21/01/2026: मार्क कार्नी का दावोस में धमाका | ट्रंप को ग्रीनलैंड चाहिए पर ताकत से नहीं | खुदकुशी को लेकर चुनाव आयोग पर एफआईआर | संभल जज का तबादला | वर्ल्ड कप से बांग्लादेश बाहर, पाकिस्तान पर भी सवाल
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियां
दावोस में भूकंप: कनाडा ने अमेरिका का साथ छोड़ा, पुरानी विश्व व्यवस्था को बताया ‘मृत’.
ट्रंप की जिद: ग्रीनलैंड चाहिए, नहीं तो नाटो सहयोगियों पर लगेगा टैक्स.
यूरोप का हथियार: ईयू ने तैयार किया ‘ट्रेड बाज़ूका’, अमेरिका से आर्थिक युद्ध की तैयारी.
बंगाल में मौत: चुनाव आयोग की प्रक्रिया से परेशान बुजुर्ग की आत्महत्या, आयोग पर FIR.
जेल में प्रयोग: सोनम वांगचुक का अनूठा काम, चींटियों और तापमान पर कर रहे रिसर्च.
पालक पनीर पर जीत: अमेरिका में ‘फूड रेसिज्म’ के खिलाफ भारतीय छात्रों को मिला 1.6 करोड़ का हर्जाना.
क्रिकेट में रार: बांग्लादेश और पाकिस्तान ने भारत में वर्ल्ड कप खेलने से किया इनकार.
दावोस में कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का धमाकेदार भाषण
“अगर आप टेबल पर नहीं हैं, तो आप मेन्यू पर हैं.”
दावोस के बर्फीले पहाड़ों में 24 घंटों के भीतर जो हुआ, उसे भविष्य के इतिहासकार एक निर्णायक क्षण मान सकते हैं. ‘एक्सियोस’ के लिए ज़ैचरी बसु रिपोर्ट करते हैं कि यह वह हफ्ता है जब अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी, कनाडा, सार्वजनिक रूप से अलग हो गया.
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने ट्रम्प के अमेरिका को ऐतिहासिक फटकार लगाते हुए घोषित किया कि अमेरिका के नेतृत्व वाली नियम-आधारित व्यवस्था अब एक “सुखद कल्पना” मात्र है. कार्नी ने कहा, “यह सौदा अब काम नहीं करता.” उन्होंने चेक लेखक वाक्लाव हवेल के निबंध का हवाला देते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि देश “अपनी खिड़कियों से वो बोर्ड हटा दें” जिन पर उन्हें विश्वास नहीं है. कार्नी ने हाल ही में बीजिंग की यात्रा की और कहा कि चीन अब अमेरिका से ज्यादा “अनुमानित” है.
इस भाषण में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था पर एक बहुत ही स्पष्ट और गंभीर दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है. प्रस्तुत है मार्क कार्नी का पूरा भाषण.
कनाडा और पूरी दुनिया के लिए इस निर्णायक मोड़ पर आपके बीच होना मेरे लिए खुशी की बात है – और एक फर्ज भी.
आज मैं विश्व व्यवस्था में आई उस दरार के बारे में बात करूंगा, एक ‘अच्छी कहानी’ के अंत के बारे में, और एक ऐसी क्रूर हकीकत की शुरुआत के बारे में जहाँ महाशक्तियों की जियो-पॉलिटिक्स (भू-राजनीति) अब किसी भी नियम या बंधन को नहीं मानती.
लेकिन मैं आपसे यह भी कहना चाहता हूं कि दूसरे देश, खास तौर पर कनाडा जैसी ‘मध्यम शक्तियां’, बेबस नहीं हैं. उनके पास एक नई व्यवस्था बनाने की क्षमता है जो हमारे मूल्यों को समाहित करती हो - जैसे मानवाधिकारों का सम्मान, सतत विकास, एकजुटता, संप्रभुता और राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता.
कम ताकतवर लोगों की ताकत ईमानदारी से शुरू होती है.
हमें हर दिन याद दिलाया जाता है कि हम महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के दौर में जी रहे हैं. कि नियमों पर आधारित व्यवस्था धुंधली पड़ रही है. कि ताकतवर वो करते हैं जो वो कर सकते हैं, और कमजोर वो भुगतते हैं जो उन्हें भुगतना पड़ता है.
थ्यूसीडाइड्स की इस कहावत को अपरिहार्य माना जाता है – जैसे कि यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों का कोई प्राकृतिक तर्क हो. और इस तर्क का सामना करते हुए, देशों में एक मजबूत प्रवृत्ति होती है कि वे साथ चलने के लिए झुक जाएं. समझौता कर लें. मुसीबत से बचें. और यह उम्मीद करें कि आज्ञापालन से उन्हें सुरक्षा मिल जाएगी.
लेकिन ऐसा नहीं होगा.
तो, हमारे पास क्या विकल्प हैं?
1978 में, चेक डिसिडेंट वाक्लाव हवेल ने ‘द पावर ऑफ द पावरलेस’ (शक्तिहीनों की शक्ति) नाम से एक निबंध लिखा था. उसमें उन्होंने एक साधारण सवाल पूछा: कम्युनिस्ट व्यवस्था खुद को कैसे बनाए रखती थी?
उनका जवाब एक सब्जी वाले से शुरू हुआ. हर सुबह, यह दुकानदार अपनी खिड़की में एक बोर्ड लगाता है: “दुनिया के मजदूरों, एक हो जाओ!” वह इस पर विश्वास नहीं करता. कोई भी इस पर विश्वास नहीं करता. लेकिन वह फिर भी वह बोर्ड लगाता है – मुसीबत से बचने के लिए, आज्ञापालन का संकेत देने के लिए, और बस साथ चलने के लिए. और चूंकि हर सड़क पर हर दुकानदार ऐसा ही करता है, इसलिए वह सिस्टम बना रहता है.
सिर्फ हिंसा के जरिए नहीं, बल्कि आम लोगों की उन रस्मों में भागीदारी के जरिए जिन्हें वे निजी तौर पर झूठा मानते हैं.
हवेल ने इसे “झूठ के भीतर जीना” कहा था. सिस्टम की ताकत उसकी सच्चाई से नहीं आती, बल्कि हर किसी की इस इच्छा से आती है कि वे ऐसा अभिनय करें जैसे कि यह सच हो. और इसकी कमजोरी भी उसी स्रोत से आती है: जब एक भी व्यक्ति अभिनय करना बंद कर देता है — जब वह सब्जी वाला अपना बोर्ड हटा देता है — तो वह भ्रम टूटने लगता है.
अब वक्त आ गया है कि कंपनियां और देश अपनी खिड़कियों से वो बोर्ड उतार दें.
दशकों तक, कनाडा जैसे देश उस व्यवस्था के तहत फलते-फूलते रहे जिसे हम ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ कहते थे. हम इसकी संस्थाओं में शामिल हुए, इसके सिद्धांतों की तारीफ की, और इसकी पूर्वानुमानशीलता से फायदा उठाया. हम इसकी सुरक्षा में अपने मूल्यों पर आधारित विदेश नीतियों का पालन कर सके.
हम जानते थे कि अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था की कहानी आंशिक रूप से झूठी थी. हम जानते थे कि सबसे ताकतवर देश जब चाहें खुद को नियमों से बाहर कर लेते थे. व्यापार के नियम एकतरफा लागू होते थे. और अंतरराष्ट्रीय कानून आरोपी या पीड़ित की पहचान के आधार पर अलग-अलग सख्ती से लागू होता था.
लेकिन यह “फिक्शन” (कल्पना) उपयोगी थी, और अमेरिकी वर्चस्व ने, विशेष रूप से, कुछ सार्वजनिक सुविधाएं प्रदान करने में मदद की: जैसे खुले समुद्री मार्ग, एक स्थिर वित्तीय प्रणाली, सामूहिक सुरक्षा और विवादों को सुलझाने के लिए ढांचे का समर्थन.
इसलिए, हमने भी खिड़की में वह बोर्ड लगा दिया. हमने उन रस्मों में हिस्सा लिया. और हमने कथनी और करनी के बीच के इस अंतर को उजागर करने से काफी हद तक परहेज किया.
अब यह सौदा काम नहीं कर रहा है.
मैं सीधी बात कहूँ: हम बदलाव के दौर में नहीं हैं, हम एक टूटन के बीच में हैं.
पिछले दो दशकों में, वित्त, स्वास्थ्य, ऊर्जा और भू-राजनीति के संकटों की एक श्रृंखला ने अत्यधिक वैश्विक एकीकरण के खतरों को उजागर कर दिया है.
हाल ही में, महाशक्तियों ने आर्थिक एकीकरण को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. लाभ उठाने के लिए टैरिफ (आयात शुल्क). जबरदस्ती करने के लिए वित्तीय बुनियादी ढांचा. और कमजोरियों के रूप में शोषण करने के लिए सप्लाई चेन.
