21/02/2026: दूसरे दौर में एसआईआर से 8% नाम कटे | जजों को मूर्ख कहकर ट्रंप ने 15% टैरिफ लगाए | 5 साल में 68000 महिलाएं एमपी से गायब | यूपी का सम्भल न्यूयार्क टाइम्स के पन्नों पर | पाकिस्तान कहां पिछड़ा
‘हरकारा’ यानी हिंदी भाषियों के लिए क्यूरेटेड न्यूजलेटर. ज़रूरी ख़बरें और विश्लेषण. शोर कम, रोशनी ज़्यादा.
निधीश त्यागी, साथ में राजेश चतुर्वेदी, गौरव नौड़ियाल, फ़लक अफ़शां
आज की सुर्खियाँ
वोटर लिस्ट में कटौती: 9 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची से लगभग 8% नाम हटाए गए.
ट्रम्प का पलटवार: सुप्रीम कोर्ट द्वारा टैरिफ अवैध घोषित करने के बाद ट्रम्प ने जजों को ‘मूर्ख’ कहा और दूसरे कानून के तहत 15% तक टैरिफ बढ़ा दिए.
MP में लापता महिलाएं: सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश में 2020 से अब तक 68,000 से अधिक महिलाएं लापता हैं जिनका कोई सुराग नहीं मिला है.
सम्भल रिपोर्ट: न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में दावा, सम्भल में हिंसा के बाद डर का माहौल, पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप.
भारत-ब्राजील डील: चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत और ब्राजील ने महत्वपूर्ण खनिजों के समझौते पर हस्ताक्षर किए.
दलित नाबालिग की आत्महत्या: लखीमपुर खीरी में छेड़छाड़ के आरोपी ने जेल से छूटकर धमकी दी, डर के मारे 14 साल की बच्ची ने जान दी.
एसआईआर के दूसरे चरण में 9 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की अंतिम मतदाता सूची से लगभग 8% नाम हटाए गए
हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दूसरे चरण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लगभग 8% मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं. बिहार में यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद, 27 अक्टूबर को जब एसआईआर के दूसरे चरण की घोषणा की गई थी, तब इन नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाताओं की संयुक्त संख्या 21,45,62,215 थी. पुनरीक्षण के बाद, यह संख्या घटकर 19,75,33,701 रह गई है, जिसमें कुल 1,70,28,514 या 7.93% की शुद्ध कटौती हुई है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, केरल, अंडमान और निकोबार, छत्तीसगढ़ और गोवा की अंतिम सूचियां शनिवार (21 फरवरी, 2026) को प्रकाशित की गईं, जबकि गुजरात की सूची 17 फरवरी को और पुडुचेरी व लक्षद्वीप की 14 फरवरी को जारी की गई थी. पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु की अंतिम सूचियां अभी प्रकाशित होनी बाकी हैं.
राज्यों में सबसे अधिक मतदाताओं के नाम गुजरात में हटाए गए हैं, जहां अंतिम सूची से 13.40% मतदाता कम हुए हैं, जबकि केरल में सबसे कम 3.22% नाम हटाए गए. केंद्र शासित प्रदेशों में, अंडमान और निकोबार में सबसे अधिक 16.87% और लक्षद्वीप में सबसे कम 0.36% की कटौती देखी गई. छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 11.77%, गोवा में 10.76%, पुडुचेरी में 7.5%, मध्य प्रदेश में 5.96% और राजस्थान में 5.74% रहा. कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ में एससी-एसटी और अल्पसंख्यकों के नाम जानबूझकर हटाए गए हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, कई बार समय सीमा बढ़ाने के बाद उत्तर प्रदेश की अंतिम सूची 10 अप्रैल को और तमिलनाडु की 23 फरवरी को आने की उम्मीद है. पश्चिम बंगाल में, जहां चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच एसआईआर को लेकर तीखी मुकदमेबाजी हुई है, सुप्रीम कोर्ट ने 28 फरवरी को अंतिम सूची प्रकाशित करने की अनुमति दी है. कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार और चुनाव आयोग के बीच “विश्वास की कमी” (ट्रस्ट डेफिसिट) का हवाला देते हुए एक “असाधारण” निर्णय लिया है, जिसमें न्यायिक अधिकारियों को इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है. चुनाव आयोग ने शेष 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एसआईआर से संबंधित सभी तैयारी जल्द से जल्द पूरी करने को कहा है, जहां यह प्रक्रिया अप्रैल 2026 से शुरू होने की उम्मीद है.
एपस्टीन फाइल्स से लेकर वेस्टर्न कमांड तक: क्या अमेरिकी दबाव में है भारत की संप्रभुता?
जेफरी एपस्टीन के काले कारनामों की फाइलें खुलने के बाद जहां अमेरिका और यूरोप में इस्तीफे हो रहे हैं और हंगामा बरपा है, वहीं भारत के सियासी गलियारों में एक अजीबोगरीब सन्नाटा छाया हुआ है. हरकारा डीप डाइव पर वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने इस सन्नाटे को “खतरनाक” बताते हुए मोदी सरकार की विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
बातचीत के दौरान यह मुद्दा जोर-शोर से उठा कि एपस्टीन दस्तावेजों में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी के नाम सामने आए हैं. श्रवण गर्ग ने तंज कसते हुए कहा, “यह मान कर चलिए कि न हरदीप पुरी का कुछ बिगड़ेगा और न ही अनिल अंबानी जेल जाएंगे, लेकिन यह सन्नाटा भविष्य के लिए डराने वाला है.” उन्होंने बताया कि कैसे अमेरिकी संसद और मीडिया में बवाल के बावजूद, भारत में इन नामों पर चर्चा तक नहीं हो रही है.
श्रवण गर्ग ने एक चौंकाने वाला विश्लेषण करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति (डोनाल्ड ट्रंप) के उस बयान का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक करियर को खत्म करने की क्षमता की बात कही थी. गर्ग का कहना है, “140 करोड़ के देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री को अगर कोई विदेशी राष्ट्रपति करियर खत्म करने की धमकी देता है, तो देश का खून क्यों नहीं खौलता? यह ब्लैकमेलिंग जैसा प्रतीत होता है.”
उन्होंने इस कड़ी को निखिल गुप्ता केस और पन्नू हत्या साजिश से भी जोड़ा, जहां चेक रिपब्लिक से प्रत्यर्पित गुप्ता ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है, जिसके तार भारतीय एजेंसियों से जुड़ते दिख रहे हैं.
बातचीत का सबसे संवेदनशील हिस्सा वह था जब गर्ग ने भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी और एडमिरल सैमुअल पपारो के भारतीय सेना की ‘वेस्टर्न कमांड’ के दौरे का जिक्र किया. यह कमांड पाकिस्तान सीमा और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘ऑपरेशन सिंधु’ के इलाकों की निगरानी करती है.
