेल आयात के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है) की तुलना में चीन की निर्भरता कम है. चीन अपनी जरूरत का लगभग आधा तेल मध्य पूर्व से लेता है, लेकिन उसके पास मौजूद ‘बफर’ उसे झटकों से बचाते हैं.
आर्थिक लाभ: ऊर्जा संकट के कारण जब दुनिया भर में महंगाई बढ़ रही है, चीन ने अपने रिफाइनरों को डीजल और पेट्रोल का निर्यात रोकने का निर्देश दिया है ताकि घरेलू कीमतें स्थिर रहें. इसके अलावा, चीन की सस्ती रिन्यूएबल तकनीक अब दुनिया के लिए एक अनिवार्य विकल्प बन गई है.
यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि चीन ने ऊर्जा को केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि एक रणनीतिक हथियार के रूप में देखा है. उसकी वर्षों की तैयारी ने उसे एक ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया है, जहाँ वह वैश्विक संकट के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में सक्षम है.
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