आप एकीकरण के माध्यम से आपसी लाभ के “झूठ के भीतर” नहीं जी सकते, जब वही एकीकरण आपकी अधीनता का स्रोत बन जाए.
बहुपक्षीय संस्थाएं जिन पर मध्यम शक्तियां निर्भर थीं— डब्ल्यूटीओ (विश्व व्यापार संगठन), यूएन (संयुक्त राष्ट्र), सीओपी (पार्टियों का सम्मेलन) – यानी सामूहिक समस्या समाधान का पूरा ढांचा – अब बहुत कमजोर हो चुका है.
नतीजतन, कई देश एक ही निष्कर्ष निकाल रहे हैं. उन्हें अपनी रणनीतिक स्वायत्तता विकसित करनी होगी: ऊर्जा में, भोजन में, महत्वपूर्ण खनिजों में, वित्त में और सप्लाई चेन में.
यह भावना समझ में आती है. जो देश खुद को खिला नहीं सकता, ईंधन नहीं दे सकता या अपनी रक्षा नहीं कर सकता, उसके पास बहुत कम विकल्प होते हैं. जब नियम अब आपकी रक्षा नहीं करते, तो आपको अपनी रक्षा खुद करनी होगी.
लेकिन हमें यह स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि यह रास्ता कहाँ जाता है. किलों वाली दुनिया ज्यादा गरीब होगी, ज्यादा नाजुक होगी और कम टिकाऊ होगी.
और एक और सच है: यदि महाशक्तियां अपनी शक्ति और हितों की अनर्गल खोज के लिए नियमों और मूल्यों का दिखावा भी छोड़ देती हैं, तो “लेन-देन” से होने वाले लाभों को दोहराना कठिन हो जाता है. कोई भी महाशक्ति अपने संबंधों को लगातार भुना नहीं सकती.
सहयोगी देश अनिश्चितता से बचने के लिए विविधता लाएंगे. सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे. विकल्प बढ़ाएंगे. यह संप्रभुता का पुनर्निर्माण करता है – वह संप्रभुता जो कभी नियमों पर आधारित थी, लेकिन अब दबाव झेलने की क्षमता पर टिकी होगी.
जैसा कि मैंने कहा, इस तरह के क्लासिक जोखिम प्रबंधन की एक कीमत होती है, लेकिन रणनीतिक स्वायत्तता और संप्रभुता की उस लागत को साझा भी किया जा सकता है. लचीलेपन में सामूहिक निवेश हर किसी के अपने “किले” बनाने से सस्ता है. साझा मानक विखंडन को कम करते हैं. एक-दूसरे का पूरक होना हमेशा फायदे का सौदा होता है.
कनाडा जैसी मध्यम शक्तियों के लिए सवाल यह नहीं है कि इस नई वास्तविकता के अनुकूल ढलना है या नहीं. हमें ढलना ही होगा. सवाल यह है कि क्या हम केवल ऊंची दीवारें बनाकर अनुकूलन करते हैं – या हम कुछ और महत्वाकांक्षी कर सकते हैं.
कनाडा उन पहले देशों में से था जिसने खतरे की घंटी सुनी, जिससे हमें अपनी रणनीतिक स्थिति को मौलिक रूप से बदलने की प्रेरणा मिली.
कनाडाई जानते हैं कि हमारी पुरानी, आरामदायक धारणा अब मान्य नहीं है कि हमारा भूगोल और गठबंधन की सदस्यता अपने आप समृद्धि और सुरक्षा प्रदान करेगी.
हमारा नया दृष्टिकोण उस पर आधारित है जिसे अलेक्जेंडर स्टब ने “मूल्यों पर आधारित यथार्थवाद” कहा है – या, दूसरे शब्दों में कहें तो, हमारा लक्ष्य “सिद्धांतवादी और व्यावहारिक” होना है.
सिद्धांतवादी: हमारे मौलिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता में – संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता, बल प्रयोग पर रोक (सिवाय इसके कि जब वह संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुरूप हो), और मानवाधिकारों का सम्मान.
व्यावहारिक: यह स्वीकार करने में कि प्रगति अक्सर क्रमिक होती है, कि हित अलग-अलग होते हैं, और यह कि हर भागीदार हमारे मूल्यों को साझा नहीं करता. हम व्यापक रूप से, रणनीतिक रूप से, खुली आंखों से जुड़ रहे हैं. हम दुनिया को वैसे ही अपना रहे हैं जैसी वह है, न कि जैसी हम चाहते हैं कि वह हो.
कनाडा अपने संबंधों को इस तरह संतुलित कर रहा है कि उनकी गहराई हमारे मूल्यों को प्रतिबिंबित करे. हम अपने प्रभाव को अधिकतम करने के लिए व्यापक जुड़ाव को प्राथमिकता दे रहे हैं, यह देखते हुए कि विश्व व्यवस्था कितनी अस्थिर है, इससे क्या जोखिम पैदा होते हैं, और आगे क्या दांव पर लगा है.
हम अब केवल अपने मूल्यों की ताकत पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि अपनी ताकत के मूल्य पर भी निर्भर हैं.
हम वह ताकत घर पर बना रहे हैं.
जब से मेरी सरकार ने कार्यभार संभाला है, हमने आय, पूंजीगत लाभ और व्यावसायिक निवेश पर करों में कटौती की है, हमने अंतर-प्रांतीय व्यापार के लिए सभी संघीय बाधाओं को हटा दिया है, और हम ऊर्जा, एआई, महत्वपूर्ण खनिजों, नए व्यापार गलियारों और उससे आगे के क्षेत्रों में एक ट्रिलियन डॉलर के निवेश को तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं.
हम 2030 तक अपने रक्षा खर्च को दोगुना कर रहे हैं और ऐसा उन तरीकों से कर रहे हैं जो हमारे घरेलू उद्योगों का निर्माण करते हैं.
हम विदेशों में तेजी से विविधता ला रहे हैं. हमने यूरोपीय संघ के साथ एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी पर सहमति व्यक्त की है, जिसमें ‘SAFE’ (यूरोप की रक्षा खरीद व्यवस्था) में शामिल होना भी शामिल है.
हमने पिछले छह महीनों में चार महाद्वीपों पर बारह अन्य व्यापार और सुरक्षा सौदों पर हस्ताक्षर किए हैं.
पिछले कुछ दिनों में, हमने चीन और कतर के साथ नई रणनीतिक साझेदारी की है.
हम भारत, आसियान, थाईलैंड, फिलीपींस और मरकोसुर के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहे हैं.
वैश्विक समस्याओं को हल करने में मदद करने के लिए, हम ‘वैरिएबल ज्योमेट्री’ अपना रहे हैं— यानी मूल्यों और हितों के आधार पर अलग-अलग मुद्दों के लिए अलग-अलग गठबंधन.
यूक्रेन पर, हम ‘कोएलिशन ऑफ द विलिंग’ (इच्छुक गठबंधन) के मुख्य सदस्य हैं और इसकी रक्षा और सुरक्षा के लिए प्रति व्यक्ति सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक हैं.
आर्कटिक संप्रभुता पर, हम ग्रीनलैंड और डेनमार्क के साथ मजबूती से खड़े हैं और ग्रीनलैंड के भविष्य को निर्धारित करने के उनके अद्वितीय अधिकार का पूरी तरह से समर्थन करते हैं. आर्टिकल 5 के प्रति हमारी प्रतिबद्धता अटूट है.
हम गठबंधन के उत्तरी और पश्चिमी किनारों को और सुरक्षित करने के लिए अपने नाटो सहयोगियों (नॉर्डिक बाल्टिक 8 सहित) के साथ काम कर रहे हैं, जिसमें रडार, पनडुब्बियों, विमानों और जमीनी सैनिकों में कनाडा का अभूतपूर्व निवेश शामिल है. कनाडा ग्रीनलैंड को लेकर टैरिफ का कड़ा विरोध करता है और आर्कटिक की सुरक्षा और समृद्धि के साझा उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए केंद्रित बातचीत का आह्वान करता है.
बहुपक्षीय व्यापार पर, हम ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप और यूरोपीय संघ के बीच एक पुल बनाने के प्रयासों का समर्थन कर रहे हैं, जिससे 1.5 बिलियन लोगों का एक नया व्यापारिक ब्लॉक तैयार हो सके.
महत्वपूर्ण खनिजों पर, हम G7 में लंगर डाले हुए ‘खरीदारों के क्लब’ बना रहे हैं ताकि दुनिया केंद्रित आपूर्ति से हटकर विविधता ला सके.
एआई पर, हम समान विचारधारा वाले लोकतंत्रों के साथ सहयोग कर रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंततः हमें ‘हेजेमोन्स’ (महाशक्तियों) और ‘हाइपरस्केलर्स’ (तकनीकी दिग्गजों) के बीच चयन करने के लिए मजबूर न होना पड़े.