गर्ग ने सवाल दागा, “एक विदेशी राजदूत को हमारी सेना की ऑपरेशनल तैयारियों और ‘ऑपरेशन सिंधु’ पर ब्रीफिंग क्यों दी गई? क्या यह देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं है?”
निष्कर्ष यह कि सरकार ‘डिनायल मोड’ (इनकार की मुद्रा) में है. चाहे वह इजराइल का अचानक दौरा हो, या एपस्टीन फाइल्स पर चुप्पी, ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार किसी अदृश्य दबाव में है. जैसा कि श्रवण गर्ग ने कहा, “लोकतंत्र में जब सवाल पूछना बंद हो जाए और सरकार जवाब देना बंद कर दे, तो नागरिकों का संदेह करना स्वाभाविक है.”
चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत और ब्राजील ने खनिज समझौते पर हस्ताक्षर किए
अल जजीरा के लिए एडना मोहम्मद की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश कर रही है, और इसी कड़ी में भारत और ब्राजील ने महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) और दुर्लभ मृदा तत्वों (रेयर अर्थ्स) पर सहयोग बढ़ाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने शनिवार को नई दिल्ली में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और व्यापार व निवेश के अवसरों को बढ़ाने पर चर्चा की.
प्रधानमंत्री मोदी ने एक बयान में कहा कि महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ मृदा तत्वों पर यह समझौता “लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण की दिशा में एक बड़ा कदम है”. रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन दुनिया के दुर्लभ मृदा और महत्वपूर्ण खनिजों के खनन और प्रसंस्करण पर हावी है और हाल के महीनों में उसने निर्यात पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है. ब्राजील, जो चीन के बाद महत्वपूर्ण खनिजों का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धारक है, के पास ऐसे संसाधन हैं जिनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर पैनलों, स्मार्टफोन, जेट इंजन और गाइडेड मिसाइलों जैसे क्षेत्रों में किया जाता है.
राष्ट्रपति लूला ने कहा, “नवीकरणीय ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों के मामलों में निवेश और सहयोग बढ़ाना हमारे द्वारा आज हस्ताक्षरित अग्रणी समझौते के मूल में है.” नई दिल्ली स्थित ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर’ थिंक टैंक के विशेषज्ञ ऋषभ जैन ने ‘एएफपी’ समाचार एजेंसी को बताया कि भारत का ब्राजील के साथ यह सहयोग अमेरिका, फ्रांस और यूरोपीय संघ के साथ हालिया आपूर्ति श्रृंखला जुड़ावों का अनुसरण करता है.
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने घोषणा की कि खनिज सौदे के अलावा, डिजिटल सहयोग से लेकर स्वास्थ्य तक नौ अन्य समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए. मोदी ने ब्राजील को “लैटिन अमेरिका में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार” बताया और कहा कि वे अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को 20 बिलियन डॉलर से आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. 2024 के आंकड़ों के अनुसार, ब्राजील को भारतीय निर्यात 7.23 बिलियन डॉलर और भारत को ब्राजीलियाई निर्यात 5.38 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक दिन बाद ट्रम्प ने ग्लोबल टैरिफ बढ़ाकर 15% किए
एक्सियोस की रिपोर्टर कोर्टनी ब्राउन की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रम्प ने शनिवार को कहा कि वह वैश्विक टैरिफ को बढ़ाकर 15% कर देंगे. यह घोषणा सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनके आयात करों के एक बड़े हिस्से को अवैध करार देने के ठीक एक दिन बाद आई है. प्रशासन ने देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा रद्द किए गए टैरिफ को बदलने के लिए तेजी से कदम उठाए हैं और अब ट्रम्प एक अलग व्यापार कानून के तहत अनुमति की उच्चतम सीमा तक टैरिफ बढ़ा रहे हैं.
रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रम्प ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट में कहा कि वह 10% वैश्विक टैरिफ को “पूरी तरह से अनुमत और कानूनी रूप से परीक्षित, 15% के स्तर” तक बढ़ाएंगे. शुक्रवार को 6-3 के फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ट्रम्प ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ के तहत टैरिफ लागू नहीं कर सकते. इसके कुछ घंटों बाद ही, प्रशासन ने कहा कि वह एक अलग व्यापार कानून, धारा 122 (सेक्शन 122) के प्रावधान के तहत सभी विदेशी सामानों पर 10% टैरिफ बहाल करेगा.
व्यापार प्रावधान कहता है कि राष्ट्रपति “भुगतान संतुलन” (बैलेंस ऑफ पेमेंट्स) के बड़े और गंभीर मुद्दों को हल करने के लिए 150 दिनों तक 15% तक टैरिफ लगा सकते हैं. इसके बाद, टैरिफ जारी रखने के लिए कांग्रेस को कार्रवाई करनी होगी. निष्कर्ष यह है कि ट्रम्प ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए गए टैरिफ को फिर से लागू करने के लिए तेजी से काम किया है और अब वे इसे कानून द्वारा अनुमत सीमा तक कठोर बना रहे हैं. ट्रम्प ने पोस्ट किया, “अगले कुछ महीनों के दौरान, ट्रम्प प्रशासन नए और कानूनी रूप से स्वीकार्य टैरिफ निर्धारित और जारी करेगा.”
भारत के लिए रूसी तेल खरीदना हुआ और मुश्किल, ट्रम्प के टैरिफ ने बढ़ाई मोदी की उलझन
द न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए एलेक्स ट्रैवेली की रिपोर्ट बताती है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ अधिकारों के खिलाफ दिए गए फैसले के समय ने भारत में असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है. भारत ने अभी तीन सप्ताह से भी कम समय पहले घोषित एक व्यापार सौदे के साथ 50% टैरिफ से खुद को बचाया था. इस सौदे की एक शर्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विशेष रूप से असहज कर रही है: भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई थी. ट्रम्प अगस्त से ही यह मांग कर रहे थे और उन्होंने यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों में बाधा डालने के लिए भारत को दंडित करने के उद्देश्य से अधिकांश भारतीय सामानों पर टैरिफ दोगुना कर दिया था.
रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मोदी के लिए स्थिति और जटिल कर दी है. ट्रम्प ने भारत को झुकाने के लिए जिस कानून (इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट) का इस्तेमाल किया था, कोर्ट ने उसी के अनुचित उपयोग की बात कही है. फिर भी, ट्रम्प प्रशासन ने सौदे के रूसी तेल वाले हिस्से को ‘क्विड प्रो क्वो’ (लेन-देन) के रूप में चित्रित किया. 9 फरवरी को प्रकाशित व्हाइट हाउस के एक दस्तावेज में कहा गया था कि दंडात्मक टैरिफ को “रूस का तेल खरीदना बंद करने की भारत की प्रतिबद्धता की मान्यता में” हटा दिया गया था.