यह कोई भोला-भाला बहुपक्षवाद नहीं है. न ही यह कमजोर हो चुकी संस्थाओं पर निर्भर है. यह उन गठबंधनों का निर्माण कर रहा है जो काम करते हैं, हर मुद्दे पर अलग-अलग, उन भागीदारों के साथ जो एक साथ काम करने के लिए पर्याप्त सामान्य आधार साझा करते हैं. कुछ मामलों में, यह राष्ट्रों का विशाल बहुमत होगा.
और यह व्यापार, निवेश और संस्कृति के पार संबंधों का एक घना जाल बना रहा है जिस पर हम भविष्य की चुनौतियों और अवसरों के लिए भरोसा कर सकते हैं.
मध्यम शक्तियों को एक साथ कार्य करना होगा क्योंकि अगर आप टेबल पर नहीं हैं, तो आप मेन्यू पर हैं.
महाशक्तियां अकेले चलने का जोखिम उठा सकती हैं. उनके पास बाजार का आकार, सैन्य क्षमता और शर्तों को निर्धारित करने की ताकत है. मध्यम शक्तियों के पास यह नहीं है. लेकिन जब हम किसी महाशक्ति के साथ केवल द्विपक्षीय बातचीत करते हैं, तो हम कमजोरी के साथ बातचीत करते हैं. जो पेशकश की जाती है, हम उसे स्वीकार करते हैं. हम सबसे अधिक आज्ञाकारी बनने के लिए एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं.
यह संप्रभुता नहीं है. यह अधीनता स्वीकार करते हुए संप्रभुता का प्रदर्शन करना है.
महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता वाली दुनिया में, बीच के देशों के पास एक विकल्प है: या तो एहसान के लिए एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करें या प्रभाव वाला तीसरा रास्ता बनाने के लिए एकजुट हो जाएं.
हमें ‘हार्ड पावर’ (सैन्य/आर्थिक बल) के उदय को इस तथ्य से अंधे नहीं होने देना चाहिए कि वैधता, अखंडता और नियमों की शक्ति मजबूत रहेगी — यदि हम इसे एक साथ इस्तेमाल करना चुनते हैं.
जो मुझे वापस हवेल की बात पर लाता है.
मध्यम शक्तियों के लिए “सच में जीने” का क्या मतलब होगा?
इसका मतलब है वास्तविकता का नाम लेना. “नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था” की दुहाई देना बंद करें जैसे कि यह अभी भी विज्ञापन के अनुसार काम करती है. सिस्टम को वही कहें जो वह है: तीव्र महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता का दौर, जहां सबसे शक्तिशाली देश जबरदस्ती के हथियार के रूप में आर्थिक एकीकरण का उपयोग करके अपने हितों को साधते हैं.
इसका मतलब है लगातार कार्य करना. सहयोगियों और प्रतिद्वंद्वियों पर समान मानक लागू करें. जब मध्यम शक्तियां एक दिशा से आर्थिक धमकी की आलोचना करती हैं लेकिन दूसरी दिशा से आने पर चुप रहती हैं, तो हम खिड़की में वह बोर्ड लगाए हुए हैं.
इसका मतलब है उसका निर्माण करना जिस पर हम विश्वास करने का दावा करते हैं. पुरानी व्यवस्था के बहाल होने का इंतजार करने के बजाय, ऐसी संस्थाएं और समझौते बनाएं जो बताए गए अनुसार काम करें.
और इसका मतलब है उस लाभ को कम करना जो जबरदस्ती को सक्षम बनाता है. एक मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था का निर्माण हमेशा हर सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विविधता लाना केवल आर्थिक समझदारी नहीं है; यह ईमानदार विदेश नीति की भौतिक नींव है. देश प्रतिशोध के प्रति अपनी संवेदनशीलता को कम करके सैद्धांतिक रुख अपनाने का अधिकार अर्जित करते हैं.
कनाडा के पास वह है जो दुनिया चाहती है. हम एक ऊर्जा महाशक्ति हैं. हमारे पास महत्वपूर्ण खनिजों के विशाल भंडार हैं. हमारे पास दुनिया की सबसे शिक्षित आबादी है. हमारे पेंशन फंड दुनिया के सबसे बड़े और सबसे परिष्कृत निवेशकों में से हैं. हमारे पास पूंजी है, प्रतिभा है, और निर्णायक रूप से कार्य करने की अपार राजकोषीय क्षमता वाली सरकार है.
और हमारे पास वे मूल्य हैं जिनकी कई अन्य लोग आकांक्षा करते हैं.
कनाडा एक बहुलवादी समाज है जो काम करता है. हमारा सार्वजनिक चौराहा मुखर, विविध और स्वतंत्र है. कनाडाई स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध हैं.
हम एक स्थिर, विश्वसनीय भागीदार हैं—एक ऐसी दुनिया में जो बिल्कुल भी स्थिर नहीं है—एक ऐसा भागीदार जो लंबी अवधि के लिए रिश्ते बनाता है और उन्हें महत्व देता है.
कनाडा के पास कुछ और भी है: जो हो रहा है उसकी पहचान और उसके अनुसार कार्य करने का दृढ़ संकल्प.
हम समझते हैं कि यह टूटन अनुकूलन से कहीं अधिक की मांग करती है. यह दुनिया के प्रति ईमानदारी की मांग करती है, जैसी वह है.
हम खिड़की से वह बोर्ड हटा रहे हैं.
पुरानी व्यवस्था वापस नहीं आ रही है. हमें इसका शोक नहीं मनाना चाहिए. पुरानी यादों में जीना कोई रणनीति नहीं है.
लेकिन इस टूटन से, हम कुछ बेहतर, मजबूत और अधिक न्यायपूर्ण बना सकते हैं.
यह मध्यम शक्तियों का काम है, जिनके पास “किलों वाली दुनिया” से खोने के लिए सबसे ज्यादा है और वास्तविक सहयोग वाली दुनिया से पाने के लिए सबसे ज्यादा है.
ताकतवर के पास उनकी ताकत है. लेकिन हमारे पास भी कुछ है – ढोंग बंद करने, वास्तविकता का नाम लेने, घर पर अपनी ताकत बनाने और एक साथ कार्य करने की क्षमता.
यही कनाडा का रास्ता है. हम इसे खुले तौर पर और आत्मविश्वास से चुनते हैं.
और यह रास्ता हमारे साथ चलने के इच्छुक किसी भी देश के लिए पूरी तरह खुला है.
दावोस में टूटी पुरानी विश्व व्यवस्था: ग्रीनलैंड पर ट्रम्प की जिद, कनाडा-यूरोप का पलटवार
स्विट्जरलैंड के दावोस में चल रहा वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) इस बार इतिहास के पन्नों में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज होने जा रहा है, जब मौजूदा विश्व व्यवस्था में गहरी दरारें पड़ गईं. 2026 की शुरुआत एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ग्रीनलैंड को हासिल करने की जिद और दूसरी तरफ उनके सहयोगियों—कनाडा और यूरोपीय संघ—के विद्रोह के साथ हुई है. जहाँ ट्रम्प ने स्पष्ट किया है कि वे ग्रीनलैंड चाहते हैं (भले ही सेना का इस्तेमाल न करें), वहीं कनाडा के प्रधानमंत्री ने अमेरिका के नेतृत्व वाली व्यवस्था को ‘मृत’ घोषित कर दिया है. उधर, यूरोप ट्रम्प की धमकियों के खिलाफ आर्थिक युद्ध की तैयारी कर रहा है. यहाँ इन सभी महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का विवरण है:
ट्रम्प का दावोस में 72 मिनट का भाषण: “मैं ग्रीनलैंड चाहता हूँ, लेकिन सेना नहीं भेजूंगा”
दावोस में अपने 72 मिनट के तीखे भाषण के दौरान, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने डेनमार्क से ग्रीनलैंड का नियंत्रण लेने के अपने इरादे को दोहराया. ‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय सहयोगी इस मुद्दे पर ट्रम्प के साथ टकराव की आशंका जता रहे थे. ट्रम्प ने अपने भाषण की शुरुआत ही इस आर्कटिक क्षेत्र को हासिल करने के लिए “तत्काल बातचीत” की मांग के साथ की और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इसे “छह घंटे में खोने” के लिए डेनमार्क का मजाक उड़ाया.
हालाँकि, एक राहत की बात यह रही कि ट्रम्प ने इसे हासिल करने के लिए सैन्य बल के प्रयोग से इनकार किया. उन्होंने कहा, “अगर अमेरिका चाहे तो बलपूर्वक इसे ले सकता है और हम अजेय हैं, लेकिन मैं बल प्रयोग नहीं करना चाहता. अमेरिका केवल ग्रीनलैंड नामक जगह मांग रहा है.” ट्रम्प ने तर्क दिया कि केवल अमेरिका ही “बर्फ के इस विशाल टुकड़े” की रक्षा और विकास कर सकता है क्योंकि डेनमार्क ऐसा करने में सक्षम नहीं है.