भारत सरकार इस बदलाव के कारण को लेकर सतर्क रही है. यह स्वीकार करना राजनीतिक रूप से कठिन होगा कि अमेरिका ने जबरदस्ती रूस के साथ भारत के वाणिज्यिक संबंधों को बदल दिया है. 18 फरवरी को रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कहा, “हमारे पास यह मानने का कोई कारण नहीं है कि भारत ने हाइड्रोकार्बन खरीदने पर अपनी स्थिति बदली है.”
इसके अलावा, मोदी ने 50% टैरिफ से तत्काल राहत पाने के लिए कुछ प्रतिष्ठित कृषि बाजारों को खोलने का वादा किया, जिसकी भारतीय किसानों ने निंदा की है. उन्होंने पांच वर्षों में अमेरिकी सामानों पर 500 बिलियन डॉलर खर्च करने का भी संकल्प लिया. ब्रुसेल्स स्थित ‘केप्लर’ की मुयु जू ने अनुमान लगाया कि भारत फरवरी में भी रूस से प्रतिदिन दस लाख बैरल तेल आयात कर रहा था. शुक्रवार को भारत में नए अमेरिकी राजदूत, सर्जियो गोर ने ‘पैक्स सिलिका’ कार्यक्रम में भारत के प्रवेश का स्वागत किया, जिसका उद्देश्य चीन पर निर्भर न रहने वाली हाई-टेक आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण करना है.
भारत का हिंदू दक्षिणपंथ अजेय लग रहा है, सम्भल शहर इसकी गवाही देता है
न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर मुजीब मशाल और सुहासिनी राज ने यूपी के सम्भल, जिसे हिंदू दक्षिणपंथ (हिंदू राइट) की बढ़ती ताकत का नया केंद्र माना जा रहा है, का दौरा करने के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट दी है. नवंबर 2024 में 16वीं शताब्दी की शाही जामा मस्जिद को लेकर हुए विवाद और उसके बाद हुई हिंसक झड़पों ने शहर को बदल दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू राष्ट्रवादियों ने दावा किया कि मस्जिद एक पवित्र हिंदू स्थल पर बनाई गई थी और इसे अदालतों के माध्यम से चुनौती दी.
रिपोर्ट बताती है कि हिंसा के बाद, अधिकारियों ने इंटरनेट बंद कर दिया और विरोध को कुचल दिया. पुलिस ने हिंसा के संबंध में 2,750 “अज्ञात” लोगों के खिलाफ आपराधिक शिकायतें दर्ज कीं. मारे गए और घायल हुए लोगों के परिवारों ने कहा कि उन पर पुलिस के खिलाफ शिकायत दर्ज न करने का दबाव डाला गया. एक मृतक, 17 वर्षीय अयान की मां नफीसा ने कहा, “इस नफरत ने मेरे बेटे को ले लिया.” शहर की लगभग 3,00,000 आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा मुस्लिम है, लेकिन उनका कहना है कि उन्हें अपनी आस्था की अभिव्यक्ति को निजी स्थानों तक सीमित करने के लिए मजबूर किया गया है.
लेखकों ने नोट किया कि इस नई वास्तविकता का सबसे दृश्यमान चेहरा पुलिस प्रमुख अनुज चौधरी थे, जो सोशल मीडिया पर अपनी ‘टफ-कॉप’ छवि के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने कहा कि वे केवल कानून लागू कर रहे थे. रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी उल्लेख है, जो अपनी बाहुबली (स्ट्रॉन्गमैन) छवि को आगे बढ़ाने के लिए सम्भल का उपयोग कर रहे हैं. मस्जिद का सर्वेक्षण कराने वाले वकील विष्णु शंकर जैन ने इसे “सांस्कृतिक विरासत को पुनः प्राप्त करने” का प्रयास बताया.
हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों और वकीलों का आरोप है कि पुलिस ने गवाहों को डराया और सबूत देने से रोका. पुलिस ने हिंसा को एक स्थानीय समूह द्वारा “दंगे भड़काने की साजिश” बताया. पुलिस थाने की दीवार पर महाभारत के दृश्य चित्रित किए गए हैं और शहर में अब हिंदू धार्मिक प्रदर्शनों का वर्चस्व दिखाई देता है. एक स्थानीय हिंदू नेता कांतिक्रांत तिवारी ने कहा कि अब जुलूस मुस्लिम बहुल इलाकों से आसानी से गुज़र सकते हैं, जो पहले भारी पुलिस सुरक्षा में निकलते थे.
चार साल बाद भी रूस यूक्रेन में अपनी एक घातक गलती की कीमत चुका रहा है
सीएनएन के मैथ्यू चांस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 24 फरवरी 2022 की सुबह जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, तब क्रेमलिन को उम्मीद थी कि वे 10 दिनों के भीतर यूक्रेन पर नियंत्रण कर लेंगे. लेकिन 1450 दिनों से अधिक समय बाद, यह समय सीमा बेहद भोली साबित हुई है और एक मौलिक गलत गणना (मिसकैलकुलेशन) निकली है जिसने दर्द और विनाश की भारी कीमत वसूली है.
‘सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टिक’ (सीएसआईएस) के शोध के अनुसार, पूर्ण पैमाने पर आक्रमण शुरू होने के बाद से लगभग 1.2 मिलियन रूसी सैनिक मारे गए या घायल हुए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी भी प्रमुख शक्ति द्वारा किसी भी युद्ध में हताहतों की संख्या से अधिक है. यूक्रेन के रक्षा मंत्री ने हाल ही में दावा किया कि वे अब रूसी सैनिकों को भर्ती होने की गति से तेज़ मार रहे हैं.
मैथ्यू चांस लिखते हैं कि मॉस्को की सतह पर युद्ध दूर लगता है, लेकिन रूसी अर्थव्यवस्था में अब “गंभीर श्रम की कमी” (सीवियर लेबर शॉर्टेज) और बढ़ती महंगाई जैसे संकेत दिख रहे हैं. खीरे की कीमतें, जो दिसंबर के बाद से दोगुनी हो गई हैं, लोगों के असंतोष का कारण बन रही हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, नाटो के विस्तार को रोकना रूस का एक मुख्य उद्देश्य था, लेकिन स्वीडन और फिनलैंड के शामिल होने से यह पूरी तरह विफल रहा. रूस अब व्यापार और तकनीक के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भर हो गया है, जिससे बीजिंग का पलड़ा भारी है. रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि चार साल के युद्ध ने रूस को घर पर कमज़ोर और अंतरराष्ट्रीय मंच पर छोटा कर दिया है.
‘कुछ नहीं बदलेगा, भारत शुल्क चुकाएगा, अमेरिका नहीं’; सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रंप ने जजों को ‘मूर्ख और पालतू’ बताया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जोर देकर कहा कि वैश्विक शुल्कों को रद्द करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद भारत के साथ व्यापारिक व्यवस्था में “कुछ भी नहीं बदलेगा”. इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश करने वाली वस्तुओं पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत अस्थायी आयात शुल्क लगाने की घोषणा की.
उनके दूसरे कार्यकाल के आर्थिक एजेंडे के एक मुख्य स्तंभ के लिए इसे एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है. मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स द्वारा लिखित 6-3 के निर्णय में, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ट्रंप द्वारा दुनिया भर के देशों पर लगाए गए शुल्क अवैध थे और राष्ट्रपति ने उन्हें लागू करने में अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया था.
‘पीटीआई’ और ‘टेलीग्राफ के मुताबिक, इस फैसले पर कड़ा रुख अपनाते हुए, ट्रंप ने अपने खिलाफ निर्णय देने वाले न्यायाधीशों की आलोचना की और उन्हें “मूर्ख और पालतू” करार दिया. शुक्रवार को फैसले के कुछ ही घंटों बाद व्हाइट हाउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ट्रंप ने कहा, “शुल्कों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद निराशाजनक है, और मुझे कोर्ट के कुछ सदस्यों पर शर्म आती है—देश के हित में जो सही है, उसे करने का साहस न दिखाने के लिए मुझे उन पर पूरी तरह शर्म आती है. विदेशी देश इस फैसले से उत्साहित हैं और सड़कों पर नाच रहे हैं.”
प्रेस ब्रिफिंग के दौरान, ट्रंप ने अपने उस दावे को फिर से दोहराया कि उन्होंने पिछले साल गर्मियों में शुल्क की धमकियों के जरिए भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को सुलझाया था. उन्होंने यह भी कहा कि उनके अनुरोध पर नई दिल्ली रूसी तेल खरीदने से “काफी पीछे हट गई” है. उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच हाल ही में घोषित अंतरिम व्यापार ढांचे को प्रभावित नहीं करेगा. साथ ही, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने संबंधों को “बेहतरीन” बताया.
यह पूछे जाने पर कि क्या भारत के साथ अंतरिम व्यापार समझौता ढांचा (जिस पर जल्द ही हस्ताक्षर होने की उम्मीद है) इस फैसले के बाद भी बरकरार रहेगा, ट्रंप ने उत्तर दिया, “कुछ भी नहीं बदलेगा.”
ट्रंप ने कहा, “कुछ भी नहीं बदलेगा. वे (भारत) शुल्क चुकाएंगे, और हम शुल्क नहीं चुकाएंगे. इसलिए भारत के साथ सौदा यह है कि वे शुल्क चुकाते हैं. यह पहले की स्थिति का बिल्कुल उल्टा है. जैसा कि आप जानते हैं, भारत और मेरे विचार में प्रधानमंत्री मोदी एक महान व्यक्ति हैं, वास्तव में एक महान इंसान हैं, लेकिन वे संयुक्त राज्य अमेरिका के उन लोगों की तुलना में बहुत अधिक चतुर थे जिनके वे खिलाफ थे, वे हमें लूट रहे थे. इसलिए हमने भारत के साथ एक सौदा किया. अब यह एक निष्पक्ष सौदा है, और हम उन्हें शुल्क नहीं दे रहे हैं, बल्कि वे शुल्क दे रहे हैं. हमने स्थिति को थोड़ा पलट दिया है.”
उन्होंने आगे जोड़ा, “भारत के साथ सौदा जारी है... सभी सौदे बरकरार हैं, हम बस उन्हें एक अलग तरीके से करेंगे.”
भारत के साथ संबंधों पर उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि भारत के साथ मेरे संबंध शानदार हैं और हम भारत के साथ व्यापार कर रहे हैं. भारत रूस से बाहर निकल गया. भारत रूस से अपना तेल प्राप्त कर रहा था. और मेरे अनुरोध पर वे काफी पीछे हट गए क्योंकि हम उस भयानक युद्ध को सुलझाना चाहते हैं जहाँ हर महीने 25,000 लोग मारे जा रहे हैं.”
उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनके संबंध “मैं कहूँगा कि, बहुत अच्छे हैं.” प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, ट्रंप ने दो बार अपना यह दावा दोहराया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को बढ़ने से रोका था.
ट्रंप ने दावा किया, “मैंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को भी रोका. जैसा कि आप जानते हैं, वहां 10 विमानों को मार गिराया गया था. वह युद्ध चल रहा था और शायद परमाणु युद्ध की ओर बढ़ रहा था. और कल ही, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने उन्हें (युद्ध) रोककर 3.5 करोड़ लोगों की जान बचाई.”
संवैधानिक शक्तियों का टकराव
13 महीने पहले व्हाइट हाउस लौटने के बाद से, ट्रंप का मानना था कि उनके पास वह “असाधारण शक्ति है, जिससे वे एकतरफा रूप से असीमित मात्रा, अवधि और दायरे के शुल्क लगा सकते हैं.” राष्ट्रीय आपातकाल का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था कि ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (आईईईपीए) का मतलब है कि वह अपनी पसंद की किसी भी दर पर शुल्क निर्धारित कर सकते हैं. लेकिन ट्रंप प्रशासन यह अदालत को नहीं समझा सका.
मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने फैसले में लिखा, “सरकार यह स्वीकार करती है कि शांति काल के दौरान राष्ट्रपति के पास शुल्क लगाने का कोई अंतर्निहित अधिकार नहीं है. और वे इन चुनौती दिए गए शुल्कों का बचाव राष्ट्रपति की युद्ध-निर्माण शक्तियों के रूप में नहीं कर रहे हैं. आखिर अमेरिका दुनिया के हर देश के साथ युद्ध में नहीं है.”
अदालत की इस स्पष्ट फटकार के बावजूद कि राष्ट्रपति ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है, ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा: “यह हास्यास्पद है, लेकिन ठीक है, क्योंकि हमारे पास अन्य तरीके हैं, कई अन्य तरीके हैं.”
भारतीय निर्यात पर प्रभाव:
‘पीटीआई’ और ‘टेलीग्राफ वेबडेस्क’ के मुताबिक, नए फैसले से भारतीय वस्तुओं पर प्रभावी ‘पारस्परिक शुल्क’ प्रस्तावित अंतरिम व्यापार ढांचे के तहत 18 प्रतिशत से घटकर कम हो गया है. यह निर्यातकों के लिए राहत की बात है, हालांकि इसके साथ ही 150 दिनों का एक नया वैश्विक अधिभार शासन भी शुरू हो गया है.