ट्रम्प ने नाटो सहयोगियों के डर को खारिज करते हुए कहा, “उनके पास विकल्प है: आप हाँ कह सकते हैं और हम आभारी होंगे, या आप ना कह सकते हैं, और हम इसे याद रखेंगे.” उन्होंने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का भी मजाक उड़ाया और दावा किया कि उन्होंने मैक्रों से कहा था, “तुम लोग 30 साल से हमें धोखा दे रहे हो.”
ट्रम्प ने यह भी दावा किया कि अमेरिका के बिना “पूरी दुनिया डूब जाएगी” और यूरोप के लोग “जर्मन और थोड़ी जापानी बोल रहे होते.” उन्होंने जलवायु परिवर्तन की चिंताओं को दरकिनार करते हुए तेल के फायदों पर बात की और पवन चक्कियों को गिराने की बात कही.
यूरोपीय संघ ने ट्रम्प के खिलाफ ‘ट्रेड बाज़ूका’ तैयार किया
डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा नाटो सहयोगियों पर 10% टैरिफ और फ्रांसीसी वाइन पर 200% टैरिफ लगाने की धमकी के बाद, यूरोपीय संघ (ईयू) ने अपना रुख कड़ा कर लिया है. ‘पोलिटिको’ की रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोपीय नेता चाहते हैं कि अगर ट्रम्प अपनी ग्रीनलैंड वाली धमकियों से पीछे नहीं हटते, तो ईयू अपना सबसे शक्तिशाली व्यापारिक हथियार इस्तेमाल करे.
राजनयिक सूत्रों के अनुसार, जर्मनी अब फ्रांस के साथ शामिल हो गया है और दोनों देश यूरोपीय आयोग से ‘एंटी-कोर्शन इंस्ट्रूमेंट’ या “ट्रेड बाज़ूका” का उपयोग करने का पता लगाने के लिए कह रहे हैं. यह ईयू का वह हथियार है जो आर्थिक दबाव बनाने वाले देशों के खिलाफ कड़े जवाबी प्रतिबंध लगा सकता है.
एक वरिष्ठ फ्रांसीसी अधिकारी ने कहा, “जर्मनों के साथ सहमति बन रही है, उनकी तरफ से एक जागृति आई है कि हमें अब भोला बनना बंद करना होगा.” यूरोपीय नेता ट्रम्प के खिलाफ 93 अरब यूरो के अमेरिकी निर्यात पर टैरिफ लगाने वाले एक पुराने जवाबी पैकेज का उपयोग करने पर भी चर्चा कर रहे हैं. जर्मनी की सोच यह है कि अमेरिका के साथ पूर्ण व्यापार युद्ध से बचने के लिए एक मजबूत निवारक का होना जरूरी है.
हरकारा डीप डाइव:
शिवकांत : चुनौती देने पर ट्रंप हमेशा झुक जाते हैं
स्विट्जरलैंड के बर्फीले पहाड़ों के बीच बसा दावोस, जो हर साल दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक दिशा तय करने का गवाह बनता था, इस साल एक ऐतिहासिक ‘टूटन’ का केंद्र बन गया है. 2026 की शुरुआत ने जिस भू-राजनीतिक संकट को जन्म दिया है, वह केवल एक साल की घटना नहीं, बल्कि पिछले 80 सालों से चली आ रही उस ‘नियम-आधारित विश्व व्यवस्था’ का अंत है, जिसका डंका अमेरिका पीटता आया था.
‘हरकारा डीप डाइव’ में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार और बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक शिवकांत के साथ इस बदलते परिदृश्य पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का लब्बोलुआब यह है कि दुनिया अब उस दौर में है जो पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बीच का समय था—पुरानी व्यवस्था मर रही है और नई अभी पैदा नहीं हुई है.
शिवकांत इस पूरे प्रकरण में ट्रंप के दोहरे चरित्र को उजागर करते हैं. एक तरफ ट्रंप ग्रीनलैंड मांगते समय रूस को एक बड़ा खतरा बताते हैं. दूसरी तरफ, यूक्रेन युद्ध में वे व्लादिमीर पुतिन की हर शर्त मानने को तैयार दिखते हैं. पांच साल से चल रहे युद्ध में ट्रंप यूक्रेन पर दबाव डाल रहे हैं कि वह अपनी जमीन रूस को दे दे. वे यह भी कहते हैं कि जब ट्रंप की घुड़कियों के आगे कोई नहीं झुकता और चुनौती देता है, तो वे चिकन आउट (घुटने टेक) देते हैं. पर उसके लिए तैयार रहना पड़ता है, जैसे चीन तैयार था.
बातचीत का सबसे चिंताजनक पहलू डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर दी गई धमकियां हैं. डेनमार्क नाटो का एक पुराना और वफादार सहयोगी है. नाटो का अनुच्छेद-5 कहता है—’एक पर हमला, सब पर हमला’. लेकिन शिवकांत सवाल उठाते हैं कि अगर नाटो का सबसे बड़ा नेता (अमेरिका) ही दूसरे सदस्य (डेनमार्क) की संप्रभुता को चुनौती दे, तो फिर नाटो का क्या औचित्य रह जाता है?
यह 1974 में तुर्की और ग्रीस के बीच साइप्रस को लेकर हुए संघर्ष की याद दिलाता है, लेकिन ग्रीनलैंड का मामला उससे कहीं ज्यादा गंभीर है. ट्रंप का तर्क है कि उन्हें रूस से निपटने के लिए ग्रीनलैंड चाहिए, जबकि डेनमार्क के साथ अमेरिका की सुरक्षा संधियां 1951 से मौजूद हैं और वे पहले से ही वहां सैन्य अड्डे इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे में ट्रंप की जिद सुरक्षा की नहीं, बल्कि संसाधनों पर कब्जे और अहंकार की है.
विश्लेषण यह बताता है कि ट्रंप की रूस के साथ कोई दुश्मनी नहीं है. उनकी नजर रूस के तेल, रेयर अर्थ मिनरल्स और वहां के बाजार पर है. वे रूस के साथ व्यापारिक सौदे करना चाहते हैं, इसलिए वे पुतिन के ‘वकील’ की तरह बर्ताव कर रहे हैं. यह पाखंड दुनिया के सामने अमेरिका की विश्वसनीयता को शून्य कर देता है. इस उथल-पुथल के बीच भारत, ब्राजील, और यूरोपीय देशों जैसी ‘मध्यम शक्तियों’ के लिए रास्ता क्या है? शिवकांत का मानना है कि अब गुटनिरपेक्षता की पुरानी रीत काम नहीं आएगी. देशों को मुद्दों के आधार पर गठबंधन बनाने होंगे.
चीन ने पिछले 20 सालों में अपनी रक्षा और अर्थव्यवस्था को अमेरिका से स्वतंत्र कर लिया है, लेकिन भारत और अन्य देश इसमें पीछे रह गए. भारत आज भी अपनी रक्षा जरूरतों और ऊर्जा के लिए दूसरों पर निर्भर है. शिवकांत चेतावनी देते हैं कि अगर कल लद्दाख या ताइवान में संकट आता है, तो अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता. भारत को अपनी रक्षा में आत्मनिर्भर होना होगा और अपने कूटनीतिक विकल्पों में विविधता लानी होगी.
संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद अब अप्रासंगिक हो चुके हैं. गाजा हो या यूक्रेन, यह संस्थाएं मूकदर्शक बनी रहीं. बातचीत का निष्कर्ष यही है कि दुनिया को अब एक नई व्यवस्था की जरूरत है, जहाँ महाशक्तियों की मनमानी न चले. भारत, जो ब्रिक्स का अध्यक्ष है, उसके पास एक मौका है कि वह ग्लोबल साउथ और मध्यम शक्तियों को एकजुट करे.
एसआईआर की ‘चिंता’ के कारण बुजुर्ग की आत्महत्या; पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग पर एफआईआर
‘पीटीआई’ की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के खिलाफ एक मामला दर्ज किया गया है. यह मामला एक 82 वर्षीय व्यक्ति की मृत्यु से जुड़ा है, जिसने कथित तौर पर राज्य में मतदाता सूची के विवादास्पद विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर उत्पन्न चिंता के कारण आत्महत्या कर ली थी.
अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि मृतक के बेटे की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई है. समाचार एजेंसी ने एक पुलिस अधिकारी के हवाले से कहा, “मामले में चुनाव आयोग के अधिकारियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और आपराधिक साजिश की धाराएं शामिल की गई हैं. हालांकि, एफआईआर में किसी भी अधिकारी का नाम नहीं लिया गया है.” सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के अनुसार, नवंबर 2025 में इस प्रक्रिया के शुरू होने के बाद से अब तक बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) सहित कम से कम 40 लोगों की कथित तौर पर काम के बोझ, तनाव और एसआईआर से जुड़ी चिंताओं के कारण मृत्यु हो चुकी है.