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (एफआईईओ) के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा कि भारतीय वस्तुओं पर अब शुल्क 10 प्रतिशत होगा. यह 10 प्रतिशत की लेवी अमेरिका में मौजूदा ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (एमएफएन) शुल्कों के अतिरिक्त है. उदाहरण के लिए, यदि किसी उत्पाद पर 5 प्रतिशत एमएफएन शुल्क लगता है, तो प्रभावी शुल्क अब 15 प्रतिशत होगा (पहले यह 5 + 25 = 30 प्रतिशत था). थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने सुझाव दिया कि भारत को अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौते का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए, क्योंकि अब पारस्परिक शुल्क भारतीय निर्यात के केवल 55 प्रतिशत मूल्य पर लागू होते हैं, जबकि लगभग 40 प्रतिशत वस्तुएं छूट वाली श्रेणियों में आती हैं.
हालांकि, कुछ क्षेत्रीय शुल्क जारी रहेंगे—जिसमें स्टील, एल्युमीनियम और तांबे पर 50 प्रतिशत और कुछ ऑटो पुर्जों पर 25 प्रतिशत शुल्क शामिल है. फैक्ट शीट में स्पष्ट किया गया है कि अमेरिकी आर्थिक जरूरतों के कारण कुछ वस्तुओं को इस अस्थायी शुल्क से छूट दी गई है. इनमें महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा उत्पाद, प्राकृतिक संसाधन, उर्वरक (जो वहां पर्याप्त मात्रा में उत्पादित नहीं होते), चुनिंदा कृषि उत्पाद जैसे बीफ, टमाटर और संतरे, फार्मास्यूटिकल्स (दवाएं), कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स, यात्री और भारी वाहन, तथा कुछ एयरोस्पेस उत्पाद शामिल हैं.
क्या कंपनियों को वापस मिलेगा $133 बिलियन का आयात शुल्क? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बढ़ी उलझन
समाचार एजेंसी “एपी” के मुताबिक, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के शुल्कों को रद्द तो कर दिया, लेकिन न्यायाधीशों ने 133 बिलियन डॉलर का एक सवाल अनुत्तरित छोड़ दिया: उस पैसे का क्या होगा जिसे सरकार ने आयात कर के रूप में पहले ही एकत्र कर लिया है और जिसे अब अवैध घोषित कर दिया गया है?
कंपनियां रिफंड (धनवापसी) के लिए कतार में लग गई हैं, लेकिन आगे की राह काफी अराजक साबित हो सकती है. व्यापारिक वकीलों का कहना है कि जब स्थिति स्पष्ट होगी, तो आयातकों को अंततोगत्वा अपना पैसा वापस मिलने की संभावना है. ‘विंसन एंड एल्किन्स’ लॉ फर्म की पार्टनर और ट्रेड लॉयर जॉयस अदेतूतू ने कहा, “कुछ समय के लिए यह सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहने वाला है.”
लॉ फर्म ‘क्लार्क हिल’ के वकीलों द्वारा ग्राहकों को भेजे गए एक नोट के अनुसार, रिफंड की प्रक्रिया अमेरिकी सीमा शुल्क और सीमा सुरक्षा (सीबीपी) एजेंसी, न्यूयॉर्क की विशेष अंतर्राष्ट्रीय व्यापार अदालत और अन्य निचली अदालतों के समन्वय से तय होने की संभावना है.
अदेतूतू ने कहा, “धनराशि बहुत बड़ी है. अदालतों के लिए यह कठिन समय होने वाला है और आयातकों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.” हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिस निर्णायक तरीके से सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के शुल्कों को खारिज किया है, उसे देखते हुए “रिफंड का कोई विकल्प न होना वास्तव में मुश्किल होगा.”
कांग्रेस का दावा: भारत-अमेरिका व्यापार समझौता मोदी की ‘बेताबी’ का नतीजा; राहुल बोले—पीएम का विश्वासघात बेनकाब
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के वैश्विक शुल्कों को रद्द किए जाने के बाद, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते में प्रधानमंत्री का “विश्वासघात” बेनकाब हो गया है.
‘पीटीआई’ के अनुसार, राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “प्रधानमंत्री दबाव में हैं. उनका विश्वासघात अब बेनकाब हो गया है. वे दोबारा बातचीत नहीं कर सकते. वे फिर से आत्मसमर्पण कर देंगे.”
कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने दावा किया कि यदि प्रधानमंत्री मोदी अपनी “कमजोर छवि” को बचाने के लिए इतने “बेताब” न होते और केवल 18 दिन और इंतजार कर लेते, तो भारतीय किसानों को पीड़ा और संकट से बचाया जा सकता था, और भारत की संप्रभुता की रक्षा की जा सकती थी.
कांग्रेस नेता ने कहा कि 2 फरवरी 2026 को राष्ट्रपति ट्रंप सबसे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के पूरा होने की घोषणा की थी. ट्रंप ने कहा था, “प्रधानमंत्री मोदी के प्रति मित्रता और सम्मान के कारण और उनके अनुरोध पर, हम तत्काल प्रभाव से संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं.”
जयराम रमेश ने सवाल उठाया, “प्रधानमंत्री मोदी को ऐसा क्या मजबूर कर रहा था कि उन्होंने 2 फरवरी की रात को ही राष्ट्रपति ट्रंप से इस व्यापार समझौते की घोषणा करवाई?”
जयराम रमेश ने सवाल किया, “उस दोपहर लोकसभा में ऐसा क्या हुआ था जिसने मोदी को इतना हताश कर दिया कि उन्हें ध्यान भटकाने के लिए व्हाइट हाउस में अपने ‘खास दोस्त’ से संपर्क करना पड़ा? भारत-अमेरिका व्यापार समझौता वास्तव में एक ‘मुसीबत’ है, जिसे प्रधानमंत्री की बेताबी और आत्मसमर्पण के कारण भारत पर थोपा जा रहा है.”
मध्यप्रदेश में 2020 से अब तक 68 हजार से अधिक महिलाएं लापता, अब भी कोई सुराग नहीं
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मध्यप्रदेश में 2020 से लापता हुई 68,334 महिलाओं का अब तक कोई पता नहीं चल सका है. विधानसभा में एक लिखित उत्तर में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि 2020 से 28 जनवरी 2026 तक पूरे मध्यप्रदेश से कुल 2,74,311 महिलाएं लापता हुई थीं. इनमें से 2,35,977 महिलाओं का पता लगा लिया गया है. हालांकि, कांग्रेस सदस्य विक्रांत भूरिया को दिए गए मुख्यमंत्री के लिखित जवाब के अनुसार, 2020 से लापता 68,334 महिलाओं का अब तक कोई सुराग नहीं मिला है, जो कि एक चौंकाने वाला आंकड़ा है.
रबींद्र नाथ चौधरी के अनुसार, राज्य में महिलाओं के लापता होने के आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य में हर दिन औसतन 130 महिलाओं के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज की जाती है. आदिवासी कांग्रेस नेता विक्रांत भूरिया ने कहा, “यह एक भयावह स्थिति है. यह राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर बड़े सवाल खड़े करती है.”
रोहित पवार का आरोप-विमान ऑपरेटर के सत्ताधारी दल के ‘शक्तिशाली’ लोगों से संबंध, विमान में पेट्रोल के कैन रखे थे
दिवंगत अजीत पवार के भतीजे और एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार ने शनिवार को आरोप लगाया कि बारामती विमान दुर्घटना में शामिल निजी जेट ऑपरेटर के संबंध “बेहद प्रभावशाली” राजनीतिक और व्यावसायिक हस्तियों से हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से इस मामले में न्याय सुनिश्चित करने का आग्रह किया.
विमान दुर्घटना पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राकांपा (एसपी) नेता ने कहा कि दिल्ली स्थित निजी जेट चार्टर ऑपरेटर वीएसआर वेंचर्स (वीएसआर एविएशन) को प्रभावशाली लोगों का समर्थन प्राप्त है, जिनमें से कुछ राज्य सरकारों में हैं और कुछ राष्ट्रीय स्तर पर सत्ताधारी दल से जुड़े हैं.
अनुपमा यादव की खबर के मुताबिक, उन्होंने यह भी दावा किया कि यदि इस जांच में वास्तविक न्याय चाहिए, तो देश के सबसे शक्तिशाली नेता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही अजीत पवार के लिए न्याय सुनिश्चित कर सकते हैं. उनके अनुसार, इस मामले में शामिल अन्य लोग भी शक्तिशाली हैं, लेकिन वर्तमान में मोदी और शाह देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्तित्व हैं.
रोहित पवार ने आगे कहा कि इस घटना के पीछे दो संभावित कोण हो सकते हैं—राजनीतिक या व्यावसायिक, और उनकी पार्टी यह निर्धारित करने की कोशिश कर रही है कि इसमें कौन सा कोण शामिल था. उन्होंने कहा, “एक और बात यह है कि कुछ ताकतें वहां के विमर्श को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही हैं.”
कई अनियमितताओं की ओर इशारा करते हुए, रोहित पवार ने कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (सीवीआर) को लेकर भी चिंता जताई. उन्होंने दावा किया कि विमान के सीवीआर की रिकॉर्डिंग क्षमता केवल 30 मिनट की थी, जबकि नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) की आवश्यकता दो घंटे की है. उन्होंने सवाल उठाया, “यदि विमान का सीवीआर केवल 30 मिनट रिकॉर्ड कर सकता था जबकि नियम दो घंटे का है, तो उस विमान का पंजीकरण कैसे हुआ? यह हम सभी जानना चाहते हैं.”
उन्होंने कहा कि दुर्घटना से ठीक पहले के अंतिम 30 मिनट, जो सबसे नवीनतम रिकॉर्ड किया गया हिस्सा है, में महत्वपूर्ण सुराग हो सकते हैं. “उन आखिरी 30 मिनटों में जो कुछ भी हुआ, वह केवल सीवीआर के माध्यम से ही जाना जा सकता है. कहा जा रहा है कि यह क्षतिग्रस्त हो गया है, लेकिन हमें इस पर विश्वास नहीं है. बात यह है कि वास्तव में क्या रिकॉर्ड किया गया था. उस रिकॉर्डिंग से कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं, ऐसे तथ्य जिन्हें शायद वीसीआर या उसका समर्थन करने वाले लोग उजागर नहीं करना चाहते.”
विमान के ‘ब्लैक बॉक्स’ के बारे में बात करते हुए रोहित पवार ने कहा, “जब दुर्घटना हुई, तो केवल एक धमाका नहीं हुआ, बल्कि कई धमाके हुए... उड़ान संचालित करने वाली कंपनी वीसीआर के साथ बहुत सारी समस्याएं हैं. वे यांत्रिक और रखरखाव जुड़ी समस्याएं हैं... विमान में जहां बैग रखे जाते हैं, वहां अतिरिक्त पेट्रोल के कैन रखे गए थे, और इसी वजह से आग लगी, इसलिए इसकी जांच की जानी चाहिए.”
‘घंटा’ बोलने वाले विजयवर्गीय के फिर विवादित बोल, कहा- भागीरथपुरा में ‘अशिक्षित’ लोग रह रहे हैं
इंदौर में दूषित पानी पीने से हुईं दर्जनों मौतों के मामले में एक पत्रकार से “घंटा” बोलने वाले मध्यप्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने एक बार फिर विवादित टिप्पणी की है. “द इंडियन एक्सप्रेस” के अनुसार, विजयवर्गीय ने शुक्रवार को राज्य विधानसभा में घटना की नैतिक जिम्मेदारी ली. कहा कि “इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में हुई यह घटना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और निश्चित रूप से इंदौर पर एक कलंक है, जो स्वच्छता के लिए देश भर में लगातार अपनी पहचान बना रहा है.” लेकिन, इसी के साथ उन्होंने राज्य सरकार का बचाव करते हुए विवादास्पद टिप्पणी भी कर दी. उन्होंने कहा, “भागीरथपुरा में कुछ अशिक्षित लोग रह रहे हैं, जिससे नगर निगम के लिए छोटा सा काम करना भी मुश्किल हो जाता है. यहाँ तक कि नगर निगम के कर्मचारी भी अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभा पा रहे थे.”
उल्लेखनीय है कि 24 दिसंबर 2025 से इस साल 6 जनवरी के बीच, भागीरथपुरा में कथित तौर पर दूषित पानी पीने से 23 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. इससे पहले, विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने जवाबदेही पर सरकार को घेरा था. सिंघार ने कहा, “अधिकारियों को हटाया गया, कुछ को निलंबित किया गया. लेकिन सरकार और मुख्यमंत्री ने न तो जिम्मेदारी ली और न ही नगरीय प्रशासन मंत्री को हटाया.”
इसका जवाब में कमियों को औपचारिक रूप से स्वीकार करते हुए विजयवर्गीय ने कहा, “हम स्वीकार करते हैं कि घटना हुई है. हम यह भी स्वीकार करते हैं कि यह लापरवाही के कारण हुई. मुख्यमंत्री ने लापरवाही बरतने वालों को दंडित किया है और हमने इससे सबक सीखा है.”
विपक्ष द्वारा लाए गए स्थगन प्रस्ताव का जवाब देते हुए उन्होंने सदन को बताया, “यह हमारे लिए एक सबक है. हम अपने घावों को सह रहे हैं, उन्हें दिखा नहीं रहे हैं; हम उन्हें भरने की कोशिश कर रहे हैं, और हमें विश्वास है कि इंदौर पर लगा यह कलंक धुल जाएगा.”