जेल बैरक में चींटियों का अवलोकन कर रहे हैं वांगचुक, प्रयोग के लिए थर्मामीटर मांगा
जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी और एचआईएएल की सह-संस्थापक गीतांजलि जे. आंग्मो ने बुधवार को बताया कि वांगचुक ने जोधपुर जेल में ‘इको-रिस्पॉन्सिव’ (पर्यावरण के अनुकूल) वास्तुकला पर कुछ प्रयोग करने के लिए थर्मामीटर मांगा है, ताकि जेल की बैरकों को बेहतर बनाया जा सके.
‘पीटीआई’ के मुताबिक, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में आंग्मो ने कहा कि उन्होंने मंगलवार को वांगचुक से मुलाकात की और आखिरकार उन्हें चींटियों और जलवायु परिवर्तन पर वे पुस्तकें सौंप दीं, जिनकी उन्होंने मांग की थी. मैग्सेसे पुरस्कार विजेता कार्यकर्ता और शिक्षक सोनम वांगचुक को 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था. यह कार्रवाई लद्दाख के लिए राज्य के दर्जे और छठी अनुसूची की मांग को लेकर हुए उन प्रदर्शनों के दो दिन बाद हुई थी, जिनमें केंद्र शासित प्रदेश में चार लोगों की मौत हो गई थी और 90 घायल हुए थे.
वह वर्तमान में एकांत कारावास में हैं और जेल में 110 से अधिक दिन बिता चुके हैं. आंग्मो ने कहा, “मैंने कल सोनम वांगचुक से मुलाकात की और उन्हें उनके बड़े भाई द्वारा उपहार में दी गई ‘चींटियों’ पर किताब और जलवायु परिवर्तन तथा उसके समाधान पर पुस्तकें दीं.” उस पुस्तक का शीर्षक एलेनोर स्पाइसर राइस और एडुआर्ड फ्लोरिन निगा की ‘एंट्स: वर्कर्स ऑफ द वर्ल्ड’ है.
उन्होंने आगे बताया कि वांगचुक ने उनसे जेल प्रशासन और सुप्रीम कोर्ट से यह पूछने के लिए कहा है कि क्या उन्हें थर्मामीटर जैसे उपकरण मिल सकते हैं. आंग्मो ने कहा, “उन्होंने मुझसे जेल प्रशासन और भारत के सर्वोच्च न्यायालय से यह पता करने को कहा कि क्या उन्हें थर्मामीटर जैसे उपकरण मिल सकते हैं, ताकि वे जेल बैरकों को बेहतर बनाने के लिए इको-रिस्पॉन्सिव आर्किटेक्चर पर साधारण प्रयोग कर सकें”
उन्होंने मांग की, “सोनम वांगचुक को अब रिहा किया जाए ताकि वे शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में अपना राष्ट्र-निर्माण का कार्य जारी रख सकें.” इससे पहले ‘पीटीआई’ को दिए एक साक्षात्कार में आंग्मो ने बताया था कि वांगचुक अपनी जेल बैरक में चींटियों का अवलोकन कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “यदि वे कुछ चींटियों और उनके व्यवहार को देखते हैं, तो वे मुझसे उस पर किताबें लाने को कहते हैं, क्योंकि चींटी समुदाय में बहुत एकजुटता और टीम भावना होती है. शायद वे उसका अध्ययन करना चाहते हैं.”
आंग्मो ने वांगचुक की हिरासत को चुनौती देते हुए और उनकी तत्काल रिहाई की मांग करते हुए एक ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ याचिका दायर की है. इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को है.
विजय शाह को बचाने के रास्ते तलाश रहा है बीजेपी नेतृत्व
सत्ताधारी भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मध्यप्रदेश के मंत्री कुंवर विजय शाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के विकल्प पर विचार कर रहा है, ताकि उन पर एमपी-एमएलए विशेष अदालत में मुकदमा चलाया जा सके. एक वरिष्ठ पार्टी पदाधिकारी ने बुधवार को बताया कि यह कदम कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ की गई उनकी कथित अपमानजनक टिप्पणियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश के बाद उठाया जा रहा है, जिसमें कोर्ट ने राज्य सरकार को 15 दिनों के भीतर उनके अभियोजन की मंजूरी पर निर्णय लेने का आदेश दिया है.
पार्टी नेता ने खुलासा किया कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के आलोक में इस मुद्दे से निपटने का रास्ता खोजने के लिए कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श करना शुरू कर दिया है. इससे पहले, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को मंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था. हालांकि, मंत्री ने हाईकोर्ट के इस निर्देश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके बाद शीर्ष अदालत ने मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का आदेश दिया था. रबींद्र नाथ चौधरी को मिली जानकारी के अनुसार, भाजपा नेतृत्व अभी भी उन्हें बचाने के रास्ते तलाश रहा है, लेकिन डर यह है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद मंत्री को इस मामले में संरक्षण देने की गुंजाइश बहुत कम है.
संभल गोलीकांड मामले में एफआईआर का आदेश देने वाले जज का तबादला
उत्तर प्रदेश के संभल में 2024 में हुए गोलीकांड से जुड़े मामले में पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने वाले जज का तबादला कर दिया गया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को 14 न्यायिक अधिकारियों के तबादले किए, जिनमें संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) विभांशु सुधीर भी शामिल हैं.
विभांशु सुधीर को अब सुल्तानपुर में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर तैनात किया गया है. उनकी जगह संभल के चंदौसी में तैनात सिविल जज आदित्य सिंह को नया सीजेएम बनाया गया है. यह जानकारी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दी गई है.
गौरतलब है कि जज सुधीर ने इसी महीने पूर्व सर्किल ऑफिसर अनुज चौधरी, कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर और 15–20 अज्ञात पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था. यह मामला नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के विरोध के दौरान हुई फायरिंग से जुड़ा है, जिसमें आलम नामक एक मुस्लिम युवक गोली लगने से बुरी तरह ज़ख़्मी हो गया था.
संभल में हुई इस हिंसा में कुल पांच मुस्लिम युवकों की मौत हो गई थी. यह हिंसा उस वक़्त भड़की थी जब अदालत के आदेश पर शाही जामा मस्जिद का सर्वे किया जा रहा था और स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया था.
पीड़ित आलम के पिता यामीन ने अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि 24 नवंबर 2024 को उनका बेटा मस्जिद के पास ठेले पर बिस्कुट बेच रहा था, तभी पुलिस ने भीड़ पर गोली चला दी. उनका कहना था कि पुलिस की मंशा जान से मारने की थी.
इस मामले में जज सुधीर ने कहा था कि यह साफ है कि आलम को गोली लगी थी और इसकी जांच ज़रूरी है की आखिर गोली किसने चलायी थी. उन्होंने यह भी कहा कि हत्या के प्रयास जैसे गंभीर अपराध में यह नहीं माना जा सकता कि पीड़ित किसी निर्दोष को फंसाएगा. साथ ही, उन्होंने कहा था कि पुलिस इस आधार पर बच नहीं सकती कि वह सिर्फ ड्यूटी निभा रही थी.जज के इस आदेश के बाद संभल पुलिस ने हाईकोर्ट जाने की बात कही थी.
सीएम धामी का एक और सांप्रदायिक बयान, धर्मांतरण और मदरसों को लेकर फिर उग्र रुख
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार को हरिद्वार में आयोजित देव संस्कृति विश्वविद्यालय के “ध्वजारोहण समारोह” में भाषण देते हुए एक बार फिर सांप्रदायिक टिप्पणियां कीं. उन्होंने धर्मांतरण, दंगे, “लव जिहाद”, “लैंड जिहाद” और “थूक जिहाद” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अपनी सरकार के सख़्त रुख़ को दोहराया.
मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने इन गतिविधियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की है और दावा किया कि राज्य में अब तक 10,000 एकड़ से अधिक सरकारी ज़मीन को कथित अतिक्रमण से मुक्त कराया गया है. उन्होंने कहा कि राज्य प्रशासन उस “विभाजनकारी सोच” के ख़िलाफ़ काम कर रहा है, जो समाज को तोड़ने का काम करती है.
धामी ने उत्तराखंड मदरसा बोर्ड को भंग करने, पाठ्यक्रम पर रोक लगाने और करीब 250 “अवैध” मदरसों को बंद करने के फैसले का भी बचाव किया. उन्होंने कहा कि यह क़दम इसलिए उठाए गए ताकि “अलगाववादी सोच के केंद्र” न पनप सकें. उन्होंने अपने भाषण में कहा कि सरकार ज्ञान और संस्कार के मंदिर बनाना चाहती है, न कि ऐसे केंद्र जो 500 साल पुरानी मानसिकता के साथ बच्चों को गुमराह करें.
मुख्यमंत्री ने ऑपरेशन कालनेमि का भी ज़िक्र किया और कहा कि यह अभियान उन लोगों और संगठनों के ख़िलाफ़ चलाया जा रहा है, जो उनके अनुसार सनातन संस्कृति को नुक़सान पहुंचाने का काम कर रहे हैं.
उनके ये बयान ऐसे समय पर आए हैं जब राज्य सरकार को विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार संगठनों की ओर से लगातार आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. आलोचकों का आरोप है कि सरकार धार्मिक संस्थानों और अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाते हुए भेदभावपूर्ण नीतियां अपना रही है.
इसी बीच, पिछले सप्ताह इंडिया हेट लैब की एक वार्षिक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि पुष्कर सिंह धामी देश में सबसे ज़्यादा नफरती भाषण देने वाले नेताओं में शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष भर में उनके 71 भाषणों में नफरत भरी टिप्पणियां दर्ज की गईं.
इससे पहले उत्तराखंड सरकार ने धर्मांतरण विरोधी कानून में संशोधन को भी मंज़ूरी दी थी. इसके तहत तथाकथित जबरन या धोखाधड़ी से किए गए धर्मांतरण पर 3 से 10 साल तक की जेल, कमज़ोर वर्ग से जुड़े मामलों में 5 से 14 साल की सजा और गंभीर मामलों में 20 साल से लेकर उम्रकैद तक का प्रावधान किया गया है, साथ ही भारी जुर्माना भी लगाया जाएगा.
राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ‘नाता विवाह’ को मान्यता, विधवा को मिलेगी पति की पेंशन
राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर बेंच ने एक अहम फैसले में ग्रामीण राजस्थान में प्रचलित ‘नाता विवाह’ को क़ानूनी मान्यता दी है. अदालत ने कहा है कि यदि किसी महिला को क़ानूनी रूप से तलाक नहीं दिया गया है, तो वह अपने मृत सरकारी कर्मचारी पति की पारिवारिक पेंशन की हक़दार होगी.
यह फैसला जस्टिस अशोक कुमार जैन ने सुनाया. अदालत ने याचिकाकर्ता राम प्यारी सुमन को उनके पति पुरण लाल सैनी की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन और बकाया राशि 18 प्रतिशत ब्याज के साथ देने के आदेश दिए.
मामला कोटा जिले का है. राम प्यारी सुमन ने अपने पहले पति की मृत्यु के बाद पुरण लाल सैनी से ‘नाता विवाह’ किया था. पुरण लाल सरकारी कर्मचारी (पटवारी) थे और उनकी मृत्यु 20 दिसंबर 2020 को हुई थी. इसके बाद राम प्यारी को पेंशन देने से मना कर दिया गया, यह कहकर कि उनका नाम सरकारी रिकॉर्ड में नहीं है.
राम प्यारी ने अदालत में बताया कि वह पुरण लाल की पत्नी थीं और उनसे उनकी एक बेटी भी है. उन्होंने यह भी बताया कि वैवाहिक विवाद के दौरान उन्हें सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुज़ारा भत्ता मिला था, जिसे पुरण लाल ने दिया था. बाद में धारा 127 की सुनवाई में भी पुरण लाल ने अदालत में उन्हें अपनी पत्नी स्वीकार किया था.
राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि राम प्यारी का नाम सेवा रिकॉर्ड में दर्ज नहीं था और उन्होंने खुद को ‘नाता पत्नी’ बताया है, जो कानूनी विवाह नहीं माना जा सकता. सरकार का तर्क था कि बिना नामांकन के पेंशन नहीं दी जा सकती.
लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को ख़ारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि जब पति ने खुद कोर्ट में पत्नी के रूप में स्वीकार किया है और तलाक नहीं हुआ है, तो महिला को पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने राजस्थान सिविल सेवा पेंशन नियम 1996 के नियम 66 और पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि नामांकन न होने से पत्नी का अधिकार खत्म नहीं होता.
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पुरण लाल की गवाही एक मज़बूत सबूत है और इससे यह साबित होता है कि राम प्यारी उनकी वैध पत्नी थीं. इसलिए उन्हें पारिवारिक पेंशन का पूरा अधिकार है.
कोर्ट ने राज्य सरकार, वित्त विभाग और संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया कि राम प्यारी को नियमों के अनुसार पेंशन दी जाए. इस फैसले के साथ याचिका को स्वीकार कर लिया गया और किसी तरह का जुर्माना नहीं लगाया गया.
कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला राजस्थान की ग्रामीण महिलाओं के लिए बेहद अहम है, खासकर उनके लिए जो नाता प्रथा के तहत जीवन बिता रही हैं. इससे उन्हें भी सरकारी योजनाओं और अधिकारों का लाभ मिल सकेगा. यह फैसला सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
27 साल बाद नासा से रिटायर हुईं सुनीता विलियम्स, अंतरिक्ष में रचा इतिहास
नासा की मशहूर अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स ने 27 साल की सेवा के बाद एजेंसी से रिटायरमेंट ले लिया है. नासा ने 20 जनवरी 2026 को इसकी पुष्टि की. इस दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर तीन मिशन पूरे किए और कई रिकॉर्ड अपने नाम किए.
60 वर्षीय सुनीता विलियम्स इन दिनों भारत दौरे पर हैं. मंगलवार को उन्होंने दिल्ली स्थित अमेरिकन सेंटर में एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया. यहां उन्होंने अपने अंतरिक्ष अनुभव साझा किए, ख़ासकर उस मिशन को, जो आठ दिन के लिए था लेकिन तकनीकी खराबी के कारण नौ महीने से ज़्यादा लंबा हो गया.
नासा के मुताबिक़, सुनीता विलियम्स ने कुल 608 दिन अंतरिक्ष में बिताए, जो किसी भी अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री में दूसरा सबसे लंबा समय है. उन्होंने 9 स्पेसवॉक किए, जिनकी कुल अवधि 62 घंटे से ज़्यादा रही. वह अंतरिक्ष में मैराथन दौड़ने वाली पहली इंसान भी हैं.
सुनीता विलियम्स का जन्म अमेरिका के ओहायो में हुआ था. उनके पिता गुजरात के मेहसाणा जिले के रहने वाले थे. वह अमेरिकी नौसेना की कैप्टन रह चुकी हैं और 40 से ज़्यादा विमानों को उड़ाने का अनुभव रखती हैं.
नासा प्रमुख ने कहा कि सुनीता विलियम्स ने अंतरिक्ष विज्ञान को नई दिशा दी और चंद्रमा व मंगल मिशनों की नींव मज़बूत की. खुद सुनीता ने कहा कि अंतरिक्ष उनके लिए सबसे खास जगह रही है और नासा में बिताए 27 साल उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान हैं.
अपने आखिरी मिशन में वह 2024 में बोइंग स्टारलाइनर से अंतरिक्ष गई थीं और 2025 में पृथ्वी लौटीं. नासा के साथी अंतरिक्ष यात्रियों ने उन्हें प्रेरणास्रोत बताते हुए उनके योगदान को ऐतिहासिक बताया.
डिजिटल स्कैन ने प्राचीन पोम्पेई की दीवार पर नए प्रेम पत्र और रेखाचित्रों का खुलासा किया
नई इमेजिंग तकनीक की मदद से पोम्पेई की एक दीवार पर प्रेम पत्र, ग्लेडिएटरों (योद्धाओं) के युद्ध के दृश्य, गालियों की बौछार और रोज़मर्रा के कबूलनामे सामने आए हैं. ‘रॉयटर्स’ के मुताबिक, इस तकनीक ने लगभग 80 ऐसे शिलालेखों को उजागर किया है, जो पहले कभी नहीं देखे गए थे. इटली के नेपल्स के पास स्थित पोम्पेई का समृद्ध शहर 79 ईस्वी में माउंट विसुवियस के ज्वालामुखी विस्फोट में दफन हो गया था, जिससे यहां की इमारतें, वस्तुएं और दीवार पर की गई लिखावट (ग्राफिटी) कई मीटर राख के नीचे सुरक्षित रह गई थी.
18वीं शताब्दी में पुनर्खोज के बाद, यह अब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है. ये ताज़ा खोजें एक लंबे गलियारे के प्लास्टर पर खुदी हुई मिलीं, जो पोम्पेई के थिएटरों को शहर की व्यस्त ‘विया स्टेबियाना’ सड़क से जोड़ता था. इस गलियारे को पहली बार 230 साल से भी पहले खोजा गया था.
शोधकर्ताओं ने ‘रिफ्लेक्टेंस ट्रांसफॉर्मेशन इमेजिंग’ (आरटीआई) नामक एक कम्प्यूटेशनल फोटोग्राफी पद्धति का उपयोग किया—जो किसी वस्तु को कई अलग-अलग प्रकाश कोणों से कैद करती है—ताकि उन हल्की खरोंचों को उजागर किया जा सके जो सदियों के कटाव के बाद नग्न आंखों से अदृश्य हो गई थीं. पुरातत्वविदों को ऐसी सतह पर नई खोजों की उम्मीद नहीं थी जिसे पूरी तरह से प्रलेखित माना जा चुका था, लेकिन उनके काम ने लगभग 300 शिलालेखों की पहचान की, जिनमें 79 नए थे.