छेड़छाड़ के आरोपी ने जेल से छूटने के बाद धमकाया, 14 साल की दलित ने जान दे दी
‘मूकनायक’ की रिपोर्ट के मुताबिक़, उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में 14 साल की एक दलित नाबालिग ने घर की छत पर फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली. परिवार का आरोप है कि कुछ दिन पहले छेड़छाड़ के मामले में जेल गया आरोपी ज़मानत पर छूटकर आया था और उसने बच्ची को जान से मारने की धमकी दी थी, जिससे वह गहरे डर और तनाव में थी.
घटना बुधवार दोपहर की है. उस समय बच्ची के पिता खेत में मज़दूरी करने गए थे और मां लकड़ियां लेने बाहर गई थी. घर लौटने पर उन्होंने बेटी को फंदे से लटका पाया.
पिता के मुताबिक़,10 जनवरी को उनकी बेटी चारा लेने खेत गई थी, जहां 25 वर्षीय लवलेश कुमार ने उसे झाड़ियों में खींचकर छेड़छाड़ की. शोर मचाने पर वह जातिसूचक गालियां देते हुए भाग गया. परिवार की शिकायत पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. करीब एक हफ्ते पहले आरोपी को ज़मानत मिल गई. बाहर आने के बाद उसने दुकान पर बच्ची को रोककर केस वापस न लेने पर जान से मारने की धमकी दी. पिता का कहना है कि इसके बाद से उनकी बेटी बेहद डरी हुई थी.
ससुराल से बचकर निकली समलैंगिक महिला को बजरंग दल की भीड़ ने थाने में घेरा
9 फरवरी 2026 को एक युवा समलैंगिक (क्वीयर) महिला कई घंटों तक दिल्ली के फतेहपुर बेरी थाने में यह बयान दर्ज कराने की कोशिश करती रही कि वह अपनी मर्ज़ी से अपने ससुराल को छोड़ कर दिल्ली आयी है. उसके ससुराल वालों ने उत्तर प्रदेश में उसके “लापता” होने की शिकायत दर्ज कराई थी. महिला ने आरोप लगाया कि उसकी शादी जबरन कराई गई थी और पति ने उसके साथ शारीरिक, मानसिक और यौन हिंसा की. उसने यह भी कहा कि उसे समलैंगिक होने को लेकर गालियां दी जाती थीं और दहेज को लेकर प्रताड़ित किया जाता था. यह रिपोर्ट क्वीरबीट ने रिपोर्ट की है.
महिला 9 फरवरी को घर से निकलकर दिल्ली में एक सुरक्षित आश्रय गृह में रहने लगी थी, जहां उसे नज़रिया फाउंडेशन नाम की क्वीयर नारीवादी संस्था ने मदद दी. उसने ईमेल और लिखित बयान के ज़रिये पुलिस को बताया था कि वह अपनी मर्ज़ी से गई है और वापस नहीं लौटना चाहती. 19 फरवरी को वह अपना बयान दर्ज कराने थाने पहुंची.
इसी दौरान करीब 15–30 लोगों की भीड़, जिन्हें मौजूद लोगों ने बजरंग दल से जुड़ा बताया, थाने के बाहर जमा हो गई. भीड़ ने “जय श्री राम” के नारे लगाए और महिला की मदद कर रहे वकीलों और कार्यकर्ताओं पर धार्मिक परिवर्तन और मानव तस्करी के आरोप लगाए. एक वकील के साथ मारपीट की गई, उनके बाल खींचे गए और थप्पड़ मारे गए. एक पत्रकार को भी धमकाकर वहां से जाने पर मजबूर किया गया.
नज़रिया फाउंडेशन की सदस्य रितुपर्णा बोरा ने पुलिस में शिकायत दी कि भीड़ ने उन्हें घेरकर धमकाया और डंडों से मारने की धमकी दी. बजरंग दल के दक्षिण दिल्ली जिला सचिव सूरज अग्रवाल ने माना कि उनके लोग वहां मौजूद थे, लेकिन हिंसा के आरोपों से इनकार किया.
मौजूद लोगों के मुताबिक़ पुलिस ने हालात क़ाबू करने में खास पहल नहीं की. महिला से बार-बार पूछा गया कि क्या वह वापस नहीं जाना चाहती, और उसे चेतावनी दी गई कि बाहर की भीड़ से सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती. देर रात करीब 11 बजे पुलिस महिला को एक अज्ञात सुरक्षित स्थान पर ले गई.
उत्तर प्रदेश पुलिस अधिकारी ने पुष्टि की कि महिला बालिग है और उसने साफ कहा कि वह अपने ससुराल या मायके वापस नहीं जाना चाहती. बावजूद इसके, पूरे दिन थाने के बाहर तनाव और हमले की घटनाएं होती रहीं.
‘लाडकी बहिन’ योजना: पंजीकरण 2.6 करोड़, शुरूआत में 2.4 करोड़ को लाभ, अब आंकड़ा घटकर 1.57 करोड़ हुआ
महाराष्ट्र सरकार की ‘मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना’ की घोषणा के दो साल बाद भी कई महिलाओं को इसका फ़ायदा नहीं मिल पाया है. मुंबई के संगमनगर में रहने वाली 49 साल की राधिका कांबले भी उन्हीं में से एक हैं. पति की मौत के बाद घर संभाल रहीं राधिका कहती हैं कि प्रक्रिया इतनी जटिल थी कि वे लाभार्थी नहीं बन सकीं. उनका कहना है कि आवेदन के समय उनसे मंगलसूत्र हटाकर फोटो खिंचवाने को कहा गया, ताकि अधिकारी “ज़रूरतमंद” महिलाओं की पहचान कर सकें.
‘द हिंदू’ में विनय देशपांडे पंडित की रिपोर्ट के अनुसार, यह योजना 28 जून 2024 को तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने शुरू की थी. इसका मक़सद 21 से 65 साल की कम आय वाली महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये सीधे बैंक खाते में देना था. परिवार की सालाना आय 2.5 लाख रुपये से कम होनी चाहिए. सरकारी नौकरी, टैक्स देने वाले परिवार या कार मालिक परिवार की महिलाएं पात्र नहीं थीं. एक परिवार से अधिकतम दो महिलाएं ही लाभ ले सकती थीं.
शुरुआत में भारी संख्या में आवेदन आए. अगस्त 2024 में 1.5 करोड़ महिलाओं को पहली किस्त मिली. सितंबर में पंजीकरण 2.6 करोड़ तक पहुंचा, लेकिन जांच के बाद 2.4 करोड़ को ही लाभ मिला. बाद में ई-केवाईसी अनिवार्य होने से संख्या घटकर दिसंबर 2025 तक 1.57 करोड़ रह गई. जुलाई 2025 में गड़बड़ियों के चलते 26.34 लाख खातों पर रोक लगाई गई. 24 लाख लाभार्थियों को गलती से सरकारी कर्मचारी बताकर किस्त रोकी गई. तकनीकी दिक्कतें, ओटीपी फेल होना, आधार-बैंक लिंकिंग में त्रुटियां जैसी समस्याएं लगातार सामने आईं. अब ई-केवाईसी की अंतिम तारीख 31 मार्च 2026 तक बढ़ाई गई है.