इस परियोजना को पेरिस की सोरबोन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं लुई ऑटिन और एलोइस लेटेलियर-टेलफर और क्यूबेक यूनिवर्सिटी की मैरी-एडलाइन ले गुएनेक ने पोम्पेई अधिकारियों के साथ मिलकर विकसित किया था.
विशाल पुरातात्विक स्थल के निदेशक गैब्रियल जुचट्रीगेल ने कहा, “यह तकनीक वह चाबी है जो प्राचीन दुनिया के नए कमरों को खोलती है.” उन्होंने आगे कहा कि पोम्पेई के 10,000 से अधिक ज्ञात शिलालेख प्राचीन दुनिया की एक “अथाह विरासत” हैं. टीम अब एक 3डी प्लेटफॉर्म विकसित कर रही है, जो फोटोग्रामेट्री, आरटीआई डेटा और पुरालेख संबंधी मेटाडेटा को संयोजित करेगा, जिससे इन ग्राफिटी (दीवार पर उकेरी गई लिखावट) का पूर्ण दृश्य और व्याख्या संभव हो सकेगी.
पहले से ज्ञात लेखों के उदाहरणों में एक प्रेमी को जल्दबाजी में कहा गया विदाई संदेश शामिल है— “मैं जल्दी में हूँ. विदा, मेरी सावा, सुनिश्चित करना कि तुम मुझसे प्यार करती हो!” एक अन्य शिलालेख एटेला की एक गुलाम ‘मेथे’ का अपने प्रिय ‘क्रेस्टो’ के प्रति समर्पण दर्ज करता है, जिसमें प्रेम की रोमन देवी वीनस से कृपा की प्रार्थना की गई है.
नई खोजों में दो ग्लेडिएटरों (योद्धाओं) को लड़ते हुए दिखाने वाला एक हल्का रेखाचित्र और प्रेम की घोषणा की शुरुआती पंक्तियां— “इरेटो प्यार करता है...” मिली हैं.
‘पालक पनीर’ पर रेसिज्म : भारतीय जोड़े ने अमेरिकी यूनिवर्सिटी से जीता 2 लाख डॉलर हर्जाना
भू-राजनीति से दूर, अमेरिका में नस्लीय भेदभाव का एक मामला भी सुर्खियों में है. ‘बीबीसी’ की रिपोर्ट के अनुसार, माइक्रोवेव में खाना गर्म करने को लेकर शुरू हुआ विवाद दो भारतीय छात्रों, आदित्य प्रकाश और उनकी मंगेतर उर्मी भट्टाचार्य, के लिए 2,00,000 डॉलर (करीब 1.6 करोड़ रुपये) के समझौते पर खत्म हुआ.
यह मामला यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो, बोल्डर का है. छात्रों ने आरोप लगाया कि 2023 में जब आदित्य ने कैंपस के माइक्रोवेव में अपना लंच—पालक पनीर—गर्म किया, तो एक ब्रिटिश स्टाफ मेंबर ने उसकी गंध को “तीखी” बताते हुए आपत्ति जताई और कहा कि वहां तेज गंध वाले भोजन को गर्म करने के खिलाफ नियम है. आदित्य ने कहा कि ऐसा कोई नियम लिखित में नहीं था, और सैंडविच गर्म करने पर कोई रोक नहीं थी, लेकिन “करी” पर थी.
इस घटना के बाद, जोड़े ने आरोप लगाया कि उन्हें “माइक्रो-एग्रेशन” और प्रतिशोध का सामना करना पड़ा, जिसके चलते उन्हें अपनी रिसर्च फंडिंग और टीचिंग भूमिकाओं से हाथ धोना पड़ा. उन्होंने मई 2025 में नागरिक अधिकारों का मुकदमा दायर किया. सितंबर 2025 में यूनिवर्सिटी ने उनके साथ समझौता किया, जिसके तहत उन्हें डिग्री दी गई और पैसे दिए गए, लेकिन भविष्य में वहां काम करने या पढ़ने पर रोक लगा दी गई.
आदित्य प्रकाश ने कहा, “बात पैसे की नहीं थी. बात यह साबित करने की थी कि भारतीयों के साथ उनके ‘भारतीयपन’ के लिए भेदभाव करने के परिणाम होते हैं.” यूनिवर्सिटी ने किसी भी दायित्व से इनकार किया है.
निकोलस मादुरो को उठा लेने की कहानी को नया रूप दे रहा एआई
जनवरी की शुरुआत में अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकड़े जाने के बाद से, घटनाक्रम का विवरण देने वाले चित्रों और वीडियो की जगह ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (एआई) द्वारा निर्मित सामग्री ने ले ली है, जिससे कल्पना और वास्तविकता के बीच की रेखा धुंधली हो गई है. सामग्री का यह अंतहीन सिलसिला हास्यप्रद मीम्स से लेकर नाटकीय पुनर्कथनों तक फैला हुआ है. एक वीडियो में, न्यूयॉर्क की अदालत में मादुरो का एक अदालती चित्र जीवंत हो उठता है और घोषणा करता है: “मैं खुद को युद्ध बंदी मानता हूँ.”
एक अन्य वीडियो में, एआई-जनरेटेड मादुरो एक अमेरिकी जेल से एयर डक्ट (हवा के रास्ते) के जरिए भागने की कोशिश करते हैं, लेकिन खुद को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ एक अदालत में पाते हैं, जहां वे एक जज और एक एफबीआई एजेंट के साथ अमेरिकी रैपर आइस स्पाइस के गाने पर डांस कर रहे हैं. मादुरो (जो तब राष्ट्रपति थे) को उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस के साथ 3 जनवरी को वेनेजुएला की राजधानी काराकास में अमेरिकी हमलों के दौरान पकड़ा गया था. तब से उन्हें न्यूयॉर्क की एक जेल में ले जाया गया है, जहां उन्हें मादक पदार्थों की तस्करी के आरोपों में रखा गया है.
जबकि कुछ लोगों ने मादुरो की बेदखली का जश्न मनाया है, उनके नेतृत्व वाले “चाविस्मो” आंदोलन—जिसका नाम उनके पूर्ववर्ती ह्यूगो चावेज के नाम पर रखा गया है—ने वेनेजुएला के भविष्य के लिए उनके पतन के अर्थ को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास किया है.
‘भ्रमित करना, मुकाबला करना और चुप कराना’
एंड्रेस बेलो कैथोलिक यूनिवर्सिटी के एक शोधकर्ता लियोन हर्नांडेज़ ने ‘एएफपी’ को बताया कि एआई द्वारा सामग्री के तेजी से निर्माण के साथ, हम “दुष्प्रचार प्रयोगशालाओं” का विकास देख रहे हैं जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बाढ़ ला देती हैं.
हर्नांडेज़ ने कहा, “मादुरो की गिरफ्तारी के दौरान कुछ ऐसी चीजें प्रसारित हुईं जो असली नहीं थीं, और कुछ ऐसी असली चीजें भी प्रसारित हुईं जिन्होंने संदेह पैदा किया. विचार यही था: वास्तविक चीजों के कुछ तत्वों को विकृत करके आधार स्तर पर भ्रम पैदा करना और संदेह उत्पन्न करना. “ उन्होंने आगे कहा कि इसका लक्ष्य दर्शकों को इतनी अधिक सामग्री से सराबोर कर देना है कि वे उसे ठीक से समझ ही न पाएं.
यहां तक कि वेनेजुएला के वीटीवी टेलीविज़न चैनल जैसे पारंपरिक मीडिया भी इसमें शामिल हैं; इस ब्रॉडकास्टर ने एक एआई-एनिमेटेड वीडियो चलाया, जिसमें एक बच्चे की आवाज़ में मादुरो की गिरफ्तारी का वृत्तांत सुनाया गया था. ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड में राजनीतिक संचार और रणनीति की प्रोफेसर ऐलेना ब्लॉक ने कहा, “एआई अब निरंकुश शासकों के लिए असहमति को भ्रमित करने, उसका मुकाबला करने और उसे दबाने का एक नया हथियार बन गया है.”
‘लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा’
ब्लॉक ने रेखांकित किया कि विशेष रूप से कार्टूनों का उपयोग सत्तावादी और लोकतांत्रिक, दोनों ही तरह के राज्यों में दुष्प्रचार के माध्यम के रूप में किया जाता रहा है. अपनी गिरफ्तारी से बहुत पहले, मादुरो को “सुपर बिगोटे” या “सुपर मूंछ” नामक एक सचित्र सुपरहीरो के रूप में चित्रित किया गया था, जो सुपरमैन जैसी पोशाक पहनकर “चरमपंथियों” और “उत्तर अमेरिकी साम्राज्य” जैसे राक्षसों से लड़ता था. इस कार्टून की लोकप्रियता ने ऐसे खिलौनों को जन्म दिया, जिन्हें मादुरो के समर्थक उनकी वापसी की मांग करने वाली रैलियों के दौरान साथ ले जाते हैं.
अपने पूर्ववर्ती की तरह, मादुरो ने “मीडिया प्रभुत्व” की प्रथा को जारी रखा, ताकि पारंपरिक मीडिया आउटलेट्स को ‘चाविस्मो’ की आलोचना प्रसारित करने से रोका जा सके. ब्लॉक ने कहा, “सेंसरशिप और समाचार माध्यमों के गायब होने या कमजोर होने के साथ, सोशल मीडिया सूचना के लिए एकमात्र स्थान के रूप में उभरा है.”
मादुरो अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जो एआई प्रोपेगेंडा का उपयोग करते हैं—ट्रंप ने भी अक्सर अपनी ऐसी एआई-जनरेटेड तस्वीरें और वीडियो पोस्ट किए हैं, जिनमें “विरोधी, आक्रामक और विभाजनकारी भाषा” का इस्तेमाल होता है. ब्लॉक ने अंत में कहा, “ये डिजिटल और एआई उपकरण राजनीति को तुच्छ बना देते हैं: आप इसकी व्याख्या नहीं करते, बल्कि आप इसके महत्व को कम कर देते हैं. आज के समय में एआई लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है.”
यूक्रेन की टेनिस खिलाड़ी ने एक टी-शर्ट के जरिए दुनिया से अपनी बात कह दी
यूक्रेन की टेनिस खिलाड़ी ओलेक्सांद्रा ओलिंनिकोवा ने ऑस्ट्रेलियन ओपन 2026 के दौरान अपने देश के प्रति प्रेम और समर्थन जताने के लिए एक खास तरीका अपनाया. ओलेक्सांद्रा पहले दौर के मैच में गत चैंपियन मैडिसन कीज से हार गईं. लेकिन, मैच के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने एक सफेद टी-शर्ट पहनी थी, जिस पर लिखा था: “मुझे यूक्रेनी महिलाओं और बच्चों की रक्षा के लिए आपकी मदद की ज़रूरत है, लेकिन मैं यहां इस बारे में बात नहीं कर सकती.”
“एपी” की खबर के अनुसार, उन्होंने यह तरीका इसलिए चुना क्योंकि ग्रैंड स्लैम के नियम खिलाड़ियों को खेल के मैदान पर राजनीतिक बयान देने से रोकते हैं. उन्होंने टी-शर्ट के जरिए अपनी बात भी कह दी और नियमों का उल्लंघन भी नहीं किया.
ओलेक्सांद्रा के पिता वर्तमान में यूक्रेन की सेना में सैनिक के रूप में देश की सेवा कर रहे हैं. उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि उनके पिता उनके सबसे बड़े समर्थक हैं. उन्होंने बताया कि पिता के सेना में शामिल होने के बाद से उनकी रैंकिंग में 200 से अधिक अंकों का सुधार हुआ है, क्योंकि वह उन्हें गौरवान्वित करना चाहती हैं.
उन्होंने साझा किया कि इस टूर्नामेंट की तैयारी उन्होंने यूक्रेन में ही की थी, जहां उन्होंने धमाकों की आवाजें सुनीं. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे यूक्रेन के नागरिकों और बच्चों की सुरक्षा के लिए मदद करें.
बांग्लादेश के भारत न जाने के फैसले का पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने किया समर्थन
आईसीसी पुरुष टी20 विश्व कप 2026 से पहले, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) ने इस बड़े आयोजन के लिए अपनी टीम की तैयारियों को रोक दिया है. भारत और श्रीलंका की सह-मेजबानी में होने वाले इस टूर्नामेंट के संबंध में यह फैसला बांग्लादेश द्वारा भारत में खेलने के बहिष्कार के निर्णय का समर्थन करने के बाद लिया गया है. हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने इस रिपोर्ट की पुष्टि करते हुए कोई बयान जारी नहीं किया है. समाचार एजेंसी एएनआई ने जियो न्यूज़ के हवाले से यह खबर दी है.
हाल ही में, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों के बीच भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के निर्देशों पर बांग्लादेशी तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) की आईपीएल 2026 टीम से बाहर कर दिया गया था. इसके बाद, बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) ने अपने खिलाड़ियों की “सुरक्षा और सलामती” का हवाला देते हुए आईसीसी से अपने मैचों को भारत से बाहर स्थानांतरित करने का अनुरोध किया है. बांग्लादेश की इन चिंताओं को “उचित और वैध” बताते हुए, पाकिस्तान ने 19 जनवरी को टी20 विश्व कप मैचों के लिए भारत की यात्रा न करने के बीसीबी के फैसले को अपना पूर्ण समर्थन दिया था.
इस्लामाबाद स्थित जियो न्यूज के मुताबिक, पाकिस्तान टीम प्रबंधन को एक आपातकालीन योजना तैयार करने के लिए कहा गया है, ताकि यदि पाकिस्तान टूर्नामेंट में हिस्सा न लेने का फैसला करता है, तो वे तैयार रहें. मीडिया आउटलेट ने आगे बताया कि पाकिस्तान ने कहा है कि यदि बांग्लादेश का मुद्दा अनसुलझा रहता है, तो वह टी20 विश्व कप में अपनी भागीदारी पर पुनर्विचार करेगा. इसके अलावा, पीसीबी ने यह इच्छा भी जताई है कि यदि श्रीलंका में स्थान उपलब्ध नहीं होते हैं, तो वह बांग्लादेश के टी20 विश्व कप मैचों की मेजबानी करने के लिए तैयार है.
बांग्लादेश का अनुरोध खारिज, स्कॉटलैंड ले सकता है जगह
इस बीच बुधवार को हुई बोर्ड बैठक के बाद, आईसीसी ने टी20 विश्व कप के पूर्व निर्धारित मैच कार्यक्रम को बरकरार रखने का फैसला किया है. इसके साथ ही आईसीसी ने अपने मैचों को भारत से श्रीलंका स्थानांतरित करने के बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के अनुरोध को खारिज कर दिया है. बीसीबी को मूल कार्यक्रम का पालन करने के लिए एक दिन का समय दिया गया है. ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, यदि बांग्लादेश टूर्नामेंट में भाग न लेने का निर्णय लेता है, तो ग्रुप सी में उनकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल किया जा सकता है.
सुरक्षा चिंताओं के बावजूद ब्रिटेन की लंदन में चीन के ‘विशाल’ दूतावास को मंजूरी
ब्रिटेन सरकार ने सुरक्षा चिंताओं और कड़े राजनीतिक विरोध के बावजूद मध्य लंदन में चीन के नए ‘विशाल दूतावास’ के निर्माण को मंजूरी दे दी है. टावर ऑफ लंदन के पास स्थित यह परिसर यूरोप में चीन का सबसे बड़ा दूतावास होगा.
‘असोसिएटेड प्रेस’ के अनुसार, विपक्ष और आलोचकों का आरोप है कि यह स्थल संवेदनशील वित्तीय डेटा ले जाने वाली भूमिगत फाइबर ऑप्टिक केबल्स के करीब है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसमें 208 गुप्त बेसमेंट कमरे होंगे, जिनका उपयोग जासूसी और चीनी निर्वासितों की निगरानी के लिए किया जा सकता है.
कंजर्वेटिव पार्टी ने इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता’ बताया है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सांसदों को डर है कि इससे ब्रिटेन में सक्रिय चीनी प्रदर्शनकारियों का दमन बढ़ेगा. लेकिन, सरकार और एजेंसियों (एमI5 और जीसीएचक्यू जैसी खुफिया एजेंसियों) ने उचित सुरक्षा उपाय लागू करने की बात कही है. उनका मानना है कि चीन के बिखरे हुए सात कार्यालयों को एक स्थान पर लाने से सुरक्षा प्रबंधन आसान होगा.
इस बीच प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने सुरक्षा को सर्वोपरि बताते हुए चीन के साथ राजनयिक संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया है. इस फैसले को स्टार्मर की आगामी चीन यात्रा और द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने के कदम के रूप में देखा जा रहा है. कुल मिलाकर, यह निर्णय ब्रिटेन की ‘आर्थिक कूटनीति’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के बीच एक कठिन संतुलन बनाने का प्रयास है.
अपील :
आज के लिए इतना ही. हमें बताइये अपनी प्रतिक्रिया, सुझाव, टिप्पणी. मिलेंगे हरकारा के अगले अंक के साथ. हरकारा सब्सटैक पर तो है ही, आप यहाँ भी पा सकते हैं ‘हरकारा’...शोर कम, रोशनी ज्यादा. व्हाट्सएप पर, लिंक्डइन पर, इंस्टा पर, फेसबुक पर, यूट्यूब पर, स्पोटीफाई पर , ट्विटर / एक्स और ब्लू स्काई पर.