विपक्ष ने सरकार पर लाभार्थियों की संख्या घटाने और योजना से राज्य के ख़ज़ाने पर बोझ डालने का आरोप लगाया है. एनसीपी (एसपी) सांसद सुप्रिया सुले ने इसे 4,800 करोड़ रुपये का “घोटाला” बताया और कहा कि 14,000 पुरुषों को भी इसका लाभ मिला.
कई महिलाएं कहती हैं कि कुछ महीनों तक पैसे आए, फिर अचानक बंद हो गए. राधिका कांबले कई बार बैंक और साइबर कैफे के चक्कर लगाती रहीं, लेकिन कोई समाधान नहीं मिला. इसी तरह शकुंतला देवी और उनकी बेटी नंदिनी को भी बैंक और आधार लिंकिंग की समस्याओं के कारण किस्त नहीं मिली. कुछ महिलाओं के खाते बंद हो गए या पोर्टल पर रिकॉर्ड “इनएक्टिव” दिखा.
हालांकि जिन महिलाओं को पैसा मिल रहा है, वे कहती हैं कि इससे दवा, बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च में मदद मिलती है. सरकार का दावा है कि इस योजना से महिलाओं को आर्थिक मज़बूती मिली और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा मिला. लेकिन ज़मीनी स्तर पर तकनीकी गड़बड़ियां और दस्तावेज़ी प्रक्रियाएं अब भी कई महिलाओं के लिए बड़ी बाधा बनी हुई हैं.
क्या भारत-पाकिस्तान की प्रतिद्वंद्विता मर चुकी है?
सुशांत सिंह ने क्रिकेट एटऑल में भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट प्रतिद्वंद्विता की वर्तमान स्थिति का एक गहरा राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण किया है. वे कहते हैं कि हाल के वर्षों में भारत का क्रिकेट में दबदबा इतना बढ़ गया है कि अब इसे एकतरफा माना जाने लगा है. 1986 से लेकर 2000 के दशक की शुरुआत तक पाकिस्तान का पलड़ा भारी था, लेकिन 2007 के बाद से, और विशेष रूप से पिछले 15 वर्षों में, भारत ने आईसीसी टूर्नामेंटों में पाकिस्तान को लगातार हराया है. इस बदलाव का मुख्य कारण दोनों देशों के क्रिकेट बोर्डों के बीच भारी आर्थिक असमानता है. बीसीसीआई की अरबों डॉलर की कमाई और आईपीएल जैसे पेशेवर ढांचे ने भारतीय क्रिकेट को एक ‘इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स’ बना दिया है, जबकि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) राजनीतिक अस्थिरता और कम राजस्व ($55 मिलियन वार्षिक) से जूझ रहा है. हालांकि, लेखक का मानना है कि पाकिस्तान की कच्ची प्रतिभा को कभी भी कम नहीं आंका जाना चाहिए, क्योंकि खेल के चक्र कभी भी बदल सकते हैं. लेख का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि “प्रतिद्वंद्विता मर चुकी है” का नैरेटिव केवल क्रिकेट के बारे में नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक उपकरण है. यह 2014 के बाद के भारत के ‘हिंदू बहुसंख्यक राष्ट्रवाद’ को दर्शाता है, जहाँ पाकिस्तान पर जीत को खेल की उपलब्धि के बजाय राष्ट्रीय और सांस्कृतिक श्रेष्ठता के प्रमाण के रूप में पेश किया जाता है. पाकिस्तानी टीम का मज़ाक उड़ाना और उन्हें कमजोर दिखाना एक तरह का ‘विजयोल्लास’ है.
विडंबना यह है कि भले ही भारत में यह कहा जा रहा हो कि प्रतिद्वंद्विता ख़त्म हो गई है, लेकिन आईसीसी (जो वास्तव में बीसीसीआई का ही दूसरा रूप है) जानबूझकर टूर्नामेंटों में भारत-पाकिस्तान के मैच करवाता है क्योंकि यह आर्थिक रूप से सबसे आकर्षक है. यह प्रतिद्वंद्विता तकनीकी रूप से मर चुकी है लेकिन इसे उन्हीं लोगों द्वारा ‘लाइफ सपोर्ट’ पर रखा गया है जो इसे खत्म बताते हैं, क्योंकि उन्हें इसकी राजनीतिक और वाणिज्यिक ज़रूरत है. अंत में, लेखक चेतावनी देते हैं कि खेल अनिश्चितताओं से भरा है और पाकिस्तान कभी भी वापसी कर सकता है, इसलिए इस एकतरफा स्थिति को स्थायी मानना एक गलती होगी.
सऊदी अरब की गुफाओं में मिले ममीकृत चीते, पुनर्वास प्रयासों में मिलेगी मदद
सीएनएन की टेलर निकिओली की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब के ‘नेशनल सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ’ के वैज्ञानिकों को उत्तरी शहर अरार के पास पांच गुफाओं में सात प्राकृतिक रूप से ममीकृत (ममीफाइड) चीते मिले हैं. 2022 और 2023 में किए गए सर्वेक्षण के दौरान मिले ये अवशेष काफी हद तक सुरक्षित हैं. तीन ममियों के डीएनए विश्लेषण से पता चला है कि यह खोज अरब प्रायद्वीप में चीतों को फिर से बसाने (रिइंट्रोडक्शन) के प्रयासों में मदद कर सकती है.
पहले यह माना जाता था कि सऊदी अरब में केवल एशियाई चीता (एशियाटिक चीता) ही मौजूद था, लेकिन अध्ययन से पता चला है कि सबसे पुराने नमूनों में से दो ‘उत्तर-पश्चिमी अफ्रीकी चीते’ (नॉर्थवेस्ट अफ्रीकन चीता) के आनुवंशिक रूप से करीब थे. इससे साबित होता है कि अरब प्रायद्वीप में चीतों की कम से कम दो उप-प्रजातियां (सबस्पीशीज़) घूमती थीं. कार्बन डेटिंग से पता चला कि सबसे पुराना नमूना लगभग 4,000 साल पुराना था, जबकि कुछ अवशेष 130 से 1,870 साल पुराने हैं.
भारत में स्थित पशु चिकित्सा वन्यजीव विशेषज्ञ एड्रियन टॉर्डिफ ने कहा कि यह खोज आश्चर्यजनक है क्योंकि कुछ अवशेष केवल एक सदी पुराने हैं, जो बताते हैं कि चीते लोगों की सोच से कहीं अधिक हाल तक वहां जीवित थे. यह खोज संरक्षणवादियों को स्पष्ट सबूत देती है कि किस प्रजाति को वहां फिर से बसाना पारिस्थितिक रूप से उपयुक्त होगा.
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